एक माँ का व्रत

A mother’s vow — Aditi keeps the payovrata, and the Lord is born to her as Vāmana

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स विधास्यति ते कामान्हरिर्दीनानुकम्पनः । अमोघा भगवद्भक्तिर्नेतरेति मतिर्मम ॥
भागवत 8.16.21

जय श्री कृष्ण।

रात के बारह बजे हैं। घर में सब सो चुके हैं। पर एक कमरे में बत्ती जल रही है।

माँ जाग रही है। बेटे का फ़ोन नहीं लग रहा। या बेटी की नौकरी चली गई है, और वो फ़ोन पर कुछ बता नहीं रही। या बच्चा अस्पताल में है, और रिपोर्ट कल आएगी।

माँ कुछ कर नहीं सकती। लड़ नहीं सकती। किसी दफ़्तर में जाकर बहस नहीं कर सकती। तो वो क्या करती है?

वो व्रत रखती है। मंदिर में दीया जलाती है। मन ही मन कहती है — "भगवान, मेरे बच्चों को कुछ मत होने देना।"

बहुत लोग इसे अंधविश्वास कहते हैं। आज भागवत की एक कथा सुनिए। फिर तय कीजिए।

यह कथा एक माँ की है। देवताओं की माँ। उनका नाम था अदिति।

और उनके बेटे थे — इन्द्र और सारे देवता। सोचिए, जिनकी माँ हों, उनके बच्चों पर क्या संकट आएगा?

पर संकट आया। राजा बलि ने स्वर्ग जीत लिया। देवता घबराकर अपने गुरु के पास गए। गुरु ने कहा — "अभी इसके सामने कोई नहीं टिक सकता। अभी इससे लड़ना बेकार है। स्वर्ग छोड़ दो। समय के पलटने का इंतज़ार करो।" और देवता अपना घर छोड़कर छिप गए।

एवं पुत्रेषु नष्टेषु देवमातादितिस्तदा । हृते त्रिविष्टपे दैत्यैः पर्यतप्यदनाथवत् ॥
8.16.1

भागवत कहता है — बेटे छिप गए, स्वर्ग छिन गया… और देवताओं की माँ ऐसे दुखी रहने लगीं, जैसे उनका कोई न हो। "अनाथवत्।"

देवताओं की माँ… अनाथ जैसी। जिसके बेटे स्वर्ग के राजा थे, आज उसके घर में दीया जलाने का मन भी नहीं होता।

जिस माँ का बच्चा घर से दूर है, मुसीबत में है, वो इस शब्द को समझती है।

बहुत दिनों बाद उनके पति, ऋषि कश्यप, समाधि से उठे और आश्रम आए। भागवत दो शब्दों में उस घर का हाल बताता है — "निरुत्सवं निरानन्दम्।" न कोई उत्सव, न कोई आनन्द।

और अब पहली दिलचस्प बात। पति ने पत्नी का उतरा हुआ चेहरा देखा, तो पहले क्या पूछा? "कहीं कोई मेहमान तो बिना पानी पिए नहीं लौट गया? कहीं समय पर हवन तो नहीं छूटा?"

पुराने ज़माने के पति! पहले घर का हिसाब।

फिर धीरे से पूछा — "बच्चे सब ठीक हैं? तुम्हारा मन ठीक नहीं लगता।"

और तब अदिति का बाँध टूटा।

परैर्विवासिता साहं मग्ना व्यसनसागरे ।
8.16.16

"शत्रुओं ने हमें निकाल दिया है। मैं दुःख के सागर में डूबी हूँ। कुछ ऐसा उपाय कीजिए कि मेरे बेटों को उनका घर वापस मिल जाए।"

उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। एक बार भी नहीं।

कश्यप थोड़ा मुस्कुराए। बोले — "अहो, विष्णु की माया! सारा जगत स्नेह से बँधा है।" यानी ज्ञानी पति ने पहले समझाया — कौन किसका बेटा, कौन किसकी माँ।

पर रुकिए। उन्होंने बात वहीं ख़त्म नहीं की। माँ के आँसू को "मोह" कहकर छोड़ नहीं दिया। उन्होंने रास्ता दिखाया।

उपतिष्ठस्व पुरुषं भगवन्तं जनार्दनम् । सर्वभूतगुहावासं वासुदेवं जगद्गुरुम् ॥
8.16.20

"भगवान की शरण लो। वो सबके दिल में बसते हैं। वो दीनों पर दया करने वाले हैं। तुम्हारी इच्छा पूरी करेंगे। भगवान की भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती।"

"अमोघा भगवद्भक्तिः।" ये दो शब्द याद रखिए। आज की पूरी कथा इन्हीं पर टिकी है।

अदिति ने पूछा — "कैसे? किस विधि से?"

और कश्यप ने बताया एक व्रत। पयोव्रत। फाल्गुन के शुक्ल पक्ष में बारह दिन… केवल दूध पीकर रहना। और रोज़ भगवान की पूजा।

फाल्गुनस्यामले पक्षे द्वादशाहं पयोव्रतः । अर्चयेदरविन्दाक्षं भक्त्या परमयान्वितः ॥
8.16.25

ज़मीन पर सोना। दिन में तीन बार स्नान। झूठ और बुरी बात से दूर रहना। किसी प्राणी को दुख न देना।

और अब दूसरी चौंकाने वाली बात। व्रत के आख़िर में क्या करना है? भागवत कहता है — जो भी आए, सबसे नीचा समझा जाने वाला आदमी भी, उसे भोजन कराओ। दीन, अंधे, असहाय… जब सब खा लें, तब अपने परिवार के साथ ख़ुद खाओ।

सोचिए। एक माँ अपने बच्चों के लिए व्रत कर रही है। और व्रत की शर्त है — पहले दूसरों के बच्चों का पेट भरो।

तपो दानं व्रतं यज्ञो येन तुष्यत्यधोक्षजः ॥
8.16.61

और कश्यप ने व्रत का निचोड़ भी बता दिया — "तप, दान, व्रत, यज्ञ… सच्चा वही है, जिससे भगवान प्रसन्न हों।" भूखा रहना नहीं। भगवान को प्रसन्न करना।

अदिति ने व्रत शुरू किया। बारह दिन। बिना आलस्य के।

भागवत एक सुंदर चित्र देता है। उन्होंने बुद्धि को सारथी बनाया, मन को लगाम… और इन्द्रियों के बेलगाम घोड़ों को थाम लिया। मन एक ही जगह लगा रहा — भगवान वासुदेव में।

और फिर… एक दिन… आश्रम में उजाला हो गया।

तस्याः प्रादुरभूत्तात भगवानादिपुरुषः । पीतवासाश्चतुर्बाहुः शङ्खचक्रगदाधरः ॥
8.17.4

पीताम्बर पहने, चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा… भगवान सामने खड़े थे!

अदिति एकदम उठीं, और ज़मीन पर लेटकर प्रणाम किया। फिर हाथ जोड़कर खड़ी हुईं, स्तुति करने के लिए… और बोल ही नहीं पाईं।

आँखें आनन्द के आँसुओं से भर गईं। शरीर काँप रहा था। रोम खड़े थे। बारह दिन जिसके लिए भूखी रहीं… वो सामने था, और माँ के मुँह से एक शब्द नहीं निकला।

भागवत कहता है, वो उन्हें ऐसे देख रही थीं… जैसे आँखों से पी रही हों।

फिर धीरे-धीरे, भर्राई आवाज़ में बोलीं —

शं नः कृधीश भगवन्नसि दीननाथः ॥
8.17.8

"हे भगवान, हमारा कल्याण कीजिए। आप दीनों के नाथ हैं।"

जो "अनाथवत्" थी… उसने भगवान को "दीननाथ" कहकर पुकारा।

अब भगवान का उत्तर सुनिए। ये तीसरी बात है, और सबसे गहरी।

भगवान बोले — "देवमाता, मैं तुम्हारी पुरानी इच्छा जानता हूँ। तुम चाहती हो, तुम्हारे बेटे फिर से अपना घर पाएँ।"

फिर उन्होंने साफ़ कहा — "पर इस समय वो असुर जीते नहीं जा सकते। उनके साथ उनका पुण्य है। लड़ाई से सुख नहीं मिलेगा।"

सुना आपने? भगवान ख़ुद कह रहे हैं — अभी रास्ता बंद है।

पर बात यहाँ ख़त्म नहीं हुई।

ममार्चनं नार्हति गन्तुमन्यथा श्रद्धानुरूपं फलहेतुकत्वात् ॥
8.17.17

"फिर भी, तुम्हारे व्रत से मैं प्रसन्न हूँ। मुझे कोई उपाय सोचना ही होगा। क्योंकि मेरी पूजा कभी बेकार नहीं जाती। वो श्रद्धा के अनुसार फल देती है।"

जहाँ सारे रास्ते बंद थे… वहाँ एक माँ के व्रत ने भगवान को "उपाय सोचने" पर मजबूर कर दिया।

और उपाय क्या था?

स्वांशेन पुत्रत्वमुपेत्य ते सुतान्गोप्तास्मि मारीचतपस्यधिष्ठितः ॥
8.17.18

"मैं स्वयं तुम्हारा बेटा बनकर आऊँगा। और तुम्हारे बेटों की रक्षा करूँगा।"

माँ ने बेटों के लिए माँगा था। भगवान ने कहा — मैं भी तुम्हारा बेटा बनूँगा।

और एक प्यारी-सी हिदायत भी दी — "ये बात किसी को मत बताना। पूछे तब भी नहीं। देवताओं का रहस्य छिपा रहे, तभी पूरा होता है।"

और फिर वो हुआ, जो किसी ने नहीं सोचा था। भगवान अदिति के गर्भ में आए।

और ब्रह्मा जी, जो सारी सृष्टि रचते हैं… वो आकर उस गर्भ की स्तुति करने लगे!

दिवौकसां देव दिवश्च्युतानां परायणं नौरिव मज्जतोऽप्सु ॥
8.17.28

"हे प्रभु, स्वर्ग से गिरे देवताओं का सहारा आप ही हैं… जैसे पानी में डूबते आदमी के लिए नाव।"

और समय आया। शंख बजे, नगाड़े बजे, अप्सराएँ नाचीं, गन्धर्व गाए। आश्रम फूलों से ढक गया। चार भुजाओं वाले भगवान अदिति से प्रकट हुए।

और फिर, माता-पिता के देखते-देखते… वो एक छोटे-से ब्रह्मचारी बालक बन गए। वामन।

जिन्हें सारे वेद नहीं नाप सकते… वो एक माँ की गोद के नाप के हो गए।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली। माँ का व्रत अंधविश्वास नहीं है। भागवत कहता है, भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। जब आप बच्चों के लिए कुछ नहीं कर सकते, तब भी एक काम कर सकते हैं — भगवान को पुकार सकते हैं।

दूसरी। व्रत भूखा रहने का नाम नहीं। अदिति के व्रत में झूठ छोड़ना था, हिंसा छोड़नी थी, और आख़िर में भूखों को खिलाना था। अपने बच्चे के लिए दुआ माँगें, तो किसी और के बच्चे का पेट भर दीजिए।

और तीसरी। जब लगे कि सारे रास्ते बंद हैं… तो याद रखिए, भगवान ने भी कहा था "अभी रास्ता बंद है।" और फिर भी उपाय निकाला। क्योंकि जो रास्ता दुनिया में नहीं होता, वो भगवान ख़ुद बनकर आते हैं।

तो अगली बार, जब रात के बारह बजे किसी कमरे में बत्ती जलती दिखे… कोई माँ जागती दिखे…

तो उसे टोकिएगा मत।

वो अदिति की तरह किसी को पुकार रही है। और भागवत कहता है, वो पुकार कभी ख़ाली नहीं जाती।

एक माँ का व्रत… और भगवान स्वयं बेटा बनकर आ गए।

जय श्री कृष्ण।

ममार्चनं नार्हति गन्तुमन्यथा श्रद्धानुरूपं फलहेतुकत्वात् ॥
भागवत 8.17.17

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.माँ का व्रत अंधविश्वास नहीं है। भागवत कहता है, भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। जब आप बच्चों के लिए कुछ नहीं कर सकते, तब भी एक काम कर सकते हैं — भगवान को पुकार सकते हैं।
  2. 2.व्रत भूखा रहने का नाम नहीं। अदिति के व्रत में झूठ छोड़ना था, हिंसा छोड़नी थी, और आख़िर में भूखों को खिलाना था। अपने बच्चे के लिए दुआ माँगें, तो किसी और के बच्चे का पेट भर दीजिए।
  3. 3.जब लगे कि सारे रास्ते बंद हैं… तो याद रखिए, भगवान ने भी कहा था "अभी रास्ता बंद है।" और फिर भी उपाय निकाला। क्योंकि जो रास्ता दुनिया में नहीं होता, वो भगवान ख़ुद बनकर आते हैं।

इस सत्संग के श्लोक

भागवत 8.16.21 8.16.1 8.16.16 8.16.20 8.16.25 8.16.61 8.17.4 8.17.8 8.17.17 8.17.18 8.17.28 भागवत 8.17.17