नवनाथ साधना, रक्षा कवच और तंत्र-ज्योतिष उपाय
नाथ परंपरा और तंत्र-ज्योतिष उपायों पर प्रश्नोत्तर
20 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
नाथ साबरी विद्या की नींव के रूप में नवनाथ चैतन्य साधना
हर षट्कर्म से पहले नवनाथ को जगाएँ; ओंकार से पहले कुछ नहीं जागता
वक्ता कहते हैं कि नाथ शाबरी विद्या के क्षेत्र में नवनाथ मूल हैं, इसलिए सबसे पहली साधना नवनाथ चैतन्य मंत्र की साधना है, जो उन्होंने अपने समूह से मकर संक्रांति से ग्यारह दिन करवाई। नवनाथ को चैतन्य कर लेने के बाद जब भी कोई षट्कर्म करें, उन्हें फिर से जगाना होगा, क्योंकि वे नौ ही कर्मों को सफलता देते हैं। वे इसकी तुलना ओंकार से करते हैं: जब तक ओम चैतन्य नहीं होगा और कुछ चैतन्य नहीं होगा, क्योंकि ओंकार में ही सब है। चाहे तंत्रोक्त विधान हो या भक्ति, यदि नवनाथ को नहीं जगाया और उनका अलख आदेश नहीं लगाया, तो फल नहीं मिलेगा। वे जोड़ते हैं कि अनुभवी साधक को ऐसी मूल साधना पर संशय हो सकता है — जैसे दसवीं के छात्र से पहली कक्षा का प्रश्न पूछा जाए — पर इसीलिए यह सबसे पहले आती है।
नाथ परंपरा से बाहर के गृहस्थ को सीमित विधान मिलता है; पूरा माँगने पर दोनों को दोष
साधना पर भी कॉपीराइट; देने वाला उतना ही बताता है जितना लाभ दे और दोष न लगे
वक्ता कहते हैं कि परंपरा के शिष्यों को विधि पूरी बताई जाती है, लेकिन जो शिष्य नहीं बन सकता, या जिसकी अपनी मर्यादाएँ हैं और पूरी तरह नहीं आना चाहता, उसके लिए ऐसे विधान बताए गए हैं कि गृहस्थ रहते हुए इस-इस तरह करो, नवनाथ की कृपा पाओ और उन्नति करो। यदि ऐसा व्यक्ति चाहे कि सारा विधान मिल जाए, तो देने वाले को भी और करने वाले को भी दोष लगेगा, क्योंकि वह शेड्यूल से बाहर है — हर साधना पर कॉपीराइट है, और नाथ परिवार का यह कहना सही है कि मैं यह चीज़ अपनी परंपरा से बाहर क्यों दूँ; ऐसा मूर्खतापूर्ण काम कोई नहीं करेगा। इसलिए देने वाला उतना ही बताता है जितने से सामने वाले को लाभ हो और काम चल जाए — और फिर साधक को, अपने स्तर से नीचे की चीज़ मिलने पर, संशय होता है कि कुछ हुआ ही नहीं।
सबसे सुलभ साधनाएँ सबसे उपेक्षित: गायत्री, ओंकार, सोऽहम्
प्रचलित होने से साधना कमज़ोर नहीं होती
वक्ता कहते हैं कि लोग ठीक उसी मंत्र या साधना को सबसे अधिक नेगलेक्ट और इग्नोर करते हैं जो सबसे सुलभ होती है — चाहे गायत्री मंत्र हो, ओंकार हो या सोऽहम्-हंस। कोई साधना प्रचलित हो जाए तो लोग मान लेते हैं कि अब वह गुप्त नहीं रही, इसलिए फल नहीं देगी या प्रभाव नहीं पड़ेगा, और उसकी महत्ता कम आँकने लगते हैं। जबकि ओंकार साधना अपने आप में ऐसी है कि कोई कर ले तो फिर और कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं।
पता है, वक्ता कहते हैं, लोग उसी मंत्र या साधना को सबसे ज़्यादा नेगलेक्ट और इग्नोर करते हैं जो सबसे सुलभ होती है? चाहे वह गायत्री की हो, ओंकार की हो, या सोऽहम्-हंस की — साधारण रूप से की जाने वाली हर साधना को हर कोई चाहता है, जब तक वह प्रचलित न हो जाए। गुप्त न रही तो लोग सोचते हैं कि फल नहीं देगी या प्रभाव नहीं पड़ेगा, और उसकी महत्ता कम आँकने लगते हैं। ओंकार साधना, वे कहते हैं, अपने आप में ऐसी है कि यदि किसी ने कर ली तो फिर और कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं है।
नाथ परंपरा में आदेश और अलख का अर्थ
आदेश आदीश (शिव) का अपभ्रंश; अलख अनंत ज्योति
वक्ता कहते हैं कि नाथ साधक जो शब्द बोलते हैं वह वास्तव में "आदेश" नहीं बल्कि "आदीश" है — आदि और ईश, पहले प्रभु, भगवान शिव — जो अपभ्रंश होकर आदेश हो गया। "अलख" का अर्थ है जिसका कोई अंत नहीं, जिसकी ज्योति सदैव जलती है; इसलिए "अलख आदेश"। अलख जगाने की अलग-अलग प्रक्रिया है और अलख देने की अलग-अलग, लेकिन साधारण रूप से जब हर कोई "आदेश, आदेश" बोलता है तो उसका अर्थ है कि हम भगवान शिव को याद कर रहे हैं और उन्हें प्रणाम कर रहे हैं।
साधना समूह के एक भाई ने पूछा था कि आदेश का अर्थ क्या है। वक्ता कहते हैं कि आदेश का अर्थ सब जगह मिल जाएगा और हर कोई बताता है, लेकिन उसका मूल यह है: वह आदेश नहीं, आदीश कहा जाता है — आदि-ईश, जो पहले हैं, जो आदि हैं, यानी भगवान शिव। आदीश अपभ्रंश होकर अब आदेश हो गया है। अलख का अर्थ है जिसका कोई अंत नहीं — जिसकी ज्योति सदैव जलती है। इसीलिए "अलख आदेश" कहा जाता है। तो अलख जगाने की अलग-अलग प्रक्रिया है और अलख देने की अलग-अलग प्रक्रिया है। साधारण रूप से हर कोई "आदेश, आदेश" बोलता है; उसका मतलब है कि हम भगवान शिव को याद कर रहे हैं, उन्हें अलख आदेश बोल रहे हैं और प्रणाम कर रहे हैं।
ओंकार यंत्र के साथ ओंकार साधना
बीसा यंत्र जैसा चाँदी का यंत्र; अ-उ-म और अर्धमात्रा
वक्ता कहते हैं कि ओंकार साधना के लिए ओंकार यंत्र अवश्य रखें, त्राटक या पूजन के लिए; यह बीसा यंत्र की तरह बनवाया जाता है और रजत यानी चाँदी पर सबसे अधिक फल देता है। यंत्र बनवाकर विधि-विधान से ओंकार का जप करें — चाहे अ, उ, म के पूरे उच्चारण वाला लंबा जप, या अधिक से अधिक संख्या — तो बहुत विशेष प्रभाव पड़ता है; उस यंत्र के माध्यम से बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है। त्राटक से क्या हो सकता है इसके उदाहरण में वे नाथूराम गोडसे का नाम लेते हैं, कहते हैं कि कॉलेज की लाइब्रेरी में पढ़ी जीवनी के अनुसार उनका त्रिनेत्र, पीनियल ग्रंथि, बचपन से जागृत था, वे सहज ध्यान में चले जाते थे, ओंकार का ध्यान और घर में पूजित श्री यंत्र पर त्राटक करते थे, और अपने समय के उच्च कोटि के साधक थे। अ-उ-म में, वे कहते हैं, हर कोई आ गया — ब्रह्मा, विष्णु, महेश — और ऊपर अर्धचंद्र और बिंदु भगवती हैं, तो उसमें सबकी पूजा हो गई।
यदि आप ओंकार साधना करना चाहते हैं, वक्ता कहते हैं, तो एक ओंकार यंत्र होता है। साधना कर रहे हैं तो सबसे पहली चीज़ उसका यंत्र ज़रूर रखें — त्राटक करने हेतु या पूजन हेतु। ओंकार साधना के लिए ओंकार यंत्र का बहुत अधिक महत्व रहा है। बीसा यंत्र की तरह ओंकार का एक यंत्र बनवाया जाता है, जो रजत, यानी चाँदी की धातु पर सबसे अधिक फल देता है। यंत्र बनवाकर विधि-विधान से ओंकार का जप करें — चाहे लंबा जप, अ, उ, म का पूरा उच्चारण, या अधिक से अधिक संख्या — तो बहुत विशेष प्रभाव पड़ता है, और उस यंत्र के माध्यम से बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं। उदाहरण में वे नाथूराम गोडसे का नाम लेते हैं, यह कहते हुए कि कोई ऑफेंस न ले, और कहते हैं कि उनके विषय में जानकारी छुपाई गई है इसलिए लोगों को सही बात पता नहीं: वे बहुत बड़े साधक थे। कॉलेज की लाइब्रेरी में उनकी एक किताब पढ़ी थी — ऐसी किताबें, वे कहते हैं, दबा दी जाती हैं और प्रकाशित नहीं मिलतीं — जिसमें बताया गया था कि बचपन से ही उनका त्रिनेत्र, पीनियल ग्रंथि, बहुत जागृत था; ध्यान की अवस्था सहज मिल जाती थी और वे ध्यान ही करते थे। पहला ध्यान वही ओंकार जो वक्ता ने बताया, और दूसरा घर में सदैव पूजित श्री यंत्र पर त्राटक; यह भी कहा जाता है कि उन्हें सवारी या ऐसा कुछ आता था। वे उस स्तर के साधक थे जिन्हें ध्यान की अवस्था प्राप्त थी, ध्यानमग्न रहते थे और ध्यान में भाव भी आ जाता था — अपने समय के उच्च कोटि के साधक। जीवनी मिले तो पढ़िए, वक्ता कहते हैं, कि त्राटक से क्या कुछ हो सकता है। तो ओंकार साधना करने के लिए बहुत अच्छी चीज़ है: अ-उ-म में हर कोई आ गया — ब्रह्मा, विष्णु, महेश — और ऊपर अर्धचंद्र और बिंदु हैं, जो भगवती हैं। तो सबकी पूजा हो गई, और यदि आप वह करते हैं तो बहुत अच्छी बात है।
उपाय चुनने से पहले प्रेत बाधा का आकलन: प्रेत या भूत, नई या पुरानी, जप पर उसकी प्रतिक्रिया
पुरानी बाधा साधारण पूजा से नहीं हिलती, उसे स्वयं ग्रहण कर सकती है
प्रेत बाधा के लिए मंत्र पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह इस पर निर्भर है कि बाधा कैसी है — प्रेत बाधा और भूत बाधा दो अलग चीज़ें हैं। प्रेत बाधा है तो किस स्तर की: स्वयं आई है या किसी ने अभिचार से पहुँचाई है, नई है या पुरानी, उसकी अवस्था क्या है, और पाठ-जप करने पर वह क्या प्रतिक्रिया देती है — चिल्लाती है, रोती है या हँसती है? इससे उसकी वस्तुस्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। यदि पुरानी है तो साधारण पूजन-पाठ से कोई फर्क नहीं पड़ेगा; वह आपके देवी-देवता की पूजा को स्वयं ग्रहण करने और रोकने भी लग सकती है — जिस पर वे अलग से बताने का वादा करते हैं। इसलिए पहले स्वयं या किसी अच्छे जानकार की सहायता से स्थिति का आकलन करें।
किसी ने पूछा कि प्रेत बाधा हो तो कोई मंत्र होगा। वक्ता कहते हैं कि यह निर्भर करता है कि बाधा कैसी है — प्रेत बाधा है कि भूत बाधा है; दोनों अलग-अलग चीज़ हैं। प्रेत बाधा है तो किस स्तर की? स्वयं से आई है या किसी ने अभिचार के माध्यम से पहुँचाई है? नई है या पुरानी? उसकी अवस्था क्या है? पाठ-जप करने पर वह क्या प्रतिक्रिया देती है — चिल्लाती है, रोती है, या हँसती है? इससे आप उसकी वस्तुस्थिति का अंदाज़ा लगा सकते हैं। साथ ही, यदि वह पुरानी चीज़ है और आप साधारण पूजन-पाठ करेंगे तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। वह एक तरह से आपकी पूजा-पाठ को अपना मान लेगी। वे पहले फेसबुक पर लेख लिखते थे, कॉपी-पेस्ट के कारण छोड़ा और अब यूट्यूब पर वीडियो डालते हैं; वे यह विषय कवर करेंगे — कैसे ऐसी चीज़ किसी के देवी-देवता की पूजा को स्वयं ग्रहण करने लगती है, कैसे पूरा रोक देती है, और आप कितना भी कर्म करें सब उसे प्राप्त होने लगता है। प्रेत बाधा है, वे कहते हैं, तो सबसे पहले आपको देख लेना चाहिए, आकलन कर लेना चाहिए — स्वयं से या किसी अच्छे जानकार की सहायता से — कि स्थिति क्या है।
जहाँ बाधा से घर की पूजा रुक जाए वहाँ कवच और वज्र पंजर, शिव मंदिर में सिद्ध
कवच केवल कूटता है; वज्र पंजर बाँधकर कूटता है
वक्ता कहते हैं कि यदि स्थिति ऐसी हो कि घर में पूजन-पाठ नहीं कर पा रहे और बहुत अशांति है, तो किसी मंत्र या तंत्रोक्त कवच का कुछ दिन पाठ-जप करके उसे जागृत कर लेना चाहिए — कम से कम पंचमुखी हनुमान कवच, अघोर शिव कवच, इंद्र वज्र कवच, इंद्राक्षी कवच, भगवती दुर्गा या कामाख्या माँ से संबंधित कोई कवच, या अप्राजिता कवच; विपरीत महाप्रत्यंगिरा और महाविपरीत जैसे स्तोत्र भी हैं, और महाविद्याओं के अलग-अलग कवच और वज्र पंजर। वज्र पंजर में कवच का दस गुना बल है: पंजर यानी छाती की पसलियाँ, तो वह पूरा घेरा डाल देता है — कवच सिर्फ कूटता है, वज्र पंजर बाँधकर कूटता है, फिर उसकी आने की हिम्मत नहीं होती, और वह प्रेत बाधा को हटा ही नहीं, दंडित भी कर सकता है। किसी भी देवी-देवता का वज्र पंजर, कवच या महाविद्या स्तुति विधि-विधान से समझकर शिव मंदिर में सिद्ध करें — संकल्प लेकर, ब्रह्मचर्य और सभी नियमों का पालन करते हुए, और चाहे कितनी भी बाधा या कष्ट हो, छोड़ें नहीं — मंदिर में, घर में नहीं। एक निश्चित समय बाद एक शक्ति मिलती है या मार्गदर्शन मिलता है जिससे बाधाएँ दबने लगती हैं; केवल घर में करने से, बाधा बड़ी हो तो, कुछ फायदा नहीं होगा।
यदि ऐसी स्थिति हो, वक्ता कहते हैं, कि घर में पूजन-पाठ नहीं कर पा रहे, आसन और घर में बहुत अशांति रह रही है, तो किसी मंत्र का, किसी कवच का, किसी तंत्रोक्त कवच का कुछ दिन पाठ-जप करके उसे जागृत कर लेना चाहिए — कम से कम पंचमुखी हनुमान कवच, या अघोर शिव कवच, या इंद्र वज्र कवच, इंद्राक्षी कवच, भगवती दुर्गा से संबंधित कोई कवच, कामाख्या माँ से संबंधित कवच, या अप्राजिता कवच। ऐसे-ऐसे कवच हैं, ऐसे-ऐसे स्तोत्र हैं — विपरीत महाप्रत्यंगिरा के बारे में सुना होगा; एक महाविपरीत भी होती हैं — और अपराजिता के सिवाय महाविद्याओं के अलग-अलग कवच होते हैं, और वज्र पंजर होते हैं। वज्र पंजर ऐसी चीज़ है, वे कहते हैं, कि कवच के साथ उसमें कवच का दस गुना बल होता है। किसी ने वज्र पंजर कर लिया है तो वह प्रेत बाधाओं को पूरी तरह हटा ही नहीं सकता, उन्हें दंडित भी कर सकता है। नाम ही है वज्र पंजर, देवी-देवता का पंजर: पंजर यानी अस्थि — हमारी छाती की हड्डियाँ, पसलियाँ — और वह उसी तरह काम करता है, पूरा घेरा डाल देता है। कवच तो सिर्फ कूटता है, लेकिन वज्र पंजर बाँधकर कूटता है, और फिर उसकी आने की हिम्मत नहीं होती। तो किसी भी देवी-देवता का वज्र पंजर, कोई वैसा कवच, या महाविद्या स्तुति — इन सबको विधि-विधान से अच्छी तरह समझकर, किसी शिव मंदिर में जाकर सिद्ध करें, नियमित पाठ करें, संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर, विधि-विधान से, ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। रहकर, सभी नियमों का पालन करते हुए, और चाहे कितनी भी बाधा हो, कितना भी कष्ट हो, छोड़ें नहीं — लेकिन मंदिर में करना है, घर में नहीं। तब एक निश्चित समय के बाद आपको एक ऊर्जा, एक शक्ति प्राप्त होती है, या उसके माध्यम से, उसकी कृपा से ऐसा हो जाता है कि ये बाधाएँ दबने लगती हैं, या आपको मार्गदर्शन मिलने लगता है कि इन्हें कैसे दबाएँ। यदि वह नहीं करेंगे, केवल घर में करेंगे, तो बाधा बड़ी हुई तो कुछ फायदा नहीं होगा।
सावधानी: जिसकी कुंडलिनी जागृत है वह यूट्यूब पर उसकी प्रक्रिया नहीं बताता
वक्ता कुंडलिनी जागरण से इनकार करते हैं; उनका मार्ग मंत्रोक्त और गृहस्थ
सोऽहम् से कुण्डलिनी जागरण पर वीडियो बनाने की माँग पर वक्ता साफ कहते हैं कि वे झूठ नहीं बोल सकते: उनकी कुंडलिनी जागृत नहीं है और न उन्हें उसका विधान पता है। जो यूट्यूब पर कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया खोज रहे हैं उनसे वे कहते हैं कि जिसकी कुंडलिनी वास्तव में जागृत हो जाएगी वह यूट्यूब पर आकर उसकी प्रक्रिया नहीं बताएगा। वे केवल इतना मानते हैं कि गुरु कृपा से उस मार्ग की कुछ अवस्थाएँ उन्होंने प्राप्त की हैं; बाकी उनका पूरा विधान मंत्रोक्त और सात्विक है, वे पूरी तरह गृहस्थ साधक हैं, और गृहस्थ साधनाओं पर बल देते हैं।
एक श्रोता ने पूछा कि सोऽहम् से किस प्रकार का कुण्डलिनी जागरण होता है, और क्या वे इस पर वीडियो बनाएँगे। वक्ता कहते हैं कि वे बिल्कुल झूठ नहीं बोल सकते: उनकी कुंडलिनी जागृत नहीं है, न ही उन्हें कुंडलिनी जागरण का विधान पता है। जो यूट्यूब पर कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया खोज रहे हैं उनसे वे यह कहते हैं: जिसकी कुंडलिनी जागृत हो जाएगी वह यूट्यूब पर आकर कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया नहीं बताएगा। वे केवल इतना कह सकते हैं कि गुरु कृपा से उस मार्ग की कुछ अवस्थाएँ उन्होंने अवश्य प्राप्त की हैं; बाकी उनका पूरा विधान मंत्रोक्त और सात्विक रहता है, वे पूरी तरह गृहस्थ साधक हैं और बल देते हैं कि लोग गृहस्थ साधनाएँ करें। कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया उन्हें नहीं आती, और वे स्पष्ट रूप से मना करते हैं।
ज्योतिष और तंत्र एक-दूसरे के पूरक: वर्षों से रुके जीवन को पढ़ना
पहले दशा, तीसरा भाव, लग्नेश और नवम भाव; गुरु-परंपरा के साधक को कुंडली की ज़रूरत नहीं
जिसे बीस साल से जीवन रुका-सा लगता है उसके प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि ज्योतिष और तंत्र पूरक हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं — तंत्र को पाखंड कहने वाले ज्योतिषी और ज्योतिष को पाखंड कहने वाले तांत्रिक दोनों गलत हैं, और दोनों को मिलाकर चलने से हर समस्या का हल मिलता है। पहले किसी अच्छे ज्योतिषाचार्य से कुंडली का विवेचन करवाएँ: किस ग्रह की दशा-अंतर्दशा चल रही है; पराक्रम का तीसरा भाव किसी ग्रह की दृष्टि में तो नहीं जो सारा कार्य रोक दे; लग्नेश की स्थिति, जो सबसे महत्वपूर्ण है; और भाग्य का नवम भाव। अपने इष्ट देवता और कुल की शक्तियों के लिए भी कुंडली का विवेचन करवा रखना चाहिए। लेकिन यदि आप पहले से तंत्रोक्त विधान से नियमित पूजन करते हैं और किसी गुरु परंपरा से जुड़े हैं, तो जन्म कुंडली की आवश्यकता नहीं — गुरु पर पूरा विश्वास रखकर आगे बढ़ते रहिए। साधारण व्यक्ति हैं और परेशानियाँ हैं तो कुंडली के उपाय लें, और राहु-केतु या शनि के दोष ऊपरी बाधा या अभिचार का संकेत हैं, जिसके लिए तंत्रोक्त विधान से सहायता लें; दोनों को मिलाकर बीच का रास्ता निकालें।
एक श्रोता ने कहा कि उसका जीवन बीस साल से ब्लॉक है और कारण पूछा। वक्ता कहते हैं कि कोई तो कारण होगा, और दो चीज़ों पर ध्यान देना चाहिए: ज्योतिष और तंत्र। कुछ लोग — ज्योतिषी खास करके, उनके ग्रुप में चले जाइए — तंत्र को पूरी तरह पाखंड बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं; और अच्छे-अच्छे तांत्रिक ज्योतिषियों को पाखंड कह देते हैं। वास्तविकता यह है, वे कहते हैं, कि ज्योतिष और तंत्र एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों को मिलाकर चलेंगे तो हर समस्या का हल मिल जाएगा; एक-दूसरे को नीचा न दिखाएँ तो बेहतर है। ज्योतिष में सबसे पहले देखिए: बीस साल से ब्लॉक लगता है तो किसी अच्छे ज्योतिषाचार्य से मिलिए, कुंडली का विवेचन करवाइए। किस ग्रह की दशा-अंतर्दशा चल रही है? ऐसा क्या कारण है कि सब कुछ रुका लगता है? पराक्रम का भाव — तीसरा भाव — उस पर किसी ग्रह की दृष्टि पड़ रही हो तो वह आपके पराक्रम को, जो भी कार्य कर रहे हैं, पूरी तरह ब्लॉक कर देगा; सबसे पहले वही देखना चाहिए। फिर लग्नेश की स्थिति देखिए, जो सबसे महत्वपूर्ण है कि क्या हो रहा है, क्या नहीं। और भाग्य की स्थिति, नवम भाव। यह सब पहले अच्छे ज्योतिषाचार्य से एनालाइज़ करवाइए — सबसे पहले वे यही कहेंगे। दूसरा कार्य है आपके इष्ट देवता और कुल की शक्तियाँ; ज्योतिष से जन्म कुंडली का विवेचन अवश्य करवा रखना चाहिए, देखना चाहिए। ऐसा नहीं है, वे कहते हैं, कि ज्योतिष को बाईपास करके तंत्र में घुस गए, या तंत्र को बाईपास करके ज्योतिष में चले गए; दोनों पूरक हैं। यदि आप नियमित पूजन-पाठ तंत्रोक्त विधान से, किसी विधान से कर रहे हैं, किसी गुरु परंपरा से जुड़े हैं, तो आपको जन्म कुंडली की आवश्यकता नहीं है: गुरु पर पूरा विश्वास रखिए, आगे बढ़ते रहिए; कोई दिक्कत नहीं। यदि उस स्तर के साधक नहीं हैं, साधारण व्यक्ति हैं, परेशानियाँ और कष्ट हैं, तो ज्योतिष से कुंडली का विवेचन करवाकर देखिए क्या परेशानी है और वे क्या उपाय बता रहे हैं। साथ ही राहु-केतु या शनि से संबंधित दोष हों तो ऊपरी बाधा या अभिचार का प्रभाव होता है; थोड़ी-बहुत सहायता वहाँ से लीजिए, बाकी तंत्रोक्त विधान से। दोनों को मिलाकर बीच का रास्ता निकालिए, उसके अनुसार विधि-विधान करते हुए जीवन सफल बनाइए — दोनों को लेकर चलिए।
गुरु मंत्र के बिना साधना: नौ गुरुओं के रूप में नवनाथ
गुरु न होना रुकने का कारण नहीं; गुरु पुष्य पर गुरु साबरी
जिसके गुरु हैं पर गुरु मंत्र नहीं मिला उसके प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि यह बहुत टेंशन लेने की बात नहीं है। गुरु मंत्र आवश्यक है और गुरु बिल्कुल ज़रूरी हैं — लेकिन यह बात गलत है कि गुरु न हो तो भक्ति या पूजा-पाठ में कमी आए या उसका फल न मिले, और वे इससे सहमत नहीं हैं; जो ऐसा आक्षेप लगाकर लोगों की भक्ति में संशय पैदा करते हैं वे सबसे बड़ा गलत काम करते हैं। बिना गुरु की कौन सी साधनाएँ हो सकती हैं इस पर उनका वीडियो है। साबरी में जो नवनाथ उन्होंने समूह से जगवाए वे स्वयं गुरु हैं — नौ गुरु; 28 तारीख को गुरु पुष्य नक्षत्र में वे फिर गुरु साबरी करवाएँगे, और पहले भी तीन-चार गुरु संबंधी साधनाएँ दी हैं — इनसे आरंभ करें, रुकें नहीं। गुरु हैं और मंत्र नहीं दे रहे तो उनसे बात करें।
अचानक क्रोध के लिए उपाय: सिरहाने ताँबे के लोटे में मिश्री का जल
ताँबा मंगल, जल चंद्रमा, मिश्री सूर्य; रविवार को कभी नहीं
छोटी-छोटी बातों पर अचानक क्रोध, जिससे घर का माहौल नकारात्मक हो जाए पर एक मिनट में शांत हो जाए, इस पर वक्ता पहले पूछते हैं कि क्या कुंभ लग्न है और लग्नेश सूर्य-मंगल लग्न में हैं — तब पारे की तरह चढ़ने और तुरंत उतरने वाला क्रोध स्वाभाविक है। लग्न कुछ और हो और यह दिक्कत हो, तो एक ही उपाय: रोज़ रात ताँबे के लोटे में जल भरकर थोड़ी गोटा मिश्री डालें, सिरहाने रखें, और सुबह तुलसी जी को अर्पित करें — पौधे पर नहीं, जड़ के पास डालें — रविवार छोड़कर छह दिन; कुछ दिनों में राहत मिलेगी। ज्योतिषीय कारण: सूर्य आत्मकारक हैं, मंगल क्रोध का सबसे बड़ा कारक, ताँबा मंगल का, जल चंद्रमा का और मिश्री सूर्य का प्रतिनिधि है, तो यह तीनों का एक तरह का उतारा है। साथ में वे कहते हैं: मेडिकल जाँच भी करवा लें — ब्लड प्रेशर आदि।
एक श्रोता ने कहा कि किसी भी अनुचित प्रकरण पर एकाएक क्रोध और चिड़चिड़ापन आ जाता है, जिससे घर का वातावरण नकारात्मक हो जाता है, हालाँकि क्रोध एक मिनट में शांत हो जाता है। वक्ता पहले पूछते हैं कि क्या वह कुंभ लग्न का है — ज्योतिष के अनुसार लग्नेश लग्न में सूर्य और मंगल हों। तब ऐसा हो सकता है: क्रोध एकाएक पारे जैसा चढ़ेगा और फिर तुरंत शांत हो जाएगा; ज़्यादा देर नहीं रहेगा। यदि ऐसी स्थिति नहीं है — लग्न कुछ और है और यह दिक्कत हो रही है — तो बार-बार आने वाले क्रोध के लिए सबसे अच्छा एक ही उपाय है: प्रतिदिन रात के समय ताँबे के लोटे में जल भरकर उसमें थोड़ी गोटा मिश्री डालें और अपने सिरहाने रखें। सुबह उठें तो उसे तुलसी जी के पास अर्पित करें। ध्यान रहे: पौधे पर नहीं चढ़ाना है, उनकी जड़ के पास डालना है। यह काम रविवार छोड़कर बाकी छह दिन लगातार करते रहना है। कुछ दिनों में ज़रूर राहत मिलेगी। इसका ज्योतिषीय कारण, वे कहते हैं: पहली बात, सूर्य आत्मकारक हैं; दूसरी, क्रोध का सबसे बड़ा कारक ग्रह मंगल है। ताँबा मंगल का प्रतिनिधित्व करता है, जल चंद्रमा का, और गुड़ या मिश्री कहीं न कहीं सूर्य का। तो इन तीनों चीज़ों से जब आप एक तरह से उतारा करते हैं तो शुभ प्रभाव मिलता है, और जो क्रोध और चिड़चिड़ापन बार-बार आ रहा है वह कम होगा। दूसरी बात, वे कहते हैं, मेडिकली भी दिखा लीजिए — टेस्ट करवाकर देख लें कोई चीज़ बढ़ी-घटी तो नहीं, ब्लड प्रेशर बार-बार तो नहीं बढ़ रहा; वह भी देखना चाहिए। सभी चीज़ों को लेकर चलना चाहिए।
सरल साधना से जुड़ाव क्यों नहीं लगता: मयोंग और सिद्धि का मौखिक हस्तांतरण
तंत्र में असली काम दो मिनट का; विद्या चावल पर दी जाती है
एक प्रतिभागी ने कहा कि पिछली साधनाओं की तरह वह नवनाथ साधना से जुड़ नहीं पाया, तो वक्ता कहते हैं कि यह सबके साथ हुआ क्योंकि साधना इतनी सरल थी — और आज लोग सरल चीज़ों को हल्का समझते हैं, जबकि तंत्र में असली काम दो मिनट का होता है। वे असम के पास मायोंग का उदाहरण देते हैं, जो जादूगर-जादूगरनियों के लिए प्रसिद्ध है और जहाँ सबसे अधिक तंत्र-अभिचार के काम होते हैं: कोई भी जानकार बताएगा कि वह इतना सरल है और पूरा परंपरा में चलता है। जैसा उनके सिद्धि ट्रांसफर वाले वीडियो में है, परंपरागत विद्याएँ इतनी सरलता से दी जाती हैं कि निश्चित समय पर सिर्फ बोलना होता है — "आज से मेरी यह चीज़, फलाना इतर-योनि का भूत-प्रेत, यह आप लो" — चावल पर पढ़कर हाथ में दे दिया, हो गया; उसे बुलाने का नाम है और मुश्किल से दो-चार अक्षर का मंत्र। तो साधना जितनी सरल, उतना कम एंगेजमेंट — सिर्फ 21 बार मंत्र और भोग — और अनुभवी साधक को उतना कम जुड़ाव लगता है, जबकि जिन्होंने कभी साधना नहीं की थी उन्हें सजावट आदि में आनंद आया और आत्मबल मिला, जो ज़रूरी था।
एक प्रतिभागी ने कहा कि इस बार वह पिछली साधना की तरह खुद को उतना कट नहीं कर पाया। वक्ता कहते हैं कि यह उसके अकेले के साथ नहीं, सबके साथ हुआ, क्योंकि साधना इतनी सरल थी। आज के समय की सबसे बड़ी बात यह है कि लोग सरल चीज़ों को सोचते हैं — "यह तो इतना आसान, इतना छोटा सा हो गया"। लेकिन तंत्र में, वे कहते हैं, दो मिनट का कार्य होता है। वे उदाहरण देते हैं: मायोंग, जो सिक्किम के पास, असम के पास पड़ता है, जहाँ सबसे अधिक तंत्र-अभिचार के काम होते हैं और जो जादूगर-जादूगरनियों के लिए प्रसिद्ध है। वहाँ किसी थोड़े भी जानकार से पूछें तो बताएगा कि इतना सरल होता है — पूरा का पूरा परंपरा में चलता है। उन्होंने सिद्धि ट्रांसफर कैसे होती है इस पर वीडियो डाला है, पूरा विधान; उसे पहले सुन लें तो अच्छे से समझ पाएँगे कि परंपरागत विद्याएँ कैसे दी जाती हैं। वे विद्याएँ इतनी सरल होती हैं, इतनी आसानी से हो जाता है, कि निश्चित समय में सिर्फ बोल लेना होता है। जैसे वे कह रहे हों: "दीपक जी, आज से मेरी यह चीज़ — फलानी चीज़, कोई इतर-योनि का, कोई भूत-प्रेत — हाँ, यह आप लो, यह आप ग्रहण करो।" बस इतना बोलना है, चावल पर पढ़कर दे दिया — "यह लो, तुम्हारा हुआ" — आपने हाथों में लिया, और वह आपका हो गया; खत्म। उसे बुलाने का कोई नाम है, जिसमें मुश्किल से दो-चार अक्षर का शब्द लगा रहेगा: वह मंत्र पढ़ो, काम होने लगेगा। उसी तरह साधना जितनी सरल होती है, उतना लगता है कि "मैं कनेक्ट नहीं हो पा रहा", क्योंकि ज़्यादा एंगेजमेंट नहीं करना पड़ा — सिर्फ 21 बार मंत्र पढ़ना और भोग देना। एक और भाई को भी यही संशय रहा कि सही हो रहा है या नहीं। नए लोग, जिन्होंने कभी कोई साधना नहीं की थी, जुड़े रहे, क्योंकि इतना सारा कार्य अच्छे से करने में उनका मन लगा, आनंद आया; जो कुछ साधनाएँ कर चुके थे उन्हें लगा "यह क्या, इतना आसान, इतना सिंपल", तो कनेक्शन में थोड़ी समस्या हुई — यह वे समझ सकते हैं। लेकिन उन्होंने कहा था कि इनिशियल से लेकर चलेंगे: जो भाई पीछे रह गए थे, जिनके पास कोई साधना नहीं थी, उन्होंने यह थोड़ा कर लिया तो उनके अंदर आत्मबल आया, और यह ज़रूरी था।
किसी भी प्रयोग से पहले रक्षा की परतें: नवनाथ, गुरु साधना और इष्ट मंत्र
जगाए हुए गुरुओं के बिना नींबू फेंकना पलटवार को न्योता
वक्ता उदाहरण देते हैं कि सरल साधनाएँ किस काम की हैं: मान लीजिए किसी मित्र के घर में कोई तंत्र है, कोई चीज़ रात को चलती है। जिन नवनाथ को जगाना सिखाया है, जगाने पर वही सबसे पहले आपकी रक्षा करेंगे, और उनकी कृपा और आदेश से बाकी मंत्र चलेंगे। दूसरा, जो गुरु साधना वे देंगे उससे सारे मंत्र साधक और उसके घर-परिवार को सुरक्षित करेंगे। फिर जो इष्ट देवता का मंत्र वे सिद्ध करवाएँगे, उसे वहाँ जाकर फेंकना है — जैसे नींबू — और मंत्र वहाँ काम करेगा; लेकिन जब वहाँ से आप पर हमला होगा और आपने अपने गुरुओं को नहीं जगाया, उन्हें भोग-प्रसाद नहीं दिया, किसी से गुरु-दीक्षा नहीं है, तो वही खतरा है। इसीलिए उन्होंने कहा है कि साल भर साधनाएँ करवाएँगे: जो पहले करवाया जाता है उसका सबसे अधिक महत्व है, और तभी आगे बाकी का उपयोग होता है।
सर्वश्रेष्ठ पूजा के रूप में मानसिक पूजा
मन का भाव किसी भी भौतिक अर्पण से बढ़कर
वक्ता कहते हैं कि मानसिक पूजा को सर्वश्रेष्ठ पूजा कहा गया है: कोई उपचार उपलब्ध न हो तो मानसिक पूजन कर लेना चाहिए, और वह सबसे अधिक फल देता है। वैसे भी मानस का सबसे अधिक महत्व है — कितना भी भौतिक पदार्थ चढ़ा लें, लेकिन भगवती को गुलाब चढ़ाते हुए मन में सोच रहे हों कि काश यह अपनी प्रेमिका को दे दिया होता, तो मन कहीं और है, भाव किसी और का लग गया, और भगवती उसे स्वीकार कैसे करेंगी?
मानसिक पूजा को, वक्ता कहते हैं, सर्वश्रेष्ठ पूजा कहा गया है। कोई भी उपचार उपलब्ध न हो तो व्यक्ति को मानसिक पूजन कर लेना चाहिए; मानसिक पूजन सबसे अधिक फल देता है, और मानस का सबसे अधिक महत्व होता है। कितना भी भौतिक पदार्थ चढ़ा लीजिए — यहाँ आप भगवती को गुलाब का फूल चढ़ा रहे हैं और मन में अपनी प्रेमिका है कि "अरे यार, उसको देना होता है, यह कितना सुंदर, काश उसे दे दिया होता।" तो आपका मानस कहीं और है, मन कहीं और है; भगवती स्वीकार करेंगी भी तो कैसे, जब भाव किसी और का लग गया? इसलिए मानसिक का महत्व, वे कहते हैं, बहुत अधिक है।
भूत-प्रेत के विरुद्ध सबसे प्रभावी कवच अपने इष्ट का
जिसका इष्ट हनुमान, उस साधारण साधक के लिए अकेली हनुमान चालीसा पर्याप्त
भूत-प्रेत प्रभाव से मुक्ति के लिए सबसे प्रभावी कवच पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: अपने इष्ट देवता का कवच, जिन पर सबसे अधिक विश्वास हो और जिन पर संशय न हो। उनके अपने इष्ट हनुमान जी हैं, जिन पर पूरा भरोसा है, इसलिए उनके लिए हनुमान चालीसा है; अकेली भी करें तो सर्वश्रेष्ठ विधि है, और उसके बाद साधारण साधक को अन्य किसी कवच की ज़रूरत ही नहीं। तो अपने इष्ट के कवच का जागरण करें।
भूत-प्रेत प्रभाव से मुक्त होने के लिए सबसे प्रभावी कवच कौन सा है? वक्ता उत्तर देते हैं: आपके इष्ट देवता जो हों, जिन पर आपको सबसे अधिक विश्वास हो — उन्हीं का कवच, जिन पर आपको संशय न हो। उनके अपने इष्ट हनुमान जी हैं, वे कहते हैं, और उन पर पूरा भरोसा है; तो उनके लिए हनुमान चालीसा है। हनुमान चालीसा अकेले भी करेंगे तो सर्वश्रेष्ठ विधि रहेगी, और वह कर लेने के बाद अन्य कोई कवच करने की ज़रूरत ही नहीं होगी — यदि आप साधारण साधक हैं। तो आप अपने इष्ट के कवच का जागरण कर सकते हैं।
हर साँस के साथ देवता के नाम का अजपा जप पर्याप्त है
दिन भर "ॐ शिव गोरक्ष" का मानसिक जप
"ॐ शिव गोरक्ष" का दिन भर, हर साँस के साथ मानसिक जप किया जा सकता है या नहीं, इस पर वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। भगवान के नामों का जितना अजपा जप करें — यानी मानसिक रूप से जप — वह बहुत है।
एक श्रोता ने पूछा कि क्या "ॐ शिव गोरक्ष" का जप दिन-रात, हर साँस के साथ मानसिक रूप से किया जा सकता है। हाँ, वक्ता कहते हैं, बिल्कुल किया जा सकता है। भगवान के नामों का जितना अजपा जप करें — यानी मानसिक रूप से जप — वह बहुत है।
लंबी आर्थिक तंगी का उपाय: घर में शिवलिंग, नित्य जल और रुद्राष्टक
सामर्थ्य हो तो शिवरात्रि की रात्रि रुद्राभिषेक
करीब बीस साल से गंभीर आर्थिक तंगी झेल रहे व्यक्ति के लिए वक्ता कहते हैं कि सबसे ठोस उपाय, यदि सक्षम हों, शिवरात्रि की रात्रि में रुद्राभिषेक करवाना है। आर्थिक रूप से सक्षम न हों और साधारण करना चाहें, तो घर में शिवलिंग हो तो अच्छा है — घर पर कर सकते हैं — और नियमित रूप से जल चढ़ाएँ और साथ में रुद्राष्टकम् का पाठ करें; इतना भी करेंगे तो बहुत होगा। वह व्यक्ति क्या-क्या करता है यह जाने बिना वे अधिक नहीं बताते, और टेलीग्राम ग्रुप में स्थिति बताने को कहते हैं ताकि बेहतर मार्गदर्शन कर सकें।
एक श्रोता ने करीब बीस साल से खराब आर्थिक स्थिति के लिए सबसे ठोस उपाय पूछा। उनके लिए सबसे बढ़िया उपाय, वक्ता कहते हैं, यही है: यदि सक्षम हैं तो शिवरात्रि के समय रात्रि में रुद्राभिषेक करवाएँ। यदि आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं और साधारण करना चाहते हैं, तो घर में शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। हो तो अच्छा है — घर पर कर सकते हैं; नहीं तो नियमित रूप से जल चढ़ाएँ और उसके साथ रुद्राष्टकम् का पाठ करें। इतना भी करेंगे तो बहुत होगा। यदि अधिक करना चाहते हैं और साधक हैं तो कमेंट करें — वक्ता कहते हैं कि वे ज़्यादा इसलिए नहीं बताते क्योंकि उन्हें पता नहीं कि वह व्यक्ति क्या-क्या करता है; कम बताएँगे तो संशय होगा कि इतना कम बता रहे हैं, अधिक बताएँगे तो हो सकता है वह पहले से बहुत करता हो। तो पहले वह बताए, या टेलीग्राम ग्रुप में जुड़कर परेशानी बताए, जहाँ वे बेहतर गाइड कर पाएँगे।
काल सर्प दोष या भारी मंगल: हनुमान और शिव की साधना पर्याप्त
लय बनाए रखें; और कुछ नहीं चाहिए
काल सर्प दोष और भारी मंगल वाले, जो पहले से शिव साधना करते हैं, के यह पूछने पर कि क्या यह पर्याप्त है, वक्ता कहते हैं हाँ: हनुमान जी और शिव जी की साधना पर्याप्त है — बस लय से करते रहिए।
एक श्रोता ने कहा कि उसकी कुंडली में मंगल भारी है, काल सर्प दोष है, और वह शिव साधना करता है — क्या यह पर्याप्त है? वक्ता उत्तर देते हैं कि हनुमान जी और शिव जी की साधना पर्याप्त है। बस लय से करते रहिए, वे कहते हैं।
स्तोत्र का देवता उच्चाटन नहीं करता, जब तक साधना कुल-शक्ति से न टकराए
शांत कुलदेवता बनाम महावीर या अस्त्र साधना
क्या जिस स्तोत्र का पाठ कर रहे हैं उसका देवता स्वयं उच्चाटन कर सकता है, इस पर वक्ता कहते हैं नहीं — वह शक्ति ऐसा नहीं करेगी, जब तक आप कोई गलती न कर रहे हों। सबसे पहले व्यक्ति को देखना चाहिए कि उसकी कुल की शक्तियाँ कौन हैं — जिन्हें वह कुलदेवता के रूप में मानता है। जैसे कोई ब्रह्म आपके कुलदेवता हैं और आपने महाविद्या, महावीर या अस्त्र-मंत्र की साधना उठा ली, तो उन्हें कष्ट होगा, और उन्हें कष्ट होगा तो वे आपको कष्ट देंगे; साधना सफल नहीं होगी और आप उस पाठ-पूजा को दोष देंगे जो शुरू की, जबकि गलती मूल में है — गलत साधना उठा ली। पहले उन्हें देखिए, उनसे आदेश लीजिए, जानिए वे किस प्रकार के साधक थे या कोई पैशाचिक शक्ति थे जिन्हें शांत करके बैठाया गया है; तभी साधना आरंभ करें। इसके अलावा साधारण रूप से गलती के बिना उच्चाटन नहीं होता — देवता की परीक्षा अलग बात है और वह इतनी आसानी से नहीं होती।
एक प्रतिभागी ने पूछा कि जिस स्तोत्र का वह पाठ कर रहा है उसका देवता क्या उस पर उच्चाटन कर सकता है। नहीं, वक्ता कहते हैं — वह शक्ति उसका उच्चाटन नहीं करेगी; लेकिन यदि वह कोई गलती कर रहा है तो बात अलग है। उन्होंने बहुत पहले, फेसबुक पर भी, बताया था कि कोई भी स्तोत्र पाठ फलित कैसे होता है। इसीलिए वे कहते हैं कि सबसे पहले व्यक्ति को अपने कुल की शक्तियों को देखना चाहिए: कुल की शक्ति कौन-कौन है — जिन्हें ग्रहण करना है, जिन्हें कुलदेवता के रूप में मान रहे हैं। मान लीजिए वे आपके कुलदेवता हैं और आपने इधर महाविद्याओं की साधना उठा ली, या किसी अस्त्र मंत्र की साधना कर रहे हैं — तो उन्हें कष्ट होगा। उन्हें कष्ट होगा तो वे आपको कष्ट देंगे। साधना सफल नहीं होगी — और आप किसे दोष देंगे? आप कहेंगे, मैंने यह पाठ-पूजा आरंभ की और मेरी परेशानी शुरू हो गई। गलती कहाँ है? मूल में गलती है: गलत साधना उठा ली। पहले उन्हें देखिए, उनसे आदेश लीजिए; देखिए वे किस प्रकार के साधक थे, या कोई पैशाचिक शक्ति थे जिन्हें शांत करके बैठाया गया है। यह सब देखना होता है; तभी साधना आरंभ करनी चाहिए। एक दिक्कत वहाँ से आती है। दूसरी बात, वे कहते हैं, कि साधारण रूप से व्यक्ति ऐसे उच्चाटित नहीं होता जब तक कोई गलती न हो जाए — या परीक्षा हो, जो अलग मैटर है; परीक्षा साधारण रूप से इतनी आसानी से नहीं होती।
विशाल स्तोत्र अनुष्ठान के दौरान घर की अशांति परीक्षा है, विफलता नहीं
हज़ारों गणपति अथर्वशीर्ष पाठ, हर सौ पर हवन
वक्ता कहते हैं कि उच्चाटन तब होता है जब बहुत अधिक कर लिया हो। वे दो-तीन ऐसे लोगों को जानते हैं जो गणपति अथर्वशीर्ष का हज़ारों पाठ करते हैं — हज़ार पाठ का संकल्प लेकर, हर सौ पर हवन — और बताते हैं कि जीवन में कुछ परिवर्तन नहीं आ रहा। वे उन्हें पॉज़िटिव रहने को कहते हैं: वे उस स्तोत्र से, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह हर पुण्य देता है और बड़े से बड़े ग्रह दोष मिटाता है, बहुत बड़ी ऊर्जा बना रहे हैं, और वह ऊर्जा जब देने पर आएगी तो बहुत कुछ देगी; इतना बड़ा अनुष्ठान करने वालों को छोटा कुछ मिलेगा ही नहीं, इसलिए पहले परीक्षा ली जाती है कि वे किस स्तर तक जा सकते हैं, और उसी अनुसार प्राप्त होता है। उस परीक्षा की स्थिति में उच्चाटन होगा — शांति भंग होगी, घर में झगड़े होंगे — लेकिन यह साधना का नकारात्मक प्रभाव नहीं, उस स्तर से अगले स्तर पर जाने का विधान मात्र है। अलग से वे जोड़ते हैं कि पाठ से मन हटे तो कारण यह भी हो सकता है कि एक जगह ज़्यादा जाने से मन हट जाता है — शुरू में मज़ा आता है, बाद में हट जाता है — जो अलग मैटर है।
उच्चाटन तब होता है, वक्ता कहते हैं, जब आप बहुत अधिक कर लिए हों। फेसबुक से जुड़े दो-तीन व्यक्तियों को उन्होंने देखा है जो गणपति अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है। का बहुत अधिक पाठ कर चुके हैं। वे सच में देखते हैं, वे कहते हैं, कि ये लोग इतने पाठ करते हैं — हज़ारों-हज़ार का संकल्प लेते हैं: "मैं हज़ार पाठ का संकल्प ले रहा हूँ," बताते हैं, और पूरा होने पर हवन करते हैं — सौ-सौ पाठ पर हवन करते जाते हैं — और बताते हैं, "गुरु जी, मेरे हज़ार पाठ पूरे हो गए।" फिर भी वे देखते हैं कि उनके जीवन में कुछ परिवर्तन नहीं आ रहा; वे कहते हैं कुछ परिवर्तन नहीं हुआ। वे उनसे कहते हैं: पॉज़िटिव रहो। जो कर रहे हो वह बहुत बड़ी एनर्जी क्रिएट कर रहा है — गणपति अथर्वशीर्ष के हज़ारों पाठ, जिसके विषय में कहा जाता है कि सुबह और रात्रि पाठ किया जाए तो हर प्रकार का पुण्य मिलता है और बड़े से बड़े ग्रह दोष मिट जाते हैं। ये लोग वह हज़ारों में कर रहे हैं और कहते हैं कुछ नहीं हो रहा। यह, वे कहते हैं, बस परीक्षा हो रही है; इसे परीक्षा कहा जाता है। क्योंकि वहाँ जो ऊर्जा क्रिएट हो रही है वह जब देने पर आएगी तो बहुत कुछ देगी। इतना बड़ा अनुष्ठान कर लिया है तो इन्हें छोटा कुछ मिलेगा भी नहीं — छोटा लेने लायक वे हैं ही नहीं। पहले परीक्षा लेकर देखा जाएगा कि वे किस स्तर तक जा सकते हैं, उसी अनुसार प्राप्त होगा। तो वहाँ परीक्षा की स्थिति बनती है, वहाँ उच्चाटन होगा, शांति भंग होगी, घर में झगड़े होंगे — तो फिर कहेंगे कि हाँ, परीक्षा चल रही है। यह साधना का नकारात्मक प्रभाव नहीं है, बल्कि उस स्तर से आगे के स्तर पर जाने का एक विधान मात्र है। बाद में, पाठ से मन बार-बार क्यों हटता है इसके उत्तर में वे कहते हैं कि जैसा लोग कहते हैं, एक जगह ज़्यादा जाने से मन हट जाता है, इसलिए शुरू-शुरू में मज़ा आता है और बाद में हट जाता है — पर वह मैटर अलग है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।