देवशयनी एकादशी से श्रावण पूर्णिमा तक — बिना गुरु की गुरु पूर्णिमा, साठ दिन का सावन और घर पर रुद्राभिषेक
देवशयनी एकादशी से श्रावण पूर्णिमा तक का मार्गदर्शन।
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गौ सेवा घर का पहला कर्तव्य क्यों है?
साल भर के कार्यों में पहला — गौ सेवा
रखे गए कार्यों में पहला है गौ सेवा। वक्ता कहते हैं कि गौ माता की सेवा हम सबकी ज़िम्मेदारी है।
वक्ता कहते हैं कि पहली बात गौ सेवा की रखी गई है। गौ माता की सेवा हम सबकी ज़िम्मेदारी है। वे एक विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाते हैं। लोग कुत्तों को घर के भीतर रखते हैं और उनका जूठा खाते हैं। यह आज का फैशन बन गया है — आप अमीर हैं तो तब तक अमीर नहीं कहलाएँगे जब तक घर में कोई ब्रांडेड कुत्ता न रखें। और गौ माता की सेवा हर किसी के बस की नहीं — गोबर कौन सँभालेगा? — इसलिए लोग गौ मैया की सेवा नहीं करते। वक्ता कहते हैं कि जितना हो सके, कम से कम उतना तो हमें करना चाहिए।
जन्म तिथि पर गौ सेवा क्यों बताई जाती है?
जिसकी जन्म तिथि है वह जीव, और उसके पितर व देवता
वक्ता कहते हैं कि यह बहुत बड़ी राशि नहीं है, पर इससे उस जीव का भी कल्याण होगा जिसका जन्मदिन और जन्म तिथि है। उसके पितर, पूर्वज और देवता प्रसन्न होंगे — क्योंकि गौ मैया की सेवा से मिले आशीर्वाद से देवता भी तर जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह बहुत ज़्यादा नहीं है, पर इस माध्यम से उस जीव का भी कल्याण होगा जिसका जन्मदिन और जन्म तिथि है। उसके पितृ, पूर्वज और देवता प्रसन्न होंगे — क्योंकि गौ मैया की सेवा से, उनके आशीर्वाद से, देवता भी पार उतर जाते हैं। उन्हीं गौ माताओं के गौ कंडे पर हम अपनी आहुतियाँ देते हैं, और फिर अग्नि देवता सभी देवी-देवताओं को तृप्त करते हैं। उन्हीं गौ माताओं के पंचगव्य और पंचामृत से हम हर देवता का अभिषेक और पूजन करते हैं। उनके बिना हमारी सद्गति हो ही नहीं सकती।
घर को किन-किनके जन्मदिन पर चारे की व्यवस्था करनी चाहिए?
परिवार के हर सदस्य के लिए एक-एक दिन
वक्ता कहते हैं कि कम से कम अपनी जन्म तिथि पर, और अपने सभी अपनों के जन्मदिन पर — माता-पिता, पति या पत्नी, बेटे-बेटी, भाई-बहन — एक-एक दिन अपने घर से, अपने परिवार की ओर से हरे चारे की व्यवस्था करवाइए।
वक्ता कहते हैं कि कम से कम इतना तो कीजिए। अपनी जन्म तिथि पर, और परिवार में जो भी आपका अपना है — आपके माता-पिता, पति या पत्नी, बेटा-बेटी, भाई-बहन — उन सबके जन्मदिन पर भी, बस एक-एक दिन, अपने घर से और अपने परिवार की ओर से हरे चारे की व्यवस्था करवाइए।
हमारे भरण-पोषण के लिए माँ ने स्वयं गाय के रूप में अवतार लिया है, इसलिए उनकी सेवा सबसे पहले है।
हमारे भरण-पोषण के लिए जगदंबा ने गाय रूप में अवतार लिया
वक्ता कहते हैं कि स्वयं जगदंबा ने हमारे भरण-पोषण के लिए इस जीव के रूप में, गाय के रूप में अवतार लिया है — इसलिए उनकी सेवा हमारा सबसे पहला कर्तव्य है।
वक्ता कहते हैं कि हम भगवती का ही पहला काम शुरू कर रहे हैं। स्वयं जगदंबा ने, साक्षात, हमारे भरण-पोषण के लिए गाय के रूप में, इस जीव के रूप में अवतार लिया है — इसलिए उनकी सेवा हमारा प्रमुख कर्तव्य है। बाकी जीवों की सेवा हम अपने घर के आसपास करते हैं। हम हर जीव की सेवा करते हैं, और वह हमें करनी ही चाहिए। अपना भोजन करने से पहले दूसरे जीवों को खिलाना चाहिए — गाय हो, कुत्ता हो या कौआ, आसपास जो भी पशु मिले, उसे खिलाइए। और हो सके तो इधर-उधर घूमते बेसहारा पशुओं की भी सेवा कीजिए।
देवशयनी एकादशी पर क्या करना चाहिए?
108 नामों से नारायण के नाम पर सूक्ष्म हवन
कल देवशयनी एकादशी है और इसी से चातुर्मास शुरू होता है। वक्ता कहते हैं कि दिन का पहला काम है भगवान नारायण के नाम पर सामर्थ्य अनुसार हवन — सूक्ष्म हवन ही सही, पर कीजिए — उनके 108 नामों से आहुति दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि कल एकादशी है, और कल के दिन से — सबसे पहले भगवान नारायण के नाम पर अपनी सामर्थ्य अनुसार हवन कीजिए। यह बात वे दोपहर में भी कह रहे थे, जब शायद ऑडियो कट गया था। कल देवशयनी एकादशी है; कल से चातुर्मास शुरू हो रहा है। तो कल के दिन का पहला काम यह है कि आप सूक्ष्म हवन ही सही — पर कीजिए। नारायण के 108 नामों से आहुति दीजिए। जो यज्ञोपवीत धारण नहीं करते, उनके लिए — जैसे वे पहले हवन समझा चुके हैं — प्रणव के बिना भगवान के नाम से आहुति दीजिए।
देवशयनी एकादशी पर नारायण के साथ और किसे आहुति देनी चाहिए?
नारायण के बाद अपने इष्ट, और पुरुष व साधिकाएँ किससे आहुति दें
साथ में अपने इष्ट-आराध्य की भी कीजिए — हनुमान जी को पूजते हैं तो नारायण के बाद हनुमान जी; भगवती को पूजते हैं तो नारायण के बाद भगवती। पुरुष घी और गुग्गुल से करें; सभी साधिकाएँ, बहनें हवन सामग्री से करें।
वक्ता कहते हैं कि साथ में अपने इष्ट-आराध्य की भी कीजिए। अगर आप हनुमान जी की पूजा करते हैं, तो नारायण के बाद हनुमान जी। अगर भगवती की करते हैं, तो नारायण के बाद भगवती। पुरुष घी और गुग्गुल से करें। सभी साधिकाएँ, बहनें हवन सामग्री से करें। अगर हवन सामग्री नहीं है, कल उसकी व्यवस्था नहीं हो पाती, तो कोई बात नहीं — कम से कम घर में जो भगवान नारायण का श्री विग्रह है, उसका अभिषेक कीजिए, और सामर्थ्य अनुसार उनके नामों और स्तोत्रों का पाठ कीजिए। कल यह काम विशेष रूप से कीजिए।
सिद्धि और चमत्कार के लिए दुनिया के पागलपन में मत पड़िए।
जीवन का उद्देश्य तंत्र सीखना या चमत्कार करना नहीं
वक्ता कहते हैं कि वे गुरु का विषय फिर से साफ़ कर रहे हैं और साथ में निवेदन कर रहे हैं: जीवन का उद्देश्य केवल तंत्र सीखना और चमत्कार करना नहीं है — इन सबमें मत पड़िए। पूरी दुनिया सिद्धि पाने, कोई शक्ति पाने, दूसरों के बारे में जानने, दिव्य दृष्टि पाने के पीछे पागल है।
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद आती है हमारी गुरु पूर्णिमा। गुरु के विषय पर इस चैनल पर जितना बता सकते थे, उन्होंने बताया है — गुरु की ज़रूरत कैसे और कब है, कहाँ कोई आवश्यकता नहीं, कब करना है और कब नहीं। वे विषय फिर से साफ़ कर रहे हैं, और साथ में निवेदन कर रहे हैं: देखिए, जीवन का उद्देश्य केवल तंत्र सीखना और चमत्कार करना नहीं है। इन सबमें मत पड़िए। पूरी दुनिया पागल है — भाई, हमें सिद्धि मिल जाए, हमें फलानी शक्ति मिल जाए, हम दूसरों के बारे में जान लें, दिव्य दृष्टि मिल जाए। और चैनल पर यह विषय जितना सरल करके बताया जा सकता है, उतना बताया जाता है: देखिए, ये माध्यम हैं। पर हर बात अलग-अलग लोगों के लिए अलग हो सकती है। एक ही चीज़ सबके साथ कभी नहीं होती। हम किसी का अनुभव रख रहे हैं; हर किसी का अपना जीवन है, तो हर किसी के लिए यह पहले या बाद में, कम या ज़्यादा हो सकता है।
जो लोग गलत हाथों से तंत्र सिद्धि के पीछे भागते हैं, उनके साथ क्या होता है?
टूटा भरोसा, जिसकी भरपाई कभी नहीं होती
तंत्र सिद्धि के चक्कर में पड़कर लोग ऐसे-वैसे लोगों से जाकर मिलते हैं, और फिर उनके साथ जो छल होता है और जो नुकसान होता है, उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। जो भरोसा टूटता है, वह कहीं जुड़ नहीं सकता।
वक्ता कहते हैं कि तंत्र सिद्धि के पीछे भागते हुए आप उस तरह के लोगों से जाकर मिलते हैं, और फिर आपके साथ जो छल होता है, जो नुकसान होता है — उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। आपका जो भरोसा टूटता है, उसकी भरपाई कहीं नहीं हो सकती। तो या तो भरोसा मत कीजिए — पहले परखिए, फिर जाइए, ताकि भरोसा न टूटे। नहीं तो गुरु बनाइए ही मत। इस कलियुग में बार-बार इधर-उधर के इन गुरु लोगों के चक्कर में मत पड़िए।
क्या भगवान का नाम लेने के लिए दीक्षा चाहिए?
नाम के लिए दीक्षा नहीं, विशेष मंत्रों और पुरश्चरण के लिए दीक्षा
वक्ता कहते हैं कि भगवान का नाम लेने के लिए किसी दीक्षा की ज़रूरत ही नहीं है। दीक्षा वैदिक मंत्रों के लिए, और उन विशेष व कठिन तांत्रोक्त और पौराणिक मंत्रों के लिए चाहिए, जो उनका विशेष पुरश्चरण करना चाहते हैं — वहाँ चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि आपको इसकी ज़रूरत नहीं है। भगवान का नाम लेने के लिए कोई दीक्षा बिल्कुल नहीं चाहिए। वैदिक मंत्र हैं, और तांत्रोक्त और पौराणिक आदि मंत्र हैं जो विशेष और कठिन हैं; उनके लिए ज़रूरत है, उनके लिए जो उनका विशेष पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करना चाहते हैं। वहाँ चाहिए।
क्या नवार्ण मंत्र बिना दीक्षा के किया जा सकता है?
बिना दीक्षा के नवार्ण का सवा लाख जप वर्जित
वक्ता कहते हैं कि तंत्र में नवार्ण सबसे बड़ा मंत्र है; अगर कोई कहे कि वह बिना दीक्षा के इसका सवा लाख या करोड़ जप करेगा, तो वहाँ नुकसान हो सकता है और वे मना करेंगे — इतना मत कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अब अगर कोई नवार्ण मंत्र करना चाहता है, तो तंत्र में नवार्ण सबसे बड़ा मंत्र है। अगर कोई इसके बारे में कहे कि वह बिना दीक्षा के सवा लाख करेगा, करोड़ करेगा — तो वहाँ आपको नुकसान हो सकता है, और वहाँ वे मना करेंगे: इतना मत कीजिए।
बिना दीक्षा के दुर्गा का कौन-सा अनुष्ठान किया जा सकता है?
भगवती दुर्गा के बत्तीस नाम — नाम, बीज नहीं
वक्ता उत्तर देते हैं कि आप कह सकते हैं कि आप भगवती दुर्गा की बत्तीस नामावली का अनुष्ठान करना चाहते हैं — उसमें भी नाम है। वहाँ बीज है, यहाँ नाम है। कीजिए। जीवन में बत्तीस लाख कीजिए; उससे भी आपकी गति होगी।
वक्ता कहते हैं कि हाँ — पर आपको यह कहना चाहिए कि आप भगवती दुर्गा की बत्तीस नामावली का अनुष्ठान करना चाहते हैं; उसमें भी नाम है। वहाँ बीज है; यहाँ नाम है। आप कीजिए। जीवन में बत्तीस लाख कीजिए; उससे भी आपकी गति होगी। जैसे-जैसे आपका पुण्य बढ़ेगा, जगदंबा आपको भौतिक गुरु भी प्राप्त करवा सकती हैं। तो यह कीजिए।
जिनका कोई गुरु नहीं, वे गुरु पूर्णिमा पर क्या करें?
स्वयं दत्तात्रेय दीक्षा विधान करें
जिनका कोई गुरु नहीं — चाहे आप पचास साल के हों या बीस के — वे इस गुरु पूर्णिमा पर फिर से भगवान दत्तात्रेय का दीक्षा विधान करें, या उसी विधि से अपने इष्ट-आराध्य का विधान करें।
वक्ता कहते हैं कि इस बार जो गुरु पूर्णिमा पड़ रही है, उस दिन वे सभी लोग जिनका कोई गुरु नहीं है — चाहे आप पचास साल के हों या बीस साल के — फिर से भगवान दत्तात्रेय का दीक्षा विधान करें। या उसी विधान से, जो भी आपके इष्ट-आराध्य हैं, उनकी विधि कीजिए।
यही सवाल फेसबुक पर, दूसरे चैनलों पर और एक के बाद एक ग्रुप में पूछे जाते हैं।
जिन्हें भटकना है, उनके पास हज़ार बहाने हैं
वक्ता कहते हैं कि वे ये सवाल जगह-जगह पूछे जाते देखते हैं — फेसबुक पर, यूट्यूब के दूसरे चैनलों पर, जिन बहुत से ग्रुपों में वे हैं उनमें — और वहाँ चलता नाटक देखते रहते हैं। अगर आपको भटकना है तो आपके पास हज़ार बहाने हैं; लोग आपको उलझाते रहेंगे और आप उलझते रहेंगे।
वक्ता कहते हैं कि जो सवाल पूछे जाते हैं — जब आप लोग जगह-जगह सवाल करते हैं, तो वे देखते हैं। फेसबुक पर भी देखते हैं और यूट्यूब के दूसरे चैनलों पर भी। ऐसा नहीं कि वे नहीं देखते; वे बहुत सारे ग्रुपों में हैं और वहाँ भी देखते रहते हैं कि क्या नौटंकीबाज़ी चलती है। अगर आपको भटकना ही है, तो आपके पास हज़ार बहाने हैं। लोग आपको उलझाते रहेंगे, और आप उलझते रहेंगे। ऐसे कई विषय हैं जिन पर हमेशा विवाद होता रहता है। आप उससे कभी बाहर नहीं निकल पाएँगे; भाई, एक जीवन निकल जाएगा। यूट्यूब पर देखिए — कितने लोगों के तीन साल बीत गए होंगे और आज तक वे कोई साधना शुरू नहीं कर पाए।
एक नवरात्रि यहाँ और अगली किसी और के साथ करते-करते तीन साल बीत जाते हैं।
तीन साल बर्बाद — एक नवरात्रि यहाँ, अगली कहीं और
वक्ता कहते हैं कि वे ऐसे लोगों को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं — उन्हें समझाते-समझाते तीन साल बीत गए। एक नवरात्रि यहाँ करेंगे, अगली नवरात्रि किसी और के साथ, उन्हें छोड़ेंगे, फिर अगली नवरात्रि इनके साथ। ऐसे ही समय निकल जाता है; वे रुक नहीं सकते, धैर्य नहीं रख सकते, तुरंत चाहते हैं।
क्या शिव की दीक्षा स्वयं ली जा सकती है?
शिव पिता हो सकते हैं, तो गुरु क्यों नहीं
लोग हर जगह पूछते हैं कि क्या शिव जी की दीक्षा स्वयं से ली जा सकती है, और चालाक लोग जवाब देते हैं: क्या शिव जी ने आपसे कहा है कि उन्होंने आपको शिष्य बनाया है? वक्ता इसे नकारते हैं — जब हम शिव जी से कह सकते हैं कि आप ही हमारे पिता हैं, तो वे गुरु क्यों नहीं हो सकते? वे हमारे बंधु, मित्र, माता-पिता, सब कुछ हो सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जो लोग जगह-जगह पूछते रहते हैं — भाई, क्या शिव जी की दीक्षा स्वयं से ली जा सकती है? और वहाँ क्या जवाब आता है? बड़े चालाक लोग ठीक यही जवाब देते हैं: क्या शिव जी ने आपसे कहा है कि उन्होंने आपको अपना शिष्य बनाया है? उन्होंने कहा नहीं, तो आप कैसे कहेंगे कि आप उनके शिष्य हैं? जब हम शिव जी से कह सकते हैं कि आप ही हमारे पिता हैं, तो भाई, वे गुरु क्यों नहीं हो सकते? वे हमारे बंधु हो सकते हैं, मित्र हो सकते हैं, माता-पिता हो सकते हैं, सब कुछ हो सकते हैं — तो गुरु क्यों नहीं? आपको यह कहना चाहिए: हाँ, हम तांत्रोक्त विधि-विधान या तंत्र-मंत्र करने के लिए उन्हें गुरु नहीं बना रहे। सीधी बात है।
शिव पूजन और पंचाक्षरी का अधिकार किसे है?
प्रणव सबके लिए नहीं, पर शिव पूजन और पंचाक्षरी जप सबके लिए
वक्ता कहते हैं कि प्रणव का अधिकार सबके लिए नहीं है, पर शिव महापुराण की विद्येश्वर संहिता में कहा गया है, जैसा चैनल पर चर्चा हुई है, कि जब आपने शिव जी को गुरु बना लिया, तो उनके पंचाक्षरी मंत्र के जप का अधिकार सबको है — शूद्र को भी, स्त्रियों को भी, और शिव पूजन का अधिकार सबको है।
वक्ता कहते हैं कि प्रणव का अधिकारकिसी उन्नत विधि को करने से पूर्व आवश्यक पात्रता या अधिकार — इसके बिना सही ढंग से किया गया अनुष्ठान भी साधक के लिए गंभीर हानि का जोखिम रखता है। सबके लिए नहीं है। पर शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता में यह बात कही गई है, और हमने इस पर चर्चा की है — कि अगर आप शिव जी को अपना गुरु बनाते हैं, तो उसके बाद उनके पंचाक्षरी मंत्र के जप का अधिकार सबको है। शूद्र को भी है, स्त्री को भी है; शिव पूजन का अधिकार सबको है। तो फिर आपको क्या कठिनाई है? आप लोगों से पूछने क्यों जाते हैं?
मनसा माँ की एक छोटी, सुंदर मूर्ति को दस अलग जगहों पर अशास्त्रीय कहा गया।
मनसा माता की मूर्ति, जिसे दस लोगों ने अशास्त्रीय कहा
एक चक्रवर्ती बाबू, जो सुंदर मूर्तियाँ बनाते हैं, उन्होंने मनसा माँ की बहुत छोटी, प्यारी मूर्ति बनाकर दस जगह भेजी। सबने कहा कि यह अशास्त्रीय मूर्ति है और इसकी पूजा से यह-वह होगा। वक्ता पूछते हैं कि इसमें क्या कठिनाई है — उन्होंने भाव-प्रधानता से बनाई; वे भगवती से उड़ने की सिद्धि या सर्प मणि नहीं माँग रहे।
वक्ता कहते हैं कि एक चक्रवर्ती बाबू हैं जो बहुत सुंदर मूर्तियाँ बनाते हैं। उन्होंने मनसा माँ की बहुत प्यारी मूर्ति बनाई और दस जगह भेजी। सबने कहा कि यह अशास्त्रीय मूर्ति है — इसकी पूजा करोगे तो ऐसा-वैसा होगा। बेचारे ने छोटी-सी मूर्ति बनाई, बिल्कुल छोटी, और कितनी सुंदर और प्यारी मूर्ति है। उन्होंने भाव-प्रधानता से इतनी अच्छी मूर्ति बनाई। उसकी पूजा की — भाई, आपको क्या कठिनाई है? वे क्या कर रहे हैं? क्या वे कह रहे हैं कि भगवती, हमें उड़ने की सिद्धि दे दो, या सर्प मणि दे दो? वे केवल भाव से पूजा कर रहे हैं — इसमें क्या कठिनाई है? कोई परेशानी नहीं है, भाई, कीजिए।
क्या भक्ति और तंत्र को मिलाना चाहिए?
तंत्र क्रियात्मक विषय है, वह अपनी जगह पर है
वक्ता कहते हैं कि जब आप भक्ति-भाव से चलना चाहते हैं, तो ऐसे लोगों से मत पूछिए। वे बार-बार दोहराते हैं: भक्ति और तंत्र को एक साथ मत मिलाइए। तंत्र क्रियात्मक विषय है; वह जहाँ है, वहीं है।
वक्ता कहते हैं कि जब आप लोग केवल भक्ति और भाव से चलना चाहते हैं, तो ऐसे लोगों से मत पूछिए। हम बार-बार कहते हैं: भक्ति और तंत्र को एक साथ मत मिलाइए। तंत्र क्रियात्मक विषय है — वह जहाँ है, वहीं है। अब भक्ति हाथ में लेकर आप कहते हैं: तो हम सिद्ध कुंजिका क्यों नहीं कर सकते? वहाँ हम मना करते हैं — भाई, वहाँ वह तकनीकी चीज़ है। उसकी जगह भगवती की स्तुति कीजिए। दुर्गा आपदुद्धार स्तुति कीजिए, भवानी अष्टकम कीजिए, महिषासुर मर्दिनी कीजिए।
काली और बगला तांत्रोक्त कुंजिका की ज़िद इंसान को बर्बादी की ओर ले जाती है।
बात को ठीक से पकड़िए, और शिव की दीक्षा स्वयं लीजिए
जब लोग कहते हैं कि नहीं, हम तो केवल सिद्ध कुंजिका करेंगे, और काली तांत्रोक्त सिद्ध कुंजिका, और बगला तांत्रोक्त — तब मना करने के कारण वक्ता ही बुरे बन जाते हैं। वे कहते हैं कि इस तरह खुद को बर्बाद करने की ओर मत बढ़िए: बात को ठीक से पकड़िए। शिव जी की दीक्षा हर व्यक्ति ले सकता है, तो स्वयं से लीजिए।
वक्ता कहते हैं कि नहीं-नहीं, हम वह नहीं करेंगे, हम तो केवल शुद्ध कुंजिका करेंगे, और काली तांत्रोक्त सिद्ध कुंजिका, और बगला तांत्रोक्त — और फिर हम बुरे बन जाते हैं, क्योंकि हम मना करते हैं। तो वे यही कहना चाहते हैं: इस तरह खुद को बर्बाद करने की ओर मत बढ़िए। बात को ठीक से पकड़िए। शिव जी की दीक्षा भी हर व्यक्ति ले सकता है — स्वयं से लीजिए। अगर आपको भौतिक गुरु की ज़रूरत है, तो उसके लिए भी उन्हीं से प्रार्थना कीजिए।
दत्तात्रेय दीक्षा विधि को शिव के लिए कैसे अपनाया जाए?
दत्तात्रेय की जगह शिव को विराजमान करें और यंत्र पर पंचाक्षरी लिखें
अगर आप तंत्र मार्ग पर जाना चाहते हैं या किसी विशेष मंत्र की साधना करना चाहते हैं, तो इस गुरु पूर्णिमा पर हाथ जोड़कर दीक्षा विधान कीजिए। पहले दिए गए देव दीक्षा विधान में उसी विधि से भगवान दत्तात्रेय की जगह भगवान शिव को विराजमान कीजिए, और जहाँ दत्तात्रेय का यंत्र लिखा है, वहाँ शिव का पंचाक्षरी मंत्र लिखिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप तंत्र मार्ग पर जाना चाहते हैं, किसी विशेष मंत्र की साधना करना चाहते हैं, तो इस गुरु पूर्णिमा पर हाथ जोड़कर दीक्षा विधान कीजिए। उन्होंने देव दीक्षा विधान दिया है; भगवान दत्तात्रेय गुरु का दीक्षा विधान दिया है। उस दीक्षा विधान में आप यह काम कर सकते हैं — भगवान दत्तात्रेय की जगह, उसी विधि-विधान से, भगवान शिव को विराजमान करवाइए, और वहाँ वही विधि-विधान अपनाइए। जहाँ भगवान दत्तात्रेय का यंत्र आदि बनाने की विधि है, वहाँ भगवान शिव का पंचाक्षरी मंत्र लिखिए।
क्या यज्ञोपवीत धारण करने वाले पुरुषों को फिर से दीक्षा चाहिए?
यज्ञोपवीत में गायत्री दीक्षा पहले ही मिल चुकी
वक्ता कहते हैं कि जिन पुरुषों का यज्ञोपवीत हो चुका है, उन्हें गायत्री की दीक्षा पहले ही मिल चुकी है — आपको दूसरी बार दीक्षा लेने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि जिन पुरुषों का यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। हो चुका है, उन्हें उसी तरह गायत्री की दीक्षा पहले ही मिल चुकी है। भाई, आपको दूसरी बार दीक्षा लेने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है।
जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ, वे क्या लिखें और धारण करें?
भोजपत्र पर प्रणव रहित पंचाक्षरी — एक अर्पित, एक धारण
जिनकी दीक्षा नहीं हुई और जो यज्ञोपवीत बिल्कुल नहीं पहनते, वे प्रणव रहित पंचाक्षरी मंत्र भोजपत्र पर लिखें — एक शिव को अर्पित करें और एक अपने गले में धारण करें — और उसी मंत्र का जप करें।
वक्ता कहते हैं कि जिन लोगों की दीक्षा नहीं हुई, जो यज्ञोपवीत बिल्कुल नहीं पहनते, वे प्रणव रहित पंचाक्षरी मंत्र लिखें। भोजपत्रभोजपत्र, अनार की टहनी की कलम व लाल चंदन की स्याही से मंत्र या नाम लिखने हेतु प्रयुक्त — जैसे शिवलिंग के अर्घे पर नाम रखकर मधु-अभिषेक करने में। पर लिखकर एक उन्हें अर्पित करें और एक अपने गले में धारण करें, और उसी मंत्र का जप करें।
स्त्रियों और चौथे वर्ण के लिए लिखने में क्या अंतर है?
पहले शिवाय, बाद में नमः
वक्ता कहते हैं कि जो चौथे वर्ण के हैं, और जो स्त्रियाँ हैं, वे सब "नमः" बाद में और "शिवाय" पहले लिखेंगी, और फिर समर्पित करके उसी से अपना पाठ और पूजा करेंगी।
वक्ता कहते हैं कि जो चौथे वर्ण के हैं, या फिर जो स्त्रियाँ, जो महिलाएँ हैं — वे सब 'नमः' बाद में लिखेंगी और 'शिवाय' पहले लिखेंगी, और समर्पण करके फिर उसी से अपना पाठ और पूजा करेंगी। यह सब लाइव वीडियो में बताया जा चुका है: पंचाक्षरी कैसे करनी है, स्त्री और पुरुष की अलग-अलग भूमिका क्या है — ठीक वही जो शिव पुराण में लिखा है। अब अगर कोई ज़िद करे कि नहीं, हम यह नहीं मानेंगे, हम पूरा करेंगे, हम प्रणव के साथ ही करेंगे — तो वक्ता कहते हैं, माता जी, पिता जी, हाथ जोड़ते हैं, इसमें अब हम कुछ नहीं कर सकते।
शास्त्र क्या कहता है
For the twice-born, "namaḥ" is placed first in the pañcākṣara; for others (the fourth varṇa) and for women, "namaḥ" is placed at the end instead.
The very next verse (11:43) records a dissenting view for brahmin women specifically — the text's general rule, not its only opinion.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
द्विजानां च नमः पूर्वमन्येषां च नमोऽन्तकम्। स्त्रीणां च केचिदिच्छन्ति नमोऽन्तं च यथाविधि॥ ४२
द्विजोंके लिये आदिमें नमः होता है, और दूसरोंके लिये अन्तमें नमः। स्त्रियोंके लिये भी कुछ लोग विधिपूर्वक अन्तमें नमःवाला मन्त्र चाहते हैं।
जैसे युद्ध भूमि में श्री कृष्ण ने किया, वैसे ही वे समझाकर चुनाव आप पर छोड़ते हैं।
प्रमाण स्पष्टता से रखना, निर्णय आपका
उनका विषय उनका अपना है, और उन्होंने सारे प्रमाण स्पष्टता से सुनने वालों के सामने रख दिए हैं। मानना या न मानना आपकी इच्छा है; निर्णय आपको लेना होगा। वे इसकी तुलना युद्ध भूमि में भगवान श्री कृष्ण से करते हैं, जिन्होंने सारा ज्ञान देकर कहा: तुम्हारी इच्छा, करो या न करो।
वक्ता कहते हैं कि हमारा विषय जैसा है, वैसा है; हमने पूरा विषय स्पष्टता से और सारे प्रमाण आपके सामने रख दिए हैं। मानना या न मानना आपकी इच्छा है। निर्णय आपको लेना होगा। भगवान श्री कृष्ण ने भी युद्ध भूमि में सारा ज्ञान देकर कहा: तुम्हारी इच्छा है, करो या न करो। मुझे ज्ञान देना था; मैंने दिया और तुम्हें खड़ा किया, हर तरह से प्रेरित किया, हर प्रश्न और हर संशय दूर किया। पर अगर सामने वाला कहे कि नहीं, हमें तो संशय के सागर में डूबे रहना अच्छा लगता है — तो भाई, डूबे रहिए, हम क्या कर सकते हैं?
गुरु पूर्णिमा पर किसे गुरु मानना चाहिए?
दिव्य शक्तियों को ही सद्गुरु और परम गुरु मानें
अगर आप अपने मन का संशय दूर करना चाहते हैं, तो उसे दूर कीजिए, अंधकार हटाइए, और गुरु पूर्णिमा के दिन उन्हीं दिव्य शक्तियों को अपना सद्गुरु, अपना परम गुरु मान लीजिए, और उनके मंत्रों का जप कीजिए — खासकर जब पुरुषोत्तम मास चल रहा है।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप अपने मन का संशय दूर करना चाहते हैं, तो उसे दूर करके, अंधकार हटाकर, गुरु पूर्णिमा के दिन उन्हीं दिव्य शक्तियों को अपना सद्गुरु, अपना परम गुरु मान लीजिए। और उनके मंत्रों का जप कीजिए, जब पुरुषोत्तम मास चल रहा है। वे कहते हैं कि उसकी महिमा पर भी वे आएँगे।
पंचाक्षरी ठीक दत्तात्रेय दीक्षा विधि से की जाती है, बस वहाँ शिव को रखा जाता है।
आकाश विश्वकर्मा जी ने दत्तात्रेय विधि से शिव को गुरु बनाया
एक श्रोता, आकाश विश्वकर्मा जी, का उदाहरण लेकर वक्ता समझाते हैं: उन्होंने भगवान शिव का पंचाक्षरी मंत्र ठीक से किया, बिल्कुल उसी विधि से जो दत्तात्रेय दीक्षा के लिए बताई गई है, बस वहाँ भगवान शिव की प्रतिमा या घर में जो शिवलिंग है, वह रखा।
वक्ता कहते हैं कि उदाहरण के लिए — आकाश विश्वकर्मा जी को उदाहरण मानकर — इन्होंने भगवान शिव का पंचाक्षरी मंत्र उचित तरीके से किया। ठीक जैसे दत्तात्रेय भगवान की दीक्षा विधि बताई गई है, उसी विधि-विधान से, बस वहाँ उन्होंने भगवान शिव की प्रतिमा, या घर में जो शिव जी का शिवलिंग आदि है, वह रखा।
मंत्र दो भोजपत्रों पर लिखा जाता है और दत्तात्रेय की जगह शिव-पार्वती का दीपक जलाया जाता है।
दो भोजपत्र, दीपक, षोडश उपचार और जप
उन्होंने दो भोजपत्रों पर पंचाक्षरी मंत्र लिखा, एक भगवान शिव को अर्पित किया और दूसरा अपने सामने रखा; जहाँ माता अनसूया, महर्षि अत्रि और भगवान दत्तात्रेय का दीपक था, वहाँ भगवान शिव, माँ पार्वती और गणपति जी का दीपक जलाया; और षोडश उपचार विधि से उनका पूजन और अभिषेक किया।
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने दो भोजपत्रों पर पंचाक्षरी मंत्र लिखा: एक भोजपत्र भगवान शिव को अर्पित किया, दूसरा अपने सामने रखा। जहाँ माता अनसूया, भगवान महर्षि अत्रि और भगवान दत्तात्रेय का दीपक था, वहाँ उन्होंने भगवान शिव, माँ पार्वती और गणेश जी का दीपक जलाया। उन्होंने षोडश उपचार विधि से उनका पूजन किया और अभिषेक किया।
गुरु पूर्णिमा की दीक्षा विधि में कितना जप किया जाता है?
सत्ताईस या 108 माला, या करमाला, या तय समय तक बैठना
उसके बाद सामर्थ्य अनुसार उन्होंने भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र की सत्ताईस या 108 माला जप की। माला न हो तो करमाला से कीजिए; वह भी न हो सके तो सवा घंटा, या कम से कम पंद्रह मिनट ही बैठकर पंचाक्षरी का जप कीजिए।
मंत्र वाले दूसरे भोजपत्र का क्या किया जाता है?
चाँदी के खोल में रखकर गले में धारण
वक्ता कहते हैं कि उनमें से एक उन्होंने चाँदी के खोल में रखकर गले में धारण कर लिया — पूरे भाव से — और बात वहीं खत्म हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि उनमें से एक उन्होंने चाँदी के खोल में रखकर गले में धारण कर लिया। पूरे भाव से — बाकी सब भाड़ में जाए, प्रभु। जब आप लोग मरते हैं, तब कोई पूछने नहीं आता। आप यहाँ क्यों पूछ रहे हैं कि गुरु बनाना है या नहीं बनाना? बात खत्म। उन्होंने गले में धारण कर लिया, और उसी दिन से शुरुआत होती है — और इस बार साठ दिन का सावन मिला है, जिसे वे सबसे दिव्य बात कहते हैं।
साठ दिन के सावन में रोज़ कितना जप करना चाहिए?
रोज़ 108 माला, या तीन घंटे
रोज़ सामर्थ्य अनुसार 108 माला पकड़िए — संकल्प कीजिए कि 108 माला करनी है। माला नहीं है, तो ठीक है: हम तीन घंटे करेंगे। एक बार में न हो सके, तो डेढ़ घंटा सुबह और डेढ़ घंटा शाम।
वक्ता कहते हैं कि रोज़ सामर्थ्य अनुसार 108 माला पकड़िए — कि 108 माला करनी है। माला नहीं है? ठीक है, कोई बात नहीं — हम तीन घंटे करेंगे। एक बार में नहीं हो सकता: डेढ़ घंटा सुबह, डेढ़ घंटा शाम।
क्या सावन में जप के समय पर कोई रोक है?
समय की कोई दिक्कत नहीं — और दो दीपक जलते रहें
सावन में समय की कोई दिक्कत नहीं — सुबह, दोपहर, शाम, रात, आधी रात, भोर, जब भी समय मिले, कीजिए। शुद्ध होकर भगवान शिव के सामने दो दीपक जलाइए।
वक्ता कहते हैं कि सावन में समय की बिल्कुल कोई दिक्कत नहीं है — सुबह कीजिए, दोपहर में कीजिए, शाम को कीजिए, रात को कीजिए, आधी रात को कीजिए, भोर में कीजिए, जब भी आपको समय मिले। शुद्ध होकर भगवान शिव के सामने दो दीपक जलाइए: एक घी का और एक सरसों के तेल का, या दोनों घी के जलाइए।
पूजा के दीपकों के लिए कौन-से तेल लिए जा सकते हैं?
घी, सरसों या तिल का तेल — पर सब शुद्ध हो
घी की व्यवस्था न हो सके, तो दोनों सरसों के तेल के, या तिल के — पर तिल का तेल शुद्ध हो। वक्ता कहते हैं कि सब कुछ शुद्ध होना चाहिए: घी हो या सरसों का तेल, जो भी आपकी सामर्थ्य में हो। और जब तक जप चले, दीपक जलता रहे।
वक्ता कहते हैं कि अगर घी नहीं कर सकते, तो दोनों सरसों के तेल के, या तिल का बनाइए। तिल का तेल — पर शुद्ध होना चाहिए। बस इतना ध्यान रखिए: सब कुछ शुद्ध हो। घी हो, सरसों का तेल हो, जो भी आपकी सामर्थ्य में हो। और जब तक जप चले, वह घी जलता रहे, वह दीपक जला रहे। जप शुरू कीजिए, जप करते रहिए।
जिसे अब भी भौतिक गुरु की इच्छा है, वह क्या करे?
साठ दिनों का सही उपयोग करें, शिव रास्ता निकालेंगे
वक्ता कहते हैं कि अगर आपके मन में भौतिक गुरु की कोई इच्छा है, तो साठ दिनों का अच्छे से उपयोग करके देखिए: सौ प्रतिशत भगवान शिव कृपा करेंगे और आपके लिए सही रास्ता निकालेंगे। पर अगर आपको फँसना है, बहाना चाहिए, तो दुनिया बहानों से भरी है।
वक्ता कहते हैं कि जप करते रहिए। अगर आपके मन में भौतिक गुरु की कोई कामना है, तो साठ दिनों का अच्छे से उपयोग करके देखिए। सौ प्रतिशत भगवान शिव कृपा करेंगे। वे आपके लिए सही रास्ता निकालेंगे। पर अगर आपको फँसना है, बहाना चाहिए — तो भाई, बहानों के लिए तो दुनिया लबालब भरी है।
किस देवता को गुरु बनाया जा सकता है, और किस काम के लिए यह मान्य नहीं?
किसी भी इष्ट को गुरु बना सकते हैं — पर तंत्र विद्या के लिए नहीं
गुरु पूर्णिमा के दिन आपकी इच्छा है — अपनी समझ के अनुसार भगवान दत्तात्रेय, महादेव, भगवान नारायण, माँ जगदंबा, माँ काली को गुरु बना सकते हैं। पर तंत्र विद्या के लिए नहीं, वक्ता बार-बार कहते हैं: तंत्र शास्त्र के लिए, तंत्र विद्या के लिए इस तरह गुरु नहीं बनाया जाता।
वक्ता कहते हैं कि गुरु पूर्णिमा के दिन आपकी इच्छा है: भगवान दत्तात्रेय को गुरु बना सकते हैं, महादेव को गुरु बना सकते हैं; भगवान नारायण को गुरु बनाना चाहें, माँ जगदंबा को, माँ काली को — अपनी समझ के अनुसार बनाइए। तंत्र विद्या के लिए नहीं। वे बार-बार कहते हैं: तंत्र शास्त्र के लिए, तंत्र विद्या के लिए इस तरह गुरु नहीं बनाया जाता।
और किसे बिना जाने गुरु दीक्षा पहले ही मिल चुकी है?
यज्ञोपवीत और विवाह में गुरु दीक्षा होती है
गुरु के रूप में ज़रूरत उनकी है जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ। जिनका विवाह नहीं हुआ — विवाह के समय भी गुरु दीक्षा होती है; जब यज्ञोपवीत होता है, तब भी गुरु दीक्षा होती है, और वह इसी तरह दी जाती है।
वक्ता कहते हैं कि गुरु के स्वरूप में उनकी ज़रूरत है जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ। जिनका विवाह नहीं हुआ — विवाह के समय भी गुरु दीक्षा होती है। जब यज्ञोपवीत होता है और सब होता है, तब भी गुरु दीक्षा होती है; वह इसी तरह दी जाती है। वे नहीं जानते कि आजकल जो नियम और विधियाँ चलती हैं, उनमें लोग यह करते या करवाते हैं या नहीं। पर आप अपना कीजिए; दस जगह पूछने मत जाइए कि फलाने व्यक्ति ने यह बात सही कही या नहीं।
जिसे भौतिक गुरु की इच्छा है, वह कौन-सा नाम जप करे?
शिव शिव, शिव पार्वती, दुर्गा दुर्गा — सीधा नाम जप
अगर भौतिक गुरु की ज़रूरत इतनी ज़्यादा है, तो पहले भगवान से निवेदन कीजिए और उनके नाम का जप शुरू कीजिए। पंचाक्षरी जप हो गया; अब भगवान शिव का जप कीजिए — शिव शिव शिव शिव शिव शिव।
वक्ता कहते हैं कि अगर भौतिक गुरु की ज़रूरत इतनी ज़्यादा है, तो पहले भगवान से अपना निवेदन कीजिए और उनके नाम का जप शुरू कीजिए। पंचाक्षरी जप हो गया। अब भगवान शिव का जप कीजिए: शिव शिव शिव शिव शिव शिव। और अगर कहा जाए कि माता पार्वती जी के बिना शिव का जप नहीं हो सकता, तो शिव पार्वती का जप कीजिए।
शिव शब्द में शक्ति पहले से कहाँ है?
"श" पर लगी इकार की मात्रा ही शक्ति है
वक्ता कहते हैं कि "श" पर जो इकार की मात्रा है, वही शक्ति है — तो शिव-शक्ति की इकार मात्रा लगी है, इसलिए वह शिव है। साथ में स्वयं शिव का जप कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अरे, 'श' में जो इकार की मात्रा है — वही तो शक्ति है न। तो वहाँ शिव-शक्ति की इकार मात्रा लगी है, और इसलिए वह शिव है। उसके साथ आप स्वयं शिव का जप कीजिए।
जगदंबा का नाम जप कैसे किया जाता है?
दुर्गा दुर्गा, और जयंती मंगला मंत्र
अगर जगदंबा का जप करना है, दुर्गा नाम का जप करना है, तो दुर्गा दुर्गा कीजिए। आप क्यों पढ़ते रहते हैं कि आगे प्रणव लगाएँ या श्री लगाएँ या न लगाएँ — केवल नाम जप करना है, तो कीजिए। या जयंती मंगला मंत्र कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर जगदंबा का जप करना है, दुर्गा नाम का जप करना है, तो दुर्गा दुर्गा कीजिए। आप क्यों पढ़ते रहते हैं कि आगे प्रणव लगाएँगे, या श्री लगाएँगे, या नहीं लगाएँगे? केवल नाम जप ही तो करना है न — तो कीजिए। जयंती मंगला काली मंत्र कीजिए। ये साठ दिन बिल्कुल बर्बाद नहीं जाने देने हैं; अपनी जो भी कामना है, उसे पकड़कर अच्छे ढंग से चलिए। वक्ता कहते हैं कि इससे आपकी गुरु पूर्णिमा पूरी होती है।
गुरु पूर्णिमा पर दान किसे देना चाहिए?
साल भर जो मार्गदर्शन देता है, उसे दान
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा, आपके आसपास जो रहते हैं और नवरात्रि में, एकादशी पर या दूसरे विशेष पर्व काल पर आपका पूजन करवाते हैं — उनसे जो भी मार्गदर्शन मिलता है, गुरु पूर्णिमा के दिन उन्हें सामर्थ्य अनुसार दान दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा, आपके आसपास जो भी रहते हैं — जो नवरात्रि में पूजन करवाते हैं, या एकादशी का पूजन करवाते हैं, या दूसरे विशेष विषयों और पर्व काल पर पूजन करवाते हैं, जिनसे आपको मार्गदर्शन आता है और मिलता है — गुरु पूर्णिमा के दिन उन सबको सामर्थ्य अनुसार दान दीजिए। अन्न का, वस्त्र का; दक्षिणा देनी हो तो दक्षिणा का। भले ₹11 दीजिए, पर आपकी अपनी श्रद्धा होनी चाहिए कि कितना देना चाहते हैं और क्या देना चाहते हैं। उनसे कुछ कहना नहीं है। अपनी इच्छा से दीजिए: हाँ भाई, आज आप हमारे मार्गदर्शक हैं, आपके नाम पर, आपके चरणों में यह सादर अर्पित है।
जिसका कोई गुरु नहीं, वह गुरु दान किसे अर्पित करे?
गुरु तत्व शिव, दत्तात्रेय या माँ को अर्पित करें
जो भी आपके गुरु हैं, उन्हें दीजिए। कोई नहीं है, तो भगवान शिव की पूजा करके — प्रभु, आप ही हमारे गुरु हैं; भगवान दत्तात्रेय, प्रभु, आप ही हमारे गुरु हैं; मैया माँ, आप ही हमारी गुरु हैं — और माँ को अर्पित कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि जो भी आपके गुरु हैं, उन्हें दीजिए। अगर कोई नहीं है — तो भगवान शिव की पूजा करके: प्रभु, आप ही हमारे गुरु हैं। भगवान दत्तात्रेय, प्रभु, आप ही हमारे गुरु हैं। मैया माँ, आप ही हमारी गुरु हैं। माँ को अर्पित कीजिए। जहाँ आपकी इच्छा हो, उस स्थान पर जाकर अर्पण कीजिए, और गुरु पूर्णिमा के दिन अपने आप को उस गुरु तत्त्व को समर्पित कर दीजिए। तभी आगे कुछ बनेगा।
जिस दिन सावन शुरू होता है, पहला काम ऐसा है जो केवल अपने लिए नहीं किया जाता।
4 जुलाई से सावन, 18 जुलाई से पुरुषोत्तम मास
4 जुलाई से सावन शुरू हो रहा है, और 18 जुलाई से पुरुषोत्तम मास लगने वाला है। वक्ता कहते हैं — जैसा उन्होंने दोपहर में भी कहा — कि जिस दिन सावन शुरू होता है, पहला काम यह है कि हमें कुछ केवल अपने लिए नहीं, अपने परिवार की ओर से भी करना है।
वक्ता कहते हैं कि गुरु पूर्णिमा की पहली बात हो गई; अब यहाँ से हम आपका सावन शुरू करते हैं, जो शुरू हो रहा है। जब सावन शुरू हो रहा है, तो 18 जुलाई से पुरुषोत्तम मास लगने वाला है, और 4 जुलाई से सावन शुरू हो रहा है। जब 4 जुलाई से सावन शुरू हो, तो पहला काम — यह उन्होंने दोपहर में भी कहा — यह है कि हमें कुछ काम केवल अपने लिए नहीं, अपने परिवार की ओर से भी करने हैं। ध्यान से सुनिए कि वे काम क्या हैं। इस बार हम केवल अपने लिए नहीं करेंगे।
परिवार के बहुत से सदस्य खुद पूजा क्यों नहीं करते?
उन्हें सब कुछ बना-बनाया और तैयार चाहिए
वक्ता कहते हैं कि अपना रुद्राभिषेक तो हम करते ही हैं, पर परिवार में बहुत से सदस्य हैं जो आपकी बात नहीं सुनते और सेवा-पूजा या रुद्राभिषेक नहीं करना चाहते — क्योंकि उन्हें सब कुछ तैयार चाहिए। सब कुछ सेट हो, और वे आकर बस जल चढ़ा दें।
वक्ता कहते हैं कि अपना रुद्राभिषेक आदि तो हम करते ही हैं — भगवान शिव पर जल चढ़े, धूप-दीप हो, जप हो। पर परिवार में बहुत सारे सदस्य हैं जो आपकी बात नहीं सुनते। वे सेवा-पूजा नहीं करना चाहते, रुद्राभिषेक नहीं करना चाहते, कुछ भी नहीं करना चाहते। क्यों? क्योंकि उन्हें सब कुछ बना-बनाया चाहिए। सब कुछ बस सेट हो; वे आकर जल चढ़ा देंगे। ऐसी व्यवस्था न हो, तो वे नहीं करते।
वह एक व्यक्ति ऐसी व्यवस्था करे कि बाकी परिवार वाले भी भाग ले सकें।
घर का वह एक व्यक्ति जिसे भगवान ने सद्बुद्धि दी है
अगर पूरे परिवार में भगवान ने एक व्यक्ति को भी सेवा-पूजा की सद्बुद्धि दी है, या जगदंबा की कृपा से घर में ऐसा एक व्यक्ति है, तो वही थोड़ी व्यवस्था करे ताकि इस साल परिवार के बाकी सदस्यों का भी कल्याण हो।
वक्ता कहते हैं कि अगर भगवान ने पूरे परिवार में एक व्यक्ति को भी ऐसी सद्बुद्धि दी है कि वह सेवा-पूजा कर रहा है, या जगदंबा की कृपा है कि उसके घर में ऐसा एक व्यक्ति है, तो वही थोड़ी व्यवस्था करे, ताकि इस साल परिवार के बाकी सदस्यों का भी कल्याण हो। क्योंकि इस बार हरिहर मास है — पुरुषोत्तम नारायण का मास है और साथ में भगवान शिव का भी मास है। अत्यंत दिव्य मास।
वे घर पर अभिषेक की कौन-सी व्यवस्था सुझाते हैं?
बड़ी थाली में स्टैंड सहित शिवलिंग
घर में जो भी शिवलिंग है — नर्मदेश्वर जी हों, स्फटिक का हो, जिस शिवलिंग पर भी आप पूजन करते हैं — एक बड़ी थाली में स्टैंड सहित, या स्टैंड न रखना चाहें तो उसके बिना, शिव जी को विराजमान कीजिए।
वक्ता एक छोटा-सा सुझाव देते हैं कि क्या व्यवस्था करनी है, जो वे चाहते हैं कि सब अपने घरों में करें। घर में जो भी शिवलिंग है — नर्मदेश्वर जी हों, स्फटिक का हो, जिस शिवलिंग पर भी आप पूजन करते हैं — एक बड़ी थाली लीजिए और जो स्टैंड है वह; या अगर स्टैंड नहीं रखना चाहते, तो भी कोई बात नहीं। एक बड़ी थाली में शिव जी को विराजमान कीजिए।
परिवार के अभिषेक के लिए जल के पात्र में क्या डालें?
थोड़ी रोली और अष्टगंध के साथ कपूर मसलकर
किसी एक बड़े कलश में, गगरे में, किसी बड़े बर्तन में जल रखिए। जल में कपूर मसलकर थोड़ी रोली और थोड़ा अष्टगंध आदि मिलाकर रखिए। और वहाँ एक लोटा रखिए।
वक्ता कहते हैं कि किसी एक बड़े कलश में, गगरे में, किसी बड़े बर्तन में जल रखिए। जल में कपूर मसलकर, थोड़ी रोली और थोड़ा अष्टगंधआठ सुगंधित द्रव्यों से बना लेप, उपाय व पूजा विधियों में सिंदूर से पूर्व तिलक के रूप में लगाया जाता है। आदि मिलाकर रखिए। और वहाँ एक लोटा रखिए।
परिवार के अभिषेक के लिए कौन-सा दीपक रखा जाए, और कब तक?
कम से कम दोपहर तक जलने वाला कर्म साक्षी दीपक
हो सके तो अपनी पूजा और अभिषेक सुबह सबसे पहले कीजिए, और उसके बाद परिवार के हर सदस्य को बताइए। वहाँ एक दीपक भी जलाइए — कर्म साक्षी दीपक, थोड़ा बड़ा, जो कम से कम दोपहर बारह बजे तक जले।
वक्ता कहते हैं कि हो सके तो अपनी पूजा और अभिषेक पहले, सुबह-सुबह कीजिए, और उसके बाद परिवार के हर सदस्य को बताइए। और वहाँ एक दीपक जलाकर रखिए — कर्म साक्षी दीपक, थोड़ा बड़ा, जो कम से कम दोपहर 12:00 बजे तक जले। और परिवार के सभी सदस्यों से कहिए: भाई, नहाकर सीधे पूजा घर में जाओ। पूजन स्थान पर जाओ। वहाँ एक लोटा रखा है।
पाठ के लिए बारह ज्योतिर्लिंगों के कौन-से नाम दिए गए हैं?
लिखकर चिपकाने के लिए बारह नाम
उन्हें पंचाक्षरी बताइए, या फिर यह कीजिए: भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम — सोमनाथाय नमः, मल्लिकार्जुनाय नमः, महाकालेश्वराय नमः, ओंकारेश्वराय नमः, वैद्यनाथाय नमः, भीमशंकराय नमः, रामेश्वराय नमः, नागेश्वराय नमः, विश्वेश्वराय नमः, त्र्यंबकेश्वराय नमः, केदारनाथाय नमः, घुश्मेश्वराय नमः।
वक्ता कहते हैं कि जितनी उनकी इच्छा हो, एक लोटे भर की इच्छा — उन्हें पंचाक्षरी बताइए, या फिर उसी जगह एक काम कीजिए: भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग के नाम। सोमनाथाय नमः, मल्लिकार्जुनाय नमः, महाकालेश्वराय नमः, ओंकारेश्वराय नमः, वैद्यनाथाय नमः, भीमशंकराय नमः, रामेश्वराय नमः, नागेश्वराय नमः, विश्वेश्वराय नमः, त्र्यंबकेश्वराय नमः, केदारनाथाय नमः, घुश्मेश्वराय नमः।
परिवार के लिए ये नाम कैसे लगाए जाएँ?
हाथ से लिखकर या प्रिंट करके सामने चिपकाएँ
इन्हें ऐसे लिखकर वहाँ सामने चिपका दीजिए। हाथ से लिखिए; नहीं तो प्रिंट-आउट निकालना हो तो एक फॉर्मेट बनाकर वहाँ सामने लगा दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि इन्हें ऐसे लिखकर वहाँ सामने चिपका दीजिए। हाथ से ही लिखिए; नहीं तो प्रिंट-आउट निकालना हो, तो एक फॉर्मेट बनाकर वहाँ सामने लगा दीजिए। कहिए: बाबू, यह जो लिखा है — इसे देखते हुए पढ़ते रहो, और लोटे से जल चढ़ाते रहो।
अगर परिवार का कोई सदस्य जल चढ़ाते हुए नाम न पढ़ सके, तो क्या करे?
पहले शिव शिव कहकर जल चढ़ाएँ, फिर बारह नाम पढ़ें
अगर देखकर पढ़ नहीं सकते, तो पहले भगवान शिव का नाम लेते हुए शिव शिव कहकर लोटे से शिव जी पर जल चढ़ाइए, और उसके बाद लिखे हुए बारह नाम पढ़िए। बैठकर पढ़िए या खड़े होकर — कोई बात नहीं। बस इतना काम कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर देखकर पढ़ नहीं सकते, तो पहले भगवान शिव का नाम लेते हुए, शिव शिव कहते हुए, लोटे से शिव जी पर जल चढ़ाइए, और उसके बाद ये लिखे हुए बारह नाम पढ़िए। बैठकर पढ़िए, खड़े होकर पढ़िए। कोई बात नहीं। बस इतना काम कीजिए।
परिवार के अभिषेक में जल के साथ और क्या चढ़ाया जाता है?
बेल पत्र, थोड़ी भांग, और दंडवत प्रणाम
बेल पत्र मिल सके तो वहाँ सजाकर रखिए; एक बेल पत्र चढ़ाया जाए। भांग हो तो भगवान शिव पर थोड़ी भांग चढ़ाई जाए। उसके बाद अपनी इच्छा अनुसार दंडवत प्रणाम, साष्टांग प्रणाम करें, और महादेव का नाम लेकर वहाँ से आ जाएँ।
वक्ता कहते हैं कि अगर बेल पत्र उपलब्ध हो, तो वहाँ बेल पत्र सजाकर रखिए। एक बेल पत्र चढ़ाया जाए। अगर भांग हो, तो भगवान शिव पर थोड़ी भांग चढ़ाई जाए। और उसके बाद अपनी इच्छा अनुसार दंडवत प्रणाम, साष्टांग प्रणाम करें — और प्रणाम करके, महादेव का नाम लेकर, वहाँ से आ जाएँ।
जो अच्छे से करना चाहें, उन्हें रुद्राष्टक पाठ बताया जाए और आरती करवाई जाए।
अतिरिक्त रूप से रुद्राष्टक पाठ और आरती
जो अच्छे से करना चाहते हैं, उन्हें रुद्राष्टक का पाठ भी बताइए, या अपने साथ करवाइए। आरती करना चाहें, तो उसकी भी व्यवस्था कीजिए। छोटा-सा सेटअप रखिए।
वक्ता कहते हैं कि जो अच्छे से करना चाहते हैं, उन्हें रुद्राष्टकम् आदि का पाठ भी बताइए, या अपने साथ करवाइए। अगर वे आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। करना चाहें, तो उसकी भी व्यवस्था कीजिए। छोटा-सा सेटअप रखिए।
क्या शिव की पूजा केवल सावन के सोमवारों को ही करनी चाहिए?
केवल सोमवार से सोमवार शिव जी को परेशान मत कीजिए
जो लोग केवल सोमवार से सोमवार शिव जी का पूजन करने वाले हैं — आठ सोमवार हैं, आठों पर पूजा करेंगे और बाकी दिन नहीं — उनसे वक्ता पूछते हैं: यह कहाँ है कि हम केवल सोमवार से सोमवार शिव जी को परेशान करेंगे? सावन के सोमवार का बड़ा महत्व है, पर उसका यह अर्थ नहीं।
वक्ता पूछते हैं कि जो लोग केवल सोमवार से सोमवार शिव जी का पूजन करने वाले हैं — कि आठ सोमवार हैं, आठों सोमवार पूजन करेंगे और बाकी दिन नहीं — भाई, यह कहाँ है कि सोमवार से सोमवार हम शिव जी को परेशान करेंगे? सावन के सोमवार का बड़ा महत्व है। क्या उसका यह अर्थ है? सावन के सोमवार का महत्व है, तो उस दिन विशेष पूजन कीजिए। बाकी दिनों में कम से कम इतना पूजन कीजिए।
सावन के बाकी दिनों में कम से कम क्या करें?
बाकी हर दिन कम से कम एक अभिषेक
वक्ता कहते हैं कि इसे बिल्कुल मत छोड़िए — कि हम केवल सावन सोमवार का व्रत रखेंगे और बाकी दिन शिव जी का हाल पूछने भी नहीं जाएँगे। ऐसा नहीं होना चाहिए। इसलिए बाकी दिनों में भी उनका अभिषेक कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि इसे बिल्कुल मत छोड़िए: कि हम केवल सावन के सोमवार का व्रत करेंगे, और बाकी दिनों में शिव जी का हाल पूछने भी नहीं जाएँगे। ऐसा नहीं होना चाहिए। इसलिए बाकी दिनों में भी उनका अभिषेक कीजिए। अगर सोमवार को आपके पास समय है, तो देखिए — हमने बारह ज्योतिर्लिंगों के साथ 108 का एक वीडियो डाला है; उसे हम फिर से शेयर करेंगे।
जो रुद्राष्टाध्यायी नहीं जानते, वे क्या पाठ करें?
रुद्राष्टक, 108 नाम, बारह ज्योतिर्लिंग नाम, कोई भी स्तोत्र
अगर घर पर आपको रुद्राष्टाध्यायी के मंत्र नहीं आते और अष्टाध्यायी पाठ नहीं कर सकते, और कोई विशेष पौराणिक मंत्र भी नहीं जानते — तो रुद्राष्टक आता हो तो उससे कीजिए, शिव जी के 108 नामों से कीजिए, बारह ज्योतिर्लिंग नामों से कीजिए, या कोई भी स्तोत्र या उनका अष्टोत्तर शतनाम पढ़ते हुए अभिषेक कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि घर पर — ठीक है, आपको रुद्राष्टाध्यायी के मंत्र नहीं आते, अष्टाध्यायी पाठ नहीं कर सकते, और पौराणिक मंत्र भी कोई खास नहीं जानते। रुद्राष्टक आता है — उससे कीजिए। शिव जी के 108 नामों से कीजिए। उनके बारह ज्योतिर्लिंग नाम हैं — उनसे कीजिए। उनका कोई भी स्तोत्र, या उनका अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। पढ़ते हुए, उससे अभिषेक कीजिए। पर कीजिए। सबसे आपको फल मिलेगा। ऐसा नहीं कि नहीं मिलेगा। कम से कम इतना तो करना ही है, सोमवार से सोमवार, आठों सोमवार।
पुरुषोत्तम मास के लिए क्या जोड़ना चाहिए?
गीता का पंद्रहवाँ अध्याय — पुरुषोत्तम योग
अगर आप इसे और दिव्य बनाना चाहते हैं और समय है, तो हो सके तो श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय, पुरुषोत्तम योग, का पाठ कीजिए — यह पुरुषोत्तम मास है। यह छोटा है, बहुत छोटा; चार-पाँच मिनट लगेंगे।
वक्ता कहते हैं कि अब इसी बीच पुरुषोत्तम मास है। अगर आप इसे और दिव्य बनाना चाहते हैं, कि प्रभाव पड़े, और आपके पास समय है — तो हो सके तो श्रीमद श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय, पुरुषोत्तम योग, का पाठ कीजिए — यह पुरुषोत्तम मास है। यह छोटा है, बहुत छोटा; चार-पाँच मिनट लगेंगे।
क्या वह पाठ संस्कृत की जगह हिंदी में किया जा सकता है?
भगवान आकर यह नहीं कहेंगे कि तुमने हिंदी में किया
वक्ता कहते हैं कि संस्कृत में न कर सकें तो हिंदी में कीजिए — इसमें कोई दिक्कत नहीं। भगवान आकर यह नहीं कहेंगे कि अरे, तुमने हिंदी में किया, हम फल नहीं देंगे। भाव से करना है; हम तंत्र नहीं कर रहे, भक्ति कर रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि अगर संस्कृत में नहीं कर सकते, तो हिंदी में कीजिए। कोई दिक्कत नहीं है। भगवान आकर यह नहीं कहेंगे: अरे, तुमने तो हिंदी में किया था, हम तुम्हें फल नहीं देंगे। भाव से ही तो करना है न — हम तंत्र नहीं कर रहे, भक्ति कर रहे हैं। आराम से हो जाएगा।
यज्ञोपवीत धारण करने वाले हरिहर मास में क्या करें?
न्यास और विनियोग के साथ विष्णु सहस्रनाम
जो लोग यज्ञोपवीत आदि धारण करते हैं, वे विष्णु सहस्रनाम का पाठ उसके न्यास और विनियोग के साथ ठीक से करने का अभ्यास करें, ताकि इस साल का हरिहर मास व्यर्थ न जाए।
गुरु पूर्णिमा, कल की एकादशी और सावन की पारिवारिक तैयारी दोहराने के बाद वक्ता एक बात और जोड़ते हैं। जो लोग यज्ञोपवीत आदि धारण करते हैं, वे विष्णु सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। का पाठ उचित तरीके से, उसके न्यास और विनियोग के साथ करने का अभ्यास करें। इस साल का यह हरिहर मास व्यर्थ न जाने दें। जैसे समय मिले, वैसे निकालिए।
जिनकी इष्ट भगवती हैं, वे इस मास में क्या करें?
शिव और नारायण का संक्षिप्त पूजन, अपने इष्ट का विशेष पूजन
जिनकी इष्ट-आराध्य भगवती हैं, जो उनकी सेवा करते हैं, वे अपनी विशेष सेवा-पूजन करें — साथ में भगवान शिव और भगवान नारायण का संक्षिप्त पूजन, और समय अनुसार अपने इष्ट-आराध्य का विशेष पूजन।
वक्ता कहते हैं कि बाकी, जिनकी इष्ट-आराध्य भगवती हैं, जो उनकी सेवा करते हैं, वे उनकी विशेष सेवा और पूजन करें। भगवान शिव और भगवान नारायण के साथ, उनका संक्षिप्त-संक्षिप्त पूजन, और अपने इष्ट देवता का विशेष पूजन — समय के अनुसार जितना संभव हो, उतना कीजिए। पर प्रयास ज़रूर कीजिए।
श्रावण में कुलदेवी और कुलदेवता का पूजन कब होता है?
श्रावण सप्तमी और अष्टमी, जिस पक्ष में आपका परिवार मानता हो
श्रावण मास में कुलदेवी और कुलदेवता का पूजन विशेष रूप से सप्तमी और अष्टमी के दिन होता है। कहीं यह कृष्ण पक्ष में होता है, कहीं शुक्ल पक्ष में।
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा आता है श्रावण सप्तमी का कुलदेवी पूजन। श्रावण मास में ही कुलदेवी और कुलदेवता का पूजन विशेष रूप से सप्तमी के दिन और अष्टमी के दिन होता है। कहीं यह कृष्ण पक्ष में होता है, कहीं शुक्ल पक्ष में।
क्या पुरुषोत्तम मास में कुलदेवी पूजन किया जा सकता है?
अधिक मास में कुलदेवी या कुलदेवता का पूजन नहीं
वक्ता कहते हैं कि पुरुषोत्तम मास के न कृष्ण पक्ष में, न शुक्ल पक्ष में कुलदेवी और कुलदेवता का पूजन होगा — यह ध्यान रखिए। यह अधिक मास है; इसमें नारायण और भगवान शिव का, या अपने इष्ट-आराध्य का नित्य पूजन और विशेष पूजन होगा।
वक्ता कहते हैं कि पुरुषोत्तम मास के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में कुलदेवी और कुलदेवता का पूजन नहीं होगा। यह बात ध्यान में रखिए। यह अधिक मास है, पुरुषोत्तम मास है; इसमें नारायण और भगवान शिव का, या अपने इष्ट-आराध्य का नित्य पूजन और विशेष पूजन ही होगा।
शुक्ल पक्ष वाले परिवार 16 अगस्त के बाद वाला पक्ष लें; कृष्ण पक्ष वाले 18 जुलाई से पहले करें।
शुक्ल पक्ष के लिए 16 अगस्त के बाद, कृष्ण पक्ष के लिए 18 जुलाई से पहले
अगर कुल देवी-देवता का भोग-पूजन विशेष रूप से शुक्ल पक्ष में होता है, तो शुक्ल पक्ष में कीजिए — यानी उस पक्ष में जो 16 अगस्त के बाद चलेगा। और अगर कृष्ण पक्ष में होता है, तो 18 जुलाई से पहले चलने वाले पक्ष में सप्तमी और अष्टमी कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर कुल के देवी-देवता का भोग और पूजन विशेष रूप से होता है, अगर शुक्ल पक्ष में होता है, तो शुक्ल पक्ष में कीजिए — यानी उस पक्ष में करना है जो 16 अगस्त के बाद चलेगा। और अगर कृष्ण पक्ष में होता है, तो जो पक्ष 18 जुलाई से पहले चलेगा, उसमें सप्तमी और अष्टमी कीजिए।
कुलदेवी का पूरा अनुष्ठान कहाँ से सीखें?
कुलदेवता पूजन और अनुष्ठान पर अलग वीडियो पहले से बने हैं
कुलदेवी-देवता के विशेष पूजन के लिए, या जो केवल कुलदेवी-देवता के लिए कोई विशेष अनुष्ठान करना चाहे, उसके लिए पूरा अलग वीडियो पहले से बना है। वक्ता कहते हैं कि वह लाइव वीडियो और दूसरे वीडियो सुनिए, जिन्हें फिर से शेयर किया जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि कुलदेवी-देवता के विशेष पूजन के लिए, या अगर आप केवल कुलदेवी-देवता के लिए कोई विशेष अनुष्ठान करना चाहते हैं, तो उसके लिए भी पूरा अलग वीडियो पहले से बना है। वह लाइव वीडियो सुनिए, जो दूसरे वीडियो बने हैं वे सुनिए; हम उन्हें फिर से शेयर करेंगे, और उसके अनुसार वह काम भी कीजिए। वे कहते हैं कि कुल के देवी-देवताओं का प्रश्न अत्यंत आवश्यक है।
शिव पूजन का तरीका किस पर निर्भर करता है?
उपासक के पास जो द्रव्य उपलब्ध हो
वक्ता कहते हैं कि कहा गया है कि भगवान शिव की पूजा विविध उपचारों से होती है। यह उपासक पर निर्भर है: उसके पास जो उपलब्ध हो, उसी द्रव्य से वह भगवान शिव का पूजन करे।
इन सबके अलावा अब वे दूसरी विशेष बातें लेते हैं: श्रावण में, और शिव जी के पूजन में, कौन-से विषय बहुत बड़ा महत्व रखते हैं और हमें उन्हें किस तरह करना चाहिए। कहा गया है कि भगवान शिव की पूजा विविध उपचारों से होती है। यह उपासक पर निर्भर करता है — उसके पास जो उपलब्ध हो, उसी द्रव्य से वह भगवान शिव का पूजन करे।
कपिला पंचगव्य और कुशोदक से शिव को स्नान कराने का क्या फल है?
कपिला गाय के पंचगव्य से अनंत फल
अगर कपिला गाय के पंचगव्य में कुशोदक — यानी कुश का जल — मिलाकर भगवान शिव को स्नान कराया जाए, तो उससे अनंत फल मिलता है।
वक्ता बताते हैं कि कपिला गाय के पंचगव्य में कुशोदक मिलाकर — कुशोदक यानी जो कुश है, वह मिलाकर — अगर भगवान शिव को उससे स्नान कराया जाए, तो उससे अनंत फल मिलता है।
कोल्हू से निकले तिल के तेल से अभिषेक का क्या फल है?
कोल्हू का तिल तेल, और शिव पद की प्राप्ति
कोल्हू से निकला तिल का तेल — उससे शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है, जिससे शिव पद की प्राप्ति होती है।
वक्ता बताते हैं कि कोल्हू से निकला तिल का तेल: उससे शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है, जिससे शिव पद की प्राप्ति होती है।
कपूर और अगरु वाले जल का क्या फल है?
सभी पापों से मुक्ति और शिव सायुज्य
जो कपूर और अगरु मिले जल से शिवलिंग को स्नान कराता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर शिव सायुज्य प्राप्त करता है।
वक्ता बताते हैं कि जो कपूर और अगरु मिले जल से शिवलिंग को स्नान कराता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है और शिव सायुज्य प्राप्त करता है।
जिस कष्ट का इलाज दवा से न हो, उसके लिए क्या करें?
पिछले जन्मों का प्रारब्ध, और आषाढ़ पूर्णिमा से रोज़ अभिषेक
अगर हमारे शरीर या जीवन में कोई बहुत विशेष दोष या रोग है जिसका कोई उपाय नहीं मिल रहा और जो चिकित्सा से संभव नहीं, तो कहीं न कहीं यह हमारे पिछले जन्मों का प्रारब्ध है — ऐसे पाप जो फल दे रहे हैं। ऐसे में आषाढ़ पूर्णिमा से ही शुरू करके श्रावण पूर्णिमा तक रोज़ कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अब अगर हमारे शरीर में या हमारे जीवन में कोई बहुत विशेष दोष है, कोई रोग है, जिसका निवारण नहीं हो रहा और जो चिकित्सा से संभव नहीं, तो कहीं न कहीं वह हमारे पिछले जन्मों का प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। है — ऐसे पाप जो फलित हुए हैं। तो श्रावण मास में आपको यह करना चाहिए: आषाढ़ पूर्णिमा से ही शुरू करके श्रावण पूर्णिमा तक हर दिन, जैसा घर के लिए बताया गया है — एक भरा हुआ पात्र।
साठ दिन के अभिषेक के पात्र में क्या डालें?
कपूर, अगरु या चंदन जल, अष्टगंध, थोड़ी रोली
कपूर; अगरु मिल सके तो — चंदन जल को अगरु कहते हैं, और एक अलग भी होता है; न मिले तो चंदन जल, अष्टगंध आदि मिलाकर, और जो रोली कुमकुम है उसमें से थोड़ा। उससे खुद शिवलिंग का अभिषेक कीजिए और परिवार के लोगों से भी करवाइए।
वक्ता कहते हैं कि कपूर; अगरु, अगर अगरु मिल सके — चंदन जल को अगरु कहते हैं, और एक अलग भी होता है। मिल जाए तो ठीक; नहीं तो चंदन जल, अष्टगंधआठ सुगंधित द्रव्यों से बना लेप, उपाय व पूजा विधियों में सिंदूर से पूर्व तिलक के रूप में लगाया जाता है। आदि मिलाकर, और जो रोली कुमकुम है उसमें से थोड़ा मिलाकर — और उससे खुद शिवलिंग का अभिषेक कीजिए और परिवार के लोगों से भी करवाइए। उससे हर तरह के पाप और ताप से मुक्ति मिलती है। तो यह साठ दिन करना है।
कपड़े से छने जल का क्या फल है?
सभी कामनाएँ पूरी और वरुण लोक की प्राप्ति
जो कपड़े से छने जल से — यानी जल को शुद्ध करके — शिवलिंग को स्नान कराता है, उसकी सभी कामनाएँ पूरी होती हैं और वह वरुण लोक प्राप्त करता है।
वक्ता बताते हैं कि कपड़े से छना जल, यानी जल को शुद्ध करके — जो उससे शिवलिंग को स्नान कराता है, उसकी सभी कामनाएँ पूरी होती हैं और वह वरुण लोक प्राप्त करता है।
शिव को वस्त्र अर्पित करने का क्या फल है?
सुंदर रंगीन मुलायम वस्त्र और शिव लोक की प्राप्ति
अगर हम वस्त्र अर्पित करते हैं — भगवान शिव को सुंदर, रंगीन, मुलायम वस्त्र — तो उससे शिव लोक की प्राप्ति होती है।
वक्ता बताते हैं कि अगर हम वस्त्र अर्पित करते हैं — सुंदर रंगीन मुलायम वस्त्र जो भगवान शिव को अर्पित किया जाता है — तो उससे शिव लोक की प्राप्ति होती है।
शिव को यज्ञोपवीत कौन अर्पित करे, और उसका क्या फल है?
केवल धारण करने वाले ही अर्पित करें — और वेदांत का ज्ञान मिलता है
वक्ता स्पष्ट करते हैं कि सफेद और पीले धागे वाला जनेऊ, यज्ञोपवीत — जो उसे धारण करते हैं, वही उसे अर्पित करेंगे। कहा गया है कि उन्हें वेदांत का ज्ञान मिलता है।
वक्ता कहते हैं कि जो सफेद, पीले धागे वाला जनेऊ है, यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। — जो यज्ञोपवीत धारण करते हैं, वही उसे अर्पित करेंगे। उन्हें वेदांत का ज्ञान मिलता है; ऐसा कहा गया है।
चंदन, अगरु, कपूर और कुमकुम से लेपन का क्या फल है?
करोड़ों कल्पों तक स्वर्ग में निवास
जो चंदन, अगरु, कपूर और कुमकुम से शिवलिंग का अर्चन और लेपन करते हैं — यानी भगवान शिव को सुगंधित द्रव्यों से लपेटकर चारों ओर से सजाते हैं — कहा गया है कि उन्हें करोड़ों कल्पों तक स्वर्ग में निवास मिलता है।
वक्ता बताते हैं कि जो लोग चंदन, अगरु, कपूर और कुमकुम से शिवलिंग का अर्चन करते हैं, लेपन करते हैं — यानी भगवान शिव को सुगंधित द्रव्यों से लपेटा जाए, चारों ओर से सजाया जाए — उनके बारे में कहा गया है कि उन्हें करोड़ों कल्पों तक स्वर्ग में निवास मिलता है।
ताज़े फूल और पत्ते अर्पित करने का क्या फल है?
केवल पत्ते और फूल से स्वर्ण दान का फल
बिल्कुल ताज़ा फूल, एक पत्ता — अगर हम उसे भगवान शिव को अर्पित करें, तो स्वर्ण दान, यानी सोने के दान का फल मिलता है। केवल एक पत्ता और एक फूल अर्पित करने से।
वक्ता बताते हैं कि बिल्कुल ताज़ा फूल, एक पत्ता — अगर हम उसे भगवान शिव को अर्पित करें, तो स्वर्ण दान, यानी सोने के दान का फल मिलता है। केवल एक पत्ता और एक फूल अर्पित करने से।
अपामार्ग और चतुर्दशी के बारे में क्या कहा गया है?
चतुर्दशी पर अपामार्ग से पूजा करने वाले को शिव सारूप्य
जो चतुर्दशी के दिन अपामार्ग से पूजा करता है, उसे शिव सारूप्य मिलता है।
वक्ता बताते हैं कि जो चतुर्दशी के दिन अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। से पूजा करता है, उसे शिव सारूप्य मिलता है।
पंचाक्षर मंत्र के साथ बेल पत्र अर्पित करने का क्या फल है?
शिव पद, यानी कैलाश की प्राप्ति
जो पंचाक्षर मंत्र के साथ शिव जी को बेल पत्र अर्पित करते हैं, उन्हें शिव जी का पद मिलता है, यानी कैलाश की प्राप्ति होती है। बेल पत्र लीजिए, मन में शिव जी का मंत्र बोलते हुए उसे शिवलिंग पर अर्पित कीजिए।
वक्ता बताते हैं कि जो पंचाक्षर मंत्र के साथ शिव जी को बेल पत्र अर्पित करते हैं, उन्हें शिव जी का पद मिलता है — यानी कैलाश की प्राप्ति होती है। बेल पत्र लेकर, शिव जी का मंत्र बोलते हुए, मन में कहते हुए, उसे शिवलिंग पर अर्पित कीजिए। इन सब बातों पर वे पहले भी बोल चुके हैं।
क्या सूखा और बासी बेल पत्र अर्पित किया जा सकता है?
धोकर अर्पित करने पर वह भी सभी पातकों से मुक्त करता है
बेल का पत्ता भगवान शिव को इतना प्रिय है कि अगर कोई सूखा और बासी बेल पत्र भी धोकर अर्पित करे, तो वह व्यक्ति भी सभी पातकों से मुक्त हो जाता है। इसलिए अगर रोज़ बेल पत्र नहीं मिल रहा, तो पुराना चढ़ा सकते हैं — बस वह टूटा न हो।
वक्ता बताते हैं कि बेल वृक्ष, बेल का पत्ता भगवान शिव को इतना प्रिय है कि अगर कोई सूखा और बासी बेल पत्र भी धोकर अर्पित करे, तो वह भी सभी पातकों से मुक्त हो जाता है। तो अगर हमें रोज़ बेल पत्र नहीं मिल रहा, तो पुराना — बस वह टूटे नहीं। होता यह है कि सूखने के बाद वह टूट जाता है। तो अगर नहीं टूटता, तो अर्पित किया जा सकता है।
घी मिले गुग्गुल की धूप का क्या फल है?
रुद्र लोक और गणपति का पद
जो गुग्गुल में घी मिलाकर भगवान शिव को धूप अर्पित करता है, वह रुद्र लोक प्राप्त करता है और गणपति का पद पाता है।
वक्ता बताते हैं कि जो गुग्गुल में घी मिलाकर भगवान शिव को धूप अर्पित करता है, वह रुद्र लोक प्राप्त करता है और गणेश का पद पाता है।
शिव को दीपक अर्पित करने का क्या फल है?
सभी पापों से मुक्ति और सभी कामनाएँ पूरी
अगर शिव जी के नाम पर घी या तिल के तेल का दीपक अर्पित किया जाए, तो हर तरह के पाप से मुक्ति मिलती है और सभी कामनाएँ पूरी होती हैं।
वक्ता बताते हैं कि अगर शिव जी के नाम पर घी का, तिल के तेल का दीपक अर्पित किया जाए, तो हर तरह के पाप से मुक्ति मिलती है, और सभी कामनाएँ पूरी होती हैं। कार्तिक में दीप मालिका का बिल्कुल अलग महत्व है; कार्तिक के दीपदान का कुबेर पद, और शिवरात्रि की ये सब बातें, इनका अपना अलग महत्व है — वह सब पहले बताया जा चुका है।
घी, गुड़ और खीर के नैवेद्य का क्या फल है?
हज़ारों वर्षों तक रुद्र लोक, और दुर्गति नहीं
जो भगवान शिव को घी और गुड़ से बने पदार्थ, खीर, और ऐसे सभी नैवेद्य अर्पित करते हैं, उन्हें हज़ारों वर्षों तक रुद्र लोक मिलता है, और उनकी दुर्गति नहीं होती।
वक्ता बताते हैं कि जो भगवान शिव को घी और गुड़ से बने पदार्थ, खीर, ये सब नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। के रूप में अर्पित करते हैं, उन्हें हज़ारों वर्षों तक रुद्र लोक मिलता है, और दुर्गति नहीं होती।
पाँच सुगंधों वाला अर्पण क्या है?
इलायची, कपूर और कंकोल वाला पान का बीड़ा
पाँच सुगंध — इलायची, कपूर, कंकोल, यानी जो पान का बीड़ा हम बनाते हैं — अगर वह बनाकर भगवान शिव को अर्पित किया जाए, तो उससे भी रुद्र लोक की प्राप्ति होती है।
वक्ता बताते हैं कि पाँच सुगंध — इलायची, कपूर, कंकोल, यानी जो पान का बीड़ा हम लोग बनाते हैं — अगर वह बनाकर भगवान शिव को अर्पित किया जाए, तो उससे भी रुद्र लोक की प्राप्ति होती है।
मंदिर के शिखर पर ध्वजा चढ़ाने का क्या फल है?
सफेद, गेरुआ या लाल कपड़े की ध्वजा और शिव लोक
जो भगवान शिव को सफेद, गेरुआ या लाल कपड़े की ध्वजा अर्पित करते हैं और उसे उनके मंदिर के शिखर पर लगवाते हैं, उन्हें उससे शिव लोक मिलता है।
वक्ता बताते हैं कि जो भगवान शिव को सफेद या गेरुआ या लाल कपड़े की ध्वजा अर्पित करते हैं, और उसे उनके मंदिर के शिखर पर लगवाते हैं, उन्हें उससे शिव लोक मिलता है।
शिव मंदिर में बड़ा घंटा लटकाने का क्या फल है?
घंटाकर्ण गण जैसा बल और शिव लोक
जो शिव जी के मंदिर में लोहे की ज़ंजीर वाला विशाल घंटा लटकाता है — लोग जो घंटा दान करते हैं, मंदिर में बजने वाला बड़ा घंटा, लोहे की ज़ंजीर पर लटका — उसके बारे में कहा गया है कि वह घंटाकर्ण गण जैसा बलवान होता है और शिव लोक प्राप्त करता है।
वक्ता कहते हैं कि जो शिव जी के मंदिर में लोहे की ज़ंजीर वाला विशाल घंटा लटकाता है — यहाँ ध्यान दीजिए। यानी जो घंटा दान करते हैं; मंदिर में बजने वाला घंटा, बड़ा वाला, अगर हम उसे भगवान शिव के मंदिर में लगवाएँ, लोहे की ज़ंजीर पर लटकाकर — तो कहा गया है कि वह घंटाकर्ण गण जैसा बलवान होता है और शिव लोक प्राप्त करता है।
घंटाकर्ण कौन हैं?
शिव के एक प्रमुख गण, जिन्हें घंटाकर्ण वीर, महावीर कहते हैं
वक्ता कहते हैं कि घंटाकर्ण गण के बारे में वे आगे बताएँगे। घंटाकर्ण भगवान शिव के एक प्रमुख गण हैं, जिन्हें घंटाकर्ण वीर और महावीर कहा जाता है; घंटा दान करने वाला उनका पद पाता है और उनका स्वरूप प्राप्त करता है।
वक्ता कहते हैं कि घंटाकर्ण गण के बारे में वे आने वाले समय में भी बताएँगे। आजकल हर कोई ऐसे ही सिद्धियों के पीछे भागता है। घंटाकर्ण भगवान शिव के एक प्रमुख गण हैं; उन्हें घंटाकर्ण वीर, महावीर कहा जाता है। तो उनका पद मिलता है, उनका स्वरूप प्राप्त होता है।
वाद्य यंत्र अर्पित करने का क्या फल है?
डमरू, भेरी और मृदंग — और उन्हें बजाने वाला कोई
अगर हम भगवान शिव को डमरू, भेरी, मृदंग, संगीत बजाने के ऐसे सभी वाद्य अर्पित करें, तो रुद्र लोक की प्राप्ति होती है। वक्ता जोड़ते हैं कि हम अर्पित तो कर रहे हैं, पर कोई उन्हें बजाए तभी बात पूरी होगी।
वक्ता बताते हैं कि अगर हम भगवान शिव को डमरू, भेरी, मृदंग — संगीत बजाने के ये सब वाद्य — अर्पित करें, तो रुद्र लोक की प्राप्ति होती है। वे जोड़ते हैं कि हम अर्पित कर रहे हैं, पर कोई उन्हें बजाए — तभी बात बनती है।
शिव की प्रदक्षिणा के बारे में क्या कहा गया है?
प्रदक्षिणा और शिव लोक की प्राप्ति
फिर प्रदक्षिणा के बारे में कहा गया है: भगवान शिव की प्रदक्षिणा करने से शिव लोक की प्राप्ति होती है।
वक्ता बताते हैं कि फिर प्रदक्षिणादेवता या मंदिर की दक्षिणावर्त परिक्रमा, जिसमें देवता सदैव दाईं ओर रहते हैं। के लिए कहा गया है: भगवान शिव की प्रदक्षिणा करने से शिव लोक की प्राप्ति होती है।
शिव को दंडवत प्रणाम का क्या फल है?
सैकड़ों यज्ञों से भी अधिक
अगर शिव जी को दंडवत प्रणाम किया जाए, तो कहा गया है कि दंडवत प्रणाम से शिव जी की पूजा करने पर सैकड़ों यज्ञों से भी अधिक फल मिलता है, और दंडवत नमस्कार से सभी कामनाएँ पूरी होती हैं।
वक्ता बताते हैं कि अगर शिव जी को दंडवत प्रणाम किया जाए, तो कहा गया है कि दंडवत प्रणाम से शिव जी की पूजा करने पर सैकड़ों यज्ञों से भी अधिक फल मिलता है। दंडवत नमस्कार से सभी कामनाएँ पूरी होती हैं।
उस प्रणाम की तुलना तीर्थ यात्रा से कैसे की गई है?
सैकड़ों-हज़ारों तीर्थ उसके सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं
सैकड़ों और हज़ारों तीर्थ महादेव जी को किए प्रणाम की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं — यानी जो भगवान शिव को प्रणाम करता है, उसे इतना फल मिलता है कि तीर्थ यात्रा से भी वह चीज़ नहीं मिल सकती।
वक्ता बताते हैं कि सैकड़ों और हज़ारों तीर्थ महादेव जी को किए प्रणाम की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं। यानी जो भगवान शिव को प्रणाम करते हैं, उन्हें इतना फल मिलता है कि तीर्थ यात्रा से भी वह चीज़ नहीं मिल सकती। वे जोड़ते हैं कि देखिए, हर चीज़ का अपना महत्व है। इसीलिए कहा जा रहा है: जब आप भगवान शिव के पास जाएँ, तो उन्हें दंडवत नमस्कार ज़रूर कीजिए। सब कुछ उन्हीं से जन्मा है।
रोग दूर करने के लिए रुद्र जप के कौन-से रूप किए जाते हैं?
लघु रुद्र, महारुद्र और अतिरुद्र
रुद्राभिषेक के लिए कहा गया है कि रोग दूर करने के लिए लघु रुद्र, महारुद्र और अतिरुद्र का जप या अभिषेक किया जाता है।
वक्ता बताते हैं कि अब रुद्राभिषेक के लिए कहा गया है कि रोग दूर करने के लिए लघु रुद्र, महारुद्र और अतिरुद्र का जप या अभिषेक किया जाता है। भगवान शिव ने रुद्राभिषेक का माहात्म्य बताया है: कि सारे कर्म छोड़कर शांत मन से रुद्राभिषेक करने से दुखों का नाश निश्चित रूप से होता है।
रुद्राभिषेक का हर द्रव्य क्या फल देता है?
जल, कुशोदक, दही, गन्ने का रस, शहद और घी, तीर्थ जल, खीर
जल से रुद्राभिषेक से वर्षा; कुशोदक से अभिषेक से व्याधि की शांति; दही से पशुओं की प्राप्ति; गन्ने के रस से श्रेय की प्राप्ति; शहद और घी से अभिषेक करने पर धन की प्राप्ति; तीर्थ जल से मोक्ष की प्राप्ति; और खीर से पुत्र की प्राप्ति।
जल से रुद्राभिषेक से वृष्टि; कुशोदक से अभिषेक से व्याधि की शांति; दही से पशुओं की प्राप्ति; गन्ने के रस से श्रेय की प्राप्ति; शहद और घी से अभिषेक करने पर धन की प्राप्ति; तीर्थ जल से मोक्ष की प्राप्ति; और खीर से पुत्र की प्राप्ति — वक्ता यह सूची इसी तरह बताते हैं।
रुद्र जप से रोग क्यों दूर होता है?
पिछले जन्म का पाप रोग का रूप लेता है
वक्ता बताते हैं कि पुराने जन्म का, पिछले जन्म का पाप ही रोगों का रूप लेता है। रुद्र जप या अभिषेक से पाप का नाश निश्चित रूप से होता है; और पाप नष्ट होने पर हमारे शरीर के रोग भी अपने आप नष्ट हो जाते हैं।
वक्ता बताते हैं कि पुराने जन्म का, पिछले जन्म का पाप ही रोगों का रूप धारण करता है। रुद्र जप या अभिषेक से पाप का नाश निश्चित रूप से होता है। और पाप नष्ट होने पर हमारे शरीर के रोग भी अपने आप नष्ट हो जाते हैं। इसीलिए शतरुद्र आदि की बात कही गई है।
विधिवत रुद्राभिषेक करवाने में कितना खर्च आता है?
एक दिन के लिए भी कम से कम ₹3000-4000
वक्ता कहते हैं कि हर किसी के लिए रोज़ विशेष रुद्राभिषेक करवाना संभव नहीं। अगर आप एक दिन का रुद्राभिषेक भी करवाने जाएँ, तो कम से कम ₹3000 से ₹4000 खर्च होंगे। आप खुद कर सकते हैं — पर कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अब हर किसी के लिए वह विशेष नित्य रुद्राभिषेक करवा पाना संभव नहीं है। अगर आप एक दिन का भी रुद्राभिषेक करवाने जाएँ, तो कम से कम ₹3-4000 तो खर्च होंगे ही। और आप खुद से कर सकते हैं — पर ज़रूर कीजिए।
क्या घर पर किया गया रुद्राभिषेक अपने आप में पर्याप्त है?
जब तक बहुत बड़ा कष्ट न हो, खुद कीजिए
नहीं तो घर पर करने की जो विधि बताई गई है, वही कीजिए। अगर कोई बहुत विशेष कष्ट है, बहुत बड़ा कष्ट है, और आप खुद प्रयास कर रहे हैं पर नहीं हो रहा, और इच्छा और सामर्थ्य है, तो उन्हें बताइए, व्यवस्था हो जाएगी। नहीं तो खुद कीजिए — कोई दिक्कत नहीं।
वक्ता कहते हैं कि नहीं तो घर पर करने की जो विधि बताई गई है — वह भी कीजिए। अगर कोई बहुत विशेष कष्ट है, बहुत बड़ा कष्ट है, और आप खुद से प्रयास कर रहे हैं और नहीं हो रहा, और इच्छा और सामर्थ्य है, तो बताइए, व्यवस्था हो जाएगी। नहीं तो खुद कीजिए; कोई दिक्कत नहीं है।
रुद्राष्टाध्यायी न जानने से क्या छूट जाता है?
पूरा विधि-विधान नहीं हो पाता, पर भाव हो सकता है
वक्ता कहते हैं कि इतना तो ज़रूर होगा: अगर रुद्राभिषेक करते समय आपको रुद्राष्टाध्यायी आदि का पाठ नहीं आता, तो आप वह पूरा विधि-विधान उतने अच्छे से नहीं कर पाएँगे। पर भाव से तो करेंगे — इतना कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि हाँ, इतना तो ज़रूर होगा: रुद्राभिषेक करते समय अगर आपको रुद्राष्टाध्यायी आदि का पाठ नहीं आता, तो आप वह पूरा विधि-विधान उतने अच्छे से नहीं कर पाएँगे। पर भाव से तो करेंगे न? इतना कीजिए। और अगर पूरे विधि-विधान से करना है, तो घर पर भी सामर्थ्य अनुसार कीजिए; और यहाँ, जहाँ हमारा प्रयास ब्राह्मणों से करवाने का है, चाहें तो उनके लिए भी कर सकते हैं, उनसे करवा सकते हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने दोनों बातें बता दी हैं।
क्या शिवलिंग पर चौबीस घंटे जलधारी टपकती छोड़नी चाहिए?
या तो चौबीसों घंटे जल की आपूर्ति कीजिए, या स्टैंड हटा दीजिए
कुछ लोग चौबीस घंटे भगवान शिव के ऊपर लोटा टाँगकर जलधारी देते हैं, पर दिन भर वहाँ बैठना संभव नहीं। अगर आप पूरे सावन के लिए घर पर ऐसी व्यवस्था कर रहे हैं, तो या तो ऐसी व्यवस्था कीजिए कि चौबीसों घंटे जल की आपूर्ति होती रहे; या फिर व्यवस्था केवल तभी तक रखिए जब तक आप पूजा-अभिषेक कर रहे हैं और वहाँ मौजूद हैं।
वक्ता कहते हैं कि अब घर पर होने वाले रुद्राभिषेक के बारे में कुछ विषय आते हैं — जैसे कुछ लोग चौबीस घंटे भगवान शिव के ऊपर लोटा टाँगकर जलाधारी देते हैं। अब दिन भर चौबीस घंटे वहाँ बैठना किसी के लिए संभव नहीं होगा। अगर आप घर पर ऐसी व्यवस्था कर रहे हैं कि पूरे सावन मास में चौबीस घंटे भगवान शिव पर जलधारी गिरती रहे, तो या तो ऐसी व्यवस्था कीजिए कि वहाँ चौबीस घंटे जल की आपूर्ति होती रहे — यह कीजिए। नहीं तो व्यवस्था केवल तभी तक रखिए जब तक आप पूजा कर रहे हैं, जब तक अभिषेक कर रहे हैं और वहाँ मौजूद हैं; उसके बाद वह स्टैंड हटा भी सकते हैं।
क्या शिवलिंग के ऊपर खाली लोटा टँगा छोड़ना ठीक है?
सिर के ऊपर खाली लोटा नहीं रखना चाहिए
वक्ता कहते हैं कि रखने में भी कोई दिक्कत नहीं, पर उसे हटा ज़रूर दीजिए। सिर के ऊपर खाली लोटा ऐसे नहीं रखना चाहिए। या दोपहर के बाद हटा दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि रखें तो भी कोई दिक्कत नहीं, पर उसे हटा ज़रूर दीजिए। सिर के ऊपर खाली लोटा ऐसे नहीं रखना चाहिए। या दोपहर के बाद हटा दीजिए।
परिवार के अभिषेक वाले दिन के बाद शाम को क्या करना चाहिए?
लगभग 5:30 या 6:00 बजे दूसरा अभिषेक और श्रृंगार
दिन में आप 5:00 बजे पूजा कर रहे होंगे और परिवार का कोई सदस्य 10:00 बजे भी आकर शिव जी का अभिषेक करेगा। तो शाम को यह कीजिए: लगभग 5:30 या 6:00 बजे भगवान शिव का फिर से अभिषेक करके उनका श्रृंगार कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि देखिए दिन में क्या होता है: अब आप 5:00 बजे पूजा कर रहे होंगे। परिवार का कोई एक सदस्य 10:00 बजे भी आकर शिव जी का अभिषेक करेगा। उसके बाद शाम के समय यह कीजिए — लगभग 5:30, 6:00 बजे, भगवान शिव का एक बार फिर अभिषेक करके उनका श्रृंगार कीजिए।
रात के लिए शिव को कैसे विराजमान करें?
त्रिपुंड्र, बिल्व पत्र, सारा जल हटाकर, विश्राम का स्थान
उनका त्रिपुंड्र आदि बनाइए, बिल्व पत्र रखिए, फूल सुखाइए, सारा जल हटाइए, और रात के विश्राम के लिए उन्हें एक जगह विराजमान कीजिए। उन्हें चौबीस घंटे जल में मत छोड़िए।
वक्ता कहते हैं कि उनका त्रिपुण्ड्र आदि बनाइए, बिल्व पत्र रखिए, फूल सुखाइए, सारा जल हटाइए, और रात के लिए उन्हें विश्राम के लिए एक जगह अच्छे से विराजमान कीजिए। उन्हें चौबीस घंटे जल में मत छोड़िए। कि अब अभिषेक हो गया और जल वैसे ही पड़ा है, दूध वैसे ही पड़ा है, घी और सब वैसे ही पड़ा है, और अगले दिन आप उन्हें साफ़ करेंगे और फिर वैसे ही पूरा लिपा-पुता छोड़ देंगे — नहीं। ऐसा नहीं करना है।
रुद्राभिषेक जिस भी समय पूरा हो, शाम को उनका पूरा श्रृंगार कीजिए।
शाम को सब साफ़ करके उन्हें ठीक से विराजमान करें
सुबह लोगों की सुविधा के अनुसार जो भी जिस समय रुद्राभिषेक पूरा कर रहा है — उसके बाद शाम को कम से कम सब हटाइए, पाँच-दस मिनट में जितना लगे, उनका पूरा श्रृंगार अच्छे से करवाइए, और फिर उन्हें विराजमान करवाइए। उन्हें ऐसे नहीं छोड़ना है।
वक्ता कहते हैं कि सुबह लोगों की सुविधा के अनुसार, जो भी जिस समय रुद्राभिषेक पूरा कर रहा है — उसके बाद शाम के समय कम से कम सब हटाइए, पाँच-दस मिनट में जितना लगे, उनका पूरा श्रृंगार अच्छे से करवाइए, और फिर उन्हें विराजमान करवाइए। उन्हें ऐसे नहीं छोड़ना है। यह बात ध्यान में रखिए।
क्या सभी देवताओं की रोज़ कपूर और लौंग से आरती की जा सकती है?
आरती के पात्र में पहले कपूर, फिर उस पर लौंग
वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, की जा सकती है। जिस पात्र में आरती दिखाई जाती है, उसमें पहले कपूर डालिए, उस पर लौंग रखिए, जलाइए और दिखाइए। कोई दिक्कत नहीं है।
अब श्रोताओं के प्रश्न लेते हुए वक्ता एक प्रश्न से शुरू करते हैं कि क्या सभी देवी-देवताओं के लिए रोज़ कपूर और लौंग से आरती की जा सकती है। वे उत्तर देते हैं कि हाँ, की जा सकती है। जिस पात्र में आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। दिखाई जाती है, उसमें पहले कपूर डालिए; उस पर लौंग रखिए; जलाइए और दिखाइए। कोई दिक्कत नहीं है।
यह विधि लाइव करके दिखानी पड़ेगी, जैसे यज्ञोपवीत या शैव दीक्षा में गुरु करते हैं।
मुँह से बताई जा सकती है, पर करके दिखाना उचित नहीं
अघोर मंत्र से बेल की लकड़ी से भस्म बनाने की विधि समझाने को कहा गया, तो वक्ता कहते हैं कि वह लाइव करके दिखानी पड़ेगी। जब तक ऐसा विधि-विधान न हो — यज्ञोपवीत संस्कार या शैव दीक्षा में — गुरु सब कुछ करके दिखाते और बताते हैं। नहीं तो हम केवल मुँह से बता सकते हैं; करके दिखाना उचित नहीं।
एक श्रोता उनसे अघोर मंत्र से बेल की लकड़ी से भस्म बनाने की विधि समझाने को कहते हैं। वे कहते हैं कि तब तो वह लाइव करके दिखानी पड़ेगी न। जब तक ऐसा विधि-विधान न हो — जब यज्ञोपवीत संस्कार आदि होता है, या शैव दीक्षा होती है — उस समय गुरु जी सब कुछ करके, दिखाकर और बताकर करवाते हैं। नहीं तो हम केवल मुँह से बता सकते हैं। करके दिखाना उचित नहीं है।
क्या भैरवी साधना घर पर की जा सकती है?
तांत्रोक्त शक्ति, इसलिए न घर पर, न बिना दीक्षा के
पंकज जमवाल जी, जो घर पर भैरवी साधना करना चाहते हैं, उन्हें उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि भैरवी की सेवा-पूजा तांत्रोक्त शक्ति है और उनका स्वरूप तांत्रोक्त है — तो आप घर पर कैसे करेंगे? या तो ऐसी साधना के लिए विधिवत दीक्षा लीजिए, और तब भी घर पर नहीं, शिव मंदिर में कीजिए, या जैसा गुरु आदेश दें।
माँ भैरवी, और घर पर भैरवी साधना कैसे करें — यह प्रश्न पंकज जमवाल जी का है। वक्ता उत्तर देते हैं कि आप घर पर भैरवी साधना करना चाहते हैं, पर सबसे पहले तो उनकी सेवा-पूजा तांत्रोक्त शक्ति है, उनका स्वरूप तांत्रोक्त है — तो आप घर पर कैसे करेंगे? तो या तो इस तरह की साधना के लिए विधिवत दीक्षा लीजिए और तभी कीजिए; और घर पर भी नहीं, शिव मंदिर में कीजिए, या जैसा गुरु आदेश दें। और उससे भी पहले, अपने कुल के देवी-देवताओं की सेवा-पूजा कीजिए।
पहले आरती आती है, या पाठ और हवन?
नित्य पूजन में क्रम का प्रश्न
एक श्रोता पूछते हैं: कुछ लोग नित्य पूजन में पहले पूजन, पाठ और हवन करते हैं और अंत में आरती; कुछ पूजन के बाद आरती करते हैं और फिर पाठ और हवन। कौन-सा क्रम सही है?
प्रश्न यह है कि कुछ लोग नित्य पूजन में पहले पूजन, पाठ और हवन करते हैं और फिर अंत में आरती करते हैं। कुछ पूजन के बाद आरती करते हैं और फिर पाठ और हवन करते हैं। कौन-सा क्रम सही है? वक्ता कहते हैं कि देखिए, वे एक उदाहरण से बता रहे हैं।
नित्य पूजन में सही क्रम क्या है?
पूजन, पाठ, हवन, और हवन के बाद ही आरती
वक्ता उत्तर देते हैं कि नित्य पूजन में ऐसा नहीं होना चाहिए। नित्य पूजन के क्रम में पूजन, पाठ और हवन करना चाहिए और उसके बाद ही आरती। पूजन के बाद आरती करके फिर पाठ और हवन करना उचित नहीं। आरती हवन के बाद ही कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि मान लीजिए नवरात्रि है — उस समय हम नित्य पूजन की बात नहीं करेंगे। नवरात्र जैसे पर्व में ऐसा किया जा सकता है: अब पूरा परिवार साथ मिलकर आरती करना चाहता है, तो सुबह सोपचार पूजन या जो भी विधि-विधान करना हो वह करके, भगवान शिव का अभिषेक आदि करके, भोग लगाकर, मैया का श्रृंगार करवाकर, आरती कीजिए; और उसके बाद बैठकर आप सब सप्तशती पाठ या जो भी एक व्यक्ति करना चाहे, वह बाद में कीजिए और अपना समर्पण कीजिए। पर नित्य पूजन में ऐसा नहीं होना चाहिए। नित्य पूजन के क्रम में पूजन, पाठ और हवन करना चाहिए, और उसके बाद ही आरती करनी चाहिए। कि हम पूजन के बाद आरती करेंगे और फिर पाठ और हवन करेंगे — यह उचित नहीं है। आरती हवन के बाद ही कीजिए।
जब एक श्रोता लाल जवा फूल अर्पित करते हैं, तो उनकी माँ को दर्द क्यों होता है?
जवा फूल से आहुति मत दीजिए
एक श्रोता कहते हैं कि जब भी वे हवन करते हैं या लाल जवा फूल से आहुति देते हैं, उनकी माँ के पेट में बहुत तेज़ दर्द होता है। वक्ता सीधा उत्तर देते हैं: अगर जवा फूल से आहुति देते हैं, तो जवा फूल से आहुति मत दीजिए। वे निखिल कटारिया जी से कहते हैं कि वे इसके पीछे का कारण समझते हैं, और अगर वे माँ के पास हों तो उस समय बिल्कुल न करें।
एक श्रोता लिखते हैं कि जब भी मैं हवन करता हूँ, या लाल जवा फूल से आहुति देता हूँ, तो माँ के पेट में बहुत तेज़ दर्द होता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि अगर आप जवा फूल से आहुति देते हैं, तो जवा फूल से आहुति मत दीजिए। निखिल कटारिया जी, हम इसके पीछे का कारण समझते हैं — हम आपसे बात भी करते हैं — तो उस समय लाल फूल से आहुति मत दीजिए। अगर आप माता जी के पास हैं, तो बिल्कुल मत कीजिए।
क्या यज्ञोपवीत में गायत्री देने वाले ही गुरु हैं?
वही व्यक्ति आपके पहले गुरु बन जाते हैं
लाखन सिंह जी पूछते हैं कि जिन्होंने उनके यज्ञोपवीत में उन्हें गायत्री दी, क्या वही उनके गुरु हैं या उन्हें दूसरा गुरु चुनना होगा। वक्ता उत्तर देते हैं कि जिन्होंने यज्ञोपवीत दिया और आपको गायत्री का उपदेश और दीक्षा दी, वे आपके पहले गुरु बन गए।
आकाश विश्वकर्मा जी को यह उत्तर देकर कि शिव जी को गुरु बनाने की विधि आज बता दी गई है, वक्ता लाखन सिंह जी के प्रश्न पर आते हैं: जिन्होंने मेरे यज्ञोपवीत के समय मुझे गायत्री दी — क्या वही मेरे गुरु हैं, या मुझे दूसरा गुरु चुनना होगा? वक्ता उत्तर देते हैं कि लाखन सिंह जी, जिन्होंने यज्ञोपवीत दिया और आपको गायत्री आदि का उपदेश और दीक्षा दी, वे आपके पहले गुरु बन गए।
क्या यज्ञोपवीत से व्यक्ति पहले ही शाक्त बन जाता है?
शाक्त दीक्षा मिल चुकी, आगे की दीक्षा केवल तांत्रोक्त साधना के लिए
वक्ता कहते हैं कि शाक्त दीक्षा आपको ऐसे ही मिल चुकी है — यज्ञोपवीत मिल गया, यानी आप शाक्त बन चुके हैं। अब अगर आपको कोई विशेष तांत्रोक्त साधना करनी है, तो अलग दीक्षा चाहिए; गायत्री की साधना और उपासना के लिए अब आपको किसी विशेष दीक्षा की ज़रूरत नहीं।
वक्ता कहते हैं कि शाक्त दीक्षा आपको ऐसे ही मिल चुकी है। यज्ञोपवीत मिल गया — इसका अर्थ है आप शाक्त बन चुके हैं। अब अगर आपको कोई विशेष तांत्रोक्त साधना करनी है, तो आपको अलग दीक्षा चाहिए। गायत्री की साधना और उपासना के लिए अब आपको किसी विशेष दीक्षा की ज़रूरत नहीं। न ही दूसरे पूजन-पाठ के लिए आपको अलग से विशेष दीक्षा चाहिए। किसी तांत्रोक्त मंत्र की साधना के लिए, किसी विशेष साधना के लिए — जैसे ऊपर पंकज जी ने शायद भैरवी साधना के बारे में पूछा था — अगर इस तरह की साधना करनी है, तो आपको मार्गदर्शन चाहिए, वैसा गुरु चाहिए। नहीं तो नहीं।
क्या बिना माला के, जब याद आए तब किया गया जप किसी काम का है?
नाम जप कभी भी, माला वाले मंत्र चलते-फिरते नहीं
एक श्रोता कहते हैं कि दो-तीन महीने से वे माला से मंत्र जप नहीं कर पाए, पर जब याद आता है तब जप करते हैं। वक्ता पूछते हैं कि कौन-सा मंत्र है: अगर माला वाला मंत्र ऐसे कर रहे हैं, तो वह उचित नहीं। हर चीज़ की मर्यादा है। नाम जप आप कभी भी कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि दो-तीन महीने से मैं माला से मंत्र जप नहीं कर पाया, पर जब भी मन में आता है, जप करता हूँ — क्या भगवान की कृपा मिलेगी? वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, आप किस मंत्र का जप कर रहे हैं। अगर माला वाला मंत्र ऐसे ही कर रहे हैं, तो यह उचित नहीं। हर चीज़ की मर्यादा है। नाम जप आप कभी भी कर सकते हैं। तांत्रोक्त और पौराणिक आदि मंत्र, जिनका जप माला पर होता है, उन्हें आप ऐसे चलते-फिरते नहीं कर सकते। नाम जप आप किसी भी अवस्था में, चौबीसों घंटे कर सकते हैं।
ऐसी स्थिति को पहले घर के लिए बताए गए क्षेत्रपाल पूजन से दूर कीजिए।
पहले क्षेत्रपाल पूजन, फिर अमावस्या और पूर्णिमा पर सूक्ष्म हवन
आकाश विश्वकर्मा जी को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि अगर ऐसी स्थिति बन रही है, तो सबसे पहले घर के लिए बताई गई विधि से क्षेत्रपाल पूजन करके उसे दूर कीजिए; और अमावस्या और पूर्णिमा के दिन सूक्ष्म हवन कीजिए — चैनल पर दी गई विधि से छोटा हवन, जयंती मंगला काली मंत्र से, घी और गुग्गुल से।
वक्ता उत्तर देते हैं कि आकाश विश्वकर्मा जी, अगर ऐसी स्थिति बन रही है, तो सबसे पहले घर के लिए बताई गई विधि से क्षेत्रपाल पूजन करके उसे दूर कीजिए। और अमावस्या और पूर्णिमा के दिन सूक्ष्म हवन कीजिए। हवन की विधि चैनल पर है — छोटा हवन कीजिए, जयंती मंगला काली मंत्र से, घी और गुग्गुल से। इतना करना शुरू कीजिए; दो-तीन महीने में फर्क आएगा।
क्या शिव-पार्वती का संयुक्त मंत्र गुरु मंत्र के रूप में लिया जा सकता है?
शक्ति सहित शिव को गुरु स्वरूप में स्वीकार करना
पूछा गया कि वीडियो में बताए गए माँ पार्वती और शिव जी के संयुक्त मंत्र से क्या उन्हें गुरु स्वरूप में स्वीकार किया जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल कर सकते हैं। बिल्कुल, शक्ति सहित शिव को, इस मंत्र से भी स्वीकार कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि वीडियो में माँ पार्वती और शिव जी का जो संयुक्त मंत्र बताया गया था — क्या हम उस मंत्र से उन्हें गुरु स्वरूप में स्वीकार कर सकते हैं? वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं। बिल्कुल — शक्ति सहित शिव; इस मंत्र से भी आप उन्हें स्वीकार कर सकते हैं।
गुरु मंत्र के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए?
गुरु मंत्र कभी ज़ोर से नहीं बोला जाता और हमेशा गुप्त रखा जाता है
जो भी मंत्र गुरु मंत्र के रूप में लिया जाए — पंचाक्षरी लीजिए, शंभु शिव का मंत्र लीजिए, जिस भी विधि-विधान से बताया गया हो — वह मंत्र कभी मुँह से नहीं बोलना चाहिए; उसे हमेशा गुप्त रखना चाहिए। गुरु मंत्र सदा गुप्त है; उसका जप भी ज़ोर से बोलकर नहीं करना है।
वक्ता कहते हैं कि और एक बात ध्यान में रखिए: जो भी मंत्र गुरु मंत्र के रूप में लिया जाए — पंचाक्षरी लीजिए, शंभु शिव का मंत्र लीजिए, जिस भी विधि-विधान से बताया गया हो — वह मंत्र कभी मुँह से नहीं बोलना चाहिए। उसे हमेशा गुप्त रखना चाहिए। ऐसा नहीं कि आपने कहीं भी बोल दिया: अरे, यह मंत्र मेरा गुरु मंत्र है। नहीं। गुरु मंत्र सदा गुप्त है। अगर गुरु मंत्र मुँह से निकल जाए — यानी उसका जप भी ज़ोर से बोलकर नहीं करना है। मन में कीजिए, या होंठों से बुदबुदाते हुए कीजिए। पर चिल्लाकर नहीं करना है।
क्या पंचाक्षरी या गायत्री को भजन की तरह गाना गलत है?
इन मंत्रों का भजन नहीं बनाया जाता
लोग जो भजन गाते हैं — "हर हर भोले नमः शिवाय", पूरा गाना — वक्ता कहते हैं कि जो पंचाक्षरी दीक्षा ले रहा है, या जिसका यज्ञोपवीत हुआ है, उसके लिए यह गाना गाना भी गलत है। यह मुँह से नहीं निकलना चाहिए। पंचाक्षरी का भजन नहीं होता; गायत्री का भजन नहीं होता।
वक्ता कहते हैं कि लोग जो ये भजन गाते हैं — हर हर भोले नमः शिवाय, यह पूरा गाना जो वे गाते हैं — भाई, जो पंचाक्षरी दीक्षा ले रहे हैं, या जिनका यज्ञोपवीत हुआ है, अगर आप यह गाना गाते हैं तो वह भी गलत है। यह सब मुँह से नहीं निकलना चाहिए। यह मंत्र बहुत गुप्त विषय है। इसका भजन नहीं बनाया जाता। पंचाक्षरी का भजन नहीं होता; गायत्री मंत्र का भजन नहीं होता। जो ऐसा कर रहे हैं, वे अपनी दुर्गति करते हैं, और दूसरों को भी दुर्गति की प्रेरणा दे दी है। मानना या न मानना आपकी इच्छा है; मेरा काम है बताना, गलत होने से रोकना। हम उत्थान चाहेंगे, पतन नहीं — इसीलिए बोलते हैं। बाकी आपकी इच्छा।
क्या यह गोपनीयता शंभु शिव मंत्र पर भी लागू होती है?
कोई भी दीक्षा मंत्र, पंचाक्षरी हो या शंभु शिव, कभी बोला नहीं जाता
वक्ता कहते हैं कि यह भी ध्यान रखिए: अगर आप पंचाक्षरी दीक्षा ले रहे हैं, तो उसे बोलना नहीं है। अगर आप शंभु शिव दीक्षा ले रहे हैं और उस मंत्र की विधि कर रहे हैं, तो वह मंत्र भी कभी मुँह से नहीं बोलना है। उसे हमेशा गुप्त रखना है। यह विषय सबके लिए है — गुरु मंत्र कभी बोला नहीं जाता।
वक्ता कहते हैं कि तो यह भी ध्यान में रखिए: अगर आप पंचाक्षरी दीक्षा ले रहे हैं, तो उसे बोलना नहीं है। ठीक है, अगर आप शंभु शिव दीक्षा ले रहे हैं और उस मंत्र की विधि कर रहे हैं, तो वह मंत्र भी कभी मुँह से नहीं बोलना है। उसे हमेशा गुप्त रखना है। यह विषय सबके लिए है। गुरु मंत्र कभी बोला नहीं जाता।
जो साल भर पूजा नहीं कर सकता, वह क्या करे?
धूप-दीप के बिना गीता और शिव गीता का पाठ
वक्ता उत्तर देते हैं कि मनोज जी, आप श्रीमद्भगवद्गीता और शिव गीता का पाठ कर सकते हैं। अगर साल भर पूजा नहीं कर सकते, तो पाठ आदि कर सकते हैं — पर धूप-दीप मत जलाइए, या जैसा पंडित जी ने विधि-विधान से बताया है, वैसा कीजिए।
वक्ता उत्तर देते हैं कि मनोज जी, आप श्रीमद श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ, शिव गीता का पाठ कर सकते हैं। आप साल भर पूजा नहीं कर सकते, तो पाठ आदि कर सकते हैं। धूप-दीप मत जलाइए; या पंडित जी जो भी विधि-विधान बताएँ, उसके अनुसार अपने अधिकार के हिसाब से गीता का पाठ, विष्णु सहस्रनाम का पाठ आदि कीजिए। इसमें कोई दिक्कत नहीं है।
जिन क्षेत्रों में अमावस्या से गिनती होती है, वहाँ सावन कब शुरू करें?
पूर्णिमांत और अमावस्यांत गणना
गुजरात के एक श्रोता, जहाँ श्रावण अमावस्या से गिना जाता है, पूछते हैं कि कब से शुरू करें। वक्ता कहते हैं कि हाँ, यह एक मुद्दा है — आप लोग पूर्णिमांत और अमावस्यांत से अलग-अलग गिनते हैं। आप लोग जब से मानते हैं, तब से शुरू कीजिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि गुजरात में हम श्रावण अमावस्या गिनते हैं, तो हम कब से शुरू करें? वक्ता कहते हैं कि हाँ, यह एक मुद्दा है — आप लोग पूर्णिमांत से और अमावस्यांत से अलग-अलग गिनते हैं। आप लोग जब से मानते हैं, तब से शुरू कीजिए। हमारी गणना से, हमारी तरफ़ सावन — गुरु पूर्णिमा हुई, और आषाढ़ पूर्णिमा के अगले ही दिन से सावन लग गया। हमारा सावन तब शुरू होता है, और हम उसी के अनुसार जो विधि-विधान है, वह करते हैं।
क्या तांत्रोक्त रुद्राक्ष का अभिषेक किया जा सकता है?
कपूर मिले जल से छोटा-सा अभिषेक
वक्ता उत्तर देते हैं कि आनंद जी, आप तांत्रोक्त रुद्राक्ष पर अभिषेक कर सकते हैं। आपको बताए गए विधान में कपूर मिले जल का छोटा लोटा रखकर छोटा अभिषेक कीजिए। और अगर पूरा रुद्राभिषेक भी करना चाहें, तो वह भी कीजिए — उससे कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा।
वक्ता उत्तर देते हैं कि आनंद जी, आप तांत्रोक्त रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । पर अभिषेक कर सकते हैं। आपको बताए गए विधान में कपूर मिले जल का छोटा-सा लोटा रखकर छोटा-सा अभिषेक कीजिए। और अगर पूरा रुद्राभिषेक भी करना चाहें, तो वह भी कीजिए — उससे उस पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा।
रुद्राक्ष का अभिषेक करते समय क्या ध्यान रखना चाहिए?
उसमें जल ठहरा नहीं रहना चाहिए
वक्ता कहते हैं कि बस इतना ध्यान रखिए: जब अभिषेक आदि हो जाए और धूप निकले, तो उन्हें थोड़ी देर धूप में भी रखिए। उनमें जल ठहरना नहीं चाहिए; जल के निकलने का रास्ता होना चाहिए। नहीं तो चौबीस घंटे जल में छोड़ेंगे, तो वह फूल जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि बस इतना ध्यान रखिए: जब अभिषेक आदि पूरा हो जाए और धूप निकले, तो उन्हें थोड़ी देर धूप में भी रखिए। उसमें जल बस ठहरा न रहे। जल के निकलने का रास्ता होना चाहिए। नहीं तो अगर आप उसे चौबीस घंटे जल में छोड़ेंगे, तो वह फूल जाएगा।
अभिषेक के बाद रुद्राक्ष अच्छे से साफ़ किए जाते हैं और कभी जल में ठहरे नहीं छोड़े जाते।
आठ-दस साल से कर रहे हैं, एक भी नहीं टूटा
वक्ता कहते हैं कि वैसे वह टूटता नहीं — वे यह कम से कम आठ-दस साल से ज़्यादा से कर रहे हैं, और आज तक उनका खंडित नहीं हुआ। पर वे उन्हें जल में नहीं छोड़ते: अभिषेक के बाद अच्छे से साफ़ करते हैं, सुखाते हैं, सूती कपड़े से पोंछते हैं, और तब श्रृंगार करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि वैसे वह टूटता नहीं — हम इतने दिनों से कर रहे हैं, कम से कम आठ-दस साल से ज़्यादा हो गए। तो आज तक हमारा खंडित नहीं हुआ। पर हम उन्हें जल में नहीं छोड़ते। अभिषेक आदि के बाद हम उन्हें अच्छे से साफ़ करते हैं, सुखाते हैं — यानी सूती कपड़े से बार-बार पोंछते हैं — और फिर श्रृंगार करते हैं।
पति की मृत्यु या तलाक के बाद किसका गोत्र और कुलदेवता मान्य होता है?
पहला विवाह ही गोत्र, उपनाम, वर्ण और कुलदेवता तय करता है
वक्ता कहते हैं कि विवाह हो चुका है। सनातन संस्कृति में एक बार विवाह हो गया, तो पति का गोत्र उसका गोत्र, पति का उपनाम उसका उपनाम, और उसका वर्ण उसका वर्ण है। और दूसरी बात, पति के कुल देवी-देवता ही उसके कुल देवी-देवता रहेंगे — चाहे आप तलाक लें या अलग हो जाएँ।
वक्ता कहते हैं कि अगर पति की मृत्यु हो गई, या तलाक हो गया — लड़की का विवाह तो हो चुका है न। सनातन संस्कृति में एक बार विवाह हो गया, तो पति का गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है। उसका गोत्र हो गया, पति का उपनाम उसका उपनाम हो गया, उसका वर्ण उसका हो गया। और दूसरी बात यह कि पति के कुल के देवी-देवता ही उसके कुल के देवी-देवता रहेंगे। चाहे आप तलाक लें या अलग हो जाएँ — जो भी करें, कुलदेवी-देवता वही रहेंगे। स्त्री का पहला विवाह जिससे होता है, उस पति के घर का सब कुछ उसका होगा। यह बात ध्यान में रखिए।
जो अनुष्ठान पूरा न हो सका, उसे फिर से कैसे शुरू करें?
कल से शुरू कीजिए, नहीं तो गुरु पूर्णिमा से
वक्ता उत्तर देते हैं कि रवि जी, अनुष्ठान नहीं हो सका तो कोई बात नहीं — अब कल से शुरू कीजिए, नहीं तो गुरु पूर्णिमा से।
वक्ता उत्तर देते हैं कि रवि जी, अनुष्ठान नहीं हो सका तो कोई बात नहीं। अब कल से शुरू कीजिए, नहीं तो गुरु पूर्णिमा से।
बेल पत्र पर राम नाम लिखने का क्या फल है?
अनंत फल, और बेल पत्र से शिव लोक
वक्ता कहते हैं कि बेल पत्र पर भगवान राम जी का नाम लिखकर अर्पित करने का अनंत फल है। बेल पत्र से शिव लोक की प्राप्ति होती है।
वक्ता कहते हैं कि बेल पत्र पर भगवान राम जी का नाम लिखकर अर्पित करने का अनंत फल है। बेल पत्र से शिव लोक की प्राप्ति होती है।
क्या नवरात्रि में पाँच दिन पूजा छोड़ने में कोई दोष है?
मासिक धर्म में बिल्कुल कोई दोष नहीं
एक श्रोता कहती हैं कि नवरात्रि में पूजा करते समय उन्हें पाँच दिन पूजा छोड़नी पड़ती है। वक्ता नेहा जी को उत्तर देते हैं कि इसमें बिल्कुल कोई दोष नहीं लगता। नवरात्र हो या कोई और पर्व काल, मासिक धर्म के कारण जो पूजा छोड़नी पड़ती है, उसमें कोई दोष नहीं; यह प्रकृति है — इसमें क्या दोष।
क्या पूरे सावन एक ही पार्थिव शिवलिंग की पूजा की जा सकती है?
रोज़ बनाना और रोज़ विसर्जन, जैसा घुश्मेश्वर कथा में है
वक्ता उत्तर देते हैं कि नहीं भाई, पार्थिव शिवलिंग के नियम के अनुसार विसर्जन हर दिन करना होगा। आप एक ही शिवलिंग का लंबे समय तक, पूरे सावन पूजन नहीं कर सकते। रोज़ बनाइए, रोज़ विसर्जन कीजिए। यही वर्णन घुश्मेश्वर कथा में मिलता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि अगर सावन में पार्थिव शिवलिंग बनाया जाए, तो क्या पूरे सावन मास एक ही शिवलिंग से पूजा करके पूर्णिमा को उसका विसर्जन करें, या रोज़? वक्ता उत्तर देते हैं कि नहीं भाई, पार्थिव शिवलिंग के नियम के अनुसार विसर्जन हर दिन करना होगा। आप एक ही शिवलिंग का लंबे समय तक, पूरे सावन पूजन नहीं कर सकते। रोज़ बनाइए, रोज़ विसर्जन कीजिए। यही वर्णन घुश्मेश्वर कथा में मिलता है।
घर का रुद्राभिषेक कितने समय तक चलना चाहिए?
पूरा महीना, सभी साठ दिन
वक्ता कहते हैं कि घर पर शिवलिंग का रुद्राभिषेक पूरे के पूरे महीने कीजिए। सभी साठ दिन कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि घर पर शिवलिंग का रुद्राभिषेक पूरे के पूरे महीने कीजिए। सभी साठ दिन कीजिए।
क्या पूजा से पहले रोज़ शिवलिंग उठाकर धोया जा सकता है?
हाँ, पर कहाँ धोते हैं, यह मायने रखता है
एक श्रोता कहते हैं कि वे रोज़ पूजा से पहले शिवलिंग उठाकर जल से धोते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल धोइए — पर यह भी ध्यान रखिए कि कहाँ धोते हैं। ऐसा न हो कि धोने के लिए बेसिन पर ले जाएँ, या वॉशरूम में धोएँ। अपने पूजन स्थान पर ही कीजिए।
एक श्रोता लिखते हैं कि क्या शिवलिंग को रोज़ पूजा स्थान से उठाकर धोया जा सकता है — मैं रोज़ पूजा से पहले शिवलिंग उठाकर जल से धोता हूँ। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल धोइए, पर यह भी ध्यान रखिए कि कहाँ धोते हैं। ऐसा न हो कि धोने के लिए उसे बेसिन पर ले जाकर वहाँ धोएँ, या वॉशरूम में धोएँ। अपने पूजन स्थान पर ही।
शिवलिंग को स्नान कराना धोना नहीं, अभिषेक क्यों कहलाता है?
यह धोना नहीं, अभिषेक है
वक्ता कहते हैं कि लोग ऐसी गलतियाँ करते हैं, और नहीं करनी चाहिए — और यह "धोना" नहीं, उनका अभिषेक होगा। आप शिवलिंग को वस्तु मान रहे हैं, इसीलिए कहते हैं कि धोते हैं। अगर आपका भाव ऐसा है, तो कहिए कि हम शिव जी का अभिषेक करते हैं। और एक बार करें या चार बार, कोई दिक्कत नहीं। आप बिल्कुल उन्हें उठाकर कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि हम यह इसलिए कहते हैं क्योंकि लोग ऐसी गलतियाँ करते हैं। इसे अपने ऊपर मत लीजिए — आपको लगेगा, अरे, हम ऐसा नहीं करते, आप यह कह रहे हैं, क्या हम ऐसे मूर्ख हैं? वे कहते हैं कि वे भी सोचते थे कि लोग ऐसी गलती शायद ही करें, पर हर तरह के लोग होते हैं, और वे ज़बरदस्त गलतियाँ करते हैं। तो ऐसी गलती नहीं करनी है — और यह धोना नहीं है; उनका केवल अभिषेक होगा। आप शिवलिंग को वस्तु मान रहे हैं, इसीलिए हम कह रहे हैं: आप कहते हैं कि धोते हैं। अगर आपका भाव ऐसा है, तो बस यही कहिए कि हम शिव जी का अभिषेक करते हैं। और अभिषेक एक बार कीजिए, चार बार कीजिए, कोई दिक्कत नहीं। आप बिल्कुल उन्हें उठाकर अभिषेक कर सकते हैं।
जिनकी कुलदेवी बंदी माता हैं, वे क्या करें?
भद्रकाली ही बंदी माता का स्वरूप हैं
वक्ता उत्तर देते हैं कि प्रीतम कुमार जी, अगर कुलदेवी बंदी माता हैं, तो आपको भद्रकाली का करना होगा। भद्रकाली कवच कीजिए, और भद्रकाली सहस्रनाम आदि का पाठ कीजिए। पर पक्का कर लीजिए कि आपकी कुलदेवी बंदी माता ही हैं, तभी। वही उनका स्वरूप है — भद्रकाली ही बंदी माता का स्वरूप हैं।
क्या शिव रक्षा स्तोत्र को कवच की तरह गले में पहना जा सकता है?
बेल की लकड़ी की कलम और अष्टगंध की स्याही से भोजपत्र पर लिखा
वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल पहना जा सकता है। जो शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ करते हैं, वे इस सावन में किसी भी दिन — सोमवार, पूर्णिमा, अमावस्या — बेल की लकड़ी की कलम से, अष्टगंध की या गंगाजल में घिसे केसर की स्याही से भोजपत्र पर पूरा कवच लिखें, फिर 108 बार पाठ करें, हवन आदि करें, और तब उसे चाँदी के खोल में रखकर धारण करें।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या शिव रक्षा स्तोत्र ऐसी चीज़ है जिसे कवच की तरह गले में पहना जा सके? वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल पहना जा सकता है। बिल्कुल — जो शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ करते हैं, वे इस सावन में किसी भी दिन लिख सकते हैं: सोमवार के दिन, पूर्णिमा के दिन, अमावस्या के दिन, भोजपत्रभोजपत्र, अनार की टहनी की कलम व लाल चंदन की स्याही से मंत्र या नाम लिखने हेतु प्रयुक्त — जैसे शिवलिंग के अर्घे पर नाम रखकर मधु-अभिषेक करने में। पर, बेल की लकड़ी की कलम बनाकर, और अष्टगंधआठ सुगंधित द्रव्यों से बना लेप, उपाय व पूजा विधियों में सिंदूर से पूर्व तिलक के रूप में लगाया जाता है। की स्याही से या गंगाजल में घिसे केसर की स्याही से; उससे पूरा कवच लिखकर, फिर 108 बार पाठ करके, और हवन आदि करके, फिर उसे चाँदी के खोल में रखकर धारण कीजिए।
क्या पूरा श्रावण शिव मानस पूजा से निभाया जा सकता है?
जब भौतिक पूजा संभव न हो, तब मानस पूजा
वक्ता उत्तर देते हैं कि अगर स्थिति ऐसी है कि हम भौतिक पूजा नहीं कर सकते — मान लीजिए किसी कारण से सावन के बीच कहीं जाना पड़ा, या ऐसी कोई बात है — तो आप बिल्कुल मानस पूजा कर सकते हैं, और उससे भी आपको फल मिलेगा।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या पूरे श्रावण मास शिव मानस पूजा से भी पूजा की जा सकती है? अगर स्थिति ऐसी है कि हम भौतिक पूजा नहीं कर सकते — मान लीजिए किसी कारण से सावन के बीच कहीं जाना पड़ा, या ऐसी कोई बात है — तो आप बिल्कुल मानसिक पूजा कर सकते हैं, और उससे भी आपको फल मिलेगा।
क्या पूरी विधि की जगह रोज़ सोलह मंत्रों की लघु रुद्री की जा सकती है?
हाँ, जब रोज़ पूरा रुद्री पाठ बहुत समय लेता हो
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने रुद्री पाठ विधि से सीखा है, पर रोज़ पूरी विधि से करने में बहुत समय लगता है, और पूछते हैं कि क्या वे रोज़ सोलह मंत्रों की लघु रुद्री से अभिषेक कर सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं। और श्रावण में रोज़ पूजन के लिए शिव मानस पूजा का भी बिल्कुल उपयोग कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि मैंने रुद्री पाठ विधि से सीखा है, पर रोज़ पूरी विधि से करने में बहुत समय लगता है — तो क्या मैं रोज़ लघु रुद्री, सोलह मंत्रों से अभिषेक कर सकता हूँ? वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं। और शिव मानस पूजा से भी, श्रावण में, आप बिल्कुल रोज़ पूजन कर सकते हैं।
यह केवल अनुभव से कहा गया है, इसलिए एक बार कुंडली का विश्लेषण भी करवाइए।
राहु का प्रभाव — पर कुंडली का विश्लेषण भी करवाइए
वक्ता कहते हैं कि प्रफुल्ल जी, आप जो बता रहे हैं वह राहु के प्रभाव से होता है। पर वे जोड़ते हैं कि यह वे केवल अनुभव के अनुसार कह रहे हैं — यह ज़रूरी नहीं; फिर भी किसी अच्छे ज्योतिषी से एक बार अपनी कुंडली का विश्लेषण भी करवाइए।
वक्ता कहते हैं कि प्रफुल्ल जी, आप जो बता रहे हैं — यह राहु के प्रभाव से होता है। हाँ, पर यह हम केवल अनुभव के अनुसार कह रहे हैं; यह ज़रूरी नहीं। फिर भी किसी अच्छे ज्योतिषी से एक बार कुंडली का विश्लेषण भी करवाइए।
रोज़ शिव मंदिर जाइए, या घर के शिवलिंग पर, और अभिषेक कीजिए।
पूरे श्रावण रोज़ सुगंधित जल से अभिषेक
वक्ता कहते हैं कि साथ में श्रावण मास में रोज़ एक छोटा-सा काम कीजिए। जैसा आज के वीडियो की शुरुआत में बताया गया कि शिव जी का अभिषेक कैसे करना है — शिव मंदिर जाइए, या घर में शिवलिंग है, तो कपूर, रोली, जल आदि मिलाकर सुगंधित जल से भगवान शिव का अभिषेक कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि साथ में, श्रावण मास में रोज़ एक छोटा-सा काम कीजिए। आज के वीडियो में, शुरुआत में, हमने बताया कि शिव जी का अभिषेक कैसे करना है। शिव मंदिर जाकर, या घर में शिवलिंग है तो, कपूर, रोली, जल आदि मिलाकर सुगंधित जल से भगवान शिव का अभिषेक कीजिए।
अभिषेक के बाद शिवलिंग पर बची रोली का क्या करें?
अनामिका उँगली से शिवलिंग से लिया गया तिलक
अभिषेक करने के बाद रोली, कपूर आदि शिवलिंग पर चिपके रह जाएँगे। वही रोली — अपनी अनामिका उँगली से शिवलिंग पर से पोंछकर — अपने माथे पर और गले पर तिलक लगाइए। यह काम कीजिए, और साथ में रुद्राष्टक का पाठ कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अभिषेक करने के बाद होगा यह कि रोली, कपूर आदि शिवलिंग पर चिपके रह जाएँगे। वही रोली लेकर — यानी शिवलिंग पर से अपनी अनामिका उँगली से पोंछकर — अपने माथे पर और गले पर तिलक लगाइए। यह काम कीजिए, और साथ में रुद्राष्टकम् का पाठ कीजिए। यह बस एक छोटा-सा उपाय है; पाँच मिनट का समय लगेगा। कीजिए — आपको लाभ होगा।
सूतक के बाद पूजन-पाठ फिर शुरू होते ही दिल की परेशानी लौट आई।
इसका अर्थ है पितर मज़बूत हैं
एक श्रोता कहते हैं कि जन्म के सूतक में लगभग कोई दिक्कत नहीं थी, और जैसे ही उन्होंने पूजन-पाठ फिर शुरू किया, दिल की परेशानी फिर वैसे ही शुरू हो गई। वक्ता उत्तर देते हैं कि यानी सूतक काल में कोई परेशानी नहीं थी — इसका अर्थ है आपके पितर मज़बूत हैं। वे ठीक हैं।
पहले जब भैरव जी का पूजन हो रहा था, तब सब ठीक चल रहा था।
जो भैरव स्थान मिला था, वहाँ पूजन शुरू कीजिए
वक्ता याद दिलाते हैं कि जो भैरव जी का पूजन उन्होंने शुरू किया था, वह बीच में हुआ था और सब ठीक चल रहा था। वे शिवम जी से कहते हैं कि जो भैरव जी का स्थान खोजा गया था, जिसके बारे में उन्होंने खुद बताया था, वहाँ पूजन देना शुरू करें, और फिर से भैरव पाठ करें।
वक्ता कहते हैं कि तो भैरव जी का वह पूजन जो आपने शुरू किया था — आपने बीच में किया था, और वह ठीक चल रहा था। भैरव जी का जो स्थान हमने खोजा था, जिसके बारे में आपने हमें बताया था — शिवम जी, उस स्थान पर पूजन देना शुरू कीजिए, और फिर से भैरव पाठ कीजिए।
काली सहस्रनाम पाठ की विधि क्या है?
सहस्रनाम कई हैं — और इसके लिए सबसे अच्छा समय
काली सहस्रनाम पाठ की विधि पूछी गई, तो वक्ता पूछते हैं कि कौन-सा काली सहस्रनाम करना चाहते हैं — सहस्रनाम कई हैं; एक बार उनसे बात कीजिए, वे बताएँगे। सामान्य रूप से, अगर भगवती काली के सहस्रनाम का पाठ करना चाहते हैं, तो भोर के समय या रात के समय करना अधिक फलदायी है।
एक श्रोता लिखते हैं: काली सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। पाठ की विधि। वक्ता पूछते हैं कि आप कौन-सा काली सहस्रनाम करना चाहते हैं — सहस्रनाम कई हैं। एक बार उनसे बात कीजिए, वे बताएँगे। सामान्य रूप से, अगर आप विशेष रूप से भगवती काली के सहस्रनाम का पाठ करना चाहते हैं, तो भोर के समय या रात के समय करें, तो वह अधिक फलदायी है।
अंबुबाची के लाल कपड़े का क्या करना है?
आधा फाड़कर परिवार की रक्षा के लिए, बाकी धन रखने की जगह
अंबुबाची का जो लाल कपड़ा भगवती पर लिपटा था, उसका आधा कपड़ा फाड़कर परिवार के हर सदस्य के गले, बाँह या कलाई पर रक्षा कवच के रूप में बाँधिए; और बाकी कपड़ा वहाँ रख सकते हैं जहाँ आप अपना धन रखते हैं, शुद्ध, अच्छी जगह पर।
मीना जी ने बधाई दी है, जिसके लिए वे धन्यवाद देते हैं, और वे पूछती हैं कि अम्बुबाची के लाल कपड़े का क्या करना है। वक्ता उत्तर देते हैं कि अंबुबाची का जो लाल कपड़ा भगवती पर लिपटा था, उसका आधा कपड़ा फाड़कर परिवार का हर सदस्य उसे गले पर, या बाँह पर, या हथेली पर, अपनी कलाई पर रक्षा कवच के रूप में बाँध सकता है। और बाकी कपड़ा वहाँ रखा जा सकता है जहाँ आप अपना धन रखते हैं, शुद्ध और अच्छी जगह पर।
गंडमूल शांति कब करनी चाहिए?
जन्म के सत्ताईस दिन के भीतर — और छूट गई हो तो काशी
वक्ता कहते हैं कि गंडमूल की शांति जन्म के सत्ताईस दिन के भीतर होनी चाहिए। अगर उस समय नहीं हुई और अब जैसी स्थिति है, तो एक बार उनसे बात कीजिए। काशी में इन सब कामों के लिए एक मंदिर है।
वक्ता कहते हैं कि गंडमूल की शांति जन्म से सत्ताईस दिन के भीतर-भीतर होनी चाहिए। अगर उस समय नहीं हुई और अब ऐसी स्थिति है, तो एक बार उनसे बात कीजिए। काशी में इन सब कामों के लिए एक मंदिर है। अगर आपका कोई जान-पहचान वाला है, तो अब वहाँ करवा सकते हैं; और कोई नहीं है, तो एक बार उनसे संपर्क कीजिए — पहले देखते हैं कि स्थिति क्या है, और उसके बाद जो हो सकता है, वह मदद की जाएगी।
पीतल के विग्रह को कैसे साफ़ करें?
दही या नींबू ले सकते हैं, पर ब्रश से मत रगड़िए
पूछा गया कि क्या पीतल के विग्रह को नए ब्रश से ठीक से साफ़ किया जा सकता है और क्या दही या नींबू का रस ले सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि ले सकते हैं — पर ब्रश से इतना मत रगड़िए, नहीं तो किसी दिन वे आपको रगड़ देंगे। उन्हें सूती कपड़े से साफ़ करना चाहिए, ताकि बहुत देर तक रगड़ना न पड़े।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या पीतल के विग्रह को नए ब्रश से ठीक से साफ़ किया जा सकता है, क्या दही या नींबू का रस इस्तेमाल किया जा सकता है? वक्ता उत्तर देते हैं कि कर सकते हैं, पर ब्रश से इतना मत रगड़िए, नहीं तो किसी दिन वे आपको रगड़ देंगे। ठीक है? उन्हें सूती कपड़े से साफ़ करना चाहिए, ताकि देर तक रगड़ना न पड़े।
बीच में बहुत-सी बाधाएँ आईं और तीसरे दिन सूतक से साधना टूट गई।
बीच में बाधाएँ, और तीसरे दिन साधना खंडित
एक श्रोता बताते हैं कि पिछली बार उन्होंने संकट नाशन गणेश साधना की, बीच में बहुत-सी बाधाएँ आईं, और तीसरे दिन सूतक के कारण साधना खंडित हो गई।
एक श्रोता लिखते हैं कि पिछली बार मैंने संकट नाशन स्तोत्र गणेश साधना की; बीच में बहुत-सी बाधाएँ आईं, और तीसरे दिन सूतक के कारण साधना खंडित हो गई।
जब गणपति पूजन में बार-बार बाधा आए, तो क्या उपाय है?
घर का पूजन कम करके कम से कम एक पक्ष मंदिर में कीजिए
लाखन सिंह जी, अगर गणपति जी के पूजन में परेशानी आ रही है, तो सबसे पहले घर का पूजन थोड़ा कम करके मंदिर में गणपति जी का पूजन कीजिए — कम से कम एक पक्ष तो ज़रूर। उसके बाद घर पर शुरू कीजिए।
वक्ता उत्तर देते हैं कि लाखन सिंह जी, अगर गणेश जी के पूजन में परेशानी आ रही है — तो सबसे पहली बात यह कि घर पर पूजन थोड़ा कम करके मंदिर में गणपति जी का पूजन कीजिए। कम से कम एक पक्ष तो ज़रूर। उसके बाद घर पर शुरू कीजिए।
क्या श्रावण में शिव सहस्रनाम का पाठ किया जा सकता है?
यह किसी भी समय किया जा सकता है
वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है — वह तो किसी भी समय किया जा सकता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या श्रावण में शिव सहस्रनाम का पाठ किया जा सकता है? वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। वह तो किसी भी समय किया जा सकता है।
अगर मासिक धर्म से नवरात्रि का संकल्प टूट जाए, तो उसे कैसे पूरा करें?
निवृत्ति के दिन बाल धोकर अर्पित कीजिए
वक्ता कहते हैं कि हाँ — अगर कभी इस कारण संकल्प बीच में अधूरा रह जाए, तो जिस दिन निवृत्ति हो और बाल धोए जाएँ, उस दिन भगवती का पूजन करके समर्पण करना चाहिए।
एक श्रोता पूछती हैं कि नवरात्रि में लिया गया नौ दिन का संकल्प अगर मासिक धर्म के कारण पूरा न हो, तो बाद में उसे कैसे पूरा करें? वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ — अगर कभी इस कारण संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। बीच में छूट जाए, तो जिस दिन निवृत्ति हो और बाल धोए जाएँ, उस दिन भगवती का पूजन करके समर्पण करना चाहिए।
महाविद्या क्रम का बीच में रुका सप्तशती पाठ कैसे पूरा करें?
उसी मास की पूर्णिमा को पूरा कीजिए
मान लीजिए आप महाविद्या क्रम में दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे थे और किसी तरह नवरात्रि के बीच ऐसी बात हो गई — तो जो पूर्णिमा पड़े: चैत्र नवरात्रि की थी तो चैत्र पूर्णिमा; आश्विन की थी तो आश्विन शरद पूर्णिमा।
वक्ता कहते हैं कि और मान लीजिए आप महाविद्या क्रम में दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे थे और किसी भी तरह नवरात्रि के बीच ऐसी बात हो गई — तो जो भी पूर्णिमा पड़े। जैसे, अगर आपने चैत्र नवरात्रि की, तो चैत्र पूर्णिमा; अगर आश्विन की, तो आश्विन शरद पूर्णिमा। उस दिन भगवती का फिर से पूजन करना चाहिए। कलश स्थापना की ज़रूरत नहीं; पर उस दिन पूजन करके, और भगवती को तांत्रोक्त देवीसूक्तम् आदि का पाठ, या जो भी स्तुतियाँ हैं उनका पाठ करके, उन्हें समर्पण करना चाहिए।
क्या केवल सावन सोमवारों को पौराणिक पाठों से लघु रुद्र पूजा की जा सकती है?
पुराणोक्त रुद्राभिषेक स्तोत्र और पुरुष सूक्त
पूछा गया कि क्या पुराणोक्त रुद्राभिषेक स्तोत्र और पुराणोक्त पुरुष सूक्त से लघु रुद्र पूजा की जा सकती है, और क्या केवल सावन सोमवारों को की जा सकती है। वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, की जा सकती है।
लाखन सिंह जी से यह कहकर कि इतनी विस्तृत विधि नहीं दी गई है, और चूँकि वे पूछ रहे हैं तो जल्द ही उसे भी लेंगे, वक्ता अगले प्रश्न पर आते हैं। एक श्रोता पूछते हैं कि क्या पुराणोक्त रुद्राभिषेक स्तोत्र और पुराणोक्त पुरुष सूक्त से लघु रुद्र पूजा की जा सकती है, क्या यह केवल सावन सोमवार को की जा सकती है? वे उत्तर देते हैं कि हाँ, की जा सकती है।
यात्रा के दौरान पूजन का क्या करें?
नाम जप, और यात्रा में पूजा पर पहले से बना वीडियो
वक्ता कहते हैं कि जब यात्रा पर जाएँ, तो नाम जप आदि। और एक वीडियो है कि यात्रा पर जाते समय पूजन-पाठ आदि कैसे करना चाहिए — उसे सुनिए, उससे भी आपको बहुत मदद मिलेगी।
वक्ता कहते हैं कि जब हम यात्रा पर जाते हैं, तो नाम जप आदि। और एक वीडियो है, कि जब आप यात्रा पर जाएँ, तो पूजन-पाठ आदि कैसे करना चाहिए — उसे सुनिए। उससे भी आपको बहुत मदद मिलेगी।
इन मंत्रों की एक-एक माला का हवन जारी रखना चाहिए।
बहुत सुंदर — इसे जारी रखिए
एक श्रोता कहते हैं कि वे महाभैरव मंत्र, सुदर्शन मंत्र और संपूर्ण नृसिंह माला मंत्र की एक-एक माला का हवन करते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि बहुत सुंदर — इसे जारी रखिए।
एक श्रोता लिखते हैं कि मैं महाभैरव मंत्र, सुदर्शन मंत्र और संपूर्ण नृसिंह माला मंत्र की एक-एक माला का हवन करता हूँ। वक्ता उत्तर देते हैं कि तब तो बहुत सुंदर है। इसे जारी रखिए।
जिसे पाप लगने का डर है, उसे कहा गया कि जो पहले बताया गया है, वह शुरू करें।
पाप लगने का डर, और परेशानी कहाँ से आती है
एक श्रोता लिखते हैं कि वे बागेश्वर धाम से जुड़े हैं, पर हनुमान जी से लेकर सभी देवी-देवताओं के बारे में उन्हें गंदे विचार आते हैं, और उन्हें डर है कि कहीं पाप तो नहीं लग गया। वक्ता कहते हैं कि जो उन्हें पहले बताया गया है, वह करना शुरू करें, और कहते हैं कि जो विचार हमें इतना परेशान करते हैं, खासकर देवताओं के प्रति, उनके पीछे दो-तीन विशेष कारण होते हैं।
एक श्रोता लिखते हैं कि गुरु जी, धन्यवाद — मैं बागेश्वर धाम से जुड़ा हूँ, पर हनुमान जी से लेकर सभी देवी-देवताओं के बारे में गंदे विचार आते हैं, और मुझे डर है कि कहीं मुझे पाप तो नहीं लग गया। वक्ता उत्तर देते हैं कि प्रफुल्ल जी, जो आपको बताया गया है — एक बार वह करना शुरू कीजिए। जो विचार हमें इतना परेशान करते हैं, खासकर, जैसा आप कह रहे हैं, देवी-देवताओं के प्रति — इसके पीछे दो-तीन विशेष कारण होते हैं।
क्षीण या खराब स्थिति वाले चंद्र से, या अभिचार से मन दूषित होता है।
कमज़ोर चंद्र, या अभिचार और पैशाचिक शक्ति का प्रभाव
पहली बात यह कि हमारा मन दूषित होता है अगर कहीं चंद्र क्षीण हो, नीच राशि में हो, नीच भाव में हो, या ग्रहण दोष आदि बन रहा हो, या चलित कुंडली में कुछ हो। और अगर अभिचार आदि के कारण शरीर पर किसी पैशाचिक शक्ति का प्रभाव पड़ने लगा हो, तब भी ऐसी बातें होती हैं।
क्या देवताओं के बारे में अशुद्ध विचार स्थायी स्थिति है?
स्थायी नहीं — पर कुछ भी न करने से समस्या बन जाती है
वक्ता कहते हैं कि और यह हमेशा के लिए नहीं है, स्थायी नहीं है। पर अगर आप बिल्कुल कुछ नहीं करते, तो यह कठिनाई का कारण बन जाता है।
वक्ता कहते हैं कि और यह हमेशा के लिए नहीं है; यह स्थायी नहीं है। पर अगर आप बिल्कुल कुछ भी नहीं करते, तो यह परेशानी का कारण बन जाता है।
गृहस्थों के लिए कौन-सा काली सहस्रनाम सबसे उपयुक्त है?
दक्षिण काली सहस्रनाम
वक्ता कहते हैं कि गृहस्थ साधक के लिए, साधिकाओं के लिए दक्षिण काली सहस्रनाम सबसे उचित है।
वक्ता कहते हैं कि गृहस्थ साधकों के लिए, साधिकाओं के लिए दक्षिण काली सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। सबसे उचित है।
भैरव अनुष्ठान में क्या करना होता है?
बटुक भैरव के अनुष्ठान का प्रश्न, और पहले क्या आता है
पूछा गया कि भैरव अनुष्ठान में क्या करना होता है और बटुक भैरव जी के अनुष्ठान की विधि क्या है, तो वक्ता कहते हैं कि पहले, शुरुआत में, वही बातें करनी चाहिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि भैरव अनुष्ठान में क्या करना होता है — बटुक भैरव जी के अनुष्ठान की विधि बताइए। वक्ता उत्तर देते हैं कि पहले, शुरुआत में, वही बातें करनी चाहिए।
पार्थिव शिवलिंग की विधि ठीक से कैसे सीखें?
किसी ब्राह्मण को बुलाकर एक बार सामने सीखिए
वक्ता कहते हैं कि देखिए समीर जी, पार्थिव शिवलिंग की विधि उचित विधि-विधान से हो तो बेहतर है — उनमें प्राण प्रतिष्ठा कैसे होती है, फिर अभिषेक कैसे होता है, किन मंत्रों से वज्र आदि स्थापित होता है। किसी ब्राह्मण को बुलाकर एक बार सीख लीजिए।
वक्ता कहते हैं कि देखिए समीर जी — पार्थिव शिवलिंग की वह विधि भी अगर विधि-विधान से हो, तो बहुत बेहतर है। उनमें प्राण प्रतिष्ठा कैसे होती है, फिर अभिषेक कैसे होता है, किन मंत्रों से वज्र आदि स्थापित होता है — किसी ब्राह्मण को बुलाकर एक बार सीख लीजिए। सावन में या किसी भी दिन उन्हें बुलाइए; अच्छे से निवेदन करके उन्हें अपने घर बुलाइए और उनसे एक दिन का या पाँच दिन का पूजन करवाइए, या एक ही दिन में उनसे सीख लीजिए — कि बस एक बार हमें सिखा दीजिए। अगर आप निवेदन करेंगे, तो वे ज़रूर सिखाएँगे।
पार्थिव शिवलिंग की विधि सामने से क्यों सीखनी चाहिए?
एक बार सीखी, जीवन भर काम आती है
वक्ता कहते हैं कि अगर आप सीख लेंगे, तो यह जीवन भर आपके काम आएगी। ऐसे पूरा विधि-विधान करना असंभव नहीं होगा, पर किसी को बुलाकर एक बार सामने से सीख लें तो बहुत बेहतर है। वे कहेंगे: अगर पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजन करना ही है, तो सीखिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप सीख लेंगे, तो यह आपके जीवन भर काम आएगी। इस तरह पूरा विधि-विधान करना असंभव नहीं होगा; पर किसी को बुलाकर एक बार सामने से सीख लें, तो बहुत बेहतर है। हम यही कहेंगे: सीखिए। अगर पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजन करना ही है, तो सीखिए। और संकल्प बिल्कुल लिया जा सकता है; इसमें कोई दिक्कत नहीं। नया संकल्प लेने में भी कोई परेशानी नहीं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।