नवरात्र के विशेष तंत्र काल — रात्रि काल, महा अष्टमी की मध्य रात्रि और संधि पूजा
नवरात्र का शेड्यूल, नियम और एक लंबा प्रश्नोत्तर सत्र।
59 concepts, in the order they are taught. Jump to any one.
49 also answer a common question
Questions this answers
49 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.
बहुत सारे अनुष्ठान बिखेरने के बजाय एक ही को बार-बार करें
क्या हर नवरात्र में अनुष्ठान बदलते रहना चाहिए?
नहीं। आप भले दीक्षित न हों, पर जब किसी अनुष्ठान या साधना को पकड़ें तो एक ही प्रकार के अनुष्ठान, एक ही प्रकार की साधना को बार-बार करें। जिसने पिछले नवरात्र में 32 नामावली के 1100 पाठ कर लिए हैं, उसे इस बार प्रयत्न करना चाहिए कि वही चक्र विधि से कर ले।
वक्ता कहते हैं कि उनका एक विषय यह कहना है: आप भले दीक्षित न हों, लेकिन जब किसी अनुष्ठान को, किसी साधना को पकड़ें, तो एक ही प्रकार के अनुष्ठान और एक ही प्रकार की साधना को बार-बार करें। जैसे — यदि किसी ने दुर्गा द्वात्रिंशन्नाम के 1100 पाठ सामान्य रूप से प्रत्येक नवरात्र में किए हैं, या अभी शुरू ही किया है और किसी एक नवरात्र में 1100 पाठ कर लिए हैं — तो इस नवरात्र में उन्हें प्रयत्न करना चाहिए कि कम से कम उतना ही चक्र विधि से कर लें।
फिर एक कवच, फिर बीजाक्षर, अर्गला या रात्रि सूक्त
अभ्यास बन जाने पर साथ में एक कवच जुड़ता है, और उसके बाद बीजाक्षर, अर्गला या रात्रि सूक्त
जब अभ्यास हो जाए और आप बहुत कम समय में उसे पूरा कर ले रहे हों, तब उसके साथ में एक कवच कर लीजिए। कवच आदि हो जाए तो बीजाक्षर पर चले जाइए; या भगवती के अर्गला के प्रथम मंत्र के पूरे बृहद विधान पर; या यदि मंत्र नहीं, स्तोत्र चाहिए तो तंत्रोक्त रात्रि सूक्त पर। लेकिन एक बेस को पकड़ कर चलिए।
वक्ता कहते हैं कि जब अभ्यास हो गया है और आप बहुत कम समय में उसे कंप्लीट कर ले रहे हैं, तब उसके साथ में एक कवच कर लीजिए। जब कवच आदि हो जाए, तब आप बीज बीजाक्षर पर चले जाइए। या भगवती के अर्गला स्तोत्र के प्रथम मंत्र का जो पूरा बृहद विधान है, उस पर चले जाइए। और यदि आप मंत्र पर नहीं, स्तोत्र-स्तुति पर जाना चाहते हैं, तो रात्रि सूक्तम् का पूरा विशेष विधान दिया गया है, उस पर चले जाइए। लेकिन एक चीज को, एक बेस को पकड़ कर चलिए।
एक मंत्र, एक कवच या एक स्तोत्र जो कभी नहीं बदलता
हर नवरात्र में क्या चीज़ फिक्स रहनी चाहिए?
हर नवरात्र में आपकी एक चीज़ फिक्स होनी चाहिए — कि और जो भी करें, एकाक्षरी बीज का कम से कम सवा लाख जप अवश्य करेंगे; या 32 नामावली के कम से कम 1100 पाठ, या 3200 पाठ; या कामाख्या कवच का पाठ अवश्य; या जयंती मंगला का 10000 जप। उस एक चीज़ को कभी मत छोड़िए।
वक्ता कहते हैं कि हर नवरात्र में आपकी एक चीज़ फिक्स होनी चाहिए: कि नवरात्र में हम और भी कुछ अवश्य करेंगे — लेकिन एकाक्षरी बीज का जप कम से कम सवा लाख अवश्य करेंगे; या दुर्गा द्वात्रिंशन्नाम के कम से कम 1100 पाठ, या 3200 पाठ अवश्य कर लेंगे; या कामाख्या कवच का पाठ अवश्य करेंगे; या जयंती मंगला काली का 10000 जप हर नवरात्र अवश्य करेंगे। उस एक चीज़ को कभी मत छोड़िए। उसे अवश्य कीजिए। उसके साथ आप किसी भी चीज़ को जोड़ते जाइए — कि इस बार हम कामाख्या कवच कर रहे हैं, अगली बार 32 नामावली, उसके बाद कुछ और। लेकिन एक चीज़ फिक्स होनी चाहिए। आपका एक मंत्र, एक कवच, या एक स्तोत्र — कुछ न कुछ आपका फिक्स होना चाहिए।
क्रमगत साधना अभी से शुरू करें — नवरात्र को खाली मत जाने दीजिए
जिसने अब तक कुछ भी नहीं किया है, वह किससे शुरुआत करे?
यदि आपने कुछ नहीं किया — न गणपति जी की साधना, न देव दीक्षा विधान, न भगवन दत्त का कुछ, न किसी गुरु परंपरा में हैं, न बटुक भैरव जी का कुछ — तो भी कम से कम भगवती के अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ कर सकते हैं। संस्कृत में नाम पढ़ने भी न आते हों तो दुर्गा चालीसा का चक्र विधि से पाठ कर लीजिए, या केवल दुर्गा चालीसा ही कर लीजिए।
एक साल, महीने में एक मूलभूत साधना
गुरु, गणपति, बटुक भैरव, पंचाक्षरी — ये मूलभूत साधनाएँ महीने-महीने करते हुए साल भर में पूरी हो जाती हैं
एक साल। साल भर के भीतर आप आराम से मूलभूत साधनाएँ — गुरु, गणपति, बटुक भैरव, पंचाक्षरी — महीना-महीना करके पूरी कर सकते हैं: श्रावण में पंचाक्षरी, चैत्र नवरात्र में कोई साधना, मार्गशीर्ष में बटुक भैरव जी, माघ में गणपति जी — आगे-पीछे देखकर।
वक्ता कहते हैं कि उसके पश्चात क्रमगत साधना करके इतनी दूर तक आइए कि अगले नवरात्र तक आप एकाक्षरी बीज की साधना पर हों। हम एक साल के लिए बोल रहे हैं, वे कहते हैं। एक साल के भीतर आप आराम से आरंभिक और मूलभूत साधनाएँ — गुरु, गणपति, बटुक भैरव जी, पंचाक्षरी मंत्र — महीना-महीना करते जाएँगे। सावन में पंचाक्षरी हो गया; अब चैत्र नवरात्र पड़ेगा, उसमें कोई साधना कर ली; मार्गशीर्ष के महीने में बटुक भैरव जी का कर लिया; और आगे-पीछे देखकर माघ के महीने में गणपति जी का कर लिया। इस प्रकार एक-एक महीने एक-एक साधना करते हुए आप आराम से साल भर में मूलभूत साधनाएँ कर लेंगे। बहुत सारी चीज़ों से आपको रिलीफ मिल जाएगा, कष्टों से छुटकारा मिल जाएगा। तब शक्ति साधना में एक साधना पकड़ लीजिए — कि भगवती दुर्गा की एकाक्षरी साधना को नित्य जीवन में अपनाकर चलना है।
विकल्प सुविधा के लिए हैं, फल के भेद के कारण नहीं
इतने सारे विकल्प आपकी सुविधा के लिए हैं, इसलिए नहीं कि एक से फल मिलता है और दूसरे से नहीं
इसलिए कि आपको जो सुविधाजनक लगे, वह आप कर सकें। ऐसा नहीं है कि 32 नामावली करेंगे तो फल मिलेगा और कवच करेंगे तो नहीं मिलेगा, या आपके कार्य सिद्ध नहीं होंगे — जगदंबा का स्वरूप हर जगह वही है, मूल में वही है, वहाँ से भी पूर्ण होगा।
वक्ता कहते हैं: भगवती दुर्गा के प्रणव को जीवन में उतार लीजिए — कि हर नवरात्र उसका सवा लाख तो अवश्य करेंगे, और बाकी समय में प्रतिदिन जितना जप हो सके। और जीवन में एक लक्ष्य ले लीजिए कि कम से कम एक करोड़ जप जितना जल्दी हो सके कर लेंगे। यह कीजिए। लेकिन कवच आदि अवश्य कर लीजिए। तो इसमें भ्रमित नहीं होना है, वे कहते हैं। विकल्प आपके लिए इसीलिए बहुत सारे हैं कि आपको जो सुविधा लगे, वह आप कर लें। इसलिए नहीं। ऐसा नहीं है कि 32 नामावली करेंगे तो आपको फल मिलेगा और कवच करेंगे तो फल नहीं मिलेगा, या आपके कार्य सिद्ध नहीं होंगे। जगदंबा का स्वरूप हर जगह वही है; मूल में वही है; वहाँ से भी पूर्ण होगा। आपके लिए कौन सा लग रहा है कि आप कर पाएँगे — प्रश्न यही है। आप यदि अर्गला स्तोत्र का प्रथम मंत्र भी करते हैं तो उससे भी कल्याण होना ही होना है, सुनिश्चित है। लेकिन हाँ — उससे जो ऊर्जा उत्पन्न होकर आपकी ओर अग्रसर हो रही है, उससे आप कितना संतुलित हो पा रहे हैं और कितना नहीं, इसीलिए क्रमगत विषय आता है।
गज पर आगमन — धन, धान्य और समृद्धि
इस बार जगदंबा का आगमन गज पर है — जो धन-धान्य से भरपूर करता है और समृद्धि बढ़ाता है
गज पर। और जब जगदंबा गज पर आती हैं तो धन-धान्य से भरपूर करती हैं, सुख-संपदा प्रदान करती हैं और समृद्धि की वृद्धि करती हैं — वे सुख-सौभाग्य देने वाली हैं।
वक्ता कहते हैं कि परसों, सोमवार से नवरात्र आरंभ हो रहा है। और भगवती का आगमन इस बार गज पर है। और गज पर जब जगदंबा आती हैं, तो धन-धान्य से भरपूर करती हैं, सुख-संपदा प्रदान करती हैं और समृद्धि की वृद्धि करती हैं। तो जगदंबा सुख-सौभाग्य देने वाली हैं।
कमल का अर्पण — 108, या नौ, या एक
नवरात्र में प्रतिदिन कितने कमल पुष्प अर्पित करने चाहिए?
विधान 108 कमल पुष्प प्रतिदिन का है; उतना न हो पाए तो एक या नौ, जितने आपको मिल जाएँ। उन्हें स्तुति से अभिमंत्रित कीजिए — तंत्रोक्त देवी सूक्त, या कोई एक मंत्र 11 या 27 बार, या "देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता" — और कलश पर, श्री विग्रह के पास, छाया-छत्र के पास या अखंड ज्योत के पास समर्पित कर दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि नवरात्र हर साधक के लिए कंपलसरी है — आप चाहे जिस शक्ति की उपासना करते हों, जिस देवता की उपासना करते हों। नवरात्र करना ही चाहिए, और देवी उपासना किए बिना किसी का कुछ होगा ही नहीं। तो हर किसी को कम से कम प्रतिदिन यह कर लेना चाहिए, यदि संभव हो: ऐसे तो 108 कमल का पुष्प चढ़ाने का विधान है, लेकिन उतना न हो पाए तो एक या नौ कमल पुष्प, जितने आपको मिल जाएँ। भगवती की स्तुति कर लीजिए — तांत्रोक्त देवीसूक्तम् कर लीजिए; या केवल एक ही मंत्र को 11 बार, 27 बार बोल लें; या "देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता" इसी मंत्र से — और उससे अभिमंत्रित करके कलश के ऊपर, या भगवती के श्री विग्रह के पास, या छाया-छत्र के पास, या अखंड ज्योति के पास समर्पित कर दीजिए, सजा दीजिए।
वे पहले से ही श्री की वृद्धि करने वाले स्वरूप में आ रही हैं
कमल का पुष्प ही विशेष रूप से क्यों चढ़ाया जाए?
क्योंकि जगदंबा पहले से ही ऐसी ऊर्जा और ऐसे स्वरूप के साथ आ रही हैं जिसमें वे समृद्धि देने वाली हैं — और कमल पुष्प से किया गया पूजन-अर्चन श्री की वृद्धि करने वाला हो जाता है। तो समर्पण करते ही आपके मनोभाव वहाँ परिलक्षित हो जाएँगे और शीघ्र ही भगवती की कृपा प्राप्त हो जाएगी।
वक्ता कहते हैं कि यह कीजिए; यह बहुत दिव्य लाभ देने वाला होता है। क्योंकि जगदंबा पहले से ही ऐसी ऊर्जा के साथ, ऐसे स्वरूप के साथ आ रही हैं जिसमें वे समृद्धि को देने वाली हैं — और जब हम कमल पुष्प से पूजन-अर्चन करते हैं तो वह श्री की वृद्धि करने वाला हो जाता है। तो जैसे ही आप समर्पण करेंगे, आपके मनोभाव वहाँ परिलक्षित हो जाएँगे और शीघ्र अति शीघ्र भगवती की कृपा आपको प्राप्त हो जाएगी। तो यह प्रतिदिन अवश्य करना है।
इस बार दस दिन, और व्रत शरीर की क्षमता के अनुसार
नवरात्र का व्रत किस प्रकार रखा जाए?
इस बार नवरात्र दस दिन का है; साधकों को दस दिन व्रत रखना है और ग्यारहवें दिन पारण होगा। व्रत अपने शरीर की क्षमता के अनुसार कीजिए — फलाहार रहकर, या एक समय अन्न खाकर, जैसा शरीर साथ दे। लेकिन यदि आप शरीर से हष्ट-पुष्ट हैं और खाना खाकर व्रत कर रहे हैं तो वह उचित नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि इस बार नवरात्र दस दिन का है: साधक को दस दिन व्रत रखना है, और ग्यारहवें दिन पारण होगा। पुनः इस विषय को जान लीजिए, वे कहते हैं: नवरात्र में अपने शरीर की क्षमता के अनुसार व्रत आदि कीजिए। फलाहार रहकर कीजिए, या एक समय अन्न खाकर कीजिए — जैसा आपका शरीर साथ देता है, उस अनुसार चलिए। लेकिन यदि आप शरीर से हष्ट-पुष्ट हैं, तो खाना खाकर कर रहे हैं तो यह उचित नहीं है। ऐसे में आपको फलाहार रहकर या फलों के रस का सेवन करके रहना चाहिए। यह अनिवार्य विषय है।
जो चंडिका का पूजन नहीं करता, उसके पुण्यों का भक्षण
नवरात्र में पूजन न करने के विषय में सप्तशती क्या कहती है?
वक्ता कहते हैं कि इस विषय को बोलने से लोग तुरंत कंट्रोवर्सी में पड़ जाते हैं, पर लिखित विषय की चर्चा कर रहे हैं: भगवती कहती हैं कि जो चंडिका का पूजन नहीं करता, उसके समस्त पुण्यों का भी वे भक्षण कर जाती हैं, भस्म कर देती हैं और कष्ट देती हैं। इसके पीछे कारण है।
वक्ता कहते हैं कि जब आप दुर्गा सप्तशती का पाठ करेंगे — यद्यपि इस विषय को बोलने से लोग तुरंत कंट्रोवर्सी में पड़ जाते हैं, पर वे लिखित विषय की चर्चा कर रहे हैं — भगवती कहती हैं कि जो चण्डिका का पूजन नहीं करता, उसके समस्त पुण्यों का भी वे भक्षण कर जाती हैं, भस्म कर देती हैं और कष्ट देती हैं। इसके पीछे कारण है, वे कहते हैं। यह जो नवरात्र है — नवरात्र में यदि आप उपासना-साधना नहीं करते हैं, तो कालांतर में बड़ा कष्ट होने वाला होता है। और बड़ा विषय यह भी है कि वर्ष भर में आप जो पुण्य करते हैं, वे पुण्य नवरात्र के नौ दिनों में भगवती की स्तुति मात्र से आराम से प्राप्त हो जाते हैं।
अकेले देवी अथर्वशीर्ष से पाँचों अथर्वशीर्ष का फल
देवी अथर्वशीर्ष से क्या प्राप्त होता है?
उसकी फलश्रुति में आता है कि पाँचों अथर्वशीर्ष के अध्ययन से जो फल प्राप्त होता है, वह मात्र देवी अथर्वशीर्ष के पाठ से प्राप्त हो जाता है — और उसके साथ भगवती और भी बहुत कुछ प्रदान करती हैं, जिसमें नवार्ण तथा पंचदशी विद्या का महात्म्य भी है।
वक्ता कहते हैं कि भगवती एकमात्र ऐसी शक्ति हैं — आप अथर्वशीर्ष का पाठ कीजिए। देवी का पाठ हिंदी में कीजिए, संस्कृत का विषय छोड़ दीजिए। अथर्वशीर्ष की फलश्रुति में एक विषय आता है: कि पाँचों अथर्वशीर्ष के अध्ययन से जो फल की प्राप्ति होती है, वह मात्र देवी अथर्वशीर्ष के पाठ से प्राप्त हो जाता है। पाँचवें अथर्वशीर्ष में जाइए और सूर्य अथर्वशीर्ष पढ़िए तो उसमें अलग-अलग फल मिलेंगे। भगवान शिव के अथर्वशीर्ष का पाठ कीजिए तो उसमें 60000 गायत्री मंत्र जप का फल और ऐसा बहुत कुछ प्राप्त होगा। नारायण का पढ़िए तो कुछ और प्राप्त होगा। गणपति के अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है। में पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि पाठ मात्र से कई सारे पापों का नाश हो जाता है। लेकिन यदि आप केवल देवी का ही अथर्वशीर्ष पढ़ लेते हैं, तो उसमें उन पाँचों का फल भी मिल रहा है — और उसके साथ-साथ भगवती यहाँ और भी बहुत कुछ प्रदान कर देती हैं। उसमें, वे जोड़ते हैं, नवार्ण मंत्र का तथा पंचदशी विद्या का महात्म्य आपको पढ़ना चाहिए। तब इन शक्ति स्वरूपों के प्रति आपका समर्पण बढ़ेगा।
एक ही पाठ हर स्वरूप के लिए पर्याप्त — यज्ञोपवीत धारियों के लिए और उत्तम
क्या अथर्वशीर्ष हर स्वरूप के लिए अलग-अलग करना पड़ता है?
नहीं — ऐसा नहीं है कि भगवती का अथर्वशीर्ष कर रहे हैं तो हर स्वरूप के लिए अलग करना है। एक बार सही से किया गया पाठ पर्याप्त है। जो यज्ञोपवीत धारण करते हैं, वैदिक हैं, वे करें तो और उत्तम है — पर जहाँ गुरु का आदेश है और आप उस स्तर के समर्पित साधक हैं, वहाँ विषय ही अलग हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि यदि आप भगवती का अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है। कर रहे हैं तो हर स्वरूप के लिए उसे अलग-अलग करना है। एक बार अथर्वशीर्ष सही से कर लिया, वही पर्याप्त है। यद्यपि उसके लिए, वे जोड़ते हैं, जो यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। आदि धारण करते हैं, वैदिक हैं, वे करें तो ज़्यादा उत्तम है। लेकिन फिर भी — यदि गुरु ने आपको आदेश कर दिया है और आप उस स्तर के समर्पित भक्त, साधक-साधिका हैं — तब तो विषय ही अलग हो जाता है।
भोर का समय अभिजीत से बेहतर — पूरा दिन हाथ में रहता है
घट स्थापना कब करनी चाहिए?
हो सके तो सुबह लगभग 5:35 से 7:25 के बीच — भोर का समय ले लीजिए। जहाँ केवल अभिजीत मुहूर्त मिलता है, वहाँ आधा दिन कलश स्थापना में बीत जाता है, पहले दिन की साधना हैंपर होती है और शरीर थक जाता है। इस बार भोर का समय मिल रहा है, तो अति उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि नवरात्र का सबसे पहला दिन घट स्थापना का है। सोमवार के दिन घटस्थापना का मुहूर्त अपने शहर, अपने स्थान के अनुसार आप देख सकते हैं — लेकिन सार्वजनिक रूप से जो सबसे सही समय है, वह सुबह का है। यदि सभी लोग उस दिन सुबह-सुबह कलश स्थापना कर लेते हैं तो पाठ-पूजन के लिए पूरा दिन आपको मिल जाएगा। कई बार क्या होता है, वे कहते हैं, कि मुहूर्त ही अभिजीत आदि मिलता है। और जब आधा दिन कलश स्थापना में बीत जाता है, तो पहले दिन की साधना कहीं न कहीं थोड़ी हैंपर होती ही है, और शरीर थक जाता है। इस बार समय बहुत अच्छा है: कलश स्थापना का मुहूर्त लगभग 5:30 से ले लीजिए — 5:35 से 7:25 तक का समय है, भोर का, सुबह का, प्रातःकाल का। इसी बीच कलश स्थापना कर लेते हैं तो अति उत्तम है। या फिर आप अभिजीत मुहूर्त में चले जाएँगे — 11:13 से 12:02 तक। अपने शहर के अनुसार यह समय थोड़ा आगे-पीछे हो सकता है; पंचांग आदि में देख सकते हैं। ज़्यादा नहीं, दो-चार मिनट का फ़र्क पड़ेगा — लेकिन कलश स्थापना का मुख्य समय यही रहेगा।
सिद्ध पीठ या ज्योतिर्लिंग में मुहूर्त नहीं — दीक्षा के लिए भी नहीं
क्या शक्ति पीठ में मुहूर्त देखना पड़ता है?
नहीं। जो शक्ति पीठ क्षेत्र हैं, तंत्र पीठ और भगवती के सिद्ध पीठ क्षेत्र हैं जहाँ जगदंबा नित्य विराजमान रहती हैं — जैसे द्वादश ज्योतिर्लिंग, स्वयंभू प्रकट लिंग, और काश्यादि क्षेत्र जहाँ शिव ने नित्य उपस्थिति बताई है — वहाँ मुहूर्त देखने की विशेष आवश्यकता नहीं पड़ती। दीक्षा तक के लिए नहीं।
वक्ता कहते हैं कि जो शक्ति पीठाधी क्षेत्र हैं — तंत्र पीठ और भगवती के सिद्ध पीठ-आदि क्षेत्र, जहाँ जगदंबा नित्य विराजमान रहती हैं; और जैसे द्वादश ज्योतिर्लिंग आदि क्षेत्र हैं, स्वयंभू प्रकट लिंग के क्षेत्र हैं, या जिन स्थानों में भगवान शिव ने नित्य अपनी उपस्थिति बताई है, काश्यादि क्षेत्र हैं — उन क्षेत्रों में, जहाँ भगवती और भगवान शिव नित्य उपस्थित रहते हैं, वहाँ आपको मुहूर्त आदि देखने की विशेष आवश्यकता नहीं पड़ती। यहाँ तक कि दीक्षा आदि के लिए भी वहाँ कोई नक्षत्र, मुहूर्त कुछ नहीं देखना है। उन जगहों के विषय में देवी पुराण महाभागवत का अध्ययन करेंगे, वे कहते हैं, तो उसमें भी इस विषय की चर्चा की गई है। लेकिन फिर भी, अपने कल्याण के निमित्त और मन में संशय न रहे, इसके लिए यदि आप इन समयों का पालन करेंगे तो उत्तम रहेगा।
तृतीया की वृद्धि, और सोमवार को महासप्तमी
इस बार तृतीया दो दिन पड़ रही है, जिससे महासप्तमी और कालरात्रि पूजन सोमवार को आ रहा है
द्वितीया मंगलवार को है; तृतीया इस बार दो दिन पड़ रही है — बुधवार और गुरुवार — क्योंकि तिथि की वृद्धि हुई है। शुक्रवार को चतुर्थी, शनिवार को पंचमी, रविवार को षष्ठी; और सप्तमी, यानी कालरात्रि पूजन, महासप्तमी, 29 सितंबर सोमवार को प्राप्त हो रही है।
घट स्थापना के बाद का क्रम वक्ता इस प्रकार बताते हैं। द्वितीया मंगलवार को है। तृतीया इस बार दो दिन पड़ रही है — तिथि की वृद्धि हुई है — तो तृतीया तिथि हमें बुधवार और गुरुवार, दो दिन प्राप्त हो रही है। शुक्रवार के दिन चतुर्थी, शनिवार को पंचमी, रविवार को षष्ठी। और सप्तमी — कालरात्रि पूजन, जो महासप्तमी है — वह 29 सितंबर सोमवार के दिन प्राप्त हो रही है।
रात 9 से 1 के बीच — और "रात में सप्तशती नहीं" का खंडन
नवरात्र का जप दिन के किस समय करना चाहिए?
नवरात्र है, तो विषय रात्रि काल का है। रात में की गई साधना अति उत्तम है — नवरात्र में भी वीराचारी साधक बनकर रात में साधना करने का प्रयत्न कीजिए। प्रतिदिन रात के 9:00 से रात के 1:00 बजे के बीच अपना अनुष्ठान कीजिए; जो भी पाठ करें, इसी बीच करें तो अति उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि अब प्रतिदिन का जो समय रहेगा — नवरात्रि है, तो विषय रात्रि काल का है। रात में जो साधना करेंगे, अति उत्तम है। वीराचार साधक बनिए; नवरात्र में भी रात में साधना करने का प्रयत्न कीजिए। तो नवरात्र में प्रतिदिन यदि आप रात के 9:00 बजे से रात के 1:00 बजे के बीच अपना अनुष्ठान आदि करते हैं — जो भी पाठ करें, इसी बीच करते हैं — तो अति उत्तम है। उनके अनुसार, वे कहते हैं, यह जगदंबा का समय है। और इस समय यदि कोई भी व्यक्ति — चाहे वह कोई तथाकथित संत हो, महात्मा हो, सिद्ध हो — आपको बोल रहा है कि रात में नहीं करना चाहिए, नवरात्र में दिन में ही कर लीजिए, रात में पाठ का विधान नहीं है — तो वह महाकाल नेमी, महा दुष्ट व्यक्ति है। वह सिर्फ़ और सिर्फ़ आपको कहीं न कहीं क्षय पहुँचा रहा है। ऐसे ही व्यक्ति का वीडियो हम देख रहे थे, वे कहते हैं, जो बोल रहा था कि रात के समय सप्तशती पाठ नहीं करनी है। अद्भुत लोग हैं।
दिन का ही विषय होता तो माई नव दिन कहतीं
यदि जप दिन का विषय है तो नवरात्र को नौ रात्रि क्यों कहा गया?
लिखा हुआ है कि रात के समय सप्तशती का पाठ नहीं करना है, और जिस कारण से लिखा गया है उसकी चर्चा कोई नहीं कर रहा — पर लिखा है इसलिए नहीं करेंगे। वक्ता पूछते हैं: भाई, फिर नवरात्र नव दिन क्यों नहीं है? माई बोल देतीं कि नव दिन है, दिन में ही करो, रात में मत करो।
वक्ता कहते हैं कि लिखा हुआ है कि रात के समय सप्तशती पाठ नहीं करना है। और जिस विषय को जिस कारण से लिखा गया है, उसकी चर्चा कोई नहीं कर रहा है — लेकिन लिखा हुआ है, इसलिए नहीं करेंगे। भाई, वे पूछते हैं: फिर नवरात्र नव दिन क्यों नहीं है? माई फिर बोल देतीं कि नहीं, नव दिन है — दिन में ही करो, रात में मत करो। तो यदि आप देवी उपासना कर रहे हैं तो इस विषय का विशेष ध्यान रखें। और फिर भी यदि आपके मन में संशय हो और किसी तथाकथित व्यक्ति को आप मानते हों, तो हमारी बात मानने की कोई आवश्यकता नहीं है, न ही हम इस प्रपंच में पड़ने वाले हैं। आप दोपहर में पाठ करके शाम के 6:00-7:00 बजते ही खा-पी के मस्त सो जाइए; मुझे उससे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन यदि आप इन विषयों के अनुरूप चलना चाहते हैं, तो विशेष करके रात्रि काल में ही अपना जप आदि करना चाहिए।
हर श्लोक की अपनी अलग अधिष्ठात्री शक्ति
रात्रि सूक्त के पंद्रह श्लोकों में से हर श्लोक की अपनी अधिष्ठात्री शक्ति महाविद्याओं में है
चैनल पर एक वीडियो प्रकाशित है जिसमें रात्रि सूक्त के सभी श्लोकों — विशेष रूप से पंद्रह श्लोकों — का पूरा विधान प्रत्येक महाविद्या के अनुसार स्पष्ट किया गया है, क्योंकि उसमें भगवती तारा, भगवती काली सभी का विशेष स्थान है। हर श्लोक की अपनी अलग अधिष्ठात्री शक्ति है। उनका अनुष्ठान रात में, 9 बजे के बाद करें।
वक्ता कहते हैं कि जो लोग तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम् का अनुष्ठान कर रहे हैं — इस चैनल पर एक वीडियो प्रकाशित है जिसमें पूरा विधान स्पष्ट किया गया है: पूरे रात्रि सूक्त के सभी श्लोकों का, और विशेष रूप से पंद्रह श्लोकों का, प्रत्येक महाविद्या के अनुसार। यदि आप उस अनुसार वह विशेष अनुष्ठान कर रहे हैं — क्योंकि उसमें भगवती तारा, भगवती काली, सभी का वहाँ विशेष स्थान है — तो उन प्रत्येक श्लोकों की अधिष्ठात्री अलग-अलग शक्तियाँ हैं। उनका अनुष्ठान रात में करें तो अति उत्तम है। रात के 9:00 बजे के बाद करें। और महाकाली कुल से संबंधित शक्ति का जो विशेष अर्चन-पूजन आप करेंगे, वह महासप्तमी की रात में — जो सोमवार को है — करें तो अति उत्तम रहेगा।
सोमवार की रात — उसे खाली मत जाने दीजिए
महा अष्टमी मंगलवार को है, पर निशीथ-व्यापिनी महा अष्टमी सोमवार की रात में प्राप्त होगी
महा अष्टमी सभी के लिए है और वह मंगलवार 30 तारीख को है — लेकिन निशीथ-व्यापिनी महा अष्टमी, जो मध्य रात्रि में व्याप्त रहती है, वह हमें सोमवार की रात में प्राप्त होगी। तो सोमवार की रात को खाली मत जाने दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि महा अष्टमी हम सभी के लिए है — वह मंगलवार, 30 तारीख को रहेगी। लेकिन एक बात का ध्यान रखिएगा: निशीथ-व्यापिनी जो महा अष्टमी रहेगी, वह विशेष करके हमें सोमवार की महारात्रि में, मध्य रात्रि में ही प्राप्त होगी। इसलिए सोमवार की रात को खाली मत जाने दीजिएगा। इस विषय का विशेष ध्यान रखना है: 29 तारीख को लगभग 4:30 बजे सप्तमी का समापन हो रहा है, और शाम 4:30 बजे के बाद से महा अष्टमी प्राप्त हो रही है। और जो महा अष्टमी महानिशीथ-व्यापिनी, मध्य रात्रि में व्यापिनी रहेगी, वह सोमवार के दिन रहेगी।
अनेक ग्रंथों की फलश्रुति उसी मध्य रात्रि को चुनती है
महा अष्टमी की मध्य रात्रि इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
क्योंकि अनेक फलश्रुतियों में आपको पढ़ने को मिलेगा कि जो शारदीय नवरात्र में महा अष्टमी की मध्य रात्रि में पाठ करता है, उस पर भगवती बहुत प्रसन्न होती हैं। बगलामुखी का कवच देख लीजिए, उनकी पाँचों अंग विद्याएँ देख लीजिए, ललितांबा का देख लीजिए; देवी गीता और पार्वती गीता में भी यही है।
वक्ता कहते हैं कि महा अष्टमी की मध्य रात्रि के पूजन का विशेष महत्व है। भगवती बगलामुखी का कवच देख लीजिए; उनकी पंचांग विद्या, जो पाँचों अंग विद्याएँ हैं, उन्हें देख लीजिए; भगवती ललितांबा का देख लीजिए। अनेक फलश्रुतियों में आपको पढ़ने को मिलेगा कि जो श्राद्ध काल में, शारदीय नवरात्र में, महा अष्टमी की मध्य रात्रि में पाठ करता है, उस पर भगवती बहुत प्रसन्न होती हैं। देवी गीता और पार्वती गीता का इधर बहुत प्रचार-प्रसार हुआ है, वे कहते हैं, और यह बहुत अच्छी बात है। उनका महात्म्य भी पढ़िए, फलश्रुति पढ़िए — तो उसमें भी है: जो एक बार भी शरद नवरात्र की महाष्टमी में, आश्विन शुक्ल पक्ष अष्टमी की मध्य रात्रि में उसका पाठ कर लेता है, उस पर भगवती कितनी प्रसन्न होती हैं। तो यह प्रयत्न अवश्य कीजिए। और यह केवल उसी के लिए नहीं कहा गया है, केवल पार्वती गीता के लिए नहीं है। भगवती के जिन भी मंत्रों का आप अनुष्ठान कर रहे हैं — ध्यान रखिएगा कि ये विशेष काल हैं।
मुख्य पाठ ग्यारह बजे आरंभ करके एक बजे तक ले जाएँ
उस रात का मुख्य पाठ और जप लगभग ग्यारह बजे शुरू होकर एक या डेढ़ बजे तक पूरा होता है
29 सितंबर सोमवार की रात में लगभग 11:00 बजे से अपना मुख्य पाठ और जप शुरू कर दीजिए, और रात में कम से कम 1 से 1:30 बजे तक उसे पूरा कर लीजिए। चाहे पार्वती गीता करें, चाहे देवी गीता, चाहे अपने मंत्रों का अनुष्ठान, कवच का, सप्तशती जी का — कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि सोमवार के दिन, जो 29 तारीख को पड़ रहा है — 29 सितंबर सोमवार — उस दिन रात में लगभग 11:00 बजे से अपना मुख्य पाठ शुरू कर देना है, जप शुरू कर देना है, और रात में कम से कम 1 से 1:30 बजे तक उस पाठ को कर लेना है। चाहे पार्वती गीता जी का करें, चाहे देवी गीता का करें, चाहे अपने जिन भी मंत्रों का अनुष्ठान कर रहे हों, कवच का, दुर्गा सप्तशती जी का — उनका अनुष्ठान कीजिए, कीजिए। हिंदी में भी करते हैं, वे जोड़ते हैं — कर लीजिए। स्तुति हिंदी में कीजिए, दुर्गा चालीसा कीजिए, कुछ भी कीजिए — लेकिन रात में जगिए। महाष्टमी की रात में जग जाएँगे तो अति उत्तम है।
वह काल जिसमें भगवती चामुंडा प्रकट होती हैं
संधि पूजा क्या है और कब पड़ रही है?
देवी भक्तों के लिए सबसे प्रमुख काल — वह क्षण जिसमें भगवती चामुंडा प्रकट होती हैं। इस बार वह 30 सितंबर मंगलवार को शाम 5:42 से 6:30 तक है। इसी काल में भगवती के लिए 108 का दीपदान, बलि, विशेष स्तुति और जप करना है। इस काल को कभी जाने नहीं देना है।
वक्ता कहते हैं कि 30 सितंबर मंगलवार को उदया-व्यापिनी अष्टमी है, तो अष्टमी का महत्व तो है ही। उस दिन हमें संधि पूजन करना है। संधि पूजा, वे कहते हैं, देवी भक्तों के लिए सबसे प्रमुख काल है। वह कब है? वह है 30 सितंबर मंगलवार के दिन संधि पूजा का समय — जिस समय भगवती चण्डिका चामुंडा प्रकट होती हैं। हर नवरात्र में वे यह विषय अवश्य सामने रखते हैं, और पुनः रखते हैं: इस काल को कभी जाने मत दीजिए। इसी काल में हमें भगवती के लिए 108 का दीपदान करना है; इसी समय में बलि करना है; इसी समय में भगवती की विशेष स्तुति करनी है; इसी समय में जप करना है। यह संधि काल का समय हमें नहीं जाने देना है। इस विषय का विशेष ध्यान रखिए। संधि पूजा का समय 30 सितंबर मंगलवार को शाम 5:42 से शाम 6:30 तक रहेगा; वही संधि काल रहेगा। तो उससे पहले तैयारी कर लीजिए, और फिर उस समय संधि पूजन कीजिए।
उस समय वे भाव देखती हैं, त्रुटि का दंड नहीं देतीं
शरद नवरात्र की बलि में कोई त्रुटि हो जाए तो?
ध्यान रखिए कि शरद नवरात्र में जो बलि पूजन और दीपदान आप करते हैं, उनमें कोई त्रुटि हो जाए तो भगवती उसका दंड आपको कभी नहीं देतीं — क्योंकि उस समय, सच कहें तो, वे भाव देखती हैं। जो जान-बूझकर अपराध करते हैं, उनकी बात वे नहीं कर रहे।
ध्यान रखिए, वे कहते हैं, कि शरद नवरात्र में जो बलि पूजन आप करते हैं, और जो दीपदान करते हैं, उनमें यदि कोई त्रुटि हो जाती है तो भगवती उसका दंड आपको कभी नहीं देतीं — क्योंकि उस समय, सही कहें तो, वे भाव को देखती हैं। जो जान-बूझकर अपराध करते हैं, उनकी बात हम नहीं कर रहे, वे जोड़ते हैं। श्री दुर्गा सप्तशती के बारहवें और तेरहवें अध्याय का अध्ययन कीजिए, जिसमें भगवती कहती हैं कि जो जाने या अनजाने भी बलि पूजन करता है, उससे भी मैं प्रसन्न होती हूँ। तो यह किसके लिए कहा गया है? सदैव के लिए नहीं — यह विशेष है, उनके लिए जो वार्षिकी पूजन में या शरद काल में कर रहे हैं। तो आराम से कीजिए। और फिर भी यदि मन में संशय है, यह शंका है कि नींबू काटेंगे तो कहीं हम ही न कट जाएँ — तो भैया, मत काटिए। संशय रखकर मत कीजिएगा।
महानवमी को हवन, उसी दिन आयुध पूजन, 2 अक्टूबर को पारण
हवन कब है, और नवरात्र का समापन कैसे होता है?
यदि आपका अनुष्ठान पूर्ण हो चुका है तो हवन 30 सितंबर को संधि पूजन के बाद भी कर सकते हैं, पर सबसे विशेष समय महानवमी, 1 अक्टूबर बुधवार है — चौघड़िया देख लीजिए, शुभ और अमृत लीजिए, राहु काल छोड़ दीजिए। आयुध पूजन उसी दिन है; अपराजिता और शमी पूजन 2 अक्टूबर को, फिर विसर्जन और पारण।
यह श्री दुर्गा अर्चन पद्धति में है, यहाँ गढ़ा नहीं गया
महाविद्या क्रम का पाठ कोई गढ़ी हुई बात नहीं — वह श्री दुर्गा अर्चन पद्धति में है
भगवती से संबंधित तंत्र ग्रंथों में सप्तशती पाठ की जो विविध विधियाँ दी गई हैं, उन्हें देख लीजिए; और कुछ नहीं तो आचार्य सुदत्त मिश्र शास्त्री जी द्वारा संकलित श्री दुर्गा अर्चन पद्धति देख लीजिए — यह विधान वहाँ भी मिलेगा। हमने कोई गढ़ा हुआ विधान आप पर नहीं थोपा है।
किसी ने कहा है कि ऐसा नहीं होता — पहले दिन एक पाठ, दूसरे दिन दो पाठ, वक्ता बताते हैं। हम अपने मन से नहीं कह रहे हैं, वे उत्तर देते हैं। भगवती से संबंधित तंत्र ग्रंथों में सप्तशती पाठ की जो विविध विधियाँ दी गई हैं, उन्हें देख लीजिए; और कुछ नहीं तो श्री दुर्गा अर्चन पद्धति देख लीजिए, जिसे आचार्य सुदत्त मिश्र शास्त्री जी ने लिखा — संकलित किया — है। यह विधान वहाँ भी आपको मिल जाएगा। यह हमारा कोई गढ़ा हुआ विधान नहीं है जो आप पर थोपा गया हो, वे कहते हैं — कि हमने नया महाविद्या क्रम बनाकर आपको करने के लिए दे दिया। और जो लोग मना कर रहे हैं, वे भगवती के लोक से ही सीधे आए हैं, वे कहते हैं; उन्हें अलग विधान प्राप्त हुआ है। हमें उनके विषय में पता ही नहीं है। कम से कम शास्त्रोक्त प्रमाण के अनुसार कोई विधान दिया जा रहा है; और उसमें भी यदि आपको संशय है, तो आप अपना जानें और आपके महागुरु जी अपना जानें — इसमें हम कुछ नहीं कह सकते।
तिथि नहीं, दिन के अनुसार चलिए — अष्टमी तक पूरा हो जाता है
तृतीया दो दिन पड़ने पर महाविद्या क्रम कैसे चलेगा?
दिन के अनुसार ही अपना पाठ बढ़ाते जाइए। पहले दिन प्रथम चरित्र; दूसरे दिन दो अध्याय, जैसा बताया गया है; इसी तरह आगे बढ़िए और तिथि को छोड़ दीजिए। सब कुछ अष्टमी तिथि तक पूरा हो जाता है — सात दिन में पूरा हो जाता है — और अष्टमी को केवल रहस्य आदि करना रहता है।
वक्ता कहते हैं कि तृतीया तिथि दो दिन हो जाने से यहाँ आप संशय में पड़ सकते हैं कि जो पाठ चतुर्थी को करना था वह कब करें — तृतीया दो दिन है तो क्या पाठ दो बार करें? नहीं। इसमें बस दिन के अनुसार अपना पाठ बढ़ाते जाइए। पहले दिन आपने प्रथम चरित्र का पाठ किया; दूसरे दिन दो अध्याय का पाठ होगा, जिस प्रकार उसमें बताया गया है; इसी तरह आगे बढ़ते जाइए। अब तिथि को छोड़ दीजिए। इसमें होगा यह कि सब कुछ अष्टमी तिथि तक पूर्ण हो जाएगा। सात दिन में पूरा हो जाता है। अष्टमी तिथि को आपको केवल रहस्य त्रय आदि करना है। तो आराम से अष्टमी तक पूरा कर लीजिए। हर बार यह थोड़ा आगे-पीछे होता है। और उसके बाद नवमी को आराम से हवन कर लीजिए। और यदि समय से पहले पूरा हो रहा है और आपके हाथ में एक दिन बच रहा है, तो उस बचे दिन में एक दिवसीय विशेष अनुष्ठान कर लीजिए, या उनकी स्तुति कीजिए, जप कीजिए, बढ़ा दीजिए — और उसके बाद हवन की प्रक्रिया पूरी कीजिए।
योगिनी मातृकाओं की शरण लीजिए — कार्य वही करती हैं
नवरात्र में किसकी शरण लेनी चाहिए?
भगवती से संबंधित आप जो भी अनुष्ठान कर रहे हों, और चाहे आप यह चैनल सुनते हों या न सुनते हों: जिस प्रकार समय चल रहा है और पूरे विश्व पर जैसी विपदा आ रही है, उसे देखते हुए इस समय हमें भगवती की योगिनी मातृकाओं की विशेष शरण लेनी चाहिए — क्योंकि हर क्षेत्र में भगवती का कार्य योगिनियाँ ही निष्पादित करती हैं।
वक्ता कहते हैं कि भगवती से संबंधित आप जो भी अनुष्ठान कर रहे हैं — चाहे आप यह चैनल सुनते हों या न सुनते हों, यद्यपि जो सुनेंगे वे करेंगे, और जो नहीं सुनते वे बस अपना आनंद लेकर चले जाएँगे — फिर भी, जिस प्रकार समय चल रहा है, पूरे विश्व पर जैसी विपदा और विपत्ति आ रही है, उसका प्रभाव कहीं न कहीं हम पर और हमारे परिवार पर पड़ना ही है। तो इस समय हमें भगवती की योगिनी मातृकाओं की विशेष शरण लेनी चाहिए। क्योंकि हर क्षेत्र में कार्य को — भगवती के कार्य को — योगिनियाँ ही निष्पादित करती हैं।
प्रतिदिन रात्रि में 64 नामों की नौ आवृत्ति, फिर नौ लौंग की बलि
64 योगिनियों के नामों का पाठ किस प्रकार करना है?
नामावली अपने पास रख लीजिए, डाउनलोड कर लीजिए, और प्रतिदिन रात्रि काल में 64 योगिनियों के नामों की कम से कम नौ बार आवृत्ति कीजिए — एक से 64 तक एक बार, पुनः एक से 64 तक, इस प्रकार नौ बार — और फिर नौ लौंग तथा कपूर की बलि दे दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि उसका पूरा विधान चैनल पर पहले से प्रकाशित है। नामावली को अपने पास रख लीजिए, डाउनलोड कर लीजिए। और प्रतिदिन रात्रि काल में 64 योगिनी के नामों की कम से कम नौ बार आवृत्ति कीजिए। यानी — एक से लेकर 64 तक आपने एक बार पाठ किया; पुनः एक से लेकर 64 तक — इस प्रकार नौ बार। और फिर नौ लौंग और कपूर की बलि दे दीजिए। योगिनी मातृकाओं को प्रसन्न करने का प्रयत्न अवश्य कीजिए। नवरात्र के समय में यदि आप इसे रात्रि काल में करते हैं तो अति उत्तम विधान रहेगा — चाहे आप कोई भी जप कर रहे हों, भगवती का कोई भी पाठ कर रहे हों।
R&D मत कीजिए — पहले 64 का स्वतंत्र पूजन कीजिए
क्या 64 योगिनी नामावली संपुट के साथ की जा सकती है?
अभी नहीं। यह पूछे जाने पर कि क्या दुर्गा बीज मंत्र या 64 योगिनी नामावली का जप जयंती मंगला के साथ संपुट में किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं: अभी इसमें मत जाइए। ये विधान अभी-अभी दिए गए हैं; अभी R&D मत कीजिए। पहले 64 योगिनियों का स्वतंत्र पूजन कीजिए। संपुट का समय आएगा।
वक्ता दोहराते हैं कि सबसे प्रमुख विषय कलश स्थापना है — और जो भी व्यक्ति अनुष्ठान में सम्मिलित होता है, उसके लिए वह अवश्य होती है; वह कभी छोड़ी नहीं जाती। यह पूछे जाने पर कि क्या दुर्गा बीज मंत्र का, या 64 योगिनी नामावली का जप जयंती मंगला काली के साथ संपुट में किया जा सकता है, वे उत्तर देते हैं: अभी इसमें मत जाइए। ये विधान अभी-अभी दिए गए हैं, और यही होता है: अब आपको पता चल गया कि संपुट लगाना है और कैसे लगाया जाता है, तो अभी R&D मत कीजिए। आप सभी ने अभी शुरुआत ही की है। पहले कम से कम 64 योगिनियों का स्वतंत्र पूजन कीजिए। अभी संपुट मत कीजिए। संपुट का समय आएगा। इस चैनल पर पहले जो संपुट का विषय और विधान दिया गया है वह सुरक्षित है; पहले वह कीजिए। सीधे हाई-प्रोफाइल में घुसेंगे तो दिक्कत होगी।
लोहे में कभी नहीं — लोहे के पात्र में मारण कर्म होता है
क्या लोहे के कुंड में हवन किया जा सकता है?
बिल्कुल नहीं। चाहे आपके तथाकथित कोई महासंत या जगद्गुरु ही क्यों न बोल रहे हों कि लोहे के हवन कुंड में हवन कर लीजिए, एलुमिनियम में कर लीजिए — मत कीजिएगा। लोहे के पात्र में मारण कर्म, निषिद्ध कर्म होता है। वह आपको क्षुद्रता प्रदान करेगा और पुण्यों का नाश करेगा।
यह पूछे जाने पर कि तांबे का हवन कुंड न मिले तो क्या लोहे के हवन कुंड में हवन पूर्ण रूप से सफल होगा, वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल नहीं। लोहे के कुंड में — चाहे आपके तथाकथित कोई महासंत और जगद्गुरु भी बोल रहे हों कि लोहे के हवन कुंड में हवन कर लीजिए, एलुमिनियम में कर लीजिए — मत कीजिएगा। लोहे के पात्र में मारण प्रयोग, निषिद्ध कर्म होता है। वह आपको क्षुद्रता प्रदान करेगा और पुण्यों का नाश करेगा। तो यदि हवन कुंड नहीं है, तो मिट्टी की, मृतिका की, बालू की वेदी बना लीजिए और उसके ऊपर हवन कर लीजिए। वह आपको अवश्य सफलता प्रदान करेगा। गाय के गोबर से लीप दीजिए, वहाँ हवन कर लीजिए। वेदी बस चार अंगुल ऊँची रखनी होती है: बालू या मिट्टी से चार अंगुल ऊँची, एक-एक हाथ लंबी-चौड़ी वेदी बना लीजिए, गाय के गोबर से लीप दीजिए। पूरा विधि चैनल पर उपस्थित है — पीडीएफ डाउनलोड कर लीजिए और हवन कर लीजिए। लेकिन लोहे के कुंड में हवन मत कीजिए। दोष अलग लगेगा और मेहनत अलग बेकार होगी।
भाव पर्याप्त है; और कुब्जिका कवच के लिए केवल जप
यदि मंदिर तक भी न जा सकें तो?
यदि आपके पास कुछ भी नहीं है तो कोई दिक्कत नहीं; मंदिर भी नहीं जा सकते तो कोई दिक्कत नहीं। यदि आपका भाव है तो पाठ आदि अवश्य कर लीजिए। और कुब्जिका कवच सिद्ध करने के लिए कोई हवन नहीं चाहिए — केवल जप कर लीजिए, बहुत है।
एक श्रोता, जिनके पास कुछ भी उपलब्ध नहीं है और जो मंदिर भी नहीं जा सकते, के पूछने पर वक्ता कहते हैं कि दोनों में कोई दिक्कत नहीं है। यदि आपका भाव है तो पाठ आदि अवश्य कर लीजिए। यह पूछे जाने पर कि कुब्जिका कवच सिद्ध करने के लिए कोई हवन भी करना होगा, वे उत्तर देते हैं: नहीं — केवल जप कर लीजिए, बहुत है। यह पूछे जाने पर कि नवरात्र में घर पर पीली राल की धुनी दी जा सकती है, वे कहते हैं: बिल्कुल दे सकते हैं।
एक बार धारण कर लिया तो कितना भी धो लें, नहीं डाल सकते
क्या पहनी हुई रत्न की अंगूठी कलश में डाली जा सकती है?
नहीं। एक बार आपने उस रत्न या अंगूठी को धारण कर लिया है, तो अब उसे कितना भी धो लीजिए, धोकर कलश में नहीं डाल सकते। उसे मत डालिए। नया है तो डालिए; नहीं है तो मत डालिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या घटस्थापना के समय रत्न की अंगूठी या धारण किया हुआ रत्न पूरी तरह साफ़ करके, गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। से धोकर कलश के जल में डाला जा सकता है, वक्ता स्पष्ट उत्तर देते हैं। एक बार यदि आपने उस रत्न को, उस अंगूठी को धारण कर लिया है, तो अब उसे कितना भी धो लीजिए — धोकर आप कलश में नहीं डाल सकते। उसे मत डालिए। नया है तो डालिए। नहीं है तो मत डालिए।
हर चंडी का अपना उत्कीलन और श्राप विमोचन
दस दिन के नवरात्र में सतचंडी की जाए तो?
वक्ता कहते हैं कि यदि आप सतचंडी अकेले करना चाहते हैं तो वह बड़ा बृहद विषय हो जाएगा। और उत्कीलन के विषय में: पूरी विधि और नियम हर बार रहेंगे। हर चंडी का अपना अलग श्राप विमोचन होगा; पूरे छह अंग सबके अलग रहेंगे।
एक श्रोता पूछते हैं कि इस बार नवरात्र दस दिन का है, तो सतचंडी करें तो क्या हर बार उत्कीलन करना पड़ेगा। सतचंडी कीजिए, वक्ता कहते हैं — लेकिन यदि आप सतचंडी अकेले करना चाहते हैं, अकेले करने वाले हैं, तो वह बड़ा बृहद विषय हो जाएगा। और जहाँ तक उत्कीलन का विधान है: पूरी विधि, पूरा नियम हर बार रहेगा। हर चंडी का अपना अलग-अलग शाप विमोचनएक प्रारंभिक शाप-निवारण अनुष्ठान — इसके बिना, या बिगड़ी हुई लय में दुर्गा सप्तशती जैसे ग्रंथों का पाठ करने से आध्यात्मिक अनुभव सुसंगत के बजाय विसंगत रूप से प्रकट हो सकते हैं। होगा। पूरे के पूरे छह अंग सबके अलग रहेंगे। इससे ठीक पहले वे एक श्रोता के उस अनुभव पर — कि 64 योगिनी नामों की 24 माला करते हुए एक अप्सरा की आवाज़ आई — कहते हैं कि यह बड़ा अद्भुत विषय है।
विनियोग एक ही बार; शिव उवाच बार-बार
संपुट पाठ में विनियोग किस प्रकार होगा?
नहीं — विनियोग एक ही बार होगा। आप शिव उवाच से आरंभ करेंगे, और शिव उवाच को ही बार-बार दोहराना है; विनियोग एक ही बार किया जाता है।
बटुक भैरव स्तोत्र से सप्तश्लोकी का संपुट पाठ कर रहे एक श्रोता के यह पूछने पर कि क्या सप्तश्लोकी का प्रथम श्लोक शिव उवाच और विनियोग हर बार करना है, वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं। विनियोग एक ही बार होगा। आप शिव उवाच से आरंभ करेंगे; विनियोग एक बार होगा, और शिव उवाच को आपको बार-बार दोहराना है। उत्तर देते हुए वे साधना का स्वरूप भी जाँचते हैं — कि आप सप्तश्लोकी के एक-एक श्लोक को बटुक भैरव के स्तोत्र से संपुट कर रहे हैं। इसी क्रम में यह पूछे जाने पर कि जप मंदिर में जाकर करें या घर पर उचित होगा, वे कहते हैं कि यह आपकी परिस्थिति पर निर्भर करता है। और यह पूछे जाने पर कि इसे करने के और क्या तरीके हैं — एक श्रोता ने पिछले नवरात्र में ग्रहण में अर्गला मंत्र का 14000 से अधिक जप कर लिया था — वे कहते हैं: तरीके पर मत जाइए। जप करना है तो जप कीजिए; तरीके से करने जाइएगा तो हो नहीं पाएगा।
सहस्रनाम, सतनामावली, कवच, या हिंदी में सप्तशती
जिसने क्रमगत साधना अभी शुरू ही नहीं की, वह नवरात्र में क्या पाठ कर सकता है?
यदि आप क्रमगत साधना करना चाहते हैं और अभी कुछ नहीं किया है, तो भी नवरात्र में भगवती के सहस्रनाम, सतनाम आदि का पाठ कीजिए। कवच आदि का पाठ कर लीजिए। जो स्तुतियाँ हैं उनका पाठ कर लीजिए; हिंदी में सप्तशती कर लीजिए। कम से कम माई के प्रति आपका भाव बनेगा।
ऊपर केवल जल, कमर से नीचे हर्बल
क्या नवरात्र में साबुन और शैंपू का प्रयोग किया जा सकता है?
सामान्यतः शरीर की शुद्धि जल से ही करनी होती है। कमर से नीचे शुद्धता के निमित्त हर्बल शैंपू या हर्बल साबुन का प्रयोग कर सकते हैं, क्योंकि कई बार उसके बिना मन नहीं मानता। बाकी फिर भी आपकी अपनी इच्छा, या आपके गुरुजी का आदेश।
यह पूछे जाने पर कि नवरात्र में साबुन-शैंपू नहीं लगाना है तो किस वस्तु से नहा सकते हैं, वक्ता कहते हैं कि सामान्यतः तो शरीर की शुद्धि जल से ही करनी होती है। कटि से नीचे — यानी कमर आदि से नीचे — आप शुद्धता के निमित्त हर्बल शैंपू आदि का, हर्बल साबुन आदि का प्रयोग कर सकते हैं, क्योंकि कई बार होता है कि मन नहीं मानता। बाकी फिर भी आपकी अपनी इच्छा, या आपके गुरुजी का आदेश।
कामाख्या की कीजिए, और अपने निकट के शक्ति पीठ का ध्यान रखिए
जो मांसाहार करते हैं वे कौन सी साधना कर सकते हैं?
वक्ता कहते हैं कि लगभग कोई भी साधना करने में कोई दिक्कत नहीं है — फिर भी आप भगवती कामाख्या की कीजिए। और यदि आप लोग नॉनवेज खाते हैं, तो अपने पास के जो शक्ति पीठ आदि हों उनका विशेष ध्यान रखें, उनकी सेवा-पूजा करें।
एक श्रोता, जो पूजन के दिनों को छोड़कर सामान्यतः नॉनवेज खाते हैं, पूछते हैं कि बताई गई साधनाओं में से कौन सी वे बिना किसी दोष के गहराई से कर सकते हैं और कौन सी नहीं करनी चाहिए। लगभग किसी भी साधना को करने में कोई दिक्कत नहीं है, वक्ता उत्तर देते हैं — फिर भी आप भगवती कामाख्या की कीजिए। और यदि आप लोग नॉनवेज खाते हैं, तो आपके पास के जो शक्ति पीठ आदि हों उनका विशेष ध्यान रखें, सेवा-पूजा करें।
तंत्रोक्त रात्रि सूक्त और महाकाली की शरण
शनि की महादशा और राहु की अंतर्दशा में क्या करना चाहिए?
आँख मूँदकर तंत्रोक्त रात्रि सूक्त की शरण लीजिए; भगवती काली की शरण लीजिए। इसी नवरात्र से महाकाली की साधना और उपासना आरंभ कर दीजिए।
एक श्रोता लिखते हैं कि शनि देव की महादशा चल रही है, जीवन में बहुत उथल-पुथल मची हुई है, और उस पर राहु की अंतर्दशा ने जीने की इच्छा ही समाप्त कर दी है। आँख मूँदकर तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम् की शरण लीजिए, वक्ता कहते हैं। भगवती काली की शरण लीजिए। इसी नवरात्र से महाकाली की साधना और उपासना आरंभ कर दीजिए। आँखों की रोशनी कमज़ोर होने के विषय में पूछने वाले दूसरे श्रोता से वे कहते हैं कि जहाँ नॉनवेज खाया जा रहा है, वहाँ उनके अनुसार मंत्र साधना से कोई लाभ नहीं होगा — क्योंकि वहाँ सूर्य उपासना का विषय आएगा, और नॉनवेज खाने से वहाँ दोष ही बढ़ेगा।
अर्चन अवश्य — पर लहसुन-प्याज नहीं
जिस घर में कलश स्थापना नहीं होती, वहाँ योगिनी अर्चन किया जा सकता है?
64 योगिनियों का अर्चन और नाम जप बिल्कुल कीजिए। लेकिन लहसुन-प्याज वाला भोजन नहीं कर सकते। जिस घर में नवरात्र का मान है, वहाँ तो और भी बढ़िया से मान मानना चाहिए।
एक श्रोता, जिनके घर में कलश स्थापना के बिना नवरात्र का मान रखा जाता है, पूछते हैं कि क्या 64 योगिनी का नाम जप और अर्चन किया जा सकता है, और क्या लहसुन-प्याज वाला भोजन किया जा सकता है। नहीं, वक्ता दूसरे प्रश्न पर कहते हैं। 64 योगिनियों का अर्चन बिल्कुल कीजिए, नाम जप कीजिए। लेकिन लहसुन-प्याज वाला भोजन नहीं कर सकते। जहाँ मान है, वहाँ तो और भी बढ़िया से मान मानना चाहिए। लहसुन-प्याज नहीं खाना चाहिए। इससे ठीक पहले वे पुष्टि करते हैं कि नवरात्र की अष्टमी तिथि को महाभैरव का दीपदान बिल्कुल किया जा सकता है। कौन सा कवच जागृत करना श्रेष्ठ होगा, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं: जिसमें आपकी आस्था हो, वही कर लीजिए। माँ काली का दिव्य कवच चैनल पर प्रसारित है — जो कालिका योगिनी का है — उन्हीं का विशेष करें।
यह केवल आपके गुरुजी बता सकते हैं — अधिकार गुरु का ही है
क्या श्री विद्या का सहस्रनाम किसी विशेष अभीष्ट के लिए प्रयोग किया जा सकता है?
यह विषय लीक से हटकर है और केवल आपके गुरुजी ही आपको बता सकते हैं। इन सभी का अधिकार केवल गुरु को होता है। वक्ता बस इतना कहते हैं: जो भी आपका अभीष्ट है उसका संकल्प लेकर पाठ कीजिए।
अभीष्ट विवाह हेतु श्री विद्या उपासक सहस्रनाम के त्रिशक्ति प्रयोग को कैसे कर सकते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देने से मना कर देते हैं। यह विषय लीक से हटकर है, वे कहते हैं, और इसे केवल आपके गुरुजी ही बता सकते हैं। इन सभी का अधिकार केवल गुरु को होता है। बाकी हम केवल यही कह सकते हैं: जो भी आपका अभीष्ट है, उसका संकल्प लेकर पाठ कीजिए।
तभी, जब पंचाक्षरी का पाँच लाख जप पहले हो चुका हो
क्या 32 नामावली पंचाक्षरी के साथ संपुट में की जा सकती है?
तभी, जब आप पंचाक्षरी का पाँच लाख जप पहले कर चुके हों — और ठीक से देखा जाए तो चार गुना, यानी बीस लाख। 32 नामावली स्वयं में एक जागृत विषय है; उसकी ऊर्जा पूर्णतः अनुकूल हो और धर्म के भीतर की इच्छा पूर्ण हो, इसके लिए तीस हज़ार जप का विधान है।
यह पूछे जाने पर कि जागरण के निमित्त दुर्गा द्वात्रिंशन्नाम का पाठ पंचाक्षरी मंत्र के संपुट में और उसके बाद 64 योगिनी नामावली की जा सकती है या नहीं, वक्ता शर्त रखते हैं। यदि आपने पंचाक्षरी का पाँच लाख जप पहले कर लिया है, तब आप यह कर सकते हैं। लेकिन 32 नामावली स्वयं में एक जागृत विषय है। उसकी ऊर्जा हमारे लिए पूर्णतः अनुकूल हो जाए, और धर्म के भीतर हम जो चाहें वह पूर्ण हो, इसके लिए तीस हज़ार जप का विधान है। संपुट आप कर सकते हैं, वे कहते हैं — यदि कम से कम पाँच लाख जप हो चुका हो; यद्यपि ठीक से तो चार गुना होता, यानी पंचाक्षरी का बीस लाख जप हो चुका होता। तब यह कुछ काम की बात है; अन्यथा इसमें कोई विशेष लाभ नहीं। इसी क्रम में वे पुष्टि करते हैं कि संकट नाशन स्तोत्र का प्रतिदिन संकल्प लेकर यथाशक्ति पाठ कर उसी दिन समर्पण किया जा सकता है।
सामान्य व्यक्ति के लिए रात्रि में निषिद्ध
क्या सूर्य के मंत्रों का पाठ रात में किया जा सकता है?
सामान्यतः वैदिक आदि के लिए रात में यह निषिद्ध है। तंत्रोक्त में भी जाएँ तो, यदि रात में करना ही है तो भोर में तीन बजे के बाद — जिस समय आपके लिए अभी लगभग रात्रि ही है। लेकिन निर्धारित रात्रि काल में, मुख्य काल में, यह नहीं करना चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि भगवान सूर्यनारायण के मंत्रों और स्तोत्रों का पाठ रात में किया जा सकता है या नहीं, वक्ता कहते हैं कि सामान्यतः वैदिक आदि के लिए यह रात में निषिद्ध है। तंत्रोक्त में भी जाएँ, वे कहते हैं, तो यदि रात में करना ही है तो भोर में तीन बजे के बाद — जिस समय आपके लिए अभी लगभग रात्रि ही रहती है। लेकिन यदि आप निर्धारित रात्रि काल में, मुख्य काल में चाहते हैं, तो वह नहीं करना चाहिए। उसके लिए, जब अन्य विद्याओं की उपासना की जाती है, तब कुछ विधान आते हैं — जैसे भगवती के महाविद्या स्वरूपों में। लेकिन सामान्यतः यह नहीं करना चाहिए। और सामान्य रूप से करने का कहीं कोई विधान है तो वह उनकी जानकारी में भी नहीं है। उनके अनुसार सामान्य व्यक्ति यह नहीं कर सकते।
पुरश्चरण नहीं — पर हवनात्मक विधान सबसे महत्वपूर्ण
क्या 64 योगिनियों का कोई पुरश्चरण होता है?
इसमें पुरश्चरण का कोई विषय नहीं है। जितना करते हैं उतना कीजिए; यह केवल नामावली है, भगवती की प्रसन्नता के लिए। आपका तपोबल जितना बढ़ेगा, वे उतनी प्रसन्न होंगी। इसमें सबसे बड़ा महत्व हवनात्मक विधान का है — यदि आप उनके नामों से अर्चना करते हैं और महीने में एक बार भी 64 नामों से हवन कर लेते हैं, तो उसका अपना महत्व है।
64 योगिनी में पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। का कोई विषय नहीं है, वक्ता कहते हैं। जितना करते हैं उतना कीजिए; यह केवल नामावली है, भगवती की प्रसन्नता के लिए। आपका तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। जितना बढ़ेगा, भगवती उतनी ही प्रसन्न होंगी। वे आपके प्रति अनुकूल बनी रहना चाहेंगी। इसमें सबसे बड़ा महत्व, वे कहते हैं, हवनात्मक विधान का है। यदि आप उनके नामों की अर्चना कर रहे हैं, और महीने में एक बार भी 64 नामों से हवन कर लेते हैं, तो उसका अपना महत्व है।
शिवलिंग स्पर्श का अधिकार सभी को है
क्या स्त्री शिवलिंग का स्पर्श कर सकती है?
शिवलिंग को स्पर्श करने का अधिकार सभी को है — स्त्री हो या पुरुष, किसी भी वर्ण का हो। भगवान शिव ने कहीं इसका निषेध नहीं किया है। स्पर्श पर कोई रोक नहीं है, और जिसने ऐसा कहा है उसकी जानकारी गलत है।
एक श्रोता लिखती हैं कि वे घर पर शिवलिंग का नित्य अभिषेक करती हैं, उनकी सास आपात स्थिति में करती थीं, और किसी ने सास से कह दिया कि स्त्री को शिवलिंग नहीं छूना चाहिए, इसलिए वे अब अभिषेक नहीं करतीं — तो क्या उन्हें भी बंद कर देना चाहिए? इसीलिए तो कहा जाता है, वक्ता उत्तर देते हैं, कि अपने शास्त्रों का इतना अध्ययन-पठन तो कर लेना चाहिए कि लोगों की कही बात का ढंग से उत्तर दे सकें। शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। को स्पर्श करने का अधिकार सभी को है — स्त्री हो या पुरुष, किसी भी वर्ण का हो। भगवान शिव ने कहीं इसका निषेध नहीं किया है। जहाँ बिना अधिकार के कोई विधान नहीं करना है, वे जोड़ते हैं, उसकी चर्चा कई बार हो चुकी है — कि वह नहीं करना है। लेकिन स्पर्श के लिए कोई रोक ही नहीं है। जिसने भी कहा है, उसकी जानकारी गलत है; ऐसा नहीं है। आप बिल्कुल स्पर्श कर सकती हैं; अभिषेक कर सकती हैं। और यह पूछे जाने पर कि क्या पार्वती जी ने अभिषेक नहीं किया था, वे उत्तर उनके अपने अध्ययन की ओर मोड़ देते हैं: द्वादश ज्योतिर्लिंग का अध्ययन कीजिए, तो पाएँगे कि उनमें से एक एक साधिका के कारण ही अस्तित्व में आया — प्रकट हुआ, प्रभाव में आया।
चौखट पर, और बाहर की ओर मुख करके अपनी दाईं ओर
चौखट का दीपक किस ओर रखा जाए?
चौखट पर दीपक अवश्य रखा जा सकता है — वहाँ पूजन भी करेंगे, दीपक रखे जाएँगे, पुष्प समर्पित होंगे, गंध-सुगंध सब कुछ। किस ओर रखना है यह इस पर निर्भर करता है कि वह किस देवता के लिए है; पर सामान्यतः घर के भीतर खड़े होकर बाहर की ओर देखते हुए उसे अपनी दाईं ओर रखिए।
यह पूछे जाने पर कि दीपक चौखट पर हो या उसके बाहर, और घर के भीतर खड़े होकर बाहर की ओर मुख किए व्यक्ति के लिए बाईं ओर हो या दाईं, वक्ता उत्तर देते हैं। चौखट पर दीपक अवश्य रखा जा सकता है; उसमें कुछ नहीं है। चौखट पर आप पूजन भी करेंगे; वहाँ दीपक रखे जाएँगे; वहाँ पुष्प समर्पित होंगे, गंध-सुगंध और सब कुछ। किस ओर रखना है — दाएँ या बाएँ — यह इस पर निर्भर करेगा कि आप किस देवता के लिए रख रहे हैं। सामान्यतः, जैसी स्थिति आपने बताई है — भीतर खड़े होकर बाहर की ओर देखते हुए — उसे अपनी दाईं ओर रखिए; वही बेहतर रहेगा।
तीन विभाजन — विंध्य के उत्तर, दक्षिण, और कामाख्या
बलि के लिए बनाया जाने वाला त्रिकोण अलग-अलग क्यों होता है?
क्योंकि बलि में त्रिकोण का विषय लगभग तीन भागों में बँटा है: विंध्याचल पर्वत के उत्तर के क्षेत्र के लिए एक विषय, उसके दक्षिण के क्षेत्र के लिए दूसरा, और कामाख्या क्षेत्र के लिए तीसरा — और इन तीनों के मध्य क्षेत्र काशी जी के लिए अलग। अश्वक्रांता, रथक्रांता और विष्णुक्रांता में यह फिर अलग हो जाता है।
बलि में त्रिकोण का विषय अलग है, वक्ता कहते हैं, जैसा उन्होंने पिछले लाइव में भी कहा था। बलि में त्रिकोण का विषय, वे कहते हैं, लगभग तीन भागों में बँटा हुआ है। विंध्य क्षेत्र, विंध्याचल पर्वत से उत्तर की ओर के लिए एक विषय है। विंध्याचल पर्वत से दक्षिण की ओर के लिए दूसरा विषय है। और कामरूप प्रदेशअसम का वह ऐतिहासिक क्षेत्र जिसमें कामाख्या स्थल स्थित है। कामाख्या क्षेत्र के लिए विषय फिर दूसरा है। और इन तीनों में जो मध्य क्षेत्र है, काशी जी, उनके लिए विषय अलग है। अश्वक्रांता में दूसरा हो जाता है, रथक्रांता में दूसरा हो जाता है, विष्णुक्रांता में दूसरा हो जाता है। तो जो चीज़ हमने बताई है, वे कहते हैं, उसमें कई बार यह प्रश्न उठ जाता है कि आपने त्रिकोण का जो विषय बताया वह उल्टा हो जाता है — और हमने उसे काशी क्षेत्र के अनुसार बताया है। यह विषय शायद उन्होंने उस वीडियो में भी कहा हुआ है।
दशमी को, अपराजिता पूजन के बाद — कन्या पूजन के तुरंत बाद नहीं
यदि कन्या पूजन अष्टमी को है तो पारण कब करें?
कन्या पूजन के तुरंत बाद पारण कर लेना उचित नहीं है — कि अष्टमी का पूजन हो गया, कन्या पूजन हो गया, तो पारण कर लें। हम भगवती का कन्या पूजन नवमी को करते हैं और उसके बाद पारण नहीं करते; फिर नवमी का फल कैसे प्राप्त होगा? पारण दशमी को, अपराजिता पूजन के बाद करना चाहिए।
एक श्रोता, जिनके घर अष्टमी को कन्या पूजन होता है और जो प्रथम दिन से व्रत रखती हैं, पूछती हैं कि पारण कब करें। कन्या पूजन के तुरंत बाद पारण कर लेना उचित नहीं है, वक्ता कहते हैं — कि अष्टमी का पूजन हो गया और कन्या पूजन हो गया, तो हम पारण कर लें। हम भगवती का कन्या पूजन नवमी के दिन करते हैं, वे कहते हैं, और कन्या पूजन के बाद पारण नहीं करते। फिर नवमी का फल कैसे प्राप्त होगा? पारण दशमी को, अपराजिता पूजन के बाद ही करना चाहिए। बाकी वे मना नहीं करेंगे, वे कहते हैं: यदि आप शास्त्रोक्त प्रमाण से चल रहे हैं, या इस गणना से कि नवमी रहते ही पारण हो जाएगा, तो हो जाएगा; अन्यथा नहीं। आप वह लेकर चलते हैं तो आपकी बात आपकी है। वे इसे विंध्य क्षेत्र के अनुसार जानते हैं और वही कह रहे हैं; वहाँ सभी ऐसे ही करते हैं और दशमी को पारण करते हैं, और दशमी को करना उचित तथा शास्त्रसम्मत भी प्रतीत होता है।
अकेला नवमुखी चंडिका रुद्राक्ष ही पर्याप्त
चंडिका यंत्र के साथ कौन सा रुद्राक्ष रखा जाए?
भगवती चंडिका के साथ नवमुखी चंडिका रुद्राक्ष एक हो, बस वही काफ़ी है। इसके आगे यदि आप मंडल रखना चाहते हैं या पंचायतन रखना चाहते हैं, तो वह विषय अलग है।
कुंभ में प्राप्त चंडिका यंत्र के साथ किन तंत्रोक्त रुद्राक्षों की स्थापना करनी चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि भगवती चण्डिका के साथ नवमुखी चंडिका रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । एक हो, बस वही काफ़ी है। बाकी यदि आप मंडल रखना चाहते हैं, या पंचायतन रखना चाहते हैं, तो वह विषय अलग है। कामाख्या कवच के विषय में अलग से पूछे जाने पर वे कहते हैं कि यदि आप उसका केवल एक बार पाठ कर रहे हैं तो फलश्रुति पढ़नी पड़ेगी; लेकिन यदि आवृत्ति करनी है, अधिक जप करना है, तो केवल मूल पाठ कीजिए और फलश्रुति केवल अंतिम बार पढ़िए।
सूतक में व्रत नहीं — सूतक के नियम का पालन करें
सूतक लगा हो तो क्या नवरात्र का व्रत रखना चाहिए?
जहाँ सूतक लगा हुआ है, वहाँ उपवास करने की आवश्यकता नहीं है। सूतक के नियम का पालन करें।
सूतक लगे हुए एक श्रोता के पूछने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि जहाँ सूतक लगा हुआ है वहाँ उपवास करने की आवश्यकता नहीं; सूतक के नियम का पालन करें। इसी क्रम में, जिन श्रोता को अब तक सावन का प्रसाद नहीं मिला है, उनसे वे कहते हैं कि तब तो वे स्वयं ही खा गए होंगे — और बताते हैं कि महागणपति अनुष्ठान का 25 लोगों का प्रसाद वापस आ गया है, जिनमें से लगभग सभी पर लिखा है कि फोन नहीं उठाया गया; वे यह सारा काम नवरात्र के बाद पुनः देखेंगे।
कालिका कवच कीजिए; और महाविद्या क्रम के बाद का हवन
घर से बाहर रूम शेयरिंग में रहते हुए क्या किया जा सकता है?
कालिका कवच कीजिए — कोई दिक्कत नहीं है। और सप्तशती महाविद्या क्रम पूरा करने के बाद वक्ता तेरह अध्याय का हवन करने को नहीं कहते: भगवती के किसी स्तोत्र या सतनामावली से सामान्य हवन कर लीजिए।
एक श्रोता, जो डेढ़ साल तक नित्य पूजन में चंडी कवच, वैरी नाशन, पंचमुखी हनुमान, अर्गला का प्रथम मंत्र, सांब शिव मंत्र और पंचाक्षरी मंत्र बिना माला के करते थे, और जो अब बाहर रूम शेयरिंग में रहते हैं, पूछते हैं कि अब वे क्या कर सकते हैं। कालिका कवच कीजिए, वक्ता कहते हैं; कोई दिक्कत नहीं है। सप्तशती महाविद्या क्रम पूरा करने के बाद हवन कैसे करना है, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं: पूरे तेरह अध्याय का हवन करने के लिए हम आपको नहीं कह रहे हैं। आप भगवती के स्तोत्र या सतनामावली से सामान्य हवन कर लीजिए। संकल्प न लेने से पूजा-पाठ का फल आधा मिलता है क्या, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं: फल का माप हम कैसे करेंगे — पर संकल्प कर लेना चाहिए, उचित होता है, आपका मनोबल बढ़ेगा। जब हम संकल्प लेते हैं तो हमारा डेडिकेशन भी बढ़ जाता है। इसलिए संकल्प लेना चाहिए; हर कर्मकांड में संकल्प आवश्यक रहता है।
अत्यंत शुभ — 64 योगिनियों का अर्चन पुनः कीजिए, और सार्वजनिक रूप से कहना बंद कीजिए
रास्ते में दो बार सफ़ेद उल्लू दिखने का क्या अर्थ है?
बिना विलंब, इसी नवरात्र में भगवती की 64 योगिनियों की अर्चना और पूजन पुनः कीजिए, अनुष्ठान कीजिए। बार-बार दर्शन हो रहे हैं तो यह बहुत शुभ है। और, वक्ता जोड़ते हैं, आपने यहाँ चर्चा कर ली — पर अब इस विषय को बार-बार मत बोलिए।
एक श्रोता लिखते हैं कि रात में कंपनी से आते हुए सुनसान रास्ते में एक सफ़ेद उल्लू रास्ते के बीच आकर बैठ गया; और अगले दिन दूसरे रास्ते से आते हुए वे रास्ता भटक गए और वहाँ भी एक सफ़ेद उल्लू बैठा था। बिना विलंब, वक्ता उत्तर देते हैं, इसी नवरात्र में भगवती की 64 योगिनी की अर्चना और पूजन पुनः कीजिए; अनुष्ठान कीजिए। यह बहुत शुभ है, यदि आपको बार-बार दर्शन हो रहे हैं। दूसरी बात: ठीक है, आपने यहाँ चर्चा कर ली — लेकिन अब इस विषय को बार-बार मत बोलिए।
तंद्रा की अवस्था में माला खिंची और टूटी
शत्रु का प्रयोग एक अनुभवी साधिका तक पहुँचा — तंद्रा की अवस्था में चिल्लाती हुई शक्ति ने उनकी माला खींची
एक साधिका, जो बहुत अच्छे स्तर की थीं और जिन्हें बहुत अनुभव प्राप्त हो रहे थे, उन पर शत्रु ने इस स्तर का प्रयोग किया कि तंद्रा की अवस्था में उन्हें लगा कि कोई आया है — और जब वह शक्ति चिल्लाती हुई उनकी माला खींची, तो तंद्रा टूटने पर माला भी वास्तव में टूटी हुई थी, मानो किसी ने खींच दी हो।
आज का वीडियो सुनिए, वक्ता कहते हैं: उसमें दो प्रमुख विषय हैं, जिनमें पहला यह कि चौखट न होने से उस साधिका को क्या क्षति हुई। प्रत्यक्ष देख लीजिए, वे कहते हैं। वे बहुत अच्छे स्तर पर साधना कर रही थीं। उन्हें बहुत अनुभव प्राप्त हो रहे थे; और बताते हुए उन्होंने कुछ बातें रोक भी ली हैं — पर जितना बताया, उससे समझ लीजिए कि उनकी क्षमता उससे दस गुना अधिक थी। फिर भी, जब शत्रु ने प्रयोग किया, तो इस स्तर का प्रयोग गया कि तंद्रा की अवस्था में उन्हें दिख रहा है, लग रहा है कि कोई आया है। और जब वह शक्ति चिल्लाती हुई उनकी माला खींची — जब सचमुच तंद्रा टूटी, तो माला भी टूटी हुई थी, मानो किसी ने खींच दिया हो। ध्यान की जो अवस्था थी, जिसे तंद्रा की ही अवस्था कहेंगे, वह भी टूट गई और माला भी टूटी हुई थी। कितनी भयावह स्थिति होगी, वे कहते हैं।
यदि विधिवत किया है तो कृपा हो चुकी है
अनुष्ठान पूरा करने के बाद के संशय का क्या करें?
यह जान लीजिए और मान लीजिए: यदि आपने विधिवत कर लिया है तो आपके ऊपर कृपा हो चुकी है। अब आप उन्हें अपने जीवन में किस प्रकार लाते हैं और वे कैसे प्रकट होती हैं, यह आपके अपने कर्म पर निर्भर करेगा। ऐसा तो होगा नहीं कि आपने आज किया और आज ही प्रकट हो गईं।
यदि आप ग्रहण में, विशेष तीर्थ क्षेत्र आदि में, इन दिव्य कालों में अनुष्ठान करते हैं, पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करते हैं, वक्ता कहते हैं, तो यह चीज़ जान लीजिए, मान लीजिए — जब तक कि संशय और शक रखने की आपकी प्रवृत्ति ऐसी न हो कि उससे छुटकारा ही न मिल रहा हो। वे वर्तमान प्रश्नकर्ता से नहीं कह रहे, वे जोड़ते हैं; पर जो लोग अनुष्ठान करने के बाद संशय में रहते हैं — हुआ कि नहीं हुआ; हमने ग्रहण में किया था, हुआ कि नहीं हुआ — यह जान लीजिए: यदि आपने विधिवत कर लिया है, तो आपके ऊपर कृपा हो चुकी है। अब आप उन्हें किस प्रकार अपने जीवन में लाते हैं और वे कैसे प्रकट होती हैं, यह आपके अपने कर्म पर निर्भर करेगा। ऐसा तो होगा नहीं कि आपने आज किया और आज ही प्रकट हो गईं। लेकिन जब उनकी उपस्थिति बन गई — जैसा इस श्रोता ने अब सार्वजनिक रूप से लिख दिया है — तो, वे कहते हैं, उपस्थिति तो बन गई है।
64 योगिनी की आहुति के लिए एक निश्चित तिथि, गुग्गल और घी से
64 योगिनियों की आहुति किस तिथि को दी जाए?
नवरात्र में कम से कम अष्टमी या नवमी को हवन अवश्य कर लीजिए। उसके बाद एक तिथि फिक्स कर लीजिए — हर अष्टमी, या चतुर्दशी, या अमावस्या — और उन दिनों 64 योगिनियों की आहुति दीजिए। गुग्गल और घी से अवश्य दीजिए।
अपने कर्म को जितना हो सके सुधारते हुए, वक्ता कहते हैं, और जितना हो सके भक्ति भाव से, साधना भाव से, जगदंबा की 64 योगिनी नामावली का अनुष्ठान करते रहिए। हवनात्मक अनुष्ठान अवश्य कीजिएगा। गुग्गल और घी से हवन विधियुक्त अवश्य कीजिए। हो सकता है चार-पाँच बार आपको थोड़ी इरिटेशन लगे, वे कहते हैं — लेकिन हवन कभी इरिटेट होकर नहीं करना चाहिए। जो नए होंगे वे कहेंगे कि इतना करना पड़ रहा है, इतना विधि-विधान है। धीरे-धीरे अभ्यास हो जाएगा; बहुत ही आसान है। तीन-चार प्रोसेस हैं, बहुत आसान; फिर हवन कीजिए। यदि उन्होंने आपको अनुभव दे दिया है कि उनकी उपस्थिति है, तो नवरात्र में कम से कम अष्टमी या नवमी को हवन अवश्य कर लीजिए। उसके पश्चात एक तिथि फिक्स कर लीजिए — हर अष्टमी, या चतुर्दशी, या अमावस्या। उन दिनों 64 योगिनियों की आहुति दीजिए। गुग्गल और घी से अवश्य दीजिए।
अपने निकटतम शक्ति पीठ साल में एक-दो बार अवश्य जाइए
साधक को अपने निकटतम शक्ति पीठ कितनी बार जाना चाहिए?
नाम से अनुमान लगाते हुए वक्ता कहते हैं कि श्रोता महाराष्ट्र क्षेत्र से लगते हैं — तो जो भी शक्ति पीठ आपके पास हो, मुंबा देवी का हो, सप्तशृंगी माता का हो, या कोई भी शक्ति पीठ या सिद्ध पीठ हो, वहाँ जाइए। वहाँ नामावली का पाठ करके समर्पित कीजिए; संभव हो तो वहाँ हवन कीजिए। साल में कम से कम एक-दो बार अवश्य जाइए।
आपके नाम से लगता है कि आप महाराष्ट्र क्षेत्र से हैं, वक्ता कहते हैं — तो वहाँ जो भी शक्ति पीठ हो, चाहे मुंबा देवी का हो या सप्तशृंगी माता का, या आपके सबसे निकट जो भी शक्ति पीठ या सिद्ध पीठ हो, वहाँ जाइए। वहाँ भी नामावली का पाठ करके समर्पित कीजिए; और संभव हो तो वहाँ हवन आदि कीजिए। साल में कम से कम एक-दो बार अवश्य जाइए। और आगे, वे कहते हैं, हम इस विषय को और पैना करेंगे और बताएँगे कि 64 योगिनियों के लिए और क्या-क्या किया जाना चाहिए, और उनकी कृपा हमारे जीवन में और किस प्रकार बढ़ सकती है।
अखंड दीपक, गणेश दीपदान और कर्म साक्षी दीपक
अखंड दीपक, गणेश दीपदान और कर्म साक्षी दीपक के क्या नियम हैं?
अखंड दीपक पर: निर्णय स्वयं लीजिए — निभा पाएँगे तो रखिए, और अव्यवस्था की स्थिति में मत रखिए। गणेश दीपदान घी से कीजिए। कर्म साक्षी दीपक सभी देवताओं के नाम पर रहता है, क्योंकि ज्योत साक्षात् उन्हीं का स्वरूप है। गणेश तर्पण में कुश की संख्या बारह या नौ रख सकते हैं।
अखंड ज्योति रखें या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि वे चाहेंगे कि निर्णय आप स्वयं लें: यदि निभा पाएँगे तो रखिए; अन्यथा अव्यवस्था की स्थिति में मत रखिए। गणेश दीपदान में कौन सा द्रव्य प्रयोग करें, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं: घी से कीजिए। कर्म साक्षी दीपक किसके नाम पर रखा जाए, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं कि कर्म साक्षी दीपक आपके अपने कर्मों की साक्षी के निमित्त रहता है; ज्योत साक्षात् देवता और देवी का ही स्वरूप है, तो वही वहाँ रखे जाने हैं, और उसमें सभी देवताओं का नाम रहेगा। गणेश तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। में कुश की संख्या पूछे जाने पर वे कहते हैं कि बारह रख सकते हैं, या नौ रख सकते हैं। संकट नाशन से सहस्र तर्पण के विषय में वे उत्तर देते हैं कि सहस्र तर्पण आप किसी एक नाम से करेंगे — एक-एक नाम से करने पर वह बारह हज़ार हो जाएगा, और इतना लंबा तर्पण एक ही बैठक में करना बहुत कठिन है।
खीर-पूरी बनाकर अपने हाथ से गौ माता को खिलाइए
सर्वपितृ अमावस्या को क्या करना चाहिए?
कल पितृ पक्ष की अंतिम तिथि है। और कुछ करें या न करें, पूरी और खीर बनाकर अपने हाथ से गौ माता को खिला दीजिए। इतना अवश्य कीजिए — पाठ करें या न करें, पूजन करें या न करें, पर भगवती गौ को नैवेद्य अवश्य अर्पित कीजिए।
कल पितृ पक्ष की अंतिम तिथि है, वक्ता कहते हैं। कल के दिन आप और कुछ करें या न करें — पूरी और खीर बनाकर बस अपने हाथ से गौ माता को खिला दीजिए। इतना अवश्य कीजिए। पाठ करें या न करें, पूजन करें या न करें — लेकिन भगवती गौ को नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। अवश्य अर्पित कीजिए, जिससे उनके शरीर में उपस्थित देवता और पितृ तृप्त होकर कल अपने दिव्य लोकों को जाएँ, और आपको आशीर्वाद देते हुए जाएँ। पितृ पक्ष का समापन और मातृ पक्ष का आगमन, जो कल महालया के साथ आ रहा है, वे कहते हैं, आपके लिए लाभकारी हो और पितरों की प्रसन्नता के साथ बीते — तो यह अवश्य कीजिए।
पत्ते के प्लेट पर दूध की मिठाई, और अपनी बात स्पष्ट कहकर
यदि आप बाहर हैं और भोजन नहीं बना सकते तो सर्वपितृ अमावस्या को क्या करें?
दूध से बनी मिठाई ले लीजिए — आधा किलो, पाव भर, जितना सामर्थ्य हो — और उसे पत्ते वाले प्लेट पर रख दीजिए, ताकि गौ माता प्लेट भी खा लें तो हानि न हो। फॉर्म या प्लास्टिक वाला नहीं। और स्पष्ट कहिए: मेरे पास यही सक्षमता है, यही मेरी श्रद्धा है; आप इसी से प्रसन्न हो जाइए।
यदि आप हॉस्टल में हैं, नौकरी के कारण बाहर हैं, कहीं और हैं और बना-खिला नहीं सकते — तो दूध से बनी मिठाई ले लीजिए, आधा किलो या पाव भर, जितना सामर्थ्य हो, और उसे पत्ते वाले प्लेट पर रख दीजिए — ताकि गौ माता प्लेट भी खा लें तो उन्हें हानि न हो। पत्तों से बना प्लेट, वे स्पष्ट करते हैं, फॉर्म वाला या प्लास्टिक वाला नहीं। और उसे रखते हुए प्रसन्नता से यह कहिए: मेरे पास यही सक्षमता है, यही मेरी श्रद्धा है, यही मेरा सामर्थ्य है — आप इसी से प्रसन्न हो जाइए, और मेरे जीवन में ऐसा समय ला दीजिए कि हम प्रसन्न मन से दिव्य तीर्थ क्षेत्रों में जा-जाकर आपके लिए तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। और श्राद्ध आदि का विधान करें; ब्राह्मणों को जिमाएँ, दरिद्र नारायण का भोज करें, जीव सेवा करें, और छक कर आपकी सेवा करें। मुझे वह सामर्थ्य दीजिए। यह बोलकर पाँच मिठाई, या दस, जितना हो सके, गौ माता को खिला दीजिए। इससे भी आपके पितृ प्रसन्न हो जाएँगे। कल अवश्य कीजिएगा। छोड़िएगा मत, भूलिएगा मत।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।