ज़हर भरी झील
The poisoned lake — Kṛṣṇa dances on Kāliya’s hoods — and gives even the serpent refuge
The recording opens here soon — the whole satsang is below to read.
तन्मूर्धरत्ननिकरस्पर्शातिताम्रपादाम्बुजोऽखिलकलादिगुरुर्ननर्त ॥
जय श्री कृष्ण।
कुछ जगहें ऐसी होती हैं… जहाँ हवा में ही ज़हर घुला होता है।
वो ऑफ़िस, जहाँ हर मीटिंग में कोई न कोई किसी की टाँग खींचता है। जहाँ कॉफ़ी मशीन के पास खड़े होते ही चुगली शुरू हो जाती है। या वो घर, जहाँ खाने की मेज़ पर बैठते ही ताने शुरू होते हैं। जहाँ एक आदमी का ग़ुस्सा पूरे घर की साँस रोक देता है।
और सबसे अजीब बात? उस ज़हर में रहते-रहते हम भी धीरे-धीरे वैसे ही हो जाते हैं। चिड़चिड़े। कड़वे। शक्की।
तो क्या करें? भाग जाएँ? नौकरी छोड़ दें? घर छोड़ दें? या उसी ज़हर में डूबते रहें?
आज भागवत की एक कथा, एक ज़हर भरी झील की। और उस बालक की, जो उस झील में कूद गया।
यमुना नदी। और उसमें एक कुंड। उस कुंड में रहता था कालिय। एक विशाल नाग।
कालिन्द्यां कालियस्यासीद्ह्रदः कश्चिद्विषाग्निना ।
श्रप्यमाणपया यस्मिन्पतन्त्युपरिगाः खगाः ॥
भागवत कहता है — उस कुंड का पानी ज़हर की आग से खौलता रहता था। ऊपर से उड़ते पक्षी भी उसकी भाप लगते ही गिर पड़ते थे।
और उसकी लहरों से उठती फुहार, हवा के साथ किनारे पर जिसे छूती… पेड़ हो, पौधा हो, जानवर हो… वो मर जाता था।
सोचिए। एक नाग। और पूरी नदी ज़हरीली। ठीक वैसे ही, जैसे एक आदमी पूरे दफ़्तर का माहौल ज़हरीला कर देता है।
अब श्रीकृष्ण ने ये देखा। ग्वाल-बालों के साथ गायें चराने आए थे। और उन्होंने तय किया — इस नदी को शुद्ध करना है।
किनारे पर एक बहुत ऊँचा कदम्ब का पेड़ था। श्रीकृष्ण उस पर चढ़े। कमर कसी। ताल ठोकी। और सीधे उस खौलते, ज़हरीले पानी में छलाँग लगा दी!
भागवत कहता है, उनके कूदने से पूरा कुंड हिल गया। ज़हर से भरी लहरें सौ धनुष दूर तक उछलीं। और फिर श्रीकृष्ण उस पानी में ऐसे खेलने लगे, जैसे कोई हाथी तालाब में मस्ती करता है। हाथों से पानी उछालते हुए!
सोचिए, जिस पानी की भाप से पक्षी गिर जाते थे… उसमें एक बालक तैराकी कर रहा है!
शोर सुनकर कालिय बाहर आया। अपने घर में ये उत्पात? क्रोध से उसने श्रीकृष्ण को डस लिया। और अपनी कुंडलियों में लपेट लिया।
और श्रीकृष्ण… निश्चल हो गए। जैसे बेहोश।
किनारे पर ग्वाल-बाल ये देखकर बेहोश होकर गिर पड़े। गायें, बैल, बछड़े… श्रीकृष्ण की ओर आँखें टिकाए ऐसे डकराने लगे, जैसे रो रहे हों।
व्रज में अपशकुन होने लगे। नन्द बाबा और सारे गोप घबरा गए। बच्चे, बूढ़े, औरतें — सब दौड़ते हुए यमुना की ओर भागे। रास्ते में श्रीकृष्ण के पैरों के निशान पहचानते हुए।
और किनारे पहुँचकर देखा — उनका कान्हा नाग की कुंडलियों में जकड़ा पड़ा है।
यशोदा माँ… बेटे के पीछे उस ज़हरीले कुंड में उतरने चलीं। गोपियों ने उन्हें पकड़ लिया। नन्द बाबा भी कूदने चले…
और अब पहली बात, जो बहुत कम लोग ध्यान देते हैं। इस सारे हाहाकार में एक आदमी शांत खड़ा था।
तांस्तथा कातरान्वीक्ष्य भगवान्माधवो बलः ।
प्रहस्य किञ्चिन्नोवाच प्रभावज्ञोऽनुजस्य सः ॥
बलराम। सबको इतना घबराया देखकर… वो बस मुस्कुराए। कुछ बोले नहीं। क्योंकि वो अपने छोटे भाई की ताक़त जानते थे। और उन्होंने ही नन्द बाबा को कुंड में घुसने से रोका।
जब पूरी दुनिया घबराई हो… तब जो भगवान को जानता है, वो मुस्कुरा सकता है।
इत्थं स्वगोकुलमनन्यगतिं निरीक्ष्य सस्त्रीकुमारमतिदुःखितमात्महेतोः ।
और श्रीकृष्ण ने देखा — "मेरा गोकुल। औरतें, बच्चे, सब मेरे लिए इतने दुखी हैं। और मेरे सिवा इनका कोई सहारा नहीं।"
बस। एक पल रुके… और नाग की कुंडलियों से निकलकर उठ खड़े हुए! शरीर ऐसा बढ़ाया कि नाग की कुंडलियाँ दुखने लगीं, और उसे छोड़ना पड़ा।
अब कालिय सामने। फन उठाए। फुफकारता हुआ। नथुनों से ज़हर। आँखें जैसे आग पर तपी कड़ाही। और श्रीकृष्ण उसके चारों ओर ऐसे घूमने लगे, जैसे गरुड़ घूमता है। घूमते-घूमते नाग थक गया।
एवं परिभ्रमहतौजसमुन्नतांसमानम्य तत्पृथुशिरःस्वधिरूढ आद्यः ।
तन्मूर्धरत्ननिकरस्पर्शातिताम्रपादाम्बुजोऽखिलकलादिगुरुर्ननर्त ॥
और फिर — छलाँग लगाकर उसके फनों पर चढ़ गए! और नाचने लगे!
और भागवत यहाँ एक अद्भुत बारीकी लिखता है। नाग के सिरों पर मणियाँ थीं। उन मणियों को छूकर श्रीकृष्ण के कमल जैसे पैर… और लाल हो गए। और उन्हें भागवत कहता है — "सब कलाओं के आदि गुरु"। यानी जो नाच रहा था, वो नृत्य का भी पहला गुरु था!
और देखते ही देखते आसमान से देवता, गन्धर्व, सिद्ध — मृदंग, ढोल, नगाड़े, फूल लेकर आ गए। ज़हर की झील पर… संगीत!
यद्यच्छिरो न नमतेऽङ्ग शतैकशीर्ष्णः ।
और दूसरी चौंकाने वाली बात — कालिय के एक सौ एक सिर थे! और जो भी सिर अकड़कर उठता, श्रीकृष्ण नाचते-नाचते उसे पैर से नीचे दबा देते।
सौ से ज़्यादा अहंकार के फन। और हर फन पर भगवान का एक पैर।
आख़िर कालिय टूट गया। मुँह से ख़ून बहने लगा। और उस हालत में उसने मन ही मन नारायण को याद किया। शरण में गया।
और तभी… नाग की पत्नियाँ आईं। बिखरे बाल, अस्त-व्यस्त कपड़े। अपने बच्चों को आगे करके, धरती पर लेटकर प्रणाम किया। और उन्होंने जो कहा, वो भागवत की सबसे समझदार प्रार्थनाओं में है।
न्याय्यो हि दण्डः कृतकिल्बिषेऽस्मिंस्तवावतारः खलनिग्रहाय ।
"प्रभु, इसे सज़ा मिलना ठीक है। इसने अपराध किया है।"
ध्यान दीजिए! वो पति का बचाव नहीं कर रहीं। ग़लती मान रही हैं। और फिर कहती हैं —
अनुग्रहोऽयं भवतः कृतो हि नो दण्डोऽसतां ते खलु कल्मषापहः ।
"आपकी ये सज़ा भी कृपा है। आपका दंड पापी के पाप धो देता है। और देखिए, आपके चरणों की जिस धूल के लिए लक्ष्मी जी ने तप किया… वो इस नाग के सिर पर पड़ रही है!"
अपराधः सकृद्भर्त्रा सोढव्यः स्वप्रजाकृतः ।
"स्वामी अपनी प्रजा का एक अपराध सह लेता है। ये मूढ़ आपको नहीं जानता था। इसे क्षमा कर दीजिए। हमें हमारा पति लौटा दीजिए।"
श्रीकृष्ण ने नाग को छोड़ दिया। धीरे-धीरे कालिय को होश आया। और हाथ जोड़कर उसने एक बहुत ईमानदार बात कही —
वयं खलाः सहोत्पत्त्या तमसा दीर्घमन्यवः ।
स्वभावो दुस्त्यजो नाथ लोकानां यदसद्ग्रहः ॥
"नाथ, हम जन्म से ही ऐसे हैं। देर तक ग़ुस्सा पालने वाले। स्वभाव छोड़ना बहुत कठिन होता है।"
कितनी सच्ची बात। ज़हरीले लोग अक्सर जानते भी नहीं कि वो ज़हरीले हैं। वो बस… अपने स्वभाव में फँसे हैं।
और अब कथा की सबसे गहरी बात। श्रीकृष्ण ने क्या किया? मार दिया? नहीं।
नात्र स्थेयं त्वया सर्प समुद्रं याहि मा चिरम् ।
"सर्प, अब तुम यहाँ नहीं रहोगे। अपने परिवार के साथ समुद्र चले जाओ। ताकि गायें और लोग इस नदी का पानी पी सकें।"
एक सीमा खींची। साफ़-साफ़। "यहाँ नहीं।" पर नाश नहीं किया।
और फिर तीसरी बात, जो इस कथा को अद्भुत बना देती है। कालिय यमुना में आया ही क्यों था?
द्वीपं रमणकं हित्वा ह्रदमेतमुपाश्रितः ।
यद्भयात्स सुपर्णस्त्वां नाद्यान्मत्पादलाञ्छितम् ॥
वो गरुड़ के डर से अपना घर, रमणक द्वीप, छोड़कर यहाँ छिपा था! जो पूरी नदी को डरा रहा था… वो ख़ुद डरा हुआ था।
और श्रीकृष्ण ने कहा — "अब तुम्हारे सिर पर मेरे पैरों के निशान हैं। अब गरुड़ तुम्हें नहीं खाएगा।"
जिन पैरों ने उसे दबाया… उन्हीं पैरों के निशान उसकी रक्षा बन गए।
तदैव सामृतजला यमुना निर्विषाभवत् ।
कालिय परिवार के साथ समुद्र चला गया। और उसी पल, यमुना का पानी ज़हर से मुक्त होकर… अमृत जैसा मीठा हो गया।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली। ज़हर से डरिए मत, भगवान को साथ लेकर उतरिए। श्रीकृष्ण किनारे खड़े होकर शिकायत नहीं करते रहे। जिस माहौल में आप हैं, वहाँ उनका नाम लेकर उतरिए। मीठा बोलिए, सच बोलिए, अपना काम ईमानदारी से कीजिए। ज़हर में भी नाचा जा सकता है।
दूसरी। ज़हरीले आदमी के पीछे अक्सर एक डर छिपा होता है। कालिय गरुड़ से डरकर छिपा था। वो बॉस, जो सब पर चिल्लाता है, शायद अपने ऊपर वाले से डरा है। घर का वो सदस्य, जो ताने मारता है, शायद अंदर से टूटा है। उसे समझिए। नफ़रत मत कीजिए।
और तीसरी। दया का मतलब ये नहीं कि ज़हर को बहने दें। सीमा खींचिए — "यहाँ नहीं।" श्रीकृष्ण ने नाग को मारा नहीं, पर नदी में रहने भी नहीं दिया। प्रेम से, पर दृढ़ता से।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
गीता कहती है — भगवान का प्यारा भक्त किसी से द्वेष नहीं करता। सबका मित्र, सब पर दया। दृढ़ता के साथ भी।
तो अगली बार, जब ऑफ़िस में या घर में हवा ज़हरीली लगे… जब लगे कि इस झील में साँस लेना मुश्किल है…
तो उस कदम्ब के पेड़ को याद कीजिए। एक बालक की छलाँग। और ज़हरीले फनों पर नाचते हुए वो लाल-लाल पैर।
ज़हर भरी झील… और उस पर नाचते भगवान।
जय श्री कृष्ण।
तदैव सामृतजला यमुना निर्विषाभवत् ।
अनुग्रहाद्भगवतः क्रीडामानुषरूपिणः ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.ज़हर से डरिए मत, भगवान को साथ लेकर उतरिए। श्रीकृष्ण किनारे खड़े होकर शिकायत नहीं करते रहे। जिस माहौल में आप हैं, वहाँ उनका नाम लेकर उतरिए। मीठा बोलिए, सच बोलिए, अपना काम ईमानदारी से कीजिए। ज़हर में भी नाचा जा सकता है।
- 2.ज़हरीले आदमी के पीछे अक्सर एक डर छिपा होता है। कालिय गरुड़ से डरकर छिपा था। वो बॉस, जो सब पर चिल्लाता है, शायद अपने ऊपर वाले से डरा है। घर का वो सदस्य, जो ताने मारता है, शायद अंदर से टूटा है। उसे समझिए। नफ़रत मत कीजिए।
- 3.दया का मतलब ये नहीं कि ज़हर को बहने दें। सीमा खींचिए — "यहाँ नहीं।" श्रीकृष्ण ने नाग को मारा नहीं, पर नदी में रहने भी नहीं दिया। प्रेम से, पर दृढ़ता से।