लक्ष्मी कहाँ रहती हैं

Where Lakṣmī lives — Lakṣmī tells Rukmiṇī which homes she stays in, and which she leaves

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सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपज्योतिःस्थिते नमः ॥
स्कन्द पुराण, कार्तिक-माहात्म्य 9.89

जय श्री कृष्ण।

दिवाली आने वाली है। और घर-घर में एक ही काम चल रहा है — सफ़ाई।

पंखे उतर रहे हैं। अलमारी के ऊपर से दस साल पुराने डिब्बे निकल रहे हैं। माँ कह रही हैं, "ये सब फेंको, लक्ष्मी जी आएँगी।" बच्चे पूछ रहे हैं, "इस बार कितने दीये लगेंगे?"

और इस सारी भाग-दौड़ के बीच… मन में एक सवाल चुपचाप बैठा है। "इस बार लक्ष्मी जी आएँगी भी? या पिछले साल की तरह… बस पूजा होगी, और फिर वही EMI, वही तंगी?"

तो आज एक सीधा सवाल पूछते हैं। लक्ष्मी रहती कहाँ हैं? किस घर में टिकती हैं, और किस घर से उठकर चली जाती हैं?

और इसका उत्तर हम अपने मन से नहीं देंगे। स्कन्द पुराण में, कार्तिक के माहात्म्य में, पूरा एक अध्याय है — सिर्फ़ इन्हीं दिनों पर। और उसमें ऐसी बातें हैं, जो सुनकर आप इस दिवाली को अलग नज़र से देखेंगे।

पहली बात तो यही जानिए कि ये त्योहार कहलाता "दीपावली" क्यों है।

मानवो मंगलस्नायी नैव लक्ष्म्या वियुज्यते । दीपैर्नीराजनादत्र सैषा दीपावलिः स्मृता ॥
9.45

"इन दिनों दीपों से आरती होती है, इसीलिए इसे दीपावली कहते हैं।" दीपों की पंक्ति। दीपों की आरती।

और उसी अध्याय में एक बहुत प्यारी बात है। दीपावली की चतुर्दशी को, सुबह के स्नान के समय —

तैले लक्ष्मीर्जले गंगा दीपावल्याश्चतुर्दशीम् ।
9.32

"तेल में लक्ष्मी रहती हैं, और जल में गंगा।" सोचिए। जिस तेल से आप दीया जलाते हैं, जिस तेल से उस सुबह बदन पर मालिश करते हैं… शास्त्र कहता है, उसमें लक्ष्मी हैं।

पर सबसे बड़ा सवाल अभी बाक़ी है। दीये जलाने से लक्ष्मी का क्या लेना-देना? इसकी कथा बहुत कम लोग जानते हैं। और ये कथा एक राक्षस-राज की है।

बलि। दैत्यों के राजा। पूरी धरती उनके राज्य में थी। एक दिन भगवान वामन का रूप लेकर, एक छोटे-से ब्राह्मण के वेश में, उनके पास आए। और उनसे धरती माँगी।

बलि ने दे दी। और उस छोटे-से वामन ने… तीन पगों में पूरी धरती नाप ली। वो कोई और नहीं, स्वयं हरि थे। धरती उन्होंने इन्द्र को लौटा दी, और बलि को पाताल भेज दिया।

अब सुनिए आगे क्या हुआ। भगवान बलि से प्रसन्न हुए। और बोले —

वरं याचस्व भद्रं ते यद्यन्मनसि वर्तते ।
9.50

"तुम्हारा भला हो, बलि। जो मन में है, वो वर माँगो।"

अब आप होते, तो क्या माँगते? शायद अपना राज्य वापस। या कम से कम आधा। पर बलि ने जो कहा, वो सुनिए —

आत्मार्थं किं याचनीयं सर्वं दत्तं मया तथा । लोकार्थं याचयिष्यामि शक्तश्चेद्देहि तच्च मे ॥
9.51

"अपने लिए क्या माँगूँ? मैं तो सब दे चुका हूँ। मैं लोगों के लिए माँगूँगा। अगर दे सको, तो वो दो।"

सब कुछ हारा हुआ आदमी। और माँग रहा है… दूसरों के लिए।

और बलि ने तीन चीज़ें माँगीं। पहली — "तुमने तीन पगों में धरती ली। तो तीन दिन धरती पर मेरा राज्य रहे।" यही दीपावली के तीन दिन हैं। चतुर्दशी, अमावस्या और कार्तिक का पहला दिन।

और दूसरी माँग? यही आज की कथा का दिल है —

मद्राज्ये ये दीपदानं भुवि कुर्वंति मानवाः । तेषां गृहे तव स्त्रीयं सदा तिष्ठतु सुस्थिरा ॥
9.54

"मेरे इन दिनों में जो लोग दीया जलाएँ… उनके घर में तुम्हारी पत्नी, लक्ष्मी, सदा स्थिर होकर रहें।"

सुना? दीये और लक्ष्मी का रिश्ता किसी व्यापारी ने नहीं बनाया। एक हारे हुए, सब कुछ दे चुके राजा ने भगवान से माँगकर बनाया। आपके लिए। और भगवान ने ये वर दे दिया।

और तीसरी माँग अपने पितरों के लिए थी — जो चतुर्दशी को दीया दें, उनके पितर नरक में न रहें। और बलि ने एक बात और कही, जो ध्यान से सुनने लायक़ है —

बलिराज्ये तु ये लोकाः शोकाऽनुत्साहकारिणः । तेषां गृहे सदा शोकः पतेदिति न संशयः ॥
9.58

"इन दिनों जो लोग दुखी और उदास बैठे रहें, उनके घर में दुख ही टिकता है।" यानी लक्ष्मी अँधेरे में नहीं रहतीं। और रोती-झींकती उदासी में भी नहीं रहतीं।

अब दूसरी चौंकाने वाली बात। दिवाली की रात हम लक्ष्मी जी की पूजा करते हैं। पर उस रात की कहानी क्या है?

अस्मिन्नहनि सर्वेऽपि विष्णुना मोचिताः पुरा । बलिकारागृहाद्देवा लक्ष्मीश्चाऽपि विमोचिता ॥
9.77

"इसी दिन विष्णु ने सब देवताओं को बलि के कारागार से छुड़ाया था। और लक्ष्मी भी छुड़ाई गई थीं।"

लक्ष्मी कैद में थीं। और छूटकर कहाँ गईं? देवताओं के साथ क्षीरसागर गईं। और वहाँ बहुत समय तक… सुख से सोईं।

लक्ष्मीर्दैत्यभयान्मुक्ता सुखं सुप्तांबुजोदरे ॥
9.80

"दैत्यों के डर से छूटी लक्ष्मी, कमल के भीतर सुख से सोईं।"

और इसीलिए स्कन्द पुराण कहता है — उस रात लक्ष्मी जी के लिए एक नरम बिस्तर सजाइए। कोमल गद्दा। दूध के झाग जैसी सफ़ेद चादर। जैसे थककर घर लौटे किसी अपने के लिए बिछाते हैं।

कुर्यात्तस्य गृहं मुक्त्वा तत्पद्मा क्वाऽपि न व्रजेत् ।
9.82

"जो उस दिन लक्ष्मी के सुख के लिए कमल की शय्या सजाता है… उसका घर छोड़कर लक्ष्मी कहीं नहीं जातीं।"

और फिर पुराण एक मीठा-सा सवाल पूछता है —

धनचिन्ता विहीनास्ते कथं रात्रौ स्वपंति हि ।
9.83

"जिन्होंने लक्ष्मी को सुख से नहीं सुलाया, वो ख़ुद रात को धन की चिंता छोड़कर कैसे सोएँगे?" जो दूसरों को चैन की नींद देता है, उसी को चैन की नींद मिलती है।

और सुबह? हरि के जागने से पहले घर की स्त्रियाँ लक्ष्मी जी को जगाएँ। और जो उन्हें जगाकर फिर भोजन करे, उसे लक्ष्मी साल भर नहीं छोड़तीं।

अब तीसरी बात। सबसे सुंदर, और सबसे चौंकाने वाली। उस रात क्षीरसागर में सोई लक्ष्मी की स्तुति किसने की? देवताओं ने नहीं। दैत्यों ने! वही, जो विष्णु से डरे हुए थे। ब्राह्मणों से अभय पाकर वो लक्ष्मी के पास गए। यानी लक्ष्मी की शरण में हारे हुए भी जा सकते हैं। और उन्होंने लक्ष्मी को क्या कहा, सुनिए —

त्वं ज्योतिः श्रीरवीन्द्वग्निविद्युत्सौवर्णतारकाः । सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपज्योतिःस्थिते नमः ॥
9.89

"हे लक्ष्मी, तुम ही ज्योति हो। सूरज, चाँद, आग, बिजली, सोना और तारे… सब तुम हो। तुम सब ज्योतियों की ज्योति हो। दीये की लौ में बैठी हुई माँ, तुम्हें नमस्कार।"

तो लक्ष्मी कहाँ रहती हैं? दीये की लौ में। जो दीया आप अपने हाथ से जलाते हैं, शास्त्र कहता है वो लक्ष्मी का घर है।

पर सिर्फ़ दीया काफ़ी नहीं। उसी अध्याय में बताया है कि ये दिन कैसे मनाने हैं। पूरा नगर सजाओ। फिर पहले ब्राह्मणों को, और फिर…

ब्राह्मणान्भोजयित्वाऽऽदौ संभोज्य च बुभुक्षितान् ॥
9.94

"…भूखों को भोजन कराओ।" उसके बाद ख़ुद नए कपड़े पहनकर खाओ। और राजा घोषणा करवाए — "आज बलि का राज्य है, जी भरकर खेलो। बच्चे जी भरकर खेलें।" और बच्चों को खिलौने दिए जाएँ।

पर साथ में एक सख़्त चेतावनी भी है। इन ख़ुशी के दिनों में भी पाँच काम नरक के दरवाज़े हैं — जीव-हिंसा, शराब, ग़लत संबंध, चोरी… और विश्वासघात।

सोचिए। दिवाली पर लोग ताश खेलते हैं, मिठाई बाँटते हैं… और कोई किसी का भरोसा तोड़ दे, तो? पुराण कहता है, जिस घर में धोखा है, वहाँ कितने भी दीये जलें, वो नरक का दरवाज़ा है।

और आधी रात को एक अनोखी रीत। जब सब आधे सोए हों, घर की स्त्रियाँ ख़ुशी-ख़ुशी सूप और डमरू बजाकर अपने आँगन से अलक्ष्मी को बाहर निकालती हैं। यानी दरिद्रता को, कलह को, उदासी को।

और एक छोटी-सी कथा भी। एकांगी नाम की एक ग्वालिन। कोई रानी नहीं, बस एक ग्वालिन। उसने इन्हीं दिनों में गाय और बछड़े की पूजा का व्रत किया। और तीन साल में वो धन-धान्य से भर गई।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली। दीया जलाइए, और मन से जलाइए। बलि ने भगवान से माँगकर ये वचन लिया है — जो इन दिनों दीया जलाएगा, उसके घर लक्ष्मी स्थिर रहेंगी। ये वचन आपके नाम पर है। एक दीया अपने पितरों के लिए भी।

दूसरी। लक्ष्मी जी को मेहमान नहीं, घर की थकी हुई बेटी समझिए। जो अभी-अभी कैद से छूटकर लौटी है। उनके लिए नरम बिस्तर, मीठा, और प्यार। जैसे किसी अपने के लिए करते हैं।

और तीसरी। घर में उदासी, धोखा और कलह को जगह मत दीजिए। भूखे को खिलाइए। बच्चों को खेलने दीजिए। हँसिए। जहाँ रोशनी है, ख़ुशी है, और भरोसा है… लक्ष्मी वहीं रहती हैं।

तो इस दिवाली, जब आप पहला दीया जलाएँ… तो एक पल रुकिए।

उस राजा को याद कीजिए, जिसने सब कुछ हारकर भी अपने लिए कुछ नहीं माँगा। जिसने माँगा, तो बस इतना — "जो दीया जलाए, उसके घर लक्ष्मी रहें।"

और उस लौ को देखिए। लक्ष्मी कहाँ रहती हैं? यहीं। इसी लौ में।

जय श्री कृष्ण।

या लक्ष्मीर्दिवसे पुण्ये दीपावल्यां च भूतले । गवां गोष्ठे तु कार्तिक्यां सा लक्ष्मीर्वरदा मम ॥
स्कन्द पुराण, कार्तिक-माहात्म्य 9.90

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.दीया जलाइए, और मन से जलाइए। बलि ने भगवान से माँगकर ये वचन लिया है — जो इन दिनों दीया जलाएगा, उसके घर लक्ष्मी स्थिर रहेंगी। ये वचन आपके नाम पर है। एक दीया अपने पितरों के लिए भी।
  2. 2.लक्ष्मी जी को मेहमान नहीं, घर की थकी हुई बेटी समझिए। जो अभी-अभी कैद से छूटकर लौटी है। उनके लिए नरम बिस्तर, मीठा, और प्यार। जैसे किसी अपने के लिए करते हैं।
  3. 3.घर में उदासी, धोखा और कलह को जगह मत दीजिए। भूखे को खिलाइए। बच्चों को खेलने दीजिए। हँसिए। जहाँ रोशनी है, ख़ुशी है, और भरोसा है… लक्ष्मी वहीं रहती हैं।

इस सत्संग के श्लोक

स्कन्द पुराण, कार्तिक-माहात्म्य 9.89 9.45 9.32 9.50 9.51 9.54 9.58 9.77 9.80 9.82 9.83 9.89 9.94 स्कन्द पुराण, कार्तिक-माहात्म्य 9.90