पितृ पक्ष लाइव प्रश्नोत्तर: पंचबली, ग्रहण का जप और चौखट

पितृ पक्ष के विधान और उसी रात के ग्रहण पर लाइव प्रश्नोत्तर।

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Questions this answers

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01

पितृ पक्ष में गीता के 11वें अध्याय का प्रयोग कैसे करें?

गीता पाठ का अलग से कोई प्रयोग नहीं बनता

· 01:07–01:37 · Also a question

प्रयोग करने की आवश्यकता नहीं है। संकल्प करके केवल पाठ कीजिए, माहात्म्य सहित — वही प्रयोग है।

02

ग्रहण में 64 योगिनी नामावली का सादा पाठ ही पर्याप्त है — चक्र विधि की आवश्यकता नहीं

योगिनी नामावली का सादा पाठ, बिना चक्र विधि के

· 01:38–01:58

चक्र विधि की आवश्यकता नहीं है — ग्रहण काल में केवल नामावली का पाठ ही बहुत है।

03

ग्रहण की रात साबर जप लगातार पूरे ग्रहण भर चलता है; बाद में मंदिर में जप हो तो दीपक, धूप, पुष्प, मीठा नैवेद्य और नौ लौंग की बलि

ग्रहण-रात्रि जप का समय, और उसके बाद के अर्पण

· 01:59–02:52

पूरे ग्रहण भर लगातार जप करें — उनके अनुसार रात 9:45 से 1:40 तक। ग्रहण में दीपक आदि की आवश्यकता नहीं; उसके बाद मंदिर में जप करना हो तो कर्मसाक्षी दीपक, धूप, सुगंधित पुष्प, मीठा नैवेद्य, और जप के उपरांत कम से कम नौ लौंग व कपूर दीपक में प्रज्वलित करके बलि के रूप में।

04

कितनी पीढ़ी तक के पितरों का पूजन होता है?

तीन पीढ़ी, सात पीढ़ी, और आठवीं पीढ़ी का जन्म सातवीं को क्यों मुक्त करता है

· 02:53–03:29 · Also a question

तीन पीढ़ियों तक, या जितनी पीढ़ी आपको ज्ञात हैं। विधान सात पीढ़ी तक का है, क्योंकि आठवीं पीढ़ी के जन्म पर सातवीं पीढ़ी मुक्त हो जाती है — गया जी में सात पीढ़ी बैठती हैं, जबकि त्रिपिंडी श्राद्ध आदि में तीन: पिता, दादा, परदादा।

05

ग्रहण में साबर मंत्र जोर से बोलकर, उपांशु या मानसिक — कैसे जपें?

कोई भी मंत्र इतना जोर से नहीं कि सामने वाले को सुनाई दे

· 03:30–04:00 · Also a question

सबर मंत्र कभी जोर-जोर से बोलकर नहीं जपा जाता। कोई भी मंत्र इतना जोर से नहीं बोला जाता कि सामने वाले को सुनाई दे — बस मुख के भीतर बुदबुदाहट चले।

06

बार-बार गर्भ नष्ट हो और चुड़ैल जैसी शक्ति हो तो महाभैरव से अच्छा बटुक भैरव

चुड़ैल जैसी शक्ति निश्चित हो तो महाभैरव नहीं, बटुक भैरव

· 04:01–04:21

यहाँ महाभैरव से अच्छा बटुक भैरव रहेगा — बशर्ते प्रश्नकर्ता को यथार्थ में यह पता हो कि चुड़ैल जैसी शक्ति ही है।

07

एक कवच पहले से धारण हो तो दूसरे की आवश्यकता नहीं — घर-परिवार के लिए रखें, वह भी आर्थिक सक्षमता हो तो

एक कवच धारण करते हुए दूसरा कवच लेना चाहिए या नहीं

· 04:22–04:48

यह निर्णय प्रश्नकर्ता को स्वयं लेना है। वक्ता के अनुसार जब एक कवच पहले से धारण किया हुआ है तो दूसरे की आवश्यकता नहीं; भविष्य या घर-परिवार के लिए आर्थिक रूप से सक्षम हों तो रख सकते हैं, नहीं तो कोई आवश्यकता नहीं।

08

चारों पुरुषार्थों में धर्म, अर्थ, काम के पश्चात ही मोक्ष आता है — इसलिए भौतिक कष्ट-निवारण के लिए साधना दोष नहीं है

भौतिकता के पीछे भागने के आरोप का उत्तर

· 04:49–07:47

वक्ता का उत्तर है कि चारों पुरुषार्थ में धर्म, अर्थ, काम के पश्चात ही मोक्ष आता है — और भगवती प्रत्यक्ष होकर वरदान भी माँगने को कहें तो व्यक्ति भौतिकता ही माँगेगा, क्योंकि उस स्तर की मोक्ष की अभिलाषा बुद्धि में है ही नहीं। व्यक्तिवादी नहीं, सिद्धांतवादी बनिए।

09

जिसे तैरना आता है उसे कितना भी पानी तृप्त नहीं करता — माया के साथ खेलना आ जाए तो धन की लालसा की कोई सीमा नहीं रहती

तैराक और डूबने वाला — एक उपदेश सबके लिए क्यों नहीं

· 07:48–10:10

जिसे तैरना नहीं आता वह दस फीट पानी में डूब जाता है, जबकि तैराक कितना भी गहरा पानी हो तैरता जाता है। जिसकी धन की लालसा केवल पुरुषार्थ के निमित्त है, उसके लिए एक सीमित राशि पर्याप्त है; जिसे माया के साथ खेलना आ गया, उसे 10, 20 या 100 करोड़ से भी तृप्ति नहीं होती।

10

कवच 10% है — 90% साधक की अपनी मेहनत; कवच सुरक्षा देकर मार्ग खोलता है, काम अपने आप नहीं करता

कवच दस प्रतिशत, साधक की मेहनत नब्बे

· 10:11–11:57

कवच उस व्यक्ति के लिए है जो कष्ट में डूबा है — जिसके घर में भूत-प्रेत नाच रहे हैं, रोग है, या अभिचार का कष्ट है — उसके लिए नहीं जिसके पास किसी चीज की कमी नहीं। और वहाँ भी, वक्ता कहते हैं, कवच केवल 10% है: 90% तो साधक की अपनी साल भर की मेहनत और ग्रहण में बैठकर किया गया जप है। कवच सुरक्षा देकर बढ़ोतरी करता है; वह केवल एक मार्ग देता है।

11

पितरों के निमित्त धन सीधे किसी परिचित ब्राह्मण को गौ सेवा के लिए दें — सार्वजनिक रूप से नहीं, उससे दृष्टि दोष लगता है

बार-बार सार्वजनिक दान से दृष्टि दोष क्यों लगता है

· 11:58–13:07

प्रत्यक्ष नहीं, निजी रूप से दें। सार्वजनिक देने से दूसरे देने नहीं लगते; स्क्रीनशॉट घूमते हैं और देने वाले को drishti-dosha लगता है। इससे भी अच्छा — अपने कुल के या किसी परिचित ब्राह्मण को सीधे देकर पितरों के निमित्त गौ सेवा आदि कराएँ।

12

क्या श्राद्ध पक्ष में भगवान का कोई नया विग्रह या फोटो घर ला सकते हैं?

श्राद्ध पक्ष में नए विग्रह की स्थापना नहीं होती

· 13:08–13:17 · Also a question

नहीं — श्राद्ध पक्ष में कुछ मत लाइए, बिल्कुल कुछ मत कीजिए। स्थापना प्रथम नवरात्रि (नवरात्रि) में होती है।

उत्तर बिना किसी शर्त के है: श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) में कुछ मत लाइए, इस प्रकार का बिल्कुल कुछ मत कीजिए। वह सब नहीं होगा — इस अवधि में नए विग्रह या फोटो की स्थापना नहीं की जाती। उसी साँस में वक्ता विकल्प बताते हैं: ऐसी स्थापना प्रथम नवरात्रि में होती है।

13

काशी में परिवार के साथ ग्रहण का जप गंगा जी के घाट पर — मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे

मंदिर बंद हों तो गंगा जी का घाट

· 13:18–13:35

गंगा जी के घाट के किनारे। ग्रहण में मंदिरों के कपाट बंद हो जाएँगे, इसलिए बैठने की जगह हर जगह नहीं मिलेगी।

पूछा गया कि काशीगंगा तट पर बसी वाराणसी, जिसे सामान्य प्रलय से परे माना जाता है। में परिवार के साथ चंद्र ग्रहण की रात कहाँ जप करें, जहाँ कोई भगाए नहीं — वक्ता नदी किनारे भेजते हैं: गंगा जी के घाट के किनारे ही बढ़िया से सब चीज कर सकते हैं। कारण व्यावहारिक है: मंदिरों के कपाट बंद हो जाएँगे, तो बैठने की जगह हर जगह नहीं मिलेगी।

14

क्या ग्रहण में एक से अधिक स्तोत्र या मंत्र का जाप किया जा सकता है?

ग्रहण के आरंभ से अंत तक एक ही मंत्र

· 13:36–14:13 · Also a question

नहीं। ग्रहण के आरंभ से अंत तक एक ही मंत्र या कवच का जप होता है — वही सिद्ध होता है। बीच में छोड़कर दूसरा शुरू कर दिया तो दोनों में से कोई सिद्ध नहीं होगा।

15

चंद्र ग्रहण से मंत्र का पुरश्चरण कैसे पूर्ण होता है?

ग्रहण — सबसे आसान पुरश्चरण

· 14:14–15:09 · Also a question

ग्रहण आरंभ होने से पहले संकल्प और गणपति (गणेश) पूजन कर लें, ग्रहण शुरू होने से 4-5 मिनट पहले जप शुरू करें, ग्रहण पूर्ण होने के 5-10 मिनट बाद तक करते रहें, फिर अगली सुबह दशांश हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन — पुरश्चरण पूर्ण, मंत्र जागृत।

16

क्या छत पर लगे पौधों के पास ग्रहण का जप कर सकते हैं?

जिन पौधों के पास ग्रहण का जप हो सकता है

· 15:10–15:19 · Also a question

हाँ — आक (मदार), अपराजिता, पारिजात, शमी या तुलसी के पास। वक्ता इसे बहुत दिव्य विषय कहते हैं।

एक श्रोता पूछते हैं कि चंद्र ग्रहण में छत पर लगे पौधों — आक (मदार)दूधिया लेटेक्स वाला एक पौधा (आक/मदार) — इसकी श्वेत किस्म (श्वेतार्क) घर की रक्षा हेतु समीप रोपी जाती है, परंतु इसका स्रोत महत्वपूर्ण है, क्योंकि दूधिया पौधों में जहाँ से लाए जाएं उसके अनुसार द्विविध (सकारात्मक या नकारात्मक) गुण होते हैं।, अपराजिता, पारिजात, शमीउपाय-अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक पत्ता — परंपरागत रूप से शनिवार को नहीं तोड़ा जाता; शनिवार के अनुष्ठान हेतु आवश्यक हो तो इसे पूर्व शुक्रवार को तोड़ लिया जाता है।, और तुलसी जी — के पास जप कर सकते हैं क्या। वक्ता बिना किसी शर्त के कहते हैं कि यह बहुत दिव्य विषय है, एकदम वहाँ जप कर सकते हैं।

17

पिछले साल गुजरे और अभी पितरों में न मिलाए गए संबंधी का नाम पाठ के लिए लिख सकते हैं, पिंड का विषय अलग है

हाल के दिवंगत का नाम पाठ के लिए, पिंड के लिए नहीं

· 15:20–15:35

पाठ के निमित्त नाम लिख सकते हैं; पिंड दान का विषय अलग है। भगवद्गीता, पार्वती गीता या सहस्रनाम के पाठ में उन्हें सम्मिलित करने में कोई समस्या नहीं।

18

पितरों के निमित्त जो करेंगे, उनकी कृपा से गुरु मिलेंगे — इसका उत्तर पितर ही देंगे

गुरु का प्रश्न पितर स्वयं सुलझाते हैं

· 15:36–15:45

वह तो पितर (पितृ) ही बता सकते हैं। उनके निमित्त जो करेंगे, उनकी कृपा से मिलेंगे — वक्ता के लिए इसमें प्रश्न ही क्या है।

पूछा गया कि पितरों की कृपा से गुरु कैसे प्राप्त होंगे — वक्ता प्रश्न को उसी की पूर्वधारणा पर लौटा देते हैं। वह तो पितर (पितृ) ही आपको बता सकते हैं। आप उनके निमित्त जो करेंगे, उनकी कृपा से आपको मिलेंगे — और अंत में पूछते हैं, इसमें प्रश्न क्या है?

19

त्वचा की लगातार समस्या (स्किन इश्यूज) के लिए क्या विधान है?

त्वचा रोग का पहला कारण — कुल पितरों का कोप

· 15:46–16:40 · Also a question

सबसे बड़ा विषय कुल के पितरों का कोप (पितृ दोष) है — उससे सबसे ज्यादा दिक्कत होती है। सबसे अच्छा प्रयोग श्रीमद्भगवद्गीता के सप्तम अध्याय का पाठ है; भगवान सूर्य नारायण और बुध देव के निमित्त भी प्रयोग हैं।

20

माता-पिता जीवित हों तो क्या पितृ तर्पण और श्राद्ध कर सकते हैं?

माता-पिता जीवित हों तो पितृ तर्पण नहीं; नांदीमुख श्राद्ध आचार्य पर निर्भर

· 16:41–17:05 · Also a question

पितृ तर्पण नहीं कर सकते। नांदीमुख श्राद्ध के लिए आचार्य से पूछिए — पिताजी हैं लेकिन बैठने में सक्षम नहीं हैं तो आप उनके स्थान पर कर सकते हैं, पर यह निर्णय आचार्य का है।

21

गया श्राद्ध कब करवाना चाहिए, और क्या पितृ पक्ष में यह अनुशंसित है?

गया श्राद्ध में पूरा कुटुंब चाहिए, त्रिपिंडी में नहीं

· 17:06–17:33 · Also a question

त्रिपिंडी श्राद्ध किसी भी समय कर सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं। गया श्राद्ध का विषय वृहद है: दादाजी के जितने भाई हैं, उन सभी के घरों से सहयोग लेकर होता है, क्योंकि सात पीढ़ी बैठाई जाती है। उतना परिवार तैयार हो तभी करवाएँ।

22

सप्तश्लोकी के नित्य 108 पाठ के साथ नित्य हवन — बिना किसी शर्त के अनुमोदित

सप्तश्लोकी के 108 पाठ के साथ नित्य हवन

· 17:34–17:41

बिल्कुल — सप्तश्लोकी के नित्य 108 पाठ के साथ नित्य हवन को वक्ता बहुत दिव्य विषय कहते हैं, बिना किसी शर्त के।

पूछा गया कि सप्तश्लोकी के नित्य 108 पाठ के साथ नित्य हवन किया जा सकता है क्या — वक्ता कहते हैं बिल्कुल, एकदम कर सकते हैं, बहुत दिव्य विषय है। साथ में कोई शर्त या सावधानी नहीं जोड़ते।

23

ग्रहण की साधना पूरे समय 9:45 से 1:40 तक; 10:50 पूर्ण ग्रहण का मध्य काल है, जो केवल उनके लिए है जो पूरा नहीं बैठ सकते

ग्रहण का मुख्य काल बनाम पूरा समय

· 17:42–19:02

साधना 9:45 से 1:40 तक करनी है — यही पूरा समय है और पूरा फल इसी में है। 10:50 मध्य काल है, जब पूर्ण ग्रहण लगता है; वह केवल उनके लिए बताया गया जो सच में कष्ट में हों और पूरा न बैठ सकें। ग्रहण शुरू होने से 10 मिनट पहले जप शुरू करें, पूर्ण होने के 10 मिनट बाद तक करते रहें।

24

हवन पूर्ण होने से पहले अग्नि बुझ जाए तो?

समिधा ऐसे सजाएँ कि अग्नि में ऑक्सीजन जाए

· 19:03–19:17 · Also a question

अग्नि प्रज्वलित करने के बाद उस पर समिधा ऐसे सजाइए कि ऑक्सीजन सही से प्रवेश करे — अग्नि बुझना लकड़ी के ऐसे ढेर का परिणाम है जिससे हवा रुक जाती है।

वक्ता कर्मकांडी नहीं, व्यावहारिक उत्तर देते हैं। अग्नि प्रज्वलित करने के बाद उस पर समिधा सजानी चाहिए, और ऐसे सजानी चाहिए कि अग्नि में ऑक्सीजन का सही से प्रवेश हो। हवन की अग्नि बुझने को वे लकड़ी सजाने की बात मानते हैं, प्रायश्चित माँगने वाला अपशकुन नहीं।

25

ग्रहण काल में रुद्रांश गण का नहीं, रुद्र गण का साधना-अनुष्ठान होता है

रुद्रांश गण नहीं, रुद्र गण

· 19:18–19:27

रुद्र गण का। वक्ता प्रश्नकर्ता को दो बार सुधारते हैं: रुद्र गण का साधना-अनुष्ठान किया जाता है, रुद्रांश के गण का नहीं।

वक्ता प्रश्न के शब्द ही सुधारते हैं, और फिर सुधार दोहराते हैं ताकि छूटे नहीं। ग्रहण काल में रुद्र गण का साधना-अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। करना है — रुद्रांश गण का नहीं। रुद्रांश के गण का साधना नहीं करना है, रुद्र गण का साधना करना है।

26

त्रिपुंड तिलक पूजा करते समय लगाना है या बैठने से पहले?

त्रिपुंड बैठने से पहले, या आसन पर शीशा रखकर

· 19:28–19:53 · Also a question

पूजन से पहले, बैठने से पहले ही अभिमंत्रित (अभिमंत्रण) तिलक लगा लीजिए। नियम से वहीं बैठकर लगाना हो तो आसन पर शीशा रखिए और वहीं से लगा लीजिए।

27

यंत्रों को हॉरिजॉन्टल रखना उचित है या वर्टिकल?

यंत्र नीचे सुलाकर रखा जाता है और कल्पना में उठाया जाता है, फोटो की तरह खड़ा नहीं

· 19:54–21:30 · Also a question

हॉरिजॉन्टल-वर्टिकल का प्रश्न ही नहीं है। यंत्र को आसन पर सुलाकर रखा जाता है और वहीं पूजन होता है — फोटो की तरह खड़ा करके कभी नहीं। पूजन के समय कल्पना करनी होती है कि उसका पटल उठा हुआ है, जैसे फिल्मों में नक्शा 3D होलोग्राम बनकर हवा में उठ जाता है।

28

पितृ पक्ष में गीता पाठ के लिए पितृ प्रसन्नता का अलग से संकल्प लेना पड़ेगा?

संकल्प में पितरों का नाम कैसे लिया जाए

· 21:31–22:46 · Also a question

अलग संकल्प नहीं — पितरों का नाम संकल्प के भीतर ही आता है: या तो सीधे, या अपने इष्ट देवता के माध्यम से: नारायण की कृपा से मम कुल पितृणां प्रसन्नता च तुष्टि पुष्टि हेतवे।

29

क्या भगवती तारा की उपासना बिना दीक्षा के की जा सकती है?

तारा के लिए दीक्षा आवश्यक

· 22:47–22:59 · Also a question

अगर वे सच में आपकी इष्ट देवता हैं तो दीक्षा लेकर कीजिए — और आपके गुरुजी जैसा कहें वैसा।

वक्ता एक शर्त जोड़ते हैं और फिर बात गुरु पर छोड़ देते हैं। भगवती तारा अगर आपकी इष्ट हैं और आप उन्हें इष्ट मानते हैं, तो दीक्षासक्षम गुरु द्वारा किसी मंत्र या साधना में औपचारिक दीक्षा। लेकर उपासना कीजिए। इसके आगे प्रश्नकर्ता को उनके अपने गुरु के पास भेजते हैं: आपके गुरुजी जैसा कहें।

30

इसी साल गुजरे नानाजी को पितृ पक्ष में जल दे सकते हैं?

साल के भीतर की मृत्यु पर कुशा, तिल और जल

· 23:00–23:08 · Also a question

हाँ — क्रियाकर्म आपके हाथ से हुआ हो तो पितृ पक्ष में कुश, तिल और जल दे सकते हैं। जल तो बिल्कुल दे सकते हैं।

एक श्रोता बताते हैं कि नानाजी इसी साल गुजरे हैं और क्रियाकर्म उन्हीं के हाथ से हुआ है। वक्ता पुष्टि करते हैं कि इस स्थिति में पितृ पक्ष में कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है।, तिलतिल, विशेषतः काला तिल, जो पितृ कर्म और अनेक आहुतियों का मुख्य द्रव्य है। और जल दे सकते हैं, और विशेष रूप से दोहराते हैं कि जल तो बिल्कुल दे सकते हैं।

31

संपुट प्रयोग है, सिद्धि नहीं — ग्रहण में योगिनी नामावली और कामाख्या कवच अलग-अलग ही पढ़े जाते हैं

संपुट प्रयोग है, सिद्धि नहीं

· 23:09–23:44

ग्रहण में संपुट नहीं करना है। संपुट करते ही वह सिद्धि नहीं, प्रयोग हो जाता है, और सिद्धि-जागृति सदैव अलग से की जाती है। केवल योगिनी नामावली का पाठ कीजिए, या केवल कामाख्या कवच का; संपुट तब, जब किसी फलाने कार्य की सिद्धि के निमित्त प्रयोग करना हो।

32

क्या रजस्वला स्त्री ग्रहण में जप कर सकती है?

रजस्वला अवस्था में जप नहीं होता

· 23:45–23:48 · Also a question

नहीं — रजस्वला ग्रहण आदि में जप नहीं कर सकतीं। वक्ता लाइव में आगे कहते हैं कि ऐसी अवस्था में जप करने से शरीर में कष्ट मिलेगा।

वक्ता का उत्तर यहाँ संक्षिप्त है: रजस्वलारजस्वला स्त्री, जिस अवस्था में इस परंपरा में अनुष्ठान सम्बन्धी विशेष निषेध माने जाते हैं। ग्रहण आदि में जप नहीं कर सकतीं। लाइव में आगे वे इस बात पर और कड़े शब्दों में लौटते हैं — ऐसी अवस्था में कुछ नहीं कर सकतीं, जप नहीं करना चाहिए, क्योंकि उससे शरीर में कष्ट मिलेगा।

33

आध्यात्मिक पत्नी पाने के लिए कोई साधना या मंत्र है?

अनुकूल पत्नी के लिए अर्गला का श्लोक

· 23:49–23:59 · Also a question

अर्गला स्तोत्र का वह मंत्र कीजिए जिसका अंत "पत्नीं मनोरमां देहि" है। वक्ता सीधे इसका नाम लेकर आगे बढ़ जाते हैं।

आध्यात्मिक पत्नी पाने के लिए साधना या मंत्र पूछा गया — वक्ता सीधे अर्गला स्तोत्र की ओर इशारा करते हैं, उस श्लोक का हवाला देते हुए जिसके अंतिम शब्द "पत्नीं मनोरमां देहि" हैं, और कहते हैं उसे कीजिए।

34

गया जी व्यक्तिगत उपाय नहीं — यह पूरे परिवार के साथ होता है, अंतिम संस्कार में न आए एक व्यक्ति के सुधार के लिए नहीं

गया जी कभी व्यक्तिगत उपाय नहीं

· 24:00–24:19

ध्यान रखिए, गया श्राद्ध का विषय ऐसे नहीं होता। वह पूरे परिवार के साथ होता है, किसी एक व्यक्ति के छूटे हुए संस्कार के सुधार के लिए नहीं।

35

क्या महाकाली, महालक्ष्मी और सरस्वती — सबकी 64 योगिनी अलग-अलग हैं?

हर महाविद्या की अपनी अलग 64 योगिनी

· 24:20–24:58 · Also a question

हाँ। हर महाविद्या, हर महाशक्ति की 64 योगिनी अलग-अलग हैं — भगवान दत्त की अलग, भगवती की अलग, सबकी अपनी-अपनी।

36

क्या योगिनियाँ केवल 64 ही हैं?

योगिनियाँ अनंत हैं; 64 कुल संख्या नहीं

· 24:59–25:16 · Also a question

नहीं। योगिनी अनंत हैं, हमारी सोच से बाहर — 64 के सिवाय भी योगिनियाँ हैं।

वक्ता प्रश्न में छिपी धारणा सुधारते हैं। 640 योगिनी नहीं, केवल 64 भी नहीं: योगिनियाँ अनंत हैं। आप और हम जो सोचते हैं, वे उससे बाहर हैं। 64 योगिनी के सिवाय भी योगिनियाँ हैं।

37

गुरु मंत्र वाली माला पर साबर मंत्र का जप कर सकते हैं?

गुरु मंत्र की माला पर साबर जप कभी नहीं

· 25:17–25:29 · Also a question

नहीं। गुरु मंत्र का जप जिस माला पर किया है उस पर साबर मत कीजिए। वैसे माला अनिवार्य भी नहीं — बिना माला के भी आरंभ से अंत तक जप कर सकते हैं।

38

पितरों के नाम नहीं जानता तो क्या करूँ?

जितने पितरों के नाम ज्ञात हों, उतने लिखें

· 25:30–25:43 · Also a question

कोई दिक्कत नहीं — जितना जानते हैं उतना लिखिए। वक्ता को नहीं लगता कि कोई एक भी नाम न जानता हो: दादाजी-परदादा जी तक तो सब कोई जानता है।

वक्ता इस चिंता को निराधार मानते हैं। कोई दिक्कत नहीं: जितना जानते हैं उतना लिखिए। ऐसा थोड़ी है, वे कहते हैं, कि आप अपने एक भी पितर (पितृ) का नाम न जानते हों — दादाजी, परदादा जी तक तो सब कोई जानता है।

39

पितृ पक्ष में कुल पितरों के लिए पंचाक्षरी का सवा लाख जप बिल्कुल उचित

पितृ पक्ष में पितरों के लिए पंचाक्षरी

· 25:44–25:53

बिल्कुल उचित — पितरों के लिए पंचाक्षरी मंत्र का जप एकदम कीजिए, उसमें कोई दिक्कत नहीं।

एक श्रोता पितृ पक्ष में कुल पितरों के लिए पंचाक्षरी मंत्र का सवा लाख जप करना चाहते हैं, यह बताते हुए कि यही साधना उन्होंने सावन में भी की थी। वक्ता बिना किसी शर्त के अनुमोदन करते हैं: बिल्कुल उचित रहेगा, एकदम कीजिए, कोई दिक्कत नहीं।

40

रोज चौखट से मोटरसाइकिल-साइकिल निकालने का कोई गलत प्रभाव पड़ता है?

चौखट पर वाहन — केवल सुरक्षा का विषय

· 25:54–26:06 · Also a question

वक्ता इसे कर्मकांडी परिणाम नहीं, सुरक्षा का विषय मानते हैं, और इसमें कोई आध्यात्मिक दोष नहीं बताते।

पूछा गया कि रोज चौखट से मोटरसाइकिल और साइकिल आना पड़ता है, कोई गलत प्रभाव पड़ता है क्या — वक्ता कहते हैं यह तो सेफ्टी का विषय है, इसमें क्या गलत प्रभाव पड़ना है। यहाँ वे इसे कोई कर्मकांडी भार नहीं देते, जबकि चौखट को इसी लाइव में कहीं और केंद्रीय मानते हैं।

41

पितृ पक्ष में क्या-क्या करना अनिवार्य है?

पंचबली — पाँच जीवों को भोजन — एकमात्र अनिवार्य

· 26:07–27:06 · Also a question

सबसे पहले पंचबलि। और कुछ करें चाहे न करें, पाँच जीवों को भोजन: गौ माता को ताजी रोटी, कुत्ते को भोजन, कौवे को भोजन, चींटियों को चीनी का बुरा, और किसी गरीब-भूखे व्यक्ति को भोजन। साथ में जिन तिथियों को छोड़ना है उन्हें छोड़कर सूर्य और तुलसी को अर्घ।

42

पितृ पक्ष में पंचबली के ऊपर कौन-कौन से पाठ जोड़े जा सकते हैं?

वैकल्पिक पाठ, और जीव सेवा उनसे ऊपर क्यों

· 27:07–27:44 · Also a question

इच्छा, सामर्थ्य और मन हो तो: गीता का सप्तम या एकादश अध्याय, या पूरा पाठ, या अपने आराध्य की गीता — शिव गीता, देवी गीता — या पितृ बीसा। लेकिन जीव सेवा अवश्य कीजिए, क्योंकि जीव सेवा से ही पितरों की आत्मा तृप्त होती है।

43

पितृ पक्ष शुरू होते ही घर की गृहिणी अशुद्ध अवस्था में आ जाए तो?

अशुद्धि के दिनों में गृहिणी के स्थान पर स्वयं भोजन बनाना

· 27:45–28:23 · Also a question

वक्ता इसे प्रश्नकर्ता का निज विषय कहकर निर्णय देने से मना करते हैं। विधि-विधान से चलना हो तो नियम यही है कि वे भोजन न बनाएँ — उनके स्थान पर आप बनाइए और उन्हें भी खिलाइए, ताकि अन्न में दोष न लगे।

44

अनुष्ठान में ब्रह्मचर्य का नियम क्या है?

संकल्पित अनुष्ठान बनाम नित्य क्रम में ब्रह्मचर्य

· 28:24–29:12 · Also a question

संकल्पित अनुष्ठान में — जो किसी कार्य की सिद्धि के संकल्प से हो — ब्रह्मचर्य पालन करना ही पड़ेगा, पति-पत्नी संबंध नहीं होगा। केवल नित्य क्रम चल रहा हो, कोई विशेष संकल्प न हो, तो सामान्य रूप से रहें, लेकिन अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावस्या, एकादशी, पर्व काल और संक्रांति में संबंध नहीं बनाना चाहिए।

45

श्राद्ध के दिन भी पितरों का नित्य भोजन निकाला जाएगा — वह और ब्राह्मण भोजन अलग-अलग दायित्व हैं

नित्य निकाला भोजन और श्राद्ध का भोजन अलग-अलग

· 29:13–29:36

हाँ, निकाला जाएगा। पितरों का नित्य भोजन गौ माता आदि को जाता है; श्राद्ध के दिन का भोजन ब्राह्मण को कराया जाता है — दोनों अलग हैं, एक दूसरे का स्थान नहीं लेता।

46

क्या माँ विंध्यवासिनी को कुलदेवी बना सकते हैं?

विंध्यवासिनी कुलदेवी के रूप में

· 29:37–30:01 · Also a question

बिल्कुल बना सकते हैं — वक्ता को आश्चर्य है कि यह प्रश्न पूछा ही क्यों गया।

श्रोता की धारणा है कि माँ विंध्यवासिनी को कुलदेवी नहीं बना सकते। वक्ता तुरंत अस्वीकार करते हैं — क्यों नहीं बना सकते भाई? ये कैसा प्रश्न है — बिल्कुल बना सकते हैं।

47

रात्रि सूक्तम का मंत्र माँ तारा की प्रसन्नता का संकल्प लेकर जप सकते हैं

तारा के संकल्प से रात्रि सूक्तम

· 30:02–30:18

हाँ — माँ तारा की प्रसन्नता का संकल्प लेकर रात्रि सूक्तम् वाला मंत्र बिल्कुल जप सकते हैं।

48

ग्रहण में कामाख्या कवच का पाठ करने से वह सिद्ध हो जाएगा?

ग्रहण में कामाख्या कवच की सिद्धि

· 30:19–31:04 · Also a question

हाँ — कामाख्या कवच अवश्य सिद्ध होगा, अवश्य करें।

पूछा गया कि ग्रहण में कामाख्या कवच का पाठ करने से सिद्ध हो जाएगा क्या — वक्ता कहते हैं अवश्य होगा, अवश्य करें। कुछ झुंझलाहट से यह भी कहते हैं कि एक ही प्रश्न बार-बार क्यों भेजा जा रहा है।

49

ग्रहण में रक्त चंदन की माला पर जयंती मंगला का जाप; माला का अलग से पूजन अनिवार्य नहीं, नित्य नियम में हो ही जाता है

रक्त चंदन की माला पर जयंती मंगला

· 31:05–31:31

हाँ। माला के पूजन की अलग से अनिवार्यता नहीं है, हालाँकि नित्य नियम में उनका पूजन तो होता ही है — अभिषेक, पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन कर सकते हैं।

50

एक स्तर को संतुष्ट किए बिना बृहद स्तर में जाने से लाभ नहीं — साल भर भी पूरा न करने वाला आवरण पूछे तो और विधि से कुछ नहीं मिलेगा

विधि-विधान बटोरने से पहले धैर्य सीखना

· 31:32–32:47

क्योंकि प्रश्नकर्ता को शुरू किए साल भर भी नहीं हुआ और वे आवरण (आवरण पूजा) पूछ रहे हैं। एक स्तर को संतुष्ट किए बिना बृहद स्तर में जाएँगे तो लाभ नहीं होगा और फिर शिकायत होगी कि कुछ प्रभाव नहीं मिल रहा। पहले सक्षम बनिए।

51

कामाख्या कवच के साथ 64 योगिनी कवच धारण किया जा सकता है?

दोनों कवच साथ धारण करना

· 32:48–33:05 · Also a question

बिल्कुल — कामाख्या कवच और 64 योगिनी कवच साथ धारण किए जा सकते हैं।

वक्ता बिना शर्त पुष्टि करते हैं कि कामाख्या कवच के साथ 64 योगिनी कवच धारण किया जा सकता है। इसी बीच पूछा गया कि कल कौन सा मंत्र जपें — पहला मंत्र या संकट नाशन — तो कहते हैं संकट नाशन स्तोत्र ही कीजिए।

52

64 योगिनी का पाठ हर रोज करना है? कवच न हो तो भी?

बिना कवच के भी नित्य योगिनी पाठ

· 33:06–33:20 · Also a question

हाँ, रोज कीजिए। कवच आवश्यक नहीं — कवच न हो तो भी कीजिए, कोई दिक्कत नहीं। नामावली कंठस्थ हो जाए तो चलते-फिरते चलती रहेगी।

वक्ता 64 योगिनी नामावलीदेवता के नामों की लिखित सूची — जैसे दुर्गा के 108 नाम, हवन में प्रत्येक नाम पर पृथक आहुति देने की सुविधा हेतु अलग से लिखे जाते हैं। के नित्य पाठ का अनुमोदन करते हैं और कवच को पूर्वशर्त से हटा देते हैं: कवच न हो तो भी कीजिए, कोई दिक्कत नहीं। जोड़ते हैं कि नामावली कंठस्थ हो जाए तो चलते-फिरते वह चलती रहेगी, उसमें भी कोई समस्या नहीं।

53

ग्रहण के बाद पितृ पक्ष में बगला साबर मंत्र का जाप कर सकते हैं?

पितृ पक्ष में कर्म प्रधान नहीं, पुष्टि देने वाले मंत्र

· 33:21–34:09 · Also a question

ऐसे मंत्र चुनिए जिनसे पुष्टि आती है। बगलामुखी का सबर मंत्र कर्म प्रधान मंत्र है, जिससे कोई क्रिया पूर्ण की जाती है — उससे पुष्टि बहुत नहीं मिलेगी; ऐसे मंत्रों का चयन कीजिए जिनसे पुष्टि प्राप्त हो।

54

क्या तंत्र दीक्षा में गुरु केवल ब्राह्मण ही होते हैं?

तंत्र में गुरु की जाति का प्रश्न

· 34:10–34:52 · Also a question

वक्ता कहते हैं इसका कोई ऐसा उत्तर देना संभव नहीं, क्योंकि तंत्र के मार्ग में यह विषय थोड़ा अलग हो जाता है।

पूछा गया कि तंत्र दीक्षासक्षम गुरु द्वारा किसी मंत्र या साधना में औपचारिक दीक्षा। में गुरु सिर्फ ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है। ही होते हैं क्या — वक्ता निश्चित उत्तर देने से मना करते हैं: इसका ऐसा कोई उत्तर देना संभव नहीं — क्योंकि तंत्र के मार्ग में यह विषय थोड़ा अलग हो जाता है।

55

भगवती तारा की साधना विधिवत दीक्षा लेकर ही — बिना दीक्षा के नहीं

तारा — केवल विधिवत दीक्षा से

· 34:53–35:01

दीक्षा लेकर विधिवत कीजिए। बिना दीक्षा के नहीं।

वक्ता भगवती तारा पर लौटते हैं और दूसरी बार पूछे जाने पर दो टूक कहते हैं: दीक्षासक्षम गुरु द्वारा किसी मंत्र या साधना में औपचारिक दीक्षा। लेकर विधिवत कीजिए — बिना दीक्षा के नहीं।

56

तुलजा भवानी में ग्रहण भर माँ को 108 साड़ियाँ पहनाकर सफेद वस्त्र से ढका जाता है — वक्ता के लिए नई जानकारी

तुलजा भवानी की ग्रहण परंपरा, वक्ता को अज्ञात

· 35:02–35:40

वक्ता को इसका पता नहीं था। तुलजा भवानी में चंद्र ग्रहण में माँ को एक साथ 108 साड़ियाँ पहनाकर ऊपर से सफेद वस्त्र से पूरा ढककर ग्रहण समाप्ति तक रखा जाता है।

एक श्रोता प्रश्न नहीं, जानकारी देते हैं — तुलजा भवानी की परंपरा: चंद्र ग्रहण में माँ को एक साथ 108 साड़ियाँ पहनाकर, फिर ऊपर से सफेद वस्त्र से पूरा ढककर ग्रहण समाप्ति तक रखा जाता है। वक्ता इसे नई जानकारी के रूप में लेते हैं — बहुत अच्छी जानकारी दी, माई की यह परंपरा उन्हें पता ही नहीं थी।

57

उसी रात ग्रहण हो तो पूर्णिमा व्रत का अर्घ कब दें?

ग्रहण और सूतक के बीच पूर्णिमा का अर्घ

· 35:41–36:05 · Also a question

दोपहर तक दे दीजिए। रात को विधिवत देना ही हो तो ग्रहण समाप्ति के पश्चात ही — सूतक में नहीं दे सकते। ग्रहण में किताब लेकर पाठ बिल्कुल कर सकते हैं।

वक्ता पहले व्यावहारिक विकल्प देते हैं: पूर्णिमा का अर्घ कल दोपहर तक दे दीजिए। रात को विधिवत देना ही हो तो ग्रहण समाप्ति के पश्चात ही दे सकते हैं, क्योंकि सूतक में नहीं दे सकते। साथ में पूछे गए दूसरे प्रश्न पर — ग्रहण में किताब लेकर पाठ किया जा सकता है क्या — कहते हैं बिल्कुल कर सकते हैं।

58

अपने इष्ट का कुंडली से कैसे पता करें?

लग्नेश, पंचमेश, नवमेश से इष्ट का निर्धारण

· 36:06–36:47 · Also a question

लग्न कुंडली देखिए: लग्नेश, पंचमेश, नवमेश — इन तीनों में जो बली हो उसके अनुसार इष्ट देवता का निर्धारण हो सकता है — अगर कुंडली के अनुसार ही करना है तो।

वक्ता ज्योतिषीय विधि एक शर्त के साथ बताते हैं। लग्न कुंडली में देखिए; लग्नेश, पंचमेश, नवमेश — इन तीनों में जो बली हो, उसके अनुसार इष्ट देवता का निर्धारण किया जा सकता है। अंतिम वाक्य दावे को सीमित करता है: अगर कुंडली के अनुसार ही करना है तो।

59

दशकों पहले जन्म के कुछ दिन बाद, नामकरण से पहले गुजरे शिशु को पितरों में लिखना आवश्यक नहीं

बिना नाम के शिशु की मृत्यु पितरों में नहीं लिखी जाती

· 36:48–37:08

आवश्यक नहीं। 60-65 साल पहले जन्म के कुछ दिन बाद गुजरे बच्चे का उस समय तक नाम भी नहीं रखा गया होगा — इसलिए वक्ता कहते हैं उनको लिखने की आवश्यकता नहीं।

60

हॉस्टल में विधि संभव न हो तो ग्रहण में हनुमान चालीसा कर सकते हैं

पूरी विधि संभव न हो तो हनुमान चालीसा

· 37:09–37:19

हाँ — बिल्कुल हनुमान चालीसा कीजिए।

एक छात्र बताते हैं कि कॉलेज हॉस्टल में रहने के कारण विधि नहीं हो पाती, तो ग्रहण में हनुमान चालीसा कर सकते हैं क्या। वक्ता कहते हैं बिल्कुल करिए हनुमान चालीसा।

61

अकाल मृत्यु की आत्माएँ तंत्र से दूसरे घर भेजी जा सकती हैं — चौखट पर ही उनसे युद्ध होता है और वहीं वे टूटती हैं

चौखट — जहाँ विरोधी शक्तियों से पहला युद्ध होता है

· 37:20–38:42

वक्ता कहते हैं तंत्र से यह संभव है, और अकाल मृत्यु वाली आत्माएँ परेशान करती ही हैं क्योंकि उनकी गति नहीं होती। उपाय है चौखट मजबूत करना — चौखट पर ही ऐसी शक्तियों से युद्ध होता है और वहीं वे हारती हैं; जिस घर में चौखट नहीं, वहाँ वे सीधे घुस जाती हैं।

62

क्या ग्रहण काल में दुर्गा सप्तशती का पाठ कर सकते हैं?

ग्रहण में सप्तशती, और एक मंत्र का जप बेहतर क्यों

· 38:43–39:44 · Also a question

हाँ, दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ कर सकते हैं — ऐसा नहीं कि नहीं कर सकते। लेकिन जप ज्यादा अच्छा है: किसी एक मंत्र का चयन करके पूरे ग्रहण में जप करना उत्तम है, हालाँकि सप्तशती भी जप मंत्रों की ही है।

63

पितरों के लिए नया विधान पक्ष के बीच में शुरू नहीं हो सकता — चाँदी की सुपारी वाला कच्चे दूध का अभिषेक अनंत से शुरू होना था

पक्ष के बीच में नया विधान शुरू नहीं होता

· 39:45–40:52

इसका शुभारंभ अनंत (अनंत चतुर्दशी) से कर देना चाहिए था। पुरानी हो, पहले से चल रही हो, तो कर सकते हैं; लेकिन नई अभी लाकर कल से नहीं कर सकते।

64

गुरु के बारे में जानने का अधिकार तभी है जब वे आपको दीक्षा देने वाले हों

गुरु का आकलन तभी, जब दीक्षा का प्रस्ताव हो

· 40:53–41:44

गुरु के बारे में जानने का अधिकार तभी है जब वे आपको दीक्षा देने वाले हों — और वक्ता स्वयं को उतना सामर्थ्यशाली नहीं मानते। यहाँ से जो दिव्य मिल रहा है वह लीजिए, जीवन में प्रयोग कीजिए; उनके रूप, साधन, खान-पान या मित्र-शत्रु का आकलन मत कीजिए।

65

अनुष्ठान के समय ब्रह्मचर्य नष्ट होने से कैसे रोकें?

तन के साथ मन का ब्रह्मचर्य

· 41:45–42:30 · Also a question

मन और तन दोनों का अभ्यास चाहिए — मन का, कि कोई बुरा विषय आए ही नहीं; तन का, कि तन से कोई गलती हो ही नहीं, चाहे नयन का विषय हो या हाथ का। केवल शरीर से रुकना पर्याप्त नहीं: मन से न रुकें तो दिक्कत होगी ही।

66

माता-पिता और सास-ससुर जीवित हों तो पितरों के फॉर्म में दादा-परदादा से आगे के नाम लिखे जाते हैं

माता-पिता जीवित हों तो दादा-परदादा के नाम

· 42:31–42:44

हाँ — क्यों नहीं भर सकते। उसमें दादा, परदादा आदि के नाम लिखने हैं, इसलिए माता-पिता का जीवित होना बाधा नहीं। साथ में पूछा गया नवार्ण मंत्र — दीक्षित हैं तभी कर सकते हैं।

67

ग्रहण में पूजा घर बंद रहे तो जप कहाँ करें?

बंद पूजा घर के बाहर जप

· 42:45–43:03 · Also a question

पूजा रूम के बाहर कीजिए। पूजा घर बंद रहेगा, और भगवान जी के स्थान तक बाहर का कोई प्रकाश नहीं जाना चाहिए।

68

ग्रहण के बाद धारण किए कवच का धागा बदलना होता है?

ग्रहण सूतक के बाद कवच का धागा बदलना

· 43:04–43:31 · Also a question

हाँ — ग्रहण में सूतक लगता है, इसलिए धारण किए किसी भी कवच का धागा अगले दिन बदलना होता है। लकड़ी का दंड दूध से अभिषेक, दत्तात्रेय माला मंत्र और पंचोपचार-दशोपचार पूजन करके पुनः लगाया जाता है।

69

जो रोज जपते हैं वही ग्रहण में जपें — रोज की सप्ताक्षरी ग्रहण में भी सप्ताक्षरी

अपना नित्य मंत्र ही ग्रहण में जारी रखें

· 43:32–44:01

वही सप्ताक्षरी। रोज जो जपते हैं, ग्रहण काल में भी उसी का जप कीजिए — वही दिव्य होगा।

70

ग्रहण में बड़वानल स्तोत्र का पाठ सिद्धि के लिए कर सकते हैं?

ग्रहण में कभी कुछ नया शुरू न करें

· 44:02–44:21 · Also a question

हाँ, लेकिन तभी जब वह पहले से आपका अभ्यास हो। कल पहली बार badvanal-stotra का पाठ करने वाले हैं तो मत कीजिए — ग्रहण में उसी चीज का पाठ अधिकाधिक कीजिए जो पहले से करते आए हैं।

71

ग्रहण में कवच या माला उतारनी है?

ग्रहण में धारण की कोई चीज नहीं उतरती

· 44:22–44:33 · Also a question

कुछ नहीं उतारना है। कोई कवच नहीं उतरेगा — सब पहने रहेंगे।

वक्ता सीधे कहते हैं कि ग्रहण में कुछ नहीं उतारना है — न कवच, न माला। कोई कवच नहीं उतारना है; सब पहने रहेंगे।

72

कुलदेवता सोखा बाबा हों तो वे भगवान वीरभद्र हैं, और भगवती भद्रकाली की कुलदेवी रूप में पूजा हो सकती है — बड़े-बुजुर्गों से पूछकर

सोखा बाबा वीरभद्र रूप में, साथ में कुलदेवी भद्रकाली

· 44:34–45:10

कुलदेवता सोखा बाबा हैं तो सोखा बाबा वीरभद्र भगवान हैं, और भगवती भद्रकाली की कुलदेवी के स्वरूप में पूजा कर सकते हैं — लेकिन बड़े-बुजुर्गों से पूछकर।

73

सप्तश्लोकी के नित्य हवन में 108 पाठ पर हर मंत्र से सात आहुति; क्षेत्रपाल बलि और पूर्णाहुति रोज नहीं

नित्य हवन में आहुति संख्या और क्या छोड़ा जाता है

· 45:11–47:01

नित्य हवन में क्षेत्रपाल बलि रोज नहीं करनी है, और पूर्णाहुति भी रोज नहीं देनी है। 108 पाठ पर हर मंत्र से सात-सात आहुति सर्वश्रेष्ठ — पाँच, सात या ग्यारह, सब चलेगा, और एक देनी हो तो एक।

74

ग्रहण काल में मंत्र सिद्धि का संकल्प कैसे लें — मानसिक या बोलकर?

संकल्प सूतक से पहले, और बोलकर

· 47:02–49:29 · Also a question

गणपति (गणेश) पूजन और संकल्प सूतक लगने से पहले ही पूर्ण कर लें, बाद में नहीं। फिर शाम को मानसिक रूप से स्मरण करें कि पूर्व उच्चारित संकल्प के अंतर्गत यह जप कर रहे हैं। और संकल्प बोलकर लें — मानसिक नहीं।

75

जो कामाख्या क्षेत्र में ही हैं, वे ग्रहण में कामाख्या कवच ही करें

कामाख्या में कामाख्या कवच

· 49:30–49:58

अगर कामाख्या में ही हैं तो ग्रहण में कामाख्या कवच कर लीजिए।

76

मंत्र जप शुरू करने के बाद सिर भारी, थकान, चक्कर आएँ तो जप की संख्या कम करें — साथ में शिव अभिषेक और बटुक भैरव

ऊर्जा सामर्थ्य से अधिक बने तो जप-संख्या घटाना

· 49:59–50:30

जप की संख्या कम कर दीजिए — ऊर्जा अधिक बन रही है। भगवान शिव का अभिषेक शुरू कर दीजिए ताकि ऊर्जा संतुलित हो और सामर्थ्य इतना बढ़े कि उसे संभाल सकें, और साथ में बटुक भैरव जी का पाठ कीजिए।

77

क्या ग्रहण काल में प्रयोग किया जा सकता है?

ग्रहण में प्रयोग — सीधा निषेध

· 50:31–51:39 · Also a question

नहीं। वक्ता कहते हैं ग्रहण काल में प्रयोग केवल दुष्ट लोग करते हैं, दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए। साधक, सेवक और सही मार्ग पर चलने वाले ग्रहण में अपने इष्ट के मंत्र का जप करें, उसकी सिद्धि का प्रयत्न करें, भजन करें — badvanal-stotra सिद्ध कीजिए, प्रयोग कभी मत कीजिए।

78

स्थान और कुल के देवी-देवता प्रसन्न हों तभी तीर्थ सफल होता है — विंध्यवासिनी की यात्रा संभव न हो तो उपाय

तीर्थ से पहले स्थान और कुल के देवी-देवता

· 51:40–52:26

भगवती विंध्यवासिनी के नाम से एक दीप प्रज्वलित करना आरंभ कीजिए और "या देवी सर्वभूतेषु क्षमा रूपेण संस्थिता" मंत्र का यथासामर्थ्य 21, 27 या 108 बार जप कीजिए। कुलदेवी या कुलदेवता के निमित्त अलग दीप जलाइए, और स्थान के देवी-देवताओं का पूजन कीजिए — घर, कुल और स्थान के देवी-देवता प्रसन्न हों तभी तीर्थ सफल होता है।

79

ग्रहण के सूतक के बाद माला आदि की शुद्धि और अग्नि स्पर्श जरूरी है?

ग्रहण सूतक मृत्यु या जन्म सूतक नहीं — और गंगा जी को ग्रहण नहीं लगता

· 52:27–53:32 · Also a question

नहीं। अग्नि स्पर्श मृत्यु और जन्म सूतक में होता है, ग्रहण सूतक में नहीं। गंगाजल का छिड़काव कर दीजिए, या तुलसी पत्र से सामान्य जल का, तो सब शुद्ध — उसमें अग्नि स्पर्श का कोई प्रावधान नहीं।

80

अनुष्ठान में हर पाठ पर विनियोग-न्यास दोहराना पड़ता है?

विनियोग-न्यास एक ही बार, हर पाठ पर नहीं

· 53:33–54:29 · Also a question

एक ही बार — जप में विनियोग और न्यास एक बार किया जाता है, बार-बार नहीं। लेकिन कुंजिका (सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्) और नवार्ण मंत्र का जप वही करे जो दीक्षित हो और जिसे गुरु आदेश हो।

81

भय अधिक लगे तो देवता के समक्ष उनके सामर्थ्य का माहात्म्य पढ़ें — हनुमान जी के लिए "अतुलित बलधामं", उग्र भाव से

भय निवारण के लिए देवता के समक्ष उनके माहात्म्य का पाठ

· 54:30–55:29

घर पर उग्र भाव से हनुमान जी का पाठ कीजिए। सिद्धांत यह कि देवता के समक्ष वह प्रसंग पढ़ें जिसमें उन्होंने अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन किया — हनुमान जी के लिए "अतुलित बलधामं" का विधिवत उच्चारण।

82

हनुमान चालीसा की जगह विचित्र वीर हनुमान माला मंत्र करना बेहतर है?

चालीसा अपने आप में संपूर्ण, और उग्र माला मंत्र से सुरक्षित

· 55:30–56:01 · Also a question

माला मंत्र कर सकते हैं, लेकिन उसे हनुमान चालीसा से रिलेट करेंगे तो पता चलेगा कि तुलसीदास जी ने उसका समावेश उसमें करवाया है। माला मंत्र उग्र है, जिसे अधिकार नहीं वह परेशान हो सकता है — हनुमान चालीसा अपने आप में संपूर्ण है।

83

हनुमान चालीसा का संपुट पाठ कैसे करें?

संपुट की दो चालीसा-चौपाइयाँ और उनका फल

· 56:02–56:48 · Also a question

"नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा" से संपुट कीजिए, या "भूत पिसाच निकट नहिं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै" से। एक बार संपुट करने का फल 100 पाठ के बराबर, और भय नष्ट।

84

दस मसान वाले साबर मंत्रों में से अपने कुलदेव का मंत्र ग्रहण में जप सकते हैं

ग्रहण में कुलदेव का मसान साबर मंत्र

· 56:49–57:01

बिल्कुल — अगर वे आपके कुलदेवता हैं तो उस मसान का सबर मंत्र ग्रहण में आराम से जप सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं।

एक श्रोता पूछते हैं कि साबर के दस मसान वाले मंत्रों में से जो उनके कुलदेव हैं, उनका जाप ग्रहण में कर सकते हैं क्या। वक्ता बिना हिचक अनुमति देते हैं: बिल्कुल कीजिए, कोई दिक्कत नहीं — अगर वे आपके कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। हैं तो वह सबर मंत्र आराम से कर सकते हैं।

85

लंबे समय से अभिचार-पीड़ित परिवार: हर साल सर्व प्रयोग महाविद्या अनुष्ठान, नवरात्र में एक ब्राह्मण से चंडी पाठ, और पंचबली व चौखट पूजन

लंबे अभिचार से पीड़ित घर का तीन-भाग उपाय

· 57:02–57:57

दो-तीन साल तक तीन चीजें: घर में साल में एक बार योग्य जानकार से सर्व प्रयोग महाविद्या अनुष्ठान; नवरात्रि में एक ब्राह्मण से नौ दिन चंडी पाठ और हवन; और कुल देवी-देवताओं के लिए पंचबलि, यथाशक्ति दान और चौखट का पूजन।

86

पितृ पक्ष में शुभ काम न करने की रीति ठीक है?

परंपरा से मिली रीति पर निर्णय न देना

· 57:58–1:00:19 · Also a question

वक्ता रीति के ठीक या गलत होने पर कोई जजमेंटल स्टेटमेंट देने से मना करते हैं। उन्हें जो बताया गया है वे वही करेंगे; श्रोता अपनी इच्छा अनुसार करें।

87

दिव्य अनुभव कभी सार्वजनिक नहीं किया जाता — कामाख्या क्षेत्र का तो बिल्कुल नहीं

दिव्य अनुभव सार्वजनिक नहीं किए जाते

· 1:00:20–1:00:48

वक्ता व्याख्या करने से मना करते हैं और श्रोता से कहते हैं कि इसे मत बताइए। ऐसी चीजें कभी सार्वजनिक नहीं करनी चाहिए — कामाख्या क्षेत्र का अनुभव तो बिल्कुल नहीं।

88

64 योगिनियों में कई केवल नकारात्मक शक्तियों का भक्षण करती हैं, कई धन के स्रोत खोलती हैं — कवच से ज्यादा महत्व नाम पाठ का

योगिनियाँ क्या करती हैं, और कवच से ज्यादा पाठ क्यों

· 1:00:49–1:04:24

64 योगिनी में कई सिर्फ नकारात्मक शक्तियों का भक्षण करती हैं, कई धन के अनेक स्रोत खोल देती हैं; बच्चों पर बाल ग्रह का कष्ट नहीं आता और घर में लाग नहीं लगती, क्योंकि ये सब योगिनियों के अधीन हैं। कवच वैकल्पिक है — वक्ता का असली उद्देश्य है कि लोग नाम पाठ करें।

89

नित्य नामावली पाठ के लिए विनियोग-न्यास चाहिए?

नित्य पाठ को विधि-नियम से मुक्त रखना

· 1:04:25–1:05:01 · Also a question

आवश्यकता नहीं। विनियोग-न्यास करेंगे तो विधि-नियम में चले जाएँगे, और उतने विधि-नियम में जाएँगे तो रोज का नहीं कर पाएँगे — यही समस्या है।

90

जहाँ कुलदेवी का जीवन में तीन बार केवल दर्शन होता है, पूजन नहीं, वहाँ दर्शन ही करना है

जहाँ परंपरा केवल दर्शन की है, वहाँ दर्शन ही

· 1:05:02–1:05:21

कोई पूजा नहीं होती, दर्शन होता है — तो दर्शन ही कीजिए। वक्ता कुलदेवी की कुल-परंपरा को जैसी है वैसी स्वीकार करते हैं, उसमें कुछ जोड़ते नहीं।

एक श्रोता बताते हैं कि उनकी कुलदेवी, माँ चामुंडाचंड और मुंड का वध करने पर देवी को प्राप्त हुआ स्वरूप, जिससे यह नाम पड़ा। का रूप, जीवन में केवल तीन बार दर्शन के लिए हैं, वहाँ जाकर कोई पूजन नहीं होता, और घर की व्यवस्था अलग है। वक्ता व्यवस्था को बिना बदले स्वीकार करते हैं: ठीक है — कोई पूजा नहीं होती, दर्शन होता है, दर्शन ही कीजिए।

91

जो साधना उन्होंने स्वयं नहीं की, उसके लिए कहते हैं — करके बताइए — और वे चेला क्यों नहीं बनाते

करके बताइए — और गुरु-शिष्य संबंध की दशा

· 1:05:22–1:06:46

हर साधना उन्होंने स्वयं नहीं की — सोखा बाबा उनके कुल के देवता नहीं, न उन्होंने वह जप किया — तो प्रश्नकर्ता स्वयं करके बताएँ, वे अन्य लोगों को बताएँगे। आजकल के शिष्य इतनी जल्दी बुरा मान जाते हैं कि सच्चा गुरु-संबंध टिकता नहीं: न गुरु बनो, न चेला बनाओ, और अभिमान समाप्त हो तभी गुरु के चरणों में गिरो।

92

महाकुंभ के समय आए शिव कवच के साथ शिव माला मंत्र करना बहुत दिव्य रहेगा

शिव कवच के साथ शिव माला मंत्र

· 1:06:47–1:07:04

महाकुंभ (कुंभ) के समय आए शिव कवच के लिए शिव माला मंत्र कीजिए — वक्ता कहते हैं बहुत दिव्य रहेगा।

एक श्रोता महाकुंभ (कुंभ) के समय आए शिव कवच के बारे में पूछते हैं। वक्ता उसके साथ एक पाठ जोड़ते हैं: उस कवच के लिए शिव माला मंत्र कीजिएगा तो बहुत दिव्य रहेगा। यहाँ और कोई विधि नहीं देते।

93

प्रतियोगी परीक्षा में अच्छा रैंक लाने के लिए कौन सी साधना करें?

संकट नाशन — परीक्षा के लिए सबसे आसान और प्रभावी

· 1:07:05–1:07:38 · Also a question

भगवान गणपति (गणेश) का संकट नाशन स्तोत्र। गणपति जी के समक्ष बैठकर उनके 12 नामों का कम से कम 12 पाठ प्रतिदिन; अधिक समय हो तो दूर्वा चढ़ाकर 108 पाठ। वक्ता इसे दिव्य, अद्भुत और सबसे आसान कहते हैं।

94

दीक्षा नहीं, उपदेश रूप में मिला बटुक भैरव मंत्र जप सकते हैं?

उपदेश में मिला मंत्र जपा जा सकता है

· 1:07:39–1:07:49 · Also a question

हाँ — उपदेश रूप में दिया है तो उपदेश मिला है, कर सकते हैं।

वक्ता इस स्थिति में उपदेश को पर्याप्त अधिकार मानते हैं: बटुक भैरव मंत्र बिना विधिवत दीक्षासक्षम गुरु द्वारा किसी मंत्र या साधना में औपचारिक दीक्षा। के, उपदेश रूप में दिया गया है — तो उपदेश मिला है, कर सकते हैं।

95

भगवान के नाम में गलती मत ढूँढ़िए — "मुरारी" हो या "मुरारे", दोष नहीं; और देव कार्य अनिवार्य हो न हो, पितृ कार्य अनिवार्य है

भगवान के नाम में गलती न ढूँढ़ना

· 1:07:50–1:08:51

भगवान के नाम में गलती मत ढूँढ़िए, इतना चिंतन मत कीजिए। भगवान के नाम में आगे-पीछे होने में कोई गलती नहीं, चिंता की आवश्यकता नहीं — वक्ता वाल्मीकि जी का प्रसिद्ध प्रसंग याद दिलाते हैं। अलग से: देव कार्य अनिवार्य हो न हो, पितृ कार्य हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य है।

96

क्या नवार्ण मंत्र का जप बिना दीक्षा के, पुस्तक की विधि देखकर, किया जा सकता है?

नवार्ण के लिए गुरु अनिवार्य, बिना अपवाद

· 1:08:52–1:09:31 · Also a question

नहीं। नवार्ण मंत्र का जाप बिना गुरु दीक्षा, बिना गुरु कृपा के नहीं करना चाहिए, और पुस्तक देखकर करने के समर्थन में वक्ता कभी नहीं रहे। यह महामंत्रों का राजा है, जिसका पूरा विधि-विधान शास्त्र में उल्लिखित है — अपनी मर्जी से करना उचित नहीं।

97

गंगा किनारे बैठकर ग्रहण काल में बटुक भैरव स्तोत्र या सतनाम का जाप अपने आप में दिव्य

ग्रहण में गंगा किनारे बटुक भैरव स्तोत्र

· 1:09:32–1:10:02

गंगा किनारे बैठकर ग्रहण काल में बटुक भैरव स्तोत्र या सतनाम का जाप, वक्ता कहते हैं, अपने आप में दिव्य विषय है — बिल्कुल करना चाहिए।

98

जमीन या खेत लेने के लिए कोई साधना है?

साधना चुनने से पहले चतुर्थ भाव देखना

· 1:10:03–1:11:05 · Also a question

एकदम प्रॉपर्ली केवल इसी के लिए करना हो तो लग्न कुंडली में चतुर्थ भाव का अधिपति कौन है, किस नक्षत्र के साथ है, यह देखकर उससे संबंधित साधना करें। साथ में मंगल देव और भगवती भूमि के अनुष्ठान का भी विधान है।

99

रुद्राष्टकम का क्या माहात्म्य है?

देव अपराध और श्राप से मुक्ति — रुद्राष्टकम

· 1:11:06–1:12:38 · Also a question

बहुत ही माहात्म्य है। किसी प्रकार का देव अपराध हो जाए, मंत्र श्राप लग जाए, किसी का शाप लग जाए — यहाँ तक कि भगवान शिव का भी श्राप हो — तो रुद्राष्टकम् के अनुष्ठान से तुरंत निवृत्ति हो जाती है। पितृ उपाधि की भी शांति हो जाती है।

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पितृ मलिन हों तो क्या करें?

चौखट — जहाँ घर की आधी समस्याएँ सुलझती हैं

· 1:12:39–1:14:23 · Also a question

दो काम: श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय का पाठ, और भगवती गंगा के 108 नाम (गंगा अष्टोत्तरशतनाम) का पाठ। जाप के समय रखा जल पूरे घर में छिड़किए, चौखट धुलिए — चौखट न हो तो आधा अनुष्ठान ऐसे ही सफल नहीं होता।

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पूरे पक्ष में पितरों के निमित्त यथासंभव सेवा-पूजा करें, और ग्रहण काल का लाभ लें

पक्ष आरंभ से पहले समापन निर्देश

· 1:14:24–1:15:18

कल से आरंभ हो रहे पक्ष में पितरों (पितृ) के निमित्त जितना हो सके सेवा-पूजा करें, ग्रहण काल का लाभ लें, और — जो गंगा जी के क्षेत्र में या अन्य दिव्य क्षेत्रों में हैं — उन क्षेत्रों का लाभ लें।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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