कसाई जो गुरु था

The butcher who was a teacher — Dharmavyādha, a meat-seller made wise by serving his parents

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स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥
गीता 18.46

जय श्री कृष्ण।

किसी शादी में गए हैं। खाना चल रहा है। और तभी कोई दूर के रिश्तेदार पास आकर बैठ जाते हैं। "और बेटा, आजकल क्या कर रहे हो?"

और उस पल… गला थोड़ा सूख जाता है।

क्योंकि आप डिलीवरी का काम करते हैं। या किसी दुकान पर हिसाब लिखते हैं। या फ़ैक्ट्री में शिफ़्ट करते हैं। या किसी के घर खाना बनाती हैं। और बगल में बैठा कज़िन विदेश में इंजीनियर है।

मन में आता है — "मेरा काम छोटा है। मैं कुछ ख़ास नहीं।" और फिर कहीं न कहीं ये भी लगता है — "भगवान भी तो बड़े लोगों की ही सुनते होंगे। ज्ञानी, पंडित, साधु। मैं तो दिन भर बस काम में ही उलझा रहता हूँ।"

आज की कथा में एक बड़े ज्ञानी पंडित हैं। और एक मांस बेचने वाला। और आप अंदाज़ा लगाइए, गुरु कौन निकला।

कौशिक नाम के एक ब्राह्मण थे। बहुत विद्वान। वेद, उपनिषद, सब कंठस्थ। तपस्वी।

एक दिन एक पेड़ के नीचे बैठकर वेद-पाठ कर रहे थे। और ऊपर डाल पर बैठी एक बगुली ने… उनके ऊपर बीट कर दी।

पंडित जी को ग़ुस्सा आ गया! ऊपर देखा, बगुली का बुरा सोचा… और उनके तप की ऐसी ताक़त थी कि वो बगुली मरकर नीचे गिर पड़ी।

फिर उन्हें दुःख हुआ। "ग़ुस्से में मैंने ये क्या कर दिया।" पर बात आई-गई हो गई।

फिर वो भिक्षा माँगने गाँव गए। एक घर के दरवाज़े पर पहुँचे। "भिक्षा दीजिए।"

अंदर से घर की स्त्री बोली — "रुकिए, अभी आती हूँ।" वो बर्तन धो रही थी।

और तभी उसके पति घर आए। दिन भर के थके, भूख से बेहाल। स्त्री ने पहले पति के पैर धुलाए, पानी दिया, आसन दिया, खाना परोसा। सेवा में लग गई।

और फिर उसे याद आया — "अरे! दरवाज़े पर पंडित जी खड़े हैं!" भागकर भिक्षा लेकर आई।

पंडित जी लाल-पीले! "तुमने मुझे रुकवाकर खड़ा रखा? पति को ब्राह्मण से बड़ा बना दिया? जानती नहीं, ब्राह्मण आग जैसे होते हैं? पूरी धरती जला सकते हैं!"

और उस गृहिणी ने बड़े शांत स्वर में जो कहा, वो पहली चौंकाने वाली बात है —

नाहं बलाका विप्रर्षे त्यज क्रोधं तपोधन । अनया क्रुद्धया दृष्ट्या क्रुद्धः किं मां करिष्यसि ॥
वन 209.25

"महाराज, मैं बगुली नहीं हूँ! ग़ुस्सा छोड़िए। इस ग़ुस्से भरी नज़र से आप मेरा क्या बिगाड़ लेंगे?"

सोचिए! पेड़ के नीचे जंगल में जो हुआ, किसी ने नहीं देखा था। और ये गाँव की एक साधारण गृहिणी, बर्तन धोते-धोते… सब जानती थी।

क्रोधः शत्रुः शरीरस्थो मनुष्याणां द्विजोत्तम ॥
209.33

"महाराज, ग़ुस्सा इंसान के शरीर में बैठा दुश्मन है।" फिर बोली — "आप वेद जानते हैं, पर मुझे लगता है धर्म का असली रूप नहीं जानते। मिथिला जाइए। वहाँ एक व्याध रहता है। वो आपको धर्म सिखाएगा।"

एक व्याध! मांस बेचने वाला! और वो सिखाएगा, एक वेद-पाठी पंडित को?

पर पंडित जी की एक बात की तारीफ़ करनी पड़ेगी। उनका अहंकार टूटा, और उन्होंने ग़ुस्सा छोड़ दिया। बोले — "तुमने जो डाँटा, वही मेरी सबसे बड़ी भलाई है।" और निकल पड़े मिथिला।

मिथिला पहुँचे। पूछते-पूछते उस व्याध का पता मिला। और वहाँ जाकर देखा — एक कसाई की दुकान। मांस टँगा है। ग्राहकों की भीड़। और बीच में बैठा वो आदमी, मोल-भाव कर रहा है।

पंडित जी एक कोने में खड़े हो गए। सोच रहे होंगे — "यही है मेरा गुरु?"

और व्याध ने उन्हें देखा, झट से उठकर आया, प्रणाम किया और बोला — "आइए महाराज! उस पतिव्रता ने आपको भेजा है न, 'मिथिला जाओ'? मैं जानता हूँ। और ये भी जानता हूँ कि आप क्यों आए हैं।"

पंडित जी चक्कर में! पहले गृहिणी, अब कसाई। महाभारत कहता है, ब्राह्मण ने मन में सोचा — "ये दूसरा आश्चर्य है।"

व्याध उन्हें अपने घर ले गया। आदर से बिठाया। और पंडित जी ने पहली बात यही कही — "भाई, तुम्हारा ये काम मुझे ठीक नहीं लगता। बड़ा कठोर काम है।"

और व्याध ने बिना शर्माए उत्तर दिया —

कुलोचितमिदं कर्म पितृपैतामहं परम् । वर्तमानस्य मे धर्मे स्वे मन्युं मा कृथा द्विज ॥
210.21

"महाराज, ये मेरे कुल का काम है, बाप-दादों से चला आ रहा है। मैं अपना धर्म निभा रहा हूँ। मेरे लिए दुःखी मत होइए।"

सत्यं वदे नाभ्यसूये यथाशक्ति ददामि च । देवतातिथिभृत्यानामवशिष्टेन वर्तये ॥
210.23

"मैं सच बोलता हूँ। किसी से जलता नहीं। जितना हो सके, दान देता हूँ। देवता, मेहमान और जो मुझ पर निर्भर हैं, उन्हें खिलाकर, जो बचता है, उसी से जीता हूँ।"

सुनिए। काम उसने नहीं बदला। काम करने का ढंग बदल दिया।

और फिर व्याध ने कई दिन तक पंडित जी को धर्म के बड़े-बड़े रहस्य समझाए। कर्म का फल, मन, इन्द्रियाँ, आत्मा। पंडित जी ने माना — "धर्म की कोई बात तुमसे छिपी नहीं।"

तब व्याध बोला — "महाराज, अब मेरा असली धर्म अपनी आँखों से देखिए। जिससे मुझे ये सब मिला।"

वो उन्हें घर के अंदर ले गया। एक साफ़-सुथरा कमरा, मंदिर जैसा। सुगंध से भरा। और वहाँ, ऊँचे आसन पर, सफ़ेद कपड़े पहने, खाना खाकर संतुष्ट… दो बुज़ुर्ग बैठे थे।

व्याध उनके चरणों में गिर पड़ा। और माँ-बाप ने आशीर्वाद दिया — "उठो बेटा। तुम सच्चे पुत्र हो। तुम्हारी सेवा से हम यहाँ ऐसे रहते हैं, जैसे स्वर्ग में हों।"

और फिर उन्होंने एक बात कही, जो सुनकर पंडित जी भी चौंके होंगे। "जैसे जमदग्नि के बेटे परशुराम ने अपने बूढ़े माँ-बाप की सेवा की थी… बेटा, तुमने उससे भी बढ़कर की है।" एक कसाई की तुलना, परशुराम से।

पिता माता च भगवन्नेतौ मे दैवतं परम् । यद्दैवतेभ्यः कर्तव्यं तदेताभ्यां करोम्यहम् ॥
217.19

"महाराज, यही मेरे सबसे बड़े देवता हैं। देवताओं के लिए जो किया जाता है, मैं इनके लिए करता हूँ।"

स्वयं च स्नापयाम्येतौ तथा पादौ प्रधावये । आहारं च प्रयच्छामि स्वयं च द्विजसत्तम ॥
217.25

"मैं ख़ुद इन्हें नहलाता हूँ। इनके पैर धोता हूँ। अपने हाथ से खाना खिलाता हूँ।"

दिन भर कसाई की दुकान। और शाम को… माँ-बाप के पैर।

और अब कथा का सबसे बड़ा मोड़। दूसरी चौंकाने वाली बात।

व्याध ने पंडित जी की ओर देखा। और धीरे से कहा —

त्वया न पूजिता माता पिता च द्विजसत्तम । अनिसृष्टोऽसि निष्क्रान्तो गृहात्ताभ्यामनिन्दित ॥
218.7

"महाराज, आपने अपने माता-पिता का आदर नहीं किया। उनसे पूछे बिना… वेद पढ़ने के लिए घर छोड़ आए।"

तव शोकेन वृद्धौ तावन्धीभूतौ तपस्विनौ ॥
218.8

"और आपके दुःख में रो-रोकर… वो दोनों बूढ़े अंधे हो गए हैं।"

सन्नाटा।

जो धर्म सीखने इतनी दूर आया था… उसका धर्म तो उसके अपने घर में, अंधी आँखों से उसकी राह देख रहा था।

"जाइए, उन्हें मनाइए। वरना आपका सारा तप, सारा वेद-पाठ बेकार है।"

और उस विद्वान ब्राह्मण ने, जो कल तक बगुली को ग़ुस्से से जला रहा था, आज क्या कहा? तीसरी बात —

यस्तु शूद्रो दमे सत्ये धर्मे च सततोत्थितः । तं ब्राह्मणमहं मन्ये वृत्तेन हि भवेद्द्विजः ॥
219.15

"जो संयम, सत्य और धर्म में सदा लगा है, उसे मैं ब्राह्मण मानता हूँ, चाहे वो किसी भी कुल में जन्मा हो। क्योंकि आचरण से ही कोई ब्राह्मण बनता है।"

और वो लौट गया। घर। और महाभारत कहता है, उसने अपने अंधे माता-पिता की पूरे मन से सेवा की।

गीता में भगवान ने यही कहा है —

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥
गीता 18.46

"जिससे सब प्राणी हुए, जो सबमें फैला है… उसकी पूजा अपने काम से करो। मनुष्य को सिद्धि मिल जाती है।"

"स्वकर्मणा" — अपने काम से। किसी और के काम से नहीं। दुकान का हिसाब, डिलीवरी, रसोई, फ़ैक्ट्री की शिफ़्ट… अगर ईमानदारी से, भगवान को याद रखकर किया जाए… तो वही पूजा है।

तो जिन्हें अपना काम छोटा लगता है, उनके लिए तीन बातें।

पहली। काम छोटा नहीं होता। काम करने का ढंग छोटा-बड़ा होता है। सच बोलिए, किसी से जलिए मत, जो कमाइए उसमें से थोड़ा बाँटिए। फिर कोई पूछे "क्या करते हो," तो सिर उठाकर बताइए।

दूसरी। घर के बुज़ुर्ग आपके सबसे बड़े देवता हैं। दिन भर कुछ भी कीजिए, शाम को उनके पास बैठिए। व्याध का सारा ज्ञान वहीं से आया था।

और तीसरी। धर्म सीखने दूर मत जाइए, पहले घर में देखिए। कहीं कोई आँख आपकी राह तो नहीं देख रही? आज एक फ़ोन कर दीजिए।

तो अगली बार, जब कोई पूछे "क्या करते हो," और गला सूखने लगे…

तो मिथिला के उस बाज़ार को याद कीजिए। जहाँ भीड़ भरी दुकान पर बैठा एक आदमी… एक बड़े पंडित का गुरु था।

कसाई जो गुरु था… क्योंकि उसका काम, उसकी पूजा थी।

जय श्री कृष्ण।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥
गीता 18.46

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.काम छोटा नहीं होता। काम करने का ढंग छोटा-बड़ा होता है। सच बोलिए, किसी से जलिए मत, जो कमाइए उसमें से थोड़ा बाँटिए। फिर कोई पूछे "क्या करते हो," तो सिर उठाकर बताइए।
  2. 2.घर के बुज़ुर्ग आपके सबसे बड़े देवता हैं। दिन भर कुछ भी कीजिए, शाम को उनके पास बैठिए। व्याध का सारा ज्ञान वहीं से आया था।
  3. 3.धर्म सीखने दूर मत जाइए, पहले घर में देखिए। कहीं कोई आँख आपकी राह तो नहीं देख रही? आज एक फ़ोन कर दीजिए।

इस सत्संग के श्लोक

गीता 18.46 वन 209.25 209.33 210.21 210.23 217.19 217.25 218.7 218.8 219.15