कामाख्या में अंबुवाची — चार दिन, और गृहस्थ घर पर क्या करे

अंबुवाची पर्व के लिए घर पर पूजा का मार्गदर्शन।

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01

अंबुवाची क्या है, और यह विषय आम लोगों से क्यों छिपाया जाता है?

तंत्र वर्ष का महाकुंभ, जिसे गृहस्थ से दूर रखा गया

· 01:17–01:51 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इन चार दिनों को पूरे वर्ष का सबसे प्रचंड और प्रत्यक्ष सिद्धि देने वाला तंत्र पर्व कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी — यह तंत्र पर्वों का महाकुंभ है। पर आम लोगों को इस विषय से दो वाक्यों में दूर कर दिया गया है: छोड़ो, यह तंत्र-मंत्र की बात है, तुम बर्बाद हो जाओगे।

02

इन चार दिनों में गृहस्थ को वास्तव में क्या करना चाहिए?

तांत्रिक का मार्ग अलग है, पर गृहस्थ को भी विशेष पूजा करनी चाहिए

· 01:52–02:37 · Also a question

वक्ता आपत्ति करते हैं कि यह नहीं बताया जाता कि तंत्र करने वालों का मार्ग थोड़ा अलग, कठिन और विशेष है — और आम व्यक्ति, उस तरह न करते हुए भी, इन चार दिनों में भगवती की कम से कम विशेष सेवा-पूजा अवश्य करे: उनका कवच, उनके मंत्र, और जो दीक्षित हैं वे अपने दीक्षित मंत्र।

03

क्या शाक्त ग्रंथ कहते हैं कि कामरूप में केवल भगवती की ही पूजा करें?

वहाँ भगवती के साथ अपने आराध्य की भी पूजा करें

· 02:38–03:18 · Also a question

नहीं — शाक्त कभी ऐसा नहीं कहता, और शाक्त तंत्र ग्रंथ भी कभी ऐसा नहीं कहते। वहाँ यह उद्धृत मिलेगा कि भगवती की पूजा अपने आराध्य के साथ करनी है; उनकी विशेष पूजा के साथ-साथ अपने आराध्य की पूजा भी करनी है।

04

यदि दीक्षित व्यक्ति कामरूप में अपने मंत्र का जप न करे तो क्या होता है?

जो दीक्षा कामरूप तक न ले जाई गई, वह व्यर्थ है

· 03:19–03:59 · Also a question

यदि किसी भी पंथ, किसी भी तरीके, किसी भी संप्रदाय या किसी भी गुरु परंपरा से दीक्षित व्यक्ति कामरूप प्रदेश में जाए और वहाँ उस दीक्षित मंत्र का जप और पुरश्चरण न करे, तो उसकी दीक्षा व्यर्थ हो जाती है।

05

जो कामरूप पहुँचकर बैठकर अपने गुरु-प्रदत्त मंत्र का जप नहीं करता, उसे वह मंत्र और गुरु मंडल शाप देते हैं

जो वहाँ जप नहीं करता, उसे गुरु मंडल शाप देता है

· 04:00–04:37

कि यदि कामरूप प्रदेश आकर आप वहाँ बैठकर — नीलाचल पर्वत के पास, सौभाग्य कुंड के पास, ब्रह्मपुत्र के पास — अपने गुरु के देवता-मंत्र का जप नहीं करते, तो वह मंत्र और आप तक आई गुरु परंपरा, वह गुरु मंडल, आपको शाप देते हैं। यह देवी पुराण महाभागवत और शक्ति संगम तंत्र में है।

06

कामरूप क्षेत्र स्वयं साधना में क्या अंतर लाता है?

कामरूप हर शक्ति का मूल क्षेत्र है

· 04:38–05:14 · Also a question

क्योंकि उसे सब कुछ का उत्पत्ति क्षेत्र, उत्पत्ति का कुंड माना जाता है, वह केंद्र जहाँ से सब प्रकाशित होता है और सब फलता-फूलता है — जितनी भी शक्तियाँ हैं उन सबका केंद्र। तो कौन सी शक्ति होगी जो उस स्थान पर अपनी पौष्टिक पूजा और हवन न चाहे?

07

कामरूप ले जाए गए किसी छोटे या दूर के देवता का क्या होता है?

दूर का भैरव देवी के सूक्ष्म लोक में प्रवेश कर पुष्ट होता है

· 05:15–06:51 · Also a question

उनका उदाहरण: किसी विशेष भैरव मंत्र का साधक — कोई ऊँचे भैरव नहीं, बल्कि दूर के क्षेत्र के लोक देवता, पूर्वांचल नहीं बल्कि राजस्थान की ओर के। जब वह कामरूप में वह जप करके उनका आवाहन करता है, तो वह देवता भगवती के सूक्ष्म कामरूप लोक में प्रवेश करते हैं, उनकी निकटता से स्वयं पुष्ट और सक्षम होते हैं, और फिर साधक पर अत्यधिक कृपा करते हैं।

08

कामरूप में पितरों और कुल देवताओं के लिए क्या करना चाहिए?

कभी खाली हाथ न लौटें — त्रिपिंडी करें, या मछलियों को खिलाएँ

· 06:52–07:28 · Also a question

वहाँ अपने आराध्य, अपने देवता, अपने कुल की शक्तियों और अपने कुल के पितरों, सबके लिए पूजा करें। पितरों के लिए दान दें; यदि ब्रह्मपुत्र में पिंड करवा सकें तो त्रिपिंडी करें। यदि नहीं, तो वहाँ बैठकर मछलियों के लिए दाना डालें, या दान दें, या सामर्थ्य अनुसार तर्पण करें।

09

महामुद्रा का दर्शन कौन कर सकता है?

महामुद्रा का दर्शन और स्पर्श निषिद्ध है

· 07:29–08:05 · Also a question

निषेध महामुद्रा के दर्शन पर है। जहाँ गुरु की कृपा और गुरु की आज्ञा है, वहाँ बात अलग है; यदि आप विवाहित हैं तो बात अलग है; यदि आप शाक्त दीक्षित हैं और गुरु की आज्ञा है, या आपका शाक्त अभिषेक हो चुका है, तो बात अलग है। अन्यथा दोष लगता है, क्योंकि वह माँ की महामुद्रा है।

10

युवाओं के लिए महामुद्रा का दर्शन निषिद्ध क्यों है?

उच्छिष्ट गणपति का उदाहरण — उस ऊर्जा को धारण करने की क्षमता

· 08:06–09:04 · Also a question

वक्ता उच्छिष्ट गणपति के स्वरूप का उदाहरण देते हैं: पंद्रह या बीस वर्ष का युवक वह स्वरूप देखकर किस दशा में होगा — वह चिंतन उसके मन से कभी नहीं जाएगा और वह पूजा में कभी एकाग्र नहीं हो पाएगा। वे स्वरूप तांत्रिक विधि से उन लोगों के लिए हैं जिनमें मूलाधार को रोकने और ऊर्जा को ऊपर ले जाने की क्षमता है।

11

कामरूप संसार की हर प्रकार की ऊर्जा का केंद्र-बिंदु है, इसलिए वहाँ अनधिकार प्रयास करना कठिनाई लाता है

संसार की हर प्रकार की ऊर्जा का केंद्र

· 09:05–10:00

कि इस पूरे संसार की हर प्रकार की ऊर्जा का केंद्र-बिंदु, एक तरह से, कामरूप प्रदेश है, भगवती कामाख्या का क्षेत्र। यदि आप वहाँ जाकर वह करने का प्रयास करते हैं जिसके आप अधिकारी नहीं हैं, तो कठिनाई होगी। महामुद्रा का दर्शन और उसका स्पर्श निषिद्ध है — उस स्थान पर नहीं जाना चाहिए।

12

कामाख्या में महामुद्रा दर्शन के अलावा क्या किया जा सकता है?

शिखर दर्शन और परिक्रमा — और वहाँ कोई आपको रोकेगा नहीं

· 10:01–11:11 · Also a question

आप कामरूप प्रदेश बिल्कुल जा सकते हैं। शिखर दर्शन करें, मंदिर की परिक्रमा करें; महामुद्रा दर्शन के अलावा, पीने के लिए जो जल है वह आपके साथ के गुरु-भाई या बड़े आपको दे सकते हैं। यह जानकारी लेकर जाएँ कि आपको दर्शन कैसे नहीं करना है।

13

क्या बच्चों पर भी यही निषेध लागू होता है?

तेरह वर्ष से कम के बच्चों को कोई विशेष दोष नहीं लगता

· 11:12–11:51 · Also a question

माता-पिता के साथ जाने वाले मासूम बच्चे, जिन्हें इन विषयों की कोई जानकारी नहीं, कोई विशेष दोष नहीं पाते — तेरह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए वैसे भी क्षमा है। पंद्रह-सोलह वर्ष का वह किशोर, जो जानता है कि वह कहाँ जा रहा है, उसकी बात अलग है।

14

आयु की इस रोक के पीछे क्या कारण है?

हार्मोन वाला तर्क — ऊर्जा सहन नहीं होगी

· 11:52–12:58 · Also a question

अपना चौदहवाँ-पंद्रहवाँ वर्ष याद करें — हार्मोन कितनी तेज़ी से बदलते थे, विपरीत लिंग की ओर कैसे खिंचाव था, लगभग बेहोशी जैसी दशा। तो सोचिए, ऐसे व्यक्ति की ऊर्जा उस क्षेत्र में जाकर कितनी बढ़ेगी, और यदि वह काम के वेग को सहन नहीं कर पाया तो गलतियाँ और अपराध होंगे और लड़का बर्बाद हो जाएगा।

15

यदि कोई केवल घूमने के लिए कामाख्या जाए तो क्या होता है?

घूमने वाले में क्षमा माँगने का भाव ही नहीं बचता

· 12:59–13:53 · Also a question

यदि भगवती के प्रति आपका भाव समर्पण का है और आप साधना के लिए गए हैं और मंत्र जप कर रहे हैं, तो वहाँ आपके लिए क्षमा है, रक्षा है, विजय है। यदि आप घूमने गए, तो गलती होने पर आपके भीतर क्षमा माँगने का भाव भी नहीं होगा — और वहीं से कठिनाई शुरू होती है।

16

कामरूप में गलती के बाद बहुत से लोग बर्बाद दशा में पहुँच जाते हैं और किसी से इसकी बात नहीं करते

वह दशा जिसकी कोई बात नहीं करेगा

· 13:54–14:48

नहीं। उनका चित्र: दक्षिण भारतीय फ़िल्में जहाँ भूत आदमी को पीछे से फाड़ देता है — आदमी सामने से पूरा सूटेड-बूटेड खड़ा है, और पीछे से फटा हुआ। वे कहते हैं कि बहुत से लोग उस दशा में पहुँचते हैं और बताते नहीं, क्योंकि उनके स्वाभिमान को ठेस लगती है।

17

कामाख्या में कौन-कौन सी शक्तियाँ उपस्थित हैं?

दस महाविद्याएँ, आठ भैरव, और भैरव रूप में विनायक

· 14:49–15:58 · Also a question

वहाँ अनगिनत शक्तियाँ हैं, पर मुख्य रूप से दस महाविद्याएँ, और भगवती की प्रमुख महामुद्रा के पास विराजमान आठ प्रमुख भैरव। और बारह विनायक — कामरूप प्रदेश में विनायक भी भैरव रूप में उपस्थित हो जाते हैं, अपनी शक्तियों, वैनायकी, के साथ।

18

चौंसठ योगिनियों का महावरण क्या है?

चौंसठ योगिनियाँ, चौंसठ भैरव और चौंसठ सिद्धि गणपति

· 15:59–16:48 · Also a question

महायंत्रों में, जहाँ चौंसठ योगिनियों की पूजा होती है, उनके साथ चौंसठ भैरवों की पूजा होती है — लोग जिन बावन को जानते हैं वे नहीं — और उनके साथ सिद्धि रूप में चौंसठ गणपति। सिद्धि यानी गणपति; तो सिद्धि महागणपति, सिद्धि क्षिप्र महागणपति, हर नाम के आगे सिद्ध शब्द जुड़ता है।

19

कामाख्या मंडल को महाचक्र क्या बनाता है?

छह मुख वाली कामाख्या और दोहरा षट्कोण आवरण

· 16:49–18:07 · Also a question

सामान्यतः षट्कोण में छह महादुर्गाओं की पूजा होती है। पर कामाख्या का अपना प्रमुख स्वरूप छह मुख वाला है — इसलिए उस महादुर्गा मंडल में दोहरी आवरण पूजा होती है, साथ में छह अलग भैरव; और प्रमुख स्थान पर भगवती कामाख्या की उमानंद भैरव के साथ पूजा होती है। इसीलिए वह महाचक्र बन जाता है।

20

जिस साधक को आवरण का ज्ञान नहीं, वह अंबुवाची में किन स्वरूपों की पूजा करे?

दो स्वरूप — कामाख्या, और जो भी आपके अपने आराध्य हैं

· 18:08–19:02 · Also a question

दो स्वरूप, क्योंकि दो तो हम जानते ही हैं: भगवती का स्वरूप और भैरव का स्वरूप — और इसी एक से अनेक हुए; मूल यही शक्ति है। तो दो को साथ ले जाएँ: भगवती कामेश्वरी कामाख्या, और आप जिनकी भी उपासना करते हैं, शिव, दुर्गा, कृष्ण, नारायण, गायत्री, बगलामुखी, त्रिपुरसुंदरी का कोई भी स्वरूप।

21

अंबुवाची काल पूजी जा रही शक्ति पर क्या प्रभाव डालता है?

किसी भी शक्ति को प्रभावी और जाग्रत करने का केंद्र-काल

· 19:03–19:58 · Also a question

समझ लीजिए कि अंबुवाची पर्व का समय उन सभी शक्तियों को विशेष प्रभावी बनाने, जाग्रत करने और उग्र करने का केंद्र-काल है, जिन्हें लोग जगा रहे हैं और जिनकी सेवा कर रहे हैं। यदि आप कवच का पाठ कर रहे हैं — तांत्रिक पक्ष को अलग रखें; हर किसी की अपनी परंपरा है और हमें उसमें जाने की ज़रूरत नहीं।

22

पार्वती गीता समय की कमी के बारे में क्या कहती है?

जीवन पत्ते पर ओस की बूँद है

· 19:59–20:48 · Also a question

पार्वती गीता में भगवती कहती हैं कि जीवन क्षणिक है — जैसे पत्ते पर पानी की बूँद, ओस की बूँद। वह कब फिसलकर नीचे गिर जाए, पता भी नहीं चलेगा। पत्ता समय है और उस पर की बूँद हम हैं; हम किसी भी क्षण फिसल सकते हैं।

23

अंबुवाची वास्तव में कितने दिन चलती है?

पूरा गिनें तो छह दिन; प्रमुख चार

· 20:49–21:38 · Also a question

पूरा लें तो समय 21 तारीख की रात बारह बजे से 26 तारीख की भोर तक मानें — छह दिन। पर प्रमुख चार हैं: 22, 23, 24 और 25 तारीख। 25 की रात से सारा श्रृंगार और पूजा शुरू हो जाती है, और फिर 26 की सुबह तीन बजे से।

24

घर पर किस स्वरूप की पूजा कामाख्या के रूप में करें?

भगवती का जो भी स्वरूप आप पहले से रखते हैं — मूल तत्व सबमें है

· 21:39–22:33 · Also a question

भगवती का जो भी स्वरूप आपने घर में स्थापित किया है और जिसकी सेवा करते हैं — भले ही वह केवल फ़ोटो या प्रतीक हो, बस उसमें आपका भाव भगवती का हो — उसी में भगवती कामाख्या की पूजा करें। क्योंकि मूल तत्व उन सबमें विराजमान है।

25

दस महाविद्याएँ उनके एक स्वरूप में क्यों आ जाती हैं?

सृष्टि की सारी अनंत शक्तियाँ उनके एक स्वरूप में एकत्र हैं

· 22:34–23:18 · Also a question

क्योंकि भगवती कामरूप कामाख्या ऐसा स्वरूप हैं कि उनमें दसों महाविद्याओं की पूजा की जा सकती है — उनके एक स्वरूप में पूरी सृष्टि की सारी अनंत शक्तियाँ समाई हैं। और इसी कारण हर स्त्री तत्व के भीतर कामाख्या तत्व उपस्थित है।

26

क्या कोई महामुद्रा का दर्शन करता भी है?

कोई दर्शन नहीं करता — पर देवी स्वप्न में अपना पूरा स्वरूप दिखाती हैं

· 23:19–24:08 · Also a question

कामरूप प्रदेश में ऐसा कोई नहीं जो महामुद्रा स्वरूप का दर्शन कर सके — इसे सत्य जानें। उस स्वरूप का दर्शन सबके लिए निषिद्ध है। पर वक्ता का अपना अनुभव है कि जिन पर माँ कृपा करती हैं, उन्हें वे स्वप्न में अपना पूरा स्वरूप दिखाती हैं, इतना स्पष्ट कि व्यक्ति उसे भूल नहीं पाता।

27

गुटिका पूजा क्या है?

चाँदी की गुटिका और सबसे दुर्लभ सोने की गुटिका

· 24:09–25:18 · Also a question

एक परंपरा अब भी है जिसमें गुटिका पूजा होती है। जिन साधकों की परंपरा में यह पूजा है, उन्हें चाँदी की गुटिका मिलती है; सोने की गुटिका सबसे दुर्लभ है। और जिन्हें वह मिलती है वे भी, वक्ता की जानकारी में, केवल गुफा का बाहरी श्रृंगार करते हैं, महामुद्रा का स्पर्श या पूरा दर्शन नहीं।

28

केवल कामरूप जाने से क्या प्राप्त होता है?

वहाँ जाने भर से सिद्धि के मार्ग खुल जाते हैं

· 25:19–26:17 · Also a question

केवल नीलाचल पर्वत के पास जाने से, केवल कामरूप प्रदेश जाने से — वह सिद्ध क्षेत्र है, और सिद्धि पाने के मार्ग खुल जाते हैं। कामाख्या का अर्थ है कामनाओं की पूर्ति: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में, वे मोक्ष से पहले आने वाला काम हैं, और उसके बाद ही वे मोक्ष का मार्ग खोलती हैं।

29

अंबुवाची शुरू होने से पहले क्या तैयारी की जाती है?

चार दिन के नैवेद्य के लिए फल, मेवा और शहद

· 26:18–26:58 · Also a question

अंबुवाची शुरू होने से पहले 21 तारीख को पूरी तैयारी कर लें। इन चार दिनों में माँ को जितना हो सके फल, मेवा और शहद नैवेद्य के रूप में अर्पित करें।

30

अंबुवाची की पहली सुबह क्या किया जाता है?

सूर्योदय से पहले हर आभूषण और वस्त्र उतार दें

· 26:59–27:58 · Also a question

22 तारीख की सुबह, भोर में, हो सके तो सूर्योदय से पहले: आपका जो भी सेवा-विग्रह है — महाकाली का, दुर्गा का, कोई भी — उससे पहले से पहनाए गए वस्त्र, सारी सोने की चेन, कान, नाक, हाथ में जो कुछ है, पायल, मुकुट, सब उतार दें।

31

विग्रह को कैसे ढका जाता है?

गले तक नया लाल कपड़ा, आभूषण सँभालकर रखें, थोड़ी दूरी पर दीपक

· 27:59–28:48 · Also a question

उतारने के बाद माँ के पूरे शरीर को नए लाल कपड़े से अच्छी तरह ढक दें — उनका विग्रह किसी भी स्वरूप का हो, बगलामुखी का भी — ठीक गले तक। फिर उन्हें उनके स्थान पर विराजमान करें, आभूषण एक साथ किसी अच्छी जगह रखें, और उनके सामने थोड़ी दूरी पर दीपक जलाएँ।

32

क्या चार दिन पूजा स्थान बंद रखना चाहिए?

अपनी परंपरा का पालन करें; नए लोग केवल लाल कपड़े से ढकें

· 28:49–29:48 · Also a question

जिनके घर में पूजा स्थान बंद करने की परंपरा पहले से चलती है — जहाँ जाग्रत पीठ रखा है, या कामाख्या या काली कुलदेवी हैं और मंदिरों की तरह चार दिन दरवाज़े बंद होते हैं — वे अपने नियम का पालन करें। नए लोग यह नियम न अपनाएँ; वे 22 तारीख से केवल लाल कपड़े से ढकें।

33

अंबुवाची के चार दिनों में क्या अर्पित किया जाता है?

हल्की सुगंधित माला, पौष्टिक नैवेद्य, और इष्ट न बदलें

· 29:49–30:28 · Also a question

चाहें तो चारों दिन रोज़ सुगंधित माला अर्पित कर सकते हैं — साधारण माला नहीं, बल्कि छोटी सुगंधित माला, ताकि उन पर भार न हो। और जितनी हो सके पौष्टिक सामग्री नैवेद्य के रूप में अर्पित करें। पर अपने आराध्य या इष्ट को कभी न बदलें।

34

क्या अंबुवाची में व्रत रखा जाता है?

व्रत नहीं — पर जो कवच आप पहले से पढ़ते हैं उसका पुरश्चरण

· 30:29–31:18 · Also a question

इन चार दिनों में व्रत नहीं रखना है — पर जप अवश्य करना है। आप जो भी कवच पढ़ते आए हैं — महाभैरव माला मंत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच, भगवती कालिका का कवच — इन चार दिनों में उसी कवच का पुरश्चरण करें, हर दिन सौ पाठ पूरे करें।

35

इन चार दिनों के लिए कौन सा कवच सबसे अच्छा है?

चार दिनों में कामाख्या कवच के ग्यारह सौ पाठ

· 31:19–32:08 · Also a question

कामाख्या कवच — सबसे अद्भुत और सबसे तीव्र, जो अपने भीतर दस महाविद्याओं के स्वरूप रखता है, और सबके लिए, विशेषकर स्त्रियों के लिए उत्तम है। इन चार दिनों में इसे जितनी अधिक मात्रा में हो सके पढ़ें: अपनी क्षमता सौ से आगे दो सौ की ओर बढ़ाएँ, सुबह और शाम, और चार दिनों में ग्यारह सौ पूरे करें।

36

जो मंत्र कभी फलित नहीं हुआ, उस पर ये चार दिन क्या करते हैं?

कभी जाग्रत न हुआ मंत्र, और उसे लगने वाले दोष

· 32:09–33:08 · Also a question

एकाक्षरी का जप करने वालों के लिए ये चार दिन उसे दृढ़ और सिद्ध करने के लिए हैं। जहाँ कोई मंत्र कभी जाग्रत नहीं होता, सिद्ध नहीं होता और कितना भी पुरश्चरण करें कोई अनुभव नहीं देता — मंत्र को कई प्रकार के दोष लगते माने जाते हैं, जैसे जब लोग अपनी ओर से प्रणव जोड़ देते हैं — ये चार दिन, भगवती की पूजा के साथ, उनसे मुक्ति दिलाते हैं।

37

जप के समय क्या धारण करना चाहिए?

शरीर पर रुद्राक्ष या लाल चंदन की माला, क्योंकि ऊर्जा कई गुना होती है

· 33:09–33:58 · Also a question

इस समय साधक, पुरुष हो या स्त्री, शरीर पर रुद्राक्ष की माला या लाल चंदन की माला पहनकर ही जप करे। क्योंकि इस समय ऊर्जा सामान्य दिनों से कई गुना अधिक होती है — सौ गुना नहीं, बल्कि कई-कई गुना — और भगवती अपने सबसे उग्र स्वरूप में होती हैं।

38

इन चार दिनों में स्त्रियों के प्रति किस बात से बचना चाहिए?

रजस्वला स्त्री स्वयं कामाख्या है — उसकी सेवा करें, उसका अपमान न करें

· 33:59–34:58 · Also a question

जीवन में कभी भी ऐसा नहीं करना चाहिए, पर इन चार दिनों में विशेष रूप से स्त्रियों और माताओं के अपमान से बचें। और यदि उस समय कोई स्त्री रजस्वला हो, तो उसे उस समय भगवती कामाख्या का ही स्वरूप जानें। उन चार दिनों उसकी सेवा करें, उससे आपका जो भी संबंध हो, और आपमें छुआछूत का कोई भाव न हो।

39

इन दिनों में रजस्वला स्त्री स्वयं क्या करे?

एक स्थान पर रहें — क्षुद्र शक्तियों के प्रयोगकर्ता उसके माध्यम से काम कर सकते हैं

· 34:59–35:48 · Also a question

वह एक स्थान पर स्थिर रहे, ज़्यादा घूमे-फिरे नहीं। क्योंकि क्षुद्र शक्तियों का प्रयोग करने वाले इस समय उन्हें जगाते हैं, और यदि उन्हें किसी तरह किसी रजस्वला स्त्री का पता चल जाए, तो वे उसके माध्यम से बहुत तेज़ी से अपने सबसे विशेष तंत्र प्रयोग करने में सक्षम हो जाते हैं।

40

क्या स्त्री को इन दिनों अपनी माहवारी में पूजा करने की ज़िद करनी चाहिए?

उस समय की गई पूजा बड़ी दुर्गति का कारण बनती है

· 35:49–36:44 · Also a question

नहीं — और वक्ता उस ज़िद का नाम लेते हैं जिसका वे उत्तर दे रहे हैं: मैं रजस्वला हूँ, तो क्या, मैं फ़ेमिनिस्ट हूँ, मैं मॉडर्न हूँ, मैं जाकर पूजा करूँगी, मैं मंदिर जाऊँगी, मुझे कोई नहीं रोक सकता। वे कहते हैं कि इस समय की गई पूजा दुर्गति का, महा दुर्गति का कारण बनेगी। ऐसी गलती बिल्कुल न करें।

41

इन दिनों तंत्रोक्त रुद्राक्ष या विग्रह के साथ क्या करना चाहिए?

चार दिन तंत्रोक्त स्वरूपों पर सहस्रार्चन

· 36:45–37:38 · Also a question

जिनके पास तंत्रोक्त रुद्राक्ष है — गुरु परंपरा से या अन्यथा मिला — वे इन चार दिनों में उस पर सहस्रार्चन अवश्य करें। सहस्रार्चन का अर्थ है सहस्रनामावली के साथ फूल आदि अर्पित करना। कम से कम चार दिन करें।

42

क्या इस पूजा के साथ कोई कामना जोड़नी चाहिए?

केवल एक कामना, पचास नहीं — और कामना के साथ पूजा करें, उसके बिना नहीं

· 37:39–38:18 · Also a question

हाँ — इस समय कामना के साथ पूजा करें; ऐसा नहीं कि न करें। पर पचास तरह की कामनाओं के बजाय एक प्रमुख कामना लें, उसी एक का संकल्प करें, और उसके साथ चारों दिन पूजा और अर्चना करें।

43

इस समय घर का यंत्र क्यों महत्व रखता है?

सिद्ध पीठ में जो होता है, वह आपके पूजा स्थान में छोटे रूप में होता है

· 38:19–38:48 · Also a question

क्योंकि उस समय अधिक से अधिक शक्तियाँ अंश रूप में अपने यंत्र और स्थान में अवश्य विराजमान हो जाती हैं। प्रमुख सिद्ध पीठ में जो हो रहा है, वही हम अपने नित्य पूजा कक्ष में, अपने घर में धारण कर रहे हैं — इसलिए वहाँ भी सूक्ष्म रूप में वही होता है।

44

अर्चना में क्या उपयोग किया जा सकता है?

कुमकुम, फूल, मेवा — या सामर्थ्य हो तो सिक्के

· 38:49–39:58 · Also a question

आप कुमकुम से, फूलों से अर्चना कर सकते हैं। जहाँ अन्न की बात हो, वहाँ किशमिश से, काजू से, मखाने से अर्चना करें — जो भी जुटा सकें। और यदि आप धन-कुबेर हैं, तो चाँदी के सिक्कों से, सोने के सिक्कों से, पाँच सौ और दो हज़ार के नोटों से अर्चना करें — पर बंद हो चुके नोट से नहीं।

45

अनुष्ठान के बाद अंबुवाची के अर्पण का क्या किया जाता है?

फूल और सिक्के सँभालकर रखें — उनका विसर्जन न करें

· 39:59–40:58 · Also a question

इन चार दिनों की अर्चना में उपयोग हुए फूल, लौंग और इलायची सँभालकर रखें; उन्हें फेंकें नहीं और उनका विसर्जन न करें। घर के सदस्य पूजा के बाद रोज़ खाली पेट थोड़ा खाएँ, या उन्हें कवच में भरकर धारण करें। और सोना, चाँदी या सिक्के लाल कपड़े में बाँधकर रखें — कभी विसर्जन न करें, कभी हटाएँ नहीं।

46

क्या इन दिनों किसी बाहरी तांत्रिक को घर में आने देना चाहिए?

चार दिनों में घर में कोई बाहरी तंत्रोक्त अनुष्ठान नहीं

· 40:59–41:58 · Also a question

इन चार दिनों में आपके घर के भीतर किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा कोई तंत्रोक्त अनुष्ठान नहीं होना चाहिए। आपके अपने गुरु आकर करें तो बहुत अच्छा, या जिन पर आपका अंधा विश्वास हो — पर कोई नया व्यक्ति, या कोई जो आपसे द्वेष रखता हो और विधियाँ जानता हो, वहाँ अपनी ऊर्जा खींच लेगा और हस्तक्षेप करेगा।

47

अंबुवाची पर्व काल कितना खतरनाक है?

ये चार दिन आपको बना भी सकते हैं और नष्ट भी कर सकते हैं

· 41:59–42:38 · Also a question

यह बहुत संवेदनशील समय है। इस समय शक्तियाँ इतनी उग्र और जाग्रत हो जाती हैं कि यदि वे कृपा करना चाहें तो इन चार दिनों में आपको बना सकती हैं — और यही चार दिन आपका विनाश और आपकी दुर्गति भी ला सकते हैं। इन चार दिनों में इतनी क्षमता है।

वक्ता कहते हैं कि यह पर्व काल बहुत संवेदनशील समय है। इस समय शक्तियाँ इतनी उग्र और जाग्रत हो जाती हैं कि यदि वे कृपा करना चाहें, तो इन चार दिनों में आपको बना सकती हैं। और यही चार दिन आपका विनाश, आपकी दुर्गति भी ला सकते हैं। इन चार दिनों में इतनी क्षमता है।

48

जिसका कोई अभ्यास ही नहीं, वह क्या करे?

सप्ताक्षरी या जयंती मंगला काली, या कोई चालीसा

· 42:39–43:38 · Also a question

जो कुछ नहीं कर रहे, सामान्य ढंग से चल रहे हैं, वे इन दोनों में से कम से कम एक करें: भगवती पार्वती का सप्ताक्षरी मंत्र, या जयंती मंगला काली। नहीं तो दुर्गा सप्तश्लोकी, दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम, दुर्गा चालीसा, विंध्यवासिनी चालीसा, बगलामुखी या भैरव का अष्टोत्तर शतनाम, संकट नाशन, हनुमान चालीसा या बजरंग बाण।

49

पर्व काल में कमाए तपोबल का क्या करना चाहिए?

उसे सँभालें — उससे कभी किसी के लिए संकल्प न लें

· 43:39–44:38 · Also a question

उसे सँभालना सीखें। पर्व काल में — नवरात्रि, शिवरात्रि, अंबुवाची पर्व, भादों अमावस्या, चतुर्दशी, तारा अमावस्या — आप जो भी जप और तप करते हैं, उससे कभी संकल्प लेकर किसी के लिए कुछ न करें, जब तक प्राण ही संकट में न हों। उसे अच्छी तरह जमा करें, और उसके ब्याज का उपयोग करें।

50

जमा किया और कभी किसी पर खर्च न किया गया तपोबल बाद के प्रयोग को तुरंत असर देने वाला बनाता है

सँभाला हुआ तपोबल अलग प्रयोग को तुरंत असरदार बनाता है

· 44:39–45:38

मान लीजिए आपने अंबुवाची में पार्वती के सप्ताक्षरी की चार-पाँच सौ माला कीं। उसे जमा करें; कभी किसी के लिए उसका उपयोग न करें, केवल भगवती की प्रसन्नता और अपने तपोबल की वृद्धि के लिए। फिर जब प्रयोग की ज़रूरत हो, तो कोई साबर मंत्र अलग से जगाकर उसका उपयोग करें — और वह तुरंत असर करेगा, क्योंकि तपोबल सुरक्षित है।

51

सँभाले हुए तपोबल को क्या नष्ट कर देता है?

उसके बाद मांस और शराब, और आप न इधर के रहते हैं न उधर के

· 45:39–45:58 · Also a question

यदि उस समय आप दूसरी चीज़ें शुरू कर दें — मांस और शराब लेने लगें, गलत काम शुरू कर दें — और फिर प्रयोग करें, तो आप न इधर के रहेंगे न उधर के। वक्ता के अपने शब्दों में: कट गया।

वक्ता कहते हैं कि पर अब यहाँ आपने दूसरे विषय शुरू कर दिए — मांस और शराब का सेवन करने लगे। आपने गलत काम शुरू कर दिए, और उसके बाद प्रयोग करते हैं: तो आप न इधर के रहते हैं न उधर के। फिर वही बात हो जाती है — आई लव यू, पर एक दोस्त की तरह। वे कहते हैं कि यहाँ भी आपका कट गया। तो इस पर ध्यान रखें।

52

अंबुवाची समाप्त होने की सुबह क्या किया जाता है?

26 तारीख को सूर्योदय से पहले लाल कपड़ा हटाया जाता है

· 45:59–47:08 · Also a question

जब चार दिनों की पूजा पूरी हो जाए, तो 26 तारीख की सुबह, भोर में, सूर्योदय से पहले ही, भगवती के स्वरूप पर आपने जो लाल कपड़ा डाला था वह हटाना है — और वह कपड़ा सँभालकर रखना है।

वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा, जब 25 तारीख तक चार दिनों की पूरी पूजा पूर्ण हो जाए — उसके बाद, 26 तारीख को, सुबह भोर में, सूर्योदय से पहले ही, भगवती के जिस स्वरूप पर आपने लाल कपड़ा डाला था, वह लाल कपड़ा उस समय हटाना है। और कपड़ा सँभालकर रखना है; उसका क्या करना है यह वे थोड़ी देर में बताएँगे।

53

यदि मूर्ति पर कपड़े पहनाना-उतारना गलत लगे तो?

ऐसा विग्रह चुनें जिसमें वस्त्र बने हों, ताकि भाव कभी गलत न हो

· 47:09–48:08 · Also a question

तो ऐसा न करें — इसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं। यह सवाल आजकल चलन में आए श्रृंगारिया विग्रह के कारण उठता है, जिसमें कोई वस्त्र तराशा ही नहीं गया, इसलिए कपड़ा हटाने पर लगता है कि देवता ने कुछ नहीं पहना। ऐसा विग्रह लें जिसमें वस्त्र बना हो, ताकि किसी भी स्थिति में आपका भाव कभी गलत न हो।

54

पाँचवें दिन देवी को स्नान और श्रृंगार कैसे कराया जाता है?

सुगंधित जल, पत्थर पर घिसा चंदन, और पूरा श्रृंगार

· 48:09–49:08 · Also a question

उन्हें सुगंधित जल से अच्छी तरह स्नान कराएँ — कच्चा दूध, गुलाब जल, अगरु और केवड़ा जल मिलाकर सुगंधित करके — कुमकुम और हल्दी के साथ; फिर पत्थर पर चंदन घिसकर गंधानुलेपन करें; फिर जल से स्नान कराकर वस्त्र आदि के साथ सुंदर श्रृंगार करें।

55

अंबुवाची अनुष्ठान का समापन किससे होता है?

चार दिनों के जप का हवन, तर्पण और मार्जन, और कन्या पूजन

· 49:09–50:06 · Also a question

नैवेद्य और आरती के बाद, हो सके तो चार दिनों के जप का हवन करें — एक माला ही सही, यदि आपने रोज़ सौ की थीं और अब दस संभव न हों। तर्पण और मार्जन करें; कन्या पूजन की व्यवस्था हो सके तो करें; न हो तो एक जगह का पूरा भोजन गाय को दें, और कन्याओं के नाम से किसी देवी मंदिर में दान करें।

56

कैसा संकल्प कभी नहीं लिखना चाहिए?

मारण के संकल्प जो लोग सच में भेजते हैं

· 50:07–52:07 · Also a question

वक्ता बिना नाम लिए पढ़कर सुनाते हैं कि उन्हें क्या भेजा गया है: एक व्यक्ति का नाम और उसके पिता का नाम, इस अनुरोध के साथ कि इस आदमी के शीघ्र मारण का संकल्प किया जाए। वे कहते हैं कि संकल्प में ऐसी बातें लिखी जा रही हैं — द्वेष की यह दशा आ गई है।

57

नुकसान पहुँचाने वाले व्यक्ति के विरुद्ध संकल्प में क्या माँगना चाहिए?

उचित दंड माँगें, मारण नहीं

· 52:08–53:27 · Also a question

कि यह व्यक्ति इस तरह नुकसान पहुँचा रहा है, धर्म के विरुद्ध काम कर रहा है — प्रभु, इसे उचित दंड दें। संकल्प यही होना चाहिए। महाभैरव आदि के प्रयोगों में शत्रु का नाम और गोत्र होता है, पर उसके मारण का संकल्प कभी न लें।

58

वृंदावन के एक साधक ने स्वयं कोई प्रयोग नहीं किया, और डेढ़ साल बाद उसके मंत्र के देवता ने वही नुकसान उसके शत्रुओं पर लौटा दिया

वृंदावन का मामला — मंत्र के देवता ने न्याय किया और बात पलट दी

· 53:28–54:47

उनका उदाहरण: वृंदावन क्षेत्र का एक आदमी, जो शुरू में पूरी तरह परेशान था, लगभग डेढ़ साल से साधना कर रहा है। आज उसके साथ जो होता था, वही उसके शत्रुओं के घर में हो रहा है, हूबहू वैसा ही। उसने कोई तंत्र विद्या नहीं की — केवल महाभैरव, भूतेश्वर महादेव मंदिर में पाठ करते हुए।

59

व्यक्ति स्वयं मारण प्रयोग कब कर सकता है?

केवल उपसंहार विद्या के साथ — नहीं तो अंत अश्वत्थामा जैसा होता है

· 54:48–55:57 · Also a question

स्वयं तभी करें जब आपमें क्षमता हो, और सबसे बढ़कर जब आपके पास उपसंहार विद्या हो। यदि आपको उसे वापस लेने का ज्ञान नहीं और आप मारण करते हैं, तो अश्वत्थामा की दशा याद रखें — आप सड़ जाएँगे। उसने ब्रह्मास्त्र चलाया और उसके पास उसे लौटाने की विद्या नहीं थी।

60

किसी व्यक्ति के विरुद्ध प्रयोग कब अधर्म होता है?

समूह के लिए प्रार्थना एक बात है; जिसने कभी नुकसान नहीं किया उसका नाम लेना दूसरी

· 55:58–56:47 · Also a question

जहाँ किसी व्यक्ति ने आपको प्रत्यक्ष नुकसान नहीं पहुँचाया — गाली नहीं दी, आपकी बहन या बेटी को कुछ नहीं कहा, और अपने रास्ते चल रहा है — वहाँ यदि आप विधर्मियों के विनाश की प्रार्थना करें तो सामूहिक रूप से करेंगे, किसी व्यक्ति का नाम लेकर नहीं। उसका उपयोग उस पर करें जहाँ सच में ऐसी बात हो।

61

शत्रु के बच्चे की मृत्यु माँगने वाले संकल्प का क्या?

यदि वह संकल्प लिया जाए और बच्चा मर जाए तो दोष किसे लगेगा

· 56:48–57:57 · Also a question

वक्ता ऐसा एक संकल्प बताते हैं: कि फलाना, जिसने मुझे इस तरह नुकसान पहुँचाया, उसका बच्चा जल्दी मृत्यु को प्राप्त हो। वे पूछते हैं कि ऐसा संकल्प लिखने वाले आदमी में कितना द्वेष है — और यदि वह संकल्प लिया जाए और बच्चा सच में मर जाए, तो उसका दोष किसे लगेगा?

62

शत्रु के विनाश के बजाय क्या माँगना चाहिए?

अपनी सामर्थ्य माँगें — कि वह आपसे आँख न मिला सके

· 57:58–59:17 · Also a question

आप क्यों नहीं कहते कि हमें सक्षम बनाओ। संकल्प में क्यों नहीं लिखते कि हमें मंत्र की सिद्धि मिले, भगवती की कृपा आए, हम सक्षम बनें — कि आपकी क्षमता इतनी बढ़े कि वह आपके सामने खड़े होने की हिम्मत न करे, आपका आंतरिक तेज इतना बढ़े कि वह आपसे आँख न मिला सके।

63

क्या शत्रु को दंड देना कभी कर्तव्य होता है?

हाँ — पर दंड धर्म के भीतर दिया जाना चाहिए

· 59:18–1:00:17 · Also a question

ऐसा समय आता है जब कोई दूसरी ओर से नुकसान पहुँचाता है, और तब उसे दंड देना अपना काम और कर्तव्य बन जाता है। यह उचित है। पर वहाँ भी आप दंड धर्म के भीतर देंगे, धर्म-रहित नहीं — भगवान कृष्ण ने किसी बच्चे को मारने के लिए किसी का बच्चा नहीं मरवाया।

64

अंबुवाची अनुष्ठान के लिए कौन सी कामनाएँ उचित हैं?

नौकरी, व्यापार, रोग का नाश — और सामर्थ्य

· 1:00:18–1:00:58 · Also a question

कामाख्या के अंबुवाची पर्व में कामना के साथ पूजा करें — पर अनुष्ठान पूरी तरह सौम्य रखें, अपनी किसी एक कामना के साथ: किसी की नौकरी, किसी का व्यापार, किसी रोग का नाश। ये उचित कामनाएँ हैं, जैसे सामर्थ्य प्राप्त होने की माँग भी। इस समय कोई ऊटपटाँग कामना न करें।

65

यदि ग्यारह सौ पाठ संभव न हों तो?

रोज़ एक सौ आठ ठीक है, और जो कुछ आप पहले से पढ़ते हैं

· 1:04:00–1:04:54 · Also a question

तो रोज़ एक सौ आठ पाठ करें — बिल्कुल कर सकते हैं। और जो भी पाठ और पूजा आप पहले से कर रहे थे, अंबुवाची में उन सबका जप करें।

66

क्या साधना के दौरान विग्रह को रोज़ हटाया जा सकता है?

केवल यदि आप रोज़ आवाहन और विसर्जन कर रहे हैं

· 1:04:55–1:05:39 · Also a question

यदि साधना काल में आप रोज़ आवाहन और रोज़ विसर्जन कर रहे हैं, तो आप उसे हटा सकते हैं। पर यदि आपने इक्कीस दिन या इकतालीस दिन का एक ही संकल्प लिया है, तो उस दौरान विग्रह को नहीं हटाना चाहिए।

67

महाभैरव या बटुक भैरव?

जहाँ शत्रु हो वहाँ महाभैरव; अन्यथा बटुक, और उनका अष्टोत्तर

· 1:05:40–1:06:25 · Also a question

यदि शत्रु से परेशानी है, तो महाभैरव करें; अन्यथा बटुक भैरव जी का करें। और बटुक भैरव के मंत्र से अधिक वक्ता अष्टोत्तर शतनाम पर ज़ोर देते हैं, क्योंकि वह अपने आप में अद्भुत है — उसका उपयोग सृष्टि, पालन और श्रृंगार के क्रम में चलता है।

68

क्या गर्भवती स्त्री कामाख्या कवच का पाठ कर सकती है?

हाँ, किसी भी अवस्था में — पर चौथे महीने के बाद पूजा स्थान पर नहीं

· 1:06:26–1:07:34 · Also a question

वह बिल्कुल कर सकती है — कामाख्या कवच किसी भी अवस्था में पढ़ा जा सकता है, और इसके लिए पूजा स्थान पर जाना अनिवार्य नहीं। पर चौथे या पाँचवें महीने के बाद गर्भवती स्त्री को पूजा स्थान पर नहीं जाना चाहिए, और सबसे बढ़कर वहाँ नहीं जहाँ शिवलिंग हो।

69

निकारी का दीपक बुझने से कैसे बचाएँ?

कपूर के साथ मोटी बाती, बड़े कार्टन के भीतर ले जाएँ

· 1:07:35–1:08:47 · Also a question

निकारी का दीपक ऐसा रखें कि वह बिल्कुल न बुझे — बाती मोटी रखें, कपूर लगाकर जलाएँ, और बाहर ले जाते समय हवा हो तो उसे बड़े वाले बिस्कुट के कार्टन के भीतर ले जाएँ ताकि हवा अंदर न जा सके।

70

क्या चार दिनों में विग्रह को स्नान कराया जाता है?

चार दिन न स्नान, न स्पर्श

· 1:08:48–1:09:39 · Also a question

नहीं। भगवती को ढकने के बाद चार दिन रोज़ स्नान नहीं होगा, और उन्हें छुआ भी नहीं जाएगा। चार दिनों में आप बस इतना कर सकते हैं कि सुगंधित फूल चढ़ाएँ और अगले दिन उतार दें — विग्रह को छूने के नाम पर इससे आगे कुछ नहीं।

71

क्या ताँबे का कवच एक साल बाद काम करना बंद कर देता है?

केवल यदि आप सूतक में गए — तब ताँबे का काम रुक जाता है

· 1:09:40–1:09:53 · Also a question

यदि आप सूतक या पातक में नहीं गए, तो चिंता की कोई बात नहीं। यदि आप सूतक या पातक में गए हैं, तो ताँबे में उसका काम रुक जाता है।

72

तंत्रोक्त स्वरूप और सामान्य विग्रह में क्या अंतर है?

जागरण अलग होता है, और नियम की कठोरता भी

· 1:09:54–1:11:27 · Also a question

दो बातें। तंत्रोक्त विधि में देवता का जागरण अलग तरीके से होता है। और जहाँ वेदोक्त विधि में नियम थोड़ा भी छूटे तो बहुत जल्दी दोष बनता है — नैवेद्य चार बजे तक चढ़ाना है, आरती सूर्योदय के आधे घंटे के भीतर — तंत्रोक्त विधि में नियम का ऐसा बंधन नहीं होता।

73

तंत्रोक्त स्थापना वास्तव में क्या बनाती है?

पीठ यंत्र और न्यास, ताकि एक जप सभी शक्तियों को पुष्ट करे

· 1:11:28–1:12:57 · Also a question

एक पीठ यंत्र बनाया जाता है और देवता को उनके पूरे परिवार के साथ उस पर स्थापित किया जाता है; उन सबमें सूक्ष्म रूप से, चल स्थापना में, न्यास की प्रक्रिया पूरी होती है। फिर वहाँ समर्पित एक मंत्र जप भी सभी जुड़ी शक्तियों को पुष्ट करता है — आठ भैरव, मातृकाएँ, योगिनियाँ, क्षेत्रपाल।

74

माला प्रतिष्ठा के कौन-कौन से स्तर हैं?

एक बार वाली विधि, वर्ण न्यास, और छह घंटे लेने वाली भूत लिपि

· 1:12:58–1:14:17 · Also a question

तीन। सबसे सरल: माला को कच्चे दूध से स्नान कराएँ, पूरी माला को हाथ में ढककर पकड़ें और प्राण प्रतिष्ठा मंत्र पढ़ें — या वह न आए तो शिव के पंचानन मंत्र एक बार, या पंचाक्षरी। दूसरी में संक्षेप में भूत लिपि वर्ण न्यास होता है। तीसरी में हर मनके को वामदेव मंत्र से अलग-अलग प्रतिष्ठित किया जाता है।

75

क्या विस्तार से प्रतिष्ठित माला सरल ढंग से प्रतिष्ठित माला से अधिक शक्ति देती है?

भूत लिपि से प्रतिष्ठित माला की ऊर्जा सरल प्रतिष्ठित माला से ज़मीन-आसमान अलग है

· 1:14:18–1:15:37 · Also a question

हाँ। ऐसा नहीं कि इतनी ज़बरदस्त प्रतिष्ठा का अर्थ है कि कोई दोष नहीं लगता — पर उस पर एक माला जप करें और उसकी ऊर्जा अद्भुत होगी। जिसे आपने हाथ में लेकर एक बार में जैसे-तैसे प्रतिष्ठित किया, उसकी ऊर्जा और इसकी ऊर्जा में ज़मीन-आसमान का अंतर होगा।

76

प्रतिष्ठा के दौरान नया साधक बेचैन क्यों हो जाता है?

क्योंकि अभी हृदय में कोई शक्ति नहीं बसी जो धैर्य दे

· 1:15:38–1:16:57 · Also a question

क्योंकि आपने किसी मंत्र का सवा लाख पुरश्चरण नहीं किया, और देवता उस तरह का धैर्य देते ही नहीं। माला को मनका-मनका प्रतिष्ठित करने बैठें तो चौथे-पाँचवें मनके तक — दसवें तक — आप पूछने लगेंगे कि यह कब खत्म होगा।

77

प्रतिष्ठा में वास्तव में प्राण कौन डालता है?

हृदय की अपनी धड़कन — और सनातनी जो जन्म से तांत्रिक है

· 1:16:58–1:17:57 · Also a question

हृदय। जब हम प्राण मंत्र पढ़ते हैं तो हृदय से ही वह धड़कता है — जो धड़कन चल रही है वही विद्युत-चुंबकीय तरंगें पैदा कर रही है, और वही तरंगें जाकर वस्तु को चेतन बनाती हैं। यदि वह आपके भीतर नहीं, तो वस्तु केवल भौतिक रहती है।

78

जब बीस पाठ से कोई उत्तर न मिले, तो कारण अपने भीतर खोजना चाहिए

उत्तर क्यों नहीं आ रहा, यह अपने भीतर देखें

· 1:17:58–1:19:07

वक्ता कहते हैं कि उन्हें ऐसी टिप्पणी का उत्तर देना ही नहीं आता। अपने भीतर देखें; इसीलिए उत्तर नहीं आ रहा।

79

गुरु की फ़ोटो कहाँ रखनी चाहिए?

पूजा स्थान में, हाँ — पर उसके लिए सारे देवताओं को हटाकर नहीं

· 1:19:08–1:20:17 · Also a question

आप अपने पूजा कक्ष में गुरु का स्थान बिल्कुल रख सकते हैं। यदि आप किसी गुरु से दीक्षित हैं, तो पूजा के लिए उनका विग्रह या फ़ोटो रखें। पर यदि आप अपने सारे देवताओं को हटाकर केवल गुरु जी को रख रहे हैं — तो आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं, और आप पूरी तरह भ्रमित कर दिए गए हैं।

80

यदि दूसरे आपके गुरु के विरुद्ध बोलें तो?

अपना समर्पण बनाए रखें — पर वहाँ नहीं जहाँ वे शास्त्र के विरुद्ध बोलें

· 1:20:18–1:21:27 · Also a question

वे जो भी हों, और चाहे हम उन्हें गाली दें या कोई और, वह विषय हम तक रहने दें। आपके लिए वे गुरु हैं; उन्होंने आपको दीक्षा दी, और उनके चरणों में आपका समर्पण बना रहना चाहिए। पर जहाँ गुरु शास्त्रों के विरुद्ध बोलें, वह अलग बात है।

81

क्या कामाख्या दीपदान की विधि दी जा सकती है?

तंत्रोक्त रूप सार्वजनिक रूप से नहीं दिया जा सकता

· 1:21:28–1:22:12 · Also a question

वक्ता मना करते हैं। कामाख्या देवी की तंत्रोक्त विधियों के बारे में वे नहीं बोल पाएँगे, और उनके बारे में उन्हें भी पूछना पड़ेगा, क्योंकि ये चीज़ें सबसे उग्र श्रेणी में आती हैं। साधारण दीपदान चलेगा — अपनी समझ से स्वार्थ दीपदान करें — पर उचित वाला अलग बात है।

82

नारायण बलि के अगले दिन हुई मृत्यु का क्या?

बिना देखे उत्तर देने के लिए बहुत जटिल मामला

· 1:22:13–1:22:56 · Also a question

वक्ता इसे बहुत कठिन बात कहते हैं और बिना देखे उत्तर देने से मना करते हैं। वे कहते हैं, इस पर विचार करें: नारायण बलि हुई और अगले दिन वे चले गए — एक पखवाड़ा भी नहीं बीता। कोई कारण अवश्य रहा होगा; और जहाँ इतनी अकाल मृत्यु हुई हों, वहाँ प्रबल अभिचार की भी संभावना है।

83

शत्रु शांत होने पर साधना क्यों रुक जाती है?

संकट आने पर हम भगवान को याद करते हैं

· 1:22:57–1:23:48 · Also a question

वक्ता उस श्रोता से सहमत हैं जिसने यह कहा: जब शत्रु शत्रुता करता है तो हम बहुत साधना करते हैं, और जब शत्रु शांत होता है तो हमारी पूजा भी शांत हो जाती है। ठीक ही कहा गया है कि संकट आने पर हम भगवान को याद करते हैं — और यदि हम तब की साधना बनाए रखें, तो बात अद्भुत हो जाए।

84

अधिकतर लोग इस क्षेत्र में आते ही क्यों हैं?

पंचानबे प्रतिशत ठीक इसी कारण आते हैं

· 1:23:49–1:24:48 · Also a question

पंचानबे प्रतिशत लोग ये सारी जानकारियाँ ठीक इसी कारण लेते हैं। कितनों ने जैसे-तैसे खुद का विश्लेषण करते हुए कुंडली पढ़ना सीख लिया। तंत्र में भी वैसे ही — सिद्धि के लिए पागल, यहाँ तक कि श्मशान जाकर ट्रांसफ़र से मसान लेना, पैसे देना, कुछ भी, क्योंकि शत्रु को खत्म करना है।

85

वृंदावन के शक्ति पीठों पर क्या किया जा रहा है?

यह स्थापित करना कि वृंदावन में भी जाग्रत शक्ति पीठ हैं

· 1:24:49–1:25:58 · Also a question

वृंदावन-मथुरा क्षेत्र के दो शक्ति पीठों पर अनुष्ठान, जो चैनल पर डाले गए। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि यहाँ "शत्रु" कोई व्यक्ति नहीं: यह हर वह मानसिक विरोध है जो ब्रज क्षेत्र को वैष्णव क्षेत्र कहकर उसे शक्ति क्षेत्र से अलग करने का प्रयास करता है, यह कहकर कि वहाँ शक्ति साधना होती ही नहीं।

86

जिन्होंने किसी कुल की बलि, भोग और नैवेद्य बंद करवाए, उस परिवार पर बाद में विपत्ति टूटने पर उन पर कोई असर नहीं पड़ता

जिन्होंने बलि बंद करवाई, परिवार बर्बाद होने पर उन्हें कुछ नहीं भुगतना पड़ता

· 1:25:59–1:27:08

कि लोग धीरे-धीरे भगवती की सेवा ही पूरी तरह छोड़ रहे हैं — ऐसी दशा आ गई है जिसमें अपने कुल की शक्तियों की बलि, भोग और नैवेद्य बंद कर दिए गए हैं। और जब फिर किसी घर में विपत्ति टूटती है और परिवार उजड़ जाता है, तो जिन्होंने बलि बंद करवाई उन पर उस परिवार की बर्बादी का क्या असर पड़ता है?

Indexed, not endorsed as instruction

यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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