दत्तात्रेय एकाक्षरी साधना — अवधूत बनने का डर क्यों निराधार है, और सदस्यों का प्रश्नोत्तर

अवधूत अवस्था के डर पर दत्तात्रेय दीक्षा से पहले की चर्चा।

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Questions this answers

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The notes
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01

भेजे गए वीडियो का दावा: साधना से घर, परिवार और संसार की कोई चिंता नहीं रहती।

दत्त साधना से अवधूत अवस्था आने का फैला हुआ दावा

· 02:55–03:47

साधकों ने वक्ता को ऐसे वीडियो के लिंक भेजे थे जिनमें कहा गया है कि भगवान दत्तात्रेय की साधना करने से अवधूत अवस्था प्राप्त हो जाएगी — अवधूत यानी वह जिसे घर, परिवार या संसार से कोई मतलब नहीं रहता। वे कहते हैं कि इस कारण लोगों में डर पैदा हुआ है। कल उन्होंने यह विषय संक्षेप में रखा था, आज वे इस पर विस्तार से बात करते हैं।

02

अघोर स्वरूप अवधूत बनने के डर को गलत कैसे साबित करता है?

सदाशिव भी गृहस्थ नहीं, फिर भी उनके अघोर उपासक सबसे बड़े गृहस्थ हैं

· 03:48–04:23 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर ऐसी बात सच होती, तो सोचिए कि भगवान सदाशिव भी एक रूप में गृहस्थ नहीं हैं — वे भी अघोर रूप में हैं, कैलाश पर योग मुद्रा में अपने ध्यान में लीन। क्या उनकी पूजा और सेवा करने वाले सब लोगों ने संसार छोड़ दिया? वे कहते हैं कि आज जो उस अघोर रूप की उपासना करता है, वही सबसे बड़ा गृहस्थ है: उसने अघोर दीक्षा ली है, अपनी एक अलग परंपरा बना ली है, शादी कर रहा है, बच्चे पैदा कर रहा है, और खुद को अघोरी भी कह रहा है।

03

जब ब्रह्मा महादेव से मिलने कैलाश गए तब क्या हुआ?

महादेव ध्यान में थे और ब्रह्मा अधीर थे

· 04:24–04:49 · Also a question

कहा जाता है कि भगवान श्री ब्रह्मा एक बार महादेव से मिलने कैलाश पर्वत गए। महादेव ध्यान में लीन थे, और ब्रह्मा बहुत जल्दी में थे, रुकना नहीं चाहते थे — वक्ता जोड़ते हैं कि यह सब त्रिदेवों की लीला थी। वे बार-बार कहने लगे कि प्रभु तुरंत आँखें खोलें, दर्शन दें और उनकी बात सुनें। नंदी जी महाराज ने उन्हें रोकने की कोशिश की कि रुकिए, प्रभु ध्यान से बाहर आएँगे तब आप बात कीजिए, पर ब्रह्मा नहीं माने।

04

जब सदाशिव ने क्रोध में आँखें खोलीं तब क्या हुआ?

शिव और ब्रह्मा के बीच खड़े नारायण, और उनके स्वरूप का क्षय

· 04:50–05:35 · Also a question

जब भगवान सदाशिव को परेशानी होने लगी, तो उन्होंने क्रोध से आँखें खोलीं, और क्रोध में खुलने के कारण ब्रह्मा जी का शरीर क्षीण होने लगा। ब्रह्मा ने रक्षा के लिए नारायण का आवाहन किया। नारायण शिव और ब्रह्मा के बीच प्रकट हुए, और जब तक सदाशिव ने अपना क्रोध शांत किया, तब तक उस क्रोध से नारायण का आधे से अधिक स्वरूप क्षीण हो चुका था। वक्ता कहते हैं कि वह स्वरूप कहीं न कहीं समाहित करके रख लिया गया।

05

महासती अनुसूया की परीक्षा से तीन पुत्र कैसे जन्मे?

ब्रह्मा से चंद्रमा, शिव से दुर्वासा, नारायण से भगवान दत्त

· 05:36–06:17 · Also a question

जब महासती अनुसूया ने अपनी परीक्षा दी और त्रिदेवों को पुत्र रूप में बुलाया — अपने सतीत्व की शक्ति से तीनों को बालक बना दिया — तब नारायण के अंश से प्रकट होने वाला स्वरूप आना था। जब वे अपनी पहली अवस्था में लौटे, तो उन्होंने आशीर्वाद दिया कि वे उनके पुत्र बनेंगे, स्वयं त्रिदेवों के समान। ब्रह्मा जी के अंश से चंद्रमा का जन्म हुआ, शिव जी के अंश से दुर्वासा ऋषि का, और भगवान नारायण के अंश से भगवान दत्त का।

06

भगवान दत्त के भीतर तीनों तत्व क्यों रहते हैं?

अधूरा अंश, जिसे ब्रह्मा और महादेव ने अपनी शक्तियाँ डालकर पूरा किया

· 06:18–06:49 · Also a question

भगवान नारायण का वह स्वरूप, जिसका शरीर शिव के क्रोध के सामने क्षीण हो गया था, वही अंश भगवती महासती अनुसूया को दिया गया — इसीलिए वह स्वरूप पूरी तरह जन्म नहीं ले सका, पूरा उत्पन्न नहीं हो सका। उसे पूर्णता देने के लिए ब्रह्मा जी और महादेव ने अपनी-अपनी शक्तियाँ उसमें समाहित कर दीं, और इस तरह त्रिदेवों की पूरी शक्तियाँ भगवान दत्त में आकर रहने लगीं।

07

भगवान दत्त के भीतर कौन-कौन से तत्व हैं?

ब्रह्मा का सृजन, नारायण का श्री, और रुद्र तत्व

· 06:50–07:27 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्त के भीतर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी का तत्व है; पालनहार नारायण का श्री तत्व है; और संहार के देवता की रुद्र शक्ति, रुद्र तत्व है। इसलिए अगर आपको अपने भीतर सृजन की क्षमता चाहिए — शिक्षक, वैज्ञानिक, इंजीनियर बनना हो, मेडिकल पेशे में जाना हो, किसी भी रचनात्मक क्षेत्र में जाना हो — तो भगवान दत्त वहाँ कृपा करेंगे।

08

धन और भौतिक इच्छाओं के लिए दत्त के किस पक्ष का आवाहन होता है?

नारायण स्वरूप वाली श्री तत्व युक्त शक्ति

· 07:28–08:03 · Also a question

अगर आप नौकरी में जाना चाहते हैं, व्यापार में बहुत आगे बढ़ना चाहते हैं, धन-धान्य पाना चाहते हैं, अमीरों में गिने जाना चाहते हैं, भौतिक इच्छाओं की पूर्ति चाहते हैं — तो भगवान दत्त की श्री तत्व युक्त शक्ति, जो नारायण का स्वरूप है, कृपा करेगी और आपको श्री दी जाएगी।

अगर आप सेवक के रूप में, नौकरी के काम में जाना चाहते हैं; अगर आप चाहते हैं कि व्यापार में बहुत आगे बढ़ें, धन-धान्य की प्राप्ति हो; कि आप अमीरों में शामिल हों; अगर आप भौतिक इच्छाओं की पूर्ति चाहते हैं — तो भगवान दत्त की श्री तत्व युक्त शक्ति, जो नारायण का स्वरूप है, कृपा करेगी और आपको श्री दी जाएगी।

09

सिद्धि या रक्षा कार्य चाहने वाले साधक की मदद कौन सा पक्ष करता है?

साधना, सिद्धि और रक्षा कर्म में सहायक रुद्र शक्ति

· 08:04–08:26 · Also a question

अगर आप साधक बनना चाहते हैं, साधनाओं में जाना चाहते हैं, सिद्धियाँ पाना चाहते हैं, जनसेवा या राष्ट्रसेवा में या रक्षा वाले किस्म के कामों में जाना चाहते हैं, तो भगवान दत्त की रुद्र शक्ति, सहायक रुद्र तत्व, उसमें आपका सहायक बनता है और आपको आगे ले जाता है।

आप साधक बनना चाहते हैं, साधनाओं में जाना चाहते हैं, सिद्धि पाना चाहते हैं। आप जनसेवा में, राष्ट्रसेवा में, रक्षा वाले किस्म के कामों में जाना चाहते हैं। वक्ता कहते हैं कि तब वहाँ भगवान दत्त की रुद्र शक्ति, वह सहायक रुद्र तत्व, आपका सहायक बनेगा और उसमें आपको आगे ले जाएगा।

10

क्या दत्त के एकाक्षरी बीज का जप अवधूत अवस्था में धकेल देता है?

फल संकल्प तय करता है, मंत्र नहीं

· 08:27–08:55 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि उनमें तीनों तरह की शक्ति समाई है, और आपको जो चाहिए — जिस कामना से आप उनके मंत्र का जप करेंगे — वही आपको मिलेगा। कहीं भी जरा भी डरने की जरूरत नहीं कि दत्त के एकाक्षरी बीज का जप करने से अवधूत अवस्था आ जाएगी। ऐसा नहीं है। मायने यह रखता है कि आप किस संकल्प से जप कर रहे हैं, और आप अवधूत अवस्था के लिए तो जप कर ही नहीं रहे।

11

क्या सवा लाख जप से अवधूत अवस्था मिल जाती है?

पाँच लाख जप के बाद भी एक पत्ता नहीं हिलता

· 08:56–09:35 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अवधूत अवस्था इतनी आसान नहीं कि आप सवा लाख या पाँच लाख जप करेंगे और आपकी अवस्था वैसी हो जाएगी। वे साफ कहते हैं कि हम भी YouTube पर वीडियो बनाकर डाल सकते हैं कि पाँच लाख जप किए और ऐसा हो गया — पर मानिए, पाँच लाख जप के बाद एक पत्ता भी नहीं हिलता। यह इतना आसान नहीं है।

12

पहली साधना वास्तव में क्या करती है?

सामर्थ्य और निकलने का रास्ता, और पुराने पाप का धुलना

· 09:36–10:00 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि आपके सारे कष्ट खत्म नहीं होंगे, पर आपको सामर्थ्य दी जाएगी। उनका साथ मिलेगा; वे वह रास्ता निकालेंगे जिससे आप उन सब चीजों से छूट सकें। और अभी जब आप अपनी पहली साधना करते हैं, तो पहले के पाप धुलेंगे — वे पूछते हैं, तो अवधूत अवस्था आपको कहाँ से मिल जाएगी?

वक्ता कहते हैं, नहीं, पर आपको सामर्थ्य दी जाएगी। उनका साथ मिलेगा। वे रास्ता निकालेंगे — कि आप उन सब चीजों से कैसे बाहर आएँ। तो अभी जब आप अपनी पहली साधना करते हैं, तो पहले के पाप धुलेंगे। वे पूछते हैं, अवधूत अवस्था आपको कहाँ से मिल जाएगी?

13

दामोदर बीजाक्षर के भीतर कौन विराजमान है?

बीजाक्षर में अग्नि, ब्रह्म और अंग की मात्राएँ और अनघा लक्ष्मी

· 10:01–10:39 · Also a question

दामोदर भगवान नारायण का पालनहारक स्वरूप है, और उस स्वरूप में अग्नि की मात्रा, ब्रह्म की मात्रा और अंग की मात्रा में साक्षात भगवती जगदंबा अनघा लक्ष्मी बीजाक्षर में विराजमान होती हैं। वे पालनहार हैं, श्री के कर्ता, श्री से युक्त; श्री के भीतर अग्नि देने के लिए अग्नि बीज है; "र" की ध्वनि रुद्र रूप में है; और ऊपर अंग के रूप में "अ" की ध्वनि, "म" की ध्वनि या "ग" की ध्वनि है, जिसमें भी आपको जप करना हो।

14

भगवान दत्त के दामोदर एकाक्षरी मंत्र में किसकी कृपा मिलती है?

दामोदर मंत्र में नारायण, अनघा लक्ष्मी, श्री रुद्र और अग्नि देवता का आवाहन

· 10:40–10:58 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि उसमें आपको चार प्रमुख देवताओं की कृपा मिलेगी — नारायण, भगवती अनघा लक्ष्मी, भगवान श्री रुद्र और अग्नि देवता। और इसमें आप जो भी संकल्प लेंगे, वही पूरा होगा।

वक्ता कहते हैं कि उसमें आपको चार प्रमुख देवताओं की कृपा प्राप्त होगी: नारायण, भगवती अनघा लक्ष्मी, भगवान श्री रुद्र और अग्नि देवता। और इसमें आप जो भी संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेंगे, उसी की पूर्ति होगी।

15

अगर दत्त को गुरु माना जाए, तो क्या गुरु अवधूत अवस्था में ले जाएँगे?

गुरु आपके जीवन में वही घटनाएँ घटाते हैं जो घटनी चाहिए

· 10:59–11:17 · Also a question

अगर आपने उन्हें गुरु रूप में लिया है — तो गुरु क्या है? वक्ता कहते हैं कि गुरु आपको अवधूत अवस्था में नहीं ले जा रहे। आपके जीवन में जो घटनाएँ समाहित होनी हैं, जो कुछ होना है, गुरु वही करवाएँगे। इसलिए वे कहते हैं, अगर आपका कोई गुरु नहीं है, तो निश्चिंत होकर भगवान दत्त की एकाक्षरी साधना कीजिए।

आपने उन्हें गुरु रूप में लिया है — तो गुरु क्या है? गुरु आपको अवधूत अवस्था में नहीं ले जा रहे। जो उचित है, आपके जीवन में जो घटनाएँ समाहित होनी हैं, जो कुछ होना है, गुरु वही करवाएँगे। इसलिए निश्चिंत होकर भगवान दत्त की एकाक्षरी साधना कीजिए — अगर आपका कोई गुरु नहीं है।

16

बिल्कुल नए साधक को शुरू में कितना करना चाहिए?

दीक्षा विधान के बाद 27 या 11 माला, साथ में वज्र कवच का एक पाठ

· 11:18–11:49 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं कि मंत्र छोटा है तो आप एक ही दिन में पाँच सौ जप कर लें। शुरू में थोड़ा कम कीजिए। नए साधकों को अभी माला फेरना नहीं आता, और उन्होंने पहले कोई विशेष साधना नहीं की — इसलिए दीक्षा विधान करने के बाद जितना हो सके उतना कीजिए: 27 माला या 11 माला। इसके साथ भगवान दत्तात्रेय के वज्र कवच का एक पाठ कीजिए, जो उस दिन अपलोड हुआ था; ज्यादा पाठ की जरूरत नहीं, एक पाठ काफी है।

17

लगभग एक महीने की दत्त साधना के बाद क्या होता है?

रास्ता अपने आप खुलना, और दत्त का गुरु रूप में स्वप्न में आना

· 11:50–12:16 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि एक महीना बीतते-बीतते आपके लिए रास्ता खुलने लगेगा कि साधना में आगे कैसे बढ़ें — आपको अपने आप पता चलने लगेगा कि ऐसा करना चाहिए। वे चैनल के साधकों का उदाहरण देते हैं, मेघनाथ जी और अंधकासुर का नाम लेते हुए, जिनमें से किसी का यह अनुभव था: भगवान दत्त की साधना करते हुए दत्त स्वप्न में साक्षात दिखे और मार्गदर्शन दिया कि तुम्हारी यह साधना पूरी हुई, अब आगे का काम इस तरह करो।

18

क्या अवधूत अवस्था अपने आप में भागने वाली चीज है?

अगर आए भी, तो वह दिव्य है और पूरे कुल को तार देती है

· 12:17–12:45 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह अपने आप में एक दिव्य साधना है, और आपको कहीं से परेशान नहीं होना कि आपके साथ कुछ अनहोनी होगी। और अगर किसी को अवधूत अवस्था मिल भी जाए, तो वह अपने आप में दिव्य और चमत्कारी है। वे पूछते हैं कि लोग इससे भाग क्यों रहे हैं, और इस चीज को डरावना क्यों बनाया जा रहा है? यह सोचने की बात है कि लोग इससे क्यों डरते हैं। अवधूत बनना इतनी आसान बात नहीं, और अगर हो भी जाए, तो अपने आप में दिव्य है — आप अपने पूरे कुल को तार देंगे।

19

वज्र कवच का कौन सा श्लोक दत्त की बदलती अवस्थाओं का वर्णन करता है?

"कदा योगी कदा भोगी कदा नग्न पिशाच वत"

· 12:46–13:20 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि वज्र कवच के पाठ में आपको भगवान दत्त के बारे में लिखा एक श्लोक मिलेगा: "कदा योगी कदा भोगी कदा नग्न पिशाच वत" — कभी वे योगी हैं, कभी भोगी, और कभी पिशाचों की तरह दिगंबर अवस्था में घूमते हैं। यह ठीक इसीलिए लिखा गया है कि आप यह भूल न करें कि वे केवल अवधूत अवस्था में रहते हैं; भक्त उन्हें जिस रूप में, जिस मनचाहे उद्देश्य के लिए बुलाता है, वे वही पूरा करते हैं।

20

भगवान दत्त ने ऋषि पारनाद को क्या वचन दिया?

जिस भाव और उद्देश्य से बुलाया जाए, उसी की पूर्ति

· 13:21–13:48 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि वज्र कवच में ही आप पढ़ेंगे कि जब ऋषि पारनाद ने उन्हें बुलाया, तो उन्होंने कहा कि जिस भाव से, जिस उद्देश्य से मुझे बुलाओगे, मैं उसी उद्देश्य की पूर्ति करूँगा। वे पूछते हैं कि जब वे खुद यह कह रहे हैं, तो आपको यह डर क्यों है? इसलिए डरना छोड़ दीजिए।

21

नया साधक जप की संख्या कैसे बढ़ाए?

पहले अभ्यास, मनोबल मजबूत, फिर धीरे-धीरे माला बढ़ाना

· 13:49–14:20 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि बहुत ज्यादा जप मत कीजिए। अगर आप नए हैं, तो पहले अभ्यास कीजिए। कवच का पाठ कीजिए। अपना मनोबल मजबूत कीजिए। थोड़ा कम जप कीजिए — बस 11 माला कीजिए। जैसे-जैसे माला पर आपका हाथ जमे, माला फेरने का तरीका आए, ध्यान टिकने लगे, और प्रभु के स्वरूप में आपका मनोबल बढ़े और समर्पण व श्रद्धा का भाव आने लगे, वैसे-वैसे धीरे-धीरे अपनी क्षमता बढ़ाइए और माला जप बढ़ाइए। आपके शरीर पर सकारात्मक असर पड़ेगा।

22

लंबे समय बैठने के बाद पुरुष साधकों को स्वप्न दोष क्यों होता है?

पतला आसन, मूलाधार पर दबाव, और बैठने के तरीके की जानकारी न होना

· 14:21–15:06 · Also a question

वक्ता यह चेतावनी देकर कि कुछ श्रोताओं को ये शब्द बुरे लगेंगे, कहते हैं कि यह खासकर लड़कों के साथ होता है — कि स्वप्न दोष हो जाता है। कारण वे यह बताते हैं कि आपको बैठने का अभ्यास नहीं है। आप साधना के लिए बैठ गए, आसन बिछा लिया, पर आपको यह जानकारी नहीं कि आसन कैसा होना चाहिए: कुश आसन नहीं है, कंबल का आसन बहुत पतला है और पूरी तरह जमीन से छू रहा है। मूलाधार उस जगह माना जाता है जहाँ सबसे नीचे रीढ़ की हड्डी खत्म होती है, और लंबे समय बैठने से उस पर दबाव पड़ता है।

23

एक ही आसन में एक-दो घंटे बैठने से नस दबती है और सूजन आती है।

नस पर दबाव, सूजन, और छोड़ दिए गए प्राणायाम व सूर्य नमस्कार

· 15:07–15:35

वक्ता कहते हैं कि आम तौर पर आप चलते-फिरते रहते हैं, पर जब आप एक ही जगह एक ही मुद्रा में कम से कम आधा घंटा, एक घंटा, दो घंटे बैठते हैं, तो वहाँ की नस पर दबाव पड़ता है; नस पर दबाव पड़ने से उसमें कहीं सूजन आती है, और फिर आपको परेशानी होती है। इसी के लिए प्राणायाम करने को कहा गया था। इसी के लिए सूर्य नमस्कार करने को कहा गया था। पर यह सब करना नहीं है — हमें सीधे जप करना है, और कुछ नहीं — तो वे कहते हैं, यह स्थिति आपके साथ थोड़ी तो बनेगी ही।

24

क्या साधक केवल इच्छाशक्ति से प्रकृति को जीत सकता है?

प्रकृति के विरुद्ध नागा साधुओं का लगातार अभ्यास

· 15:36–16:06 · Also a question

वक्ता पूछते हैं कि अगर उसे इतने समय तक दबाया जाएगा, तो वह जाएगा कहाँ — आप प्रकृति से जीत नहीं सकते। वे कहते हैं कि नागा साधुओं की अवस्था पढ़िए, जानिए या देखिए: वे किस तरह प्रकृति के उलटे चलने की कोशिश करते हैं, कैसे अभ्यास करते हैं, उनकी अवस्था क्या है, किस तरह हठयोग में जाकर वे सब करते हैं — तभी वे उस पर विजय पाते हैं। अगर वे अपना अभ्यास छोड़ दें, तो वे पहले जैसे हो जाएँगे; उनके शरीर की स्थिति पहले जैसी हो जाएगी।

25

क्या गृहस्थ साधक को दूसरों के बुरे अनुभवों से डरना चाहिए?

आपको नागा साधु नहीं बनना — न भागिए, न डरिए

· 16:07–16:40 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि आपको नागा साधु नहीं बनना है — आपको साधना करके भौतिक चीजें पानी हैं। वे कहते हैं कि धन चाहिए, और धन खर्च करने के लिए अप्सराएँ भी; सारी कामनाएँ तो हैं ही। तो निश्चिंत होकर कीजिए, पर किसी व्यक्ति का यह अनुभव सुनकर इस तरह भागिए या डरिए मत कि उसने किसी मंत्र का जप किया और उसके साथ ऐसी अवस्था बनी, कि कोई डाकिनी आकर सीधे उसका भोग लेने लगी। वह अवस्था अलग बात है।

26

शुरुआत की कठिनाई शरीर की अपनी स्थिति में दखल होने से आती है।

शरीर पर पहले से मौजूद नकारात्मक ऊर्जा का साफ होना

· 16:41–17:10

वक्ता कहते हैं कि उसके पीछे बहुत कुछ होगा, और वह व्यक्ति आपको पूरी बात शायद ही बताएगा। शरीर की स्थिति उसकी अपनी प्राकृतिक चीज है; अगर उसमें दखल होता है, तो अभ्यास करने पर शुरू में कठिनाई होगी। दूसरी बात, वे कहते हैं, तंत्र का विषय है: तंत्र का विषय वहाँ आता है जहाँ शरीर पर पहले से कोई नकारात्मक ऊर्जा, कोई नकारात्मक तत्व हो। ऐसे समय में भी ये सब चीजें होती हैं, ताकि आप साधना पूरी न कर पाएँ — आपको शुद्ध करने का प्रयास हो रहा होता है।

27

साधना में शरीर की परेशानी बार-बार हो तो उपाय क्या है?

कवच, सोने से पहले तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम, और हल्का भोजन

· 17:11–17:40 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इसी के लिए कवच होता है: कवच कीजिए ताकि शरीर की रक्षा हो। अगर यह कठिनाई बार-बार हो रही है, तो सोने से पहले रात्रि सूक्तम् का पाठ कीजिए — तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम का पाठ कीजिए, उससे रक्षा होगी। भारी भोजन मत कीजिए। गरम भोजन मत कीजिए; बहुत गरम भोजन नहीं करना चाहिए।

वक्ता कहते हैं कि इसके लिए कवच है। कवच करके कीजिए, ताकि शरीर की रक्षा हो। अगर यह कठिनाई बार-बार हो रही है, तो सोने से पहले रात्रि सूक्तम् का पाठ कीजिए। तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम का पाठ कीजिए; उससे रक्षा होगी। भारी भोजन मत कीजिए। गरम भोजन मत कीजिए। बहुत गरम भोजन नहीं करना चाहिए।

28

एक संत के गुरु ने उसकी टूटती साधना का कारण क्या बताया?

गुरु का कहना कि भोजन किसके हाथ से आता है, उसे बदलो

· 17:41–18:15 · Also a question

वक्ता एक संत का प्रसंग पढ़कर बताते हैं, जिनके साथ यह स्थिति बार-बार होती थी। संत ने अपने गुरु से पूछा: मैं कभी कोई कामुक चिंतन नहीं करता, न गलत साहित्य पढ़ता, न ऐसे चलचित्र देखता, मैंने सब छोड़ दिया है और मन में ऐसा कोई भाव नहीं आता, फिर भी मेरी साधना बार-बार टूट रही है — यह कैसे हो रहा है और इसके पीछे कारण क्या है? गुरु ने पूछा कि तुम भोजन कैसे और कहाँ से करते हो। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति बनाता है और वे उसके हाथ से खाते हैं। गुरु ने कहा: बस वही बदल दो, उसके हाथ का भोजन मत करो।

29

अच्छे साधक स्वपाकी क्यों होते हैं — अपना भोजन खुद क्यों बनाते हैं?

अन्न किसके पैसे का है, और बनाने वाले के मन की स्थिति

· 18:16–18:50 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यही कारण है कि अच्छे साधक स्वपाकी होते हैं और अपने हाथ से भोजन बनाकर खाते हैं। जो अन्न पक रहा है — वह अन्न किसके पैसे का है, उस व्यक्ति ने वह पैसा कैसे कमाया, इससे परेशानी आएगी; उसका असर भी खाने वाले पर पड़ेगा, क्योंकि जैसा अन्न वैसा मन। दूसरी बात, अपने हाथ से भोजन बनाते समय उस व्यक्ति के मन में क्या भाव था।

30

बाहरी व्यक्ति का बनाया भोजन खाने का क्या असर होता है?

बनाने वाले की सोच भोजन के जरिए शरीर में पहुँचना

· 18:51–19:22 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जब आप किसी बाहरी व्यक्ति के हाथ का भोजन करते हैं — किसी ऐसे व्यक्ति से खाते हैं, या घर में दूसरे सदस्य हैं और उनके हाथ से खाते हैं — तो अगर उस समय उनकी सोच उस तरह चल रही थी, और उसी सोच की अवस्था में उन्होंने भोजन बनाया, तो उसका असर शरीर पर पड़ता है।

पर जब आप किसी बाहरी व्यक्ति के हाथ का भोजन करते हैं — किसी ऐसे व्यक्ति से खाते हैं, या घर में दूसरे सदस्य हैं और उनके हाथ से खाते हैं — तो अगर उस समय उनकी सोच उस तरह चल रही थी, और उसी सोच की अवस्था में उन्होंने भोजन बनाया, खाना बनाया, तो उसका असर शरीर पर पड़ता है।

31

जो साधक अपना भोजन खुद नहीं बना सकता, वह क्या करे?

भोजन पहले अपने इष्ट को अर्पित करने से वह दोषमुक्त होता है

· 19:23–19:40 · Also a question

अब आप कहेंगे, भाई, तो क्या साधना में भोजन करना छोड़ दें — कैसे चलेगा, हम खुद नहीं बना सकते। वक्ता कहते हैं कि कोई कठिनाई नहीं, अपना भोजन कीजिए। जब भोजन आपके पास आए, तो पहले वह भोजन अपने आराध्य को, अपने इष्ट को अर्पित कीजिए और उसके बाद खाइए: वह दोषमुक्त हो जाएगा। इतना तो आप कर ही सकते हैं। और अगर इसके बाद भी शरीर पर असर पड़े, तो बैठने से शरीर में आई कमजोरी को मजबूत कीजिए — थोड़ा अभ्यास कीजिए और आप इससे पार हो जाएँगे।

32

क्या हर समस्या को तंत्र से जोड़ना चाहिए?

वक्ता का हर चीज को तंत्र से जोड़ने का समर्थन न करना

· 19:41–20:15 · Also a question

वक्ता साफ कहते हैं कि अगर आप सोचेंगे कि हर चीज तंत्र है, हर चीज शरीर पर पड़ रहा नकारात्मक असर है, कि यह चीज केवल मंत्र से ठीक होगी, केवल किसी तांत्रिक प्रयोग से ठीक होगी — तो यह आपकी मूर्खता है, यह अंधविश्वास है। वे कहते हैं कि वे हर बार इस चीज का समर्थन नहीं कर सकते। कारण यह है कि आप हर चीज को घुमा-फिराकर तंत्र से जोड़ रहे हैं।

33

क्या कोई नकारात्मक शक्ति इस मंत्र का जप ले जा सकती है?

अग्नि बीज, और प्रेत-पिशाच का वायव्य स्वभाव

· 20:16–20:50 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि महिलाएँ भी घबरा जाती हैं कि कहीं कोई नकारात्मक शक्ति आकर्षित होकर न आ गई हो। ध्यान रखिए: इस मंत्र के जप में किसी नकारात्मक शक्ति में उसे लेने की सामर्थ्य नहीं है। कारण यह है कि इसमें अग्नि बीज है। जहाँ अग्नि बीज होगा, जहाँ अग्नि की मात्रा होगी, वहाँ वायव्य शक्तियाँ — यानी प्रेत और पिशाच, जो वायव्य रूप के, वायु स्वभाव के होते हैं — अग्नि तत्व युक्त मंत्र का जप ग्रहण करने की सामर्थ्य नहीं रखतीं।

34

नकारात्मक स्थानों में वीर साधकों को क्या कठिनाई आती है?

अपने ही स्थान पर जप ले जाने में सक्षम पैशाचिक शक्तियाँ

· 20:51–21:40 · Also a question

वक्ता कहते हैं, मान लीजिए किसी नकारात्मक स्थान पर साधना करनी हो — वीर साधनाएँ, जिनमें उच्च कोटि के साधक नकारात्मक स्थानों पर जाते हैं। उनकी इच्छा लोक कल्याण की होती है, या बहुत से साधक अपने लिए भी करते हैं कि हम जाकर किसी उच्च कोटि के वीर को सिद्ध करेंगे; और उसका पूरा तांत्रिक विषय ऐसा होता है कि वे किसी खंडहर में, गुफा में, जंगल में जाकर मंत्र जप करेंगे। वहाँ जाकर उन्हें पता चलता है कि जगह देखने में बहुत अच्छी है, पर यहाँ पैशाचिक शक्तियाँ रहती हैं, और वे मेरा मंत्र जप ले सकती हैं।

35

साधना के लिए नकारात्मक स्थान को कैसे साफ किया जाता है?

अग्नि बीज का जप, या गायत्री या सिद्ध कवच के साथ संपुट

· 21:41–22:18 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि ऐसी स्थिति में वे साधक अग्नि बीज का आधिकारिक मात्रा में जप करते हैं। या वे अग्नि बीज को गायत्री मंत्र में संपुट लगाकर जप करते हैं। इससे वहाँ इतनी अधिक अग्नि तत्व की मात्रा उत्पन्न होती है कि प्रेत और पिशाच अपने आप हट जाते हैं। या वे अपने आराध्य का वह कवच लेते हैं जिसे उन्होंने गुरु की आज्ञा से सिद्ध किया है, और उसमें अग्नि बीज का संपुट लगाते हैं।

36

मंत्र संपुट किसी स्थान का वातावरण कैसे बदलता है?

मुख में बसी मंत्र ऊर्जा से वातावरण में अग्नि तत्व भरना

· 22:19–22:50 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि ऐसी ऊर्जा उत्पन्न होती है। ऊर्जा क्या है? वह आपके अपने मुख में है — मंत्र ऊर्जा है। तो मंत्र का उच्चारण इस तरह, संपुट लगाकर किया जाता है कि उस स्थान का वातावरण एक तय समय के लिए अग्नि तत्व से युक्त हो जाए। और उसके बाद अपनी शक्ति और सामर्थ्य से वे जिसका आवाहन करना हो उसका आवाहन करते हैं, जिस मंत्र का जप करना हो वह करते हैं, उन्हें अर्पित करते हैं, सिद्ध करते हैं, उनका वचन लेते हैं, और लौट आते हैं।

37

दत्त जप के दौरान मन की शांति के लिए क्या पाठ किया जा सकता है?

भगवान दत्त के बारह नाम

· 22:51–23:14 · Also a question

इसलिए खासकर इस मंत्र के जप में यह मत सोचिए कि कोई नकारात्मक शक्ति है और हम कहीं जप करेंगे तो वह ले जाएगी। फिर भी अपने मन की तसल्ली के लिए आप भगवान दत्त के बारह नामों का उच्चारण कर सकते हैं, जो चैनल पर पहले ही दिए जा चुके हैं। पूरा श्लोक न पढ़ें तो कोई कठिनाई नहीं — पूरा श्लोक पढ़ने की बिल्कुल जरूरत नहीं; बस जो बारह नाम दिए गए हैं, उनका पाठ कीजिए।

38

सामान्य साधक को दत्तात्रेय वज्र कवच का कितना भाग करना चाहिए?

मूल कवच के ऊपर का केवल विनियोग और न्यास, माला मंत्र नहीं

· 23:15–23:43 · Also a question

दत्तात्रेय कवच, जो वज्र कवच है, उसमें ऊपर से नीचे तक पूरी कथा के साथ मूल कवच है — वह कवच कैसे प्राप्त हुआ, उसका विनियोग कैसे होता है, आदि। जहाँ से मूल कवच शुरू होता है, उसके ऊपर जितना विनियोग और न्यास है, केवल उतना कीजिए। माला मंत्र का विनियोग और न्यास अलग है; माला मंत्र पिछले साल दिया गया था, और उसे करने की जरूरत नहीं — इसमें वह बहुत लंबा हो जाएगा। सामान्य साधक को इतना नहीं करना चाहिए: केवल मूल कवच का पाठ कीजिए, वही बहुत है।

39

बगलामुखी शतनाम का संकल्प पूरा क्यों नहीं हो पाता?

कोई अधूरी मन्नत, या जन्म कुंडली में चल रही दशा

· 23:55–24:32 · Also a question

VK 1209 के यह पूछने पर कि माँ बगलामुखी के शतनाम का संकल्प दो बार पूरा क्यों नहीं हुआ, वक्ता कहते हैं कि इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि आपकी कोई मन्नत हो जिसे आप पूरा नहीं कर रहे — किसी देवी-देवता की कोई बात जिसे आप भूल गए हैं; उसे पूरा कीजिए तो संकल्प भी पूरा होगा। दूसरा यह कि आपकी जन्म कुंडली के अनुसार कौन सी अंतरदशा चल रही है: खासकर अगर शनि भगवान की चल रही है, तो साधना के क्षेत्र में आप बहुत धीरे आगे बढ़ेंगे।

40

भगवान दत्त के लिए दीपदान कैसे किया जाता है?

उनके नाम पर सोलह दीपक

· 24:33–25:08 · Also a question

भगवान दत्त के लिए दीपदान की विधि बताने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि समय बहुत कम है, पर अब तक मिली जानकारी के अनुसार भगवान दत्त के लिए 16 दीपकों का दीपदान करना चाहिए। वे कहते हैं कि यह उन्हें एक बहुत अच्छे साधक से पता चला, जो खुद भगवान दत्त की साधना करते हैं और जिनकी कुल परंपरा पर भगवान दत्तात्रेय की बहुत विशेष कृपा है।

41

शत्रुओं के बार-बार किए श्मशानिक तंत्र में बगलामुखी शतनाम कैसे मदद करता है?

रक्षा के संकल्प के साथ अपामार्ग की लकड़ी पर 108 नामों की आहुति

· 25:09–25:40 · Also a question

हरीश जी पूछते हैं कि जब शत्रु बार-बार तंत्र करते हैं और मामला श्मशान का है, तो माँ बगलामुखी के शतनाम की मदद से इसे कैसे ठीक किया जाए। वक्ता कहते हैं कि पहले एक बार शतनाम साधना पूरी कीजिए। फिर पिछले दिन के लाइव में बताई गई अपामार्ग की लकड़ी पर हवन विधि से, अगर आप भगवती बगला के 108 नामों की आहुति इस संकल्प के साथ देना शुरू करें कि श्मशानिक तंत्र, विचार कर्म और कृत्या प्रयोग नष्ट हों और हमारी रक्षा हो, तो वह काम पूरा होगा।

42

क्या एकाक्षरी या माला मंत्र का एक दिन का विधान किया जा सकता है?

कर माला से एक दिन का विधान, फिर रोज कम से कम एक माला

· 25:41–26:17 · Also a question

टीटू जी पूछते हैं कि क्या भगवान दत्तात्रेय के एकाक्षरी बीज मंत्र का जप, या दत्त माला मंत्र का जप करके उसका एक दिन का विधान किया जा सकता है, और क्या कर-माला से जप किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं, और एक दिन का भी कर सकते हैं। पर एक दिन का विधान करने के बाद अगले दिन से कम से कम एक-एक माला जप कीजिए — एकाक्षर की एक माला जप कीजिए, और माला मंत्र का कम से कम पाँच बार पाठ जरूर कीजिए।

43

क्या सदाशिव को परमेष्ठी गुरु मानते हुए गुरु दत्त को परम गुरु माना जा सकता है?

जरूरी नहीं, पर अनुमति है

· 26:18–26:36 · Also a question

अवधेश जी पूछते हैं कि भगवान सदाशिव को परमेष्ठी गुरु मानने के बाद क्या वे गुरु दत्त को परम गुरु, या प्राप्तपर गुरु के रूप में मान सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है, पर फिर भी आप ऐसा कर सकते हैं।

अवधेश जी लिखते हैं कि उन्होंने भगवान सदाशिव को अपना परमेष्ठी गुरु माना है, और पूछते हैं कि क्या वे गुरु दत्त को परम गुरु, प्राप्तपर गुरु के रूप में मान सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है। फिर भी आप ऐसा कर सकते हैं।

44

क्या पाँच लाख पूरे करने के लिए सवा लाख का अनुष्ठान चार बार किया जा सकता है?

बड़े अनुष्ठान को छोटे-छोटे दोहराए अनुष्ठानों में बाँटना

· 26:51–27:15 · Also a question

राहुल चौधरी जी पूछते हैं कि क्या पाँच लाख मंत्र पूरे करने के लिए मंत्र का सवा लाख का अनुष्ठान चार बार किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं। एक बार में न हो तो चार बार में कर सकते हैं। अगर आपकी इच्छा हो, और सवा लाख भी न कर पाएँ, तो एक-एक लाख करके पाँच बार में कीजिए। जितनी बार में संभव हो, कर सकते हैं; कोई कठिनाई नहीं। बड़ा अनुष्ठान न कर पाएँ तो छोटे-छोटे करके पूरा कीजिए।

45

बटुक भैरव का पूरा वर्णन किन पुराणों में मिलता है?

ब्रह्मवर्त पुराण और स्कंद पुराण

· 27:51–28:17 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि बटुक भैरव का पूरा वर्णन किस पुराण में पढ़ने को मिलेगा, वक्ता कहते हैं कि पुराणों में आपको अलग-अलग जगह अलग-अलग वर्णन मिलेंगे। फिर भी अगर आप इन दोनों का अध्ययन करें — ब्रह्मवर्त पुराण और दूसरा स्कंद पुराण — तो आपको पढ़ने को मिल जाएगा।

यह पूछे जाने पर कि बटुक भैरव का पूरा वर्णन किस पुराण में पढ़ने को मिलेगा, वक्ता कहते हैं कि वैसे तो पुराणों में आपको अलग-अलग वर्णन मिलेंगे। फिर भी: ब्रह्मवर्त पुराण लीजिए, और दूसरा स्कंद पुराण। अगर आप इन दोनों का अध्ययन करें, इन दोनों का अध्ययन कर लें, तो आपको पढ़ने को मिल जाएगा।

46

बटुक स्वरूप प्रकट ही क्यों हुआ?

राक्षस आपद और बालक के हाथों मृत्यु का उसका वरदान

· 28:18–29:01 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि आपदा नाम के राक्षस के अंत के लिए — आपद ही उस राक्षस का नाम था। उसने भगवान ब्रह्मा जी से यह वरदान माँगा था कि उसकी मृत्यु किसी बालक के हाथों हो। ऐसी स्थिति में देवताओं ने भगवान सदाशिव की आराधना की, भगवती की आराधना की, और इस स्वरूप की कामना की: कि आप कोई ऐसा स्वरूप प्रकट करें।

47

क्या साधना के दौरान देव नदी पार करने से दोष लगता है?

नदियाँ लाँघने से मंत्र बल का खत्म होना

· 29:02–29:30 · Also a question

एक श्रोता, जो रोज ऑफिस जाने के लिए गंगा पार करते हैं, पूछते हैं कि क्या समुद्र लाँघने की तरह देव नदियों को पार करने से भी दोष लगता है। वक्ता कहते हैं कि यह संभव नहीं है, और देव नदियाँ पार करने का दोष कब लगता है, यह मंत्र पर निर्भर है। तंत्र के कुछ ग्रंथों में इसका वर्णन मिलता है: साधना के समय नदियाँ पार नहीं करनी चाहिए। नदियाँ लाँघने से मंत्र बल खत्म हो जाता है। यहाँ तक माना गया है कि अगर कोई नाला बह रहा हो, तो उसमें पैर रखकर पार जाना चाहिए।

48

जिसे रोज गंगा पार करनी पड़ती है, उसका उपाय क्या है?

भगवती गंगा के 108 नामों का रोज एक पाठ

· 29:31–30:04 · Also a question

वक्ता अमित कुमार जी से कहते हैं कि अगर ऐसा दोष लग भी रहा हो, तो उस स्थिति में, अगर आपको भगवती गंगा के ऊपर से पार जाना है, आप साधना कर रहे हैं और ऑफिस जाना है, तो रोज एक बार भगवती गंगा के 108 नामों का पाठ कीजिए — दो मिनट लगेंगे — यह कहते हुए कि आपको जो दोष लगा है, उससे आप मुक्त हों।

49

बटुक भैरव की रोज की और विशेष दिन की पूजा कैसे करें?

रोज की पूजा सामान्य देवताओं की तरह; पूरा विधान चैनल पर है

· 30:05–30:31 · Also a question

अंकुर जी पूछते हैं कि बटुक भैरव की रोज की सामान्य पूजा कैसे करें, और अष्टमी, उनकी जन्म जयंती या उनके किसी और विशेष दिन की विशेष पूजा कैसे करें। वक्ता कहते हैं कि रोज की पूजा वैसे ही करनी चाहिए जैसे सामान्य देवी-देवताओं की होती है। और उनका पूजन का पूरा विधान चैनल पर उपलब्ध है, जिसमें सब बताया गया है — उन्हें क्या भोग लगाना है, कैसे और क्या करना है; आप उसी विधान से कर सकते हैं।

50

दत्तात्रेय के द्वादश नाम स्तोत्र का कौन सा भाग सबसे अधिक पढ़ना चाहिए?

मूल स्तोत्र, फलश्रुति जानकारी के लिए दी गई है

· 30:32–30:47 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल: भगवान दत्तात्रेय के द्वादश नाम स्तोत्र में खासकर मूल स्तोत्र का ही अधिक पाठ करना है। बाकी — फलश्रुति आदि — आपकी जानकारी के लिए दी गई है।

वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल। भगवान दत्तात्रेय के बारह नामों वाले स्तोत्र में खासकर मूल स्तोत्र का ही अधिक पाठ करना है। बाकी, फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। आदि, आपकी जानकारी के लिए दी गई है।

51

क्या हनुमान चालीसा वाली हवन विधि दूसरी चालीसाओं से की जा सकती है?

दुर्गा चालीसा से हाँ; बटुक भैरव के लिए 108 नाम बेहतर

· 30:48–31:02 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि हनुमान चालीसा से बताया गया हवन क्या दुर्गा या बटुक भैरव चालीसा से भी किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि दुर्गा चालीसा से किया जा सकता है; बटुक भैरव के लिए अगर आप उनके 108 नामों से करें तो बेहतर होगा।

एक श्रोता हनुमान चालीसा से बताए गए हवन के बारे में पूछते हैं — कि क्या ऐसा हवन दुर्गा या बटुक भैरव चालीसा से भी किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि दुर्गा चालीसा से किया जा सकता है। जहाँ तक बटुक भैरव की बात है, अगर आप उनके 108 नामों से करें तो बेहतर होगा।

52

हर तिथि का व्रत किस देवता के लिए रखा जाता है?

पक्ष की हर तिथि का व्रत और उसके अधिष्ठाता देवता

· 31:03–32:00 · Also a question

प्रदोष व्रत और त्रयोदशी व्रत में अंतर, और क्या दोनों साथ रखे जा सकते हैं, यह पूछने वाले श्रोता से — जो पहले से अष्टमी, प्रदोष और पूर्णिमा रखते हैं — वक्ता पूछते हैं कि बाकी सब कहाँ छोड़ रहे हैं, और फिर उन्हें गिनाते हैं: प्रतिपदा भी रखिए, प्रजापति के लिए; द्वितीया चंद्र भगवान के लिए; तृतीया गौरी जी के लिए; चतुर्थी विनायक के लिए; पंचमी महादेव के लिए; षष्ठी छठी मैया के लिए, और स्कंदमाता, कात्यायनी और भगवान कार्तिकेय की पत्नी देवसेना के लिए; सप्तमी सूर्य भगवान के लिए; अष्टमी आप रखते ही हैं; नवमी दुर्गा जी के लिए; दशमी गंगा जी के लिए; एकादशी नारायण के लिए; द्वादशी और त्रयोदशी आप कर ही रहे हैं; चतुर्दशी काली जी के लिए; और पूर्णिमा तो है ही। वे जोड़ते हैं, खाना-पीना कुछ मत कीजिए।

53

क्या एक जीवन में इतने सारे व्रत रखने चाहिए?

कुंडली या इष्ट के अनुसार चुना एक व्रत, पूरी विधि से

· 32:01–32:38 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जीवन में इतने सारे व्रत-उपवास इस तरह नहीं किए जाते। अपनी कुंडली के अनुसार या अपने इष्ट-आराध्य के अनुसार कोई एक व्रत पूरे विधि-विधान से करना चाहिए। अगर आप महादेव को ही सब कुछ मानते हैं, तो उसके अनुसार केवल प्रदोष व्रत कीजिए। अगर आप दो व्रत रख रहे हैं, प्रदोष भी और त्रयोदशी भी, तो एक भी व्रत की पूर्णता कहाँ होगी? प्रदोष का पूरा नियम कहाँ निभेगा?

54

क्या दोनों पक्षों में एक ही व्रत रखना ठीक है?

एक व्रत निभाना, एक पक्ष में या दोनों में

· 32:39–33:16 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि कोई एक व्रत कीजिए। अगर आप अष्टमी रखते हैं, तो कौन सी — कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष? दोनों रखें, वह भी ठीक है। दोनों में प्रदोष कर रहे हैं, वह भी ठीक है। पर एक को साथ लेकर चलिए। जो एकादशी करते हैं, वे केवल एकादशी करते हैं, दोनों पक्षों की। अगर आप चतुर्थी कर रहे हैं, दोनों चतुर्थी या एक — वह ठीक है। पर अष्टमी, प्रदोष, त्रयोदशी और पूर्णिमा, चार-चार व्रत करके — तो बाकी तिथियों ने क्या गलती की है? उनके भी कीजिए, सबकी कृपा आपको मिलेगी।

55

क्या गुरु दत्तात्रेय के बारह नामों का पाठ जीवन भर किया जा सकता है?

नाम जप, जिसके लिए अनुमति नहीं चाहिए और चलते-फिरते हो सकता है

· 33:17–33:49 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या गुरु दत्तात्रेय के बारह नामों का पाठ जीवन भर किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है — आप इसे ठीक गुरु मंत्र की तरह कर सकते हैं। नाम जप करने में आपको कोई कठिनाई नहीं है। किसी भी देवी-देवता का नाम जप चलते-फिरते किया जा सकता है। बारह नाम कीजिए; आप बिल्कुल कर सकते हैं।

56

मकार की तुलना में गकार में क्या मिलता है?

गकार तंत्रोक्त हो जाता है, तंत्र सिद्धि के लिए प्रयोग

· 33:50–34:08 · Also a question

राजेश जी पूछते हैं: अगर मकार में भौतिक इच्छाएँ पूरी होती हैं, तो गकार में क्या होता है? वक्ता कहते हैं, देखिए, गकार तंत्रोक्त हो जाता है। तंत्र सिद्धि के लिए हम गकार में जाते हैं। वैसे तंत्र सिद्धि दोनों में है — गकार में वह एक तरह की हो जाती है, मकार में दूसरी तरह की।

57

क्या कर्म काटने के लिए जयंती पर बारह नामों का एक दिन का जप किया जा सकता है?

कर्म के लिए बारह नामों का एक दिन का अनुष्ठान

· 34:09–34:22 · Also a question

एक श्रोता, जिनके एक भौतिक गुरु हैं, पूछते हैं कि क्या वे अगले दिन, जयंती पर, अपने पूरे कर्म काटने के लिए एक दिन के अनुष्ठान के रूप में बारह नामों का जप पूरा कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं — जितना संभव हो उतना कीजिए।

58

क्या विनियोग के बिना किए जप के बाद विनियोग नए सिरे से किया जा सकता है?

बिना विनियोग तीन लाख पंचाक्षरी के बाद विनियोग फिर से करना

· 34:23–34:31 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने विनियोग आदि के बिना पंचाक्षरी का तीन लाख से अधिक जप किया है, और अब विनियोग के साथ नए सिरे से करना चाहते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल ऐसा कर सकते हैं।

एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने विनियोग आदि के बिना पंचाक्षरी का तीन लाख से अधिक जप किया, और अब वे इसे नए सिरे से, विनियोग के साथ करना चाहते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं।

59

दत्तात्रेय कलश स्थापना के बाद कलश कितने दिन रहना चाहिए?

पूरी साधना की अवधि तक कलश जैसा है वैसा रहे

· 34:32–34:58 · Also a question

रोहन जी, जिन्हें अगले दिन भगवान दत्तात्रेय के लिए कलश स्थापना करनी है, पूछते हैं कि पूजन के बाद कलश और नारियल का क्या करना है। वक्ता कहते हैं कि आपने कलश स्थापना की है — अब आप कितने दिन की साधना कर रहे हैं? अगर एक महीने की साधना कर रहे हैं, तो पूरे महीने कलश जैसा है वैसा रहने दीजिए। ठंड का मौसम है, तो कोई कठिनाई नहीं। आखिरी दिन, हवन आदि करने के बाद, उनका विसर्जन होता है।

60

एक दिन के अनुष्ठान का कलश किस दिन विसर्जित करना चाहिए?

गुरुवार को नहीं; धातु का कलश वापस लाएँ, नारियल विसर्जित करें

· 34:59–35:14 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर आप अगले दिन एक दिन का अनुष्ठान कर रहे हैं, तो ध्यान रखिए कि विसर्जन गुरुवार को नहीं करना चाहिए। उनका विसर्जन आप शुक्रवार को कर सकते हैं। अगर आपने किसी धातु का कलश रखा है, तो नदी में विसर्जन के बाद उसे अपने साथ वापस ले आइए। नारियल नदी में विसर्जित कीजिए।

वक्ता कहते हैं कि अगर आप अगले दिन एक दिन का अनुष्ठान कर रहे हैं, तो ध्यान रखिए कि विसर्जन गुरुवार को नहीं करना चाहिए। शुक्रवार को आप उनका विसर्जन कर सकते हैं। अगर आपने किसी धातु का कलश रखा है, तो नदी में विसर्जन के बाद उसे अपने साथ वापस ले आइए। नारियल नदी में विसर्जित कीजिए।

61

क्या सूर्यास्त के बाद हवन करने में दोष है, और क्या दिक्पाल बलि हमेशा जरूरी है?

तंत्रोक्त हवन में दोष नहीं; दस दिक्पाल बलि केवल पूरे विधान में

· 35:15–35:39 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या सूर्यास्त के बाद हवन करने से कोई दोष लगता है, और क्या हर हवन में दस दिक्पालों के निमित्त बलिदान अनिवार्य है, वक्ता कहते हैं कि दोष आदि की बात वैदिक हवन में है। अगर आप सामान्य तंत्रोक्त हवन आदि कर रहे हैं, तो उसमें कोई दोष नहीं, आप कर सकते हैं। और अगर आप दस दिग्पाल के निमित्त बलि सहित हवन का पूरा विधान कर रहे हैं, तो वह जरूरी है; अगर सामान्य हवन कर रहे हैं, तो हर बार जरूरी नहीं।

62

क्या इष्ट वाले कलश में ही दूसरे देवताओं की पूजा की जा सकती है?

इस दीक्षा विधान में दिखाया गया कलश पूजन, दोबारा काम आने वाले नमूने के रूप में

· 35:40–36:06 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या सांकेतिक साधना में इष्ट के अलावा दूसरे देवी-देवताओं का पूजन सामान्य रूप से कलश में ही किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। वे कहते हैं कि इस बार का दीक्षा विधान ठीक इसी कारण पूरी तरह कलश पर करके दिखाया गया है — ताकि उन वीडियो को काटकर अलग से बनाया जा सके और दिखाया जा सके कि कलश पूजन का तरीका यह है। उसमें आप सभी देवी-देवताओं की पूजा इसी तरह कर सकते हैं; ठीक वैसे ही कीजिए जैसे वहाँ बताया गया है।

63

जहाँ मंत्रों की हिंदी उपलब्ध नहीं, वहाँ भाव प्रधान हिंदी में लिखा जाएगा।

जहाँ मंत्रों की हिंदी न मिले, वहाँ भाव प्रधान हिंदी

· 36:07–36:20

वक्ता कहते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा की विधि हिंदी में भी करने का प्रयास है। बहुत से मंत्रों की हिंदी नहीं मिल रही — उनमें क्या और कैसे बोलना है। तो उनमें भी वे भाव प्रधान हिंदी में लिखकर पूरी चीज दिखाएँगे कि प्रतिष्ठा विधि कैसे की जाती है।

वक्ता कहते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा की विधि हिंदी में भी करने का प्रयास है। बहुत से मंत्रों की हिंदी नहीं मिल रही — कि उनमें कैसे और क्या बोलना है। तो उनमें भी भाव प्रधान हिंदी में लिखकर वे पूरी चीज दिखाएँगे: कि प्रतिष्ठा विधि कैसे की जाती है।

64

कुछ दत्त उपासक साधु नशीली चीजें लेते क्यों दिखते हैं?

अपनी अवस्था में संन्यासी, और पर्वतीय क्षेत्रों की दिव्य जड़ी-बूटियाँ

· 36:21–36:46 · Also a question

दत्त के अघोर स्वरूप पर प्रकाश डालने को कहे जाने पर, क्योंकि दत्त उपासक कई साधु उनकी उपासना में सिगरेट लेते देखे गए हैं, वक्ता कहते हैं कि प्रकाश डालने की जरूरत नहीं है। वे घर छोड़कर संन्यास आश्रम में चले गए हैं; उनकी अपनी अवस्था है। वे ध्यान टिकाने के लिए कहते हैं कि हम बूटी ले रहे हैं — वे उनकी चीजें हैं, और यह भी सच है कि वे उस तरह जड़ी-बूटियाँ लेते हैं। वे कहते हैं कि पर्वतों के क्षेत्र में, चाहे गिरनार हो, विंध्य क्षेत्र हो या हिमालय क्षेत्र, हर क्षेत्र में दिव्य औषधि, दिव्य जड़ी-बूटियाँ हैं।

65

जो चिलम और गांजा दिखता है, क्या वही साधु लेते हैं?

एक अलग विषय जिसे सांसारिक लोग नहीं समझ सकते

· 36:47–37:10 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि चिलम और गांजा अलग बात है; पर उससे ध्यान योग की प्राप्ति, उन जड़ी-बूटियों का सेवन, एक अलग माध्यम से लिया जाता है। आप सोच रहे हैं कि वे चिलम ले रहे हैं, पर वह अलग विषय है, वह चीज ही बिल्कुल अलग है। और सांसारिक लोग उन विषयों को नहीं समझ सकते — इसलिए उस पर चर्चा करना भी उचित नहीं। उन्हें तो बस यही लगेगा कि आदमी किसी तरह का नशा कर रहा है।

66

ऐसी जड़ी-बूटियाँ किन परिस्थितियों में दी जाती हैं?

हठयोग में, सामान्य अभ्यास से न मिलने वाली अवस्थाओं के लिए गुरु द्वारा

· 37:11–37:43 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जो बिना किसी नशे के कर सके, वह अलग विषय है; पर हठयोग में, और कुछ विशेष अवस्थाएँ पाने के लिए जो सामान्य अभ्यास से नहीं आ रहीं, तब वहाँ गुरु द्वारा उसका सेवन कराया जाता है। अब कौल परंपरा में और इन सब में, वे जोड़ते हैं, यह पूरा विषय कुछ अलग हो जाता है — और क्योंकि माताएँ-बहनें भी सुन रही हैं, वे इन विषयों से थोड़ा बचते हैं, और कभी और बताएँगे।

67

अगर कोई पहले से काल भैरव कवच का पाठ करता है, तो क्या दत्त पंजर कवच भी पढ़ना चाहिए?

कोई एक कवच — सब नहीं

· 37:54–38:05 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि काल भैरव कवच का पाठ करते हुए क्या दत्त पंजर कवच का भी पाठ करना चाहिए, वक्ता कहते हैं: कोई एक कवच कीजिए। सारे कवच करने की जरूरत नहीं है।

एक श्रोता कहते हैं कि वे काल भैरव कवच का पाठ करते हैं, और पूछते हैं कि क्या उन्हें दत्त पंजर कवच का भी पाठ करना चाहिए या नहीं। वक्ता कहते हैं कि कोई एक कवच कीजिए। सारे कवच करने की जरूरत नहीं है।

68

जिसका पहले से गुरु है, क्या उसे यह दीक्षा विधान करना चाहिए?

दीक्षा की जरूरत नहीं — पूजन और हवन खुले हैं

· 38:06–38:14 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या जिनके पहले से गुरु हैं, वे भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न करने के लिए यह दीक्षा विधान कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं कि दीक्षा विधान की जरूरत नहीं है। आप उनका पूजन कर सकते हैं, उनका हवन कर सकते हैं। दीक्षा की जरूरत नहीं है।

एक श्रोता पूछते हैं कि क्या जिनके पहले से गुरु हैं, वे भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न करने के लिए यह दीक्षा विधान कर सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि दीक्षा विधान की जरूरत नहीं है। आप उनका पूजन कर सकते हैं, उनका हवन कर सकते हैं। दीक्षा की जरूरत नहीं है।

69

दत्त पूर्णिमा की साधना कब से शुरू करनी है?

7 तारीख की सुबह से

· 38:15–38:33 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या दत्त पूर्णिमा की साधना अगली सुबह से ही करनी है, वक्ता पुष्टि करते हैं कि 7 तारीख से ही करनी है।

एक श्रोता पूछते हैं कि क्या दत्त पूर्णिमा की साधना अगली सुबह से ही करनी है। वक्ता उत्तर देते हैं, हाँ — 7 तारीख से ही करनी है।

70

मंगलवार की हनुमान पूजा में चालीसा और सुंदरकांड के अलावा क्या जोड़ा जा सकता है?

हनुमान सहस्रनाम और एक कवच जोड़ना

· 38:34–39:03 · Also a question

भक्ति जी पूछती हैं कि मंदिर में मंगलवार की हनुमान पूजा में चालीसा और सुंदरकांड के अलावा वे क्या जोड़ें। वक्ता कहते हैं, ऐसा कीजिए: हनुमान जी का सहस्रनाम जोड़िए, और एक कवच भी जोड़िए।

भक्ति जी लिखकर पूछती हैं कि मंदिर में वे जो चालीसा और सुंदरकांड करती हैं, उसके अलावा मंगलवार को हनुमान जी की पूजा में और क्या जोड़ें। वक्ता कहते हैं कि आप चालीसा और सुंदरकांड कर रही हैं और कुछ और जोड़ना चाहती हैं। तो ऐसा कीजिए: हनुमान जी का सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। जोड़िए, और एक कवच भी जोड़िए।

71

क्या साधना काल में दूसरे घर का भोजन किया जा सकता है?

अपने हाथ का बना भोजन, या सात्विक विचार रखने वाले हाथों का

· 39:04–39:19 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या साधना काल में किसी के घर का भोजन नहीं लेना चाहिए, वक्ता कहते हैं कि नहीं लेना चाहिए। भोजन के बारे में इतना होना चाहिए: कि भोजन खुद बनाया हो, या जो सात्विक विचार रखता हो उसके हाथ का हो — वह अधिक उचित है।

एक श्रोता पूछते हैं कि क्या साधना के समय किसी के घर का भोजन नहीं लेना चाहिए। वक्ता कहते हैं, देखिए, नहीं लेना चाहिए। भोजन के बारे में इतना होना चाहिए: कि भोजन खुद बनाकर खाया जाए, या जो सात्विक विचार रखता हो उसके हाथ का हो। वह अधिक उचित है।

72

जनेऊ के बाद बच्चों से किस उम्र से हवन कराया जा सकता है?

जनेऊ से सिखाना शुरू; 12 से 13 साल से खुद करना

· 39:20–39:46 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि जनेऊ के बाद बच्चों से कब से हवन कराया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि उन्हें सिखाना शुरू कीजिए। अगर आप उतना नियम मानते हैं तो अग्निहोत्र तो करना ही चाहिए; नहीं तो साप्ताहिक हवन या मासिक हवन में उन्हें साथ बैठाइए और अभ्यास कराइए, दिखाइए कि कैसे होता है। 12 से 13 साल के हो जाने के बाद आप उन्हें खुद करने की छूट दे सकते हैं।

73

दत्त साधना में रोज के पूजन का विधान क्या है?

चैनल पर दीक्षा विधान वाले वीडियो में पहले ही दिया गया

· 39:47–39:59 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि दत्त साधना में रोज के पूजन का विधान क्या है, वक्ता कहते हैं कि यह पहले ही बताया जा चुका है — चैनल पर दीक्षा विधान में एक वीडियो है कि रोज कैसे करना है। उसमें सामान्य बातें बताई गई हैं।

यह पूछे जाने पर कि दत्त साधना में रोज के पूजन का विधान क्या है, वक्ता कहते हैं कि यह पहले ही बताया जा चुका है। चैनल पर दीक्षा विधान में एक वीडियो है कि रोज कैसे करना है। उसमें सामान्य बातें बताई गई हैं।

74

क्या पिछले जन्म के भारी संचित कर्म काटने के लिए अनुष्ठान करना चाहिए?

जिस अनुष्ठान के लिए मंत्र दीक्षा मिली है, उसे करना

· 40:00–40:11 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि उन्हें बताया गया है कि पिछले जन्म में जमा हुए बहुत बुरे कर्म कष्ट लाने वाले हैं — कहने का मतलब, वे बिस्तर पर आ जाएँगे — और उन्हें काटने के लिए एक अनुष्ठान बताया गया है, जिसके लिए उन्हें मंत्र दीक्षा दी गई है। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल कीजिए।

एक श्रोता कहते हैं कि उन्हें बताया गया है कि उनके पिछले जन्म से बहुत सारे बुरे कर्म जमा हो गए हैं और कष्ट आने वाला है — कहने का मतलब, वे बिस्तर पर आ जाएँगे — और उन्हें काटने के लिए एक अनुष्ठान बताया गया है, जिसके लिए उन्हें मंत्र दीक्षा मिली है। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल कीजिए।

75

अगर हर बार अनुष्ठान करने पर शरीर में परेशानी हो तो क्या करना चाहिए?

पहले गुरु से अनुष्ठान करवाना, फिर खुद करना

· 40:12–40:43 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि जब वे दीक्षा में मिला नवार्ण अनुष्ठान करते हैं, तो शरीर में कोई न कोई परेशानी आ जाती है, और उपाय पूछते हैं। वक्ता कहते हैं, देखिए, अगर अनुष्ठान करने से परेशानी बहुत बढ़ रही है, तो सबसे पहले आपको साधकों के माध्यम से अपने गुरु जी को बताना चाहिए और पहले उनके माध्यम से अनुष्ठान करवाना चाहिए। उसके बाद खुद कीजिए।

76

दुर्गा के शतनाम का हवन कैसे किया जाता है?

घी और गुग्गुल से 108 नामों की आहुति

· 40:44–41:22 · Also a question

भगवती दुर्गा की कृपा पाने के लिए स्तोत्र नामों, शतनाम का हवन कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: जैसे किया जाता है, दुर्गेश जी — घी और गुग्गुल से उनके 108 नामों से आहुति कर सकते हैं। सामान्य संकल्प के साथ।

एक श्रोता पूछते हैं कि भगवती दुर्गा की कृपा पाने के लिए स्तोत्र नामों का, शतनाम का हवन कैसे करें। वक्ता कहते हैं, जैसे किया जाता है, दुर्गेश जी: घी और गुग्गुल से, उनके 108 नामों से आहुति कर सकते हैं। संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। के साथ, सामान्य तरीके से।

77

क्या केवल भौतिक इच्छाओं के लिए जीवन भर बारह नामों का पाठ किया जा सकता है?

दत्त की कृपा के लिए जीवन भर बारह नामों का पाठ

· 41:23–41:33 · Also a question

दीपक जी पूछते हैं कि गुरु दत्त को परम गुरु मानने की बहुत जरूरत नहीं है, तो क्या वे फिर भी — केवल उनकी कृपा के लिए और कुछ भौतिक इच्छाओं के लिए — जीवन भर बारह नामों का पाठ और साधना कर सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं।

दीपक जी लिखते हैं कि जब गुरु दत्त को परम गुरु के रूप में मानने की बहुत जरूरत नहीं है, तो क्या वे फिर भी, केवल उनकी कृपा के लिए और कुछ भौतिक कामना के लिए, जीवन भर बारह नामों का पाठ और साधना कर सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं।

78

क्या किसी देवता के नामों का पाठ करने के लिए विशेष अनुमति चाहिए?

अष्टोत्तर या बारह नामों के लिए अनुमति नहीं; सहस्रनाम के लिए जीभ की स्पष्टता

· 41:34–41:59 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भगवान के नामों की साधना आदि के लिए कभी कुछ विशेष पूछने की जरूरत नहीं होती — खासकर अष्टोत्तरशतनाम, बारह नामों, और सहस्रनाम आदि के लिए। सहस्रनाम में "द" वाले अक्षरों, "क" वाले अक्षरों, इन सब में थोड़ा देखना होता है कि आपका अभ्यास है या नहीं, क्योंकि जीभ की स्पष्टता बहुत जरूरी हो जाती है: शब्द लड़खड़ाने नहीं चाहिए, उच्चारण गलत नहीं होना चाहिए। इसके अलावा कोई विशेष बात नहीं।

79

एक कवच सिद्ध रखना बेहतर है या एक से अधिक?

ब्रह्मास्त्र के रूप में एक कवच, साथ में दूसरे भी

· 42:00–42:22 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि आप एक से अधिक कर सकते हैं। आपके पास एक ब्रह्मास्त्र होना चाहिए, जिसका आपने बहुत अधिक जप किया हो — आप 11,000 की तीन-चार साधनाएँ कर रहे हैं, और दो-तीन साल में लाखों पार कर जाते हैं। ऐसा एक कवच सिद्ध करके रखिए; इसके अलावा आप दूसरे कवच भी सिद्ध करके रख सकते हैं।

80

बटुक भैरव को ताँबे का दीपक देना चाहिए या पीतल का?

ताँबे की जगह पीतल, और चमेली न मिले तो सरसों का तेल

· 42:23–42:52 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या बटुक भैरव के लिए ताँबे या पीतल का दीपक जलाया जा सकता है, क्योंकि मिट्टी का दीपक हमेशा नहीं मिलता, और असली चमेली का तेल कौन सा है, वक्ता कहते हैं कि आप पीतल का दीपक बिल्कुल जला सकते हैं। ताँबे का जलाने से थोड़ी परेशानी होगी; ताँबे का मत जलाइए, पीतल का दीपक जलाइए। और अगर चमेली का तेल न मिले, तो सरसों का तेल लीजिए।

81

अगर पति और पत्नी दोनों पाँच लाख जप करें, तो क्या सब कुछ दोगुना होगा?

दोनों के लिए एक पूजन विधान, यंत्र और माला अलग-अलग

· 42:53–43:36 · Also a question

अवधेश पांडे जी पूछते हैं कि अगर वे और उनकी पत्नी दोनों पाँच लाख जप शुरू करना चाहें, तो क्या बताई गई सारी सामग्री दो-दो लगेगी। वक्ता कहते हैं कि अगर आप भगवान दत्तात्रेय की साधना का पाँच लाख जप करना चाहते हैं, तो पूजन का जो भी विधि-विधान है, वह एक ही होगा। पति-पत्नी कर रहे हैं, तो कुछ भी दो-दो नहीं करना। केवल जो यंत्र बन रहा है — पहनने और पूजने के दो यंत्र — वे अलग होंगे, आपका अलग और उनका अलग; इसके अलावा माला दोनों की अलग होगी। बाकी सारा पूजन, जो भी भोग लगे, जो फूल और प्रसादी हो, सब एक ही जगह होगा, अलग नहीं।

82

क्या छत्तीसगढ़ का अंबिकापुर शक्तिपीठ क्षेत्र में आता है?

वक्ता द्वारा खुला छोड़ा गया प्रश्न

· 43:37–44:09 · Also a question

राहुल चौधरी जी के यह पूछने पर कि क्या छत्तीसगढ़ का अंबिकापुर शक्ति पीठ के क्षेत्र में आता है, वक्ता कहते हैं कि उन्हें देखना पड़ेगा। जहाँ तक उन्हें जानकारी है, यह दंतेवाड़ा के आसपास पड़ना चाहिए।

राहुल चौधरी जी पूछते हैं कि क्या छत्तीसगढ़ का अंबिकापुर शक्ति पीठ के क्षेत्र में आता है। वक्ता कहते हैं, राहुल चौधरी जी, इसे देखना पड़ेगा। जहाँ तक उन्हें जानकारी है, यह दंतेवाड़ा के आसपास पड़ना चाहिए।

83

क्या रोज दत्तात्रेय पूजन से पहले प्रारंभिक पूजन करने होंगे?

पहले गौरी गणेश, कलश, नवग्रह, क्षेत्रपाल और दिक्पाल पूजन

· 44:10–44:36 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या भगवान दत्तात्रेय के पूजन में रोज पहले गौरी गणेश, कलश, नवग्रह, क्षेत्रपाल और दिग्पाल का पूजन करना होगा, वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ — पहले उन्हें कीजिए।

एक श्रोता पूछते हैं कि क्या भगवान दत्तात्रेय के पूजन में गौरी गणेश का, कलश का, नवग्रह का, क्षेत्रपाल का और दिग्पाल का पूजन रोज पहले करना होगा। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, पहले उन्हें कीजिए।

84

शिवलिंग रखने के लिए किस धातु का पात्र सबसे अच्छा है?

चाँदी सबसे अच्छी, पीतल भी चल सकता है

· 44:37–45:17 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि शिवलिंग रखने के लिए किस धातु का पात्र सबसे अच्छा है, वक्ता कहते हैं कि अगर ऐसे कहा जाए, तो चाँदी का पात्र सबसे उत्तम है। आप पीतल में भी रख सकते हैं — पीतल में रखिए।

एक श्रोता पूछते हैं कि शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। रखने के लिए किस धातु का पात्र सबसे उत्तम है। वक्ता उत्तर देते हैं कि अगर ऐसे कहा जाए, तो चाँदी का पात्र सबसे उत्तम है। आप पीतल में भी रख सकते हैं। पीतल में रखिए।

85

32 नामावली वाले हवन में आहुति के शब्द कैसे हों?

"दुर्गाय नमः" बिना स्वाहा के

· 45:18–45:34 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि माता की 32 नामावली से हवन करते समय हवन कैसे किया जाए — "दुर्गाय नमः स्वाहा, दुर्गाय नमः स्वाहा", या "दुर्गाय नमः" — वक्ता उत्तर देते हैं कि "दुर्गाय नमः" कहते हुए किया जाएगा।

एक श्रोता, यह कहते हुए कि माता मनसा की साधना खरमास खत्म होने से पहले आएगी, पूछते हैं कि माता की 32 नामावली से हवन करते समय वह कैसे करना है: "दुर्गाय नमः स्वाहा दुर्गाय नमः स्वाहा", या "दुर्गाय नमः"? वक्ता उत्तर देते हैं कि "दुर्गाय नमः" कहते हुए किया जाएगा।

86

मनसा का विग्रह दुर्गा के किस ओर रहता है?

बिना देखे उत्तर देने से वक्ता का इनकार, और भगवती के पास शिव का स्थान

· 45:35–46:06 · Also a question

एक श्रोता, जिनकी कुलदेवी मनसा हैं और इष्ट माँ दुर्गा, पूछती हैं कि घर में माँ मनसा का विग्रह माँ दुर्गा के किस ओर रहेगा। वक्ता कहते हैं कि वे देखकर उन्हें व्यक्तिगत रूप से संदेश भेजेंगे — बिना देखे नहीं बता सकते। यह देखना होगा कि भगवती मनसा को कहाँ, भगवती के किस ओर स्थान दिया गया है। क्योंकि, वे कहते हैं, अगर वे शिव जी के साथ, शिव-पार्वती जी के साथ रहती हैं, तो वे भगवती के बाईं ओर बैठती हैं।

87

पंचायतन व्यवस्था से स्थान कैसे बदलता है?

दुर्गा पंचायतन में शिव का दुर्गा के बाईं ओर जाना, और शिव मंडल में मनसा बाईं ओर

· 46:07–46:34 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अब अगर आपने दुर्गा जी का पंचायतन रखा है, तो शिव जी खिसक जाते हैं — शिव जी दुर्गा जी के बाईं ओर आ जाते हैं। तो उसके अनुसार फिर देखना होगा कि मनसा जी का स्थान कहाँ होगा। और अगर शिव-पार्वती जी का, शिव परिवार का मंडल बन रहा है, और उसमें आप मनसा जी को स्थान दे रहे हैं, तो उन्हें केवल बाईं ओर ही स्थान मिलता है — और उनकी पूजा भी बाएँ हाथ से होती है।

88

अगर सवा लाख लगातार न हो सके, तो किस इकाई में करें?

25,000 की जगह 27,000, क्योंकि वह दोगुना होकर 54, 108 और आगे बनता है

· 46:35–47:46 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि अगर सवा लाख की साधना लगातार न हो सके, तो क्या 25,000 के छोटे-छोटे अनुष्ठान किए जा सकते हैं, वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल — गिनती में आएगा, पर लगातार कीजिए। और 25,000 के अनुष्ठान की जगह, वे कहते हैं, 27,000 का कीजिए: क्योंकि 27 और 27 से 54 होता है, और 54 और 54 से 108, और इस तरह आप बढ़ाते जाते हैं। फिर जब आप फिर से 27 करेंगे, तो आपका सवा लाख आराम से पूरा हो जाएगा।

89

जब साधना पूरी होने से पहले बार-बार टूटे तो क्या करना चाहिए?

दोष निवारण के संकल्प के साथ विघ्नेश्वर विनायक की सेवा

· 47:47–48:17 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि अगर 30 दिन की साधना अवधि के अंत से कुछ दिन पहले साधना टूट जाए, तो क्या प्रभाव और फल मिलेगा, वक्ता कहते हैं: अगर साधना पूरी होने से पहले टूट रही है, तो सबसे पहले, अगर ऐसा बार-बार हो रहा है, भगवान विघ्नेश्वर विनायक की सेवा और पूजा कीजिए। और उसमें संकल्प लीजिए — कि इसका जो भी कारण हो, चाहे पितृ दोष हो, देव दोष हो, प्रेत-पिशाच दोष हो, या कोई विचार, हे विनायक, उस दोष का उन्मूलन कीजिए, और मेरी साधना पूरी करवाइए।

90

अगर साधना आखिरी क्षण में टूट जाए, तो क्या फल खो जाता है?

देव कृपा फिर भी आती है, पर भौतिक रूप से यह ठीक नहीं

· 48:18–48:35 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह चीज ठीक नहीं — कि साधना पूरी होने वाली है और बिल्कुल आखिरी क्षण में किसी भी कारण से टूट जाए। फल मिलना अलग बात है: देवता की कृपा तो मिलेगी ही; ऐसा नहीं कि साधना छोड़ दी तो नहीं मिलेगी। पर भौतिक रूप से यह चीज ठीक नहीं है।

वक्ता कहते हैं कि यह चीज ठीक नहीं है: कि साधना पूरी होने की कगार पर है और बिल्कुल आखिरी क्षण में किसी भी कारण से खण्डित हो जाए। फल मिलना अलग बात है। देवता की कृपा तो मिलेगी ही — ऐसा नहीं कि साधना छोड़ दी तो नहीं मिलेगी। पर भौतिक रूप से यह चीज ठीक नहीं है।

91

ताँबे के दीपक से दीपदान किसे किया जा सकता है?

ताँबा सबके लिए शुभ नहीं — केवल सरसों का तेल, रोज तिल का तेल या घी कभी नहीं

· 48:36–48:58 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि ताँबे के दीपक से दीपदान किसे किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि ताँबे के दीपक का प्रयोग ही अलग है। ताँबे का दीपक जलाना हर किसी के लिए शुभ नहीं है। ताँबे के दीपक में आप हमेशा सरसों का तेल जला सकते हैं; उसमें सामान्य रोज के तरीके से तिल का तेल या घी कभी मत जलाइए।

92

ताँबे का दीपक किन देवताओं के लिए जलाया जा सकता है?

उग्र देवता, भैरव जी और हनुमान जी

· 48:59–49:06 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह उग्र देवताओं के लिए और भैरव जी के लिए जलाया जा सकता है। हनुमान जी के लिए भी जलाया जा सकता है — हनुमान जी के नाम पर, उनके लिए भी।

वक्ता कहते हैं कि और यह उग्र देवताओं के लिए, भैरव जी के लिए जलाया जा सकता है। हनुमान जी के लिए भी जलाया जा सकता है। हनुमान जी के नाम पर, उनके लिए भी।

93

क्या तिल के तेल में मिलाकर चमेली का तेल बनाया जा सकता है?

मिलाने की अनुमति; शुद्ध चमेली बहुत जल्दी जलती है

· 49:07–49:49 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि अच्छी गुणवत्ता का तिल का तेल और चमेली का तेल मिलता है, तो क्या तिल के तेल में चमेली का तेल मिलाकर चमेली का तेल बनाया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि हाँ, मिलाइए, कोई कठिनाई नहीं। वे जोड़ते हैं कि केवल चमेली रखने पर वह बहुत जल्दी जल जाता है।

एक श्रोता पूछते हैं कि अच्छी गुणवत्ता का तिल का तेल और चमेली का तेल उपलब्ध होने पर, क्या तिल के तेल में चमेली का तेल मिलाकर चमेली का तेल बनाया जा सकता है। वक्ता कहते हैं, हाँ, मिलाइए। कोई कठिनाई नहीं है। उसमें केवल चमेली हो, तो वह बहुत जल्दी जल जाता है।

94

अस्त्र कैसे चलते हैं, यह केवल चर्चा और जानकारी के रूप में बताया जाएगा।

अस्त्रों का पूरा विषय, केवल चर्चा और जानकारी के रूप में

· 49:50–50:12

वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय की साधना पूरी होने के बाद एक से एक जबरदस्त विषय आएँगे। अस्त्रों का पूरा विषय अभी बाकी है, जिसमें आप सबको पता चलेगा कि अस्त्र कैसे चलते हैं। वे कहते हैं कि यह केवल चर्चा और जानकारी है — उन्हें चलाने की सामर्थ्य न उनमें है और न आपमें हो सकती है; हम कहाँ इतने बड़े साधक हैं। पर देवी की कृपा से और संतों की कृपा से जो भी रुचि मिलती है, इस माध्यम से जो भी सुना जाता है, वह आप सबके सामने रखेंगे।

95

आए हुए संदेशों में ज्यादातर अवधूत बन जाने का डर था।

अवधूत बन जाने का डर

· 50:13–50:35

वक्ता कहते हैं कि अभी केवल यही चर्चा हो रही थी कि कल की साधना पूरी हो, क्योंकि बहुत से लोगों के संदेश आए थे। वे कहते हैं कि सबका सबसे बड़ा डर यह था कि कहीं हम अवधूत न बन जाएँ — मतलब अगर हम अवधूत बन गए तो घर में ऐसे ही घूमेंगे, और कोई मारे तब भी कोई असर नहीं होगा।

वक्ता कहते हैं कि अभी केवल यही चर्चा हो रही है कि कल की साधना पूरी हो, क्योंकि बहुत से लोगों के संदेश आए थे। सबका सबसे बड़ा डर क्या था? कि कहीं हम अवधूत न बन जाएँ। मतलब, अगर हम अवधूत बन गए तो घर में ऐसे ही घूमेंगे, और कोई मारे तब भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

96

जब कोई प्रयोग से फँसाने की कोशिश कर रहा हो तो क्या किया जा सकता है?

दुर्गा वज्र पंजर कवच, या अर्गला या "शूलेन पाहि नो देवि" से संपुट

· 50:53–51:39 · Also a question

घनश्याम दास जी भगवती दुर्गा की योगिनी साधना के बारे में पूछते हैं; वक्ता कहते हैं कि उसे एकदम बताना संभव नहीं, क्योंकि सारी सामग्री की व्यवस्था करनी होगी, और सामान्य विधान भी ऐसे ही नहीं बताया जा सकता। इसके बजाय, वे कहते हैं, अगर यह धोखे का मामला है, अगर ऐसी स्थिति बन गई है, तो भगवती दुर्गा का वज्र पंजर कवच प्राप्त करने की व्यवस्था कीजिए। और अगर वह नहीं, तो अर्गला मंत्र से, या "शूलेन पाहि नो देवि" मंत्र से संपुट करके तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ कीजिए।

97

तंत्रोक्त देवी सूक्तम के पाठ के साथ नींबू की कौन सी बलि दी जाती है?

रोज नौ नींबू, दो-दो टुकड़ों में कटे, उन पर लौंग और कपूर जलाकर

· 51:40–52:10 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि पाठ केवल एक करना है, पर बहुत मजबूत पाठ असर देगा। और जब आप यह पाठ करें — जैसे कालिका योगिनी साधना में नौ नींबू की, पाँच नींबू की बलि दी गई थी, नींबू के ऊपर लौंग और कपूर जलाकर — इस साधना में आपको रोज नौ नींबू की बलि देनी होगी, नौ नींबू को दो-दो टुकड़ों में काटकर उन पर लौंग और कपूर रखकर जलाना होगा। जो आपको फँसाने की कोशिश कर रहा है, उस पर बहुत जोरदार चोट पड़ेगी।

98

देवी सूक्तम प्रयोग की शर्तें और शुरू करने की तिथि क्या है?

कड़ा ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन, और कृष्ण पक्ष अष्टमी से शुरुआत

· 52:11–52:30 · Also a question

कैसे करना है: तंत्रोक्त देवी सूक्तम को "शूलेन पाहि नो देवि" मंत्र से संपुटित करना है। और, वक्ता कहते हैं, ब्रह्मचर्य का पूरी तरह और अच्छे से पालन करना होगा; आपकी ओर से कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए; खाना-पीना पूरी तरह सात्विक रखिए। इसे कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू किया जा सकता है।

99

क्या ऐसी परेशानी के लिए दुर्गा सप्तशती का स्वतंत्र पाठ किया जा सकता है?

कम से कम मध्यम चरित्र, छह अंगों के साथ

· 52:31–53:06 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि दुर्गा सप्तशती का स्वतंत्र पाठ करके भी आप इन परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं। हम जो दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं, उसमें माना गया है कि कम से कम मध्यम चरित्र का पाठ करना चाहिए — पूरा पाठ छह अंगों के साथ करना है।

वक्ता कहते हैं कि दुर्गा सप्तशती का स्वतंत्र पाठ करके भी आप इन परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं। हम लोग जो दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं, उसमें माना गया है कि कम से कम मध्यम चरित्र का पाठ करना चाहिए। पूरा पाठ छह अंगों के साथ करना है।

100

क्या सप्तशती का कोई एक अध्याय अकेले पढ़ा जा सकता है?

कारण सटीक हो तो स्वतंत्र पाठ की अनुमति

· 53:07–53:22 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अब जब कोई विशेष परेशानी आती है, तो ऐसा वर्णन भी मिलता है, और जानकार लोग ऐसा प्रयोग करते भी हैं, और सामान्य व्यक्ति भी कर सकता है — पर कारण सटीक होना चाहिए। अगर आप सच में सही हैं और कठिनाई हो रही है, तो आप स्वतंत्र पाठ कर सकते हैं। जैसे कि सप्तम अध्याय।

वक्ता कहते हैं कि अब जब कोई विशेष कठिनाई आती है, तो ऐसा वर्णन भी मिलता है, और जानकारों द्वारा ऐसा प्रयोग किया भी जाता है, और सामान्य व्यक्ति भी कर सकता है — पर कारण सटीक होना चाहिए। अगर आप सच में सही हैं और कठिनाई हो रही है, तो आप स्वतंत्र रूप से पाठ कर सकते हैं। जैसे कि सप्तम अध्याय।

101

"शूलेन पाहि नो देवि" पाठ का हल्का रूप क्या है?

"शूलेन पाहि नो देवि" की एक माला, देवी सूक्तम, फिर एक माला

· 53:23–54:46 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि सप्तम अध्याय में बहुत सारे मंत्र हैं, और लाइव पर उन मंत्रों का वर्णन करना शायद ठीक नहीं होगा — वैसे ऐसे मंत्र हैं कि उनका संपुट लगाने पर तुरंत असर देते हैं। अगर आप यह कर सकें तो बहुत अच्छा; न कर सकें तो सामान्य रूप कीजिए: "शूलेन पाहि नो देवि" की एक माला जप, फिर तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ, फिर "शूलेन पाहि नो देवि" की एक माला जप। अगर एक माला संभव न हो, तो मंत्र कम से कम 27 बार पढ़िए। वे कहते हैं कि इतने संकल्प से भी करेंगे तो आपको बहुत राहत मिलेगी।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · तेरह अध्याय 4.24

The protective verse शूलेन पाहि नो देवि asks the Goddess to guard with spear, sword, bell and bowstring.

The speaker places it near the seventh adhyāya; in the text it is adhyāya 4, verse 24.

मूल पाठ पढ़ें →
24

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके । घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥ २४ ॥

हे देवी! शूल से हमारी रक्षा करें। हे अम्बिके! खड्ग से हमारी रक्षा करें। घण्टे की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमारी रक्षा करें।

यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।

102

दत्तात्रेय वज्र पंजर कवच कहाँ से शुरू होता है?

छब्बीसवें श्लोक से, उसके बाद विनियोग

· 54:47–55:02 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि भगवान दत्तात्रेय का वज्र पंजर कवच कहाँ से शुरू होगा, और कहाँ से करना है, वक्ता कहते हैं कि उसे देखिए — आप छब्बीसवें श्लोक से पढ़ना शुरू कर सकते हैं। उसके बाद विनियोग आता है।

एक श्रोता पूछते हैं कि भगवान दत्तात्रेय का वज्र पंजर कवच कहाँ से शुरू होगा, वे कहाँ से करें। वक्ता कहते हैं, उसे देखिए। छब्बीसवाँ श्लोक — आप वहाँ से पढ़ना शुरू कर सकते हैं। उसके बाद विनियोग आता है।

103

दत्तात्रेय वज्र कवच का विनियोग क्या है?

दत्त वज्र कवच का विनियोग पाठ

· 55:03–55:23 · Also a question

वक्ता दत्तात्रेय वज्र कवच का विनियोग इस तरह पढ़कर सुनाते हैं: "अस्य श्री दत्तात्रेय वज्र कवच स्तोत्र मन्त्रस्य किरातरूपी महारुद्र ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्री दत्तात्रेयो देवता। द्रां बीजम् आं शक्तिः क्रौं कीलकम् ॐ आत्मने नमः।" वे कहते हैं कि यह सारा न्यास आदि पाठ में दिया गया है, और इन सबका पाठ करके इन सबका न्यास करना चाहिए।

104

दत्त वज्र कवच का विनियोग शारीरिक रूप से कैसे किया जाता है?

हाथ में जल, "जपे विनियोगः" तक पाठ, फिर दत्त के चरणों में अर्पण

· 55:24–55:47 · Also a question

"जपे विनियोगः" तक विनियोग का पूरा मंत्र — यानी "अस्य श्री दत्तात्रेय वज्र कवच स्त्रोत मंत्रस्य" से आगे — हाथ में जल लेकर पढ़ा जाता है। "जपे विनियोगः" तक पढ़ने के बाद आप जल भगवान दत्त के श्री चरणों के पास अर्पित करेंगे।

105

दत्त वज्र कवच के बीज मंत्र किस रूप में पढ़े जाते हैं?

हर बीज मकार में पढ़ा जाता है

· 55:48–56:13 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि दत्तात्रेय वज्र कवच में जितने भी बीज मंत्र हैं, सबको आपको मकार में (म् की ध्वनि के साथ) पढ़ना है — यह ध्यान रखिए। "आं शक्तिः क्रौं" — तो इसे ॐ, क्रौं पढ़ना है। "द्रीं" मकार में पढ़ा जाएगा। "श्रीं" भी मकार में, "सौः" भी मकार में। जितने भी दिए गए हैं — "क्लां, क्लूं" — सब मकार में पढ़े जाएँगे। यह ध्यान रखिए।

106

दत्त वज्र कवच के न्यास और पाठ के बीच क्या आता है?

दिग्वंदन मंत्र और फिर ध्यान मंत्र, वज्र कवच पाठ शुरू होने से पहले

· 56:14–56:26 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि दिग्वंदन के लिए एक छोटा मंत्र दिया गया है, वह करना चाहिए। फिर ध्यान मंत्र है। और ध्यान मंत्र के बाद कवच का पाठ शुरू होता है।

वक्ता कहते हैं कि दिग्वंदन के लिए एक छोटा मंत्र दिया गया है। वह करना चाहिए। फिर ध्यान मंत्र है। और ध्यान मंत्र के बाद फिर कवच का पाठ शुरू होता है।

107

कवच दत्तात्रेय की दिनचर्या के बारे में क्या कहता है?

काशी में गंगा, कोल्हापुर, माहुरगढ़ और सह्याचल की गुफाएँ

· 56:27–57:03 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इसमें लिखा है कि महामुनि दत्तात्रेय रोज सुबह काशी में गंगा नदी में स्नान करते हैं; फिर समुद्र किनारे कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर पहुँचकर देवी का जप और ध्यान करते हैं; और माहुरीपुर, माहुरगढ़ जाकर वहाँ भिक्षा करते हैं; और फिर सह्याचल की गुफाओं में दिगंबर वेश में विश्राम करते और सोते हैं। वे कहते हैं कि यह सब पढ़कर आपको बहुत कुछ पता चलेगा — इस कवच में बहुत सारी बातें हैं।

108

अगर कवच एक से अधिक बार पढ़ना हो तो पाठ कैसे बदलता है?

विनियोग से सीधे "ॐ दत्तात्रेयः शिरः पातु" पर

· 57:04–57:32 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि विनियोग के बाद, अगर पाठ एक बार करना है, तो जो कुछ लिखा है वह सब पढ़ सकते हैं। और अगर सब नहीं पढ़ना है — मतलब आप एक से अधिक बार पढ़ना चाहते हैं, कवच के 11 पाठ करना चाहते हैं — तो विनियोग करने के बाद सीधे कवच मंत्र पर आ जाना चाहिए, जो "ॐ दत्तात्रेयः शिरः पातु" से शुरू होता है। वहीं से आप कवच का पाठ शुरू करेंगे।

109

दोहराया जाने वाला कवच पाठ किस पंक्ति तक किया जाता है?

फलश्रुति से ठीक पहले रुकना, और अंत का न्यास न करना

· 57:33–58:22 · Also a question

वक्ता पूछते हैं कि और कहाँ तक करेंगे — वहाँ तक जहाँ से फलश्रुति शुरू होने वाली है, उससे ठीक पहले तक: "ताहनंत यत स्थानम रक्षित वादी मुनीश्वरा", यहाँ तक। माला मंत्र के जप के लिए अंत में फिर से न्यास आदि दिए गए हैं; यह करने की जरूरत नहीं। उसमें से केवल सामान्य, जो सब दिया गया है, बस पढ़ा जाएगा, क्योंकि नहीं तो यह एक विस्तृत विधि बन जाएगी।

110

सूतक काल में क्या किया जा सकता है?

केवल मानसिक जप, बारह नाम, और गीता का सातवाँ अध्याय

· 58:23–58:42 · Also a question

इस बात पर कि सूतक काल में केवल मानसिक जप होता है, वक्ता कहते हैं कि हाँ — भगवान दत्त के बारह नामों का जप किया जा सकता है। और, वे जोड़ते हैं, आपके लिए अच्छा रहेगा कि गीता के सातवें अध्याय का पाठ कर लें।

इस बात पर कि सूतक काल में केवल मानसिक जप होता है, वक्ता कहते हैं कि हाँ: भगवान दत्त के बारह नामों का जप किया जा सकता है। और वे जोड़ते हैं कि आपके लिए अच्छा रहेगा अगर आप गीता के सातवें अध्याय का पाठ कर लें।

111

उनके गुरु पहले से हैं, और वह वही साधना होती जो यहाँ बताई जा रही है।

वही जो वे श्रोताओं को बता रहे हैं

· 58:43–58:48

यह पूछे जाने पर कि अगर उन्हें श्री दत्तात्रेय जी की अपनी पहली साधना करनी होती तो वे कौन सी करते, वक्ता कहते हैं कि उनके गुरु पहले से हैं, और वह वही होती जो वे आप सबको बता रहे हैं।

एक श्रोता पूछते हैं कि अगर उन्हें श्री दत्तात्रेय जी की अपनी पहली साधना करनी होती, तो वे कौन सी साधना करते। वक्ता कहते हैं कि मेरे गुरु पहले से हैं। जो चीज हम आप सबको बता रहे हैं — वही।

112

तंत्रोक्त देवी सूक्तम का संपुट किस मंत्र से होता है?

"शूलेन पाहि नो देवि", जिसे वे लाइव पर पूरा नहीं बोलेंगे

· 58:49–59:15 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि वे समझ नहीं पा रहे कि तंत्रोक्त देवी सूक्तम को किस मंत्र से संपुटित करना है, और मंत्र बोलने को कहते हैं। वक्ता कहते हैं कि खोजिए, मिल जाएगा: "शूलेन पाहि नो देवि"। "शूलेन पाहि नो देवि"। वे कहते हैं कि यह पूरा मंत्र हम पूरा नहीं बोल सकते — इसे खोजिए; यह "शूलेन पाहि नो देवि" से शुरू होता है।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · तेरह अध्याय 4.24

The verse शूलेन पाहि नो देवि asks the Goddess to protect with her spear, sword, bell and bowstring.

Using it as the sampuṭa of the Tantrokta Devī Sūktam is the speaker's practice, not stated in the text.

मूल पाठ पढ़ें →
24

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके । घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥ २४ ॥

हे देवी! शूल से हमारी रक्षा करें। हे अम्बिके! खड्ग से हमारी रक्षा करें। घण्टे की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमारी रक्षा करें।

यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।

113

पंचायतन व्यवस्था और उसका संपुट चित्र बनाकर भेजा जाएगा।

बनाकर भेजा जाने वाला चित्र

· 59:16–1:00:35

माँ भगवती दुर्गा का पंचायतन फिर से बताने को, और संपुट कैसे होता है यह पूछे जाने पर, वक्ता कहते हैं कि ठीक है — हम एक चित्र बनाकर भेजेंगे, और आपको मिल जाएगा; और वे कहते हैं कि वे लिखकर दे देंगे।

एक श्रोता उनसे माँ भगवती दुर्गा का पंचायतन कई बार फिर से बताने को कहते हैं, और पूछते हैं कि संपुट कैसे होता है। वक्ता कहते हैं, ठीक है: हम एक चित्र बनाकर आपको भेजेंगे, और आपको मिल जाएगा। ठीक है, वे कहते हैं — हम लिखकर आपको दे देंगे।

114

सप्तशती की स्वतंत्र व्याख्या, गुप्त सप्तशती, देवी रहस्य और दस महाविद्याएँ।

सप्तशती की स्वतंत्र व्याख्या, गुप्त सप्तशती, देवी रहस्य और दस महाविद्याएँ

· 1:00:36–1:01:21

वक्ता कहते हैं कि आगे आनंद आएगा, जब वे सप्तशती की स्वतंत्र व्याख्या करेंगे। अभी गुप्त सप्तशती के बारे में पूछा जा रहा था। फिर देवी रहस्य है। फिर जब पूरी शृंखला शुरू होगी, तो दस महाविद्या पर अलग-अलग चर्चा होगी, और उसमें हर एक की योगिनियों पर चर्चा — जानकारी के लिए चर्चा। साधनाएँ अलग विषय हैं; साधना का विषय अलग है, पर ज्ञान होना चाहिए, और उद्देश्य यह है कि आपको जानकारी हो।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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