शिव महापुराण का गणपति आख्यान — रुद्र संहिता, कुमार खंड, अध्याय 13
शिव महापुराण के अनुसार गणपति जी की जन्म-कथा।
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आरंभ का ध्यान श्लोक, और जो कथा सब जानते हैं उसमें शिव महापुराण क्या जोड़ता है
लाइव का आरंभ गजाननं ध्यान श्लोक से और इस प्रश्न से होता है कि शिव महापुराण की गणेश कथा अन्य पुराणों से कैसे भिन्न है
वक्ता गजाननं भूतगणादि सेवितं वाले श्लोक से गणपति जी का स्मरण करते हुए आरंभ करते हैं और विषय रखते हैं: गणेश जी की कथा तो सनातन धर्म के लगभग सभी लोग जानते हैं, पर सबसे पहले यह जानना है कि भगवान विनायक की उत्पत्ति की जो कथा शिव महापुराण में है, वह अन्य पुराणों में सुनी जाने वाली कथा से किस प्रकार भिन्न है।
लाइव का आरंभ गजाननं भूतगणादि सेवितं वाले प्रसिद्ध ध्यान श्लोक से गणपति जी के स्मरण के साथ होता है (ट्रांसक्रिप्ट में श्लोक का जो रूप है वह ASR का है, उसे यहाँ पाठ के लिए नहीं रखा गया है)। वक्ता विषय की भूमिका रखते हैं। गणेश जी की कथा, वे कहते हैं, ऐसे तो सभी कोई जानते हैं — कथा कैसी है, क्या घटना घटित हुई थी — सनातन धर्म के लगभग सभी लोग इस विषय को इस स्तर तक जानते हैं। लेकिन आज शिव महापुराण की कथा के साथ-साथ गणपति जी के बारे में कुछ और विशेष बातें जानी जाएँगी, और भगवान विनायक को लेकर बहुत सारे ऐसे विशेष विषय हैं जो और स्पष्ट होंगे। सर्वप्रथम, वे कहते हैं, यह जान लेना चाहिए कि भगवान विनायक की उत्पत्ति की जो कथा शिव महापुराण में है वह क्या है, और अन्य पुराणों के अनुसार जो कथा सुनने को मिलती है उससे उसमें क्या अंतर है। इस विषय का आरंभ पुराण में रुद्र संहिता के कुमार खंड में किया गया है।
केवल सुनना पर्याप्त नहीं — पुराण का अध्ययन करना होगा
शिव महापुराण केवल सुनने से कुछ नहीं होगा — स्वयं अध्ययन करना चाहिए, चाहे प्रतिदिन एकाध अध्याय ही
केवल सुनने से कुछ नहीं होगा, स्वयं भी अध्ययन करना चाहिए। यथाशक्ति आधा श्लोक ही सही, उसका अध्ययन करें और भावार्थ समझें — प्रतिदिन एकाध अध्याय भी पढ़ेंगे तो बहुत कुछ जानने, सुनने, समझने को मिलेगा।
वक्ता शिव महापुराण के पूर्व के लाइव की ओर संकेत करते हैं, जिसमें इस विषय का पूरे विस्तार से वर्णन किया गया था कि समय मिलने पर यथाशक्ति हमें शिव पुराण का अध्ययन करना चाहिए या सुनना चाहिए। चाहे आधा श्लोक ही क्यों न हो, उसका अध्ययन करें और उसके भावार्थ को समझें। फिर वे स्पष्ट कह देते हैं: केवल सुनने से कुछ नहीं होगा — स्वयं भी अध्ययन करना चाहिए। अगर अपने से शिव महापुराण का अध्ययन करेंगे, इसे पढ़ेंगे, प्रतिदिन एकाध अध्याय भी, तो बहुत कुछ जानने, सुनने, समझने को मिलेगा। वे बताते हैं कि अब तक क्या हो चुका है: लगभग वर्ष भर पहले रुद्र संहिता के बारहवें-तेरहवें अध्याय तक, स्वामी कार्तिकेय जी के चरित्र के पूर्ण वर्णन तक कथा सुनी जा चुकी थी; और एक दिन पहले के लाइव में पुनः शिव महापुराण का माहात्म्य, भस्म, रुद्राक्ष और पंचाक्षरी का माहात्म्य बताया गया, ताकि जो नए लोग सुन रहे हों वे महापुराण के विषयों को समझें, समय देकर सुनें और स्वयं भी अध्ययन करें।
रुद्र संहिता, कुमार खंड, तेरहवाँ अध्याय
शिव महापुराण के किस अध्याय में गणेश जी की पूर्ण कथा है?
रुद्र संहिता — सात संहिताओं में दूसरी — के कुमार खंड का तेरहवाँ अध्याय, जिसमें भगवान गणपति जी की पूर्ण कथा है। यह ब्रह्मा जी और नारद जी के बीच का संवाद है, जिसे सूत जी सुनाते हैं।
वक्ता आज का पाठ घोषित करते हैं: रुद्र संहिता के कुमार खंड के तेरहवें अध्याय का शुभारंभ, जिसमें भगवान गणपति जी की पूर्ण कथा है। सात संहिताओं में कुमार खंड दूसरी संहिता, रुद्र संहिता में है। सबसे पहले, वे कहते हैं, यह जान लेना है कि शिव महापुराण में जिन गणपति जी का चरित्र बताया गया है, वे गणपति जी आखिर हैं कौन। संवाद के ढाँचे पर: सूत जी पूछते हैं, और जो बात हो रही है वह ब्रह्मा जी और नारदएक देव-ऋषि, पौराणिक साहित्य में प्रायः प्रश्नकर्ता या श्रोता के रूप में उपस्थित। जी के बीच की है। नारद जी भी कल्प के अनुसार पहले से ही प्रकट हैं — यह बात, वे बताते हैं, विद्येश्वर संहिता के अध्ययन से पता चलेगी। तो यहाँ जो चर्चा हो रही है वह पूर्व में बीत चुकी बात पर ब्रह्मा जी और नारद जी के बीच है।
गणेश आख्यान की फलश्रुति — जिस कामना से पाठ हो वह पूर्ण होती है
गणेश आख्यान का नित्य पाठ करने वाले को क्या फल कहा गया है?
जो भी कामना हो, उस कामना को लेकर अगर इस पूर्ण आख्यान का नित्य पाठ किया जाए तो वह कामना अवश्य पूर्ण होती है। जिनके पुत्र नहीं उन्हें पुत्र, जिस कन्या को वर नहीं मिल रहा उसे शीघ्र वर, जिसका धन नष्ट हो गया हो उसे धन की प्राप्ति।
कथा आरंभ करने से पहले वक्ता आख्यान की फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। बताते हैं, जैसी आख्यान के लिए कही गई है: इसे सुनने मात्र से, और जो भी कामना हो उस कामना को लेकर पूर्ण आख्यान का नित्य पाठ करने से, वह कामना अवश्य ही पूर्ण हो जाती है। जिनके पुत्र नहीं है उन्हें पुत्र की प्राप्ति। जिस कन्या को वर की प्राप्ति नहीं हो रही, वह प्रतिदिन इस चरित्र का पाठ करे तो उसे शीघ्र अति शीघ्र वर की प्राप्ति हो जाती है। अगर धन नष्ट हो गया हो — पहले कोई बहुत धनवान रहा हो और धन नष्ट हो गया हो — तो धन की प्राप्ति; ऐसी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। कुछ विशेष बातें, वे जोड़ते हैं, बाद में फलश्रुति के समय फिर चर्चा की जाएँगी। फिर कथा का आरंभ होता है — नारद जी ब्रह्मा जी से कहते हैं कि कार्तिकेय जी का चरित्र सुन लिया, अब कृपा करके गणपति जी का चरित्र सुनाइए जिससे सभी प्रकार के मंगल और दिव्यता की प्राप्ति हो।
कल्प-भेद से अनेक गणपति, एक तो ब्रह्मा जी से भी पहले
क्या गणेश जी का जन्म केवल एक बार हुआ है?
नहीं। कल्प के भेद से गणेश जी का जन्म ब्रह्मा जी से भी पहले कहा गया है। पहले के एक कल्प में शनिश्चर की दृष्टि पड़ने मात्र से उनका सिर कट गया था और हाथी का सिर जोड़ा गया; यहाँ जो कथा है वह श्वेत कल्प की है, जिसमें शंकर जी स्वयं शिरोच्छेदन करते हैं।
ब्रह्मा जी उत्तर देते हैं कि कल्प के भेद से गणेश जी का जन्म ब्रह्मा जी से भी पहले कहा गया है। अर्थात आज की कथा में जिन गणपति जी की चर्चा होने वाली है, ऐसा नहीं है कि वे प्रथम बार प्रकट हो रहे हैं; उससे पहले भी गणपति जी प्रकट हो चुके हैं और ब्रह्मा जी से भी पहले उनका आविर्भाव हुआ है, ऐसा पुराणों में कहा गया है। यहाँ शिव महापुराण में यह कहा गया है कि एक समय शनिश्चर — शनि — की दृष्टि पड़ने से उनका सिर कट गया था और उस पर हाथी का सिर जोड़ दिया गया। और अब, ब्रह्मा जी कहते हैं, श्वेत कल्प में जिस प्रकार गणेश जी का जन्म हुआ, वह कह रहा हूँ, जिसमें कृपालु शंकर जी के द्वारा उनका शिरोच्छेदन किया गया।
महागणपति और शिव महापुराण के गणपति में भिन्नता है
क्या शिव महापुराण में जन्मे गणपति और महागणपति एक ही हैं?
नहीं — यह सदैव ध्यान रखिएगा। महागणपति सृष्टि के आरंभ से हैं और महाशक्ति हैं; शिव महापुराण में या सामान्यतः जिनकी चर्चा होती है वे गणपति वही नहीं हैं। कल्प-भेद से अनेक गणपति हुए हैं, जैसे अनेक ब्रह्मा, अनेक विष्णु, अनेक रुद्र हुए हैं।
वक्ता वह भेद स्पष्ट करते हैं जिस पर पूरा प्रवचन टिका है। एक महागणपति हैं, जो सृष्टि के आरंभ से हैं, जो महाशक्ति हैं — सदैव ध्यान रखिएगा — और एक वे गणपति जी जिनकी चर्चा शिव महापुराण में है या जिन्हें हम सब जगह-जगह सुनते हैं; दोनों में भिन्नता है। कल्प के अनुसार अनेक गणपति जी हुए हैं, जिस प्रकार हम सब सुनते हैं कि अनेक ब्रह्मा, अनेक विष्णु, अनेक रुद्र हैं। उसी प्रकार गणपति भी अनेक हैं, और कल्प-भेद के अनुसार उनका जन्म भी अलग-अलग प्रकार से हुआ है।
ललिता त्रिपुरसुंदरी द्वारा प्रकट महागणपति, दश महाविद्याओं के साथ पूजित
महागणपति का वर्णन कहाँ मिलता है, और वे किनके साथ पूजित होते हैं?
देवी भागवत महापुराण में, जहाँ भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी अपनी शक्ति से महागणपति जी को प्रकट करती हैं और वे मायासुर द्वारा फैलाई गई माया का उच्चाटन कर उसे नष्ट कर देते हैं। वे सृष्टि के आरंभ से हैं और भगवती के दश महाविद्या स्वरूपों के साथ पूजित होते हैं।
वक्ता बताते हैं कि महागणपति का आख्यान किस ग्रंथ में मिलता है। देवी भागवत महापुराण में महागणपति जी की कथा सुनने को मिलेगी, जब भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी, माँ भगवती, अपनी शक्ति से महागणपति जी को प्रकट करती हैं; और मायासुर द्वारा रचित जो माया फैलाई जा रही थी, उसका वे उच्चाटन कर देते हैं, उसे नष्ट कर देते हैं। वे महागणपति सृष्टि के आरंभ से हैं, जो भगवती के दश महाविद्या स्वरूपों के साथ पूजित होते हैं। भगवान गणपति जी का सबसे विशिष्ट स्वरूप महागणपति जी हैं। और उनके विषय में यह जानना चाहिए, वक्ता जोड़ते हैं: आप किसी भी देवी की साधना कर रहे हों, अगर आपने महागणपति जी की साधना कर ली है और भगवान महागणपति की कृपा प्राप्त कर चुके हैं, तो हर प्रकार की साधना निर्विघ्नतापूर्वक पूर्ण हो जाएगी।
जितनी प्रचंड शक्ति, उतना ही नियमों में बँधा साधक का जीवन
क्रोध भैरव के बारे में इंटरनेट की बातें बढ़ा-चढ़ाकर कही जाती हैं, और जितनी प्रचंड शक्ति उतना ही बंधा हुआ साधक का जीवन
वक्ता कहते हैं कि इस विषय को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है — जितना बताया जाता है उतना सामर्थ्य किसी में है नहीं। उनकी कसौटी: जितनी अधिक क्षमतावान शक्ति की साधना करेंगे, उतना ही आपका नियम और जीवन उस शक्ति के नियमों में आबद्ध हो जाएगा। तो जो कह रहा है उसका जीवन देख लीजिए।
क्रोध भैरव और क्रोधराज के बारे में इंटरनेट पर जो उपलब्ध है, उस पर आते हुए वक्ता कहते हैं कि लोग वहाँ से सुनते हैं और विषय को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है — जितना बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है उतना सामर्थ्य किसी व्यक्ति में है नहीं। भगवान का स्वरूप तो वैसा है ही, वे मानते हैं; लेकिन जब कोई उस विषय को बताता है तो सुनने वाले पर यह प्रभाव पड़ता है कि यह व्यक्ति क्रोध भैरव या क्रोधराज का साधक होगा, तो इसके पास अवर्णनीय क्षमता होगी। जान लीजिए, वे कहते हैं: जितनी अधिक क्षमतावान शक्ति की आप साधना करेंगे, आपका नियम, आपका जीवन उसी प्रकार कहीं न कहीं उस शक्ति से संबंधित सभी नियमों में आबद्ध हो जाएगा। स्वतंत्रतापूर्वक फिर जीवन नहीं जी सकते। जितनी तीव्रतम और प्रचंडतम शक्ति होगी, उतना, एक तरीके से कहें तो, अनुशासन में बँधकर जीवन जीना पड़ेगा। तो कोई व्यक्ति अगर इस विषय को बोल रहा है तो उसका जीवन देख लीजिए। सोशल मीडिया पर उसका कैसा जीवन है — ऐसे लोग कुछ समय बाद दिखाई देने लगते हैं। उसका जीवन कैसा है और जिस शक्ति के बारे में कह रहा है कि हमने ऐसी साधना की है, यथार्थ रूप से क्या वह संभव है, वह देखिए।
क्रोधराज के मंत्रों के बारे में क्या कहा जाता है
क्रोधराज के मंत्रों का जो दावा है: किसी भी देवी-देवता का आकर्षण-बंधन, उपदेव शक्तियों का आवाहन, इंद्रादि को भी मूर्छित करना
कि उनके मंत्रों की क्षमता से किसी भी प्रकार के देवी-देवताओं का आकर्षण और बंधन किया जा सकता है; कि उनकी साधना के बिना उपदेव श्रेणी की शक्तियों का किसी प्रकार आवाहन नहीं किया जा सकता; और कि उनके मंत्रों के प्रभाव से इंद्रादि देवताओं को भी मूर्छित किया जा सकता है।
वक्ता पहले दावे को वैसे ही रखते हैं जैसे किया जाता है, फिर उसे पलटते हैं। क्रोधराज के बारे में कहा गया है कि उनके मंत्रों की क्षमता से किसी भी प्रकार के देवी-देवताओं का आकर्षण किया जा सकता है, बंधन किया जा सकता है। उनकी साधना के बिना उपदेवता श्रेणी की जो शक्तियाँ होती हैं, उन सबका किसी प्रकार आवाहन नहीं किया जा सकता। और उनके मंत्रों के प्रभाव से इंद्रादि देवताओं को भी मूर्छित किया जा सकता है। यह सारा विषय, वे कहते हैं, उसमें बताया जाता है। लेकिन क्या आप महागणपति के विषय में जानते हैं, वे पूछते हैं।
अठारह लाख चार बार, किसी स्थापित कुल-परंपरा के गुरु के अधीन
महागणपति का महापुरश्चरण क्या है, और उससे क्या कहा गया है?
उनके मंत्र का एक पुरश्चरण अठारह लाख का होता है; महापुरश्चरण यानी अठारह-अठारह लाख चार बार, और वह भी विधिवत किसी ऐसे योग्य गुरु से दीक्षित होकर जो पहले से किसी कुल-परंपरा में हो — कोई नवनिर्मित कुल नहीं। तब कहा गया है कि संसार की कोई शक्ति उस मंत्र के प्रभाव से शांत हुए बिना नहीं रहती।
क्रोधराज के दावे के उत्तर में वक्ता महागणपति का माप देते हैं। महागणपति ऐसी महाशक्ति हैं कि इनके मंत्र की सिद्धि अगर किसी को प्राप्त हो जाए, अगर इनके मंत्र का कोई महापुरश्चरण कर ले — इनका एक पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। अठारह लाख का होता है। महापुरश्चरण यानी अठारह-अठारह लाख चार बार। और वह भी विधिवत, किसी ऐसे योग्य गुरु से दीक्षित होकर जो पहले से किसी कुल में, परंपरा में हो — कोई नवनिर्मित कुल नहीं, कोई नया-नया वाला नहीं। अगर विधिवत दीक्षा हुई और गुरु ने आदेश किया कि इसका पुरश्चरण करो, और आपने किया, तो उनके मंत्रों के प्रयोग में ऐसा कहा गया है कि संसार की कोई ऐसी शक्ति नहीं जो उस मंत्र के प्रभाव से शांत न हो जाए, और कोई ऐसी शक्ति नहीं जिसे विमोहित न किया जा सके। अर्थात महागणपति के प्रयोग से शक्तियों को मोहित करना, मूर्छित करना, आकर्षित करना, वशीकृत करना — यह केवल उनके मंत्रों से भी संभव है, पूर्ण रूप से, चाहे वह कोई भी प्रचंडतम शक्ति क्यों न हो। ऐसा वर्णन, वे कहते हैं, तंत्र ग्रंथों में मिल जाएगा।
जिन्हें ऐसी सिद्धि है वे बोलना बंद कर देते हैं
जिन्हें महागणपति मंत्र की सिद्धि वास्तव में प्राप्त है वे बोलना ही छोड़ देते हैं — मान-अपमान का उन पर असर नहीं रहता
वे चेतना-शून्य हो जाते हैं और बहुत कम बोलते हैं। वक्ता कहते हैं कि दिगंबर क्षेत्र में भी ऐसे साधक हैं — लेकिन वे बोलने-चलने योग्य भी नहीं रहते; आप उनसे बोल भी नहीं सकते, वे कोई उत्तर नहीं देंगे, और संसार के मान-अपमान का उन पर कोई असर नहीं पड़ता।
वक्ता बताते हैं कि यह सामर्थ्य बाहर से कैसा दिखता है। जो साधक उस प्रकार की सिद्धि धारण करने वाले होते हैं, वे ऐसी चीज़ें प्राप्त कर लेते हैं कि फिर चेतना-शून्य हो जाते हैं। फिर वे बहुत ज़्यादा बोलते भी नहीं। ऐसे लोग मिलेंगे, वे कहते हैं — दिगंबर क्षेत्र में भी ऐसे साधक हैं। लेकिन आप चाहें कि इनसे कुछ काम करवा लें या कुछ प्रयोग करवा लें, तो वे बिल्कुल बोलने-चलने योग्य भी नहीं हैं। आप उनसे बोल भी नहीं सकते, वे कोई उत्तर भी नहीं देंगे। और यह, वे कहते हैं, यथार्थ में सच बात है: जिसे इस प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं वह फिर उतना बोलेगा नहीं। वह ऐसी चीज़ देख लेगा, उसे ऐसी दिव्यता दिख जाएगी कि संसार की चीज़ों से, मान-सम्मान से, अपमान से — किसी का उस पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। इस प्रकार का सामर्थ्य महागणपति में होता है।
सृष्टि के मूल में महागणपति द्वारा वैदिक प्रणव का भेदन
महागणपति ने सृष्टि के मूल में वैदिक प्रणव का भेदन किया और शब्द, नाद, बिंदु के साथ प्रकट हुए
कहा गया है कि वैदिक प्रणव — प्रथम सृष्टि के मूल में जो ध्वनि प्रकट हुई — उसका भेदन महागणपति जी के द्वारा किया गया, और तब शब्द, नाद, बिंदु आदि के साथ वे प्रकट हुए। जैसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश और महाशक्ति सृष्टि के आरंभ से हैं, वैसे ही वे भी हैं।
शिव जी के सारे गण उन्हीं के थे; स्वतंत्र रूप से पार्वती जी का कोई गण नहीं
पार्वती जी को अपना स्वतंत्र गण क्यों चाहिए था?
क्योंकि शिव जी की आज्ञा में रहने वाले असंख्य गण यद्यपि उनकी आज्ञाओं का पालन करते थे, स्वतंत्र रूप से उनका कोई गण नहीं था। नंदी, भृंगी और अनेक प्रमथ गण सब शंकर जी की आज्ञा पालन करते हैं और द्वार पर रहते हैं — लेकिन ये हमारे गण नहीं हैं, वे कहती हैं, हमारा मन उनसे नहीं मिलता।
वक्ता श्वेत कल्प की कथा आरंभ करते हैं। विवाह के पश्चात भगवती पार्वती शिव जी के साथ कैलाश पर्वत पर विराजमान रहीं, और स्कंद जी के जन्म आदि के पश्चात का यह विषय है। जया और विजया, भगवती की प्रमुख शक्तियों के साथ मिलकर वे विचार करती हैं: शिव जी की आज्ञा में रहने वाले जितने असंख्य गण हैं, वे सब हालाँकि हमारी आज्ञाओं का पालन करते हैं, लेकिन स्वतंत्र रूप से हमारा कोई गण नहीं है। भगवती अपनी सखियों के साथ यह विचार कर रही हैं, और सखियाँ बोल रही हैं। नंदी जी हैं, भृंगी जी हैं, अनेक प्रमथ गण हैं। वे सब भगवान शंकर की आज्ञा पालन करते हैं, द्वार पर स्थित रहते हैं — लेकिन ये हमारे गण नहीं हैं। हमारा मन उनसे नहीं मिलता। यहाँ, वक्ता बताते हैं, अनघ शब्द आया है — हे अनघे। हमारा भी कोई एक स्वतंत्र गण होना चाहिए; अतः आप किसी ऐसे एक गण की रचना कीजिए। वे उस प्रश्न को भी सामने रखते हैं जिस पर बाद में लौटेंगे: गणेश जी का जो शिरोच्छेदन हुआ उसके पीछे क्या रहस्य है, शिव जी ने अपने पुत्र का शीश क्यों काटा — उसके पीछे क्या कारण था।
भगवती के स्नान के समय शिव जी का प्रवेश, और द्वार पर नंदी को डाँट
भगवती के स्नान के समय शिव जी नंदी को डाँटकर भीतर चले गए — जिस घटना से अपना द्वारपाल बनाने का संकल्प पक्का हुआ
जब भगवती स्नान कर रही थीं तब शिव जी घर के भीतर प्रवेश कर गए — द्वार पर बैठे नंदी जी को डाँटकर अंदर चले गए। मैया को लगा कि यह उचित नहीं है, और उन्होंने सोचा कि ऐसा कोई सेवक होना चाहिए जो श्रेष्ठ हो, योग्य हो और मेरी आज्ञा के बिना इधर से उधर विचलित न हो।
वक्ता वह घटना बताते हैं जिससे विचार कार्य में बदला। पार्वती जी विचार करने लगीं कि हाँ, ऐसा अवश्य होना चाहिए — हमारा भी एक गण हो, प्रमथ गण हो, जो स्वतंत्र रूप से हमारी आज्ञाओं का पालन करे और हमारा ही गण हो। और एक बार ऐसा हुआ कि जब भगवती स्नान आदि कर रही थीं तब शिव जी द्वार के भीतर, घर के भीतर प्रवेश कर गए; मैया को लगा कि यह उचित नहीं है। नंदी जी द्वार पर बैठे हुए थे। शिव जी नंदी जी को डाँटकर अंदर चले गए। तब भगवती ने सोचा कि ऐसा कोई सेवक होना चाहिए जो श्रेष्ठ हो, योग्य हो और मेरी आज्ञा के बिना इधर से उधर विचलित न हो।
भीतरी द्वार पर विनायक, बाहरी द्वार पर भैरव
देवी महापुराण महाभागवत में भगवती के भीतरी द्वार पर विनायक और प्रमुख द्वार पर भैरव — जैसे मंदिर में
देवी महापुराण महाभागवत में — श्रीमद् देवी भागवत नहीं — भगवती के लोक के वर्णन में प्रत्येक द्वार पर गणपति जी विराजमान हैं। उनके प्रासाद-द्वार पर भगवान विनायक उनकी सेवा में विद्यमान हैं; और प्रमुख द्वार पर भैरव जी का स्थान है।
वक्ता एक समानांतर बात पर ध्यान दिलाते हैं। जब आप देवी भागवत महापुराण पढ़ेंगे — श्री देवी महापुराण महाभागवत, वे स्पष्ट करते हैं, श्रीमद् देवी भागवत महापुराण नहीं — तो उसमें देवी के लोक के वर्णन में पढ़ने को मिलेगा कि भगवती के लोक की रक्षा के लिए प्रत्येक द्वार पर गणपति जी विराजमान हैं। भगवती के प्रमुख प्रासाद-शिखर, प्रासाद-स्थान के द्वार पर भगवती की सेवा में भगवान विनायक विद्यमान होते हैं; और प्रमुख द्वार पर भैरव जी का स्थान होता है। वे इसे मंदिर से जोड़ते हैं। जैसे मंदिर में जाते हैं तो पहले मंडपम आता है — मंडपम के पास का जो स्थान है वह भैरव जी का होता है; वहाँ भगवती के इस प्रकार के गण उपस्थित होते हैं। लेकिन जब अंदर जाते हैं, मुख्य गर्भगृहमंदिर का सबसे भीतरी गर्भगृह, जहाँ मुख्य देवता विराजमान होते हैं — यहाँ से प्राप्त जल या भोग उस स्थान की पूर्ण संकेंद्रित शक्ति समेटे होता है। में, तो वहाँ जो द्वार है उस पर विनायक की उपस्थिति होती है।
पार्वती जी के शरीर के उबटन से बने गणेश, लाठी और आज्ञा के साथ
गणेश जी का निर्माण कैसे हुआ, और उन्हें क्या कहा गया?
अपने शरीर पर लगे उबटन के मैल से उन्होंने सर्वलक्षण-संपन्न मूर्ति बनाई और संकल्प-शक्ति से उसे साक्षात स्वरूप दे दिया। उसने पूछा कि आपका क्या कार्य है; उन्होंने कहा — तुम मेरे पुत्र हो, आज मेरे द्वारपाल बनो, और मेरी आज्ञा के बिना कोई भी, हठ से भी, मेरे घर के भीतर न जाने पाए।
वक्ता निर्माण का वर्णन देते हैं। भगवती ने विचार किया कि हमारा भी कोई सेवक होना चाहिए, और अपने शरीर पर लगाए हुए उबटन से, मैल से, सर्वलक्षण-संपन्न, शरीर के हर अवयव का बढ़िया निर्माण करके, अपनी संकल्प-शक्ति से उसे पराक्रमी पुरुष बनाकर उस मूर्ति को साक्षात स्वरूप दे दिया। वह प्रकट होकर सामने खड़े हो गए। तब वह पुरुष कहते हैं: आपका क्या कार्य है? आपके द्वारा कहे गए हर कार्य को मैं पूर्ण करूँगा। तब भगवती कहती हैं: हे तात, मेरे वचन को सुनो। तुम मेरे पुत्र हो, तुम आज मेरे द्वारपाल बनो। केवल तुम ही मेरे हो, तुम्हारे अतिरिक्त यहाँ मेरा कोई नहीं है। हे सत्पुत्र, मेरी आज्ञा के बिना कोई भी मेरे घर के भीतर किसी प्रकार, हठ से भी, न जाने पाए। हे तात, यह मैंने तुमसे सत्य कह दिया। ब्रह्मा जी कहते हैं कि पार्वती जी के ऐसा कहने के बाद भगवती ने उन्हें एक लाठी दे दी — शक्ति का स्वरूप लाठी। बालक के सुंदर रूप को देखकर मैया बहुत हर्षित हुईं; प्रेम से उनके मुख को गोद में लेकर बैठा लिया और लाठी उनके हाथ में दे दी। उसके पश्चात गणेश जी द्वार पर जाकर खड़े हो गए, रक्षा के लिए हाथ में लाठी लेकर पहरा देने लगे।
हर आवरण में गणपति का प्रथम पूजन, और उपद्रवी शक्तियों का प्रवेश निषिद्ध
हर आवरण में गणपति जी का प्रथम पूजन क्यों होता है, और उससे क्या रुकता है?
इस विषय को तंत्र से जोड़ लीजिए, वक्ता कहते हैं: जहाँ कहीं गणपति जी की पूजा हो गई — और जब भी भगवती के आवरणों का पूजन होता है तो गणपति जी का प्रथम पूजन होता है — तो उस स्थान पर किसी प्रकार की उपद्रवी शक्ति उपस्थित भी हो, विनायक का पूजन होते ही उसका प्रवेश निषिद्ध हो जाता है, वह नहीं आ पाती।
वक्ता कथा के इस आदेश से व्यावहारिक निष्कर्ष निकालते हैं। इस विषय को पुनः तंत्र से जोड़ लीजिए, वे कहते हैं: जहाँ कहीं भी गणपति जी की पूजा हो गई, और जब भी भगवती के आवरणों का पूजन (आवरण पूजा) होता है, तो गणपति जी का प्रथम पूजन होता है। और विनायक का पूजन होने के पश्चात, अगर उस स्थान पर किसी प्रकार की उपद्रवी शक्ति उपस्थित भी है, तो गणपति जी का पूजन हो जाने पर उसका प्रवेश निषिद्ध हो जाता है। वे नहीं आ पाते।
शिव जी रोके गए, और दो बार लाठी से प्रहार
शिव जी लीला मात्र के लिए द्वार पर आए, रोके गए, और दो बार लाठी का प्रहार सहा
गणेश जी ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया — माता स्नान कर रही हैं, उनकी आज्ञा के बिना आप अंदर नहीं जा सकते, यहाँ से चले जाइए। "मैं शिव हूँ, कोई दूसरा नहीं" सुनकर उन्होंने लाठी से प्रहार कर दिया; फिर "यह तो मेरा ही घर है" कहकर प्रवेश करने पर क्रोध में दूसरी बार प्रहार किया।
भगवती अपनी सखियों के साथ स्नानागार में चली गईं। शिव जी — जिन्हें सब कुछ पता है, लेकिन लीला मात्र के लिए — वहाँ पहुँच गए। गणेश जी शिव जी को अंदर नहीं जाने दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि माता की आज्ञा के बिना आप अंदर नहीं जा सकते; माता जी स्नान कर रही हैं और आप कहाँ चले जा रहे हैं। यहाँ से चले जाइए। रोकने के लिए गणपति जी ने तुरंत लाठी उठा ली। शिव जी बोले: अरे मूर्ख, तुम किसे मना कर रहे हो? तुम मुझे नहीं जानते, हे दुर्बुद्धि। मैं शिव हूँ, कोई दूसरा नहीं। गणपति जी उतना सुनने वाले नहीं थे। इतना सुनते ही उन्होंने शिव जी पर तुरंत लाठी चला दी। शिव जी कुपित होकर कहते हैं: हे बालक, तुम मूर्ख हो, तुम मुझे नहीं जानते। मैं पार्वती का पति शिव हूँ। हे बालक, मैं तो अपने ही घर जा रहा हूँ, तुम मुझे क्यों मना करते हो? और ऐसा कहकर, लाठी के प्रहार की बात छोड़कर, बच्चा है यह सोचकर, यह तो मेरा ही घर है कहते हुए वे पुनः घर में प्रवेश करने लगे। बस गणनायक गणपति जी ने क्रोध करते हुए फिर से डंडे से प्रहार कर दिया। गणपति जी पूरी तरह भगवती की आज्ञा में तत्पर हैं और उन्हें इस बात का भान नहीं कि यह कौन हैं — उन्होंने शिव जी पर भी लाठी चला दी।
गण पहले समझाने भेजे गए, फिर धमकाने
शिव जी के गणों ने पहले द्वार पर खड़े बालक को समझाने का प्रयास किया, फिर धमकाने लगे
उन्होंने पहले समझाने का प्रयास किया — तुम कौन हो, कहाँ से आए हो, क्या करना चाहते हो, अगर जीना चाहते हो तो यहाँ से दूर चले जाओ। शिव जी, जिन्हें सब पता है लेकिन जो लोकाचार में यह लीला कर रहे हैं, घर के बाहर स्थित होकर उन्हें भेजे थे।
तब शिव जी ने अपने गणों को आज्ञा दी कि देखो यह कौन है और यहाँ क्या कर रहा है। भगवान शिव को सब कुछ पता है, वक्ता बताते हैं, लेकिन फिर भी वे लोकाचार में यह लीला कर रहे हैं। और भगवान शिव घर के बाहर स्थित हो गए और अपने गणों को वहाँ भेजा। गण जाकर पहले गणेश जी को समझाने का प्रयास करते हैं। सभी गण जाकर समझाते हैं: तुम कौन हो, कहाँ से आए हो, क्या करना चाहते हो — अगर जीना चाहते हो तो यहाँ से दूर चले जाओ। इस प्रकार के विषय बोलना आरंभ किए।
कटाक्ष — "आप लोग तो बहुत सुंदर हैं"
गणों को "बहुत सुंदर" कहना उनके विचित्र स्वरूपों पर कटाक्ष था, प्रेम नहीं
यह कटाक्ष था, प्रेम नहीं। शिव जी के जितने गण हैं सब देखने में अलग-अलग प्रकार के, विचित्र स्वरूप के हैं। गिरिजा-पुत्र ने निडर होकर हाथ की लाठी दिखाते हुए पूछा कि आप लोग कौन हैं, कहाँ से आए हैं — आप लोग तो बहुत ही सुंदर हैं — और शीघ्र दूर चले जाने को कहा।
गिरिजा-पुत्र निडर होकर हाथ में लाठी दिखाते हुए सभी गणों से कहते हैं: अरे आप लोग कौन हैं और कहाँ से आए हैं? आप लोग तो बहुत ही सुंदर हैं। समझिए कि "बहुत ही सुंदर" के पीछे क्या तात्पर्य है, वक्ता कहते हैं। भगवान शिव के जितने गण हैं, सभी देखने में बड़े अलग-अलग प्रकार के हैं, विचित्र हैं, सबका स्वरूप चित्र-विचित्र है। इसीलिए गणपति जी कटाक्ष कर रहे हैं। गणपति जी कोई प्रेम से नहीं बोल रहे — कटाक्ष कर रहे हैं: आप लोग तो बड़े सुंदर हैं। यहाँ से शीघ्र दूर चले जाइए, वे कहते हैं। विरोध करने के लिए यहाँ क्यों स्थित हैं? तब जितने गण थे सब आश्चर्यचकित हो गए और आपस में बोलने लगे कि अरे यह कौन है जो हमें इस प्रकार बोल रहा है।
वध की धमकी, और गणेश जी का अपनी जगह से न हटना
गणों ने कहा कि तुम भी गण हो इसलिए बचे हो, और वध की धमकी से भी वे द्वार से टस से मस नहीं हुए
उन्होंने कहा कि हम शिव जी के श्रेष्ठ गण हैं, यहाँ के द्वारपाल हम ही हैं, और शिव जी की आज्ञा से ही तुम्हें हटने को कह रहे हैं; तुम भी एक गण हो इसलिए बचे हो — गण न होते तो अब तक वध कर दिया होता। वे अपनी जगह से नहीं हिले, और गण शिकायत करने लौट गए।
शिव गण बोले: हम लोग शिव जी के श्रेष्ठ गण हैं, यहाँ के सब द्वारपाल हम ही हैं। और शिव जी की आज्ञा से ही हम तुम्हें यहाँ से हटने के लिए कह रहे हैं। तुम भी एक गण हो, हम भी गण हैं। अगर तुम गण नहीं होते तो अभी तक तुम्हारा वध कर दिए होते। गणपति जी को यह धमकी दी जा रही है — कि गण न होते तो अब तक वध हो गया होता। तुम क्यों मरना चाहते हो? लेकिन गणों की जितनी डाँट-फटकार थी, उसे सुनकर गणपति जी किसी भी प्रकार वहाँ से टस से मस नहीं हुए; उसी जगह खड़े रहे। सभी गण पुनः भगवान शिव के पास जाकर बोले कि वह तो हट ही नहीं रहा — शिव जी से शिकायत करने गए। तो शिव जी कहते हैं: अरे तुम लोग क्यों कायरों की भाँति यहाँ भागकर चले आए हो और इस प्रकार के समाचार सुना रहे हो? जाकर उसे हटाओ।
सेवा का अहंकार, और भगवान उसे क्यों तोड़ते हैं
सेवा के अहंकार को तोड़ने के लिए शिव जी अपने ही गणों को लड़ने और हारने देते हैं — "हमने करोड़ों जप कर दिए, इतने अनुष्ठान कर दिए"
सेवा के अहंकार को तोड़ने के लिए। अगर कोई भगवती की, शिव जी की या किसी महाशक्ति की सेवा कर रहा है और उसके भीतर सेवा का अहंकार आ गया — हमने करोड़ों जप कर दिए, इतने अनुष्ठान कर दिए, हमें ये सिद्धियाँ प्राप्त हो गईं — तो उस अहंकार को तोड़ने के लिए भगवान इस प्रकार की लीला करते हैं।
वक्ता कथा रोककर उसका अर्थ बताते हैं। गणों के विषय में यहाँ ध्यान रखिएगा: अगर कोई भगवती की या भगवान शिव की या किसी भी महाशक्ति की सेवा कर रहा है और सेवा करने का अहंकार उसके भीतर हो गया — कि हम तो करोड़ों का जप कर दिए, हम तो इतना अनुष्ठान कर दिए, इतनी साधना कर ली, हमें तो ये सिद्धि प्राप्त हो गईं — तो उस अहंकार को तोड़ने के लिए भी भगवान इस प्रकार की लीला करते हैं। इसी कारण से कई बार भगवान स्वयं युद्ध में उपस्थित होकर, जिसे वरदान दिए होते हैं कि हम तुम्हारी रक्षा करेंगे, वरदान देने के पश्चात भी रक्षा करने जाएँगे लेकिन स्वयं हार जाएँगे। यह उनकी लीला है; वे अपने भक्त का कल्याण कभी रुकने नहीं देना चाहते। अहंकार के कारण उसका विनाश हो सकता है — वह विनाश न हो पाए, उसके लोक की गति रुक न जाए, इस कारण से भगवान शिव भी यहाँ लीला कर रहे हैं। यहाँ गणों को जितना डंडा-लाठी अभी पड़ने वाला है, वे जोड़ते हैं, वह सबके अपने पुराने कुछ अहंकार-भरे कर्म और कुछ कुकर्म हैं जो भगवान शिव के माध्यम से धुलने वाले हैं — ऐसा सभी देवताओं के लिए है।
देवी की लाठी से गण पिटे और भगाए गए
गणपति जी ने भगवती की दी हुई लाठी से गणों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा, जिसका प्रहार कोई सह नहीं सकता
वे फिर धमकाने आए और गणपति जी को अत्यंत क्रोध आ गया। लाठी उठाकर दौड़ा-दौड़ाकर गणों को पीटना शुरू कर दिया। वह भगवती की दी हुई शक्ति थी — उसका प्रहार भला कौन सहन कर सकता है? अच्छे से कुट-पिटकर वे फिर शिव जी के पास चले गए।
शिव गण पुनः जाकर गणपति जी को धमकाने लगे: तुम अपने कल्याण की इच्छा नहीं रखते, तुम अभी तक गरज रहे हो, मूर्ख, यहाँ से चले जाओ नहीं तो धराशायी कर दिए जाओगे। इतना सुनना था कि गणपति जी को अत्यंत क्रोध आ गया, और क्रोध में भरकर लाठी उठाकर दौड़ा-दौड़ाकर गणों को पीटना शुरू कर दिया। गण इधर भागे, उधर भागे। और सोचिए, वक्ता कहते हैं, गणपति जी के पास भगवती की दी हुई शक्ति है — उसका प्रहार भला कौन सहन कर सकता है? दौड़ा-दौड़ाकर पीटे जा रहे हैं। एक तो स्फूर्तिवान, अत्यंत तेज, वह भी भगवती के साक्षात शरीर से उत्पन्न — ऐसे ही महाशक्ति हैं; दौड़ाकर पीट रहे हैं तो उनका भार भला कौन वहन कर पाएगा? सभी अच्छे से कुट-पिटकर फिर शिव जी के पास चले गए। जब वे भागने लगे तो पार्वती-नंदन कह रहे हैं: जाओ, यहाँ से दूर चले जाओ — अन्यथा मैं तुम लोगों को प्रचंड पराक्रम दिखाऊँगा जिससे तुम उपहास के पात्र हो जाओगे।
गणों का कहना कि हम मर्यादा की रक्षा कर रहे थे; शिव जी का उन्हें कायर कहना
पिटे हुए गणों ने कहा कि हम तो मर्यादा की रक्षा कर रहे थे, और शिव जी ने उन्हें कायर कहा
कि हम तो मर्यादा की रक्षा कर रहे थे — केवल धमका रहे थे, पीटना नहीं चाहते थे, और इसने ऐसी बात कह दी। एक कोस की दूरी पर त्रिशूल धारण किए खड़े शिव जी कहते हैं कि तुम कायर हो, नाम के वीर हो, और फिर से जाकर उस पर प्रहार करने का आदेश देते हैं, चाहे वह कोई भी हो।
गण बोल रहे हैं: अब हमें क्या करना चाहिए — कहने पर भी बात नहीं मान रहा। हम लोग तो मर्यादा की रक्षा करते हैं, इसने तो ऐसी बात कह दी। मतलब, वक्ता समझाते हैं, शिव जी के गण अभी केवल धमका ही रहे थे। लेकिन गणपति जी ने कूट दिया। तो अब ये कह रहे हैं कि हम मर्यादा की रक्षा कर रहे हैं, हम पीटना नहीं चाह रहे थे, लेकिन गणपति जी ने ऐसी बात बोल दी। तब एक कोस की दूरी पर जहाँ भगवान शिव त्रिशूल धारण किए स्थित थे, वहाँ जाकर गणों ने पुनः सारी बात बताई। शिव जी बोले: हे गणों, तुम लोग कायर हो, नाम के वीर हो, वीर नहीं। मेरे सामने तुम ऐसा कहने के योग्य नहीं हो। जाओ, फिर उस पर प्रहार करो, चाहे वह कोई भी क्यों न हो। किसी भी तरीके से उसे वहाँ से हटाओ। फिर से फटकार सुनकर शिव गण फिर गए और डाँटना शुरू किया: तुम यहाँ से दूर चले जाओ नहीं तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। हठपूर्वक क्यों व्यर्थ बकवास करते हो?
माता की आज्ञा में बँधे होने से गणेश जी का दुख
माता की आज्ञा से आबद्ध और वध के निश्चय का सामना करते हुए गणेश जी बहुत दुखी हुए
क्योंकि वे भगवती की आज्ञा से आबद्ध हैं, और ये लोग क्रोध कर रहे हैं कि अब हम तुम्हारा वध कर देंगे। शिव गणों के ऐसे निश्चयपूर्वक वचन सुनकर वे बहुत दुखी हुए।
पार्वती-पुत्र गणेश जी जब शिव गणों के ऐसे निश्चयपूर्वक वचन सुने तो बहुत दुखी हुए। दुखी क्यों हुए, वक्ता पूछते हैं — क्योंकि वे भगवती की आज्ञा से आबद्ध हैं और ये लोग क्रोध कर रहे हैं कि अब हम तुम्हारा वध कर देंगे। जब वहाँ इतना कोलाहल होने लगा तब भगवती ने अपनी एक सखी से कहा कि जाकर द्वार पर देखो क्या कलह हो रहा है। सखी ने आकर देखा और पार्वती जी के पास जाकर जो कुछ घटित हुआ था सब बताया: हे महेश्वरी, हमारा जो गण द्वार पर स्थित है उसे शिव जी के वीर गण निश्चित रूप से धमका रहे हैं। शिव और उनके वे सभी गण बिना अवसर के घर में ज़बरदस्ती कैसे प्रवेश कर सकते हैं? यह आपके लिए शुभतर नहीं है।
पार्वती जी के गण को जीते बिना कोई घर में प्रवेश नहीं कर सकता
पार्वती जी की शर्त: वाद-विवाद हो तो ठीक, पर युद्ध में मेरे गण को जीते बिना कोई घर में प्रवेश नहीं कर सकता
कि अगर वाद-विवाद है तब तो ठीक है — लेकिन अगर युद्ध करके मेरे गण को जीतकर विजय प्राप्त करके घर में प्रवेश करते हैं तो ही प्रवेश कर पाएँगे। मेरे गण को जीते बिना कोई भी घर में प्रवेश नहीं कर सकता।
भगवती कहती हैं: इस बालक ने बहुत अच्छा किया। जिस कार्य के लिए इसे प्रकट किया गया है, उस कार्य को यह बहुत सुखपूर्वक, सही प्रकार से वीर गणों को प्रत्युत्तर देकर कर रहा है। फिर वे अपनी शर्त रखती हैं। अगर वाद-विवाद है तब तो ठीक है। लेकिन अगर युद्ध करके मेरे गण को जीतकर, विजय प्राप्त करके ये घर में प्रवेश करते हैं तो ही प्रवेश कर पाएँगे। मेरे गण को जीते बिना कोई भी घर में प्रवेश नहीं कर सकता। भगवती पार्वती जोड़ती हैं: बड़े आश्चर्य की बात है। शिव जी के गण क्षण मात्र भी रुक नहीं सके। इस प्रकार प्रवेश का हठ उन्होंने कैसे ठान लिया? अब इस निमित्त उनसे विनय अथवा अन्य उपाय करना उचित प्रतीत नहीं हो रहा। जो होना होगा वही होगा। मैंने जो कह दिया है उसे अन्यथा कैसे कर सकती हूँ?
देवी का गणेश को संदेश: जो एक बार जीत लिया जाएगा वह फिर बैर नहीं करेगा
देवी ने संदेश भेजा कि ये गण तुम्हारे सामने कुछ नहीं, करने योग्य या न करने योग्य जो कर्तव्य हो उसे अवश्य करो
कि तुमने बहुत अच्छा किया; ये लोग अब हठपूर्वक घर में प्रवेश नहीं करेंगे; तुम्हारे सामने ये गण क्या हैं जो तुम्हारे जैसे गण को जीत लें; और करने योग्य अथवा न करने योग्य जो भी कर्तव्य हो उसे अवश्य करना — जो एक बार जीत लिया जाएगा वह फिर बैर नहीं करेगा।
ऐसा कहकर पार्वती जी ने अपनी सखी को वहाँ भेजा। सखी आकर गणपति जी से कहती है: हे भद्र, तुमने बहुत अच्छा किया। ये लोग अब हठपूर्वक घर में प्रवेश नहीं करेंगे। तुम्हारे सामने ये गण क्या हैं जो तुम्हारे जैसे गण को जीत लें। करने योग्य अथवा न करने योग्य जो भी कर्तव्य हो, तुम उसे अवश्य करना। जो एक बार जीत लिया जाएगा वह फिर बैर नहीं करेगा। भगवती का आदेश सखी ने गणपति जी तक पहुँचा दिया। अब गणेश जी का उत्साह चरम पर पहुँच गया। भगवती ने जब इस प्रकार उनका उत्साह बढ़ाया — कि कुछ भी हो जाए, पीछे मत हटना और इन सबको जीत लो — तो वे बहुत प्रसन्न हुए। जीत लोगे तो ये लोग ऐसे ही बैर छोड़ देंगे; बैर कर भी नहीं पाएँगे।
गणेश का शिव गणों को उत्तर: दोनों अपने-अपने स्वामी के सेवक, आज दोनों अपना बल देखें
गणेश जी ने उत्तर दिया कि दोनों पक्ष अपने-अपने स्वामी की आज्ञा में हैं — आज पार्वती और शंकर अपना-अपना बल देख लें
कि मैं पार्वती का पुत्र हूँ और तुम शिव जी के गण हो, दोनों समान हैं, सब अपने-अपने कर्तव्य का पालन करें; यदि तुम शिव के द्वार पर स्थित हो तो मैं भी यहाँ निश्चित रूप से स्थित हूँ — वहाँ तुम शिव जी की आज्ञा का पालन करना, यहाँ मैं पार्वती की आज्ञा का पालन कर रहा हूँ।
कमर कसकर, पगड़ी बाँधकर, जाँघ पर ताल ठोकते हुए निडर होकर भगवान गणपति जी बोलते हैं: मैं पार्वती का पुत्र हूँ। तुम लोग शिव जी के गण हो। दोनों ही समान हैं। हम सब अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करें। क्या आप लोग ही द्वारपाल रह सकते हैं? मैं द्वारपाल नहीं रह सकता? यदि आप लोग शिव के द्वार पर स्थित हैं तो मैं भी यहाँ निश्चित रूप से स्थित हूँ। जब आप यहाँ स्थित रहिएगा तब शिव जी की आज्ञा का पालन कीजिएगा; इस समय तो यहाँ मैं पार्वती की आज्ञा का पालन कर रहा हूँ। हे वीरों, यह सत्य है, मैंने उचित निर्णय लिया है। बहुत क्लियर-कट जवाब दे दिया गणेश जी ने, वक्ता कहते हैं: जब भगवान शिव ने तुम्हें यहाँ स्थित होने को कहा तब उनकी आज्ञा का पालन करो — अभी हम पार्वती जी की आज्ञा से यहाँ हैं और उन्हीं के आदेश के अनुसार इस द्वार की रक्षा होगी। हे शिव गणों, मेरा वचन आदरपूर्वक सुन लो: हठ से या विनय से तुम किसी भी प्रकार घर के भीतर नहीं जा सकते। शिव जी के गण लज्जित होकर शिव जी के पास गए और सारा वृत्तांत कहा।
नम्रता दिखाने से शिव जी स्त्री के वश में प्रसिद्ध हो जाते
शिव जी ने नम्रता नहीं दिखाई, कहीं संसार यह न कहे कि शिव सदा स्त्री के वश में रहते हैं — घर-घर का झगड़ा
क्योंकि, वे कहते हैं, यदि नम्रता प्रदर्शित की जाए तो संसार में यह निंदनीय प्रसिद्धि होगी कि शिव जी सदा स्त्री के वश में रहते हैं। शिव जी के गण निर्मल हैं; जो जैसा करे उसके साथ वैसा ही बर्ताव करना सर्वश्रेष्ठ नीति है — और वह अकेला बालक गण क्या पराक्रम करेगा?
शंकर जी पुनः बोले: हे गणों, सुनो — युद्ध करना भी उचित नहीं है क्योंकि तुम लोग हमारे गण हो और वह बालक पार्वती का गण है। लेकिन यदि नम्रता प्रदर्शित की जाए तो संसार में मेरी यह निंदनीय प्रसिद्धि होगी कि शिव जी सदा स्त्री के वश में रहते हैं। शिव जी के गण निर्मल हैं। जो जैसा करे उसके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिए; यही नीति सर्वश्रेष्ठ है। वह अकेला बालक गण क्या पराक्रम करेगा? यहाँ, वक्ता बताते हैं, घर-घर का विषय चल रहा है — बहुत अच्छा संदेश जा रहा है कि किस प्रकार युद्ध घर के भीतर ही होता है।
शिव का गणों से: तुम युद्ध में कुशल हो, अब लघुता कैसे प्राप्त होगे?
शिव जी अंततः युद्ध का आदेश देते हैं — पति के आगे स्त्री को हठ नहीं करना चाहिए, और जो होनहार है वह होकर रहेगा
कि तुम सब मेरे गण हो, युद्ध में अत्यंत कुशल हो, युद्ध छोड़कर लघुता को कैसे प्राप्त होगे; कि विशेष रूप से पति के आगे स्त्री को हठ कैसे करना चाहिए, हठ करके पार्वती उसका फल अवश्य प्राप्त करेंगी; इसलिए — युद्ध करो, जो होनहार है वह होकर रहेगा।
शिव जी कहते हैं: तुम सब मेरे गण हो, युद्ध में अत्यंत कुशल हो। अब युद्ध छोड़कर तुम लघुता को कैसे प्राप्त होगे? विशेष रूप से पति के आगे स्त्री को हठ कैसे करना चाहिए? हठ करके पार्वती उसका फल अवश्य प्राप्त करेंगी। इसलिए हे वीरों, तुम सब मेरी बात आदरपूर्वक सुनो। तुम लोग अवश्य युद्ध करो। जो होनहार है वह होकर रहेगा। इसके साथ, वक्ता कहते हैं, शिव जी ने भी आदेश दे दिया — जाओ, जाकर युद्ध करो। और शिव जी के आदेश को सुनकर भगवान शिव के गण युद्ध करने पहुँच गए, कवच आदि धारण करके सब भवन के निकट पहुँचे।
गणेश का मनोवैज्ञानिक दाँव: हारने की लाज तुम्हारी होगी, मेरी नहीं
गणेश जी ने पहले उनका मनोबल तोड़ा: अकेले बालक होने से हारने की लाज उनकी होगी, मेरी नहीं
पहले उनका मनोबल तोड़कर। मैं अकेला बालक हूँ, मैंने कभी युद्ध नहीं किया, वे कहते हैं, किंतु आज करूँगा; और शिव-पार्वती के इस युद्ध में हार जाने पर लज्जित तुम्हें ही होना पड़ेगा — बालक होने के कारण मुझे हार या जीत की लाज नहीं है।
गणेश जी जब देखते हैं कि ये लोग युद्ध की तैयारी करके आ गए हैं, तो कहते हैं: शिव जी की आज्ञा का पालन करने वाले आप सब गण आए। मैं अकेला बालक होते हुए भी अपनी माता की आज्ञा का पालन करूँगा। तथापि आज देवी पार्वती अपने पुत्र का बल देखें और शंकर अपने गणों का बल देखें। भवानी के पक्ष से इस बालक का और शिव जी के पक्ष से बलवान गणों के बीच आज युद्ध होगा। युद्ध में विशारद आप सभी गण पूर्व काल में अनेक युद्ध कर चुके हैं। मैं तो अभी बालक हूँ, मैंने कभी युद्ध नहीं किया — किंतु आज करूँगा। फिर भी शिव-पार्वती के इस युद्ध में हार जाने पर आप सभी को ही लज्जित होना पड़ेगा। बालक होने के कारण मुझे हार या जीत की लाज नहीं है। सही बात है, वक्ता कहते हैं: बालक हारे या जीते, उससे क्या फर्क पड़ने वाला है। वे महाभारत धारावाहिक के एक प्रसिद्ध संवाद से तुलना करते हैं — कि रणभूमि में खेलने से पहले युद्ध मनोभूमि में खेला जाता है। वही यहाँ गणपति जी कर रहे हैं: पहले ही इनके मनोबल को तोड़ने का पूरा प्रयत्न कर दिया है। गणेश जी वैसे ही बुद्धि के विशारद हैं।
पार्वती, शिव और गणेश तीनों का "जो होनहार है वह होगा" कहना
पार्वती, शिव और गणेश तीनों अलग-अलग कहते हैं "जो होनहार है वह होकर रहेगा" — पुराण में दिया गया संकेत
वक्ता इसे पुराण में दिया गया संकेत मानते हैं। पहले भगवती कहती हैं, फिर भगवान शिव कहते हैं, और अब गणपति जी भी कह रहे हैं — इससे समझ लीजिए कि यह संकेत किस ओर है।
गणपति जी कहते हैं: इस युद्ध का फल भी मेरे विपरीत होगा। मेरी तथा आप लोगों की लाज भवानी तथा शंकर की लाज है। अगर शिव जी के गण जीतेंगे तो शिव जी की लाज रहेगी; भवानी के गण, उनके पुत्र गणपति जीते तो उनकी लाज रहेगी। आप लोग अपने स्वामी की ओर देखकर और मैं अपनी माता की ओर देखकर युद्ध करूँगा। यह युद्ध कैसा होगा इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। इसे रोकने में त्रिलोकी में कोई समर्थ नहीं होगा। जो होनहार है वह अभी होकर ही रहेगा। देखिए, यह बात सभी कह रहे हैं, वक्ता ध्यान दिलाते हैं — कि जो होनहार है वह होगा। पहले भगवती कहीं, फिर भगवान शिव कहे, और अब पुनः गणपति जी कह रहे हैं। तो यह जो संकेत पुराण में दिया गया है, इससे समझ लीजिए कि यह संकेत किस ओर है।
कथा के पीछे का संदेश, केवल कथा नहीं
केवल कथा की तरह पढ़ने पर पुराण कथा मात्र रह जाता है — कथा के पीछे छुपा संदेश लेना होगा
पुराण सबके समझ की बात नहीं। केवल कथा सुनकर, कथा समझकर पाठ-अध्ययन करेंगे तो वह कथा मात्र रह जाएगा। वक्ता बताते हैं कि कई लोग पूरा शिव महापुराण पाठ कर चुके हैं और कथा की तरह पढ़ने से कुछ समझ ही नहीं आया, कोई फर्क नहीं पड़ा — फर्क पड़ेगा कहाँ से, वे पूछते हैं।
इसीलिए, वक्ता कहते हैं, कहीं-कहीं यह बात कही जाती है कि पुराण सबके समझ की बात नहीं। केवल कथा सुनकर, कथा समझकर इसका पाठ-अध्ययन करेंगे तो फिर वह कथा मात्र रह जाएगा। इसलिए तो कई ऐसे लोग हैं जो शिव महापुराण का पूरा पाठ कर चुके हैं लेकिन बुद्धि चूँकि वैसी है, कथा जैसा पढ़े हैं, तो कुछ समझ ही नहीं आया। बोलते हैं हम तो किए हैं, कुछ फर्क नहीं पड़ा। कहाँ से पड़ेगा, वे पूछते हैं। जो संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है वह संदेश लीजिएगा, वे कहते हैं — तब तो पड़ेगा। टू-थ्री क्लास के बच्चे की तरह, तोते की तरह केवल पढ़ लीजिएगा कि अच्छा ऐसा हुआ था, ऐसा हुआ था — कथा थोड़ी चल रही है यहाँ? कथा के पीछे जो संदेश छुपा हुआ है उसे भी समझने का प्रयास करना चाहिए।
नंदी-भृंगी का गणेश के पैर खींचना, और परिघ
नंदी और भृंगी ने पैर पकड़कर घसीटा; उन्होंने पैर छुड़ाए, परिघ उठाया और सबको मार गिराया
नंदी जी ने एक पैर और भृंगी जी ने दूसरा पैर पकड़कर घसीटा; उन्होंने हाथों से प्रहार करके पैर छुड़ाए, परिघ लेकर सबको मारना आरंभ किया — किसी का हाथ टूटा, किसी की पीठ फटी, किसी का सिर फूटा, किसी का कंधा अलग हुआ, कुछ ऊपर उड़े, कुछ टूटे पैर घसीटते भागे।
फटकार आदि के पश्चात शिव जी के गण हाथ में दंड-आयुध लेकर, दाँत कटकटाते, हुंकार करते हुए सब गणपति जी की ओर दौड़ पड़े। नंदी जी ने आकर सबसे पहले गणेश जी का पैर खींचा। उसके बाद भृंगी जी ने आकर दूसरा पैर पकड़कर खींचना शुरू किया। दोनों उनके पैर पकड़कर घसीट रहे थे। गणेश जी ने अपने हाथों से प्रहार करके पैर छुड़ा लिए। तब एक परिघ लेकर देवी-पुत्र गणेश्वर ने सभी गणों को मारना आरंभ किया। और जब गणपति जी अपने विकराल स्वरूप में आते हैं, युद्ध में उतर जाते हैं और मारना आरंभ करते हैं, तो उनके युद्ध-कौशल के समक्ष कोई टिक नहीं पाता। ऐसे ही नहीं गणाध्यक्ष बन गए, वक्ता कहते हैं। जैसे ही मारना आरंभ किया, किसी का हाथ टूटा, किसी की पीठ फट गई, किसी का सिर फूट गया, किसी का मस्तक कट गया, किसी की जाँघ टूटी, किसी का कंधा टूटकर अलग हुआ, किसी के हृदय पर प्रहार। कुछ ऊपर की ओर उड़ने लगे, कुछ के पैर टूट गए और घसीट-घसीटकर शिव जी के पास भागने लगे।
कल्पांत के काल के समान गणेश
भागते गणों ने गणेश को कल्पांत के काल के समान देखा, और सिंह को देखकर मृगों की तरह बिखर गए
उन्होंने उन्हें काल के समान देखा। जैसे सिंह को देखकर मृग दसों दिशाओं में भाग जाते हैं, वैसे वे हजारों गण भागे; और जैसे कल्पांत के समय काल भयंकर दिखाई पड़ता है, वैसे सबने गणेश को काल के समान प्रलयंकारी देखा। फिर वे लौटकर पुनः द्वार पर स्थित हो गए।
उनमें से कोई भी ऐसा गण नहीं था जो संग्राम में गणेश जी के सामने दिखाई पड़े। जैसे सिंह को देखकर मृग दसों दिशाओं में भाग जाते हैं, उसी प्रकार वे हजारों गण भाग गए। और गणेश जी पुनः लौटकर द्वार पर स्थित हो गए। जिस प्रकार कल्पांत के समय काल भयंकर दिखाई पड़ता है, उसी प्रकार उन सबने गणेश को काल के समान प्रलयंकारी देखा। गणपति जी का ऐसा अद्भुत स्वरूप उन सबने देखा। जब क्रोध शीश पर सवार होता है, वक्ता जोड़ते हैं, तो किसी का भी स्वरूप रौद्र हो जाता है — और भगवान गणेश जी के स्वरूप को देखकर सभी बहुत भयभीत हो गए।
अपने ही पिटे गणों को देखकर शिव जी का हँसना
धीरे-धीरे पहुँचते अपने घायल गणों को देखकर शिव जी हँसे, और ब्रह्मा जी को बालक के बल के बारे में बताया
इसी बीच नारद जी विष्णु, इंद्र और सभी देवताओं को लेकर पहुँचे, जिन्होंने शिव जी से पूछा कि आप कौन सी लीला कर रहे हैं। घायल गणों को धीरे-धीरे आते देख शंकर जी हँसे और ब्रह्मा जी को द्वार पर खड़े उस महाबली बालक के बारे में बताया जिसने उनके पार्षदों को मार गिराया और गणों को बलपूर्वक पराजित कर दिया।
इसी बीच नारद जी विष्णु जी, इंद्र जी और सभी देवताओं को लेकर वहाँ पहुँचे। ये सभी देवता भगवान शिव से कहते हैं: हे भगवान शिव, आप हमें आज्ञा दीजिए, हम सब आपके सेवक हैं। आप सृष्टि के कर्ता, भर्ता, संहर्ता परमेश्वर हैं। आप अपनी लीला से सत्व, रज और तम रूप हैं। आप इस समय कौन सी लीला प्रारंभ किए हैं, हमें बताइए। इतना बड़ा युद्ध हुआ तो सबको पता तो चलना ही था, वक्ता कहते हैं; और सबको यह भी समझ है कि किसी प्रकार की लीला हो रही है — नहीं तो भला अपने ही भवन में, कैलाश पर्वत पर, जहाँ शिव-पार्वती के सिवाय किसी की कुछ नहीं चल सकती, भगवान शिव युद्ध क्यों करवाने लगे। यह बात हो ही रही थी कि सभी घायल गण धीरे-धीरे वहाँ पहुँचने लगे। उन्हें देखकर भगवान शंकर हँसते हुए ब्रह्मा जी से बोलते हैं — अपने ही गणों को देखकर हँस रहे हैं क्योंकि गणेश जी ने उनका अहंकार उतार दिया है। शिव जी कहते हैं: हे ब्राह्मण, सुनिए। मेरे द्वार पर एक महाबली बालक हाथ में लाठी लिए खड़ा है। सबको घर में जाने से रोकता है। वह भयंकर प्रहार करने वाला है। उसने मेरे पार्षदों को मार गिराया, मेरे गणों को बलपूर्वक पराजित कर दिया। अब आप वहाँ जाइए और इस महाबली को प्रसन्न कीजिए। हे ब्राह्मण, जैसी नीति हो वैसा व्यवहार करें।
ब्रह्मा जी की दाढ़ी, और "अज्ञान से मोहित होकर मैं गया"
गणेश जी ब्रह्मा जी की दाढ़ी उखाड़ने लगे — और ब्रह्मा जी स्वयं कहते हैं कि मैं अज्ञान से मोहित होकर वहाँ गया
उन्हें देखते ही गणेश जी क्रोध में आ गए और उनकी दाढ़ी उखाड़ने लगे। संकेत पढ़िए, वक्ता कहते हैं: शिव महापुराण में ब्रह्मा जी स्वयं कहते हैं कि उस विशेष बात को न जानकर, अज्ञान से मोहित होकर मैं ऋषियों के साथ वहाँ गया।
ब्रह्मा जी इस वचन को सुनकर, और उस विशेष बात को न जानकर, अज्ञान से मोहित होकर ऋषियों के साथ वहाँ पहुँच गए। संकेत को पढ़िए, वक्ता कहते हैं। ब्रह्मा जी जब वहाँ जा रहे हैं तो शिव महापुराण में ब्रह्मा जी स्वयं कह रहे हैं: उस विशेष बात को न जानकर, अज्ञान से मोहित होकर मैं सभी ऋषियों के साथ वहाँ गया। अब गणेश जी हमको देखते ही क्रोध में आ गए और आकर मेरी दाढ़ी उखाड़ने लगे। ब्रह्मा जी कह रहे हैं: हे देव, क्षमा कीजिए, क्षमा कीजिए — मैं यहाँ युद्ध के लिए नहीं आया हूँ। मैं तो ब्राह्मण हूँ, मुझ पर कृपा कीजिए; मैं उपद्रव-रहित हूँ तथा शांति करने वाला हूँ। ब्रह्मा जी नारद जी से कहते हैं: मैं ऐसा कह ही रहा था कि उस महापराक्रमी महावीर बालक ने हाथ में परिघ ले लिया। मारने के लिए तैयार हो गए गणपति जी; वे सुनने को तो तैयार ही नहीं थे। परिघ देखकर ब्रह्मा जी शीघ्रता से भागने लगे, और उनके साथ जितने ऋषि गए थे वे भी भागने लगे।
इंद्र, कार्तिकेय और भूत-प्रेत-पिशाच गणों को युद्ध का आदेश
फिर इंद्र, देवसेनापति कार्तिकेय और शिव जी के प्रमुख गणों को युद्ध का आदेश दिया गया
बहुत क्रोधित शिव जी ने अत्यंत उग्र इंद्र को — जिन्हें रुद्राष्टाध्यायी के तीसरे अध्याय में साक्षात शिव का स्वरूप माना गया है — सभी देवताओं के सेनापति कार्तिकेय जी और अपने सभी प्रमुख गणों, भूत-प्रेत-पिशाचों के साथ आज्ञा दी कि सब दिशाओं से घेरकर उस बालक से युद्ध करो।
भागते ऋषियों को गणपति जी ने पीछे से दौड़ाया और कुछ को पीट भी दिया; कोई रास्ते में गिरा, कुछ इधर गिरे, कुछ उधर। सब भागते-भागते शिव जी के पास आए और सारा विषय बताया, और शिव जी को बड़ा क्रोध आया। यहाँ वक्ता इंद्र पर रुकते हैं। अगर आपके आसपास रुद्राभिषेक चल रहा हो और रुद्राष्टाध्यायी का पाठ होता हो तो तीसरा अध्याय पढ़िए: वहाँ शक्र — जो इंद्र हैं — से शत्रुओं के दमन के लिए प्रार्थना की गई है, और अष्टाध्यायी के तीसरे अध्याय में वे साक्षात शिव के स्वरूप ही माने गए हैं। वैदिक देवता। तो इंद्र, जो अत्यंत उग्र देव और शत्रुओं के संहार में प्रवीण हैं, उन्हें, सभी देवताओं के सेनापति कार्तिकेय जी को, और शिव जी के जितने प्रमुख गण थे — भूत-प्रेत-पिशाच — उन सबको आज्ञा दी कि जाओ, जाकर युद्ध करो। सब हाथ में आयुध लेकर उस एक गण को मारने की इच्छा से सभी दिशाओं से घेरकर चले, और जिनका जो-जो विशेष अस्त्र था उन अस्त्रों का बलपूर्वक बालक गणेश पर प्रहार करने लगे।
क्या कल्प समय से पहले समाप्त हो गया? — त्रिलोकी में हाहाकार
त्रिलोकी में हाहाकार मच गया, लोग संशय में कि ब्रह्मा जी की आयु समाप्त हुए बिना ब्रह्मांड का नाश कैसे हो रहा है
चराचर त्रिलोकी में हाहाकार मच गया। सब लोग संशय में पड़ गए और आश्चर्यचकित होकर कहने लगे कि अभी तो ब्रह्मा जी की आयु समाप्त नहीं हुई, तब इस ब्रह्मांड का नाश कैसे हो रहा है — निश्चय ही शिव-इच्छा से ऐसी अकाल की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
उस समय चराचर त्रिलोकी में हाहाकार मच गया। सभी लोग अत्यंत संशय में पड़ गए। आश्चर्यचकित होकर कहने लगे: अभी तो ब्रह्मा जी की आयु समाप्त नहीं हुई है, तब इस ब्रह्मांड का नाश कैसे हो रहा है? निश्चय ही शिव-इच्छा से ऐसी अकाल की स्थिति उत्पन्न हो रही है। लेकिन वहाँ जितने देवता गए थे और जिस-जिस प्रकार के अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग किए थे, वह सब अब व्यर्थ हो गया।
दो शक्तियों का प्राकट्य, और सौम्य पार्वती के भीतर सहस्र शक्तियाँ
गणेश पर अस्त्र चलने पर पार्वती जी ने दो शक्तियाँ प्रकट कीं — सौम्य पार्वती के भीतर ऐसी सहस्र शक्तियाँ विद्यमान हैं
वे अपार क्रोध में बह गईं और दो शक्तियों को प्रकट किया। एक काले पहाड़ की गुफा के समान मुख फैलाकर खड़ी हो गई; दूसरी बिजली के समान रूप वाली, बहुत हाथों वाली, दुष्टों को दंड देने वाली महाभयंकर महादेवी थी। सौम्य पार्वती के भीतर, वे कहते हैं, ऐसी सहस्र शक्तियाँ विद्यमान हैं।
भगवती की सखी उन्हें सारी सूचना दे रही थी कि इस-इस प्रकार युद्ध हो रहा है, ऐसे-ऐसे प्रहार हो रहे हैं। तब भगवती अपार क्रोध में बह गईं और दो शक्तियों को प्रकट किया। ध्यान रखिएगा, वक्ता कहते हैं। माँ जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। पार्वती, जो शिव-परिवार में किसी मंदिर में बिल्कुल सौम्य रूप में, हाथ जोड़कर बैठी हुई, एकदम सामान्य सी दिखती हैं। आपको कौन पसंद आता है? अगर शत्रु-नाश करना चाहते हैं तो पसंद आती हैं महाकाली, जिनके दस मुख, दस-बीस हाथ, बीस पैर हों — दुर्गा सप्तशती के प्रथम चरित्र में जिनके स्वरूप का वर्णन है। वैसी शक्ति को प्रसन्न करने की इच्छा होती है, क्योंकि आप सोचते हैं कि यही शक्ति प्रसन्न होगी तो शत्रु का नाश होगा। और भगवती पार्वती के भीतर, वे कहते हैं, ऐसी सहस्र शक्तियाँ विद्यमान हैं। वे मूल प्रकृति हैं।
प्रवृत्ति-मार्ग के जीवन के लिए शिव का पंचाक्षरी और पार्वती का सप्ताक्षरी साथ-साथ
शिव जी के पंचाक्षरी मंत्र के साथ पार्वती जी का सप्ताक्षरी मंत्र क्यों करना चाहिए?
क्योंकि हम निवृत्ति-मार्ग में न होकर प्रवृत्ति-मार्ग में हैं और कामनाएँ भी हैं — तो पुरुष-शक्ति के साथ स्त्री-शक्ति की भी सेवा करनी चाहिए। दोनों मंत्र हर कोई कर सकता है; भगवती की कृपा से गुरु मिलें तो उनसे पुनः ले लीजिए। पंचाक्षरी वैसे तो अकेले सर्वसक्षम है।
वक्ता यहाँ चैनल की एक स्थायी सलाह का कारण बताते हैं। इसीलिए, वे कहते हैं, हमने चैनल पर भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र के साथ भगवती पार्वती के सप्ताक्षरी मंत्र को — जो हर किसी के द्वारा किया जा सकता है — प्रचारित किया है, ताकि आप लोग उसे करें। ये दो मंत्र जीवन में उतार लीजिए। भगवती की कृपा से जब गुरु मिलेंगे तो उनसे पुनः वह मंत्र ले लीजिए। कल्याण ही कल्याण है, क्योंकि माई सबसे मूल शक्ति हैं। बाकी उनकी महाशक्तियाँ और महातंत्र आदि तो विषय अलग ही हैं। लेकिन जिसके पास कोई मार्ग नहीं, कोई वैसे विशेष गुरु नहीं, और सौम्य रूप से जीवन-यापन करना है, सब कुछ की प्राप्ति भी करनी है, शत्रु-नाश आदि भी करना है और सफलतापूर्वक जीवन भी जीना है — उनके लिए ये दो मंत्र जीवन में हर कुछ देने में सक्षम हैं। पंचाक्षरी, वे कहते हैं, ऐसे तो सर्वसक्षम है। लेकिन क्योंकि हम कहीं न कहीं निवृत्ति मार्ग में न होकर प्रवृत्ति मार्ग में हैं और साथ ही कामनाएँ हैं, तो पुरुष-शक्ति के साथ स्त्री-शक्ति की भी सेवा करनी चाहिए। इसलिए सप्ताक्षरी साथ में करने को कहते हैं।
दो में से एक शक्ति ने सारे अस्त्र खा लिए; गणेश के लिए मंदराचल की उपमा
काली गुफा के समान मुख फैलाए एक शक्ति ने फेंके गए हर अस्त्र को खा लिया, केवल गणेश का परिघ दिखाई पड़ता रहा
जिसका मुख काली गुफा के समान फैला था, वह देवताओं के फेंके सारे अस्त्र-शस्त्र खा जा रही थी, यहाँ तक कि उस स्थान पर एक भी देवता का शस्त्र दिखाई नहीं देता था, केवल गणेश जी का परिघ। जैसे मंदराचल ने क्षीरसागर का मंथन किया, वैसे अकेले उस बालक ने पूरी दुस्तर देव-सेना को मथ डाला।
भगवती ने दो प्रमुख प्रचंड शक्तियों को प्रकट किया। भगवती का जो स्वरूप काली गुफा के समान था, अपना मुख फैलाए हुए, वह देवताओं द्वारा मारने के लिए फेंके जा रहे सारे अस्त्र-शस्त्र खा जा रही थी। एक भी देवता का शस्त्र उस स्थान पर दिखाई ही नहीं दे रहा था। सब ओर केवल गणेश जी का परिघ दिखाई पड़ रहा था। ऐसा अद्भुत चरित्र हो गया। वक्ता यहाँ दी गई उपमा पर ध्यान दिलाते हैं — हिंदी पढ़े हों तो अलंकार में एक उपमा अलंकार आता है: कहा गया है कि जैसे गिरिश्रेष्ठ मंदराचल ने क्षीरसागर का मंथन किया था, उसी प्रकार अकेले गणेश जी ने, उस बालक ने, पूरी दुस्तर देव-सेना को मथ डाला। अकेले गणेश जी के द्वारा मारे-पीटे इंद्रादि देवगण और शिवगण व्याकुल हो गए। आपस में कहने लगे: अब क्या करना चाहिए, कहाँ जाना चाहिए? दसों दिशाओं का ज्ञान ही नहीं हो रहा। यह बालक तो दाएँ-बाएँ परिघ घुमा रहा है। जब कोई तबीयत से पीट दे तो माथा काम करना बंद कर देता है, वक्ता जोड़ते हैं — देवता गणपति जी के द्वारा इस प्रकार कूटे जा चुके थे कि उनका मस्तिष्क काम करना बंद कर दिया। पता ही नहीं चल रहा कि किधर जाना है, दिशाओं का ज्ञान नहीं हो रहा; देवता भ्रमित होने लगे।
आकाश दर्शकों से भरा; पृथ्वी का काँपना
अप्सराएँ और सप्तर्षि युद्ध देखने आकाश-मार्ग में भर गए, पृथ्वी काँपने लगी और पर्वत गिरने लगे
पूरा आकाश-मार्ग अप्सराओं, सप्तर्षियों और युद्ध देखने आए लोगों से भर गया — परम सिद्ध गण जो आकाश-मार्ग से विचरण कर सकते हैं। पृथ्वी काँपने लगी और पर्वत गिरने लगे, क्योंकि एक बालक ने इतने सारे देवताओं को, वह भी कई युद्ध जीत चुके देवताओं को, अकेले संभाल लिया।
उस समय जितनी अप्सराएँ, सप्तर्षि आदि युद्ध देखने वाले वहाँ आए थे, उनसे पूरा आकाश-मार्ग भर गया। आकाश-मार्ग से जाने की क्षमता, वक्ता बताते हैं, कलिकाल में सामान्य मनुष्यों के पास तो है नहीं। जो परम सिद्ध गण होते हैं, वे आकाश-मार्ग से विचरण करते हैं। तो आकाश-मार्ग में स्थित होकर सब देखने आ गए — क्योंकि एक बालक ने इतने सारे देवताओं को, वह भी ऐसे देवता जो कई युद्ध जीत चुके हैं, अकेले संभाल लिया। इस युद्ध के कारण पूरी पृथ्वी काँपने लगी, पर्वत गिरने लगे। वे आज की एक तुलना देते हैं, इस सावधानी के साथ कि आजकल यह विषय बड़ा अलग तरीके से प्रस्तुत किया जाने लगा है: देवताओं की डोली जो कई यूट्यूब चैनलों पर दिखाई जाती है — जहाँ यथार्थ रूप से सही दिखाया जा रहा हो, वहाँ देखिए कि उसमें कितनी प्रचंडता और कितना वेग होता है। अभी के समय में जब इतना वेग हो सकता है, तो सोचिए कि जिस समय की चर्चा चल रही है उस समय भगवान गणेश जी में और सभी देवताओं में कितनी क्षमता होगी, और किस प्रचंडता से युद्ध हो रहा होगा कि पृथ्वी काँपने लगी, पर्वत गिरने लगे। आकाश, नक्षत्र, मंडल सब घूमने लगे।
केवल कार्तिकेय डटे रहे
केवल कार्तिकेय जी नहीं भागे; दोनों शक्तियों ने सब देवताओं के शस्त्र काट दिए और सब शिव जी के पास भागे
सभी देवता भाग गए; केवल पराक्रमी महावीर कार्तिकेय जी नहीं भागे और सबको रोककर गणेश जी के सामने डटे रहे। उन दोनों शक्तियों ने इस बीच सबको असफल कर दिया, सभी देवताओं के शस्त्र काट दिए।
वहाँ सभी देवता भाग गए। केवल पराक्रमी महावीर कार्तिकेय जी नहीं भागे; सबको रोककर गणेश जी के सामने डटे रहे। उन दोनों शक्तियों ने उस युद्ध में सभी को असफल कर दिया — जो दो शक्तियाँ भगवती ने भेजी थीं, एक महादेवी और एक भगवती काली का प्रचंड स्वरूप। उन दोनों ने वहाँ जितने देवता थे सबकी शक्तियों को असफल कर दिया, सबके शस्त्रों को काट दिया। जो शेष बचे, वे सब भागकर अपने-अपने स्वामियों के पास चले गए, और सब देवता और शिवगण भागकर शिव जी के पास आए। यहाँ आकर सब कह रहे हैं: हमने बहुत से युद्ध देखे हैं, लेकिन ऐसा युद्ध न कभी देखा है, न सुना है। अब आप ही कुछ विचार कीजिए। आप ही इस ब्रह्मांड के रक्षक हैं, इसमें संदेह नहीं।
नारद का शिव से: आपने गणों और देवताओं का गर्व दूर कर दिया
नारद जी ने शिव जी से कहा कि महालीला से गणों और देवताओं दोनों का गर्व दूर हो गया, अब लीला समाप्त कीजिए
कि महालीला करके शिव जी ने अपने गणों का गर्व दूर कर दिया — और इस बालक को बल देकर देवताओं का गर्व भी नष्ट कर दिया। अब, नारद जी कहते हैं, उस लीला को मत कीजिए; गणों और देवताओं का सम्मान करके उनकी रक्षा कीजिए, इन्हें अधिक मत बढ़ाइए, और इस गणेश का वध कीजिए।
भगवान शिव रुद्र रूप धारण करके बहुत कोपित हुए; और देवगणों की सेना चक्रधारी विष्णु जी के साथ भगवान शिव के पीछे-पीछे गई। वहाँ उपस्थित नारद जी हाथ जोड़कर कहते हैं: हे विभु, मेरा वचन सुनिए। आप सर्वत्र विद्यमान हैं। आप अनेक प्रकार की लीलाएँ करने में प्रवीण हैं। आपने महालीला करके अपने गणों के गर्व को दूर कर दिया है। देखिए, यहाँ शिव महापुराण में यह लिखा गया है, वक्ता कहते हैं। देवर्षि नारद जी कह रहे हैं कि आपने महालीला करके गणों के गर्व को दूर कर दिया। तारकासुर का युद्ध कार्तिकेय जी के साथ पहले हो चुका है; यह उसके बाद का वृत्तांत है। तो गणों के भीतर भी कहीं न कहीं यह अभिमान भर चुका था कि हम बहुत बलशाली हैं। उस बल के गर्व को — केवल गणों का ही नहीं, इंद्रादि देवताओं के गणों का भी — दूर करने के लिए भगवान शिव ने यह लीला रची, और यही नारद जी कह रहे हैं: आपने अपने गणों का गर्व दूर कर दिया; इनको बल देकर देवताओं का गर्व भी नष्ट कर दिया। हे नाथ, हे शंभु, स्वतंत्र तथा सबके गर्व को चूर करने वाले, आपने इस भुवन में अपना अद्भुत बल दिखाया। हे भक्तवत्सल, अब उस लीला को मत कीजिए और अपने गणों तथा देवताओं का सम्मान करके इनकी रक्षा कीजिए। अब इन्हें अधिक मत बढ़ाइए और इस गणेश का वध कीजिए। ऐसा कहकर नारद जी अंतर्धान हो गए।
देवी की लाठी से विष्णु जी का बल भी कुंठित
देवी की लाठी ने विष्णु जी का बल भी कुंठित कर दिया, और दोनों शक्तियाँ अपनी शक्ति गणेश को समर्पित कर अंतर्धान हो गईं
बालक ने भगवती की दी हुई लाठी से विष्णु जी पर प्रहार किया, और उस प्रहार से विष्णु जी सहित समस्त देवताओं का बल कुंठित हो गया और वे युद्ध से पराङ्मुख हो गए। उसमें इतना सामर्थ्य था — विष्णु जी की शक्तियाँ भी वहाँ कुंठित हो गईं।
यह सुनकर भगवान शिव बालक के साथ युद्ध करने वहाँ पहुँचे, और सबसे पहले विष्णु जी गणपति जी से युद्ध करने लगे। तब बालक गणेश, भगवती के द्वारा दी गई लाठी को धारण किए हुए, उससे विष्णु जी पर प्रहार करने लगे। उस लाठी के प्रहार से विष्णु जी सहित समस्त देवताओं का बल कुंठित हो गया और वे युद्ध से पराङ्मुख हो गए। उसमें इतना सामर्थ्य था कि विष्णु जी की शक्तियाँ भी वहाँ कुंठित हो गईं। अत्यंत महाभयंकर स्वरूप में गणेश जी को देखकर सभी देवता पुनः चिंतित हो गए। और विष्णु जी शिव जी से कह रहे हैं: यह बालक तो बड़ा तामसी और युद्ध में दुर्धर्ष है। इसका वध किस प्रकार किया जाए? तब विष्णु जी को इस प्रकार बात करते देख, भगवती की भेजी हुई वे दोनों शक्तियाँ अपनी समस्त शक्ति भगवान गणेश जी को समर्पित करके अंतर्धान हो गईं।
त्रिशूल गिरा, पिनाक गिरा, पाँचों हाथ आहत
गणेश ने पार्वती की दी हुई लाठी से त्रिशूल गिरा दिया और पिनाक धनुष को भी भूमि पर गिरा दिया
जिस हाथ में त्रिशूल था उस पर पार्वती की दी हुई लाठी से प्रहार किया और त्रिशूल गिर पड़ा। शिव जी ने पिनाक धनुष उठाया; गणेश्वर ने परिघ फेंककर उसे भी भूमि पर गिरा दिया। शिव जी वहाँ पंचानन स्वरूप में थे, तो एक ओर के पाँचों हाथों पर प्रहार करके उन्हें क्षति पहुँचा दी।
अब वहाँ केवल विष्णु जी और भगवान गणेश जी उपस्थित थे, और गणेश जी ने अपना परिघ फेंककर विष्णु जी पर प्रहार किया। महेश्वर को स्मरण करके विष्णु जी ने उस परिघ की गति को विफल कर दिया। उसी समय शिव जी भी अपना त्रिशूल लेकर युद्ध की इच्छा से वहाँ आ गए। भगवान शिव जिस हाथ में त्रिशूल धारण किए थे, उस हाथ पर गणपति जी ने उसी दंड से, उसी लाठी से प्रहार किया जो भगवती पार्वती ने दी थी, और शिव जी के हाथ से त्रिशूल गिर पड़ा। त्रिशूल गिरा तो उन्होंने पिनाक नामक धनुष उठा लिया। तो गणेश्वर ने अपना परिघ फेंककर उस धनुष को भी भूमि पर गिरा दिया। और भगवान शिव वहाँ पंचानन स्वरूप में हैं — इसका भी वर्णन है, क्योंकि वे वहाँ पाँच और दस हाथों के साथ उपस्थित हैं। तो उनकी एक ओर के पाँचों हाथों पर गणेश जी ने अपने परिघ से प्रहार कर दिया और पाँचों हाथों को क्षति पहुँचा दी। तब शंकर जी पुनः लौकिक गति प्रदर्शित करते हुए त्रिशूल को ग्रहण किए।
विष्णु का निर्णय: त्रिलोकी में गणेश के समान कोई योद्धा नहीं
विष्णु जी ने कहा कि देवता, दानव, यक्ष, राक्षसों में त्रिलोकी में इस योद्धा की बराबरी कोई नहीं कर सकता
कि यह महाबलवान धन्य है, रणप्रिय योद्धा है: मैंने बहुत से देवता, दानव, दैत्य, यक्ष, गंधर्व, राक्षस देखे, किंतु त्रिलोकी में तेज, रूप, गुण, शौर्य आदि में इसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता।
हाथ में त्रिशूल लेकर शंकर जी विचार करने लगे: जब मुझे इस प्रकार यह बालक चोट पहुँचा रहा है, तब अपने परिघ और शक्ति से इसने देवताओं को, गणों को किस-किस प्रकार आहत किया होगा — इसके सामने तो कोई ठहर ही नहीं पा रहा। विष्णु जी भी गणेश जी को देखकर कहते हैं: यह महाबलवान धन्य है। यह तो रणप्रिय योद्धा है। मैंने बहुत से देवता, दानव, दैत्य, यक्ष, गन्धर्ववैदिक और पौराणिक मान्यता में स्वर्गीय गायक व सेवक।, राक्षसों को देखा, किंतु त्रिलोकी में तेज, रूप, गुण, शौर्य आदि में इसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। विष्णु जी ऐसा कह ही रहे थे कि गणपति जी ने अपना परिघ घुमाकर उन पर फेंक दिया। तब विष्णु जी ने सुदर्शन चक्रभगवान विष्णु/नारायण का सुदर्शन चक्र अस्त्र, शास्त्रों में एकादशी जैसे व्रतों का दृढ़तापूर्वक पालन करने वाले भक्तों के रक्षक रूप में वर्णित। का प्रयोग किया और परिघ के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। और जो टुकड़ा टूटकर गिरा, गणेश जी ने उसे उठाकर उसी टूटे परिघ से विष्णु जी पर प्रहार कर दिया। जब उससे प्रहार किया तो गरुड़ जी वहाँ उपस्थित थे; उन्होंने उन टुकड़ों को विफल कर दिया — भक्षण कर लिया। इस प्रकार बहुत समय तक विष्णु जी और गणपति जी युद्ध करते रहे।
विष्णु का गिरना, और शिव द्वारा गणेश का शिरोच्छेदन
लाठी के प्रहार से विष्णु जी गिर पड़े, और कुपित शिव जी ने गणेश का शीश धड़ से अलग कर दिया
शक्ति-पुत्र ने लाठी से फिर विष्णु जी पर प्रहार किया; भगवती की दी हुई शक्ति होने से विष्णु जी उसे सह न सके और पृथ्वी पर गिर पड़े, गिरकर तुरंत उठे और फिर संग्राम करने लगे। तब अत्यंत क्रोधित शिव जी ने सामने प्रकट होकर गणपति जी का शिरोच्छेदन कर दिया।
तब भगवान शक्ति-पुत्र विनायक ने हाथ में लाठी लेकर फिर से विष्णु जी पर प्रहार कर दिया। और चूँकि वह भगवती की दी हुई शक्ति थी, उसे सहन करने में विष्णु जी भी समर्थ नहीं थे; वे पृथ्वी पर गिर पड़े। गिरने के पश्चात तुरंत उठकर फिर से संग्राम करने लगे। इस प्रकार युद्ध हो रहा था कि शिव जी अत्यंत क्रोधित और कुपित हो गए और सामने प्रकट होकर उन्होंने गणपति जी का शिरोच्छेदन कर दिया। गणपति जी का शीश धड़ से अलग हो गया।
पुत्र-वध पर कश्यप ऋषि का श्राप, और हम सब कश्यप की संतान क्यों
शिव जी ने अपने पुत्र गणेश का शीश क्यों काटा?
एक श्राप का मान रखने के लिए। शिव जी के दो राक्षस भक्त माली और सुमाली को वरदान था कि वे आकर उनकी रक्षा करेंगे; जब सुर नारायण ने उनसे युद्ध किया तो शिव जी ने त्रिशूल का प्रहार किया और उनके प्राण चले गए। उनके पिता कश्यप ऋषि ने श्राप दिया कि एक दिन आप भी अपने पुत्र का वध स्वयं करेंगे।
वक्ता शिरोच्छेदन पर कथा रोककर बताते हैं कि इस कल्प के अनुसार शिरोच्छेदन क्यों हुआ। भगवान शिव के दो बड़े भक्त थे, दो राक्षस जिनके नाम थे माली और सुमाली। माली-सुमाली को यह वरदान था कि जब कभी वे किसी से युद्ध करेंगे और स्मरण करेंगे तो भगवान शिव आकर उनकी रक्षा करेंगे। माली-सुमाली ने बहुत उत्पात मचाया, देवराज इंद्र पर आक्रमण किया। उस समय सुर नारायण ने इन दोनों राक्षसों से युद्ध किया और उन्हें प्रताड़ित करने लगे। तब इन्होंने शिव जी का स्मरण किया। भगवान शिव प्रकट हुए और सुर नारायण को रोकने लगे। लेकिन सुर नारायण अत्यंत क्रोध में थे और दोनों राक्षसों का वध करना चाहते थे। इससे पहले कि सुर नारायण वध करते, शिव जी ने ही त्रिशूल का प्रहार कर दिया, जिससे सुर नारायण के प्राण चले गए। ऐसा वर्णन है। जब इस युद्ध में सुर नारायण के प्राण चले गए, तो उनके पिता कश्यप ऋषि हैं। हम सभी कश्यप की संतान हैं, वक्ता जोड़ते हैं, और कश्मीर का नाम कश्यप ऋषि के ऊपर ही पड़ा है। जिनका कोई गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है। नहीं — जिन्हें पता ही नहीं कि हम किस गोत्र के हैं — उन्हें कहा जाता है कि आप कश्यप गोत्र बोलिए, क्योंकि कश्यप प्रथम ऐसे ऋषि हैं जिनके द्वारा समग्र सृष्टि में मनुष्यों की उत्पत्ति का दायित्व संभाला गया था। इसीलिए कहा जाता है कि हम सभी ऋषियों की संतान हैं। महर्षि कश्यप अत्यंत कुपित हुए और क्रोध में आकर श्राप दिया कि जिस प्रकार आपने मेरे पुत्र का वध किया है, उसी प्रकार एक दिन आप भी अपने पुत्र का वध स्वयं कीजिएगा। इसी श्राप को, वक्ता कहते हैं, गणपति जी के शिरोच्छेदन के माध्यम से सफल किया गया। भगवान शिव तो श्राप और वरदान सबसे रहित हैं, लेकिन महर्षि के उस श्राप का मान रखने के लिए इस कल्प में यह लीला रची गई।
क्षण मात्र में करोड़ों शक्तियाँ, सबके भक्षण का आदेश
शिरोच्छेदन का समाचार पाकर पार्वती जी ने क्षण भर में करोड़ों शक्तियाँ प्रकट कीं और आदेश दिया कि अपना-पराया देखे बिना सबका भक्षण कर डालो
उन्होंने क्षण मात्र में अपने शरीर से करोड़ों शक्तियाँ उत्पन्न कर दीं और आदेश दिया: मेरी आज्ञा से समग्र सृष्टि में प्रलय कर डालो। तुम्हें विचार नहीं करना है कि कौन देवता है, कौन ऋषि, कौन यक्ष, कौन राक्षस, कौन अपना, कौन पराया। सबको हठपूर्वक, बलपूर्वक खा डालो।
जब भगवती के पास यह समाचार पहुँचा कि गणपति जी का शिरोच्छेदन हो गया है, तो वे बहुत दुखी हुईं — और दुखी होने के साथ-साथ बहुत क्रोधित, बहुत क्लेशित हो गईं। अपने शरीर से करोड़ों शक्तियों को उत्पन्न कर दिया, क्षण मात्र में प्रकट कर दिया। ध्यान दीजिएगा, वक्ता कहते हैं: वही भगवती पार्वती हैं जो भगवान शिव के साथ बिल्कुल सौम्य रूप में विराजमान रहती हैं। उन्हीं के स्वरूप से करोड़ों शक्तियाँ उत्पन्न हुईं। जब उन्होंने आदेश माँगा, तो उन सभी जाज्वल्यमान शक्तियों को भगवती ने आदेश दिया: तुम मेरी आज्ञा से समग्र संसार में, सृष्टि में प्रलय कर डालो। तुम्हें विचार नहीं करना है कि कौन देवता है, कौन ऋषि, कौन यक्ष, कौन राक्षस, कौन अपना, कौन पराया। सबका भक्षण कर डालो, सबको खा डालो। सबको हठपूर्वक, बलपूर्वक खा डालो — वक्ता इसके लिए ग्रंथ का अपना वाक्यांश उद्धृत करते हैं। भगवती की आज्ञा पाते ही सभी शक्तियाँ क्रोध में भरकर सभी देवताओं का संहार करने लगीं। जिस प्रकार अग्नि तृणों का संहार कर देती है, वे समस्त शक्तियाँ उन सबका संहार करने लगीं।
चौंसठ योगिनियों में कराली, कुब्जिका, खंजा, लंबशिरसा
कराली, कुब्जिका, खंजा, लंबशिरसा — यहाँ नामित शक्तियाँ जो चौंसठ योगिनियों में आती हैं
चार के नाम दिए गए हैं — कराली, कुब्जिका, खंजा, लंबशिरसा — और इनके नाम भगवती की चौंसठ योगिनियों में आते हैं; ऐसी अनंत शक्तियाँ वहाँ विराजमान थीं। वे देवताओं को हाथ से पकड़-पकड़कर मुँह में डालने लगीं।
जहाँ भी उनकी शक्तियाँ दिखाई पड़तीं — शिव जी के गणाधिप, विष्णु जी, ब्रह्मा जी, शंकर जी, इंद्र, यक्षराज कुबेर, स्कंद (कार्तिकेय), सूर्य — वे शक्तियाँ उन सबका संहार करती जातीं। जहाँ-जहाँ दृष्टि जाती वहाँ केवल शक्तियाँ ही दिखाई पड़तीं। नाम भी बताए गए हैं। चौंसठ योगिनी में — भगवती की चौंसठ योगिनियों में — इनका नाम आता है। कराली, कुब्जिका, खंजा, लंबशिरसा। यहाँ केवल इन चार शक्तियों का नाम दिया गया है, लेकिन ऐसी अनंत शक्तियाँ वहाँ विराजमान थीं। ये शक्तियाँ देवताओं को हाथ से पकड़-पकड़कर मुँह में डालने लगीं। सोचिए, वक्ता कहते हैं: जब आप चौंसठ योगिनी पूजन करेंगे, भगवती की प्रमुख शक्तियों का, तो उसमें एक आती हैं प्रेत-भक्षणी। वे प्रेतों का साक्षात भक्षण कर जाती हैं। ऐसी एक शक्ति चौंसठ योगिनियों में उपस्थित है — और यहाँ तो वे देवताओं का ही भक्षण कर रही हैं।
अपराध सीमा पार करे तो योगिनियाँ नहीं बख्शतीं
अपराध शीश से ऊपर चला जाए तो योगिनियाँ बख्शती नहीं — जहाँ योगिनी कुपित है वहाँ भगवती ही कोप कर रही हैं
जब तक भगवती शांत हैं, सौम्य हैं, तब तक अत्यंत सौम्य हैं और कई पापों-दुष्कर्मों को क्षमा करने वाली हैं। लेकिन जब अति कर देते हैं, अपराध शीश से ऊपर चला जाता है, तो उनकी शक्तियाँ बख्शती नहीं — और जिन पर योगिनियों का प्रकोप हो जाए, उन्हें जल्दी कोई बचाने वाला नहीं होता।
देखिए, वक्ता कहते हैं: जब तक भगवती शांत हैं, सौम्य हैं, तब तक वे अत्यंत सौम्य हैं, अपने कई सारे पापों-दुष्कर्मों को क्षमा करने वाली हैं। लेकिन जब अति कर देते हैं — जब अपराध शीश से ऊपर चला जाता है — तो उनकी शक्तियाँ फिर बख्शती नहीं। इसीलिए जिनके ऊपर योगिनी का प्रकोप हो जाता है, उन्हें जल्दी कोई बचाने वाला नहीं होता। जहाँ योगिनी कुपित है, इसका मतलब भगवती ही कोप कर रही हैं। इस संहार को देखकर हरिहर — शिव जी, विष्णु जी, ब्रह्मा जी, इंद्र आदि सभी देवगण, सभी ऋषिगण — संदेह में पड़ गए कि क्या भगवती कुपित होकर अकाल में ही प्रलय कर देंगी? अभी तो प्रलय का समय नहीं आया। सब ऐसा विचार करने लगे।
साक्षात क्रोध की मूर्ति पार्वती; पुत्र खो चुकी माँ
कुपित पार्वती के सामने जाने का साहस किसी देवता ने नहीं किया — साक्षात क्रोध की मूर्ति, जैसे कोई भी माँ जिसके पुत्र की मृत्यु हुई हो
उन्होंने सोचा कि पार्वती जी साक्षात क्रोध की मूर्ति हैं, कोई उनके सामने जाने का साहस नहीं कर सकता। देवता, दानव, दिक्पाल, यक्ष, किन्नर, मुनि, विष्णु, ब्रह्मा — कोई भी अपना-पराया उनके जाज्वल्यमान दाहक स्वरूप के समक्ष जाने में समर्थ नहीं था।
फिर उन्होंने सोचा कि किस प्रकार भगवती माँ पार्वती को प्रसन्न किया जाए — और भगवती तो प्रसन्न, शांत हो ही नहीं पाएँगी। कौन सा उपाय अभी किया जाए? जिस प्रकार यह सब हो रहा है, अभी तो संभव ही नहीं। भगवान शिव भी लौकिक गति का आश्रय लेकर दुख में पड़ गए। सबको मोहित तो कर ही चुके हैं, सारी लीला रच ही चुके हैं, स्वयं दुखी भी हो गए। किंतु सभी देवताओं की कमर उस समय टूट गई जब पार्वती जी के पास जाने का प्रश्न उठा। उन्होंने सोचा कि पार्वती जी साक्षात क्रोध की मूर्ति हैं; कोई भी उनके सामने जाने का साहस नहीं कर सकता। देवता, दानव, दिग्पाल, यक्ष, किन्नर, मुनि, विष्णु, ब्रह्मा — कोई भी अपना-पराया भगवती के समक्ष प्रकट होने में, उनके सामने जाने में समर्थ नहीं था। उनके जाज्वल्यमान दाहक स्वरूप को देखकर सब डरे पड़े थे। किसी के पुत्र की मृत्यु हो जाए, वक्ता जोड़ते हैं, तो उसके भीतर का क्रोध, संताप ऐसा ही होता है।
नारद की छह श्लोक की स्तुति — जगदंब नमस्तुभ्यं
पार्वती जी को शांत करने के लिए नारद जी की छह श्लोक की स्तुति — जगदंब नमस्तुभ्यं
मात्र छह श्लोक की स्तुति, जगदंबा को नमस्कार — ट्रांसक्रिप्ट में इसका आरंभ जगदंब नमस्तुभ्यं शिवाय च नमस्तुते, चंडिकाय नमस्तुभ्यं कल्याणै च नमस्तुते दिया है — कि आप शांत होइए, प्रसन्न होइए।
उस समय सभी ऋषियों को देखकर नारद जी पार्वती जी के पास गए और उनके क्रोध को शांत करने और भगवती को प्रसन्न करने का प्रयास किया। उन्होंने स्तुति की: हे जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम।, आपको नमस्कार। ट्रांसक्रिप्ट के अनुसार: जगदंब नमस्तुभ्यं शिवाय च नमस्तुते। चंडिकाय नमस्तुभ्यं कल्याणै च नमस्तुते। इस प्रकार स्तुति की — आप शांत होइए, प्रसन्न होइए। और देवर्षि नारद जी की यह जो स्तुति है, वक्ता बताते हैं, मात्र छह श्लोक की स्तुति है।
नारद की स्तुति कब करें: देवी-कोप, मातृ-दोष और कुमारी के प्रति अपराध में
नारद जी की जगदंबा स्तुति का पाठ कब करना चाहिए?
जहाँ किसी के घर में देवी-कोप हो, कुंडली में मातृ-दोष हो, या जानबूझकर कोई अपराध किया हो — और वक्ता विशेष रूप से अविवाहित कन्या के छलपूर्वक यौवन-हरण का नाम लेते हैं, जिसके दंड में, वे कहते हैं, बहुत बुरे प्रकार का चर्म रोग होता है। तंत्रोक्त देवी सूक्तम के साथ इसका पाठ करें।
वक्ता स्तुति का प्रयोग बताते हैं, और पहले इस विषय को उठाने के लिए क्षमा माँगते हैं — लेकिन कलिकाल है, वे कहते हैं, और इस प्रकार के अपराध कई लोग करते हैं। अगर किसी के घर में देवी-कोप हो, कोई बोले कि देवी-दोष है, किसी प्रकार का मातृ-दोष कुंडली में उपस्थित हो, या आपने जानबूझकर अपराध किया हो — और विशेष करके यह: अक्षतयोनि, ऐसी कन्या जिसका कन्यादान न हुआ हो, विवाह न हुआ हो, और छलपूर्वक कोई उसके यौवन का भंग कर दे — तो भगवती के द्वारा बड़ा कठोर दंड मिलता है। जब वह दंड प्राप्त होता है, वे कहते हैं, तो चर्म रोग बहुत बेकार प्रकार का होता है; चर्म और गुप्तांग आदि गलने की स्थिति में हो जाते हैं। छल से ऐसा किया जाए तो बहुत विशेष प्रकार के दोष उत्पन्न होते हैं। प्रेम का विषय अलग है; विवाह आदि करना अलग विषय है। ऐसा कोप उपस्थित हो जाए तो प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। के साथ-साथ — कहा जाता है कि ऐसा अपराध बन गया हो तो क्षमा माँगते हुए अंगूठा धोकर पीना चाहिए — यह स्तुति भी की जाए। तांत्रोक्त देवीसूक्तम् के साथ इसका पाठ किया जाए तो भगवती का कोप शांत होता है। और अन्य प्रकार के अपराधों में भी, वे जोड़ते हैं, चाहे वह दृष्टि का अपराध ही क्यों न हो — किसी को गलत दृष्टि से देखा हो और उसके कारण ग्लानि उत्पन्न होने लगे कि मानसिक रूप से अपराध किया है — तो भी इसके द्वारा भगवती से क्षमा-प्रार्थना करें तो माँ शांत हो जाती हैं।
पार्वती की शर्त: पुत्र जीवित हो और सबमें प्रथम पूज्य हो
संहार रोकने के लिए पार्वती जी की शर्त: मेरा पुत्र जीवित हो और तुम सबके बीच प्रथम पूज्य हो
कि यदि मेरा पुत्र जीवित हो जाए और तुम लोगों के बीच प्रथम पूज्य हो, आज से सबका अध्यक्ष हो जाए, तो यह संहार नहीं होगा। यदि तुम उसे ऐसा कर दो तो लोक में शांति हो सकती है, अन्यथा तुम्हें सुख की प्राप्ति नहीं होगी।
जब नारद जी स्तुति करने लगे तो भगवती ने कुछ कहा नहीं, बस क्रोधपूर्वक देखा। जितने ऋषि वहाँ गए थे, सबने हाथ जोड़कर भगवती से कहा: क्षमा कीजिए, क्षमा कीजिए; इस समय प्रलय होना चाहता है। हे अंबिके, आपके स्वामी यहीं स्थित हैं। हम सब कौन हैं? हम सब तो आपकी प्रजा, आपके पुत्र हैं। हमारे अपराध को क्षमा कीजिए। सब व्याकुल हैं, इनकी शांति कीजिए। बहुत दीन-हीन होकर सब भगवती के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े हो गए। तब भगवती बोलीं: यदि मेरा पुत्र जीवित हो जाए और तुम लोगों के बीच प्रथम पूज्य हो, तो यह संहार नहीं होगा — जो संहार हो रहा है वह रुक जाएगा। यह आज से सबका अध्यक्ष हो जाए। और यदि तुम लोग उसे ऐसा कर दो तो लोक में शांति हो सकती है, अन्यथा तुम्हें सुख की प्राप्ति नहीं होगी। यह सुनकर ऋषियों ने देवगणों के साथ पुनः जाकर शंकर जी से सारा वृत्तांत निवेदित किया।
उत्तर दिशा में जाओ, जो पहले मिले उसका शीश लाओ — एक दाँत वाला हाथी
गणेश जी को हाथी का सिर कैसे मिला, और वे पुनः जीवित कैसे हुए?
शिव जी ने देवताओं से कहा कि उत्तर दिशा की ओर जाओ और सर्वप्रथम जो मिले उसका शीश लाकर धड़ पर जोड़ दो। शिव महापुराण में उन्हें एक दाँत वाला हाथी मिला। फिर शिव जी ने वेद मंत्रों से अभिमंत्रित जल छिड़का, जिसके स्पर्श मात्र से वे जीवित हो गए।
शिव जी देवताओं को आज्ञा देते हैं: संसार का जिस प्रकार कल्याण हो सके वह करना चाहिए। आप सभी उत्तर दिशा की ओर जाइए और सर्वप्रथम जो मिले उसका शीश लाकर इसके धड़ के ऊपर जोड़ दीजिए। इसमें, वक्ता बताते हैं, गजासुर का भी वृत्तांत आता है — कि उसे यह वरदान प्राप्त था कि वह इस प्रकार भगवान शिव के पुत्र के स्थान पर स्थापित होगा; वह एक अलग कथा है। शिव जी की आज्ञा का पालन करते हुए सभी देवता उत्तर दिशा की ओर गए। वहाँ, शिव महापुराण में ऐसी कथा है कि सर्वप्रथम एक दाँत वाला हाथी मिला। इसे आप उससे जोड़िए, वक्ता कहते हैं, जो हमने पढ़ा है कि गणपति जी का एक दाँत परशुराम जी के साथ युद्ध के समय टूटा है, इसलिए एकदंत कहे गए हैं। और वहाँ पुनः कह दें कि यहाँ केवल श्वेत कल्प की कथा की चर्चा हो रही है; कल्प के अनुसार सारे विषय अलग हैं। इस कल्प में इन्हें जो शीश लगा वह एक दाँत वाले हाथी का लगा। उसे जोड़कर सब प्रणाम करके शिव जी के पास खड़े हो गए। तब भगवान शिव ने सबको सुख प्रदान करने के लिए अपने वेद मंत्रों के प्रभाव से, अपने तेज के प्रभाव से जल को अभिमंत्रित करके गणपति जी के ऊपर छिड़का — जिसके स्पर्श मात्र से, शिव जी की इच्छा से, वे जीवित हो गए, चेतनायुक्त हो गए: अत्यंत सुंदर हाथी के मुख वाले, लाल वर्ण वाले, प्रसन्न मुखमंडल वाले, अत्यंत तेजस्वी और मनोहर आकृति वाले।
गणाध्यक्ष पद पर अभिषेक, और माँ के वरदान
देवताओं द्वारा गणाध्यक्ष पद पर अभिषिक्त, और माँ से वस्त्र, अलंकार, सिद्धियाँ और वरदान
देवताओं ने उन्हें गणाध्यक्ष के पद पर अभिषिक्त किया, और पार्वती जी ने गोद में लेकर आलिंगन किया। उन्होंने वस्त्र-अलंकार और अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान कीं, अपने कल्याणकारी हाथ से स्पर्श किया, मुख चूमा और अनेक वरदान दिए।
पार्वती-पुत्र को जीवित देखकर सब अत्यंत प्रसन्न हुए, सबका दुख नष्ट हो गया। सब भगवान गणेश जी को भगवती के पास ले जाकर दिखाए, और अपने पुत्र को जीवित देखकर माँ बहुत प्रसन्न हुईं। जब भगवती ने देख लिया कि उनके पुत्र जीवित हो गए हैं, तब उनकी शांति हुई; उसके पश्चात देवताओं के द्वारा गणपति जी को गणाध्यक्ष के पद पर अभिषिक्त किया गया। अपने पुत्र को अभिषिक्त देखकर पार्वती जी अत्यंत हर्षित हुईं; उस बालक को गोद में लेकर आलिंगन करने लगीं, प्रेम से अपने गले लगा लिया। नाना प्रकार के वस्त्र-अलंकार अपने पुत्र को प्रदान किए, अनेक प्रकार की सिद्धि प्रदान कीं। सबके दुखों को दूर करने वाले अपने कल्याणकारी हाथ से उनका स्पर्श किया, उनके मुख को चूमा, अनेक वरदान दिए। उन्होंने कहा: पुत्र, तुमने इस समय बड़ा कष्ट उठाया है। हे पुत्र, तुम धन्य हो और कृतकृत्य हो। तुम सभी देवताओं से पहले पूजे जाओगे और सदा दुख-रहित रहोगे।
गणेश के मुख पर सिंदूर, और कौन सा सिंदूर चढ़ाएँ
गणपति जी के लिए सिंदूर का प्रयोग क्यों होता है, और कौन सा सिंदूर?
क्योंकि पार्वती जी ने कहा कि इस समय तुम्हारे मुखमंडल पर सिंदूर दिखाई देता है, इसलिए लोग तुम्हें सदा सिंदूर से पूजेंगे। लाल सिंदूर या नारंगी सिंदूर चढ़ाएँ — दोनों का आख्यान मिलता है। और, वक्ता सावधान करते हैं, रक्त मिलाकर सिंदूर मत चढ़ा दीजिएगा।
पार्वती जी कहती हैं: क्योंकि इस समय तुम्हारे मुखमंडल पर सिंदूर दिखाई देता है, इसलिए लोगों के द्वारा तुम सदा सिंदूरसिंदूर चूर्ण, यहाँ भैरव को अर्पण हेतु उल्टे त्रिकोण मंडल को बनाने में प्रयुक्त, देवी हेतु बनाए जाने वाले रोली-अष्टगंध त्रिकोण के स्थान पर। से पूजित होगे। ध्यान रखिए, वक्ता कहते हैं, गणपति जी के पूजन के लिए सिंदूर का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। और — लाल सिंदूर। रक्त मिलाकर सिंदूर मत चढ़ा दीजिएगा। लाल वाला जो सिंदूर होता है वह; और कई जगह भकरा सिंदूर, जिसे कहते हैं कि यह ओरिजिनल सिंदूर है, वह नारंगी सिंदूर। दोनों का आख्यान मिलता है — या तो लाल सिंदूर या फिर नारंगी सिंदूर गणपति जी को चढ़ाना चाहिए। भगवती ने स्वयं कहा कि सदा सिंदूर से पूजित होगे; और जो मनुष्य पुष्प, चंदन, सुगंधित द्रव्य, उत्तम नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं।, विधिपूर्वक आरती, ताम्बूलपंचोपचार अथवा षोडशोपचार पूजा के अंग रूप में अर्पित ताम्बूल (पान का पत्ता) — जैसे ऋणहर्ता (मूँगा) गणपति की प्रतिष्ठा में। दान, परिक्रमा तथा नमस्कार विधान से तुम्हारी पूजा करेगा, उसे संपूर्ण सिद्धि प्राप्त होगी — इसमें संदेह नहीं करना चाहिए।
जिनकी साधना और कार्य बार-बार विघ्न से रुक जाते हैं
जिनकी साधना और कार्य बार-बार विघ्न से रुकते हैं उन्हें गणपति की शरण लेनी चाहिए — और शिव जी उन्हें अपना दूसरा पुत्र कहते हैं
जिनकी साधना-अनुष्ठान में बार-बार विघ्न आते हैं, और जिनके जीवन में अनेक प्रकार के विघ्न उपस्थित रहते हैं — कोई कार्य बस होते-होते रह जाता है। उन्हें गणपति जी की शरण अवश्य लेनी चाहिए।
तुम्हारे पूजन से समस्त विघ्न निःसंदेह विनष्ट हो जाएँगे, भगवती कहती हैं। जिनकी साधना-अनुष्ठान आदि में बार-बार विघ्न आते हैं उन्हें गणपति जी की सेवा-पूजा ज़रूर करनी चाहिए — जिनके जीवन में अनेक प्रकार के विघ्न उपस्थित रहते हैं। कोई कार्य कर रहे हैं, बस होते-होते रह जाता है, वक्ता कहते हैं; उन्हें गणपति जी की शरण ज़रूर लेनी चाहिए। और कैसे लेनी है वह इसी वृत्तांत में पूरा पता चल जाएगा। बहुत क्लिष्ट नहीं है; थोड़ा और सुन लीजिए। तब भगवती ने अनेक प्रकार के उत्कृष्ट पदार्थों से अपने पुत्र का पूजन किया। जब इस प्रकार सब कुछ हुआ तब भगवती शांत हुईं, शिव गणों को भी शांति मिली, देवता भी शांत हो गए, सब प्रसन्न होकर स्तुति करने लगे। तब भगवान शिव ने अपने पुत्र गणेश जी को गोद में बैठाया और कहा कि यह मेरा दूसरा पुत्र है। गणेश जी भी उठकर शिव जी और भगवती पार्वती को, विष्णु जी को, सबको प्रणाम किए और अपराधों के लिए क्षमा माँगी: आप लोग मेरे अपराध को क्षमा करें; मनुष्यों में मान ऐसा ही होता है।
पहले गणेश पूजन, नहीं तो किसी भी देवता की पूजा का फल नहीं
किसी भी देवता से पहले गणेश जी की पूजा क्यों आवश्यक है?
ब्रह्मा, विष्णु और शिव के एक साथ दिए वरदान के कारण: जैसे हम तीनों तीनों लोकों में पूज्य हैं वैसे ही गणेश भी सबके द्वारा पूजे जाएँ; पहले इनकी पूजा करके बाद में मनुष्य हमारी पूजा करें; और यदि कोई इनकी पूजा किए बिना अन्य देवताओं की पूजा करेगा तो उसे पूजा का फल प्राप्त नहीं होगा।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों देवताओं ने एक साथ उस बालक को उत्तम वर प्रदान किया। क्या कहा: जिस प्रकार हम तीनों श्रेष्ठ देवता तीनों लोकों में पूज्य हैं, उसी प्रकार यह गणेश भी सबके द्वारा पूजे जाएँ। हम लोग प्राकृत देवता हैं, उसी प्रकार यह भी प्राकृत हैं। गणेश विघ्नों का हरण करने वाले तथा सभी कामनाओं का फल प्रदान करने वाले हैं। पहले इनकी पूजा करके बाद में मनुष्य हम लोगों की पूजा करें। और हे देवताओं, यदि कोई इनकी पूजा किए बिना अन्य देवताओं की पूजा करेगा तो उसे पूजा का फल प्राप्त नहीं होगा; इसमें संदेह नहीं है।
जिस देवता के लिए जो बना है उसे उन्हीं तक सीमित रखें
जिन देवताओं के लिए जो बना है उसे उन्हीं तक सीमित रहने दें — राधा जी के नाम से रुद्राभिषेक को वक्ता अस्वीकार करते हैं
एक देवता का विधान दूसरे देवता के नाम से करना — वे उन वीडियो का उल्लेख करते हैं जिनमें कहा जा रहा है कि इस सावन शिव जी की जगह भगवती राधा का नाम लेकर रुद्राभिषेक कीजिए। कृपया इन सब चीज़ों से बचें, वे कहते हैं; जो चीज़ जिन देवताओं के लिए बनी है उसे उन्हीं तक सीमित रहने दीजिए।
वक्ता पाठ से हटकर आज की एक प्रथा का ज़िक्र करते हैं, नाम फिर से न लेने की बात कहते हुए। अब तो ऐसी स्थिति हो गई है, वे कहते हैं, कि लोग वीडियो बना रहे हैं कि शिव जी का अभिषेक करते हैं तो इस सावन शिव जी की जगह भगवती राधा का नाम लेकर रुद्राभिषेक कीजिए। कृपा करके इन सभी चीज़ों से बचें, वे कहते हैं। ऐसा अपराध न करें। अगर ऐसा होता तो फिर भगवान शिव का रुद्राष्टक क्यों प्रसिद्ध होता, क्यों ये सब चीज़ें कही जातीं। ये मनगढ़ंत बातें हैं: जो चीज़ जिन देवताओं के लिए बनी है उसे उन्हीं तक सीमित रहने दीजिए। वे चिंता आगे बढ़ाते हैं: कि लोग नाम ही लेना बंद कर दें — गणपति जी का नाम न लें, कहें कि गणपति जी की क्यों पूजा करें, हमारे लिए तो नारायणी ही सब हैं। आप समझ रहे हैं हम कहाँ कहना चाह रहे हैं, वे कहते हैं। यह गलती नहीं करनी है।
गणाध्यक्ष, और विघ्न-नाश में सर्वश्रेष्ठ नाम
शिव, विष्णु, ब्रह्मा ने स्वयं गणेश की पूजा की, सबने सर्वाध्यक्ष कहा, और शिव जी ने वरदान दिए — गणाध्यक्ष, और विघ्न-नाश में सर्वश्रेष्ठ नाम
स्पष्ट लिखा है कि इनकी पूजा के बिना पूजा स्वीकार ही नहीं होगी। फिर शिव जी ने स्वयं गणेश की पूजा की, फिर विष्णु जी, फिर ब्रह्मा जी, और सबने सर्वाध्यक्ष कहा। शिव जी के वरदान: मेरे संतुष्ट रहने पर जगत संतुष्ट होता है; शक्ति का पुत्र सर्वदा सुखी रहे; विघ्नों को नष्ट करने में तुम्हारा नाम सर्वश्रेष्ठ होगा; और आज से तुम मेरे संपूर्ण गणों के अध्यक्ष हो।
यहाँ स्पष्ट रूप से लिखा है, वक्ता कहते हैं: शिव, ब्रह्मा, विष्णु तीनों त्रिदेवों का यह वर है कि अगर कोई इनकी पूजा के बिना किसी की भी पूजा करेगा तो सफल नहीं होगा — वह पूजा स्वीकार ही नहीं होगी। ऐसा कहकर शिव जी ने अनेक प्रकार की वस्तुओं से स्वयं गणेश जी की पूजा की, फिर विष्णु जी ने पूजा की, फिर ब्रह्मा जी ने। समस्त देवगणों ने एक-एक करके और समस्त ऋषियों ने भी भगवती पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी की प्रसन्नता के लिए उनकी पूजा की, और सबने सर्वाध्यक्ष शब्द से संबोधित किया। फिर शिव जी ने प्रसन्न मन से गणेश जी को अनेक वर दिए। भगवान शिव कहते हैं: हे पार्वती-नंदन, मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ, इसमें संदेह नहीं। मेरे संतुष्ट रहने पर जगत संतुष्ट हो जाता है; कोई भी विरुद्ध नहीं हो सकता। तुम बालक रूप से हो और शक्ति के महापराक्रमी एवं परम तेजस्वी पुत्र हो; इसलिए सर्वदा सुखी रहो। हे बालक, विघ्नों को नष्ट करने में तुम्हारा नाम सर्वश्रेष्ठ होगा। आज से तुम मेरे संपूर्ण गणों के अध्यक्ष एवं सबके पूजनीय होगे। ऐसा कहकर शंकर जी ने गणेश को उनकी अनेक पूजा-विधियाँ बतलाकर उसी क्षण अनेक आशीर्वाद प्रदान किए। भगवान शिव ने गणेश जी को गणाध्यक्ष बनाया, सभी गणों का अधिपति — और उनके अनेक पूजन-विधानों को भी बताया। कुछ विधान यहाँ स्पष्ट किए गए हैं, वक्ता कहते हैं, उन्हें भी अवश्य सुन लीजिए: क्या-क्या विधान हैं और क्या करने से साल भर के भीतर किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है।
भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी, और चौबीस चतुर्थियाँ
गणेश जी का जन्म किस तिथि को हुआ, और वर्ष में कितनी चतुर्थियाँ होती हैं?
भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को, शुभ चंद्रोदय काल में। लोग विशेष रूप से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश पूजन मनाते हैं, लेकिन दोनों पक्षों की चतुर्थी उनकी है — बारह महीनों की चौबीस चतुर्थियों में गणेश जी का पूजन होता है।
भगवान शिव कहते हैं: हे गणेश्वर, तुम भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को शुभ चंद्रोदय काल में उत्पन्न हुए हो। अब विशेष करके, वक्ता बताते हैं, लोग भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी में गणेश पूजन मनाते हैं — लेकिन दोनों पक्षों की चतुर्थी में, और ऐसे तो बारह महीनों में जो चौबीस चतुर्थियाँ पड़ती हैं, सभी में भगवान गणेश जी का पूजन होता है। तो यहाँ भगवान कह रहे हैं कि कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को तुम उत्पन्न हुए हो। यह श्वेत कल्प की बात है; इसमें पुनः कन्फ्यूज़ मत होइएगा कि हम तो चतुर्थी शुक्ल पक्ष में मनाते हैं और यहाँ कृष्ण पक्ष कहा जा रहा है। इसमें संशय न करें — दोनों ही उनकी हैं। रात्रि के प्रथम पहर में गिरिजा के चित्त से तुम्हारा रूप आविर्भूत हुआ, इसलिए उसी दिन तुम्हारा उत्तम व्रत होगा। उसी तिथि से आरंभ कर उसी तिथि को सभी सिद्धियों के लिए मनुष्य को प्रसन्नतापूर्वक इस सुंदर व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए।
पूरा एक वर्ष, भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी से अगली तक
शिव जी द्वारा बताया गया गणेश चतुर्थी व्रत कितने समय का है?
जब तक भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पुनः आए — यानी इस साल भादों की कृष्ण चतुर्थी को आरंभ किया तो अगले साल भादों की कृष्ण चतुर्थी तक। भगवान शिव का आदेश है कि एक वर्ष तक यह व्रत करना चाहिए, और अतुल सुख चाहने वाले प्रत्येक चतुर्थी को पूजा करें।
इस व्रत में क्या-क्या अनुष्ठान होगा, वक्ता पूछते हैं, और शिव जी का उत्तर देते हैं। जब तक एक वर्ष में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पुनः आए — यानी इस साल भादों की कृष्ण चतुर्थी को आरंभ किया तो अगले साल भादों की कृष्ण चतुर्थी तक का समय दिया गया है। तब तक मेरी आज्ञा से तुम्हारा व्रत करना चाहिए। भगवान शिव का यह आदेश है कि एक वर्ष तक इस व्रत को करना चाहिए। जो लोग इस संसार में अनेक प्रकार के अतुल सुख चाहते हैं, वे प्रत्येक चतुर्थी के दिन विधिपूर्वक तुम्हारी पूजा करें।
स्नान, संकल्प, उपवास, और रात्रि के प्रथम पहर में पूजन
चतुर्थी व्रत के दिन की विधि क्या है?
प्रातः स्नान करके व्रत के लिए ब्राह्मणों से निवेदन करें; संकल्प लें, दूर्वा से पूजन करें, उपवास करें। रात्रि का प्रथम पहर आने पर पुनः स्नान करके गणेश जी का पूजन करें — धातु, मूँगा, श्वेत अर्क या मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसकी प्रतिष्ठा कराकर।
किस-किस प्रकार पूजन करना है, उसका वर्णन इस प्रकार है। सबसे पहले प्रातःकाल स्नान करके व्रत के लिए ब्राह्मणों से निवेदन करें। संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। आदि लें, दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। से पूजन करें, उपवास करें। रात्रि का प्रथम पहर उपस्थित होने पर स्नान करके गणेश जी का पूजन करना चाहिए। धातु से, मूँगे से, श्वेत अर्क से, मिट्टी से गणेश जी की मूर्ति का निर्माण करके उसकी प्राण प्रतिष्ठा कराकर मनुष्य सावधान होकर नाना प्रकार के दिव्य गंध, चंदन तथा पुष्पों से उनकी पूजा करे। धातु में कौन-कौन से, वे पूछते हैं, और उत्तर देते हैं: ताँबे में पूजन कर सकते हैं, पीतल में, चाँदी और स्वर्ण में पूजन कर सकते हैं। और मूँगा, जो रत्न होता है, उससे अगर भगवान गणपति जी की प्रतिमा का निर्माण करके पूजन करते हैं तो अद्भुत।
चालीस वर्ष पुराने श्वेत आक की जड़, पुष्य नक्षत्र में
श्वेत अर्क क्या है, और गणेश की मूर्ति और किससे बन सकती है?
सफेद आक, सफेद मदार का पौधा — कहा जाता है कि कम से कम चालीस वर्ष पुराना हो। उसकी जड़ से भगवान गणपति जी का विग्रह बनाना चाहिए, और उसमें गुरु पुष्य, रवि पुष्य नक्षत्र आदि का वर्णन है; वह तंत्रोक्त विधान हो जाता है। या फिर मिट्टी से मूर्ति बनाएँ।
श्वेत अर्कश्वेत आक (अकवन) का पौधा, जिसकी ताज़ी पत्तियों को नीम की सींकों से दोने के रूप में बाँधकर दुग्ध-धार उतार अनुष्ठान में प्रयुक्त किया जाता है।, वक्ता समझाते हैं, सफेद आक का पौधा कहा जाता है। कहा जाता है कि कम से कम चालीस वर्ष पुराना हो — मदार, सफेद मदार। तो उसकी जड़ से भगवान गणपति जी के विग्रह का निर्माण करना चाहिए। उसमें भी पुष्य नक्षत्र आदि का, गुरु पुष्य और रवि पुष्य नक्षत्र का वर्णन है; वह तंत्रोक्त विधान हो जाता है। या फिर मिट्टी से गणेश जी की मूर्ति का निर्माण करना चाहिए। और उनकी प्रतिष्ठा करके तब षोडशोपचारदेवता हेतु सोलह अंगों वाला पूर्ण पूजा-क्रम, मूल पंचोपचार से अधिक विस्तृत। विधि से उनका पूजन हो।
बारह अंगुल, तीन गाँठ, मूल-रहित — एक सौ एक या इक्कीस
गणेश जी को किस प्रकार की दूर्वा चढ़ती है?
गणेश जी की पूजा की दूर्वा एक बित्ता, बारह अंगुल लंबी होनी चाहिए; तीन गाँठ से युक्त; और मूल-रहित — उसमें जड़ नहीं होगी। ऐसी दूर्वा ही उन्हें समर्पित होती है, स्थापित प्रतिमा पर एक सौ एक या इक्कीस।
वक्ता कहते हैं कि यह अच्छे से जान लीजिए। इसमें कहा गया है कि गणेश जी की पूजा की दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। एक बित्ता, बारह अंगुल लंबी होनी चाहिए। बारह अंगुल लंबी मिल जाए तो अति उत्तम। और तीन गाँठ से युक्त होनी चाहिए, मूल-रहित होनी चाहिए — मतलब जड़ उसमें नहीं रहेगी, तीन गाँठ रहेंगी, और कम से कम बारह अंगुल लंबी। ऐसी दूर्वा ही गणेश जी को समर्पित होती है। और ऐसी एक सौ एक दूर्वा या इक्कीस दूर्वा स्थापित प्रतिमा के ऊपर चढ़ानी चाहिए। और यह, वे कहते हैं, अद्भुत विषय शिव जी के द्वारा बताया जा रहा है: सोचिए, भगवान शिव स्वयं कह रहे हैं कि भगवान गणपति जी के प्रतिष्ठित विग्रह पर दूर्वा से पूजन करें।
संकटनाशन के इक्कीस पाठ के साथ इक्कीस दूर्वा
जिसे अनेक प्रकार के कष्ट हों उसे चतुर्थी को क्या करना चाहिए?
चतुर्थी तिथि को गणेश जी का अभिषेक करके, सुगंध आदि से पूजन करके, संकटनाशन गणपति स्तोत्र का इक्कीस बार पाठ करते हुए इक्कीस दूर्वा चढ़ाइए — बताई गई दूर्वा: बारह अंगुल, तीन गाँठ, जड़-रहित। वर्ष भर की चौबीस चतुर्थियों तक करें।
अगर आपको अनेक प्रकार के कष्ट हैं, वक्ता कहते हैं, तो चतुर्थी तिथि को गणेश जी का अभिषेक करके, सुगंध आदि से पूजन करके, उनके ऊपर संकट नाशन स्तोत्र का पाठ करते हुए इक्कीस दूर्वा चढ़ाइए। इक्कीस बार पाठ कीजिए। और जैसी दूब घास यहाँ बताई गई है — बारह अंगुल लंबी, तीन गाँठ से युक्त और जड़ से रहित — ऐसी दूब घास चढ़ाएँ। वर्ष भर तक, यानी चौबीस चतुर्थी गणेश जी का पूजन करें, तो वह कामना व्रत से पूर्ण होती है। हालाँकि व्रत रखकर करेंगे तो अति उत्तम। जब कोई मार्ग न दिखे, वे कहते हैं, तो विघ्नहर्ता गणपति जी की शरणागत होनी चाहिए। स्थापित प्रतिमा पर एक सौ एक या इक्कीस दूर्वा चढ़ाने के बाद फिर धूप-दीपसुबह-शाम अर्पित की जाने वाली धूप व दीप — व्यस्त गृहस्थ या फ्लैट में भी सदैव निभाई जा सकने वाली न्यूनतम नित्य पूजा।, नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं।, ताम्बूलपंचोपचार अथवा षोडशोपचार पूजा के अंग रूप में अर्पित ताम्बूल (पान का पत्ता) — जैसे ऋणहर्ता (मूँगा) गणपति की प्रतिष्ठा में।, अर्घाशिवलिंग के चारों ओर की आधार-पीठिका व जलमार्ग, जिससे अभिषेक की सामग्री बहकर निकलती है। — और विशेष अर्घ भी है, जिसकी देने की विधि है, जिसमें फल, फूल, दक्षिणा, मिठाई, स्वर्ण लेकर रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष आदि मंत्र से अर्घ दिया जाता है। षोडशोपचार विधि के आरंभ में ही यह प्राप्त हो जाता है; नित्य कर्म पूजा प्रकाश में भी यह विधि दी गई है।
बाल चंद्रमा का पूजन, और नमक-रहित मीठा भोजन
चतुर्थी रात्रि के पूजन के बाद: बाल चंद्रमा का पूजन, ब्राह्मण-भोजन, और स्वयं लवण-रहित मधुर भोजन
उनका पूजन और स्तुति करने के बाद प्रथम पहर में उदित बाल चंद्रमा का पूजन करें — अर्घ दें, धूप-दीप दिखाएँ, यथोपचार पूजन करें। फिर ब्राह्मणों की पूजा करके मधुर पदार्थों का भोजन कराएँ, और स्वयं भी लवण-रहित मधुर भोजन करें।
तब उत्तम द्रव्यों के द्वारा गणेश जी की पूजा करें, स्तुति करें। उनका पूजन करने के पश्चात बाल चंद्रमा का पूजन करें — जो चंद्रमा उस समय प्रथम पहर में उदित हुए हों, उनका भी पूजन करना चाहिए। चंद्रमा को अर्घाशिवलिंग के चारों ओर की आधार-पीठिका व जलमार्ग, जिससे अभिषेक की सामग्री बहकर निकलती है। देना चाहिए, धूप-दीप दिखाना चाहिए, यथोपचार उनका भी पूजन करना चाहिए। फिर ब्राह्मणों की पूजा करके मधुर पदार्थों का भोजन कराना चाहिए; और स्वयं भी लवण-रहित मधुर भोजन करना चाहिए — नमक नहीं खाना है। उसके पश्चात अपना सारा नियम विसर्जित करें, गणेश जी का स्मरण करें — अर्थात जो कर्म किए हैं, पूजन किया है, वह सारा पुण्य भगवान गणेश जी को समर्पित कर दें। इस प्रकार यह शुभ व्रत संपूर्ण होता है। एक व्रत हुआ यह।
उद्यापन — बारह ब्राह्मण, कलश, और अष्टदल कमल
एक वर्ष के गणेश चतुर्थी व्रत का उद्यापन कैसे होता है?
पूरा एक वर्ष होने पर शिव जी की आज्ञा से बारह ब्राह्मणों को भोजन कराएँ, कलश स्थापित करके उसके साथ उनकी मूर्ति की पूजा करें। वेदी पर अष्टदल कमल बनाकर धन की कृपणता से रहित होकर वेद-विधि से होम करें — नवग्रह, षोडश मातृका मंडल, और गणेश गायत्री व सहस्रनाम से हवन।
ऐसा एक वर्ष जब हो जाए — यानी दोनों चतुर्थी को व्रत करते हुए जब एक साल पूरा हो जाए — तब उस व्रत की संपूर्णता के लिए उद्यापन करना चाहिए। साल भर के बाद, भगवान शिव कहते हैं, मेरी आज्ञा से बारह ब्राह्मणों को भोजन कराएँ तथा एक कलश की स्थापना करके तुम्हारी मूर्ति की पूजा करें। यानी कलश के साथ भगवान गणपति जी की मूर्ति रहे। वेदी पर अष्टदल कमल बनाकर मनुष्य धन की कृपणता से रहित होकर वेद-विधि से होम करे। यानी समस्त मंडल बने — नवग्रह, षोडश मातृका (षोडश मातृकाप्रमुख गृह्य संस्कारों के आरंभ में आवाहित की जाने वाली सोलह मातृकाएँ।) आदि; षोडश देवताओं के कलश की स्थापना हो; गणेश जी का विधिवत पूजन हो; और उसके पश्चात उनका होम-हवन हो। उद्यापन के समय गणेश जी के गायत्री मंत्र से, उनके सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। आदि से हवन हो, और तत्पश्चात उद्यापन की आगे की प्रक्रिया होगी।
दो सुहागन स्त्रियाँ और दो बटुक; केवल मिट्टी की प्रतिमा का विसर्जन
उद्यापन में दो सुहागन स्त्रियों और दो बटुकों को भोजन, रात्रि जागरण, और केवल मृत्तिका की प्रतिमा का विसर्जन
मूर्ति के आगे दो सुहागन स्त्रियों और दो बटुकों — बारह वर्ष से कम आयु के ब्राह्मण बालकों — का विधिपूर्वक पूजन करके आदर से भोजन कराएँ। फिर रात्रि जागरण, प्रातः पुनः पूजन, और गणेश जी से पुनः आने की प्रार्थना करके विसर्जन। यहाँ विसर्जन, वे स्पष्ट करते हैं, उद्यापन के लिए स्थापित मृत्तिका की प्रतिमा का है।
मूर्ति के आगे हवन आदि हो जाने के बाद दो स्त्रियों एवं दो बटुकों का विधिपूर्वक पूजन करके आदर से उन्हें भोजन कराएँ। जहाँ केवल स्त्री का वर्णन है, वक्ता समझाते हैं, यानी सुहागन स्त्री — दो; और दो बटुक यानी ब्राह्मण के बालक, बारह वर्ष से कम आयु के दो बाल ब्राह्मण। उनका विधिपूर्वक पूजन करें, भोजन कराएँ। रात्रि जागरण करें, प्रातःकाल पुनः पूजन करें। इसके बाद गणेश जी से पुनः आने की प्रार्थना करके उनका विसर्जन करें। यहाँ यह विषय न उठने लगे, वे जोड़ते हैं, कि गणेश जी का विसर्जन तो होता नहीं है कहा गया है। उद्यापन की विधि के लिए जो मृत्तिका की प्रतिमा वहाँ स्थापित की गई होगी, उसका विसर्जन होगा। उसके पश्चात सुबह पुनः बटुकों से आशीर्वाद ग्रहण करें, स्वस्तिवाचन कराएँ। व्रत की संपूर्णता के लिए पुष्पांजलिहाथों में पुष्प लेकर देवता के चरणों में अर्पित करने का समापन अनुष्ठान, आत्मसमर्पण की प्रार्थना सहित। समर्पित करें, नमस्कार करें। इस प्रकार जो व्रत का अनुष्ठान करता है उसे अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। यह अंतिम की पूरी विधि, वे बताते हैं, एक साल पूरा होने के पश्चात अंतिम चतुर्थी को करनी है — यानी कृष्ण पक्ष चतुर्थी को, भादों मास की कृष्ण चतुर्थी को जब एक साल हो जाए।
सिंदूर, चंदन, केतकी के फूल, तंडुल और अनेक उपचार
वर्ष भर का सामान्य पूजन: षोडशोपचार, दूर्वा, सहस्रार्चन, तर्पण — और सिंदूर, चंदन, केतकी के फूल, तंडुल
शिव जी कहते हैं कि जो श्रद्धा के साथ, अपनी शक्ति के अनुसार, सभी कामनाओं के फल के लिए सिंदूर, चंदन, केतकी के फूल, तंडुल और अनेक प्रकार के उपचारों से गणेश की पूजा करेगा, उसे सदा सिद्धि प्राप्त होगी और उसके विघ्नों का नाश होगा। केतकी के फूल और तांबूल दोनों गणेश जी को चढ़ते हैं।
उद्यापन से पहले, वक्ता कहते हैं, जो करना था वह यह: गणेश जी की प्रतिमा को स्थापित करके उनका षोडशोपचारदेवता हेतु सोलह अंगों वाला पूर्ण पूजा-क्रम, मूल पंचोपचार से अधिक विस्तृत। विधि से पूजन, दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। से पूजन, सहस्रार्चन, गणपति तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। — जो पूरा विधि-विधान पूजन का होता है, वह आप कर सकते हैं। फिर भगवान शिव पुनः कहते हैं: हे गणेश्वर, जो श्रद्धा के साथ नित्य अपनी शक्ति के अनुसार सभी कामनाओं का फल प्राप्त करने के लिए सिंदूरसिंदूर चूर्ण, यहाँ भैरव को अर्पण हेतु उल्टे त्रिकोण मंडल को बनाने में प्रयुक्त, देवी हेतु बनाए जाने वाले रोली-अष्टगंध त्रिकोण के स्थान पर।, चंदन, केतकी के फूल, तंडुल, अनेक प्रकार के उपचारों से तुम गणेश की पूजा करेगा — और जो भी भक्तिपूर्वक अनेक उपचारों से तुम्हारी पूजा करेंगे — उन्हें सदा सिद्धि प्राप्त होगी तथा उनके विघ्नों का नाश हो जाएगा। केतकी के फूल यहाँ भगवान गणेश जी को चढ़ेंगे, वे बताते हैं; ऐसा वर्णन है। ताम्बूलपंचोपचार अथवा षोडशोपचार पूजा के अंग रूप में अर्पित ताम्बूल (पान का पत्ता) — जैसे ऋणहर्ता (मूँगा) गणपति की प्रतिष्ठा में। भी, पान का पत्ता, यह सब भगवान गणपति जी को चढ़ेगा।
सभी वर्ण, विशेषकर स्त्रियाँ, और अभ्युदय चाहने वाले राजा
सभी वर्णों को गणपति पूजन का आदेश, विशेषकर स्त्रियों को, और अभ्युदय चाहने वाले राजाओं को
सभी वर्णों — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र — को गणपति जी का पूजन करने का आदेश दिया गया है; और विशेषकर स्त्री-जनों को गणेश जी का पूजन अवश्य करना चाहिए, ऐसा भगवान शिव स्वयं कहते हैं। अपने अभ्युदय की कामना रखने वाले राजाओं को भी विशेष रूप से पूजन करना चाहिए।
वक्ता इसे एक विशेष बात कहते हैं जिसे अवश्य जान लेना चाहिए। सभी वर्णों (वर्णाश्रम) — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र — सभी को गणपति जी का पूजन करने का आदेश दिया गया है। और साथ ही विशेषकर स्त्री-जनों को गणेश जी का पूजन अवश्य करना चाहिए। भगवान शिव स्वयं कह रहे हैं कि सभी वर्ण, विशेषकर स्त्री-जन, गणेश जी का पूजन अवश्य करें। अपने अभ्युदय की कामना रखने वाले राजाओं को भी विशेष रूप से गणपति जी का पूजन करना चाहिए। मनुष्य जो-जो कामना करता है, तुम्हारी पूजा से उसे निश्चित रूप से प्राप्त करेगा। इसलिए कामना करने वाले मनुष्य को सदैव तुम्हारा पूजन करना चाहिए।
गणेश और पार्वती का प्रथम आवाहन; पुत्र के पूजन से माँ प्रसन्न
गणेश जी का प्रथम पूजन अंबिका के साथ क्यों होता है?
क्योंकि प्रथम पूजन हम गणेश जी का भगवती अंबिका के साथ ही करते हैं — माँ पार्वती और गणेश जी का ही प्रथम आवाहन होता है — और यहाँ वर्णन है कि गणेश जी के पूजन से भगवती स्वतः प्रसन्न हो जाती हैं। अपने पुत्र के पूजन से माँ अवश्य प्रसन्न होती हैं।
जब भगवान शिव ने आशीर्वाद-वरदान आदि दिए, तो सभी देवगणों, ऋषियों और समस्त शिव-प्रिय गणों ने तथास्तु कहकर विधिपूर्वक गणपति जी का पूजन किया। उसके बाद सभी गणों ने गणेश को प्रणाम किया, आदरपूर्वक अनेक प्रकार की वस्तुओं से विशेष रूप से उनकी पूजा की। भगवती पार्वती उस समय अत्यंत हर्षित हुईं। और ध्यान रखिएगा, वक्ता कहते हैं, प्रथम पूजन हम गणेश जी का भगवती अंबिका के साथ ही करते हैं। माँ पार्वती और गणेश जी का प्रथम पूजन होता है; गणेश जी और पार्वती जी का ही प्रथम आवाहन होता है, और गणेश जी के पूजन से भगवती स्वतः प्रसन्न हो जाती हैं। यहाँ वर्णन भी है: अगर गणेश जी का पूजन हो रहा है तो माँ पार्वती स्वयं प्रसन्न हो जाती हैं, अत्यंत प्रसन्न होती हैं। अपने पुत्र के पूजन से माँ अवश्य प्रसन्न होती हैं।
गणाध्यक्ष के रूप में गणेश की प्रतिष्ठा पर महोत्सव
गणेश आख्यान का समापन महोत्सव से: दुंदुभि, नाचती अप्सराएँ, पुष्प-वृष्टि, और गणपति की प्रतिष्ठा पर सारा जगत सुखी
देवताओं की दुंदुभियाँ बजने लगीं, अप्सराएँ नाचने लगीं, गंधर्व गाने लगे, आकाश से पुष्प-वृष्टि होने लगी। गणपति की प्रतिष्ठा होने पर सारा जगत सुखी हो गया, महोत्सव होने लगा, सारा दुख-कष्ट नष्ट हो गया।
देवताओं के द्वारा दुंदुभियाँ बजने लगीं; अप्सराएँ नाचने लगीं; गन्धर्ववैदिक और पौराणिक मान्यता में स्वर्गीय गायक व सेवक। गाने लगे; आकाश-मंडल से पुष्प-वृष्टि होने लगी। इस प्रकार गणपति की प्रतिष्ठा होने पर सारा जगत सुखी हो गया। महोत्सव होने लगा; सारा दुख-कष्ट नष्ट हो गया। उस समय विशेष रूप से पार्वती जी और भगवान शिव प्रसन्न हुए, सर्वत्र मंगल होने लगा। समस्त ऋषिगण जो वहाँ आए थे, सब शिव जी की आज्ञा से भगवती पार्वती और गणेश जी की बारंबार प्रशंसा करते हुए स्तुति किए, शिव जी की स्तुति किए; और यह युद्ध कैसा था इसका वर्णन करते हुए सब चले गए। जब भगवती पार्वती का क्रोध शांत हो गया, तब शिव जी भी पूर्ववत भगवती के समक्ष आकर पूर्ण संसार के संचालन का जो विधि-विधान है, वह नाना प्रकार से करने लगे।
गणेश आख्यान सुनने से क्या मिलता है
गणेश आख्यान की पूरी फलश्रुति क्या है?
जो संयत होकर इसे सुनता है वह सभी मंगलों से युक्त हो जाता है। पुत्रहीन को पुत्र, निर्धन को धन, स्त्री की इच्छा वाले को स्त्री, प्रजा चाहने वाले को प्रजा, रोगी को आरोग्य, भाग्यहीन को सौभाग्य, जिसके पुत्र नष्ट हुए उसे पुत्र, जिसका धन नष्ट हुआ उसे धन, और जिसे पति ने त्याग दिया उस स्त्री को पति की प्राप्ति।
वक्ता अभी सुनाए गए आख्यान की फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। बताते हैं, और जिन्होंने पूरा नहीं सुना उनसे कहते हैं कि बाद में सुन लें और स्वयं अध्ययन करें। इसमें कहा गया है कि जो संयत होकर इस मंगलदायक आख्यान को सुनता है वह सभी मंगलों से युक्त होकर मंगलों का आलय हो जाता है — उसके पास इतने सारे मंगल आलय हो जाते हैं कि हर प्रकार से मंगल ही होने लगता है। पुत्रहीन को पुत्र। निर्धन को धन। स्त्री की इच्छा वाले को स्त्री — मतलब, वे स्पष्ट करते हैं, जिनका विवाह नहीं हो रहा है उनके लिए; कोई अन्य प्रकार का विषय इसमें न लगा लीजिएगा। प्रजा चाहने वाले को प्रजा की प्राप्ति — यानी आज के समय में जो चुनाव जीतना चाहते हैं। रोगी को आरोग्य। भाग्यहीन को सौभाग्य। जिसके पुत्र नष्ट हो गए हों उसे पुत्र; जिसका धन नष्ट हो गया हो उसे धन। जिसके पति ने त्याग दिया हो उस स्त्री को पति की प्राप्ति। और जो पुरुष शोक से युक्त हो गया है, इस संपूर्ण आख्यान को सुनने मात्र से शोक-रहित हो जाता है। गणेश जी से संबंधित यह आख्यान जिसके घर में रहता है वह सर्वदा मंगल से युक्त होता है, इसमें संशय नहीं। और यात्रा के आरंभ के समय और पवित्र पर्व में जो सावधान होकर इसे सुनता है वह गणेश जी की कृपा से संपूर्ण मनोरथ प्राप्त कर लेता है।
भाद्रपद भर प्रतिदिन पंद्रह मिनट गणेश आख्यान का पाठ
भाद्रपद मास में गणेश आख्यान का नित्य पाठ कैसे करें?
पूरे भादों के महीने प्रतिदिन पाठ कीजिए — लगभग पंद्रह मिनट लगेंगे। उस महीने गणेश जी के विग्रह को नित्य स्नान कराएँ, सुंदर तिलक करें, नैवेद्य अर्पित करें, दूब घास चढ़ाएँ, संकटनाशन का पाठ करके यह आख्यान पढ़ें, जो भी कामना हो उसे लेकर।
भाद्रपद मास जब आएगा, वक्ता कहते हैं, तो याद दिला दीजिएगा, वे इस आख्यान को पुनः सामने रख देंगे और इसका एक पीडीएफ बना देंगे, ताकि कम से कम एक महीने, पूरे भादों के महीने प्रतिदिन इसका पाठ हो। पंद्रह मिनट लगेंगे — गणेश जी की प्रसन्नता के लिए प्रतिदिन पाठ कीजिए। गणेश जी का जो भी विग्रह हो, नित्य उनका स्नान करा दीजिए। हालाँकि छोटे विग्रह का, वे बताते हैं, वैसे स्नान नहीं कराना चाहिए — लेकिन केवल महीने भर के लिए नित्य स्नान हो; अभिषेक करने के पश्चात सुंदर तिलक किया जाए, नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। आदि अर्पित किया जाए। दूब घास चढ़ाई जाए, संकट नाशन स्तोत्र का पाठ करके इस आख्यान का पाठ किया जाए — जो कामना है उसकी प्राप्ति के लिए। मंत्र सिद्धि वाले भी, वे कहते हैं, तंत्र सिद्धि वाले भी, अध्यात्म मार्ग पर चलने वाले भी, कॉम्पिटेटिव एग्ज़ाम वाले — किसी भी प्रकार की कामना हो, उस कामना के साथ कीजिएगा। अभी से याद करके रख लीजिए। इससे भाद्रपद मास भी सफल होगा और गणेश जी की कृपा से हमारी अनेक कामनाओं की पूर्ति भी हो जाएगी।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।