राजा का दोस्त, नाव वाला
The king’s friend, the boatman — Guha the Niṣāda chief, who kept watch all night for Śrī Rāma
तत्र राजा गुहो नाम रामस्यात्मसमः सखा ।
जय श्री राम।
स्कूल का कोई ऐसा दोस्त है आपका… जो आज बहुत बड़ा आदमी बन गया हो? बड़ा अफ़सर, बड़ा बिज़नेसमैन?
और फिर किसी शादी में वो अचानक सामने आ जाए। आप एक पल रुकते हैं। मन में सवाल आता है — "पहचानेगा भी? गले लगाऊँ या दूर से नमस्ते करूँ? मैं उसके लायक़ हूँ भी?"
वो झिझक। वो छोटापन। जो हमें अपनों से भी दूर कर देता है।
आज एक नाव वाले की कथा सुनाता हूँ। जंगल का आदमी। मछुआरों का सरदार। और भगवान श्रीराम उसे क्या कहते थे, जानते हैं? "आत्मसमः सखा" — मेरे अपने जैसा दोस्त।
श्रीराम वन को निकले हैं। सीता और लक्ष्मण साथ हैं। सारथि सुमन्त्र रथ चला रहे हैं। और गंगा के किनारे, शृंगवेरपुर में, एक सुंदर पेड़ के नीचे रथ रुकता है।
उस इलाक़े का राजा था गुह। निषादों का मुखिया। बलवान। जैसे ही उसने सुना कि श्रीराम आए हैं, अपने बुज़ुर्गों, मंत्रियों, अपने लोगों को साथ लेकर दौड़ा आया।
और पहली प्यारी बात यहीं है। श्रीराम ने उसे दूर से आते देखा… और ख़ुद आगे बढ़कर मिलने गए। लक्ष्मण को साथ लेकर।
तमार्तः संपरिष्वज्य गुहो राघवमब्रवीत् ।
यथायोध्या तथेयं ते राम किं करवाणि ते ॥
गुह ने श्रीराम को गले लगा लिया। दुखी था, कि दोस्त वन में आया है। और बोला — "राम, जैसी अयोध्या तुम्हारी है, वैसी ही ये धरती तुम्हारी है। बोलो, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?"
स्वागतं ते महाबाहो तवेयमखिला मही ।
वयं प्रेष्या भवान्भर्ता साधु राज्यं प्रशाधि नः ॥
"ये सारी भूमि तुम्हारी। हम सेवक, तुम स्वामी। हमारा राज्य तुम चलाओ!"
सोचिए। जिसका अपना राज्य छिन गया… उसे एक नाव वाला अपना राज्य सौंप रहा है।
और फिर गुह ढेर सारा खाना लाया। तरह-तरह का भोजन। अच्छे बिस्तर। घोड़ों के लिए चारा।
अब श्रीराम क्या करें? उन्होंने वनवास का व्रत लिया है। अब किसी से कुछ लेना नहीं।
अर्चिताश्चैव हृष्टाश्च भवता सर्वथा वयम् ।
पद्भ्यामभिगमाच्चैव स्नेहसंदर्शनेन च ॥
"गुह, तुम पैदल चलकर मुझसे मिलने आए, इतना प्रेम दिखाया… मेरा सत्कार तो हो गया। पूरा हो गया।"
और फिर बड़ी नाज़ुक बात। मना भी करना है, और दोस्त का दिल भी नहीं तोड़ना। तो श्रीराम ने कहा — "बस मेरे घोड़ों को चारा दे दो। ये मेरे पिताजी के प्यारे घोड़े हैं। इनकी सेवा हो गई, तो मेरी सेवा हो गई।"
देखिए, मना करने का भी कैसा सुंदर ढंग! दोस्त को लगे कि उसकी भेंट स्वीकार हुई।
उस रात श्रीराम ने भोजन में केवल जल लिया। ज़मीन पर, घास पर सो गए। लक्ष्मण ने उनके पैर धोए, और पेड़ से टिककर खड़े हो गए।
और अब वो रात।
गुह ने लक्ष्मण से कहा — "राजकुमार, आपके लिए बिस्तर लगा है, सो जाइए। हम लोग तो कष्ट के आदी हैं। आज रात हम पहरा देंगे।"
न हि रामात्प्रियतरो ममास्ति भुवि कश्चन ।
ब्रवीम्येतदहं सत्यं सत्येनैव च ते शपे ॥
"सच कहता हूँ, सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ — इस धरती पर मुझे राम से प्यारा कोई नहीं।"
"मैं धनुष लेकर, अपने सारे लोगों के साथ, चारों ओर से अपने प्यारे दोस्त की रक्षा करूँगा। ये जंगल मेरा है। यहाँ मुझसे कुछ छिपा नहीं।"
लक्ष्मण नहीं सोए। बोले, "जब भैया और भाभी ज़मीन पर सो रहे हैं, तो मुझे नींद कैसे आए?"
तो उस रात… एक राजकुमार और एक नाव वाला… दोनों धनुष लिए, जागते रहे। और बातें करते रहे। और गुह, लक्ष्मण का दुख सुनकर, ऐसे रोया… जैसे बुख़ार में तड़पता कोई हाथी।
सुबह हुई। कोयल कूकी, मोर बोले। श्रीराम ने कहा, "चलो, गंगा पार करें।"
उपस्थितेयं नौर्देव भूयः किं करवाणि ते ॥
गुह हाथ जोड़कर आया। "देव, नाव तैयार है। और क्या करूँ आपके लिए?"
अब एक बात, जो कम लोग जानते हैं। श्रीराम और लक्ष्मण ने जो जटाएँ बाँधीं, तपस्वी का रूप धरा… वो किसकी मदद से? श्रीराम ने गुह से कहा, "बरगद का दूध ले आओ।" गुह दौड़कर लाया। और उसी से दोनों भाइयों ने जटाएँ बनाईं।
यानी वनवासी श्रीराम का पहला रूप… उस नाव वाले के हाथ से सजा।
और जाते-जाते श्रीराम ने गुह से जो कहा, उस पर ध्यान दीजिए —
अप्रमत्तो बले कोशे दुर्गे जनपदे तथा ।
भवेथा गुह राज्यं हि दुरारक्षतमं मतम् ॥
"गुह, अपनी सेना, अपने ख़ज़ाने, अपने क़िले और अपने देश के प्रति सावधान रहना। राज्य सँभालना सबसे कठिन काम है।"
सुना आपने? श्रीराम उसे सेवक की तरह विदा नहीं कर रहे। एक राजा दूसरे राजा को सलाह दे रहा है। बराबरी से।
और लोग अक्सर केवट की कथा सुनाते हैं, जिसने नाव पर चढ़ाने से पहले प्रभु के पैर धोए। वो कथा बहुत प्यारी है। पर हमारा वाल्मीकि का पाठ यह कहता है — नाव गुह की थी, उसके माँझी चप्पू चला रहे थे, और गुह ख़ुद किनारे खड़ा रहा।
अब कहानी में एक मोड़।
कुछ दिन बाद गुह ने देखा — गंगा के किनारे समुद्र जैसी विशाल सेना! रथ पर कोविदार का झंडा। भरत आए हैं।
और गुह के मन में शक उठा। "कहीं भरत राम को मारने तो नहीं जा रहे?"
भर्ता चैव सखा चैव रामो दाशरथिर्मम ।
"राम मेरे स्वामी भी हैं, मेरे दोस्त भी! सब हथियार बाँध लो। पाँच सौ नावें तैयार करो, हर नाव पर सौ जवान!"
सोचिए। एक छोटे-से इलाक़े का मुखिया… अयोध्या की पूरी सेना के सामने खड़ा होने को तैयार। दोस्त के लिए।
पर गुह समझदार भी था। पहले भेंट लेकर भरत से मिलने गया। और सीधा पूछ लिया — "आपकी इतनी बड़ी सेना देखकर मन में शंका होती है। कहीं राम के प्रति बुरा भाव तो नहीं?"
माभूत्स कालो यत्कष्टं न मां शङ्कितुमर्हसि ।
राघवः स हि मे भ्राता ज्येष्ठः पितृसमो मतः ॥
भरत बोले — "ऐसा दुख भरा दिन कभी न आए। मुझ पर शक मत करो। राघव मेरे बड़े भाई हैं। पिता जैसे। मैं उन्हें लौटाने जा रहा हूँ।"
और गुह का चेहरा खिल उठा —
धन्यस्त्वं न त्वया तुल्यं पश्यामि जगतीतले ।
अयत्नादागतं राज्यं यस्त्वं त्यक्तुमिहेच्छसि ॥
"धन्य हो तुम! धरती पर तुम्हारे जैसा कोई नहीं। बिना माँगे मिला राज्य छोड़ने चले हो!"
उस रात गुह भरत को उस पेड़ के नीचे ले गया। जहाँ श्रीराम सोए थे। घास अब भी दबी हुई थी। और भरत ने उस घास में सोने के छोटे-छोटे कण चमकते देखे… सीता के गहनों से झड़े हुए। रेशमी धागे उलझे हुए।
और भरत फूट पड़े — "हाय, मेरे कारण भैया ऐसे बिछौने पर सोए… अनाथ की तरह।"
और यहाँ एक छोटी-सी बात देखिए। सुमन्त्र ने भरत से गुह का परिचय कैसे कराया? "ये आपके भाई के पुराने दोस्त हैं। हज़ार लोगों का मुखिया। दण्डक वन का चप्पा-चप्पा जानता है।"
"आपके भाई का दोस्त।" बस यही परिचय काफ़ी था। भरत ने तुरंत कहा, "बुलाओ उन्हें।" और गुह ने भी कहा, "मेरे धनुषधारी लोग आपके साथ चलेंगे। मैं भी चलूँगा।"
जो कुछ घड़ी पहले शत्रु मानकर नावें सजा रहा था… वही रास्ता दिखाने को तैयार खड़ा था। क्योंकि उसकी वफ़ादारी किसी पक्ष से नहीं थी। श्रीराम से थी।
अगली सुबह गुह फिर हाथ जोड़े खड़ा था। पाँच सौ नावें, जो युद्ध के लिए तैयार की थीं… अब भरत की सेना को पार कराने लगीं।
और कथा का सबसे सुंदर अंत। चौदह बरस बाद।
लंका जीतकर, विमान से लौटते हुए, श्रीराम ने हनुमान को आगे भेजा। और पहला संदेश किसके लिए था? अयोध्या के मंत्रियों के लिए नहीं।
श्रुत्वा तु मां कुशलिनमरोगं विगतज्वरम् ।
भविष्यति गुहः प्रीतः स ममात्मसमः सखा ॥
"शृंगवेरपुर जाओ। गुह से मेरी कुशल कहना। मुझे ठीक सुनकर वो बहुत ख़ुश होगा। वो मेरा अपने जैसा दोस्त है।"
चौदह बरस। रावण से युद्ध। लंका की जीत। और भगवान को याद रहा… कि गंगा किनारे एक नाव वाला उनकी राह देख रहा है।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली। "मैं किस लायक़ हूँ" — ये सवाल भगवान के सामने मत लाइए। गुह के पास न महल था, न वेद। बस एक बात थी — "राम से प्यारा कोई नहीं।" वही उसकी योग्यता बन गई।
दूसरी। दोस्त के लिए जागिए। जिस रात आपके किसी अपने पर संकट हो — अस्पताल में, मुक़दमे में — उस रात धनुष लेकर पहरा दीजिए। फ़ोन उठाइए, साथ बैठिए। ऐसी रातें भगवान याद रखते हैं।
और तीसरी। बड़े दोस्त से झिझकिए मत। श्रीराम ख़ुद आगे बढ़कर गुह से मिले। और सबसे बड़े वही हैं। जब वो नहीं झिझकते… तो हम क्यों?
तो अगली बार, जब किसी बड़े के सामने मन छोटा हो जाए… जब लगे, "मैं उसके बराबर कहाँ"…
तो गंगा के उस किनारे को याद कीजिए। घास का बिछौना। धनुष लिए जागता एक नाव वाला।
राजा का दोस्त… नाव वाला। "आत्मसमः सखा।"
जय श्री राम।
श्रुत्वा तु मां कुशलिनमरोगं विगतज्वरम् ।
भविष्यति गुहः प्रीतः स ममात्मसमः सखा ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1."मैं किस लायक़ हूँ" — ये सवाल भगवान के सामने मत लाइए। गुह के पास न महल था, न वेद। बस एक बात थी — "राम से प्यारा कोई नहीं।" वही उसकी योग्यता बन गई।
- 2.दोस्त के लिए जागिए। जिस रात आपके किसी अपने पर संकट हो — अस्पताल में, मुक़दमे में — उस रात धनुष लेकर पहरा दीजिए। फ़ोन उठाइए, साथ बैठिए। ऐसी रातें भगवान याद रखते हैं।
- 3.बड़े दोस्त से झिझकिए मत। श्रीराम ख़ुद आगे बढ़कर गुह से मिले। और सबसे बड़े वही हैं। जब वो नहीं झिझकते… तो हम क्यों?