कामाख्या में अंबुवाची — चार दिन, और गृहस्थ घर पर क्या करे
अंबुवाची पर्व के लिए घर पर पूजा का मार्गदर्शन।
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अंबुवाची क्या है, और यह विषय आम लोगों से क्यों छिपाया जाता है?
तंत्र वर्ष का महाकुंभ, जिसे गृहस्थ से दूर रखा गया
वक्ता कहते हैं कि इन चार दिनों को पूरे वर्ष का सबसे प्रचंड और प्रत्यक्ष सिद्धि देने वाला तंत्र पर्व कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी — यह तंत्र पर्वों का महाकुंभ है। पर आम लोगों को इस विषय से दो वाक्यों में दूर कर दिया गया है: छोड़ो, यह तंत्र-मंत्र की बात है, तुम बर्बाद हो जाओगे।
वक्ता कहते हैं कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी: यदि पूरे वर्ष के सबसे प्रचंड और प्रत्यक्ष सिद्धि देने वाले तंत्र पर्व का नाम लेना हो, जिसे तंत्र पर्वों का महाकुंभ माना जाए — और तांत्रिकों का अपना महाकुंभ होता ही है — तो वह अम्बुबाची के यही चार दिन हैं। वे कहते हैं कि एक ऐसा समय रहा है जब इस विषय को एक ही दिशा में ज़ोर से दबाया गया: छोड़ो, छोड़ो, यह तंत्र-मंत्र की बात है, आम आदमी को इसे पढ़ने की ज़रूरत नहीं, तुम बर्बाद हो जाओगे। बस इन्हीं दो वाक्यों से किसी को भी इन सब बातों से दूर कर दिया जाता है।
इन चार दिनों में गृहस्थ को वास्तव में क्या करना चाहिए?
तांत्रिक का मार्ग अलग है, पर गृहस्थ को भी विशेष पूजा करनी चाहिए
वक्ता आपत्ति करते हैं कि यह नहीं बताया जाता कि तंत्र करने वालों का मार्ग थोड़ा अलग, कठिन और विशेष है — और आम व्यक्ति, उस तरह न करते हुए भी, इन चार दिनों में भगवती की कम से कम विशेष सेवा-पूजा अवश्य करे: उनका कवच, उनके मंत्र, और जो दीक्षित हैं वे अपने दीक्षित मंत्र।
वक्ता आपत्ति करते हैं कि जो बात नहीं बताई जाती, वह यह है: जो तांत्रिक हैं, जो तांत्रिक क्रियाएँ करते हैं या तांत्रिक विधि से भगवती की उपासना करते हैं, उनकी सेवा-पूजा करके शक्तियाँ सिद्ध करते हैं, उनका मार्ग थोड़ा अलग, कठिन और विशेष है। और यह कि आम व्यक्ति, उस तरह न करते हुए भी, इन चार दिनों में भगवती की कम से कम विशेष सेवा-पूजा अवश्य करे। उनका कवच करें; उनके मंत्र करें; और जो दीक्षित हैं, वे अपने दीक्षित मंत्र करें। वे कहते हैं कि इसकी चर्चा नहीं होती। उलटे आम लोगों को दूर रखने का प्रयास होता है कि वे दूर ही रहें। दूर रखने का एक सकारात्मक तरीका और सकारात्मक कारण भी है — कि इसका दुरुपयोग न हो, और वह भी ठीक है। पर कल्याण के लिए कम से कम अपने इष्ट और आराध्य की सेवा-पूजा तो इस दिन की ही जा सकती है।
क्या शाक्त ग्रंथ कहते हैं कि कामरूप में केवल भगवती की ही पूजा करें?
वहाँ भगवती के साथ अपने आराध्य की भी पूजा करें
नहीं — शाक्त कभी ऐसा नहीं कहता, और शाक्त तंत्र ग्रंथ भी कभी ऐसा नहीं कहते। वहाँ यह उद्धृत मिलेगा कि भगवती की पूजा अपने आराध्य के साथ करनी है; उनकी विशेष पूजा के साथ-साथ अपने आराध्य की पूजा भी करनी है।
वक्ता कहते हैं कि कामाख्या क्षेत्र के बारे में यह बात पक्की जान लें: शाक्त कभी वैसा नहीं कहता जैसा दूसरे संप्रदाय और दूसरे लोग कहते हैं। शाक्त के तंत्र ग्रंथ कभी ऐसा नहीं कहते। शाक्त के प्रामाणिक, पारंपरिक गुरु-परंपरा वाले स्रोत और लोग आपसे कभी यह कहते नहीं मिलेंगे कि यदि आप कामरूप प्रदेशअसम का वह ऐतिहासिक क्षेत्र जिसमें कामाख्या स्थल स्थित है। में आएँ — जो शाक्त का सबसे प्रमुख केंद्र और स्थान है — तो केवल और केवल भगवती की ही पूजा करें। वहाँ यह उद्धृत मिलेगा कि भगवती की पूजा अपने आराध्य के साथ करनी है। जगदंबा की विशेष पूजा के साथ-साथ अपने आराध्य की पूजा भी करनी है।
यदि दीक्षित व्यक्ति कामरूप में अपने मंत्र का जप न करे तो क्या होता है?
जो दीक्षा कामरूप तक न ले जाई गई, वह व्यर्थ है
यदि किसी भी पंथ, किसी भी तरीके, किसी भी संप्रदाय या किसी भी गुरु परंपरा से दीक्षित व्यक्ति कामरूप प्रदेश में जाए और वहाँ उस दीक्षित मंत्र का जप और पुरश्चरण न करे, तो उसकी दीक्षा व्यर्थ हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ यह भी मिलेगा: यदि कोई व्यक्ति किसी भी पंथ से, किसी भी तरीके से, किसी भी संप्रदाय से, किसी भी गुरु परंपरा में दीक्षित है, और वह कामरूप प्रदेशअसम का वह ऐतिहासिक क्षेत्र जिसमें कामाख्या स्थल स्थित है। जाकर वहाँ उस दीक्षित मंत्र का जप और पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। नहीं करता, तो उसकी दीक्षा व्यर्थ हो जाती है। वे कहते हैं कि यहाँ किसी शाक्त ग्रंथ में यह उद्धृत नहीं मिलेगा कि आप वैष्णव हैं इसलिए वहाँ जाकर जप नहीं कर सकते, या वैष्णव मंत्रों का जप न करें, या ऐसी कोई बात। सीधी बात है: आप जिसमें भी दीक्षित हैं, वहाँ उसका जप करना अनिवार्य है।
जो कामरूप पहुँचकर बैठकर अपने गुरु-प्रदत्त मंत्र का जप नहीं करता, उसे वह मंत्र और गुरु मंडल शाप देते हैं
जो वहाँ जप नहीं करता, उसे गुरु मंडल शाप देता है
कि यदि कामरूप प्रदेश आकर आप वहाँ बैठकर — नीलाचल पर्वत के पास, सौभाग्य कुंड के पास, ब्रह्मपुत्र के पास — अपने गुरु के देवता-मंत्र का जप नहीं करते, तो वह मंत्र और आप तक आई गुरु परंपरा, वह गुरु मंडल, आपको शाप देते हैं। यह देवी पुराण महाभागवत और शक्ति संगम तंत्र में है।
वक्ता बताते हैं कि अब ये शास्त्रोक्त बातें हैं; उनके अपने विचार और अनुभव अलग बात हैं। शास्त्रोक्त बातों में यह भी लिखा मिलेगा, देवी पुराण महाभागवत आदि में और शक्ति संगम तंत्र में: कि यदि कामरूप प्रदेशअसम का वह ऐतिहासिक क्षेत्र जिसमें कामाख्या स्थल स्थित है। जाकर आप उस क्षेत्र में भगवती के सामने बैठकर अपने गुरु के देवता-मंत्र का जप नहीं करते — उनके प्रमुख स्थान के सामने, उसके आसपास, या सीधे कहें तो कामरूप प्रदेश के नीलाचल पर्वत के पास, सौभाग्य कुंड के पास, या ब्रह्मपुत्र के पास — तो वह मंत्र, और आप तक आई गुरु परंपरा, वह गुरु मंडल, आपको शाप देते हैं।
कामरूप क्षेत्र स्वयं साधना में क्या अंतर लाता है?
कामरूप हर शक्ति का मूल क्षेत्र है
क्योंकि उसे सब कुछ का उत्पत्ति क्षेत्र, उत्पत्ति का कुंड माना जाता है, वह केंद्र जहाँ से सब प्रकाशित होता है और सब फलता-फूलता है — जितनी भी शक्तियाँ हैं उन सबका केंद्र। तो कौन सी शक्ति होगी जो उस स्थान पर अपनी पौष्टिक पूजा और हवन न चाहे?
वक्ता कहते हैं कि यह मातृ-स्थान है। उस स्थान को सब कुछ का उत्पत्ति क्षेत्र, उत्पत्ति का कुंड, उत्पत्ति का केंद्र माना जाता है। वहीं से सब कुछ प्रकाशित हो रहा है; वहीं से सब फल-फूल रहा है। जितनी भी शक्तियाँ हैं उन सबका यह केंद्र है — और कौन सी शक्ति जगदंबा की शरणागत नहीं है? तो वे पूछते हैं, ऐसी कौन सी शक्ति होगी जो उस स्थान पर अपना पौष्टिक कर्म पौष्टिक हवन और पूजा न चाहे? सभी शक्तियाँ पुष्ट होना, तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। से तृप्त होना, शुद्ध होना चाहती हैं। और उसी स्थान पर जाकर, माँ के सामने बालक — कौन सा बालक नहीं चाहेगा कि उसकी माँ उसे प्यार करे?
कामरूप ले जाए गए किसी छोटे या दूर के देवता का क्या होता है?
दूर का भैरव देवी के सूक्ष्म लोक में प्रवेश कर पुष्ट होता है
उनका उदाहरण: किसी विशेष भैरव मंत्र का साधक — कोई ऊँचे भैरव नहीं, बल्कि दूर के क्षेत्र के लोक देवता, पूर्वांचल नहीं बल्कि राजस्थान की ओर के। जब वह कामरूप में वह जप करके उनका आवाहन करता है, तो वह देवता भगवती के सूक्ष्म कामरूप लोक में प्रवेश करते हैं, उनकी निकटता से स्वयं पुष्ट और सक्षम होते हैं, और फिर साधक पर अत्यधिक कृपा करते हैं।
वक्ता एक उदाहरण से समझाते हैं। मान लीजिए कोई भैरव जी के किसी विशेष मंत्र का जप करता है — और सामान्य रूप से मान लें कि ये ऊँचे स्तर के भैरव नहीं, बल्कि कोई तंत्र भैरव हैं, या शुद्ध सात्विक रूप में लोक देवता के रूप में खड़ा कोई भैरव-तत्व। और मान लीजिए वह किसी दूर के क्षेत्र का है, पूर्वांचल का नहीं बल्कि राजस्थान की ओर का। जब वह साधक कामरूप प्रदेशअसम का वह ऐतिहासिक क्षेत्र जिसमें कामाख्या स्थल स्थित है। जाकर उस स्थान पर अपने मंत्रों का जप करता है, तो उसके अपने शरीर में स्थित देवता का अंश तो उसके साथ पहले से है। पर जब उसके आवाहन से उसके देवता वहाँ आते हैं — तो सबसे सरल ढंग से कहें: आप अपने हाथ से उन्हें अर्घ देंगे, आचमनपूजा से पूर्व आत्मशुद्धि हेतु जल का अनुष्ठानिक आचमन, प्रारंभिक शुद्धिकरण क्रियाओं में से एक। देंगे, और साथ में सूक्ष्म जगत में भगवती का अपना दिव्य कामरूप क्षेत्र है, तंत्र लोक, सूक्ष्म लोक, जिसे उनकी कृपा के बिना कोई प्रत्यक्ष नहीं देख सकता। उस लोक में उनका प्रवेश होता है, और भगवती की कृपा से उनकी अपनी पुष्टि बढ़ती है; वे भी पुष्ट हो जाते हैं। उनकी क्षमता बढ़ती है; भगवती की निकटता से वे सक्षम हो जाते हैं। और फिर वे आप पर अत्यधिक कृपा करते हैं।
कामरूप में पितरों और कुल देवताओं के लिए क्या करना चाहिए?
कभी खाली हाथ न लौटें — त्रिपिंडी करें, या मछलियों को खिलाएँ
वहाँ अपने आराध्य, अपने देवता, अपने कुल की शक्तियों और अपने कुल के पितरों, सबके लिए पूजा करें। पितरों के लिए दान दें; यदि ब्रह्मपुत्र में पिंड करवा सकें तो त्रिपिंडी करें। यदि नहीं, तो वहाँ बैठकर मछलियों के लिए दाना डालें, या दान दें, या सामर्थ्य अनुसार तर्पण करें।
वक्ता कहते हैं कि इसी कारण जब भी कोई कामरूप क्षेत्र जाए, तो वहाँ अपने आराध्य, अपने देवता, अपने कुल की शक्तियों और अपने कुल के पितृ — सबके लिए पूजा करें। पितरों के लिए दान दें। यदि ब्रह्मपुत्र नदी में पिंड करवा सकें, तो त्रिपिंडी श्राद्ध आदि करें। यदि यह न कर सकें, तो वहाँ बैठकर मछलियों के लिए दाना डालें। मछलियों के लिए आटा डालें; या हो सके तो वहाँ बैठकर किसी को दान दें; या सामर्थ्य अनुसार तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। करें। और यदि तर्पण करना नहीं आता, तो बस अंजलि में जल लेकर, पितरों के लिए, अपने इष्ट और आराध्य का नाम और मंत्र लेकर छोड़ दें। यदि कुछ भी नहीं आता, तो बस इतना ही करें — इससे भी उनकी तृप्ति हो जाएगी। पर वहाँ से कभी खाली हाथ न लौटें।
महामुद्रा का दर्शन कौन कर सकता है?
महामुद्रा का दर्शन और स्पर्श निषिद्ध है
निषेध महामुद्रा के दर्शन पर है। जहाँ गुरु की कृपा और गुरु की आज्ञा है, वहाँ बात अलग है; यदि आप विवाहित हैं तो बात अलग है; यदि आप शाक्त दीक्षित हैं और गुरु की आज्ञा है, या आपका शाक्त अभिषेक हो चुका है, तो बात अलग है। अन्यथा दोष लगता है, क्योंकि वह माँ की महामुद्रा है।
वक्ता वह बात सुधारते हैं जो उनके अनुसार उन्होंने पिछले वीडियो में कभी नहीं कही: उन्होंने कभी नहीं कहा कि अविवाहित वहाँ नहीं जा सकते। वे कहते हैं कि निषेध महामुद्रा के दर्शन पर है। यदि कोई सीधे-सीधे कह रहा है कि प्रत्यक्ष दर्शन और स्पर्श किया जा सकता है या नहीं, तो वह बहुत भ्रम में है। जहाँ गुरु की कृपा और गुरु की आज्ञा है, वहाँ बात अलग है। यदि आप विवाहित हैं, तो बात अलग है। यदि आप शाक्त अभिषेकशाक्त तांत्रिक कुल परंपरा में क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ने हेतु आवश्यक एक औपचारिक अभिषेक व दीक्षा संस्कार। से दीक्षित हैं और आपके लिए गुरु की आज्ञा है, तो बात अलग है। यदि आपका शाक्त अभिषेक हो चुका है, तो बात अलग है। अन्यथा, वे कहते हैं, वैसे भी वहाँ महामुद्रा का प्रत्यक्ष रूप में दर्शन — उस प्रमुख स्थान का दर्शन — नहीं होता। पर फिर भी दोष लगता है, क्योंकि वह माँ की महामुद्रा है।
युवाओं के लिए महामुद्रा का दर्शन निषिद्ध क्यों है?
उच्छिष्ट गणपति का उदाहरण — उस ऊर्जा को धारण करने की क्षमता
वक्ता उच्छिष्ट गणपति के स्वरूप का उदाहरण देते हैं: पंद्रह या बीस वर्ष का युवक वह स्वरूप देखकर किस दशा में होगा — वह चिंतन उसके मन से कभी नहीं जाएगा और वह पूजा में कभी एकाग्र नहीं हो पाएगा। वे स्वरूप तांत्रिक विधि से उन लोगों के लिए हैं जिनमें मूलाधार को रोकने और ऊर्जा को ऊपर ले जाने की क्षमता है।
वक्ता कहते हैं कि सीधी बात है। जिन्होंने यहाँ उच्छिष्ट गणपति का स्वरूप प्रत्यक्ष देखा है, वे देख सकते हैं कि भगवान का वह स्वरूप क्या है, उसके पीछे की कथा क्या है, और तंत्र में उनकी क्षमता क्या है। यदि कोई आम व्यक्ति, पंद्रह-सोलह या बीस वर्ष का कोई युवक, वह स्वरूप देखे — तो वह किस दशा में आ जाएगा? वह चिंतन उसके मन से कभी नहीं जा पाएगा, और वह पूजा में कभी एकाग्र नहीं हो पाएगा। वे कहते हैं कि वह स्वरूप पूरी तरह तांत्रिक विधि का है और ऐसे लोगों के लिए है जिनमें सामान्यतः मूलाधार को रोकने और उसे ऊपर की ओर पुष्ट करने की क्षमता है, और जो ऐसी गुरु परंपरा में हैं। यदि आप आधे-अधूरे ज्ञान के साथ ऐसे स्वरूपों को धारण करते हैं, तो वह शक्ति शायद ही आपको मना करे या रोके — पर उस ऊर्जा को धारण करने की क्षमता आपमें नहीं होगी।
कामरूप संसार की हर प्रकार की ऊर्जा का केंद्र-बिंदु है, इसलिए वहाँ अनधिकार प्रयास करना कठिनाई लाता है
संसार की हर प्रकार की ऊर्जा का केंद्र
कि इस पूरे संसार की हर प्रकार की ऊर्जा का केंद्र-बिंदु, एक तरह से, कामरूप प्रदेश है, भगवती कामाख्या का क्षेत्र। यदि आप वहाँ जाकर वह करने का प्रयास करते हैं जिसके आप अधिकारी नहीं हैं, तो कठिनाई होगी। महामुद्रा का दर्शन और उसका स्पर्श निषिद्ध है — उस स्थान पर नहीं जाना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी तरह, यदि ऐसा कहें, तो इस पूरे संसार की हर प्रकार की ऊर्जा का केंद्र-बिंदु कामरूप प्रदेशअसम का वह ऐतिहासिक क्षेत्र जिसमें कामाख्या स्थल स्थित है। है, भगवती कामाख्या का क्षेत्र। और यदि आप उस स्थान पर जाकर इस तरह वह करने का प्रयास करते हैं जिसके आप अधिकारी नहीं हैं, तो कठिनाई होगी। उन महामुद्रा का दर्शन और उनका स्पर्श निषिद्ध है। उस स्थान पर नहीं जाना चाहिए। बाकी मानना या न मानना आपकी अपनी इच्छा है। वे कहते हैं कि हमने जो सुना है वह हमारा कोई आविष्कार नहीं है — ऐसा नहीं कि हम आज पैदा हुए और आज से आपको ज्ञान बाँटने लगे। यह परंपरा से आया है, बड़े-बुज़ुर्ग कहते आए हैं, और पारंपरिक साधक ये नियम मानते हैं। वही सुनकर हम आपको बता रहे हैं। इसमें मेरे मन का कुछ नहीं है। वे जोड़ते हैं कि यह उनका अपना अनुभव भी है, इसीलिए वे बता रहे हैं।
कामाख्या में महामुद्रा दर्शन के अलावा क्या किया जा सकता है?
शिखर दर्शन और परिक्रमा — और वहाँ कोई आपको रोकेगा नहीं
आप कामरूप प्रदेश बिल्कुल जा सकते हैं। शिखर दर्शन करें, मंदिर की परिक्रमा करें; महामुद्रा दर्शन के अलावा, पीने के लिए जो जल है वह आपके साथ के गुरु-भाई या बड़े आपको दे सकते हैं। यह जानकारी लेकर जाएँ कि आपको दर्शन कैसे नहीं करना है।
वक्ता कहते हैं कि आप कामरूप क्षेत्र बिल्कुल जा सकते हैं। आप शिखर दर्शन कर सकते हैं; मंदिर की परिक्रमा कर सकते हैं। महामुद्रा के दर्शन के अलावा, वहाँ पीने के लिए जो जल है, वह आपके गुरु-भाई या आपके बड़े, जो भी आपके साथ हों, आपको दे सकते हैं। यदि आप अंदर जाते हैं, तो यह जानकारी लेकर जाएँ कि हमें दर्शन कैसे नहीं करना है। आपको पता होना चाहिए कि यह कैसे करना है। वे कहते हैं कि आधे-अधूरे ज्ञान के साथ यदि आप ऐसी किसी चीज़ को छू लें — तो वहाँ आपको मना करने वाला कोई नहीं है; वह विषय अलग रखें। यह दूसरे ऐसे क्षेत्रों जैसा नहीं जहाँ स्त्रियों का प्रवेश वर्जित है और कोई आकर आपको बताएगा। यह आपका निजी मामला है; मानना या न मानना आपकी अपनी बात है। वहाँ कोई किसी को नहीं रोकता, और यह बहुत अच्छी बात है — इसीलिए उन्होंने कहा था कि हम करोड़ों को क्यों रोकें। वे कहते हैं कि यह बहुत अच्छी बात है कि किसी को भी रोका नहीं जाता। भगवती को छूने से उनके लिए कोई बात नहीं बनेगी — पर उनकी योगिनी शक्तियाँ, जिनके लिए यह निषेध बताया गया है, अत्यंत जाग्रत स्वरूप हैं।
क्या बच्चों पर भी यही निषेध लागू होता है?
तेरह वर्ष से कम के बच्चों को कोई विशेष दोष नहीं लगता
माता-पिता के साथ जाने वाले मासूम बच्चे, जिन्हें इन विषयों की कोई जानकारी नहीं, कोई विशेष दोष नहीं पाते — तेरह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए वैसे भी क्षमा है। पंद्रह-सोलह वर्ष का वह किशोर, जो जानता है कि वह कहाँ जा रहा है, उसकी बात अलग है।
वक्ता कहते हैं कि वह क्षेत्र अपने आप में अत्यंत तीव्र और उग्र है: जाने के एक वर्ष के भीतर नौ दीपकों जितना तेल जल जाता है। और बाद में शुरू होता है — हम गए थे, और यह हो गया; देखो, यह होना चाहिए था, हमारी इच्छा पूरी होनी थी और यहाँ उल्टा हो रहा है। वे कहते हैं कि उल्टा होने का कारण तब बनता है जब आप जान-बूझकर गलती करते हैं। जहाँ जानकारी नहीं है और ऐसा कुछ हो जाए, वह अलग बात है। बाकी: माता-पिता के साथ जाने वाले मासूम बच्चे, जिन्हें इन विषयों की कोई जानकारी नहीं — यह क्या है, दर्शन कैसे होता है, वहाँ कौन है — उन्हें कोई विशेष दोष नहीं लगेगा। तेरह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए वैसे भी क्षमा है। पर उसके बाद की बात, पंद्रह-सोलह वर्ष पर, जब वह जानता है कि वह कहाँ जा रहा है और वहाँ क्या है — आजकल तो वे खोजबीन करते हैं, इंटरनेट पर सब उपलब्ध है।
आयु की इस रोक के पीछे क्या कारण है?
हार्मोन वाला तर्क — ऊर्जा सहन नहीं होगी
अपना चौदहवाँ-पंद्रहवाँ वर्ष याद करें — हार्मोन कितनी तेज़ी से बदलते थे, विपरीत लिंग की ओर कैसे खिंचाव था, लगभग बेहोशी जैसी दशा। तो सोचिए, ऐसे व्यक्ति की ऊर्जा उस क्षेत्र में जाकर कितनी बढ़ेगी, और यदि वह काम के वेग को सहन नहीं कर पाया तो गलतियाँ और अपराध होंगे और लड़का बर्बाद हो जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि कहीं न कहीं यही कारण है। सुनने वाले आप कितनी भी उम्र के हों — बीस, तीस, चालीस, पचास, साठ — आप सब चौदह-पंद्रह की इस उम्र से गुज़रे हैं। एक बार सोचिए कि उस समय शरीर में हार्मोन के बदलाव कितनी तेज़ी से होते हैं। सोचिए कि आप विपरीत लिंग की ओर कैसे खिंचते थे; उस समय लगभग बेहोशी जैसी दशा रही होगी। उसे याद कीजिए। तो सोचिए ऐसा व्यक्ति उस क्षेत्र में जा रहा है जहाँ भगवती के ये स्वरूप विराजमान हैं — और उसे पहले से जानकारी है कि वहाँ ऐसी स्थिति है। दिन-रात उसके मन में वही चिंतन चलेगा। आज के समय में हमने उसे इतना लाड़-प्यार में नहीं रखा कि वह इन विषयों से अनजान रहे, उनसे कोई मतलब न रखे और केवल भगवती के स्वरूप के लिए जाए; ऐसा बहुत दुर्लभ है। तो सोचिए वहाँ जाकर उसकी ऊर्जा कितनी बढ़ेगी। और यदि वह काम के वेग को सहन नहीं कर पाया, तो गलतियाँ होंगी, अपराध होंगे, और लड़का बर्बाद हो जाएगा। वे कहते हैं कि मानना या न मानना आपकी अपनी इच्छा है।
यदि कोई केवल घूमने के लिए कामाख्या जाए तो क्या होता है?
घूमने वाले में क्षमा माँगने का भाव ही नहीं बचता
यदि भगवती के प्रति आपका भाव समर्पण का है और आप साधना के लिए गए हैं और मंत्र जप कर रहे हैं, तो वहाँ आपके लिए क्षमा है, रक्षा है, विजय है। यदि आप घूमने गए, तो गलती होने पर आपके भीतर क्षमा माँगने का भाव भी नहीं होगा — और वहीं से कठिनाई शुरू होती है।
वक्ता बताते हैं कि आजकल लोग दर्शन के लिए नहीं, बस घूमने जाते हैं — यह भी एक विषय है: चलो, घूम आते हैं। वे कहते हैं कि घूमने के लिए आप दूसरी जगहों पर जा सकते हैं। स्थानों में वह भगवती का धाम है, सबसे विशेष तीर्थ और सबसे विशेष धाम। वह तीर्थ भी है और धाम भी। वह महाक्षेत्र है। और उससे ऊपर, वह तंत्र क्षेत्र है। तो आप वहाँ घूमने के उद्देश्य से गए, और कुछ हो गया। यदि भगवती के प्रति आपका भाव समर्पण का है और आप साधना के उद्देश्य से गए हैं और मंत्र जप आदि कर रहे हैं, तो वहाँ आपके लिए क्षमा है; तब आपकी रक्षा है, तब आपकी विजय है। और यदि आप घूमने गए, यदि आपका उद्देश्य कुछ और था — ऐसा नहीं कि आप कुछ गलत कर रहे हैं, पर जब गलती होगी, तो आपके भीतर क्षमा का भाव भी नहीं बचेगा। आप उसे महत्व नहीं देंगे: हाँ, हो गया तो हो गया; पैर लग गया तो क्या। फिर यदि उस "तो क्या" के लिए आप क्षमा नहीं माँगते, तो कठिनाई होगी — विशेष रूप से उस क्षेत्र में।
कामरूप में गलती के बाद बहुत से लोग बर्बाद दशा में पहुँच जाते हैं और किसी से इसकी बात नहीं करते
वह दशा जिसकी कोई बात नहीं करेगा
नहीं। उनका चित्र: दक्षिण भारतीय फ़िल्में जहाँ भूत आदमी को पीछे से फाड़ देता है — आदमी सामने से पूरा सूटेड-बूटेड खड़ा है, और पीछे से फटा हुआ। वे कहते हैं कि बहुत से लोग उस दशा में पहुँचते हैं और बताते नहीं, क्योंकि उनके स्वाभिमान को ठेस लगती है।
वक्ता कहते हैं कि तारापीठ जाइए — और उन लोगों की दशा देखिए जो इन बातों को नहीं मानते। कोई आकर आपको नहीं बताएगा। वे कहते हैं कि दक्षिण भारतीय फ़िल्मों में दिखाया जाता है: भूत आदमी को पीछे से फाड़ देता है; सामने से आदमी पूरा सूटेड-बूटेड है, और पीछे से फटा हुआ। बहुत से लोग उस दशा में पहुँचते हैं। पर वे इसकी बात नहीं करेंगे। वे कैसे बात करेंगे? कहीं न कहीं उनके स्वाभिमान को ठेस लगेगी — कि ऐसा कैसे हो सकता है।
कामाख्या में कौन-कौन सी शक्तियाँ उपस्थित हैं?
दस महाविद्याएँ, आठ भैरव, और भैरव रूप में विनायक
वहाँ अनगिनत शक्तियाँ हैं, पर मुख्य रूप से दस महाविद्याएँ, और भगवती की प्रमुख महामुद्रा के पास विराजमान आठ प्रमुख भैरव। और बारह विनायक — कामरूप प्रदेश में विनायक भी भैरव रूप में उपस्थित हो जाते हैं, अपनी शक्तियों, वैनायकी, के साथ।
वक्ता कहते हैं कि जब भी आप कामरूप प्रदेश या कामाख्या क्षेत्र जाएँ, तो उस क्षेत्र में उपस्थित सभी शक्तियों की जानकारी हो तो बहुत अच्छा है। वहाँ अनगिनत शक्तियाँ हैं, पर मुख्य रूप से दस महाविद्या आठ प्रमुख अष्ट-भैरव के साथ भगवती की प्रमुख महामुद्रा के पास विराजमान हैं। और दूसरे, बारह गणपति — आप बारह विनायक और सोलह विनायक सुनेंगे। जब आप कामरूप प्रदेश में जाते हैं, तो विनायक भी भैरव रूप में उपस्थित हो जाते हैं; और यह भी माना जाता है कि उनकी शक्तियाँ वैनायकी हैं। यदि आप किसी गुरु परंपरा में हैं और आपके गुरु कामरूप प्रदेश की विशेष सेवा करते हैं और उन्हें भगवती कामाख्या के महामुद्रा यंत्र की जानकारी है, तो वह यंत्र वैसे ही काम करता है जैसे, एक सामान्य उदाहरण लें, सप्तशती यंत्र: जो सप्तशती यंत्र की आवरण पूजा करते हैं, वे अष्टदल कमल में आठ भैरवों की पूजा करते हैं, और उनके साथ आठ शक्तियों की — आठ दुर्गाओं, आठ अष्टमातृका की। दो समूहों की शक्तियों की पूजा हो रही है।
चौंसठ योगिनियों का महावरण क्या है?
चौंसठ योगिनियाँ, चौंसठ भैरव और चौंसठ सिद्धि गणपति
महायंत्रों में, जहाँ चौंसठ योगिनियों की पूजा होती है, उनके साथ चौंसठ भैरवों की पूजा होती है — लोग जिन बावन को जानते हैं वे नहीं — और उनके साथ सिद्धि रूप में चौंसठ गणपति। सिद्धि यानी गणपति; तो सिद्धि महागणपति, सिद्धि क्षिप्र महागणपति, हर नाम के आगे सिद्ध शब्द जुड़ता है।
वक्ता कहते हैं कि जब हम महायंत्रों में जाते हैं, तो महायंत्र वह है जिसमें सामान्यतः चौंसठ योगिनी की पूजा होती है। यदि कोई व्यक्ति नवार्ण मंत्र में दीक्षित है, तो नवार्ण में चौंसठ की पूजा होती है, और उसके भीतर तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। भी। तो जहाँ चौंसठ योगिनियों की पूजा हो रही है: सामान्यतः आदमी बावन भैरवों को जानता है — पर वहाँ, महायंत्र या महा नवार्ण यंत्र आदि में, चौंसठ योगिनियों के साथ चौंसठ भैरवों की पूजा होती है। और उनमें सिद्धि रूप में सिद्धि गणपति हैं। वे कहते हैं कि महागणपति का स्वरूप एक बात समझें, और उनका सिद्धि गणपति स्वरूप दूसरी बात। पर वहाँ, तालमेल बैठाकर, चौंसठ योगिनियों के मंडल में सिद्धि रूप में चौंसठ विनायकों की भी पूजा होती है। सिद्धि यानी गणपति बराबर सिद्धि। तो उनके सभी नामों में — महागणपति सिद्धि महागणपति हो जाते हैं; क्षिप्र गणपति सिद्धि क्षिप्र महागणपति हो जाते हैं; हर नाम के आगे सिद्ध शब्द जुड़ता है — जब योगिनियों के साथ चौंसठ आवरण और चौंसठ मंडलों की पूजा होती है। तो चौंसठ दल वाले कमल में, चतुःषष्टि-दल कमल में, चौंसठ-चौंसठ की तीन पूजाएँ होती हैं। इसीलिए इसे महावरण कहते हैं: इसमें चौंसठ योगिनियों की पूजा हो रही है, चौंसठ भैरवों की पूजा हो रही है, और उसी में चौंसठ सिद्धि गणपतियों की। हालाँकि वे खुद को सुधारते हैं — वहाँ उन्हें विनायक नहीं कहा जाएगा; चौंसठ को सिद्ध गणपति, महागणपति कहा जाएगा; वे उन्हीं के अपने स्वरूप हैं।
कामाख्या मंडल को महाचक्र क्या बनाता है?
छह मुख वाली कामाख्या और दोहरा षट्कोण आवरण
सामान्यतः षट्कोण में छह महादुर्गाओं की पूजा होती है। पर कामाख्या का अपना प्रमुख स्वरूप छह मुख वाला है — इसलिए उस महादुर्गा मंडल में दोहरी आवरण पूजा होती है, साथ में छह अलग भैरव; और प्रमुख स्थान पर भगवती कामाख्या की उमानंद भैरव के साथ पूजा होती है। इसीलिए वह महाचक्र बन जाता है।
वक्ता कहते हैं कि सामान्यतः हम सब जानते हैं कि षट्कोण में छह महादुर्गाओं के रूप में पूजा होती है — पर जब आप कामाख्या जाते हैं, तो उसमें भगवती के अपने छह प्रमुख स्वरूप आ जाते हैं। माँ कामाख्या के स्वरूप के कितने मुख हैं? छह। तो इस महादुर्गा मंडल में फिर दोहरी आवरण पूजा होती है। इसीलिए इसे महायंत्र और महावरण कहा जा रहा है। भगवती के एक प्रमुख स्वरूप के साथ एक महादुर्गा है; और जहाँ महादुर्गाएँ हैं, वहाँ उनके साथ छह अलग भैरव होंगे। तो जिस स्थान पर हम सामान्यतः बटुक भैरव और महाभैरव की पूजा करते हैं, वहाँ छह अलग भैरव पूजाएँ होती हैं। और प्रमुख स्थान पर भगवती कामाख्या की उमानन्द भैरवकामाख्या स्थल पर शिव की उपस्थिति, देवी के भैरव के रूप में। आदि के साथ पूजा होती है। इसीलिए यह महाचक्र बन जाता है।
जिस साधक को आवरण का ज्ञान नहीं, वह अंबुवाची में किन स्वरूपों की पूजा करे?
दो स्वरूप — कामाख्या, और जो भी आपके अपने आराध्य हैं
दो स्वरूप, क्योंकि दो तो हम जानते ही हैं: भगवती का स्वरूप और भैरव का स्वरूप — और इसी एक से अनेक हुए; मूल यही शक्ति है। तो दो को साथ ले जाएँ: भगवती कामेश्वरी कामाख्या, और आप जिनकी भी उपासना करते हैं, शिव, दुर्गा, कृष्ण, नारायण, गायत्री, बगलामुखी, त्रिपुरसुंदरी का कोई भी स्वरूप।
वक्ता कहते हैं कि भले ही हमें इतनी जानकारी न हो, दो स्वरूप तो हम जानते ही हैं: एक भगवती का स्वरूप, दूसरा भैरव जी का स्वरूप। और इसी एक से अनेक हुए; मूल यही शक्ति है। तो जब हम उस स्थान पर जाते हैं, तो मुख्य रूप से दो शक्तियों को साथ ले जाना है। पहली, भगवती का वह स्वरूप जो कामरूप कामाख्या है, माँ भगवती कामेश्वरी कामाख्या। और दूसरा स्वरूप वह, जिनकी भी आप उपासना करते हैं — आप जिनके भी सेवक हों, शिव जी के, दुर्गा जी के, कृष्ण जी के, नारायण के; चाहे आप गायत्री मंत्र के साधक हों, भगवती बगलामुखी के साधक हों, या त्रिपुरसुंदरी के किसी भी स्वरूप के। पर वहाँ जब आप भगवती के साथ उनकी पूजा करते हैं, तो उस पूजा का ढंग और विधि आप पर निर्भर है — आप मानसिक पूजा करेंगे, संक्षिप्त पंचोपचारपूजा का मूल पंचांग क्रम — धूप, दीप, गंध, पुष्प व नैवेद्य — जो साधना की प्रारंभिक क्रियाओं के बाद देवता हेतु किया जाता है। या षडोपचार पूजा, षोडशोपचारदेवता हेतु सोलह अंगों वाला पूर्ण पूजा-क्रम, मूल पंचोपचार से अधिक विस्तृत। पूजा, या जो भी आपका सामर्थ्य और इच्छा हो।
अंबुवाची काल पूजी जा रही शक्ति पर क्या प्रभाव डालता है?
किसी भी शक्ति को प्रभावी और जाग्रत करने का केंद्र-काल
समझ लीजिए कि अंबुवाची पर्व का समय उन सभी शक्तियों को विशेष प्रभावी बनाने, जाग्रत करने और उग्र करने का केंद्र-काल है, जिन्हें लोग जगा रहे हैं और जिनकी सेवा कर रहे हैं। यदि आप कवच का पाठ कर रहे हैं — तांत्रिक पक्ष को अलग रखें; हर किसी की अपनी परंपरा है और हमें उसमें जाने की ज़रूरत नहीं।
वक्ता उसी विषय को आगे ले जाते हुए कहते हैं: समझ लीजिए कि अम्बुबाची पर्व का समय उन सभी शक्तियों को विशेष प्रभावी बनाने, जाग्रत करने और उग्र करने का केंद्र-काल है, जिन्हें लोग जगा रहे हैं और जिनकी सेवा-पूजा कर रहे हैं। आप किसी कवच का पाठ कर रहे हैं। वे जोड़ते हैं कि तांत्रिक पक्ष को अभी अलग रखें — तांत्रिक क्या करेंगे वह हर किसी की अपनी परंपरा है, और आपको या हमें उसमें जाने की ज़रूरत नहीं। चाहे उन्हें कोई सिद्धि मिल रही हो, या वे गलत काम कर रहे हों या अच्छा — लोग संदेश भेजकर पूछते हैं कि फलाना क्या है; हमें उससे क्या लेना। वे कहते हैं, देखिए समय कितनी तेज़ी से बीत रहा है। सुबह आठ से शाम पाँच तक आप नौकरी पर या अपने व्यापार में हैं; कितना कम समय मिलता है। और उसमें आप फलाने के बारे में सोच रहे हैं कि वह यह कर रहा है — करने दीजिए। उससे आपको और हमें क्या मिलेगा? उससे बस मानसिक दबाव, ईर्ष्या और द्वेष मिलेगा। उसमें अध्ययन के लिए समय ही नहीं बचता।
पार्वती गीता समय की कमी के बारे में क्या कहती है?
जीवन पत्ते पर ओस की बूँद है
पार्वती गीता में भगवती कहती हैं कि जीवन क्षणिक है — जैसे पत्ते पर पानी की बूँद, ओस की बूँद। वह कब फिसलकर नीचे गिर जाए, पता भी नहीं चलेगा। पत्ता समय है और उस पर की बूँद हम हैं; हम किसी भी क्षण फिसल सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि समय बहुत कम है। पार्वती गीता में भगवती कह रही हैं कि जीवन क्षणिक है। जैसे पत्ते पर पानी की बूँद, ओस की बूँद, वैसा ही हमारा जीवन है। वह कब पत्ते से फिसलकर नीचे गिर जाए, पता भी नहीं चलेगा। यह पत्ता समय है, और उस पर की बूँद हम हैं। हम किसी भी क्षण फिसल सकते हैं। तो वे कहते हैं, इस पर ध्यान देना बंद करें — कौन लुट रहा है, कौन लूट रहा है, किसकी दुर्गति हो रही है। सबकी दुर्गति हो रही है, हमारी भी; वे हमारे अपने कर्म हैं। आपकी हो रही है; वे आपके कर्म हैं। न हमारी दुर्गति आप पर असर करे, न आपकी हम पर। वे जोड़ते हैं कि एक काम ज़रूर किया जा सकता है: हम एक-दूसरे को उस दुर्गति को नष्ट करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं — कि हम दुर्गति नाश करने वाली भगवती दुर्गा की उपासना करें। और यदि हम दुर्गा की शरण लें, तो वे दुर्गति अवश्य नष्ट करेंगी, क्योंकि उनका नाम ही दुर्गा है।
अंबुवाची वास्तव में कितने दिन चलती है?
पूरा गिनें तो छह दिन; प्रमुख चार
पूरा लें तो समय 21 तारीख की रात बारह बजे से 26 तारीख की भोर तक मानें — छह दिन। पर प्रमुख चार हैं: 22, 23, 24 और 25 तारीख। 25 की रात से सारा श्रृंगार और पूजा शुरू हो जाती है, और फिर 26 की सुबह तीन बजे से।
वक्ता कहते हैं कि अंबुवाची पर्व के चार दिन प्रमुख हैं। पूरा लें, तो समय 21 तारीख से — 21 की रात बारह बजे से — मानें और 26 की भोर तक ले जाएँ। इस तरह आपको छह दिन मिलते हैं। पर मुख्य रूप से यह चार दिन है: 22, 23, 24 और 25 तारीख। 26 को — हालाँकि 25 की रात से ही सारा श्रृंगार और पूजा शुरू हो जाती है — 26 की सुबह तीन बजे से माँ का श्रृंगार आदि फिर से होता है।
घर पर किस स्वरूप की पूजा कामाख्या के रूप में करें?
भगवती का जो भी स्वरूप आप पहले से रखते हैं — मूल तत्व सबमें है
भगवती का जो भी स्वरूप आपने घर में स्थापित किया है और जिसकी सेवा करते हैं — भले ही वह केवल फ़ोटो या प्रतीक हो, बस उसमें आपका भाव भगवती का हो — उसी में भगवती कामाख्या की पूजा करें। क्योंकि मूल तत्व उन सबमें विराजमान है।
वक्ता बताते हैं कि इस पर बहुत कम चर्चा होती है: कथावाचक ऐसे विषय कभी नहीं उठाएँगे, बस थोड़ा सा कहेंगे — हाँ, वहाँ ऐसा होता है — और आम व्यक्ति को यह जिज्ञासा ही नहीं होती कि उस समय उसे क्या करना चाहिए, और जो कोई जो बताए वही मान लेता है। तो वे कहते हैं, इसे सरल ढंग से समझें: भगवती के जिस भी स्वरूप का श्री विग्रह आपने घर में स्थापित किया है और जिसकी सेवा-पूजा करते हैं — भले ही आपने केवल उनकी फ़ोटो स्थापित की हो, भले ही केवल उनका प्रतीक स्थापित किया हो, बस उसमें आपका भाव भगवती का हो — तो उसी में भगवती कामाख्या की पूजा करें। क्योंकि मूल तत्व उन सबमें विराजमान है; भगवती कामाख्या का, माँ पार्वती का वह स्वरूप सबमें उपस्थित है।
दस महाविद्याएँ उनके एक स्वरूप में क्यों आ जाती हैं?
सृष्टि की सारी अनंत शक्तियाँ उनके एक स्वरूप में एकत्र हैं
क्योंकि भगवती कामरूप कामाख्या ऐसा स्वरूप हैं कि उनमें दसों महाविद्याओं की पूजा की जा सकती है — उनके एक स्वरूप में पूरी सृष्टि की सारी अनंत शक्तियाँ समाई हैं। और इसी कारण हर स्त्री तत्व के भीतर कामाख्या तत्व उपस्थित है।
वक्ता कहते हैं कि दस महाविद्या भगवती कामरूप कामाख्या का ऐसा स्वरूप हैं कि उसमें आप दसों महाविद्याओं की पूजा कर सकते हैं। उनके एक स्वरूप में पूरी सृष्टि की सारी अनंत शक्तियाँ एकत्र हैं। और इसी कारण हर स्त्री-तत्व के भीतर, सबके भीतर, कामाख्या तत्व उपस्थित है — है ही। वे कहते हैं कि यदि कामाख्या कृपा न करतीं, तो कोई नई सृष्टि होती ही नहीं। उन्हीं की कृपा से जीवन चल रहा है। और उसका प्रत्यक्ष जाग्रत प्रतीक आज के समय में भी उपस्थित है।
क्या कोई महामुद्रा का दर्शन करता भी है?
कोई दर्शन नहीं करता — पर देवी स्वप्न में अपना पूरा स्वरूप दिखाती हैं
कामरूप प्रदेश में ऐसा कोई नहीं जो महामुद्रा स्वरूप का दर्शन कर सके — इसे सत्य जानें। उस स्वरूप का दर्शन सबके लिए निषिद्ध है। पर वक्ता का अपना अनुभव है कि जिन पर माँ कृपा करती हैं, उन्हें वे स्वप्न में अपना पूरा स्वरूप दिखाती हैं, इतना स्पष्ट कि व्यक्ति उसे भूल नहीं पाता।
वक्ता कहते हैं कि कुछ लोग सोच रहे होंगे, जैसे हम विंध्य क्षेत्र में कहते हैं: श्रृंगारिया परिवार के पंडा जी कितने अद्भुत हैं, उनका कितना सौभाग्य है कि वे भगवती के मूल विग्रह का नित्य दर्शन करते हैं, उनका नित्य श्रृंगार और स्नान करते हैं। निश्चय ही वे भाग्यशाली हैं, बहुत भाग्यशाली। हमें तो बस भगवती के चरणों का थोड़ा दर्शन और उनके मस्तक का, उनके नेत्रों का थोड़ा दर्शन मिलता है; प्रमुख चिह्न ढके रहते हैं और मूल स्वरूप का दर्शन नहीं होता। पर एक बात वे अपने अनुभव से बिल्कुल साफ़ कहते हैं: जिन पर माँ कृपा करती हैं, जिन पर भी माँ विंध्यवासिनी की कृपा होती है — वे इसे अपने से जुड़े लोगों के माध्यम से देखते हैं और उन्हीं से जानते हैं — उन्हें माँ स्वप्न के माध्यम से अपना पूरा स्वरूप दिखाती हैं। ठीक ऐसा ही होता है, और स्वरूप ऐसा होता है कि व्यक्ति कहता है कि इतने दिन बीत गए और वह उसे भूल नहीं पाता: माँ का प्रमुख, बिल्कुल अलग स्वरूप, पत्थर वाला स्वरूप, स्वप्न में प्रत्यक्ष दिखना। जिसका समर्पण इतना गहरा है, उसे वे उस दर्शन से अपना रहस्य दे देती हैं। पर वे कहते हैं कि कामरूप प्रदेश में ऐसा कोई नहीं जो उनके महामुद्रा स्वरूप का दर्शन कर सके — इसे भी सत्य जानें। उस स्वरूप का दर्शन सबके लिए निषिद्ध है।
गुटिका पूजा क्या है?
चाँदी की गुटिका और सबसे दुर्लभ सोने की गुटिका
एक परंपरा अब भी है जिसमें गुटिका पूजा होती है। जिन साधकों की परंपरा में यह पूजा है, उन्हें चाँदी की गुटिका मिलती है; सोने की गुटिका सबसे दुर्लभ है। और जिन्हें वह मिलती है वे भी, वक्ता की जानकारी में, केवल गुफा का बाहरी श्रृंगार करते हैं, महामुद्रा का स्पर्श या पूरा दर्शन नहीं।
वक्ता कहते हैं कि उस स्वरूप का दर्शन चैनल के एक पिछले वीडियो में रखा गया था, जिसमें भगवती कामाख्या की गुटिका की पूजा का विधान दिया गया है। तो यह साफ़ जान लें: आज भी ऐसी परंपराएँ हैं जिनमें गुटिका पूजा होती है — और जो दिव्य, सिद्ध साधक गुटिका पूजा करते हैं, उन्हें सोने की गुटिका मिलती है। वे कहते हैं कि चाँदी की गुटिका तो बहुत से साधकों को मिलती होगी, जिनकी परंपराओं में यह पूजा विहित है; जो भी साधक इसे करते हैं उन्हें यह मिलती होगी, जहाँ तक वे जानते हैं। पर सोने की गुटिका सबसे दुर्लभ है; बहुत कम लोगों को मिलती है। और जहाँ तक वे जानते हैं, वे लोग भी केवल बाहरी श्रृंगार करते हैं — गुफा का बाहर से — महामुद्रा का पूरा दर्शन या उसका स्पर्श नहीं। भीतर क्या है, उसका केवल अनुमान लगाया गया है: कि यहाँ ऐसा-ऐसा है, या शक्ति संगम तंत्र, योगिनी तंत्र आदि के शास्त्रोक्त प्रमाणों के अनुसार ऐसे स्वरूप का वर्णन है — और उन्हीं ध्यान मंत्रों से वे अपनी साधना और पूजा करते हैं। पर साफ़ बात है, कोई उस स्वरूप का दर्शन नहीं कर सकता; और यह अपनी जगह ठीक है।
केवल कामरूप जाने से क्या प्राप्त होता है?
वहाँ जाने भर से सिद्धि के मार्ग खुल जाते हैं
केवल नीलाचल पर्वत के पास जाने से, केवल कामरूप प्रदेश जाने से — वह सिद्ध क्षेत्र है, और सिद्धि पाने के मार्ग खुल जाते हैं। कामाख्या का अर्थ है कामनाओं की पूर्ति: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में, वे मोक्ष से पहले आने वाला काम हैं, और उसके बाद ही वे मोक्ष का मार्ग खोलती हैं।
वक्ता कहते हैं कि गोपनीयता ही इसकी भलाई है: यह गोपनीयता का विषय है, और इसका कल्याण इसके गुप्त रहने में है। कोई चर्चा नहीं करता कि ऐसा क्यों है या कैसे; सब माँ की इच्छा पर छोड़ दिया जाता है, या इस विचार पर कि न करने में ही अपनी भलाई है। पर जो उस प्रकार की विरक्ति और क्षमता पा लेते हैं — भगवती उनके लिए मार्ग बनाती होंगी। वे कहते हैं कि उस रूप में, केवल नीलाचल पर्वत के पास जाने से, केवल कामरूप प्रदेश जाने से: वह सिद्ध क्षेत्र है, और सिद्धि पाने के मार्ग खुल जाते हैं। भगवती कामाख्या का अर्थ ही कामनाओं की पूर्ति है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में, मोक्ष से पहले जो काम है, वह स्वयं भगवती कामाख्या हैं — और उसके बाद ही वे मोक्ष का मार्ग खोलती हैं।
अंबुवाची शुरू होने से पहले क्या तैयारी की जाती है?
चार दिन के नैवेद्य के लिए फल, मेवा और शहद
अंबुवाची शुरू होने से पहले 21 तारीख को पूरी तैयारी कर लें। इन चार दिनों में माँ को जितना हो सके फल, मेवा और शहद नैवेद्य के रूप में अर्पित करें।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले, गृहस्थ ने घर में जो भी स्वरूप स्थापित करके रखा है — जो भी स्वरूप हो, जिसमें उसका भाव शुद्ध और निर्मल हो — हर वर्ष जब अम्बुबाची पर्व आए, तो अंबुवाची शुरू होने से पहले पूरी तैयारी कर ले। चूँकि अब अंबुवाची 22 तारीख से शुरू होनी है, तो पूरी तैयारी 21 तारीख को कर लें। कैसी तैयारी: इन चार दिनों में माँ को जितना हो सके फल — जो भी फल हो सके — मेवा और शहद अर्पित करें। ये सब नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। के रूप में अर्पित होने चाहिए।
अंबुवाची की पहली सुबह क्या किया जाता है?
सूर्योदय से पहले हर आभूषण और वस्त्र उतार दें
22 तारीख की सुबह, भोर में, हो सके तो सूर्योदय से पहले: आपका जो भी सेवा-विग्रह है — महाकाली का, दुर्गा का, कोई भी — उससे पहले से पहनाए गए वस्त्र, सारी सोने की चेन, कान, नाक, हाथ में जो कुछ है, पायल, मुकुट, सब उतार दें।
वक्ता कहते हैं कि तैयारी करने के बाद, 22 तारीख की सुबह, भोर में, हो सके तो सूर्योदय से पहले — आपका जो भी सेवा-विग्रह है, भगवती के जिस भी स्वरूप की आप उपासना करते हैं: यदि भगवती महाकाली का या भगवती दुर्गा जी का श्री विग्रह स्थापित है, तो उस विग्रह से पहले से पहनाए गए वस्त्र सबसे पहले उतारें, और जो भी सोने की मालाएँ हैं, और कान में, नाक में, हाथ में जो भी पहनाया है — जो भी सोने के आभूषण, पायल, किसी भी प्रकार के, और मुकुट और सब कुछ — सब सुबह सबसे पहले, सूर्योदय से पहले उतार दें।
विग्रह को कैसे ढका जाता है?
गले तक नया लाल कपड़ा, आभूषण सँभालकर रखें, थोड़ी दूरी पर दीपक
उतारने के बाद माँ के पूरे शरीर को नए लाल कपड़े से अच्छी तरह ढक दें — उनका विग्रह किसी भी स्वरूप का हो, बगलामुखी का भी — ठीक गले तक। फिर उन्हें उनके स्थान पर विराजमान करें, आभूषण एक साथ किसी अच्छी जगह रखें, और उनके सामने थोड़ी दूरी पर दीपक जलाएँ।
वक्ता कहते हैं कि उतारने के बाद, माँ के पूरे शरीर को नए लाल कपड़े से अच्छी तरह ढक दें — आप जिस भी स्वरूप का विग्रह रखते हों, भले ही वह भगवती बगलामुखी का हो। उनका पूरा शरीर, ठीक गले तक, लाल कपड़े से अच्छी तरह ढका होना चाहिए। ढकने के बाद उन्हें उनके स्थान पर विराजमान करें; और उनके सारे आभूषण एक साथ किसी अच्छी जगह रखें — चाहें तो चावल पर रख सकते हैं, या फूलों की किसी थाली में, ताँबे की थाली में, काँसे की थाली में — उन्हें वहाँ अच्छी तरह स्थापित करें। और भगवती के सामने थोड़ी दूरी पर दीपक जलाएँ, और फिर वहाँ पूजा करें।
क्या चार दिन पूजा स्थान बंद रखना चाहिए?
अपनी परंपरा का पालन करें; नए लोग केवल लाल कपड़े से ढकें
जिनके घर में पूजा स्थान बंद करने की परंपरा पहले से चलती है — जहाँ जाग्रत पीठ रखा है, या कामाख्या या काली कुलदेवी हैं और मंदिरों की तरह चार दिन दरवाज़े बंद होते हैं — वे अपने नियम का पालन करें। नए लोग यह नियम न अपनाएँ; वे 22 तारीख से केवल लाल कपड़े से ढकें।
वक्ता कहते हैं कि जिनके घर में पूजा स्थान बंद करने की परंपरा पहले से चलती है, वे उसका पालन करें — जो जाग्रत पीठ रखते हैं, या जिनकी कुलदेवी स्वयं भगवती कामाख्या या भगवती काली हैं, और जो उसे जाग्रत स्वरूप मानते हैं कि चार दिन दरवाज़े पूरी तरह बंद होते हैं, जैसा मंदिरों में होता है। जहाँ घर में ऐसा नियम है, वहाँ नियम से उसका पालन करें। पर नए लोग यह नियम न अपनाएँ। नए लोगों को बस इतना करना है: भगवती की फ़ोटो, श्री विग्रह, या आप जिस भी स्वरूप की उपासना करते हैं, प्रकट हो या नहीं, उसे 22 तारीख से लाल कपड़े से ढकना है। और यदि एक से अधिक विग्रह हों — दुर्गा जी का रखा है, काली जी का रखा है, लक्ष्मी जी का रखा है — तो सभी विग्रहों को लाल कपड़े से ढकें। मुख दिखना चाहिए। ऐसा नहीं कि उन्हें पूरा ढक देना है; कपड़ा अच्छी तरह गले तक डालना है। सूती लाल कपड़ा, ताकि उन पर कोई भार न हो, और उन पर कोई भी आभूषण नहीं रहेगा।
अंबुवाची के चार दिनों में क्या अर्पित किया जाता है?
हल्की सुगंधित माला, पौष्टिक नैवेद्य, और इष्ट न बदलें
चाहें तो चारों दिन रोज़ सुगंधित माला अर्पित कर सकते हैं — साधारण माला नहीं, बल्कि छोटी सुगंधित माला, ताकि उन पर भार न हो। और जितनी हो सके पौष्टिक सामग्री नैवेद्य के रूप में अर्पित करें। पर अपने आराध्य या इष्ट को कभी न बदलें।
वक्ता कहते हैं कि चाहें तो इन चार दिनों में रोज़ सुगंधित माला अर्पित कर सकते हैं — साधारण माला नहीं, बल्कि छोटी सुगंधित माला, जो उन पर भार न बने। और इन चार दिनों में जितनी हो सके पौष्टिक कर्म सामग्री उन्हें नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। के रूप में अर्पित करें। वे कहते हैं कि यह माँ की मूल पूजा है — वह बात जो हम किसी भी फ़ोटो या श्री विग्रह में करेंगे। अगली बात यह है: आप जिस भी शक्ति का जो भी कवच, स्तोत्र, स्तुति या मंत्र पढ़ते आए हैं — अपने आराध्य और इष्ट को कभी न बदलें। यह ध्यान रखें; यह तो विषय ही नहीं है। यदि आप भगवती दुर्गा जी का करते हैं, तो वहाँ दुर्गा जी का जप करें। यदि शिव जी का करते हैं, तो शिव जी का जप करें। यदि भगवान नृसिंह का करते हैं, तो उस समय भगवान नृसिंह का जप करेंगे। बस साथ में भगवती का स्वरूप जोड़ लें। भगवती कामरूप कामाख्या का स्मरण करें, माँ के स्वरूप का स्मरण करें — और उसके बाद आपकी पूजा और आपका जप चलता रहे, इन चार दिनों में अधिक मात्रा में। बस इतना ही।
क्या अंबुवाची में व्रत रखा जाता है?
व्रत नहीं — पर जो कवच आप पहले से पढ़ते हैं उसका पुरश्चरण
इन चार दिनों में व्रत नहीं रखना है — पर जप अवश्य करना है। आप जो भी कवच पढ़ते आए हैं — महाभैरव माला मंत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच, भगवती कालिका का कवच — इन चार दिनों में उसी कवच का पुरश्चरण करें, हर दिन सौ पाठ पूरे करें।
वक्ता कहते हैं कि जैसे नवरात्रि में हम चार दिन या नौ दिन व्रत और इतने जप के साथ करते हैं, वैसे यहाँ — इन चार दिनों में व्रत नहीं रखना है, पर जप अवश्य करना है। यदि कोई महाभैरव माला मंत्र, महाभैरव मंत्र, या उनकी स्तुति और स्तोत्र पढ़ रहा है; या ब्रह्म कवच, बटुक भैरव ब्रह्म कवच पढ़ रहा है; या भगवती कालिका का कवच आदि पढ़ता आया है — तो इन चार दिनों में उसी कवच का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करें, हर दिन सौ पाठ पूरे करें।
इन चार दिनों के लिए कौन सा कवच सबसे अच्छा है?
चार दिनों में कामाख्या कवच के ग्यारह सौ पाठ
कामाख्या कवच — सबसे अद्भुत और सबसे तीव्र, जो अपने भीतर दस महाविद्याओं के स्वरूप रखता है, और सबके लिए, विशेषकर स्त्रियों के लिए उत्तम है। इन चार दिनों में इसे जितनी अधिक मात्रा में हो सके पढ़ें: अपनी क्षमता सौ से आगे दो सौ की ओर बढ़ाएँ, सुबह और शाम, और चार दिनों में ग्यारह सौ पूरे करें।
वक्ता कहते हैं कि सबसे अद्भुत और सबसे तीव्र — वह कवच जो अपने भीतर दस महाविद्या के स्वरूप रखता है — भगवती का कामरूप कामाख्या कवच है, जिसे वे चैनल पर पहले ही डाल चुके हैं। कामाख्या कवच सबके लिए, और विशेषकर स्त्रियों और माताओं के लिए, सबसे उत्तम है। तो इन चार दिनों में कामाख्या कवच का जप जितनी अधिक मात्रा में हो सके करें। यदि आप सौ कर सकते हैं, तो वह तो ज़रूर कर सकते हैं; अपनी क्षमता और बढ़ाएँ। सौ पर सीमित न रहें; दो सौ की ओर प्रयास करें। दोनों समय करें, सुबह और शाम। इन चार दिनों में ग्यारह सौ पाठ पूरे करें। यदि हो सके, तो चार दिनों में ग्यारह सौ पूरे करें। ये ग्यारह सौ पाठ आपको आगे अपार संभावनाएँ देंगे। और इस कवच में भगवती वज्र जैसा प्रभाव देती हैं, यदि कवच का पाठ हुआ हो। वे जोड़ते हैं कि यदि आप भगवती के किसी स्वरूप का कोई दूसरा कवच पढ़ते हैं, तो वही कवच पढ़ें। उनकी बात बस इतनी है कि यदि आपने कोई कवच नहीं किया, या कामाख्या कवच किया है, तो वह करें — नए कवच पर बदलने की ज़रूरत नहीं है।
जो मंत्र कभी फलित नहीं हुआ, उस पर ये चार दिन क्या करते हैं?
कभी जाग्रत न हुआ मंत्र, और उसे लगने वाले दोष
एकाक्षरी का जप करने वालों के लिए ये चार दिन उसे दृढ़ और सिद्ध करने के लिए हैं। जहाँ कोई मंत्र कभी जाग्रत नहीं होता, सिद्ध नहीं होता और कितना भी पुरश्चरण करें कोई अनुभव नहीं देता — मंत्र को कई प्रकार के दोष लगते माने जाते हैं, जैसे जब लोग अपनी ओर से प्रणव जोड़ देते हैं — ये चार दिन, भगवती की पूजा के साथ, उनसे मुक्ति दिलाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जो एकाक्षरी का जप करते आए हैं, उनके लिए ये चार दिन एकाक्षरी को दृढ़ और सिद्ध करने के लिए हैं। उस मंत्र के बारे में कहा जाता है जो कभी जाग्रत ही नहीं होता, कभी सिद्ध नहीं होता और कितना भी पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करते जाएँ कोई अनुभव नहीं देता — मंत्र को कई प्रकार के दोष लगते माने जाते हैं। जो अपनी ओर से उसमें प्रणव जोड़ देते हैं, अपना कुछ जोड़ देते हैं, वे उसमें दोष पैदा कर देते हैं। तो जहाँ ऐसा कोई दोष हो, या मंत्र का शाप हो, या देवता का शाप हो — ऐसी सभी परिस्थितियों में, यदि आप इन चार दिनों में भगवती की सेवा-पूजा के साथ उस मंत्र का जप करें, तो उन दोषों से भी मुक्ति मिल जाती है।
जप के समय क्या धारण करना चाहिए?
शरीर पर रुद्राक्ष या लाल चंदन की माला, क्योंकि ऊर्जा कई गुना होती है
इस समय साधक, पुरुष हो या स्त्री, शरीर पर रुद्राक्ष की माला या लाल चंदन की माला पहनकर ही जप करे। क्योंकि इस समय ऊर्जा सामान्य दिनों से कई गुना अधिक होती है — सौ गुना नहीं, बल्कि कई-कई गुना — और भगवती अपने सबसे उग्र स्वरूप में होती हैं।
वक्ता कहते हैं कि इस समय साधक — पुरुष हो या स्त्री — शरीर पर रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की माला या लाल चंदन की माला पहनकर ही जप करे। क्योंकि इस समय ऊर्जा सामान्य दिनों की ऊर्जा से कई गुना अधिक होती है। इसे सौ गुना नहीं कहा जा सकता; यह कई-कई गुना है। यह अत्यंत विशेष है। इस समय भगवती अपने सबसे उग्र स्वरूप में रहती हैं। वे कहते हैं कि इसका कारण आप सब जानते हैं; इस पर अलग से चर्चा की ज़रूरत नहीं।
इन चार दिनों में स्त्रियों के प्रति किस बात से बचना चाहिए?
रजस्वला स्त्री स्वयं कामाख्या है — उसकी सेवा करें, उसका अपमान न करें
जीवन में कभी भी ऐसा नहीं करना चाहिए, पर इन चार दिनों में विशेष रूप से स्त्रियों और माताओं के अपमान से बचें। और यदि उस समय कोई स्त्री रजस्वला हो, तो उसे उस समय भगवती कामाख्या का ही स्वरूप जानें। उन चार दिनों उसकी सेवा करें, उससे आपका जो भी संबंध हो, और आपमें छुआछूत का कोई भाव न हो।
वक्ता कहते हैं कि एक और बात याद रखें, और सब इन चार दिनों के बारे में इसे ध्यान में रखें। वैसे तो जीवन में कभी ऐसा करना ही नहीं चाहिए — पर इन चार दिनों में विशेष रूप से स्त्रियों और माताओं के अपमान से बचें; ऐसा न करें। और यदि कोई स्त्री रजस्वला हो, कोई माँ या बहन रजस्वला हो, तो उसे उस समय भगवती कामाख्या का ही स्वरूप जानें। किसी भी कारण से उसका अपमान न हो। यदि हो सके, तो उन चार दिनों उसकी सेवा करें, उससे आपका जो भी संबंध हो। पर उसका अपमान नहीं होना चाहिए — और साथ ही, आपके भीतर छुआछूत का भाव नहीं होना चाहिए। वे कहते हैं कि यह शाक्त साधक में तो कभी होना ही नहीं चाहिए; पर फिर भी, आप जिस भी देव-शक्ति की पूजा करते हों, यदि उसमें ऐसी कोई बात हो, तो इस समय तो किसी भी हाल में उसकी उपेक्षा न करें। दूसरे समय आपकी इच्छा है और आपकी अपनी परंपरा और आप कैसे करते हैं — पर इस समय तो बिल्कुल नहीं।
इन दिनों में रजस्वला स्त्री स्वयं क्या करे?
एक स्थान पर रहें — क्षुद्र शक्तियों के प्रयोगकर्ता उसके माध्यम से काम कर सकते हैं
वह एक स्थान पर स्थिर रहे, ज़्यादा घूमे-फिरे नहीं। क्योंकि क्षुद्र शक्तियों का प्रयोग करने वाले इस समय उन्हें जगाते हैं, और यदि उन्हें किसी तरह किसी रजस्वला स्त्री का पता चल जाए, तो वे उसके माध्यम से बहुत तेज़ी से अपने सबसे विशेष तंत्र प्रयोग करने में सक्षम हो जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इस समय जो माताएँ-बहनें रजस्वला हों, वे एक स्थान पर स्थिर रहें, ज़्यादा न घूमें, ज़्यादा इधर-उधर न जाएँ। वे कहते हैं कि यह विषय भी समझ लें: जो, एक तरह से, क्षुद्र विद्या शक्तियों के प्रयोगकर्ता हैं, वही इस समय इन चीज़ों को जगाते हैं। और यदि उन्हें किसी तरह किसी रजस्वला स्त्री का ज्ञान हो जाए, तो वे उसके माध्यम से — बहुत तेज़ी से — अपने सबसे विशेष तंत्र प्रयोग करने में सक्षम हो जाते हैं। इसी कारण, यदि आप इन चार दिनों में रजस्वला हैं, तो जितना कम हो सके बाहर जाने का प्रयास करें, केवल जितना ज़रूरी हो। नहीं तो एक स्थान पर रहें। वे जोड़ते हैं कि आप कितने भी बड़े शहर में रहते हों, मन से यह विचार निकाल दें कि वहाँ कोई जानकार व्यक्ति नहीं होगा। आजकल विशेषकर बड़े शहर ऐसे नमूनों से भरे हैं जो न जाने क्या कर दें।
क्या स्त्री को इन दिनों अपनी माहवारी में पूजा करने की ज़िद करनी चाहिए?
उस समय की गई पूजा बड़ी दुर्गति का कारण बनती है
नहीं — और वक्ता उस ज़िद का नाम लेते हैं जिसका वे उत्तर दे रहे हैं: मैं रजस्वला हूँ, तो क्या, मैं फ़ेमिनिस्ट हूँ, मैं मॉडर्न हूँ, मैं जाकर पूजा करूँगी, मैं मंदिर जाऊँगी, मुझे कोई नहीं रोक सकता। वे कहते हैं कि इस समय की गई पूजा दुर्गति का, महा दुर्गति का कारण बनेगी। ऐसी गलती बिल्कुल न करें।
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ, इस बात पर कोई ज़िद नहीं होनी चाहिए — कि मैं रजस्वला हूँ, तो क्या; मैं फ़ेमिनिस्ट हूँ, मैं मॉडर्न हूँ; मैं जाकर पूजा करूँगी, मैं मंदिर जाऊँगी, मुझे कोई नहीं रोक सकता। इस समय आप जो पूजा करेंगी, वह दुर्गति का, महा दुर्गति का कारण बनेगी। ऐसी गलती बिल्कुल न करें। जब इस समय माँ स्वयं दरवाज़े बंद करवा देती हैं — और वे जोड़ते हैं कि भीतर के उस प्रमुख स्थान के बारे में, जहाँ आम लोगों के जाने की संभावना बहुत कम है: कहा जाता है कि वहाँ ऊर्जा ऐसी हो जाती है कि व्यक्ति वहाँ सामान्य अवस्था में नहीं रह सकता। वहाँ इतना उच्चाटन, इतनी उग्रता होती है कि हटना पड़ता है। और आम लोग इन बातों का विरोध करते हैं — इस विषय में कोई विरोध और प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। यह ध्यान रखें। यह भगवती की विशेष पूजा का समय है।
इन दिनों तंत्रोक्त रुद्राक्ष या विग्रह के साथ क्या करना चाहिए?
चार दिन तंत्रोक्त स्वरूपों पर सहस्रार्चन
जिनके पास तंत्रोक्त रुद्राक्ष है — गुरु परंपरा से या अन्यथा मिला — वे इन चार दिनों में उस पर सहस्रार्चन अवश्य करें। सहस्रार्चन का अर्थ है सहस्रनामावली के साथ फूल आदि अर्पित करना। कम से कम चार दिन करें।
वक्ता कहते हैं कि जिनके पास तंत्रोक्त रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । आदि है — चाहे गुरु परंपरा से मिला हो, गुरुजनों ने दिया हो, या किसी और माध्यम से मिला हो — और जो उसका अभिषेक और पूजा करते हैं, वे इन चार दिनों में उस पर सहस्रार्चन अवश्य करें। आपने जो भी स्वरूप स्थापित किया हो: भगवती छिन्नमस्तिका का स्वरूप, या कबन्ध भैरव का स्वरूप; या तांत्रिक प्रवृत्ति वाले जिनकी कुल देवी भगवती रेणुका तंत्रोक्त रूप में स्थापित हैं; या तंत्रोक्त रुद्राक्ष जिस पर आप भगवान शिव की पूजा और अभिषेक करते हैं; या आपने जो दूसरे विग्रह और दूसरे स्वरूप स्थापित किए हैं — इस समय उनकी अर्चना अवश्य करें। वे समझाते हैं कि सहस्रार्चन का अर्थ है कि उनकी सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। नामावली के साथ आप फूल आदि अर्पित करें। कम से कम चार दिन करें।
क्या इस पूजा के साथ कोई कामना जोड़नी चाहिए?
केवल एक कामना, पचास नहीं — और कामना के साथ पूजा करें, उसके बिना नहीं
हाँ — इस समय कामना के साथ पूजा करें; ऐसा नहीं कि न करें। पर पचास तरह की कामनाओं के बजाय एक प्रमुख कामना लें, उसी एक का संकल्प करें, और उसके साथ चारों दिन पूजा और अर्चना करें।
वक्ता कहते हैं कि यदि आपकी कोई विशेष इच्छा है, तो इस समय कामना के साथ पूजा करें। वे कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि इस समय कामना के साथ पूजा नहीं करनी चाहिए — कामना के साथ ही पूजा करें। यदि आपकी कोई विशेष कामना है, तो इन चार दिनों में उसे एक कामना बनाएँ, कोई एक प्रमुख कामना, पचास तरह की कामनाएँ नहीं। उस एक का संकल्प करें और इन चार दिनों पूजा और अर्चना करें। यदि आपने कोई यंत्र स्थापित किया है और उसकी विधि जानते हैं, तो उस विधि से उसकी अर्चना करें; नहीं तो उस यंत्र पर सहस्रार्चन अवश्य करें। और यदि सहस्रार्चन की क्षमता नहीं है — आप इतनी देर नहीं बैठ पाएँगे, या समय की कमी है — तो शतार्चन करें, यानी एक सौ आठ नामावली से फूल आदि से अर्चना; चार दिन यह अवश्य करें। और इन चार दिनों रोज़ यंत्र का अभिषेक करें।
इस समय घर का यंत्र क्यों महत्व रखता है?
सिद्ध पीठ में जो होता है, वह आपके पूजा स्थान में छोटे रूप में होता है
क्योंकि उस समय अधिक से अधिक शक्तियाँ अंश रूप में अपने यंत्र और स्थान में अवश्य विराजमान हो जाती हैं। प्रमुख सिद्ध पीठ में जो हो रहा है, वही हम अपने नित्य पूजा कक्ष में, अपने घर में धारण कर रहे हैं — इसलिए वहाँ भी सूक्ष्म रूप में वही होता है।
वक्ता कहते हैं कि रोज़ यंत्र का अभिषेक करने का कारण यह है कि उस समय अधिक से अधिक शक्तियाँ अंश रूप में अपने यंत्र में, अपने स्थान में अवश्य विराजमान हो जाती हैं। क्योंकि माँ का प्रमुख स्थान — देखिए, प्रमुख सिद्ध पीठ में जो भी हो रहा है, वही विषय हम और आप उस स्थान पर अपने नित्य पूजा कक्ष में, अपने घर में, अपने निवास में धारण कर रहे हैं। तो वहाँ भी, जो भी शक्तियाँ केवल सेवा में रहती हैं, वे उस समय हट जाती हैं और माँ के मंडल में अलग-अलग स्थानों पर स्थापित हो जाती हैं। उस समय वहाँ हर प्रकार की शक्तियाँ उपस्थित रहती हैं, माँ की रक्षा में और उनकी सेवा में तत्पर। तो यदि आप भी एक छोटा सा मंडल, एक छोटा सा यंत्र, या भगवान का कोई तंत्रोक्त विग्रह रूप, यंत्र, मंडल, रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । आदि रखते हैं और पूजा करते हैं — तो जान लें कि उसमें भी सूक्ष्म रूप में वही होगा। वहाँ मन में जो भी सूक्ष्मता उपस्थित है, वह इनमें भी रहेगी। तो वे कहते हैं, आपका काम यह है कि इस समय सारी शक्तियाँ एक स्थान पर स्थापित हो गई हैं; और आपके पास अब सबसे दिव्य समय है, एक तरह से बहुत अच्छा अवसर। इस अवसर को कभी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए; इसका लाभ उठाना चाहिए।
अर्चना में क्या उपयोग किया जा सकता है?
कुमकुम, फूल, मेवा — या सामर्थ्य हो तो सिक्के
आप कुमकुम से, फूलों से अर्चना कर सकते हैं। जहाँ अन्न की बात हो, वहाँ किशमिश से, काजू से, मखाने से अर्चना करें — जो भी जुटा सकें। और यदि आप धन-कुबेर हैं, तो चाँदी के सिक्कों से, सोने के सिक्कों से, पाँच सौ और दो हज़ार के नोटों से अर्चना करें — पर बंद हो चुके नोट से नहीं।
वक्ता कहते हैं कि आप कुमकुम से और फूलों से अर्चना कर सकते हैं। जहाँ दूसरी तरह की चीज़ें हों — जहाँ अन्न की बात हो — वहाँ किशमिश से, काजू से, मखाने से अर्चना करें। जो भी जुटा सकें उससे करें। और यदि आप धन-कुबेर हैं, यदि आपके पास धन की बहुत अधिकता है, तो चाँदी के सिक्कों से, सोने के सिक्कों से अर्चना करें। पाँच सौ और दो हज़ार के नोटों से करें — हालाँकि दो हज़ार का नोट बंद हो गया है, तो बंद हो चुके नोट से न करें; वह वहाँ भी स्वीकार नहीं होगा। जो मुद्रा चल रही है, वही अपने सामर्थ्य के अनुसार उपयोग करें। और फिर उसे माँ के स्थान पर ही रहने दें।
अनुष्ठान के बाद अंबुवाची के अर्पण का क्या किया जाता है?
फूल और सिक्के सँभालकर रखें — उनका विसर्जन न करें
इन चार दिनों की अर्चना में उपयोग हुए फूल, लौंग और इलायची सँभालकर रखें; उन्हें फेंकें नहीं और उनका विसर्जन न करें। घर के सदस्य पूजा के बाद रोज़ खाली पेट थोड़ा खाएँ, या उन्हें कवच में भरकर धारण करें। और सोना, चाँदी या सिक्के लाल कपड़े में बाँधकर रखें — कभी विसर्जन न करें, कभी हटाएँ नहीं।
वक्ता कहते हैं कि इन चार दिनों की अर्चना में उपयोग हुए फूल, लौंग और इलायची सब एक स्थान पर सँभालकर रखें। उन्हें फेंकें नहीं; उनका विसर्जन न करें। घर के लोग पूजा के बाद रोज़ खाली पेट उनमें से थोड़ा खाएँ; या उन्हें कवच में भरकर धारण किया जा सकता है। यदि किसी को कोई परेशानी हो, तो उनसे लौंग का उतारा किया जा सकता है, या उन्हें कपूर के साथ जलाया जा सकता है। इस तरह करें। और यदि आप अर्चना में सोना, चाँदी या सिक्के उपयोग करते हैं, तो उन सबको लाल कपड़े में बाँधकर पूजा स्थान पर, या पूजा स्थान पर, या जहाँ धन रखा जाता है वहाँ रखें। उनका कभी विसर्जन न करें; उन्हें हटाएँ नहीं। क्योंकि इन चार दिनों की पूजा अपने आप में अद्भुत और दिव्य है।
क्या इन दिनों किसी बाहरी तांत्रिक को घर में आने देना चाहिए?
चार दिनों में घर में कोई बाहरी तंत्रोक्त अनुष्ठान नहीं
इन चार दिनों में आपके घर के भीतर किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा कोई तंत्रोक्त अनुष्ठान नहीं होना चाहिए। आपके अपने गुरु आकर करें तो बहुत अच्छा, या जिन पर आपका अंधा विश्वास हो — पर कोई नया व्यक्ति, या कोई जो आपसे द्वेष रखता हो और विधियाँ जानता हो, वहाँ अपनी ऊर्जा खींच लेगा और हस्तक्षेप करेगा।
वक्ता कहते हैं कि इन चार दिनों में तंत्र-मंत्र करने वाला कोई व्यक्ति आपके घर में नहीं आना चाहिए। यदि आप पूजा करने वाले हैं और कोई किसी संकट के लिए या किसी काट के लिए आ रहा है, तो वह अलग बात है और आपका निजी मामला हो सकता है। पर उनकी मूल बात यह है: यदि आपके घर में पूजा-पाठ चल रहा है और आप सब नियम से कर रहे हैं, और उसी समय कोई व्यक्ति जो आपसे द्वेष रखता है और तंत्र-मंत्र जानता है, जिसे विधियों की जानकारी है, या ऐसा कोई दुष्ट व्यक्ति आ जाए — तो आपके घर की चीज़ें गड़बड़ा जाएँगी, क्योंकि वह वहाँ अपनी ऊर्जा अवश्य खींच लेगा। वह किसी न किसी चीज़ में हस्तक्षेप अवश्य करेगा, और फिर आप सब परेशान होंगे। तो इन चार दिनों में आपके घर के भीतर किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा किसी भी प्रकार का तंत्रोक्त अनुष्ठान नहीं होना चाहिए। वे यह अपने अनुभव से, अपनी देखी हुई बातों से कहते हैं। आपके गुरु जी आकर करें तो बहुत अच्छा; जिन पर आप आँख मूँदकर विश्वास करते हैं, जो आपके मार्गदर्शक और पथ-प्रदर्शक हैं, जिन्होंने आपके लिए बहुत कुछ किया है, और जिनके तंत्र-मार्ग की सिद्धियों और मंत्र उपासना से आपके परिवार को लाभ हुआ है — यदि वे आकर करना चाहें, तो कोई रोक नहीं है। पर कोई नया व्यक्ति, कोई जो आपसे द्वेष रखता है, कोई जो आपका नुकसान करता है — आपके अपने चाचा, मामा, बुआ, पिता, कोई भी, आपका भाई, कोई भी जो आपसे द्वेष रखता है — इस समय आकर पूजा करे या अपनी कोई विशेष प्रक्रिया करे जो आप जानते हैं कि वे करते हैं: वे कहते हैं, ध्यान दें, सावधान रहें। कुछ भी हो सकता है।
अंबुवाची पर्व काल कितना खतरनाक है?
ये चार दिन आपको बना भी सकते हैं और नष्ट भी कर सकते हैं
यह बहुत संवेदनशील समय है। इस समय शक्तियाँ इतनी उग्र और जाग्रत हो जाती हैं कि यदि वे कृपा करना चाहें तो इन चार दिनों में आपको बना सकती हैं — और यही चार दिन आपका विनाश और आपकी दुर्गति भी ला सकते हैं। इन चार दिनों में इतनी क्षमता है।
वक्ता कहते हैं कि यह पर्व काल बहुत संवेदनशील समय है। इस समय शक्तियाँ इतनी उग्र और जाग्रत हो जाती हैं कि यदि वे कृपा करना चाहें, तो इन चार दिनों में आपको बना सकती हैं। और यही चार दिन आपका विनाश, आपकी दुर्गति भी ला सकते हैं। इन चार दिनों में इतनी क्षमता है।
जिसका कोई अभ्यास ही नहीं, वह क्या करे?
सप्ताक्षरी या जयंती मंगला काली, या कोई चालीसा
जो कुछ नहीं कर रहे, सामान्य ढंग से चल रहे हैं, वे इन दोनों में से कम से कम एक करें: भगवती पार्वती का सप्ताक्षरी मंत्र, या जयंती मंगला काली। नहीं तो दुर्गा सप्तश्लोकी, दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम, दुर्गा चालीसा, विंध्यवासिनी चालीसा, बगलामुखी या भैरव का अष्टोत्तर शतनाम, संकट नाशन, हनुमान चालीसा या बजरंग बाण।
वक्ता कहते हैं कि जो एकाक्षरी आदि का जप कर रहे हैं, चाहे भगवान दत्त का हो या किसी भी परंपरा में दीक्षित होकर, उन्हें इन चार दिनों में बस इतना करना है: भगवती के साथ अपने गुरु मंत्र का जप करें। और जो कुछ भी नहीं कर रहे, सामान्य ढंग से चल रहे हैं — वे इन चार दिनों में, और कुछ नहीं तो, या तो भगवती पार्वती का सप्ताक्षरी मंत्र, या जयंती मंगला काली। इन दोनों में से एक मंत्र। या सप्तश्लोकी, दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम, दुर्गा चालीसा, विंध्यवासिनी चालीसा, भगवती बगलामुखी का अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त।, भैरव जी का अष्टोत्तर शतनाम, गणपति जी का संकट नाशन स्तोत्र, हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, या जो दूसरे साबर मंत्र दिए गए हैं — इन सबका जागरण भी इस समय किया जा सकता है।
पर्व काल में कमाए तपोबल का क्या करना चाहिए?
उसे सँभालें — उससे कभी किसी के लिए संकल्प न लें
उसे सँभालना सीखें। पर्व काल में — नवरात्रि, शिवरात्रि, अंबुवाची पर्व, भादों अमावस्या, चतुर्दशी, तारा अमावस्या — आप जो भी जप और तप करते हैं, उससे कभी संकल्प लेकर किसी के लिए कुछ न करें, जब तक प्राण ही संकट में न हों। उसे अच्छी तरह जमा करें, और उसके ब्याज का उपयोग करें।
वक्ता कहते हैं कि चार शक्ति-वीर — हनुमान जी, भैरव जी, गणपति जी, नृसिंह जी — भगवती की सेवा में चारों दिशाओं से रक्षा करते हुए चलते हैं; और यदि इन चार दिनों में भगवती के साथ उनमें से किसी एक की उपासना, जिनकी आप पहले से पूजा करते आए हैं, ठीक से और पूरे मन से हो, तो जो मंत्र दो या चार प्रतिशत प्रभाव दे रहा था, वह सीधे अपना पूरा सौ प्रतिशत देने लगेगा। पर वे कहते हैं कि बाद में आपको अपना पुण्य बल बनाए रखना है। ऐसा नहीं कि हमने चार दिन बहुत अच्छी पूजा की और उसका असर फिर बना रहेगा — पुण्य आपका है, और उसे ऐसे ही क्षीण नहीं होने देना है। जब भी पर्व काल हो — नवरात्रि, शिवरात्रि, अंबुवाची पर्व, भादों अमावस्या, चतुर्दशी, तारा अमावस्या, ये सब समय — उनमें आप जो भी जप और तप करते हैं, उसे सँभालना सीखें। उससे कभी संकल्प लेकर किसी के लिए कुछ न करें। जब तक प्राण ही संकट में न हों। उसे अच्छी तरह जमा करें, और उसके ब्याज का उपयोग करें।
जमा किया और कभी किसी पर खर्च न किया गया तपोबल बाद के प्रयोग को तुरंत असर देने वाला बनाता है
सँभाला हुआ तपोबल अलग प्रयोग को तुरंत असरदार बनाता है
मान लीजिए आपने अंबुवाची में पार्वती के सप्ताक्षरी की चार-पाँच सौ माला कीं। उसे जमा करें; कभी किसी के लिए उसका उपयोग न करें, केवल भगवती की प्रसन्नता और अपने तपोबल की वृद्धि के लिए। फिर जब प्रयोग की ज़रूरत हो, तो कोई साबर मंत्र अलग से जगाकर उसका उपयोग करें — और वह तुरंत असर करेगा, क्योंकि तपोबल सुरक्षित है।
वक्ता एक उदाहरण देते हैं: कोई भगवती पार्वती के सप्ताक्षरी मंत्र का जप करता है। अंबुवाची पर्व काल में उसने रोज़ सौ माला कीं और वे चार-पाँच सौ माला हो गईं। अब इसे जमा करके रखना है। इसका कभी किसी के लिए उपयोग नहीं करना है; इसका जप केवल भगवती की प्रसन्नता और आपके अपने तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। की वृद्धि के लिए होगा। पाँचवें दिन से, चार दिनों के बाद, आप इसकी पाँच या सात माला करें — उसे सुरक्षित रखें, भगवती की प्रसन्नता के लिए। अब जब प्रयोग की ज़रूरत हो — घर में कोई कठिनाई, भूत-प्रेत की कोई परेशानी, या किसी का समय बुरा चल रहा हो — तो उसके लिए किसी सबर मंत्र का उपयोग करें, जिनके बहुत से विधान चैनल पर दिए गए हैं, बटुक भैरव जी के और काली जी के; उन्होंने काट के लिए वमती काली भी दी है। वे समझाते हैं कि वमती का अर्थ है जो चीज़ों को पीसकर हटा दे। कितना भी बड़ा तंत्र प्रयोग किया गया हो, मारण, मूठ या करनी तक, हानि तक चलाई गई हो — यदि आपने उन्हें जाग्रत रखा है, तो एक नींबू पर चलाने पर भी वह अवश्य कटेगा। वह तुरंत अपना असर नहीं दे पाएगा; वे उस समय उसे लगने से रोक देती हैं, और जो भी दौड़कर आया है उसे हटना पड़ता है। क्योंकि आपका चार दिनों का तपोबल भगवती पार्वती के सप्ताक्षरी में है, और उस तपोबल के कारण आपका सूक्ष्म शरीर स्वयं तेज से भर गया है। अब वमती काली मंत्र को उसकी जागरण विधि से जगाकर, जब आप ज़रूरत पड़ने पर उसका उपयोग करेंगे, तो वह उसी क्षण असर देगा; तुरंत काटेगा। बजरंग बाण भी ऐसे ही: यदि आपने उसे सिद्ध किया है और नुकसान पहुँचाने वाले शत्रु के विरुद्ध संकल्प के साथ उसका उपयोग करते हैं, तो वह उस शत्रु को कमज़ोर कर देगा — जब तपोबल सुरक्षित हो।
सँभाले हुए तपोबल को क्या नष्ट कर देता है?
उसके बाद मांस और शराब, और आप न इधर के रहते हैं न उधर के
यदि उस समय आप दूसरी चीज़ें शुरू कर दें — मांस और शराब लेने लगें, गलत काम शुरू कर दें — और फिर प्रयोग करें, तो आप न इधर के रहेंगे न उधर के। वक्ता के अपने शब्दों में: कट गया।
वक्ता कहते हैं कि पर अब यहाँ आपने दूसरे विषय शुरू कर दिए — मांस और शराब का सेवन करने लगे। आपने गलत काम शुरू कर दिए, और उसके बाद प्रयोग करते हैं: तो आप न इधर के रहते हैं न उधर के। फिर वही बात हो जाती है — आई लव यू, पर एक दोस्त की तरह। वे कहते हैं कि यहाँ भी आपका कट गया। तो इस पर ध्यान रखें।
अंबुवाची समाप्त होने की सुबह क्या किया जाता है?
26 तारीख को सूर्योदय से पहले लाल कपड़ा हटाया जाता है
जब चार दिनों की पूजा पूरी हो जाए, तो 26 तारीख की सुबह, भोर में, सूर्योदय से पहले ही, भगवती के स्वरूप पर आपने जो लाल कपड़ा डाला था वह हटाना है — और वह कपड़ा सँभालकर रखना है।
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा, जब 25 तारीख तक चार दिनों की पूरी पूजा पूर्ण हो जाए — उसके बाद, 26 तारीख को, सुबह भोर में, सूर्योदय से पहले ही, भगवती के जिस स्वरूप पर आपने लाल कपड़ा डाला था, वह लाल कपड़ा उस समय हटाना है। और कपड़ा सँभालकर रखना है; उसका क्या करना है यह वे थोड़ी देर में बताएँगे।
यदि मूर्ति पर कपड़े पहनाना-उतारना गलत लगे तो?
ऐसा विग्रह चुनें जिसमें वस्त्र बने हों, ताकि भाव कभी गलत न हो
तो ऐसा न करें — इसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं। यह सवाल आजकल चलन में आए श्रृंगारिया विग्रह के कारण उठता है, जिसमें कोई वस्त्र तराशा ही नहीं गया, इसलिए कपड़ा हटाने पर लगता है कि देवता ने कुछ नहीं पहना। ऐसा विग्रह लें जिसमें वस्त्र बना हो, ताकि किसी भी स्थिति में आपका भाव कभी गलत न हो।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ माँ के स्वरूप पर वस्त्र पहनाने और उतारने के बारे में एक प्रश्न उठता है। यदि आपको लगे कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए, तो न करें। इसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं। वे कहते हैं कि यह प्रश्न अश्रृंगारिया विग्रह के कारण उठता है — आजकल चलन में आया श्रृंगारिया विग्रह, जिसमें कोई वस्त्र है ही नहीं; और कपड़ा हटाने पर लगेगा कि भगवान ने कोई वस्त्र पहना ही नहीं। तो कम से कम ऐसा विग्रह लें जिसमें वस्त्र की बात हो — ऐसा बना हो कि देवता वस्त्र पहने हों, ताकि आपका भाव किसी भी समय, किसी भी स्थिति में गलत न हो। क्योंकि भाव के लिए ही तो विग्रह सेवा हो रही है। विग्रह सेवा इसलिए हो रही है कि द्वैत में रहते हुए, सेवा करते-करते, हमारे भीतर ऐसी क्षमता और ऐसा भाव जागे कि हम अद्वैत में चले जाएँ और हमें प्रत्यक्ष विग्रह की, किसी भौतिक मूर्ति की ज़रूरत ही न रहे। तो ऐसा विग्रह स्थापित करके पूजें जिससे आपका भाव जुड़ सके।
पाँचवें दिन देवी को स्नान और श्रृंगार कैसे कराया जाता है?
सुगंधित जल, पत्थर पर घिसा चंदन, और पूरा श्रृंगार
उन्हें सुगंधित जल से अच्छी तरह स्नान कराएँ — कच्चा दूध, गुलाब जल, अगरु और केवड़ा जल मिलाकर सुगंधित करके — कुमकुम और हल्दी के साथ; फिर पत्थर पर चंदन घिसकर गंधानुलेपन करें; फिर जल से स्नान कराकर वस्त्र आदि के साथ सुंदर श्रृंगार करें।
वक्ता कहते हैं कि 26 तारीख को, पहले लाल कपड़ा हटाकर और उसे सँभालकर रखने के बाद, फिर आप भगवती का अच्छी तरह अभिषेक करेंगे। सुगंधित जल से; कच्चे दूध से; गुलाब जल, अगरु और केवड़ा जल एक साथ मिलाकर सुगंधित करके; कुमकुम से, हल्दी से। और फिर चंदन घिसें — चंदन की लकड़ी को पत्थर पर रगड़ें — और उससे गंधानुलेपन करें। फिर माँ को जल से स्नान कराकर, उनका सुंदर श्रृंगार करें; उन्हें वस्त्र पहनाएँ; श्रृंगार करें।
अंबुवाची अनुष्ठान का समापन किससे होता है?
चार दिनों के जप का हवन, तर्पण और मार्जन, और कन्या पूजन
नैवेद्य और आरती के बाद, हो सके तो चार दिनों के जप का हवन करें — एक माला ही सही, यदि आपने रोज़ सौ की थीं और अब दस संभव न हों। तर्पण और मार्जन करें; कन्या पूजन की व्यवस्था हो सके तो करें; न हो तो एक जगह का पूरा भोजन गाय को दें, और कन्याओं के नाम से किसी देवी मंदिर में दान करें।
वक्ता कहते हैं कि श्रृंगार के बाद माँ को विराजमान करें और उनके सामने उत्तम पदार्थों का नैवेद्य रखें — हो सके तो खीर और पूरी। और यदि आपकी परिस्थिति अनुमति दे, तो घर पर श्रद्धा से बनवाएँ। नहीं तो — यदि प्रारब्ध अनुकूल न रहा, या परिस्थिति अनुमति न दे — तो स्वयं बनाएँ, या जो भी नैवेद्य जुटा सकें वह अर्पित करें। और उसके बाद, यदि उस दिन उतना ही जप हो सके जितना आपने चार दिनों में किया, तो बहुत अच्छा; तब तो सोने पर सुहागा। जप पूरा करके समर्पित करें, और इन पाँच दिनों की सेवा से आपकी आत्मा तृप्त हो जाएगी। भगवती प्रत्यक्ष आपके सामने आएँ या न आएँ, पर आपका अनुभव इतना दृढ़ हो जाएगा, और उनकी ऐसी प्रत्यक्ष कृपा आप पर आएगी, कि चार दिनों की सेवा के बाद जिस दिन आप अपने हाथों से माँ का श्रृंगार करेंगे, उस दिन आप इसे अपने जीवन में महसूस करेंगे। फिर नैवेद्य अर्पित करके और आरती दिखाकर: यदि हो सके, तो चार दिनों में किए जप का हवन करें। भले ही केवल एक माला करें — आप रोज़ सौ माला कर रहे थे और अब आपके लिए दस माला संभव नहीं, पर यदि एक की क्षमता है, तो कम से कम एक माला का हवन करें। तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। और मार्जन करें। यदि कन्या पूजन की कोई व्यवस्था हो सके, तो कन्या पूजन करें; यदि व्यवस्था न हो, तो एक जगह का पूरा भोजन गौ माता को दें। और किसी मंदिर में कन्याओं के नाम से संकल्प करके दान दें — किसी देवी मंदिर में पंडित जी को दें। वे कहते हैं, इस तरह पूजा करके देखिए: आप जो भी मंत्र या कवच पढ़ते आए हैं वह अत्यंत प्रचंड हो जाएगा, देवी की कृपा मिलेगी, और आपकी आध्यात्मिक उन्नति होगी। यदि आपने ये चार दिन किए हैं, तो 20 या 21 तारीख तक आप जिस अवस्था में थे और 26 या 27 के बाद जिस अवस्था में होंगे, उसमें ज़मीन-आसमान का अंतर होगा।
कैसा संकल्प कभी नहीं लिखना चाहिए?
मारण के संकल्प जो लोग सच में भेजते हैं
वक्ता बिना नाम लिए पढ़कर सुनाते हैं कि उन्हें क्या भेजा गया है: एक व्यक्ति का नाम और उसके पिता का नाम, इस अनुरोध के साथ कि इस आदमी के शीघ्र मारण का संकल्प किया जाए। वे कहते हैं कि संकल्प में ऐसी बातें लिखी जा रही हैं — द्वेष की यह दशा आ गई है।
वक्ता आने वाले अंबुवाची अनुष्ठान के बारे में कहते हैं कि इस बार कामना में ये विषय न लिखें — कि यह मर जाए, इसका धन नष्ट हो जाए, इसे ऐसी बीमारी हो जाए। वे पूछते हैं, क्या संकल्प में ऐसे विषय लिखे जाते हैं? वे बताते हैं कि उन्हें क्या भेजा गया है। वे कहते हैं कि ठीक है जब कोई दुखी व्यक्ति लिखे कि हमें इस दुख से मुक्ति मिले; वह उचित है। पर हम कैसे जान सकते हैं कि सामने वाला व्यक्ति हमें लाभ पहुँचा रहा है और इसलिए उसे मरना चाहिए — कि ऐसा संकल्प किया जाए? लोग लिख रहे हैं कि फलाना, उसके पिता का नाम यह, इस व्यक्ति का शीघ्र मारण हो; ऐसा संकल्प करें। संकल्प में ऐसी बातें लिखी मिल रही हैं। द्वेष की यह दशा आ गई है। वे बिना नाम लिए एक मामला बताते हैं: संकल्प में दिए पाँच नामों में एक उस आदमी का था जिसने लिखने वाले को परेशान किया था — दस साल पहले उसने यह किया था, तीन साल पहले वह किया था। उसमें इतना द्वेष भरा है।
नुकसान पहुँचाने वाले व्यक्ति के विरुद्ध संकल्प में क्या माँगना चाहिए?
उचित दंड माँगें, मारण नहीं
कि यह व्यक्ति इस तरह नुकसान पहुँचा रहा है, धर्म के विरुद्ध काम कर रहा है — प्रभु, इसे उचित दंड दें। संकल्प यही होना चाहिए। महाभैरव आदि के प्रयोगों में शत्रु का नाम और गोत्र होता है, पर उसके मारण का संकल्प कभी न लें।
वक्ता पूछते हैं, क्या आप और हम तय करेंगे कि उसे मरना चाहिए? इसके बजाय लिखें कि उसे उचित दंड मिले, और हम संकल्प करते हैं। वे कहते हैं कि यह विषय बिल्कुल है: महाभैरव आदि के प्रयोगों में — जैसे अभी जो भैरव जी का अनुष्ठान हुआ — जो भी प्रयोग होते हैं, संकल्प में शत्रु का नाम और गोत्र होता है, सब ज्ञात। पर उसके मारण का संकल्प कभी न लें। लिया जाने वाला संकल्प यह है: प्रभु, इस व्यक्ति द्वारा इस तरह नुकसान पहुँचाया जा रहा है; यह धर्म के विरुद्ध काम कर रहा है; इसे उचित दंड दें। संकल्प यही होना चाहिए। जब आप सीधे कहते हैं कि व्यक्ति मर जाए और ऐसा संकल्प लिया जाए — वे पूछते हैं, क्या आप समझते हैं कि हत्या के संकल्प का क्या अर्थ है? कि हम हत्या का संकल्प लें और देवताओं के क्रोध के पात्र बनें, और वह भी इस तरह। संकल्प लिखते समय यह गलती कभी न करें। फल देने की क्षमता न आपमें है न मुझमें, और वह अधिकार भी हमारा नहीं — तो कम से कम उसे उसी के पास रहने दें जिसके पास वह अधिकार है। वे उसे मारेंगे, या उसके हाथ-पैर तोड़ेंगे, या उसे पागल कर देंगे, या क्या करेंगे — उन पर छोड़ दें। इसे अपने हाथ में न लें। उन्हें जो भी करना होता है, वे बहुत अच्छी तरह करते हैं।
वृंदावन के एक साधक ने स्वयं कोई प्रयोग नहीं किया, और डेढ़ साल बाद उसके मंत्र के देवता ने वही नुकसान उसके शत्रुओं पर लौटा दिया
वृंदावन का मामला — मंत्र के देवता ने न्याय किया और बात पलट दी
उनका उदाहरण: वृंदावन क्षेत्र का एक आदमी, जो शुरू में पूरी तरह परेशान था, लगभग डेढ़ साल से साधना कर रहा है। आज उसके साथ जो होता था, वही उसके शत्रुओं के घर में हो रहा है, हूबहू वैसा ही। उसने कोई तंत्र विद्या नहीं की — केवल महाभैरव, भूतेश्वर महादेव मंदिर में पाठ करते हुए।
वक्ता कहते हैं कि यह उनका अपना अनुभव है, और वे ग्रुप में स्क्रीनशॉट डालते हैं कि लोग कैसे रो रहे हैं और बर्बाद हो रहे हैं। जिस आदमी की वे बात कर रहे हैं: पहले दिन जब उन्होंने बात की, वह पूरी तरह परेशान था। और वे जोड़ते हैं कि आपको जानकर आश्चर्य होगा कि वह वृंदावन क्षेत्र का है। पूरी तरह परेशान — यह क्या है, कैसे है, हम क्या करें। आज, उसके जितने भी शत्रु हैं — उसे साधना करते लगभग डेढ़ साल हुआ होगा — उनकी दशा खराब है। और जैसे उसके साथ होता था, ठीक वैसी ही बातें उनके घर में हो रही हैं। चीज़ें पलट गईं। उसने कोई तंत्र विद्या की ही नहीं; वह केवल महाभैरव कर रहा था। वृंदावन क्षेत्र में भूतेश्वर महादेव मंदिर है, और वह वहाँ जाकर पाठ करता था। यह दशा बनी। उसने नहीं कहा कि उसे मार दो या यह करो। यह मंत्र में है; उन्हें जो करना है वे करेंगे। वे हमारे कहने से नहीं कर रहे। वे देख रहे हैं कि क्या सही है और क्या गलत। वक्ता कहते हैं कि यही मंत्र की क्षमता है: जब आप उस मंत्र की ऊर्जा जगाते हैं, तो धर्म और अधर्म की बात देखकर उसके देवता स्वयं उस तरह का असर देने लगते हैं। आपको करना नहीं पड़ेगा।
व्यक्ति स्वयं मारण प्रयोग कब कर सकता है?
केवल उपसंहार विद्या के साथ — नहीं तो अंत अश्वत्थामा जैसा होता है
स्वयं तभी करें जब आपमें क्षमता हो, और सबसे बढ़कर जब आपके पास उपसंहार विद्या हो। यदि आपको उसे वापस लेने का ज्ञान नहीं और आप मारण करते हैं, तो अश्वत्थामा की दशा याद रखें — आप सड़ जाएँगे। उसने ब्रह्मास्त्र चलाया और उसके पास उसे लौटाने की विद्या नहीं थी।
वक्ता कहते हैं कि स्वयं तब करें जब आपमें क्षमता हो — और सबसे बड़ी बात, जब आपके पास उपसंहार विद्या हो। यदि आपमें क्षमता नहीं, विद्या नहीं, उसे वापस लेने का ज्ञान नहीं, और आप मारण कर रहे हैं, तो ध्यान रखें कि दशा अश्वत्थामा जैसी हो जाएगी। आप सड़-सड़कर मरेंगे। वे जोड़ते हैं कि उसकी अपनी बात छोड़ दें — वह शिव का अवतार है, उसे अलग रखें। पर उसके पास भी उपसंहार विद्या नहीं थी, और इसी कारण भगवान कृष्ण ने उसे शाप दिया। यह भी एक कारण है; यह भी याद रखें। उसने ब्रह्मास्त्रतांत्रिक व पौराणिक कथाओं का सर्वोच्च व अंतिम अस्त्र — किसी अद्वितीय व निर्णायक शक्ति वाले प्रयोग या विद्या हेतु प्रतीकात्मक रूप से प्रयुक्त। चलाया पर उसके पास उसे लौटाने की विद्या नहीं थी। यदि आप महाभैरव से किसी का मारण कर रहे हैं पर धर्म-रहित काम कर रहे हैं, तो वहीं कठिनाई है। प्रयोग का विधान तो हम अभी भी देंगे — पर जहाँ धर्म खड़ा है और कोई आशा बची ही नहीं, जहाँ आप उसे वापस लेना नहीं चाहते, वह अलग बात है।
किसी व्यक्ति के विरुद्ध प्रयोग कब अधर्म होता है?
समूह के लिए प्रार्थना एक बात है; जिसने कभी नुकसान नहीं किया उसका नाम लेना दूसरी
जहाँ किसी व्यक्ति ने आपको प्रत्यक्ष नुकसान नहीं पहुँचाया — गाली नहीं दी, आपकी बहन या बेटी को कुछ नहीं कहा, और अपने रास्ते चल रहा है — वहाँ यदि आप विधर्मियों के विनाश की प्रार्थना करें तो सामूहिक रूप से करेंगे, किसी व्यक्ति का नाम लेकर नहीं। उसका उपयोग उस पर करें जहाँ सच में ऐसी बात हो।
वक्ता वह स्थिति बताते हैं जिसमें उनके अनुसार प्रयोग उचित है: आपकी बेटी, आपकी बहन, और कोई आदमी कहता है कि वह उसे उठा ले जाएगा और यह-वह करेगा; आप जानते हैं कि प्रशासन आपका साथ नहीं देगा और पीछे कोई नेता काम नहीं आएगा, और आपके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं। महाभैरव की विधि पूरी रिकॉर्ड है और वे अंबुवाची के बाद उसे अपलोड करना शुरू करेंगे। पर यदि आप किसी से थोड़ा द्वेष रखते हैं — वह आदमी ज़्यादा चालाक बन रहा है — वह किसी भी मत का हो: वे कहते हैं, यह भी जान लें, वह किसी भी मत का हो। यदि आप सीधे वह प्रयोग कर दें, जहाँ उसने आपको प्रत्यक्ष नुकसान नहीं पहुँचाया, गाली नहीं दी, आपकी बहन या बेटी को कुछ नहीं कहा, और वह अपने रास्ते चल रहा है — तो यदि आप विधर्मियों के विनाश की प्रार्थना करें, तो सामूहिक रूप से करेंगे; आप किसी व्यक्ति का नाम लेकर व्यक्तिगत रूप से नहीं करेंगे, जब वह आपको प्रत्यक्ष नुकसान नहीं पहुँचा रहा। पर यदि आप बताई गई विधि सीधे उस पर उपयोग करें, तो वह धर्म-रहित हो गया। उस समय ऐसा न करें। एक व्यक्ति पर अलग बात है; एक समूह पर अलग बात है — समूह, क्योंकि यह पूरा विधर्म हमें कहीं भी उलझा सकता है। जहाँ ऐसी बात हो, वहाँ ऐसा प्रयोग करें।
शत्रु के बच्चे की मृत्यु माँगने वाले संकल्प का क्या?
यदि वह संकल्प लिया जाए और बच्चा मर जाए तो दोष किसे लगेगा
वक्ता ऐसा एक संकल्प बताते हैं: कि फलाना, जिसने मुझे इस तरह नुकसान पहुँचाया, उसका बच्चा जल्दी मृत्यु को प्राप्त हो। वे पूछते हैं कि ऐसा संकल्प लिखने वाले आदमी में कितना द्वेष है — और यदि वह संकल्प लिया जाए और बच्चा सच में मर जाए, तो उसका दोष किसे लगेगा?
वक्ता कहते हैं कि संकल्प लिखने की बात आते ही लोग कुछ भी लिख देते हैं। ऐसे बहुत से संकल्प मिलते हैं; यदि आप नवरात्रि से अब तक हर एक को देखें, तो कई आपको रुककर सोचने पर मजबूर कर देंगे कि यह आदमी क्या लिख रहा है। कोई व्यक्ति संकल्प में लिखता है: कि फलाना, जिसने मुझे इस तरह नुकसान पहुँचाया है — उसका बच्चा जल्दी मृत्यु को प्राप्त हो। वे पूछते हैं, बताइए, ऐसा संकल्प लिखने वाले आदमी में कितना द्वेष है? क्या सच है और क्या झूठ, न आप जानते हैं न मैं। उसने बस वहाँ लिख दिया — कि उसकी मृत्यु हो। पर जहाँ धर्म और अधर्म का, क्या सही है और क्या गलत का प्रश्न उठता है: यदि वह संकल्प लिया जाए, और वह बच्चा सच में मर जाए — तो दोष किसे लगेगा? वे पूछते हैं, क्या ऐसे संकल्प लिए जाते हैं? यहाँ एक ही संकल्प होगा: प्रभु, जो भी यह पूजा करवा रहा है और जिसका यह संकल्प है — इस व्यक्ति को सद्बुद्धि दें।
शत्रु के विनाश के बजाय क्या माँगना चाहिए?
अपनी सामर्थ्य माँगें — कि वह आपसे आँख न मिला सके
आप क्यों नहीं कहते कि हमें सक्षम बनाओ। संकल्प में क्यों नहीं लिखते कि हमें मंत्र की सिद्धि मिले, भगवती की कृपा आए, हम सक्षम बनें — कि आपकी क्षमता इतनी बढ़े कि वह आपके सामने खड़े होने की हिम्मत न करे, आपका आंतरिक तेज इतना बढ़े कि वह आपसे आँख न मिला सके।
वक्ता कहते हैं कि बाहरी शत्रु तो आज नहीं तो कल नष्ट होना ही है। यदि आप भगवती की सेवा, शक्ति साधना कर रहे हैं, तो शक्ति शत्रु को अवश्य नष्ट करती है; वह उसे अवश्य दबाएगी, चाहे कोई भी शक्ति हो। नारायण भी दबाएँगे, नारायणी भी दबाएँगी। ऐसा हो ही नहीं सकता कि शत्रु न दबें। पर वे पूछते हैं, आपके आंतरिक शत्रुओं का क्या? आपके भीतर इतना द्वेष भरा है कि आप एक छोटे बच्चे के लिए संकल्प करवा रहे हैं, कि बच्चा मर जाए ताकि उसे पता चले कि बच्चा जाने पर कैसा लगता है। आप और हम कौन होते हैं ऐसा संकल्प लेने वाले? आप और हम कौन होते हैं ऐसे दुष्ट कर्म और ऐसे दुष्ट विचार मन में लाने वाले? फिर उसमें और आपमें क्या अंतर बचा? भले ही उसने ऐसी विद्या का उपयोग करके आपके बच्चे की मृत्यु करवाई हो, तब भी — कि उसे उचित दंड मिले; यह नहीं कि आप खास तौर पर लिखें कि उसका बच्चा भी मरे। और उसका बच्चा सात-आठ साल का होगा; बताइए, इसमें उस बच्चे का क्या दोष है? और मान भी लें कि वह अपनी करनी भुगतेगा — तो आप ऐसा करके अपने ऊपर नया दोष क्यों ले रहे हैं? क्या नवरात्रि के नौ दिनों की पूजा, दिव्य चामुंडा तीर्थ और शक्ति पीठ पर महाभैरव की पूजा, ऐसे दिव्य स्थानों पर होने वाले अनुष्ठान, इतने छोटे संकल्प के लिए हैं? आप क्यों नहीं कहते: हमें सक्षम बनाओ। आप संकल्प में क्यों नहीं लिखते कि हमें मंत्र सिद्धि मिले, भगवती की कृपा मिले, हम सक्षम बनें। कि आपकी क्षमता इतनी बढ़े कि वह आपके सामने खड़े होने की हिम्मत न करे। कि आपका आंतरिक तेज इतना बढ़े, आपकी आँखों की शक्ति इतनी बढ़े, कि वह आपसे आँख न मिला सके। कि जगदंबा आपमें इतनी क्षमता भर दें।
क्या शत्रु को दंड देना कभी कर्तव्य होता है?
हाँ — पर दंड धर्म के भीतर दिया जाना चाहिए
ऐसा समय आता है जब कोई दूसरी ओर से नुकसान पहुँचाता है, और तब उसे दंड देना अपना काम और कर्तव्य बन जाता है। यह उचित है। पर वहाँ भी आप दंड धर्म के भीतर देंगे, धर्म-रहित नहीं — भगवान कृष्ण ने किसी बच्चे को मारने के लिए किसी का बच्चा नहीं मरवाया।
वक्ता कहते हैं कि एक समय आता है जब कोई दूसरी ओर से नुकसान पहुँचाता है; और वहाँ यह अपना काम, अपना कर्तव्य बन जाता है कि इस व्यक्ति को दंड दिया जाए। यह उचित है। पर वहाँ भी आप दंड धर्म के भीतर देंगे। आप इस तरह धर्म-रहित दंड नहीं देंगे। वे कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने किसी बच्चे को मारने के लिए किसी का बच्चा नहीं मरवाया। धर्म और अधर्म के विषय को सोच-समझकर ही संकल्प देना चाहिए।
अंबुवाची अनुष्ठान के लिए कौन सी कामनाएँ उचित हैं?
नौकरी, व्यापार, रोग का नाश — और सामर्थ्य
कामाख्या के अंबुवाची पर्व में कामना के साथ पूजा करें — पर अनुष्ठान पूरी तरह सौम्य रखें, अपनी किसी एक कामना के साथ: किसी की नौकरी, किसी का व्यापार, किसी रोग का नाश। ये उचित कामनाएँ हैं, जैसे सामर्थ्य प्राप्त होने की माँग भी। इस समय कोई ऊटपटाँग कामना न करें।
वक्ता कहते हैं कि कामाख्या के अम्बुबाची पर्व में कामना के साथ पूजा करें — पर कामना में ये विषय न लिखें: कि यह मर जाए, इसका धन नष्ट हो जाए, इसे ऐसी बीमारी हो जाए। क्या संकल्प में ऐसे विषय लिखे जाते हैं? संकल्प में ऐसा भी होता है, यह उन्हें इन्हें पढ़ने के बाद ही समझ आया। तो इन चार दिनों में पहले अपना सबसे विशेष प्रयोग करें। अपने विषयों को साथ लेकर चलें, और साथ में अपने आराध्य का जप भी करें। और जो भी अनुष्ठान हो, वह पूरी तरह सौम्य हो, अपनी किसी एक कामना के साथ — जैसे किसी की नौकरी की, किसी की व्यापार की, किसी रोग के नाश की। ये सब कामनाएँ उचित हैं: कि यह कामना पूरी हो, कि हमें सामर्थ्य मिले। पर इस समय कोई ऊटपटाँग कामना नहीं करनी चाहिए।
यदि ग्यारह सौ पाठ संभव न हों तो?
रोज़ एक सौ आठ ठीक है, और जो कुछ आप पहले से पढ़ते हैं
तो रोज़ एक सौ आठ पाठ करें — बिल्कुल कर सकते हैं। और जो भी पाठ और पूजा आप पहले से कर रहे थे, अंबुवाची में उन सबका जप करें।
एक श्रोता, जो ग्यारह सौ नहीं कर सकता, पूछता है कि क्या रोज़ एक सौ आठ चलेंगे; वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं — रोज़ एक सौ आठ पाठ करें। और जो भी पाठ और पूजा आप पहले से करते आए हैं, अम्बुबाची में उन सबका जप करें। इसी क्रम में वे पुष्टि करते हैं कि बटुक ब्रह्म कवच करने के बाद नींबू की बलि देना बहुत अच्छा है — बिल्कुल दें।
क्या साधना के दौरान विग्रह को रोज़ हटाया जा सकता है?
केवल यदि आप रोज़ आवाहन और विसर्जन कर रहे हैं
यदि साधना काल में आप रोज़ आवाहन और रोज़ विसर्जन कर रहे हैं, तो आप उसे हटा सकते हैं। पर यदि आपने इक्कीस दिन या इकतालीस दिन का एक ही संकल्प लिया है, तो उस दौरान विग्रह को नहीं हटाना चाहिए।
एक श्रोता, जो अपने कमरे में साधना करता है इसलिए हर दिन साधना के बाद भगवती लक्ष्मी के श्री विग्रह को चौकी से उठाकर ऊँची जगह रखता है, पूछता है कि क्या साधना काल में विग्रह को रोज़ हटाने से दोष लगता है। वक्ता कहते हैं कि साधना काल में यदि आप रोज़ आवाहन और रोज़ विसर्जन कर रहे हैं, तो आप उसे हटा सकते हैं। और यदि आपने एक ही समय में इक्कीस दिन या इकतालीस दिन का एक संकल्प लिया है, तो उस समय विग्रह को नहीं हटाना चाहिए।
महाभैरव या बटुक भैरव?
जहाँ शत्रु हो वहाँ महाभैरव; अन्यथा बटुक, और उनका अष्टोत्तर
यदि शत्रु से परेशानी है, तो महाभैरव करें; अन्यथा बटुक भैरव जी का करें। और बटुक भैरव के मंत्र से अधिक वक्ता अष्टोत्तर शतनाम पर ज़ोर देते हैं, क्योंकि वह अपने आप में अद्भुत है — उसका उपयोग सृष्टि, पालन और श्रृंगार के क्रम में चलता है।
वक्ता कहते हैं कि आवश्यकता के अनुसार आप दोनों में से कोई भी मंत्र कर सकते हैं। यदि शत्रु आदि से परेशानी है, तो महाभैरव करें; अन्यथा बटुक भैरव जी का करें। और वे कहते हैं कि बटुक भैरव जी के मंत्र से अधिक हम अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। पर ज़ोर देते हैं — क्योंकि वह अपने आप में अद्भुत है। उसका उपयोग तीनों में क्रम से चलता है: सृष्टि, पालन और श्रृंगार। तो वह करें।
क्या गर्भवती स्त्री कामाख्या कवच का पाठ कर सकती है?
हाँ, किसी भी अवस्था में — पर चौथे महीने के बाद पूजा स्थान पर नहीं
वह बिल्कुल कर सकती है — कामाख्या कवच किसी भी अवस्था में पढ़ा जा सकता है, और इसके लिए पूजा स्थान पर जाना अनिवार्य नहीं। पर चौथे या पाँचवें महीने के बाद गर्भवती स्त्री को पूजा स्थान पर नहीं जाना चाहिए, और सबसे बढ़कर वहाँ नहीं जहाँ शिवलिंग हो।
वक्ता कहते हैं कि गर्भवती स्त्री कामाख्या कवच का पाठ बिल्कुल कर सकती है। यह किसी भी अवस्था में पढ़ा जा सकता है; और हाँ, यह अनिवार्य नहीं कि इसे पूजा स्थान पर जाकर ही किया जाए। वे कहते हैं कि चौथे या पाँचवें महीने के बाद गर्भवती स्त्री को सेवा-पूजा करने के लिए पूजनीय स्थान पर नहीं जाना चाहिए। विशेषकर जहाँ शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। आदि हो, वहाँ तो बिल्कुल नहीं जाना चाहिए। तो दूर से, मंदिर के बाहर से, पूजा स्थान के बाहर से प्रणाम करके, वह जहाँ भी हो आराम से बैठे — कुर्सी पर भी, जहाँ भी बैठ सके — और वहाँ पाँच या ग्यारह पाठ करे, जितने चाहे; और भगवती का नाम-जप, जयंती मंगला काली, या जो भी मंत्र पढ़ना चाहे या भगवान का जो भी नाम लेना चाहे, वह करती रहे।
निकारी का दीपक बुझने से कैसे बचाएँ?
कपूर के साथ मोटी बाती, बड़े कार्टन के भीतर ले जाएँ
निकारी का दीपक ऐसा रखें कि वह बिल्कुल न बुझे — बाती मोटी रखें, कपूर लगाकर जलाएँ, और बाहर ले जाते समय हवा हो तो उसे बड़े वाले बिस्कुट के कार्टन के भीतर ले जाएँ ताकि हवा अंदर न जा सके।
क्षेत्रपाल निकारीक्षेत्रपाल को अर्पित एक विसर्जन-अनुष्ठान — सुरक्षा तथा क्षेत्र में निवास करने वाली दुष्ट शक्तियों (डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल) की शांति हेतु प्रार्थना, जो घर की देहरी पर व्याप्त दुष्ट ऊर्जाओं को कम-से-कम 24 घंटे हेतु शुद्ध कर देती है। करते समय हवा में दीपक बुझ जाने के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि इसमें कुछ अशुभ होने की संभावना नहीं है — पर निकारी का दीपक ऐसा रखें कि वह बिल्कुल न बुझे। बाती मोटी रखें। कपूर लगाकर जलाएँ। और बाहर ले जाते समय, यदि हवा आदि चल रही हो, तो उसे बड़े वाले बिस्कुट के कार्टन के भीतर ले जाएँ, ताकि हवा अंदर न जा सके।
क्या चार दिनों में विग्रह को स्नान कराया जाता है?
चार दिन न स्नान, न स्पर्श
नहीं। भगवती को ढकने के बाद चार दिन रोज़ स्नान नहीं होगा, और उन्हें छुआ भी नहीं जाएगा। चार दिनों में आप बस इतना कर सकते हैं कि सुगंधित फूल चढ़ाएँ और अगले दिन उतार दें — विग्रह को छूने के नाम पर इससे आगे कुछ नहीं।
वक्ता कहते हैं कि भगवती को ढकने के बाद रोज़ स्नान नहीं कराना है: चार दिन कोई स्नान नहीं होगा। चार दिन उन्हें छुआ भी नहीं जाएगा। चार दिनों में आप बस इतना कर सकते हैं: उन पर सुगंधित फूल चढ़ाएँ और अगले दिन उतार दें। बस इतना — इससे आगे विग्रह को छूना नहीं है। यदि आप माँ को रोज़ स्नान कराते थे, तो इन चार दिनों में रोज़ स्नान नहीं होगा।
क्या ताँबे का कवच एक साल बाद काम करना बंद कर देता है?
केवल यदि आप सूतक में गए — तब ताँबे का काम रुक जाता है
यदि आप सूतक या पातक में नहीं गए, तो चिंता की कोई बात नहीं। यदि आप सूतक या पातक में गए हैं, तो ताँबे में उसका काम रुक जाता है।
यह पूछे जाने पर कि ताँबे में बना लक्ष्मी साबर कवच क्या एक साल बाद काम करना बंद कर देगा, वक्ता समय के बजाय शर्त पर उत्तर देते हैं। यदि आप सूतक या पातक में नहीं गए हैं, तो चिंता की कोई बात नहीं। और यदि आप सूतक या पातक में गए हैं, तो ताँबे में उसके बाद उसका काम रुक जाता है। इसी क्रम में वे उत्तर देते हैं कि कवच का धागा खुल जाना कोई समस्या नहीं है।
तंत्रोक्त स्वरूप और सामान्य विग्रह में क्या अंतर है?
जागरण अलग होता है, और नियम की कठोरता भी
दो बातें। तंत्रोक्त विधि में देवता का जागरण अलग तरीके से होता है। और जहाँ वेदोक्त विधि में नियम थोड़ा भी छूटे तो बहुत जल्दी दोष बनता है — नैवेद्य चार बजे तक चढ़ाना है, आरती सूर्योदय के आधे घंटे के भीतर — तंत्रोक्त विधि में नियम का ऐसा बंधन नहीं होता।
पंडितों द्वारा अचल प्राण प्रतिष्ठा के साथ घर के बाहर स्थापित कालेश्वरी माता के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि एक बार अचल प्रतिष्ठा हो जाए, तो आपको सामान्य तंत्रोक्त चीज़ की कोई ज़रूरत नहीं। वे जोड़ते हैं कि एक विषय हमेशा याद रखें: आज के समय में लगभग सारी प्रतिष्ठा आगमतांत्रिक शास्त्रोक्त विधि-विधानों का समूह (जैसे शिवागम), जो पूजा के नियम निर्धारित करता है, यह भी कि बलि कहाँ व कैसे विहित है — मात्र स्वाद या भोग हेतु इसके नियमों का उल्लंघन किसी भी उच्च आध्यात्मिक प्राप्ति को असंभव बना देता है। में बताई विधि से होती है। पर फिर भी, तंत्रोक्त विधि का अर्थ यह है। पहला, तंत्रोक्त प्रक्रिया और विधान में देवता का जागरण अलग तरीके से होता है। दूसरा: वेदोक्त विधान में, यदि नियम थोड़ा भी छूटे, यदि आप कोई गलती या अपराध करें, तो बहुत जल्दी दोष बनता है। यदि वहाँ नियम है कि नैवेद्य सुबह चार बजे तक चढ़ाना है, और आरती सूर्योदय के आधे घंटे के भीतर करनी है, तो करनी ही है। तंत्रोक्त विधान में आप पर उस तरह का नियम का बंधन नहीं होता। हालाँकि वे कहते हैं कि इसका अर्थ यह नहीं कि आप सब छोड़ दें और तय करें कि चार दिन नैवेद्य नहीं चढ़ाएँगे — ऐसा नहीं।
तंत्रोक्त स्थापना वास्तव में क्या बनाती है?
पीठ यंत्र और न्यास, ताकि एक जप सभी शक्तियों को पुष्ट करे
एक पीठ यंत्र बनाया जाता है और देवता को उनके पूरे परिवार के साथ उस पर स्थापित किया जाता है; उन सबमें सूक्ष्म रूप से, चल स्थापना में, न्यास की प्रक्रिया पूरी होती है। फिर वहाँ समर्पित एक मंत्र जप भी सभी जुड़ी शक्तियों को पुष्ट करता है — आठ भैरव, मातृकाएँ, योगिनियाँ, क्षेत्रपाल।
वक्ता कहते हैं कि जागरण इस तरह बनता है: जैसे बटुक भैरव जी के साथ, जब उनका तंत्रोक्त विग्रह किसी मंदिर में पीठ पर स्थापित होता है, तो स्थापना एक विधान से होती है — जैसे काल भैरव के साथ, जहाँ स्थापना श्मशान की भस्म पर होती है। पर जब घर में सबसे सूक्ष्म रूप में तंत्रोक्त स्थापना होती है, तो वहाँ भी एक पीठ यंत्र बनाया जाता है, और उस पर भगवान बटुक भैरव जी स्थापित होते हैं। वे वहाँ अपने पूरे परिवार के साथ स्थापित रहते हैं; और उन सबमें न्यास आदि की प्रक्रिया सबसे सूक्ष्म रूप में पूरी होती है — चल स्थापना में, अचल में नहीं। फिर उनकी तृप्ति बनी रहती है। वे कहते हैं कि आपके बिना कारण कोई गलत काम करने से वे बहुत कम ही क्रोधित और कुपित होते हैं। और क्योंकि इस तरह आवरण, आवाहन, पूजा और न्यास हुए हैं: यदि आप साधारण पूजा भी अर्पित करें, तो वह बहुत दृढ़ असर देगी। मान लीजिए भैरव जी का विग्रह वहाँ स्थापित हो रहा है जहाँ अष्ट-भैरव यंत्र है, जिसमें आठ भैरव सूक्ष्म रूप से स्थापित हुए हैं, और अष्टमातृका, और योगिनी, क्षेत्रपाल आदि के साथ, सबका सबसे सूक्ष्म न्यास हुआ है। तो यदि आप एक बार भी मंत्र जप करके समर्पित करें, तो सभी जुड़ी शक्तियाँ पुष्ट हो जाती हैं। जबकि जहाँ आपने इसे साधारण विग्रह में स्थापित किया है, वहाँ आपको जितना हो सके जप करना होगा — कम से कम सवा लाख जप, साधारण नियम और स्थिरता बनाए रखकर — और तब उनका जागरण होगा। वहाँ आपको करना ही पड़ेगा।
माला प्रतिष्ठा के कौन-कौन से स्तर हैं?
एक बार वाली विधि, वर्ण न्यास, और छह घंटे लेने वाली भूत लिपि
तीन। सबसे सरल: माला को कच्चे दूध से स्नान कराएँ, पूरी माला को हाथ में ढककर पकड़ें और प्राण प्रतिष्ठा मंत्र पढ़ें — या वह न आए तो शिव के पंचानन मंत्र एक बार, या पंचाक्षरी। दूसरी में संक्षेप में भूत लिपि वर्ण न्यास होता है। तीसरी में हर मनके को वामदेव मंत्र से अलग-अलग प्रतिष्ठित किया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि माला प्रतिष्ठा का विधान चैनल पर दिया गया है; उसे वहाँ देखें। सबसे सरल बिल्कुल साधारण है: हम माला को केवल कच्चे दूध से स्नान कराते हैं; और अभिषेक के बाद, पूरी माला को एक साथ हाथ में ढककर पकड़कर, प्राण प्रतिष्ठा मंत्र पढ़ते हैं। यदि प्राण प्रतिष्ठा मंत्र नहीं आता, तो भगवान शिव के पंचानन मंत्र एक बार पढ़ते हैं। और यदि वह भी नहीं आता, तो पंचाक्षरी मंत्र पढ़ते हैं। दूसरी विधि वह है जिसमें हम संक्षेप में या सामान्य रूप से भूत लिपि वर्ण न्यास आदि का एक पूरा पाठ करते हैं। तीसरी, जो इस चैनल पर दी गई है — हालाँकि वहाँ दोनों विधियाँ बताई गई हैं — वह है जिसमें हम हर मनके को अलग-अलग प्रतिष्ठित करते हैं। हर मनके को वामदेव मंत्र से प्रतिष्ठित किया जाता है, और उसके बाद हर मंत्र में वर्णों का न्यास करते हैं। इस तरह यह माला तंत्रोक्त और दिव्य हो जाती है। और यदि यही भूत लिपि विधि से किया जाए, तो वह अपने आप में अद्भुत हो जाती है। यदि आप भूत लिपि विधि से एक माला प्रतिष्ठित करने जाएँ, तो भूत लिपि वर्ण न्यास का अच्छा अभ्यास होने पर भी एक माला में आपको कम से कम पाँच-छह घंटे लगेंगे।
क्या विस्तार से प्रतिष्ठित माला सरल ढंग से प्रतिष्ठित माला से अधिक शक्ति देती है?
भूत लिपि से प्रतिष्ठित माला की ऊर्जा सरल प्रतिष्ठित माला से ज़मीन-आसमान अलग है
हाँ। ऐसा नहीं कि इतनी ज़बरदस्त प्रतिष्ठा का अर्थ है कि कोई दोष नहीं लगता — पर उस पर एक माला जप करें और उसकी ऊर्जा अद्भुत होगी। जिसे आपने हाथ में लेकर एक बार में जैसे-तैसे प्रतिष्ठित किया, उसकी ऊर्जा और इसकी ऊर्जा में ज़मीन-आसमान का अंतर होगा।
वक्ता कहते हैं कि वह अपने आप में दिव्य हो जाती है। और वे जोड़ते हैं कि ऐसा नहीं कि इतनी ज़बरदस्त प्रतिष्ठा हुई है इसलिए आपको कोई दोष नहीं लगता। पर अब उस पर एक माला जप करें, और उसकी ऊर्जा अद्भुत होगी। और साधारण वाली की ऊर्जा — जिसे आपने हाथ में लेकर एक बार में जैसे-तैसे प्रतिष्ठित किया — और इसकी ऊर्जा में ज़मीन-आसमान का अंतर होगा। जब आप इसे जानेंगे, तभी यह विषय समझ पाएँगे। वे कहते हैं कि यह साधकों के लिए है। जो साधक नहीं हैं — उन्हें इसकी क्या ज़रूरत? कामना पूर्ति के लिए आप साधारण वाली से काम चला सकते हैं; आपकी बात अलग है। पर यदि कामना से आगे साधना के प्रति आपका कोई लगाव और आकर्षण है, और उस समय आप तंत्रोक्त विग्रह, माला या यंत्र का उपयोग कर रहे हैं, तो आपको सबसे विशेष फल मिलेगा — और वह इसी विधि के कारण।
प्रतिष्ठा के दौरान नया साधक बेचैन क्यों हो जाता है?
क्योंकि अभी हृदय में कोई शक्ति नहीं बसी जो धैर्य दे
क्योंकि आपने किसी मंत्र का सवा लाख पुरश्चरण नहीं किया, और देवता उस तरह का धैर्य देते ही नहीं। माला को मनका-मनका प्रतिष्ठित करने बैठें तो चौथे-पाँचवें मनके तक — दसवें तक — आप पूछने लगेंगे कि यह कब खत्म होगा।
वक्ता कारण समझाते हैं। मान लीजिए आपने कभी किसी मंत्र का सवा लाख पुरश्चरण नहीं किया, और आप सीधे भूत लिपि न्यास विधि से किसी यंत्र या किसी माला की प्रतिष्ठा करने बैठ जाते हैं। जब आप प्रतिष्ठा करने बैठेंगे, तो बीच में बेचैन हो जाएँगे। ऐसा होना ही है। माला के मनकों पर — भूत लिपि छोड़िए, साधारण वर्ण न्यास ही कीजिए — चार-पाँच मनकों के बाद, दसवाँ मनका आते-आते आपको लगेगा: कब खत्म होगा, कब खत्म होगा। आपकी हालत खराब हो जाएगी। क्योंकि कहीं न कहीं आपके मन में, चूँकि आपने किसी विशेष मंत्र का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। नहीं किया, देवता उस तरह का धैर्य देते ही नहीं। जब तक हृदय में कोई शक्ति ठीक से नहीं बसती, जब तक आपका हृदय किसी शक्ति के प्रति अधीर नहीं और वह विश्वास नहीं, जब तक वे आपके हृदय में सूक्ष्म रूप से उपस्थित नहीं — तब तक प्रतिष्ठा की पूरी प्रक्रिया ठीक से हो ही नहीं पाएगी।
प्रतिष्ठा में वास्तव में प्राण कौन डालता है?
हृदय की अपनी धड़कन — और सनातनी जो जन्म से तांत्रिक है
हृदय। जब हम प्राण मंत्र पढ़ते हैं तो हृदय से ही वह धड़कता है — जो धड़कन चल रही है वही विद्युत-चुंबकीय तरंगें पैदा कर रही है, और वही तरंगें जाकर वस्तु को चेतन बनाती हैं। यदि वह आपके भीतर नहीं, तो वस्तु केवल भौतिक रहती है।
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि आपका हृदय जाग्रत और जीवित है, इसी से ऊर्जा स्पंदित होकर निकलती है और उस स्थान तक पहुँचती है। जब हम प्राण मंत्र पढ़ते हैं, तो वह हृदय से ही धड़कता है — जो धड़कन चल रही है, वही विद्युत-चुंबकीय तरंगें पैदा करती है। यही तरंगें जाकर वस्तु को चेतन बनाती हैं। तो यदि वह आपके भीतर नहीं, तो कहाँ से? तब वह केवल भौतिक है। उस स्थान पर सूक्ष्म ऊर्जा, आपके अपने इष्ट और आराध्य की ऊर्जा, भी उपस्थित होनी चाहिए — और तभी वह पूरी तरह जाग्रत होती है। तब उसमें आपको कोई बेचैनी नहीं होगी; उस समय आपका मन करेगा कि एक की जगह दो करें। वह शक्ति इतनी क्षमता देती है। और यह आपके अपने मन से भी नहीं आता; आपका लगाव ही उनसे यह दिलवाता है। तब आप जोड़ पाएँगे — यह सेतु, यह महासेतु, यह बंध, यह महाबंध कैसे लग रहा है, यह सब कैसे हो रहा है; यह अपने आप स्पष्ट हो जाएगा। वे जोड़ते हैं कि सनातनी व्यक्ति जन्म से तांत्रिक है — यह जान लें। वह बस अपनी शक्तियाँ भूल गया है। और उसे शक्ति कब याद आती है? जब उसके अपने यहाँ परेशानी होती है। जब शत्रु उसे परेशान करते हैं, जब भूत-प्रेत उसे परेशान करते हैं, तब वह धीरे-धीरे तांत्रिक बनने लगता है।
जब बीस पाठ से कोई उत्तर न मिले, तो कारण अपने भीतर खोजना चाहिए
उत्तर क्यों नहीं आ रहा, यह अपने भीतर देखें
वक्ता कहते हैं कि उन्हें ऐसी टिप्पणी का उत्तर देना ही नहीं आता। अपने भीतर देखें; इसीलिए उत्तर नहीं आ रहा।
वक्ता कहते हैं कि तांत्रिक बनने के रास्ते पर आदमी ऐसा तांत्रिक बन जाता है कि फिर उसे पूरी दुनिया छोटी लगती है — क्योंकि वह खुद ठीक से काम नहीं करेगा। उसने शुरू से कामचोरी सीखी, शुरू से चीट कोड सीखा, कामचोरी से काम कैसे निकलवाएँ, जुगाड़-तंत्र। और यहाँ जुगाड़-तंत्र नहीं चलता। काम पूरे नहीं होते, चीज़ें बिगड़ती रहती हैं, और दोष दूसरों पर डाला जाता है। वे कहते हैं कि चैनल पर एक टिप्पणी आती है: आप झूठ बोल रहे हैं, हमने हनुमान चालीसा बीस बार पढ़ी और कुछ नहीं हुआ। वे कहते हैं कि वह टिप्पणी सुनकर और पढ़कर उन्हें समझ नहीं आता कि क्या उत्तर दें — कि इस आदमी ने बीस बार पढ़ी और कुछ नहीं हुआ; इसका क्या उत्तर दिया जाए। वे कहते हैं कि हनुमान जी ने भी अपना सिर पकड़ लिया होगा, कि उन्हें उत्तर देना चाहिए था, कि उन्हें प्रत्यक्ष उसके सामने खड़ा हो जाना चाहिए था। आप हनुमान जी से उत्तर चाहते हैं — अपने भीतर देखें। इसीलिए उत्तर नहीं आ रहा।
गुरु की फ़ोटो कहाँ रखनी चाहिए?
पूजा स्थान में, हाँ — पर उसके लिए सारे देवताओं को हटाकर नहीं
आप अपने पूजा कक्ष में गुरु का स्थान बिल्कुल रख सकते हैं। यदि आप किसी गुरु से दीक्षित हैं, तो पूजा के लिए उनका विग्रह या फ़ोटो रखें। पर यदि आप अपने सारे देवताओं को हटाकर केवल गुरु जी को रख रहे हैं — तो आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं, और आप पूरी तरह भ्रमित कर दिए गए हैं।
यह पूछे जाने पर कि पिता का अपनी पूजा के साथ अपने गुरु बाबा की फ़ोटो पूजा के लिए रखना क्या उचित है, वक्ता कहते हैं कि अपने पूजा स्थान में गुरु का स्थान बिल्कुल रखा जा सकता है। यदि आप किसी गुरु से दीक्षित हैं, तो उसके बाद पूजा के लिए उनका विग्रह रखें, या उनकी फ़ोटो रखें। पर यदि आप अपने सारे देवताओं को हटाकर केवल गुरु जी को रख रहे हैं — तो वे कहते हैं, आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। तब आप भ्रमित हैं; उनके हिसाब से आप ज़बरदस्त भ्रमित हैं। तब आप पूरी तरह ठगे गए हैं। वे जोड़ते हैं, हाँ: यदि आपने अपने पंचायतन के भीतर गुरु का स्थान, अपने दीक्षा गुरु का स्थान, दिया है, तो बहुत अच्छा — बिल्कुल दें।
यदि दूसरे आपके गुरु के विरुद्ध बोलें तो?
अपना समर्पण बनाए रखें — पर वहाँ नहीं जहाँ वे शास्त्र के विरुद्ध बोलें
वे जो भी हों, और चाहे हम उन्हें गाली दें या कोई और, वह विषय हम तक रहने दें। आपके लिए वे गुरु हैं; उन्होंने आपको दीक्षा दी, और उनके चरणों में आपका समर्पण बना रहना चाहिए। पर जहाँ गुरु शास्त्रों के विरुद्ध बोलें, वह अलग बात है।
वक्ता कहते हैं कि वे कौन हैं, कैसे हैं और क्या हैं — चाहे हम उन्हें गाली दें या कोई और गाली दे — वह विषय हम तक सीमित रहने दें। आपके लिए वे गुरु हैं। उन्होंने आपको दीक्षा दी। उनके चरणों में आपका समर्पण बना रहना चाहिए। गुरु मंडल में पूजा उनके मंडल के अनुसार होनी चाहिए; वे गुरु आपके लिए हमेशा गुरु रहेंगे। हमारे लिए वे हमारे मित्र या शत्रु हो सकते हैं। वे हमारे आलोचक हो सकते हैं, या हम उनसे द्वेष रख सकते हैं। वह हमारा और उनका विषय है। उनके साथ आपका विषय कभी नहीं बिगड़ना चाहिए। गुरु जो भी हों, गुरु के प्रति अपना समर्पण बनाए रखें। वे कहते हैं कि हम इस चैनल से कभी गलत शिक्षा नहीं देंगे — कि फलाना ऐसा-वैसा है; मीडिया जो दिखाता है और लोग जो दिखाते हैं, वे जानें। अपना समर्पण बनाए रखें। पर वे कहते हैं कि जहाँ आपका मन टूट रहा है, जहाँ आपके गुरु जी शास्त्रों के विरुद्ध बातें कह रहे हैं — जैसे जब कहा जाता है कि यहाँ भगवान की कोई सेवा नहीं, गुरु की सेवा ही सब कुछ है, जिससे केवल गुरु की फ़ोटो रखकर पूजी जाती है, नैवेद्य गुरु को चढ़ाया जाता है, और गुरु की पादुका की जगह चप्पल रख दी जाती है; जहाँ कृष्ण जी को छोटा बताया जा रहा है, कि कृष्ण जी ने यह कहा, कि कृष्ण जी मरेंगे — तो ऐसे गुरु को ही जूते से पीटना चाहिए, और उसके शिष्य की पिटाई होनी चाहिए।
क्या कामाख्या दीपदान की विधि दी जा सकती है?
तंत्रोक्त रूप सार्वजनिक रूप से नहीं दिया जा सकता
वक्ता मना करते हैं। कामाख्या देवी की तंत्रोक्त विधियों के बारे में वे नहीं बोल पाएँगे, और उनके बारे में उन्हें भी पूछना पड़ेगा, क्योंकि ये चीज़ें सबसे उग्र श्रेणी में आती हैं। साधारण दीपदान चलेगा — अपनी समझ से स्वार्थ दीपदान करें — पर उचित वाला अलग बात है।
कामाख्या देवी के दीपदान की विधि पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि कामाख्या देवी की तंत्रोक्त विधियाँ ऐसी हैं जिनके बारे में वे नहीं बोल पाएँगे; उन्हें भी इसके बारे में पूछना पड़ेगा, क्योंकि ये सब चीज़ें सबसे उग्र श्रेणी में आती हैं। यदि आम लोगों को करना है, तो साधारण दीपदान चलेगा — आप अपनी समझ से स्वार्थ दीपदान कर सकते हैं; उसमें कोई समस्या नहीं। पर आप जो ठीक से माँग रहे हैं, कि उनकी अपनी विधि बताई जाए — वह अलग बात हो जाती है।
नारायण बलि के अगले दिन हुई मृत्यु का क्या?
बिना देखे उत्तर देने के लिए बहुत जटिल मामला
वक्ता इसे बहुत कठिन बात कहते हैं और बिना देखे उत्तर देने से मना करते हैं। वे कहते हैं, इस पर विचार करें: नारायण बलि हुई और अगले दिन वे चले गए — एक पखवाड़ा भी नहीं बीता। कोई कारण अवश्य रहा होगा; और जहाँ इतनी अकाल मृत्यु हुई हों, वहाँ प्रबल अभिचार की भी संभावना है।
एक श्रोता लिखती हैं कि नारायण बलि हुई और अगले दिन उनके ससुर की मृत्यु हो गई; कि घर में कोई तंत्र की बात है और पितृ दोष भी; कि कहीं से कोई लाभ नहीं हो रहा; और कि उनके तीन बेटे पहले ही जा चुके थे। वक्ता कहते हैं कि यह बहुत कठिन बात है। इस पर विचार करें: नारायण बलि हुई और अगले दिन वे चले गए — यानी एक पखवाड़ा भी नहीं बीता। यह भी एक बात बन गई है; कोई न कोई कारण अवश्य रहा होगा। वे कहते हैं कि यह देखने की चीज़ है, और यहाँ प्रबल अभिचार के विषय पर भी विचार किया जा सकता है, यदि इतनी अकाल मृत्यु अकाल मृत्यु हुई हैं। बिना देखे-सुने, यह न किया जा सकता है, न इस पर कुछ कहा जा सकता है।
शत्रु शांत होने पर साधना क्यों रुक जाती है?
संकट आने पर हम भगवान को याद करते हैं
वक्ता उस श्रोता से सहमत हैं जिसने यह कहा: जब शत्रु शत्रुता करता है तो हम बहुत साधना करते हैं, और जब शत्रु शांत होता है तो हमारी पूजा भी शांत हो जाती है। ठीक ही कहा गया है कि संकट आने पर हम भगवान को याद करते हैं — और यदि हम तब की साधना बनाए रखें, तो बात अद्भुत हो जाए।
वक्ता एक श्रोता से कहते हैं कि आपने ठीक लिखा है: कि जब शत्रु शत्रुता करता है तो हम बहुत साधना करते हैं, और जब शत्रु शांत हो जाता है तो हमारी पूजा भी शांत और कम हो जाती है। यह सच्ची बात है। अब शत्रु उधर से कह रहा है कि वह यह-वह करेगा — तो आप साधना में बैठेंगे, कि वह कैसे करेगा। और फिर भगवती इधर से उसे शांत कर देती हैं। और अब आप भी थोड़ा ढीला छोड़ देते हैं, क्योंकि कुछ हो ही नहीं रहा। वे कहते हैं कि तो यह सच है। यह गलत नहीं कहा गया कि संकट आने पर हम भगवान को याद करते हैं। और यदि, जब हम भगवान को याद कर रहे हैं और साधना कर रहे हैं, उसे बनाए रख सकें और स्थायी बना सकें, तो यह सबसे अद्भुत बात बन सकती है।
अधिकतर लोग इस क्षेत्र में आते ही क्यों हैं?
पंचानबे प्रतिशत ठीक इसी कारण आते हैं
पंचानबे प्रतिशत लोग ये सारी जानकारियाँ ठीक इसी कारण लेते हैं। कितनों ने जैसे-तैसे खुद का विश्लेषण करते हुए कुंडली पढ़ना सीख लिया। तंत्र में भी वैसे ही — सिद्धि के लिए पागल, यहाँ तक कि श्मशान जाकर ट्रांसफ़र से मसान लेना, पैसे देना, कुछ भी, क्योंकि शत्रु को खत्म करना है।
वक्ता कहते हैं कि इस क्षेत्र में पंचानबे प्रतिशत लोग ये सारी जानकारियाँ ठीक इसी कारण लेते हैं। कितने लोग हैं जिन्होंने जन्म कुंडली पढ़ना सीख लिया है — जैसे-तैसे, बार-बार खुद का विश्लेषण करते हुए: अरे, कुंडली में ऐसा है, वैसा है। चूँकि वे व्यवस्थित ढंग से नहीं सीख रहे, विषय कहीं भी पूरा नहीं होता; फिर भी वे प्रयास करते रहते हैं। तंत्र में भी वे ठीक इसी तरह सिद्धि के लिए पागल हैं। वे कहते हैं कि हालत यहाँ तक आ गई है: श्मशान जाकर ट्रांसफ़र से मसान लेना, उसके लिए पैसे देना — कुछ भी, बस हो जाए। और कारण क्या है? कि शत्रु खत्म हो, नष्ट हो। तो जब तक यही विषय रहेगा, यही सब चलता रहेगा। और यह स्थायी भी नहीं रहेगा; यह बस तब तक चलेगा जब तक जैसे-तैसे काम निकल जाए।
वृंदावन के शक्ति पीठों पर क्या किया जा रहा है?
यह स्थापित करना कि वृंदावन में भी जाग्रत शक्ति पीठ हैं
वृंदावन-मथुरा क्षेत्र के दो शक्ति पीठों पर अनुष्ठान, जो चैनल पर डाले गए। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि यहाँ "शत्रु" कोई व्यक्ति नहीं: यह हर वह मानसिक विरोध है जो ब्रज क्षेत्र को वैष्णव क्षेत्र कहकर उसे शक्ति क्षेत्र से अलग करने का प्रयास करता है, यह कहकर कि वहाँ शक्ति साधना होती ही नहीं।
वक्ता कहते हैं कि शत्रु को उत्तर कभी बोलकर नहीं दिया जाता; करके दिया जाता है। और वे स्पष्ट करते हैं कि यहाँ शत्रु से किसी विशेष व्यक्ति को न समझें — वे किसी का नाम नहीं ले रहे। यहाँ शत्रु का अर्थ है हर वह मानसिक विरोध जो ब्रज क्षेत्र को वैष्णव क्षेत्र कहता है और उसे शक्ति क्षेत्र से अलग करने का प्रयास करता है, यह कहकर कि वहाँ शक्ति साधना होती ही नहीं। वे कहते हैं कि वहाँ करके दिखाना होगा: देखो, पहली बात तो यह होती है; हाँ, बिल्कुल होती है; यहाँ जाग्रत शक्ति पीठ है, यहाँ ये शक्तियाँ उपस्थित हैं; यह तंत्र पीठ था। ताकि जब कोई साधक जाए — उनके परिचितों में से कोई भी, जो भी सुनता है, चाहे वे उनसे मिलें या नहीं, उन्हें मानें या नहीं — उन्हें कम से कम यह जानकारी हो कि जब हम वृंदावन जाते हैं, तो वहाँ भगवती का तैनी पीठ है; कि उस स्थान पर भगवती योगमाया का दिव्य शक्ति पीठ है, एक समय का शाक्त तंत्र केंद्र जहाँ बलि दी जाती थी, और आज भी वहाँ प्रमाण और सबूत प्रत्यक्ष उपस्थित है। उस स्थान पर भगवती चण्डिका प्रत्यक्ष उपस्थित हैं; यह शक्ति पीठ है; वहाँ भगवती के केश गिरे थे। और वे कहते हैं कि यह शक्ति संगम तंत्र, योगिनी तंत्र, राधा तंत्र आदि के प्रमाणों से सिद्ध किया जाएगा। इसकी तैयारी चल रही है।
जिन्होंने किसी कुल की बलि, भोग और नैवेद्य बंद करवाए, उस परिवार पर बाद में विपत्ति टूटने पर उन पर कोई असर नहीं पड़ता
जिन्होंने बलि बंद करवाई, परिवार बर्बाद होने पर उन्हें कुछ नहीं भुगतना पड़ता
कि लोग धीरे-धीरे भगवती की सेवा ही पूरी तरह छोड़ रहे हैं — ऐसी दशा आ गई है जिसमें अपने कुल की शक्तियों की बलि, भोग और नैवेद्य बंद कर दिए गए हैं। और जब फिर किसी घर में विपत्ति टूटती है और परिवार उजड़ जाता है, तो जिन्होंने बलि बंद करवाई उन पर उस परिवार की बर्बादी का क्या असर पड़ता है?
वक्ता कहते हैं कि यदि स्थिति ऐसी ही रही, तो यह सच्ची बात है कि लोग धीरे-धीरे भगवती की सेवा ही पूरी तरह छोड़ रहे हैं — ऐसी दशा आ गई है जिसमें अपने कुल की शक्तियों की बलि, भोग और नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। बंद कर दिए गए हैं। अब जब घर में विपत्ति टूटती है, जब एक परिवार उजड़ और बर्बाद हो जाता है, तो उस परिवार की बर्बादी से उन लोगों पर क्या असर पड़ने वाला है जिन्होंने बलि बंद करवाई? पर जो परिवार नष्ट हुआ, जो बर्बाद हुआ — उस पर तो असर पड़ा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।