गुरु पूर्णिमा का तंत्रोक्त गुरु पूजन — गुरु मंत्र के षोडशोपचार पूजन सहित
गुरु तत्व के पूजन के लिए गुरु पूर्णिमा की विधि।
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गुरु वालों और बिना गुरु वालों — दोनों के लिए गुरु पूर्णिमा पूजन
गुरु पूर्णिमा का पूजन उनके लिए है जिनके गुरु हैं, जिनके नहीं हैं, या दोनों के लिए?
दोनों के लिए। जो दीक्षित हैं वे अपने गुरु के पास जाकर उनका पूजन करेंगे। जिन्होंने देव दीक्षा विधान किया है और जिनके गुरु नहीं हैं — प्रश्न यही है कि वे गुरु तत्व के निमित्त किस प्रकार पूजन करें।
वक्ता सत्र का विषय बताते हैं: आगामी गुरु पूर्णिमा, और एक व्यक्ति अपने गुरु जी से संबंधित पूजन किस प्रकार करे। विशेष करके जो लोग दीक्षित हैं, वे तो अपने गुरु के पास जाएंगे और वहीं उनका पूजन आदि करेंगे। और जो लोग देव दीक्षा विधान आदि करते हैं और जिनके गुरु नहीं हैं — वे गुरु तत्व के निमित्त किस प्रकार से पूजन करेंगे।
सहस्रार में सद्गुरु और गुरु मंडल का निवास
गुरु तत्व इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
क्योंकि यह अति आवश्यक और महत्वपूर्ण समय है — सबसे प्रथम गुरु ही होते हैं। हमारे सहस्रार चक्र के स्थान पर हमारे सद्गुरुदेव और गुरु मंडल का निवास होता है। अगर गुरु तत्व की कृपा नहीं मिलती तो किसी भी साधना में कभी पूर्ण सफलता नहीं मिल सकती।
वक्ता कहते हैं कि यह अति आवश्यक और महत्वपूर्ण समय है, क्योंकि सबसे प्रथम जो होते हैं वे गुरु होते हैं। और हमारा जो सहस्रार चक्र है, उस स्थान पर हमारे सद्गुरुदेव और गुरु मंडल का निवास होता है। अगर उनकी कृपा नहीं मिलती — अगर गुरु तत्व की कृपा हमें प्राप्त नहीं होती — तो किसी भी साधना में कभी भी पूर्ण रूप से सफलता नहीं मिल सकती। इसलिए गुरु तत्व की कृपा और गुरु मंडल की कृपा के लिए गुरु पूजन हमारे लिए अति अनिवार्य है। और विशेष करके गुरु पूर्णिमा के दिन तो अवश्य ही करना चाहिए।
इस जन्म में भौतिक गुरु न होने का अर्थ पूर्व जन्मों में गुरु न होना नहीं
अगर इस जन्म में गुरु नहीं मिले तो?
इस जन्म में भौतिक गुरु की प्राप्ति न होने का यह अर्थ कहीं से नहीं निकलता कि पूर्व जन्मों में हमारे गुरु नहीं होंगे। यह सदैव स्मरण रखिए — और निश्चिंत होकर अपने गुरु से संबंधित विषय को पूर्ण कीजिए।
दूसरा विषय, वक्ता कहते हैं, यह है: जिस प्रकार हमारा यह जन्म है, अगर इस जन्म में हमें भौतिक गुरु की प्राप्ति नहीं हुई है, तो इसका यह अर्थ कहीं भी नहीं निकलता कि हमारे पूर्व जन्म में गुरु नहीं होंगे। यह सदैव स्मरण रखिएगा। इसलिए निश्चिंत होकर अपने गुरु से संबंधित जो विषय है, उसे पूर्ण करना चाहिए।
गुरु, परम गुरु और परमेष्ठी गुरु — तीन कुल
गुरु मंडल की कितनी पीढ़ियां जाननी चाहिए?
तीन, जैसे अपने कुल में पिता, दादा, परदादा। गुरु मंडल में भी: गुरु, गुरु के गुरु, और उनसे ऊपर के गुरु। यही गुरु, परम गुरु और परमेष्ठी गुरु हैं। तभी जाकर तंत्रोक्त मंडल में गुरु मंडल का पूजन कर पाएंगे, जिसमें तीन मंडल का तर्पण आवश्यक होता है।
जिनके अपने गुरु हैं, उनके लिए वक्ता कहते हैं: अगर आपको अपनी गुरु परंपरा का ज्ञान है और उसमें पूजन आदि का विधान बताया गया है, तो उसी प्रकार उनका पूजन करें। गुरु मंडल के बारे में: जैसे हमें अपने पिताजी, दादाजी, परदादाजी — कम से कम तीन कुल जानना आवश्यक होता है, उसी प्रकार गुरु मंडल में भी, जब हम अपने भौतिक गुरु का पूजन करते हैं, तो गुरु, गुरु जी के गुरु जी, और उनसे ऊपर के गुरु जी। यानी तीन कुल जानना चाहिए। तो इसमें गुरु हो गए, परम गुरु हो गए और परमेष्ठी गुरु हो गए। जो भी दीक्षित हैं, इतना कम से कम अवश्य जानना चाहिए। और तभी जाकर आप तंत्रोक्त मंडल में गुरु मंडल का पूजन कर पाएंगे, जिसमें तीन मंडल का तर्पण आवश्यक होता है। वैसे तो, वे जोड़ते हैं, दिव्य गुरु, मानव गुरु और अपने स्वयं के गुरु का कुल — इनके अनुसार पूजन विधान अलग-अलग हो जाता है।
भगवान शिव, भगवान दत्त, या अपने पंथ का गुरु तत्व धारण करने वाला स्वरूप
सामान्य जन गुरु पूर्णिमा पर किस गुरु स्वरूप का पूजन करें?
या तो भगवान शिव को या भगवान दत्त को, या आप जिस भी पंथ-परंपरा को मानते हैं — वैष्णव, शैव आदि — उससे संबंधित गुरु तत्व को धारण करने वाली कोई शक्ति या महाशक्ति। वक्ता का अपना कहना है कि भगवान दत्त का पूजन अवश्य करें, क्योंकि हर गुरु मंडल में उनकी उपस्थिति है।
सामान्य जन को कम से कम इतना अवश्य करना चाहिए, वक्ता कहते हैं: जब हम गुरु पूर्णिमा के दिन विशेष करके पूजन करें, तो उस दिन या तो भगवान शिव का या भगवान दत्त का — या आप जिस भी पंथ या परंपरा को मानते हैं, वैष्णव, शैव आदि, उससे संबंधित गुरु तत्व को धारण करने वाली किसी शक्ति या महाशक्ति का पूजन अवश्य करें। इसमें सबसे पहला विधान वे यही बताते हैं कि भगवान दत्त की सेवा-पूजा अवश्य करिए। कारण: हर गुरु मंडल में उनकी उपस्थिति है — और आप चाहे किसी भी पंथ, परंपरा, संप्रदाय में आगे जाकर दीक्षित हों, उसमें इनका स्थान अवश्य रहेगा ही रहेगा।
उस दिन घर पर देव दीक्षा विधान कर लें
जिसके गुरु नहीं हैं, वह गुरु पूर्णिमा के दिन क्या करे?
जिन्होंने गुरु दीक्षा विधान या देव दीक्षा विधान नहीं किया है, वे गुरु पूर्णिमा के दिन अपने घर पर आराम से देव दीक्षा विधान कर लें। जो कर चुके हैं, उनका कर्तव्य है उस दिन अपने गुरु के स्थान पर जाना — न जा पाएं तो अपने निज स्थान पर उनका मानसिक आवाहन करें।
जो लोग गुरु दीक्षा विधान नहीं किए हुए हैं, देव दीक्षा विधान नहीं किए हैं, वक्ता कहते हैं, वे भी चाहें तो इस गुरु पूर्णिमा के दिन — जो 21 तारीख को है — देव दीक्षा विधान अपने घर पर आराम से कर लें। और जो लोग देव दीक्षा विधान कर चुके हैं, उनका यह कर्तव्य बनता है, हम सभी का कर्तव्य है, कि हमारे जो भी गुरु हैं, उस दिन उनके स्थान पर जाएं। अगर किसी कारणवश नहीं जा पाते हैं, तो अपने ही निज स्थान पर उनका मानसिक रूप से आवाहन करके यथाशक्ति, यथा सामर्थ्य उनका पंचोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार — या यथा विधि, यथाशक्ति — पूजन करें।
पादुका, श्री विग्रह, या छायाचित्र के सामने सुपारी
गुरु पूजन किस पर किया जाए?
अगर अपने सद्गुरुदेव की पादुका, या उनका श्री विग्रह, या छायाचित्र स्थापित है, तो उसी पर पूर्ण पूजन करें। छायाचित्र है तो उस पर अभिषेक आदि नहीं होगा — इसलिए उनके सामने एक सुपारी स्थापित करके उस पर कर सकते हैं, या पुष्प पर।
सबसे पहले, वक्ता कहते हैं, अगर आप अपने सद्गुरुदेव महाराज की पादुका स्थापित किए हैं, या उनका श्री विग्रह स्थापित है, या उनका छायाचित्र स्थापित है, तो उन्हीं पर आपको पूर्ण पूजन करना है। छायाचित्र है तो अभिषेक आदि उस पर तो नहीं होगा — तो उनके सामने एक सुपारी स्थापित करके उस पर कर सकते हैं; पुष्प पर भी कर सकते हैं।
सावन अगले दिन से — तैयारी गुरु पूर्णिमा से
गुरु पूर्णिमा से अगले दिन सावन आरंभ होता है, और सावन की साधनाओं की तैयारी यहीं से शुरू होती है
गुरु पूर्णिमा के अगले दिन से सावन आरंभ हो रहा है, और चैनल पर पहले से दी गई कम से कम तीन सावन की साधनाएं विधिवत क्रम से दी जाएंगी। लेकिन इसका आरंभ गुरु पूर्णिमा से ही होगा — प्रथम पूजन अपने गुरु जी का कर लेना है।
वक्ता बताते हैं कि यह दिन आगे के लिए क्यों महत्वपूर्ण है: गुरु पूर्णिमा के अगले दिन से सावन आरंभ होने वाला है — और सावन की कम से कम तीन साधनाएं जो पहले से चैनल पर दी हुई हैं, उन्हें एकदम विधिवत, क्रमगत करके दिया जाएगा। भगवान शिव, भगवती या भैरव जी — इन्हीं तीन स्वरूपों पर वे अधिक फोकस रखते हैं, ताकि इनसे संबंधित स्वरूपों की कृपा प्राप्त हो। यह सावन खाली नहीं जाएगा, वे कहते हैं; बहुत विशेष तैयारी हो रही है। आपको ही करना है, वे जोड़ते हैं; हम कोई अनुष्ठान आदि नहीं करवा रहे हैं। आपको ही करना है, आपको केवल विधिवत पूरी जानकारी दी जाएगी। लेकिन इसका जो आरंभ है, वह गुरु पूर्णिमा से ही होगा। प्रथम पूजन हमको अपने गुरु जी का कर लेना है।
पीले अक्षत की ढेरी पर बड़ी सुपारी, गुरु मां के लिए लाल ढेरी
अगर कोई विग्रह या छायाचित्र ही न हो तो?
तो उस दिन चावल की ढेरी पर पीला अक्षत कर लीजिए — चावल को पीला कर लीजिए — और उसके ऊपर बड़ी वाली सुपारी स्थापित कीजिए। अगर परंपरागत रूप से गुरु जी के साथ उनकी शक्ति यानी गुरु मां हैं, तो दो ढेरी पर दो सुपारी स्थापित करें, दूसरी ढेरी लाल अक्षत की।
मान लीजिए आपके पास कोई विग्रह नहीं है, छायाचित्र नहीं है, कुछ नहीं है, वक्ता कहते हैं, और आप केवल मानसिक रूप से अपने गुरु जी का स्मरण-पूजन करते हैं, मंत्र आदि का जप करते हैं — तो भी उस दिन चावल की ढेरी पर पीला अक्षत कर लीजिए: चावल को पीला कर लीजिए और उसके ऊपर बड़ी वाली जो सुपारी आती है, वह स्थापित कीजिए। अगर परंपरागत रूप से आपके गुरु जी के साथ उनकी शक्ति हैं — यानी गुरु मां हैं — तो दो ढेरी पर दो सुपारी स्थापित कीजिए। चावल की दूसरी ढेरी, अगर गुरु मां भी हैं, लाल अक्षत की होगी; लाल हो तो अति उत्तम रहेगा।
पीले पर गुरु, लाल पर गुरु मां — भगवान दत्त के साथ अनघा लक्ष्मी
गुरु जी पीली ढेरी पर, गुरु मां लाल पर — दत्त के लिए अनघा लक्ष्मी
पीली ढेरी पर गुरु जी और लाल ढेरी पर गुरु मां। जिन्होंने भगवान दत्त का देव दीक्षा विधान किया है, उनके लिए पीली ढेरी पर बड़ी सुपारी और पीला कलावा भगवान दत्त गुरु के निमित्त, और उसके बाईं ओर लाल ढेरी पर लाल कलावे वाली सुपारी गुरु मां भगवती अनघा लक्ष्मी के निमित्त।
पीले वाले पर गुरु जी रहेंगे, वक्ता कहते हैं, और लाल वाली ढेरी पर गुरु मां। अगर आप भगवान दत्त का देव दीक्षा विधान किए हैं और आपके पास छायाचित्र है, तो उनके निमित्त भी इसी प्रकार चावल की पीली ढेरी, जिसके ऊपर बड़ी सुपारी रखेंगे और उस पर कलावा लपेटेंगे — वह गुरु जी के, भगवान दत्त के निमित्त हो जाएगा। और उनके बाईं ओर लाल अक्षत की ढेरी, जिसके ऊपर दूसरी सुपारी और लाल कलावा रहेगा — वह गुरु मां, मां भगवती अनघा लक्ष्मी के निमित्त रहेगा। इस तरीके से, वे कहते हैं, अपने-अपने गुरु जी और उनकी शक्ति की स्थापना करें। यह सबसे पहले।
आचमन, हस्त प्रक्षालन और पवित्री धारण
पूजन आरंभ होने से पहले के प्रारंभिक कार्य क्या हैं?
स्थान दे देने के बाद पूजन का पहला कार्य आवाहन है। उससे पहले: दो लोटा और आचमनी रखें, गंगा-यमुना-सरस्वती मंत्र से जल अभिमंत्रित करके आचमन करें; फिर हस्त प्रक्षालन; फिर पवित्री यानी कुशा की अंगूठी धारण करें।
अभी तो हमने केवल रखा है, वक्ता कहते हैं; अब पूजन की विधि शुरू होगी, और स्थान दे देने के बाद सबसे प्रथम कार्य आवाहन का होता है। पूरी बेसिक विधि चैनल पर पहले से लाइव दिखाई हुई है: सबसे पहले जल को अभिमंत्रित करना है। दो लोटा और आचमनी रखें। गंगा, यमुना, सरस्वती आदि मंत्र से जल अभिमंत्रित करके पहले आचमन कर लें। आचमन के बाद हस्त प्रक्षालन; और उसके बाद पवित्री — कुशा की अंगूठी — धारण करना दूसरा विषय हो गया।
आसन के नीचे पुष्प, त्रिकोण, जल और पृथ्वी देवी का मंत्र
आसन शुद्धिकरण कैसे होता है, और यह क्यों आवश्यक है?
आसन के नीचे पुष्प रखना, त्रिकोण बनाना, जल डालना और पृथ्वी देवी के मंत्र का उच्चारण — यानी पृथ्वी स्वरूपा भगवती जगदंबा को नमस्कार, ताकि आसन सुरक्षित हो और उस पर बैठकर किया गया कर्म सिद्ध हो। अगर आसन को सम्मान नहीं देते, तो कोई सिद्धि मिलने वाली नहीं है।
पवित्री धारण करने के बाद, वक्ता कहते हैं, आसन शुद्धिकरण का मंत्र आदि का जो विधान है, वह करेंगे। आसन के नीचे पुष्प रखना, त्रिकोण बनाना, जल डालना, पृथ्वी देवी के मंत्र का उच्चारण करना — यानी हम अपने आसन को शुद्ध, पवित्र करते हैं और पृथ्वी स्वरूपा भगवती जगदंबा को नमस्कार करते हैं, ताकि हमारा आसन सुरक्षित हो जाए और उस आसन पर बैठकर हम जो भी कर्म करें, वह सिद्ध हो। अगर हम अपने आसन को सम्मान नहीं देते, तो ध्यान रखिएगा, कोई सिद्धि मिलने वाली नहीं है। बहुत सारे लोग, वे कहते हैं, आसन को कभी सम्मान नहीं देंगे — लात मारकर इधर फेंकेंगे, उधर फेंकेंगे।
दूसरे के आसन पर कभी न बैठें, अपनी पवित्री किसी को न दें
क्या आसन, पवित्री या आचमन पात्र किसी और के साथ साझा किया जा सकता है?
नहीं। जब आप किसी मंत्र का अनुष्ठान या पुरश्चरण कर रहे हैं, तो आपके आसन पर कभी कोई दूसरा न बैठे, न आप किसी अन्य के आसन पर बैठें — यह नहीं देखना है कि वह ब्राह्मण है, गुरु जी हैं, विद्वान हैं या ऊंच-नीच कुल के। और पवित्री का कभी अदला-बदली नहीं होता।
आसन, पवित्री और पात्र — अपने आराध्य के पार्षद
आसन, पवित्री और आचमन पात्र को इतना सम्मान क्यों देना चाहिए?
क्योंकि ये सभी चीज़ें — आचमन का पात्र, पवित्री, अपना आसन — जिनकी हम साधना कर रहे हैं उन आराध्य के पार्षद मानी गई हैं। यह सम्मान हमारे लिए नहीं है: जिस शक्ति को हम अपने शरीर में आवाहित कर रहे हैं, जो अपनी ऊर्जा हम पर प्रक्षेपित करेंगी और हमारे आभामंडल में उपस्थित होंगी, यह उनके सम्मान के निमित्त है।
ऐसा माना गया है, वक्ता कहते हैं, कि ये सभी चीज़ें — चाहे आचमन का पात्र हो, पवित्री हो, अपना आसन हो — अपने आराध्य के, जिनकी हम साधना कर रहे हैं, जिनकी पूजा कर रहे हैं, उनके पार्षद होते हैं। जब हम उन्हें अपने लिए प्रयोग कर रहे होते हैं और हमारे शरीर में हमारे आराध्य से संबंधित तत्व उपस्थित होते हैं, तो यह उनके सम्मान के निमित्त है। यह ध्यान रखिएगा, वे कहते हैं: यह केवल हमारे लिए नहीं है। हम सम्मान किसका कर रहे हैं? हम अपना सम्मान करें न करें, लेकिन जिस शक्ति को हम अपने शरीर में आवाहित कर रहे हैं, जिनका सम्मान कर रहे हैं, जिनका मंत्र जप कर रहे हैं — वह शक्ति जब अपनी ऊर्जा हमारे शरीर पर प्रक्षेपित करेंगी, हमारे आभामंडल में उपस्थित होंगी, तो उनका सम्मान होना चाहिए। उनका अपमान न हो, इसलिए यह सारा विषय है। अगर आप इन विषयों का ध्यान नहीं रखते, तो कहीं न कहीं आप अपराध कर रहे हैं। अपने आराध्य के प्रति आप अपराधी बन रहे हैं।
नियम से चलने को कहना प्रताड़ना लगता है
ब्रह्मचर्य पालन और आसन-पवित्री का ध्यान रखने को कहना ही लोग प्रताड़ना कहते हैं
वक्ता शिकायत को सीधे उठाते हैं कि वे बहुत प्रताड़ित करते हैं। प्रताड़ना का अर्थ लोगों ने यह समझा है कि हम नियम से चलने को कहते हैं — ब्रह्मचर्य पालन करो, आसन का ध्यान रखो, पवित्री का ध्यान रखो। अगर हम कह देते जैसे थे वैसे रहो, खाओ-पियो, ऐश करो, तो वह उचित रहता।
एक कमेंट आया कि यह व्यक्ति बहुत प्रताड़ित करता है। प्रताड़ना का अर्थ उन्होंने क्या समझा है, वे पूछते हैं: कि हम नियम से चलने के लिए कहते हैं। इसलिए उन्हें लगता है कि हम प्रताड़ित कर रहे हैं। हम कहते हैं भैया ब्रह्मचर्य पालन करो — तो हम प्रताड़ित कर रहे हैं। आसन का ध्यान रखो — तो प्रताड़ना है। पवित्री का ध्यान रखो — तो प्रताड़ना हो गया। अगर हम यही बोल देते कि जैसे थे वैसे रहो, जो भी खाओ-पियो, आनंद लो, ऐश करो, घूमो-फिरो — तो वह उचित रहता। तो जब नियम से, डिसिप्लिन से चलने को कहा जाता है — कि अनुशासन में रहकर जब साधना-अनुष्ठान करेंगे तभी फलीभूत होगी — तो वह प्रताड़ना लगने लगती है। और जब प्रताड़ना होगी तो फल भी वैसा ही मिलेगा; फिर ढपली बजाते रहिए कि कुछ नहीं हुआ, कोई परिणाम नहीं मिला, कुछ नहीं होता। इसी कारण से नहीं होता है — इन सभी बातों का ध्यान न रखने के कारण ही नहीं होता।
शिखा बंधन और स्वस्तिवाचन
पवित्री के बाद शिखा बंधन और स्वस्तिवाचन — कम से कम मंगलम भगवान विष्णु
शिखा बंधन; उसके बाद पहले स्वस्तिवाचन। स्वस्तिवाचन में बहुत विशेष मंत्र नहीं आता — कम से कम मंगलम भगवान विष्णु कर लीजिए, जो सबको आता होगा और सभी कर सकते हैं। मंगलम भगवान महादेव का भी मंत्र है।
इसके बाद अगला विषय शिखा बंधन का है, वक्ता कहते हैं। शिखा बंधन आदि कर लिए, तत्पश्चात प्रथम स्वस्तिवाचन करते हैं। स्वस्तिवाचन में बहुत विशेष मंत्र नहीं आता; कम से कम इतना ज़रूर कर लीजिए — मंगलम भगवान विष्णु। यह मंत्र सभी को आता होगा और सभी कर सकते हैं। कम से कम सभी पुरुष भगवान नारायण के इन मंत्रों का स्मरण कर लें, कि हर चीज़ मंगल हो जाए: मंगलम भगवान विष्णु, मंगलम गरुड़ध्वज पढ़ लीजिए। इससे संबंधित भगवान महादेव का भी मंगलम मंत्र है — मंगलम वृषभध्वज आदि; जो करना चाहें, वह भी कर सकते हैं।
संस्कृत या हिंदी में, हाथ में अक्षत, जल और पुष्प लेकर
संकल्प कैसे लिया जाता है?
संकल्प अवश्य लें। संस्कृत क्लिष्ट लग रही है और आप नए हैं तो हिंदी में लें। हाथ में अक्षत, जल, पुष्प रखें। गुरु पूर्णिमा के लिए बोलें: हमारे सद्गुरुदेव महाराज और गुरु मंडल की कृपा हमें प्राप्त हो, गुरुदेव प्रसन्न हों — इस निमित्त यथाशक्ति, यथा बुद्धि उनका पूजन करने का संकल्प ले रहे हैं।
उसके बाद संकल्प अवश्य लें, वक्ता कहते हैं। संस्कृत में संकल्प की विधि चैनल पर नित्य कर्म पूजा वाले में मिल जाएगी — कैसे लेना है, अपना नाम-गोत्र का उच्चारण करके। अगर आपको संस्कृत में संकल्प लेना क्लिष्ट लग रहा है, आप बिल्कुल नए हैं, तो हिंदी में संकल्प लीजिए। संकल्प के लिए हाथ में अक्षत, जल, पुष्प आदि रख लीजिए और फिर संकल्प लीजिए। गुरु पूर्णिमा के दिन का संकल्प है, तो उस दिन का यह बोलकर कि हमारे सद्गुरुदेव महाराज, गुरु मंडल की कृपा हमें प्राप्त हो, गुरुदेव प्रसन्न हों — इस निमित्त यथाशक्ति, यथा बुद्धि अपने सद्गुरुदेव महाराज का, अपने पूर्ण गुरु मंडल का यथा सामर्थ्य पूजन करने का संकल्प ले रहे हैं। पूर्ण संस्कृत में लें तो: श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त, तंत्रोक्त, वेदोक्त फल प्राप्त्यर्थम् गुरु मंडल पूजनम् — इस प्रकार ले सकते हैं। उतना नहीं तो सामान्य हिंदी में ले लीजिए।
गुरु का स्मरण, फिर पहले गौरी-गणपति का पूजन
पहले पूजन किसका — गुरु का या गणपति का?
उस समय गुरु का केवल स्मरण करें — एक बार, गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरुदेवो महेश्वरः से। फिर गणपति जी का पूजन करें। क्योंकि उस दिन गुरु मंडल और गुरुदेव प्रमुख देवता हैं, और प्रमुख देवता का पूरा पूजन सबसे पहले नहीं किया जा सकता।
संकल्प के बाद, वक्ता कहते हैं, क्योंकि इसके बाद प्रथम पूजन गुरुदेव का होता है, तो गुरुदेव का स्मरण करिए — उस समय केवल स्मरण। अपने सद्गुरुदेव महाराज का एक बार स्मरण कर लिया, गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरुदेवो महेश्वरः आदि मंत्र से — और उसके बाद पहले गणपति जी का पूजन कीजिए। कारण: उस दिन हमारे गुरु मंडल और भगवान गुरुदेव प्रमुख देवता हैं। और प्रमुख देवता का पूरा का पूरा पूजन सबसे पहले नहीं कर सकते। सबसे पहले उनका स्मरण ज़रूर करेंगे, क्योंकि गुरु जी का स्थान सबसे पहले है। पूजन गणपति जी का करेंगे। गौरी-गणपति का पूजन सबसे पहले होगा।
देव दीक्षा न कर रहे हों तो कलश नहीं; पहले से दो दीप
क्या गुरु पूर्णिमा पर कलश स्थापना आवश्यक है?
बिल्कुल अनिवार्य नहीं, अगर उस दिन देव दीक्षा विधान नहीं कर रहे हैं। सामान्य कीजिए, बहुत क्लिष्ट मत कीजिए — क्लिष्टता से लोग भागने लगते हैं। हां, दीप प्रज्वलन पहले ही कर लेना है — कम से कम दो दीप, एक समस्त देवी-देवताओं के लिए और एक घी का गुरु मंडल के लिए।
यहां एक विषय और आता है, वक्ता कहते हैं: क्या हमें कलश स्थापना करने की आवश्यकता है। ऐसा ज़रूरी नहीं है। अगर आप देव दीक्षा विधान नहीं कर रहे हैं, तो उस दिन कलश स्थापना की अनिवार्यता बिल्कुल नहीं है। सामान्य कीजिए, बहुत ज़्यादा क्लिष्ट मत कीजिए, क्योंकि क्लिष्टता से लोग भागने लगते हैं। अगर आपके गुरुदेव हैं तो आपकी गुरु परंपरा में जैसा विषय है, उसके अनुसार कीजिए। नहीं तो सामान्य रूप से। हां, दीप प्रज्वलन पहले ही कर लेना है। जब आसन पर बैठें, उससे पहले ही दीप प्रज्वलित कर लें — कर्म साक्षी दीप। कम से कम दो दीप अवश्य प्रज्वलित करें: एक समस्त देवी-देवताओं के लिए, और एक घी का दीप हमारे गुरु मंडल के लिए, पहले से ही।
गुरु पूर्णिमा पर पंचोपचार और संकट नाशन स्तोत्र
गुरु पूर्णिमा पर गणपति पूजन कितना करें?
घर में गणेश जी का जो श्री विग्रह पहले से है, उसी पर कर लें। ज़्यादा नहीं तो पंचोपचार पूजन — आवाहन, आसन, अर्घ आदि देकर नैवेद्य, धूप, दीप दिखा दें। फिर संकट नाशन गणपति स्तोत्र का पाठ, जिसमें उनके 12 नाम हैं। इतना पर्याप्त है।
अब हम गणपति जी और गौरी जी का स्मरण करेंगे, वक्ता कहते हैं। घर में गणेश जी का जो भी श्री विग्रह पहले से रखा है, उसी पर पूजन कर लीजिए। ज़्यादा नहीं तो पंचोपचार पूजन कर लीजिए। पंचोपचार में आवाहन, आसन, अर्घ आदि देकर नैवेद्य, धूप, दीप आदि उन्हें दिखा दीजिए। यह आरंभिक पूजन हो गया। उसके बाद संकट नाशन गणपति स्तोत्र, जिसमें गणेश जी के 12 नामों का विषय रखा गया है — उनके 12 नाम कहे गए हैं — उसका पाठ कर लीजिए। गणपति पूजन संक्षिप्त रूप से इतना कर लीजिए।
कम से कम दशोपचार, वृहद विधि से षोडशोपचार
गुरु जी का स्वयं कितना पूजन होता है?
कम से कम दशोपचार पूजन; और वृहद विधि से करना चाहें तो षोडशोपचार। पूर्ण विधि नित्य कर्म पूजा प्रकाश में मिल जाएगी। मंत्र नहीं आता या उच्चारण क्लिष्ट लगे तो भाव पूर्वक भी कर सकते हैं — श्री गुरुदेवाय गुरु मंडल सहिताय नमः से।
अब गुरु जी का पूजन आरंभ कीजिए, वक्ता कहते हैं। जब आरंभ करेंगे तो इसमें कम से कम दशोपचार पूजन तो ज़रूर करें — और अगर वृहद विधि से करना चाहें तो षोडशोपचार पूजन करें। नित्य कर्म पूजा प्रकाश आदि जो ग्रंथ हैं, उनमें पूर्ण विधि मिल जाएगी। मंत्र नहीं आता है या उच्चारण क्लिष्ट लग रहा है, तो कोई दिक्कत नहीं: इनकी पूजा भाव पूर्वक भी कर सकते हैं। श्री गुरुदेवाय गुरु मात्र सहिताय, या श्री गुरुदेवाय गुरु मंडल सहिताय नमः आदि मंत्र से भी उनका पूजन कर सकते हैं।
पुष्प से आवाहन, फिर आसन, पाद्य, मधुपर्क, स्नान और वस्त्र
गुरु जी के षोडशोपचार का क्रम क्या है?
हाथ में पुष्प लेकर गुरुदेव और गुरु मां का ध्यान करके दोनों सुपारी के सामने एक-एक पुष्प छोड़ें, इस भाव से कि वे आ चुके हैं। फिर आसन; फिर पाद्य, चरण धुलाने के लिए जल; मधुपर्क; फिर आचमन, स्नान, और वस्त्र-यज्ञोपवीत — और सामर्थ्य हो तो दोनों को वस्त्र अवश्य अर्पित करें।
षोडशोपचार में, वक्ता कहते हैं, सबसे पहले आवाहन करते हैं। आवाहन के लिए हाथ में पुष्प लेकर गुरुदेव और गुरु मां का ध्यान करके एक-एक पुष्प दोनों सुपारी के सामने छोड़ेंगे और यह भाव करेंगे कि हमारे गुरुदेव और गुरु मां आ चुके हैं। उसके बाद आसन देंगे। आसन के बाद पाद्य — यानी उनके चरण धुलाने के लिए जल। मधुपर्क दिया जाता है। उसके बाद जब वे आसन पर बैठ जाएंगे, तब आचमन आदि करा के, स्नान आदि करा के, वस्त्र, यज्ञोपवीत — वस्त्र, उपवस्त्र आदि गुरु जी को देना। यह पूरा क्रम लेकर चलेंगे: नैवेद्य आदि अर्पण करके धूप, दीप, पुष्प, माला, गंध, अक्षत आदि सब पूरे विधि-विधान से समर्पित करेंगे। अगर आर्थिक रूप से सामर्थ्य हो, तो उस दिन अपने गुरु जी और गुरु मां को वस्त्र अवश्य अर्पित करने का प्रयास करें: पीला वस्त्र, पीली धोती, पीला गमछा; और गुरु मां को पीली साड़ी या लाल साड़ी, उसमें सुहाग की समस्त सामग्री — चूड़ी, बिंदी, सिंदूर — रखकर गुरुदेव और गुरु मां को सब समर्पित करें। उसके बाद चाहें तो वह सारी सामग्री, अगर आपके गुरु जी हैं तो उन्हें दे दें, या आसपास कोई गुरु तुल्य व्यक्ति हों जिन्हें आप मानते हों उन्हें दें, या किसी विद्वान ब्राह्मण को जो सही प्रकार से पूजन-पाठ करते-कराते हों।
किसी भी षोडशोपचार पूजन में दक्षिणा अनिवार्य
क्या दक्षिणा अनिवार्य है?
हां। गुरुदेव और गुरु मां को दक्षिणा अवश्य चढ़ानी चाहिए — किसी भी देवी-देवता के पूजन में, षोडशोपचार पूजन के समय दक्षिणा अनिवार्य रूप से होती है।
दक्षिणा, वक्ता कहते हैं, गुरुदेव और गुरु मां को अवश्य चढ़ानी चाहिए। किसी भी देवी-देवता के पूजन में, षोडशोपचार पूजन आदि के समय, दक्षिणा अनिवार्य रूप से आवश्यक है। तो यह, वे कहते हैं, सामान्य रूप से षोडशोपचार पूजन हो गया।
गुरु मंत्र का ही पूजन — कभी उच्चारण नहीं
तंत्रोक्त विधि का प्रमुख विषय है स्वयं अपने गुरु मंत्र का पूजन — जो कभी बोलकर नहीं कहा जाता
अपने मंत्र का पूजन। दीक्षा में गुरु जी से जो भी मंत्र लिया हो, या देव दीक्षा विधान में जो एकाक्षरी जीवन पर्यंत गुरु मंत्र के स्वरूप में स्वीकार की हो — उस मंत्र का वहां पूजन होगा। यही सबसे प्रमुख पूजन है। और गुरु मंत्र एक बार प्राप्त होने के बाद कभी बोलकर उच्चारित नहीं किया जाता, भौतिक गुरु के समक्ष भी नहीं।
अब ध्यान दीजिए, वक्ता कहते हैं: यह तंत्रोक्त विधि का प्रमुख विषय है। आपने दीक्षा में गुरु जी से जो भी मंत्र लिया हो, या देव दीक्षा विधान में एकाक्षरी का जो विषय लिया है — कि हम इसे जीवन पर्यंत गुरु मंत्र के स्वरूप में स्वीकार करते हैं — तब उस मंत्र का वहां पूजन होगा। यह सबसे प्रमुख पूजन है। और गुरु मंत्र के बारे में कहा गया है कि एक बार प्राप्त कर लेने के बाद, अगर भौतिक रूप से गुरु हैं तो उनके समक्ष भी उस मंत्र का उच्चारण नहीं किया जाता। ध्यान रखिएगा।
स्तोत्र बोलकर पढ़ें, संपुट मौन रहकर मन में
स्तोत्र पाठ करते समय संपुट बोलकर लगाना चाहिए?
उस स्थिति में भी संपुट कभी उच्चारण करके नहीं लगाना है। आपको दुनिया को थोड़ी दिखाना है। मूल स्तोत्र का पाठ कीजिए; जहां एकाक्षरी का संपुट लगाना है, वहां मौन होकर मन में ही उसका उच्चारण कर लीजिए।
उस मंत्र को कभी बोलकर नहीं बोलना है, वक्ता कहते हैं — तब भी नहीं जब किसी स्तोत्र, स्तुति आदि का पाठ कर रहे हों, जैसे उन्होंने संपुट की विधि बताई है कि एकाक्षरी का संपुट लगाकर कवच का पाठ करने से अमुक प्रभाव प्राप्त होता है। ऐसी कंडीशन में भी कभी उच्चारण करके संपुट नहीं करना है। आपको दुनिया को थोड़ी दिखाना है। मूल स्तोत्र का पाठ कीजिए; और जहां एकाक्षरी का संपुट लगाना है, वहां मौन होकर मन में ही उसका उच्चारण कर लीजिए। यह ध्यान रखिएगा।
परंपरा का अपना मंत्र, उसमें दीक्षित सभी का एक ही
गुरु मंत्र वास्तव में क्या होता है?
हर कुल — श्री कुल, काली कुल, कोई भी — का अपना गुरु मंत्र होता है: वह मंत्र जिसका, जब से वह गुरु परंपरा चली, उस परंपरा में गुरु स्वरूप में वर्चस्व रहा है। उसमें उस गुरु मंडल की संपूर्ण कृपा होती है, और उस परंपरा में दीक्षित सभी का गुरु मंत्र एक ही होता है।
यह तंत्रोक्त विधि सभी की है, वक्ता कहते हैं। जो गुरु परंपराएं विशेष करके तांत्रिक पद्धति से चलती हैं — चाहे श्री कुल हो, काली कुल हो — हर कुल का अपना एक गुरु मंत्र होता है। गुरु मंत्र का अर्थ: वह मंत्र, जब से वह गुरु परंपरा चली, उस परंपरा में जिसका वर्चस्व गुरु स्वरूप में रहा है। उस मंत्र में उस गुरु मंडल की संपूर्ण कृपा होती है; और उस गुरु परंपरा में जितने भी लोग दीक्षित हैं, उन सभी का गुरु मंत्र एक ही होगा। वही गुरु मंत्र होता है। ऐसा नहीं, वे कहते हैं, कि हमें काली जी का जो मंत्र मिला वह गुरु मंत्र है, या दुर्गा जी का, श्री विद्या का मंत्र मिला तो वही गुरु मंत्र है। गुरु मंत्र उस परंपरा का एक अपना विशिष्टतम मंत्र होता है। और उसके बाद कम से कम एक प्रोक्षण होता है — गुरु जी एक दिन का भी प्रोक्षण कराते हैं या नहीं भी कराया जाता; यह निर्भर करता है कि कौन सी परंपरा है और आपके भीतर क्या योग्यता है। जब गुरु दीक्षा दे रहे हैं तो आपकी पात्रता देखकर गुरु मंत्र के बाद कौन सा मंत्र देंगे और कितने दिन का नियम-निषेध लगाएंगे, वह उन पर निर्भर करता है।
अष्टगंध की स्याही, अनामिका उंगली, चांदी या पीतल का पात्र
पूजन के लिए गुरु मंत्र कैसे लिखा जाता है?
विधान है चांदी की थाली, जिस पर अनामिका उंगली से अष्टगंध की स्याही में पूरा मंत्र लिखा जाता है। चांदी न हो तो फूल धातु या पीतल में — पीतल सबसे उत्तम। तांबे में कभी नहीं, स्टील में कभी नहीं।
जो मंत्र आपको प्राप्त हुआ है, वक्ता कहते हैं — या जो मंत्र देव दीक्षा विधान में लिया है, बहुत से लोग उसमें शिव जी का भी मंत्र लेते हैं — या किसी परंपरा में जो मंत्र प्राप्त हुआ है, उसका विधान है कि वह चांदी की थाली पर लिखा जाता है। चांदी का पात्र हो, और उस पात्र में अष्टगंध की स्याही से अनामिका उंगली से उस मंत्र को पूरा का पूरा लिखते हैं। लेकिन चांदी का पात्र न होने की स्थिति में फूल, जो एक धातु होती है, उसमें या फिर पीतल में — इन दोनों में से किसी पात्र में लिखिएगा। तांबे में मत लिखिएगा, स्टील में मत लिखिएगा, यह ध्यान रहे। सबसे उत्तम पीतल का रहेगा। तो पीतल की थाली में — चांदी न हो तो; चांदी का बर्तन पहले से है, पूजन-पाठ में प्रयोग होता है, तो उसमें कर सकते हैं। नहीं तो पीतल की थाली जो पूजन में ही प्रयोग होती हो, उसमें अष्टगंध को गंगाजल आदि से निर्मित करके — ओरिजिनल अष्टगंध तो आज के समय में मिलता नहीं, जो आपके पास उपलब्ध है — उसमें हरिद्रा मिलाकर, गंगाजल मिलाकर स्याही बनाइए। और जैसे तिलक करने के लिए अनामिका उंगली का प्रयोग करते हैं, उसी अनामिका से वहां अपना गुरु मंत्र लिखेंगे। जिन्होंने एकाक्षरी की दीक्षा ली है, वे एकाक्षरी मंत्र को पहले लिखेंगे, सुंदर से, गाढ़ा से; एक बार में सुंदर न बने तो दो-तीन बार में भी कर सकते हैं।
सीधे धरती पर कभी नहीं — डाकिनी शक्ति मंत्र की पूरी सामर्थ्य हर लेती है
लिखा हुआ मंत्र कहां रखा जाए?
किसी ऊंचे स्थान पर, सीधे धरती पर कभी नहीं। वर्णन मिलता है कि सीधे पृथ्वी से स्पर्श करा देने पर हमारे लिए उस मंत्र के तेज का हरण हो जाता है। तंत्र में यह भी विवरण है कि डाकिनी — भगवती की डाकिनी शक्ति — उस मंत्र की पूरी सामर्थ्य हर लेती है, और जितना प्रोक्षण किया था वह नीलबट्टा सन्नाटा हो जाता है।
मंत्र को पूरा लिखने के बाद, वक्ता कहते हैं, किसी ऊंचे स्थान पर उस पात्र को स्थापित करें। ध्यान रखिएगा कि लिखने के बाद सीधे धरती पर नहीं रखना है। जब भी आप किसी पात्र पर मंत्र लिख देते हैं — यह विषय अनेक बार आता है, हालांकि निर्भर करता है कि किस विधि के लिए लिखा है और क्या करना है — यंत्र और मंत्र, चाहे भोजपत्र पर हों या धातु में लिखे हों, सीधे-सीधे पृथ्वी पर नहीं रखने चाहिए। ऐसा वर्णन मिलता है कि अगर सीधे पृथ्वी से स्पर्श करा देते हैं, तो हमारे लिए उस मंत्र के तेज का हरण हो जाता है। और तंत्र में ऐसा भी विवरण मिलता है कि डाकिनी — यानी भगवती की जो डाकिनी शक्ति होती है — उस मंत्र की पूरी सामर्थ्य का हरण कर लेती है। यानी हमने जितना भी प्रोक्षण किया हो, उस समय नीलबट्टा सन्नाटा हो जाएगा, पूरा खत्म हो जाएगा। तो सीधे नहीं रखेंगे। या तो वस्त्र बिछाकर उसके ऊपर पात्र रखिए, या आम की लकड़ी या बेल की लकड़ी का कोई सिंहासन बना हो जो पूजन में प्रयोग करते हैं, उसके ऊपर पीला या लाल कपड़ा बिछाकर तब उस पात्र को रखेंगे।
गुरु मंत्राय नमः — मंत्र ही देवता का स्वरूप
मंत्र का षोडशोपचार पूजन कैसे किया जाता है?
मंत्र का मन में उच्चारण करके गुरु मंत्राय नमः बोलें — गुरु से मिला हो तो गुरु प्रदत्त मंत्राय नमः — और आवाहयामि, आवाहनार्थे पुष्पम् समर्पयामि कहकर थाल में पुष्प रखें। फिर आसन के लिए पुष्प, फिर पाद्य, आचमन, स्नान, और पूरा क्रम पुनः मंत्र के लिए।
अब उस पात्र का षोडशोपचार पूजन करेंगे, वक्ता कहते हैं। इसमें पहले एकाक्षरी मंत्र या अपना पूर्ण गुरु मंत्र मन में उच्चारण कर लिया, तत्पश्चात बोलेंगे — और वे असली मंत्र की जगह उदाहरण लेते हैं, मान लीजिए भगवान नरसिंह का मंत्र श्रौं किसी का गुरु मंत्र है — श्रौं गुरु मंत्राय नमः। जिन्हें गुरु से मिला हो, वे गुरु प्रदत्त मंत्राय नमः; और जिन्हें गुरु से नहीं मिला है, वे कम से कम गुरु मंत्राय नमः बोलकर, उसके बाद आवाहयामि, आवाहनार्थे पुष्पम् समर्पयामि। या सामान्य हिंदी में करें तो: मन में उच्चारण करके, गुरु मंत्र जो हैं उनका हम आवाहन करते हैं, सश्री उपस्थित हों — मंत्र ही तो देवता का स्वरूप है; उसी में उनकी संपूर्ण शक्तियां साक्षात विराजमान रहती हैं। ठीक उसी भाव से हम उनका आवाहन कर रहे हैं। यह बोलकर पुष्प उसी थाल में, जिसमें मंत्र लिखा है, रखेंगे। आवाहन हो गया। फिर आसन के लिए पुनः पुष्प देंगे। फिर उनके पैर धुलाएंगे। पूर्ण भाव करते हुए पुष्पादि पर ही जल समर्पित करके षोडशोपचार पूजन की जो विधि है — आवाहन, आसन, पाद्य, आचमन, जल, स्नान — यह सारा क्रमगत पुनः उस मंत्र का करेंगे। यह बिल्कुल सरलतम रूप में बता रहे हैं, वे कहते हैं; इसमें कुछ क्लिष्ट नहीं है। तंत्रोक्त पद्धति से करते हैं तो 16 मुद्राओं का प्रयोग होता है, और उस मंत्र के साथ अगर स्त्री मंत्र दिया गया है तो चौर विधि आदि जो होती है, वह सब प्रयोग करके फिर इसे करना होता है।
तैयार शिष्य से गुरु प्रसन्न होंगे — पर अहंकार कभी न दिखाएं
गुरु पहले से तैयार शिष्य को जल्दी आगे बढ़ाते हैं, शर्त एक ही कि ज्ञान अहंकार में प्रदर्शित न हो
क्योंकि गुरु भाग्य से मिलते हैं और शिष्य भी भाग्य से मिलता है। इतना सीखकर जाएंगे तो गुरु देखेंगे कि शिष्य अच्छा जानता है, उन्हें ढालने में आसानी होगी, और वे जल्दी-जल्दी आगे बढ़ाएंगे। एक ही शर्त: गुरु के सामने अहंकार प्रदर्शित करते हुए यह न दिखाएं कि हमें यह आता है — निवेदित करना होता है।
अगर भगवान कृपा करें, जगदंबा कृपा करें, वक्ता कहते हैं, और इस जीवन में किसी उच्च परंपरा में आपको दीक्षा प्राप्त हो, और आप यह सारा विषय अपने गुरु के समक्ष रखें या बताएं कि हम इस-इस प्रकार से पूजन करते हैं, तो वे बड़े प्रसन्न होंगे। क्योंकि ऐसा शिष्य भी बहुत भाग्य से किसी को मिलता है। जैसे गुरु हमें भाग्य से मिलते हैं, वैसे शिष्य भी भाग्य से मिलता है। जब आप इतना सब सीखे रहेंगे, तो आपके गुरु देखेंगे कि हमारा शिष्य इतना अच्छा जानता है — तो उन्हें आपको ढालने में आसानी होगी, और वे क्रमगत जल्दी-जल्दी आगे बढ़ाएंगे। हां, शर्त यही रहेगी कि गुरु के सामने अहंकार प्रदर्शित करते हुए यह न दिखाएं कि हमको यह आता है। उनके सामने निवेदित करना होता है। वे अपना उद्देश्य साफ बताते हैं: मेरा कार्य है रॉ बनाना, रॉ बना दिए। आप इतने तैयार हो गए हैं कि किसी भी गुरु के पास जाकर यह बताएंगे, और आपके गुरु जी अगर उस योग्यता को धारण करने वाले होंगे, तो बड़े प्रसन्न होंगे कि हमारा शिष्य इतना अच्छा जान रहा है, हमें बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।
सात तिथियां, जिनमें गुरु पूर्णिमा सबसे विशेष
मंत्र का पूजन किन तिथियों पर किया जाता है?
महाशिवरात्रि की रात; चैत्र शुक्ल अष्टमी-नवमी की रात; दीपावली की चतुर्दशी; पूर्णिमा को भगवान दत्तात्रेय की जयंती। शरद पूर्णिमा और माघ पूर्णिमा को भी माना गया है। और सातवीं, गुरु पूर्णिमा, सबसे विशिष्टतम।
वक्ता उन तिथियों को गिनाते हैं जिन पर यह विधान किया जाता है। पहला, महाशिवरात्रि की रात में। दूसरा, चैत्र शुक्ल अष्टमी और चैत्र शुक्ल नवमी की रात। तीसरा, दीपावली की जो चतुर्दशी होती है। और चौथा, भगवान दत्तात्रेय की जयंती, जो हम पूर्णिमा को मनाते हैं। इनके सिवा शरद पूर्णिमा को भी माना गया है, माघ पूर्णिमा को भी माना गया है। लेकिन इन पांच-छह तिथियों में, वे कहते हैं, गुरु पूर्णिमा सबसे विशिष्टतम है — सातवीं तिथि, सबसे विशेष।
उस मंत्र से संबंधित हर दोष समाप्त
मंत्र के पूजन से क्या प्राप्त होता है?
अगर किसी भी कारण से उस मंत्र से संबंधित हमारा कोई अपराध बन गया हो, दोष लग गया हो, तो सभी प्रकार के दोष विमुचित हो जाते हैं — दोष की हानि हो जाती है, दोष ही समाप्त हो जाता है — और मंत्र हम पर अनंत कृपा करने वाला हो जाता है, क्योंकि वह मंत्र साक्षात देव स्वरूप है।
जब इन तिथियों में हम अपने गुरु प्रदत्त मंत्र का षोडशोपचार पूजन करते हैं, वक्ता कहते हैं, तो अगर किसी भी कारण से उस मंत्र से संबंधित हमारा कुछ अपराध बन गया हो, दोष लग गया हो, तो सभी प्रकार के दोष विमुचित — यानी उनसे छुटकारा मिल जाता है; दोष की हानि हो जाती है; वह दोष ही समाप्त हो जाता है। और मंत्र हमारे ऊपर अनंत कृपा करने वाला हो जाता है, क्योंकि वह मंत्र तो साक्षात देव स्वरूप है।
दो नदियों के संगम पर मंत्र तत्काल फल देने वाला
मंत्र सिद्ध न हो रहा हो तो क्या किया जा सकता है?
हां — अन्य सिद्ध काल में भी इसका विधान है, जब अमुक तिथि को अमुक नक्षत्र, दिन, पक्ष पड़ जाए। एक उदाहरण: मंत्र सिद्ध नहीं हो रहा है, तो जहां कम से कम दो नदियां मिलती हों, उस संगम पर इसी विधि को मानसिक रूप से किया जाए तो मंत्र तत्काल फल देने वाला हो जाता है।
जब आप यह पूजन कर देते हैं, वक्ता कहते हैं, तो अन्य सिद्ध काल आदि में भी इसका विधान है — जिसमें इस तिथि को यह नक्षत्र पड़ जाए, यह दिन पड़ जाए, यह पक्ष हो जाए, तब इस मंत्र का इस विधान से पूजन करना है। इसमें एक उदाहरण है: जहां कम से कम दो नदियां मिलती हों, अगर मंत्र सिद्ध नहीं हो रहा है और आप कर रहे हैं, तो उस स्थान पर जाकर इसी विधि को दो नदियों के संगम पर मानसिक रूप से किया जाए, तो तंत्रोक्त पद्धति से मंत्र तत्काल फल देने वाला हो जाता है। लेकिन उसमें, वे जोड़ते हैं, कल के लाइव में सिद्ध साबरी विद्या में जो चर्चा हुई थी कि स्नानादि के समय हम जो पूरा विधान करते हैं — लगभग उसी से संबंधित वह विधान है, और उसमें मुद्राओं का बहुत ज़्यादा प्रयोग होता है; मुद्रा से ही सारी चीज़ की जाती है। तो वह पूरा तंत्रोक्त विधान हो जाता है। जब आप किसी ऐसी परंपरा में जाते हैं, तो गुरु जी एक-एक विधान का अभ्यास कराते हैं, और अभ्यास के बाद ही आप उसे बिना देखे कर पाएंगे।
गौ पूजन — इसके बिना गुरु पूजन का पूर्ण फल नहीं
गुरु पूजन किससे पूर्ण होता है?
गौ पूजन से। गौ पूजन के बिना गुरु पूजन का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होगा। गुरु जी के पूजन के बाद गौ माता को भोजन आदि अवश्य निवेदित करें। जिनके प्रत्यक्ष गुरु हैं, वे उन्हें सामने से नैवेद्य अर्पण करें और उनका जूठन प्रसाद स्वरूप में स्वीकार करें।
ये दो कार्य ज़रूर करें, वक्ता कहते हैं: अपने गुरुदेव-गुरु माता का षोडशोपचार पूजन, और गुरु दीक्षा में जो मंत्र प्राप्त हुआ है, उस मंत्र का पूर्ण रूप से षोडशोपचार विधि-विधान से पूजन। यह करने के बाद अगला विषय होता है गौ पूजन। गौ पूजन के बिना, वे कहते हैं, गुरु पूजन का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होगा। गुरु जी के पूजन के बाद गौ माता को ज़रूर भोजन आदि निवेदित करना चाहिए। जिनके प्रत्यक्ष गुरु हैं, वे उनका पूजन करके, सारा विधि-विधान करके, सामने से नैवेद्य आदि अर्पण करें और उनके जूठन को प्रसाद स्वरूप में अवश्य स्वीकार करें — तो वह आपका पूर्ण फल हो गया।
पीपल की लकड़ी पर गुग्गल-घी की 108 आहुति
गुरु पूर्णिमा पर हवन कैसे करें?
चाहें तो उस दिन अधिकतम मात्रा में पौष्टिक सामग्री और विशेष करके गुग्गल-घी का प्रयोग करें — पीपल की लकड़ी पर 108 आहुति अति उत्तम है। फिर गुरु मंत्र से ही कम से कम एक माला आहुति और पूर्णाहुति।
जब प्रत्यक्ष रूप से गुरु नहीं हैं, वक्ता कहते हैं — देव दीक्षा विधान आदि किया है, या गुरु तत्व के प्रति श्रद्धा है — ऐसी अवस्था में यह पूजन पूर्ण करने के बाद हवन आदि की प्रक्रिया भी करना चाहें तो जितना अच्छे से कर सकते हैं, करें। इसमें उस दिन अधिकतम मात्रा में पौष्टिक सामग्री और विशेष करके गुग्गल-घी का ही प्रयोग करें। गुग्गल-घी से 108 आहुति पीपल वृक्ष की लकड़ी पर करते हैं तो अति उत्तम है। आरंभिक आहुतियां दें; उसके बाद जो गुरु मंत्र है — एकाक्षरी, अष्टाक्षरी, पंचाक्षरी, जिस मंत्र की आपको दीक्षा प्राप्त है या जो आपने लिया है — उस मंत्र से कम से कम एक माला आहुति गुग्गल और घी से पीपल की लकड़ी पर अवश्य दें और पूर्णाहुति कर दें।
अनिवार्य नहीं — मूल कर लें, विधि बढ़ाएं नहीं
क्या गुरु पूर्णिमा पर क्षेत्रपाल या दिक्पाल बलि आवश्यक है?
नहीं। उस दिन यह अनिवार्यता नहीं रहेगी कि क्षेत्रपाल बलि या दस दिक्पालों की बलि करनी है। करेंगे तो अति उत्तम, नहीं करेंगे तो कोई क्लिष्टता नहीं। चिंता मत कीजिए — क्योंकि विधि ज़्यादा बढ़ जाएगी तो लोग भागेंगे।
उसके बाद, वक्ता कहते हैं, उस दिन यह अनिवार्यता नहीं रहेगी कि आपको क्षेत्रपाल बलि करनी है, दस दिक्पालों की बलि करनी है। करेंगे तो अति उत्तम है, नहीं करेंगे तो क्लिष्ट नहीं है। इसमें चिंता नहीं करनी है। क्योंकि विधि ज़्यादा बढ़ जाएगी तो लोग भागेंगे। तो उतनी चिंता मत कीजिए — जो मूल है, उसे कर लीजिए। और हवन संभव हो पाए तो ठीक; न भी हो तो कोई दिक्कत नहीं। हो जाए तो उत्तम है, न हो तो भी ठीक है।
नैवेद्य में कुछ पीला — और कुंडली मत देखिए
गौ माता को क्या अर्पण करें, और क्या कुंडली देखनी है?
गौ माता के लिए जो भोजन निकालें उसमें पीली सामग्री से संबंधित वस्तु ज़रूर हो — खीर-पूरी बना रहे हैं तो खीर में थोड़ा केसर डाल दें। और अपनी जन्म कुंडली देखने मत बैठिए कि गुरु मेरे लिए शुभ ग्रह हैं, यह दान है या नहीं।
गौ माता के लिए, वक्ता कहते हैं, अब जो भोजन निकालेंगे उसमें पीली सामग्रियों से संबंधित वस्तु ज़रूर हो। अगर खीर-पूरी बना रहे हैं तो खीर में थोड़ा सा केसर डाल दीजिए। यह ज़रूर करिएगा; पीला हो। और इसमें, वे कहते हैं, आपको अपनी जन्म कुंडली नहीं देखनी है — कि अरे भैया, गुरु तो मेरे लिए बहुत प्रभावशाली ग्रह हैं, सर्व प्रकार से शुभ, मंगल करने वाले हैं, आप इनका दान करवा रहे हैं। दान नहीं हो रहा है, वे कहते हैं। गौ माता की सेवा हो रही है, ताकि उनकी पूरी कृपा प्राप्त हो। इसलिए निश्चिंत होकर जब आप गौ माता को इस प्रकार नैवेद्य आदि अर्पण कर देंगे, तब आपका गुरु पूजन पूर्ण होगा। और उसके बाद ही आपको अपना भोजन आदि स्वीकार करना है। यह संक्षिप्त और सरलतम रूप में, वे कहते हैं, अपने गुरु मंडल की कृपा और गुरु मंत्र की कृपा के लिए पूजन की विधि है। इसी गुरु मंडल और इसी गुरु मंत्र से आप विश्व विजेता बनने वाले हैं — इसलिए यह तिथि व्यर्थ नहीं जानी चाहिए।
एक हाथ लंबी सफेद कनेर की लकड़ी, पीले धागे में लपेटी
गुरु दंड क्या है, और कैसे बनाया जाता है?
गुरु पूर्णिमा के दिन पूजन के बाद लाई गई कम से कम एक हाथ लंबी सफेद कनेर की लकड़ी — निमंत्रण एक दिन पहले। उस पर गाय के दूध से अभिषेक करके पंचोपचार पूजन, फिर गुरु मंत्र बोलते हुए पूरी लकड़ी पर ऊपर से नीचे तक पीला सूती धागा लपेटें।
एक विधि और है, वक्ता कहते हैं, जो वे सबके समक्ष रखते हैं। सफेद कनेर का पेड़ — सफेद कनेर, जिसमें सफेद रंग का ही पुष्प होना चाहिए। सफेद कनेर का पेड़ मिल जाता है, तो गुरु पूर्णिमा के दिन पूजन करने के बाद कम से कम एक हाथ लंबी सफेद कनेर की लकड़ी ले आइए। इसमें निमंत्रण देने की जो विधि होती है, वह एक दिन पहले कर लेनी चाहिए। और लाने का समय सुबह नहीं रहेगा; अगर सुबह लाने जाते भी हैं, तो गुरु पूजन आदि करने के बाद ही जाना है। लकड़ी एक हाथ की लेकर आनी है। लकड़ी लाने के बाद, जब पूजन आदि पूर्ण कर लेंगे, तो उसके ऊपर कम से कम पंचोपचार पूजन — गाय के दूध से अभिषेक आदि करके — और उस पूरी लकड़ी पर गुरु मंत्र बोलते हुए पीले रंग का धागा लपेटना है; ऊपर से नीचे तक, सूती धागा हो तो अति उत्तम।
अभिमंत्रित कील ठोकना, और हर पुरश्चरण की एक माला का समर्पण
गुरु दंड में चांदी की कील और उस पर एक माला का समर्पण
चांदी की एक कील लेकर गुरु मंत्र की कम से कम एक माला से अभिमंत्रित करें, दूध से धोकर लकड़ी के एक सिरे में लगाएं। इसे गुरु दंड के स्वरूप में स्थापित करें; और गुरु मंत्र या किसी भी मंत्र का पुरश्चरण करें तो उसका समर्पण कम से कम एक माला इस गुरु दंड पर अवश्य करें।
तत्पश्चात, वक्ता कहते हैं, चांदी की एक कील लेकर गुरु मंत्र का कम से कम एक माला जप करके उसे भी अभिमंत्रित करें, पहले दूध से धोएं, और लकड़ी के एक ओर उस कील को लगाएं। गुरु दंड के स्वरूप में इसे स्थापित करेंगे। और जब भी गुरु मंत्र का या अन्य किसी भी मंत्र का पुरश्चरण आदि करें, तो उसका समर्पण — कम से कम एक माला — इस गुरु दंड के ऊपर अवश्य किया करें। इससे यह होगा, वे कहते हैं, कि जब भी आप कोई मंत्र जप करें और उसमें कोई अशुद्धि या दोष लग जाए, तो इससे उसका निराकरण होता है। लेकिन यह कार्य, वे जोड़ते हैं, केवल और केवल गुरु पूर्णिमा के दिन ही कर सकते हैं — मतलब दंड को लाने की विधि। पूर्ण विधि में गुरु मंडल का अष्टदल कमल वाला यंत्र बनाकर उसमें दंड स्थापित किया जाता है; लेकिन वह विधि क्लिष्ट हो जाएगी, तो उतना न करके केवल इतना भी करते हैं तो लाभदायी है। थोड़ा-थोड़ा करते रहना चाहिए।
पुण्य अपने तक सीमित रखें, तीर्थ के बाद संशय न रखें
क्या तीर्थ से मिले पुण्य का सार्वजनिक वर्णन करना चाहिए?
पुण्य की प्राप्ति होती है तो उसका सार्वजनिक रूप से बहुत अधिक वर्णन कभी नहीं करना चाहिए। हम क्या कर रहे हैं, क्या प्राप्त हुआ — अपने तक सीमित रखें। और उत्तम-मध्यम-निम्न सोचने की आवश्यकता ही नहीं — किसी तीर्थ के लिए एक पग भी चल गए तो उसका भी पुण्य है।
जब पुण्य आदि की प्राप्ति होती है, वक्ता कहते हैं, तो उसका सार्वजनिक रूप से बहुत अधिक वर्णन कभी नहीं करना चाहिए। हम क्या कर रहे हैं, क्या प्राप्त हुआ — प्रयास करें कि यह अपने तक सीमित रहे। और इसमें उत्तम, मध्यम या निम्न सोचने की आवश्यकता ही नहीं है। आप किसी भी तीर्थ के लिए एक पद भी चलते हैं, एक पग भी चल गए, तो उसका भी पुण्य है। आपने पूरा त्रिकोण कर लिया, इतना जाप कर लिया — यह व्यर्थ जाएगा क्या? आपके मन में संशय आया ही कैसे? तीर्थ करने के बाद, वे कहते हैं, संशय कभी नहीं रखना चाहिए। यह ध्यान रखिएगा।
एक सप्ताह गाय के दूध से दही जमाएं; दही-गुड़ का कोई विकल्प नहीं
अभिषेक के लिए शुद्ध दही न मिले तो?
कम से कम एक सप्ताह के लिए गाय के दूध की व्यवस्था करके जोरन डालकर दही जमा लें — एक-एक पाव दूध भी काफी है। दही का इसमें कोई विकल्प नहीं है। दही-गुड़ का ही सबसे उत्तम प्रयोग है, जिससे क्षमा तुरंत मिलती है और किसी भी देव दोष, मंत्र दोष का तुरंत निराकरण हो जाता है।
पूछा गया कि क्षमा प्रार्थना के लिए दही-गुड़ बताया गया था, शुद्ध दही न मिले तो शिव जी का किससे अभिषेक करें — वक्ता विकल्प की जगह व्यवस्था बताते हैं। संभव हो पाए तो कम से कम एक सप्ताह के लिए गाय के दूध की व्यवस्था कर लीजिए और जोरन डालकर दही जमा लीजिए। एक-एक पाव दूध भी मिलेगा तो काफी है। यह हो जाए तो अति उत्तम — एक सप्ताह की बात है, सात दिन, हर दिन एक-एक बार। विकल्प की बात करें तो दही का ऐसा कोई विकल्प इसमें है नहीं। दही-गुड़ का ही सबसे अति उत्तम प्रयोग होता है, जिससे क्षमा तुरंत प्राप्त होती है, और किसी भी देव दोष और मंत्र दोष का तुरंत निराकरण हो जाता है।
ग्यारह हज़ार पर अकाट्य प्रभाव
लक्ष्मी माला मंत्र कितने अनुष्ठान में पूर्ण फल देता है?
पूर्ण फल कितने में मिलेगा, यह सबके लिए अलग-अलग हो सकता है। सामान्य रूप से माला मंत्र, कवच आदि 11000 कर लेने पर उसका प्रभाव जीवन में आना आरंभ हो जाता है — अकाट्य प्रभाव। उसके बाद नित्य नियम से 11 बार भी जाप करते रहेंगे तो कृपा-प्रभाव बना रहेगा।
पूछा गया कि लक्ष्मी माला मंत्र कितने अनुष्ठान करने पर पूर्ण फल देता है — वक्ता कहते हैं कि पूर्ण फल कितने में मिलेगा, यह सबके लिए अलग-अलग हो सकता है। सामान्य रूप से माला मंत्र, कवच आदि 11000 जब कर लेते हैं, तो उसका प्रभाव जीवन में आना आरंभ हो जाता है — अकाट्य प्रभाव। मतलब 11000 कर लिए तो ऐसा नहीं कि फिर उसका प्रभाव नहीं मिलेगा। उसके बाद नित्य नियम से 11 बार भी जाप करते रहेंगे तो कृपा-प्रभाव बना रहेगा। यह बात अलग है, वे जोड़ते हैं, कि कृपा प्राप्त होने के बाद हम कैसा विचार और व्यवहार रखते हैं, क्या करते हैं; उसके अनुसार भी वह प्रभाव जाएगा-आएगा। लेकिन जैसा आप पूछ रहे हैं, उसके लिए कम से कम 11000 तो अवश्य कीजिए, श्रद्धा पूर्वक।
मंदिर या तीर्थ जाइए — वहां प्रारब्ध तुरंत कटता है
केवल घर में किया गया जाप सीमित प्रभाव क्यों देता है?
घर में कितना भी जाप कीजिए, बड़ा सीमित प्रभाव मिलेगा। अगर लंबे समय से साधना कर रहे हैं, केवल घर में, और प्रभाव नहीं मिल रहा — तो वह घर में नहीं होगा। मंदिर जाइए, तीर्थ क्षेत्र जाइए, स्नान-दान कीजिए — प्रयाग में, त्रिवेणी में स्नान से हमारा प्रबलतम प्रारब्ध तुरंत कटता है।
एक विषय स्पष्ट रूप से जान लीजिए, वक्ता कहते हैं: घर में कितना भी जाप कीजिए, बड़ा सीमित प्रभाव मिलेगा। कम से कम यह ज़रूर करना चाहिए — अगर आप लंबे समय से साधना कर रहे हैं, केवल घर में कर रहे हैं, और प्रभाव प्राप्त नहीं हो रहा है, तो वह घर में नहीं होगा। आपको मंदिर जाना चाहिए, तीर्थ क्षेत्र जाना चाहिए, स्नान-दान करना चाहिए। तीर्थ में स्नान करेंगे — मान लीजिए प्रयाग क्षेत्र है, प्रयाग जी में जाकर स्नान कर लिया, त्रिवेणी में स्नान कर लिया — तो हमारा जो प्रबलतम प्रारब्ध होता है, वह तुरंत कटता है। तब मंत्र का प्रभाव शीघ्र मिलता है। अगर हम तीर्थ जाने में ही कृपणता करें कि नहीं जाएंगे, इतना पैसा खर्च होगा — तो फिर वह इधर खर्च होता रहेगा। यह इधर आपको देरी करवाता रहेगा।
दस बच्चे पास हो रहे हों तो टीचर को दोष नहीं दे सकते
सालों जाप करके कुछ न हो तो दोष किसका?
वक्ता की उपमा: बार-बार एग्ज़ाम में फेल हो रहे हैं तो दोष टीचर को नहीं दे सकते कि ठीक से नहीं पढ़ाया। उनके पढ़ाने से 10 बच्चे पास हो रहे हैं, टॉप कर रहे हैं, और हम हर बार फेल — तो कुछ हमारी भी गलती हो रही होगी। उस गलती को सुधारना है, अपनी लगन और मेहनत बढ़ानी है।
सबसे बड़ी गलती लोग यह करते हैं, वक्ता कहते हैं, कि मंत्र जाप करते हैं तो बहुत से लोग बहुत उल्टा-सीधा बोलते हैं — अरे महाराज, हम तो दो साल से जप लिए, कुछ नहीं हुआ। कुछ नहीं हुआ तो इसमें अपनी कमी है। नहीं हो पा रहा है तो उसके लिए हमें अपना प्रभाव बढ़ाना है। अगर हम पढ़ रहे हैं और बार-बार एग्ज़ाम में फेल हो रहे हैं, तो इसका दोष टीचर को तो नहीं दे सकते कि आपने ठीक से नहीं पढ़ाया। इसमें हमारी कमी हो सकती है। अगर उनके पढ़ाने से 10 बच्चे पास हो रहे हैं, टॉप कर रहे हैं, और हम हर बार फेल हो रहे हैं, तो कुछ हमारी भी गलती हो रही होगी। उस गलती को सुधारना है। अपनी लगन, अपनी मेहनत बढ़ानी है।
गंगा में नाभि जल में खड़े होकर, या ग्रहण भर बहती नदी में
प्रभाव न देने वाला मंत्र आखिर किससे काम करता है?
प्रभाव न देने वाले मंत्र का विधान: गंगा जी में नाभि जल में खड़े होकर उस मंत्र की कम से कम एक माला — लंबा माला मंत्र है तो एक माला, एकाक्षरी, पंचाक्षरी, अष्टाक्षरी है तो 100 माला। या ग्रहण के समय बहती नदी में खड़े होकर ग्रहण के आरंभ से अंत तक जाप।
दीवार पर पीपल अंधविश्वास का विषय नहीं
घर की दीवार पर पीपल उग आए तो क्या इसका कोई अर्थ है?
इसमें इतना अंधविश्वास करने वाला विषय नहीं है। कई बार दीवार पर पीपल उग ही जाता है। शुभ तिथि — पर्व काल आदि — छोड़कर बाकी समय में, ज़्यादा बड़ा हो गया हो तो उसे किसी दूसरी जगह ले जाकर लगा सकते हैं। इसमें प्रेत-पिशाच जोड़ने की आवश्यकता नहीं है।
पूछा गया कि घर के मुख्य द्वार की दीवार पर पीपल उग आया है, दूर तक कोई पीपल नहीं, क्या माता जी प्रेत योनि में होंगी — वक्ता कहते हैं कि इसमें इतना अंधविश्वास करने वाला विषय नहीं है। पीपल का वृक्ष उगा है तो कई बार ऐसा होता है कि दीवार पर पीपल उग ही जाता है। शुभ तिथि — यानी पर्व काल आदि — छोड़कर बाकी समय में, अगर ज़्यादा बड़ा हो गया है, तो उस पीपल को किसी दूसरी जगह ले जाकर लगा सकते हैं। इसमें प्रेत और पिशाच को जोड़ने की आवश्यकता नहीं है।
108 नाम, या नाम मंत्र से आहुति
कामाख्या कवच अनुष्ठान का हवन कैसे करें?
भगवती कामाख्या के 108 मंत्र से, 108 नाम से, या उनके नाम मंत्र से आहुति दे सकते हैं — श्री कामाख्या देव्यै स्वाहा बोलकर। 108 नामावली ऑनलाइन न मिले तो उनके एक नाम से ही 108 आहुति दे सकते हैं।
जो कामाख्या कवच का अनुष्ठान कर रही हैं, वक्ता कहते हैं, उनके लिए हवन भगवती कामाख्या के 108 मंत्र से, 108 नाम से, या उनके नाम मंत्र से — श्री कामाख्या देव्यै स्वाहा बोलकर — आहुति दे सकते हैं। एक श्रोता ने अलग से पूछा कि 108 नामावली नहीं मिल रही; वे कहते हैं कि ऑनलाइन मिल जानी चाहिए, और न मिले तो उनके एक नाम से ही 108 आहुति दे सकते हैं — श्री कामाख्या देव्यै नमः या श्री कामाख्या देव्यै स्वाहा करके।
मिट्टी की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा
क्या मिट्टी की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा की जा सकती है?
बिल्कुल कर सकते हैं। होता ही है।
पूछा गया कि क्या मिट्टी की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा विधान कर सकते हैं — वक्ता कहते हैं: बिल्कुल कर सकते हैं; होता ही है।
ग्रहण भर शिव सहस्रनाम का पाठ
पुराना और प्रबल अभिचार किससे नष्ट होता है?
भगवान शिव का सामान्य सहस्रनाम, जो आप नित्य पढ़ते हैं — वही सहस्रनाम ग्रहण के आरंभ से अंत तक कर दीजिए। अभिचार कितना भी प्रबल हो, डिग जाएगा — नष्ट होने के कगार पर पहुंच जाएगा।
कोई भी अभिचार पुराना हो, कितना भी प्रबल हो, वक्ता कहते हैं: जो विशेष पर्व काल आदि होते हैं, जिनकी अभी चर्चा हुई, इन सभी समयों में मंत्रों का पुरश्चरण और अभिचार नाश के निमित्त जो भी शास्त्रोक्त विधान बताए गए हैं, उन्हें करने से वह नष्ट होते हैं। और सब छोड़िए, वे एक बताते हैं: भगवान शिव जी का एक सामान्य सा सहस्रनाम है। अगर आप नित्य सहस्रनाम का पाठ करते हैं, तो वही सहस्रनाम ग्रहण काल में, ग्रहण के आरंभ से अंत तक कर दें। तो जो अभिचार होगा, वह बिल्कुल डिग जाएगा; कितनी भी प्रबलता में हो, नष्ट होने के कगार पर पहुंच जाएगा। हां, यह ज़रूर है, वे जोड़ते हैं, कि उसमें अगर विशेष अवयव लगे होंगे और शत्रु अभी भी एक्टिव है, कर रहा है, तब थोड़ा 19-20 हो सकता है। लेकिन अगर कोई करके छोड़ दिया है, अब वह पुराना हो रहा है और प्रभाव बढ़ता जा रहा है — तब इन सभी दिव्य समयों में आपको अनुष्ठान करना चाहिए।
गुप्त नवरात्रि में नहीं; संधि बलि का महत्व शारदीय और चैत्र में
क्या गुप्त नवरात्रि के संधि काल में बलियारी विधान आवश्यक है?
गुप्त नवरात्रि के संधि काल में बलियारी विधान करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसमें उपवास-नियम आदि वह सब नहीं कर रहे हैं और ऐसे करने की आवश्यकता भी नहीं है। शारदीय नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि में उसका विशेष महत्व है।
नमः जहां लगाते हैं वहीं रखें, और स्वाहा जोड़ें
पंचाक्षरी मंत्र से हवन कैसे करें?
अगर पहले नमः लगाकर मूल पंचाक्षरी कर रहे हैं, तो ठीक उसी तरह उच्चारण करके स्वाहा कहें। अगर नमः बाद में लगाकर कर रहे हैं, तो नमः बाद में ही लगाकर उसी प्रकार स्वाहा कहकर आहुति दें।
पूछा गया कि पंचाक्षरी मंत्र से हवन कैसे करें — वक्ता नमः के स्थान का नियम बताते हैं। मान लीजिए पहले नमः लगाकर जो मूल पंचाक्षरी है, उस अनुसार कर रहे हैं: तो ठीक उसी तरीके से उच्चारण करके स्वाहा कहेंगे। अगर नमः बाद में लगाकर कर रहे हैं, तो नमः बाद में ही लगाकर उसी प्रकार स्वाहा कहकर आहुति देंगे।
दूर से छेड़छाड़ उचित नहीं — सामने से सहायता लें
आवेश की स्थिति में क्या करना चाहिए?
आसपास के किसी जानकार व्यक्ति की सहायता लीजिए। जैसा आप बता रहे हैं कि उस श्रेणी पर इस तरह आवेशित होता है, तो इसे दूर से छेड़छाड़ करना उचित नहीं होगा — न किसी से ऐसे कराइए। ऐसा व्यक्ति खोजें जो सामने से आकर काट करके हटाए।
एक ऐसे मामले पर, जिसमें एक श्रेणी पर आवेश हो जाता है, वक्ता का उत्तर है: आसपास के किसी जानकार व्यक्ति की सहायता लीजिए। कारण, वे कहते हैं, यह है कि जैसा आप बता रहे हैं — कि उस श्रेणी पर इस तरीके से आवेशित होता है — तो इसे दूर से छेड़छाड़ करना उचित नहीं होगा; न किसी से ऐसे कराइए। आसपास के किसी ऐसे व्यक्ति की सहायता लें, जो सामने से आकर बकार करवाकर, उसका काट करके हटाए।
कार्तिकेय अकेले या शक्ति सहित, कठोर ब्रह्मचर्य के साथ
क्या घर में पंचदेव के विग्रह रखें, और कार्तिकेय जी की पूजा कैसे करें?
घर में पंचदेव के विग्रह बिल्कुल रखने चाहिए। कार्तिकेय जी का या तो अकेले का श्री विग्रह या उनकी शक्ति से संयुक्त श्री विग्रह स्थापित करके फिर उनका पूरा विधान, पंचांग सेवा उसी अनुसार करें। लेकिन उनके पूजन में, हनुमान जी की तरह, पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन की अनिवार्यता कठोरता से होती है।
पूछा गया कि घर में पंचदेवों के विग्रह रखने चाहिए या नहीं — वक्ता कहते हैं, बिल्कुल रखने चाहिए। भगवान कार्तिकेय जी की पूजा घर पर कैसे करें — वे दो प्रकार बताते हैं: या तो उनका अकेले का श्री विग्रह, या उनकी शक्ति से संयुक्त श्री विग्रह स्थापित करके, तत्पश्चात उनका जो पूरा विधान होता है, पंचांग सेवा, उस अनुसार करें। यह ज़रूर है, वे जोड़ते हैं, कि उनके पूजन में भी, हनुमान जी के पूजन की तरह, पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन आदि की अनिवार्यता कठोरता से होती है।
दत्त हर पंथ में उपस्थित हैं, कोई परंपरा बंद नहीं
क्या भगवान दत्त की देव दीक्षा से आगे अन्य परंपराएं बंद हो जाती हैं?
नहीं। भगवान दत्तात्रेय की देव दीक्षा विधि कर रहे हैं तो आगे किसी भी परंपरा में जा सकते हैं। ऐसा नहीं कि शाक्त के लिए अलग, शैव के लिए अलग, वैष्णव के लिए अलग — भगवान दत्त हर पंथ, हर परंपरा में उपस्थित हैं।
भगवान दत्तात्रेय की देव दीक्षा विधि कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं, तो आप आगे किसी भी परंपरा में जा सकते हैं। इसमें ऐसा नहीं है कि शाक्त के लिए अलग है, शैव के लिए अलग है, वैष्णव के लिए अलग है। भगवान दत्त हर पंथ, हर परंपरा में उपस्थित हैं। इसलिए निश्चिंत होकर कर सकते हैं — जब तक भौतिक गुरु की प्राप्ति नहीं होती।
अपने शरीर की लंबाई जितना, सांस रोककर गांठ
रक्षा सूत्र कितना लंबा हो, और कैसे बांधा जाए?
हमारे शरीर की जितनी लंबाई है, उतना लंबा रक्षा सूत्र होना चाहिए। दोनों हाथ पूरे फैला दीजिए; एक हाथ की मध्यमा उंगली के अग्र भाग से दबाकर दूसरे हाथ की मध्यमा तक ले जाएं — यही शरीर की लंबाई है। वहां तोड़ लें, फिर रक्षण मंत्र जपते हुए कलाई पर लपेटें और सांस रोककर गांठ मारें।
पूछा गया कि कलावा कितना बड़ा होना चाहिए — वक्ता माप बताते हैं। हमारे शरीर की जो लंबाई है, उतना लंबा रक्षा सूत्र होना चाहिए। रक्षा सूत्र सर से पैर तक तो नहीं नापेंगे, वे कहते हैं। अपने दोनों हाथ पूरे फैला दीजिए, रक्षा सूत्र को एक हाथ की मध्यमा उंगली के अग्र भाग से दबा लें, दूसरे हाथ तक ले जाएं और दूसरे हाथ की मध्यमा उंगली से दबा लें — यही हमारे शरीर की लंबाई होती है। फिर उसे तोड़ दीजिए। उसके बाद किसी भी रक्षण मंत्र से — जयंती मंगला आदि मंत्र से, या जिस मंत्र का आप जाप करते हैं उससे, रक्षोघ्न मंत्र आदि का स्मरण-जाप करते हुए — अपनी कलाई पर लपेटकर गांठ मार दीजिए। और गांठ मारने के समय अगर उसका विशिष्ट प्रभाव बनाना है, तो सांस रोककर अपने मंत्र का जाप करते हुए गांठ मारिए। तो आपकी सुरक्षा और तीव्रतम होती है। बाकी, वे जोड़ते हैं, जो वेदोक्त विधान है जो पंडित जी लोग प्रयोग करते हैं, उस विधान से भी कर सकते हैं।
ठोकनी है
गुरु दंड में कील ठोकनी है या बांधनी है?
ठोकनी है।
पूछा गया कि गुरु दंड में कील को ठोकना है या बांधना है — वक्ता का उत्तर: ठोकना है।
इससे प्रहार कभी नहीं — सारा तपोबल खत्म
गुरु दंड का प्रयोग कभी किसलिए नहीं करना चाहिए?
किसी को हानि पहुंचाने के लिए कभी प्रयोग मत कीजिए। जितना तपोबल अर्जित किया है, सब खत्म हो जाएगा। गुरु दंड से प्रहार तंत्र के यंत्र-प्रहार से 100 गुना अधिक प्रभाव देगा — लेकिन आप अपना सर्वनाश कर लेंगे, क्योंकि जब गुरु मंत्र ही चला गया तो आपके पास बचा क्या।
वक्ता इसे अभी बताई विधि के साथ चेतावनी के रूप में रखते हैं, और यह भी बताते हैं कि यह सब क्यों बता रहे हैं: जब साधना करेंगे और इन चीज़ों का प्रयोग करेंगे, तो बहुत सारे विषय अपने आप मस्तिष्क में डाउनलोड होने लगेंगे। शक्तियां कृपा करती हैं। इसका दुरुपयोग कभी मत कीजिए। दंड का प्रयोग बहुत स्थान पर होता है, वे कहते हैं: भैरव दंड बनता है, उसका भी प्रयोग होता है; गुरु दंड का भी प्रयोग होता है। इसका प्रयोग कभी किसी को हानि पहुंचाने के लिए मत कीजिए। जितना तपोबल अर्जित किया है, सब खत्म हो जाएगा। वे प्रलोभन को उसके असली रूप में रखते हैं: क्रोध में आकर, अविवेकी बनकर — कोई व्यक्ति आप पर लांछन लगा रहा है, आपको पता है कि आप सही हैं, वह गलत है, फिर भी वह आपकी हानि कर रहा है — अपना सर्वस्व समर्पण मत कर दीजिएगा। उनकी तुलना: तंत्र के अध्ययन में ऐसे यंत्र होते हैं जिन्हें विशेष नक्षत्र में कलम और स्याही का विशेष प्रयोग करके लिखा जाता है और उन पर चोट की जाती है, तो शत्रु पर प्रहार होता है। गुरु दंड से प्रहार करेंगे तो 100 गुना अधिक प्रभाव देगा — लेकिन आप अपना सर्वनाश कर लेंगे। क्योंकि जब गुरु मंत्र ही चला गया, तो आपके पास बचा क्या। तो ऐसा प्रयोग गलती से मत कीजिएगा, वे कहते हैं। यह बुद्धि में आएगा — बहुत लोगों की बुद्धि खुलती है, और सुनने वालों में कई ऐसे साधक होंगे जो सब प्रयोग करते हैं, तो आइडिया आता है कि इसका ऐसे प्रयोग कर सकते हैं। यह गलती कभी कोई साधक न करे। इसकी मर्यादा होती है। यह प्रयोग कभी करना ही नहीं चाहिए। कहते हैं ब्रह्मास्त्र प्रयोग कर दो — लेकिन यह प्रयोग कभी मत करो।
नए साधक भाद्रपद में गणपति से आरंभ
बिल्कुल नए साधक भाद्रपद मास में गणपति जी से आरंभ करेंगे
भादो का मास आएगा — और भाद्रपद मास में जो नए साधक हैं, बिल्कुल स्टार्टिंग से करना चाहते हैं, वे उस समय गणपति जी से शुरू करेंगे।
वक्ता आगे की योजना बताते हैं। गणपति जी की साधना चैनल पर है, और कल-परसों से सावन मास के लिए जो साधनाएं दी जाएंगी, उनमें सारा विषय विस्तार से अलग से रहेगा। वे प्रयास करेंगे कि पंचदेव की अलग-अलग साधना दे दें, ताकि जिनके जो इष्ट हैं, वे शिव जी की साधना के साथ उनकी साधना करें। उनका अपना कहना है कि भगवान शिव जी की उपासना हो तो अति उत्तम रहेगी। फिर, वे कहते हैं, भादो का मास आएगा — और भाद्रपद मास में जो नए साधक हैं, बिल्कुल स्टार्टिंग से करना चाहते हैं, वे उस समय गणपति जी से शुरू करेंगे।
केवल सफेद कनेर — कोई विकल्प नहीं
सफेद कनेर की जगह कोई और लकड़ी प्रयोग कर सकते हैं?
नहीं। इसमें सफेद कनेर ही चाहिए होता है।
पूछा गया कि सफेद कनेर की जगह किसी और पेड़ की लकड़ी का प्रयोग कर सकते हैं — वक्ता साफ कहते हैं: नहीं कर सकते। इसमें सफेद कनेर ही चाहिए होता है।
पंचाक्षरी पहले से कर रहे हैं तो अलग दीक्षा की आवश्यकता नहीं
क्या शिव जी को इष्ट के साथ गुरु रूप में भी मान सकते हैं?
हां। और अगर पंचाक्षरी पहले से कर रहे हैं, तो अलग से कुछ और करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। मानसिक रूप से गुरु स्वरूप में उनका पूजन करिए, या सामने से प्रत्यक्ष पूजन, जब तक भौतिक गुरु की प्राप्ति नहीं होती। पुनः दीक्षा विधान करने की आवश्यकता नहीं।
पूछा गया कि शिव जी इष्ट हों तो उन्हें गुरु रूप में मान्यता दे सकते हैं, गुरु दीक्षा विधान में क्या परिवर्तन होगा और गुरु मंत्र क्या रहेगा — वक्ता प्रश्नकर्ता की स्थिति से उत्तर देते हैं। आप तो पंचाक्षरी का कर ही रहे हैं, वे कहते हैं, तो अब अलग से करने की आवश्यकता आपको नहीं पड़ेगी। मानसिक रूप से गुरु स्वरूप में उनका पूजन करिए, या सामने से प्रत्यक्ष पूजन कीजिए — जब तक भौतिक गुरु की प्राप्ति नहीं होती। पुनः दीक्षा विधान करने की आवश्यकता नहीं है। इसी बीच वे यह भी कहते हैं कि दत्त दंड का प्रयोग रक्षण के निमित्त था, उसका पूरा विधान ही अलग विषय पर था, और उसका प्रयोग इसमें नहीं हो सकता।
गाय के दूध से तीन बार
भैंस के दही का जोरन प्रयोग के लिए शुद्ध कैसे करें?
पहले दिन जोरन गाय के दूध में डालिए; अगले दिन उस जमे दही का जोरन फिर गाय के दूध में डालिए; तीसरी बार जब गाय के दूध में पड़ जाएगा तो वह शुद्ध हो जाएगा। तीन बार जोरन डालना पड़ेगा।
जोरन भी अगर भैंस के दही का मिल रहा है, वक्ता कहते हैं, तो यह करना चाहिए। पहले दिन जोरन गाय के दूध में डालिए। अगले दिन जो गाय के दूध में दही जमा है, उसका जोरन पुनः डालिए। तीसरी बार जब गाय के दूध में पड़ जाएगा, तो वह शुद्ध हो जाएगा। यानी तीन बार जोरन डालना पड़ेगा: पहले गाय के दूध में डालें, फिर उसमें से निकालकर दूसरे गाय के दूध में, फिर उससे निकालकर तीसरे में — तीसरा वाला प्रयोग कर सकते हैं।
वीर भाव के मंत्र बिना दीक्षा के उग्रता बढ़ाते हैं
क्या हनुमान जी का मंत्र बिना दीक्षा के कर सकते हैं?
दीक्षा लेकर करेंगे तो उत्तम रहेगा। वीर भाव के जितने भी देवता हैं, उनके मंत्रों का बिना दीक्षा के जाप करने से उग्रता काफी बढ़ जाती है। जब तक दीक्षा नहीं, तब तक अष्टोत्तर शतनाम का अनुष्ठान या कवच कीजिए — चालीसा, बजरंग बाण तो सभी करें।
एक श्रोता 41 दिन की हनुमान जी की साधना कर रहे हैं, उस मंत्र में दीक्षित नहीं हैं, सुझाव मांगते हैं। भगवान हनुमान जी का यह जो मंत्र आप कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं, दीक्षा लेकर करेंगे तो उत्तम रहेगा। वीर भाव के जितने भी देवता हैं, विशेष करके उनके मंत्रों का बिना दीक्षा के जाप करने से उग्रता काफी बढ़ जाती है। दीक्षा लेकर कीजिए। और जब तक दीक्षा आदि की प्राप्ति नहीं है, तब तक उनके अष्टोत्तर शतनाम का अनुष्ठान कर सकते हैं। चालीसा, बजरंग बाण तो सभी करें; अष्टोत्तर शतनाम का कर सकते हैं, कवच का कर सकते हैं। वह कीजिए।
असली धुंधला होता है; सबसे चमकदार असली नहीं
असली स्फटिक की पहचान नकली से कैसे करें?
यह सत्य है कि स्फटिक को अंधेरे में रगड़ने से चिंगारी निकलती है — लेकिन नकली, यानी क्रिस्टल, रगड़ने पर असली से ज़्यादा चमकेगा। असली स्फटिक अधिकतर धुंधला और बेकार सा दिखता है। जो बहुत स्वच्छ असली स्फटिक है, वह इंडिया का नहीं, बाहर का है; और बीच का जो सबसे ज़्यादा मार्केट में है, वह दोनों से ज़्यादा चमकता है।
यह सत्य तो है, वक्ता कहते हैं, कि स्फटिक को अंधेरे में रगड़ने से चिंगारी निकलती है। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि नकली वाला — सही कहा जाए तो जो क्रिस्टल है — उसे रगड़ेंगे तो असली से ज़्यादा चमकेगा। असली स्फटिक अधिकतर समय बहुत धुंधला और बेकार सा दिखता है। क्रिस्टल वाला बहुत स्वच्छ दिखेगा। और जो बहुत स्वच्छ दिखने वाला असली स्फटिक है, वह इंडिया का नहीं है, बाहर वाला स्फटिक है। इन दोनों के मध्य का जो स्फटिक है, वही सबसे ज़्यादा मार्केट में रहता है। या तो बिल्कुल चमकदार, एकदम पारदर्शी विदेशी; नहीं तो इंडिया वाला, जो धुंधला रहेगा। इनके बीच का बहुत सारा मिल जाएगा। और मध्य वाला दोनों से ज़्यादा चमकता है — असली से ज़्यादा चमकेगा, इतनी चिंगारी निकलेगी कि आप कहेंगे यही असली माल है।
स्वयं प्रकट मूर्ति कभी नहीं हटाई जाती, कितनी भी जीर्ण हो
शक्ति पीठ की मूर्ति जीर्ण या भग्न हो जाए तो क्या करें?
कभी नहीं। जो स्वयं प्रकट मूर्ति है, शक्ति पीठ, सिद्ध पीठ के श्री विग्रह — कितने भी जीर्ण हो जाएं, कोई भी अवस्था बन जाए — उन्हें कभी हटाया नहीं जा सकता। हां, श्रृंगार के लिए स्वर्ण की परत चढ़ाई जा सकती है, ग्राम देवता हों तो रजत का प्रयोग।
पूछा गया कि सिद्ध पीठ या शक्ति पीठ में स्थापित मूर्ति जीर्ण हो जाए तो क्या करें — कोल्हापुर महालक्ष्मी की मूर्ति और ग्राम देवता का उदाहरण देकर — वक्ता सीधे मना करते हैं। नहीं, कभी नहीं। जो स्वयं से प्रकट मूर्ति है, जो शक्ति पीठ, सिद्ध पीठ हैं, इन सबके श्री विग्रह — कितने भी जीर्ण हो जाएं, कोई भी अवस्था बन जाए — उन्हें कभी हटाया नहीं जा सकता। हां, यह ज़रूर हो सकता है, वे कहते हैं, कि श्रृंगार आदि के लिए श्री विग्रह पर स्वर्ण की परत बिल्कुल चढ़ाई जा सकती है; स्वर्ण से उन्हें आविष्कृत किया जा सकता है। वैसा प्रयोग करें। लेकिन उन्हें कभी हटाना नहीं चाहिए। ग्राम देवता हैं तो रजत यानी चांदी का प्रयोग करके उनके स्थान को, उन्हें अच्छे से आविष्कृत कर दीजिए, ताकि मूर्ति आगे टूटे नहीं। लेकिन उन्हें हटाना नहीं चाहिए, बदलना नहीं चाहिए।
सहयोग लें; स्वयं उपाय करने से दिक्कत बढ़ेगी
कर्ण पिशाचिनी से छुटकारा कैसे पाएं?
किसी साधक की सहायता लीजिए — जो महाविद्याओं का प्रचंड साधक हो, या भगवती वन दुर्गा का साधक हो, या पशुपतास्त्र मंत्र का पुरश्चरण करने वाला पशुपतिनाथ महादेव का साधक हो। इसमें उपाय नहीं हो सकता: अगर वास्तव में लगी है तो उपाय करने से वह और दिक्कत बढ़ाएगी।
कर्ण पिशाचिनी से छुटकारा पाने का उपाय पूछे जाने पर वक्ता पहले पूछते हैं कि वह लगी कैसे। किसी साधक की सहायता लीजिए, वे कहते हैं: जो महाविद्याओं का प्रचंड साधक हो, या भगवती वन दुर्गा का साधक हो। या भगवान महादेव के पशुपतास्त्र मंत्र आदि का पुरश्चरण करने वाला पशुपतिनाथ महादेव का साधक हो — उनके माध्यम से आपको इससे छुटकारा मिल जाएगा। लेकिन कोई सहयोग करेगा या नहीं, वे जोड़ते हैं, यह विषय बड़ा अलग है। महागणपति के साधक भी पूर्ण सहयोग कर सकते हैं; उनके द्वारा भी इन सभी चीज़ों का निराकरण हो सकता है। इसमें उपाय नहीं हो सकता, वे कहते हैं। उपाय करने का मतलब है कि अगर वास्तव में कर्ण पिशाचिनी लगी है, तो उपाय करने से वह आपको और दिक्कत बढ़ाएगी। इससे सीधे छुटकारे के लिए सहयोग लीजिए। इसमें आरएनडी नहीं हो सकता; रिसर्च-डेवलपमेंट करने के चक्कर में प्राण जाएगा। इसलिए सहयोग लीजिए — हम यही कहेंगे।
दक्षिणामूर्ति का अपना देव दीक्षा विधान
क्या दक्षिणामूर्ति को गुरु रूप में ले सकते हैं?
प्रत्यक्ष गुरु नहीं हैं तो दक्षिणामूर्ति जी का भी देव दीक्षा विधान है — उसी प्रकार कीजिए। समय न होने से वक्ता लाइव में मंत्र नहीं बताते।
पूछा गया कि दक्षिणामूर्ति शिव जी को गुरु रूप में कैसे कर सकते हैं — वक्ता कहते हैं कि अगर प्रत्यक्ष रूप से गुरु नहीं हैं, तो दक्षिणामूर्ति जी का भी देव दीक्षा विधान है; उसी प्रकार कीजिए। मंत्र आदि का पूरा विषय वे वहीं नहीं बताते — लाइव में इतना समय नहीं है कि किस मंत्र का लेना है, यह पूरा बता पाएं। गुरु जी के मंदिर में पूजन के बारे में अलग से पूछे जाने पर वे कहते हैं कि सोलह उपचार पूजन बिल्कुल कर सकते हैं, और स्थापित मूर्ति में आवाहन की आवश्यकता नहीं होती — लेकिन क्योंकि अपने लिए कर रहे हैं और सोलह उपचार है, तो मानसिक रूप से एक बार आवाहन बोल सकते हैं, उसमें कोई दिक्कत नहीं।
पहले सुरक्षा का विधान — पलटा हुआ अभिचार तीन गुना लौटता है
प्रत्यंगिरा पाठ से पहले क्या होना चाहिए?
सुरक्षा-रक्षण का विधान पहले करके अवश्य रखना चाहिए। क्योंकि प्रत्यंगिरा आप करेंगे, और अगर अभिचार की स्थिति पलट गई, सामने वाला शत्रु जानकार रहा और उसने पुनः पलट दिया — तो सोचिए, तीन गुना अधिक प्रभाव से आपको मिलेगा।
प्रत्यंगिरा स्तोत्र आदि करने से पहले, वक्ता कहते हैं, सुरक्षा-रक्षण का विधान करके अवश्य रखना चाहिए। कारण: प्रत्यंगिरा आप करेंगे, और अगर अभिचार की स्थिति पलट गई, सामने वाला शत्रु जानकार रहा और उसने पुनः पलट दिया, तो सोचिए — तीन गुना अधिक प्रभाव से आपको मिलेगा। और अगर आप असावधान हुए, तो यह आपके लिए दिक्कत बढ़ाने वाली होगी। और यही कारण है, वे कहते हैं, कि यह नहीं कर सकते, वह नहीं कर सकते — जो सारी रोका-टोकी वे लगाते रहते हैं — और इसी कारण लोग उन्हें पसंद नहीं करते और कहते हैं कि बहुत प्रताड़ित करते हो। लेकिन हम नहीं कह सकते; हम आपका अहित नहीं चाहेंगे। हमें नहीं पता कि आप किस स्तर के साधक हैं, सुरक्षा का क्या विधान लेकर चलते हैं। हो सकता है आपकी सुरक्षा हो जाए, लेकिन आपके परिवार में बच्चे होंगे, बुज़ुर्ग होंगे, आपकी स्त्री होंगी — उनकी सुरक्षा कैसे होगी? यह पूरा का पूरा एक अपना सर्कल होता है। जब किसी भी प्रयोग को हम पलटते हैं — प्रत्यंगिरा जगदंबा का ऐसा स्वरूप है कि वे पलट देती हैं। लेकिन आपने सीधे स्तोत्र आदि किया, उसके प्रभाव से वह पलटा; सुरक्षा के लिए आपने कुछ नहीं किया। प्रत्यंगिरा का और भी विधान है। इसलिए क्रमगत विद्या में, वे समझाते हैं — चाहे बगला प्रत्यंगिरा हो, तारा प्रत्यंगिरा हो, काली प्रत्यंगिरा हो — पहले मूल काली का क्रमगत कम से कम एकाक्षरी, चतुराक्षरी, अष्टाक्षरी, तीन कर लेते हैं, तब जाकर कोई भी गुरु जी प्रत्यंगिरा के लिए बोलेंगे। सीधे प्रत्यंगिरा नहीं करवाएंगे। और उसमें तर्पण आदि का विधान भी होता है, जो करवा दिया जाता है, ताकि अगर कभी विद्या के प्रति हमसे कुछ अपराध बन जाए और गलती से कुछ पलट भी जाए, तो हमें हानि न हो। तो सीधे प्रयोग के लिए, वे कहते हैं, हम आपको कह नहीं सकते।
दीक्षित होइए, फिर मंदिर में पंचमुखी हनुमान कवच के 11000
तांत्रिक से पीड़ित परिवार क्या करे?
सबसे पहले परंपरा में दीक्षित होइए, फिर अपने आराध्य की शरणागति लीजिए। हनुमान जी में श्रद्धा है तो पंचमुखी हनुमान कवच का आश्रय लीजिए — शत्रुओं को फाड़कर रख देंगे। 11000 का पुरश्चरण हनुमान जी के मंदिर में कीजिए, घर पर मत करिए।
एक श्रोता लिखते हैं कि दुष्ट शत्रु और तांत्रिक पूरे परिवार को बहुत परेशान कर रहे हैं, पत्नी को भी मार दिया, एक साल से नित्य श्रद्धा से बजरंग बाण और राम रक्षा करते हैं, तीर्थ यात्रा भी की, और तंत्र बार-बार किया जा रहा है। अगर शत्रु बार-बार तंत्र कर रहा है और हानि भी हो चुकी है, वक्ता कहते हैं, तो सबसे पहला कार्य यह कीजिए: दीक्षित होइए। परंपरा में दीक्षित होकर फिर अपने आराध्य की शरणागति लीजिए। पंचमुखी हनुमान जी के कवच का आश्रय लीजिए। अगर हनुमान जी में आपकी श्रद्धा है, तो पंचमुखी हनुमान जी का कवच कीजिए — शत्रुओं को फाड़कर रख देंगे। 11000 का पुरश्चरण हनुमान जी के मंदिर में कीजिए। घर पर मत करिए। बजरंग बाण कर रहे हैं, ठीक है। पंचमुखी हनुमान कवच में समय का कोई बंधन नहीं — कि सुबह भोर में ही करना है या रात को ही। यथाशक्ति, यथा सामर्थ्य कंटिन्यू कीजिए। बस ब्रह्मचर्य पालन सही से हो, मानसिक रूप से भी; इसको लेकर अब कोई और विषय नहीं होना चाहिए। खानपान सही रखिए और प्रचंडता से कीजिए। मूल कवच का पहले अभ्यास कीजिए, अभ्यास के बाद पुरश्चरण शुरू कर दीजिए। देखिए 11000 होते-होते शत्रु की क्या-क्या स्थिति बनती है। बीच में डिगना नहीं है। बीच में प्रसन्न नहीं होना है। यह नहीं सोचना कि कोई प्रभाव नहीं रहा — बिल्कुल नहीं। करके देखिए; पूरा प्रभाव मिलेगा।
दत्त माला मंत्र में घी का दीपक अति उत्तम
दत्त माला मंत्र के साथ घी का दीपक
भगवान दत्त का माला मंत्र कर रहे हैं तो घी का दीपक रहे तो अति उत्तम रहेगा। दीपक की बाती डबल होनी चाहिए।
एक श्रोता के प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्त का माला मंत्र कर रहे हैं तो घी का दीपक रहेगा तो अति उत्तम रहेगा। दीपक की बाती डबल होनी चाहिए, वे जोड़ते हैं। बाती के बारे में उनका अगला शब्द ट्रांसक्रिप्ट में स्पष्ट नहीं है।
कीलित शिष्य — सिद्धि है पर प्रयोग नहीं कर सकता
गुरु ने वचन से विद्या रोक दी हो तो क्या होता है?
दुरुपयोग के भय से गुरु विद्या को कीलित कर देते हैं — वचन ले लेते हैं कि तुम इसका ऐसा प्रयोग नहीं करोगे, केवल रक्षा के निमित्त करोगे। आदमी के पास सब कुछ है, लेकिन प्रयोग नहीं कर सकता। ऐसे गुरु पिता तुल्य होते हैं, नहीं चाहते कि शिष्य का कर्म बंधन बढ़े; कहते हैं केवल अपने आराध्य की सेवा करो, प्रयोग मत करो।
दीक्षित लोगों के साथ भी एक समस्या होती है, वक्ता कहते हैं, जो उन्होंने देखी है। गुरु ने साधना करवाई, मंत्रों की जागृति करवा दी, सिद्धि हो गई और बहुत अच्छे से हो गई; प्रभाव प्रत्यक्ष है। लेकिन अगर गुरु के मन में यह आ गया कि कहीं इस विद्या का दुरुपयोग न कर दे, तो इस कारण उन्होंने उसे कीलित कर दिया। कीलित करने का अर्थ: वचन आदि ले लिए कि तुम इसका इस प्रकार प्रयोग नहीं करोगे। हम बंधन की बात नहीं कर रहे, वे स्पष्ट करते हैं: उन्होंने अपने वचन से रोक लगा दी कि तुम इसका ऐसा प्रयोग नहीं करोगे, केवल रक्षा के निमित्त करोगे। तो कई बार आदमी मजबूर हो जाता है — है तो सब कुछ, लेकिन प्रयोग आप कर नहीं सकते। ऐसी अवस्था में अगर आप गुरु जी से प्रार्थना करेंगे — देखिए, वे भी पिता तुल्य होते हैं। कई ऐसे गुरु होते हैं जो नहीं चाहते कि हमारे शिष्य का अहित हो या इसका कर्म बंधन बढ़े। तो वे सदैव कहते हैं: तुम अपने आराध्य की सेवा ही करो। पुरश्चरण करके, अनुष्ठान करके मंत्रों का समर्पण ही करो, प्रयोग मत करो। उनके ऊपर छोड़ो, कर्म बंधन मत बढ़ाओ। ऐसे भी गुरु होते हैं।
उसी शक्ति की अंग विद्या लें — नई दीक्षा की आवश्यकता नहीं
उसी शक्ति का दूसरा मंत्र लेने के लिए नई दीक्षा चाहिए?
अगर दीक्षित होकर मंत्र का पुरश्चरण पहले से किया है और मंत्र सिद्धि हो चुकी है, तो दोबारा कहीं दीक्षा लेने की आवश्यकता नहीं। संबंधित विद्या का ही कोई अन्य मंत्र, या उनकी अंग विद्याएं — पशुपतिनाथ से संबंधित बहुत सी विद्याएं हैं, खड्ग रावण आदि — उनका पुरश्चरण करके शिव मंदिर में प्रयोग करें।
ऐसी अवस्था में, वक्ता कहते हैं, अगर आपका हृदय नहीं मान रहा और लग रहा है कि प्रयोग करना ही करना है — तब, अगर दीक्षित होकर मंत्र का पुरश्चरण पहले से ऑलरेडी किया है, उसका प्रभाव प्राप्त हो चुका है, मंत्र सिद्धि हो चुकी है, तो दोबारा कहीं दीक्षा लेने की आवश्यकता नहीं है। संबंधित विद्या का ही कोई अन्य मंत्र लें — जैसे भगवती पीतांबरा का कर रहे थे, तो उन्हीं का कोई अन्य मंत्र या कोई अन्य विधान — या उनकी अंग विद्याएं। भगवान सर्वेश्वर हैं; पशुपतिनाथ महादेव से संबंधित बहुत सी विद्याएं हैं, खड्ग रावण आदि। उन सबका पुरश्चरण करके उस शिव मंदिर में प्रयोग कर सकते हैं। लेकिन दीक्षित हों और विद्या प्रत्यक्ष हो गई हो — यानी उस अवस्था तक जा चुके हों — तभी उनका करें, तो फिर सहयोग होती हैं। उसमें गुरु जी का बंधन फिर नहीं रहेगा, उनका मान भी रह जाएगा और आपका विषय भी रह जाएगा। और जब ऐसी अवस्था आ जाए कि हम पूरी तरह घिर चुके हैं, तो किसी न किसी महाविद्या या महाशक्ति की शरणागति लेकर किसी भी कवच, माला मंत्र आदि का — जो-जो विषय रखा गया है कि इसका कर सकते हैं — उस मंदिर में पुरश्चरण कीजिए। घर में रहकर जब पुरश्चरण करते हैं और पहले से पीड़ित होते हैं, तो हमारी दिक्कत ही बढ़ जाती है।
अगले काट अनुष्ठान में वही चीज़ दोबारा लिखें
एक कटा और एक बचा दिखाया गया हो तो अगले काट अनुष्ठान में वही विषय फिर लिखें ताकि उसी संकल्प से आहुति पड़े
अगर आपको बताया जा रहा है कि एक कट गया और एक रह गया, तो दोबारा जब कभी काट अनुष्ठान हो, सेम विषय, सेम चीज़ को पूरा लिख दीजिए, ताकि उसी संकल्प के साथ आहुति पड़ जाए। तो जो बचा है, वह भी कट जाएगा।
एक श्रोता अनुष्ठान के बाद का स्वप्न बताते हैं जिसमें माता ने कहा: तुम्हारा मैंने एक काट दिया है, एक रह गया है। अगर इस प्रकार का स्वप्न या आभास हुआ, वक्ता कहते हैं, और ऐसा बताया जा रहा है कि एक ही कटा है और एक रह गया, तो दोबारा जब कभी काट अनुष्ठान हो, सेम विषय, सेम चीज़ को पूरा लिख दीजिए — ताकि उसी संकल्प के साथ आहुति पड़ जाए। तो फिर जो बचा है, वह भी कट जाएगा।
दावा अस्वीकार, पराशर स्मृति के प्रमाण से
क्या रजस्वला स्त्री मंत्र जाप कर सकती है?
वक्ता इसे सिरे से अस्वीकार करते हैं। पॉडकास्ट के एक बहुत प्रसिद्ध तांत्रिक का कहना है कि स्त्री रजस्वला हो तो भी मंत्र जाप, महाविद्याओं का जाप कर सकती है, किसी शास्त्र में मना नहीं है। कई लोग पराशर स्मृति आदि का प्रमाण दे चुके हैं — पहले दिन ब्रह्मघातिनी, दूसरे दिन चांडालिनी, तीसरे दिन रज की।
एक विषय आज पुनः सुना, वक्ता कहते हैं: बहुत बड़े, बहुत प्रसिद्ध तांत्रिक हैं, पॉडकास्ट पर भरमार है, नाम नहीं ले सकते। उनका कहना है कि स्त्री अगर रजस्वला हो तो भी मंत्रों का जाप कर सकती है; महाविद्याओं के मंत्रों का जाप कर सकती है; विधिवत जाप कर सकती है, उसमें कोई नियम-निषेध नहीं, ऐसा नहीं कि अशुद्ध हो गई — और किसी भी शास्त्र में यह लिखा नहीं है। यानी उनका कहना है कि ऐसा कहीं लिखा नहीं कि पीरियड आया हो तो स्त्री मंत्र जाप नहीं कर सकती। कई लोग इसका प्रमाण दे चुके हैं, वक्ता कहते हैं — पराशर स्मृति आदि का प्रमाण: कि जिस समय स्त्री रजस्वला होती है, पहले दिन ब्रह्मघातिनी, दूसरे दिन चांडालिनी, तीसरे दिन रज की। यह विषय पहले से उपलब्ध है, शास्त्रोक्त विषय है। तो आज के समय में, वे कहते हैं, जो इतने प्रबुद्ध तांत्रिक हो गए हैं, वे माता-बहनों को रजस्वला अवस्था में भी पूजन के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। इस प्रकार के विषय सुनकर आप प्रोत्साहित होती हैं और करती हैं, तो याद रखिएगा: अपना, अपने वंश का, अपने परिवार का नाश — इसके लिए पूर्ण रूप से आप उत्तरदायी होंगी। बताने वाले का कुछ नहीं जा रहा है। ये सब कारण हैं, वे कहते हैं, कि लोग हमसे भाग रहे हैं — कि बहुत नियम बताते हैं। हम बहुत नियम नहीं बताते; हम सत्य मार्ग पर चलने के लिए कहते हैं। आपका कल्याण धीरे से होगा, लेकिन होगा। आप कोई अपराध मत करिएगा — हम इस चीज़ से डरते हैं। 100 दिन लगें, धीरे-धीरे चलें, लेकिन जब प्रभाव हो, भगवती कृपा हो, तो विशिष्टतम कृपा हो; हमें फिर पीछे न मुड़ना पड़े।
सूतक गृह का जाप पूर्ण दीक्षित शाक्तों का, गृहस्थों का नहीं
सूतक गृह में जाप कौन कर सकता है?
सूतक गृह में, या जहां मृत्यु हुई हो उस स्थान पर जाप करने का विषय शाक्तों के लिए है, जिन्हें पूर्ण उस प्रकार की दीक्षा प्राप्त है, या जो वैश्य मंत्र का जाप करते हैं — सामान्य जनों के लिए नहीं। जो गृहस्थ हैं, सामान्य दीक्षा प्राप्त व्यक्ति हैं, वे सूतक गृह में बैठकर जाप नहीं करते।
ये गलत-गलत विषय, वक्ता कहते हैं — कि तुरंत हो जाएगा, ऐसा हो जाएगा, वैसा हो जाएगा — सूतक गृह में, या जहां मृत्यु हुई हो उस स्थान पर जाप करने का यह विषय शाक्तों के लिए है, जिन्हें पूर्ण उस प्रकार की दीक्षा प्राप्त है, या जो वैश्य मंत्र का जाप करते हैं। सामान्य जनों के लिए नहीं है। जो गृहस्थ हैं, सामान्य दीक्षा प्राप्त किए हुए व्यक्ति हैं, वे सूतक गृह में बैठकर जाप नहीं करते। यह गलत विषय है, वे कहते हैं।
लोग दूसरों की गलतियों से नहीं सीखते — अपनी बुद्धि का प्रयोग करें
वीडियो में अनुभवों सहित नियम स्पष्ट करने पर भी लोग भाग-भागकर करते हैं, इसलिए रोक को अपनी बुद्धि से परखें
क्योंकि वे लोग कोई रोक नहीं लगाते। नवार्ण मंत्र को सबसे बुरा उदाहरण बताते हैं — कि उसमें कोई नियम-निषेध नहीं। और वीडियो में अनुभवों सहित नियम स्पष्ट करने पर भी लोग अंधों जैसे भाग-भागकर करते हैं। उनका निवेदन: अपनी बुद्धि का प्रयोग करना सीखिए।
क्योंकि हम रोक लगाते हैं कि भैया यह मत करिए, ऐसा करेंगे तो दिक्कत होगी — आपकी अच्छाई के लिए, आपके साथ गलत न हो जाए। वे लोग रोक नहीं लगाते। नवार्ण मंत्र को लेकर तो, वे कहते हैं, इतना रायता फैला हुआ है — नवार्ण मंत्र करिए, और नवार्ण मंत्र में कोई नियम-निषेध नहीं। जहां आप वीडियो बनाएं और बोलें कि यह-यह नियम है, इस प्रकार करना चाहिए, अनुभव आदि भी डाल दिए — तो भी लोग वहां लिख रहे हैं कि भैया यह विषय एग्ज़ैक्ट ऐसा हुआ है। यह समझ में आ रहा है कि इस प्रकार दिक्कत करेगा, दीक्षित होकर करना चाहिए, यह विधान है — सारा विषय स्पष्ट करने के बावजूद अंधों जैसे लोग भाग-भागकर जाते हैं। क्योंकि लोग दूसरों की गलतियों से सीखना नहीं चाहते, वे कहते हैं। वे चाहते हैं कि जब मेरा बांस होगा, जब मेरा गांव का गुड़गांव बन जाएगा, तभी मानेंगे कि हां, यह दिक्कत है, यह गलत है। उससे पहले नहीं मानने वाले। तो इसमें कुछ किया भी नहीं जा सकता। उनका एक ही निवेदन: अपनी बुद्धि का प्रयोग करना सीखिए। अपनी बुद्धि से देखिए कहां गलत है, कहां सही है, कौन आपको गलत दिशा की ओर ले जा रहा है। थोड़ा अपनी बुद्धि का प्रयोग करेंगे तो समझ में आ जाएगा।
मूंगफली या चावल की भूसी का तेल नहीं — घी
सरसों के तेल की जगह कौन सा तेल?
मूंगफली का तेल प्रयोग करने के लिए वक्ता नहीं बोलेंगे। चावल की भूसी का तेल, मूंगफली का तेल — सरसों न हो तो घी का प्रयोग कीजिए।
सरसों की जगह मूंगफली के तेल के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि मूंगफली का तेल प्रयोग करने के लिए वे नहीं बोलेंगे। चावल की भूसी का तेल, मूंगफली का तेल — सरसों न हो तो घी का यूज़ कीजिए।
साधक के आगे बढ़ने पर सामान्य स्थिति
साधना के समय जीव शरीर से बाहर निकल जाए तो इसका क्या अर्थ है?
सामान्य सा विषय है। जब साधक आगे बढ़ना शुरू करता है, तो इस प्रकार की परिस्थिति-स्थिति आती-जाती रहती है। इससे परेशान नहीं होना चाहिए, और इतने से अनुभव के लिए रुकना नहीं चाहिए, न इसकी आशा करनी चाहिए। आगे बढ़ें।
पूछा गया कि साधना करते समय कभी-कभी अष्टमी, चौदस, अमावस्या या अन्य दिनों में जीव बाहर निकल जाता है — वक्ता कहते हैं कि यह सामान्य सा विषय है। जब साधक आगे बढ़ना शुरू करता है, तो इस प्रकार की परिस्थिति, स्थिति आती-जाती रहती है। इससे परेशान नहीं होना चाहिए, और इतने से अनुभव के लिए रुकना नहीं चाहिए, न ही इसकी आशा करनी चाहिए। आगे बढ़ें — अगर साधना करते हैं तो।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।