माँ ने मुँह में ब्रह्माण्ड देखा

A mother saw the universe in his mouth — Yaśodā opens the child’s mouth and sees the whole world

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सद्यो नष्टस्मृतिर्गोपी सारोप्यारोहमात्मजम् ॥
भागवत 10.8.44

जय श्री कृष्ण।

जिनके घर में छोटे बच्चे हैं, उन्हें ये दृश्य पता होगा। बच्चा एक कोने में बैठा है। एकदम चुप। बहुत देर से कोई आवाज़ नहीं।

और माँ समझ जाती है — कुछ गड़बड़ है!

दौड़कर जाती है। "क्या खा रहा है? मुँह खोल! खोल मुँह!" उँगली डालकर देखती है — मिट्टी, कंकड़, कोई सिक्का, बटन…

हर माँ ने ये किया है। हर पिता ने ये देखा है। और फिर जब बच्चा सो जाता है, तो वही माँ उसके माथे पर हाथ फेरती है और सोचती है — "कितना छोटा है। कितना कुछ है अभी इसके आगे।"

आज की कथा ऐसी ही एक माँ की है, जिसने अपने बच्चे से कहा, "मुँह खोल।" और उस छोटे से मुँह में… उसे पूरा ब्रह्माण्ड दिखा।

पहले थोड़ा पीछे चलते हैं। श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ था। और रातों-रात वसुदेव उन्हें गोकुल में नन्द बाबा के घर छोड़ आए।

और अब पहली दिलचस्प बात। जब नामकरण का समय आया, तो यदुवंश के पुरोहित गर्ग मुनि आए। पर उन्होंने कहा — "अगर मैं खुलेआम इसका नामकरण करूँ, तो कंस समझ जाएगा कि ये देवकी का आठवाँ बेटा है।"

तो भगवान का नामकरण कहाँ हुआ? किसी महल में नहीं। एक एकांत गोशाला में। चुपचाप। गायों के बीच।

और गर्ग मुनि ने नाम रखने का कारण भी बताया। "ये बालक हर युग में शरीर धारण करता है। कभी इसका रंग सफ़ेद था, कभी लाल, कभी पीला। इस बार ये साँवला हुआ है — इसलिए इसका नाम कृष्ण।"

और फिर बोले — "नन्द, जो लोग इससे प्रेम करेंगे, उन्हें कोई शत्रु नहीं हरा पाएगा। तुम्हारा ये बेटा गुण में, कीर्ति में, प्रभाव में नारायण के समान है। सावधानी से इसकी रक्षा करना।"

सोचिए — जो सबकी रक्षा करता है, उसकी रक्षा का काम एक ग्वाले को सौंपा गया!

और फिर शुरू हुआ गोकुल का सबसे सुंदर समय।

तावङ्घ्रियुग्ममनुकृष्य सरीसृपन्तौ घोषप्रघोषरुचिरं व्रजकर्दमेषु ।
10.8.22

श्रीकृष्ण और बलराम, दोनों भाई, घुटनों के बल सरकते हुए। व्रज के कीचड़ में। पैरों में घुँघरू, छन-छन-छन। किसी अनजान के पीछे चल पड़ते, फिर डरकर भागते हुए माँ के पास लौट आते।

और माँ? कीचड़ से सने बेटे को उठाकर गले लगाती, दूध पिलाती, और उसके छोटे-छोटे दाँतों वाली भोली मुस्कान देखकर… निहाल हो जाती।

फिर कभी बछड़ों की पूँछ पकड़ लेते, और बछड़े उन्हें इधर-उधर घसीटते! गोकुल की स्त्रियाँ घर का काम छोड़कर देखतीं और हँसते-हँसते लोटपोट।

और अब सुनिए, भागवत एक ऐसी बात कहता है, जो आज के हर माँ-बाप की बात है —

शृङ्ग्यग्निदंष्ट्र्यसिजलद्विजकण्टकेभ्यः क्रीडापरावतिचलौ स्वसुतौ निषेद्धुम् ।
10.8.25

"सींग वाले जानवर, आग, कुत्ते-बिल्ली, चाकू, पानी, पक्षी, काँटे… इन सबसे दोनों शरारती बच्चों को बचाते-बचाते माँओं का घर का कोई काम नहीं हो पाता था। और मन कभी शांत नहीं रहता था।"

भगवान की माँ भी परेशान थी! आज की माँ बिजली के स्विच और सीढ़ियों से बचाती है। वो सींग और आग से बचाती थी। चिंता वही। प्यार वही।

थोड़े बड़े हुए, तो शिकायतें आने लगीं। गोपियाँ इकट्ठी होकर यशोदा के पास आतीं —

"तुम्हारा लाला! असमय बछड़े खोल देता है! दही-माखन चुराता है, बंदरों को बाँट देता है! और कुछ न मिले, तो बर्तन फोड़ देता है! छींके पर हाँडी टाँगो, तो पीढ़ा और ओखली रखकर चढ़ जाता है, हाँडी में छेद कर देता है!"

ध्वान्तागारे धृतमणिगणं स्वाङ्गमर्थप्रदीपं ।
10.8.30

और एक शिकायत तो ऐसी, कि सुनकर हँसी भी आए और आँखें भी भीगें — "अँधेरे कमरे में चोरी करने जाता है, तो दीया भी नहीं चाहिए। उसका अपना गहनों से सजा शरीर ही दीपक बन जाता है!"

और ये सब कहते हुए गोपियाँ उसका डरा-डरा सुंदर मुँह देखती रहतीं। और माँ? बस मुस्कुराती रहती। डाँटने का मन ही नहीं करता।

और फिर एक दिन… बच्चों ने आकर यशोदा से शिकायत की —

कृष्णो मृदं भक्षितवानिति मात्रे न्यवेदयन् ॥
10.8.32

"माँ! कृष्ण ने मिट्टी खाई है!"

और भागवत बताता है, शिकायत करने वालों में कौन था? बड़े भाई बलराम भी!

यशोदा ने अपने लाल का हाथ पकड़ा। "क्यों रे नटखट! छिपकर मिट्टी क्यों खाई? तेरे सब साथी कह रहे हैं, तेरा बड़ा भाई भी कह रहा है!"

और नन्हे श्रीकृष्ण, आँखें इधर-उधर घुमाते हुए, डरे-डरे —

नाहं भक्षितवानम्ब सर्वे मिथ्याभिशंसिनः । यदि सत्यगिरस्तर्हि समक्षं पश्य मे मुखम् ॥
10.8.35

"माँ, मैंने नहीं खाई! सब झूठ बोल रहे हैं! यक़ीन नहीं, तो मेरा मुँह देख लो!"

"अच्छा? तो खोल मुँह!"

और श्रीकृष्ण ने मुँह खोला।

सा तत्र ददृशे विश्वं जगत्स्थास्नु च खं दिशः । साद्रिद्वीपाब्धिभूगोलं सवाय्वग्नीन्दुतारकम् ॥
10.8.37

और यशोदा ने देखा… पूरा विश्व।

आकाश, दिशाएँ, पहाड़, द्वीप, समुद्र, सारी धरती। हवा, आग, चाँद, तारे। चलते-फिरते प्राणी, खड़े पेड़। काल, कर्म, स्वभाव। जो कुछ है… सब।

और अब दूसरी चौंकाने वाली बात। भागवत कहता है —

सूनोस्तनौ वीक्ष्य विदारितास्ये व्रजं सहात्मानमवाप शङ्काम् ॥
10.8.39

उस मुँह में उसे व्रज भी दिखा। गोकुल। और उस गोकुल में… ख़ुद यशोदा भी! अपने बेटे के मुँह में, अपने आप को खड़े देखा, अपने बेटे का मुँह देखते हुए।

सोचिए। माँ समझती थी, "ये मेरे अंदर से निकला है।" और उस दिन पता चला… "मैं इसके अंदर हूँ।"

यशोदा काँप गईं। "ये सपना है? देवताओं की माया है? मेरी बुद्धि भ्रमित हो गई? या ये मेरे इसी बच्चे की कोई शक्ति है?"

और फिर, उस एक पल में, उस गाँव की ग्वालिन ने वो समझा, जो बड़े-बड़े ज्ञानी समझ नहीं पाते —

अहं ममासौ पतिरेष मे सुतो व्रजेश्वरस्याखिलवित्तपा सती । गोप्यश्च गोपाः सहगोधनाश्च मे यन्माययेत्थं कुमतिः स मे गतिः ॥
10.8.42

"'मैं हूँ, ये मेरे पति हैं, ये मेरा बेटा है, मैं व्रज के राजा की रानी हूँ, ये गायें मेरी, ये गोप-गोपियाँ मेरे'… जिसकी माया से मुझे ये सब 'मेरा-मेरा' लगता है… वही मेरी शरण है।"

और अब तीसरी बात। इस कथा की सबसे सुंदर बात।

भगवान ने देखा — माँ ने सत्य जान लिया। अब वो डर रही है। हाथ जोड़ रही है। अब ये मुझे बेटा नहीं, भगवान मानेगी।

और भगवान को ये मंज़ूर नहीं था।

इत्थं विदिततत्त्वायां गोपिकायां स ईश्वरः । वैष्णवीं व्यतनोन्मायां पुत्रस्नेहमयीं विभुः ॥
10.8.43

उन्होंने अपनी माया फैला दी। पर कैसी माया? "पुत्रस्नेहमयी" — बेटे के प्यार से भरी हुई।

सद्यो नष्टस्मृतिर्गोपी सारोप्यारोहमात्मजम् । प्रवृद्धस्नेहकलिलहृदयासीद्यथा पुरा ॥
10.8.44

और यशोदा… तुरंत सब भूल गईं। बेटे को उठाकर गोद में बिठा लिया। और दिल फिर वैसे ही प्यार से भर गया… बल्कि पहले से भी ज़्यादा।

जिसकी महिमा वेद गाते हैं, उपनिषद् गाते हैं… उसे वो फिर से "मेरा लल्ला" मानने लगीं।

सोचिए। भगवान ने ख़ुद को भुलवा दिया। क्योंकि उन्हें पूजा नहीं चाहिए थी। उन्हें माँ की गोद चाहिए थी।

राजा परीक्षित ने भी यही पूछा — "नन्द और यशोदा ने ऐसा कौन-सा पुण्य किया था?" और भागवत कहता है, ये लीलाएँ तो श्रीकृष्ण के अपने जन्म देने वाले माता-पिता ने भी नहीं देखीं।

उत्तर — पिछले जन्म में नन्द और यशोदा, द्रोण नाम के वसु और उनकी पत्नी धरा थे। और उन्होंने ब्रह्मा से एक ही चीज़ माँगी थी — "धरती पर जन्म लें, तो भगवान में परम भक्ति हो।" भक्ति माँगी थी। और भगवान बेटा बनकर आ गए।

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
गीता 9.17

गीता में वही कृष्ण कहते हैं — "इस जगत का पिता मैं हूँ, माता मैं हूँ।" और गोकुल में वही जगत की माता… एक माँ की गोद में बैठा था।

तो माता-पिता के लिए, और बच्चों के लिए, आज तीन बातें।

पहली। बच्चे की शरारत में, उसकी मिट्टी सनी हथेलियों में, उसकी झूठी "मैंने नहीं खाई" में… भगवान की लीला देखिए। ये दिन जल्दी बीत जाते हैं। जी भरकर देख लीजिए।

दूसरी। यशोदा की तरह याद रखिए — "मेरा बेटा, मेरा घर, मेरी गायें"… ये सब उसकी दी हुई अमानत है। बच्चे हमारे अंदर से आते हैं। पर हम सब… उसके अंदर हैं।

और तीसरी। जो बच्चे आज सुन रहे हैं, जिनके माँ-बाप बूढ़े हो रहे हैं… भगवान भी माँ की गोद के लिए तरसते थे। आज माँ के पास बैठिए। गोद में सिर रखिए। ये मौक़ा भगवान को भी बड़ी मुश्किल से मिला था।

तो अगली बार, जब घर का छोटा बच्चा कोने में चुपचाप बैठा मिले… और आप कहें, "मुँह खोल!"…

तो एक पल के लिए गोकुल को याद कीजिए।

माँ ने मुँह में ब्रह्माण्ड देखा… और फिर, प्यार से, सब भूल गई।

जय श्री कृष्ण।

सद्यो नष्टस्मृतिर्गोपी सारोप्यारोहमात्मजम् । प्रवृद्धस्नेहकलिलहृदयासीद्यथा पुरा ॥
भागवत 10.8.44

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.बच्चे की शरारत में, उसकी मिट्टी सनी हथेलियों में, उसकी झूठी "मैंने नहीं खाई" में… भगवान की लीला देखिए। ये दिन जल्दी बीत जाते हैं। जी भरकर देख लीजिए।
  2. 2.यशोदा की तरह याद रखिए — "मेरा बेटा, मेरा घर, मेरी गायें"… ये सब उसकी दी हुई अमानत है। बच्चे हमारे अंदर से आते हैं। पर हम सब… उसके अंदर हैं।
  3. 3.जो बच्चे आज सुन रहे हैं, जिनके माँ-बाप बूढ़े हो रहे हैं… भगवान भी माँ की गोद के लिए तरसते थे। आज माँ के पास बैठिए। गोद में सिर रखिए। ये मौक़ा भगवान को भी बड़ी मुश्किल से मिला था।

इस सत्संग के श्लोक

भागवत 10.8.44 10.8.22 10.8.25 10.8.30 10.8.32 10.8.35 10.8.37 10.8.39 10.8.42 10.8.43 10.8.44 गीता 9.17