फेंकी हुई माला
The garland that was thrown away — Indra tosses aside a sage’s garland, and Lakṣmī leaves
यतः सत्त्वं ततो लक्ष्मीः सत्त्वं भूत्यनुसारि च ।
जय श्री कृष्ण।
कुछ साल पहले तक सब ठीक था। अच्छा कारोबार। बड़ा घर। गाड़ी। रिश्तेदार हर त्योहार पर घर आते थे। फिर एक-एक करके सब खिसकने लगा।
एक बड़ा ऑर्डर रद्द हुआ। फिर एक साझेदार अलग हुआ। फिर बैंक के फ़ोन आने लगे। और जो रिश्तेदार हर त्योहार पर आते थे… अब फ़ोन भी नहीं उठाते।
और रात को एक सवाल घूमता है — "कहाँ ग़लती हुई? लक्ष्मी रूठ क्यों गईं?"
आज की कथा उस राजा की है, जिसके पास तीनों लोक थे। और जो एक माला की वजह से सब खो बैठा। पर ये कथा यहीं ख़त्म नहीं होती। ये बताती है कि लक्ष्मी लौटती कैसे हैं।
दुर्वासा ऋषि। महादेव के अंश। धरती पर घूम रहे थे। रास्ते में एक विद्याधरी मिली, जिसके हाथ में एक दिव्य माला थी। सन्तानक फूलों की। ऐसी सुगंध कि पूरा जंगल महक उठे।
दुर्वासा ने माला माँगी। विद्याधरी ने आदर से प्रणाम करके दे दी। और ऋषि ने उसे अपने सिर पर रख लिया।
आगे चले, तो सामने से आते दिखे देवराज इन्द्र। ऐरावत हाथी पर, देवताओं के साथ, पूरे ठाठ से। दुर्वासा ने अपने सिर से वो माला उतारी, और इन्द्र की ओर फेंक दी। प्रसाद की तरह।
इन्द्र ने माला ली… और ऐरावत के मस्तक पर रख दी।
मदान्धकारिताक्षोऽसौ गन्धाकृष्टेन वारणः ।
करेणाघ्राय चिक्षेप तां स्रजं धरणीतले ॥
और हाथी ने? मद में अंधा था। सुगंध से खिंचकर सूँड़ से माला सूँघी… और ज़मीन पर फेंक दी।
दुर्वासा का क्रोध भड़क उठा। और उन्होंने जो कहा, वो सुनिए। उन्होंने इन्द्र की असली ग़लती बताई —
प्रसाद इति नोक्तं ते प्रणिपातपुरःसरम् ।
हर्षोत्फुल्लकपोलेन न चापि शिरसा धृता ॥
"तुमने झुककर 'बड़ी कृपा' नहीं कहा। ख़ुशी से खिले चेहरे के साथ उसे अपने सिर पर नहीं रखा।"
सुना? माला हाथी ने फेंकी थी। पर दोष इन्द्र का था। क्योंकि जो चीज़ सिर पर रखनी थी, वो इन्द्र ने हाथी के सिर पर रख दी। यानी ग़लती बड़ी नहीं थी। एक छोटी-सी लापरवाही। एक छोटा-सा घमंड। "अरे, एक माला ही तो है।"
और शाप — "तेरे तीनों लोकों की लक्ष्मी नष्ट हो जाएगी।"
इन्द्र घबराए। तुरंत हाथी से उतरे, पैरों में गिरे, मनाने लगे। और अब पहली चौंकाने वाली बात सुनिए। दुर्वासा ने क्या कहा?
नाहं कृपालुहृदयो न च मां भजते क्षमा ।
अन्ये ते मुनयः शक्र दुर्वाससमवेहि माम् ॥
"मैं दयालु दिल वाला नहीं हूँ। मुझमें क्षमा नहीं रहती। वो दूसरे मुनि होंगे, इन्द्र। मुझे दुर्वासा जानो।"
और आगे एक बड़ी गहरी बात कही — "गौतम, वसिष्ठ जैसे दयालु ऋषियों ने तुम्हारी इतनी तारीफ़ की, कि तुम घमंडी हो गए।" यानी ज़्यादा तारीफ़ भी कभी-कभी आदमी को गिरा देती है।
और फिर वही हुआ।
ततः प्रभृति निःश्रीकं सशक्रं भुवनत्रयम् ।
मैत्रेयासीदपध्वस्तं सङ्क्षीणौषधिवीरुधम् ॥
उस दिन से तीनों लोक श्रीहीन हो गए। जड़ी-बूटियाँ, बेलें सूखने लगीं। यज्ञ बंद। तपस्वियों ने तप छोड़ दिया। लोगों का दान-धर्म में मन नहीं लगा। सब लोग छोटी-छोटी चीज़ों के लालच में पड़ गए।
और यहाँ दूसरी चौंकाने वाली बात है। विष्णु पुराण कहता है कि लक्ष्मी के जाने से सिर्फ़ पैसा नहीं गया। कुछ और भी गया।
यतः सत्त्वं ततो लक्ष्मीः सत्त्वं भूत्यनुसारि च ।
निःश्रीकाणां कुतः सत्त्वं विना तेन गुणाः कुतः ॥
"जहाँ सत्त्व है, वहाँ लक्ष्मी। और सत्त्व भी लक्ष्मी के पीछे चलता है।" यानी अच्छाई और समृद्धि एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चलती हैं। एक जाती है, तो दूसरी भी ढीली पड़ जाती है।
इसीलिए मुश्किल में आदमी का स्वभाव भी बदलने लगता है। चिड़चिड़ापन, शक, हर किसी पर ग़ुस्सा। विष्णु पुराण कहता है — अपमानित होने पर अच्छे-भले आदमी की बुद्धि भी बिगड़ जाती है।
और मौक़ा देखकर दैत्यों ने हमला किया। कमज़ोर पड़े देवता हार गए।
अब देवता कहाँ गए? पहले ब्रह्मा के पास। और ब्रह्मा ने कहा — "मेरे पास नहीं। चलो, उनके पास चलते हैं, जो शरणागतों का दुख हरते हैं।"
सब क्षीरसागर के किनारे पहुँचे। लंबी स्तुति की। और उस स्तुति में देवताओं ने एक बहुत सच्ची बात कही —
तावदार्त्तिस्तथा वाञ्छा तावन्मोहस्तथाऽसुखम् ।
यावन्न याति शरणं त्वामशेषाघनाशनम् ॥
"पीड़ा, इच्छा, मोह और दुख… तभी तक रहते हैं, जब तक जीव आपकी शरण में नहीं आता।"
और शंख-चक्र-गदा लिए भगवान प्रकट हुए। प्रसन्न होकर बोले —
तेजसो भवतां देवाः करिष्याम्युपबृंहणम् ।
"देवताओ, मैं तुम्हारा तेज फिर से बढ़ाऊँगा। पर जो मैं कहूँ, वो करो।"
और उन्होंने क्या कहा? "दैत्यों के साथ मिलकर समुद्र मथो।" जिनसे अभी-अभी हारे थे, उन्हीं के साथ! प्यार से समझाकर, बराबर हिस्सा देने का वादा करके।
यानी लक्ष्मी लौटाने का रास्ता आसान नहीं था। मेहनत चाहिए थी। धीरज चाहिए था। और कभी-कभी उनसे भी हाथ मिलाना था, जिनसे मन नहीं मिलता।
मंथन शुरू हुआ। भगवान ख़ुद कछुआ बनकर नीचे पर्वत थामे रहे, एक रूप से देवताओं के बीच, एक रूप से दैत्यों के बीच, और एक बड़े रूप से ऊपर पर्वत दबाए रहे।
और निकलने लगा — पहले सुरभि गाय। फिर वारुणी। फिर पारिजात। फिर अप्सराएँ। फिर चन्द्रमा, जिसे महादेव ने लिया। और विष? विष्णु पुराण में उसे नागों ने ग्रहण किया।
फिर धन्वन्तरि, हाथ में अमृत का कमण्डलु लिए। और फिर…
तया विलोकिता देवा हरिवक्षःस्थलस्थया ।
लक्ष्म्या मैत्रेय सहसा परां निर्वृतिमागताः ॥
खिले कमल पर बैठी, हाथ में कमल लिए, श्री देवी प्रकट हुईं। ऋषियों ने श्रीसूक्त गाया। गंगा आदि नदियाँ स्नान का जल लेकर आईं। और सबके देखते-देखते, लक्ष्मी जी जाकर विराजीं… हरि के वक्षःस्थल पर।
और वहाँ से उन्होंने देवताओं की ओर देखा। बस एक नज़र। और देवता परम आनंद से भर गए।
ध्यान दीजिए। लक्ष्मी लौटीं… पर इन्द्र के पास नहीं। विष्णु के पास। और वहाँ से नज़र डालकर सबको भर दिया। और जो दैत्य विष्णु से विमुख थे, उन्हें लक्ष्मी ने छोड़ दिया। वो अमृत का कलश छीनकर भागे भी, पर भगवान ने स्त्री का मोहक रूप लेकर वो कलश देवताओं को दिला दिया।
फिर इन्द्र ने सिंहासन पर बैठकर लक्ष्मी जी की स्तुति की। एक बहुत सुंदर स्तुति।
नमस्ये सर्वलोकानां जननीमब्जसम्भवाम् ।
श्रियमुन्निद्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम् ॥
"सब लोकों की माता, कमल से जन्मी, खिले कमल जैसी आँखों वाली, विष्णु के वक्ष पर विराजने वाली श्री को मेरा नमस्कार।"
त्वया देवि परित्यक्तं सकलं भुवनत्रयम् ।
विनष्टप्रायमभवत्त्वयेदानीं समेधितम् ॥
"देवी, आपने छोड़ा, तो तीनों लोक लगभग नष्ट हो गए। आप आईं, तो फिर से भर गए।"
और तीसरी बात — इन्द्र ने जो वर माँगा, वो सुनिए। लक्ष्मी जी बोलीं, "वर माँगो।" इन्द्र ने अपने लिए नहीं माँगा। पहला वर — "आप तीनों लोकों को कभी मत छोड़िए।" और दूसरा — "जो कोई इस स्तुति से आपको याद करे, उसे भी कभी मत छोड़िए।"
यश्च सायं तथा प्रातः स्तोत्रेणानेन मानवः ।
मां स्तोष्यति न तस्याहं भविष्यामि पराङ्मुखी ॥
और लक्ष्मी जी ने वचन दिया — "जो सुबह-शाम इस स्तुति से मुझे याद करेगा, उससे मैं कभी मुँह नहीं मोड़ूँगी।"
और विष्णु पुराण एक आख़िरी बात कहता है — जब-जब भगवान अवतार लेते हैं, लक्ष्मी उनके साथ आती हैं।
राघवत्वेऽभवत्सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनि ।
श्रीराम बने, तो वो सीता बनीं। श्रीकृष्ण बने, तो रुक्मिणी। लक्ष्मी कभी विष्णु से अलग नहीं होतीं। देवताओं के बीच दिव्य रूप में, मनुष्यों के बीच मानवी रूप में।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली। प्रसाद को सिर पर रखिए। इन्द्र ने एक माला को हल्के में लिया। जो कुछ मिला है — नौकरी, सेहत, परिवार, बड़ों का आशीर्वाद — उसे "एक माला ही तो है" मत समझिए। रोज़ एक बार झुककर कहिए, "बड़ी कृपा।"
दूसरी। सब खो जाए, तो पहले शरण, फिर मंथन। देवता पहले भगवान के पास गए, फिर समुद्र मथा। आप भी पहले प्रार्थना कीजिए। फिर मेहनत से मत भागिए। लक्ष्मी लौटती हैं, पर मंथन के बाद।
और तीसरी। लक्ष्मी को नहीं, लक्ष्मी-पति को पकड़िए। लक्ष्मी अकेले नहीं रहतीं। वो हमेशा विष्णु के वक्ष पर रहती हैं। जिस घर में नारायण का नाम है, वहाँ से वो कभी नहीं जातीं। और सत्त्व रखिए। ईमानदारी, शांति, अच्छाई। "यतः सत्त्वं ततो लक्ष्मीः।"
तो अगली बार, जब लगे कि सब कुछ हाथ से फिसल रहा है… जब बैंक के फ़ोन डराएँ, जब अपने भी मुँह फेर लें…
तो उस फेंकी हुई माला को याद कीजिए। एक छोटी-सी लापरवाही… और तीनों लोक सूने।
पर याद रखिए, वो माला फिर से खिली थी। क्षीरसागर के कमलों में।
शरण लीजिए। मंथन कीजिए। लक्ष्मी लौटेंगी। नारायण के साथ।
जय श्री कृष्ण।
नमस्ये सर्वलोकानां जननीमब्जसम्भवाम् ।
श्रियमुन्निद्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम् ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.प्रसाद को सिर पर रखिए। इन्द्र ने एक माला को हल्के में लिया। जो कुछ मिला है — नौकरी, सेहत, परिवार, बड़ों का आशीर्वाद — उसे "एक माला ही तो है" मत समझिए। रोज़ एक बार झुककर कहिए, "बड़ी कृपा।"
- 2.सब खो जाए, तो पहले शरण, फिर मंथन। देवता पहले भगवान के पास गए, फिर समुद्र मथा। आप भी पहले प्रार्थना कीजिए। फिर मेहनत से मत भागिए। लक्ष्मी लौटती हैं, पर मंथन के बाद।
- 3.लक्ष्मी को नहीं, लक्ष्मी-पति को पकड़िए। लक्ष्मी अकेले नहीं रहतीं। वो हमेशा विष्णु के वक्ष पर रहती हैं। जिस घर में नारायण का नाम है, वहाँ से वो कभी नहीं जातीं। और सत्त्व रखिए। ईमानदारी, शांति, अच्छाई। "यतः सत्त्वं ततो लक्ष्मीः।"