पाँच साल का भक्त
A five-year-old devotee — Dhruva, pushed off his father’s lap, goes to the forest
The recording opens here soon — the whole satsang is below to read.
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
जय श्री कृष्ण।
शाम का समय। बच्चा स्कूल से लौटा है। बस्ता फेंका, और सीधे अपने कमरे में। दरवाज़ा बंद।
माँ पीछे जाती है। "क्या हुआ बेटा?" और बड़ी देर बाद, सिसकते हुए जवाब आता है — "सबको बुलाया था बर्थडे पर… मुझे नहीं बुलाया।"
या कोई और बात। "पापा मेरे फ़ंक्शन में नहीं आए।" "टीचर हमेशा उसी को आगे करती हैं।" "दादी भैया को ज़्यादा प्यार करती हैं।"
बड़ों को ये छोटी बातें लगती हैं। पर बच्चे के लिए… ये पूरी दुनिया होती है।
और कुछ घरों में ये दर्द और गहरा है। सौतेलापन। माँ-बाप का अलगाव। एक बच्चे पर लाड़, दूसरे की अनदेखी।
आज एक ऐसे ही बच्चे की कथा। उम्र — पाँच साल।
राजा उत्तानपाद। दो रानियाँ। सुनीति और सुरुचि। राजा को सुरुचि ज़्यादा प्यारी थी। सुनीति… उतनी नहीं।
सुरुचि का बेटा था उत्तम। और सुनीति का बेटा — ध्रुव।
एक दिन राजा सिंहासन पर बैठे थे, और उत्तम को गोद में बिठाकर दुलार कर रहे थे। छोटा ध्रुव भी दौड़कर आया। हाथ फैलाए। वो भी पिता की गोद में चढ़ना चाहता था।
एकदा सुरुचेः पुत्रमङ्कमारोप्य लालयन् ।
उत्तमं नारुरुक्षन्तं ध्रुवं राजाभ्यनन्दत ॥
और राजा ने… उसे नहीं उठाया।
तभी सुरुचि बोली। राजा के सुनते हुए —
न वत्स नृपतेर्धिष्ण्यं भवानारोढुमर्हति ।
"बच्चे, तू राजा के आसन पर बैठने लायक़ नहीं है। भले तू राजा का बेटा है, पर तू मेरी कोख से नहीं जन्मा। अगर ये सिंहासन चाहिए, तो जा, भगवान की तपस्या कर… और अगले जन्म में मेरे पेट से पैदा हो।"
पाँच साल के बच्चे से।
और भागवत एक ऐसी बात कहता है, जो सबसे ज़्यादा चुभती है। पिता चुपचाप देखते रहे। एक शब्द नहीं बोले।
ध्रुव वहाँ से हटा। डंडे की चोट खाए साँप की तरह फुफकारता हुआ… और रोता हुआ अपनी माँ के पास भागा।
माँ सुनीति ने उसे गोद में उठा लिया। बच्चा सिसक रहा है, होंठ काँप रहे हैं। महल के लोगों से माँ ने सुना कि क्या हुआ। और वो भी रो पड़ी।
अब यहाँ ध्यान दीजिए। ये कथा का सबसे ज़रूरी पल है। एक अपमानित माँ, अपने रोते बच्चे से क्या कहेगी? "बदला लेना"? "उन्हें दिखा देना"?
नहीं। सुनिए सुनीति ने क्या कहा —
मामङ्गलं तात परेषु मंस्था भुङ्क्ते जनो यत्परदुःखदस्तत् ॥
"बेटा, किसी का बुरा मत सोचना। जो दूसरों को दुःख देता है, वो ख़ुद उसे भोगता है।"
और फिर बोली — "सुरुचि ने एक बात सच कही है। भगवान की शरण ले। मुझे तो कमल-नयन भगवान के सिवा कोई नहीं दिखता, जो तेरा दुःख मिटा सके।"
नान्यं ततः पद्मपलाशलोचनाद्दुःखच्छिदं ते मृगयामि कञ्चन ।
जो माताएँ आज सुन रही हैं — आपके बच्चे के आँसू जब आपकी गोद में गिरें, तो उन्हें ज़हर मत दीजिए। सुनीति की तरह… उन्हें भगवान की ओर मोड़ दीजिए।
और पाँच साल का ध्रुव… उठा, और महल छोड़कर चल पड़ा। अकेला। जंगल की ओर।
रास्ते में मिले देवर्षि नारद। उन्होंने बच्चे के सिर पर हाथ रखा और मन में बोले — "वाह! इतना छोटा है, फिर भी अपमान दिल में लिए बैठा है।"
और फिर नारद ने उसकी परीक्षा ली। "बेटा, अभी तेरी उम्र खेलने की है। ये तपस्या बड़े-बड़े मुनियों से नहीं होती। घर लौट जा।"
और साथ में एक ऐसी सीख दी, जो आज हर बच्चे के कमरे की दीवार पर लिखी होनी चाहिए — "जो तुमसे आगे है, उसे देखकर ख़ुश हो। जो पीछे है, उस पर दया करो। जो बराबर है, उससे दोस्ती करो। ऐसा करने वाला कभी दुःख से दबता नहीं।"
तुलना का ज़हर… और उसकी दवा। एक वाक्य में।
और ध्रुव ने कहा — "महाराज, मेरा दिल सुरुचि के शब्दों के बाण से बिंधा है। आपकी शांति की बात उसमें टिकती नहीं। मुझे वो पद चाहिए, जो तीनों लोकों में सबसे ऊँचा हो। रास्ता बताइए।"
नारद प्रसन्न हो गए! बोले — "तेरी माँ ने जो रास्ता बताया, वही सही है।" और यमुना किनारे मधुवन भेजा, ध्यान सिखाया, और एक मंत्र दिया —
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
अब ज़रा महल में चलिए। नारद वहाँ पहुँचे, तो राजा उदास बैठे थे।
राजा बोले — "महाराज, मैंने अपने पाँच साल के बेटे को निकाल दिया। वो जंगल में अकेला होगा, भूखा, थका… कहीं भेड़िये न खा जाएँ। वो प्यार से मेरी गोद में चढ़ना चाहता था… और मैंने उसका आदर नहीं किया।"
नारद ने कहा —
मा मा शुचः स्वतनयं देवगुप्तं विशाम्पते ।
"शोक मत करो, राजन्। तुम्हारे बेटे की रक्षा भगवान कर रहे हैं।"
जिस बच्चे को पिता ने गोद नहीं दी… उसे भगवान ने अपनी गोद में ले लिया था।
और मधुवन में तप शुरू हुआ।
पहले महीने, हर तीसरे दिन कुछ बेर और कैथ। दूसरे महीने, हर छठे दिन सूखी घास और गिरे पत्ते। तीसरे महीने, हर नौवें दिन बस पानी। चौथे महीने, हर बारहवें दिन बस हवा। और पाँचवें महीने…
पञ्चमे मास्यनुप्राप्ते जितश्वासो नृपात्मजः ।
ध्यायन् ब्रह्म पदैकेन तस्थौ स्थाणुरिवाचलः ॥
एक पैर पर खड़ा हो गया। खम्भे की तरह, बिल्कुल अचल।
और अब पहली चौंकाने वाली बात। भागवत कहता है — उस बच्चे के अँगूठे के दबाव से धरती झुक गई! जैसे नाव पर हाथी चढ़ जाए, और नाव डगमगाने लगे।
और जब उसने साँस रोकी… तो सारे लोकों की साँस रुक गई! देवता घबराकर भगवान के पास दौड़े — "प्रभु, बचाइए! किसी की साँस नहीं चल रही!"
भगवान मुस्कुराए। "डरो मत। उत्तानपाद का बेटा मुझमें लीन है। मैं जाता हूँ।"
जिस बच्चे को राजा की गोद में जगह नहीं मिली… उसकी साँस से सारा ब्रह्माण्ड चल रहा था।
भगवान गरुड़ पर आए। ध्रुव ने आँखें खोलीं। जो रूप हृदय में था, वही सामने खड़ा था।
बच्चा ज़मीन पर गिरकर प्रणाम करने लगा। ऐसे देख रहा था, मानो आँखों से पी जाएगा। वो स्तुति करना चाहता था। पर पाँच साल का बच्चा… उसे आती ही नहीं थी।
और दूसरी, सबसे प्यारी बात —
कृताञ्जलिं ब्रह्ममयेन कम्बुना पस्पर्श बालं कृपया कपोले ॥
भगवान ने अपना शंख… धीरे से उस बच्चे के गाल से छुआ दिया। जैसे कोई पिता बेटे का गाल थपथपाता है।
और उसी पल ध्रुव के मुँह से सुंदर स्तुति बहने लगी।
भगवान ने वो पद दिया, जो आज तक किसी को नहीं मिला। ध्रुव पद। जिसके चारों ओर सारे तारे घूमते हैं। आज भी रात को उत्तर की ओर जो अटल तारा दिखता है… ध्रुव।
अब तीसरी बात, जो बहुत कम लोग जानते हैं। ध्रुव लौटते समय ख़ुश नहीं था!
उसने कहा — "हाय, मेरी मूर्खता! भगवान मुझे सब कुछ देने को तैयार खड़े थे… और मैंने माँगा मान। जैसे कोई कंगाल सम्राट के पास जाए, और टूटे चावल माँग ले।"
स्वाराज्यं यच्छतो मौढ्यान्मानो मे भिक्षितो बत ।
ईश्वरात्क्षीणपुण्येन फलीकारानिवाधनः ॥
भगवान के पास जाकर ही बच्चा समझा… कि वो गोद, वो सिंहासन, वो बदला… सब कितना छोटा था।
और घर पहुँचा तो? पिता रथ से कूदकर दौड़े, गले लगाया, आँसुओं से नहला दिया।
और फिर… ध्रुव ने सुरुचि के पैर छुए। और जिस सौतेली माँ ने उसे गोद से हटवाया था… उसने उसे उठाया, गले लगाया, और रुँधे गले से कहा — "चिरंजीवी हो।"
उत्तम और ध्रुव, दोनों भाई, एक-दूसरे से लिपटकर रोते रहे।
और माँ सुनीति? उसने अपने प्राणों से प्यारे बेटे को सीने से लगाया… और भागवत कहता है, उस स्पर्श में उसका सारा दुःख भूल गया। लोगों ने कहा — "रानी, तुमने ज़रूर भगवान की पूजा की है। तुम्हारा खोया बेटा लौट आया।"
यस्य प्रसन्नो भगवान् गुणैर्मैत्र्यादिभिर्हरिः ।
तस्मै नमन्ति भूतानि निम्नमाप इव स्वयम् ॥
"जिस पर भगवान प्रसन्न हों, उसके आगे सब अपने आप झुक जाते हैं। जैसे पानी अपने आप नीचे की ओर बहता है।"
तो आज, बच्चों के लिए और बच्चों के माता-पिता के लिए, तीन बातें।
पहली। बच्चे का अपमान छोटी बात नहीं। पाँच साल का दिल भी बिंधता है। उसकी बात सुनिए। गोद दीजिए। जो राजा चुप रहा, वो बाद में रोया।
दूसरी। सुनीति बनिए। बच्चे के आँसू में बदले का ज़हर मत घोलिए। कहिए — "किसी का बुरा मत सोचना। भगवान हैं न।"
और तीसरी। बच्चों को एक नाम दे दीजिए। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।" जब दुनिया की गोद न मिले, तो उन्हें पता हो कि एक और गोद है।
तो आज रात, जब आसमान की ओर देखें… तो उत्तर में एक तारा ढूँढिए, जो कभी हिलता नहीं।
वो उस बच्चे का है, जिसे एक दिन गोद से हटा दिया गया था।
पाँच साल का भक्त… और भगवान ने अपने शंख से उसका गाल छुआ।
जय श्री कृष्ण।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
तीन बातें याद रखिए
- 1.बच्चे का अपमान छोटी बात नहीं। पाँच साल का दिल भी बिंधता है। उसकी बात सुनिए। गोद दीजिए। जो राजा चुप रहा, वो बाद में रोया।
- 2.सुनीति बनिए। बच्चे के आँसू में बदले का ज़हर मत घोलिए। कहिए — "किसी का बुरा मत सोचना। भगवान हैं न।"
- 3.बच्चों को एक नाम दे दीजिए। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।" जब दुनिया की गोद न मिले, तो उन्हें पता हो कि एक और गोद है।