सच की क़ीमत

The price of truth — Hariścandra loses kingdom, wife and son, and keeps his word

The recording opens here soon — the whole satsang is below to read.

अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेकं विशिष्यते ।
देवीभागवत 7.21.8

जय माता दी।

आज उनके लिए, जिन्होंने सच बोलकर कुछ खोया है।

ऑफ़िस में ग़लत बिल पर साइन करने से मना किया, और प्रमोशन रुक गया। रिश्वत नहीं दी, तो फ़ाइल महीनों अटकी रही। किसी ग़लत बात पर गवाही नहीं बदली, तो अपने ही रिश्तेदार दुश्मन बन गए।

और फिर रात को मन पूछता है — "क्या फ़ायदा हुआ? जो झूठ बोलते हैं, वो तो आराम से हैं। मैं ही बेवक़ूफ़ था।"

आज उस राजा की कथा, जिसने सच की इतनी बड़ी क़ीमत चुकाई, जितनी शायद किसी ने नहीं चुकाई। राज्य गया। पत्नी बिकी। बेटा बिका। ख़ुद श्मशान में दास बना। और फिर भी… सच नहीं छोड़ा।

अयोध्या के राजा हरिश्चन्द्र। सूर्यवंशी। ऐसे दानी, कि राजसूय यज्ञ में सबके सामने व्रत लिया था — "मेरे लिए कुछ भी अदेय नहीं।"

और उनकी परीक्षा लेने आए महर्षि विश्वामित्र। एक दिन राजा शिकार में एक जंगली सूअर का पीछा करते-करते भटक गए। अकेले। भूखे, प्यासे। तभी एक बूढ़ा ब्राह्मण मिला। वेश बदले हुए विश्वामित्र।

बातों-बातों में राजा ने दान का वचन दे दिया। "जो चाहें, माँग लीजिए।" और ब्राह्मण ने माँगा… पूरा राज्य। हाथी, घोड़े, रथ, ख़ज़ाने समेत।

राजा ने कह दिया — "दिया।" और ब्राह्मण बोला — "लिया। अब दक्षिणा दो। बिना दक्षिणा के दान अधूरा है। ढाई भार सोना।"

जिसका सब कुछ अभी-अभी दान हो गया… उससे सोना माँगा जा रहा है।

अगली सुबह विश्वामित्र आए। "राज्य छोड़ो। और दक्षिणा दो।"

हरिश्चन्द्र ने अपना राजमहल छोड़ा। पत्नी शैब्या और छोटा बेटा रोहित साथ चल पड़े। पूरी अयोध्या रो रही थी। "हाय राजा, ये क्या हुआ!"

और नगर के बाहर विश्वामित्र फिर खड़े थे। "सोना दो। या साफ़ कह दो, 'नहीं दूँगा'। मैं चला जाऊँगा।"

अब ध्यान दीजिए। राजा के पास एक आसान रास्ता था। बस इतना कहना था — "नहीं है, नहीं दूँगा।" कोई अदालत नहीं, कोई गवाह नहीं।

अदत्त्वा ते हिरण्यं वै न करिष्यामि भोजनम् ।
7.20.1

और राजा ने कहा — "आपको सोना दिए बिना मैं भोजन नहीं करूँगा। ये मेरी प्रतिज्ञा है।"

और उन्होंने एक महीने की मोहलत माँगी। और काशी पहुँचे। सोचा, यहाँ ख़ुद को बेचकर ऋण चुकाऊँगा।

मोहलत का आख़िरी दिन। आधा दिन बचा है। विश्वामित्र आए — "शाम तक दक्षिणा नहीं मिली, तो शाप दूँगा।"

राजा टूट गए। ज़मीन पर गिर पड़े। और तब रानी शैब्या ने वो कहा, जो कोई सोच नहीं सकता।

नातः परतरं धर्मं वदन्ति पुरुषस्य च । यादृशं पुरुषव्याघ्र स्वसत्यस्यानुपालनम् ॥
7.20.30

"महाराज, अपने सच को निभाने से बड़ा कोई धर्म नहीं। मुझे बेच दीजिए। और ब्राह्मण का ऋण चुकाइए।"

राजा ये सुनकर बेहोश हो गए। होश आया तो बोले, "तुम ये कैसे कह सकती हो?" पर शैब्या बार-बार कहती रहीं — "जुए के लिए नहीं, शराब के लिए नहीं, भोग के लिए नहीं। सच के लिए। बेच दीजिए।"

और रानी ने एक बार ये भी कहा — "किसी धनी ब्राह्मण से माँग लीजिए।" और राजा का उत्तर सुनिए —

असिना तीक्ष्णधारेण वरं जिह्वा द्विधा कृता । न तु मानं परित्यज्य देहि देहीति भाषितम् ॥
7.21.21

"तीखी तलवार से मेरी जीभ के दो टुकड़े हो जाएँ, वो अच्छा। पर स्वाभिमान छोड़कर 'दो, दो' कहना नहीं।"

और फिर काशी के बाज़ार में… एक राजा ने अपनी रानी को खड़ा किया। आँसुओं से रुँधे गले से पुकारा — "किसी को दासी चाहिए?"

एक बूढ़ा ब्राह्मण आया — फिर वेश बदले विश्वामित्र — और पैसे रखकर रानी को खींचकर ले चला।

और छोटा रोहित "माँ! माँ!" कहता पीछे दौड़ा। माँ का आँचल पकड़ लिया। ब्राह्मण ने उसे भी मारा। फिर भी उसने आँचल नहीं छोड़ा। तब रानी ने विनती की — "इसे भी ख़रीद लीजिए। इसके बिना मैं काम नहीं कर पाऊँगी।" और बेटा भी बिक गया।

वृक्षच्छायापि वृक्षं तं न जहाति कदाचन ॥
7.22.29

राजा रोते रहे — "पेड़ की छाया भी पेड़ को नहीं छोड़ती… और मेरी पत्नी मुझसे बिछुड़ गई।"

और फिर भी ऋण पूरा नहीं हुआ। तो राजा ने ख़ुद को बेचा। और ख़रीदार मिला — एक चाण्डाल। श्मशान का मालिक।

राजा ने एक पल हिचककर कहा, "किसी ब्राह्मण या क्षत्रिय को बिकना चाहता हूँ।" पर फिर ख़ुद ही सँभले —

ततश्चाण्डालता साध्वी न वरा मे ह्यसत्यता ।
7.23.14

"चाण्डाल का दास बनना भी अच्छा। पर झूठा बनना मुझे स्वीकार नहीं।"

और जैसे ही ऋण चुका, आकाश से आवाज़ आई — "महाभाग, तुम ऋण से मुक्त हो।" और फूल बरसे।

अब श्मशान। काशी के दक्षिण में। धुआँ, राख, हड्डियाँ, सियारों की आवाज़ें। और रोते लोगों की चीख़ें — "हाय बेटा! हाय भाई! लौट आओ!"

वहाँ अयोध्या का राजा, फटी गुदड़ी पहने, शरीर पर चिता की राख, हाथ में एक पुरानी लाठी, मुर्दों के कपड़े इकट्ठे करता था। देवीभागवत कहता है, बारह महीने ऐसे बीते, जैसे सौ बरस।

और फिर एक रात… एक दुबली, मैली, बिखरे बालों वाली औरत आई। गोद में एक बच्चा। साँप के काटने से मरा हुआ।

राजा ने उसे नहीं पहचाना। उसने राजा को नहीं पहचाना। फिर उसके विलाप में एक नाम सुना… "हाय, राजा हरिश्चन्द्र!"

और राजा ने देखा — ये शैब्या है। और ये बच्चा… रोहित।

वो दोनों बेहोश होकर गिर पड़े।

और उसी रात एक और परीक्षा आई। लोगों ने रानी को, जो आधी रात को श्मशान के पास अकेली थी, बच्चे खाने वाली डायन समझकर पकड़ लिया। और चाण्डाल ने राजा के हाथ में तलवार दी — "इसे मारो।"

राजा काँप गए। "स्त्री को नहीं मारूँगा। कोई और काम दो।" और शैब्या ने कहा — "स्वामी की आज्ञा पूरी कीजिए। झूठे मत बनिए।"

टूटे हुए राजा ने निश्चय किया — बेटे की चिता बनाऊँगा, और उसी में ख़ुद भी कूद जाऊँगा। रानी ने कहा, "मैं भी साथ चलूँगी।"

चिता तैयार हुई। बेटा उस पर लेटा। और दोनों ने हाथ जोड़कर… जगदम्बा का ध्यान किया। करुणा की सागर, जगत् को पालने वाली माँ का।

और उसी पल — इन्द्र, ब्रह्मा, सारे देवता प्रकट हो गए! और धर्म स्वयं! और साथ में… विश्वामित्र भी।

इन्द्र ने चिता पर अमृत बरसाया। फूलों की वर्षा हुई। और रोहित… उठ खड़ा हुआ। स्वस्थ। मुस्कुराता हुआ।

और अब पहली चौंकाने वाली बात। जब इन्द्र ने कहा "स्वर्ग चलो", तो हरिश्चन्द्र बोले, "पहले मेरे मालिक, उस चाण्डाल से आज्ञा लूँगा।" और तब धर्म बोले —

तवैवं भाविनं क्लेशमवगम्यात्ममायया । आत्मा श्वपचतां नीतो दर्शितं तच्च पक्कणम् ॥
7.27.18

"वो चाण्डाल मैं ही था, राजन्। तुम्हारे आने वाले कष्ट को जानकर, मैंने ख़ुद वो रूप लिया था।"

जिसके घर दास बना… वो स्वयं धर्म था।

और दूसरी बात, जो इस राजा को सबसे ऊँचा बनाती है। इन्द्र ने कहा, "स्वर्ग चलो।" हरिश्चन्द्र बोले — "मेरी प्रजा मेरे दुख में डूबी है। उन्हें छोड़कर मैं स्वर्ग नहीं जाऊँगा।"

उपदादान्न सन्त्यक्ष्ये तानहं स्वर्गलिप्सया ।
7.27.27

"स्वर्ग के लालच में अपने लोगों को नहीं छोड़ूँगा। मेरा जो पुण्य है, उनके साथ बाँट दीजिए। वो जाएँ, तो मैं जाऊँगा।"

और ऐसा ही हुआ। अयोध्या के लोग भी उनके साथ स्वर्ग गए। और रोहित का राजतिलक हुआ।

अहो तितिक्षामाहात्म्यमहो दानफलं महत् ।
7.27.40

और ये देखकर असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने भी कहा — "अहो, सहने की कैसी महिमा! दान का कैसा फल!"

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली। सच की क़ीमत चुकती है, पर सच कभी घाटे में नहीं जाता। विश्वामित्र ने ख़ुद कहा था — हज़ार अश्वमेध एक तरफ़, एक सच एक तरफ़, तो सच भारी निकला। आज की रुकी फ़ाइल, रुका प्रमोशन… वो सच का बीमा है।

दूसरी। जो आपको परख रहा है, वो शायद धर्म ही है। हरिश्चन्द्र जिसे चाण्डाल समझे, वो धर्म था। आपकी ज़िंदगी का सबसे कठोर आदमी, सबसे कठिन दौर — शायद आपकी परीक्षा है। और परीक्षा का अंत होता है।

और तीसरी। जब सब हार जाएँ, तो माँ को याद कीजिए। चिता के सामने, हाथ जोड़कर, हरिश्चन्द्र और शैब्या ने जगदम्बा का ध्यान किया। और उसी पल देवता उतर आए।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥
गीता 2.14

गीता भी यही कहती है — "सुख-दुख आते-जाते हैं। टिकते नहीं। उन्हें सहो।" हरिश्चन्द्र ने सहा। और जो सहता है, वही अंत देखता है।

तो अगली बार, जब सच बोलने की क़ीमत भारी लगे… जब लगे, "झूठ बोल देता तो अच्छा था"…

तो काशी के उस श्मशान को याद कीजिए। राख में लिपटा एक राजा। हाथ में लाठी। और होंठों पर एक ही बात —

"चाण्डाल बनना मंज़ूर है… झूठा बनना नहीं।"

सच की क़ीमत चुकती है। पर सच का फल… स्वयं धर्म देने आता है।

जय माता दी।

सत्ये प्रोक्तः परो धर्मः स्वर्गः सत्ये प्रतिष्ठितः । अश्वमेधसहस्रं तु सत्यं च तुलया धृतम् ॥
देवीभागवत 7.21.7

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.सच की क़ीमत चुकती है, पर सच कभी घाटे में नहीं जाता। विश्वामित्र ने ख़ुद कहा था — हज़ार अश्वमेध एक तरफ़, एक सच एक तरफ़, तो सच भारी निकला। आज की रुकी फ़ाइल, रुका प्रमोशन… वो सच का बीमा है।
  2. 2.जो आपको परख रहा है, वो शायद धर्म ही है। हरिश्चन्द्र जिसे चाण्डाल समझे, वो धर्म था। आपकी ज़िंदगी का सबसे कठोर आदमी, सबसे कठिन दौर — शायद आपकी परीक्षा है। और परीक्षा का अंत होता है।
  3. 3.जब सब हार जाएँ, तो माँ को याद कीजिए। चिता के सामने, हाथ जोड़कर, हरिश्चन्द्र और शैब्या ने जगदम्बा का ध्यान किया। और उसी पल देवता उतर आए।

इस सत्संग के श्लोक

देवीभागवत 7.21.8 7.20.1 7.20.30 7.21.21 7.22.29 7.23.14 7.27.18 7.27.27 7.27.40 गीता 2.14 देवीभागवत 7.21.7