माँ, मेरा गोत्र क्या है?
Mother, what is my lineage? — Satyakāma Jābāla tells his teacher the plain truth
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जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि ।
जय श्री कृष्ण।
स्कूल में दाख़िले का फ़ॉर्म। पहला ख़ाना — "पिता का नाम।"
बहुत-सी माँएँ उस ख़ाने के सामने रुक जाती हैं। पति छोड़कर चला गया। या कभी था ही नहीं। या कहानी ऐसी है, जो किसी को बताई नहीं जा सकती। और पीछे खड़ा बच्चा पूछता है — "मम्मी, क्या लिखोगी?"
या वो पल, जब शादी की बात चल रही है, और सामने वाले पूछते हैं, "आपकी जात क्या है? गोत्र क्या है?" और किसी के पास उसका ऐसा जवाब नहीं, जिस पर सब सिर हिलाएँ।
और आज भी, कितने बच्चे स्कूल में सिर्फ़ इसलिए चुप रहते हैं कि कोई उनसे उनके घर के बारे में न पूछ ले। कितने नौजवान अपने गाँव का नाम, अपना उपनाम बदलकर बताते हैं। अपनी ही पहचान से शर्मिंदा।
आज की कथा ऐसी ही एक माँ और ऐसे ही एक बेटे की है। और ये कथा किसी नई किताब से नहीं — हज़ारों बरस पुराने उपनिषद् से है।
एक लड़का था। नाम सत्यकाम। माँ का नाम जबाला।
एक दिन उसने माँ से कहा — "माँ, मैं गुरु के पास जाकर पढ़ना चाहता हूँ। ब्रह्मचारी बनना चाहता हूँ।"
और उस ज़माने में गुरु के पास जाओ, तो पहला सवाल यही होता था। तो बेटे ने पूछा —
किंगोत्रो न्वहमस्मीति ॥
"माँ… मैं किस गोत्र का हूँ?"
और अब उस माँ का जवाब सुनिए। उपनिषद् ने उसे शब्दशः लिखा है।
"बेटा, मुझे नहीं पता तू किस गोत्र का है। जवानी में मैं सेविका बनकर, काम करती हुई, बहुत जगह घूमी। तभी मैंने तुझे पाया। इसलिए मैं नहीं जानती।"
कोई कहानी नहीं गढ़ी। कोई झूठा नाम नहीं बताया। बेटे के सामने अपनी ज़िंदगी का सच रख दिया।
जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि ।
स सत्यकाम एव जाबालो ब्रवीथा इति ॥
"पर इतना जानती हूँ — मेरा नाम जबाला है। तेरा नाम सत्यकाम है। तो जाकर बस इतना कहना — मैं सत्यकाम जाबाल हूँ।"
सोचिए उस माँ को। उसके पास बेटे को देने के लिए न गोत्र था, न पिता का नाम। उसने बेटे को अपना नाम दिया। और सच बोलने की हिम्मत दी।
और पहली चौंकाने वाली बात — जिस लड़के का गोत्र नहीं था, उसे आज भी उपनिषद् "जाबाल" कहकर याद करता है। यानी माँ के नाम से। हज़ारों बरस से।
सत्यकाम चल पड़ा। हरिद्रुमत के पुत्र, महर्षि गौतम के आश्रम।
"भगवन्, मैं आपके पास ब्रह्मचारी बनकर रहना चाहता हूँ।"
और गौतम ने वही पूछा, जिसका डर था — "किस गोत्र के हो, सौम्य?"
अब सोचिए। लड़के के पास मौक़ा था। किसी भी अच्छे गोत्र का नाम ले देता। कौन जाँच करता? आश्रम में और भी बच्चे बैठे होंगे, बड़े-बड़े घरों के।
पर उसने माँ की कही हर बात, बिना कुछ छिपाए, गुरु के सामने दोहरा दी। "मुझे नहीं पता। माँ ने कहा कि वो जवानी में सेविका थीं, बहुत घूमीं, तभी मुझे पाया। उनका नाम जबाला है, मेरा सत्यकाम।"
सोऽहꣳ सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥
"तो, गुरुदेव… मैं सत्यकाम जाबाल हूँ।"
आश्रम में सन्नाटा।
और फिर गौतम बोले। और उन्होंने जो कहा, वो उपनिषद् की सबसे साहसी पंक्तियों में से एक है।
तꣳ होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति ।
"जो ब्राह्मण नहीं, वो इतनी साफ़ सच्चाई नहीं बोल सकता।"
"जाओ, समिधा ले आओ। मैं तुम्हें शिष्य बनाऊँगा। क्योंकि तुम सच से नहीं हटे।"
समिधꣳ सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति ।
सुना आपने? गुरु ने गोत्र नहीं देखा। जन्म नहीं देखा। सच देखा। और सच को ही उसकी पहचान मान लिया।
जिस सवाल से लड़का डर रहा था… उसी सवाल का सच्चा जवाब उसका दाख़िला बन गया।
पर पढ़ाई आसान नहीं थी। गौतम ने चार सौ गायें अलग कीं। दुबली, कमज़ोर। "इनके पीछे जाओ।"
और सत्यकाम ने जो कहा, वो उसकी दूसरी पहचान है —
ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणावर्तेयेति ।
"जब तक ये एक हज़ार नहीं हो जातीं, मैं नहीं लौटूँगा!"
और वो बरसों जंगल में रहा। अकेला। गायों के साथ।
और अब दूसरी अद्भुत बात। जब गायें हज़ार हो गईं, तो एक दिन झुंड का बैल बोला — "सत्यकाम!"
प्राप्ताः सोम्य सहस्रꣳ स्मः प्रापय न आचार्यकुलम् ॥
"हम हज़ार हो गए हैं। अब हमें गुरु के घर ले चलो।" और उस बैल ने उसे ब्रह्म का एक पाद सिखाया — चारों दिशाएँ।
अगली शाम आग जलाकर बैठा, तो अग्नि ने सिखाया — धरती, आकाश, द्युलोक, समुद्र। फिर एक हंस उड़कर उतरा, और सिखाया — अग्नि, सूर्य, चन्द्र, बिजली। फिर एक जलपक्षी आया, और सिखाया — प्राण, आँख, कान, मन।
और एक प्यारी बारीकी। हर बार जब कोई पुकारता — "सत्यकाम!" — तो वो एक ही उत्तर देता, "भगवः", यानी "जी, कहिए।" बैल हो, आग हो या पक्षी, सबको वही आदर।
जिस लड़के को समाज ने गोत्र नहीं दिया… उसे पूरी सृष्टि ने गुरु बनकर पढ़ाया।
और जब वो गुरु के घर लौटा, तो गौतम ने उसे देखा… और ठिठक गए।
ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वानुशशासेति ।
"सौम्य, तुम तो ब्रह्मज्ञानी की तरह चमक रहे हो! किसने सिखाया तुम्हें?"
और सत्यकाम ने फिर सच कहा — "मनुष्यों ने नहीं, दूसरों ने।" और फिर बड़ी विनम्रता से — "पर गुरुदेव, मैं चाहता हूँ कि आप ही मुझे सिखाएँ। गुरु से सीखी विद्या ही सबसे अच्छी तरह फल देती है।"
और गौतम ने उसे पूरी विद्या दी। उपनिषद् दो बार कहता है — "कुछ भी नहीं छूटा। कुछ भी नहीं छूटा।"
और कथा यहीं ख़त्म नहीं होती। आगे उपनिषद् बताता है कि वही सत्यकाम जाबाल ख़ुद एक बड़े गुरु बने। और उनके आश्रम में एक शिष्य आया — उपकोसल।
उपकोसल ने बारह बरस गुरु की यज्ञ-अग्नियों की सेवा की। बाक़ी शिष्य पढ़कर घर चले गए, पर सत्यकाम ने उसे विदा नहीं किया। गुरुपत्नी ने भी कहा, "इसे सिखा दीजिए।" पर गुरु बिना सिखाए यात्रा पर चले गए।
उपकोसल इतना दुखी हुआ कि उसने खाना छोड़ दिया। और तब… उन्हीं अग्नियों ने, जिनकी उसने बारह बरस सेवा की थी, आपस में कहा, "चलो, इसे हम सिखाएँ।" और उसे ब्रह्म का उपदेश दिया।
देखिए, कथा कैसे घूमकर लौटती है! जिस सत्यकाम को कभी बैल, अग्नि और हंस ने पढ़ाया था… उसी के शिष्य को अग्नियों ने पढ़ाया। और जब गुरु लौटे, तो वही बात कही जो कभी उनके अपने गुरु ने उनसे कही थी — "तुम्हारा चेहरा ब्रह्मज्ञानी जैसा चमक रहा है! किसने सिखाया?"
जिस लड़के से कभी गोत्र पूछा गया था… आज उसकी अपनी परंपरा चल रही थी।
अब इसमें भगवान कहाँ हैं?
उपनिषद् कहता है —
सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
"सत्य ही जीतता है, झूठ नहीं। और भगवान तक जाने वाला रास्ता… सत्य से ही बिछा है।"
सत्यकाम के पास और कोई सीढ़ी नहीं थी। न कुल, न पिता, न पैसा। बस सच था। और वही सीढ़ी उसे ब्रह्म तक ले गई।
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
और गीता में भगवान ख़ुद कहते हैं — "मैं सबके लिए बराबर हूँ। मेरे लिए न कोई पराया, न कोई ख़ास। जो मुझे प्रेम से भजता है, वो मुझमें है, और मैं उसमें।"
भगवान के दरवाज़े पर फ़ॉर्म में "पिता का नाम" वाला ख़ाना नहीं है।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली। जो माँएँ अकेले बच्चे पाल रही हैं — आप अपने बच्चे को जो सबसे बड़ी चीज़ दे सकती हैं, वो जबाला ने दी। अपना नाम, और सच बोलने की हिम्मत। वो काफ़ी है। हज़ारों बरस बाद भी, उपनिषद् उस बेटे को माँ के नाम से पुकारता है।
दूसरी। अपने अतीत पर झूठ का पर्दा मत डालिए। सत्यकाम चाहता तो कोई भी गोत्र बोल देता। उसने सच बोला, और सच ही उसका दाख़िला बन गया। जो सच से नहीं डरता, उसके लिए दरवाज़े खुलते हैं।
और तीसरी। किसी से उसका कुल, उसकी जात, उसका अतीत पूछने से पहले… गौतम को याद कीजिए। उन्होंने गोत्र नहीं, सच देखा। हम भी देखें, आदमी कैसा है। कहाँ से आया, वो बाद की बात।
तो अगली बार, जब कोई फ़ॉर्म आपसे वो सवाल पूछे, जिसका जवाब आपको शर्मिंदा करता है… जब कोई गोत्र पूछे, जात पूछे…
तो उस लड़के को याद कीजिए। गुरु के सामने खड़ा। सिर ऊँचा। और होंठों पर बस अपनी माँ का नाम।
"माँ, मेरा गोत्र क्या है?" "बेटा… तू सत्यकाम है।"
जय श्री कृष्ण।
जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि ।
स सत्यकाम एव जाबालो ब्रवीथा इति ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.जो माँएँ अकेले बच्चे पाल रही हैं — आप अपने बच्चे को जो सबसे बड़ी चीज़ दे सकती हैं, वो जबाला ने दी। अपना नाम, और सच बोलने की हिम्मत। वो काफ़ी है। हज़ारों बरस बाद भी, उपनिषद् उस बेटे को माँ के नाम से पुकारता है।
- 2.अपने अतीत पर झूठ का पर्दा मत डालिए। सत्यकाम चाहता तो कोई भी गोत्र बोल देता। उसने सच बोला, और सच ही उसका दाख़िला बन गया। जो सच से नहीं डरता, उसके लिए दरवाज़े खुलते हैं।
- 3.किसी से उसका कुल, उसकी जात, उसका अतीत पूछने से पहले… गौतम को याद कीजिए। उन्होंने गोत्र नहीं, सच देखा। हम भी देखें, आदमी कैसा है। कहाँ से आया, वो बाद की बात।