अड़तालीस दिन की भूख
Forty-eight days of hunger — Rantideva gives away his first meal in days, seeing Hari in each guest
आर्तिं प्रपद्येऽखिलदेहभाजामन्तःस्थितो येन भवन्त्यदुःखाः ॥
जय श्री कृष्ण।
महीने की पच्चीस तारीख़। तनख़्वाह आने में अभी पाँच दिन हैं। बटुए में गिने-चुने नोट। और फ़ोन बजता है।
किसी पुराने जानने वाले का। "भाई, बेटे की फ़ीस भरनी है, थोड़ी मदद हो जाएगी?" या घर में काम करने वाली दीदी धीरे से कहती हैं, "भैया, इस महीने कुछ पहले दे सकते हैं? माँ बीमार है।"
और मन तुरंत कहता है — "अभी? अभी तो मेरे पास ही नहीं है। जब ज़्यादा होगा, तब दूँगा।"
ये बात ग़लत भी नहीं लगती। सही ही लगती है। पर आज एक राजा की कथा सुनिए, जिसके पास "ज़्यादा" कभी हुआ ही नहीं। और फिर भी उसका नाम, भागवत कहता है, इस लोक में भी गाया जाता है और परलोक में भी।
उनका नाम था रन्तिदेव। राजा संकृति के बेटे। भरत के वंश में।
अब सुनिए भागवत उनका परिचय कैसे देता है। एक बहुत अनोखा शब्द है — "वियद्वित्त"।
वियद्वित्तस्य ददतो लब्धं लब्धं बुभुक्षतः ।
"वियत्" यानी आकाश। आकाश जैसा धन। आकाश कुछ जमा नहीं करता, ख़ाली रहता है। रन्तिदेव भी जो मिलता, बाँट देते। और ख़ुद भूखे रह जाते।
आज की भाषा में कहें, तो उनका सेविंग्स अकाउंट हमेशा ज़ीरो रहता था! और उनके साथ उनका परिवार भी कष्ट उठाता था। फिर भी वो धीर थे। अडिग।
और फिर एक ऐसा समय आया…
व्यतीयुरष्टचत्वारिंशदहान्यपिबतः किल ।
अड़तालीस दिन। बिना खाए। बिना पानी पिए।
परिवार भी साथ। सबका शरीर भूख-प्यास से काँप रहा था। अड़तालीस दिन… सोचिए। हम एक दिन का व्रत रखते हैं, तो शाम तक घड़ी देखते रहते हैं।
और उनचासवें दिन सुबह… थाली आई। घी, खीर, हलवा। और पानी।
अब बस खाना है। हाथ बढ़ाना है।
और ज़रा सोचिए, उस घर में उस सुबह कैसा माहौल होगा। घर के हर आदमी की आँखें थाली पर। सूखे होंठ, काँपते हाथ। और अड़तालीस दिन बाद, घर में घी और खीर की ख़ुशबू।
ये कोई राजसी दावत नहीं थी। ये एक भूखे परिवार की पहली थाली थी।
और ठीक उसी पल… दरवाज़े पर एक ब्राह्मण अतिथि आ गया। भूखा।
हरिं सर्वत्र सम्पश्यन्स भुक्त्वा प्रययौ द्विजः ॥
रन्तिदेव ने आदर से, श्रद्धा से, अपने भोजन में से उसे बाँटकर खिलाया। क्योंकि वो सब जगह हरि को देखते थे। ब्राह्मण खाकर चला गया।
और यहाँ "हरि को सब जगह देखना" — ये कोई किताबी बात नहीं। आज के शब्दों में सोचिए। दरवाज़े पर डिलीवरी वाला लड़का, धूप में पसीने से भीगा। बिल्डिंग का चौकीदार, जो रात भर जागता है। सड़क किनारे बैठी बूढ़ी अम्मा। रन्तिदेव की आँख होती, तो इन सबमें वही चेहरा दिखता।
बचा हुआ भोजन परिवार में बँटा। रन्तिदेव ने अपना हिस्सा उठाया…
और तभी एक और आदमी आ गया। भूखा। वो उस समय के समाज में छोटा माना जाता था। पर रन्तिदेव ने हरि को याद किया… और अपने हिस्से में से फिर बाँट दिया।
वो गया ही था कि तीसरा अतिथि! और इस बार अकेला नहीं — कुत्तों से घिरा हुआ। "राजन्, मुझे और मेरे साथियों को खाना दीजिए, हम भूखे हैं।"
तच्च दत्त्वा नमश्चक्रे श्वभ्यः श्वपतये विभुः ॥
रन्तिदेव ने जो बचा था, सब दे दिया। बड़े सम्मान से। और फिर… कुत्तों को और उनके स्वामी को हाथ जोड़कर प्रणाम किया।
कुत्तों को प्रणाम। क्योंकि उनकी आँख में वो कुत्ते भी हरि के ही रूप थे।
और एक बात पर ध्यान दीजिए। हर अतिथि के साथ देना और कठिन होता गया। पहली बार थाली भरी थी, बाँटना आसान था। दूसरी बार अपना हिस्सा था। तीसरी बार… जो बचा था, सब। और भागवत बार-बार लिखता है — आदर से। श्रद्धा से। बड़े सम्मान से। भूख बढ़ती गई, पर आदर कम नहीं हुआ।
अब थाली ख़ाली। बस थोड़ा-सा पानी बचा है। एक आदमी की प्यास भर का।
अड़तालीस दिन से सूखे गले के पास वो पानी पहुँचा ही था…
पास्यतः पुल्कसोऽभ्यागादपो देह्यशुभस्य मे ॥
कि एक और आवाज़ आई। समाज ने जिसे सबसे नीचे रखा था, ऐसा एक आदमी। काँपती आवाज़ में बोला — "मुझे पानी दे दीजिए। मैं तो अभागा हूँ।"
अब रुकिए एक पल।
खाना तो दे दिया था। चलो, खाने के बिना आदमी कुछ दिन जी लेता है। पर ये पानी… अड़तालीस दिन के बाद… ये पानी नहीं, जान है।
भागवत कहता है — उस आदमी की करुण आवाज़ सुनकर रन्तिदेव दया से बेचैन हो उठे। और फिर उन्होंने वो बात कही, जिसे भागवत "अमृत वचन" कहता है —
न कामयेऽहं गतिमीश्वरात्परामष्टर्द्धियुक्तामपुनर्भवं वा ।
आर्तिं प्रपद्येऽखिलदेहभाजामन्तःस्थितो येन भवन्त्यदुःखाः ॥
"मैं भगवान से न सिद्धियाँ माँगता हूँ, न मोक्ष। मैं बस इतना चाहता हूँ… कि हर प्राणी के भीतर बैठकर उसका दुख अपने ऊपर ले लूँ। ताकि वो दुखी न रहे।"
मोक्ष नहीं चाहिए। दूसरों का दुख चाहिए।
सर्वे निवृत्ताः कृपणस्य जन्तोर्जिजीविषोर्जीवजलार्पणान्मे ॥
और फिर कहा — "इस जीना चाहने वाले को पानी देने से… मेरी भूख, मेरी प्यास, मेरी थकान, मेरा दुख… सब मिट गया।"
और प्यास से मरते हुए… रन्तिदेव ने वो पानी उसे दे दिया।
और अब कथा का वो मोड़, जो इसे सबसे अलग बनाता है।
आत्मानं दर्शयाञ्चक्रुर्माया विष्णुविनिर्मिताः ॥
उसी पल, तीनों लोकों के स्वामी, बड़े-बड़े देवता, उनके सामने प्रकट हो गए। और भागवत खोलकर बताता है — वो सारे अतिथि… ब्राह्मण, भूखा आदमी, कुत्तों वाला, पानी माँगने वाला… सब भगवान विष्णु की रची हुई माया थे।
यानी परीक्षा थी! चार बार दरवाज़ा खटखटाया गया… और चारों बार दरवाज़े पर भगवान ही थे।
पर रन्तिदेव ने ये जानकर नहीं दिया था। उन्हें पता नहीं था। उन्होंने तो हर एक में बस हरि को देखकर दिया था। यानी जो उन्होंने आँख से देखा, वही सच निकला।
और अब देवता सामने हैं, फल देने को तैयार। जो माँगो। रन्तिदेव ने क्या माँगा? कुछ नहीं। प्रणाम किया, और मन पूरी तरह भगवान वासुदेव में लगा दिया।
और एक सुंदर बात। भागवत कहता है — उनके संग के प्रभाव से उनके सारे साथी, जो उनके पीछे चलते थे, वो सब भी नारायण के भक्त बन गए। एक आदमी का देना… पूरे घर का स्वभाव बन गया।
और उसी अध्याय में आगे लिखा है, इसी वंश में आगे राजा हस्ती हुए, जिन्होंने हस्तिनापुर बसाया। वही हस्तिनापुर, जहाँ महाभारत की कथा चली।
गीता में भगवान ज्ञानी की पहचान बताते हैं —
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
"विद्वान ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में, और जिसे समाज सबसे नीचा माने उसमें… ज्ञानी एक ही चीज़ देखता है।"
ध्यान दीजिए — रन्तिदेव के दरवाज़े पर ठीक यही लोग आए थे! ब्राह्मण, कुत्ते, और समाज का सबसे नीचे वाला। रन्तिदेव ने ये श्लोक जीकर दिखा दिया।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
"जो मुझे सब जगह देखता है, मैं उसकी आँखों से कभी ओझल नहीं होता।"
और एक और श्लोक, जो रन्तिदेव के "आर्तिं प्रपद्ये" का जैसे उत्तर है —
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥
"जो दूसरे के सुख-दुख को अपने जैसा महसूस करता है… वही सबसे बड़ा योगी है।" न जंगल जाना, न आसन लगाना। बस दूसरे की प्यास को अपनी प्यास जैसा महसूस करना।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली। "जब ज़्यादा होगा, तब दूँगा" — ये दिन शायद कभी नहीं आता। रन्तिदेव के पास कभी ज़्यादा नहीं था। थोड़े में से थोड़ा दीजिए। एक रोटी में से आधी। यही असली दान है।
दूसरी। देने वाले को देखिए मत, लेने वाले में भगवान देखिए। रन्तिदेव ने किसी की जात नहीं पूछी, हैसियत नहीं पूछी। कुत्तों को भी प्रणाम किया। आपके दरवाज़े पर जो आए, उसे हाथ जोड़कर दीजिए। फेंककर नहीं।
और तीसरी। किसी की मदद करके आपका अपना दुख हल्का होता है। रन्तिदेव ने कहा — पानी देते ही मेरी प्यास मिट गई। ये चमत्कार नहीं, ये अनुभव है। जिस दिन आप किसी का बोझ उठाते हैं, उस दिन आपका अपना बोझ हल्का लगता है।
तो अगली बार, जब महीने के आख़िर में कोई हाथ फैलाए… जब मन कहे, "अभी तो मेरे पास ही नहीं"…
तो उस राजा को याद कीजिए। अड़तालीस दिन की भूख। हाथ में पानी का आख़िरी घूँट। और दरवाज़े पर एक प्यासा आदमी।
कौन जाने… दरवाज़े पर कौन खड़ा है।
जय श्री कृष्ण।
न कामयेऽहं गतिमीश्वरात्परामष्टर्द्धियुक्तामपुनर्भवं वा ।
आर्तिं प्रपद्येऽखिलदेहभाजामन्तःस्थितो येन भवन्त्यदुःखाः ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1."जब ज़्यादा होगा, तब दूँगा" — ये दिन शायद कभी नहीं आता। रन्तिदेव के पास कभी ज़्यादा नहीं था। थोड़े में से थोड़ा दीजिए। एक रोटी में से आधी। यही असली दान है।
- 2.देने वाले को देखिए मत, लेने वाले में भगवान देखिए। रन्तिदेव ने किसी की जात नहीं पूछी, हैसियत नहीं पूछी। कुत्तों को भी प्रणाम किया। आपके दरवाज़े पर जो आए, उसे हाथ जोड़कर दीजिए। फेंककर नहीं।
- 3.किसी की मदद करके आपका अपना दुख हल्का होता है। रन्तिदेव ने कहा — पानी देते ही मेरी प्यास मिट गई। ये चमत्कार नहीं, ये अनुभव है। जिस दिन आप किसी का बोझ उठाते हैं, उस दिन आपका अपना बोझ हल्का लगता है।