यंत्र और कवच का नित्य पूजन — अभिषेक, तर्पण, अग्नि स्पर्श और बलि सहित प्रयोग

घर के यंत्र और कवच की नित्य देखभाल और उनका प्रयोग।

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Questions this answers

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The notes
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01

यंत्रों और धारण किए हुए कवचों का नित्य पूजन

हर प्रकार के दिव्य यंत्र और कवच का नित्य पूजन, और धारण किए हुए कवच की ऊर्जा में नित्य अभिवृद्धि

· Reviewed Sep 2026 · 01:39–02:27

जिस भी प्रकार के दिव्यतम यंत्र और कवच होते हैं, उनका नित्य पूजन किस प्रकार होगा; जिन कवचों को हम धारण करते हैं उनकी ऊर्जा में नित्य प्रति किस प्रकार अभिवृद्धि की जाए; और आवश्यकता पड़ने पर उनका प्रयोग किस प्रकार किया जाए। इसके पश्चात वे कुछ श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास करेंगे।

02

पूजन के यंत्र, धारण के यंत्र और कार्य-प्रयोग के यंत्र

यंत्र मुख्यतः कितने प्रकार के होते हैं?

· Reviewed Sep 2026 · 02:28–02:55 · Also a question

यंत्र कई प्रकार के होते हैं। जिन मुख्य यंत्रों को हम सामान्य जन जानते हैं, उनमें एक पूजन के निमित्त होता है और दूसरा धारण के निमित्त। इनसे आगे जाएँ तो किसी विशेष कार्य में प्रयोग से संबंधित बहुत सारे यंत्र मिलते हैं। इन सब में सबसे अधिक महत्व पूजन यंत्र का है।

03

कुल परंपरा और आश्रम के अनुसार भेद, तथा आगम-उक्त पूजन

पूजन यंत्रों में कुल परंपरा और आश्रम के अनुसार भेद होते हैं, और कलिकाल में जो होता है वह आगम-उक्त विधान है

· Reviewed Sep 2026 · 02:56–03:38

पूजन यंत्रों में भी अनेक प्रकार हो जाते हैं: कुल परंपरा के अनुसार उनमें विभिन्नताएँ आती हैं, और उन्हीं यंत्रों में आश्रम के अनुसार भी वर्गीकरण है — एक गृहस्थ के लिए, एक विरक्त के लिए। वे जोड़ते हैं कि कलिकाल में वैदिक पूजन संभव नहीं है, इसलिए जो किया जाता है वह आगम-उक्त या पुराणोक्त विधान है; आगम का अर्थ है तांत्रिक विधान।

04

एक यंत्र के माध्यम से पूरे देव मंडल की संतुष्टि

आगम-उक्त पूजन में यंत्र की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है?

· Reviewed Sep 2026 · 03:39–04:35 · Also a question

क्योंकि आगम-उक्त सेवा-पूजा में देवता के समस्त मंडल की पूजा होती है — उनके सारे परिकर, सारी अंग विद्याएँ, उनके कुल परंपरा में उपस्थित सारे स्वरूप, दश दिगपाल से लेकर मातृका समूह तक और योगिनी-भैरव तक। उन सब में से एक-एक की संतुष्टि का यदि कोई माध्यम है, वे कहते हैं, तो वह यंत्र है; इसके सिवाय ऐसा कोई विशिष्ट या सामान्य माध्यम इतनी आसानी से प्राप्त नहीं होता।

05

यंत्र मंत्र का ही पूर्ण स्वरूप

यंत्रों की सृष्टि ऋषियों ने — या भगवान सदाशिव ने — की, और यंत्र मंत्र का ही पूर्ण स्वरूप है

· Reviewed Sep 2026 · 04:36–05:08

वे कहते हैं कि यंत्रों की सृष्टि ऋषि-मुनियों के द्वारा — या यह कह लीजिए, भगवान सदाशिव के द्वारा — इसी विषय को ध्यान में रखकर की गई, और प्रत्येक देवता का अपना यंत्र होता है जिसमें उनके स्वरूपों से संबंधित पूजन होता है। यंत्र और मंत्र, वे कहते हैं, एक तरीके से एक दूसरे के पूरक हैं: यंत्र मंत्र का ही पूर्ण स्वरूप है।

06

पंचानन पंचाक्षरी यंत्र, और अदीक्षित के लिए शास्त्रोक्त माध्यम

महाकुंभ अनुष्ठान में मिला पंचानन पंचाक्षरी यंत्र, और दीक्षा न मिलने तक शास्त्रोक्त माध्यम का महत्व

· Reviewed Sep 2026 · 05:09–05:45

जो लोग महाकुंभ के संपूर्ण अनुष्ठान में थे, वे कहते हैं, उन्हें भगवान शिव का पंचानन यंत्र, पंचाक्षरी यंत्र गया होगा। वे शुरू से कहते आए हैं कि सभी दीक्षित नहीं हैं, और दीक्षा कहाँ तथा कैसे प्राप्त होगी यह किसी को नहीं पता; तब तक यदि कोई शास्त्रोक्त माध्यम हो जिस पर सभी का अधिकार है, तो उसे लेकर चलने का प्रयास करना चाहिए।

07

प्रणव के बिना पंचाक्षरी का अधिकार

पंचाक्षरी मंत्र के जप का अधिकार किसे है?

· Reviewed Sep 2026 · 05:46–06:21 · Also a question

पंचाक्षरी में शास्त्रोक्त अधिकार यही है कि हर कोई इसका जप कर सकता है। प्रणव के बिना स्त्री-पुरुष हर कोई जप कर सकते हैं; और चतुर्वर्ण की स्त्री के लिए यह है कि "नमः" बाद में लगाकर करेंगी। वे कहते हैं कि इस पर कई बार चर्चा हो चुकी है, और इसी मंत्र के यंत्र को कभी सामान्य समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।

08

बृहद विधि से पहले तपोबल और आसन सिद्धि

क्या नया साधक एकदम से सबसे बृहद विधि पकड़ ले?

· Reviewed Sep 2026 · 06:22–06:45 · Also a question

नहीं। वे कहते हैं कि नया-नया इतनी विधि में घुसेंगे तो दिक्कत होगी, क्योंकि बहुत अधिक विधि से करने के लिए तपोबल और सिद्ध आसन चाहिए। आसन सिद्ध का अर्थ है कि आपके पास बैठने की क्षमता और धैर्य हो; नहीं तो नया-नया दो-तीन दिन करेगा और फिर छोड़ देगा।

09

षडाक्षरी से दशाक्षरी तक — अक्षरों और देवताओं का स्थान बदलता है

षडाक्षरी से दशाक्षरी तक यंत्र के भीतर अक्षरों और उनके देवताओं का स्थान बदलता जाता है

· Reviewed Sep 2026 · 06:46–07:21

षडाक्षरी में, यानी प्रणव सहित जप में, यंत्र का स्वरूप वही रहता है, लेकिन यंत्र के भीतर मंत्र के अक्षरों का स्थान और उस अक्षर से संबंधित देवता का स्थान बदल जाता है। सप्ताक्षरी, अष्टाक्षरी, नवाक्षर, दशाक्षरी और ओम भगवते रुद्राय जैसे मंत्रों में जाते-जाते यंत्र का स्वरूप भी बदलता है और देवताओं का स्थान भी।

10

अष्टाक्षरी, नवाक्षरी, सप्तशती महायंत्र और बगलामुखी

भगवती के अष्टाक्षरी, नवाक्षरी, सप्तशती महायंत्र और बगलामुखी यंत्र में बहुत सारी समानताएँ मिलती हैं

· Reviewed Sep 2026 · 07:22–07:43

जगदंबा के स्वरूपों में भी यही बात है: अष्टाक्षरी मंत्र का स्वरूप अलग है, नवाक्षरी में अलग है, और बहुत बार समानता भी है। श्री दुर्गा सप्तशती महायंत्र में और श्री भगवती बगलामुखी के यंत्र में — वे मूल यंत्र जो सामान्य हैं और जिन्हें लगभग पूजा जा सकता है — आपको काफी समानताएँ देखने को मिलेंगी।

11

बिंदु, त्रिकोण, षटकोण, अष्टकोण, कमल, भूपुर, वृत्त

यंत्र का रेखांकन वास्तव में कितना अलग होता है?

· Reviewed Sep 2026 · 07:44–08:11 · Also a question

लगभग सौ प्रतिशत यह मानकर चलिए, वे कहते हैं, कि रेखांकन — जो ज्योमेट्रिकल व्यूज़ दिखेंगे — एक जैसे ही होंगे। कोई विशेष बदलाव नहीं है: मध्य में बिंदु रहेगा, फिर त्रिकोण, फिर षटकोण, फिर अष्टकोण, फिर कमल, भूपुर, वृत्त। वृत्त कम-ज्यादा हो सकते हैं और वह मंत्र पर निर्भर करेगा।

12

पीतांबरा बगलामुखी का क्रम और प्रत्यंगिरा स्वरूप

मूल स्वरूप तभी बदलता है जब क्रम में आगे बढ़ा जाए — जैसे पीतांबरा बगलामुखी के प्रत्यंगिरा स्वरूप में

· Reviewed Sep 2026 · 08:12–08:45

भगवती पीतांबरा बगलामुखी के मूल यंत्र में जब आप क्रमगत चलते हैं — त्रयाक्षरी से एकाक्षरी मूल तक, या त्रयाक्षरी और अष्टाक्षरी में — तब तक स्वरूप बना रहता है; लेकिन उसके पश्चात क्रम में आगे बढ़ना शुरू करते हैं तो मूल स्वरूप में भी भिन्नता आने लगती है। पीतांबरा बगलामुखी के प्रत्यंगिरा स्वरूप में जाइए तो उसी यंत्र में भिन्नता दिख जाएगी।

13

नवार्ण और तांत्रिकों का बीसा यंत्र

बीसा यंत्र क्या है?

· Reviewed Sep 2026 · 08:46–09:10 · Also a question

नवार्ण यंत्र बहुत प्रसिद्ध है। नवार्ण में, वे कहते हैं, लोग बीसा यंत्र को जानते हैं — वे स्वयं उसे नवार्ण नहीं कहेंगे, लेकिन बीसा यंत्र लोगों ने बहुत देखा है, जिसके विषय में तांत्रिकों के बीच कहावत प्रचलित है कि "जिसके पास वो बीसा, उसका क्या बिगाड़े जगदीशा"।

14

एक ही बीसा यंत्र तीन अलग तरीकों से बनाया हुआ

क्या एक ही यंत्र पूजन, धारण और उच्चाटन तीनों में काम आ सकता है?

· Reviewed Sep 2026 · 09:11–09:56 · Also a question

हाँ। बीसा यंत्र विभिन्न प्रकार के मिलते हैं — धन से संबंधित, रक्षा से संबंधित, और इनमें सबसे प्रचंड भगवती का माना गया है। लेकिन भगवती का वही रक्षात्मक यंत्र, जो धारण के निमित्त बना है, पूजन के निमित्त भी प्राप्त होता है और काम्य प्रयोग में उच्चाटन के निमित्त भी प्रयुक्त होता है। बदलता क्या है — उसमें बनने वाली रेखाओं की दिशा, स्याही, कलम, और कलम लाने का समय तथा तिथि।

15

कवच का खोल, ठोस यंत्र, और पूजन के लिए धातु

यंत्र किस चीज पर बनवाना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 09:57–10:41 · Also a question

धारण के निमित्त कवच के खोल के ऊपर एक सांकेतिक यंत्र बनाया जा सकता है; या यदि पूरा ठोस में बना रहे हैं तो पूरा विधिवत यंत्र बनाएँ — वह भी चलेगा, लेकिन वह दिखेगा और फिर उसमें बहुत सारी और विधियाँ जुड़ जाती हैं। मुख्यतः, वे कहते हैं, पूजन के निमित्त यंत्र धातु पर बनवाएँ।

16

पहले पुरश्चरण, और मारण का कुएँ का जल तथा लोह कलश

काम्य प्रयोग में भी धातु चलती है, और मारण प्रयोग में कुएँ का जल तथा लोह कलश चाहिए

· Reviewed Sep 2026 · 10:42–11:34

काम्य प्रयोग के यंत्रों में भी धातु का प्रयोग होता है, लेकिन बहुत कुछ ध्यान रखना पड़ता है। वे कहते हैं कि नवार्ण का काम्य प्रयोग लगभग सभी जानते हैं; प्रत्येक मंत्र का अपना काम्य प्रयोग है और वह सब में प्रयोग हो सकता है। जिन्हें पूरी जानकारी नहीं होती वे मंत्र का पुरश्चरण करके सीधे काम्य प्रयोग में उतर जाते हैं — जो तब तक ही चलता है जब तक शत्रु उस स्तर का न हो।

17

न पंचरत्न न सिक्का — लोह कलश और लोह पात्र का यंत्र

मारण प्रयोग में कलश लोहे का होता है, उसमें पंचरत्न और सिक्का नहीं पड़ता, और यंत्र लोह पात्र पर बनता है

· Reviewed Sep 2026 · 11:35–12:13

नवरात्रि की कलश स्थापना में पंचरत्न डाले जाते हैं और धातु का एक टुकड़ा, चाहे तांबे का हो या कोई अन्य सिक्का। मारण प्रयोग में जाएँगे तो उसका प्रयोग नहीं कर सकते। वहाँ कलश स्थापना में देवता का स्वरूप भी बदल जाता है; वहाँ लोहे का कलश होगा, लोहे से संबंधित अन्य धातुएँ, और यंत्र लोह पात्र पर ही बनाकर उसमें स्थापित किया जाएगा।

18

माला, यंत्र, आसन, मंत्र और वस्त्र

साधक के पास कौन सी पाँच चीजें परफेक्ट होनी चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 12:14–13:00 · Also a question

वे दो-तीन साल पहले के एक वीडियो की याद दिलाते हैं: माला, यंत्र, आसन, मंत्र और वस्त्र — ये पाँच चीजें अपने पास परफेक्ट होनी चाहिए। इनमें सबसे पहला विषय आपके अपने शरीर से संबंधित है, और शरीर पर सबसे पहले आता है वस्त्र; साधना के समय वस्त्र का महत्व है।

19

चतु स्वरूप जो एक ही स्वरूप होना चाहिए

यंत्र, मंत्र, गुरु और आराध्य एक ही स्वरूप कैसे हैं?

· Reviewed Sep 2026 · 13:01–13:36 · Also a question

यंत्र, मंत्र, गुरु और आपके आराध्य का स्वरूप — ये चार, यह चतु स्वरूप, चारों एक ही स्वरूप होने चाहिए। देवता का स्वरूप अपने परिकरों के साथ यंत्र में विराजमान है; मंत्र स्वयं यंत्र का स्वरूप है। तो यंत्र, मंत्र और देवता एक हो गए, और चौथे हैं गुरु, जो साक्षात देव स्वरूप ही हैं।

20

साधक — चारों को एक बिंदु में लाने वाला

साधक ही पंचम तत्व है, जो यंत्र, मंत्र, गुरु और आराध्य को एक बिंदु में लाता है

· Reviewed Sep 2026 · 13:37–14:18

पाँचवाँ, जिसे भेदन करना है, वह आप हैं — उपासक, आराधक, भक्त, सेवक, साधक। आप ही इन चारों को एकीकृत करके एक बिंदु में लाने वाले हैं, इसलिए आप भी उसी देवता के स्वरूप हो जाते हैं।

21

साधक का शोधन

दीक्षा में सबसे पहले साधक का शोधन होता है

· Reviewed Sep 2026 · 14:19–14:50

वे कहते हैं कि वे अभी अभिषेक की नहीं, सामान्य दीक्षा की बात कर रहे हैं, और श्रोताओं को चेताते हैं कि इसे किसी पर आक्षेप समझकर कहीं और न ले जाएँ — वे सभी के निमित्त सामान्य जानकारी दे रहे हैं। इसमें सबसे पहले साधक का शोधन होता है।

22

लगातार जप से बढ़ी हुई इंट्यूशन पावर

क्या पुरश्चरण से साधक की भाँपने की शक्ति बढ़ती है?

· Reviewed Sep 2026 · 14:51–15:18 · Also a question

वे कहते हैं कि यदि श्रोता कम से कम कुंभ से ही पुरश्चरण कर रहे होंगे तो उनकी इंट्यूशन पावर — किसी चीज को भाँपने की क्षमता — बहुत बढ़ चुकी होगी। किसी को देखकर आप जान सकते हैं कि यह व्यक्ति साधक है या नहीं, इसके पास कितना सामर्थ्य है, ऊर्जा है या नहीं, खाली है या नहीं।

23

नैष्ठिक साधक, कीलन और त्रिस्करणी दुर्गा का प्रयोग

क्या कोई साधक अपनी ऊर्जा दूसरे साधकों से छुपा सकता है?

· Reviewed Sep 2026 · 15:19–16:12 · Also a question

हाँ। जो नैष्ठिक साधक उस स्तर के हैं, जो कुल परंपरा में कवच आदि का बहुत बृहद विधि विधान जानते हैं और कीलन आदि की जानकारी रखते हैं — जैसे त्रिस्करणी दुर्गा के प्रयोग की जानकारी ली जाती है, वैसे सबकी अपनी कुल परंपरा में उन्हीं दुर्गा से संबंधित स्वरूप हैं, और कई बार लोग उनका प्रयोग इसी निमित्त करते हैं कि उनकी ऊर्जा अन्य साधकों के समक्ष न आ पाए। ऐसे साधकों के विषय में, वे कहते हैं, हम जान नहीं पाएँगे।

24

रामकृष्ण परमहंस और तैलंग स्वामी

रामकृष्ण परमहंस के चित्रों से कोई सामान्य व्यक्ति कह ही नहीं सकता कि वैसी कोई ऊर्जा है

· Reviewed Sep 2026 · 16:13–16:55

रामकृष्ण परमहंस के विषय में वे कहते हैं कि लोगों ने उनके स्वरूप के जितने भी चित्र बनाए हैं, उन्हें देखकर आप कह नहीं सकते — जो सामान्य जन नहीं जानते वे कैसे कह पाएँगे कि वैसा कोई विषय है, लेकिन है। तैलंग स्वामी के विषय में वे कहते हैं कि जो भी पढ़ने को मिलता है — पुलिस वाले पकड़ लिया करते थे आदि — वे भी कहीं न कहीं अपने आप को उस अवस्था में संतुलित करके रखे हुए थे।

25

नित्य नैमित्तिक उपासना और परंपरा की न्यास पद्धति

लगातार साधना और नित्य नैमित्तिक उपासना से सामने वाले को देखकर जान लेने की वही क्षमता आ जाती है

· Reviewed Sep 2026 · 16:56–17:53

वह क्षमता एक स्तर तक आप में भी आ जाती है जब आप लगातार साधना करते हैं, अनुष्ठान और पोषण करते रहते हैं, और नित्य नैमित्तिक रूप से अपनी संध्या उपासना करते हैं — आप देखकर सामने वाले को जानने लगेंगे। फिर वे न्यास पद्धति पर लौटते हैं, जिसमें परंपरा देवता से प्रथम दीक्षित तक और आगे चलकर आपके गुरु तक पहुँचती है, चाहे उसमें करोड़ों वर्ष लगे हों।

26

गुरु, दादा गुरु और परदादा गुरु

शिष्य को गुरु की कितनी पीढ़ियाँ जाननी चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 17:54–18:25 · Also a question

तीन कुल अवश्य जानने चाहिए — अपने गुरु को, उनके गुरु को और उनके गुरु को: यानी कुल परंपरा में दादा गुरु और परदादा गुरु तक की जानकारी होनी चाहिए। जब आपके गुरु को दीक्षा मिली होगी तो उनके गुरु ने पूर्ण विधिवत न्यास आदि करके उन्हें सब बताया होगा। फिर आपका विषय आता है।

27

नित्य साधना से पहले ही शुभ्र हो चुका आभा मंडल

नित्य साधना से आभा मंडल पहले ही शुभ्र हो तो गुरु अलग से शोधन नहीं करते

· Reviewed Sep 2026 · 18:26–19:15

यदि आवश्यक नहीं है तो वे नहीं करवाएँगे — क्योंकि आप पहले से ही जप करते आ रहे हैं: प्रतिदिन पंचाक्षरी का जप, शिव जी का अभिषेक, गणपति जी का तर्पण, भगवान दत्तात्रेय की सेवा, दीपदान, तीर्थ यात्रा, पंचबली। तब आपके शरीर के बाहर उपस्थित सूक्ष्म शरीर की ऊर्जाएँ, आपका आभा मंडल इतना शुभ्र हो चुका होगा कि आपके सामर्थ्यवान गुरु अलग से विशेष शोधन नहीं करेंगे; सामान्य संकल्प आदि के माध्यम से ही स्वीकार कर लेंगे।

28

उपदेश, सहमति, कुल का पूजन, और फिर गुरु पादुका मंत्र

दीक्षा की विधि का क्रम क्या होता है?

· Reviewed Sep 2026 · 19:16–20:01 · Also a question

पहले उपदेश — ये नियम हैं, यह नीति-नियम है, ऐसे करना है, यह विधि विधान रहेगा। फिर आपसे पूछा जाता है कि आप इस परंपरा में इस अनुसार चल सकते हैं या नहीं। उसके बाद गुरु आपको बैठाकर अपने कुल का पूरा विधि विधान करवाते हैं: गुरु गणपति पूजन, गुरु मंडल पूजन, कलश स्थापन, कलश पूजन, योगिनी पूजन, तथा कुल देवी-देवता और कुल रक्षक का पूजन। फिर अग्नि प्रज्वलित करके, शिखा मंत्र आदि के द्वारा, वे गुरु पादुका मंत्र देते हैं।

29

पादुका मंत्र, और जहाँ वह न मिले वहाँ गुरु मंत्र

क्या सबसे पहला मंत्र गुरु पादुका मंत्र ही दिया जाना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 20:02–20:45 · Also a question

वे कहते हैं कि पहला मंत्र अधिकतर गुरु पादुका मंत्र ही होना चाहिए, लेकिन लोग देते नहीं हैं। वे श्रोताओं से कहते हैं कि इससे मन में संशय न आए — वे जनरल बात कर रहे हैं, क्योंकि जिनके गुरु नहीं देंगे वे कहेंगे कि हमारे ने तो नहीं दिया। सबका अपना अलग तरीका हो सकता है और वे क्या देंगे यह उन पर निर्भर है; लेकिन जनरली, वे कहते हैं, पादुका मंत्र दे देना चाहिए और मिल जाना चाहिए।

30

मंत्र का कोई भी रूप, और शरीर में किया जाने वाला न्यास

मंत्र नाम मंत्र, बीजाक्षर या श्लोक कुछ भी हो सकता है, और गुरु उसका न्यास शरीर में करते हैं

· Reviewed Sep 2026 · 20:46–21:36

आप वैसे मंत्र को लेकर भी चल सकते हैं, चाहे वह नाम मंत्र हो, बीजाक्षर हो, कोई बीज मंत्र हो, पूर्ण मंत्र हो, कोई भी मंत्र हो या श्लोक हो। जब गुरु आपको मंत्र देंगे तो आपके शरीर में उसका न्यास करेंगे — कई बार बृहद न्यास भी, जो आपकी अपनी क्षमता के अनुसार होता है।

31

शक्तिपात, कान में मंत्र, और देवता का आगे प्रकट होना

शक्तिपात और कान में दिए गए मंत्र के द्वारा देवता स्वयं को शिष्य में आगे प्रकट करते हैं

· Reviewed Sep 2026 · 21:37–22:28

देवता साक्षात ऊर्जा और शक्ति के स्रोत हैं; उनका मंत्र साक्षात उनका ही रूप है; उनका यंत्र उनकी सारी विद्याओं के साथ है और बिंदु रूप में वे स्वयं हैं। गुरु उन्हीं मंत्रों के बार-बार न्यास और प्रोक्षण से स्वयं देव स्वरूप हो चुके हैं। फिर पाँचवें आप हैं: वही न्यास पद्धति सिखाकर, वही ऊर्जा आप पर प्रक्षेपित करके, शक्तिपात करके और कान में मंत्र देकर — यानी देवता स्वयं को आगे प्रकट करते जा रहे हैं और आपसे उन्हीं की पूजा करवा रहे हैं।

32

सबके लिए खुले मंत्र, और दीक्षा का मार्ग दिए बिना नियम-निषेध की आलोचना

कौन से मंत्र बिना गुरु के भी हर कोई कर सकता है?

· Reviewed Sep 2026 · 22:29–23:09 · Also a question

शास्त्र स्वयं आदेश देते हैं कि कुछ मंत्र बिना गुरु के भी कोई भी कर सकता है — पंचाक्षरी, भगवती का सप्ताक्षरी मंत्र, नाम मंत्र आदि — और उनके लिए बहुत चिंता की आवश्यकता नहीं है। फिर वे उनकी आलोचना करते हैं जो नियम-निषेध को उस स्तर तक ले जाते हैं जिसे कलिकाल में निभाना संभव नहीं: उन्हें कम से कम दीक्षा का एक विकल्प तो खुला रखना चाहिए कि यदि तुम सही मार्ग पर चलना चाहो तो हम तुम्हें अपनी परंपरा में सम्मिलित कर लेंगे।

33

अगले आदमी के पास ऊर्जा का कोई स्रोत न बचना

जो विकल्प दिया गया है उसे भी गलत सिद्ध कर देने से अगले आदमी के पास ऊर्जा का कोई स्रोत ही नहीं बचता

· Reviewed Sep 2026 · 23:10–23:44

यदि वह विकल्प भी नहीं है और जो विकल्प दिया गया है उसे भी आप गलत सिद्ध करने पर तुले हैं, तो अगला आदमी हाथ पर हाथ मारकर बैठ जाएगा — कटने के लिए तैयार, जिसके पास ऊर्जा का कोई स्रोत नहीं, कोई देव स्वरूप नहीं, कोई देव कृपा नहीं। नियम-निषेध के चक्कर में, वे कहते हैं, उस स्तर की गलती नहीं होनी चाहिए कि व्यक्ति अपना नित्य नैमित्तिक जीवन ही छोड़ दे। इसीलिए वे नियम-मर्यादा में रहकर उसे सरल करके रखते हैं।

34

जप की ऊर्जा को एकत्र करना और आवश्यकता पड़ने पर प्रक्षेपित करना

जप से बनी ऊर्जा को एकत्र और संकलित करके आवश्यकता पड़ने पर प्रक्षेपित करना होता है

· Reviewed Sep 2026 · 23:45–24:31

यहाँ मुख्य विषय यह हो जाता है, वे कहते हैं, कि जप करने से जो ऊर्जा निर्मित होती है उसे सही विधि विधान से संयुक्त होकर किस प्रकार एक जगह एकत्रित किया जाए, संकलित किया जाए, और फिर अवसर आने पर, आवश्यकता पड़ने पर उसका प्रयोग या प्रक्षेपण किया जाए।

35

साधनात्मक वस्त्र — धोती-गमछा, और सिले वस्त्र का प्रश्न

साधक को कैसा वस्त्र पहनना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 24:32–25:24 · Also a question

स्नान आदि से शुद्ध होने के पश्चात सबसे पहली बात यह है कि वस्त्र उपयुक्त होना चाहिए और उसे कोई और न पहने। साधनात्मक वस्त्र वही धोती-गमछा है जिसका प्रयोग किया जाता है; ठंडी में शरीर की क्षमता के अनुसार कंबल ओढ़ें या सिला वस्त्र भी। यदि कोई कहे कि सिला वस्त्र बिल्कुल नहीं चलेगा, तो वे कहते हैं कि वे प्राण देने के लिए तो नहीं कह सकते। यदि क्षमता हो तो बिना कुर्ता पहने केवल उत्तरीय वस्त्र धारण करके करें।

36

माला और कवच व्यक्तिगत होने चाहिए

क्या पूरा परिवार एक ही माला या एक ही कवच से काम चला सकता है?

· Reviewed Sep 2026 · 25:25–25:51 · Also a question

नहीं। वे इसे बड़ी विडंबना का विषय कहते हैं कि कभी-कभी ऐसे प्रश्न आते हैं कि एक ही माला है और उससे परिवार के सभी लोग जप करते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। सामान्य से सामान्य माला पर भी जप कर रहे हों तो सभी का अपना अलग और व्यक्तिगत होना चाहिए — जप की माला भी और धारण की माला भी। तीसरा, जो कवच हम धारण करते हैं, वह भी सभी का व्यक्तिगत होना चाहिए।

37

पाँच मिनट से कम में नित्य अभिषेक

देवता के यंत्र के लिए सबसे सरल नित्य विधि क्या है?

· Reviewed Sep 2026 · 25:52–26:43 · Also a question

चौथी चीज है देवता का यंत्र, जिसके ऊपर समस्त जप किया जाता है, जिनका अभिषेक, तर्पण और पूजन करके देवता के समस्त परिवार को संतुष्ट करके आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। अपने आराध्य के यंत्र को लेकर चलने की सबसे सरलतम विधि, वे कहते हैं, यह है: और कुछ नहीं तो नित्य नियम से उनका अभिषेक कर दीजिए। अभिषेक करने में पाँच मिनट से ज्यादा नहीं लगेगा।

38

अनुष्ठान से प्राप्त, स्वयं बनाया या बनवाया — और बनाने वाला कौन

यंत्र कहाँ से आता है, और कारीगरों की अवस्था के कारण उपलब्धता क्यों सीमित है

· Reviewed Sep 2026 · 26:44–27:42

अभिषेक के लिए, वे कहते हैं, मान लीजिए भगवान शिव का यंत्र है — या भगवान दत्तात्रेय का ले लीजिए: आप भगवान दत्त की सेवा-पूजा कर रहे हैं और उनसे संबंधित कोई यंत्र आपके पास है, चाहे वह अनुष्ठान आदि के माध्यम से प्राप्त हुआ हो, आपने स्वयं बनाया हो, बनवाया हो, या आप उनका नित्य पूजन करते हों। फर्क सिर्फ इतना-सा होता है कि विधि कहाँ से ली जाएगी, वह किस अवस्था में और कौन बनाए। कारीगरों की अवस्था, वे कहते हैं, बहुत दयनीय है; सनातनी कारीगर मिलना कठिन है, इसलिए बहुत सारी चीजें हमें बहुत सीमित मात्रा में ही उपलब्ध होती हैं।

39

कवच, माला मंत्र, स्तोत्र और सतनामावली का पाठ करते हुए अभिषेक

यंत्र का अभिषेक करते समय किसका पाठ करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 27:43–28:06 · Also a question

भगवान दत्त के लिए, वे कहते हैं, आप उनके वज्र पंजर कवच का, उनके माला मंत्र का, उनके स्तोत्र और सतनामावली का पाठ करते होंगे। इन्हीं का पाठ करते हुए अभिषेक करें; या स्तोत्र सतनामावली को, अथवा स्तोत्र को कंठस्थ कर लीजिए और उसी का पाठ करते हुए या जप करते हुए, एक से अधिक आवृत्ति करते हुए अभिषेक कीजिए।

40

गाय का कच्चा दूध, और पैकेट का दूध क्यों नहीं

यंत्र का अभिषेक किस चीज से करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 28:07–28:37 · Also a question

यदि संभव हो तो गाय का कच्चा दूध। पैकेट के दूध से अभिषेक न करें, वे कहते हैं, क्योंकि वह पहले से गर्म करके ठंडा किया हुआ है — पाश्चराइजेशन की प्रक्रिया है, इसलिए वह उबला हुआ दूध है, कच्चा दूध नहीं। यदि गाय का कच्चा दूध मिल सके तो उससे; अन्यथा गंधोदक से भी कोई दिक्कत नहीं है।

41

जल में कपूर, अष्टगंध, रोली, गुलाब जल और अगरु

अभिषेक के लिए गंधोदक कैसे बनाया जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 28:38–28:51 · Also a question

जल में थोड़ा कपूर घिसकर उसका बुरादा बना लीजिए; उसमें अष्टगंध डालिए, थोड़ी रोली डालिए, और अच्छे से मिला दीजिए। गुलाब जल और अगरु जल डाल दीजिए। एक लोटा सुगंधित हो गया।

जल, वे कहते हैं: जल के भीतर थोड़ा कपूर घिसकर उसका बुरादा बना लीजिए, और उसमें अष्टगंध डालिए, थोड़ी रोली डालिए, और अच्छे से मिला दीजिए। गुलाब जल और अगरु जल डाल दीजिए। एक लोटा सुगंधित हो गया।

42

अभिषेक मात्र से यंत्र के समस्त देवताओं का पूजन

क्या केवल अभिषेक से ही यंत्र का पूजन पूरा हो जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 28:52–29:30 · Also a question

हाँ। पाठ आरंभ कीजिए — "ओम महासिद्धाय नमः दत्तात्रेयाय नमः" — अपना मंत्र पढ़ते जाइए और यंत्र के ऊपर जल की धार गिराते जाइए; अभिषेक हो गया। केवल अभिषेक से ही, वे कहते हैं, उस यंत्र का संपूर्ण पूजन हो जाता है। यदि और कुछ नहीं जानते और कुछ करना नहीं चाहते, तो कुछ मत कीजिए — बस यंत्र का अभिषेक कर दीजिए, उसमें उपस्थित समस्त देवताओं का अभिषेक एक साथ हो जाता है।

43

केमिकल पाउडर की जगह चीनी का बुरादा

पीला पड़ चुके यंत्र की सफाई कैसे करनी चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 29:31–30:06 · Also a question

जहाँ बहुत सेवा-पूजा होती है वहाँ यंत्र पूरा पीला पड़ जाता है — उस पर चंदन और टीका लगते रहने से, दूध, दही, मक्खन और घी चढ़ते रहने से। साफ करने के लिए, वे कहते हैं, कोई केमिकल पाउडर मत लगाइए: चीनी का मोटा बुरादा लीजिए, बहुत अच्छे से चमक जाएगा। अभिषेक के बाद थोड़ा बुरादा लगाकर, थोड़ा जल डालकर अच्छे से घिस दीजिए।

44

वह घिसकर मिटता नहीं — पीढ़ियों तक रहता है

धातु का यंत्र कितने दिन चलेगा?

· Reviewed Sep 2026 · 30:07–30:18 · Also a question

इसलिए, वे कहते हैं, उसके उखड़ने, टूटने और मिटने के ऊपर जन्म-जन्म बीत जाएगा — वह कभी मिटेगा नहीं। जब तक कोई अपने हाथ से मोड़ या तोड़ न दे, वह यंत्र आपके यहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी बना रहेगा।

इसलिए, वे कहते हैं, उसके उखड़ने, टूटने और मिटने के ऊपर जन्म-जन्म बीत जाएगा। वह कभी मिटेगा नहीं। पीढ़ी दर पीढ़ी वह यंत्र आपके यहाँ बना रहेगा, जब तक कोई अपने हाथ से उसे मोड़ या तोड़ न दे।

45

सामान्य सेवा से यंत्र नहीं मिटता

यंत्र केवल जोर लगाने से टूटता है; चीनी का बुरादा और फिर अभिषेक उसकी चमक लौटा देते हैं

· Reviewed Sep 2026 · 30:19–30:51

धोने-पोंछने में भी वह तभी टूटेगा जब कोई बहुत जोर लगाकर मोड़ या तोड़ दे; सामान्य सेवा जितनी करनी चाहिए, उससे वह कभी मिटेगा या टूटेगा नहीं। इसलिए निश्चिंत होकर चीनी के बुरादे से उन्हें अच्छे से धो लीजिए, और उसके बाद गंधोदक से, दूध से, जिससे चाहें उनका अभिषेक कर दीजिए — यंत्र चमकने लगेगा। वह सदैव चमकता रहता है, वे कहते हैं, विशेष करके चाँदी वाला।

46

तांबा आधे घंटे में ही काला पड़ने लगता है

तांबे का धनदा यंत्र इतनी जल्दी फिर से काला क्यों पड़ जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 30:52–31:48 · Also a question

जिनके पास धनदा यंत्र है वह अधिकतर तांबे का ही होगा, और तांबे में आप कितना भी साफ करें, आधे घंटे में ही कालापन लौट आता है — जल से या चढ़ाए गए पुष्पों से। वे कहते हैं कि उनके पास भी हैं, और नित्य सेवा-पूजा में जो कुछ श्रोता करते हैं वह सब वे भी करते हैं, इसलिए थोड़ा श्रम आवश्यक है; उन्हें रोज साफ करने और स्नान कराने में समय लगता है।

47

सप्ताह में एक दिन या दस दिन में एक दिन पर्याप्त

क्या यंत्र को हर रोज माँजना ही पड़ेगा?

· Reviewed Sep 2026 · 31:49–32:05 · Also a question

नहीं। यदि आप रोज इतनी अच्छी तरह साफ नहीं कर सकते, चमका नहीं सकते और इतना समय नहीं है, तो कोई दिक्कत नहीं — एक दिन में वह गंदा नहीं हो जाएगा। सप्ताह में एक दिन, या दस दिन में एक दिन बैठकर, जब आपको लगे कि हाँ ये पीले पड़ गए हैं, तब चीनी के बुरादे से एक बार साफ कर दीजिए; चमक जाएँगे और अगले दस दिन आराम से चमकते रहेंगे।

48

खड़ा रखना, या चौकी पर वस्त्र बिछाकर बैठाना

यंत्र को किस पर विराजमान करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 32:06–32:35 · Also a question

सारे देवता संतुष्ट हो जाते हैं, वे कहते हैं; उनका अभिषेक कीजिए, सूती वस्त्र से अच्छे से पोंछ दीजिए, वे सूख गए। आसन के विषय में: एक तरीका यह है कि उसे खड़ा रखा जाए, वह भी रखा जा सकता है, कोई दिक्कत नहीं। दूसरा यह कि चौकी जैसा आसन हो, उस पर वस्त्र बिछाकर उन्हें बैठाया जाए — जैसे यंत्र के ऊपर कोई श्री विग्रह रखना हो तो पहले चौकी पर यंत्र रखते हैं, फिर श्री विग्रह। इस प्रकार रखना, वे कहते हैं, अधिक उचित है।

49

अभिषेक की चौकी और थाली, तथा तिलक की विधि

अभिषेक के लिए दो-तीन सौ रुपये की चौकी, और यंत्र में प्रत्येक देवता का तिलक

· Reviewed Sep 2026 · 32:36–33:19

अभिषेक के लिए चौकी चाहिए, या पूजा में ही प्रयोग होने वाली कोई कटोरी उल्टी करके उसके ऊपर अभिषेक कर सकते हैं। चौकी, वे कहते हैं, दो-तीन सौ रुपये में आराम से मिल जाती है; नित्य प्रयोग के लिए एक छोटी चौकी और एक थाली ले लीजिए जिस पर यंत्र रखा जा सके, और उन पर रखकर अभिषेक कीजिए। उसके बाद तिलक आता है: यंत्र में जिस-जिस देवता का जहाँ स्थान है, वहाँ उनके अर्चन, पूजन और तिलक की विधि है।

50

मध्य के बिंदु पर तिलक

स्थान-स्थान के अर्चन का समय न हो तो अभिषेक करके बीच के मूल पर तिलक लगा दीजिए

· Reviewed Sep 2026 · 33:20–33:51

यदि आपके पास इतना समय नहीं है तो कोई समस्या नहीं, वे कहते हैं — मन में यह संशय बिल्कुल मत लाइए कि यह नहीं हो पाया। जो साधक बृहद स्तर तक जाते हैं, जिनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य सेवा-पूजा है और कोई अन्य कार्य नहीं, वे इतना करें; जिनका अपना कार्य है वे बस अभिषेक कर दें और बीच में मूल पर तिलक लगा दें।

51

पूजन के आरंभ में विस्तार, और विसर्जन में मूल बिंदु में समावेश

यंत्र का पूजन बिंदु पर ही क्यों केंद्रित होता है?

· Reviewed Sep 2026 · 33:52–34:24 · Also a question

क्योंकि पूजन मूल में ही होगा, मध्य के बिंदु पर, केंद्र में। यंत्र पूजन में, वे कहते हैं, आरंभ में वे स्वयं को विस्तारित करते हैं, फैलते हैं, और बाद में स्वयं को समेट लेते हैं। जब पूजन का विसर्जन होता है तो विभिन्न मंडलों में उपस्थित उनके सारे परिकर — दश दिगपाल अपने आयुधों के साथ, जो भी शक्तियाँ हैं, दश दिगपालों की प्रमुख शक्तियाँ, भगवती कादंबरी आदि — उसी मूल बिंदु पर आकर देवता के भीतर की मूल शक्ति में समा जाते हैं, चाहे वे भगवती हों या भगवान शिव।

52

नैवेद्य यंत्र पर नहीं, अर्चन की सामग्री यंत्र पर

क्या यंत्र के ऊपर नैवेद्य रखा जा सकता है?

· Reviewed Sep 2026 · 34:25–34:47 · Also a question

नहीं — यंत्र के ऊपर नैवेद्य मत रखिए। नैवेद्य वह भोग है जो उनके समक्ष अर्पित किया जाता है। यंत्र पर चीजें अर्चन के समय रखी जाती हैं: यदि आप सहस्रनाम से या सतनाम से अर्चन करना चाहें — किशमिश से, काजू से, मखाने से, कमलगट्टे से या किसी अन्य सामग्री से — तो उस समय ये यंत्र के ऊपर रख सकते हैं।

53

पाँच, सात या नौ बार लपेटा हुआ मौली

यंत्र को वस्त्र के रूप में क्या अर्पित किया जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 34:48–35:29 · Also a question

यंत्र के ऊपर वस्त्र अवश्य रखना चाहिए। पूरी साड़ी और धोती अर्पित करना आवश्यक नहीं है। सूती मौली बाजार में आराम से मिल जाती है और सभी उसका प्रयोग करते हैं: उसका एक बड़ा बंडल रख लीजिए। वे यह नहीं कहते कि रोज नया अर्पित करें — यदि समय हो तो रोज नया अर्पित कीजिए, मुश्किल से पाँच सेकंड लगते हैं। हाथ पर पाँच, सात या नौ बार लपेटकर एक छोटा ढेर बना लीजिए, तोड़ लीजिए, हल्का सुगंधित कर लीजिए और यंत्र पर रख दीजिए।

54

श्रीमद्देवीभागवत पढ़िए, और मनसा परिकल्पयामि से अर्पण

नित्य वस्त्र अर्पित करने का पुण्य, और "मनसा परिकल्पयामि" कहकर अर्पण

· Reviewed Sep 2026 · 35:30–36:32

आप अपने आराध्य को नित्य वस्त्र अर्पित कर रहे हैं; उसका महत्व कितना बड़ा है, इसके लिए वे कहते हैं कि श्रीमद्देवीभागवत पढ़िए और देखिए कि देवता के यंत्र का नित्य अर्चन या अभिषेक करने में और उन्हें नित्य वस्त्र अर्पित करने में क्या महत्व है। आप बोलकर भी अर्पित कर सकते हैं — "मनसा परिकल्पयामि", कि हम इसे मन से अर्पित कर रहे हैं — और यह कहकर कि वस्त्र के निमित्त हम रक्त सूत्र अर्पित कर रहे हैं; पूर्ण फल प्राप्त होगा।

55

घर का पुष्प स्वर्ण अर्पित करने का फल देता है

घर में उगाया हुआ पुष्प अर्पित करने का क्या फल है?

· Reviewed Sep 2026 · 36:33–37:10 · Also a question

यदि आपने घर पर एक भी पुष्प का पौधा लगाया है और उस पर नित्य एक भी पुष्प खिलता है, तो वही एक पुष्प उस यंत्र पर अर्पित कीजिए — और समस्त देव समूह को स्वर्ण अर्पित करने का फल प्राप्त होगा; स्वर्ण, वे दोहराते हैं। घर में लगाया और सेवा किया हुआ पुष्प जब आप देवता को अर्पित और समर्पित करते हैं, तो देवता स्वर्ण अर्पित करने का ही फल देते हैं।

56

पुण्य जो कभी समाप्त नहीं होता

अपने बगीचे के पुष्पों से शतार्चन या सहस्रार्चन करने पर ऐसा पुण्य मिलता है जो कभी समाप्त नहीं होता

· Reviewed Sep 2026 · 37:11–37:31

यदि घर पर पुष्प वाटिका है और 108 पुष्प या 1000 पुष्प मिल जाते हैं, और आप उनका शतार्चन और सहस्रार्चन करते हैं, तो ऐसा फल प्राप्त होता है कि वह पुण्य कभी समाप्त ही नहीं हो सकता। इतना फल है, वे कहते हैं, यदि आप अपने बगीचे में लगाए पुष्पों से देवता का अर्चन करते हैं।

यदि घर पर आपकी पुष्प वाटिका है, वे कहते हैं, और 108 पुष्प मिल जाते हैं, 1000 पुष्प मिल जाते हैं, और आप उनका शतार्चन और सहस्रार्चन करते हैं — तो इतना फल प्राप्त होता है कि वह पुण्य कभी समाप्त ही नहीं हो सकता। अपने बगीचे में लगाए हुए पुष्प आदि से यदि आप देवता का अर्चन करते हैं तो इतना फल है।

57

स्वर्ण चोरी का फल, और यमदूतों का पिघला हुआ सोना

पूजा के लिए पुष्प या तुलसी चुराने का क्या फल है?

· Reviewed Sep 2026 · 37:32–38:17 · Also a question

इसी प्रकार, जब आप दूसरे के बगीचे से पुष्प तोड़ते हैं, तुलसी जी को तोड़ते या उखाड़ते हैं, बिना पूछे चुराकर घर ले आते हैं, तो उस अवस्था में आपको स्वर्ण चोरी का फल प्राप्त होता है। वही दोष आपके ऊपर लगता है और उसी प्रकार भोगना पड़ता है: नरक में ले जाने पर यमदूत उसी स्वर्ण को पिघलाकर आपको पिलाते हैं और उसी स्वर्ण को पिघलाकर आपको स्नान कराते हैं।

58

कुछ दिए बिना आधा पुण्य देने वाले को चला जाता है

यदि पुष्प पड़ोसी के यहाँ से लाना पड़े तो क्या करें?

· Reviewed Sep 2026 · 38:18–38:56 · Also a question

यदि कभी मित्र या पड़ोसी के यहाँ से पूछकर भी पुष्प लाना पड़े, तो बिना कोई मुद्रा दिए वह पुष्प लाकर अर्पित करने पर उसका 50 प्रतिशत कटकर उन्हीं को चला जाता है — पुण्य वैसे ही उन्हें मिल जाता है। आप कितना भी श्रृंगार कर लें, दूसरे के यहाँ से कुछ मुद्रा देकर, खरीदकर ही लाना चाहिए। थोड़ा-सा ही दे दीजिए, या बदले में कुछ दे दीजिए; अन्यथा ऋण रह जाएगा और आधा पुण्य उन्हें चला जाएगा।

59

शतार्चन या सहस्रार्चन, और हर बेलपत्र के साथ शिव माला मंत्र

यंत्र का बृहद पूजन — शतार्चन या सहस्रार्चन, और प्रत्येक बेलपत्र पर शिव माला मंत्र का पाठ

· Reviewed Sep 2026 · 38:57–39:44

यंत्र का सामान्य पूजन इतना ही है। यदि अधिक समय है और बृहद पूजन करना चाहते हैं तो शतार्चन या सहस्रार्चन कीजिए। भगवान शिव का है तो नित्य पंचाक्षरी का पाठ कीजिए, या भगवान की अष्टोत्तर सतनाम का पाठ कीजिए, और सबसे दिव्य — भगवान शिव के माला मंत्र का पाठ करके अर्पित कीजिए। मान लीजिए पाँच बेलपत्र मिले: एक बेलपत्र हाथ में लेकर पूरा शिव माला मंत्र पढ़िए और उसे यंत्र पर अर्पित कीजिए।

60

देवी सूक्तम, जो किसी भी यंत्र पर चलता है

भगवती के यंत्र के अभिषेक में देवी सूक्तम पढ़ा जाता है, और वह किसी भी यंत्र पर चलता है

· Reviewed Sep 2026 · 39:45–40:12

भगवती का यंत्र है तो अभिषेक इसी प्रकार होगा; अभिषेक के समय देवी सूक्तम का पाठ कीजिए। और भगवान शिव के यंत्र के अभिषेक के पश्चात यदि आप देवी सूक्तम का पाठ करके उस पर बेलपत्र अर्पित करें तो बहुत अच्छा है। देवी सूक्तम का नित्य पाठ किसी भी यंत्र पर चलता है, वे कहते हैं — चाहे भगवती का हो, भगवान शिव का हो या भगवान दत्त का — क्योंकि सभी में शक्ति विराजमान है।

61

अग्नि स्पर्श अनिवार्य है

सूतक या पातक के बाद यंत्र या कवच का क्या करना पड़ता है?

· Reviewed Sep 2026 · 40:13–40:51 · Also a question

उस यंत्र के विषय में एक बात ध्यान रखिए, वे कहते हैं: चाहे वह कवच हो, कोई भी कवच जो आप गले में धारण करते हैं, या कोई भी यंत्र — सूतक या पातक पड़ जाने के पश्चात उनका अग्नि स्पर्श अवश्य करवाइए।

और उस यंत्र के विषय में एक बात ध्यान रखिए, वे कहते हैं: चाहे वह कवच हो, कोई भी कवच जिसे आपने गले में धारण किया है, या कोई भी यंत्र हो — सूतक या अशौचपरिवार में जन्म या मृत्यु जैसे अवसरों पर उत्पन्न अशुद्धि की स्थिति, जिसके दौरान कुछ अनुष्ठान व पाठ वर्जित रहते हैं। पड़ जाने के पश्चात उनका अग्नि स्पर्श अवश्य करवाइए। अग्नि स्पर्श किस प्रकार करना है, वे कहते हैं, यह उदाहरण भी देखिए और सुनिए।

62

दस, बारह या पंद्रह दिन — और शुद्धि वास्तव में हमारी अपनी

जन्म का सूतक कितने दिन का होता है, और क्या वह यंत्र पर लगता है?

· Reviewed Sep 2026 · 40:52–41:41 · Also a question

मान लीजिए आपके घर में बच्चे का जन्म हुआ: जन्म का सूतक लग गया, शौच लग गया। जब तक छठी न हो जाए — और वैसे भी कम से कम एक पक्ष नहीं बीतेगा; दस दिन, बारह दिन, जैसा हो, दस दिन सामान्य रूप से माना जाता है — तो बारह या पंद्रह दिन के बाद ही आप पूजन आरंभ करेंगे। सूतक, वे कहते हैं, यंत्र और कवच पर वैसे नहीं लगेगा; लेकिन चूँकि हम उन्हें स्पर्श करने जा रहे हैं, इसलिए यहाँ शुद्धि वास्तव में हमारी अपनी है।

63

हर वस्त्र और चाँदनी धुली या बदली, और स्थान की सफाई

सूतक के बाद पूजा स्थान का हर वस्त्र और चाँदनी धोई या बदली जाती है और स्थान की सफाई होती है

· Reviewed Sep 2026 · 41:42–42:19

सबसे पहला काम यह है कि पूजा स्थान के प्रत्येक देवता पर जो वस्त्र आपने चढ़ाए या नीचे बिछाए हैं, वे सब बदलने पड़ेंगे। यदि बदले न जा सकें तो कम से कम उन्हें धोकर, सुखाकर फिर चढ़ाना होगा। ऊपर लगी हुई चाँदनी भी धोई या बदली जाएगी। यदि पूजा स्थान की पुताई और पोंछा हो सके तो बहुत अच्छा; अन्यथा झाड़-पोंछकर साफ कर दीजिए।

64

कच्चे दूध का अभिषेक, चित्रों पर गंगाजल, नया या धुला वस्त्र

देवताओं का गाय के कच्चे दूध से अभिषेक, चित्रों पर गंगाजल, और सब पर नया या धुला वस्त्र

· Reviewed Sep 2026 · 42:20–42:49

प्रत्येक देवता का गाय के कच्चे दूध से अभिषेक करना पड़ेगा। चित्रों पर गंगाजल छिड़किए, प्रतिमाओं को अच्छे से पोंछकर सुरक्षित रखिए। सबकी शुद्धि करनी है। जब पूजन स्थान पर सभी का स्नान हो जाए तो सब पर नया वस्त्र, या धुला हुआ वस्त्र चढ़ाइए। फिर मालाएँ आती हैं — जप की भी और धारण की भी: धारण वाली माला का धागा बदल देना चाहिए, यद्यपि वे कहते हैं कि न बदलें तो भी कोई दिक्कत नहीं।

65

कवचों के नए धागे, भीमसेनी कपूर, और पहले पूजन में हवन

अग्नि स्पर्श से पहले: हर कवच में नया धागा, भीमसेनी कपूर, और उस दिन के पहले पूजन में हवन

· Reviewed Sep 2026 · 42:50–43:40

सब कुछ इकट्ठा कीजिए — सारी मालाएँ, यंत्र, कवच — उन्हें अच्छे से झाड़ लीजिए, और कम से कम हर कवच का धागा बदल दीजिए। माला में धागा पिरोना पड़ता है इसलिए वहाँ दिक्कत है, यह वे मानते हैं, तो उसका बस अग्नि स्पर्श करा दीजिए; लेकिन बाकी कवचों में जो धागा है उसे निकालकर नया धागा डालिए। फिर एक पात्र में कपूर रखिए — भीमसेनी कपूर, शुद्ध कपूर — और उस दिन के पहले पूजन में हवन अवश्य कीजिए।

66

हवन कुंड की अग्नि, दूध से धुलाई, और तेजी से अग्नि के आर-पार

अग्नि स्पर्श वास्तव में किस प्रकार किया जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 43:41–44:28 · Also a question

हवन कुंड में प्रज्वलित अग्नि से ही कपूर लीजिए; कपूर को उससे स्पर्श कराकर ज्वाला प्रज्वलित कीजिए। फिर सबसे पहले सारी मालाओं को गाय के दूध से धोइए; कवच और यंत्र को गाय के दूध से और फिर थोड़े जल से धोकर शुद्ध कीजिए, और उस माला, यंत्र और कवच को बहुत तेजी से अग्नि के आर-पार निकाल दीजिए। जलाने कभी मत बैठिए, वे चेताते हैं। अग्नि स्पर्श का अर्थ है कि वह पल भर में आर-पार निकल जाए — अग्नि के बीच से निकलकर आ गया, जला नहीं, केवल स्पर्श हुआ। अग्नि जिसे स्पर्श कर ले वह शुद्ध हो जाता है; अग्नि साक्षात देव हैं और सबको पवित्र करते हैं।

67

जप की माला हर व्यक्ति स्वयं ही सँभाले

क्या एक ही व्यक्ति सबकी जप माला का अग्नि स्पर्श कर सकता है?

· Reviewed Sep 2026 · 44:29–45:11 · Also a question

नहीं। इस प्रकार सबकी शुद्धि करके उन्हें फिर अपने-अपने स्थान पर विराजमान कीजिए; सब अपना-अपना कवच धारण करें, सब अपनी-अपनी माला लें। अब आप साधक हैं, आपकी पत्नी साधिका हैं, बहन साधिका हैं, भाई साधक हैं — तो सबकी जप माला लेकर मत बैठिए, वे कहते हैं। कवच आप कर सकते हैं, धारण की माला का अग्नि स्पर्श भी आप कर सकते हैं, लेकिन किसी और की जप माला मत छूइए। जिसकी माला है वही उसे गोमुखी से निकालेगा, शुद्ध करेगा, गोमुखी को धोएगा, और स्वयं ही गोमुखी और माला का अग्नि स्पर्श कराएगा।

68

तेजी, वृद्धजन का अपवाद, और कोई देखने वाला नहीं

जप माला का अग्नि स्पर्श तेजी से, उसके अपने ही स्वामी के हाथों और बिना किसी दर्शक के होता है

· Reviewed Sep 2026 · 45:12–45:45

यह बिल्कुल तेजी से करना है, हाथ तेजी से चले — बस स्पर्श जितना; वहाँ भूनना नहीं है। सब अपनी-अपनी माला का अग्नि स्पर्श कराएँगे। यदि कोई वृद्धजन, जो जप करते हैं, ऐसा न कर सकें तो अग्नि उनके पास ले जाकर उन्हीं से करवाना चाहिए; और यदि वे बिल्कुल न कर सकें तो आप स्वयं करके दे सकते हैं — पिता हों, दादा हों, चलेगा। लेकिन ऐसा नहीं कि दस लोग उस माला को छू रहे हों। और जिस समय आपकी माला का अग्नि स्पर्श हो रहा हो, वहाँ पूरी बटालियन खड़ी होकर निरीक्षण न करे कि आपका हुआ या नहीं; जब आप अपना करें तो केवल आप ही हों।

69

गोमुखी में जाने के बाद स्वयं भी न देखें

क्या जप की माला कभी दिखानी या देखनी चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 45:46–46:12 · Also a question

जब आप माला को गोमुखी से निकालकर, गोमुखी धोकर सूखने रख दें, तो उस समय माला को किसी पात्र में या किसी नए धुले वस्त्र में लपेटकर, ढककर रखिए — वे जप वाली माला की बात कर रहे हैं। ऐसा नहीं कि प्रदर्शनी लगी हो — देखो मेरी माला, देखो मेरी माला। माला एक बार गोमुखी में चली जाती है तो दोबारा स्वयं भी देखने की मनाही है; आप भी मत देखिए, केवल सुमेरु देखिए। दिख जाना अलग विषय है — लेकिन अन्य किसी को नहीं देखना चाहिए।

70

मृत्यु — वही नियम, लेकिन हर धागा बदलना पड़ेगा

क्या पातक को सूतक से अलग तरीके से लिया जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 46:13–46:56 · Also a question

पातक पड़ जाने पर, किसी की मृत्यु हो जाने पर, उस समय भी शुद्धिकरण के पश्चात सारा नियम यही रहेगा — बस उस समय सारा धागा अवश्य बदलना पड़ेगा। उस समय विशेष ध्यान रखिए, वे कहते हैं, और प्रयास कीजिए कि जप की माला आदि का धागा भी बदल दें तो उचित रहेगा।

71

तंत्रोक्त देवी सूक्तम के सत्ताईस पाठ

सूतक या पातक के बाद यंत्रों पर क्या समर्पित करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 46:57–47:22 · Also a question

सभी यंत्रों पर, वे कहते हैं, तंत्रोक्त देवी सूक्त का पाठ करके आप समर्पण करेंगे। जब भी सूतक-पातक पड़ेगा, उसके पश्चात भी संभव हो तो कम से कम 27 देवी सूक्त का पाठ करके उन सभी यंत्रों पर अवश्य समर्पित करना चाहिए जिनका आपने अग्नि स्पर्श कराया है। सभी मालाओं पर भी करना चाहिए और सभी कवचों पर भी।

72

लौंग, इलायची या सुपारी से गिनती, और श्रृंगार के बाद समर्पण

27 पाठ किस चीज से गिने जाएँ और पुष्प कब समर्पित हो

· Reviewed Sep 2026 · 47:23–48:04

27 पाठ केवल यंत्र पर बोलिए; बाकी सब पर — कवच आदि पर, माला आदि पर — एक-एक पाठ करके भी समर्पित कीजिए। 27 पुष्प ले लीजिए, या एक ही पुष्प है तो एक ही लीजिए; 27 गिनने के लिए कोई सामग्री रख लीजिए — माला से, लौंग से, इलायची से, सुपारी से या कर माला पर गिन लीजिए। पुष्प यंत्र के ऊपर तभी अर्पित कीजिए जब आप उनका अभिषेक कर चुके हों, अग्नि स्पर्श करवा चुके हों, पुनः अभिषेक करके उन्हें अपने स्थान पर विराजमान करा चुके हों और श्रृंगार आदि कर चुके हों। उसके बाद कोई भी तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ कीजिए — तंत्र का ही हो, वे ध्यान दिलाते हैं। पुनः प्रतिष्ठा के साथ हर दोष और दिक्कत तुरंत दूर हो जाती है।

73

उपदेवताओं और दुष्ट शक्तियों का आगमन, और यंत्र की रक्षा

सूतक के बाद यंत्र की ऊर्जा को पुनः प्रचंड करना क्यों आवश्यक है

· Reviewed Sep 2026 · 48:05–48:42

ये सब चीजें करने से, वे कहते हैं, साधक की ऊर्जा बनी रहती है और उसका क्षय नहीं होता — क्योंकि सूतक में बहुत सारे देवताओं, उपदेवताओं और निकृष्ट देवताओं का आगमन होता है, दुष्ट शक्तियों का आगमन होता है। उस समय यंत्र की ऊर्जा ही आपकी सुरक्षा करती है। इन सबसे निवृत्ति के पश्चात जब आप अभिषेक और समर्पण करेंगे, इतना जप करके, तो ऊर्जा पुनः प्रचंड अवस्था में आ जाएगी और आपने साल-दो-साल-तीन साल जितना भी जप किया होगा वह ऊर्जा बनी रहेगी। क्षय तो वैसे भी नहीं होता, वे कहते हैं; जो दोष वाला विषय होता है वह दूर हो जाता है, और कृपा प्राप्ति सो अलग।

74

हर एक पर एक पाठ और एक पुष्प या चावल

मालाओं और कवचों का भी अपना अभिषेक, अग्नि स्पर्श और देवी सूक्तम समर्पण होता है

· Reviewed Sep 2026 · 48:43–48:58

जो जप की माला है और जो कवच है, वे कहते हैं, उन सभी का भी अभिषेक और अग्नि स्पर्श होगा; और सबके ऊपर एक-एक बार ही सही, एक-एक पुष्प से या चावल से जप करके, तंत्रोक्त देवी सूक्तम का समर्पण अवश्य कर दीजिए। इसी से उनकी ऊर्जा भी बनी रहेगी।

जो जप की माला है, जो कवच है, वे कहते हैं, उन सभी का भी अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। और अग्नि स्पर्श होगा। और सबके ऊपर एक-एक बार ही सही, एक-एक पुष्प से या चावल से जप करके, उनके ऊपर भी तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का समर्पण अवश्य कर दीजिए। इसी से उनकी ऊर्जा भी बनी रहेगी।

75

समस्त दत्त मंडल की कृपा, और दिव्य कवच

दत्त माला मंत्र से शतार्चन करने पर समस्त दत्त मंडल की कृपा प्राप्त होती है

· Reviewed Sep 2026 · 48:59–49:13

यदि समय है तो शतार्चन कीजिए। भगवान दत्त के माला मंत्र का जप करके यंत्र पर समर्पण करेंगे तो समस्त दत्त मंडल की कृपा प्राप्त होगी; उनके वज्र पंजर कवच का पाठ करके समर्पण करेंगे तो दिव्य कवच और दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होगा।

अब यदि आपके पास समय है, वे कहते हैं, तो आप शतार्चन करें। भगवान दत्त के माला मंत्र का जप करके उनके ऊपर समर्पण करेंगे तो समस्त दत्त मंडल की कृपा प्राप्त होगी। उनके वज्र पंजर कवच का पाठ करके समर्पण करेंगे तो दिव्य कवच, दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होगा।

76

अभिषेक, स्तोत्र-सतनाम समर्पण, और सिंदूर से रंग फीका पड़ने पर चीनी का बुरादा

बृहद विधियों से पहले जो सबके लिए नित्य कॉमन है

· Reviewed Sep 2026 · 49:14–49:53

यंत्र का तर्पण भी किया जा सकता है, वे कहते हैं, लेकिन वह थोड़ा बृहद की ओर जाना है। अभी तक जितना बताया है वह सभी नित्य नियम से करें: जितना अभिषेक हो सके, और उसके पश्चात उनके स्तोत्र-सतनाम का जप करके समर्पण कर दीजिए; और जो कवच या मंत्र आप जपते हैं वह नित्य नियम से उसी यंत्र पर समर्पित होगा। जब यंत्र का रंग फेड हो जाए — चंदन लगने से, रोली लगने से, और सिंदूर का रंग कभी-कभी जाता नहीं इसलिए थोड़ा लालीपन रह जाता है — तब चार-पाँच बार चीनी का बुरादा लगाकर अच्छे से घिसना होगा। इतना, वे कहते हैं, सबके लिए कॉमन है।

77

पितरों से संबंधित कोई भी समस्या, और गृहस्थ के पास संभावित यंत्र

यंत्र का तर्पण कब आवश्यक होता है, और किन यंत्रों पर किया जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 49:54–50:33 · Also a question

तर्पण की आवश्यकता विशेष करके तब निवारी जाती है जब पितरों से संबंधित कोई समस्या हो। यह आपके पास के किसी भी यंत्र पर किया जा सकता है — पंचानन यंत्र, यदि आप उस अनुष्ठान में थे जो सब मिलकर करते हैं; भगवान दत्त का; भगवती दुर्गा जी का; भगवती चंडिका सप्तशती यंत्र; भगवती बगला का। दो-तीन, वे कहते हैं, अधिकतर लोगों के पास होंगे। धनदा यंत्र का विषय अलग है: उसका पूरा विधि विधान पहले बताया जा चुका है और वह इसी प्रकार होगा, लेकिन उसमें तर्पण की आवश्यकता नहीं है।

78

धन प्राप्ति और ऋण मुक्ति के लिए समर्पित स्वरूप

धनदा यंत्र पर तर्पण करने से मनचाहा फल क्यों नहीं मिलता

· Reviewed Sep 2026 · 50:34–50:57

धनदा यंत्र में अभिषेक और अर्चन होगा, वे कहते हैं, लेकिन तर्पण दूसरों में कीजिए; उसमें तर्पण करेंगे तो हमारी जो कामना है उसके अनुरूप फल नहीं मिल पाएगा। कारण यह कि वहाँ जो प्रधान है — भगवती पार्वती का धनदा स्वरूप — वह विशेष करके धन प्राप्ति के लिए, कर्ज-ऋण आदि से मुक्ति और धन के मार्ग के निमित्त है। वे पितरों की प्रपौत्र के रूप में तो हैं, लेकिन उनका स्वरूप किसी अन्य चीज के लिए डेडिकेटेड है।

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बिल्व पत्र या चाँदी के चम्मच से गाय के कच्चे दूध का तर्पण

यंत्र का तर्पण गाय के कच्चे दूध से, बिल्व पत्र या चाँदी के चम्मच से — ग्रहण, पितृ और प्रेत दोष के लिए

· Reviewed Sep 2026 · 50:58–51:48

तर्पण के लिए गाय का कच्चा दूध चाहिए: या तो उसमें बिल्व पत्र डुबाकर, या चाँदी के चम्मच से। जहाँ किसी भी प्रकार का ग्रहण दोष, पितृ दोष, या पितरों के कारण भूत-प्रेत आदि का दोष हो — पितृ और प्रेत एक साथ, वे कहते हैं — इस पूरे विषय में यंत्र का तर्पण बहुत कार्य करता है। उनके भीतर जो नकारात्मक तत्व होते हैं, जो किसी पर अटैक कर देते हैं या तबीयत खराब कर देते हैं, वे तत्व तर्पण से जल जाते हैं, या कहिए शांत हो जाते हैं। पक्ष बल होते-होते उनकी शांति बनने लगती है और उग्रता उस प्रकार फिर नहीं आएगी — भगवान दत्त की कृपा से, भगवती की कृपा से।

80

चतुर्थी विभक्ति लगी हुई अष्टोत्तर सतनामावली

यंत्र के तर्पण में नाम किस प्रकार बोले जाते हैं

· Reviewed Sep 2026 · 51:49–52:17

तर्पण आप अष्टोत्तर सतनामावली का प्रयोग करके करेंगे: "श्री महासिद्धाय तर्पयामि नमः, श्री दत्तात्रेयाय तर्पयामि नमः, श्री अनघाय तर्पयामि नमः" — इस प्रकार से आप उनका तर्पण करेंगे। भगवती का है तो "श्री दुर्गायै तर्पयामि नमः, श्री सत्यै तर्पयामि नमः, श्री भगवत्यै तर्पयामि नमः", और उसमें जितने भी नाम हैं। चतुर्थी विभक्ति लगाकर सतनामावली ले लीजिए।

81

देख लीजिए, और एक पीडीएफ तथा वीडियो का वादा

यदि चतुर्थी विभक्ति समझ में न आए तो क्या करें?

· Reviewed Sep 2026 · 52:18–52:39 · Also a question

यदि आपको समझ में नहीं आ रहा कि चतुर्थी विभक्ति कैसे लगाई जाती है, वे कहते हैं, तो एक बार youtube पर अवलोकन कर लीजिए — बहुत आसान है; देख लीजिए कि कैसे लगाई जाती है और उसी प्रकार से लगाकर कर लीजिए। वे जोड़ते हैं कि कोई याद दिला दे तो वे अलग से तीनों-चारों विभक्ति लगाकर एक पीडीएफ शेयर कर देंगे और एक अलग वीडियो भी बना देंगे, ताकि सभी अपने-अपने यंत्रों का समय पर तर्पण कर सकें।

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पक्ष में एक बार या अमावस्या को, और गृहस्थ के प्रथम देवता कुल के पितृ

यंत्र का तर्पण पक्ष में एक बार या अमावस्या को करें; गृहस्थ के प्रथम देवता कुल के पितृ ही हैं

· Reviewed Sep 2026 · 52:40–53:17

पक्ष में एक बार, या अमावस्या के दिन तर्पण कर लीजिए; कोई समस्या न भी हो तो भी तर्पण करना बहुत अच्छा रहेगा। पितृ तर्पण लोग रोज करते नहीं हैं, वे कहते हैं; पितृ तर्पण आता नहीं है, और पितृ पक्ष में स्वयं से तर्पण होता नहीं है। तो उस समय यही कीजिएगा — बहुत आनंद आएगा और आपके पितृ अति प्रसन्न होंगे कि मेरा बच्चा तर्पण कर रहा है। तर्पण आप देवता का करेंगे, लेकिन उस तर्पण से तृप्ति उन तक भी पहुँचती है, क्योंकि आप गृहस्थों के प्रथम देवता कुल के पितृ ही होते हैं; तो देवता, आपके कुल की शक्ति, आपके आराध्य उन्हें तृप्त कर देंगे।

83

बारह नाम, षोडश नाम, या दुर्गा जी की बत्तीस नामावली

नित्य करने योग्य सबसे छोटा तर्पण कौन सा है?

· Reviewed Sep 2026 · 53:18–54:05 · Also a question

यदि आप दिव्य भक्त हैं, आपके पास समय है और बैठने की क्षमता है, तो सहस्रनामावली से भी तर्पण कर सकते हैं; लेकिन यदि नित्य तर्पण करना चाहें तो सबसे छोटा तर्पण बारह नामावली से है। चाहे गणपति जी का हो, भगवान दत्त का हो, भगवती का हो — भगवती के 16 नाम हैं, 18 नाम हैं; भगवती के षोडश नाम से तर्पण कर लीजिए। भगवती दुर्गा जी की 32 नामावली है, उनसे भी तर्पण कर लीजिए। अर्चन उन्हीं 32 नामावली से कर लीजिए। अलग-अलग करके करना पड़ेगा, वे कहते हैं: माला मंत्र में हम एक साथ पढ़ देते हैं — "दुर्गा दुर्गति शमनी" — लेकिन तर्पण या अर्चन में एक-एक नाम से होगा: "दुर्गायै तर्पयामि नमः", "अर्चयामि नमः" आदि।

84

जिस मंत्र का प्रयोग कभी नहीं करना, उसकी ऊर्जा कवच में बनी रहती है

पंचाक्षरी का जप हर धारण किए हुए कवच को क्यों पुष्ट रखता है

· Reviewed Sep 2026 · 54:06–54:54

कवच का पाठ करके यदि यंत्र के ऊपर समर्पित करते हैं तो कवच का प्रभाव भी बढ़ता है — मान लीजिए कोई नीलकंठ अघोर योगिनी कवच धारण किए है, या कोई भगवान पंचानन का कवच धारण किए है। जिस देवता का कवच हो, पंचाक्षरी का जप तो प्रत्येक को करना है: पंचानन कवच किसी के पास हो या न हो, पंचाक्षरी का जप कीजिएगा। तब आप जिस भी प्रकार के कवच धारण कर रहे हैं उनकी मूल ऊर्जा सदैव बनी रहेगी, क्योंकि पंचाक्षरी का प्रयोग कभी करना नहीं है। वे आपकी आत्मा को सदैव पुष्ट रखेंगे, और आपके हृदय के पास, अनाहत के पास जो कवच आपने धारण किया है वह सदैव पुष्ट रहेगा। अन्य सबका तो प्रयोग कर सकते हैं, वे कहते हैं, लेकिन पंचाक्षरी का प्रयोग नहीं करना है, इसलिए वे ऐसे भी आपके कवच को सदैव पुष्ट रखेंगे।

85

चौंसठ योगिनी और वन दुर्गा के नौ नाम

चौंसठ योगिनी नामावली और वन दुर्गा के नौ नाम भी कवच को पुष्ट रखते हैं

· Reviewed Sep 2026 · 54:55–55:33

दूसरा, जिस कवच से संबंधित हो उसका पाठ कीजिए। 64 योगिनी का कवच है तो भगवती के 64 योगिनी स्वरूपों की पूरी नामावली चैनल पर ऑलरेडी दी गई है और टेलीग्राम में भी शेयर की गई है — उसका नित्य पाठ कीजिए और उसका प्रभाव देखिए। इसी प्रकार भगवती के नव नामों का प्रभाव, वन दुर्गा के नौ नामों का प्रभाव: दक्षिण भारत के मत के अनुसार भगवती के जो नौ स्वरूप हैं उनका मंत्र, "प्रथम वन दुर्गेति" आदि। इनका नित्य पाठ करते हैं तो इन सभी से भी उनकी पुष्टता बनी रहती है। और दो कवच सदैव अपने हृदय के निकट रखिए।

86

दत्त वज्र पंजर, हरिद्रा गणपति, बगलामुखी

जिनका कवच धारण किया है, पाठ भी उन्हीं के कवच का कीजिए

· Reviewed Sep 2026 · 55:34–56:10

यदि आपने प्रमुख रूप से अपने आराध्य का कवच धारण किया है और वह उनके स्वरूप से संबंधित है, तो उन्हीं का कवच कीजिए। यदि भगवान दत्त का कवच रखते हैं, जो दत्त वज्र पंजर से अभिमंत्रित है, तो उसी का पाठ करें — अति उत्तम है। यदि भगवान विनायक के हरिद्रा कवच को धारण किए हुए हैं, तो भगवान गणपति की 108 नामावली, या भगवान हरिद्रा गणपति का कवच, या भगवान विनायक के किसी भी स्वरूप का कवच करें — अति उत्तम है। या भगवती बगलामुखी के कवच का पाठ करें, वह भी अति उत्तम है, क्योंकि उससे समस्त कोई तृप्त हो जाएँगे।

87

बटुक भैरव का ब्रह्म कवच, और पाठ संख्या से पुष्टता

कवच को सिद्ध कैसे किया जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 56:11–56:28 · Also a question

उसी प्रकार आगे बढ़ते हुए, वे कहते हैं: यदि आपने भगवान बटुक भैरव जी का धारण किया है तो बटुक भैरव जी के ब्रह्म कवच का पाठ करें। और ब्रह्म कवच को जितना अधिकाधिक हो सके, तथा जितने भी कवच हैं उन्हें सिद्ध करने का भी प्रयास करें: अधिकाधिक पाठ करते रहें। जितना पाठ करते जाएँगे उतना वे पुष्ट होते जाएँगे।

88

1100 या 11000 पाठ तक ले जाने पर विपत्ति कम ही आती है

क्या सिद्ध किए हुए कवच का कभी प्रयोग करना पड़ता है?

· Reviewed Sep 2026 · 56:29–56:55 · Also a question

जब हम कवच का पाठ करते हैं और उसे सिद्ध करते हैं, वे कहते हैं, तो कभी प्रयोग करने की अवस्था स्वयं को भी आएगी — लेकिन करने की आवश्यकता पड़ेगी नहीं। जब तक आपसे जानबूझकर कोई अपराध नहीं बनेगा, यदि आप कवच को 1100 या 11000 तक लेकर चले गए हैं तो बहुत कम ऐसा होता है कि इनसे संबंधित कोई विशेष विपत्ति आपके ऊपर आए। लेकिन मनुष्य ही हैं, कभी जानबूझकर अपराध हो भी जाता है।

89

शिव पूजन, कवच का पुनः अभिषेक, ग्यारह-इक्कीस दिन का जप, और हवन

यदि अपराध हो जाए तो क्या करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 56:56–57:24 · Also a question

ऐसी अवस्था में, वे कहते हैं, सबसे पहले शिव जी का पूजन होगा। कवच आदि का पुनः अभिषेक करेंगे। क्षमा मंत्र की कम से कम पाँच माला, 11 माला कीजिए, और जब तक मन की शांति न हो तब तक 11 दिन, 21 दिन तक उनका जप कीजिए। हवन आदि के कारण पापों का बहुत अधिक शमन होता है, तो जितना आगम-उक्त विधान से बताया गया है उतना अभ्यास यदि आप करते हैं — और यदि हवन हो तो बड़ी अच्छी बात है — उसके कारण आपको शीघ्र ही उस पाप-दोष से छुटकारा मिल जाएगा।

90

ऊर्जा उपस्थित तो है, पर आत्मसात नहीं हो पाती

अनाहत दूषित हो जाए तो कवच भी दूषित क्यों रह जाता है

· Reviewed Sep 2026 · 57:25–57:56

यदि मन में ऐसी अवस्था बैठ जाए कि हमारा कवच अशुद्ध हो गया है — बहुत से कारण होते हैं, वे कहते हैं, जिन्हें बताने की आवश्यकता नहीं — तो ऐसी अवस्था में कवच का अभिषेक अति अनिवार्य है। क्योंकि यह आपके हृदय से, अनाहत से जुड़ी हुई चीज है: अनाहत दूषित हो गया, आपका मन दूषित हो गया, तो फिर कवच भी दूषित रहेगा। मतलब वह ऊर्जा वहाँ उपस्थित तो है, लेकिन आप उसे आत्मसात कर ही नहीं पा रहे हैं, और आप उच्चाटित होने लगेंगे। इन विषयों का ध्यान रखते हुए, वे कहते हैं, फिर ऐसे करना है।

91

विशेष करके कवच या यंत्र के साथ बलि

जब किसी के लिए प्रयोग करना पड़े तो बलि का प्रयोग अवश्य करें

· Reviewed Sep 2026 · 57:57–58:16

जब कभी किसी के लिए प्रयोग करना पड़े, वे कहते हैं, तब बलि का प्रयोग अवश्य करें — विशेष करके कवच का या यंत्र का। इसके बाद वे उदाहरण देने से पहले एक श्रोता का प्रश्न लेते हैं।

जब कभी किसी के लिए प्रयोग करना पड़े, वे कहते हैं, तो उस समय बलि का प्रयोग अवश्य करें। बलि का प्रयोग कैसे करना है? विशेष करके कवच का या यंत्र का। उदाहरण के लिए, वे कहते हैं, मान लेते हैं कि एक श्रोता हैं — और फिर वे उनका प्रश्न उठाते हैं।

92

लंबे अनुष्ठान वालों के लिए कोई उपाय नहीं

लंबे अनुष्ठान में नाखून और बाल बढ़ जाने का क्या उपाय है?

· Reviewed Sep 2026 · 58:17–58:43 · Also a question

एक श्रोता का प्रश्न पढ़ते हुए — नाखून बड़े होकर डिस्टर्ब करते हैं, इसका क्या उपाय है — वे उत्तर देते हैं कि नाखून बड़े होते हैं, बाल-दाढ़ी बड़ी हो जाती है, और पुरुषों को तो और भी समस्या होती है। वे कहते हैं कि उनके पास भी कोई उपाय नहीं है; वे भी ऐसे ही पागल जैसा घूमते हैं, और जब अनुष्ठान पूर्ण होता है तभी काटा जाता है। इसमें कोई उपाय नहीं है, वे कहते हैं: लंबे अनुष्ठान वालों के लिए कुछ नहीं है, हम लोग ऐसे ही पागल बाबा दिखेंगे।

93

अलग संकल्प, नित्य वाला नहीं

परिवार के कष्ट में पड़े व्यक्ति के लिए प्रयोग में अलग संकल्प लिया जाता है, नित्य वाला नहीं

· Reviewed Sep 2026 · 58:44–59:23

एक श्रोता को उदाहरण बनाकर वे कहते हैं: मान लीजिए वह व्यक्ति भगवान बटुक भैरव जी का पाठ-पूजा करता है और उनका कवच उसके पास है जिसे उसने सिद्ध कर लिया है, या वह पंचाक्षरी यंत्र का जप करता है और नित्य नियम से उनकी सेवा-पूजा, अभिषेक, तर्पण, अर्चन आदि कर रहा है। अब किसी के ऊपर किसी प्रकार की अभिचारिक क्रिया हो गई, या किसी को ऐसा रोग हो गया जो दिक्कत दे रहा है, और समझ में आ रहा है कि परिवार के किसी अन्य व्यक्ति को बहुत अधिक कष्ट है। तो अब संकल्प लेकर यह सारा एक्स्ट्रा करेंगे। ऐसा नहीं कि नित्य नियम का जो था — कवच का पाठ, जप, अभिषेक, तर्पण, मार्जन — उसी वाला संकल्प ले लिया कि हाँ, इनका जो कष्ट है वह दूर कीजिए।

94

सामर्थ्य के लिए पौष्टिक संकल्प, वस्तुओं के लिए नहीं

साधक का नित्य संकल्प क्या होना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 59:24–1:00:22 · Also a question

नित्य की सेवा-पूजा में, वे कहते हैं, पौष्टिक संकल्प रखा कीजिए: देवता की कृपा प्राप्ति का, अनन्य भक्ति का, भक्ति और जप सिद्धि के मार्ग में आए विघ्न-बाधा के शमन के निमित्त, और सामर्थ्यता की प्राप्ति के लिए — भगवान, हमें सामर्थ्य दीजिए कि आज हम मात्र 10 ही पाठ कर रहे हैं, इसे नित्य 100 पाठ तक ले जाएँ। हमें सामर्थ्य दीजिए, हमें निद्रा न आए, हमें आलस्य न आए; हम जब बैठें तो हमारा आसन सिद्ध रहे; जब तक चाहें तब तक हम बैठ पाएँ — हमें इतना क्षमतावान बना दीजिए, और क्षमता से युक्त होकर अपनी सेवा कराइए। वे स्पष्ट कहते हैं कि यह वे साधकों के लिए बोल रहे हैं: बाकी सामान्य जन टेंशन न लें, अपना जो नियम लेना है ले लें और जो उनका है वह करें — धन-संपदा, वैभव, किसी वस्तु या किसी व्यक्ति की प्राप्ति।

95

पहले नित्य सेवा, फिर संकल्प के साथ अलग अभिषेक

प्रयोग के लिए अतिरिक्त अभिषेक किस प्रकार किया जाता है

· Reviewed Sep 2026 · 1:00:23–1:00:51

प्रयोग करना हो तो पहले नित्य का नियम, सेवा-पूजा पूरी कर लीजिए। उसके पश्चात पुनः अभिषेक के लिए: अब आप अभिषेक करेंगे — चूँकि उन्हें कोई रोग या कष्ट है, यदि आप दूध का ही अभिषेक कर रहे हैं — तो उसमें अब आप संकल्प ले लेंगे कि हाँ, चाहे वे आपके भाई हों या कोई अन्य व्यक्ति, इनके निमित्त हम अब यह पूर्ण पूजन कर रहे हैं, कृपा करके आप इनके इन रोगों को शांत कीजिए।

96

दैवीय बाधा का तुरंत निर्मूलन, और विशेष बाधा पर संख्या बढ़ाना

इकतालीस दिन का नित्य अभिषेक क्या संभव बना देता है?

· Reviewed Sep 2026 · 1:00:52–1:01:31 · Also a question

यदि आप लगातार 41 दिन तक नियम से यंत्र का नित्य अभिषेक, नित्य सेवा और नित्य पूजन कर चुके हैं, तो यह जान लीजिए कि जब आप प्रयोग कीजिएगा तो यदि कोई दैवीय बाधा होगी तो तुरंत ही उसका निर्मूलन हो जाएगा। कोई विशेष बाधा होगी तो संख्या को बढ़ाना है। ऐसा नहीं कि एक बार किए और नहीं हुआ तो मुँह बनाकर बैठ जाना, वे कहते हैं — उसको और बढ़ा दीजिए। कई बार ऐसी विपदा होती है कि जैसा उसका प्रारब्ध होगा वैसा कष्ट होगा, और उसे काटने के लिए आपको उसी प्रकार की क्षमता का प्रयोग करना पड़ेगा। अच्छे-अच्छे लोगों को काफी अधिक करना पड़ जाता है। एक बार में हो गया तो बहुत बढ़िया है।

97

नींबू, लौंग-कपूर या जायफल, और समापन नारियल की बलि से

प्रयोग में नींबू, लौंग-कपूर या जायफल की बलि, और समापन नारियल की बलि से जो प्रसाद रूप में खाई जाती है

· Reviewed Sep 2026 · 1:01:32–1:02:09

संकल्प के साथ अभिषेक और अलग से अर्चन-पूजन के पश्चात बलि अवश्य चढ़ाएँगे। यहाँ नींबू की बलि दीजिए, या अलग से लौंग-कपूर की बलि; भगवती का है तो जायफल की बलि। सब बलि देकर, जब उस कष्ट से छुटकारा मिल जाए, उसके पश्चात नारियल की बलि पूर्ण पूजन है। मान लीजिए आपको पाँच दिन एक्स्ट्रा अनुष्ठान करना पड़ा और उनका कष्ट धीरे-धीरे पाँच दिन में खत्म हुआ: पाँचवें दिन जब सब हो जाएगा तो छठे दिन के पूजन के पश्चात अब एक्स्ट्रा अलग से कुछ नहीं करना है, लेकिन उस दिन एक नारियल की बलि अवश्य दे दीजिए। वह बलि चढ़ने के बाद घर में सभी उसे प्रसाद रूप में खाएँगे।

98

कॉलेज के पहले दिन जैसा — बाद में आप प्रो बन जाते हैं

यह पूरी विधि केवल नए सुनने वालों को ही अधिक क्यों लगती है

· Reviewed Sep 2026 · 1:02:10–1:03:01

ठीक इसी प्रकार, वे कहते हैं, यदि कोई अभिचारिक प्रयोग हो गया है तो आपको समझ में आएगा जब आप इस विधि विधान से इतना पूजा करेंगे। जो नए लोग सुन रहे होंगे उन्हें बहुत ज्यादा लगेगा, लोग कमेंट भी कर देते हैं कि भैया इतना कैसे; लेकिन जो पुराने हैं, जो सुनते आ रहे हैं, उन्हें पता है कि आप किस स्तर तक जा चुके हैं। जैसे स्कूल का पहला दिन, या सेवन-एट क्लास, या कॉलेज: जब कॉलेज में आप नए-नए होंगे तो दिक्कत होती होगी — यार, ये सब कैसे पढ़ेंगे, ये अल्फा-थीटा-बीटा-गामा क्या आ गया। लेकिन बाद में आप उसके प्रो बन जाते हैं, एकदम प्रीमियम वर्जन बन जाते हैं और सब कुछ आ जाता है। यहाँ भी वही है: नए-नए में दिक्कत होगी।

Indexed, not endorsed as instruction

यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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