पितृ पक्ष लाइव प्रश्नोत्तर: पंचबली, ग्रहण का जप और चौखट
पितृ पक्ष के विधान और उसी रात के ग्रहण पर लाइव प्रश्नोत्तर।
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गीता पाठ का अलग से कोई प्रयोग नहीं बनता
पितृ पक्ष में गीता के 11वें अध्याय का प्रयोग कैसे करें?
प्रयोग करने की आवश्यकता नहीं है। संकल्प करके केवल पाठ कीजिए, माहात्म्य सहित — वही प्रयोग है।
लाइव का पहला प्रश्न यह है कि पितृ पक्ष में गीता के 11वें अध्याय का 'प्रयोग' किस प्रकार करें — मानो पाठ के ऊपर कोई और तकनीक चढ़ानी हो। वक्ता इस सोच को ही अस्वीकार कर देते हैं: इसका प्रयोग करने की आवश्यकता ही नहीं है। संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। कीजिए और पाठ मात्र कीजिए — अध्याय के साथ माहात्म्य का भी पाठ कीजिए। संकल्प लेकर किया गया पाठ ही प्रयोग है; उसके ऊपर कुछ और जोड़ने की न आवश्यकता है, न कुछ जोड़ने को है।
योगिनी नामावली का सादा पाठ, बिना चक्र विधि के
ग्रहण में 64 योगिनी नामावली का सादा पाठ ही पर्याप्त है — चक्र विधि की आवश्यकता नहीं
चक्र विधि की आवश्यकता नहीं है — ग्रहण काल में केवल नामावली का पाठ ही बहुत है।
पूछा गया कि ग्रहण काल में 64 योगिनी नाम मंत्र का जाप चक्र विधि से किया जा सकता है क्या — वक्ता कहते हैं कि चक्र विधि की कोई आवश्यकता नहीं है। केवल उनकी नामावलीदेवता के नामों की लिखित सूची — जैसे दुर्गा के 108 नाम, हवन में प्रत्येक नाम पर पृथक आहुति देने की सुविधा हेतु अलग से लिखे जाते हैं। का पाठ — नामों का सीधा क्रम — ही बहुत है। जो लोग ग्रहण के बजाय अगले दिन से जप शुरू करने वाले हैं, उनके लिए वे बिना माला के जप की एक बात जोड़ते हैं; उस स्थान पर ट्रांसक्रिप्ट की पंक्ति अस्पष्ट है, इसलिए उसके सटीक शब्दों पर हम भरोसा नहीं कर रहे।
ग्रहण-रात्रि जप का समय, और उसके बाद के अर्पण
ग्रहण की रात साबर जप लगातार पूरे ग्रहण भर चलता है; बाद में मंदिर में जप हो तो दीपक, धूप, पुष्प, मीठा नैवेद्य और नौ लौंग की बलि
पूरे ग्रहण भर लगातार जप करें — उनके अनुसार रात 9:45 से 1:40 तक। ग्रहण में दीपक आदि की आवश्यकता नहीं; उसके बाद मंदिर में जप करना हो तो कर्मसाक्षी दीपक, धूप, सुगंधित पुष्प, मीठा नैवेद्य, और जप के उपरांत कम से कम नौ लौंग व कपूर दीपक में प्रज्वलित करके बलि के रूप में।
एक श्रोता वामते काली के विधान के बारे में पूछते हैं — काली मंदिर में रात को दीप जलाकर प्रारंभिक क्रिया करना। वामते काली के किसी भी सबर मंत्र की सिद्धि ग्रहण में करनी हो तो वक्ता समय बताते हैं — प्रचलित आंकड़ों के अनुसार 9:57 से 1:27, या उनके अपने अनुसार रात 9:45 से 1:40 तक — और निर्देश है कि इस पूरे समय लगातार जप करें। ग्रहण के समय, वे कहते हैं, दीपक आदि किसी सामग्री की आवश्यकता नहीं रहेगी। ये आवश्यकताएँ उसके पश्चात मंदिर में किए जाने वाले जप पर लागू होती हैं: एक दीपक कर्म साक्षी के रूप में अवश्य जला लें, धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है। जलाएँ, थोड़े सुगंधित पुष्प चढ़ाएँ, और नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। में कुछ मीठा चढ़ा सकें तो चढ़ा दें। जप के उपरांत कम से कम नौ लौंग और कपूर एक दीपक में रखकर बलि के रूप में प्रज्वलित कर दें।
तीन पीढ़ी, सात पीढ़ी, और आठवीं पीढ़ी का जन्म सातवीं को क्यों मुक्त करता है
कितनी पीढ़ी तक के पितरों का पूजन होता है?
तीन पीढ़ियों तक, या जितनी पीढ़ी आपको ज्ञात हैं। विधान सात पीढ़ी तक का है, क्योंकि आठवीं पीढ़ी के जन्म पर सातवीं पीढ़ी मुक्त हो जाती है — गया जी में सात पीढ़ी बैठती हैं, जबकि त्रिपिंडी श्राद्ध आदि में तीन: पिता, दादा, परदादा।
वक्ता उत्तर देते हैं कि पूजन तीन पीढ़ियों तक का होता है, या प्रश्नकर्ता को जितनी पीढ़ी ज्ञात हों, उन सबका किया जा सकता है। फिर वे सात पीढ़ी के विधान के पीछे का गणित समझाते हैं: जब आठवीं पीढ़ी का जन्म होता है तो पहले की सातवीं पीढ़ी की सद्गतिदिवंगत प्राणी की शुभ गति, जो पितृ कर्म और तर्पण का उद्देश्य है। हो जाती है, वे मुक्त हो जाते हैं — इसीलिए विधान सात पीढ़ियों तक है, उससे आगे नहीं। दोनों विधान इसी रेखा पर बँटते हैं — गया जी में पूरा विधि-विधान (गया श्राद्ध) सात पीढ़ी तक बैठाता है, जबकि त्रिपिंडी श्राद्ध आदि में तीन पीढ़ी का विधान रहता है: पिता, दादा, परदादा।
कोई भी मंत्र इतना जोर से नहीं कि सामने वाले को सुनाई दे
ग्रहण में साबर मंत्र जोर से बोलकर, उपांशु या मानसिक — कैसे जपें?
सबर मंत्र कभी जोर-जोर से बोलकर नहीं जपा जाता। कोई भी मंत्र इतना जोर से नहीं बोला जाता कि सामने वाले को सुनाई दे — बस मुख के भीतर बुदबुदाहट चले।
वक्ता इसे बचकाना प्रश्न कहकर उत्तर शुरू करते हैं। सबर मंत्र किसी भी स्थिति में जोर-जोर से बोलकर नहीं जपा जाता। फिर वे नियम को साबर मंत्र से आगे सभी मंत्रों पर लागू करते हैं: कोई भी मंत्र इतने जोर से नहीं बोला जाता कि सामने बैठे व्यक्ति को सुनाई दे। सही स्वर वह है जिसमें मुख के भीतर बुदबुदाहट चले (उपांशु जप) — बस इतना, उससे अधिक नहीं।
चुड़ैल जैसी शक्ति निश्चित हो तो महाभैरव नहीं, बटुक भैरव
बार-बार गर्भ नष्ट हो और चुड़ैल जैसी शक्ति हो तो महाभैरव से अच्छा बटुक भैरव
यहाँ महाभैरव से अच्छा बटुक भैरव रहेगा — बशर्ते प्रश्नकर्ता को यथार्थ में यह पता हो कि चुड़ैल जैसी शक्ति ही है।
एक श्रोता अपने मित्र की बात रखते हैं — संतान प्राप्ति में बहुत समस्या है, गर्भ बार-बार नष्ट हो जाता है, और चुड़ैललोकभाषा में बाधा देने वाली स्त्री-प्रेत के लिए प्रयुक्त नाम। जैसी शक्ति है; उन्हें ग्रहण में महाभैरव मंत्र करने को कहा गया है। वक्ता दिशा बदल देते हैं: मित्र को महाभैरव के बजाय बटुक भैरव जी का करने को कहिए। साथ में एक शर्त जोड़ते हैं — अगर यथार्थ में आपको यह सत्य पता है कि चुड़ैल जैसी शक्ति ही है, तब बटुक भैरव जी का करने कहिए।
एक कवच धारण करते हुए दूसरा कवच लेना चाहिए या नहीं
एक कवच पहले से धारण हो तो दूसरे की आवश्यकता नहीं — घर-परिवार के लिए रखें, वह भी आर्थिक सक्षमता हो तो
यह निर्णय प्रश्नकर्ता को स्वयं लेना है। वक्ता के अनुसार जब एक कवच पहले से धारण किया हुआ है तो दूसरे की आवश्यकता नहीं; भविष्य या घर-परिवार के लिए आर्थिक रूप से सक्षम हों तो रख सकते हैं, नहीं तो कोई आवश्यकता नहीं।
पूछा गया कि कामाख्या कवच पहले से है, तो 64 योगिनी कवच भी ले लें क्या — वक्ता निर्णय प्रश्नकर्ता पर छोड़ते हैं: यह निर्णय आपको लेना है। फिर अपना मत स्पष्ट रखते हैं: जब एक कवच पहले से धारण किए हुए हैं, तो उनके अनुसार और कवच की आवश्यकता नहीं है। दो रास्ते खुले छोड़ते हैं। भविष्य के लिए, या धारण करने वाले के बजाय घर-परिवार के लिए चाहिए तो रख सकते हैं, पूजन कर सकते हैं। और निर्णायक बात वे साधन बताते हैं: आर्थिक रूप से सक्षम हैं तो रखें, नहीं तो कोई आवश्यकता नहीं है।
तैराक और डूबने वाला — एक उपदेश सबके लिए क्यों नहीं
जिसे तैरना आता है उसे कितना भी पानी तृप्त नहीं करता — माया के साथ खेलना आ जाए तो धन की लालसा की कोई सीमा नहीं रहती
जिसे तैरना नहीं आता वह दस फीट पानी में डूब जाता है, जबकि तैराक कितना भी गहरा पानी हो तैरता जाता है। जिसकी धन की लालसा केवल पुरुषार्थ के निमित्त है, उसके लिए एक सीमित राशि पर्याप्त है; जिसे माया के साथ खेलना आ गया, उसे 10, 20 या 100 करोड़ से भी तृप्ति नहीं होती।
वक्ता बात अपने ही एक प्रश्न से बनाते हैं: पानी में डूबकर मरने के लिए कितने फीट पानी चाहिए? 6 फीट का व्यक्ति 10 फीट पानी में डूबकर मर जाएगा। लेकिन जिसे तैरना आता है वह कितना भी गहरा पानी हो, तैरता जाएगा। इसी को वे धन पर लागू करते हैं। जिसकी धन की लालसा केवल पुरुषार्थसाधक का अपना सतत, तीव्र प्रयास — साधना का फल साधक के नियंत्रण में नहीं होता, किंतु यह पुरुषार्थ सदैव उसके हाथ में रहता है। के निमित्त है, उसके लिए 5-10 करोड़ काफी होंगे, चाहे वह लग्जरी जीवन जीना चाहे। लेकिन जिसे माया के साथ खेलना आ गया, उसे 10 करोड़ क्या, 20 करोड़ क्या, 100 करोड़ क्या — तृप्ति नहीं होगी; वह तैरता रहेगा, ऊपर आता रहेगा। यही, वे कहते हैं, उन सुप्रसिद्ध कथावाचकों और सिद्धि-संपन्न दिखने वाले व्यक्तियों की व्याख्या है जिनके बारे में लोग कहते हैं कि इनके पास फलानी सिद्धि है, फलानी सिद्धि है: वे बस माया से खेल रहे हैं। अपने आचरण की तुलना वे उनसे करते हैं: वे भी वही धृष्टता कर सकते थे कि स्वयं को महासिद्ध घोषित करें और फिर करोड़ माँगें, पर्चा बनवाने के लाख माँगें — लेकिन उन्हें इन सब चीजों की आवश्यकता नहीं, जो होता है वह श्रोताओं के समक्ष स्पष्ट रखा जाता है।
कवच दस प्रतिशत, साधक की मेहनत नब्बे
कवच 10% है — 90% साधक की अपनी मेहनत; कवच सुरक्षा देकर मार्ग खोलता है, काम अपने आप नहीं करता
कवच उस व्यक्ति के लिए है जो कष्ट में डूबा है — जिसके घर में भूत-प्रेत नाच रहे हैं, रोग है, या अभिचार का कष्ट है — उसके लिए नहीं जिसके पास किसी चीज की कमी नहीं। और वहाँ भी, वक्ता कहते हैं, कवच केवल 10% है: 90% तो साधक की अपनी साल भर की मेहनत और ग्रहण में बैठकर किया गया जप है। कवच सुरक्षा देकर बढ़ोतरी करता है; वह केवल एक मार्ग देता है।
ग्रहण के कवच-कार्य को भौतिकतावादी कहने वाले कमेंट का उत्तर आगे बढ़ाते हुए वक्ता बताते हैं कि कवच वास्तव में किसके लिए है: जो व्यक्ति कष्ट में डूबा पड़ा है, जिसके घर में भूत-प्रेत नाच रहे हैं — उसे ग्रहण में बनाकर कवच क्यों न दें, अगर उनके पास वैसे सक्षम साधक हैं। संख्या की सीमा वे साफ बताते हैं: अकेले दो, चार, पाँच, बहुत अभ्यास हो तो दस बना लेंगे; स्वयं को दो जगह प्रकट करके 10-10 नहीं बना सकते, इसलिए जो साधक अपने पास हैं, उनके माध्यम से काम चलता है। फिर सिद्धांत। आपके जीवन में धन की कमी नहीं, सामर्थ्य की कमी नहीं, शरीर में कोई रोग नहीं, कोई भूत-प्रेत परेशान नहीं कर रहा, आपके ऊपर कोई अभिचार कष्ट नहीं — तो आपके लिए वह कवच कुछ नहीं है, तुच्छ है; लेकिन उन लोगों के लिए ओछापन न दिखाएँ जिनके लिए वह जीवन है, प्राण है। और वह सुधार जो वे सदैव करते हैं: परिवार का रक्षण हुआ तो उसमें केवल उनका निमित्त कभी नहीं होता। वे साथ में दूसरा स्क्रीनशॉट भी डालते हैं — देखो, यह व्यक्ति मेहनत कर रहा है। अगला व्यक्ति साल भर मेहनत किया है, अगला ग्रहण में बैठकर जप कर रहा है, तब जाकर इन चीजों का पूरा सहयोग मिलता है। वे यह दावा नहीं करते कि यहाँ से भेजे कवच ने अपने आप आर्थिक संपन्नता ला दी, सारे कष्ट मिटा दिए, सारे भूत-प्रेत नष्ट कर दिए। 90% तो सामने वाला व्यक्ति कर रहा होता है, उनका 10% ही होता है। यह 10% सुरक्षा देकर उसकी बढ़ोतरी करता है; उसे एक मार्ग देता है, बस।
बार-बार सार्वजनिक दान से दृष्टि दोष क्यों लगता है
पितरों के निमित्त धन सीधे किसी परिचित ब्राह्मण को गौ सेवा के लिए दें — सार्वजनिक रूप से नहीं, उससे दृष्टि दोष लगता है
प्रत्यक्ष नहीं, निजी रूप से दें। सार्वजनिक देने से दूसरे देने नहीं लगते; स्क्रीनशॉट घूमते हैं और देने वाले को दृष्टि दोष लगता है। इससे भी अच्छा — अपने कुल के या किसी परिचित ब्राह्मण को सीधे देकर पितरों के निमित्त गौ सेवा आदि कराएँ।
एक श्रोता जो पितरों (पितृ) के निमित्त बार-बार प्रत्यक्ष रूप से धन भेजते हैं, उन्हें संबोधित करते हुए वक्ता की आपत्ति देने के तरीके पर है। प्रत्यक्ष नहीं, निजी रूप से दीजिए: प्रत्यक्ष देने से अन्य लोग तो देते नहीं, लेकिन लोगों को कष्ट बड़ा होता है। स्क्रीनशॉट अन्य ग्रुपों में घूमता है — देखिए इनके पास इतना पैसा जाता है, ये तो अब तक करोड़पति बन चुके होंगे। क्या जरूरत है आँख लगवाने की, वे पूछते हैं। उनका स्पष्ट और बार-बार का कहना है कि श्रोता सामने किसी ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है। को — अपने कुल के ब्राह्मण हों, या कोई जान-पहचान के व्यक्ति — सीधे देकर पितरों के निमित्त गौ सेवा आदि कराया करें। उनके पास भेजने की आवश्यकता ही नहीं है। जहाँ नजर पड़ेगी वहाँ देने से नजर में चढ़ेंगे, और किसी दिन बेकार में दृष्टि दोष लग जाएगा; रही उनकी बात, वे जोड़ते हैं, उन्हें तो लगा ही पड़ा है।
श्राद्ध पक्ष में नए विग्रह की स्थापना नहीं होती
क्या श्राद्ध पक्ष में भगवान का कोई नया विग्रह या फोटो घर ला सकते हैं?
नहीं — श्राद्ध पक्ष में कुछ मत लाइए, बिल्कुल कुछ मत कीजिए। स्थापना प्रथम नवरात्रि (नवरात्रि) में होती है।
मंदिर बंद हों तो गंगा जी का घाट
काशी में परिवार के साथ ग्रहण का जप गंगा जी के घाट पर — मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे
गंगा जी के घाट के किनारे। ग्रहण में मंदिरों के कपाट बंद हो जाएँगे, इसलिए बैठने की जगह हर जगह नहीं मिलेगी।
पूछा गया कि काशीगंगा तट पर बसी वाराणसी, जिसे सामान्य प्रलय से परे माना जाता है। में परिवार के साथ चंद्र ग्रहण की रात कहाँ जप करें, जहाँ कोई भगाए नहीं — वक्ता नदी किनारे भेजते हैं: गंगा जी के घाट के किनारे ही बढ़िया से सब चीज कर सकते हैं। कारण व्यावहारिक है: मंदिरों के कपाट बंद हो जाएँगे, तो बैठने की जगह हर जगह नहीं मिलेगी।
ग्रहण के आरंभ से अंत तक एक ही मंत्र
क्या ग्रहण में एक से अधिक स्तोत्र या मंत्र का जाप किया जा सकता है?
नहीं। ग्रहण के आरंभ से अंत तक एक ही मंत्र या कवच का जप होता है — वही सिद्ध होता है। बीच में छोड़कर दूसरा शुरू कर दिया तो दोनों में से कोई सिद्ध नहीं होगा।
वक्ता इसे पसंद नहीं, तय नियम की तरह कहते हैं: ग्रहण में एक से अधिक स्तोत्रदेवता की स्तुति का पाठ, जिसे बिना दीक्षा के भी पढ़ा जा सकता है, जबकि मंत्र के लिए दीक्षा अपेक्षित है। या मंत्र का जाप कभी नहीं किया जा सकता, क्योंकि ग्रहण के आरंभ से अंत तक एक ही मंत्र या कवच का जप करना चाहिए, तभी वह सिद्ध होगा। असफलता का उदाहरण भी देते हैं — किसी का 100 पाठ किए, बीच में समाप्त करके दूसरा जप शुरू कर दिया, तो दोनों में से कोई सिद्ध नहीं होगा। नियम अवधि का है, संख्या का नहीं। जप ग्रहण आरंभ होने से लेकर उसके पूर्ण होने तक चलना है, और इस पूरी अवधि में जिस मंत्र का जप होगा वही सिद्ध होगा (मंत्र सिद्धि)। आरंभ से अंत तक जप नहीं कर रहे हैं तो सिद्ध नहीं होगा। इसमें, वे कहते हैं, संख्या का कोई मायने ही नहीं है — मायने रखता है पूरे के पूरे समय का जप।
ग्रहण — सबसे आसान पुरश्चरण
चंद्र ग्रहण से मंत्र का पुरश्चरण कैसे पूर्ण होता है?
ग्रहण आरंभ होने से पहले संकल्प और गणपति (गणेश) पूजन कर लें, ग्रहण शुरू होने से 4-5 मिनट पहले जप शुरू करें, ग्रहण पूर्ण होने के 5-10 मिनट बाद तक करते रहें, फिर अगली सुबह दशांश हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन — पुरश्चरण पूर्ण, मंत्र जागृत।
वक्ता ग्रहण के पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। को सबसे सुलभ मार्ग बताते हैं, और यह भी कि वह किसके लिए है: जिसे गुरु से मंत्र प्राप्त हुआ है और जो उस मंत्र की सिद्धि के लिए सवा लाख, दस लाख का जप नहीं कर सकता। साढ़े तीन घंटे का चंद्र ग्रहण सामने है, तो पूरा विधान एक रात में समा जाता है। क्रम यह है: ग्रहण आरंभ होने से पहले ही संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है।, जप की प्रारंभिक क्रिया और गणपति (गणेश) पूजन कर लीजिए। ग्रहण शुरू होने से 4-5 मिनट पहले जप शुरू कर दीजिए और ग्रहण पूर्ण होने के 5-10 मिनट बाद तक जप करते रहिए। इससे उस मंत्र का पुरश्चरण पूर्ण हो जाएगा। अगले दिन सुबह उसका दशांशसाधना के चरणों को जोड़ने वाला दशमांश (एक-दसवां) अनुपात नियम — कुल जप संख्या के दसवें भाग जितना हवन, हवन के दसवें भाग जितना तर्पण, और तर्पण के दसवें भाग जितना मार्जन किया जाता है। हवन, फिर तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण।, मार्जनहवन-तर्पण-मार्जन की अनुष्ठान त्रयी को पूर्ण करने वाला पवित्र जल का शुद्धिकरण-छिड़काव। और ब्राह्मण भोजन आदि कर लीजिए। उस मंत्र का एक पुरश्चरण पूर्ण हो गया, उसका पूरा फल प्राप्त होगा, मंत्र जागृत हो जाएगा। ग्रहण में किया गया जप, वे जोड़ते हैं, कल्पवृक्ष के समान फल देने वाला कहा गया है — इतना सामर्थ्यवान हो जाता है वह मंत्र।
जिन पौधों के पास ग्रहण का जप हो सकता है
क्या छत पर लगे पौधों के पास ग्रहण का जप कर सकते हैं?
हाँ — आक (मदार), अपराजिता, पारिजात, शमी या तुलसी के पास। वक्ता इसे बहुत दिव्य विषय कहते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि चंद्र ग्रहण में छत पर लगे पौधों — आक (मदार)दूधिया लेटेक्स वाला एक पौधा (आक/मदार) — इसकी श्वेत किस्म (श्वेतार्क) घर की रक्षा हेतु समीप रोपी जाती है, परंतु इसका स्रोत महत्वपूर्ण है, क्योंकि दूधिया पौधों में जहाँ से लाए जाएं उसके अनुसार द्विविध (सकारात्मक या नकारात्मक) गुण होते हैं।, अपराजिता, पारिजात, शमीउपाय-अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक पत्ता — परंपरागत रूप से शनिवार को नहीं तोड़ा जाता; शनिवार के अनुष्ठान हेतु आवश्यक हो तो इसे पूर्व शुक्रवार को तोड़ लिया जाता है।, और तुलसी जी — के पास जप कर सकते हैं क्या। वक्ता बिना किसी शर्त के कहते हैं कि यह बहुत दिव्य विषय है, एकदम वहाँ जप कर सकते हैं।
हाल के दिवंगत का नाम पाठ के लिए, पिंड के लिए नहीं
पिछले साल गुजरे और अभी पितरों में न मिलाए गए संबंधी का नाम पाठ के लिए लिख सकते हैं, पिंड का विषय अलग है
पाठ के निमित्त नाम लिख सकते हैं; पिंड दान का विषय अलग है। भगवद्गीता, पार्वती गीता या सहस्रनाम के पाठ में उन्हें सम्मिलित करने में कोई समस्या नहीं।
एक श्रोता बताते हैं कि चाचा जी पिछले साल शांत हुए हैं और उन्हें अभी पितरों (पितृ) में मिलाया नहीं गया, तो नाम लिखें क्या। वक्ता दोनों स्थितियाँ अलग करते हैं। पाठ आदि के निमित्त नाम लिख सकते हैं। पिंड दान आदि का विषय अलग है, उस पर यही नियम लागू नहीं होता। पाठ में — भगवद्गीता पाठ, पार्वती गीताशिव महापुराण के अंतर्गत पार्वती द्वारा दिया गया उपदेश।, सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। — कोई समस्या नहीं है।
गुरु का प्रश्न पितर स्वयं सुलझाते हैं
पितरों के निमित्त जो करेंगे, उनकी कृपा से गुरु मिलेंगे — इसका उत्तर पितर ही देंगे
वह तो पितर (पितृ) ही बता सकते हैं। उनके निमित्त जो करेंगे, उनकी कृपा से मिलेंगे — वक्ता के लिए इसमें प्रश्न ही क्या है।
पूछा गया कि पितरों की कृपा से गुरु कैसे प्राप्त होंगे — वक्ता प्रश्न को उसी की पूर्वधारणा पर लौटा देते हैं। वह तो पितर (पितृ) ही आपको बता सकते हैं। आप उनके निमित्त जो करेंगे, उनकी कृपा से आपको मिलेंगे — और अंत में पूछते हैं, इसमें प्रश्न क्या है?
त्वचा रोग का पहला कारण — कुल पितरों का कोप
त्वचा की लगातार समस्या (स्किन इश्यूज) के लिए क्या विधान है?
सबसे बड़ा विषय कुल के पितरों का कोप (पितृ दोष) है — उससे सबसे ज्यादा दिक्कत होती है। सबसे अच्छा प्रयोग श्रीमद्भगवद्गीता के सप्तम अध्याय का पाठ है; भगवान सूर्य नारायण और बुध देव के निमित्त भी प्रयोग हैं।
स्किन इश्यूज के लिए पहले बताया विधान दोबारा बताने को कहा गया — वक्ता उपाय से पहले कारण बताते हैं: त्वचा की समस्या में सबसे बड़ा विषय कुल के पितरों का कोप (पितृ दोष) है, और अगर वह हो तो सबसे ज्यादा दिक्कत होगी। सबसे अच्छा प्रयोग वे श्रीमद्भगवद्गीता के सप्तम अध्याय का पाठ बताते हैं — प्रश्नकर्ता वह करें तो बढ़िया रहेगा। इसके अलावा भगवान सूर्य नारायण तथा बुध देव के निमित्त भी प्रयोग हैं। इन सबको क्रम से मिलाकर वे एक अलग शॉर्ट वीडियो बनाने का वचन देते हैं, लाइव में विस्तार नहीं करते। इसी बीच पूछा गया कि सहस्राक्षरी मंत्र और माला मंत्र में क्या अंतर है — वे केवल इतना कहते हैं कि बहुत अंतर होता है, और आगे नहीं बढ़ते।
माता-पिता जीवित हों तो पितृ तर्पण नहीं; नांदीमुख श्राद्ध आचार्य पर निर्भर
माता-पिता जीवित हों तो क्या पितृ तर्पण और श्राद्ध कर सकते हैं?
पितृ तर्पण नहीं कर सकते। नांदीमुख श्राद्ध के लिए आचार्य से पूछिए — पिताजी हैं लेकिन बैठने में सक्षम नहीं हैं तो आप उनके स्थान पर कर सकते हैं, पर यह निर्णय आचार्य का है।
वक्ता दोनों विधानों को अलग करते हैं। माता-पिता जीवित हों तो पितृ तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। नहीं कर सकते — यहाँ उत्तर सीधा है। नांदीमुख श्राद्ध को वे अलग रखते हैं और प्रश्न बाहर भेज देते हैं। अगर पिताजी हैं लेकिन बैठने में सक्षम नहीं हैं, और आपके यहाँ वैसा आयोजन हो रहा है, तो वह आचार्य पर निर्भर करता है, वे आपको बताएँगे। पिताजी बैठने में सक्षम न हों तो, वे कहते हैं, भले आप कर सकते हैं।
गया श्राद्ध में पूरा कुटुंब चाहिए, त्रिपिंडी में नहीं
गया श्राद्ध कब करवाना चाहिए, और क्या पितृ पक्ष में यह अनुशंसित है?
त्रिपिंडी श्राद्ध किसी भी समय कर सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं। गया श्राद्ध का विषय वृहद है: दादाजी के जितने भाई हैं, उन सभी के घरों से सहयोग लेकर होता है, क्योंकि सात पीढ़ी बैठाई जाती है। उतना परिवार तैयार हो तभी करवाएँ।
त्रिपिंडी श्राद्ध पर वक्ता उदार हैं — किसी भी समय कर सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं, और पितृ पक्ष में बिल्कुल अनुशंसित है। गया श्राद्ध को वे अलग स्तर का विषय मानते हैं, इसे वृहद कहते हैं। जिस आवश्यकता पर वे जोर देते हैं वह कर्मकांड की नहीं, परिवार की है: कम से कम दादाजी के जितने भाई हों उन सभी के घर से सहयोग लेकर तब होता है, क्योंकि उसमें सात पीढ़ी बैठाई जाती है। निष्कर्ष आज के समय पर सशर्त है — उतना परिवार अगर तैयार हो, आज के समय में, तब आप गया श्राद्ध करवाएँ।
सप्तश्लोकी के 108 पाठ के साथ नित्य हवन
सप्तश्लोकी के नित्य 108 पाठ के साथ नित्य हवन — बिना किसी शर्त के अनुमोदित
बिल्कुल — सप्तश्लोकी के नित्य 108 पाठ के साथ नित्य हवन को वक्ता बहुत दिव्य विषय कहते हैं, बिना किसी शर्त के।
पूछा गया कि सप्तश्लोकी के नित्य 108 पाठ के साथ नित्य हवन किया जा सकता है क्या — वक्ता कहते हैं बिल्कुल, एकदम कर सकते हैं, बहुत दिव्य विषय है। साथ में कोई शर्त या सावधानी नहीं जोड़ते।
ग्रहण का मुख्य काल बनाम पूरा समय
ग्रहण की साधना पूरे समय 9:45 से 1:40 तक; 10:50 पूर्ण ग्रहण का मध्य काल है, जो केवल उनके लिए है जो पूरा नहीं बैठ सकते
साधना 9:45 से 1:40 तक करनी है — यही पूरा समय है और पूरा फल इसी में है। 10:50 मध्य काल है, जब पूर्ण ग्रहण लगता है; वह केवल उनके लिए बताया गया जो सच में कष्ट में हों और पूरा न बैठ सकें। ग्रहण शुरू होने से 10 मिनट पहले जप शुरू करें, पूर्ण होने के 10 मिनट बाद तक करते रहें।
एक श्रोता कहते हैं कि सब 9:50 से ग्रहण स्पर्श बता रहे हैं जबकि वक्ता ने 10:50 कहा है, तो साधना का समय कौन सा है। वक्ता गलतफहमी सुधारते हैं: उन्होंने 11 बजे से शुरू करने को कभी नहीं कहा। फिर वे ग्रहण की संरचना समझाते हैं। ग्रहण एक साथ नहीं लगता — धीरे-धीरे लगता है, फिर पूर्ण ग्रहण होता है, फिर छूटना आरंभ होकर समापन की ओर जाता है। उन्होंने जो 10:50 कहा था वह मध्य काल है, जब पूर्ण ग्रहण लग जाता है। इसे वे मुख्य समय कहते हैं, और ठीक-ठीक बताते हैं कि यह किसके लिए है: जो बहुत कष्ट में हो, उतना जप न कर सकता हो — किसी का पैर दर्द दे रहा हो, किसी को बुखार हो — और चाहे कि थोड़ी देर तो जप कर लें। उसके लिए वह छोटी बैठक मध्य काल में होनी चाहिए। लेकिन पूरा फल, वे कहते हैं, 9:50 या 9:45 से लेकर 1:40 तक करने से है। यह बात वे कई बार कह चुके हैं — पिछले लाइव में, टेलीग्राम पर, यूट्यूब कम्युनिटी पोस्ट में। उनका सामान्य नियम उत्तर समाप्त करता है: ग्रहण शुरू होने से 10 मिनट पहले जप शुरू कीजिए और ग्रहण पूर्ण होने के 10 मिनट बाद तक जप करते रहिए।
समिधा ऐसे सजाएँ कि अग्नि में ऑक्सीजन जाए
हवन पूर्ण होने से पहले अग्नि बुझ जाए तो?
अग्नि प्रज्वलित करने के बाद उस पर समिधा ऐसे सजाइए कि ऑक्सीजन सही से प्रवेश करे — अग्नि बुझना लकड़ी के ऐसे ढेर का परिणाम है जिससे हवा रुक जाती है।
वक्ता कर्मकांडी नहीं, व्यावहारिक उत्तर देते हैं। अग्नि प्रज्वलित करने के बाद उस पर समिधा सजानी चाहिए, और ऐसे सजानी चाहिए कि अग्नि में ऑक्सीजन का सही से प्रवेश हो। हवन की अग्नि बुझने को वे लकड़ी सजाने की बात मानते हैं, प्रायश्चित माँगने वाला अपशकुन नहीं।
रुद्रांश गण नहीं, रुद्र गण
ग्रहण काल में रुद्रांश गण का नहीं, रुद्र गण का साधना-अनुष्ठान होता है
रुद्र गण का। वक्ता प्रश्नकर्ता को दो बार सुधारते हैं: रुद्र गण का साधना-अनुष्ठान किया जाता है, रुद्रांश के गण का नहीं।
वक्ता प्रश्न के शब्द ही सुधारते हैं, और फिर सुधार दोहराते हैं ताकि छूटे नहीं। ग्रहण काल में रुद्र गण का साधना-अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। करना है — रुद्रांश गण का नहीं। रुद्रांश के गण का साधना नहीं करना है, रुद्र गण का साधना करना है।
त्रिपुंड बैठने से पहले, या आसन पर शीशा रखकर
त्रिपुंड तिलक पूजा करते समय लगाना है या बैठने से पहले?
पूजन से पहले, बैठने से पहले ही अभिमंत्रित (अभिमंत्रण) तिलक लगा लीजिए। नियम से वहीं बैठकर लगाना हो तो आसन पर शीशा रखिए और वहीं से लगा लीजिए।
वक्ता पहले सामान्य नियम बताते हैं: पूजन करने से पहले, बैठने से पहले ही अभिमंत्रित (अभिमंत्रण) तिलक (त्रिपुण्ड्र) लगा लीजिए। फिर प्रश्नकर्ता का विकल्प भी रखते हैं — अगर वहीं बैठकर लगाना है, नियम से करना है, तो वहीं शीशा रखिए और वहीं से कर सकते हैं। विस्तार से बताने से मना करते हैं — यह विषय कई बार बता चुके हैं, लाइव में विस्तार संभव नहीं।
यंत्र नीचे सुलाकर रखा जाता है और कल्पना में उठाया जाता है, फोटो की तरह खड़ा नहीं
यंत्रों को हॉरिजॉन्टल रखना उचित है या वर्टिकल?
हॉरिजॉन्टल-वर्टिकल का प्रश्न ही नहीं है। यंत्र को आसन पर सुलाकर रखा जाता है और वहीं पूजन होता है — फोटो की तरह खड़ा करके कभी नहीं। पूजन के समय कल्पना करनी होती है कि उसका पटल उठा हुआ है, जैसे फिल्मों में नक्शा 3D होलोग्राम बनकर हवा में उठ जाता है।
वक्ता पहले प्रश्न के शब्द ही अस्वीकार करते हैं — हॉरिजॉन्टल और वर्टिकल रखिएगा कैसे? यंत्र को उनके पीठ पर, या जिस प्रकार रखा जाता है, नीचे रखकर वैसे ही रखा जाता है और उसी स्थिति में पूजन होता है। यंत्रों को छायाचित्र की तरह सजाकर, खड़ा करके नहीं रखना चाहिए; उन्हें आसनसाधना के दौरान प्रयुक्त पवित्र आसन, जिसे पृथ्वी-शक्ति (वसुंधरा) का साक्षात रूप माना जाता है — इसे कभी भी सामान्य प्रयोजन हेतु साझा, पद-दलित, या उपयोग नहीं करना चाहिए। के ऊपर सुलाकर रखा जाता है और वहीं उनका पूजन होता है। फिर वे वह मानसिक चित्र देते हैं जिसके लिए यह सुलाकर रखना है। कल्पना कीजिए, वे कहते हैं, फिल्मों में जैसे कोई नक्शा बना हो और लोग उसे 3D होलोग्राम की तरह पूरा हवा में उठा देते हैं — ठीक वैसा ही यंत्र के लिए इमेजिन कर लीजिए। जिन्हें इंजीनियरिंग ड्राइंग का थोड़ा आईडिया हो, उनके लिए वही बात उस भाषा में: एक टॉप व्यू होता है, एक साइड व्यू; उन्हें अलग-अलग करने पर एक व्यू पूरा नीचे का बनता है — ठीक वही यंत्र है। समझ लीजिए कि आप उसे 3D में देख रहे हैं, और 3D में उठाने पर वह नीचे से ऊपर की ओर उठेगा — इसीलिए यंत्र को नीचे रखा जाता है। जब उसका पूजन करते हैं तो कल्पना करनी होती है कि जिस पटल का पूजन कर रहे हैं वह पूरा का पूरा पटल उठा हुआ है। इस कल्पना का अभ्यास पूजन का ही हिस्सा है।
संकल्प में पितरों का नाम कैसे लिया जाए
पितृ पक्ष में गीता पाठ के लिए पितृ प्रसन्नता का अलग से संकल्प लेना पड़ेगा?
अलग संकल्प नहीं — पितरों का नाम संकल्प के भीतर ही आता है: या तो सीधे, या अपने इष्ट देवता के माध्यम से: नारायण की कृपा से मम कुल पितृणां प्रसन्नता च तुष्टि पुष्टि हेतवे।
वक्ता हाँ-ना के बजाय शब्दावली समझाते हैं। जब आप संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेते हैं — मान लीजिए 'अमुक गोत्रोत्पन्नस्य' (गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है।), अपना नाम, फिर 'मम कुल पितृणां प्रसन्नता हेतवे' — इतना बोलने के बाद पितर उसमें आ ही गए। जो अपने इष्ट देवता के नाम से आरंभ करते हैं, उनके लिए दूसरा रास्ता: अगर आरंभ में 'भगवान श्री हरि नारायण प्रसन्नता हेतवे' बोल रहे हैं, तो उसमें 'च मम कुल पितृणां प्रसन्नता हेतवे' जोड़कर दोनों बोलेंगे। या विस्तृत रूप: भगवान नारायण कृपा प्रसाद द्वारा मम कुल पितृणां प्रसन्नता च तुष्टि पुष्टि हेतवे। अंत में इसे सीधे विकल्प में समेटते हैं: या तो सीधे बोल लीजिए, या यह बोल दीजिए कि हमारे इष्ट नारायण की कृपा से मेरे कुल पितृ प्रसन्न हों, संतुष्ट हों, उनकी गति (सद्गतिदिवंगत प्राणी की शुभ गति, जो पितृ कर्म और तर्पण का उद्देश्य है।) हो, नारायण रूप को प्राप्त हों — इसलिए हम श्रीमद्भगवद्गीता के पाठ का संकल्प ले रहे हैं। इसी बीच एक श्रोता कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ के पास जाकर जप करने की बात कहते हैं — वक्ता इसे अति उत्तम बताते हैं।
तारा के लिए दीक्षा आवश्यक
क्या भगवती तारा की उपासना बिना दीक्षा के की जा सकती है?
अगर वे सच में आपकी इष्ट देवता हैं तो दीक्षा लेकर कीजिए — और आपके गुरुजी जैसा कहें वैसा।
वक्ता एक शर्त जोड़ते हैं और फिर बात गुरु पर छोड़ देते हैं। भगवती तारा अगर आपकी इष्ट हैं और आप उन्हें इष्ट मानते हैं, तो दीक्षासक्षम गुरु द्वारा किसी मंत्र या साधना में औपचारिक दीक्षा। लेकर उपासना कीजिए। इसके आगे प्रश्नकर्ता को उनके अपने गुरु के पास भेजते हैं: आपके गुरुजी जैसा कहें।
साल के भीतर की मृत्यु पर कुशा, तिल और जल
इसी साल गुजरे नानाजी को पितृ पक्ष में जल दे सकते हैं?
हाँ — क्रियाकर्म आपके हाथ से हुआ हो तो पितृ पक्ष में कुश, तिल और जल दे सकते हैं। जल तो बिल्कुल दे सकते हैं।
एक श्रोता बताते हैं कि नानाजी इसी साल गुजरे हैं और क्रियाकर्म उन्हीं के हाथ से हुआ है। वक्ता पुष्टि करते हैं कि इस स्थिति में पितृ पक्ष में कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है।, तिलतिल, विशेषतः काला तिल, जो पितृ कर्म और अनेक आहुतियों का मुख्य द्रव्य है। और जल दे सकते हैं, और विशेष रूप से दोहराते हैं कि जल तो बिल्कुल दे सकते हैं।
संपुट प्रयोग है, सिद्धि नहीं
संपुट प्रयोग है, सिद्धि नहीं — ग्रहण में योगिनी नामावली और कामाख्या कवच अलग-अलग ही पढ़े जाते हैं
ग्रहण में संपुट नहीं करना है। संपुट करते ही वह सिद्धि नहीं, प्रयोग हो जाता है, और सिद्धि-जागृति सदैव अलग से की जाती है। केवल योगिनी नामावली का पाठ कीजिए, या केवल कामाख्या कवच का; संपुट तब, जब किसी फलाने कार्य की सिद्धि के निमित्त प्रयोग करना हो।
पूछा गया कि ग्रहण में 64 योगिनी नामावली को कामाख्या कवच के साथ संपुट करके किया जा सकता है क्या — वक्ता संपुट को मना करते हैं और प्रश्न के पीछे की श्रेणी-भूल समझाते हैं। संपुट करते हैं तो आप सिद्धि नहीं कर रहे होते — वह प्रयोग का विषय हो जाता है। सिद्धि और जागृति, जब भी की जाती है, सदैव अलग-अलग की जाती है। इसलिए निर्देश है कि दोनों को अलग रखिए: केवल 64 योगिनी की नामावली का पाठ कीजिए, और कामाख्या कवच करना है तो केवल उसी का पाठ कीजिए। संपुट का स्थान दूसरी स्थिति में है — जब हम कहें कि फलाने कार्य की सिद्धि के निमित्त प्रयोग करना है, तब संपुट करेंगे।
रजस्वला अवस्था में जप नहीं होता
क्या रजस्वला स्त्री ग्रहण में जप कर सकती है?
नहीं — रजस्वला ग्रहण आदि में जप नहीं कर सकतीं। वक्ता लाइव में आगे कहते हैं कि ऐसी अवस्था में जप करने से शरीर में कष्ट मिलेगा।
वक्ता का उत्तर यहाँ संक्षिप्त है: रजस्वलारजस्वला स्त्री, जिस अवस्था में इस परंपरा में अनुष्ठान सम्बन्धी विशेष निषेध माने जाते हैं। ग्रहण आदि में जप नहीं कर सकतीं। लाइव में आगे वे इस बात पर और कड़े शब्दों में लौटते हैं — ऐसी अवस्था में कुछ नहीं कर सकतीं, जप नहीं करना चाहिए, क्योंकि उससे शरीर में कष्ट मिलेगा।
अनुकूल पत्नी के लिए अर्गला का श्लोक
आध्यात्मिक पत्नी पाने के लिए कोई साधना या मंत्र है?
अर्गला स्तोत्र का वह मंत्र कीजिए जिसका अंत "पत्नीं मनोरमां देहि" है। वक्ता सीधे इसका नाम लेकर आगे बढ़ जाते हैं।
आध्यात्मिक पत्नी पाने के लिए साधना या मंत्र पूछा गया — वक्ता सीधे अर्गला स्तोत्र की ओर इशारा करते हैं, उस श्लोक का हवाला देते हुए जिसके अंतिम शब्द "पत्नीं मनोरमां देहि" हैं, और कहते हैं उसे कीजिए।
गया जी कभी व्यक्तिगत उपाय नहीं
गया जी व्यक्तिगत उपाय नहीं — यह पूरे परिवार के साथ होता है, अंतिम संस्कार में न आए एक व्यक्ति के सुधार के लिए नहीं
ध्यान रखिए, गया श्राद्ध का विषय ऐसे नहीं होता। वह पूरे परिवार के साथ होता है, किसी एक व्यक्ति के छूटे हुए संस्कार के सुधार के लिए नहीं।
एक श्रोता बताते हैं कि दादाजी की मृत्यु पर पापा किसी भी अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुए — सब कुछ चाचा ने किया — तो क्या पापा को गया जी ले जाकर पिंड दान करवा सकते हैं। वक्ता विधान का स्वरूप दोहराकर उत्तर देते हैं: गया श्राद्ध का विषय ऐसे नहीं होता, वह पूरे परिवार के साथ होता है। जो बात वे छोड़ जाते हैं वह यह कि गया जी को एक संबंधी की पुरानी अनुपस्थिति के व्यक्तिगत उपाय की तरह नहीं लिया जा सकता।
हर महाविद्या की अपनी अलग 64 योगिनी
क्या महाकाली, महालक्ष्मी और सरस्वती — सबकी 64 योगिनी अलग-अलग हैं?
हाँ। हर महाविद्या, हर महाशक्ति की 64 योगिनी अलग-अलग हैं — भगवान दत्त की अलग, भगवती की अलग, सबकी अपनी-अपनी।
वक्ता पुष्टि करते हैं कि ये समूह साझा नहीं, अलग-अलग हैं। हर महाविद्या, हर महाशक्तिमहाशक्ति — वक्ता इसे सामान्य शक्ति साधना से पृथक् बताते हैं। की 64 योगिनी अलग-अलग हैं। परंपराओं के पार उदाहरण देते हैं: भगवान दत्त (दत्तात्रेय) की 64 योगिनियाँ अलग हैं, भगवती की अलग — सबके अलग-अलग 64 योगिनी हैं। थोड़ी देर बाद फिर पूछे जाने पर दोहराते हैं कि हर महाविद्या की बिल्कुल अलग-अलग होती हैं और यह पहले भी बता चुके हैं।
योगिनियाँ अनंत हैं; 64 कुल संख्या नहीं
क्या योगिनियाँ केवल 64 ही हैं?
नहीं। योगिनी अनंत हैं, हमारी सोच से बाहर — 64 के सिवाय भी योगिनियाँ हैं।
वक्ता प्रश्न में छिपी धारणा सुधारते हैं। 640 योगिनी नहीं, केवल 64 भी नहीं: योगिनियाँ अनंत हैं। आप और हम जो सोचते हैं, वे उससे बाहर हैं। 64 योगिनी के सिवाय भी योगिनियाँ हैं।
गुरु मंत्र की माला पर साबर जप कभी नहीं
गुरु मंत्र वाली माला पर साबर मंत्र का जप कर सकते हैं?
नहीं। गुरु मंत्र का जप जिस माला पर किया है उस पर साबर मत कीजिए। वैसे माला अनिवार्य भी नहीं — बिना माला के भी आरंभ से अंत तक जप कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि साबर के लिए माला आवश्यक है क्या, और हो तो दत्तात्रेय के श्री मंत्र वाली माला चलेगी क्या। वक्ता सीधे मना करते हैं: उसका प्रयोग मत कीजिए। नियम सामान्य रूप में कहते हैं — गुरु मंत्र का जप जिस माला पर किया है उस पर सबर मंत्र मत कीजिए। फिर विकल्प का प्रश्न ही हटा देते हैं: बिना माला के भी आरंभ से अंत तक जप कर सकते हैं।
जितने पितरों के नाम ज्ञात हों, उतने लिखें
पितरों के नाम नहीं जानता तो क्या करूँ?
कोई दिक्कत नहीं — जितना जानते हैं उतना लिखिए। वक्ता को नहीं लगता कि कोई एक भी नाम न जानता हो: दादाजी-परदादा जी तक तो सब कोई जानता है।
वक्ता इस चिंता को निराधार मानते हैं। कोई दिक्कत नहीं: जितना जानते हैं उतना लिखिए। ऐसा थोड़ी है, वे कहते हैं, कि आप अपने एक भी पितर (पितृ) का नाम न जानते हों — दादाजी, परदादा जी तक तो सब कोई जानता है।
पितृ पक्ष में पितरों के लिए पंचाक्षरी
पितृ पक्ष में कुल पितरों के लिए पंचाक्षरी का सवा लाख जप बिल्कुल उचित
बिल्कुल उचित — पितरों के लिए पंचाक्षरी मंत्र का जप एकदम कीजिए, उसमें कोई दिक्कत नहीं।
एक श्रोता पितृ पक्ष में कुल पितरों के लिए पंचाक्षरी मंत्र का सवा लाख जप करना चाहते हैं, यह बताते हुए कि यही साधना उन्होंने सावन में भी की थी। वक्ता बिना किसी शर्त के अनुमोदन करते हैं: बिल्कुल उचित रहेगा, एकदम कीजिए, कोई दिक्कत नहीं।
चौखट पर वाहन — केवल सुरक्षा का विषय
रोज चौखट से मोटरसाइकिल-साइकिल निकालने का कोई गलत प्रभाव पड़ता है?
वक्ता इसे कर्मकांडी परिणाम नहीं, सुरक्षा का विषय मानते हैं, और इसमें कोई आध्यात्मिक दोष नहीं बताते।
पूछा गया कि रोज चौखट से मोटरसाइकिल और साइकिल आना पड़ता है, कोई गलत प्रभाव पड़ता है क्या — वक्ता कहते हैं यह तो सेफ्टी का विषय है, इसमें क्या गलत प्रभाव पड़ना है। यहाँ वे इसे कोई कर्मकांडी भार नहीं देते, जबकि चौखट को इसी लाइव में कहीं और केंद्रीय मानते हैं।
पंचबली — पाँच जीवों को भोजन — एकमात्र अनिवार्य
पितृ पक्ष में क्या-क्या करना अनिवार्य है?
सबसे पहले पंचबलि। और कुछ करें चाहे न करें, पाँच जीवों को भोजन: गौ माता को ताजी रोटी, कुत्ते को भोजन, कौवे को भोजन, चींटियों को चीनी का बुरा, और किसी गरीब-भूखे व्यक्ति को भोजन। साथ में जिन तिथियों को छोड़ना है उन्हें छोड़कर सूर्य और तुलसी को अर्घ।
पूरे लाइव में वक्ता सबसे अधिक जोर इसी उत्तर पर देते हैं। पूछा गया कि पितृ पक्ष में क्या करना अनिवार्य है — वे कहते हैं: सबसे पहले, और कुछ करिए चाहे मत करिए, पंचबलिअनुष्ठान के अंत में विभिन्न योनियों हेतु अर्पित की जाने वाली पाँच बलियाँ। अवश्य करिए — सभी को। हर उस विकल्प के सामने वे इसे रखते हैं जो श्रोता पकड़ सकता है। पूजा-पाठ का समय नहीं है, मंत्र जप का समय नहीं, दान-पुण्य का समय नहीं — मत करिए। ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है। को दान इसलिए नहीं देंगे कि वह आपके पैसे से करोड़पति हो जाएगा — मत करो दान, किसी को मत करो। लेकिन पाँच जीवों का भोजन फिर भी रहेगा। गौ माता को ताजी बनी रोटी अवश्य खिलाइए। श्वान यानी कुत्ते को अवश्य भोजन कराइए। कौवे को अवश्य भोजन दीजिए। चींटियों को चीनी आदि का बुरा अवश्य डालिए। और किसी गरीब व्यक्ति को भोजन कराइए — ब्राह्मणों के प्रति श्रोता का द्वेष वे रहने देते हैं और उसके बगल से निकल जाते हैं: मन में बहुत द्वेष है तो ब्राह्मण को मत दीजिए, लेकिन जो किंचन हो, भूखा हो, उसे भोजन कराइए। इन पाँच जीवों को भोजन कराना ही, वे कहते हैं, पंचबली कहलाता है। इसके साथ वे सूर्य नारायण को अर्घ और भगवती तुलसी को अर्घ रखते हैं — जिन तिथियों को छोड़ना है उन्हें छोड़कर हर दिन: मंगल, रविवार, एकादशी, द्वादशी आदि।
वैकल्पिक पाठ, और जीव सेवा उनसे ऊपर क्यों
पितृ पक्ष में पंचबली के ऊपर कौन-कौन से पाठ जोड़े जा सकते हैं?
इच्छा, सामर्थ्य और मन हो तो: गीता का सप्तम या एकादश अध्याय, या पूरा पाठ, या अपने आराध्य की गीता — शिव गीता, देवी गीता — या पितृ बीसा। लेकिन जीव सेवा अवश्य कीजिए, क्योंकि जीव सेवा से ही पितरों की आत्मा तृप्त होती है।
पंचबलिअनुष्ठान के अंत में विभिन्न योनियों हेतु अर्पित की जाने वाली पाँच बलियाँ। को अनिवार्य बताने के बाद वक्ता बताते हैं कि इच्छा, सामर्थ्य और मन हो तो क्या जोड़ा जा सकता है। पितरों के निमित्त: श्रीमद्भगवद्गीता के सप्तम अध्याय का पाठ, या एकादश अध्याय का, या पूरा पाठ करना हो तो पूरा। या अपने इष्ट देवता की जो भी गीता हो — शिव जी हैं तो शिव गीता, भगवती हैं तो देवी गीता। सूची में पितृ बीसा का पाठ भी जोड़ते हैं। लेकिन श्रेणियों का क्रम स्पष्ट रखते हैं। पितृ पक्ष में जीव सेवा जरूर कीजिए, क्योंकि जीव सेवा से ही पितरों की आत्मा तृप्त होगी। इस दायित्व का एक निषेधात्मक पक्ष भी है: पितृ पक्ष में किसी जीव को हानि मत पहुँचाइए।
अशुद्धि के दिनों में गृहिणी के स्थान पर स्वयं भोजन बनाना
पितृ पक्ष शुरू होते ही घर की गृहिणी अशुद्ध अवस्था में आ जाए तो?
वक्ता इसे प्रश्नकर्ता का निज विषय कहकर निर्णय देने से मना करते हैं। विधि-विधान से चलना हो तो नियम यही है कि वे भोजन न बनाएँ — उनके स्थान पर आप बनाइए और उन्हें भी खिलाइए, ताकि अन्न में दोष न लगे।
वक्ता पहले प्रश्न से किनारा करते हैं — यह आपका निज विषय है, इसमें हम कुछ बोल नहीं सकेंगे। फिर उनके लिए नियम बताते हैं जो विधि-विधान से चलना चाहें: वे भोजन न बनाएँ, उनके स्थान पर आप ही भोजन बनाइए, और उन्हें भी आप ही खिलाइए, ताकि अन्न में दोष न लगे। उत्तर श्रोता के विवेक पर छोड़कर समाप्त करते हैं — अगर आप मानना चाहें तो। बाद में फिर पूछे जाने पर कि उनके शुद्ध होने तक उनके बनाए भोजन का क्या करें, वही व्यावहारिक उत्तर देते हैं: विकल्प यही है कि अपने से भोजन बनाकर खाया जाए।
संकल्पित अनुष्ठान बनाम नित्य क्रम में ब्रह्मचर्य
अनुष्ठान में ब्रह्मचर्य का नियम क्या है?
संकल्पित अनुष्ठान में — जो किसी कार्य की सिद्धि के संकल्प से हो — ब्रह्मचर्य पालन करना ही पड़ेगा, पति-पत्नी संबंध नहीं होगा। केवल नित्य क्रम चल रहा हो, कोई विशेष संकल्प न हो, तो सामान्य रूप से रहें, लेकिन अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावस्या, एकादशी, पर्व काल और संक्रांति में संबंध नहीं बनाना चाहिए।
वक्ता प्रश्न को इस आधार पर बाँटते हैं कि संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लिया गया है या नहीं। चतुर्थी से चतुर्दशी तक अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। कर रहे हैं और संकल्प लिया है — कि फलाने कार्य की सिद्धि हो, गाँव का जमीन का विवाद है, जो भी हो — तो संकल्पित अनुष्ठान में ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। पालन करना ही पड़ेगा, उसमें पति-पत्नी का संबंध स्थापित नहीं होगा। अगर केवल नित्य क्रम चल रहा है, अनुष्ठान के निमित्त कोई विशेष संकल्प नहीं है, तो सामान्य रूप से जैसे रहते हैं वैसे रहें। लेकिन वहाँ भी एक स्थायी नियम जोड़ते हैं: अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है।, चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावस्या, एकादशी, पर्व काल और संक्रांति में संबंध स्थापित नहीं करना चाहिए — उससे दोष लगता है।
नित्य निकाला भोजन और श्राद्ध का भोजन अलग-अलग
श्राद्ध के दिन भी पितरों का नित्य भोजन निकाला जाएगा — वह और ब्राह्मण भोजन अलग-अलग दायित्व हैं
हाँ, निकाला जाएगा। पितरों का नित्य भोजन गौ माता आदि को जाता है; श्राद्ध के दिन का भोजन ब्राह्मण को कराया जाता है — दोनों अलग हैं, एक दूसरे का स्थान नहीं लेता।
पूछा गया कि पितरों के निमित्त नित्य निकाला जाने वाला भोजन श्राद्ध के दिन भी निकलेगा क्या — वक्ता कहते हैं पहले प्रश्न समझ नहीं आया, फिर दोनों व्यवस्थाएँ अलग करके उत्तर देते हैं। पितरों के लिए नित्य निकाला भोजन गौ माता आदि को देंगे। श्राद्ध के दिन का भोजन ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है। आदि को कराया जाता है। अगर यह पूछ रहे हैं कि उस दिन नित्य वाला निकाला जाएगा या नहीं, तो अवश्य निकाला जाएगा।
विंध्यवासिनी कुलदेवी के रूप में
क्या माँ विंध्यवासिनी को कुलदेवी बना सकते हैं?
बिल्कुल बना सकते हैं — वक्ता को आश्चर्य है कि यह प्रश्न पूछा ही क्यों गया।
श्रोता की धारणा है कि माँ विंध्यवासिनी को कुलदेवी नहीं बना सकते। वक्ता तुरंत अस्वीकार करते हैं — क्यों नहीं बना सकते भाई? ये कैसा प्रश्न है — बिल्कुल बना सकते हैं।
तारा के संकल्प से रात्रि सूक्तम
रात्रि सूक्तम का मंत्र माँ तारा की प्रसन्नता का संकल्प लेकर जप सकते हैं
हाँ — माँ तारा की प्रसन्नता का संकल्प लेकर रात्रि सूक्तम् वाला मंत्र बिल्कुल जप सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि रात्रि सूक्तम् वाला मंत्र कल माँ तारा की प्रसन्नता का संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर जप सकते हैं क्या। वक्ता का उत्तर बिना शर्त है: बिल्कुल कर सकते हैं। इसी बीच वे एक और श्रोता को बधाई देते हैं जिन्होंने संकट नाशन स्तोत्र का 1000 पाठ, हवन, तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण।, मार्जनहवन-तर्पण-मार्जन की अनुष्ठान त्रयी को पूर्ण करने वाला पवित्र जल का शुद्धिकरण-छिड़काव। और बाल भोजन पूर्ण किया है — बहुत सुंदर, अति दिव्य।
ग्रहण में कामाख्या कवच की सिद्धि
ग्रहण में कामाख्या कवच का पाठ करने से वह सिद्ध हो जाएगा?
हाँ — कामाख्या कवच अवश्य सिद्ध होगा, अवश्य करें।
पूछा गया कि ग्रहण में कामाख्या कवच का पाठ करने से सिद्ध हो जाएगा क्या — वक्ता कहते हैं अवश्य होगा, अवश्य करें। कुछ झुंझलाहट से यह भी कहते हैं कि एक ही प्रश्न बार-बार क्यों भेजा जा रहा है।
रक्त चंदन की माला पर जयंती मंगला
ग्रहण में रक्त चंदन की माला पर जयंती मंगला का जाप; माला का अलग से पूजन अनिवार्य नहीं, नित्य नियम में हो ही जाता है
हाँ। माला के पूजन की अलग से अनिवार्यता नहीं है, हालाँकि नित्य नियम में उनका पूजन तो होता ही है — अभिषेक, पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन कर सकते हैं।
वक्ता पुष्टि करते हैं कि जो रक्त चंदनपूजन में अर्पित एवं लगाया जाने वाला चंदन, जो शीतल और पवित्र करने वाला माना जाता है। की माला प्राप्त हुई है, उस पर ग्रहण काल में जयंती मंगला का जाप बिल्कुल कर सकते हैं। माला का पहले पूजन आवश्यक है या नहीं, इस पर कहते हैं कि ऐसी अलग से अनिवार्यता नहीं है — लेकिन जोड़ते हैं कि ऐसे बोलिएगा तो नित्य नियम में उनका पूजन तो होता ही है। उनका अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। आदि कर सकते हैं, पंचोपचारपूजा का मूल पंचांग क्रम — धूप, दीप, गंध, पुष्प व नैवेद्य — जो साधना की प्रारंभिक क्रियाओं के बाद देवता हेतु किया जाता है।, षोडशोपचारदेवता हेतु सोलह अंगों वाला पूर्ण पूजा-क्रम, मूल पंचोपचार से अधिक विस्तृत। पूजन कर सकते हैं।
विधि-विधान बटोरने से पहले धैर्य सीखना
एक स्तर को संतुष्ट किए बिना बृहद स्तर में जाने से लाभ नहीं — साल भर भी पूरा न करने वाला आवरण पूछे तो और विधि से कुछ नहीं मिलेगा
क्योंकि प्रश्नकर्ता को शुरू किए साल भर भी नहीं हुआ और वे आवरण (आवरण पूजा) पूछ रहे हैं। एक स्तर को संतुष्ट किए बिना बृहद स्तर में जाएँगे तो लाभ नहीं होगा और फिर शिकायत होगी कि कुछ प्रभाव नहीं मिल रहा। पहले सक्षम बनिए।
एक प्रश्नकर्ता आवरण (आवरण पूजा) के लिए पूछ रहे हैं, जबकि वक्ता के अनुसार कुंभ (कुंभ) को बीते साल भर भी नहीं हुआ और उसी समय उन्होंने एक-एक विषय बताया था कि साल भर कम से कम अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। आदि कैसे होगा। तीन-चार-पाँच महीने बीते हैं। निर्देश है कि अगर वास्तव में साधना के मार्ग में चलना है तो धैर्य रखना सीखिए। केवल हाय-हाय मची रहे कि हम विधि-विधान जान लें, जान लें, जान लें, तो कर कुछ नहीं पाएँगे और दिक्कत 50 और हो जाएगी। उन्हें नहीं लगता कि किसी ने 108 दिन का लगातार वाला भी पूर्ण किया होगा; एक-दो ने किया, उन्होंने पूछा, जो जानकारी चाहिए थी वह पता करके बता दी गई। जब तक एक स्तर से उन्हें संतुष्ट नहीं करेंगे और बृहद स्तर में चले जाएँगे, तो लाभ कहाँ से होगा — और बाद में शिकायत आती है कि इतना कर रहे हैं, कुछ प्रभाव नहीं मिल रहा। सक्षम बनिए पहले, वे कहते हैं। करिए, साल भर अभी पूरा नहीं हुआ है। और यह कहते हुए अपनी सीमा भी बताते हैं: डाँट देंगे तो सब भाग जाएँगे — तो डाँट सुनने का भी सामर्थ्य रखिए।
दोनों कवच साथ धारण करना
कामाख्या कवच के साथ 64 योगिनी कवच धारण किया जा सकता है?
बिल्कुल — कामाख्या कवच और 64 योगिनी कवच साथ धारण किए जा सकते हैं।
वक्ता बिना शर्त पुष्टि करते हैं कि कामाख्या कवच के साथ 64 योगिनी कवच धारण किया जा सकता है। इसी बीच पूछा गया कि कल कौन सा मंत्र जपें — पहला मंत्र या संकट नाशन — तो कहते हैं संकट नाशन स्तोत्र ही कीजिए।
बिना कवच के भी नित्य योगिनी पाठ
64 योगिनी का पाठ हर रोज करना है? कवच न हो तो भी?
हाँ, रोज कीजिए। कवच आवश्यक नहीं — कवच न हो तो भी कीजिए, कोई दिक्कत नहीं। नामावली कंठस्थ हो जाए तो चलते-फिरते चलती रहेगी।
वक्ता 64 योगिनी नामावलीदेवता के नामों की लिखित सूची — जैसे दुर्गा के 108 नाम, हवन में प्रत्येक नाम पर पृथक आहुति देने की सुविधा हेतु अलग से लिखे जाते हैं। के नित्य पाठ का अनुमोदन करते हैं और कवच को पूर्वशर्त से हटा देते हैं: कवच न हो तो भी कीजिए, कोई दिक्कत नहीं। जोड़ते हैं कि नामावली कंठस्थ हो जाए तो चलते-फिरते वह चलती रहेगी, उसमें भी कोई समस्या नहीं।
पितृ पक्ष में कर्म प्रधान नहीं, पुष्टि देने वाले मंत्र
ग्रहण के बाद पितृ पक्ष में बगला साबर मंत्र का जाप कर सकते हैं?
ऐसे मंत्र चुनिए जिनसे पुष्टि आती है। बगलामुखी का सबर मंत्र कर्म प्रधान मंत्र है, जिससे कोई क्रिया पूर्ण की जाती है — उससे पुष्टि बहुत नहीं मिलेगी; ऐसे मंत्रों का चयन कीजिए जिनसे पुष्टि प्राप्त हो।
वक्ता मंत्र को मना करने के बजाय चुनाव की दिशा बदलते हैं। पितृ पक्ष में, वे कहते हैं, पुष्टि से संबंधित जितने मंत्र हैं, जिनसे पुष्टि आती है, उन्हें कीजिए। इसे छोड़ने का कारण नैतिक नहीं, श्रेणीगत है: भगवती बगलामुखी का सबर मंत्र कर्म प्रधान मंत्र है — उससे आप किसी प्रकार की क्रिया पूर्ण करते हैं। उससे पुष्टि बहुत प्राप्त नहीं होगी। इसलिए इस अवधि में ऐसे मंत्रों का चयन कीजिए जिनसे पुष्टि प्राप्त हो।
तंत्र में गुरु की जाति का प्रश्न
क्या तंत्र दीक्षा में गुरु केवल ब्राह्मण ही होते हैं?
वक्ता कहते हैं इसका कोई ऐसा उत्तर देना संभव नहीं, क्योंकि तंत्र के मार्ग में यह विषय थोड़ा अलग हो जाता है।
पूछा गया कि तंत्र दीक्षासक्षम गुरु द्वारा किसी मंत्र या साधना में औपचारिक दीक्षा। में गुरु सिर्फ ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है। ही होते हैं क्या — वक्ता निश्चित उत्तर देने से मना करते हैं: इसका ऐसा कोई उत्तर देना संभव नहीं — क्योंकि तंत्र के मार्ग में यह विषय थोड़ा अलग हो जाता है।
तारा — केवल विधिवत दीक्षा से
भगवती तारा की साधना विधिवत दीक्षा लेकर ही — बिना दीक्षा के नहीं
दीक्षा लेकर विधिवत कीजिए। बिना दीक्षा के नहीं।
वक्ता भगवती तारा पर लौटते हैं और दूसरी बार पूछे जाने पर दो टूक कहते हैं: दीक्षासक्षम गुरु द्वारा किसी मंत्र या साधना में औपचारिक दीक्षा। लेकर विधिवत कीजिए — बिना दीक्षा के नहीं।
तुलजा भवानी की ग्रहण परंपरा, वक्ता को अज्ञात
तुलजा भवानी में ग्रहण भर माँ को 108 साड़ियाँ पहनाकर सफेद वस्त्र से ढका जाता है — वक्ता के लिए नई जानकारी
वक्ता को इसका पता नहीं था। तुलजा भवानी में चंद्र ग्रहण में माँ को एक साथ 108 साड़ियाँ पहनाकर ऊपर से सफेद वस्त्र से पूरा ढककर ग्रहण समाप्ति तक रखा जाता है।
एक श्रोता प्रश्न नहीं, जानकारी देते हैं — तुलजा भवानी की परंपरा: चंद्र ग्रहण में माँ को एक साथ 108 साड़ियाँ पहनाकर, फिर ऊपर से सफेद वस्त्र से पूरा ढककर ग्रहण समाप्ति तक रखा जाता है। वक्ता इसे नई जानकारी के रूप में लेते हैं — बहुत अच्छी जानकारी दी, माई की यह परंपरा उन्हें पता ही नहीं थी।
ग्रहण और सूतक के बीच पूर्णिमा का अर्घ
उसी रात ग्रहण हो तो पूर्णिमा व्रत का अर्घ कब दें?
दोपहर तक दे दीजिए। रात को विधिवत देना ही हो तो ग्रहण समाप्ति के पश्चात ही — सूतक में नहीं दे सकते। ग्रहण में किताब लेकर पाठ बिल्कुल कर सकते हैं।
लग्नेश, पंचमेश, नवमेश से इष्ट का निर्धारण
अपने इष्ट का कुंडली से कैसे पता करें?
लग्न कुंडली देखिए: लग्नेश, पंचमेश, नवमेश — इन तीनों में जो बली हो उसके अनुसार इष्ट देवता का निर्धारण हो सकता है — अगर कुंडली के अनुसार ही करना है तो।
वक्ता ज्योतिषीय विधि एक शर्त के साथ बताते हैं। लग्न कुंडली में देखिए; लग्नेश, पंचमेश, नवमेश — इन तीनों में जो बली हो, उसके अनुसार इष्ट देवता का निर्धारण किया जा सकता है। अंतिम वाक्य दावे को सीमित करता है: अगर कुंडली के अनुसार ही करना है तो।
बिना नाम के शिशु की मृत्यु पितरों में नहीं लिखी जाती
दशकों पहले जन्म के कुछ दिन बाद, नामकरण से पहले गुजरे शिशु को पितरों में लिखना आवश्यक नहीं
आवश्यक नहीं। 60-65 साल पहले जन्म के कुछ दिन बाद गुजरे बच्चे का उस समय तक नाम भी नहीं रखा गया होगा — इसलिए वक्ता कहते हैं उनको लिखने की आवश्यकता नहीं।
एक श्रोता बताते हैं कि दादाजी के बड़े बच्चे की मृत्यु जन्म के कुछ दिन बाद हो गई थी, 60-65 साल पहले की बात है, तो क्या उनका भी पितरों (पितृ) में हो जाएगा। वक्ता मृत्यु की उम्र से तर्क करते हैं: जन्म के कुछ दिन बाद गुजरे बच्चे का, जहाँ तक उन्हें लगता है, उस समय तक नाम भी नहीं रखा गया होगा। इस आधार पर ऐसी कोई आवश्यकता नहीं — उन्हें लिखना आवश्यक नहीं।
पूरी विधि संभव न हो तो हनुमान चालीसा
हॉस्टल में विधि संभव न हो तो ग्रहण में हनुमान चालीसा कर सकते हैं
हाँ — बिल्कुल हनुमान चालीसा कीजिए।
एक छात्र बताते हैं कि कॉलेज हॉस्टल में रहने के कारण विधि नहीं हो पाती, तो ग्रहण में हनुमान चालीसा कर सकते हैं क्या। वक्ता कहते हैं बिल्कुल करिए हनुमान चालीसा।
चौखट — जहाँ विरोधी शक्तियों से पहला युद्ध होता है
अकाल मृत्यु की आत्माएँ तंत्र से दूसरे घर भेजी जा सकती हैं — चौखट पर ही उनसे युद्ध होता है और वहीं वे टूटती हैं
वक्ता कहते हैं तंत्र से यह संभव है, और अकाल मृत्यु वाली आत्माएँ परेशान करती ही हैं क्योंकि उनकी गति नहीं होती। उपाय है चौखट मजबूत करना — चौखट पर ही ऐसी शक्तियों से युद्ध होता है और वहीं वे हारती हैं; जिस घर में चौखट नहीं, वहाँ वे सीधे घुस जाती हैं।
पूछा गया कि पड़ोसियों के यहाँ अकाल मृत्यु हुई है तो क्या उन आत्माओं को दूसरे पड़ोसियों के यहाँ भेजा जा सकता है — वक्ता पहले प्रश्नकर्ता से दो बार स्पष्ट लिखने को कहते हैं, फिर प्रश्न को यों लेते हैं: जिनकी अकाल मृत्यु हुई है, उन आत्माओं को अन्य पड़ोसियों के यहाँ भेज सकते हैं क्या। उत्तर है कि तंत्र से यह संभव तो है — क्योंकि अकाल मृत्यु हुई तो गति (सद्गतिदिवंगत प्राणी की शुभ गति, जो पितृ कर्म और तर्पण का उद्देश्य है।) होगी नहीं, वे परेशान करेंगी ही, और ये सब विषय होता ही है। उपाय वही जिस पर वे पूरे लाइव में लौटते हैं: चौखट मजबूत करिए। कहने में वे बेलाग और भदेस हैं — चौखट मजबूत होगी तो इन शक्तियों को वहीं तोड़ दिया जाएगा, और चौखट रखेंगे ही नहीं तो वे अंदर घुसेंगी ही। चौखट पर, वे कहते हैं, आपके देवी-देवता और कुल के पितर सभी मजबूत होते हैं; ऐसी शक्तियाँ आएँगी तो सबसे पहले वहीं युद्ध होगा और वहीं वे हारेंगी। चौखट न हो तो वह चोट आप पर पड़ेगी। यह भी कहते हैं कि लोग इसे अंधविश्वास कहकर टाल देते हैं क्योंकि घर का स्टाइल खराब हो जाता है। फिर उत्तर को स्पष्ट रूप से व्यक्तिगत होने से बचाते हैं — प्रश्नकर्ता से दो बार कहते हैं कि अपने ऊपर मत लीजिएगा, वे सबके लिए बोल रहे हैं, उनके विरुद्ध कुछ नहीं कहा।
ग्रहण में सप्तशती, और एक मंत्र का जप बेहतर क्यों
क्या ग्रहण काल में दुर्गा सप्तशती का पाठ कर सकते हैं?
हाँ, दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ कर सकते हैं — ऐसा नहीं कि नहीं कर सकते। लेकिन जप ज्यादा अच्छा है: किसी एक मंत्र का चयन करके पूरे ग्रहण में जप करना उत्तम है, हालाँकि सप्तशती भी जप मंत्रों की ही है।
वक्ता पाठ की अनुमति देते हैं और फिर प्रभाव के आधार पर उसके विरुद्ध तर्क देते हैं। दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ जरूर कर सकते हैं; ऐसा नहीं है कि नहीं कर सकते। लेकिन जप करते हैं तो ज्यादा अच्छा रहता है। तर्क वही एक-मंत्र का नियम है जो वे बार-बार कह चुके हैं। हालाँकि सप्तशती में भी मंत्रों का जप ही है, किसी एक मंत्र का चयन करके पूरे ग्रहण में जप करना पाठ से ज्यादा उत्तम है। एक संबंधित प्रश्न पर — सप्तम अध्याय के माध्यम से पितरों से स्वप्न में मार्गदर्शन कैसे लें — वे कहते हैं बस इसी का संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। ले लीजिए: हे पितृदेव, आप लोग स्वप्न में मार्गदर्शन दीजिए। संकल्प करके पाठ करिए, तो देंगे मार्गदर्शन।
पक्ष के बीच में नया विधान शुरू नहीं होता
पितरों के लिए नया विधान पक्ष के बीच में शुरू नहीं हो सकता — चाँदी की सुपारी वाला कच्चे दूध का अभिषेक अनंत से शुरू होना था
इसका शुभारंभ अनंत (अनंत चतुर्दशी) से कर देना चाहिए था। पुरानी हो, पहले से चल रही हो, तो कर सकते हैं; लेकिन नई अभी लाकर कल से नहीं कर सकते।
पूछा गया कि पितरों के लिए चाँदी की सुपारीसुपारी, जो संकल्प में देवता के प्रतीक रूप में रखी जाती है और पूजन में अर्पित होती है। वाला कच्चे दूध का अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। अभी शुरू कर सकते हैं क्या — वक्ता विधान पर नहीं, समय पर निर्णय देते हैं। पितृ पक्ष में पितरों के निमित्त किए जाने वाले इस विधान का शुभारंभ आज अनंत (अनंत चतुर्दशी) से कर देना चाहिए था। पुरानी हो, पहले से चल रही हो, तो कर सकते हैं। लेकिन नई अभी लाकर कल से करना संभव नहीं।
गुरु का आकलन तभी, जब दीक्षा का प्रस्ताव हो
गुरु के बारे में जानने का अधिकार तभी है जब वे आपको दीक्षा देने वाले हों
गुरु के बारे में जानने का अधिकार तभी है जब वे आपको दीक्षा देने वाले हों — और वक्ता स्वयं को उतना सामर्थ्यशाली नहीं मानते। यहाँ से जो दिव्य मिल रहा है वह लीजिए, जीवन में प्रयोग कीजिए; उनके रूप, साधन, खान-पान या मित्र-शत्रु का आकलन मत कीजिए।
बाल छिलवाने या कटवाने के एक प्रश्न से शुरू होकर वक्ता सीमा तय करते हैं। उनका निवेदन है कि श्रोता चैनल के आध्यात्मिक विषय से जितना हो सके लाभ लें। वे कैसे दिखते हैं, क्या खाते हैं, उनका निज जीवन क्या है, कितने गरीब या अमीर हैं, साइकिल से चलते हैं या मोटरसाइकिल से, मित्र कौन, शत्रु कौन — इन सबका आकलन मत कीजिए। वह एक स्थिति बताते हैं जब ऐसा आकलन उचित होगा: जिस दिन वे कहें कि आइए, मुझसे दीक्षासक्षम गुरु द्वारा किसी मंत्र या साधना में औपचारिक दीक्षा। लीजिए। तब, वे मानते हैं, गुरु के बारे में पूरा जानने का अधिकार है आपको, और जानना चाहिए। लेकिन पहले ही कह देते हैं कि वे स्वयं को उतना सामर्थ्यशाली नहीं मानते — इसलिए उनके बारे में कुछ मत जानिए। केवल यहाँ से जो दिव्य चीज मिल रही है उसे उठाइए, जीवन में प्रयोग कीजिए, भगवती के सन्निकट जाइए।
तन के साथ मन का ब्रह्मचर्य
अनुष्ठान के समय ब्रह्मचर्य नष्ट होने से कैसे रोकें?
मन और तन दोनों का अभ्यास चाहिए — मन का, कि कोई बुरा विषय आए ही नहीं; तन का, कि तन से कोई गलती हो ही नहीं, चाहे नयन का विषय हो या हाथ का। केवल शरीर से रुकना पर्याप्त नहीं: मन से न रुकें तो दिक्कत होगी ही।
वक्ता कहते हैं कि अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। के समय ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। नष्ट होने से रोकने के लिए मन और तन दोनों का अभ्यास जरूरी है। मन का अभ्यास कि मन में कोई बुरा विषय आए ही नहीं; तन का अभ्यास कि तन से कोई गलती हो ही नहीं — चाहे नयन का विषय हो, चाहे अपने हाथ का। हर तरीके से एक साथ, तभी वह रुकेगा। जिस स्थिति की उन्हें सबसे अधिक चिंता है, उस पर समाप्त करते हैं। शरीर से रुक भी गए लेकिन मन से नहीं रुक पा रहे, मन में चिंतन हो ही रहा है, तो मन से ब्रह्मचर्य न पालन करने के कारण भी दिक्कत होगी ही होगी।
माता-पिता जीवित हों तो दादा-परदादा के नाम
माता-पिता और सास-ससुर जीवित हों तो पितरों के फॉर्म में दादा-परदादा से आगे के नाम लिखे जाते हैं
हाँ — क्यों नहीं भर सकते। उसमें दादा, परदादा आदि के नाम लिखने हैं, इसलिए माता-पिता का जीवित होना बाधा नहीं। साथ में पूछा गया नवार्ण मंत्र — दीक्षित हैं तभी कर सकते हैं।
पूछा गया कि माता-पिता और सास-ससुर जीवित हैं, पितरों की प्रसन्नता का फॉर्म भर सकते हैं क्या — वक्ता के लिए प्रश्न स्वयं उत्तर है। हाँ, क्यों नहीं भर सकते — और कारण बताते हैं कि आपत्ति उठती ही नहीं: उसमें दादा, परदादा इन सभी का नाम लिखना है। इसी बीच पूछे गए नवार्ण मंत्र पर अपनी स्थायी शर्त दोहराते हैं: दीक्षित (दीक्षासक्षम गुरु द्वारा किसी मंत्र या साधना में औपचारिक दीक्षा।) हैं तो कर सकते हैं। और, इस लाइव में कई बार कही बात फिर से: ग्रहण में एक से अधिक मंत्र का जाप नहीं — आरंभ से पूर्ण होने तक एक ही मंत्र।
बंद पूजा घर के बाहर जप
ग्रहण में पूजा घर बंद रहे तो जप कहाँ करें?
पूजा रूम के बाहर कीजिए। पूजा घर बंद रहेगा, और भगवान जी के स्थान तक बाहर का कोई प्रकाश नहीं जाना चाहिए।
वक्ता पुष्टि करते हैं कि ग्रहण में पूजा घर बंद रहेगा। जिस बात पर जोर देते हैं वह यह कि भगवान जी के पूरे स्थान तक बाहर का कोई प्रकाश नहीं जाना चाहिए। इसलिए जप पूजा रूम के बाहर करना है। अंदर रखी पूजन सामग्री — यंत्र, कलश, जो कवच धारण नहीं किए — के बारे में वे लाइव में आगे कहते हैं कि वह सब पूजन स्थान पर रखा है, वह बंद रहेगा, उसमें अलग से कुछ करने की आवश्यकता नहीं।
ग्रहण सूतक के बाद कवच का धागा बदलना
ग्रहण के बाद धारण किए कवच का धागा बदलना होता है?
हाँ — ग्रहण में सूतक लगता है, इसलिए धारण किए किसी भी कवच का धागा अगले दिन बदलना होता है। लकड़ी का दंड दूध से अभिषेक, दत्तात्रेय माला मंत्र और पंचोपचार-दशोपचार पूजन करके पुनः लगाया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि कोई भी कवच धारण किए हों, ग्रहण के अगले दिन उसका धागा बदलना होता है, और कारण सीधे बताते हैं: ग्रहण में सूतक लग रहा है। कई बार कहे हैं — ग्रहण के सूतक के बाद उसका धागा बदलेंगे। साथ में पूछे गए लकड़ी के दंड पर पुनः स्थापना की विधि बताते हैं: दूध से अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। करके, दत्तात्रेय माला मंत्र आदि का पाठ करते हुए, पंचोपचारपूजा का मूल पंचांग क्रम — धूप, दीप, गंध, पुष्प व नैवेद्य — जो साधना की प्रारंभिक क्रियाओं के बाद देवता हेतु किया जाता है। या दशोपचार पूजन करके पुनः लगाएँ।
अपना नित्य मंत्र ही ग्रहण में जारी रखें
जो रोज जपते हैं वही ग्रहण में जपें — रोज की सप्ताक्षरी ग्रहण में भी सप्ताक्षरी
वही सप्ताक्षरी। रोज जो जपते हैं, ग्रहण काल में भी उसी का जप कीजिए — वही दिव्य होगा।
वक्ता का उत्तर एक विशेष स्थिति से सामान्य सिद्धांत बनाता है। एक श्रोता रोज पार्वती सप्ताक्षरी की एक माला करती हैं और पूछती हैं कि ग्रहण में जयंती मंगला काली का जाप करें क्या; वे कहते हैं कि रोज सप्ताक्षरी का जप कर रही हैं तो ग्रहण काल में भी सप्ताक्षरी का ही जप कीजिए, वही दिव्य होगा। उतने ही सीधे यह भी कहते हैं कि कल बगलामुखी का मंत्र जप बिल्कुल कर सकते हैं, अगर वह श्रोता का अभ्यास है।
ग्रहण में कभी कुछ नया शुरू न करें
ग्रहण में बड़वानल स्तोत्र का पाठ सिद्धि के लिए कर सकते हैं?
हाँ, लेकिन तभी जब वह पहले से आपका अभ्यास हो। कल पहली बार बड़वानल स्तोत्र का पाठ करने वाले हैं तो मत कीजिए — ग्रहण में उसी चीज का पाठ अधिकाधिक कीजिए जो पहले से करते आए हैं।
वक्ता सिद्धि के लिए बड़वानल स्तोत्र की अनुमति देते हैं और फिर वह शर्त जोड़ते हैं जिसे वे निर्णायक मानते हैं। अगर पहले से पाठ नहीं कर रहे हैं, कल पहली बार पाठ करने वाले हैं, तो मत कीजिए। ग्रहण का नियम यह कि उसी चीज का पाठ अधिकाधिक कीजिए जिसे पहले से करते आए हैं — और प्रश्नकर्ता का नाम लेकर कहते हैं, यह ध्यान रखिएगा।
ग्रहण में धारण की कोई चीज नहीं उतरती
ग्रहण में कवच या माला उतारनी है?
कुछ नहीं उतारना है। कोई कवच नहीं उतरेगा — सब पहने रहेंगे।
सोखा बाबा वीरभद्र रूप में, साथ में कुलदेवी भद्रकाली
कुलदेवता सोखा बाबा हों तो वे भगवान वीरभद्र हैं, और भगवती भद्रकाली की कुलदेवी रूप में पूजा हो सकती है — बड़े-बुजुर्गों से पूछकर
कुलदेवता सोखा बाबा हैं तो सोखा बाबा वीरभद्र भगवान हैं, और भगवती भद्रकाली की कुलदेवी के स्वरूप में पूजा कर सकते हैं — लेकिन बड़े-बुजुर्गों से पूछकर।
वक्ता उत्तर से पहले देवता की पहचान करते हैं: कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। सोखा बाबा हैं तो सोखा बाबा वीरभद्र भगवान हैं, और उस स्थिति में भगवती भद्रकाली की कुलदेवी के स्वरूप में पूजा कर सकते हैं। तुरंत परिवार के अधिकार पर छोड़ देते हैं — लेकिन बड़े-बुजुर्गों से पूछकर। घर में सोखा बाबा की स्थापना कैसे करें, इस पर वे विधि नहीं देते: स्थापना हर क्षेत्र में अपने-अपने कुल की परंपरा के नियम अनुसार होती है। पहले सोखा बाबा का कवच माँगे जाने पर कहते हैं कि उनके पास नहीं है, और जिनके कुल देवता सोखा बाबा हों और जिनके पास उस अस्त्र का सामर्थ्य हो, उनसे देने का आग्रह करते हैं। सोखा बाबा का एक पौराणिक मंत्र चैनल पर डाला जा चुका है।
नित्य हवन में आहुति संख्या और क्या छोड़ा जाता है
सप्तश्लोकी के नित्य हवन में 108 पाठ पर हर मंत्र से सात आहुति; क्षेत्रपाल बलि और पूर्णाहुति रोज नहीं
नित्य हवन में क्षेत्रपाल बलि रोज नहीं करनी है, और पूर्णाहुति भी रोज नहीं देनी है। 108 पाठ पर हर मंत्र से सात-सात आहुति सर्वश्रेष्ठ — पाँच, सात या ग्यारह, सब चलेगा, और एक देनी हो तो एक।
वक्ता पहले बताते हैं कि क्या छोड़ना है: नित्य हवन में क्षेत्रपाल बलि रोज नहीं करनी है, और नित्य कर रहे हैं तो पूर्णाहुति भी रोज नहीं देनी है — ध्यान रखिए। संख्या पर वे प्रश्नकर्ता के सप्तश्लोकी पाठ की संख्या से चलते हैं। मान लीजिए 108 पाठ करेंगे तो हर मंत्र से सात-सात आहुति दे दीजिए; इसे सर्वश्रेष्ठ कहते हैं। फिर संख्या ढीली करते हैं: पाँच दे दीजिए, सात दे दीजिए, ग्यारह दे दीजिए — एक देनी है तो एक दे दीजिए। इससे पहले वे लाइव के केंद्रीय ग्रहण-नियम को चौथी बार दोहराते हैं, एक प्रश्नकर्ता के लिए जिन्होंने कई बार पूछा था: ग्रहण आरंभ से पूर्ण होने तक एक ही मंत्र का जप, और आरंभ से अंत तक जिस मंत्र का जप करेंगे वही सिद्ध होगा। दो-तीन मंत्र करेंगे तो कोई सिद्ध नहीं होगा। और रजस्वलारजस्वला स्त्री, जिस अवस्था में इस परंपरा में अनुष्ठान सम्बन्धी विशेष निषेध माने जाते हैं। को ऐसी अवस्था में जप नहीं करना चाहिए — शरीर में कष्ट मिलेगा। अंग्रेजी में पूछा गया कि ग्रहण में आसन पर जागे रहने के लिए गुलाब जल इस्तेमाल कर सकते हैं क्या — यस ऑफ कोर्स, और मजाक करते हैं कि आँख में डाल लेंगे तो इतनी जलन होगी कि नींद भाग जाएगी।
संकल्प सूतक से पहले, और बोलकर
ग्रहण काल में मंत्र सिद्धि का संकल्प कैसे लें — मानसिक या बोलकर?
गणपति (गणेश) पूजन और संकल्प सूतक लगने से पहले ही पूर्ण कर लें, बाद में नहीं। फिर शाम को मानसिक रूप से स्मरण करें कि पूर्व उच्चारित संकल्प के अंतर्गत यह जप कर रहे हैं। और संकल्प बोलकर लें — मानसिक नहीं।
वक्ता इसे अपने गुरुजी का निर्देश बताते हैं, जन-कल्याण के लिए सामने रखा हुआ, मानना न मानना श्रोता का विषय: अगर ग्रहण के नियम के अनुसार पूरा विधिवत चलना है तो विधान सूतक से पहले टिकता है। क्रम यह है कि सूतक लगने से पहले — उस दिन ग्रहण का सूतक लगभग 1 बजे से लगने वाला है — भगवान गणपति (गणेश) का पूजन और संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। पूर्ण हो जाना चाहिए। संकल्प यह कि आज रात ग्रहण के समय हम फलाने मंत्र का जप यथाशक्ति पूरे ग्रहण काल में करेंगे। फिर शाम के समय साधक मानसिक रूप से स्मरण करता है, इस सूत्र में कि पूर्व उच्चारित संकल्प के अंतर्गत — आज ग्रहण के दिवस काल में या ग्रहण की रात्रि में हम यह जप कर रहे हैं। इसे वे सही नियम कहते हैं और गुरुजी का बताया हुआ। प्रश्नकर्ता के असली प्रश्न पर फिर धारणा उलट देते हैं: संकल्प मानसिक रूप से नहीं लेना है। बिल्कुल बोलकर लीजिए — मानसिक रूप से क्यों लेंगे? अलग से एक देवता का ध्यान मंत्र पूछे जाने पर कहते हैं कि देखे बिना नहीं बता सकते, वह उन्हें कंठस्थ नहीं, वे सामान्य पाठ करते हैं।
कामाख्या में कामाख्या कवच
जो कामाख्या क्षेत्र में ही हैं, वे ग्रहण में कामाख्या कवच ही करें
अगर कामाख्या में ही हैं तो ग्रहण में कामाख्या कवच कर लीजिए।
एक श्रोता कामाख्या क्षेत्र से बताते हैं कि आज कामाख्या कवच का 51 बार और अर्गला स्तोत्र का 11 माला जप किया, ग्रहण में क्या करें। वक्ता स्थान के आधार पर उत्तर देते हैं: अगर कामाख्या में ही हैं तो कामाख्या कवच कर लीजिए — वही स्थान-देवता का तर्क जो वे लाइव में अन्यत्र लगाते हैं। छाग बलि क्या है पूछे जाने पर कहते हैं पता करिए, बहुत सामान्य सा विषय है।
ऊर्जा सामर्थ्य से अधिक बने तो जप-संख्या घटाना
मंत्र जप शुरू करने के बाद सिर भारी, थकान, चक्कर आएँ तो जप की संख्या कम करें — साथ में शिव अभिषेक और बटुक भैरव
जप की संख्या कम कर दीजिए — ऊर्जा अधिक बन रही है। भगवान शिव का अभिषेक शुरू कर दीजिए ताकि ऊर्जा संतुलित हो और सामर्थ्य इतना बढ़े कि उसे संभाल सकें, और साथ में बटुक भैरव जी का पाठ कीजिए।
एक श्रोता रोज जयंती मंगला मंत्र का जाप कर रहे हैं और बताते हैं कि तब से सिर भारी रहता है, थकान रहती है, हमेशा चक्कर आता रहता है। वक्ता बताए गए क्रम के आधार पर लक्षणों को साधना का परिणाम मानते हैं, कोई असंबंधित रोग नहीं। मंत्र जप शुरू किया और उसके पश्चात ये चीजें शुरू हुईं, तो जप की संख्या कम कर दीजिए, क्योंकि जितनी ऊर्जा संभाली जा सकती है उससे अधिक बन रही है। उपाय है भगवान शिव का अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। शुरू करना, ताकि ऊर्जा संतुलित हो और आपके सामर्थ्य में वृद्धि हो — इतनी कि आप मंत्र की ऊर्जा को संभाल सकें। संख्या कम रखिए, वे दोहराते हैं, और साथ में बटुक भैरव जी का भी पाठ कीजिए।
ग्रहण में प्रयोग — सीधा निषेध
क्या ग्रहण काल में प्रयोग किया जा सकता है?
नहीं। वक्ता कहते हैं ग्रहण काल में प्रयोग केवल दुष्ट लोग करते हैं, दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए। साधक, सेवक और सही मार्ग पर चलने वाले ग्रहण में अपने इष्ट के मंत्र का जप करें, उसकी सिद्धि का प्रयत्न करें, भजन करें — बड़वानल स्तोत्र सिद्ध कीजिए, प्रयोग कभी मत कीजिए।
पूछा गया कि ग्रहण में बड़वानल स्तोत्र का सकाम प्रयोग कर सकते हैं क्या — वक्ता सिद्धि और प्रयोग को तीखेपन से अलग करते हैं और दूसरे को मना कर देते हैं। प्रयोग नहीं करना चाहिए। ग्रहण काल में, वे कहते हैं, प्रयोग केवल दुष्ट लोग करते हैं — जो महादुष्ट और नीच प्रवृत्ति के हों, दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए। सज्जनों, साधकों, सेवकों और सही मार्ग पर चलने वालों को ग्रहण काल में अपने इष्ट-आराध्य के मंत्र का जप करना चाहिए, मंत्र सिद्ध करने का प्रयत्न, भजन आदि करना चाहिए। प्रयोग नहीं। नैतिक कारण से आगे दूसरा कारण देते हैं: देव शक्तियाँ उस समय स्वयं ही वेधित होती हैं, और प्रयोग करके उन्हें और परेशान करना — बड़ी दुष्टता का विषय हो जाता है। प्रश्नकर्ता से सीधे कहते हैं: बड़वानल सिद्ध कीजिए, प्रयोग कभी मत करिएगा। ऐसे नियमों की पूरी तरह उपेक्षा करने वालों पर एक कटु टिप्पणी जोड़ते हैं — उनकी तुलना उन लोगों से जो कुत्ते से उसी जीभ से भगवान को चटवा देते हैं और फिर कहते हैं भगवान तो पशुपतिनाथ हैं — ऐसे लतखोर लोगों के लिए, वे कहते हैं, कोई नियम ही नहीं है।
तीर्थ से पहले स्थान और कुल के देवी-देवता
स्थान और कुल के देवी-देवता प्रसन्न हों तभी तीर्थ सफल होता है — विंध्यवासिनी की यात्रा संभव न हो तो उपाय
भगवती विंध्यवासिनी के नाम से एक दीप प्रज्वलित करना आरंभ कीजिए और "या देवी सर्वभूतेषु क्षमा रूपेण संस्थिता" मंत्र का यथासामर्थ्य 21, 27 या 108 बार जप कीजिए। कुलदेवी या कुलदेवता के निमित्त अलग दीप जलाइए, और स्थान के देवी-देवताओं का पूजन कीजिए — घर, कुल और स्थान के देवी-देवता प्रसन्न हों तभी तीर्थ सफल होता है।
एक श्रोता के लिए माँ विंध्यवासिनी के दर्शन की यात्रा में आर्थिक समस्या है, उपाय पूछते हैं। वक्ता दो तत्काल कार्य बताते हैं: भगवती विंध्यवासिनी के नाम से एक दीप प्रज्वलित करना आरंभ कीजिए, और 'या देवी सर्वभूतेषु क्षमा रूपेण संस्थिता' मंत्र का यथासामर्थ्य — 21, 27 या 108 बार — जप कीजिए। कुलदेवी के निमित्त, या जो भी कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। हों, अलग से दीप प्रज्वलित कीजिए। फिर वह सिद्धांत बताते हैं जो पूरे उत्तर को चलाता है। स्थान के देवी-देवताओं का दर्शन-पूजन करके उनसे सामर्थ्य प्राप्त कीजिए। घर के देवी-देवता, कुल के देवी-देवता, स्थान के देवी-देवता प्रसन्न होंगे तभी आप दिव्य क्षेत्रों में जाकर दर्शन करेंगे और वह सफल होगा। चेतावनी इसका उलटा है: अपने आसपास के क्षेत्र देवी-देवता का कभी पूजन-दर्शन नहीं करते, तो वे तीर्थ (तीर्थ यात्रा) जाने में विघ्न-बाधा उत्पन्न करेंगे ही।
ग्रहण सूतक मृत्यु या जन्म सूतक नहीं — और गंगा जी को ग्रहण नहीं लगता
ग्रहण के सूतक के बाद माला आदि की शुद्धि और अग्नि स्पर्श जरूरी है?
नहीं। अग्नि स्पर्श मृत्यु और जन्म सूतक में होता है, ग्रहण सूतक में नहीं। गंगाजल का छिड़काव कर दीजिए, या तुलसी पत्र से सामान्य जल का, तो सब शुद्ध — उसमें अग्नि स्पर्श का कोई प्रावधान नहीं।
वक्ता सूतक के प्रकार अलग करते हैं। जप माला की शुद्धि और अग्नि स्पर्श ग्रहण के सूतक में अनिवार्य नहीं; वे चीजें मृत्यु और जन्म सूतक में होती हैं। ग्रहण में, ग्रहण खत्म होने पर छिड़काव पर्याप्त है — गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। का छिड़काव कर दीजिए, या तुलसी पत्र से सामान्य जल का, तो सभी कुछ शुद्ध हो गया। उसमें अग्नि स्पर्श का कोई प्रावधान नहीं। गंगा जी पर एक बात जोड़ते हैं: गंगाजल पर ग्रहण का कभी प्रभाव नहीं पड़ता, ध्यान रखिए गंगा मैया को ग्रहण नहीं लगता। इसीलिए गंगा जी में खड़े होकर जप का प्रावधान है — लेकिन तुरंत सीमा बाँधते हैं कि वह गुरु आदेश से ही होगा। दिन में तो आदमी जप कर ही सकता है; रात्रि में गंगा जी में प्रवेश गुरु आदेश से ही करना होता है, नहीं तो नहीं। पूजा के लिए कौन सा जायफलजायफल, घी में डुबोकर पूर्णाहुति से पूर्व अर्पित — नवदुर्गाओं में से प्रत्येक हेतु एक-एक। पूछे जाने पर कहते हैं सामान्य वाला, बिना छिलके वाला।
विनियोग-न्यास एक ही बार, हर पाठ पर नहीं
अनुष्ठान में हर पाठ पर विनियोग-न्यास दोहराना पड़ता है?
एक ही बार — जप में विनियोग और न्यास एक बार किया जाता है, बार-बार नहीं। लेकिन कुंजिका (सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्) और नवार्ण मंत्र का जप वही करे जो दीक्षित हो और जिसे गुरु आदेश हो।
एक श्रोता दो साल से कुंजिका स्तोत्र पाठ कर रहे हैं, नवार्ण का सवा लाख अनुष्ठान किया है, और पूछते हैं कि कुंजिका के 11000 पाठ के अनुष्ठान में हर बार विनियोग-न्यास करना रहेगा क्या। वक्ता विधि का प्रश्न सीधे सुलझाते हैं: विनियोग-न्यास जप में एक ही बार किया जाता है, बार-बार नहीं। लेकिन उत्तर से पहले वह शर्त रखते हैं जिसे वे ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं। इस विषय में वे बिल्कुल स्पष्टता से कहते हैं — कुंजिका (सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्) और नवार्ण मंत्र का जप तभी करना चाहिए जब आप दीक्षित हों, गुरु आदेश हो। और परिणाम भी बताते हैं: अगर यह चीज है तो आपको कुछ पूछने की आवश्यकता ही नहीं।
भय निवारण के लिए देवता के समक्ष उनके माहात्म्य का पाठ
भय अधिक लगे तो देवता के समक्ष उनके सामर्थ्य का माहात्म्य पढ़ें — हनुमान जी के लिए "अतुलित बलधामं", उग्र भाव से
घर पर उग्र भाव से हनुमान जी का पाठ कीजिए। सिद्धांत यह कि देवता के समक्ष वह प्रसंग पढ़ें जिसमें उन्होंने अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन किया — हनुमान जी के लिए "अतुलित बलधामं" का विधिवत उच्चारण।
एक श्रोता बताते हैं कि माता जी को चार साल से बहुत भय लगता है और वे कोई साधना नहीं करतीं। भय अधिक लगने पर वक्ता का उत्तर है — घर पर उग्र भाव से हनुमान जी का पाठ, भय नाश के लिए। फिर इसे विधि में बदलते हैं। किसी को भी भय लगता हो तो अपने से संबंधित देवी-देवताओं को लीजिए — और ध्यान दें कि सादा पाठ करना उससे अलग विषय है जो वे यहाँ कह रहे हैं। देवता के समक्ष उनके सामर्थ्य का प्रसंग पढ़ना चाहिए: वह जिसमें उन्होंने अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन किया, उनका माहात्म्य। हनुमान जी के लिए यह माहात्म्य कि उनके पास कितना सामर्थ्य है। श्लोक बताते हैं — 'अतुलित बलधामं हेमशैलाभ देहं' — और कहते हैं इसका विधिवत उच्चारण करके पाठ कीजिए। इससे भय दूर होगा।
चालीसा अपने आप में संपूर्ण, और उग्र माला मंत्र से सुरक्षित
हनुमान चालीसा की जगह विचित्र वीर हनुमान माला मंत्र करना बेहतर है?
माला मंत्र कर सकते हैं, लेकिन उसे हनुमान चालीसा से रिलेट करेंगे तो पता चलेगा कि तुलसीदास जी ने उसका समावेश उसमें करवाया है। माला मंत्र उग्र है, जिसे अधिकार नहीं वह परेशान हो सकता है — हनुमान चालीसा अपने आप में संपूर्ण है।
वक्ता पहले वह मानसिकता बताते हैं जो उन्हें काम करती दिखती है। हनुमान चालीसा सबको पता है, तो लगता है हनुमान चालीसा से क्या ही होगा, कुछ दूसरा करें, थोड़ा हटके — विचित्र वीर हनुमान माला मंत्र। अनुमति देते हैं: माला मंत्र कर सकते हैं। लेकिन सुझाते हैं कि उसे हनुमान चालीसा से रिलेट करें, क्योंकि तब कई सारी चीजें पता चलेंगी — तुलसीदास जी द्वारा उसका समावेश उसमें करवाया गया है। सावधानी अधिकार की है। जिन्हें माला मंत्र का अधिकार नहीं, वे उससे परेशान हो सकते हैं, वह उग्र है। हनुमान चालीसा अपने आप में संपूर्ण है।
संपुट की दो चालीसा-चौपाइयाँ और उनका फल
हनुमान चालीसा का संपुट पाठ कैसे करें?
"नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा" से संपुट कीजिए, या "भूत पिसाच निकट नहिं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै" से। एक बार संपुट करने का फल 100 पाठ के बराबर, और भय नष्ट।
वक्ता दोनों चौपाइयाँ सीधे बताते हैं। हनुमान चालीसा का संपुट पाठ 'नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा' से कीजिए — इससे संपुट कर दीजिए। या 'भूत पिसाच निकट नहिं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै' से। इसका फल भी बताते हैं: एक बार संपुट करने का फल 100 पाठ के बराबर सब फल देने वाला होगा, और भय नष्ट हो जाएगा। अलग से पूछा गया कि सप्तश्लोकी का न्यास विधि से पाठ बिना दीक्षा के कर सकते हैं क्या — कहते हैं लिखना पड़ेगा, अभी संभव नहीं — और लिखकर पहले बड़े गुरु महाराज जी लोगों से अप्रूवल करवाना होगा कि सही लिखा है या नहीं, तब होगा। पार्वती गीताशिव महापुराण के अंतर्गत पार्वती द्वारा दिया गया उपदेश। का कौन सा अध्याय करें, पूछे जाने पर कहते हैं पाँचवाँ।
ग्रहण में कुलदेव का मसान साबर मंत्र
दस मसान वाले साबर मंत्रों में से अपने कुलदेव का मंत्र ग्रहण में जप सकते हैं
बिल्कुल — अगर वे आपके कुलदेवता हैं तो उस मसान का सबर मंत्र ग्रहण में आराम से जप सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं।
एक श्रोता पूछते हैं कि साबर के दस मसान वाले मंत्रों में से जो उनके कुलदेव हैं, उनका जाप ग्रहण में कर सकते हैं क्या। वक्ता बिना हिचक अनुमति देते हैं: बिल्कुल कीजिए, कोई दिक्कत नहीं — अगर वे आपके कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। हैं तो वह सबर मंत्र आराम से कर सकते हैं।
लंबे अभिचार से पीड़ित घर का तीन-भाग उपाय
लंबे समय से अभिचार-पीड़ित परिवार: हर साल सर्व प्रयोग महाविद्या अनुष्ठान, नवरात्र में एक ब्राह्मण से चंडी पाठ, और पंचबली व चौखट पूजन
दो-तीन साल तक तीन चीजें: घर में साल में एक बार योग्य जानकार से सर्व प्रयोग महाविद्या अनुष्ठान; नवरात्रि में एक ब्राह्मण से नौ दिन चंडी पाठ और हवन; और कुल देवी-देवताओं के लिए पंचबलि, यथाशक्ति दान और चौखट का पूजन।
एक श्रोता बताते हैं कि पूरा परिवार लंबे समय से अभिचार से पीड़ित है, जो पिताजी के गुरु ने किया था और जो अब जीवित नहीं हैं — मुक्ति कैसे मिले। वक्ता एक उपाय नहीं, पूरा कार्यक्रम रखते हैं। पहला, अपने घर में यथासंभव साल में एक-एक बार सर्व प्रयोग महाविद्या का अनुष्ठान योग्य जानकार व्यक्ति से करवाइए — कम से कम दो-तीन साल। दूसरा, नवरात्रि में वहाँ चंडी पाठ करवाइए। पैमाने पर वे स्पष्ट और जानबूझकर संयत हैं: वे नौ चंडी, नौ ब्राह्मण नहीं कहेंगे। एक ब्राह्मण नौ दिन पाठ करें और हवन हो — यह करवाइए। तीसरा, साथ में कुल देवी-देवताओं के लिए पंचबलिअनुष्ठान के अंत में विभिन्न योनियों हेतु अर्पित की जाने वाली पाँच बलियाँ।, शरीर से जितना हो दान, और चौखट का पूजन। ये कीजिए, वे कहते हैं, साल भर में बहुत फर्क पड़ेगा।
परंपरा से मिली रीति पर निर्णय न देना
पितृ पक्ष में शुभ काम न करने की रीति ठीक है?
वक्ता रीति के ठीक या गलत होने पर कोई जजमेंटल स्टेटमेंट देने से मना करते हैं। उन्हें जो बताया गया है वे वही करेंगे; श्रोता अपनी इच्छा अनुसार करें।
पूछा गया कि पितृ पक्ष में शुभ काम न करने की रीति ठीक है या नहीं — वक्ता निर्णय देने से मना करते हैं। रीति ठीक है कि नहीं, इस पर वे कोई जजमेंटल स्टेटमेंट नहीं दे सकते। उनकी अपनी स्थिति मूल्यांकन की नहीं, परंपरा की है: हमारे लिए जो बताया गया है, हम वही करेंगे। आज के समय पर एक व्यंग्य जोड़ते हैं — लोग अपने आप में इतने विद्वान हैं कि कुछ भी कर सकते हैं, और ठीक-गलत का निर्णय उनका विषय नहीं — अपनी इच्छा अनुसार करिए। लाइव में आगे वे एक संबंधित सिद्धांत सकारात्मक रूप में कहते हैं: देव कार्य अनिवार्य हो न हो, पितृ कार्य हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य है, और ठीक इसलिए कि पितृ कार्य हर व्यक्ति नहीं करना चाहता, अन्य सभी कार्यों पर रोक लगाई गई है।
दिव्य अनुभव सार्वजनिक नहीं किए जाते
दिव्य अनुभव कभी सार्वजनिक नहीं किया जाता — कामाख्या क्षेत्र का तो बिल्कुल नहीं
वक्ता व्याख्या करने से मना करते हैं और श्रोता से कहते हैं कि इसे मत बताइए। ऐसी चीजें कभी सार्वजनिक नहीं करनी चाहिए — कामाख्या क्षेत्र का अनुभव तो बिल्कुल नहीं।
एक श्रोता ने पहले बताया था कि कामाख्या में एक छोटी कन्या ने उन्हें नाक की बाली देकर कहा कि पत्नी को दे देना, जबकि उनकी शादी हुई ही नहीं — वक्ता ने इसे शुभ संकेत माना था कि अब शादी हो जाएगी। अब वे आगे बताते हैं: उस शाम के बाद से रोज सपने में खुद को मंदिर में पाते हैं। वक्ता व्याख्या के बजाय उन्हें रोक देते हैं। यह सब विषय सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। बात को व्यक्तिगत रूप से दबाते हैं — ये पुराने श्रोता हैं, हमेशा सुनते हैं, इसीलिए उन्होंने पूछा था। अगर सही में बता रहे हैं तो नहीं बताना है। ऐसी दिव्य चीजें, वह भी कामाख्या क्षेत्र में हो जाएँ, नहीं बतानी चाहिए — कभी भी नहीं बतानी चाहिए।
योगिनियाँ क्या करती हैं, और कवच से ज्यादा पाठ क्यों
64 योगिनियों में कई केवल नकारात्मक शक्तियों का भक्षण करती हैं, कई धन के स्रोत खोलती हैं — कवच से ज्यादा महत्व नाम पाठ का
64 योगिनी में कई सिर्फ नकारात्मक शक्तियों का भक्षण करती हैं, कई धन के अनेक स्रोत खोल देती हैं; बच्चों पर बाल ग्रह का कष्ट नहीं आता और घर में लाग नहीं लगती, क्योंकि ये सब योगिनियों के अधीन हैं। कवच वैकल्पिक है — वक्ता का असली उद्देश्य है कि लोग नाम पाठ करें।
पूछा गया कि 64 योगिनी कवच का नाम पाठ बार-बार करते रहना है क्या — वक्ता पहले अनिवार्यता हटाते हैं। कवच का पाठ नहीं करेंगे तो ऐसी कोई दिक्कत नहीं कि उससे कोई परेशानी हो जाएगी। ऐसा नियम बँधा नहीं है कि पाठ करेंगे तभी धारण करें, न करने पर दिक्कत देगा — कुछ नहीं होगा। करते तो अच्छा होता; और पत्नी पति के निमित्त भी कर सकती हैं। पाठ करता क्या है, उनके अनुसार — भगवती की ओर आपका एक चरण बढ़ जाता है। जब 64 योगिनी के नामों का पाठ करेंगे तो उनके दिव्य प्रभाव आपके जीवन में प्रकट होने लगेंगे। 64 में कई ऐसी योगिनी हैं जो सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक शक्तियों का भक्षण करती हैं, कई ऐसी जो धन प्रदान करने के अनेक स्रोत खोल देती हैं और प्रसन्न हो जाएँ तो धन-दान से परिपूर्ण कर देती हैं। योगिनियों की कृपा हो जाए, वे पूछते हैं, तो क्या संभव नहीं? घर के लाभ विशेष रूप से गिनाते हैं: घर में छोटे बाल-बच्चे हैं तो उन पर कोई विशेष बाल ग्रह जनित कष्ट जल्दी उपस्थित नहीं होगा, कोई उपद्रव नहीं होगा; आसपास की नकारात्मक शक्तियाँ, और जो लाग कई बार लग जाती है, वह सब नहीं लगेगी — क्योंकि वे सब योगिनियों के अधीन हैं। उनकी प्रमुखता का इतिहास भी बताते हैं: 64 योगिनी भगवती के कार्यों को पूर्ण करने के लिए प्रकट हुईं, और कलिकाल (कलियुगचार युगों में वर्तमान और अंतिम युग, जिसमें वक्ता के अनुसार कुछ साधनाएँ वर्जित हैं और कुछ विशेष रूप से फलदायी।) में योगिनियों का वर्चस्व है। जो रोज पाठ नहीं कर सकते उनके लिए विकल्प: अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। को, चतुर्दशी को, नवमी को, पूर्णिमा या अमावस्या को — या सप्ताह में किसी एक दिन, लेकिन पाठ कभी न कभी कीजिए। धीरे-धीरे कंठस्थ हो जाएगा, फिर पाठ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, 64 नाम चलते रहेंगे — और फिर योगिनियाँ स्वयं आपसे अपनी पूजा करवाएँगी, सामर्थ्य देंगी, बुद्धि देंगी। अंत में अपना असली उद्देश्य बताते हैं। दाम की आपत्ति को सीधे स्वीकार करते हैं — लोग 4000 का रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । कवच देखकर सोचते हैं कि इससे कितना कमा लेंगे — और कहते हैं कि आप अभी नहीं समझ रहे कि इससे क्या मिलने वाला है, जबकि उन्हें अनुभव है कि यह कैसे काम करेगा। कवच कितने लोग लें, लेकिन जो नामावलीदेवता के नामों की लिखित सूची — जैसे दुर्गा के 108 नाम, हवन में प्रत्येक नाम पर पृथक आहुति देने की सुविधा हेतु अलग से लिखे जाते हैं। उन्होंने डाली है उसका पाठ अवश्य करें। यही, वे कहते हैं, उनका मुख्य उद्देश्य रहा है: पाठ करो। पाठ करना आरंभ कर देंगे तो आगे का सामर्थ्य स्वयं प्राप्त हो जाएगा।
नित्य पाठ को विधि-नियम से मुक्त रखना
नित्य नामावली पाठ के लिए विनियोग-न्यास चाहिए?
आवश्यकता नहीं। विनियोग-न्यास करेंगे तो विधि-नियम में चले जाएँगे, और उतने विधि-नियम में जाएँगे तो रोज का नहीं कर पाएँगे — यही समस्या है।
वक्ता नामावलीदेवता के नामों की लिखित सूची — जैसे दुर्गा के 108 नाम, हवन में प्रत्येक नाम पर पृथक आहुति देने की सुविधा हेतु अलग से लिखे जाते हैं। के नित्य पाठ के लिए औपचारिक अंग हटा देते हैं, और कारण पूरी तरह व्यावहारिक देते हैं। विनियोग-न्यास करेंगे तो विधि-नियम में चले जाएँगे; उतना विधि-नियम में जाएँगे तो रोज का नहीं कर पाएँगे — यही समस्या है। इसी बीच पूछा गया कि कुल सप्तमी से गीता के 11वें अध्याय का पाठ करते हैं तो क्या सातवाँ भी करें — कहते हैं नहीं, केवल 11वें का ही कीजिए, और इसे बहुत अच्छा और दिव्य विषय बताते हैं।
जहाँ परंपरा केवल दर्शन की है, वहाँ दर्शन ही
जहाँ कुलदेवी का जीवन में तीन बार केवल दर्शन होता है, पूजन नहीं, वहाँ दर्शन ही करना है
कोई पूजा नहीं होती, दर्शन होता है — तो दर्शन ही कीजिए। वक्ता कुलदेवी की कुल-परंपरा को जैसी है वैसी स्वीकार करते हैं, उसमें कुछ जोड़ते नहीं।
एक श्रोता बताते हैं कि उनकी कुलदेवी, माँ चामुंडाचंड और मुंड का वध करने पर देवी को प्राप्त हुआ स्वरूप, जिससे यह नाम पड़ा। का रूप, जीवन में केवल तीन बार दर्शन के लिए हैं, वहाँ जाकर कोई पूजन नहीं होता, और घर की व्यवस्था अलग है। वक्ता व्यवस्था को बिना बदले स्वीकार करते हैं: ठीक है — कोई पूजा नहीं होती, दर्शन होता है, दर्शन ही कीजिए।
करके बताइए — और गुरु-शिष्य संबंध की दशा
जो साधना उन्होंने स्वयं नहीं की, उसके लिए कहते हैं — करके बताइए — और वे चेला क्यों नहीं बनाते
हर साधना उन्होंने स्वयं नहीं की — सोखा बाबा उनके कुल के देवता नहीं, न उन्होंने वह जप किया — तो प्रश्नकर्ता स्वयं करके बताएँ, वे अन्य लोगों को बताएँगे। आजकल के शिष्य इतनी जल्दी बुरा मान जाते हैं कि सच्चा गुरु-संबंध टिकता नहीं: न गुरु बनो, न चेला बनाओ, और अभिमान समाप्त हो तभी गुरु के चरणों में गिरो।
बार-बार 'क्या होगा' पूछने वाले प्रश्नकर्ता से वक्ता कहते हैं — करो, तब तो पता चलेगा क्या होगा। अपनी सीमा साफ बताते हैं: सोखा बाबा उनके कुल के देवता नहीं हैं, न ही उन्होंने उनका जप किया है, तो वे कैसे बता सकते हैं। आप खुद कीजिए, करके हमें बताइए, हम अन्य लोगों को बताएँगे — कई सारे ऐसे विषय, वे कहते हैं, श्रोता ही करके बताते हैं, और फिर वे कह पाते हैं कि हाँ भैया, ऐसा हुआ। उत्तर फिर स्वभाव की शिकायत में फैलता है। इतना जल्दी बुरा लग जाता है, इतना जल्दी खराब लग जाता है — कैसे साधना मार्ग पर चलेंगे। यूट्यूबिया साधना मार्ग ऐसा ही होगा, वे कहते हैं: तुरंत भागना पड़ जाता है। जिस दिन वास्तव में कोई सक्षम गुरु सामने मिल जाएँगे और गलती पर दो झापड़ खींचकर देंगे, तब आप अपने गुरु को गरियाकर भाग जाइएगा। इसीलिए, वे कहते हैं, वे कभी चेला-चपेटा नहीं बनाना चाहते। आजकल के शिष्य गुरु को लतियाने में देरी नहीं लगाते — तुरंत चार बात बोल देंगे, और गुरु का पूरा जप-तप (तपस्यादीर्घकाल तक किया गया तप, जिससे तपोबल संचित होता है।) इसी बात पर केंद्रित हो जाएगा कि अपमान कर दिया। तो इससे बढ़िया न गुरु बनो, न चेला बनाओ — चेला ही बने रहो। जिस दिन अभिमान भीतर से समाप्त हो जाए, तब गुरु के चरणों में गिर जाओ।
शिव कवच के साथ शिव माला मंत्र
महाकुंभ के समय आए शिव कवच के साथ शिव माला मंत्र करना बहुत दिव्य रहेगा
महाकुंभ (कुंभ) के समय आए शिव कवच के लिए शिव माला मंत्र कीजिए — वक्ता कहते हैं बहुत दिव्य रहेगा।
एक श्रोता महाकुंभ (कुंभ) के समय आए शिव कवच के बारे में पूछते हैं। वक्ता उसके साथ एक पाठ जोड़ते हैं: उस कवच के लिए शिव माला मंत्र कीजिएगा तो बहुत दिव्य रहेगा। यहाँ और कोई विधि नहीं देते।
संकट नाशन — परीक्षा के लिए सबसे आसान और प्रभावी
प्रतियोगी परीक्षा में अच्छा रैंक लाने के लिए कौन सी साधना करें?
भगवान गणपति (गणेश) का संकट नाशन स्तोत्र। गणपति जी के समक्ष बैठकर उनके 12 नामों का कम से कम 12 पाठ प्रतिदिन; अधिक समय हो तो दूर्वा चढ़ाकर 108 पाठ। वक्ता इसे दिव्य, अद्भुत और सबसे आसान कहते हैं।
पूछा गया कि प्रतियोगी परीक्षा में अच्छा रैंक लाने के लिए कौन सी साधना करें — वक्ता इसे बहुत अच्छा प्रश्न कहते हैं और अपने अनुभव से उत्तर देते हैं: उनके अनुसार भगवान गणपति (गणेश) का संकट नाशन स्तोत्र। अपने आप में दिव्य, अद्भुत, और सबसे आसान। न्यूनतम: प्रतिदिन गणपति जी के समक्ष बैठकर उनके 12 नामों का कम से कम 12 पाठ। अधिक समय हो तो दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। चढ़ाकर 108 पाठ कर लीजिए। दिव्य प्रभाव पड़ेगा। बाद में एक श्रोता पूछते हैं कि ग्रहण में क्या करें — सप्तश्लोकी, संकट नाशन, दुर्गा स्तोत्र, सतनाम — और बताते हैं कि उन्हें ग्रहण में पहली बार कुछ करने से मना किया गया है; वक्ता उन्हें संकट नाशन की ओर भेजते हैं, इस शर्त पर कि उद्देश्य प्रतियोगिता परीक्षा है।
उपदेश में मिला मंत्र जपा जा सकता है
दीक्षा नहीं, उपदेश रूप में मिला बटुक भैरव मंत्र जप सकते हैं?
हाँ — उपदेश रूप में दिया है तो उपदेश मिला है, कर सकते हैं।
वक्ता इस स्थिति में उपदेश को पर्याप्त अधिकार मानते हैं: बटुक भैरव मंत्र बिना विधिवत दीक्षासक्षम गुरु द्वारा किसी मंत्र या साधना में औपचारिक दीक्षा। के, उपदेश रूप में दिया गया है — तो उपदेश मिला है, कर सकते हैं।
भगवान के नाम में गलती न ढूँढ़ना
भगवान के नाम में गलती मत ढूँढ़िए — "मुरारी" हो या "मुरारे", दोष नहीं; और देव कार्य अनिवार्य हो न हो, पितृ कार्य अनिवार्य है
भगवान के नाम में गलती मत ढूँढ़िए, इतना चिंतन मत कीजिए। भगवान के नाम में आगे-पीछे होने में कोई गलती नहीं, चिंता की आवश्यकता नहीं — वक्ता वाल्मीकि जी का प्रसिद्ध प्रसंग याद दिलाते हैं। अलग से: देव कार्य अनिवार्य हो न हो, पितृ कार्य हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य है।
एक श्रोता कृष्ण जन्माष्टमी से 'कृष्ण गोविंद हरे मुरारी' कर रहे हैं और लोग कहते हैं सही 'मुरारे' है। वक्ता कहते हैं भगवान के नाम में अब गलती मत ढूँढ़िए, उसमें इतना चिंतन मत कीजिए। वाल्मीकि जी का प्रसिद्ध प्रसंग याद दिलाते हैं, और उसकी स्थिति पर सावधान हैं — अब यह सत्य है कि असत्य, विद्वान लोग इसका भी विषय बताते हैं, कई कहते हैं कि यह सही नहीं है। लेकिन निष्कर्ष उससे स्वतंत्र है: भगवान के नाम में आगे-पीछे होने में कोई गलती नहीं, उसमें इतना चिंता करने की आवश्यकता नहीं। एक संबंधित कमेंट पर पुष्टि करते हैं कि देव कार्य अनिवार्य हो न हो, पितृ कार्य हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य है — और ठीक इसलिए कि पितृ कार्य हर व्यक्ति नहीं करना चाहता, इस अवधि में अन्य सभी कार्यों पर रोक लगाई गई है; शुभ-अशुभ का इसमें कोई विशेष महत्व नहीं।
नवार्ण के लिए गुरु अनिवार्य, बिना अपवाद
क्या नवार्ण मंत्र का जप बिना दीक्षा के, पुस्तक की विधि देखकर, किया जा सकता है?
नहीं। नवार्ण मंत्र का जाप बिना गुरु दीक्षा, बिना गुरु कृपा के नहीं करना चाहिए, और पुस्तक देखकर करने के समर्थन में वक्ता कभी नहीं रहे। यह महामंत्रों का राजा है, जिसका पूरा विधि-विधान शास्त्र में उल्लिखित है — अपनी मर्जी से करना उचित नहीं।
ग्रहण में गंगा किनारे बटुक भैरव स्तोत्र
गंगा किनारे बैठकर ग्रहण काल में बटुक भैरव स्तोत्र या सतनाम का जाप अपने आप में दिव्य
गंगा किनारे बैठकर ग्रहण काल में बटुक भैरव स्तोत्र या सतनाम का जाप, वक्ता कहते हैं, अपने आप में दिव्य विषय है — बिल्कुल करना चाहिए।
एक श्रोता गंगा किनारे बैठकर ग्रहण में बटुक भैरव स्तोत्र और सतनाम का जाप करने की बात कहते हैं। वक्ता पूरा अनुमोदन करते हैं: यह अपने आप में दिव्य विषय है, ग्रहण काल में बिल्कुल करना चाहिए — कीजिए। इसी बीच एक श्रोता विंध्यवासिनी क्षेत्र में शाक्त दीक्षा (दीक्षासक्षम गुरु द्वारा किसी मंत्र या साधना में औपचारिक दीक्षा।) के आयोजन की बात करते हैं, जिसे वे अच्छा बताते हैं, और नवार्ण वाले श्रोता बताते हैं कि उन्हें उसकी दीक्षा मिली है — उन्हें निश्चिंत होकर करने को कहा जाता है।
साधना चुनने से पहले चतुर्थ भाव देखना
जमीन या खेत लेने के लिए कोई साधना है?
एकदम प्रॉपर्ली केवल इसी के लिए करना हो तो लग्न कुंडली में चतुर्थ भाव का अधिपति कौन है, किस नक्षत्र के साथ है, यह देखकर उससे संबंधित साधना करें। साथ में मंगल देव और भगवती भूमि के अनुष्ठान का भी विधान है।
वक्ता उत्तर को इस शर्त पर रखते हैं कि एकदम प्रॉपर्ली, केवल इसी के लिए करना हो। तब लग्न कुंडली में देखिए चतुर्थेश कौन है — चतुर्थ भाव का अधिपति — किस नक्षत्र के साथ है, क्या विषय है। उससे संबंधित साधना करेंगे तो इसका मार्ग शीघ्र अति शीघ्र प्रशस्त होगा। कुंडली-आधारित तरीके के साथ एक स्थायी विधान भी बताते हैं: इसी उद्देश्य के लिए मंगल देव और भगवती भूमि के अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। का भी विधान है।
देव अपराध और श्राप से मुक्ति — रुद्राष्टकम
रुद्राष्टकम का क्या माहात्म्य है?
बहुत ही माहात्म्य है। किसी प्रकार का देव अपराध हो जाए, मंत्र श्राप लग जाए, किसी का शाप लग जाए — यहाँ तक कि भगवान शिव का भी श्राप हो — तो रुद्राष्टकम् के अनुष्ठान से तुरंत निवृत्ति हो जाती है। पितृ उपाधि की भी शांति हो जाती है।
वक्ता रुद्राष्टकम का माहात्म्य बहुत ही बड़ा बताते हैं और गिनाते हैं कि वह क्या-क्या दूर करता है। किसी प्रकार का देव अपराध हो जाए, मंत्र श्राप लग जाए, किसी का शाप लग जाए — और सूची को भगवान शिव के श्राप तक ले जाते हैं — तो रुद्राष्टकम् के अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। आदि से तुरंत ही निवृत्ति हो जाती है। पितृ पक्ष का प्रयोग जोड़ते हैं: पितृ उपाधि (पितृ दोष) की भी शांति हो जाती है, और उसका पूरा विधान अलग से बताया हुआ है। इसी प्रसंग में पुष्टि करते हैं कि बाजार में मिलने वाले गौमुखी श्रृंगी से शिव अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। कर सकते हैं — विकल्प हो और सही विकल्प हो तो ले लीजिए; 32 नामों का पाठ बोलकर बिल्कुल कर सकते हैं; विपरीत प्रत्यंगिरा बिना दीक्षासक्षम गुरु द्वारा किसी मंत्र या साधना में औपचारिक दीक्षा। के न करें, प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि अपने गुरुजी से, जो हैं ही, दीक्षा ले लें; और मंत्र महार्णव तांत्रिक ग्रंथ है।
चौखट — जहाँ घर की आधी समस्याएँ सुलझती हैं
पितृ मलिन हों तो क्या करें?
दो काम: श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय का पाठ, और भगवती गंगा के 108 नाम (गंगा अष्टोत्तरशतनाम) का पाठ। जाप के समय रखा जल पूरे घर में छिड़किए, चौखट धुलिए — चौखट न हो तो आधा अनुष्ठान ऐसे ही सफल नहीं होता।
मलिन पितरों के लिए वक्ता प्रश्नकर्ता को दो काम बताते हैं: श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय का पाठ, और भगवती गंगा के 108 नाम (गंगा अष्टोत्तरशतनाम) का पाठ। जाप के समय जो जल पास रखें, उसे पूरे घर में छिड़किए — और चौखट धुलिए। उत्तर असल में चौखट पर जाता है, और लाइव इसी पर समाप्त होता है। चौखट न हो, वे कहते हैं, तो आधा अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। ऐसे ही सफल नहीं होता — इसीलिए वे हर लाइव में चौखट-चौखट करते हैं। अपना तरीका बताते हैं: किसी को शिष्य बनाकर उसके घर जाएँ और चौखट न हो, तो पहले चौखट पर ही पूजा कर देंगे, बाद में अंदर जाएँगे — और कहेंगे, तुम कैसा मेरा चेला रे, कि चौखट ही नहीं लगाया और हमको बुला दिया; उसकी पूजा करके चले आएँगे। दावा सीधा है: आपके जीवन की आधी से अधिक समस्या चौखट पर सॉल्व हो सकती है। जहाँ भगवान नरसिंह नित्य निवास करते हों, महा नारायण का स्थायी वास हो — वह स्थान आपके घर में है तो आधी समस्या वहीं नष्ट हो जाएगी। स्पष्ट आपत्ति का उत्तर पहले ही देते हैं। कई घरों में चौखट है, फिर भी समस्या — क्योंकि घर में अंडा, बकरी-बकरा बन रहा है, चौखट पर पैर रख रहे हैं, उस पर बैठ रहे हैं, गंदा रख रहे हैं, कभी पूजते नहीं। जहाँ चौखट हो और सेवा-पूजा हो, और उसके बाद प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। का भोग हो रहा हो, तो समझ लीजिए वह प्रारब्ध एक चौथाई भोग रहे हैं। सहस्रनाम पाठ पर पूछे जाने पर पुष्टि करते हैं कि लाभ अवश्य प्राप्त होगा।
पक्ष आरंभ से पहले समापन निर्देश
पूरे पक्ष में पितरों के निमित्त यथासंभव सेवा-पूजा करें, और ग्रहण काल का लाभ लें
कल से आरंभ हो रहे पक्ष में पितरों (पितृ) के निमित्त जितना हो सके सेवा-पूजा करें, ग्रहण काल का लाभ लें, और — जो गंगा जी के क्षेत्र में या अन्य दिव्य क्षेत्रों में हैं — उन क्षेत्रों का लाभ लें।
वक्ता लाइव को उन दो अवसरों पर लौटकर समाप्त करते हैं जो पूरे समय साथ-साथ चले। कल से पितृ पक्ष आरंभ होगा; सभी अपने पितरों के निमित्त यथासंभव जितना हो सके सेवा-पूजा करें, और ग्रहण काल का लाभ लें। जो गंगा जी के क्षेत्र में हैं, अन्य क्षेत्रों में हैं, दिव्य क्षेत्रों में हैं, उन क्षेत्रों का लाभ लीजिए। उसी जयकारे से समाप्त करते हैं जिससे लाइव शुरू हुआ था।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।