तारा चौदस और कौशिकी अमावस्या — भाद्रपद की ये रात्रियाँ, और गृहस्थ को इन्हें यूँ ही क्यों नहीं जाने देना चाहिए

भाद्रपद की कृष्ण पक्ष तिथियों में तांत्रिक जोखिम पर एक प्रवचन।

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01

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और अमावस्या का तंत्र क्षेत्र में अति विशिष्ट महत्व है।

भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और अमावस्या

· 01:19–01:44

वक्ता आरंभ में कहते हैं कि आज का विषय अत्यंत आवश्यक है — भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और अमावस्या, जिनका तंत्र क्षेत्र में अति विशिष्ट महत्व है। जो लोग विशेष करके किसी भी विशिष्टतम देवी-देवता की तांत्रिक साधनाएँ करते हैं, उनके लिए यह समय अति महत्वपूर्ण होता है।

वक्ता आरंभ में कहते हैं कि आज का विषय अत्यंत आवश्यक है — भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और अमावस्या। तंत्र क्षेत्र में इसका अति विशिष्ट महत्व है। जो लोग विशेष करके किसी भी विशिष्टतम देवी-देवता की तांत्रिक साधनाएँ करते हैं, उनके लिए यह समय अति महत्वपूर्ण होता है।

02

किसी भी महीने में अभिचारिक प्रयोग किन तिथियों में किए जाते हैं?

अमावस्या, अष्टमी और चतुर्दशी — विशेष करके कृष्ण पक्ष की अष्टमी

· 01:45–02:00 · Also a question

सामान्य जनों को यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि किसी भी महीने की अमावस्या हो, अष्टमी हो, चतुर्दशी हो — और विशेष करके कृष्ण पक्ष की अष्टमी हो — इन्हीं समयों में प्रमुखतया तंत्र आदि का अभिचारिक प्रयोग, कृत्या प्रयोग आदि किए जाते हैं।

वक्ता कहते हैं कि सामान्य जनों को यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए — किसी भी महीने की अमावस्या हो, अष्टमी हो, चतुर्दशी हो, और विशेष करके कृष्ण पक्ष की अष्टमी हो। इन सभी समयों में ही प्रमुखतया तंत्र आदि का अभिचारिक प्रयोग, कृत्या प्रयोग आदि किया जाता है।

03

श्रावण मास पूर्ण हो चुका है जिसमें अनेक लोग अपनी सिद्धियाँ जागृत करते हैं, और हल षष्ठी बीत चुकी है जिसमें गुरु उपदेश मात्र से दी जाने वाली विधियाँ देते हैं।

श्रावण पूर्ण हुआ, और हल षष्ठी बीत गई

· 02:01–02:27

क्योंकि श्रावण का महीना पूर्ण हो चुका है, और कई सारे लोग उसी में अपनी सिद्धियों को जागृत करते हैं; और क्योंकि हल षष्ठी बीत चुकी है, जिसमें गुरु अपने शिष्यों को — विशेष करके जो गद्दी पर विराजमान होने वाले हैं उन्हें — उपदेश मात्र से दी जाने वाली विधियाँ प्रदान करते हैं।

04

उनका प्रयोग काल इसी चतुर्दशी और अमावस्या के आसपास की अघोर नवरात्रि है, जब तारापीठ और ताराचंडी में शाक्त और कौल तांत्रिक अपनी साधनाएँ संपन्न करते हैं।

अघोर चतुर्दशी, तारा चतुर्दशी और अघोर नवरात्रि

· 02:28–03:06

उनका प्रयोग काल ठीक यही अघोर चतुर्दशी, तारा चतुर्दशी, अमावस्या आदि होता है। चतुर्दशी और उसके आसपास का नवरात्र, जिसे अघोर नवरात्रि भी कहा जाता है, पहले से ही आरंभ हो चुका होता है; बंगाल के क्षेत्र में विशेष करके तारापीठ में, और बिहार की ताराचंडी में, शाक्त और कौल मार्ग के तांत्रिक इन्हीं नौ दिनों में अपनी साधनाएँ संपन्न करते हैं।

05

ये दिन सिद्धियों के त्याग के भी हैं — क्षुद्र शक्तियाँ, या ज्ञात-अज्ञात कारणों से प्राप्त हुई ऐसी सिद्धियाँ जो अपनी ही गति बाधित करती हैं, इन्हीं दिनों में त्यागी जाती हैं।

जिन सिद्धियों को नहीं ढोना चाहिए, उनका त्याग

· 03:07–03:26

उनका त्याग। जिन लोगों को अपनी सिद्धियों का त्याग करना होता है — जो क्षुद्र शक्तियों को सिद्ध कर चुके हैं, या ज्ञात-अज्ञात कारणों से जिन्हें ऐसी सिद्धियाँ प्राप्त हो गई हैं जिनके कारण उनकी गति बाधित हो सकती है — वे इन्हीं समयों में उन सभी का त्याग करते हैं। इसीलिए तारा चतुर्दशी और अघोर अमावस्या का इतना विशिष्ट महत्व है।

06

होलिका और दीपावली की रात्रि की तरह यह समय भी दोनों दिशाओं में काम करता है — विशेष पूजन भी होता है और शत्रुओं द्वारा घात भी अधिक किए जाते हैं।

होलिका और दीपावली की तरह — वही घड़ियाँ दोनों तरह से प्रयुक्त होती हैं

· 03:27–03:52

ये दोनों दिशाओं में एक साथ काम करते हैं। होलिका की रात्रि और दीपावली की रात्रि में हम विशेष पूजन पाठ करते हैं, और इसी समय के आसपास शत्रुओं के द्वारा घात आदि का प्रयोग भी अधिकाधिक किया जाता है। ठीक उसी तरीके से भाद्रपद मास की यह चतुर्दशी और अमावस्या भी इन सभी चीजों के लिए अति जागृत होती है, और लोग प्रयोग आदि करते हैं।

07

तंत्रपीठों और श्मशानों में — शक्तिपीठों में कामाख्या, चक्र तीर्थ श्मशानों में उज्जैन — और अक्सर किसी यजमान के लिए।

तंत्रपीठ, श्मशान, कामाख्या, उज्जैन का चक्र तीर्थ

· 03:53–04:07

तंत्रपीठ और श्मशान आदि में, कामाख्या जैसे शक्तिपीठों में, उज्जैन जैसे चक्र तीर्थ श्मशानों में। वहाँ अनेक ऐसे साधक होते हैं जो इस प्रकार के प्रयोग को सिद्ध भी करते हैं और जो उनके यजमान हैं उनके लिए प्रयोग आदि भी करते हैं।

तंत्रपीठ, श्मशान आदि; कामाख्या जैसे शक्तिपीठ; उज्जैन जैसे चक्र तीर्थ श्मशान। इन सभी स्थानों में अनेक ऐसे साधक होते हैं जो इस प्रकार के प्रयोग को सिद्ध भी करते हैं, और जो उनके यजमान हैं उनके लिए प्रयोग आदि भी करते हैं।

08

इस समय किया गया अभिचारिक कृत्या प्रयोग किसी भी अन्य समय की तुलना में पूर्ण रूप से सफल होने की कहीं अधिक संभावना रखता है।

इन दिनों में पूर्ण सफलता की संभावना बहुत अधिक होती है

· 04:08–04:19

बहुत अधिक संभावना होती है। इस समय में अगर किसी के घर में अभिचारिक कृत्या प्रयोग आदि किए जाते हैं, तो उसके पूरी तरीके से सफल होने का जो चांस होता है वह अन्य समयों की तुलना में बहुत अधिक होता है।

वक्ता कहते हैं कि इस समय में अगर किसी के घर में अभिचारिक कृत्या प्रयोग आदि की जाती है, तो उसके पूरी तरीके से सफल होने का जो चांस होता है वह बहुत अधिक होता है।

09

इन तीन दिनों में घर पर हवनात्मक अनुष्ठान करना चाहिए, और यदि यह संभव न हो तो आसपास के जिस मंदिर में अनुष्ठान हो रहा हो वहाँ संकल्प करवाना चाहिए।

स्वयं और परिवार के रक्षण हेतु अनुष्ठान

· 04:20–04:59

कम से कम अपने परिवार और स्वयं के रक्षण हेतु इन तीन दिनों में, और विशेष करके चतुर्दशी और अमावस्या तिथि में, अनुष्ठान आदि अवश्य करने चाहिए। हवनात्मक अनुष्ठान घर में कर सकें तो करें; और यदि आप अपने घर पर नहीं कर सकते, तो आसपास के जिस मंदिर में कोई विशिष्ट अनुष्ठान हो रहा हो वहाँ संकल्प करवाएँ।

10

डाकिनी विद्या करने वाले होलिका और दीपावली की रात्रियों का नाम लेते हैं — किंतु अष्टमी की रात्रि और यह तारा चौदस भी उनके साथ खड़ी हैं।

केवल होलिका और दीपावली नहीं, अष्टमी की रात्रि और तारा चौदस भी

· 05:00–05:17

जो दो रात्रियाँ सामान्यतः गिनाई जाती हैं वे पूरी सूची नहीं हैं। जो लोग डाकिनी विद्या आदि की सिद्धि कर रहे हैं या कर चुके हैं, उनके लिए कहा जाता है कि होलिका और दीपावली की रात्रि बड़ी विशेष है; किंतु उन्हें यह भी जानना चाहिए कि उनके साथ-साथ अष्टमी की रात्रि और यह चतुर्दशी, जिसे तारा चौदस कहा जाता है, भी खड़ी हैं।

11

जैसे दीपावली से एक दिन पहले काली चौदस है, वैसे ही भादो की ये रात्रियाँ तारा चौदस और कौशिकी अमावस्या हैं, जिन्हें अघोर चतुर्दशी और अघोर अमावस्या भी कहा जाता है।

तारा चौदस, कौशिकी अमावस्या, अघोर चतुर्दशी

· 05:18–05:43

जैसे हम दीपावली के एक दिन पहले को काली चौदस बोलते हैं, उसी तरीके से भादो की ये दो रात्रियाँ तारा चौदस के नाम से विख्यात हैं। कौशिकी अमावस्या के रूप में भी इनकी विख्याति है, और अघोर चतुर्दशी, अघोर नवरात्र तथा अघोर अमावस्या के नाम से भी।

12

केवल वही नहीं जिन्हें मारण या मोहिनी करनी है — लोक कल्याण के लिए कार्य करने वाले भी इस समय श्मशान साधना करते हैं, क्योंकि भगवती तारा का प्रभाव उग्रतम होता है।

लोक कल्याण हेतु श्मशान साधना, और तारा का उग्रतम प्रभाव

· 05:44–06:12

नहीं। केवल वही लोग इस प्रयोग को नहीं करते जिनको किसी का मारण मोहिनी करना है, खराबी करना है। समाज की भलाई के लिए भी इस समय लोग श्मशान आदि में साधना करते हैं, जो लोक कल्याण के लिए कार्य कर रहे होते हैं; और जिन्हें अपनी व्यक्तिगत सिद्धि की अपेक्षा होती है वे किसी सिद्धपीठ, शक्तिपीठ में जाकर साधना करते हैं, क्योंकि इस समय में भगवती तारा का उग्रतम प्रभाव होता है।

13

दुर्गा सप्तशती में भगवती कौशिकी का प्रादुर्भाव किस प्रकार आता है?

हिमालय पर पार्वती के सम्मुख देवताओं की स्तुति

· 06:13–06:51 · Also a question

पंचम अध्याय से आगे। जब शुंभ निशुंभ के द्वारा देवताओं को प्रताड़ित किया गया तो देवताओं ने तंत्रोक्त देवी सूक्तम के माध्यम से भगवती की स्तुति की; और चूँकि भगवती ने पहले उन्हें वरदान दिया था कि जब कभी भी तुम मेरा स्मरण करोगे, आवाहन करोगे, मैं तुम्हारे रक्षण के लिए अवश्य प्रस्तुत हो जाऊँगी, इसलिए वे भगवती पार्वती के सम्मुख गए, जो उस समय हिमालय पर तपस्या कर रही थीं।

14

शिव जी की उस कही पर पार्वती हिमालय पर तपस्या करने गईं — यह लीला मात्र थी — और उनके शरीर से गौर वर्ण की कौशिकी प्रकट हुईं, पार्वती स्वयं काली रह गईं।

शिव जी की कही, ब्रह्मा जी की तपस्या, और जो गौर स्वरूप प्रकट हुआ

· 06:52–07:19

उस समय की यह कथा है कि भगवान शिव जी ने माँ पार्वती को कह दिया था कि आप बहुत काली हो, तो अपने वर्ण को गोरा करने के लिए वे हिमालय पर जाकर ब्रह्मा जी की तपस्या करने लगीं — यह लीला मात्र है। और उसी समय, जब प्रताड़ित देवता उनकी स्तुति करते हैं, भगवती के शरीर से एक तेजोमय नारी का प्राकट्य होता है जो गौर वर्ण की होती हैं, और भगवती पार्वती स्वयं काली रह जाती हैं।

15

कालिका कौन हैं और कौशिकी कौन हैं?

हिमालय पर जो काली रहीं, और जो दिव्य तेज प्रकट हुआ

· 07:20–07:38 · Also a question

जो काली रह गईं वे हिमालय के ऊपर कालिका के नाम से विख्यात हुईं; और जो गौर वर्ण की प्रकट हुई थीं, जो दिव्य तेज प्रकट हुआ था, जो नारी प्रकट हुई थीं — वही कौशिकी हैं।

वह काली हिमालय के ऊपर कालिका के नाम से विख्यात हुईं। और जो गौर वर्ण की प्रकट हुई थीं, जो दिव्य तेज प्रकट हुआ था, जो नारी प्रकट हुई थीं — वही कौशिकी हैं।

16

भगवती कौशिकी का स्वरूप किसका स्वरूप माना गया है?

महासरस्वती का स्वरूप, और वह ललाट जिससे काली और चामुंडा प्रकट हुईं

· 07:39–07:50 · Also a question

भगवती कौशिकी का स्वरूप महासरस्वती का स्वरूप माना गया है। भगवती कौशिकी ने शुंभ निशुंभ का वध किया है; और भगवती कौशिकी के ललाट से भगवती काली का, भगवती चामुंडा का तथा अनेक महाशक्तियों का प्राकट्य हुआ है।

वक्ता कहते हैं, अब आप ध्यान दीजिए। भगवती कौशिकी का स्वरूप महासरस्वती का स्वरूप माना गया है। भगवती कौशिकी ने शुंभ निशुंभ का वध किया है। भगवती कौशिकी के ललाट से भगवती काली का प्राकट्य हुआ है, भगवती चामुंडा का प्राकट्य हुआ है, और अनेक महाशक्तियों का प्राकट्य हुआ है।

17

कौशिकी का सबसे प्रमुख दिवस भाद्रपद की अमावस्या है, तो पूछिए कि महासरस्वती की शक्ति कहाँ आकर मिल रही है — और अघोर में क्या विलीन हो रहा है, या अघोर किसमें।

क्या किसमें विलीन हो रहा है — दोनों तरीके से देखिए

· 07:51–08:19

कौशिकी का सबसे प्रमुख दिवस यह कौशिकी अमावस्या है, भाद्रपद की अमावस्या। वक्ता कहते हैं, तो आप रिलेट कीजिए — महासरस्वती की शक्ति कहाँ आकर के मिल रही है? जो यह बोलते हैं कि नहीं, अघोर में ऐसे कैसे हो सकता है, उनसे वे कहते हैं — देखिए अघोर में किसका विलीन हो रहा है, या अघोर किसमें विलीन हो रहा है। दोनों तरीके से देखिए।

19

यह विषय उसी के लिए खुलता है जो किसी गुरु परंपरा में हो, जिसने ऐसा अध्ययन किया हो, या जिसे भगवती की विशिष्ट कृपा से ऐसे लोग मिले हों।

गुरु परंपरा, और जो खोजने भर से नहीं मिलेगा

· 08:36–08:57

क्योंकि जब तक आप ऐसे गुरु परंपरा से न हों, ऐसा अध्ययन न किए हों, ऐसे गुरुओं का ज्ञान प्राप्त न हो, या भगवती की विशिष्ट कृपा से ऐसे लोग न मिले हों, तब तक यह पूरा विषय जल्दी खुलता नहीं है। आप कहीं भी देख लीजिए, YouTube या Facebook पर खोज लीजिए — इन विषयों का अवलोकन वही व्यक्ति कर सकता है जो कहीं न कहीं अपनी गुरु परंपरा में हो।

20

अत्यधिक मोटिवेट हुआ श्रोता यह तर्क कर बैठता है कि सभी शक्तियाँ एक ही हैं तो गृहस्थ भी सीधे अघोरी या चामुंडा की उपासना कर ले — और उल्टी-सीधी साधना कर बैठता है।

वह श्रोता जो यह निष्कर्ष निकाल लेता है कि गृहस्थ भी अघोरी साधना कर सकता है

· 08:58–09:19

क्योंकि इससे यह संभावना बढ़ जाती है कि लोग अत्यधिक मोटिवेट होकर के कुछ उल्टी-सीधी साधना कर लें — कि सभी शक्तियाँ तो एक ही हैं, तो फिर क्यों न माँ अघोरी कर लें; गृहस्थ हैं, अघोरी क्यों न कर लें; कौशिकी तो यहीं हैं न, जगदंबा का यही स्वरूप है; और जब उनके ललाट से भगवती चामुंडा ही प्रकट हुई हैं तो हम सीधे उन्हीं की उपासना कर लेते हैं।

21

यह जानकारी मात्र के लिए है, ताकि इन दिनों में उपासना करते समय आपके मन में समर्पण की प्रगाढ़ता हो — भले आप एक दीपक ही प्रज्वलित करें।

ज्ञान, ताकि इन दो-तीन दिनों में समर्पण की प्रगाढ़ता हो

· 09:20–09:50

जानकारी मात्र के लिए — कि आप अपने सनातन को समझें, उन शक्तियों के विषय में जानें, आपके भीतर ज्ञान का उद्भव हो और अज्ञानता दूर हो; ताकि जब आप इन दो-तीन दिनों में भगवती की उपासना करें तो आपके मन में समर्पण की प्रगाढ़ता हो, और आप जगदंबा के प्रति अति समर्पित रहें। उनकी कृपा तभी आपको प्राप्त हो पाएगी — भले आप उस दिन एक दीपक ही क्यों न प्रज्वलित करें।

22

रक्षण हेतु पहले किया गया कोई भी अनुष्ठान अब फिर से कर लेना चाहिए — कम से कम तीन दिन का लघु अनुष्ठान, और संभव हो तो अंतिम दिन हवन।

रक्षण का जो अनुष्ठान पहले कर चुके हैं, उसे दोहराएँ

· 09:51–10:11

अपने रक्षण हेतु जो भी अनुष्ठान आपने पहले किए हैं, उन अनुष्ठानों को अवश्य ही फिर से कर लेना चाहिए। मान लीजिए किसी ने वैरी नाशन काली कवच का अनुष्ठान कर लिया है — तो उसे इन समयों में उसी वैरी नाशन काली कवच का कम से कम तीन दिन का लघु अनुष्ठान कर लेना चाहिए, और संभव हो तो अंतिम दिन हवन कर लेना चाहिए।

23

और कुछ न आता हो तो जयंती मंगला काली मंत्र का सपरिवार 108 बार सुबह और 108 बार रात पाठ, तथा भगवती और भैरव जी के नाम से एक-एक दीपक, ही लाभ के लिए पर्याप्त है।

जयंती मंगला काली, 108 सुबह और 108 रात, सपरिवार

· 10:12–10:36

तो जयंती मंगला काली जो मंत्र है, उसका पाठ 108 बार सुबह और 108 बार रात के समय सपरिवार करें — भगवती के नाम से और भैरव जी के नाम से दीप प्रज्वलित करके। वक्ता कहते हैं कि यह सामान्य सा काम है, और अगर उतना भी कीजिएगा तो कुछ शत्रु हो या न हो, कोई परेशानी आपके जीवन में हो या न हो, लाभ आपको अवश्य मिलेगा।

24

तारा चतुर्दशी और कौशिकी अमावस्या का महत्व दीपावली की रात्रि तथा चंद्र और सूर्य ग्रहण के समान है।

दीपावली की रात्रि और ग्रहणों के साथ

· 10:37–10:56

जैसे दीपावली की रात्रि की महत्ता है, जैसे चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण की महत्ता है, वैसे ही इस तारा चतुर्दशी और कौशिकी अमावस्या का भी बहुत महत्व है। तो इस समय में आप जाप आदि कार्य अवश्य करें — नया अनुष्ठान करना चाहें तो कीजिए, नहीं तो जो भी पहले का अनुष्ठान आप कर चुके हैं उसी को दोहरा लीजिए।

25

जो लोग साबर मंत्रों का अधिकाधिक जाप करते हैं उनके लिए यह अमृत काल है — सामान्यतः दो दिन होते हैं, पर इस बार तीन पड़ रहे हैं, अंतिम दिन उदया के अनुसार।

साबर मंत्र, और इस बार पड़ रहे तीन दिन

· 10:57–11:25

जो साबर आदि का अनुष्ठान करते हैं, जो साबर मंत्रों का अधिकाधिक जाप करते हैं, उनके लिए यह अमृत काल है — इस समय में जरूर करें। भगवती के उपासक या उपासिका के लिए ऐसे तो दो ही दिन होते हैं, चतुर्दशी और अमावस्या; लेकिन इस बार तीन दिन पड़ जा रहे हैं, उदया के अनुसार अंतिम दिन भी पड़ रहा है, बृहस्पतिवार और शुक्रवार को भी पड़ रहा है, तो तीन दिन का लाभ मिल जाएगा।

26

गुरु के द्वारा पहले से दिए गए मंत्र का ही अब अत्यधिक अनुष्ठान करना चाहिए, न कि इस अवसर के लिए कोई नया मंत्र लेना चाहिए।

नए मंत्रों की जगह वही मंत्र

· 11:26–11:40

इसके सिवाय, अगर आप किसी गुरु परंपरा में हैं और भगवती के किसी भी स्वरूप के मंत्र आदि की आपको प्राप्ति है, जो गुरु के द्वारा दिया गया है, तो आप नए मंत्रों की जगह पर उन्हीं मंत्रों का अत्यधिक अनुष्ठान कर लें — आपको अत्यधिक लाभ होगा।

इसके सिवाय: अगर आप किसी गुरु परंपरा में हैं, और भगवती के किसी भी स्वरूप के मंत्र आदि की आपको प्राप्ति है, गुरु के द्वारा दिया गया है — तो नए मंत्रों की जगह पर उन्हीं मंत्रों का अत्यधिक अनुष्ठान कर लें। उससे आपको अत्यधिक लाभ होगा।

27

यह दोनों ही तरह से अमृत काल है — प्रतिशोध को फलित करना हो या उसका शमन करना हो — क्योंकि भगवती तारा का स्वरूप और उनके भैरव दोनों अक्षोभ्य कहे जाते हैं।

दोनों दिशाओं में अमृत काल — फलित करने का, या शमन करने का

· 11:41–12:07

यह दोनों ही तरह से अमृत काल है। अगर आप अपने मन में प्रतिशोध की भावना रखे हुए हैं और चाहते हैं कि वह प्रतिशोध अब फलित हो जाए, तो आपके लिए अमृत काल है। और अगर आप उस प्रतिशोध का शमन करना चाहते हैं, तब भी आपके लिए अमृत काल है — क्योंकि जगदंबा का जो स्वरूप भगवती तारा का है, उनका स्वरूप अक्षोभ्य कहा जाता है, और उनके भैरव अक्षोभ्य कहे जाते हैं।

28

वे बिना क्षोभित हुए हर प्रकार के विष को ग्रहण कर लेती हैं, और प्रतिशोध की भावना स्वयं एक विष है; हमारे अपने कर्म ही शत्रु बनकर सामने आते हैं।

वे बिना क्षोभित हुए हर विष को ग्रहण कर लेती हैं

· 12:08–12:25

क्योंकि बिना क्षोभित हुए वे हर प्रकार के विष को ग्रहण कर लेती हैं — और प्रतिशोध की भावना भी हमारे भीतर एक प्रकार का विष ही है। हमारे कर्म ही शत्रु बनकर हमारे सामने आते हैं, भले हम उसे जानें या न जानें, समझें या न समझें।

बिना क्षोभित हुए वे हर प्रकार के विष को ग्रहण कर लेती हैं। वक्ता कहते हैं कि प्रतिशोध की भावना भी हमारे भीतर एक प्रकार का विष ही है। हमारे कर्म ही शत्रु बनकर के हमारे सामने आते हैं — भले हम उसे जानें या न जानें, समझें या न समझें।

29

वे शत्रु का नाश कर सकती हैं, या केवल उसके मन की और हमारे मन की शत्रुता का — इनमें से कौन सा होगा यह उन पर और हमारे समर्पण पर निर्भर करता है।

या तो शत्रु का नाश होता है, या दोनों के मन की शत्रुता का

· 12:26–12:40

हो सकता है भगवती उस शत्रु का भी नाश कर दें; या हो सकता है कि वे केवल उसके मन के भीतर की शत्रुता और हमारे मन के भीतर की शत्रुता का ही नाश कर दें। दोनों ही प्रकार से शत्रु का शमन हो सकता है। इनमें से क्या होगा यह उनके ऊपर निर्भर करता है, और इस पर भी कि हमारे भीतर मन में क्या चल रहा है — कैसा समर्पण है, क्या भावना है, क्या इच्छा है।

30

मंत्र अनुष्ठान के अलावा तांत्रात्मक अनुष्ठान भी खुला है — भगवती का षोडशोपचार पूजन, और उनका यंत्र पूजन उनके लिए जो उसे जानते हैं या सीख रहे हैं।

षोडशोपचार पूजन और यंत्र, एक-एक आवरण

· 12:41–13:03

अगर आप केवल और केवल मंत्र अनुष्ठान करना चाहते हैं तो कर सकते हैं; लेकिन उसके सिवाय अगर आप तांत्रात्मक अनुष्ठान करना चाहते हैं — भगवती का षोडशोपचार पूजन आदि, और विशेष करके उनका यंत्र पूजन — और अगर आपको यंत्र अनुष्ठान आता है या आप सीख रहे हैं, तो आप कर सकते हैं।

31

श्री चक्र पूजन उन्हीं का है जिन्हें श्री यंत्र की दीक्षा प्राप्त है; अदीक्षित होकर करने पर बहुत दोष लगेगा, और वक्ता इसमें किसी भी प्रकार का सहयोग देने से इनकार करते हैं।

केवल दीक्षा के साथ — अन्यथा बहुत दोष

· 13:04–13:22

अगर आपको श्री यंत्र आदि की दीक्षा प्राप्त है और श्री चक्र पूजन आपको आता है, तो वह भी आप इन दिनों में अवश्य करें। लेकिन अगर श्री चक्र की आपकी दीक्षा नहीं है और अदीक्षित होकर के आप यह कृत्य करने का प्रयास करते हैं, तो बहुत दोष लगेगा — और वक्ता स्पष्ट कहते हैं कि इन सब चीजों में वे कभी भी आपका सहयोग या समर्थन नहीं कर सकते, यह गलत है।

32

उसकी विधि और प्रयोग इतने क्लिष्ट हैं कि बिना सीखे नहीं हो सकते, जबकि दुर्गा जी का अपेक्षाकृत सरल यंत्र और चक्र पूजन जानने वाले पर कोई दोष नहीं लगाते।

विधि क्लिष्ट है; अपेक्षाकृत सरल यंत्र खुले हैं

· 13:23–14:02

क्योंकि उसके पूरे विधि-विधान और जो सारे प्रयोग हैं वे क्लिष्ट हैं — बिना सीखे आप कर नहीं पाइएगा, और दोष लगेगा। उसके सिवाय भगवती दुर्गा जी का यंत्र, जो करने के लिए थोड़ा सरल है, और उनका चक्र पूजन आदि — अगर वह आपको आता है तो आप वह कर सकते हैं, और उसमें आपको कोई दोष नहीं है।

33

भगवती तारा किसकी आराध्या रही हैं?

महर्षि वशिष्ठ, भगवान श्री राम के कुल गुरु

· 14:03–14:17 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि आप सभी को यह जानकारी होनी चाहिए कि भगवती तारा भगवान श्री राम के कुल गुरु महर्षि वशिष्ठ जी की आराध्या रही हैं। वशिष्ठ मुनि के द्वारा ही सर्वप्रथम भगवती तारा की उपासना की गई है।

वक्ता कहते हैं कि आप सभी को यह जानकारी होनी चाहिए। कि भगवती तारा भगवान श्री राम के कुल गुरु महर्षि वशिष्ठ जी की आराध्या रही हैं। वशिष्ठ मुनि के द्वारा ही सर्वप्रथम भगवती तारा की उपासना की गई है।

34

वेदोक्त विधान से सिद्धि न मिलने पर श्राप दिए जाने पर भगवती ने कहा कि वे श्राप से परे हैं, फिर भी उनकी वाणी का मान रखने के लिए श्राप स्वीकार किया — और तब तंत्रोक्त उपदेश दिया।

श्राप, और उसके बाद मिला तंत्रोक्त उपदेश

· 14:18–14:34

जब वेदोक्त विधान से उन्हें सिद्धि नहीं प्राप्त हुई, तब उन्होंने भगवती को श्रापित किया। जगदंबा ने कहा कि मैं श्राप से परे हूँ, मुझे श्राप नहीं लग सकता, किंतु फिर भी आपकी वाणी का मान रखने के लिए मैं श्राप को स्वीकार करती हूँ — और उसके पश्चात उन्होंने तंत्रोक्त उपदेश दिया।

जब वेदोक्त विधान से उन्हें सिद्धि नहीं प्राप्त हुई, तब उन्होंने भगवती को शाप दिया। और जगदंबा ने कहा: मैं श्राप से परे हूँ, मुझे श्राप नहीं लग सकता। किंतु फिर भी आपकी वाणी का मान रखने के लिए मैं श्राप को स्वीकार करती हूँ। और उसके पश्चात उन्होंने तंत्रोक्त उपदेश दिया।

35

वशिष्ठ कामाख्या गए और तदुपरांत चीन — तिब्बत के क्षेत्र — में जाकर वामाचार विधि से तारा की उपासना की, और वहीं उन्हें वरदान तथा सिद्धि प्राप्त हुई।

कामाख्या, और तदुपरांत चीन का क्षेत्र

· 14:35–14:57

वशिष्ठ मुनि कामाख्या गए, और तदुपरांत चीन में — जो तिब्बत का क्षेत्र है — वहाँ जाकर के उन्होंने तंत्रोक्त विधि-विधान से, वामाचार विधि से भगवती तारा की उपासना की। तब भगवती ने उन्हें उनके मनोकूल वरदान आदि दिए और उन्हें सिद्धि इत्यादि प्रदान की।

तब वशिष्ठ मुनि कामाख्या गए, और तदुपरांत चीन में, जो तिब्बत का क्षेत्र है, वहाँ जाकर के उन्होंने तंत्रोक्त विधि-विधान से, वामाचार विधि से भगवती तारा की उपासना की। तब भगवती ने उन्हें उनके मनोकूल वरदान आदि दिए, और उन्हें सिद्धि इत्यादि प्रदान किए।

36

भगवान श्री राम हृदय में तारा के ही मंत्रों को धारण करते थे, और उनकी जटा कैसे बाँधी जाती है यह वैष्णव तंत्र के अंतर्गत संकर्षण तंत्र में आता है।

हृदय में उनके मंत्र, और जटा का बाँधा जाना

· 14:58–15:21

भगवान श्री राम हृदय में तारा के ही मंत्रों को धारण करते थे। और जो जटा श्री राम ने धारण की है — वक्ता संकर्षण तंत्र की ओर संकेत करते हैं, जो वैष्णव तंत्र के अंतर्गत है, और कहते हैं कि यदि आप किसी गुरु परंपरा में हैं और वह ग्रंथ प्राचीन ग्रंथों में आपके लिए उपस्थित हो, तो उसमें आप पढ़िएगा कि जटा कैसे बाँधी जाती है।

37

कौल और शाक्त साधक अपनी जटा में आभूषण क्यों धारण करते हैं?

सजावट नहीं — जटा में सिद्धियाँ धारण की जाती हैं

· 15:22–15:58 · Also a question

केवल सजने के लिए नहीं। जितने भी कौल संप्रदाय के साधक होते हैं, आप देखिएगा कि वे आभूषण आदि को भी अपनी जटा पर धारण करते हैं; शाक्त संप्रदाय के साधक भी अपने आप को सजाते हैं। लेकिन वह आभूषण मात्र सजने के लिए नहीं हुआ करता था, और जो अभी भी धारण करते हैं उनके लिए भी केवल ऐसा नहीं होता — कई प्रकार की सिद्धियाँ जटा में धारण की जाती हैं।

38

महर्षि वशिष्ठ ने राम के लिए उस स्वरूप की सिद्धि कराई थी, जिसे उन्होंने रावण वध के निमित्त शीश पर धारण किया — और रावण की आराधिता निकुंभला तारा के सम्मुख से हट गईं।

भगवती तारा के सम्मुख निकुंभला का हट जाना

· 15:59–16:27

उस स्वरूप की सिद्धि महर्षि वशिष्ठ के द्वारा भगवान श्री राम के अवतार के समय कराई गई थी, और उन्होंने उसे ही रावण के वध के निमित्त अपने शीश पर धारण किया था। उन्हीं कारणों से भगवती निकुंभला — जो रावण की आराधिता रहीं, माँ पार्वती उस स्वरूप में वहाँ उपस्थित थीं — जब भगवती तारा राम की जटा में उनके सम्मुख उपस्थित हुईं तब वहाँ से हट गईं। निकुंभला ने उनकी सुरक्षा नहीं की।

39

महर्षि वशिष्ठ के आशीर्वाद और उनके द्वारा सिखाई गई तंत्र विद्याओं के कारण श्री राम विजयी हुए — यह सब लीला मात्र थी, और यह सीख केवल रामायण से नहीं मिलती।

लीला, और जो केवल रामायण से नहीं सीखा जा सकता

· 16:28–17:06

वक्ता दोनों बातें साथ रखते हैं। महर्षि वशिष्ठ के आशीर्वाद और उनके द्वारा सिखाई गई तंत्र विद्याओं के कारण भगवान श्री राम विजयी हुए हैं — हालाँकि यह सब लीला मात्र है, क्योंकि चाहते तो हनुमान जी, भगवान शिव या कोई भी ऐसी महाशक्ति आराम से रावण का वध कर सकती थी। यह सब मनुष्यों के लिए लीला था। तथापि हम सभी को यह जानना चाहिए कि यह सीख हम केवल रामायण से नहीं ले सकते।

40

किन साधनाओं में भगवती तारा का बीज मंत्र प्रयुक्त होता है?

चौर गणपति, कोई महाविद्या साधना, कुरुकुल्ला

· 17:07–17:40 · Also a question

जटा से संबंधित जब कभी भी कोई सिद्धि की जाती है तो उसमें भगवती तारा का सबसे महत्वपूर्ण योगदान होता है, और उन्हीं की सिद्धियों तथा मंत्रों का प्रयोग किया जाता है। जब आप किसी गुरु परंपरा से संबंधित चौर गणपति आदि का प्रयोग करते हैं, या अपनी किसी महाविद्या की साधना कर रहे हैं, या कुरुकुल्ला आदि मंत्रों का जाप करते हैं — तो उसमें जितने मंत्र आपको मिलेंगे, उनमें जटा से संबंधित जो बीज मंत्र होगा वह भगवती तारा का ही बीज मंत्र होगा।

41

क्या भगवती कामाख्या की उपासना में भी भगवती तारा उपस्थित रहती हैं?

कामाख्या एक स्वतंत्र विद्या, जिनमें तारा समाहित हैं

· 17:41–18:07 · Also a question

हाँ। अगर आप भगवती कामाख्या से संबंधित उपासना करने जाते हैं, तो एकाक्षरी से लेकर के जब आप आगे बढ़ना शुरू करते हैं, अगर क्रम में जा रहे हैं — हालाँकि भगवती कामाख्या क्रम विद्या में नहीं आतीं, वे स्वतंत्र विद्या हैं — तो उनमें भी भगवती तारा का कहीं न कहीं पूर्ण रूप से समावेश होता है। कामाख्या के स्वरूप में तीन महाशक्तियों का समावेश माना गया है; फिर भी अलग-अलग ग्रंथों के अनुसार भगवती तारा भी प्रमुख रूप से उनके भीतर समाहित रहती हैं।

42

भगवान श्री कृष्ण ने जो विश्व विराट स्वरूप का दर्शन कराया वह भगवती तारा की विद्याओं के प्रयोग से माना गया है, और नर-नारायण ही कृष्ण तथा अर्जुन के स्वरूप में थे।

विश्व विराट स्वरूप, और नर-नारायण

· 18:08–18:38

अगर ऐसे देखा जाए तो भगवान श्री कृष्ण के अवतार में भी — भगवान श्री कृष्ण के द्वारा जो विश्व विराट स्वरूप का दर्शन कराया गया, उसमें भी माना गया है कि उन्होंने भगवती तारा की विद्याओं का प्रयोग करके अपने उस विश्व विराट स्वरूप का प्रदर्शन किया था। आपको कहीं यह पढ़ने को मिलेगा कि नर और नारायण ही भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के स्वरूप में उपस्थित हुए थे।

43

तंत्र में माना गया है कि श्री कृष्ण के मोर पंख में भगवती तारा की शक्ति समाहित रहती है, जिसे वे सदैव शीश पर धारण करते थे — वक्ता इसे सुनी हुई बात कहते हैं, प्रमाणिक नहीं।

विद्वानों से सुनी हुई बात, प्रमाणिकता के साथ नहीं कही गई

· 18:39–19:23

तंत्र के क्षेत्र में यह माना गया है कि उनके मोर पंख में भगवती तारा की शक्ति समाहित रहती है, और वे उसे हमेशा अपने शीश पर धारण किया करते थे। वक्ता स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यह वे प्रमाणिकता के साथ नहीं कह सकते — यह उनकी सुनी हुई बात है, इस प्रकार के विद्वानों के द्वारा, भगवती तारा के उपदेश आदि के कुछ अंश में।

44

भगवती तारा का ध्यान किसे करना चाहिए?

शाक्त हों, शैव हों या वैष्णव — सभी

· 19:24–19:52 · Also a question

सभी को। इस प्रकार से भगवती तारा भगवान नारायण के अनेक अवतारों में भी उनकी सहयोगी बनकर के, अपनी शक्तियों के साथ उनके साथ खड़ी रही हैं और विजय प्रदान करती रही हैं। इसलिए आप शाक्त हों, शैव हों, वैष्णव हों — आप सभी को भगवती तारा का ध्यान अवश्य करना चाहिए।

45

क्या भगवती तारा का पूजन केवल वामाचार विधि से ही होना चाहिए?

दक्षिणाचार को एकदम नकार देना गलत है

· 19:53–20:16 · Also a question

यह आवश्यक नहीं है कि आप भगवती का पूजन केवल वामाचार विधि से ही करें। कुछ लोगों के द्वारा जो यह बात पूरी तरीके से बोली जाती है कि आप घर में उनका पूजन नहीं कर सकते — यह बात सही है; लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि उनका पूजन केवल और केवल वामाचार विधि से ही होगा। इसे एकदम झटक देना कि नहीं, इनका पूजन दक्षिणाचार विधि से हो ही नहीं सकता — यह कहना गलत है।

46

वामाचार विधि वास्तव में किसके लिए कही गई है?

सिद्धि के लिए, पूजन के लिए नहीं

· 20:17–20:41 · Also a question

वामाचार विधि सिद्धि के लिए कही गई है, पूजन के लिए नहीं। जो लोग सिद्धि करना चाहते हैं, जो मंत्र उपदेश लेकर के भगवती तारा की कृपा की प्राप्ति करना चाहते हैं, उनकी शक्तियों को सिद्ध करना चाहते हैं — उनके लिए वह आवश्यक है। जो लोग भगवती की सामान्य सेवा पूजा करना चाहते हैं, माई की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं — उनके लिए ऐसा आवश्यक नहीं है।

47

कड़ाई से लगाने पर यह नियम छिन्नमस्तिका, तारा, त्रिपुर भैरवी और धूमावती को भी रोक देगा — और बगलामुखी भी तो शवासन पर ही बैठती हैं; फिर घर में पूजन कोई कर ही नहीं सकता।

बगलामुखी भी शवासन पर ही बैठती हैं

· 20:42–21:15

यह तर्क वहाँ पहुँचता है जहाँ इसे कहने वाले नहीं ले जाना चाहते। उस हिसाब से भगवती छिन्नमस्तिका, भगवती तारा, भगवती त्रिपुर भैरवी, भगवती धूमावती — और थोड़ा आगे चले जाइए तो, भले आप बोल देते हैं कि भगवती बगलामुखी किसी कुल में हैं, लेकिन आपको यह भी जानना चाहिए कि भगवती बगलामुखी भी शवासन पर ही बैठती हैं। तो फिर घर में पूजन कोई कैसे करे?

48

दक्षिणाचार विधि से सेवा पूजा की जा सकती है, लेकिन भगवती तारा के अनुष्ठान और उनके मंत्रों के जाप के लिए गुरु आदेश चाहिए।

दक्षिणाचार से सेवा-पूजा; अनुष्ठान के लिए गुरु का आदेश

· 21:16–21:33

पूरे तरीके से यह नहीं कहा जा सकता — दक्षिणाचार विधि से आप सेवा पूजा कर सकते हैं। लेकिन अगर आप भगवती तारा का अनुष्ठान आदि कर रहे हैं, तो वहाँ गुरु आदेश आदि होना चाहिए: उनके विशिष्टतम अनुष्ठान और उनके मंत्रों का जाप आप घर में स्वतंत्रता के साथ नहीं कर सकते। उसके लिए आदेश चाहिए।

49

तारापीठ, कामाख्या या किसी शक्तिपीठ के आसपास रहने वालों को, या जिनकी कुल परंपरा में ऐसी शक्ति पूजित हैं, उन्हें किसी से पूछने की आवश्यकता नहीं — पर किसी और को उपदेश भी न करें।

किसी पीठ के आसपास रहना, या कुल परंपरा में उनका होना

· 21:34–22:02

हाँ। अगर आप तारापीठ के आसपास के रहने वाले हैं, कामाख्या पीठ के रहने वाले हैं, या आपका क्षेत्र किसी शक्तिपीठ के आसपास का है — या अगर आपकी परंपरा में, आपकी कुल परंपरा में भगवती तारा, भगवती छिन्नमस्तिका, भगवती धूमावती या इस प्रकार की कोई शक्ति पूजित हैं — तो वहाँ आपको किसी से कुछ पूछने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन आपको देखकर कोई और व्यक्ति करने लगे, या आप किसी और को उपदेश कर दें कि हम तो कर रहे हैं आप भी करो — यह गलत है।

50

किसी और का करना आपके लिए अनुमति क्यों नहीं बन जाता?

वर्ण, धर्म, देश और काल — सभी की महत्ता है

· 22:03–22:34 · Also a question

क्योंकि इन सब में वर्ण, धर्म, देश और काल — इन सभी की महत्ता है। कोई व्यक्ति बोले कि हम तो घर में तारा या भगवती छिन्नमस्तिका का पूजन करते हैं, और आज से नहीं, 10 साल से कर रहे हैं — और आप उससे बहुत अधिक आंदोलित हो जाते हैं और आप भी करने लगते हैं। तो आप यह तो देख लीजिए कि उनकी कुल परंपरा कौन सी है, उनके घर में कौन पूजित हैं, और उनके घर में पहले से और कौन-कौन से लोग हुए जो इनकी पूजा किए हैं।

51

वे आपको यह नहीं बताएँगे कि वे किस पंथ से दीक्षित हैं या उन्होंने कौन सी साधनाएँ की हैं — केवल यह कि हम करते हैं, आप भी करो।

वे किस संप्रदाय से दीक्षित हैं, और पहले कौन सी साधनाएँ कर चुके हैं

· 22:35–23:07

वे कौन से पंथ से, कौन से संप्रदाय से दीक्षित हैं, उन्होंने कौन सी साधनाएँ कीं — आपको सब कुछ थोड़ी बताएँगे। वे तो केवल यह बोल देंगे कि हम करते हैं, आप भी करो, कुछ नहीं होता है, ये लोग झूठ बोलते हैं। और फिर दिक्कत हो जाती है। जहाँ मना करना है उसको लोग मना नहीं करते हैं; जहाँ नहीं मना करना है, उस चीज को मना कर देते हैं।

52

जो कहीं और अनुष्ठान में सम्मिलित नहीं हो सकते, वे जो बताया गया है उसे तीन दिन तक अपने सामर्थ्य के अनुसार घर में ही करें।

तीन दिन घर में, जितना सामर्थ्य हो उतना

· 23:08–23:43

जो लोग मंदिर में अनुष्ठान आदि नहीं कर रहे हैं, या तंत्र परिवार के माध्यम से नहीं करवा सकते या नहीं करवाना चाहते — वे कम से कम घर में, तीन दिन के लिए, जो-जो बताया गया है वह अपने सामर्थ्य के अनुसार जितना हो सके अवश्य करें। अपना और अपने परिवार का रक्षण करें; सुरक्षित रहें।

जो लोग मंदिर में अनुष्ठान आदि नहीं कर रहे हैं, या अपने परिवार के, तंत्र परिवार के माध्यम से नहीं करवा सकते हैं या नहीं करवाना चाहते हैं — वे कम से कम घर में, तीन दिन के लिए, जो-जो चीज बताई गई है, जो हो सके, जितना सामर्थ्य हो उस अनुसार अवश्य करें। अपना और अपने परिवार का रक्षण करें। सुरक्षित रहें।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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