ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर
Brahmā’s fifth head — Bhairava cuts off the head of pride, then carries the skull to Kāśī
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यावद्गर्वो भवेत्तावज्ज्ञानगुप्तिर्विशेषतः ।
हर हर महादेव।
एक मीटिंग चल रही है। कंपनी के दो सीनियर डायरेक्टर हैं। एक कहता है — "ये प्रोजेक्ट मेरी वजह से चला।" दूसरा कहता है — "तुम्हारी वजह से? मैंने इसे बनाया है!" और बाकी सब चुपचाप बैठे हैं, बार-बार घड़ी देख रहे हैं।
या घर में दो सगे भाई — "पिताजी की दुकान मैंने बढ़ाई।" "नहीं, मैंने।" और उसी बहस में पूरी दुकान ही डूब जाती है।
"मैं सबसे बड़ा" — ये वाक्य किसने नहीं बोला? आज की कथा इसी वाक्य की है। और ये वाक्य बोलने वाले कोई साधारण आदमी नहीं थे — स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा। और उसकी क़ीमत थी — उनका पाँचवाँ सिर।
एक बार सारे देवता और ऋषि मेरु पर्वत पर ब्रह्मा जी के पास गए। हाथ जोड़कर पूछा — "प्रभु, हमें सच बताइए — इस सृष्टि का सबसे बड़ा तत्त्व कौन है?"
और ब्रह्मा जी — जो उस समय माया से मोहित थे — बोले —
जगद्योनिरहं धाता स्वयम्भूरज ईश्वरः ।
अनादिभागहं ब्रह्म एक आत्मा निरञ्जनः ॥
"मैं जगत् का कारण हूँ, रचयिता हूँ। स्वयंभू, अजन्मा, ईश्वर। मेरा कोई आदि नहीं। मैं ही ब्रह्म हूँ।"
और वहीं विष्णु जी भी बैठे थे। वो भी माया से मोहित थे। तुरंत बोले —
न चैतदुचिता ब्रह्मन्योगयुक्तस्य मूर्खता ।
अविज्ञाय परं तत्त्वं वृथैतत्ते निगद्यते ॥
"ब्रह्मा, तुम्हारे जैसे योगी को ये मूर्खता शोभा नहीं देती। तुम परम तत्त्व को नहीं जानते — तुम्हारी बात व्यर्थ है।" और फिर — "सबका कर्ता तो मैं हूँ। तुम भी मेरी आज्ञा से सृष्टि करते हो।"
देखिए। दोनों महान्, दोनों पूज्य। पर जब "मैं" आ जाता है, तो बड़े-बड़े भी मीटिंग वाले उन दो डायरेक्टरों जैसे लगने लगते हैं।
फिर तय हुआ — वेदों से पूछो। वेद वहाँ शरीर धारण करके खड़े थे। और चारों वेदों ने एक-एक करके कहा — "जिनके भीतर सब प्राणी रहते हैं, जिनसे सब उत्पन्न होता है, जिनका योगी ध्यान करते हैं — वो रुद्र हैं, वही परम तत्त्व हैं।"
पर दोनों ने वेदों की भी नहीं मानी —
कथं प्रमथनाथोऽसौ रममाणो निरन्तरम् ।
दिगम्बरः पीतवर्णो शिवया धूलिधूसरः ॥
"ये भूतों का स्वामी परम कैसे हो सकता है? ये तो दिगम्बर है, धूल से सना, सदा शिवा के साथ रहता है।"
सुना? सच सामने आया, तो उसके कपड़ों पर सवाल उठा दिया। जब अहंकार हारने लगता है, तो वो तर्क नहीं, ताने देता है।
फिर स्वयं ओंकार — प्रणव — ने प्रकट होकर समझाया। फिर भी अज्ञान नहीं गया।
और तब —
प्रादुरासीत्ततो ज्योतिरुभयोरन्तरे महत् ।
पूरयन्निजया भासा द्यावाभूम्योर्यदन्तरम् ॥
"दोनों के बीच एक महान् ज्योति प्रकट हुई — जिसने अपने प्रकाश से आकाश और धरती के बीच का सारा स्थान भर दिया।"
उस ज्योति के बीच एक पुरुष का रूप दिखा। और —
प्रज्ज्वालाथ कोपेन ब्रह्मणः पञ्चमं शिरः ।
आवयोरन्तरे कोऽसौ बिभृयात्पुरुषाकृतिम् ॥
"तब ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर क्रोध से जल उठा — 'हम दोनों के बीच, पुरुष का रूप लिए ये कौन है?'"
और ज्योति से नीललोहित शिव प्रकट हुए — त्रिशूल, तीसरा नेत्र, साँप और चन्द्रमा। और ब्रह्मा जी ने क्या कहा? —
नीललोहित जाने त्वां मा भैषीश्चन्द्रशेखर ।
भालस्थलान्मम पुरा रुद्रः प्रादुरभूद्भवान् ॥
"नीललोहित, मैं तुम्हें जानता हूँ। चन्द्रशेखर, डरो मत। बहुत पहले तुम मेरे माथे से प्रकट हुए थे।"
रोदनाद् रुद्रनामापि योजितोऽसि मया पुरा ।
मामेव शरणं याहि पुत्र रक्षां करोमि ते ॥
"तुम रोए थे, इसलिए मैंने तुम्हारा नाम रुद्र रखा। बेटा, मेरी शरण में आ जाओ — मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा।"
सोचिए। जिसकी ज्योति ने आकाश-धरती भर दी — उससे कह रहे हैं, "डरो मत, बेटा, मेरी शरण आओ।" अहंकार का सबसे बड़ा लक्षण — बड़े को छोटा समझना।
और तब —
अथेश्वरः पद्मयोनेः श्रुत्वा गर्ववतीं गिरम् ।
चुकोपातीव च तदा कुर्वन्निव लयं मुने ॥
"ब्रह्मा के घमंड भरे वचन सुनकर प्रभु अत्यंत क्रोधित हुए — जैसे प्रलय कर देंगे।"
और उस क्रोध से एक पुरुष प्रकट हुआ — तेज से जलता हुआ — भैरव। महादेव ने कहा, "कालभैरव, पहले इस ब्रह्मा को दण्ड दो।" और भैरव ने, अपने बाएँ हाथ की उँगली के नाख़ून से, ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काट दिया।
केवल पाँचवाँ? क्यों? —
यदंगमपराध्नोति कार्यं तस्यैव शासनम् ।
अतो येन कृता निन्दा तच्छिन्नं पञ्चमं शिरः ॥
"जो अंग अपराध करे, दण्ड उसी को मिलना चाहिए। इसलिए जिस पाँचवें सिर ने निन्दा की थी, वही काटा गया।"
बाकी चार सिर — जो वेद पढ़ते थे, जो सृष्टि रचते थे — वो बचे रहे। भगवान व्यक्ति को नहीं मिटाते। वो सिर्फ़ उसका अहंकार काटते हैं।
ये देखकर विष्णु जी डर गए। तुरंत शतरुद्रिय मंत्रों से शंकर की स्तुति करने लगे। ब्रह्मा जी ने भी। और दोनों को समझ आ गया।
और यहाँ कथा का सबसे बड़ा उपदेश आता है —
यावद्गर्वो भवेत्तावज्ज्ञानगुप्तिर्विशेषतः ।
"जब तक घमंड रहता है, तब तक सच्चा ज्ञान छिपा रहता है।"
त्यक्त्वाभिमानं पुरुषो जानाति परमेश्वरम् ।
गर्विणं हन्ति विश्वेशो जातो गर्वापहारकः ॥
"अभिमान छोड़कर ही मनुष्य परमेश्वर को जानता है। विश्वेश्वर घमंड को हरने के लिए ही प्रकट होते हैं।"
ब्रह्मा जी चार वेदों के ज्ञाता थे। पर एक पाँचवें सिर का घमंड, चारों वेदों के ज्ञान पर पर्दा डाल रहा था।
और जब दोनों ने घमंड छोड़कर प्रणाम किया, तो महादेव प्रसन्न हुए, ढाढ़स बँधाया। और फिर भैरव से जो कहा, वो बहुत गहरा है —
त्वया मान्यो विष्णुरसौ तथा शतधृतिः स्वयम् ।
कपालं वैधसं वापि नीललोहित धारय ॥
"तुम्हें विष्णु का, और स्वयं ब्रह्मा का भी, आदर करना है। और नीललोहित — ब्रह्मा का ये कपाल, तुम धारण करो।"
यानी — दण्ड देने वाला भी ज़िम्मेदारी से नहीं बचेगा। भैरव ने न्याय किया था, आज्ञा से किया था — फिर भी ब्रह्महत्या का पाप उनके पीछे चला।
कपालपाणिर्विश्वात्मा चचार भुवनत्रयम् ।
नात्याक्षीच्चापि तं देवं ब्रह्महत्यापि दारुणा ॥
"हाथ में कपाल लिए, विश्वात्मा तीनों लोकों में घूमे। पर ब्रह्महत्या का भयंकर पाप उन्हें नहीं छोड़ रहा था।"
हर तीर्थ गए। भिक्षा माँगी। एक दिन वैकुण्ठ पहुँचे, तो विष्णु जी ने दण्डवत् करके पूछा — "प्रभु, आप भिक्षा क्यों माँग रहे हैं?" और भैरव ने बड़ी सरलता से कहा —
ब्रह्मणस्तु शिरश्छिन्नमङ्गुल्याग्रनखेन ह ।
तदघं प्रतिहन्तुं हि चराम्येतद्व्रतं शुभम् ॥
"मैंने अपने नाख़ून की नोक से ब्रह्मा का सिर काटा था। उस पाप को मिटाने के लिए, ये पवित्र व्रत कर रहा हूँ।"
न बहाना, न "मुझे आदेश मिला था", न "वो घमंडी था"। सीधा स्वीकार — "मैंने किया, अब प्रायश्चित्त कर रहा हूँ।"
और फिर भैरव काशी पहुँचे। जैसे ही उस पवित्र क्षेत्र में पैर रखा —
कपालं ब्रह्मणः सद्यो भैरवस्य करांबुजात् ।
पपात भुवि तत्तीर्थमभूत्कापालमोचनम् ॥
"उसी क्षण ब्रह्मा का कपाल भैरव के हाथ से धरती पर गिर पड़ा, और वो स्थान कपालमोचन तीर्थ बन गया।"
और भैरव सबके सामने आनंद से नाच उठे। आज भी वो काशी के कोतवाल हैं — कालभैरव।
अब उस मीटिंग वाले कमरे में लौटिए। वो दोनों डायरेक्टर अगर एक पल रुककर सोचें — "ये प्रोजेक्ट किसी एक का नहीं, पूरी टीम का है, और उससे भी ऊपर, उन ग्राहकों का है जिन्होंने भरोसा किया" — तो बहस वहीं ख़त्म हो जाए। इस कथा में ब्रह्मा और विष्णु, दोनों ने आख़िर में यही किया — "मैं" छोड़कर, किसी बड़े के आगे झुके। और झुकते ही दोनों का मान फिर से लौट आया — महादेव ने ख़ुद भैरव से कहा, "इन दोनों का आदर करना।" झुकने से कोई छोटा नहीं होता। अड़ने से ज़रूर कुछ कटता है।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली — "मैं सबसे बड़ा" वाला एक सिर सबमें होता है। ब्रह्मा जी के चार सिर ज्ञान के थे, एक घमंड का। अगली मीटिंग में, अगली पारिवारिक बहस में, अपना "पाँचवाँ सिर" पहचानिए — और उसे पहले ही झुका दीजिए।
दूसरी — सच आए, तो कपड़ों पर सवाल मत उठाइए। "ये धूल से सना है, ये कैसे बड़ा होगा?" सच कभी-कभी साधारण वेश में आता है — उसे पहचानिए।
तीसरी — सही काम करके भी ज़िम्मेदारी लीजिए। भैरव ने न्याय किया, फिर भी कपाल उठाया, प्रायश्चित्त किया। माँ-बाप बच्चे को डाँटें, तो बाद में गले लगाना भी न भूलें।
चार सिर ज्ञान के थे… एक घमंड का। और कटा वही, जिसने भगवान को छोटा समझा।
हर हर महादेव।
त्यक्त्वाभिमानं पुरुषो जानाति परमेश्वरम् ।
तीन बातें याद रखिए
- 1."मैं सबसे बड़ा" वाला एक सिर सबमें होता है। ब्रह्मा जी के चार सिर ज्ञान के थे, एक घमंड का। अगली मीटिंग में, अगली पारिवारिक बहस में, अपना "पाँचवाँ सिर" पहचानिए — और उसे पहले ही झुका दीजिए।
- 2.सच आए, तो कपड़ों पर सवाल मत उठाइए। "ये धूल से सना है, ये कैसे बड़ा होगा?" सच कभी-कभी साधारण वेश में आता है — उसे पहचानिए।
- 3.सही काम करके भी ज़िम्मेदारी लीजिए। भैरव ने न्याय किया, फिर भी कपाल उठाया, प्रायश्चित्त किया। माँ-बाप बच्चे को डाँटें, तो बाद में गले लगाना भी न भूलें।