शिव महापुराण का गणपति आख्यान — रुद्र संहिता, कुमार खंड, अध्याय 13

शिव महापुराण के अनुसार गणपति जी की जन्म-कथा।

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01

शिव महापुराण केवल सुनने से कुछ नहीं होगा — स्वयं अध्ययन करना चाहिए, चाहे प्रतिदिन एकाध अध्याय ही

केवल सुनना पर्याप्त नहीं — पुराण का अध्ययन करना होगा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:24–03:13

केवल सुनने से कुछ नहीं होगा, स्वयं भी अध्ययन करना चाहिए। यथाशक्ति आधा श्लोक ही सही, उसका अध्ययन करें और भावार्थ समझें — प्रतिदिन एकाध अध्याय भी पढ़ेंगे तो बहुत कुछ जानने, सुनने, समझने को मिलेगा।

02

शिव महापुराण के किस अध्याय में गणेश जी की पूर्ण कथा है?

रुद्र संहिता, कुमार खंड, तेरहवाँ अध्याय

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:14–04:12 · Also a question

रुद्र संहिता — सात संहिताओं में दूसरी — के कुमार खंड का तेरहवाँ अध्याय, जिसमें भगवान गणपति जी की पूर्ण कथा है। यह ब्रह्मा जी और नारद जी के बीच का संवाद है, जिसे सूत जी सुनाते हैं।

03

गणेश आख्यान का नित्य पाठ करने वाले को क्या फल कहा गया है?

गणेश आख्यान की फलश्रुति — जिस कामना से पाठ हो वह पूर्ण होती है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:13–05:06 · Also a question

जो भी कामना हो, उस कामना को लेकर अगर इस पूर्ण आख्यान का नित्य पाठ किया जाए तो वह कामना अवश्य पूर्ण होती है। जिनके पुत्र नहीं उन्हें पुत्र, जिस कन्या को वर नहीं मिल रहा उसे शीघ्र वर, जिसका धन नष्ट हो गया हो उसे धन की प्राप्ति।

04

क्या गणेश जी का जन्म केवल एक बार हुआ है?

कल्प-भेद से अनेक गणपति, एक तो ब्रह्मा जी से भी पहले

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:07–05:55 · Also a question

नहीं। कल्प के भेद से गणेश जी का जन्म ब्रह्मा जी से भी पहले कहा गया है। पहले के एक कल्प में शनिश्चर की दृष्टि पड़ने मात्र से उनका सिर कट गया था और हाथी का सिर जोड़ा गया; यहाँ जो कथा है वह श्वेत कल्प की है, जिसमें शंकर जी स्वयं शिरोच्छेदन करते हैं।

05

क्या शिव महापुराण में जन्मे गणपति और महागणपति एक ही हैं?

महागणपति और शिव महापुराण के गणपति में भिन्नता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:56–06:21 · Also a question

नहीं — यह सदैव ध्यान रखिएगा। महागणपति सृष्टि के आरंभ से हैं और महाशक्ति हैं; शिव महापुराण में या सामान्यतः जिनकी चर्चा होती है वे गणपति वही नहीं हैं। कल्प-भेद से अनेक गणपति हुए हैं, जैसे अनेक ब्रह्मा, अनेक विष्णु, अनेक रुद्र हुए हैं।

06

महागणपति का वर्णन कहाँ मिलता है, और वे किनके साथ पूजित होते हैं?

ललिता त्रिपुरसुंदरी द्वारा प्रकट महागणपति, दश महाविद्याओं के साथ पूजित

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:22–07:16 · Also a question

देवी भागवत महापुराण में, जहाँ भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी अपनी शक्ति से महागणपति जी को प्रकट करती हैं और वे मायासुर द्वारा फैलाई गई माया का उच्चाटन कर उसे नष्ट कर देते हैं। वे सृष्टि के आरंभ से हैं और भगवती के दश महाविद्या स्वरूपों के साथ पूजित होते हैं।

07

क्रोध भैरव के बारे में इंटरनेट की बातें बढ़ा-चढ़ाकर कही जाती हैं, और जितनी प्रचंड शक्ति उतना ही बंधा हुआ साधक का जीवन

जितनी प्रचंड शक्ति, उतना ही नियमों में बँधा साधक का जीवन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:17–08:28

वक्ता कहते हैं कि इस विषय को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है — जितना बताया जाता है उतना सामर्थ्य किसी में है नहीं। उनकी कसौटी: जितनी अधिक क्षमतावान शक्ति की साधना करेंगे, उतना ही आपका नियम और जीवन उस शक्ति के नियमों में आबद्ध हो जाएगा। तो जो कह रहा है उसका जीवन देख लीजिए।

08

क्रोधराज के मंत्रों का जो दावा है: किसी भी देवी-देवता का आकर्षण-बंधन, उपदेव शक्तियों का आवाहन, इंद्रादि को भी मूर्छित करना

क्रोधराज के मंत्रों के बारे में क्या कहा जाता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:29–08:54

कि उनके मंत्रों की क्षमता से किसी भी प्रकार के देवी-देवताओं का आकर्षण और बंधन किया जा सकता है; कि उनकी साधना के बिना उपदेव श्रेणी की शक्तियों का किसी प्रकार आवाहन नहीं किया जा सकता; और कि उनके मंत्रों के प्रभाव से इंद्रादि देवताओं को भी मूर्छित किया जा सकता है।

09

महागणपति का महापुरश्चरण क्या है, और उससे क्या कहा गया है?

अठारह लाख चार बार, किसी स्थापित कुल-परंपरा के गुरु के अधीन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:55–09:55 · Also a question

उनके मंत्र का एक पुरश्चरण अठारह लाख का होता है; महापुरश्चरण यानी अठारह-अठारह लाख चार बार, और वह भी विधिवत किसी ऐसे योग्य गुरु से दीक्षित होकर जो पहले से किसी कुल-परंपरा में हो — कोई नवनिर्मित कुल नहीं। तब कहा गया है कि संसार की कोई शक्ति उस मंत्र के प्रभाव से शांत हुए बिना नहीं रहती।

10

जिन्हें महागणपति मंत्र की सिद्धि वास्तव में प्राप्त है वे बोलना ही छोड़ देते हैं — मान-अपमान का उन पर असर नहीं रहता

जिन्हें ऐसी सिद्धि है वे बोलना बंद कर देते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:56–10:38

वे चेतना-शून्य हो जाते हैं और बहुत कम बोलते हैं। वक्ता कहते हैं कि दिगंबर क्षेत्र में भी ऐसे साधक हैं — लेकिन वे बोलने-चलने योग्य भी नहीं रहते; आप उनसे बोल भी नहीं सकते, वे कोई उत्तर नहीं देंगे, और संसार के मान-अपमान का उन पर कोई असर नहीं पड़ता।

11

महागणपति ने सृष्टि के मूल में वैदिक प्रणव का भेदन किया और शब्द, नाद, बिंदु के साथ प्रकट हुए

सृष्टि के मूल में महागणपति द्वारा वैदिक प्रणव का भेदन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:39–11:39

कहा गया है कि वैदिक प्रणव — प्रथम सृष्टि के मूल में जो ध्वनि प्रकट हुई — उसका भेदन महागणपति जी के द्वारा किया गया, और तब शब्द, नाद, बिंदु आदि के साथ वे प्रकट हुए। जैसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश और महाशक्ति सृष्टि के आरंभ से हैं, वैसे ही वे भी हैं।

12

पार्वती जी को अपना स्वतंत्र गण क्यों चाहिए था?

शिव जी के सारे गण उन्हीं के थे; स्वतंत्र रूप से पार्वती जी का कोई गण नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 11:40–12:54 · Also a question

क्योंकि शिव जी की आज्ञा में रहने वाले असंख्य गण यद्यपि उनकी आज्ञाओं का पालन करते थे, स्वतंत्र रूप से उनका कोई गण नहीं था। नंदी, भृंगी और अनेक प्रमथ गण सब शंकर जी की आज्ञा पालन करते हैं और द्वार पर रहते हैं — लेकिन ये हमारे गण नहीं हैं, वे कहती हैं, हमारा मन उनसे नहीं मिलता।

13

भगवती के स्नान के समय शिव जी नंदी को डाँटकर भीतर चले गए — जिस घटना से अपना द्वारपाल बनाने का संकल्प पक्का हुआ

भगवती के स्नान के समय शिव जी का प्रवेश, और द्वार पर नंदी को डाँट

· Reviewed Sep 14, 2026 · 12:55–13:28

जब भगवती स्नान कर रही थीं तब शिव जी घर के भीतर प्रवेश कर गए — द्वार पर बैठे नंदी जी को डाँटकर अंदर चले गए। मैया को लगा कि यह उचित नहीं है, और उन्होंने सोचा कि ऐसा कोई सेवक होना चाहिए जो श्रेष्ठ हो, योग्य हो और मेरी आज्ञा के बिना इधर से उधर विचलित न हो।

14

देवी महापुराण महाभागवत में भगवती के भीतरी द्वार पर विनायक और प्रमुख द्वार पर भैरव — जैसे मंदिर में

भीतरी द्वार पर विनायक, बाहरी द्वार पर भैरव

· Reviewed Sep 14, 2026 · 13:29–14:24

देवी महापुराण महाभागवत में — श्रीमद् देवी भागवत नहीं — भगवती के लोक के वर्णन में प्रत्येक द्वार पर गणपति जी विराजमान हैं। उनके प्रासाद-द्वार पर भगवान विनायक उनकी सेवा में विद्यमान हैं; और प्रमुख द्वार पर भैरव जी का स्थान है।

15

गणेश जी का निर्माण कैसे हुआ, और उन्हें क्या कहा गया?

पार्वती जी के शरीर के उबटन से बने गणेश, लाठी और आज्ञा के साथ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 14:25–15:21 · Also a question

अपने शरीर पर लगे उबटन के मैल से उन्होंने सर्वलक्षण-संपन्न मूर्ति बनाई और संकल्प-शक्ति से उसे साक्षात स्वरूप दे दिया। उसने पूछा कि आपका क्या कार्य है; उन्होंने कहा — तुम मेरे पुत्र हो, आज मेरे द्वारपाल बनो, और मेरी आज्ञा के बिना कोई भी, हठ से भी, मेरे घर के भीतर न जाने पाए।

16

हर आवरण में गणपति जी का प्रथम पूजन क्यों होता है, और उससे क्या रुकता है?

हर आवरण में गणपति का प्रथम पूजन, और उपद्रवी शक्तियों का प्रवेश निषिद्ध

· Reviewed Sep 14, 2026 · 15:22–15:43 · Also a question

इस विषय को तंत्र से जोड़ लीजिए, वक्ता कहते हैं: जहाँ कहीं गणपति जी की पूजा हो गई — और जब भी भगवती के आवरणों का पूजन होता है तो गणपति जी का प्रथम पूजन होता है — तो उस स्थान पर किसी प्रकार की उपद्रवी शक्ति उपस्थित भी हो, विनायक का पूजन होते ही उसका प्रवेश निषिद्ध हो जाता है, वह नहीं आ पाती।

17

शिव जी लीला मात्र के लिए द्वार पर आए, रोके गए, और दो बार लाठी का प्रहार सहा

शिव जी रोके गए, और दो बार लाठी से प्रहार

· Reviewed Sep 14, 2026 · 15:44–17:35

गणेश जी ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया — माता स्नान कर रही हैं, उनकी आज्ञा के बिना आप अंदर नहीं जा सकते, यहाँ से चले जाइए। "मैं शिव हूँ, कोई दूसरा नहीं" सुनकर उन्होंने लाठी से प्रहार कर दिया; फिर "यह तो मेरा ही घर है" कहकर प्रवेश करने पर क्रोध में दूसरी बार प्रहार किया।

18

शिव जी के गणों ने पहले द्वार पर खड़े बालक को समझाने का प्रयास किया, फिर धमकाने लगे

गण पहले समझाने भेजे गए, फिर धमकाने

· Reviewed Sep 14, 2026 · 17:36–18:07

उन्होंने पहले समझाने का प्रयास किया — तुम कौन हो, कहाँ से आए हो, क्या करना चाहते हो, अगर जीना चाहते हो तो यहाँ से दूर चले जाओ। शिव जी, जिन्हें सब पता है लेकिन जो लोकाचार में यह लीला कर रहे हैं, घर के बाहर स्थित होकर उन्हें भेजे थे।

19

गणों को "बहुत सुंदर" कहना उनके विचित्र स्वरूपों पर कटाक्ष था, प्रेम नहीं

कटाक्ष — "आप लोग तो बहुत सुंदर हैं"

· Reviewed Sep 14, 2026 · 18:08–18:49

यह कटाक्ष था, प्रेम नहीं। शिव जी के जितने गण हैं सब देखने में अलग-अलग प्रकार के, विचित्र स्वरूप के हैं। गिरिजा-पुत्र ने निडर होकर हाथ की लाठी दिखाते हुए पूछा कि आप लोग कौन हैं, कहाँ से आए हैं — आप लोग तो बहुत ही सुंदर हैं — और शीघ्र दूर चले जाने को कहा।

20

गणों ने कहा कि तुम भी गण हो इसलिए बचे हो, और वध की धमकी से भी वे द्वार से टस से मस नहीं हुए

वध की धमकी, और गणेश जी का अपनी जगह से न हटना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 18:50–19:52

उन्होंने कहा कि हम शिव जी के श्रेष्ठ गण हैं, यहाँ के द्वारपाल हम ही हैं, और शिव जी की आज्ञा से ही तुम्हें हटने को कह रहे हैं; तुम भी एक गण हो इसलिए बचे हो — गण न होते तो अब तक वध कर दिया होता। वे अपनी जगह से नहीं हिले, और गण शिकायत करने लौट गए।

21

सेवा के अहंकार को तोड़ने के लिए शिव जी अपने ही गणों को लड़ने और हारने देते हैं — "हमने करोड़ों जप कर दिए, इतने अनुष्ठान कर दिए"

सेवा का अहंकार, और भगवान उसे क्यों तोड़ते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 19:53–20:57

सेवा के अहंकार को तोड़ने के लिए। अगर कोई भगवती की, शिव जी की या किसी महाशक्ति की सेवा कर रहा है और उसके भीतर सेवा का अहंकार आ गया — हमने करोड़ों जप कर दिए, इतने अनुष्ठान कर दिए, हमें ये सिद्धियाँ प्राप्त हो गईं — तो उस अहंकार को तोड़ने के लिए भगवान इस प्रकार की लीला करते हैं।

22

गणपति जी ने भगवती की दी हुई लाठी से गणों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा, जिसका प्रहार कोई सह नहीं सकता

देवी की लाठी से गण पिटे और भगाए गए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 20:58–21:57

वे फिर धमकाने आए और गणपति जी को अत्यंत क्रोध आ गया। लाठी उठाकर दौड़ा-दौड़ाकर गणों को पीटना शुरू कर दिया। वह भगवती की दी हुई शक्ति थी — उसका प्रहार भला कौन सहन कर सकता है? अच्छे से कुट-पिटकर वे फिर शिव जी के पास चले गए।

23

पिटे हुए गणों ने कहा कि हम तो मर्यादा की रक्षा कर रहे थे, और शिव जी ने उन्हें कायर कहा

गणों का कहना कि हम मर्यादा की रक्षा कर रहे थे; शिव जी का उन्हें कायर कहना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 21:58–23:00

कि हम तो मर्यादा की रक्षा कर रहे थे — केवल धमका रहे थे, पीटना नहीं चाहते थे, और इसने ऐसी बात कह दी। एक कोस की दूरी पर त्रिशूल धारण किए खड़े शिव जी कहते हैं कि तुम कायर हो, नाम के वीर हो, और फिर से जाकर उस पर प्रहार करने का आदेश देते हैं, चाहे वह कोई भी हो।

24

माता की आज्ञा से आबद्ध और वध के निश्चय का सामना करते हुए गणेश जी बहुत दुखी हुए

माता की आज्ञा में बँधे होने से गणेश जी का दुख

· Reviewed Sep 14, 2026 · 23:01–23:48

क्योंकि वे भगवती की आज्ञा से आबद्ध हैं, और ये लोग क्रोध कर रहे हैं कि अब हम तुम्हारा वध कर देंगे। शिव गणों के ऐसे निश्चयपूर्वक वचन सुनकर वे बहुत दुखी हुए।

25

पार्वती जी की शर्त: वाद-विवाद हो तो ठीक, पर युद्ध में मेरे गण को जीते बिना कोई घर में प्रवेश नहीं कर सकता

पार्वती जी के गण को जीते बिना कोई घर में प्रवेश नहीं कर सकता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 23:49–25:00

कि अगर वाद-विवाद है तब तो ठीक है — लेकिन अगर युद्ध करके मेरे गण को जीतकर विजय प्राप्त करके घर में प्रवेश करते हैं तो ही प्रवेश कर पाएँगे। मेरे गण को जीते बिना कोई भी घर में प्रवेश नहीं कर सकता।

26

देवी ने संदेश भेजा कि ये गण तुम्हारे सामने कुछ नहीं, करने योग्य या न करने योग्य जो कर्तव्य हो उसे अवश्य करो

देवी का गणेश को संदेश: जो एक बार जीत लिया जाएगा वह फिर बैर नहीं करेगा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 25:01–25:47

कि तुमने बहुत अच्छा किया; ये लोग अब हठपूर्वक घर में प्रवेश नहीं करेंगे; तुम्हारे सामने ये गण क्या हैं जो तुम्हारे जैसे गण को जीत लें; और करने योग्य अथवा न करने योग्य जो भी कर्तव्य हो उसे अवश्य करना — जो एक बार जीत लिया जाएगा वह फिर बैर नहीं करेगा।

27

गणेश जी ने उत्तर दिया कि दोनों पक्ष अपने-अपने स्वामी की आज्ञा में हैं — आज पार्वती और शंकर अपना-अपना बल देख लें

गणेश का शिव गणों को उत्तर: दोनों अपने-अपने स्वामी के सेवक, आज दोनों अपना बल देखें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 25:48–26:53

कि मैं पार्वती का पुत्र हूँ और तुम शिव जी के गण हो, दोनों समान हैं, सब अपने-अपने कर्तव्य का पालन करें; यदि तुम शिव के द्वार पर स्थित हो तो मैं भी यहाँ निश्चित रूप से स्थित हूँ — वहाँ तुम शिव जी की आज्ञा का पालन करना, यहाँ मैं पार्वती की आज्ञा का पालन कर रहा हूँ।

28

शिव जी ने नम्रता नहीं दिखाई, कहीं संसार यह न कहे कि शिव सदा स्त्री के वश में रहते हैं — घर-घर का झगड़ा

नम्रता दिखाने से शिव जी स्त्री के वश में प्रसिद्ध हो जाते

· Reviewed Sep 14, 2026 · 26:54–27:30

क्योंकि, वे कहते हैं, यदि नम्रता प्रदर्शित की जाए तो संसार में यह निंदनीय प्रसिद्धि होगी कि शिव जी सदा स्त्री के वश में रहते हैं। शिव जी के गण निर्मल हैं; जो जैसा करे उसके साथ वैसा ही बर्ताव करना सर्वश्रेष्ठ नीति है — और वह अकेला बालक गण क्या पराक्रम करेगा?

29

शिव जी अंततः युद्ध का आदेश देते हैं — पति के आगे स्त्री को हठ नहीं करना चाहिए, और जो होनहार है वह होकर रहेगा

शिव का गणों से: तुम युद्ध में कुशल हो, अब लघुता कैसे प्राप्त होगे?

· Reviewed Sep 14, 2026 · 27:31–28:10

कि तुम सब मेरे गण हो, युद्ध में अत्यंत कुशल हो, युद्ध छोड़कर लघुता को कैसे प्राप्त होगे; कि विशेष रूप से पति के आगे स्त्री को हठ कैसे करना चाहिए, हठ करके पार्वती उसका फल अवश्य प्राप्त करेंगी; इसलिए — युद्ध करो, जो होनहार है वह होकर रहेगा।

30

गणेश जी ने पहले उनका मनोबल तोड़ा: अकेले बालक होने से हारने की लाज उनकी होगी, मेरी नहीं

गणेश का मनोवैज्ञानिक दाँव: हारने की लाज तुम्हारी होगी, मेरी नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 28:11–29:31

पहले उनका मनोबल तोड़कर। मैं अकेला बालक हूँ, मैंने कभी युद्ध नहीं किया, वे कहते हैं, किंतु आज करूँगा; और शिव-पार्वती के इस युद्ध में हार जाने पर लज्जित तुम्हें ही होना पड़ेगा — बालक होने के कारण मुझे हार या जीत की लाज नहीं है।

31

पार्वती, शिव और गणेश तीनों अलग-अलग कहते हैं "जो होनहार है वह होकर रहेगा" — पुराण में दिया गया संकेत

पार्वती, शिव और गणेश तीनों का "जो होनहार है वह होगा" कहना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 29:32–30:23

वक्ता इसे पुराण में दिया गया संकेत मानते हैं। पहले भगवती कहती हैं, फिर भगवान शिव कहते हैं, और अब गणपति जी भी कह रहे हैं — इससे समझ लीजिए कि यह संकेत किस ओर है।

32

केवल कथा की तरह पढ़ने पर पुराण कथा मात्र रह जाता है — कथा के पीछे छुपा संदेश लेना होगा

कथा के पीछे का संदेश, केवल कथा नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 30:24–31:04

पुराण सबके समझ की बात नहीं। केवल कथा सुनकर, कथा समझकर पाठ-अध्ययन करेंगे तो वह कथा मात्र रह जाएगा। वक्ता बताते हैं कि कई लोग पूरा शिव महापुराण पाठ कर चुके हैं और कथा की तरह पढ़ने से कुछ समझ ही नहीं आया, कोई फर्क नहीं पड़ा — फर्क पड़ेगा कहाँ से, वे पूछते हैं।

33

नंदी और भृंगी ने पैर पकड़कर घसीटा; उन्होंने पैर छुड़ाए, परिघ उठाया और सबको मार गिराया

नंदी-भृंगी का गणेश के पैर खींचना, और परिघ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 31:05–32:12

नंदी जी ने एक पैर और भृंगी जी ने दूसरा पैर पकड़कर घसीटा; उन्होंने हाथों से प्रहार करके पैर छुड़ाए, परिघ लेकर सबको मारना आरंभ किया — किसी का हाथ टूटा, किसी की पीठ फटी, किसी का सिर फूटा, किसी का कंधा अलग हुआ, कुछ ऊपर उड़े, कुछ टूटे पैर घसीटते भागे।

34

भागते गणों ने गणेश को कल्पांत के काल के समान देखा, और सिंह को देखकर मृगों की तरह बिखर गए

कल्पांत के काल के समान गणेश

· Reviewed Sep 14, 2026 · 32:13–33:10

उन्होंने उन्हें काल के समान देखा। जैसे सिंह को देखकर मृग दसों दिशाओं में भाग जाते हैं, वैसे वे हजारों गण भागे; और जैसे कल्पांत के समय काल भयंकर दिखाई पड़ता है, वैसे सबने गणेश को काल के समान प्रलयंकारी देखा। फिर वे लौटकर पुनः द्वार पर स्थित हो गए।

35

धीरे-धीरे पहुँचते अपने घायल गणों को देखकर शिव जी हँसे, और ब्रह्मा जी को बालक के बल के बारे में बताया

अपने ही पिटे गणों को देखकर शिव जी का हँसना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 33:11–34:36

इसी बीच नारद जी विष्णु, इंद्र और सभी देवताओं को लेकर पहुँचे, जिन्होंने शिव जी से पूछा कि आप कौन सी लीला कर रहे हैं। घायल गणों को धीरे-धीरे आते देख शंकर जी हँसे और ब्रह्मा जी को द्वार पर खड़े उस महाबली बालक के बारे में बताया जिसने उनके पार्षदों को मार गिराया और गणों को बलपूर्वक पराजित कर दिया।

36

गणेश जी ब्रह्मा जी की दाढ़ी उखाड़ने लगे — और ब्रह्मा जी स्वयं कहते हैं कि मैं अज्ञान से मोहित होकर वहाँ गया

ब्रह्मा जी की दाढ़ी, और "अज्ञान से मोहित होकर मैं गया"

· Reviewed Sep 14, 2026 · 34:37–35:39

उन्हें देखते ही गणेश जी क्रोध में आ गए और उनकी दाढ़ी उखाड़ने लगे। संकेत पढ़िए, वक्ता कहते हैं: शिव महापुराण में ब्रह्मा जी स्वयं कहते हैं कि उस विशेष बात को न जानकर, अज्ञान से मोहित होकर मैं ऋषियों के साथ वहाँ गया।

37

फिर इंद्र, देवसेनापति कार्तिकेय और शिव जी के प्रमुख गणों को युद्ध का आदेश दिया गया

इंद्र, कार्तिकेय और भूत-प्रेत-पिशाच गणों को युद्ध का आदेश

· Reviewed Sep 14, 2026 · 35:40–36:56

बहुत क्रोधित शिव जी ने अत्यंत उग्र इंद्र को — जिन्हें रुद्राष्टाध्यायी के तीसरे अध्याय में साक्षात शिव का स्वरूप माना गया है — सभी देवताओं के सेनापति कार्तिकेय जी और अपने सभी प्रमुख गणों, भूत-प्रेत-पिशाचों के साथ आज्ञा दी कि सब दिशाओं से घेरकर उस बालक से युद्ध करो।

38

त्रिलोकी में हाहाकार मच गया, लोग संशय में कि ब्रह्मा जी की आयु समाप्त हुए बिना ब्रह्मांड का नाश कैसे हो रहा है

क्या कल्प समय से पहले समाप्त हो गया? — त्रिलोकी में हाहाकार

· Reviewed Sep 14, 2026 · 36:57–37:21

चराचर त्रिलोकी में हाहाकार मच गया। सब लोग संशय में पड़ गए और आश्चर्यचकित होकर कहने लगे कि अभी तो ब्रह्मा जी की आयु समाप्त नहीं हुई, तब इस ब्रह्मांड का नाश कैसे हो रहा है — निश्चय ही शिव-इच्छा से ऐसी अकाल की स्थिति उत्पन्न हो रही है।

39

गणेश पर अस्त्र चलने पर पार्वती जी ने दो शक्तियाँ प्रकट कीं — सौम्य पार्वती के भीतर ऐसी सहस्र शक्तियाँ विद्यमान हैं

दो शक्तियों का प्राकट्य, और सौम्य पार्वती के भीतर सहस्र शक्तियाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 37:22–38:09

वे अपार क्रोध में बह गईं और दो शक्तियों को प्रकट किया। एक काले पहाड़ की गुफा के समान मुख फैलाकर खड़ी हो गई; दूसरी बिजली के समान रूप वाली, बहुत हाथों वाली, दुष्टों को दंड देने वाली महाभयंकर महादेवी थी। सौम्य पार्वती के भीतर, वे कहते हैं, ऐसी सहस्र शक्तियाँ विद्यमान हैं।

40

शिव जी के पंचाक्षरी मंत्र के साथ पार्वती जी का सप्ताक्षरी मंत्र क्यों करना चाहिए?

प्रवृत्ति-मार्ग के जीवन के लिए शिव का पंचाक्षरी और पार्वती का सप्ताक्षरी साथ-साथ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 38:10–39:16 · Also a question

क्योंकि हम निवृत्ति-मार्ग में न होकर प्रवृत्ति-मार्ग में हैं और कामनाएँ भी हैं — तो पुरुष-शक्ति के साथ स्त्री-शक्ति की भी सेवा करनी चाहिए। दोनों मंत्र हर कोई कर सकता है; भगवती की कृपा से गुरु मिलें तो उनसे पुनः ले लीजिए। पंचाक्षरी वैसे तो अकेले सर्वसक्षम है।

41

काली गुफा के समान मुख फैलाए एक शक्ति ने फेंके गए हर अस्त्र को खा लिया, केवल गणेश का परिघ दिखाई पड़ता रहा

दो में से एक शक्ति ने सारे अस्त्र खा लिए; गणेश के लिए मंदराचल की उपमा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 39:17–41:04

जिसका मुख काली गुफा के समान फैला था, वह देवताओं के फेंके सारे अस्त्र-शस्त्र खा जा रही थी, यहाँ तक कि उस स्थान पर एक भी देवता का शस्त्र दिखाई नहीं देता था, केवल गणेश जी का परिघ। जैसे मंदराचल ने क्षीरसागर का मंथन किया, वैसे अकेले उस बालक ने पूरी दुस्तर देव-सेना को मथ डाला।

42

अप्सराएँ और सप्तर्षि युद्ध देखने आकाश-मार्ग में भर गए, पृथ्वी काँपने लगी और पर्वत गिरने लगे

आकाश दर्शकों से भरा; पृथ्वी का काँपना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 41:05–42:34

पूरा आकाश-मार्ग अप्सराओं, सप्तर्षियों और युद्ध देखने आए लोगों से भर गया — परम सिद्ध गण जो आकाश-मार्ग से विचरण कर सकते हैं। पृथ्वी काँपने लगी और पर्वत गिरने लगे, क्योंकि एक बालक ने इतने सारे देवताओं को, वह भी कई युद्ध जीत चुके देवताओं को, अकेले संभाल लिया।

43

केवल कार्तिकेय जी नहीं भागे; दोनों शक्तियों ने सब देवताओं के शस्त्र काट दिए और सब शिव जी के पास भागे

केवल कार्तिकेय डटे रहे

· Reviewed Sep 14, 2026 · 42:35–43:24

सभी देवता भाग गए; केवल पराक्रमी महावीर कार्तिकेय जी नहीं भागे और सबको रोककर गणेश जी के सामने डटे रहे। उन दोनों शक्तियों ने इस बीच सबको असफल कर दिया, सभी देवताओं के शस्त्र काट दिए।

44

नारद जी ने शिव जी से कहा कि महालीला से गणों और देवताओं दोनों का गर्व दूर हो गया, अब लीला समाप्त कीजिए

नारद का शिव से: आपने गणों और देवताओं का गर्व दूर कर दिया

· Reviewed Sep 14, 2026 · 43:25–45:00

कि महालीला करके शिव जी ने अपने गणों का गर्व दूर कर दिया — और इस बालक को बल देकर देवताओं का गर्व भी नष्ट कर दिया। अब, नारद जी कहते हैं, उस लीला को मत कीजिए; गणों और देवताओं का सम्मान करके उनकी रक्षा कीजिए, इन्हें अधिक मत बढ़ाइए, और इस गणेश का वध कीजिए।

45

देवी की लाठी ने विष्णु जी का बल भी कुंठित कर दिया, और दोनों शक्तियाँ अपनी शक्ति गणेश को समर्पित कर अंतर्धान हो गईं

देवी की लाठी से विष्णु जी का बल भी कुंठित

· Reviewed Sep 14, 2026 · 45:01–46:00

बालक ने भगवती की दी हुई लाठी से विष्णु जी पर प्रहार किया, और उस प्रहार से विष्णु जी सहित समस्त देवताओं का बल कुंठित हो गया और वे युद्ध से पराङ्मुख हो गए। उसमें इतना सामर्थ्य था — विष्णु जी की शक्तियाँ भी वहाँ कुंठित हो गईं।

46

गणेश ने पार्वती की दी हुई लाठी से त्रिशूल गिरा दिया और पिनाक धनुष को भी भूमि पर गिरा दिया

त्रिशूल गिरा, पिनाक गिरा, पाँचों हाथ आहत

· Reviewed Sep 14, 2026 · 46:01–47:07

जिस हाथ में त्रिशूल था उस पर पार्वती की दी हुई लाठी से प्रहार किया और त्रिशूल गिर पड़ा। शिव जी ने पिनाक धनुष उठाया; गणेश्वर ने परिघ फेंककर उसे भी भूमि पर गिरा दिया। शिव जी वहाँ पंचानन स्वरूप में थे, तो एक ओर के पाँचों हाथों पर प्रहार करके उन्हें क्षति पहुँचा दी।

47

विष्णु जी ने कहा कि देवता, दानव, यक्ष, राक्षसों में त्रिलोकी में इस योद्धा की बराबरी कोई नहीं कर सकता

विष्णु का निर्णय: त्रिलोकी में गणेश के समान कोई योद्धा नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 47:08–48:16

कि यह महाबलवान धन्य है, रणप्रिय योद्धा है: मैंने बहुत से देवता, दानव, दैत्य, यक्ष, गंधर्व, राक्षस देखे, किंतु त्रिलोकी में तेज, रूप, गुण, शौर्य आदि में इसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता।

48

लाठी के प्रहार से विष्णु जी गिर पड़े, और कुपित शिव जी ने गणेश का शीश धड़ से अलग कर दिया

विष्णु का गिरना, और शिव द्वारा गणेश का शिरोच्छेदन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 48:17–48:49

शक्ति-पुत्र ने लाठी से फिर विष्णु जी पर प्रहार किया; भगवती की दी हुई शक्ति होने से विष्णु जी उसे सह न सके और पृथ्वी पर गिर पड़े, गिरकर तुरंत उठे और फिर संग्राम करने लगे। तब अत्यंत क्रोधित शिव जी ने सामने प्रकट होकर गणपति जी का शिरोच्छेदन कर दिया।

49

शिव जी ने अपने पुत्र गणेश का शीश क्यों काटा?

पुत्र-वध पर कश्यप ऋषि का श्राप, और हम सब कश्यप की संतान क्यों

· Reviewed Sep 14, 2026 · 48:50–50:50 · Also a question

एक श्राप का मान रखने के लिए। शिव जी के दो राक्षस भक्त माली और सुमाली को वरदान था कि वे आकर उनकी रक्षा करेंगे; जब सुर नारायण ने उनसे युद्ध किया तो शिव जी ने त्रिशूल का प्रहार किया और उनके प्राण चले गए। उनके पिता कश्यप ऋषि ने श्राप दिया कि एक दिन आप भी अपने पुत्र का वध स्वयं करेंगे।

50

शिरोच्छेदन का समाचार पाकर पार्वती जी ने क्षण भर में करोड़ों शक्तियाँ प्रकट कीं और आदेश दिया कि अपना-पराया देखे बिना सबका भक्षण कर डालो

क्षण मात्र में करोड़ों शक्तियाँ, सबके भक्षण का आदेश

· Reviewed Sep 14, 2026 · 50:51–52:00

उन्होंने क्षण मात्र में अपने शरीर से करोड़ों शक्तियाँ उत्पन्न कर दीं और आदेश दिया: मेरी आज्ञा से समग्र सृष्टि में प्रलय कर डालो। तुम्हें विचार नहीं करना है कि कौन देवता है, कौन ऋषि, कौन यक्ष, कौन राक्षस, कौन अपना, कौन पराया। सबको हठपूर्वक, बलपूर्वक खा डालो।

51

कराली, कुब्जिका, खंजा, लंबशिरसा — यहाँ नामित शक्तियाँ जो चौंसठ योगिनियों में आती हैं

चौंसठ योगिनियों में कराली, कुब्जिका, खंजा, लंबशिरसा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 52:01–52:55

चार के नाम दिए गए हैं — कराली, कुब्जिका, खंजा, लंबशिरसा — और इनके नाम भगवती की चौंसठ योगिनियों में आते हैं; ऐसी अनंत शक्तियाँ वहाँ विराजमान थीं। वे देवताओं को हाथ से पकड़-पकड़कर मुँह में डालने लगीं।

52

अपराध शीश से ऊपर चला जाए तो योगिनियाँ बख्शती नहीं — जहाँ योगिनी कुपित है वहाँ भगवती ही कोप कर रही हैं

अपराध सीमा पार करे तो योगिनियाँ नहीं बख्शतीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 52:56–53:35

जब तक भगवती शांत हैं, सौम्य हैं, तब तक अत्यंत सौम्य हैं और कई पापों-दुष्कर्मों को क्षमा करने वाली हैं। लेकिन जब अति कर देते हैं, अपराध शीश से ऊपर चला जाता है, तो उनकी शक्तियाँ बख्शती नहीं — और जिन पर योगिनियों का प्रकोप हो जाए, उन्हें जल्दी कोई बचाने वाला नहीं होता।

53

कुपित पार्वती के सामने जाने का साहस किसी देवता ने नहीं किया — साक्षात क्रोध की मूर्ति, जैसे कोई भी माँ जिसके पुत्र की मृत्यु हुई हो

साक्षात क्रोध की मूर्ति पार्वती; पुत्र खो चुकी माँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 53:36–54:32

उन्होंने सोचा कि पार्वती जी साक्षात क्रोध की मूर्ति हैं, कोई उनके सामने जाने का साहस नहीं कर सकता। देवता, दानव, दिक्पाल, यक्ष, किन्नर, मुनि, विष्णु, ब्रह्मा — कोई भी अपना-पराया उनके जाज्वल्यमान दाहक स्वरूप के समक्ष जाने में समर्थ नहीं था।

54

पार्वती जी को शांत करने के लिए नारद जी की छह श्लोक की स्तुति — जगदंब नमस्तुभ्यं

नारद की छह श्लोक की स्तुति — जगदंब नमस्तुभ्यं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 54:33–54:57

मात्र छह श्लोक की स्तुति, जगदंबा को नमस्कार — ट्रांसक्रिप्ट में इसका आरंभ जगदंब नमस्तुभ्यं शिवाय च नमस्तुते, चंडिकाय नमस्तुभ्यं कल्याणै च नमस्तुते दिया है — कि आप शांत होइए, प्रसन्न होइए।

55

नारद जी की जगदंबा स्तुति का पाठ कब करना चाहिए?

नारद की स्तुति कब करें: देवी-कोप, मातृ-दोष और कुमारी के प्रति अपराध में

· Reviewed Sep 14, 2026 · 54:58–56:40 · Also a question

जहाँ किसी के घर में देवी-कोप हो, कुंडली में मातृ-दोष हो, या जानबूझकर कोई अपराध किया हो — और वक्ता विशेष रूप से अविवाहित कन्या के छलपूर्वक यौवन-हरण का नाम लेते हैं, जिसके दंड में, वे कहते हैं, बहुत बुरे प्रकार का चर्म रोग होता है। तंत्रोक्त देवी सूक्तम के साथ इसका पाठ करें।

56

संहार रोकने के लिए पार्वती जी की शर्त: मेरा पुत्र जीवित हो और तुम सबके बीच प्रथम पूज्य हो

पार्वती की शर्त: पुत्र जीवित हो और सबमें प्रथम पूज्य हो

· Reviewed Sep 14, 2026 · 56:41–57:38

कि यदि मेरा पुत्र जीवित हो जाए और तुम लोगों के बीच प्रथम पूज्य हो, आज से सबका अध्यक्ष हो जाए, तो यह संहार नहीं होगा। यदि तुम उसे ऐसा कर दो तो लोक में शांति हो सकती है, अन्यथा तुम्हें सुख की प्राप्ति नहीं होगी।

57

गणेश जी को हाथी का सिर कैसे मिला, और वे पुनः जीवित कैसे हुए?

उत्तर दिशा में जाओ, जो पहले मिले उसका शीश लाओ — एक दाँत वाला हाथी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 57:39–59:02 · Also a question

शिव जी ने देवताओं से कहा कि उत्तर दिशा की ओर जाओ और सर्वप्रथम जो मिले उसका शीश लाकर धड़ पर जोड़ दो। शिव महापुराण में उन्हें एक दाँत वाला हाथी मिला। फिर शिव जी ने वेद मंत्रों से अभिमंत्रित जल छिड़का, जिसके स्पर्श मात्र से वे जीवित हो गए।

58

देवताओं द्वारा गणाध्यक्ष पद पर अभिषिक्त, और माँ से वस्त्र, अलंकार, सिद्धियाँ और वरदान

गणाध्यक्ष पद पर अभिषेक, और माँ के वरदान

· Reviewed Sep 14, 2026 · 59:03–1:00:08

देवताओं ने उन्हें गणाध्यक्ष के पद पर अभिषिक्त किया, और पार्वती जी ने गोद में लेकर आलिंगन किया। उन्होंने वस्त्र-अलंकार और अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान कीं, अपने कल्याणकारी हाथ से स्पर्श किया, मुख चूमा और अनेक वरदान दिए।

59

गणपति जी के लिए सिंदूर का प्रयोग क्यों होता है, और कौन सा सिंदूर?

गणेश के मुख पर सिंदूर, और कौन सा सिंदूर चढ़ाएँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:00:09–1:00:57 · Also a question

क्योंकि पार्वती जी ने कहा कि इस समय तुम्हारे मुखमंडल पर सिंदूर दिखाई देता है, इसलिए लोग तुम्हें सदा सिंदूर से पूजेंगे। लाल सिंदूर या नारंगी सिंदूर चढ़ाएँ — दोनों का आख्यान मिलता है। और, वक्ता सावधान करते हैं, रक्त मिलाकर सिंदूर मत चढ़ा दीजिएगा।

60

जिनकी साधना और कार्य बार-बार विघ्न से रुकते हैं उन्हें गणपति की शरण लेनी चाहिए — और शिव जी उन्हें अपना दूसरा पुत्र कहते हैं

जिनकी साधना और कार्य बार-बार विघ्न से रुक जाते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:00:58–1:01:57

जिनकी साधना-अनुष्ठान में बार-बार विघ्न आते हैं, और जिनके जीवन में अनेक प्रकार के विघ्न उपस्थित रहते हैं — कोई कार्य बस होते-होते रह जाता है। उन्हें गणपति जी की शरण अवश्य लेनी चाहिए।

61

किसी भी देवता से पहले गणेश जी की पूजा क्यों आवश्यक है?

पहले गणेश पूजन, नहीं तो किसी भी देवता की पूजा का फल नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:01:58–1:02:36 · Also a question

ब्रह्मा, विष्णु और शिव के एक साथ दिए वरदान के कारण: जैसे हम तीनों तीनों लोकों में पूज्य हैं वैसे ही गणेश भी सबके द्वारा पूजे जाएँ; पहले इनकी पूजा करके बाद में मनुष्य हमारी पूजा करें; और यदि कोई इनकी पूजा किए बिना अन्य देवताओं की पूजा करेगा तो उसे पूजा का फल प्राप्त नहीं होगा।

62

जिन देवताओं के लिए जो बना है उसे उन्हीं तक सीमित रहने दें — राधा जी के नाम से रुद्राभिषेक को वक्ता अस्वीकार करते हैं

जिस देवता के लिए जो बना है उसे उन्हीं तक सीमित रखें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:02:37–1:03:20

एक देवता का विधान दूसरे देवता के नाम से करना — वे उन वीडियो का उल्लेख करते हैं जिनमें कहा जा रहा है कि इस सावन शिव जी की जगह भगवती राधा का नाम लेकर रुद्राभिषेक कीजिए। कृपया इन सब चीज़ों से बचें, वे कहते हैं; जो चीज़ जिन देवताओं के लिए बनी है उसे उन्हीं तक सीमित रहने दीजिए।

63

शिव, विष्णु, ब्रह्मा ने स्वयं गणेश की पूजा की, सबने सर्वाध्यक्ष कहा, और शिव जी ने वरदान दिए — गणाध्यक्ष, और विघ्न-नाश में सर्वश्रेष्ठ नाम

गणाध्यक्ष, और विघ्न-नाश में सर्वश्रेष्ठ नाम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:03:21–1:04:50

स्पष्ट लिखा है कि इनकी पूजा के बिना पूजा स्वीकार ही नहीं होगी। फिर शिव जी ने स्वयं गणेश की पूजा की, फिर विष्णु जी, फिर ब्रह्मा जी, और सबने सर्वाध्यक्ष कहा। शिव जी के वरदान: मेरे संतुष्ट रहने पर जगत संतुष्ट होता है; शक्ति का पुत्र सर्वदा सुखी रहे; विघ्नों को नष्ट करने में तुम्हारा नाम सर्वश्रेष्ठ होगा; और आज से तुम मेरे संपूर्ण गणों के अध्यक्ष हो।

64

गणेश जी का जन्म किस तिथि को हुआ, और वर्ष में कितनी चतुर्थियाँ होती हैं?

भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी, और चौबीस चतुर्थियाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:04:51–1:05:44 · Also a question

भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को, शुभ चंद्रोदय काल में। लोग विशेष रूप से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश पूजन मनाते हैं, लेकिन दोनों पक्षों की चतुर्थी उनकी है — बारह महीनों की चौबीस चतुर्थियों में गणेश जी का पूजन होता है।

65

शिव जी द्वारा बताया गया गणेश चतुर्थी व्रत कितने समय का है?

पूरा एक वर्ष, भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी से अगली तक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:05:45–1:06:18 · Also a question

जब तक भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पुनः आए — यानी इस साल भादों की कृष्ण चतुर्थी को आरंभ किया तो अगले साल भादों की कृष्ण चतुर्थी तक। भगवान शिव का आदेश है कि एक वर्ष तक यह व्रत करना चाहिए, और अतुल सुख चाहने वाले प्रत्येक चतुर्थी को पूजा करें।

66

चतुर्थी व्रत के दिन की विधि क्या है?

स्नान, संकल्प, उपवास, और रात्रि के प्रथम पहर में पूजन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:06:19–1:07:02 · Also a question

प्रातः स्नान करके व्रत के लिए ब्राह्मणों से निवेदन करें; संकल्प लें, दूर्वा से पूजन करें, उपवास करें। रात्रि का प्रथम पहर आने पर पुनः स्नान करके गणेश जी का पूजन करें — धातु, मूँगा, श्वेत अर्क या मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसकी प्रतिष्ठा कराकर।

67

श्वेत अर्क क्या है, और गणेश की मूर्ति और किससे बन सकती है?

चालीस वर्ष पुराने श्वेत आक की जड़, पुष्य नक्षत्र में

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:07:03–1:07:28 · Also a question

सफेद आक, सफेद मदार का पौधा — कहा जाता है कि कम से कम चालीस वर्ष पुराना हो। उसकी जड़ से भगवान गणपति जी का विग्रह बनाना चाहिए, और उसमें गुरु पुष्य, रवि पुष्य नक्षत्र आदि का वर्णन है; वह तंत्रोक्त विधान हो जाता है। या फिर मिट्टी से मूर्ति बनाएँ।

68

गणेश जी को किस प्रकार की दूर्वा चढ़ती है?

बारह अंगुल, तीन गाँठ, मूल-रहित — एक सौ एक या इक्कीस

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:07:29–1:08:09 · Also a question

गणेश जी की पूजा की दूर्वा एक बित्ता, बारह अंगुल लंबी होनी चाहिए; तीन गाँठ से युक्त; और मूल-रहित — उसमें जड़ नहीं होगी। ऐसी दूर्वा ही उन्हें समर्पित होती है, स्थापित प्रतिमा पर एक सौ एक या इक्कीस।

69

जिसे अनेक प्रकार के कष्ट हों उसे चतुर्थी को क्या करना चाहिए?

संकटनाशन के इक्कीस पाठ के साथ इक्कीस दूर्वा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:08:10–1:09:06 · Also a question

चतुर्थी तिथि को गणेश जी का अभिषेक करके, सुगंध आदि से पूजन करके, संकटनाशन गणपति स्तोत्र का इक्कीस बार पाठ करते हुए इक्कीस दूर्वा चढ़ाइए — बताई गई दूर्वा: बारह अंगुल, तीन गाँठ, जड़-रहित। वर्ष भर की चौबीस चतुर्थियों तक करें।

70

चतुर्थी रात्रि के पूजन के बाद: बाल चंद्रमा का पूजन, ब्राह्मण-भोजन, और स्वयं लवण-रहित मधुर भोजन

बाल चंद्रमा का पूजन, और नमक-रहित मीठा भोजन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:09:07–1:09:48

उनका पूजन और स्तुति करने के बाद प्रथम पहर में उदित बाल चंद्रमा का पूजन करें — अर्घ दें, धूप-दीप दिखाएँ, यथोपचार पूजन करें। फिर ब्राह्मणों की पूजा करके मधुर पदार्थों का भोजन कराएँ, और स्वयं भी लवण-रहित मधुर भोजन करें।

71

एक वर्ष के गणेश चतुर्थी व्रत का उद्यापन कैसे होता है?

उद्यापन — बारह ब्राह्मण, कलश, और अष्टदल कमल

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:09:49–1:10:45 · Also a question

पूरा एक वर्ष होने पर शिव जी की आज्ञा से बारह ब्राह्मणों को भोजन कराएँ, कलश स्थापित करके उसके साथ उनकी मूर्ति की पूजा करें। वेदी पर अष्टदल कमल बनाकर धन की कृपणता से रहित होकर वेद-विधि से होम करें — नवग्रह, षोडश मातृका मंडल, और गणेश गायत्री व सहस्रनाम से हवन।

72

उद्यापन में दो सुहागन स्त्रियों और दो बटुकों को भोजन, रात्रि जागरण, और केवल मृत्तिका की प्रतिमा का विसर्जन

दो सुहागन स्त्रियाँ और दो बटुक; केवल मिट्टी की प्रतिमा का विसर्जन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:10:46–1:11:53

मूर्ति के आगे दो सुहागन स्त्रियों और दो बटुकों — बारह वर्ष से कम आयु के ब्राह्मण बालकों — का विधिपूर्वक पूजन करके आदर से भोजन कराएँ। फिर रात्रि जागरण, प्रातः पुनः पूजन, और गणेश जी से पुनः आने की प्रार्थना करके विसर्जन। यहाँ विसर्जन, वे स्पष्ट करते हैं, उद्यापन के लिए स्थापित मृत्तिका की प्रतिमा का है।

73

वर्ष भर का सामान्य पूजन: षोडशोपचार, दूर्वा, सहस्रार्चन, तर्पण — और सिंदूर, चंदन, केतकी के फूल, तंडुल

सिंदूर, चंदन, केतकी के फूल, तंडुल और अनेक उपचार

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:11:54–1:12:37

शिव जी कहते हैं कि जो श्रद्धा के साथ, अपनी शक्ति के अनुसार, सभी कामनाओं के फल के लिए सिंदूर, चंदन, केतकी के फूल, तंडुल और अनेक प्रकार के उपचारों से गणेश की पूजा करेगा, उसे सदा सिद्धि प्राप्त होगी और उसके विघ्नों का नाश होगा। केतकी के फूल और तांबूल दोनों गणेश जी को चढ़ते हैं।

74

सभी वर्णों को गणपति पूजन का आदेश, विशेषकर स्त्रियों को, और अभ्युदय चाहने वाले राजाओं को

सभी वर्ण, विशेषकर स्त्रियाँ, और अभ्युदय चाहने वाले राजा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:12:38–1:13:19

सभी वर्णों — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र — को गणपति जी का पूजन करने का आदेश दिया गया है; और विशेषकर स्त्री-जनों को गणेश जी का पूजन अवश्य करना चाहिए, ऐसा भगवान शिव स्वयं कहते हैं। अपने अभ्युदय की कामना रखने वाले राजाओं को भी विशेष रूप से पूजन करना चाहिए।

75

गणेश जी का प्रथम पूजन अंबिका के साथ क्यों होता है?

गणेश और पार्वती का प्रथम आवाहन; पुत्र के पूजन से माँ प्रसन्न

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:13:20–1:14:01 · Also a question

क्योंकि प्रथम पूजन हम गणेश जी का भगवती अंबिका के साथ ही करते हैं — माँ पार्वती और गणेश जी का ही प्रथम आवाहन होता है — और यहाँ वर्णन है कि गणेश जी के पूजन से भगवती स्वतः प्रसन्न हो जाती हैं। अपने पुत्र के पूजन से माँ अवश्य प्रसन्न होती हैं।

76

गणेश आख्यान का समापन महोत्सव से: दुंदुभि, नाचती अप्सराएँ, पुष्प-वृष्टि, और गणपति की प्रतिष्ठा पर सारा जगत सुखी

गणाध्यक्ष के रूप में गणेश की प्रतिष्ठा पर महोत्सव

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:14:02–1:14:49

देवताओं की दुंदुभियाँ बजने लगीं, अप्सराएँ नाचने लगीं, गंधर्व गाने लगे, आकाश से पुष्प-वृष्टि होने लगी। गणपति की प्रतिष्ठा होने पर सारा जगत सुखी हो गया, महोत्सव होने लगा, सारा दुख-कष्ट नष्ट हो गया।

77

गणेश आख्यान की पूरी फलश्रुति क्या है?

गणेश आख्यान सुनने से क्या मिलता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:14:50–1:16:14 · Also a question

जो संयत होकर इसे सुनता है वह सभी मंगलों से युक्त हो जाता है। पुत्रहीन को पुत्र, निर्धन को धन, स्त्री की इच्छा वाले को स्त्री, प्रजा चाहने वाले को प्रजा, रोगी को आरोग्य, भाग्यहीन को सौभाग्य, जिसके पुत्र नष्ट हुए उसे पुत्र, जिसका धन नष्ट हुआ उसे धन, और जिसे पति ने त्याग दिया उस स्त्री को पति की प्राप्ति।

78

भाद्रपद मास में गणेश आख्यान का नित्य पाठ कैसे करें?

भाद्रपद भर प्रतिदिन पंद्रह मिनट गणेश आख्यान का पाठ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:16:15–1:17:42 · Also a question

पूरे भादों के महीने प्रतिदिन पाठ कीजिए — लगभग पंद्रह मिनट लगेंगे। उस महीने गणेश जी के विग्रह को नित्य स्नान कराएँ, सुंदर तिलक करें, नैवेद्य अर्पित करें, दूब घास चढ़ाएँ, संकटनाशन का पाठ करके यह आख्यान पढ़ें, जो भी कामना हो उसे लेकर।

Indexed, not endorsed as instruction

यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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