खेत की मेड़ पर लेटा शिष्य

The student who lay down in the field — Āruṇi blocks the water with his body; Upamanyu’s hard test

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भो आरुणे पाञ्चाल्य क्वासि वत्सैहीति ॥
आदि 3.27

जय श्री कृष्ण।

आज की शुरुआत उन सबके लिए, जिनके घर में इस समय कोई परीक्षा चल रही है। बच्चा रात को दो बजे तक पढ़ रहा है, माँ चाय बनाकर दे रही है, और सुबह फिर वही सवाल — "इतना पढ़ा, फिर भी डर लगता है।"

और उनके लिए भी, जिनका बॉस कुछ ज़्यादा ही कड़ा है। हर काम में नुक़्स। हर रिपोर्ट वापस। और मन में एक ही बात — "ये सब मेरे साथ ही क्यों? बाक़ियों से तो कोई कुछ नहीं कहता।"

आज महाभारत के बिल्कुल शुरू के पन्नों से एक कथा। एक गुरु। तीन शिष्य। और तीन परीक्षाएँ, जो आज के किसी भी इम्तिहान से कड़ी थीं।

एक ऋषि थे — धौम्य। उनके तीन शिष्य थे। उपमन्यु, आरुणि और बैद।

एक दिन धौम्य ने पांचाल देश के आरुणि से कहा — "जाओ, खेत की मेड़ टूट गई है। पानी बह रहा है। उसे बाँध दो।"

आरुणि गया। मिट्टी डाली। फिर डाली। पर पानी रुका ही नहीं। जितना बाँधे, उतना बह जाए।

अब आप-हम होते तो क्या करते? लौटकर कहते — "गुरुजी, हमसे नहीं हुआ। पानी बहुत तेज़ था।" बात ख़त्म।

पर आरुणि ने सोचा — "ठीक है। मैं ऐसा करूँगा।"

स तत्र संविवेश केदारखण्डे शयाने च तथा तस्मिंस्तदुदकं तस्थौ ॥
3.24

वो ख़ुद उस टूटी मेड़ में लेट गया। और उसके लेटते ही… पानी रुक गया।

ठंडा पानी। गीली मिट्टी। और एक बच्चा, जो वहीं लेटा रहा। जब तक गुरु ने पुकारा नहीं।

शाम हुई। धौम्य ने बाक़ी शिष्यों से पूछा, "आरुणि कहाँ गया?"

"गुरुजी, आपने ही तो भेजा था। मेड़ बाँधने।"

धौम्य बोले, "चलो, सब चलते हैं।" और खेत पर पहुँचकर पुकारा —

भो आरुणे पाञ्चाल्य क्वासि वत्सैहीति ॥
3.27

"अरे आरुणि! कहाँ हो, बेटा? आओ!"

आवाज़ सुनते ही आरुणि झटके से उठा… मेड़ को तोड़ता हुआ… और गुरु के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। "गुरुदेव, पानी और किसी तरह रुक नहीं रहा था, इसलिए मैं लेट गया था। आपकी आवाज़ सुनी, तो उठ आया। बताइए, अब क्या करूँ?"

और अब पहली मज़ेदार बात। गुरु ने कहा —

तस्मादुद्दालक एव नाम्ना भवान्भविष्यति ॥
3.31

"तुम मेड़ को फाड़कर उठे हो, इसलिए आज से तुम्हारा नाम होगा — उद्दालक!" यानी "फाड़कर उठने वाला।"

सोचिए, गुरु ने नाम भी दिया तो उस पल का, जब शिष्य ने उनका काम ही बिगाड़ दिया! मेड़ फिर टूट गई। पर गुरु को मेड़ से ज़्यादा… वो दौड़कर आता हुआ शिष्य प्यारा लगा।

सर्वे च ते वेदाः प्रतिभास्यन्ति सर्वाणि च धर्मशास्त्राणीति ॥
3.32

और आशीर्वाद दिया — "सारे वेद, सारे धर्मशास्त्र… तुम्हारे मन में अपने आप प्रकट हो जाएँगे।"

दूसरा शिष्य था उपमन्यु। और उसकी परीक्षा… सच कहूँ तो सुनकर पेट में कुछ होता है।

गुरु ने कहा, "गायें चराओ।" वो दिन भर गायें चराता, शाम को लौटकर प्रणाम करता।

एक दिन गुरु ने देखा — लड़का तो ख़ूब मोटा-ताज़ा है। "उपमन्यु, खाते क्या हो?"

"गुरुदेव, भिक्षा माँगकर खाता हूँ।"

"मुझे सौंपे बिना भिक्षा मत खाओ।" "जी।" अब वो सारी भिक्षा गुरु को दे देता।

पर लड़का फिर भी मोटा-ताज़ा। "अब क्या खाते हो?" — "पहली भिक्षा आपको देता हूँ, फिर दोबारा माँग लेता हूँ।" "ये ठीक नहीं। दूसरे भिखारियों का हिस्सा मारते हो।"

फिर भी मोटा-ताज़ा! "अब?" — "गायों का दूध पी लेता हूँ।" — "मैंने इजाज़त नहीं दी।"

फिर भी! "अब क्या?" और उपमन्यु ने कहा — "गुरुदेव, बछड़े दूध पीते समय जो झाग उगल देते हैं… वही पी लेता हूँ।"

"बछड़े तुम पर दया करके ज़्यादा झाग छोड़ते होंगे। उनका हिस्सा मत मारो।" "जी।"

अब ज़रा इस बातचीत को दोबारा सुनिए। चार बार गुरु ने रोका। और चारों बार उपमन्यु का जवाब एक ही शब्द — "ठीक है।"

न बहस। न शिकायत। न ये कि "बाक़ी शिष्यों से तो आप कुछ नहीं कहते।" और मज़े की बात, उसने कभी झूठ भी नहीं बोला। हर बार सच बता दिया कि क्या खा रहा है… जबकि जानता था, अगली बार वो भी छिन जाएगा।

आज के बच्चे से पूछिए, "होमवर्क किया?" — तो जवाब आने से पहले चार बहाने आ जाते हैं! यहाँ एक भूखा लड़का है, जो सच बोलकर अपनी आख़िरी रोटी भी गँवा रहा है।

अब उसके पास कुछ नहीं बचा। एक दिन जंगल में, भूख से बेहाल, उसने आक के पत्ते खा लिए। खारे, कड़वे, जलाने वाले पत्ते।

और उसकी आँखें चली गईं।

अंधा लड़का, जंगल में भटकता रहा… और एक कुएँ में गिर पड़ा।

सूरज ढला। गुरु ने कहा, "मैंने उसे हर तरफ़ से रोक दिया। लगता है रूठ गया है। चलो ढूँढें।" और जंगल में पुकारा, "उपमन्यु! कहाँ हो, बेटा?"

कुएँ के अंदर से आवाज़ आई — "मैं यहाँ हूँ, गुरुदेव! कुएँ में गिर पड़ा हूँ।"

गुरु ने कहा, "देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों की स्तुति करो। वो तुम्हें आँखें लौटा देंगे।"

और उस अंधेरे कुएँ में बैठे लड़के ने पुकारा —

दुर्गेऽहमस्मिन्पतितोऽस्मि कूपे । युवां शरण्यौ शरणं प्रपद्ये ॥
3.68

"मैं इस कुएँ में गिर पड़ा हूँ, जिससे निकलना कठिन है। आप शरण देने वाले हैं। मैं आपकी शरण में हूँ।"

अश्विनीकुमार प्रकट हुए। "हम प्रसन्न हैं! लो, ये पुआ खाओ।"

अब सोचिए। कितने दिनों का भूखा बच्चा। हाथ में गरम पुआ। और वो क्या कहता है?

नत्वहमेतमपूपमुपयोक्तुमुत्सहे गुरवेऽनिवेद्येति ॥
3.70

"आप झूठ नहीं कहते, भगवन्। पर गुरु को सौंपे बिना मैं ये पुआ नहीं खा सकता।"

और अब दूसरी बात, जो सचमुच चौंकाती है। अश्विनीकुमार बोले — "अरे, तुम्हारे गुरु ने भी कभी ऐसे ही हमारी स्तुति की थी। हमने उन्हें भी पुआ दिया था। और उन्होंने अपने गुरु को सौंपे बिना खा लिया था! तुम भी खा लो।"

सुना आपने? जो गुरु इतनी कड़ाई कर रहे थे… वो ख़ुद अपनी परीक्षा में पुआ खा गए थे!

उपमन्यु फिर भी नहीं माना। "क्षमा कीजिए। नहीं खा सकता।"

उपाध्यायस्य ते कार्ष्णायसा दन्ता भवतोऽपि हिरण्मया भविष्यन्ति ॥
3.73

अश्विनीकुमार इस गुरुभक्ति से बहुत प्रसन्न हुए। बोले — "तुम्हारे गुरु के दाँत काले लोहे के हैं। तुम्हारे सोने के होंगे!" आँखें लौट आईं। और गुरु ने भी वही आशीर्वाद दिया — सारे वेद तुम्हारे मन में प्रकट होंगे।

और तीसरा शिष्य, बैद। उसकी कथा छोटी है… पर सबसे गहरी।

गुरु ने उसे बरसों तक बैल की तरह भारी कामों में जोते रखा। सर्दी, गर्मी, भूख, प्यास। उसने कभी पलटकर कुछ नहीं कहा। आख़िर गुरु प्रसन्न हुए, और उसे सब ज्ञान मिला।

फिर बैद गृहस्थ बना। उसके भी तीन शिष्य हुए। और महाभारत कहता है — वो अपने शिष्यों से न कोई काम करवाता, न अपनी सेवा।

दुःखाभिज्ञो हि गुरुकुलवासस्य शिष्यान्परिक्लेशेन योजयितुं नेयेष ॥
3.81

क्योंकि वो गुरुकुल का दुख जानता था। इसलिए उसने अपने शिष्यों को वो दुख नहीं दिया।

जो कड़ाई उसने झेली, वो आगे नहीं बढ़ाई। दुख उसके पास आकर रुक गया। जैसे आरुणि के शरीर पर आकर पानी रुक गया था।

अब इसका भगवान से क्या लेना-देना?

गीता का पूरा उपदेश भी एक शिष्य के बनने से शुरू होता है। जब अर्जुन टूट गए, तो उन्होंने कहा —

शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥
गीता 2.7

"मैं आपका शिष्य हूँ। शरण में आया हूँ। मुझे सिखाइए।" और उसी पल से भगवान बोलने लगे।

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
गीता 4.34

झुककर, पूछकर, सेवा करके — ऐसे ज्ञान मिलता है। और उपनिषद् तो सीधा कहता है —

आचार्यदेवो भव ।
तैत्तिरीय 1.11

गुरु को देवता मानो। क्योंकि कई बार भगवान… कड़े गुरु के रूप में आते हैं।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली। जब काम न बने, तो भागिए मत, लेट जाइए। आरुणि की तरह पूरा का पूरा लग जाइए। परीक्षा में, नौकरी में, घर में — जहाँ मेड़ टूटी है, वहाँ ख़ुद को रख दीजिए।

दूसरी। कुएँ में गिरें, तो पुकारिए। उपमन्यु अंधा था, अकेला था, पर उसने स्तुति की। और जिसने उसे कुएँ तक पहुँचाया, उसी गुरु ने रास्ता भी बताया।

और तीसरी। जो कड़ाई आपने झेली, उसे आगे मत बढ़ाइए। कल आप बॉस बनेंगे, माँ-बाप बनेंगे, सास बनेंगे। बैद की तरह बनिए। दुख को अपने पास आकर रुकने दीजिए।

तो आज रात, जब बच्चा किताब पर सिर रखकर सो जाए… जब ऑफ़िस से थककर लौटें…

तो उस खेत को याद कीजिए। गीली मिट्टी। टूटी मेड़। और एक लड़का, जो वहीं लेटा रहा।

खेत की मेड़ पर लेटा शिष्य… और दूर से आती एक आवाज़ — "कहाँ हो, बेटा?"

वो आवाज़ आती है। ज़रूर आती है।

जय श्री कृष्ण।

भो आरुणे पाञ्चाल्य क्वासि वत्सैहीति ॥
आदि 3.27

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.जब काम न बने, तो भागिए मत, लेट जाइए। आरुणि की तरह पूरा का पूरा लग जाइए। परीक्षा में, नौकरी में, घर में — जहाँ मेड़ टूटी है, वहाँ ख़ुद को रख दीजिए।
  2. 2.कुएँ में गिरें, तो पुकारिए। उपमन्यु अंधा था, अकेला था, पर उसने स्तुति की। और जिसने उसे कुएँ तक पहुँचाया, उसी गुरु ने रास्ता भी बताया।
  3. 3.जो कड़ाई आपने झेली, उसे आगे मत बढ़ाइए। कल आप बॉस बनेंगे, माँ-बाप बनेंगे, सास बनेंगे। बैद की तरह बनिए। दुख को अपने पास आकर रुकने दीजिए।

इस सत्संग के श्लोक

आदि 3.27 3.24 3.27 3.31 3.32 3.68 3.70 3.73 3.81 गीता 2.7 गीता 4.34 तैत्तिरीय 1.11