दत्तात्रेय एकाक्षरी साधना — अवधूत बनने का डर क्यों निराधार है, और सदस्यों का प्रश्नोत्तर
अवधूत अवस्था के डर पर दत्तात्रेय दीक्षा से पहले की चर्चा।
114 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
105 also answer a common question
Questions this answers
105 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.
भेजे गए वीडियो का दावा: साधना से घर, परिवार और संसार की कोई चिंता नहीं रहती।
दत्त साधना से अवधूत अवस्था आने का फैला हुआ दावा
साधकों ने वक्ता को ऐसे वीडियो के लिंक भेजे थे जिनमें कहा गया है कि भगवान दत्तात्रेय की साधना करने से अवधूत अवस्था प्राप्त हो जाएगी — अवधूत यानी वह जिसे घर, परिवार या संसार से कोई मतलब नहीं रहता। वे कहते हैं कि इस कारण लोगों में डर पैदा हुआ है। कल उन्होंने यह विषय संक्षेप में रखा था, आज वे इस पर विस्तार से बात करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि उनके साधक परिवार के कुछ साधकों ने उन्हें लिंक भेजे और प्रश्न भी पूछे। उनमें से अधिकतर ने एक ही बात कही: कि इस तरह के वीडियो मौजूद हैं जिनमें बताया जा रहा है कि अगर हम भगवान दत्तात्रेय की साधना करेंगे तो अवधूत की अवस्था प्राप्त हो जाएगी — अवधूत यानी जिसे घर, परिवार या संसार से कोई मतलब नहीं रहता। एक अच्छे साधक ने भी यह भेजा और पूछा कि लोग ऐसी बातें क्यों कहते हैं, और इसका तात्पर्य क्या है। क्या अब यह जरूरी है कि ठीक ऐसा ही होगा? अगर हम कोई दूसरी कामना रखें, तब भी क्या ऐसा हो सकता है? वे कहते हैं कि इस कारण कहीं न कहीं लोगों में डर पैदा हो रहा है। वे कहते हैं कि कल उन्होंने इस विषय को संक्षेप में रखने की कोशिश की थी; आज वे इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
अघोर स्वरूप अवधूत बनने के डर को गलत कैसे साबित करता है?
सदाशिव भी गृहस्थ नहीं, फिर भी उनके अघोर उपासक सबसे बड़े गृहस्थ हैं
वक्ता कहते हैं कि अगर ऐसी बात सच होती, तो सोचिए कि भगवान सदाशिव भी एक रूप में गृहस्थ नहीं हैं — वे भी अघोर रूप में हैं, कैलाश पर योग मुद्रा में अपने ध्यान में लीन। क्या उनकी पूजा और सेवा करने वाले सब लोगों ने संसार छोड़ दिया? वे कहते हैं कि आज जो उस अघोर रूप की उपासना करता है, वही सबसे बड़ा गृहस्थ है: उसने अघोर दीक्षा ली है, अपनी एक अलग परंपरा बना ली है, शादी कर रहा है, बच्चे पैदा कर रहा है, और खुद को अघोरी भी कह रहा है।
वक्ता कहते हैं कि अगर ऐसी बात होती, तो सोचिए कि भगवान सदाशिव भी अपने एक रूप में गृहस्थ नहीं हैं। वे भी अघोर रूप में हैं। वे भी कैलाश पर्वत पर रहते हैं, सदा योग मुद्रा में, सदा अपने ध्यान में। तो क्या उनकी पूजा और सेवा करने वाले सब लोगों ने संसार छोड़ दिया है? वे कहते हैं कि आज के समय में जो उनके अघोर रूप की उपासना कर रहा है, वही सबसे बड़ा गृहस्थ है। उसने अघोर की दीक्षा ली है और अपनी एक पूरी अलग परंपरा बनाकर रखी है। वह शादी भी कर रहा है, भाई लोग बच्चे भी पैदा कर रहे हैं, और खुद को अघोरी भी कह रहे हैं। वे पूछते हैं कि वह परंपरा कहाँ है? और फिर भी आप सब आज भगवान दत्त से डर रहे हैं। वे कहते हैं, सोचिए कि आप भगवान के ऐसे स्वरूप से डर रहे हैं।
जब ब्रह्मा महादेव से मिलने कैलाश गए तब क्या हुआ?
महादेव ध्यान में थे और ब्रह्मा अधीर थे
कहा जाता है कि भगवान श्री ब्रह्मा एक बार महादेव से मिलने कैलाश पर्वत गए। महादेव ध्यान में लीन थे, और ब्रह्मा बहुत जल्दी में थे, रुकना नहीं चाहते थे — वक्ता जोड़ते हैं कि यह सब त्रिदेवों की लीला थी। वे बार-बार कहने लगे कि प्रभु तुरंत आँखें खोलें, दर्शन दें और उनकी बात सुनें। नंदी जी महाराज ने उन्हें रोकने की कोशिश की कि रुकिए, प्रभु ध्यान से बाहर आएँगे तब आप बात कीजिए, पर ब्रह्मा नहीं माने।
वक्ता बताते हैं कि कहा जाता है, भगवान श्री ब्रह्मा जी एक बार महादेव से मिलने कैलाश पर्वत पर गए। महादेव ध्यान में लीन थे। ब्रह्मा जी बहुत जल्दी में थे। वे रुकना नहीं चाहते थे — वक्ता कहते हैं कि यह सब त्रिदेवों की ही लीला थी। वे बार-बार कहने लगे कि प्रभु जल्दी से जल्दी आँखें खोलें, दर्शन दें और उनकी बात सुनें। नंदी जी महाराज ने उन्हें रोकने की कोशिश की: रुकिए, प्रभु ध्यान से बाहर आएँगे तब आप बात कीजिए। पर ब्रह्मा जी नहीं मान रहे थे।
जब सदाशिव ने क्रोध में आँखें खोलीं तब क्या हुआ?
शिव और ब्रह्मा के बीच खड़े नारायण, और उनके स्वरूप का क्षय
जब भगवान सदाशिव को परेशानी होने लगी, तो उन्होंने क्रोध से आँखें खोलीं, और क्रोध में खुलने के कारण ब्रह्मा जी का शरीर क्षीण होने लगा। ब्रह्मा ने रक्षा के लिए नारायण का आवाहन किया। नारायण शिव और ब्रह्मा के बीच प्रकट हुए, और जब तक सदाशिव ने अपना क्रोध शांत किया, तब तक उस क्रोध से नारायण का आधे से अधिक स्वरूप क्षीण हो चुका था। वक्ता कहते हैं कि वह स्वरूप कहीं न कहीं समाहित करके रख लिया गया।
जब भगवान सदाशिव को परेशानी होने लगी, तो उन्होंने क्रोध से आँखें खोलीं। और क्योंकि आँखें क्रोध से खुली थीं, ब्रह्मा जी का शरीर क्षीण होने लगा। तो वे रक्षा के लिए नारायण का आवाहन करने लगे। नारायण शिव और ब्रह्मा के बीच प्रकट होते हैं, और जब तक भगवान सदाशिव ने अपना क्रोध शांत किया, तब तक उस क्रोध के कारण नारायण का आधे से अधिक स्वरूप क्षीण हो चुका था। वक्ता कहते हैं कि यहाँ सब एक-दूसरे का मान रख रहे हैं। कहा जाता है कि यह स्वरूप कहीं न कहीं समाहित करके रखा गया।
महासती अनुसूया की परीक्षा से तीन पुत्र कैसे जन्मे?
ब्रह्मा से चंद्रमा, शिव से दुर्वासा, नारायण से भगवान दत्त
जब महासती अनुसूया ने अपनी परीक्षा दी और त्रिदेवों को पुत्र रूप में बुलाया — अपने सतीत्व की शक्ति से तीनों को बालक बना दिया — तब नारायण के अंश से प्रकट होने वाला स्वरूप आना था। जब वे अपनी पहली अवस्था में लौटे, तो उन्होंने आशीर्वाद दिया कि वे उनके पुत्र बनेंगे, स्वयं त्रिदेवों के समान। ब्रह्मा जी के अंश से चंद्रमा का जन्म हुआ, शिव जी के अंश से दुर्वासा ऋषि का, और भगवान नारायण के अंश से भगवान दत्त का।
वक्ता आगे कहते हैं कि यही स्वरूप तब काम आया जब महासती अनुसूया ने अपनी परीक्षा दी और त्रिदेवों को पुत्र रूप में बुलाया, अपनी शक्ति से, अपने सतीत्व की शक्ति से तीनों को बालक बना दिया। तो नारायण के अंश से जो स्वरूप प्रकट होना था — जब वे अपनी पहली अवस्था में लौटे, तो उन्होंने आशीर्वाद दिया कि हाँ, हम तुम्हारे पुत्र बनेंगे, त्रिदेवों के समान। और वे कहते हैं, आप सब जानते हैं कि ब्रह्मा जी के अंश से चंद्रमा का जन्म हुआ; शिव जी के अंश से दुर्वासा ऋषि का जन्म हुआ; और भगवान नारायण के अंश से भगवान दत्त का।
भगवान दत्त के भीतर तीनों तत्व क्यों रहते हैं?
अधूरा अंश, जिसे ब्रह्मा और महादेव ने अपनी शक्तियाँ डालकर पूरा किया
भगवान नारायण का वह स्वरूप, जिसका शरीर शिव के क्रोध के सामने क्षीण हो गया था, वही अंश भगवती महासती अनुसूया को दिया गया — इसीलिए वह स्वरूप पूरी तरह जन्म नहीं ले सका, पूरा उत्पन्न नहीं हो सका। उसे पूर्णता देने के लिए ब्रह्मा जी और महादेव ने अपनी-अपनी शक्तियाँ उसमें समाहित कर दीं, और इस तरह त्रिदेवों की पूरी शक्तियाँ भगवान दत्त में आकर रहने लगीं।
भगवान नारायण का वह स्वरूप, जिसका शरीर भगवान शिव के क्रोध के सामने, उसके आगे खड़े होने पर क्षीण हो गया था — वही अंश रूप में भगवती महासती अनुसूया को दिया गया। इस कारण वह स्वरूप पूरी तरह जन्म नहीं ले सका, पूरा उत्पन्न नहीं हो सका। तो उस स्वरूप को पूर्णता देने के लिए ब्रह्मा जी और महादेव ने अपनी-अपनी शक्तियाँ उसमें समाहित कर दीं। इस कारण त्रिदेवों की जितनी भी शक्तियाँ थीं, वे सब भगवान दत्त में समाहित हो गईं।
भगवान दत्त के भीतर कौन-कौन से तत्व हैं?
ब्रह्मा का सृजन, नारायण का श्री, और रुद्र तत्व
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्त के भीतर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी का तत्व है; पालनहार नारायण का श्री तत्व है; और संहार के देवता की रुद्र शक्ति, रुद्र तत्व है। इसलिए अगर आपको अपने भीतर सृजन की क्षमता चाहिए — शिक्षक, वैज्ञानिक, इंजीनियर बनना हो, मेडिकल पेशे में जाना हो, किसी भी रचनात्मक क्षेत्र में जाना हो — तो भगवान दत्त वहाँ कृपा करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि इन सब कारणों से भगवान दत्त के भीतर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी का तत्व है। श्री के कर्ता, पालनहार नारायण का श्री तत्व है। और संहार के देवता की रुद्र शक्ति, रुद्र तत्व भी है। वे कहते हैं, भगवान दत्त के लिए किसी भी क्षेत्र में जाइए। आपको अपने भीतर सृजन की क्षमता चाहिए: आप शिक्षक बनना चाहते हैं, वैज्ञानिक बनना चाहते हैं, इंजीनियर बनना चाहते हैं, मेडिकल पेशे में जाना चाहते हैं। रचनात्मक क्षेत्र में आप जहाँ भी जाना चाहें, भगवान दत्त वहाँ अपनी कृपा करेंगे। उनकी वह शक्ति, वह सामर्थ्य आपका साथ देगी; उनका वही तत्व आपको आगे ले जाएगा।
धन और भौतिक इच्छाओं के लिए दत्त के किस पक्ष का आवाहन होता है?
नारायण स्वरूप वाली श्री तत्व युक्त शक्ति
अगर आप नौकरी में जाना चाहते हैं, व्यापार में बहुत आगे बढ़ना चाहते हैं, धन-धान्य पाना चाहते हैं, अमीरों में गिने जाना चाहते हैं, भौतिक इच्छाओं की पूर्ति चाहते हैं — तो भगवान दत्त की श्री तत्व युक्त शक्ति, जो नारायण का स्वरूप है, कृपा करेगी और आपको श्री दी जाएगी।
अगर आप सेवक के रूप में, नौकरी के काम में जाना चाहते हैं; अगर आप चाहते हैं कि व्यापार में बहुत आगे बढ़ें, धन-धान्य की प्राप्ति हो; कि आप अमीरों में शामिल हों; अगर आप भौतिक इच्छाओं की पूर्ति चाहते हैं — तो भगवान दत्त की श्री तत्व युक्त शक्ति, जो नारायण का स्वरूप है, कृपा करेगी और आपको श्री दी जाएगी।
सिद्धि या रक्षा कार्य चाहने वाले साधक की मदद कौन सा पक्ष करता है?
साधना, सिद्धि और रक्षा कर्म में सहायक रुद्र शक्ति
अगर आप साधक बनना चाहते हैं, साधनाओं में जाना चाहते हैं, सिद्धियाँ पाना चाहते हैं, जनसेवा या राष्ट्रसेवा में या रक्षा वाले किस्म के कामों में जाना चाहते हैं, तो भगवान दत्त की रुद्र शक्ति, सहायक रुद्र तत्व, उसमें आपका सहायक बनता है और आपको आगे ले जाता है।
आप साधक बनना चाहते हैं, साधनाओं में जाना चाहते हैं, सिद्धि पाना चाहते हैं। आप जनसेवा में, राष्ट्रसेवा में, रक्षा वाले किस्म के कामों में जाना चाहते हैं। वक्ता कहते हैं कि तब वहाँ भगवान दत्त की रुद्र शक्ति, वह सहायक रुद्र तत्व, आपका सहायक बनेगा और उसमें आपको आगे ले जाएगा।
क्या दत्त के एकाक्षरी बीज का जप अवधूत अवस्था में धकेल देता है?
फल संकल्प तय करता है, मंत्र नहीं
वक्ता कहते हैं कि उनमें तीनों तरह की शक्ति समाई है, और आपको जो चाहिए — जिस कामना से आप उनके मंत्र का जप करेंगे — वही आपको मिलेगा। कहीं भी जरा भी डरने की जरूरत नहीं कि दत्त के एकाक्षरी बीज का जप करने से अवधूत अवस्था आ जाएगी। ऐसा नहीं है। मायने यह रखता है कि आप किस संकल्प से जप कर रहे हैं, और आप अवधूत अवस्था के लिए तो जप कर ही नहीं रहे।
वक्ता कहते हैं कि उनमें तीनों तरह की शक्ति समाई है। आपको जो चाहिए, जिस कामना से आप उनके मंत्र का जप करेंगे, वही आपको प्राप्त होगा। इसमें आपको कहीं भी जरा भी डरने की जरूरत नहीं है — कि हम भगवान दत्त के एकाक्षरी बीज का जप करेंगे और उससे अवधूत की अवस्था प्राप्त हो जाएगी। ऐसा नहीं है। आप उस मंत्र का जप किस संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। से कर रहे हैं? आप अवधूत अवस्था के लिए जप कर ही नहीं रहे। आपने यह संकल्प थोड़े ही लिया है कि मुझे अवधूत अवस्था मिले, समाधि की अवस्था मिले, दिव्य शक्तियाँ मिलें। आपने संकल्प लिया है कि भगवान दत्त की कृपा मिले — और वे जानते हैं कि आपके भौतिक जीवन में क्या इच्छाएँ हैं।
क्या सवा लाख जप से अवधूत अवस्था मिल जाती है?
पाँच लाख जप के बाद भी एक पत्ता नहीं हिलता
वक्ता कहते हैं कि अवधूत अवस्था इतनी आसान नहीं कि आप सवा लाख या पाँच लाख जप करेंगे और आपकी अवस्था वैसी हो जाएगी। वे साफ कहते हैं कि हम भी YouTube पर वीडियो बनाकर डाल सकते हैं कि पाँच लाख जप किए और ऐसा हो गया — पर मानिए, पाँच लाख जप के बाद एक पत्ता भी नहीं हिलता। यह इतना आसान नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि अवधूत अवस्था इतनी आसान नहीं है कि आप सवा लाख या पाँच लाख जप करेंगे और आपकी अवस्था वैसी हो जाएगी। यह कहने भर की बात है। वे साफ कहते हैं कि हम भी YouTube पर वीडियो बनाकर डाल सकते हैं कि पाँच लाख जप किए और ऐसा हो गया। मानिए: पाँच लाख जप के बाद एक पत्ता भी नहीं हिलता। यह इतना आसान भी नहीं है। हाँ, उनकी शक्तियाँ बहुत साथ देती हैं। भौतिक मामलों में वे अप्रत्यक्ष रूप से बहुत बड़ा साथ देती हैं। और जिसे लोग प्रत्यक्ष कहते हैं — जो लोग नई साधनाएँ कर रहे हैं, उनका कर्म इतना प्रबल नहीं है कि पाँच लाख जप में पहले से बना सारा प्रारब्ध एक साथ खत्म हो जाए और आपके सारे कष्ट खत्म हो जाएँ।
पहली साधना वास्तव में क्या करती है?
सामर्थ्य और निकलने का रास्ता, और पुराने पाप का धुलना
वक्ता कहते हैं कि आपके सारे कष्ट खत्म नहीं होंगे, पर आपको सामर्थ्य दी जाएगी। उनका साथ मिलेगा; वे वह रास्ता निकालेंगे जिससे आप उन सब चीजों से छूट सकें। और अभी जब आप अपनी पहली साधना करते हैं, तो पहले के पाप धुलेंगे — वे पूछते हैं, तो अवधूत अवस्था आपको कहाँ से मिल जाएगी?
वक्ता कहते हैं, नहीं, पर आपको सामर्थ्य दी जाएगी। उनका साथ मिलेगा। वे रास्ता निकालेंगे — कि आप उन सब चीजों से कैसे बाहर आएँ। तो अभी जब आप अपनी पहली साधना करते हैं, तो पहले के पाप धुलेंगे। वे पूछते हैं, अवधूत अवस्था आपको कहाँ से मिल जाएगी?
दामोदर बीजाक्षर के भीतर कौन विराजमान है?
बीजाक्षर में अग्नि, ब्रह्म और अंग की मात्राएँ और अनघा लक्ष्मी
दामोदर भगवान नारायण का पालनहारक स्वरूप है, और उस स्वरूप में अग्नि की मात्रा, ब्रह्म की मात्रा और अंग की मात्रा में साक्षात भगवती जगदंबा अनघा लक्ष्मी बीजाक्षर में विराजमान होती हैं। वे पालनहार हैं, श्री के कर्ता, श्री से युक्त; श्री के भीतर अग्नि देने के लिए अग्नि बीज है; "र" की ध्वनि रुद्र रूप में है; और ऊपर अंग के रूप में "अ" की ध्वनि, "म" की ध्वनि या "ग" की ध्वनि है, जिसमें भी आपको जप करना हो।
वक्ता कहते हैं, दामोदर: दामोदर स्वरूप भगवान नारायण का पालनहारक स्वरूप है। उस स्वरूप में अग्नि की मात्रा, ब्रह्म की मात्रा और अंग की मात्रा में साक्षात भगवती जगदंबा अनघा लक्ष्मी बीजाक्षर में विराजमान होती हैं। तो वे पालनहार हैं, श्री के कर्ता, श्री से युक्त। वे नारायण के पालनहारक स्वरूप में हैं। अग्नि बीज (बीज मंत्र) श्री के भीतर अग्नि देने के रूप में है। "र" की ध्वनि रुद्र रूप में है। और अंग के रूप में, ऊपर, "अ" की ध्वनि, "म" की ध्वनि या "ग" की ध्वनि है — जिसमें भी आपको जप करना हो। और वे कहते हैं कि अगर आप यहाँ से कर रहे हैं, तो हम आपको "म" की ध्वनि बताते हैं, क्योंकि हमें पालनहार में जाना है; हमें भौतिक इच्छाओं की पूर्ति करनी है।
भगवान दत्त के दामोदर एकाक्षरी मंत्र में किसकी कृपा मिलती है?
दामोदर मंत्र में नारायण, अनघा लक्ष्मी, श्री रुद्र और अग्नि देवता का आवाहन
वक्ता कहते हैं कि उसमें आपको चार प्रमुख देवताओं की कृपा मिलेगी — नारायण, भगवती अनघा लक्ष्मी, भगवान श्री रुद्र और अग्नि देवता। और इसमें आप जो भी संकल्प लेंगे, वही पूरा होगा।
वक्ता कहते हैं कि उसमें आपको चार प्रमुख देवताओं की कृपा प्राप्त होगी: नारायण, भगवती अनघा लक्ष्मी, भगवान श्री रुद्र और अग्नि देवता। और इसमें आप जो भी संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेंगे, उसी की पूर्ति होगी।
अगर दत्त को गुरु माना जाए, तो क्या गुरु अवधूत अवस्था में ले जाएँगे?
गुरु आपके जीवन में वही घटनाएँ घटाते हैं जो घटनी चाहिए
अगर आपने उन्हें गुरु रूप में लिया है — तो गुरु क्या है? वक्ता कहते हैं कि गुरु आपको अवधूत अवस्था में नहीं ले जा रहे। आपके जीवन में जो घटनाएँ समाहित होनी हैं, जो कुछ होना है, गुरु वही करवाएँगे। इसलिए वे कहते हैं, अगर आपका कोई गुरु नहीं है, तो निश्चिंत होकर भगवान दत्त की एकाक्षरी साधना कीजिए।
बिल्कुल नए साधक को शुरू में कितना करना चाहिए?
दीक्षा विधान के बाद 27 या 11 माला, साथ में वज्र कवच का एक पाठ
वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं कि मंत्र छोटा है तो आप एक ही दिन में पाँच सौ जप कर लें। शुरू में थोड़ा कम कीजिए। नए साधकों को अभी माला फेरना नहीं आता, और उन्होंने पहले कोई विशेष साधना नहीं की — इसलिए दीक्षा विधान करने के बाद जितना हो सके उतना कीजिए: 27 माला या 11 माला। इसके साथ भगवान दत्तात्रेय के वज्र कवच का एक पाठ कीजिए, जो उस दिन अपलोड हुआ था; ज्यादा पाठ की जरूरत नहीं, एक पाठ काफी है।
वक्ता कहते हैं कि इसमें ऐसी कोई अवस्था नहीं है। हाँ — शुरू में ऐसा नहीं कि छोटा मंत्र है तो हम एक ही दिन में पाँच सौ जप कर लें। शुरू में थोड़ा कम कीजिए। साधक नए हैं; आपको अभी माला फेरना नहीं आता। और अगर आपने पहले कोई विशेष साधना नहीं की है, तो ऐसे में दीक्षा विधान करने के बाद जितना हो सके 27 माला कीजिए, 11 माला कीजिए। इसके साथ भगवान दत्तात्रेय के वज्र कवच का एक पाठ कीजिए, जो आज अपलोड हुआ है। ज्यादा पाठ करने की जरूरत नहीं है। बस एक पाठ कीजिए। अभी इतने से शुरुआत कीजिए।
लगभग एक महीने की दत्त साधना के बाद क्या होता है?
रास्ता अपने आप खुलना, और दत्त का गुरु रूप में स्वप्न में आना
वक्ता कहते हैं कि एक महीना बीतते-बीतते आपके लिए रास्ता खुलने लगेगा कि साधना में आगे कैसे बढ़ें — आपको अपने आप पता चलने लगेगा कि ऐसा करना चाहिए। वे चैनल के साधकों का उदाहरण देते हैं, मेघनाथ जी और अंधकासुर का नाम लेते हुए, जिनमें से किसी का यह अनुभव था: भगवान दत्त की साधना करते हुए दत्त स्वप्न में साक्षात दिखे और मार्गदर्शन दिया कि तुम्हारी यह साधना पूरी हुई, अब आगे का काम इस तरह करो।
वक्ता कहते हैं कि एक महीना बीतते-बीतते आपके लिए रास्ता खुलने लगेगा कि साधना में आगे कैसे बढ़ना है, क्या करना है। आपको अपने आप पता चलेगा कि ऐसा करना चाहिए। वे कहते हैं कि चैनल पर ऐसे साधक हैं — मेघनाथ जी, या अंधकासुर; इन्हीं में से किसी का यह अनुभव था। उन्होंने बताया था कि साधना करते हुए, भगवान दत्त की साधना करने पर, बहुत सारे स्वप्नों के माध्यम से वे साक्षात स्वप्न में दिखते हैं और मार्गदर्शन देते हैं: तुम्हारी यह साधना पूरी हुई, अब आगे का काम इस तरह करो। गुरु रूप में वे यह सारा मार्गदर्शन कर रहे हैं।
क्या अवधूत अवस्था अपने आप में भागने वाली चीज है?
अगर आए भी, तो वह दिव्य है और पूरे कुल को तार देती है
वक्ता कहते हैं कि यह अपने आप में एक दिव्य साधना है, और आपको कहीं से परेशान नहीं होना कि आपके साथ कुछ अनहोनी होगी। और अगर किसी को अवधूत अवस्था मिल भी जाए, तो वह अपने आप में दिव्य और चमत्कारी है। वे पूछते हैं कि लोग इससे भाग क्यों रहे हैं, और इस चीज को डरावना क्यों बनाया जा रहा है? यह सोचने की बात है कि लोग इससे क्यों डरते हैं। अवधूत बनना इतनी आसान बात नहीं, और अगर हो भी जाए, तो अपने आप में दिव्य है — आप अपने पूरे कुल को तार देंगे।
वक्ता कहते हैं कि यह अपने आप में एक दिव्य साधना है। इसमें आपको कहीं से परेशान नहीं होना कि आपके साथ कुछ अनहोनी होगी। और अगर किसी को अवधूत अवस्था मिल जाए, तो वह अपने आप में दिव्य और चमत्कारी है। लोग क्यों भाग रहे हैं, या इस चीज को डरावना क्यों बनाया जा रहा है? यह सोचने की बात है कि लोग इससे क्यों डर रहे हैं। आप अवधूत बन जाएँगे — तो अवधूत बनना भी इतनी आसान बात नहीं है, और अगर हो भी जाए, तो अपने आप में दिव्य है। आप अपने पूरे कुल को तार देंगे।
वज्र कवच का कौन सा श्लोक दत्त की बदलती अवस्थाओं का वर्णन करता है?
"कदा योगी कदा भोगी कदा नग्न पिशाच वत"
वक्ता कहते हैं कि वज्र कवच के पाठ में आपको भगवान दत्त के बारे में लिखा एक श्लोक मिलेगा: "कदा योगी कदा भोगी कदा नग्न पिशाच वत" — कभी वे योगी हैं, कभी भोगी, और कभी पिशाचों की तरह दिगंबर अवस्था में घूमते हैं। यह ठीक इसीलिए लिखा गया है कि आप यह भूल न करें कि वे केवल अवधूत अवस्था में रहते हैं; भक्त उन्हें जिस रूप में, जिस मनचाहे उद्देश्य के लिए बुलाता है, वे वही पूरा करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि आप जो वज्र कवच का पाठ करेंगे, उसमें आपको भगवान दत्त के बारे में लिखा एक श्लोक पढ़ने को मिलेगा: "कदा योगी कदा भोगी कदा नग्न पिशाच वत"। कभी वे योगी हैं, कभी भोगी हैं, और कभी पिशाच की तरह दिगंबर अवस्था में घूमते हैं। वे कहते हैं कि यह ठीक इसी कारण लिखा गया है, ताकि आप यह समझने की भूल न करें कि वे केवल अवधूत अवस्था में रहते हैं। भक्त उन्हें जिस रूप में बुलाता है, जिस मनचाहे उद्देश्य की पूर्ति के लिए बुलाता है, वे वही पूरा करेंगे।
भगवान दत्त ने ऋषि पारनाद को क्या वचन दिया?
जिस भाव और उद्देश्य से बुलाया जाए, उसी की पूर्ति
वक्ता कहते हैं कि वज्र कवच में ही आप पढ़ेंगे कि जब ऋषि पारनाद ने उन्हें बुलाया, तो उन्होंने कहा कि जिस भाव से, जिस उद्देश्य से मुझे बुलाओगे, मैं उसी उद्देश्य की पूर्ति करूँगा। वे पूछते हैं कि जब वे खुद यह कह रहे हैं, तो आपको यह डर क्यों है? इसलिए डरना छोड़ दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि यह आपको उसी जगह पढ़ने को मिलेगा — वज्र कवच में ही पढ़ने को मिलेगा। जब ऋषि पारनाद ने उन्हें बुलाया, तो उन्होंने कहा कि जिस भाव से, जिस उद्देश्य से मुझे बुलाओगे, मैं उसी उद्देश्य की पूर्ति करूँगा। तो जब वे खुद यह बात कह रहे हैं, तो आपको यह डर क्यों है? इसलिए डरना छोड़ दीजिए। आप साधनाओं में ऐसी साधनाएँ कर लेते हैं जिनसे कुछ अनहोनी होना तय है। पर सामान्य साधना में, जिससे आपको कुछ मिलने वाला है, आप डरने लगते हैं। डरिए मत।
नया साधक जप की संख्या कैसे बढ़ाए?
पहले अभ्यास, मनोबल मजबूत, फिर धीरे-धीरे माला बढ़ाना
वक्ता कहते हैं कि बहुत ज्यादा जप मत कीजिए। अगर आप नए हैं, तो पहले अभ्यास कीजिए। कवच का पाठ कीजिए। अपना मनोबल मजबूत कीजिए। थोड़ा कम जप कीजिए — बस 11 माला कीजिए। जैसे-जैसे माला पर आपका हाथ जमे, माला फेरने का तरीका आए, ध्यान टिकने लगे, और प्रभु के स्वरूप में आपका मनोबल बढ़े और समर्पण व श्रद्धा का भाव आने लगे, वैसे-वैसे धीरे-धीरे अपनी क्षमता बढ़ाइए और माला जप बढ़ाइए। आपके शरीर पर सकारात्मक असर पड़ेगा।
वक्ता कहते हैं कि बहुत ज्यादा जप मत कीजिए। हम इतना जरूर कहेंगे: अगर आप नए हैं, तो पहले अभ्यास कीजिए। कवच का पाठ कीजिए। अपना मनोबल मजबूत बनाइए। थोड़ा कम जप कीजिए। बस 11 माला कीजिए। जैसे-जैसे माला पर आपका हाथ जमे, माला फेरने का तरीका आपको आए, ध्यान टिकने लगे, प्रभु के स्वरूप में आपका मनोबल बढ़े और उनके प्रति समर्पण व श्रद्धा का भाव आने लगे — तब धीरे-धीरे अपनी क्षमता बढ़ाइए, माला जप बढ़ाइए। आपके शरीर पर सकारात्मक असर पड़ेगा।
लंबे समय बैठने के बाद पुरुष साधकों को स्वप्न दोष क्यों होता है?
पतला आसन, मूलाधार पर दबाव, और बैठने के तरीके की जानकारी न होना
वक्ता यह चेतावनी देकर कि कुछ श्रोताओं को ये शब्द बुरे लगेंगे, कहते हैं कि यह खासकर लड़कों के साथ होता है — कि स्वप्न दोष हो जाता है। कारण वे यह बताते हैं कि आपको बैठने का अभ्यास नहीं है। आप साधना के लिए बैठ गए, आसन बिछा लिया, पर आपको यह जानकारी नहीं कि आसन कैसा होना चाहिए: कुश आसन नहीं है, कंबल का आसन बहुत पतला है और पूरी तरह जमीन से छू रहा है। मूलाधार उस जगह माना जाता है जहाँ सबसे नीचे रीढ़ की हड्डी खत्म होती है, और लंबे समय बैठने से उस पर दबाव पड़ता है।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप ऐसा नहीं करेंगे, तो एक ही दिन में 100 माला जप कर डालेंगे। यहाँ, वे कहते हैं, खासकर लड़कों की बात है — कुछ शब्द आपको बुरे लगेंगे। फिर भी वे कहना चाहते हैं: खासकर लड़कों के साथ ऐसा होता है कि स्वप्न दोष हो रहा है, ऐसी चीज हो रही है। आपको बैठने का अभ्यास नहीं है। आप साधना करने बैठ गए। आपने अपना आसन बिछा लिया। अगर आपको यह जानकारी नहीं है कि आसन कैसा होना चाहिए — कुश आसन नहीं है, कंबल का आसन बहुत पतला है, पूरी तरह जमीन से छू रहा है, आप पतले आसन पर बैठे हैं — तो होता यह है। मूलाधार की स्थिति: सबसे नीचे, जिस जगह रीढ़ की हड्डी खत्म होती है, वह जगह मूलाधार का स्थान मानी जाती है। जब आप लंबे समय तक बैठते हैं तो उस पर दबाव पड़ता है।
एक ही आसन में एक-दो घंटे बैठने से नस दबती है और सूजन आती है।
नस पर दबाव, सूजन, और छोड़ दिए गए प्राणायाम व सूर्य नमस्कार
वक्ता कहते हैं कि आम तौर पर आप चलते-फिरते रहते हैं, पर जब आप एक ही जगह एक ही मुद्रा में कम से कम आधा घंटा, एक घंटा, दो घंटे बैठते हैं, तो वहाँ की नस पर दबाव पड़ता है; नस पर दबाव पड़ने से उसमें कहीं सूजन आती है, और फिर आपको परेशानी होती है। इसी के लिए प्राणायाम करने को कहा गया था। इसी के लिए सूर्य नमस्कार करने को कहा गया था। पर यह सब करना नहीं है — हमें सीधे जप करना है, और कुछ नहीं — तो वे कहते हैं, यह स्थिति आपके साथ थोड़ी तो बनेगी ही।
वक्ता कहते हैं कि जब आप लंबे समय तक बैठते हैं तो उस पर दबाव पड़ता है। आम तौर पर आप चलते-फिरते रहते हैं, पर जब आप एक ही जगह एक ही मुद्रा में कम से कम आधा घंटा, एक घंटा, दो घंटे बैठते हैं, तो वहाँ की नस पर दबाव पड़ेगा। नस पर दबाव पड़ेगा तो उसमें कहीं सूजन आएगी। सूजन आएगी तो उसमें आपको थोड़ी परेशानी होगी। इसीलिए प्राणायाम करने को कहा गया था। इसीलिए सूर्य नमस्कार करने को कहा गया था। पर यह सब करना नहीं है: हमें सीधे जप करना है, और बाकी चीजें नहीं करनी हैं। तो अगर ये नहीं करनी हैं, तो यह स्थिति आपके साथ थोड़ी बनने ही वाली है।
क्या साधक केवल इच्छाशक्ति से प्रकृति को जीत सकता है?
प्रकृति के विरुद्ध नागा साधुओं का लगातार अभ्यास
वक्ता पूछते हैं कि अगर उसे इतने समय तक दबाया जाएगा, तो वह जाएगा कहाँ — आप प्रकृति से जीत नहीं सकते। वे कहते हैं कि नागा साधुओं की अवस्था पढ़िए, जानिए या देखिए: वे किस तरह प्रकृति के उलटे चलने की कोशिश करते हैं, कैसे अभ्यास करते हैं, उनकी अवस्था क्या है, किस तरह हठयोग में जाकर वे सब करते हैं — तभी वे उस पर विजय पाते हैं। अगर वे अपना अभ्यास छोड़ दें, तो वे पहले जैसे हो जाएँगे; उनके शरीर की स्थिति पहले जैसी हो जाएगी।
वक्ता पूछते हैं कि अगर उसे इतने समय तक दबाया जाएगा, तो वह जाएगा कहाँ? आप प्रकृति से जीत नहीं सकते। नागा साधुओं की भी — कभी उनकी अवस्था पढ़िए, या जानिए, देखिए, समझिए: वे किस तरह प्रकृति के उलटे चलने की कोशिश करते हैं, कैसे अभ्यास करते हैं। उनकी अवस्था क्या है? वे किस तरह हठयोग में जाकर वे सब करते हैं? तभी वे उस पर विजय पाते हैं। अगर वे अपना अभ्यास छोड़ दें, तो वे पहले जैसे हो जाएँगे। उनके शरीर की स्थिति पहले जैसी हो जाएगी। इसी कारण वे अभ्यास करते हैं।
क्या गृहस्थ साधक को दूसरों के बुरे अनुभवों से डरना चाहिए?
आपको नागा साधु नहीं बनना — न भागिए, न डरिए
वक्ता कहते हैं कि आपको नागा साधु नहीं बनना है — आपको साधना करके भौतिक चीजें पानी हैं। वे कहते हैं कि धन चाहिए, और धन खर्च करने के लिए अप्सराएँ भी; सारी कामनाएँ तो हैं ही। तो निश्चिंत होकर कीजिए, पर किसी व्यक्ति का यह अनुभव सुनकर इस तरह भागिए या डरिए मत कि उसने किसी मंत्र का जप किया और उसके साथ ऐसी अवस्था बनी, कि कोई डाकिनी आकर सीधे उसका भोग लेने लगी। वह अवस्था अलग बात है।
वक्ता कहते हैं कि तो आपको नागा साधु नहीं बनना है। आपको साधना करनी है, भौतिक चीजें पानी हैं। फिर अप्सराएँ भी पानी हैं; सुंदर-सुंदर अप्सराएँ आपके जीवन में आनी चाहिए। सारी कामनाएँ तो हैं ही न — धन चाहिए, और धन खर्च करने के लिए अप्सराएँ चाहिए। तो भाई, निश्चिंत होकर कीजिए, पर इस तरह भागिए मत, डरिए मत। किसी व्यक्ति का अनुभव सुनकर — कि उसने किसी मंत्र का जप किया और उसके साथ ऐसी अवस्था बनी, कि कोई डाकिनी आकर सीधे उसका भोग लेने लगी — वह अवस्था अलग बात है। कहने को तो बहुत कुछ कहा जा सकता है, पर इन सब बातों से भटकने की जरूरत नहीं है।
शुरुआत की कठिनाई शरीर की अपनी स्थिति में दखल होने से आती है।
शरीर पर पहले से मौजूद नकारात्मक ऊर्जा का साफ होना
वक्ता कहते हैं कि उसके पीछे बहुत कुछ होगा, और वह व्यक्ति आपको पूरी बात शायद ही बताएगा। शरीर की स्थिति उसकी अपनी प्राकृतिक चीज है; अगर उसमें दखल होता है, तो अभ्यास करने पर शुरू में कठिनाई होगी। दूसरी बात, वे कहते हैं, तंत्र का विषय है: तंत्र का विषय वहाँ आता है जहाँ शरीर पर पहले से कोई नकारात्मक ऊर्जा, कोई नकारात्मक तत्व हो। ऐसे समय में भी ये सब चीजें होती हैं, ताकि आप साधना पूरी न कर पाएँ — आपको शुद्ध करने का प्रयास हो रहा होता है।
वक्ता कहते हैं कि उसके पीछे बहुत कुछ होगा। वह व्यक्ति आपको पूरी बात शायद ही बताएगा। शरीर की स्थिति — शरीर अपनी प्राकृतिक चीज है; अगर उसमें दखल होता है, तो जब आप अभ्यास करेंगे तो शुरू में कठिनाई होगी। दूसरी बात तंत्र का विषय है। तंत्र का विषय कहाँ आता है? अगर शरीर पर पहले से कोई नकारात्मक ऊर्जा, कोई नकारात्मक तत्व हो। उस समय भी ये सब चीजें होती हैं, ताकि आप साधना पूरी न कर पाएँ। आपको शुद्ध करने का प्रयास हो रहा होता है।
साधना में शरीर की परेशानी बार-बार हो तो उपाय क्या है?
कवच, सोने से पहले तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम, और हल्का भोजन
वक्ता कहते हैं कि इसी के लिए कवच होता है: कवच कीजिए ताकि शरीर की रक्षा हो। अगर यह कठिनाई बार-बार हो रही है, तो सोने से पहले रात्रि सूक्तम् का पाठ कीजिए — तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम का पाठ कीजिए, उससे रक्षा होगी। भारी भोजन मत कीजिए। गरम भोजन मत कीजिए; बहुत गरम भोजन नहीं करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि इसके लिए कवच है। कवच करके कीजिए, ताकि शरीर की रक्षा हो। अगर यह कठिनाई बार-बार हो रही है, तो सोने से पहले रात्रि सूक्तम् का पाठ कीजिए। तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम का पाठ कीजिए; उससे रक्षा होगी। भारी भोजन मत कीजिए। गरम भोजन मत कीजिए। बहुत गरम भोजन नहीं करना चाहिए।
एक संत के गुरु ने उसकी टूटती साधना का कारण क्या बताया?
गुरु का कहना कि भोजन किसके हाथ से आता है, उसे बदलो
वक्ता एक संत का प्रसंग पढ़कर बताते हैं, जिनके साथ यह स्थिति बार-बार होती थी। संत ने अपने गुरु से पूछा: मैं कभी कोई कामुक चिंतन नहीं करता, न गलत साहित्य पढ़ता, न ऐसे चलचित्र देखता, मैंने सब छोड़ दिया है और मन में ऐसा कोई भाव नहीं आता, फिर भी मेरी साधना बार-बार टूट रही है — यह कैसे हो रहा है और इसके पीछे कारण क्या है? गुरु ने पूछा कि तुम भोजन कैसे और कहाँ से करते हो। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति बनाता है और वे उसके हाथ से खाते हैं। गुरु ने कहा: बस वही बदल दो, उसके हाथ का भोजन मत करो।
वक्ता कहते हैं कि जब आप साधु-संतों का अंतर्जीवन पढ़ते हैं, उनकी साधनाओं के समय का, और ऐसी घटनाएँ होने पर उन्होंने अपने गुरुओं से जो चर्चाएँ कीं — यह सब आपको बहुत जगह लिखा पढ़ने को मिलेगा। ऐसे ही एक में वे एक संत का प्रसंग पढ़ रहे थे, जिनके साथ यह स्थिति बार-बार हो रही थी। उन्होंने अपने गुरु से पूछा: मैं कभी कोई कामुक चिंतन नहीं करता, न कोई गलत साहित्य पढ़ता हूँ, न इस तरह के चलचित्र देखता हूँ, मैंने हर चीज छोड़ दी है, न मन में ऐसा कोई भाव आता है — फिर भी मेरी साधना बार-बार टूट रही है। यह कैसे हो रहा है, इसके पीछे कारण क्या है? उनके गुरु ने कहा: तुम भोजन कैसे करते हो, कहाँ से करते हो? उन्होंने उत्तर दिया कि एक व्यक्ति बनाता है और वे उसके हाथ से खाते हैं। गुरु ने कहा, बस वही बदल दो। उसके हाथ का भोजन मत करो।
अच्छे साधक स्वपाकी क्यों होते हैं — अपना भोजन खुद क्यों बनाते हैं?
अन्न किसके पैसे का है, और बनाने वाले के मन की स्थिति
वक्ता कहते हैं कि यही कारण है कि अच्छे साधक स्वपाकी होते हैं और अपने हाथ से भोजन बनाकर खाते हैं। जो अन्न पक रहा है — वह अन्न किसके पैसे का है, उस व्यक्ति ने वह पैसा कैसे कमाया, इससे परेशानी आएगी; उसका असर भी खाने वाले पर पड़ेगा, क्योंकि जैसा अन्न वैसा मन। दूसरी बात, अपने हाथ से भोजन बनाते समय उस व्यक्ति के मन में क्या भाव था।
वक्ता कहते हैं कि अच्छे साधकों के स्वपाकी होने के पीछे, अपने हाथ से भोजन बनाकर खाने के पीछे यही कारण है। जो अन्न पक रहा है: वह अन्न किसके पैसे का है — इससे भी परेशानी आएगी, कि उस व्यक्ति ने वह पैसा कैसे कमाया। उसका असर भी खाने वाले पर पड़ेगा। जैसा अन्न, वैसा मन। दूसरी बात, जो व्यक्ति अपने हाथ से भोजन बना रहा है — उस समय, भोजन बनाते हुए, उसके मन में क्या भाव था। जब माँ बनाती है, जब घर के माता-पिता बनाते हैं और कमाकर लाते हैं, तो उसमें उनका प्रेम होता है। उनका आशीर्वाद होता है कि मेरे बच्चे खाएँगे और पोषित होंगे। इसलिए माता-पिता के हाथ का भोजन करने से आपको कोई कठिनाई नहीं होगी। अगर आपकी अपनी सोच बिगड़ी है तो कठिनाई होगी, पर वह अलग बात है।
बाहरी व्यक्ति का बनाया भोजन खाने का क्या असर होता है?
बनाने वाले की सोच भोजन के जरिए शरीर में पहुँचना
वक्ता कहते हैं कि जब आप किसी बाहरी व्यक्ति के हाथ का भोजन करते हैं — किसी ऐसे व्यक्ति से खाते हैं, या घर में दूसरे सदस्य हैं और उनके हाथ से खाते हैं — तो अगर उस समय उनकी सोच उस तरह चल रही थी, और उसी सोच की अवस्था में उन्होंने भोजन बनाया, तो उसका असर शरीर पर पड़ता है।
पर जब आप किसी बाहरी व्यक्ति के हाथ का भोजन करते हैं — किसी ऐसे व्यक्ति से खाते हैं, या घर में दूसरे सदस्य हैं और उनके हाथ से खाते हैं — तो अगर उस समय उनकी सोच उस तरह चल रही थी, और उसी सोच की अवस्था में उन्होंने भोजन बनाया, खाना बनाया, तो उसका असर शरीर पर पड़ता है।
जो साधक अपना भोजन खुद नहीं बना सकता, वह क्या करे?
भोजन पहले अपने इष्ट को अर्पित करने से वह दोषमुक्त होता है
अब आप कहेंगे, भाई, तो क्या साधना में भोजन करना छोड़ दें — कैसे चलेगा, हम खुद नहीं बना सकते। वक्ता कहते हैं कि कोई कठिनाई नहीं, अपना भोजन कीजिए। जब भोजन आपके पास आए, तो पहले वह भोजन अपने आराध्य को, अपने इष्ट को अर्पित कीजिए और उसके बाद खाइए: वह दोषमुक्त हो जाएगा। इतना तो आप कर ही सकते हैं। और अगर इसके बाद भी शरीर पर असर पड़े, तो बैठने से शरीर में आई कमजोरी को मजबूत कीजिए — थोड़ा अभ्यास कीजिए और आप इससे पार हो जाएँगे।
अब आप कहेंगे, भाई, तो क्या हम साधना में भोजन करना छोड़ दें? फिर कैसे चलेगा? हम खुद बनाकर नहीं खा सकते। वक्ता कहते हैं कि कोई कठिनाई नहीं है — अपना भोजन कीजिए। जब भोजन आपके पास आए, तो पहले वह भोजन अपने आराध्य को, अपने इष्ट को अर्पित कीजिए, और उसके बाद खाइए। वह दोषमुक्त हो जाएगा। इतना तो आप कर ही सकते हैं। और अगर इसके बाद भी शरीर पर असर पड़ रहा है, तो शरीर में जो कमजोरी है, बैठने से शरीर में जो कठिनाई हो रही है — उसे थोड़ा मजबूत कीजिए। थोड़ा अभ्यास कीजिए, और आप इससे पार हो जाएँगे।
क्या हर समस्या को तंत्र से जोड़ना चाहिए?
वक्ता का हर चीज को तंत्र से जोड़ने का समर्थन न करना
वक्ता साफ कहते हैं कि अगर आप सोचेंगे कि हर चीज तंत्र है, हर चीज शरीर पर पड़ रहा नकारात्मक असर है, कि यह चीज केवल मंत्र से ठीक होगी, केवल किसी तांत्रिक प्रयोग से ठीक होगी — तो यह आपकी मूर्खता है, यह अंधविश्वास है। वे कहते हैं कि वे हर बार इस चीज का समर्थन नहीं कर सकते। कारण यह है कि आप हर चीज को घुमा-फिराकर तंत्र से जोड़ रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप सोचेंगे कि हर चीज तंत्र है, हर चीज शरीर पर पड़ रहा नकारात्मक असर है, कि यह चीज केवल मंत्र से ठीक होगी, केवल किसी तांत्रिक प्रयोग से ठीक होगी — तो यह आपकी मूर्खता है, यह अंधविश्वास है। वे कहते हैं कि वे हर बार इस चीज का समर्थन नहीं कर सकते। कारण यह है कि आप हर चीज को घुमा-फिराकर तंत्र से जोड़ रहे हैं। हर चीज को मत जोड़िए। अगर जीवन में आप पर सच में कोई तांत्रिक प्रयोग हुआ भी हो, तब भी हर चीज को उससे नहीं जोड़ना है — कि आपके जीवन में जो कुछ गलत हो रहा है, वह केवल तंत्र के कारण हो रहा है। भाई, अच्छी चीजें भी होती हैं। चीजें आपके अपने कारण भी बिगड़ती हैं।
क्या कोई नकारात्मक शक्ति इस मंत्र का जप ले जा सकती है?
अग्नि बीज, और प्रेत-पिशाच का वायव्य स्वभाव
वक्ता कहते हैं कि महिलाएँ भी घबरा जाती हैं कि कहीं कोई नकारात्मक शक्ति आकर्षित होकर न आ गई हो। ध्यान रखिए: इस मंत्र के जप में किसी नकारात्मक शक्ति में उसे लेने की सामर्थ्य नहीं है। कारण यह है कि इसमें अग्नि बीज है। जहाँ अग्नि बीज होगा, जहाँ अग्नि की मात्रा होगी, वहाँ वायव्य शक्तियाँ — यानी प्रेत और पिशाच, जो वायव्य रूप के, वायु स्वभाव के होते हैं — अग्नि तत्व युक्त मंत्र का जप ग्रहण करने की सामर्थ्य नहीं रखतीं।
वक्ता कहते हैं कि ये बातें महिलाओं के साथ भी होती हैं। वे भी घबरा जाती हैं कि कहीं कोई नकारात्मक शक्ति आकर्षित होकर साथ न आ गई हो। वे कहते हैं, ध्यान रखिए। इस मंत्र के जप में किसी भी नकारात्मक शक्ति में उसे ले पाने की सामर्थ्य नहीं है। कारण क्या है? इसमें अग्नि बीज (बीज मंत्र) है। जहाँ अग्नि बीज रहेगा, जिस जगह अग्नि की मात्रा रहेगी, वहाँ वायव्य शक्तियाँ — यानी प्रेत और पिशाच, जो वायव्य रूप में हैं, यानी जिनका रूप वायु का है — उनमें इतनी सामर्थ्य नहीं होती कि वे अग्नि तत्व युक्त मंत्र का जप ग्रहण कर सकें। इसलिए, वे कहते हैं, आप इसका जप निश्चिंत होकर कर सकते हैं।
नकारात्मक स्थानों में वीर साधकों को क्या कठिनाई आती है?
अपने ही स्थान पर जप ले जाने में सक्षम पैशाचिक शक्तियाँ
वक्ता कहते हैं, मान लीजिए किसी नकारात्मक स्थान पर साधना करनी हो — वीर साधनाएँ, जिनमें उच्च कोटि के साधक नकारात्मक स्थानों पर जाते हैं। उनकी इच्छा लोक कल्याण की होती है, या बहुत से साधक अपने लिए भी करते हैं कि हम जाकर किसी उच्च कोटि के वीर को सिद्ध करेंगे; और उसका पूरा तांत्रिक विषय ऐसा होता है कि वे किसी खंडहर में, गुफा में, जंगल में जाकर मंत्र जप करेंगे। वहाँ जाकर उन्हें पता चलता है कि जगह देखने में बहुत अच्छी है, पर यहाँ पैशाचिक शक्तियाँ रहती हैं, और वे मेरा मंत्र जप ले सकती हैं।
वक्ता कहते हैं, मान लीजिए ऐसा हो कि किसी नकारात्मक स्थान पर जाकर साधना करनी हो। जितनी भी वीर साधनाएँ हैं, जिनमें लोग नकारात्मक स्थानों पर जाते हैं, वे किसी उच्च कोटि के साधकों की होती हैं। उनकी इच्छा होती है कि वे लोक कल्याण के लिए करें, या बहुत से साधक यह चीज अपने लिए भी करते हैं — कि हम जाकर किसी उच्च कोटि के वीर को सिद्ध करेंगे। और उसका पूरा तांत्रिक विषय ऐसा है कि हम किसी खंडहर में, गुफा में, जंगल में जाकर मंत्र जप करेंगे। और जब वे उस जगह जाते हैं तो उन्हें पता चलता है कि जगह देखने में बहुत अच्छी है, पर यहाँ पैशाचिक शक्तियाँ रहती हैं। वे मेरा मंत्र जप ले सकती हैं। हम कितना भी घेरा बना लें, क्योंकि जगह उनकी है, उनका ठिकाना है, हो सकता है कि हमसे जरा सी भी चूक या गलती हो जाए तो हमारी सारी जप ऊर्जा चली जाए।
साधना के लिए नकारात्मक स्थान को कैसे साफ किया जाता है?
अग्नि बीज का जप, या गायत्री या सिद्ध कवच के साथ संपुट
वक्ता कहते हैं कि ऐसी स्थिति में वे साधक अग्नि बीज का आधिकारिक मात्रा में जप करते हैं। या वे अग्नि बीज को गायत्री मंत्र में संपुट लगाकर जप करते हैं। इससे वहाँ इतनी अधिक अग्नि तत्व की मात्रा उत्पन्न होती है कि प्रेत और पिशाच अपने आप हट जाते हैं। या वे अपने आराध्य का वह कवच लेते हैं जिसे उन्होंने गुरु की आज्ञा से सिद्ध किया है, और उसमें अग्नि बीज का संपुट लगाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि ऐसी स्थिति में वे साधक अग्नि बीज (बीज मंत्र) का आधिकारिक मात्रा में जप करते हैं। या वे अग्नि बीज को गायत्री मंत्र में संपुट लगाकर जप करते हैं। इससे वहाँ इतनी अग्नि तत्व की मात्रा उत्पन्न होती है कि प्रेत और पिशाच अपने आप हट जाते हैं। या अपने आराध्य का जो भी कवच उन्होंने गुरु की आज्ञा से सिद्ध किया है, उसमें अग्नि बीज का संपुट लगाकर रखते हैं। वे चेताते हैं कि अब मुझसे सुनकर अपने मन से इसे लगाना शुरू मत कर दीजिए। यह सब किसी के मार्गदर्शन में होता है; वे जानकारी के लिए बता रहे हैं, ताकि आप सब इन विषयों को समझें और जानें। ये सब व्यावहारिक विषय हैं, प्रयोग के विषय हैं — लोग जब साधना करते हैं तो इनका इस तरह उपयोग करते हैं।
मंत्र संपुट किसी स्थान का वातावरण कैसे बदलता है?
मुख में बसी मंत्र ऊर्जा से वातावरण में अग्नि तत्व भरना
वक्ता कहते हैं कि ऐसी ऊर्जा उत्पन्न होती है। ऊर्जा क्या है? वह आपके अपने मुख में है — मंत्र ऊर्जा है। तो मंत्र का उच्चारण इस तरह, संपुट लगाकर किया जाता है कि उस स्थान का वातावरण एक तय समय के लिए अग्नि तत्व से युक्त हो जाए। और उसके बाद अपनी शक्ति और सामर्थ्य से वे जिसका आवाहन करना हो उसका आवाहन करते हैं, जिस मंत्र का जप करना हो वह करते हैं, उन्हें अर्पित करते हैं, सिद्ध करते हैं, उनका वचन लेते हैं, और लौट आते हैं।
वक्ता कहते हैं कि तो ऐसी ऊर्जा उत्पन्न होती है। ऊर्जा क्या है? वह अपने ही मुख में है — मंत्र ऊर्जा है। तो मंत्र का उच्चारण इस तरह, संपुट लगाकर किया जाता है कि उस स्थान का वातावरण एक तय समय के लिए अग्नि तत्व से युक्त हो जाए। और उसके बाद अपनी शक्ति और सामर्थ्य से वे जिसका आवाहन करना हो उसका आवाहन करते हैं, जिस मंत्र का जप करना हो उसका जप करते हैं, उन्हें अर्पित करते हैं, सिद्ध करते हैं, उनका वचन लेते हैं, और लौट आते हैं। वे जोड़ते हैं कि हमने यह सामान्य तरीके से कह दिया — यह इतना आसान पकवान नहीं है; पर एक उदाहरण दिया गया है कि ये चीजें कैसे की जाती हैं।
दत्त जप के दौरान मन की शांति के लिए क्या पाठ किया जा सकता है?
भगवान दत्त के बारह नाम
इसलिए खासकर इस मंत्र के जप में यह मत सोचिए कि कोई नकारात्मक शक्ति है और हम कहीं जप करेंगे तो वह ले जाएगी। फिर भी अपने मन की तसल्ली के लिए आप भगवान दत्त के बारह नामों का उच्चारण कर सकते हैं, जो चैनल पर पहले ही दिए जा चुके हैं। पूरा श्लोक न पढ़ें तो कोई कठिनाई नहीं — पूरा श्लोक पढ़ने की बिल्कुल जरूरत नहीं; बस जो बारह नाम दिए गए हैं, उनका पाठ कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि इसलिए खासकर इस मंत्र के जप में यह मत सोचिए कि कोई नकारात्मक शक्ति है और हम कहीं भी जप करेंगे तो वह ले जाएगी। फिर भी अपने मन की तसल्ली के लिए आप भगवान दत्त के बारह नामों का उच्चारण कर सकते हैं — वे चैनल पर पहले ही दिए जा चुके हैं। आप वह कर सकते हैं। पूरा श्लोक न पढ़ें तो कोई कठिनाई नहीं है। पूरा श्लोक पढ़ने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। जो बारह नाम दिए गए हैं, उतने का पाठ कीजिए।
सामान्य साधक को दत्तात्रेय वज्र कवच का कितना भाग करना चाहिए?
मूल कवच के ऊपर का केवल विनियोग और न्यास, माला मंत्र नहीं
दत्तात्रेय कवच, जो वज्र कवच है, उसमें ऊपर से नीचे तक पूरी कथा के साथ मूल कवच है — वह कवच कैसे प्राप्त हुआ, उसका विनियोग कैसे होता है, आदि। जहाँ से मूल कवच शुरू होता है, उसके ऊपर जितना विनियोग और न्यास है, केवल उतना कीजिए। माला मंत्र का विनियोग और न्यास अलग है; माला मंत्र पिछले साल दिया गया था, और उसे करने की जरूरत नहीं — इसमें वह बहुत लंबा हो जाएगा। सामान्य साधक को इतना नहीं करना चाहिए: केवल मूल कवच का पाठ कीजिए, वही बहुत है।
वक्ता कहते हैं कि दत्तात्रेय कवच, जो वज्र कवच है, उसमें ऊपर से नीचे तक पूरी कथा के साथ मूल कवच है — वह कवच कैसे प्राप्त हुआ, उसका विनियोग कैसे होगा, क्या होगा। मूल कवच जहाँ से शुरू होता है, उसके ऊपर जितना विनियोग और न्यास है, केवल उतना कीजिए। माला मंत्र का विनियोग और न्यास अलग है। माला मंत्र पिछले साल दिया गया था। माला मंत्र करने की जरूरत नहीं है। माला मंत्र के साथ इसमें यह बहुत लंबा हो जाएगा। सामान्य साधक को इतना नहीं करना चाहिए। जितना मूल कवच है, केवल उतने का पाठ कीजिए — वही बहुत है।
बगलामुखी शतनाम का संकल्प पूरा क्यों नहीं हो पाता?
कोई अधूरी मन्नत, या जन्म कुंडली में चल रही दशा
VK 1209 के यह पूछने पर कि माँ बगलामुखी के शतनाम का संकल्प दो बार पूरा क्यों नहीं हुआ, वक्ता कहते हैं कि इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि आपकी कोई मन्नत हो जिसे आप पूरा नहीं कर रहे — किसी देवी-देवता की कोई बात जिसे आप भूल गए हैं; उसे पूरा कीजिए तो संकल्प भी पूरा होगा। दूसरा यह कि आपकी जन्म कुंडली के अनुसार कौन सी अंतरदशा चल रही है: खासकर अगर शनि भगवान की चल रही है, तो साधना के क्षेत्र में आप बहुत धीरे आगे बढ़ेंगे।
एक श्रोता, VK 1209, लिखते हैं कि दो बार से उन्होंने माँ बगलामुखी के शतनाम का जो संकल्प लिया था, वह पूरा नहीं हो रहा, और मार्गदर्शन माँगते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है। वक्ता कहते हैं कि अगर संकल्प पूरा नहीं हो रहा, तो इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं। पहला कारण यह होगा कि आपकी कोई मन्नत हो जिसे आप पूरा नहीं कर रहे। किसी देवी-देवता की कोई बात होगी जिसे आप भूल गए हैं। उसे पूरा कीजिए, तो संकल्प भी पूरा होगा। दूसरा यह हो सकता है: आपकी जन्म कुंडली के अनुसार किसकी अंतरदशा चल रही है। खासकर अगर शनि भगवान की चल रही है, तो साधना के क्षेत्र में आप बहुत धीरे आगे बढ़ेंगे।
भगवान दत्त के लिए दीपदान कैसे किया जाता है?
उनके नाम पर सोलह दीपक
भगवान दत्त के लिए दीपदान की विधि बताने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि समय बहुत कम है, पर अब तक मिली जानकारी के अनुसार भगवान दत्त के लिए 16 दीपकों का दीपदान करना चाहिए। वे कहते हैं कि यह उन्हें एक बहुत अच्छे साधक से पता चला, जो खुद भगवान दत्त की साधना करते हैं और जिनकी कुल परंपरा पर भगवान दत्तात्रेय की बहुत विशेष कृपा है।
भगवान दत्त की ओर से दीपदान की विधि बताने का निवेदन किए जाने पर वक्ता कहते हैं कि समय बहुत कम है। फिर भी अब तक जो जानकारी मिली है, उसके अनुसार भगवान दत्त की ओर से 16 दीपकों का दीपदान करना चाहिए। वे कहते हैं कि एक बहुत अच्छे साधक हैं, जो खुद भगवान दत्त की वह साधना करते हैं। उनकी कुल परंपरा पर भगवान दत्तात्रेय की, भगवान दत्त की बहुत विशेष कृपा है। तो उन्हीं के माध्यम से पता चला है कि भगवान दत्तात्रेय की ओर से 16 दीपकों का दीपदान होता है।
शत्रुओं के बार-बार किए श्मशानिक तंत्र में बगलामुखी शतनाम कैसे मदद करता है?
रक्षा के संकल्प के साथ अपामार्ग की लकड़ी पर 108 नामों की आहुति
हरीश जी पूछते हैं कि जब शत्रु बार-बार तंत्र करते हैं और मामला श्मशान का है, तो माँ बगलामुखी के शतनाम की मदद से इसे कैसे ठीक किया जाए। वक्ता कहते हैं कि पहले एक बार शतनाम साधना पूरी कीजिए। फिर पिछले दिन के लाइव में बताई गई अपामार्ग की लकड़ी पर हवन विधि से, अगर आप भगवती बगला के 108 नामों की आहुति इस संकल्प के साथ देना शुरू करें कि श्मशानिक तंत्र, विचार कर्म और कृत्या प्रयोग नष्ट हों और हमारी रक्षा हो, तो वह काम पूरा होगा।
हरीश जी लिखते हैं कि शत्रु बार-बार तंत्र करते हैं, कि मामला श्मशान का है, और पूछते हैं कि माँ बगलामुखी के शतनाम की मदद से इसे कैसे ठीक किया जाए। वक्ता कहते हैं कि पहले एक बार शतनाम साधना पूरी कीजिए। फिर पिछले दिन के लाइव में बताई गई अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी पर हवन विधि से — अगर उससे आप भगवती बगला के 108 नामों की आहुति देना शुरू करें, इस संकल्प के साथ कि श्मशानिक तंत्र, विचार कर्म और कृत्या प्रयोग नष्ट हों और हमारी रक्षा हो — तो उससे काम पूरा होगा।
क्या एकाक्षरी या माला मंत्र का एक दिन का विधान किया जा सकता है?
कर माला से एक दिन का विधान, फिर रोज कम से कम एक माला
टीटू जी पूछते हैं कि क्या भगवान दत्तात्रेय के एकाक्षरी बीज मंत्र का जप, या दत्त माला मंत्र का जप करके उसका एक दिन का विधान किया जा सकता है, और क्या कर-माला से जप किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं, और एक दिन का भी कर सकते हैं। पर एक दिन का विधान करने के बाद अगले दिन से कम से कम एक-एक माला जप कीजिए — एकाक्षर की एक माला जप कीजिए, और माला मंत्र का कम से कम पाँच बार पाठ जरूर कीजिए।
टीटू जी लिखकर पूछते हैं कि क्या भगवान दत्तात्रेय के एकाक्षरी बीज मंत्र का जप, या दत्त माला मंत्र का जप करके एक दिन का विधान किया जा सकता है; और क्या कर-माला से जप किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि तो आप दोनों में से एक करना चाहते हैं। हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं, और एक दिन का भी कर सकते हैं। पर उसके बाद, एक दिन का विधान करने के बाद, अगले दिन से कम से कम एक-एक माला जप कीजिए। एकाक्षर की एक माला जप कीजिए, और माला मंत्र का कम से कम पाँच बार पाठ जरूर कीजिए।
क्या सदाशिव को परमेष्ठी गुरु मानते हुए गुरु दत्त को परम गुरु माना जा सकता है?
जरूरी नहीं, पर अनुमति है
अवधेश जी पूछते हैं कि भगवान सदाशिव को परमेष्ठी गुरु मानने के बाद क्या वे गुरु दत्त को परम गुरु, या प्राप्तपर गुरु के रूप में मान सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है, पर फिर भी आप ऐसा कर सकते हैं।
अवधेश जी लिखते हैं कि उन्होंने भगवान सदाशिव को अपना परमेष्ठी गुरु माना है, और पूछते हैं कि क्या वे गुरु दत्त को परम गुरु, प्राप्तपर गुरु के रूप में मान सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है। फिर भी आप ऐसा कर सकते हैं।
क्या पाँच लाख पूरे करने के लिए सवा लाख का अनुष्ठान चार बार किया जा सकता है?
बड़े अनुष्ठान को छोटे-छोटे दोहराए अनुष्ठानों में बाँटना
राहुल चौधरी जी पूछते हैं कि क्या पाँच लाख मंत्र पूरे करने के लिए मंत्र का सवा लाख का अनुष्ठान चार बार किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं। एक बार में न हो तो चार बार में कर सकते हैं। अगर आपकी इच्छा हो, और सवा लाख भी न कर पाएँ, तो एक-एक लाख करके पाँच बार में कीजिए। जितनी बार में संभव हो, कर सकते हैं; कोई कठिनाई नहीं। बड़ा अनुष्ठान न कर पाएँ तो छोटे-छोटे करके पूरा कीजिए।
राहुल चौधरी जी लिखकर पूछते हैं कि क्या पाँच लाख मंत्र पूरे करने के लिए मंत्र का सवा लाख का अनुष्ठान चार बार किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल किया जा सकता है। एक बार में न हो, तो चार बार में भी किया जा सकता है। अगर आपकी इच्छा हो, और आप सवा लाख भी न कर पाएँ, तो एक-एक लाख करके पाँच बार में कीजिए। जितनी बार में हो सके, आप कर सकते हैं; कोई कठिनाई नहीं है। अगर आप बड़ा अनुष्ठान नहीं कर सकते, तो छोटे-छोटे करके उसे पूरा कीजिए।
बटुक भैरव का पूरा वर्णन किन पुराणों में मिलता है?
ब्रह्मवर्त पुराण और स्कंद पुराण
यह पूछे जाने पर कि बटुक भैरव का पूरा वर्णन किस पुराण में पढ़ने को मिलेगा, वक्ता कहते हैं कि पुराणों में आपको अलग-अलग जगह अलग-अलग वर्णन मिलेंगे। फिर भी अगर आप इन दोनों का अध्ययन करें — ब्रह्मवर्त पुराण और दूसरा स्कंद पुराण — तो आपको पढ़ने को मिल जाएगा।
यह पूछे जाने पर कि बटुक भैरव का पूरा वर्णन किस पुराण में पढ़ने को मिलेगा, वक्ता कहते हैं कि वैसे तो पुराणों में आपको अलग-अलग वर्णन मिलेंगे। फिर भी: ब्रह्मवर्त पुराण लीजिए, और दूसरा स्कंद पुराण। अगर आप इन दोनों का अध्ययन करें, इन दोनों का अध्ययन कर लें, तो आपको पढ़ने को मिल जाएगा।
बटुक स्वरूप प्रकट ही क्यों हुआ?
राक्षस आपद और बालक के हाथों मृत्यु का उसका वरदान
वक्ता कहते हैं कि आपदा नाम के राक्षस के अंत के लिए — आपद ही उस राक्षस का नाम था। उसने भगवान ब्रह्मा जी से यह वरदान माँगा था कि उसकी मृत्यु किसी बालक के हाथों हो। ऐसी स्थिति में देवताओं ने भगवान सदाशिव की आराधना की, भगवती की आराधना की, और इस स्वरूप की कामना की: कि आप कोई ऐसा स्वरूप प्रकट करें।
वक्ता कहते हैं कि आपदा नाम के राक्षस के अंत के लिए। आपद — यही उस राक्षस का नाम था। उसने भगवान ब्रह्मा जी से यह वरदान माँगा था कि उसकी मृत्यु किसी बालक के हाथों हो। तो ऐसी स्थिति में देवताओं ने भगवान सदाशिव की आराधना की, भगवती की आराधना की, और इस स्वरूप की कामना की: कि आप कोई ऐसा स्वरूप प्रकट करें।
क्या साधना के दौरान देव नदी पार करने से दोष लगता है?
नदियाँ लाँघने से मंत्र बल का खत्म होना
एक श्रोता, जो रोज ऑफिस जाने के लिए गंगा पार करते हैं, पूछते हैं कि क्या समुद्र लाँघने की तरह देव नदियों को पार करने से भी दोष लगता है। वक्ता कहते हैं कि यह संभव नहीं है, और देव नदियाँ पार करने का दोष कब लगता है, यह मंत्र पर निर्भर है। तंत्र के कुछ ग्रंथों में इसका वर्णन मिलता है: साधना के समय नदियाँ पार नहीं करनी चाहिए। नदियाँ लाँघने से मंत्र बल खत्म हो जाता है। यहाँ तक माना गया है कि अगर कोई नाला बह रहा हो, तो उसमें पैर रखकर पार जाना चाहिए।
अमित कुमार जी लिखते हैं कि वक्ता ने एक लाइव में कहा था कि समुद्र लाँघने से दोष लगता है, और पूछते हैं कि क्या देव नदियों का भी दोष लगता है, क्योंकि वे रोज ऑफिस आने-जाने के लिए गंगा पार करते हैं; और दोष हो तो उसका उपाय क्या है। वक्ता कहते हैं कि यह संभव नहीं है, और देव नदियाँ पार करने का दोष कब लगता है, यह मंत्र पर निर्भर है। तंत्र के कुछ ग्रंथों में इसका वर्णन मिलता है: साधना करने के समय नदियों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। नदियों के उल्लंघन से मंत्र बल खत्म हो जाता है। तो यह चीज है — यहाँ तक माना गया है कि अगर नाला भी बह रहा हो, तो उसमें पैर रखकर पार जाना चाहिए। पर अब, आज के समय में, यह संभव नहीं है।
जिसे रोज गंगा पार करनी पड़ती है, उसका उपाय क्या है?
भगवती गंगा के 108 नामों का रोज एक पाठ
वक्ता अमित कुमार जी से कहते हैं कि अगर ऐसा दोष लग भी रहा हो, तो उस स्थिति में, अगर आपको भगवती गंगा के ऊपर से पार जाना है, आप साधना कर रहे हैं और ऑफिस जाना है, तो रोज एक बार भगवती गंगा के 108 नामों का पाठ कीजिए — दो मिनट लगेंगे — यह कहते हुए कि आपको जो दोष लगा है, उससे आप मुक्त हों।
वक्ता कहते हैं, अमित कुमार जी, तो अगर ऐसा दोष लग भी रहा है, तो ऐसी स्थिति में, अगर आपको भगवती गंगा के ऊपर से पार होकर जाना है, आप साधना कर रहे हैं और ऑफिस जाना है — तो आपको रोज एक बार भगवती गंगा के 108 नामों का पाठ करना चाहिए। दो मिनट का समय लगेगा। यह कहते हुए: कि आपको जो दोष लगा है, उससे आप मुक्त हों।
बटुक भैरव की रोज की और विशेष दिन की पूजा कैसे करें?
रोज की पूजा सामान्य देवताओं की तरह; पूरा विधान चैनल पर है
अंकुर जी पूछते हैं कि बटुक भैरव की रोज की सामान्य पूजा कैसे करें, और अष्टमी, उनकी जन्म जयंती या उनके किसी और विशेष दिन की विशेष पूजा कैसे करें। वक्ता कहते हैं कि रोज की पूजा वैसे ही करनी चाहिए जैसे सामान्य देवी-देवताओं की होती है। और उनका पूजन का पूरा विधान चैनल पर उपलब्ध है, जिसमें सब बताया गया है — उन्हें क्या भोग लगाना है, कैसे और क्या करना है; आप उसी विधान से कर सकते हैं।
अंकुर जी बटुक भैरव की रोज की सामान्य पूजा के बारे में, और अष्टमी, उनकी जन्म जयंती या उनके किसी और विशेष दिन के बारे में पूछते हैं — कि उस दिन की विशेष पूजा कैसे करनी चाहिए। वक्ता कहते हैं, देखिए, रोज की पूजा वैसी ही है जैसी सामान्य देवी-देवताओं की होती है; उसी तरह करनी चाहिए। और उनका पूजन का पूरा विधान हमारे चैनल पर उपलब्ध है, जिसमें हमने सब बताया है — उन्हें क्या भोग लगाना है, कैसे और क्या करना है। उसी विधान से आप कर सकते हैं।
दत्तात्रेय के द्वादश नाम स्तोत्र का कौन सा भाग सबसे अधिक पढ़ना चाहिए?
मूल स्तोत्र, फलश्रुति जानकारी के लिए दी गई है
वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल: भगवान दत्तात्रेय के द्वादश नाम स्तोत्र में खासकर मूल स्तोत्र का ही अधिक पाठ करना है। बाकी — फलश्रुति आदि — आपकी जानकारी के लिए दी गई है।
वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल। भगवान दत्तात्रेय के बारह नामों वाले स्तोत्र में खासकर मूल स्तोत्र का ही अधिक पाठ करना है। बाकी, फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। आदि, आपकी जानकारी के लिए दी गई है।
क्या हनुमान चालीसा वाली हवन विधि दूसरी चालीसाओं से की जा सकती है?
दुर्गा चालीसा से हाँ; बटुक भैरव के लिए 108 नाम बेहतर
यह पूछे जाने पर कि हनुमान चालीसा से बताया गया हवन क्या दुर्गा या बटुक भैरव चालीसा से भी किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि दुर्गा चालीसा से किया जा सकता है; बटुक भैरव के लिए अगर आप उनके 108 नामों से करें तो बेहतर होगा।
एक श्रोता हनुमान चालीसा से बताए गए हवन के बारे में पूछते हैं — कि क्या ऐसा हवन दुर्गा या बटुक भैरव चालीसा से भी किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि दुर्गा चालीसा से किया जा सकता है। जहाँ तक बटुक भैरव की बात है, अगर आप उनके 108 नामों से करें तो बेहतर होगा।
हर तिथि का व्रत किस देवता के लिए रखा जाता है?
पक्ष की हर तिथि का व्रत और उसके अधिष्ठाता देवता
प्रदोष व्रत और त्रयोदशी व्रत में अंतर, और क्या दोनों साथ रखे जा सकते हैं, यह पूछने वाले श्रोता से — जो पहले से अष्टमी, प्रदोष और पूर्णिमा रखते हैं — वक्ता पूछते हैं कि बाकी सब कहाँ छोड़ रहे हैं, और फिर उन्हें गिनाते हैं: प्रतिपदा भी रखिए, प्रजापति के लिए; द्वितीया चंद्र भगवान के लिए; तृतीया गौरी जी के लिए; चतुर्थी विनायक के लिए; पंचमी महादेव के लिए; षष्ठी छठी मैया के लिए, और स्कंदमाता, कात्यायनी और भगवान कार्तिकेय की पत्नी देवसेना के लिए; सप्तमी सूर्य भगवान के लिए; अष्टमी आप रखते ही हैं; नवमी दुर्गा जी के लिए; दशमी गंगा जी के लिए; एकादशी नारायण के लिए; द्वादशी और त्रयोदशी आप कर ही रहे हैं; चतुर्दशी काली जी के लिए; और पूर्णिमा तो है ही। वे जोड़ते हैं, खाना-पीना कुछ मत कीजिए।
प्रश्न यह है कि प्रदोष व्रत और त्रयोदशी व्रत में क्या अंतर है, और क्या दोनों व्रत साथ रखे जा सकते हैं — श्रोता पहले से अष्टमी, प्रदोष और पूर्णिमा रखते हैं। तो बाकी सब कहाँ छोड़ रहे हैं, वक्ता पूछते हैं। भक्ति जी, बाकी सब भी रखिए। प्रतिपदा भी रखिए, प्रजापति के लिए। द्वितीया रखिए, चंद्र भगवान के लिए। तृतीया रखिए, गौरी जी के लिए। चतुर्थी रखिए, विनायक के लिए। पंचमी रखिए, महादेव के लिए। षष्ठी रखिए, छठी मैया के लिए — और इनके लिए भी, स्कंदमाता के लिए, कात्यायनी के लिए, और, वे एक पल नाम भूलते हुए कहते हैं, देवसेना के लिए, जो भगवान कार्तिकेय की विवाहिता पत्नी हैं। सप्तमी रखिए, सूर्य भगवान के लिए। अष्टमी आप रखते ही हैं। नवमी रखिए, दुर्गा जी के लिए। दशमी भी रखिए, गंगा जी के लिए। एकादशी भी कीजिए, नारायण के लिए। द्वादशी और त्रयोदशी आप कर ही रहे हैं। चतुर्दशी काली जी के लिए रखिए। और पूर्णिमा तो पहले से है। वे जोड़ते हैं, खाना-पीना कुछ मत कीजिए।
क्या एक जीवन में इतने सारे व्रत रखने चाहिए?
कुंडली या इष्ट के अनुसार चुना एक व्रत, पूरी विधि से
वक्ता कहते हैं कि जीवन में इतने सारे व्रत-उपवास इस तरह नहीं किए जाते। अपनी कुंडली के अनुसार या अपने इष्ट-आराध्य के अनुसार कोई एक व्रत पूरे विधि-विधान से करना चाहिए। अगर आप महादेव को ही सब कुछ मानते हैं, तो उसके अनुसार केवल प्रदोष व्रत कीजिए। अगर आप दो व्रत रख रहे हैं, प्रदोष भी और त्रयोदशी भी, तो एक भी व्रत की पूर्णता कहाँ होगी? प्रदोष का पूरा नियम कहाँ निभेगा?
वक्ता कहते हैं, ठीक है — जीवन भर व्रत अच्छे से कीजिए। देखिए: जीवन में इतने सारे व्रत-उपवास इस तरह नहीं किए जाते। अपनी कुंडली के अनुसार या अपने इष्ट-आराध्य के अनुसार कोई एक व्रत आपको पूरे विधि-विधान से करना चाहिए। अगर आप महादेव को ही सब कुछ मानते हैं, तो उनके अनुसार केवल प्रदोष व्रत कीजिए। आप दो व्रत कर रहे हैं — प्रदोष भी कर रहे हैं, और त्रयोदशी भी। तो एक भी व्रत की पूर्णता कहाँ होगी? प्रदोष का जो पूरा नियम है, वह कहाँ निभेगा? इसलिए व्रत कभी इस तरह नहीं करना चाहिए।
क्या दोनों पक्षों में एक ही व्रत रखना ठीक है?
एक व्रत निभाना, एक पक्ष में या दोनों में
वक्ता कहते हैं कि कोई एक व्रत कीजिए। अगर आप अष्टमी रखते हैं, तो कौन सी — कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष? दोनों रखें, वह भी ठीक है। दोनों में प्रदोष कर रहे हैं, वह भी ठीक है। पर एक को साथ लेकर चलिए। जो एकादशी करते हैं, वे केवल एकादशी करते हैं, दोनों पक्षों की। अगर आप चतुर्थी कर रहे हैं, दोनों चतुर्थी या एक — वह ठीक है। पर अष्टमी, प्रदोष, त्रयोदशी और पूर्णिमा, चार-चार व्रत करके — तो बाकी तिथियों ने क्या गलती की है? उनके भी कीजिए, सबकी कृपा आपको मिलेगी।
वक्ता कहते हैं कि केवल एक, कोई एक व्रत कीजिए। अगर आप अष्टमी रखते हैं, तो कौन सी? कृष्ण पक्ष कर रहे हैं, शुक्ल पक्ष कर रहे हैं? अगर दोनों भी कर रहे हैं, तो वह भी ठीक है। अगर दोनों में प्रदोष कर रहे हैं, तो वह भी ठीक है। पर एक को अपने साथ लेकर चलिए। जो एकादशी करते हैं, वे केवल एकादशी करते हैं, दोनों पक्षों की। आप चतुर्थी कर रहे हैं — दोनों चतुर्थी कर रहे हैं या एक? वह ठीक है। पर इतना सारा: अष्टमी, प्रदोष, त्रयोदशी, पूर्णिमा — चार-चार व्रत करके। तो बाकी तिथियों ने क्या गलती की है? उनके भी कीजिए। सबकी कृपा भी आपको मिलेगी।
क्या गुरु दत्तात्रेय के बारह नामों का पाठ जीवन भर किया जा सकता है?
नाम जप, जिसके लिए अनुमति नहीं चाहिए और चलते-फिरते हो सकता है
यह पूछे जाने पर कि क्या गुरु दत्तात्रेय के बारह नामों का पाठ जीवन भर किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है — आप इसे ठीक गुरु मंत्र की तरह कर सकते हैं। नाम जप करने में आपको कोई कठिनाई नहीं है। किसी भी देवी-देवता का नाम जप चलते-फिरते किया जा सकता है। बारह नाम कीजिए; आप बिल्कुल कर सकते हैं।
यह पूछे जाने पर कि क्या गुरु दत्तात्रेय के बारह नामों का पाठ जीवन भर किया जा सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। ठीक गुरु मंत्र की तरह आप इसे बिल्कुल कर सकते हैं। नाम जप करने में आपको कोई कठिनाई नहीं है। किसी भी देवी-देवता का नाम जप चलते-फिरते किया जा सकता है। बारह नामों का कीजिए। आप बिल्कुल कर सकते हैं।
मकार की तुलना में गकार में क्या मिलता है?
गकार तंत्रोक्त हो जाता है, तंत्र सिद्धि के लिए प्रयोग
राजेश जी पूछते हैं: अगर मकार में भौतिक इच्छाएँ पूरी होती हैं, तो गकार में क्या होता है? वक्ता कहते हैं, देखिए, गकार तंत्रोक्त हो जाता है। तंत्र सिद्धि के लिए हम गकार में जाते हैं। वैसे तंत्र सिद्धि दोनों में है — गकार में वह एक तरह की हो जाती है, मकार में दूसरी तरह की।
राजेश जी पूछते हैं कि जैसे वक्ता ने अभी बताया कि मकार में भौतिक इच्छाएँ पूरी होंगी, तो फिर गकार में क्या होगा। वक्ता कहते हैं, देखिए, गकार तंत्रोक्त हो जाता है। गकार में, तंत्र सिद्धि के लिए, हम गकार में जाते हैं। वैसे तंत्र सिद्धि दोनों में है। गकार में वह अलग हो जाती है, मकार में अलग हो जाती है।
क्या कर्म काटने के लिए जयंती पर बारह नामों का एक दिन का जप किया जा सकता है?
कर्म के लिए बारह नामों का एक दिन का अनुष्ठान
एक श्रोता, जिनके एक भौतिक गुरु हैं, पूछते हैं कि क्या वे अगले दिन, जयंती पर, अपने पूरे कर्म काटने के लिए एक दिन के अनुष्ठान के रूप में बारह नामों का जप पूरा कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं — जितना संभव हो उतना कीजिए।
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने पिछले दिन भगवान दत्त के बारह नामों का वीडियो देखा, और उनके एक भौतिक गुरु हैं; वे पूछते हैं कि क्या वे अगले दिन, जयंती पर, अपने पूरे कर्म काटने के लिए एक दिन के अनुष्ठान के रूप में बारह नामों का जप पूरा कर सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं। जितना कर सकें, उतना कीजिए।
क्या विनियोग के बिना किए जप के बाद विनियोग नए सिरे से किया जा सकता है?
बिना विनियोग तीन लाख पंचाक्षरी के बाद विनियोग फिर से करना
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने विनियोग आदि के बिना पंचाक्षरी का तीन लाख से अधिक जप किया है, और अब विनियोग के साथ नए सिरे से करना चाहते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल ऐसा कर सकते हैं।
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने विनियोग आदि के बिना पंचाक्षरी का तीन लाख से अधिक जप किया, और अब वे इसे नए सिरे से, विनियोग के साथ करना चाहते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं।
दत्तात्रेय कलश स्थापना के बाद कलश कितने दिन रहना चाहिए?
पूरी साधना की अवधि तक कलश जैसा है वैसा रहे
रोहन जी, जिन्हें अगले दिन भगवान दत्तात्रेय के लिए कलश स्थापना करनी है, पूछते हैं कि पूजन के बाद कलश और नारियल का क्या करना है। वक्ता कहते हैं कि आपने कलश स्थापना की है — अब आप कितने दिन की साधना कर रहे हैं? अगर एक महीने की साधना कर रहे हैं, तो पूरे महीने कलश जैसा है वैसा रहने दीजिए। ठंड का मौसम है, तो कोई कठिनाई नहीं। आखिरी दिन, हवन आदि करने के बाद, उनका विसर्जन होता है।
रोहन जी लिखते हैं कि उन्हें अगले दिन भगवान दत्तात्रेय की कलश स्थापना करनी है, और पूछते हैं कि पूजन के बाद कलश और नारियल का क्या करना है। वक्ता कहते हैं, देखिए, आपने कलश स्थापना की है। अब आप कितने दिन की साधना कर रहे हैं? अगर आप एक महीने की साधना कर रहे हैं, तो पूरे एक महीने कलश जैसा है वैसा रहने दीजिए। ठंड का मौसम है, तो कोई कठिनाई नहीं है। आखिरी दिन, जब आप हवन आदि कर लें, उसके बाद उनका विसर्जन होता है।
एक दिन के अनुष्ठान का कलश किस दिन विसर्जित करना चाहिए?
गुरुवार को नहीं; धातु का कलश वापस लाएँ, नारियल विसर्जित करें
वक्ता कहते हैं कि अगर आप अगले दिन एक दिन का अनुष्ठान कर रहे हैं, तो ध्यान रखिए कि विसर्जन गुरुवार को नहीं करना चाहिए। उनका विसर्जन आप शुक्रवार को कर सकते हैं। अगर आपने किसी धातु का कलश रखा है, तो नदी में विसर्जन के बाद उसे अपने साथ वापस ले आइए। नारियल नदी में विसर्जित कीजिए।
क्या सूर्यास्त के बाद हवन करने में दोष है, और क्या दिक्पाल बलि हमेशा जरूरी है?
तंत्रोक्त हवन में दोष नहीं; दस दिक्पाल बलि केवल पूरे विधान में
यह पूछे जाने पर कि क्या सूर्यास्त के बाद हवन करने से कोई दोष लगता है, और क्या हर हवन में दस दिक्पालों के निमित्त बलिदान अनिवार्य है, वक्ता कहते हैं कि दोष आदि की बात वैदिक हवन में है। अगर आप सामान्य तंत्रोक्त हवन आदि कर रहे हैं, तो उसमें कोई दोष नहीं, आप कर सकते हैं। और अगर आप दस दिग्पाल के निमित्त बलि सहित हवन का पूरा विधान कर रहे हैं, तो वह जरूरी है; अगर सामान्य हवन कर रहे हैं, तो हर बार जरूरी नहीं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या सूर्यास्त हो जाने के बाद हवन करने में कोई दोष है, और क्या हवन में हर बार दस दिक्पालों के निमित्त बलिदान अनिवार्य है। वक्ता कहते हैं, देखिए, दोष आदि की बात वैदिक हवन में है। अगर आप सामान्य तंत्रोक्त हवन आदि कर रहे हैं, तो उसमें कोई दोष नहीं है; आप कर सकते हैं। और अगर आप दस दिग्पाल के निमित्त बलि हवन का पूरा विधान कर रहे हैं, तो वह जरूरी है। अगर आप सामान्य हवन कर रहे हैं, तो हर बार जरूरी नहीं है।
क्या इष्ट वाले कलश में ही दूसरे देवताओं की पूजा की जा सकती है?
इस दीक्षा विधान में दिखाया गया कलश पूजन, दोबारा काम आने वाले नमूने के रूप में
यह पूछे जाने पर कि क्या सांकेतिक साधना में इष्ट के अलावा दूसरे देवी-देवताओं का पूजन सामान्य रूप से कलश में ही किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। वे कहते हैं कि इस बार का दीक्षा विधान ठीक इसी कारण पूरी तरह कलश पर करके दिखाया गया है — ताकि उन वीडियो को काटकर अलग से बनाया जा सके और दिखाया जा सके कि कलश पूजन का तरीका यह है। उसमें आप सभी देवी-देवताओं की पूजा इसी तरह कर सकते हैं; ठीक वैसे ही कीजिए जैसे वहाँ बताया गया है।
यह पूछे जाने पर कि क्या सांकेतिक साधना में इष्ट के अलावा दूसरे देवी-देवताओं का पूजन सामान्य रूप से कलश में ही किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। वे कहते हैं कि इस बार का दीक्षा विधान ठीक इसी कारण पूरी तरह कलश पर करके दिखाया गया है — ताकि उन्हीं वीडियो को काटकर अलग से बनाया जा सके और दिखाया जा सके कि हाँ, कलश के पूजन की विधि यह है। उसमें आप सभी देवी-देवताओं की पूजा इसी तरह कर सकते हैं। वहाँ बताया गया है, तो ठीक वैसे ही कीजिए। हमने पूरी तरह हिंदी में करके दिखाया है।
जहाँ मंत्रों की हिंदी उपलब्ध नहीं, वहाँ भाव प्रधान हिंदी में लिखा जाएगा।
जहाँ मंत्रों की हिंदी न मिले, वहाँ भाव प्रधान हिंदी
वक्ता कहते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा की विधि हिंदी में भी करने का प्रयास है। बहुत से मंत्रों की हिंदी नहीं मिल रही — उनमें क्या और कैसे बोलना है। तो उनमें भी वे भाव प्रधान हिंदी में लिखकर पूरी चीज दिखाएँगे कि प्रतिष्ठा विधि कैसे की जाती है।
वक्ता कहते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा की विधि हिंदी में भी करने का प्रयास है। बहुत से मंत्रों की हिंदी नहीं मिल रही — कि उनमें कैसे और क्या बोलना है। तो उनमें भी भाव प्रधान हिंदी में लिखकर वे पूरी चीज दिखाएँगे: कि प्रतिष्ठा विधि कैसे की जाती है।
कुछ दत्त उपासक साधु नशीली चीजें लेते क्यों दिखते हैं?
अपनी अवस्था में संन्यासी, और पर्वतीय क्षेत्रों की दिव्य जड़ी-बूटियाँ
दत्त के अघोर स्वरूप पर प्रकाश डालने को कहे जाने पर, क्योंकि दत्त उपासक कई साधु उनकी उपासना में सिगरेट लेते देखे गए हैं, वक्ता कहते हैं कि प्रकाश डालने की जरूरत नहीं है। वे घर छोड़कर संन्यास आश्रम में चले गए हैं; उनकी अपनी अवस्था है। वे ध्यान टिकाने के लिए कहते हैं कि हम बूटी ले रहे हैं — वे उनकी चीजें हैं, और यह भी सच है कि वे उस तरह जड़ी-बूटियाँ लेते हैं। वे कहते हैं कि पर्वतों के क्षेत्र में, चाहे गिरनार हो, विंध्य क्षेत्र हो या हिमालय क्षेत्र, हर क्षेत्र में दिव्य औषधि, दिव्य जड़ी-बूटियाँ हैं।
एक श्रोता पूछते हैं: दत्त का एक अघोर स्वरूप है, और उनकी उपासना में हमने दत्त उपासक कई साधुओं को सिगरेट लेते देखा है — कृपया अघोर स्वरूप पर प्रकाश डालें। वक्ता कहते हैं कि प्रकाश डालने की जरूरत नहीं है। वे घर-बार छोड़कर संन्यास आश्रम में चले गए हैं। उनकी अपनी अवस्था है। वे ध्यान टिकाने के लिए कहते हैं कि हम बूटी ले रहे हैं। वे उनकी चीजें हैं। यह भी सच है कि वे उस तरह जड़ी-बूटियाँ लेते हैं। पर्वतों के क्षेत्र में, चाहे गिरनार हो, चाहे विंध्य क्षेत्र हो या हिमालय का क्षेत्र, हर क्षेत्र में दिव्य औषधि, दिव्य जड़ी-बूटियाँ हैं। वे कहते हैं कि इनके बारे में हम नहीं जानते। उन्हें लेने का तरीका अलग हो सकता है।
जो चिलम और गांजा दिखता है, क्या वही साधु लेते हैं?
एक अलग विषय जिसे सांसारिक लोग नहीं समझ सकते
वक्ता कहते हैं कि चिलम और गांजा अलग बात है; पर उससे ध्यान योग की प्राप्ति, उन जड़ी-बूटियों का सेवन, एक अलग माध्यम से लिया जाता है। आप सोच रहे हैं कि वे चिलम ले रहे हैं, पर वह अलग विषय है, वह चीज ही बिल्कुल अलग है। और सांसारिक लोग उन विषयों को नहीं समझ सकते — इसलिए उस पर चर्चा करना भी उचित नहीं। उन्हें तो बस यही लगेगा कि आदमी किसी तरह का नशा कर रहा है।
वक्ता कहते हैं कि चिलम, गांजा आदि अलग बात है। पर उससे ध्यान योग की प्राप्ति, उन जड़ी-बूटियों का सेवन — वह एक अलग माध्यम से लिया जाता है। आप सोच रहे हैं कि वे चिलम ले रहे हैं, पर वह अलग विषय है; वह चीज ही अलग है। और सांसारिक लोग उन विषयों को नहीं समझ सकते। इसलिए उस पर चर्चा करना भी उचित नहीं है। उन्हें तो बस यही लगेगा कि आदमी किसी तरह का नशा कर रहा है।
ऐसी जड़ी-बूटियाँ किन परिस्थितियों में दी जाती हैं?
हठयोग में, सामान्य अभ्यास से न मिलने वाली अवस्थाओं के लिए गुरु द्वारा
वक्ता कहते हैं कि जो बिना किसी नशे के कर सके, वह अलग विषय है; पर हठयोग में, और कुछ विशेष अवस्थाएँ पाने के लिए जो सामान्य अभ्यास से नहीं आ रहीं, तब वहाँ गुरु द्वारा उसका सेवन कराया जाता है। अब कौल परंपरा में और इन सब में, वे जोड़ते हैं, यह पूरा विषय कुछ अलग हो जाता है — और क्योंकि माताएँ-बहनें भी सुन रही हैं, वे इन विषयों से थोड़ा बचते हैं, और कभी और बताएँगे।
वक्ता कहते हैं कि जो बिना किसी नशे के कर ले, वह अलग विषय है। पर हठयोग में, और कुछ विशेष तरह की अवस्थाएँ पाने के लिए जो सामान्य अभ्यास से नहीं आ रहीं, तब वहाँ गुरु द्वारा उसका सेवन कराया जाता है। अब कौल परंपरा में और इन सब में, यह पूरा विषय कुछ अलग हो जाता है। वे कहते हैं कि माताएँ-बहनें भी सुन रही हैं, इसलिए वे इन विषयों से थोड़ा बचते हैं। कभी और बताएँगे।
अगर कोई पहले से काल भैरव कवच का पाठ करता है, तो क्या दत्त पंजर कवच भी पढ़ना चाहिए?
कोई एक कवच — सब नहीं
यह पूछे जाने पर कि काल भैरव कवच का पाठ करते हुए क्या दत्त पंजर कवच का भी पाठ करना चाहिए, वक्ता कहते हैं: कोई एक कवच कीजिए। सारे कवच करने की जरूरत नहीं है।
जिसका पहले से गुरु है, क्या उसे यह दीक्षा विधान करना चाहिए?
दीक्षा की जरूरत नहीं — पूजन और हवन खुले हैं
यह पूछे जाने पर कि क्या जिनके पहले से गुरु हैं, वे भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न करने के लिए यह दीक्षा विधान कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं कि दीक्षा विधान की जरूरत नहीं है। आप उनका पूजन कर सकते हैं, उनका हवन कर सकते हैं। दीक्षा की जरूरत नहीं है।
दत्त पूर्णिमा की साधना कब से शुरू करनी है?
7 तारीख की सुबह से
यह पूछे जाने पर कि क्या दत्त पूर्णिमा की साधना अगली सुबह से ही करनी है, वक्ता पुष्टि करते हैं कि 7 तारीख से ही करनी है।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या दत्त पूर्णिमा की साधना अगली सुबह से ही करनी है। वक्ता उत्तर देते हैं, हाँ — 7 तारीख से ही करनी है।
मंगलवार की हनुमान पूजा में चालीसा और सुंदरकांड के अलावा क्या जोड़ा जा सकता है?
हनुमान सहस्रनाम और एक कवच जोड़ना
भक्ति जी पूछती हैं कि मंदिर में मंगलवार की हनुमान पूजा में चालीसा और सुंदरकांड के अलावा वे क्या जोड़ें। वक्ता कहते हैं, ऐसा कीजिए: हनुमान जी का सहस्रनाम जोड़िए, और एक कवच भी जोड़िए।
भक्ति जी लिखकर पूछती हैं कि मंदिर में वे जो चालीसा और सुंदरकांड करती हैं, उसके अलावा मंगलवार को हनुमान जी की पूजा में और क्या जोड़ें। वक्ता कहते हैं कि आप चालीसा और सुंदरकांड कर रही हैं और कुछ और जोड़ना चाहती हैं। तो ऐसा कीजिए: हनुमान जी का सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। जोड़िए, और एक कवच भी जोड़िए।
क्या साधना काल में दूसरे घर का भोजन किया जा सकता है?
अपने हाथ का बना भोजन, या सात्विक विचार रखने वाले हाथों का
यह पूछे जाने पर कि क्या साधना काल में किसी के घर का भोजन नहीं लेना चाहिए, वक्ता कहते हैं कि नहीं लेना चाहिए। भोजन के बारे में इतना होना चाहिए: कि भोजन खुद बनाया हो, या जो सात्विक विचार रखता हो उसके हाथ का हो — वह अधिक उचित है।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या साधना के समय किसी के घर का भोजन नहीं लेना चाहिए। वक्ता कहते हैं, देखिए, नहीं लेना चाहिए। भोजन के बारे में इतना होना चाहिए: कि भोजन खुद बनाकर खाया जाए, या जो सात्विक विचार रखता हो उसके हाथ का हो। वह अधिक उचित है।
जनेऊ के बाद बच्चों से किस उम्र से हवन कराया जा सकता है?
जनेऊ से सिखाना शुरू; 12 से 13 साल से खुद करना
यह पूछे जाने पर कि जनेऊ के बाद बच्चों से कब से हवन कराया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि उन्हें सिखाना शुरू कीजिए। अगर आप उतना नियम मानते हैं तो अग्निहोत्र तो करना ही चाहिए; नहीं तो साप्ताहिक हवन या मासिक हवन में उन्हें साथ बैठाइए और अभ्यास कराइए, दिखाइए कि कैसे होता है। 12 से 13 साल के हो जाने के बाद आप उन्हें खुद करने की छूट दे सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि जनेऊ के बाद बच्चों से कब से हवन आदि कराया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि उन्हें सिखाना शुरू कीजिए। अगर आप उतना नियम रखते हैं, तो अग्निहोत्र तो करना ही चाहिए। नहीं तो साप्ताहिक हवन में या मासिक हवन में उन्हें अपने साथ बैठाइए, और अभ्यास कराइए, दिखाइए कि कैसे होता है। 12 से 13 साल की उम्र हो जाने के बाद आप उन्हें खुद से करने की छूट दे सकते हैं।
दत्त साधना में रोज के पूजन का विधान क्या है?
चैनल पर दीक्षा विधान वाले वीडियो में पहले ही दिया गया
यह पूछे जाने पर कि दत्त साधना में रोज के पूजन का विधान क्या है, वक्ता कहते हैं कि यह पहले ही बताया जा चुका है — चैनल पर दीक्षा विधान में एक वीडियो है कि रोज कैसे करना है। उसमें सामान्य बातें बताई गई हैं।
यह पूछे जाने पर कि दत्त साधना में रोज के पूजन का विधान क्या है, वक्ता कहते हैं कि यह पहले ही बताया जा चुका है। चैनल पर दीक्षा विधान में एक वीडियो है कि रोज कैसे करना है। उसमें सामान्य बातें बताई गई हैं।
क्या पिछले जन्म के भारी संचित कर्म काटने के लिए अनुष्ठान करना चाहिए?
जिस अनुष्ठान के लिए मंत्र दीक्षा मिली है, उसे करना
एक श्रोता कहते हैं कि उन्हें बताया गया है कि पिछले जन्म में जमा हुए बहुत बुरे कर्म कष्ट लाने वाले हैं — कहने का मतलब, वे बिस्तर पर आ जाएँगे — और उन्हें काटने के लिए एक अनुष्ठान बताया गया है, जिसके लिए उन्हें मंत्र दीक्षा दी गई है। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल कीजिए।
एक श्रोता कहते हैं कि उन्हें बताया गया है कि उनके पिछले जन्म से बहुत सारे बुरे कर्म जमा हो गए हैं और कष्ट आने वाला है — कहने का मतलब, वे बिस्तर पर आ जाएँगे — और उन्हें काटने के लिए एक अनुष्ठान बताया गया है, जिसके लिए उन्हें मंत्र दीक्षा मिली है। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल कीजिए।
अगर हर बार अनुष्ठान करने पर शरीर में परेशानी हो तो क्या करना चाहिए?
पहले गुरु से अनुष्ठान करवाना, फिर खुद करना
एक श्रोता कहते हैं कि जब वे दीक्षा में मिला नवार्ण अनुष्ठान करते हैं, तो शरीर में कोई न कोई परेशानी आ जाती है, और उपाय पूछते हैं। वक्ता कहते हैं, देखिए, अगर अनुष्ठान करने से परेशानी बहुत बढ़ रही है, तो सबसे पहले आपको साधकों के माध्यम से अपने गुरु जी को बताना चाहिए और पहले उनके माध्यम से अनुष्ठान करवाना चाहिए। उसके बाद खुद कीजिए।
एक श्रोता, जो कहते हैं कि वे शिव जी और महाकाल जी को बहुत मानते हैं, लिखते हैं कि जब वे दीक्षा में मिला नवार्ण अनुष्ठान करते हैं तो शरीर में कोई न कोई परेशानी आ जाती है, और पूछते हैं कि क्या उपाय करें। वक्ता कहते हैं, देखिए, अगर अनुष्ठान करने से परेशानी बहुत बढ़ रही है, तो सबसे पहले आपको साधकों के माध्यम से अपने गुरु जी को बताना चाहिए और पहले उनके माध्यम से अनुष्ठान करवाना चाहिए। उसके बाद खुद कीजिए।
दुर्गा के शतनाम का हवन कैसे किया जाता है?
घी और गुग्गुल से 108 नामों की आहुति
भगवती दुर्गा की कृपा पाने के लिए स्तोत्र नामों, शतनाम का हवन कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: जैसे किया जाता है, दुर्गेश जी — घी और गुग्गुल से उनके 108 नामों से आहुति कर सकते हैं। सामान्य संकल्प के साथ।
एक श्रोता पूछते हैं कि भगवती दुर्गा की कृपा पाने के लिए स्तोत्र नामों का, शतनाम का हवन कैसे करें। वक्ता कहते हैं, जैसे किया जाता है, दुर्गेश जी: घी और गुग्गुल से, उनके 108 नामों से आहुति कर सकते हैं। संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। के साथ, सामान्य तरीके से।
क्या केवल भौतिक इच्छाओं के लिए जीवन भर बारह नामों का पाठ किया जा सकता है?
दत्त की कृपा के लिए जीवन भर बारह नामों का पाठ
दीपक जी पूछते हैं कि गुरु दत्त को परम गुरु मानने की बहुत जरूरत नहीं है, तो क्या वे फिर भी — केवल उनकी कृपा के लिए और कुछ भौतिक इच्छाओं के लिए — जीवन भर बारह नामों का पाठ और साधना कर सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं।
दीपक जी लिखते हैं कि जब गुरु दत्त को परम गुरु के रूप में मानने की बहुत जरूरत नहीं है, तो क्या वे फिर भी, केवल उनकी कृपा के लिए और कुछ भौतिक कामना के लिए, जीवन भर बारह नामों का पाठ और साधना कर सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं।
क्या किसी देवता के नामों का पाठ करने के लिए विशेष अनुमति चाहिए?
अष्टोत्तर या बारह नामों के लिए अनुमति नहीं; सहस्रनाम के लिए जीभ की स्पष्टता
वक्ता कहते हैं कि भगवान के नामों की साधना आदि के लिए कभी कुछ विशेष पूछने की जरूरत नहीं होती — खासकर अष्टोत्तरशतनाम, बारह नामों, और सहस्रनाम आदि के लिए। सहस्रनाम में "द" वाले अक्षरों, "क" वाले अक्षरों, इन सब में थोड़ा देखना होता है कि आपका अभ्यास है या नहीं, क्योंकि जीभ की स्पष्टता बहुत जरूरी हो जाती है: शब्द लड़खड़ाने नहीं चाहिए, उच्चारण गलत नहीं होना चाहिए। इसके अलावा कोई विशेष बात नहीं।
वक्ता कहते हैं कि भगवान के नामों की साधना आदि के लिए कभी कुछ विशेष पूछने की जरूरत नहीं होती — खासकर अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त।, बारह नामों, सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। आदि के लिए। सहस्रनाम में जो "द" वाले अक्षर हैं, जो "क" वाले अक्षर हैं, उन सब में थोड़ा देखना होता है कि आपका अभ्यास है या नहीं — क्योंकि जीभ की स्पष्टता बहुत जरूरी हो जाती है। शब्द लड़खड़ाने नहीं चाहिए; उच्चारण गलत नहीं होना चाहिए। और कोई विशेष बात नहीं है।
एक कवच सिद्ध रखना बेहतर है या एक से अधिक?
ब्रह्मास्त्र के रूप में एक कवच, साथ में दूसरे भी
वक्ता कहते हैं कि आप एक से अधिक कर सकते हैं। आपके पास एक ब्रह्मास्त्र होना चाहिए, जिसका आपने बहुत अधिक जप किया हो — आप 11,000 की तीन-चार साधनाएँ कर रहे हैं, और दो-तीन साल में लाखों पार कर जाते हैं। ऐसा एक कवच सिद्ध करके रखिए; इसके अलावा आप दूसरे कवच भी सिद्ध करके रख सकते हैं।
यह पूछे जाने पर कि एक कवच सिद्ध करके रखना अधिक लाभदायक है, या एक से अधिक सिद्ध करना ठीक है, वक्ता कहते हैं कि आप एक से अधिक कर सकते हैं। आपके पास एक ब्रह्मास्त्र होना चाहिए, जिसका आपने बहुत अधिक जप किया हो। आप 11,000 की तीन-चार साधनाएँ कर रहे हैं; दो-तीन साल में आप लाखों में पहुँच जाते हैं। इस तरह का एक कवच सिद्ध करके रखिए। इसके अलावा आप दूसरे कवच भी सिद्ध करके रख सकते हैं।
बटुक भैरव को ताँबे का दीपक देना चाहिए या पीतल का?
ताँबे की जगह पीतल, और चमेली न मिले तो सरसों का तेल
यह पूछे जाने पर कि क्या बटुक भैरव के लिए ताँबे या पीतल का दीपक जलाया जा सकता है, क्योंकि मिट्टी का दीपक हमेशा नहीं मिलता, और असली चमेली का तेल कौन सा है, वक्ता कहते हैं कि आप पीतल का दीपक बिल्कुल जला सकते हैं। ताँबे का जलाने से थोड़ी परेशानी होगी; ताँबे का मत जलाइए, पीतल का दीपक जलाइए। और अगर चमेली का तेल न मिले, तो सरसों का तेल लीजिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या बटुक भैरव को ताँबे या पीतल का दीपक दिया जा सकता है, क्योंकि मिट्टी का दीपक हमेशा नहीं मिल पाता, और असली चमेली का तेल कौन सा है। वक्ता कहते हैं, देखिए, आप पीतल का दीपक बिल्कुल जला सकते हैं। ताँबे का जलाने में थोड़ी परेशानी होगी। ताँबे का मत जलाइए — पीतल का दीपक जलाइए। और अगर चमेली का तेल नहीं मिल रहा, तो सरसों का तेल लीजिए।
अगर पति और पत्नी दोनों पाँच लाख जप करें, तो क्या सब कुछ दोगुना होगा?
दोनों के लिए एक पूजन विधान, यंत्र और माला अलग-अलग
अवधेश पांडे जी पूछते हैं कि अगर वे और उनकी पत्नी दोनों पाँच लाख जप शुरू करना चाहें, तो क्या बताई गई सारी सामग्री दो-दो लगेगी। वक्ता कहते हैं कि अगर आप भगवान दत्तात्रेय की साधना का पाँच लाख जप करना चाहते हैं, तो पूजन का जो भी विधि-विधान है, वह एक ही होगा। पति-पत्नी कर रहे हैं, तो कुछ भी दो-दो नहीं करना। केवल जो यंत्र बन रहा है — पहनने और पूजने के दो यंत्र — वे अलग होंगे, आपका अलग और उनका अलग; इसके अलावा माला दोनों की अलग होगी। बाकी सारा पूजन, जो भी भोग लगे, जो फूल और प्रसादी हो, सब एक ही जगह होगा, अलग नहीं।
अवधेश पांडे जी लिखते हैं कि वे और उनकी पत्नी दोनों अगले दिन से पाँच लाख जप शुरू करना चाहते हैं, और पूछते हैं कि क्या उसमें बताई गई सारी सामग्री दो-दो लगेगी। वक्ता कहते हैं कि अगर आप भगवान दत्तात्रेय की साधना का पाँच लाख जप करना चाहते हैं, तो पूजन का जो भी विधि-विधान होगा, वह एक ही होगा। पति-पत्नी कर रहे हैं: कुछ भी दो-दो नहीं करना है। केवल जो यंत्र बन रहा है — पहनने के लिए और पूजन के लिए जो दो यंत्र बनने हैं — वे अलग होंगे, दो: आपका अलग होगा, उनका अलग होगा। इसके अलावा माला आप दोनों की अलग होगी। बाकी, पूजन में जो भी भोग लगेगा, जो भी फूल और प्रसादी होगी, वह एक ही जगह होगी, अलग नहीं।
क्या छत्तीसगढ़ का अंबिकापुर शक्तिपीठ क्षेत्र में आता है?
वक्ता द्वारा खुला छोड़ा गया प्रश्न
राहुल चौधरी जी के यह पूछने पर कि क्या छत्तीसगढ़ का अंबिकापुर शक्ति पीठ के क्षेत्र में आता है, वक्ता कहते हैं कि उन्हें देखना पड़ेगा। जहाँ तक उन्हें जानकारी है, यह दंतेवाड़ा के आसपास पड़ना चाहिए।
राहुल चौधरी जी पूछते हैं कि क्या छत्तीसगढ़ का अंबिकापुर शक्ति पीठ के क्षेत्र में आता है। वक्ता कहते हैं, राहुल चौधरी जी, इसे देखना पड़ेगा। जहाँ तक उन्हें जानकारी है, यह दंतेवाड़ा के आसपास पड़ना चाहिए।
क्या रोज दत्तात्रेय पूजन से पहले प्रारंभिक पूजन करने होंगे?
पहले गौरी गणेश, कलश, नवग्रह, क्षेत्रपाल और दिक्पाल पूजन
यह पूछे जाने पर कि क्या भगवान दत्तात्रेय के पूजन में रोज पहले गौरी गणेश, कलश, नवग्रह, क्षेत्रपाल और दिग्पाल का पूजन करना होगा, वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ — पहले उन्हें कीजिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या भगवान दत्तात्रेय के पूजन में गौरी गणेश का, कलश का, नवग्रह का, क्षेत्रपाल का और दिग्पाल का पूजन रोज पहले करना होगा। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, पहले उन्हें कीजिए।
शिवलिंग रखने के लिए किस धातु का पात्र सबसे अच्छा है?
चाँदी सबसे अच्छी, पीतल भी चल सकता है
यह पूछे जाने पर कि शिवलिंग रखने के लिए किस धातु का पात्र सबसे अच्छा है, वक्ता कहते हैं कि अगर ऐसे कहा जाए, तो चाँदी का पात्र सबसे उत्तम है। आप पीतल में भी रख सकते हैं — पीतल में रखिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। रखने के लिए किस धातु का पात्र सबसे उत्तम है। वक्ता उत्तर देते हैं कि अगर ऐसे कहा जाए, तो चाँदी का पात्र सबसे उत्तम है। आप पीतल में भी रख सकते हैं। पीतल में रखिए।
32 नामावली वाले हवन में आहुति के शब्द कैसे हों?
"दुर्गाय नमः" बिना स्वाहा के
यह पूछे जाने पर कि माता की 32 नामावली से हवन करते समय हवन कैसे किया जाए — "दुर्गाय नमः स्वाहा, दुर्गाय नमः स्वाहा", या "दुर्गाय नमः" — वक्ता उत्तर देते हैं कि "दुर्गाय नमः" कहते हुए किया जाएगा।
एक श्रोता, यह कहते हुए कि माता मनसा की साधना खरमास खत्म होने से पहले आएगी, पूछते हैं कि माता की 32 नामावली से हवन करते समय वह कैसे करना है: "दुर्गाय नमः स्वाहा दुर्गाय नमः स्वाहा", या "दुर्गाय नमः"? वक्ता उत्तर देते हैं कि "दुर्गाय नमः" कहते हुए किया जाएगा।
मनसा का विग्रह दुर्गा के किस ओर रहता है?
बिना देखे उत्तर देने से वक्ता का इनकार, और भगवती के पास शिव का स्थान
एक श्रोता, जिनकी कुलदेवी मनसा हैं और इष्ट माँ दुर्गा, पूछती हैं कि घर में माँ मनसा का विग्रह माँ दुर्गा के किस ओर रहेगा। वक्ता कहते हैं कि वे देखकर उन्हें व्यक्तिगत रूप से संदेश भेजेंगे — बिना देखे नहीं बता सकते। यह देखना होगा कि भगवती मनसा को कहाँ, भगवती के किस ओर स्थान दिया गया है। क्योंकि, वे कहते हैं, अगर वे शिव जी के साथ, शिव-पार्वती जी के साथ रहती हैं, तो वे भगवती के बाईं ओर बैठती हैं।
एक श्रोता, जिनकी कुलदेवी मनसा हैं और इष्ट माँ दुर्गा, पूछती हैं कि घर में माँ मनसा का विग्रह माँ दुर्गा के किस ओर रहेगा। वक्ता कहते हैं, ठीक है — हम देखकर आपको व्यक्तिगत रूप से संदेश भेजेंगे; बिना देखे नहीं बताया जा सकता। यह देखना होगा कि भगवती मनसा को कहाँ, भगवती के किस ओर स्थान दिया गया है। क्योंकि अगर वे शिव जी के साथ, शिव-पार्वती जी के साथ रहती हैं, तो वे भगवती के बाईं ओर बैठती हैं।
पंचायतन व्यवस्था से स्थान कैसे बदलता है?
दुर्गा पंचायतन में शिव का दुर्गा के बाईं ओर जाना, और शिव मंडल में मनसा बाईं ओर
वक्ता कहते हैं कि अब अगर आपने दुर्गा जी का पंचायतन रखा है, तो शिव जी खिसक जाते हैं — शिव जी दुर्गा जी के बाईं ओर आ जाते हैं। तो उसके अनुसार फिर देखना होगा कि मनसा जी का स्थान कहाँ होगा। और अगर शिव-पार्वती जी का, शिव परिवार का मंडल बन रहा है, और उसमें आप मनसा जी को स्थान दे रहे हैं, तो उन्हें केवल बाईं ओर ही स्थान मिलता है — और उनकी पूजा भी बाएँ हाथ से होती है।
वक्ता कहते हैं कि अब अगर आपने दुर्गा जी का पंचायतन रखा है, तो शिव जी साथ में खिसक जाते हैं — शिव जी दुर्गा जी के बाईं ओर आ जाते हैं। तो उसके अनुसार फिर एक बार देखना होगा कि मनसा जी का स्थान कहाँ होगा। और अगर शिव-पार्वती जी का, शिव परिवार का मंडल बन रहा है, और उसमें फिर आप मनसा जी को स्थान दे रहे हैं, तो उन्हें केवल बाईं ओर ही स्थान मिलता है। और उनकी पूजा भी बाएँ हाथ से होती है।
अगर सवा लाख लगातार न हो सके, तो किस इकाई में करें?
25,000 की जगह 27,000, क्योंकि वह दोगुना होकर 54, 108 और आगे बनता है
यह पूछे जाने पर कि अगर सवा लाख की साधना लगातार न हो सके, तो क्या 25,000 के छोटे-छोटे अनुष्ठान किए जा सकते हैं, वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल — गिनती में आएगा, पर लगातार कीजिए। और 25,000 के अनुष्ठान की जगह, वे कहते हैं, 27,000 का कीजिए: क्योंकि 27 और 27 से 54 होता है, और 54 और 54 से 108, और इस तरह आप बढ़ाते जाते हैं। फिर जब आप फिर से 27 करेंगे, तो आपका सवा लाख आराम से पूरा हो जाएगा।
एक श्रोता पूछते हैं कि सवा लाख की साधना लगातार न कर पाने पर क्या 25,000 के छोटे-छोटे अनुष्ठान किए जा सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं। हाँ भाई, गिनती में जरूर आएगा — पर लगातार कीजिए। मतलब, मान लीजिए आप 25,000 का अनुष्ठान मत कीजिए: 27,000 का कीजिए। 27 में कीजिए, क्योंकि 27 और 27 से 54 होता है; 54 और 54 से 108 होता है। इस तरह आप बढ़ाते जाएँगे। फिर जब आप 27 करेंगे, तो आपका सवा लाख आराम से पूरा हो जाएगा। तो 27,000 में कीजिए।
जब साधना पूरी होने से पहले बार-बार टूटे तो क्या करना चाहिए?
दोष निवारण के संकल्प के साथ विघ्नेश्वर विनायक की सेवा
यह पूछे जाने पर कि अगर 30 दिन की साधना अवधि के अंत से कुछ दिन पहले साधना टूट जाए, तो क्या प्रभाव और फल मिलेगा, वक्ता कहते हैं: अगर साधना पूरी होने से पहले टूट रही है, तो सबसे पहले, अगर ऐसा बार-बार हो रहा है, भगवान विघ्नेश्वर विनायक की सेवा और पूजा कीजिए। और उसमें संकल्प लीजिए — कि इसका जो भी कारण हो, चाहे पितृ दोष हो, देव दोष हो, प्रेत-पिशाच दोष हो, या कोई विचार, हे विनायक, उस दोष का उन्मूलन कीजिए, और मेरी साधना पूरी करवाइए।
एक श्रोता पूछते हैं कि अगर 30 दिन की साधना अवधि में अंत से कुछ दिन पहले साधना खण्डित हो जाए, तो प्रभाव और फल मिलेगा या नहीं। वक्ता कहते हैं, देखिए, अगर साधना पूरी होने से पहले टूट रही है, तो सबसे पहले भगवान विघ्नेश्वर विनायक की सेवा और पूजा कीजिए, अगर ऐसा बार-बार हो रहा है। और उसमें संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लीजिए: कि इसका जो भी कारण हो — चाहे पितृ दोष हो, देव दोष हो, प्रेत-पिशाच दोष हो, या कोई विचार — हे विनायक, उस दोष का उन्मूलन कीजिए। और मेरी साधना पूरी करवाइए।
अगर साधना आखिरी क्षण में टूट जाए, तो क्या फल खो जाता है?
देव कृपा फिर भी आती है, पर भौतिक रूप से यह ठीक नहीं
वक्ता कहते हैं कि यह चीज ठीक नहीं — कि साधना पूरी होने वाली है और बिल्कुल आखिरी क्षण में किसी भी कारण से टूट जाए। फल मिलना अलग बात है: देवता की कृपा तो मिलेगी ही; ऐसा नहीं कि साधना छोड़ दी तो नहीं मिलेगी। पर भौतिक रूप से यह चीज ठीक नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि यह चीज ठीक नहीं है: कि साधना पूरी होने की कगार पर है और बिल्कुल आखिरी क्षण में किसी भी कारण से खण्डित हो जाए। फल मिलना अलग बात है। देवता की कृपा तो मिलेगी ही — ऐसा नहीं कि साधना छोड़ दी तो नहीं मिलेगी। पर भौतिक रूप से यह चीज ठीक नहीं है।
ताँबे के दीपक से दीपदान किसे किया जा सकता है?
ताँबा सबके लिए शुभ नहीं — केवल सरसों का तेल, रोज तिल का तेल या घी कभी नहीं
यह पूछे जाने पर कि ताँबे के दीपक से दीपदान किसे किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि ताँबे के दीपक का प्रयोग ही अलग है। ताँबे का दीपक जलाना हर किसी के लिए शुभ नहीं है। ताँबे के दीपक में आप हमेशा सरसों का तेल जला सकते हैं; उसमें सामान्य रोज के तरीके से तिल का तेल या घी कभी मत जलाइए।
एक श्रोता पूछते हैं कि दीपदान में ताँबे का दीपक किसे दिया जा सकता है। वक्ता कहते हैं, देखिए, ताँबे के दीपक का प्रयोग ही अलग बात है। ताँबे का दीपक जलाना हर किसी के लिए शुभ नहीं है। और ताँबे के दीपक में आप हमेशा सरसों का तेल जला सकते हैं। उसमें सामान्य रोज के तरीके से तिल का तेल या घी कभी मत जलाइए।
ताँबे का दीपक किन देवताओं के लिए जलाया जा सकता है?
उग्र देवता, भैरव जी और हनुमान जी
वक्ता कहते हैं कि यह उग्र देवताओं के लिए और भैरव जी के लिए जलाया जा सकता है। हनुमान जी के लिए भी जलाया जा सकता है — हनुमान जी के नाम पर, उनके लिए भी।
क्या तिल के तेल में मिलाकर चमेली का तेल बनाया जा सकता है?
मिलाने की अनुमति; शुद्ध चमेली बहुत जल्दी जलती है
यह पूछे जाने पर कि अच्छी गुणवत्ता का तिल का तेल और चमेली का तेल मिलता है, तो क्या तिल के तेल में चमेली का तेल मिलाकर चमेली का तेल बनाया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि हाँ, मिलाइए, कोई कठिनाई नहीं। वे जोड़ते हैं कि केवल चमेली रखने पर वह बहुत जल्दी जल जाता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि अच्छी गुणवत्ता का तिल का तेल और चमेली का तेल उपलब्ध होने पर, क्या तिल के तेल में चमेली का तेल मिलाकर चमेली का तेल बनाया जा सकता है। वक्ता कहते हैं, हाँ, मिलाइए। कोई कठिनाई नहीं है। उसमें केवल चमेली हो, तो वह बहुत जल्दी जल जाता है।
अस्त्र कैसे चलते हैं, यह केवल चर्चा और जानकारी के रूप में बताया जाएगा।
अस्त्रों का पूरा विषय, केवल चर्चा और जानकारी के रूप में
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय की साधना पूरी होने के बाद एक से एक जबरदस्त विषय आएँगे। अस्त्रों का पूरा विषय अभी बाकी है, जिसमें आप सबको पता चलेगा कि अस्त्र कैसे चलते हैं। वे कहते हैं कि यह केवल चर्चा और जानकारी है — उन्हें चलाने की सामर्थ्य न उनमें है और न आपमें हो सकती है; हम कहाँ इतने बड़े साधक हैं। पर देवी की कृपा से और संतों की कृपा से जो भी रुचि मिलती है, इस माध्यम से जो भी सुना जाता है, वह आप सबके सामने रखेंगे।
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय की साधना पूरी हो जाए, और उसके बाद एक से एक जबरदस्त विषय आएँगे। अभी अस्त्रों का पूरा विषय बाकी है। उसमें आप सबको पता चलेगा कि अस्त्र कैसे चलते हैं। यह केवल चर्चा है, केवल जानकारी है — उन्हें चलाने की सामर्थ्य न हममें है, न आपमें हो सकती है, न हममें ही हो सकती है; हम कहाँ इतने बड़े साधक हैं। पर देवी की कृपा से, संतों की कृपा से जो भी रुचि मिलती है, इस माध्यम से जो भी सुना जाता है, वह आप सबके सामने रखेंगे।
आए हुए संदेशों में ज्यादातर अवधूत बन जाने का डर था।
अवधूत बन जाने का डर
वक्ता कहते हैं कि अभी केवल यही चर्चा हो रही थी कि कल की साधना पूरी हो, क्योंकि बहुत से लोगों के संदेश आए थे। वे कहते हैं कि सबका सबसे बड़ा डर यह था कि कहीं हम अवधूत न बन जाएँ — मतलब अगर हम अवधूत बन गए तो घर में ऐसे ही घूमेंगे, और कोई मारे तब भी कोई असर नहीं होगा।
वक्ता कहते हैं कि अभी केवल यही चर्चा हो रही है कि कल की साधना पूरी हो, क्योंकि बहुत से लोगों के संदेश आए थे। सबका सबसे बड़ा डर क्या था? कि कहीं हम अवधूत न बन जाएँ। मतलब, अगर हम अवधूत बन गए तो घर में ऐसे ही घूमेंगे, और कोई मारे तब भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
जब कोई प्रयोग से फँसाने की कोशिश कर रहा हो तो क्या किया जा सकता है?
दुर्गा वज्र पंजर कवच, या अर्गला या "शूलेन पाहि नो देवि" से संपुट
घनश्याम दास जी भगवती दुर्गा की योगिनी साधना के बारे में पूछते हैं; वक्ता कहते हैं कि उसे एकदम बताना संभव नहीं, क्योंकि सारी सामग्री की व्यवस्था करनी होगी, और सामान्य विधान भी ऐसे ही नहीं बताया जा सकता। इसके बजाय, वे कहते हैं, अगर यह धोखे का मामला है, अगर ऐसी स्थिति बन गई है, तो भगवती दुर्गा का वज्र पंजर कवच प्राप्त करने की व्यवस्था कीजिए। और अगर वह नहीं, तो अर्गला मंत्र से, या "शूलेन पाहि नो देवि" मंत्र से संपुट करके तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ कीजिए।
घनश्याम दास जी भगवती दुर्गा की योगिनी साधना के बारे में पूछते हैं। वक्ता कहते हैं कि उसे एकदम बताना संभव नहीं होगा, क्योंकि उसके लिए सारी सामग्री की व्यवस्था करनी होगी; और सामान्य विधान भी ऐसे ही नहीं बताया जा सकता। पर एक काम कीजिए, वे कहते हैं: अगर यह धोखे का मामला है, अगर ऐसा लगता है, अगर ऐसी स्थिति बन गई है — तो भगवती दुर्गा का वज्र पंजर कवच मिल सके तो उसे प्राप्त करने की व्यवस्था कीजिए। अगर वह नहीं, तो अर्गला मंत्र से संपुट करके, या फिर "शूलेन पाहि नो देवि" मंत्र से संपुट करके, तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ कीजिए।
तंत्रोक्त देवी सूक्तम के पाठ के साथ नींबू की कौन सी बलि दी जाती है?
रोज नौ नींबू, दो-दो टुकड़ों में कटे, उन पर लौंग और कपूर जलाकर
वक्ता कहते हैं कि पाठ केवल एक करना है, पर बहुत मजबूत पाठ असर देगा। और जब आप यह पाठ करें — जैसे कालिका योगिनी साधना में नौ नींबू की, पाँच नींबू की बलि दी गई थी, नींबू के ऊपर लौंग और कपूर जलाकर — इस साधना में आपको रोज नौ नींबू की बलि देनी होगी, नौ नींबू को दो-दो टुकड़ों में काटकर उन पर लौंग और कपूर रखकर जलाना होगा। जो आपको फँसाने की कोशिश कर रहा है, उस पर बहुत जोरदार चोट पड़ेगी।
वक्ता कहते हैं कि पाठ केवल एक करना है, पर बहुत मजबूत पाठ असर देगा। और जब आप यह पाठ करें — देखिए, कालिका योगिनी साधना में नौ नींबू की, पाँच नींबू की बलि दी गई थी, और नींबू के ऊपर लौंग और कपूर जलाए जाते हैं। इस साधना में आपको रोज नौ नींबू की बलि देनी होगी, और नौ नींबू को दो-दो टुकड़ों में काटकर उन पर लौंग और कपूर रखकर जलाना होगा। जो आपको फँसाने की कोशिश कर रहा है, उस पर बहुत जोरदार चोट पड़ेगी।
देवी सूक्तम प्रयोग की शर्तें और शुरू करने की तिथि क्या है?
कड़ा ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन, और कृष्ण पक्ष अष्टमी से शुरुआत
कैसे करना है: तंत्रोक्त देवी सूक्तम को "शूलेन पाहि नो देवि" मंत्र से संपुटित करना है। और, वक्ता कहते हैं, ब्रह्मचर्य का पूरी तरह और अच्छे से पालन करना होगा; आपकी ओर से कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए; खाना-पीना पूरी तरह सात्विक रखिए। इसे कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू किया जा सकता है।
वक्ता पूछते हैं कि कैसे करना है, और उत्तर देते हैं: तंत्रोक्त देवी सूक्तम को "शूलेन पाहि नो देवि" मंत्र से संपुटित करना है। और ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का बिल्कुल और अच्छे से पालन करना होगा। आपको कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। खाना-पीना पूरी तरह सात्विक रखते हुए। इसे कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू किया जा सकता है।
क्या ऐसी परेशानी के लिए दुर्गा सप्तशती का स्वतंत्र पाठ किया जा सकता है?
कम से कम मध्यम चरित्र, छह अंगों के साथ
वक्ता कहते हैं कि दुर्गा सप्तशती का स्वतंत्र पाठ करके भी आप इन परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं। हम जो दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं, उसमें माना गया है कि कम से कम मध्यम चरित्र का पाठ करना चाहिए — पूरा पाठ छह अंगों के साथ करना है।
वक्ता कहते हैं कि दुर्गा सप्तशती का स्वतंत्र पाठ करके भी आप इन परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं। हम लोग जो दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं, उसमें माना गया है कि कम से कम मध्यम चरित्र का पाठ करना चाहिए। पूरा पाठ छह अंगों के साथ करना है।
क्या सप्तशती का कोई एक अध्याय अकेले पढ़ा जा सकता है?
कारण सटीक हो तो स्वतंत्र पाठ की अनुमति
वक्ता कहते हैं कि अब जब कोई विशेष परेशानी आती है, तो ऐसा वर्णन भी मिलता है, और जानकार लोग ऐसा प्रयोग करते भी हैं, और सामान्य व्यक्ति भी कर सकता है — पर कारण सटीक होना चाहिए। अगर आप सच में सही हैं और कठिनाई हो रही है, तो आप स्वतंत्र पाठ कर सकते हैं। जैसे कि सप्तम अध्याय।
वक्ता कहते हैं कि अब जब कोई विशेष कठिनाई आती है, तो ऐसा वर्णन भी मिलता है, और जानकारों द्वारा ऐसा प्रयोग किया भी जाता है, और सामान्य व्यक्ति भी कर सकता है — पर कारण सटीक होना चाहिए। अगर आप सच में सही हैं और कठिनाई हो रही है, तो आप स्वतंत्र रूप से पाठ कर सकते हैं। जैसे कि सप्तम अध्याय।
"शूलेन पाहि नो देवि" पाठ का हल्का रूप क्या है?
"शूलेन पाहि नो देवि" की एक माला, देवी सूक्तम, फिर एक माला
वक्ता कहते हैं कि सप्तम अध्याय में बहुत सारे मंत्र हैं, और लाइव पर उन मंत्रों का वर्णन करना शायद ठीक नहीं होगा — वैसे ऐसे मंत्र हैं कि उनका संपुट लगाने पर तुरंत असर देते हैं। अगर आप यह कर सकें तो बहुत अच्छा; न कर सकें तो सामान्य रूप कीजिए: "शूलेन पाहि नो देवि" की एक माला जप, फिर तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ, फिर "शूलेन पाहि नो देवि" की एक माला जप। अगर एक माला संभव न हो, तो मंत्र कम से कम 27 बार पढ़िए। वे कहते हैं कि इतने संकल्प से भी करेंगे तो आपको बहुत राहत मिलेगी।
वक्ता कहते हैं कि सप्तम अध्याय में बहुत सारे मंत्र हैं। लाइव पर उन मंत्रों का वर्णन करना शायद ठीक नहीं होगा। वैसे ऐसे मंत्र हैं कि उनका संपुट लगाने पर तुरंत असर देते हैं। वह किया जा सकता है। अगर आप यह कर पाएँ, तो बहुत अच्छा है। अगर नहीं कर पाएँगे, तो सामान्य रूप कीजिए: "शूलेन पाहि नो देवि" की एक माला जप, फिर तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ, फिर "शूलेन पाहि नो देवि" की एक माला जप। अगर एक माला संभव न हो, तो मंत्र कम से कम 27 बार पढ़िए। इतना भी संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर करेंगे, तो आपको बहुत राहत मिलेगी।
शास्त्र क्या कहता है
The protective verse शूलेन पाहि नो देवि asks the Goddess to guard with spear, sword, bell and bowstring.
The speaker places it near the seventh adhyāya; in the text it is adhyāya 4, verse 24.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके । घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥ २४ ॥
हे देवी! शूल से हमारी रक्षा करें। हे अम्बिके! खड्ग से हमारी रक्षा करें। घण्टे की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमारी रक्षा करें।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
दत्तात्रेय वज्र पंजर कवच कहाँ से शुरू होता है?
छब्बीसवें श्लोक से, उसके बाद विनियोग
यह पूछे जाने पर कि भगवान दत्तात्रेय का वज्र पंजर कवच कहाँ से शुरू होगा, और कहाँ से करना है, वक्ता कहते हैं कि उसे देखिए — आप छब्बीसवें श्लोक से पढ़ना शुरू कर सकते हैं। उसके बाद विनियोग आता है।
दत्तात्रेय वज्र कवच का विनियोग क्या है?
दत्त वज्र कवच का विनियोग पाठ
वक्ता दत्तात्रेय वज्र कवच का विनियोग इस तरह पढ़कर सुनाते हैं: "अस्य श्री दत्तात्रेय वज्र कवच स्तोत्र मन्त्रस्य किरातरूपी महारुद्र ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्री दत्तात्रेयो देवता। द्रां बीजम् आं शक्तिः क्रौं कीलकम् ॐ आत्मने नमः।" वे कहते हैं कि यह सारा न्यास आदि पाठ में दिया गया है, और इन सबका पाठ करके इन सबका न्यास करना चाहिए।
वक्ता दत्तात्रेय वज्र कवच का विनियोग पढ़कर सुनाते हैं: "अस्य श्री दत्तात्रेय वज्र कवच स्तोत्र मन्त्रस्य किरातरूपी महारुद्र ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्री दत्तात्रेयो देवता।" "द्रां बीजम् आं शक्तिः क्रौं कीलकम् ॐ आत्मने नमः।" वे कहते हैं कि अब आपका यह सारा न्यास आदि दिया गया है। इन सबका पाठ करके इन सबका न्यास करना चाहिए।
दत्त वज्र कवच का विनियोग शारीरिक रूप से कैसे किया जाता है?
हाथ में जल, "जपे विनियोगः" तक पाठ, फिर दत्त के चरणों में अर्पण
"जपे विनियोगः" तक विनियोग का पूरा मंत्र — यानी "अस्य श्री दत्तात्रेय वज्र कवच स्त्रोत मंत्रस्य" से आगे — हाथ में जल लेकर पढ़ा जाता है। "जपे विनियोगः" तक पढ़ने के बाद आप जल भगवान दत्त के श्री चरणों के पास अर्पित करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि न्यास करने की विधि क्या है और विनियोग कैसे करना है — इसे भी सुन लीजिए, क्योंकि सुनने वालों की ओर से कुछ प्रश्न आए थे। विनियोग का पूरा मंत्र, "जपे विनियोगः" तक — जो "अस्य श्री दत्तात्रेय वज्र कवच स्त्रोत मंत्रस्य" है — यह पूरा मंत्र आप हाथ में जल लेकर पढ़ेंगे। "जपे विनियोगः" तक पढ़ने के बाद आप जल को भगवान दत्त के श्री चरणों के पास अर्पित करेंगे।
दत्त वज्र कवच के बीज मंत्र किस रूप में पढ़े जाते हैं?
हर बीज मकार में पढ़ा जाता है
वक्ता कहते हैं कि दत्तात्रेय वज्र कवच में जितने भी बीज मंत्र हैं, सबको आपको मकार में (म् की ध्वनि के साथ) पढ़ना है — यह ध्यान रखिए। "आं शक्तिः क्रौं" — तो इसे ॐ, क्रौं पढ़ना है। "द्रीं" मकार में पढ़ा जाएगा। "श्रीं" भी मकार में, "सौः" भी मकार में। जितने भी दिए गए हैं — "क्लां, क्लूं" — सब मकार में पढ़े जाएँगे। यह ध्यान रखिए।
वक्ता कहते हैं कि दत्तात्रेय वज्र कवच में जितने भी बीज मंत्र (बीज मंत्र) हैं, सबको आपको मकार में पढ़ना है। यह ध्यान रखिए। "आं शक्तिः क्रौं" — तो इसे ॐ, क्रौं पढ़ना है। जो "द्रीं" है, वह मकार में पढ़ा जाएगा। "श्रीं" भी मकार में, "सौः" भी मकार में। जितने भी दिए गए हैं — "क्लां, क्लूं" — सब मकार में पढ़े जाएँगे। यह ध्यान रखिए।
दत्त वज्र कवच के न्यास और पाठ के बीच क्या आता है?
दिग्वंदन मंत्र और फिर ध्यान मंत्र, वज्र कवच पाठ शुरू होने से पहले
वक्ता कहते हैं कि दिग्वंदन के लिए एक छोटा मंत्र दिया गया है, वह करना चाहिए। फिर ध्यान मंत्र है। और ध्यान मंत्र के बाद कवच का पाठ शुरू होता है।
वक्ता कहते हैं कि दिग्वंदन के लिए एक छोटा मंत्र दिया गया है। वह करना चाहिए। फिर ध्यान मंत्र है। और ध्यान मंत्र के बाद फिर कवच का पाठ शुरू होता है।
कवच दत्तात्रेय की दिनचर्या के बारे में क्या कहता है?
काशी में गंगा, कोल्हापुर, माहुरगढ़ और सह्याचल की गुफाएँ
वक्ता कहते हैं कि इसमें लिखा है कि महामुनि दत्तात्रेय रोज सुबह काशी में गंगा नदी में स्नान करते हैं; फिर समुद्र किनारे कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर पहुँचकर देवी का जप और ध्यान करते हैं; और माहुरीपुर, माहुरगढ़ जाकर वहाँ भिक्षा करते हैं; और फिर सह्याचल की गुफाओं में दिगंबर वेश में विश्राम करते और सोते हैं। वे कहते हैं कि यह सब पढ़कर आपको बहुत कुछ पता चलेगा — इस कवच में बहुत सारी बातें हैं।
वक्ता कहते हैं कि अब इसमें लिखा है: कि महामुनि दत्तात्रेय रोज सुबह काशी में गंगा नदी में स्नान करते हैं। फिर समुद्र किनारे कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर पहुँचकर देवी का जप और ध्यान करते हैं। और माहुरीपुर, माहुरगढ़ जाकर वहाँ भिक्षाटन करते हैं। और फिर सह्याचल की गुफाओं में दिगंबर वेश में विश्राम करते और सोते हैं। वे कहते हैं कि यह सब पढ़कर आपको बहुत कुछ पता चलेगा। इस कवच में बहुत सारी बातें हैं।
अगर कवच एक से अधिक बार पढ़ना हो तो पाठ कैसे बदलता है?
विनियोग से सीधे "ॐ दत्तात्रेयः शिरः पातु" पर
वक्ता कहते हैं कि विनियोग के बाद, अगर पाठ एक बार करना है, तो जो कुछ लिखा है वह सब पढ़ सकते हैं। और अगर सब नहीं पढ़ना है — मतलब आप एक से अधिक बार पढ़ना चाहते हैं, कवच के 11 पाठ करना चाहते हैं — तो विनियोग करने के बाद सीधे कवच मंत्र पर आ जाना चाहिए, जो "ॐ दत्तात्रेयः शिरः पातु" से शुरू होता है। वहीं से आप कवच का पाठ शुरू करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि तो विनियोग के बाद, यह सारी चीज जो लिखी है — क्योंकि पाठ एक बार करना है, तो आप यह सब पढ़ सकते हैं। और अगर सब नहीं पढ़ना है, मतलब एक से अधिक बार पढ़ना है, कि आप कवच के 11 पाठ करना चाहते हैं — तो विनियोग करने के बाद आपको सीधे कवच मंत्र पर आ जाना चाहिए। जो यहाँ से शुरू होता है: "ॐ दत्तात्रेयः शिरः पातु" — मंत्र यहीं से शुरू होता है, और यहीं से शुरू करके आप कवच का पाठ आरंभ करेंगे। अगर आपकी इच्छा एक से अधिक बार, 11 बार करने की है।
दोहराया जाने वाला कवच पाठ किस पंक्ति तक किया जाता है?
फलश्रुति से ठीक पहले रुकना, और अंत का न्यास न करना
वक्ता पूछते हैं कि और कहाँ तक करेंगे — वहाँ तक जहाँ से फलश्रुति शुरू होने वाली है, उससे ठीक पहले तक: "ताहनंत यत स्थानम रक्षित वादी मुनीश्वरा", यहाँ तक। माला मंत्र के जप के लिए अंत में फिर से न्यास आदि दिए गए हैं; यह करने की जरूरत नहीं। उसमें से केवल सामान्य, जो सब दिया गया है, बस पढ़ा जाएगा, क्योंकि नहीं तो यह एक विस्तृत विधि बन जाएगी।
वक्ता पूछते हैं कि और कहाँ तक करेंगे। जहाँ से फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। शुरू होने वाली है, उससे पहले तक। "ताहनंत यत स्थानम रक्षित वादी मुनीश्वरा" — यहाँ तक। माला मंत्र के जप के लिए अंत में फिर से न्यास आदि दिए गए हैं। यह करने की जरूरत नहीं है। उसमें से केवल सामान्य, जो सब दिया गया है, बस पढ़ा जाएगा, क्योंकि नहीं तो यह एक विस्तृत विधि बन जाएगी।
सूतक काल में क्या किया जा सकता है?
केवल मानसिक जप, बारह नाम, और गीता का सातवाँ अध्याय
इस बात पर कि सूतक काल में केवल मानसिक जप होता है, वक्ता कहते हैं कि हाँ — भगवान दत्त के बारह नामों का जप किया जा सकता है। और, वे जोड़ते हैं, आपके लिए अच्छा रहेगा कि गीता के सातवें अध्याय का पाठ कर लें।
उनके गुरु पहले से हैं, और वह वही साधना होती जो यहाँ बताई जा रही है।
वही जो वे श्रोताओं को बता रहे हैं
यह पूछे जाने पर कि अगर उन्हें श्री दत्तात्रेय जी की अपनी पहली साधना करनी होती तो वे कौन सी करते, वक्ता कहते हैं कि उनके गुरु पहले से हैं, और वह वही होती जो वे आप सबको बता रहे हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि अगर उन्हें श्री दत्तात्रेय जी की अपनी पहली साधना करनी होती, तो वे कौन सी साधना करते। वक्ता कहते हैं कि मेरे गुरु पहले से हैं। जो चीज हम आप सबको बता रहे हैं — वही।
तंत्रोक्त देवी सूक्तम का संपुट किस मंत्र से होता है?
"शूलेन पाहि नो देवि", जिसे वे लाइव पर पूरा नहीं बोलेंगे
एक श्रोता कहते हैं कि वे समझ नहीं पा रहे कि तंत्रोक्त देवी सूक्तम को किस मंत्र से संपुटित करना है, और मंत्र बोलने को कहते हैं। वक्ता कहते हैं कि खोजिए, मिल जाएगा: "शूलेन पाहि नो देवि"। "शूलेन पाहि नो देवि"। वे कहते हैं कि यह पूरा मंत्र हम पूरा नहीं बोल सकते — इसे खोजिए; यह "शूलेन पाहि नो देवि" से शुरू होता है।
एक श्रोता कहते हैं कि वे समझ नहीं पा रहे कि तंत्रोक्त देवी सूक्तम को किस मंत्र से संपुटित करना है, और उनसे मंत्र बोलने को कहते हैं। वक्ता कहते हैं कि आपको इसे खोजना चाहिए, मिल जाएगा। "शूलेन पाहि नो देवि"। "शूलेन पाहि नो देवि"। यह पूरा मंत्र — वे कहते हैं कि हम पूरा मंत्र नहीं बोल सकते। इसे खोजिए। यह "शूलेन पाहि नो देवि" से शुरू होता है।
शास्त्र क्या कहता है
The verse शूलेन पाहि नो देवि asks the Goddess to protect with her spear, sword, bell and bowstring.
Using it as the sampuṭa of the Tantrokta Devī Sūktam is the speaker's practice, not stated in the text.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके । घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥ २४ ॥
हे देवी! शूल से हमारी रक्षा करें। हे अम्बिके! खड्ग से हमारी रक्षा करें। घण्टे की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमारी रक्षा करें।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
पंचायतन व्यवस्था और उसका संपुट चित्र बनाकर भेजा जाएगा।
बनाकर भेजा जाने वाला चित्र
माँ भगवती दुर्गा का पंचायतन फिर से बताने को, और संपुट कैसे होता है यह पूछे जाने पर, वक्ता कहते हैं कि ठीक है — हम एक चित्र बनाकर भेजेंगे, और आपको मिल जाएगा; और वे कहते हैं कि वे लिखकर दे देंगे।
सप्तशती की स्वतंत्र व्याख्या, गुप्त सप्तशती, देवी रहस्य और दस महाविद्याएँ।
सप्तशती की स्वतंत्र व्याख्या, गुप्त सप्तशती, देवी रहस्य और दस महाविद्याएँ
वक्ता कहते हैं कि आगे आनंद आएगा, जब वे सप्तशती की स्वतंत्र व्याख्या करेंगे। अभी गुप्त सप्तशती के बारे में पूछा जा रहा था। फिर देवी रहस्य है। फिर जब पूरी शृंखला शुरू होगी, तो दस महाविद्या पर अलग-अलग चर्चा होगी, और उसमें हर एक की योगिनियों पर चर्चा — जानकारी के लिए चर्चा। साधनाएँ अलग विषय हैं; साधना का विषय अलग है, पर ज्ञान होना चाहिए, और उद्देश्य यह है कि आपको जानकारी हो।
वक्ता कहते हैं कि आगे आनंद आएगा, जब हम लोग सप्तशती की स्वतंत्र व्याख्या करेंगे। अभी गुप्त सप्तशती के बारे में पूछा जा रहा था। फिर देवी रहस्य है। फिर दस महाविद्या पर अलग-अलग चर्चा होगी, जब पूरी शृंखला शुरू होगी। और उसमें हर एक की योगिनी के बारे में चर्चा होगी — जानकारी के लिए चर्चा। और साधनाएँ अलग विषय हैं। साधना का विषय अलग है। पर ज्ञान होना चाहिए; उद्देश्य यह है कि आपको जानकारी हो। उसमें बहुत आनंद आएगा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।