शिव नवरात्रि: पंचायतन पूजा और नौ दिन की साधनाएँ

शिव नवरात्रि पर उपाय और साधकों के प्रश्नों का उत्तर।

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01

शिव नवरात्रि: महाशिवरात्रि से पहले के नौ दिन

हर देवता का अपने प्राकट्य तिथि से पहले एक नवरात्र होता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:54–08:12

जैसे हम जगदंबा के लिए नवरात्रि मनाते हैं, वक्ता कहते हैं कि हर देवी-देवता का अपना नवरात्र है: उनका विशेष अर्चन उनकी प्राकट्य तिथि से नौ दिन पहले आरंभ होता है, और वह तिथि कल्प भेद से अलग-अलग होती है (उदाहरण में वे बगलामुखी के दो विवरण देते हैं)। सदाशिव के लिए सबसे विशेष रात्रि महाशिवरात्रि है, इसलिए शिव नवरात्रि उससे पहले के नौ दिन हैं — इस लाइव के वर्ष में 10 फरवरी से। इन नौ दिनों में यदि सच्चे समर्पण से सदाशिव से संबंधित साधना कर ली जाए, वे कहते हैं, तो महादेव की कृपा से वह भी मिल सकता है जो भाग्य में नहीं है, और जन्म कुंडली धरी की धरी रह जाती है।

02

किसी भी साधना में सदाशिव की साधना की उपेक्षा क्यों नहीं करनी चाहिए

सदाशिव के बिना फल नहीं मिलता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:13–09:01

किसी भी देवता का सीरियल देखें या कोई भी कथा-पुराण उठाकर पढ़ें, वक्ता कहते हैं, सदाशिव उसमें होते ही होते हैं, क्योंकि महादेव के बिना यह जगत चल ही नहीं सकता। उनसे जुड़ी सबसे विशेष बात: जीवन में हम कोई भी यज्ञ, कर्मकांड, तंत्रकांड या पूजन-पाठ कर लें, यदि सदाशिव से संबंधित साधनाओं को पूरी तरह नहीं करते — न्यूनता से करते हैं, छोड़ देते हैं — तो सामान्यतः वह फल नहीं मिलता जो मिलना चाहिए।

03

भ्रांति: केवल मेरे आराध्य सर्वश्रेष्ठ हैं, और किसी अन्य देवता का नाम नहीं लेना है

अपने आराध्य को दूसरों पर थोपना विकृति है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:02–10:21

वक्ता कहते हैं कि अपने लिए आप अपने आराध्य को सर्वश्रेष्ठ मान सकते हैं — लेकिन दूसरों पर थोपना, यह ज़िद करना कि बाकी सब उनके दास मात्र हैं, मूर्खता है: जिन प्रमाणों से अन्य देवी-महाशक्तियाँ सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होती हैं वे सर्वत्र उपलब्ध हैं, और उन्हें भी मानना पड़ेगा। उन्होंने लाइव वीडियो में लोगों को अपने बच्चों को भगवती का नाम लेने से रोकते और हनुमान जी की पूजा से मना करते देखा है; इसे वे निकृष्ट प्रवृत्ति कहते हैं। कोई संस्था अच्छे आचार्य से शुरू होकर बाद में विकृत हो सकती है — जहाँ ऐसी शिक्षा दी जाए वहाँ जाने से बचें।

04

पंचायतन पूजन: केवल अपने आराध्य नहीं, हर देवता की पूजा क्यों

जागते ही कण-कण में ईश्वर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:22–13:20

सनातन परंपरा के सर्वश्रेष्ठ आचार्यों ने — जिन्हें साक्षात शंकर का अवतार कहा जाता है — पंचायतन पूजन का निर्देश दिया: केवल एक की नहीं, सभी देवी-शक्तियों की पूजा, क्योंकि हमारे लिए कण-कण में भगवान हैं। वक्ता दिखाते हैं कि यह भाव पूरी सनातन सुबह में चलता है: जागते ही अपने हाथों के भीतर के भगवान को प्रणाम (कराग्रे वसते लक्ष्मी); पैर रखने से पहले धरती माता से क्षमा; माता-पिता को प्रणाम; सूर्य नारायण को अर्घ्य; तुलसी, अपराजिता, शमी और देव-वृक्षों को प्रणाम; गौ माता और श्वान को रोटी; फिर शालिग्राम, नर्मदेश्वर शिवलिंगम् और घर के देवताओं का स्नान-श्रृंगार। इसमें कहीं हम यह सोचकर प्रणाम नहीं करते कि "छोटी-मोटी पृथ्वी माता हैं, मेरे आराध्य बड़े हैं" — और जो शिक्षा किसी अन्य देवता का नाम लेने से भी रोके, उससे दूर रहना है।

05

पूरे मंडल सहित शिवलिंग का पूजन हर देवता को समेट लेता है

शिव जी का नित्य अभिषेक सभी शक्तियों का अभिषेक है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 13:22–14:01

ऐसा माना गया है, वक्ता कहते हैं, कि सदाशिव के शिवलिंग का जब उनकी argha, नंदी जी, उनके सर्प और उनके त्रिशूल सहित — उनसे जुड़ा पूरा मंडल — पूजन होता है, तो उसमें सभी देवी-देवताओं का पूजन हो जाता है। इसलिए नित्य केवल शिव जी का अभिषेक भी कर दें, तो माना गया है कि समस्त ब्रह्मांड की सभी शक्तियों का अभिषेक और पूजन हो गया; उनके पिंड का पूजन समस्त ब्रह्मांड का पूजन है, और पूर्ण है।

06

मंदिर में चढ़ी वस्तुओं पर पैर पड़ने का दोष और उसका निवारण

क्षमा याचना ही एकमात्र उपाय

· Reviewed Sep 14, 2026 · 19:25–20:15

मंदिर में सेवा करते समय भगवान की चढ़ी वस्तुएँ पैरों में पड़ जाएँ तो दोष लगता है या नहीं, इस पर वक्ता बड़े मंदिरों की ओर संकेत करते हैं — बाबा बैजनाथ धाम चले जाइए, मुख्य शिवलिंग पर चढ़ा बेलपत्र-पुष्प पैरों तले रौंदा जाता है, और अरघी की नाली में आपका पैर पड़ जाएगा। वहाँ ऐसी ही व्यवस्था बना रखी गई है। यदि गलती से लग जाए, वे कहते हैं, तो निवारण केवल क्षमा याचना है।

07

साधना शुरू करते ही कष्ट क्यों बढ़ जाता है

नकारात्मक शक्ति जाना नहीं चाहती

· Reviewed Sep 14, 2026 · 21:10–22:32

जब नकारात्मक शक्ति शरीर के भीतर होती है, वक्ता कहते हैं, तो वह घर कर जाती है और निकलने तक थोड़ा कष्ट देती है; जब तक आपके आभा मंडल में उसकी ऊर्जा है तब तक कष्ट होगा। आभा मंडल — सूक्ष्म शरीर — तभी मुक्त होता है जब आपके जप-तप से बनी ऊर्जा उसमें मौजूद नकारात्मक ऊर्जा से अधिक हो जाए। ये चाहते ही नहीं कि छोड़कर जाएँ: अभिचार से किसी पर बैठाया भूत, प्रेत या पिशाच कभी शरीर छोड़ना नहीं चाहता, क्योंकि उसका खाना आपके माध्यम से हो रहा है। इसलिए आप कोई भी पूजन-पाठ करें, ये कष्ट बढ़ाएँगे, ताकि आप छोड़ दें।

08

बिना पंडित के रुद्राभिषेक: स्वयं कैसे करें

जल ही काफी है; बस शुरू कीजिए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 22:33–24:15

बारह ज्योतिर्लिंगओं के पास रहने वाले एक श्रोता से, जिनसे रुद्राभिषेक के ₹1100 लिए जाते हैं, वक्ता कहते हैं: सामर्थ्य नहीं है तो मत करवाइए — स्वयं कीजिए, स्वयं करना सीखिए। ज़रूरी नहीं कि दूध से ही अभिषेक हो; जल से कीजिए। जल में भस्म, सफेद चंदन पाउडर या अष्टगंध मिला लीजिए; वह भी नहीं है तो सादे पानी में मिश्री मिलाकर मीठा कर लीजिए। घर में शिवलिंग रखते हैं तो घर पर, नहीं तो मंदिर में जाकर कीजिए। भगवान इसलिए अप्रसन्न नहीं होते कि रुद्राष्टाध्यायी का पाठ नहीं करवा सके — बिल्कुल प्रसन्न होंगे; बात करने की है। विधि चैनल पर है।

09

पंडित की दक्षिणा, और श्रद्धा से दिया गया दान

प्रशिक्षित ब्राह्मण की फीस उसकी आजीविका है, डॉक्टर की तरह

· Reviewed Sep 14, 2026 · 24:16–30:41

वक्ता कहते हैं कि जिन्होंने रुद्राष्टाध्यायी का अध्ययन किया, संस्कृत सीखी और आचार्यत्व धारण किया, उनके भरण-पोषण का दायित्व हमारा है — ₹1100 कम है। आज दो तरह के ब्राह्मण हैं: जो विधि-विधान से सीखे हैं और यजमान की शंका का निवारण भी करते हैं (उच्च कोटि के, क्योंकि सशंकित यजमान को पूरा फल नहीं मिलता), और जो नहीं। माँगी गई दक्षिणा न दे सकें तो विनयपूर्वक कहिए, मान लेंगे; मुँह लगाइए तो वे नाराज़ होंगे ही, क्योंकि वही उनका भरण-पोषण है। लाखों खर्च करके पढ़ा डॉक्टर पाँच मिनट के ₹500 लेता है — सीखा हुआ ब्राह्मण दक्षिणा माँगे तो गलत कहाँ है? सामर्थ्य न होना एक बात है; "ब्राह्मण लूटते हैं" वाली मानसिकता दूसरी, और उस तर्क से तो हर कोई लूट रहा है। दान पर: विश्वास से दिया धन कोई दुरुपयोग करे तो आपका कुछ नहीं जाता — आपका विश्वास फलित होगा, बस जानकारी न लेने का थोड़ा दोष लगेगा — जबकि दुरुपयोग करने वाले के साथ बहुत गलत होता है। और धर्म का अर्थ सब कुछ मंदिर में लगाना नहीं: सनातन के गरीबों को दीजिए।

10

केसर-जल के साथ रुद्राष्टक: दोष और श्राप के लिए शिव नवरात्रि का उपाय

पीतल का लोटा, केसर, और आठ या सत्ताईस रुद्राष्टक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 31:00–35:18

हर कुंडली में एकाध दोष निकल ही जाता है, वक्ता कहते हैं — ग्रहण दोष, पितृ दोष, काल सर्प दोष — और दोष का अर्थ है कोई श्राप मिला है; कुंडली न हो तो लक्षण हैं बार-बार गर्भपात, वाहन की परेशानी आदि। किसी भी दोष से मुक्ति के लिए — देव दोष, पितृ दोष, माता-पिता या किसी का श्राप — शिव नवरात्रि में सबसे पहला काम: पीतल के लोटे में केसर डालें, जल डालें, दोनों हाथों में पकड़ें, रुद्राष्टकम् का कम से कम 8 बार (समय हो तो 27) पाठ करें, फिर सदाशिव से प्रार्थना करें कि हर प्रकार के श्राप से मुक्त कर दें — जिसमें किसी के दुखी हृदय से निकली बद्दुआ भी है; भगवान उस व्यक्ति के मन के भाव बदलकर ऐसा श्राप हटाते हैं। 10 से 18 फरवरी तक प्रतिदिन कीजिए। बहुत समय से रुका काम हो तो पूरे नौ दिन पूरे समर्पण से; यह टोटका नहीं है।

11

बहुत समय से रुके काम के लिए कमल के साथ शिव सहस्रनाम

एक कमल, एक संकल्प, और पूरा सहस्रनाम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 35:19–39:45

शिव सहस्रनाम को सिद्ध करने या उसके द्वारा सदाशिव की कृपा पाने की सर्वश्रेष्ठ विधि कमल है, वक्ता कहते हैं। एक कमल लाइए, स्नान कराइए, केसर से तिलक कीजिए, उसे हाथ में लेकर संकल्प लीजिए — "मेरा यह काम बहुत समय से रुका है, सदाशिव इसे फलीभूत कीजिए" — और उसे लिए हुए ही पूरा सहस्रनाम कम से कम एक बार (समय हो तो 5 या 11 बार) पढ़िए; फिर पुष्प शिवलिंग पर अर्पित कीजिए। इससे पहले, हर विधि की तरह: अक्षत पर घी के दो दीपक, एक शिव जी के लिए (सब देवता) और एक पार्वती जी के लिए (सब शक्तियाँ, क्योंकि दस महाविद्याएँ उन्हीं के शरीर से प्रकट हुईं); अभिषेक — चाहें तो परिवार के हर सदस्य के लिए एक लोटा; बेलपत्र, त्रिपुण्ड्र, श्रृंगार, धूप और नैवेद्य के साथ मीठा जल; पीला वस्त्र और पीला आसन। शिव मंदिर में गणपति की मूर्ति न हो तो गणपति के लिए रखी दूब शिवलिंग की argha पर रख दें — उन्हें स्वीकार होगी। यह नौ दिन कीजिए। कमल के नियम: बृहस्पतिवार को स्वयं न तोड़ें; और किसी सरोवर, बगीचे या निर्जन स्थान से पुष्प लेने से पहले हाथ जोड़कर वहाँ के रक्षक यक्ष या देवता से आज्ञा माँगें — क्या पता उस पेड़ के नीचे किसने किसे बैठाया हो — नहीं तो दोष-निवृत्ति के लिए गए और नया दोष लग गया। बाद में सहस्रनाम कठिन लगने वाले श्रोता से वे कहते हैं: नौ दिन रुद्राष्टक कर लीजिए।

12

पूर्व जन्मों के पापों के लिए द्वादश ज्योतिर्लिंग अभिषेक और शमी पत्र

हर नाम से बारह अभिषेक, या एक शमी पत्र के साथ स्तोत्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 39:50–41:29

जिन्हें पता है कि इस जन्म में शरीर, मन, वाणी से पाप हो रहे हैं या हुए हैं, या जिनकी कुंडली में पाप-ग्रहों से दृष्ट ऐसे योग हैं जिन्हें ज्योतिषी बड़ा पाप बताते हैं, और जिन्हें दिखता है कि इसी से सफलता नहीं मिल रही — उनके लिए वक्ता बताते हैं सदाशिव का बारह ज्योतिर्लिंगओं के नाम से अभिषेक, हर नाम से बारह-बारह अभिषेक (विधि चैनल पर)। वह न हो सके तो: शिवालय में सामान्य अभिषेक करके, वहीं बैठकर एक शमी पत्र हाथ में लें, jyotirlinga-stotram ("सौराष्ट्रे सोमनाथं च…") का 12 से 108 बार पाठ करें, और पत्र शिवलिंग पर अर्पित कर दें। केवल पाठ से ही सात जन्मों के पाप नष्ट होना कहा गया है; शमी पत्र के साथ, वे कहते हैं, ज़रूर नष्ट होंगे। शमी शनिवार को कभी न तोड़ें — शुक्रवार को तोड़कर पानी में रखें।

13

धन और ऋण के लिए काली किशमिश के साथ दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र

केसर लगी बारह किशमिश, हर पाठ पर एक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 41:30–43:12

धन की समस्या और न उतरने वाले कर्ज़ के लिए वक्ता इस समय के लिए एक छोटी विधि के साथ daridra-dahana-stotram बताते हैं: कृष्ण द्राक्षा (काली किशमिश) रख लें; हर दिन थोड़े गंगाजल में केसर घिसकर उसमें बारह किशमिश मिला दें; एक किशमिश लेकर स्तोत्र पढ़ें और शिवलिंग पर समर्पित करें, ऐसे बारह बार। बारह बेलपत्र मिल जाएँ तो हर किशमिश को एक बेलपत्र पर रखकर समर्पित करें — और अधिक लाभ। इससे धन-संपदा मिलती है और कर्ज़ से मुक्ति। समर्पण से करें, टोटके या "उपाय" के भाव से नहीं: उस भाव से करेंगे तो फल नहीं मिलेगा। विधि लिखित है, तांत्रोक्त प्रमाण सहित — उसमें मधु भी लिखा है, पर विधि सरल रखने के लिए वे उसे छोड़ देते हैं।

14

जिस रोग पर औषधि असर न करे, उसके लिए 27 नक्षत्रों पर महामृत्युंजय कवच

शिवरात्रि से पहले के पाँच दिन, हाथ में बिल्व गिरी लेकर रोज़ 27 पाठ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 43:13–44:56

शरीर में बहुत रोग हो और औषधि का प्रभाव न पड़े, तो वक्ता महामृत्युंजय कवच बताते हैं — उसमें बीज मंत्र हैं, इसलिए जिन्हें उच्चारण आता हो वही करें। यह नौ दिन नहीं, केवल पाँच दिन करना है, शिवरात्रि से पहले के पाँच, लगभग नवमी से: प्रतिदिन 27 पाठ, हर नक्षत्र के लिए एक। हाथ में बिल्व गिरी (बेल का गूदा) लें, 27 नक्षत्रों के नाम लिखकर ले जाएँ, और हर पाठ से पहले कहें: "हे सदाशिव, अश्विनी नक्षत्र की शांति हेतु, और उससे जनित कोई रोग मेरे शरीर पर प्रभाव दे रहा हो तो उसकी शांति हेतु यह पाठ कर रहा हूँ" — फिर कवच; फिर भरणी, कृत्तिका, इसी तरह सभी 27, इस भाव से कि वे शांत हो रहे हैं। पूरी संस्कृत विधि हर एक की अलग है; यह संक्षिप्त रूप है। बाद में वह एक बिल्व गिरी शिवलिंग पर रख दें।

15

शिवलिंग के चारों ओर छाल की अरघी: अस्त्र-मंत्र अभिषेक, और रोग के लिए नीम की छाल का उपाय

पेड़ की छाल से बनी अरघी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 44:57–47:00

पिछले सावन के लाइव की एक विधि याद करते हुए वक्ता छाल की argha बताते हैं: पुराने आम या बेल के पेड़ की बाहरी छाल, पूरी बिना टूटे निकालकर, पानी में फूलने तक रखकर, हल्के से अरघी के आकार में मोड़कर, शिवलिंग के चारों ओर पहनाई जाती है, और उसी से अभिषेक होता है। उस विधि में अस्त्र मंत्र मंत्रों का प्रयोग होता है — महामृत्युंजय मंत्र, और तांत्रोक्त रूप में अघोरास्त्र और अलग नीलकंठ अस्त्र, शत्रुनाश और अभिचार-नाश के लिए; महामृत्युंजय के अन्य संपुट मंत्र लक्ष्मी-प्राप्ति के लिए। वह विधि थोड़ी क्लिष्ट है। रोगनाश के लिए घर का छोटा रूप: नीम की छाल की छोटी अरघी शिवलिंग के चारों ओर, और मट्ठे से शिव जी का अभिषेक।

16

घर के किन शिवलिंगों और मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा चाहिए

नर्मदेश्वर कभी नहीं; स्फटिक, मूंगा और विग्रह हाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 47:01–49:10

नर्मदेश्वर शिवलिंगम् शिवलिंग की कभी प्रतिष्ठा नहीं होती, वक्ता कहते हैं। स्फटिक या मूंगे (मणि-माणिक्य) का शिवलिंग, या अकेले सदाशिव का अथवा शिव परिवार का विग्रह हो तो कर सकते हैं — प्रतिष्ठा विधि वही रहेगी, महादेव से संबंधित विधान के साथ। चैनल पर दी गई घर की विधि हिंदी में भावपूर्ण सामान्य प्रतिष्ठा है, मंदिर की अचल प्रतिष्ठा नहीं; जिन्हें लंबी लगे वे छोटी कर लें और उसे छोड़ दें। किसी भी त्रिनेत्र देवता के लिए एक सावधानी: नेत्र-उन्मीलन में तीसरा नेत्र न खोलें — वह ओवर-स्मार्टनेस होगी।

17

पर्व काल मंत्र चैतन्य करने के लिए है, प्रयोग के लिए नहीं

बैंक में जितना है उतना ही खर्च करें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 49:22–53:23

जो पहले से साधना कर रहे हैं वे इन नौ दिनों में उसे दोहराएँ, वक्ता कहते हैं — प्रयोग नहीं करें। लोग एक 11 दिन की साधना करके तुरंत प्रयोग विधि माँगते हैं, फिर कहते हैं कुछ नहीं हुआ: बैंक में ₹10,000 हों तो उससे अधिक खर्च नहीं कर सकते; 100 माला जमा हैं तो 1,000 खर्च नहीं होंगी। आपका शत्रु कच्चा खिलाड़ी नहीं है। अनुष्ठान बार-बार दोहराएँ जब तक कम से कम कृपा-सिद्धि न हो, तभी प्रयोग प्रभाव देगा। महाशिवरात्रि, शिव नवरात्र, होलिका की रात जैसे पर्व काल में प्रयोग की बजाय मंत्रों को चैतन्य करने पर ध्यान दें — इन समयों में प्रयोग केवल दुष्ट, बेवकूफ लोग दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए करते हैं, और ऐसा प्रयोग तुरंत असर तो करता है, पर सामने वाले का इष्ट और तप-बल मज़बूत हो तो वह कुछ दिन बीमार पड़कर ठीक हो जाता है, और उसका ज्ञात-अज्ञात सभी शत्रुओं के विरुद्ध लिया संकल्प फिर उन्हें समाप्त कर देता है।

18

शत्रुओं के विरुद्ध संकल्प, बिना नाम लिए

दंड अपने इष्ट पर छोड़ दें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 53:24–54:04

चैनल पर दिए प्रयोग प्रयोग नहीं, निवेदन हैं, वक्ता कहते हैं। हनुमान जंजीरा करते हुए आप यह नहीं कहते कि "फलाने को जाकर खत्म करो"; भैरव जी के विधानों में ऐसी चीज़ें हैं, लेकिन नाम लेने को उन्होंने कहीं नहीं कहा — लेना है तो अपने रिस्क पर, क्योंकि शत्रु पलटवार करे तो रोकने का सामर्थ्य आपमें होना चाहिए। शत्रु को दंड देना है तो जिन आराध्य की सेवा करते हैं उन पर छोड़िए: पाठ करके समर्पित करते जाइए — "हनुमान जी, मेरे शत्रुओं को देखिए, उन्हें दंडित कीजिए" — यह नहीं कि "फलाने को ऐसा करके आइए"। नाम लेना तभी उचित है जब किसी देवता को उस प्रकार की त्रिवाचा के साथ सिद्ध किया हो। अन्यथा शत्रु-नाश का संकल्प लीजिए, पर समर्पण अपने इष्ट को कीजिए।

19

शिव नवरात्रि में अभिचार के लिए भैरव अनुष्ठान, और एक साधना पर टिके रहना

अनुष्ठान दोहराइए; प्रभाव देना उनका काम है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 54:05–55:40

जिनके जीवन में बहुत विचित्र घटनाएँ हो रही हैं — चैनल पर भैरव जी से संबंधित प्रयोग अभिचार-नाश के लिए हैं, वहाँ तक जहाँ किसी परिवार पर मारण प्रयोग होते रहते हैं — उनसे वक्ता कहते हैं: इस नवरात्रि में भैरव जी का अनुष्ठान करें। बटुक भैरव हृदय; रुद्रयामल तंत्र का बटुक भैरव स्तोत्र, शतनाम का संकल्प लेकर; या महाभैरव मंत्र अथवा महाभैरव स्तोत्र। पहले अनुष्ठान, बार-बार दोहराया हुआ; प्रयोग विधि बाद में। उनके मूल साधकों ने एक बात फिक्स कर रखी है: शिवरात्रि पर केवल अघोरास्त्र सिद्धि। एक जगह जम जाइए, वे कहते हैं; "प्रभाव कब मिलेगा" मत पूछते रहिए — प्रभाव देने वाले वहाँ बैठे हैं; न आप एक पत्ता हिला सकते हैं न वे, लेकिन भगवान कहते हैं कि सब कुछ मेरी इच्छा से होता है।

20

महाशिवरात्रि: प्रथम ज्योतिर्लिंग, और सदाशिव का पंचानन स्वरूप

विवाह की तिथि से कहीं अधिक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 55:41–58:04

सब महाशिवरात्रि को शिव-पार्वती विवाह का दिन जानते हैं, वक्ता कहते हैं, लेकिन शिव पुराण की विश्वेश्वर संहिता और बताती है: यही वह तिथि है जिस दिन सदाशिव पहली बार ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए — पहली बार मूर्त आकार लिया, स्वयं को स्तंभ का आकार दिया। कल्प भेद से एक अन्य विवरण इसे मार्गशीर्ष कृष्ण तृतीया, आर्द्रा नक्षत्र में रखता है; दोनों गलत नहीं। और उनका प्रथम स्वरूप एकमुखी नहीं था: सदाशिव का पूर्ण स्वरूप पंचानन है, पंचमुखी — जैसे कामाख्या के कामेश्वर महादेव भी माने गए हैं, कामेश्वरी पंचमुखी और कामाख्या षण्मुखी, और श्री विद्या के ध्यान मंत्रों में नाम-स्वरूप के और भेद। केवल इतना जान लें, वे कहते हैं: महाशिवरात्रि अति विशिष्ट है, और उससे पहले के पूरे नौ दिन साधना करने से विशेष फल मिलता है।

21

धन के लिए गोधूलि बेला में शिव तांडव स्तोत्र, और इसे घर में पढ़ने की भ्रांति

फलश्रुति स्वयं लक्ष्मी का वचन देती है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 58:05–59:05

समय कम हो और किसी एक चीज़ को लेकर चलना हो, विशेषकर धन के लिए, तो वक्ता कहते हैं: गोधूलि बेला में, शाम के संध्या वंदन के समय, शिव ताण्डव स्तोत्र का पाठ करें। यह भ्रम कि इसे घर में नहीं पढ़ना चाहिए — "कहाँ से ऐसी बुद्धि लाते हैं, भगवान जाने" — मन से निकाल दें: स्तोत्र में अंत में स्वयं लिखा है कि जो संध्या के समय पूजन के पश्चात इसका पाठ करेगा, उसके घर में लक्ष्मी स्थिरता से रहेंगी, रथ-गज आदि सहित पूरी धन-संपदा मिलेगी। शिव नवरात्र से आरंभ करके जीवन पर्यंत करते चलें; सही समय पर करें तो शीघ्र प्रभाव दिखता है।

22

जनेऊ धारण करने वाले के लिए न्यूनतम दैनिक गायत्री

अर्घ्य के समय पाँच मानसिक गायत्री, सुबह-शाम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:01:00–1:01:41

पंद्रह वर्ष के एक बच्चे के प्रश्न पर कि जनेऊ धारण करने वाले को प्रतिदिन कितनी पूजा करनी चाहिए, वक्ता कहते हैं कि त्रिकाल गायत्री — त्रिकाल संध्या — कही गई है, लेकिन पूरा विधि-विधान अभी के समय में संभव नहीं। देश-काल-परिस्थिति के अनुसार कम से कम सुबह-शाम पूजन-पाठ हो जाए; और वह भी न हो सके तो सूर्य नारायण को अर्घ्य देते समय कम से कम पाँच बार मानसिक गायत्री का पाठ हो जाए — उससे भी वह फल मिलता है, और इतना तो ज़रूर करना चाहिए।

23

क्या मनसा देवी पुराणों में नहीं हैं? एक खंडन

मनसा के बिना महाभारत और परीक्षित की कथा गिर जाती है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:01:42–1:02:44

एक श्रोता दावा करता है कि माँ मनसा देवी का उल्लेख किसी पुराण में नहीं मिलता, फिर उनकी पूजा कैसे शुरू हुई। किसने कहा, वक्ता पूछते हैं — आप सारे पुराण पढ़ चुके हैं? यदि मनसा देवी हैं ही नहीं, तो पूरा महाभारत गलत हो गया, पूरा श्रीमद्भागवत गलत, राजा परीक्षित की कथा गलत — और फिर कलियुग ही गलत हो गया। आपने पूरा ब्रह्मांड घुमा दिया, वे कहते हैं।

24

स्वप्न में मिला सच्चा आदेश और भ्रमित करने वाला आदेश कैसे पहचानें

नाड़ी, और जागने पर वातावरण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:03:26–1:05:04

क्या स्वप्न में देव शक्तियाँ सच में साधना का आदेश दे सकती हैं, या कोई दूसरी शक्ति भ्रमित करने के लिए करती है? दोनों हो सकता है, वक्ता कहते हैं; उस समय जो आभास हुआ उसके अनुसार विचार करें। एक तरीका, जिस पर वीडियो पहले से है, नाड़ी विज्ञान: देखें उस समय सूर्य नाड़ी चल रही थी या चंद्र — इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना — यह ध्यान रखते हुए कि किस करवट सोए थे। दूसरा: नींद टूटते ही यदि देव शक्ति थी तो आसपास का वातावरण अत्यंत शुभ्र, शांत, सौम्य लगेगा, कोई विशेष सुगंध भी महसूस हो सकती है, अर्धनिद्रा में भी; नकारात्मक ऊर्जा थी तो उठते ही एकाएक हल्का भय लगेगा, वातावरण भयभीत-सा, कुछ अच्छा नहीं लगेगा। जब तक आभामंडल इतना संवेदनशील न हो, ऐसा निर्देश मिलता भी नहीं — और त्रिशंकु साधक, जो साधना के मध्य में है, उसके साथ ये सब होता रहता है और समझना मुश्किल हो जाता है।

25

मंत्र जप के दौरान क्रोध क्यों बढ़ता है

मूलाधार पहले सक्रिय होता है; इसीलिए गणपति प्रथम पूज्य हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:05:05–1:08:29

माँ के मंत्र जप से अधिक क्रोध क्यों आता है, इस पर वक्ता कहते हैं कि यह किसी भी मंत्र से होता है, और दो तरह से समझाते हैं। पहला: साधक जब बैठकर जप करता है तो मूलाधार — ठीक आसन के पास — सबसे पहले सक्रिय होता है, और उसके साथ काम और क्रोध का आवेग बढ़ता है; यह साधना का स्टार्टिंग फेज़ है, और उस चक्र के स्वामी भगवान गणेश हैं। इसीलिए वे प्रथम पूज्य हैं: गणपति इन्हें नियंत्रित कर लें तो आगे की साधना में यह आवेग परेशान नहीं करता। लेकिन हम गणपति साधना कितनी करते हैं — "गजाननं भूतगणादि सेवितं" कर दिया, हो गया; 11,000 या 21,000 दो-तीन दिन में खत्म, फिर भगवती के मंत्र के पाँच-नौ लाख: नियंत्रण भी उसी अनुसार होगा। क्रम है गुरु, गणपति, फिर भैरव, फिर हनुमान, तब मुख्य साधना, कुल के देवी-देवता सहित। दूसरा: मंत्र की प्रकृति — बीज मंत्र हो तो गकार-मकार और अनुस्वार का सही उच्चारण मायने रखता है (वे कालिका बीज का उदाहरण देते हैं); उल्टा करें तो शरीर में दिक्कत देगा। और षट्चक्र के अनुसार असंतुलित चक्र क्रोध बढ़ाता है: मूलाधार छोड़ दें तो प्रायः नाभि चक्र असंतुलित होता है, रं अग्नि बीज के साथ। बड़ी साधना से पहले अपनी प्रकृति जानिए।

26

हर पूर्णिमा और पर्व काल पर नारियल का दीपदान

108 बत्ती का नारियल दीपक सर्वांगीण प्रभाव वाला है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:08:36–1:10:16

दीपावली पर बताया नारियल का दीपदान हर विशेष पर्व पर किया जा सकता है क्या, इस पर वक्ता कहते हैं हाँ — वे कह भी चुके हैं। नारियल में 108 बत्ती का दीपदान सर्वांगीण प्रभाव वाला है: नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है, धन की प्राप्ति होती है, और पितृ व देवता दोनों तृप्त होते हैं। इसलिए हर पूर्णिमा और हर आने वाले पर्व काल पर कीजिए — सरस्वती पूजा और माघ पूर्णिमा अभी गई; शिव नवरात्रि आ रही है तो महाशिवरात्रि को ज़रूर; फिर फाल्गुन अमावस्या; फिर होलिका की रात। "यहाँ तो होली है, आप दिवाली वाली बात कह रहे हैं" पर वे कहते हैं दोनों कीजिए, फल बढ़िया मिलेगा। वे उन साधिकाओं का भी ज़िक्र करते हैं जो हर कृष्ण पक्ष अष्टमी को भैरव जी का वृहद दीपदान करती हैं — सामर्थ्य हो तो पूरा कीजिए, नहीं तो थोड़ा।

27

एक दीपक से दूसरा दीपक क्यों नहीं जलाते

ऋण दोष

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:11:06–1:11:22

दीपक से दीपक जलाना ऋण दोष माना गया है, वक्ता कहते हैं — इसीलिए न जलाने को कहा गया है। विशेषकर दूसरे के दीपक से अपना दीप प्रज्वलित करना तो मना ही है।

एक श्रोता पूछता है कि दीपक से दीपक क्यों नहीं जलाना चाहिए। ऋण दोष माना गया है, वक्ता उत्तर देते हैं। इसीलिए बताया गया है कि दीपक से दीपक नहीं जलाना चाहिए। और विशेष रूप से, दूसरे के दीपक से अपना दीप प्रज्वलित करना तो मना ही है।

28

पितृ पक्ष में या शनि पुष्य में जन्मा बच्चा

पूछिए पुष्य के स्वामी और देवता कौन हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:11:23–1:13:18

एक माँ को कहा गया है कि उनकी बेटी का जन्म — श्राद्ध में, शनिवार को शनि पुष्य में — ठीक नहीं। ऐसा नहीं कहा जा सकता, वक्ता उत्तर देते हैं, कि श्राद्ध में जन्म कठिनाई वाला जीवन है; किसके जीवन में कठिनाई नहीं है? और जिसने शनि पुष्य को बुरा कहा उससे पूछिए: पुष्य नक्षत्र के स्वामी कौन हैं, और देवता कौन — दोनों अलग होते हैं — फिर बताएँ कि शनि पुष्य का जन्म कैसे गड़बड़ हो गया। लोगों ने गुरु पुष्य, रवि पुष्य सुना है और शनि पुष्य को बुरा कह देते हैं, बिना जाने कि नक्षत्र पर किसका अधिकार है। सब अपना प्रारब्ध काटने जन्मे हैं; ग्रह-नक्षत्र को दोष न दें, भ्रमित न हों।

29

शिवलिंग का मस्तक कभी खाली नहीं रखा जाता

ब्रह्मांड के महाराजाधिराज मुकुट पहनते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:13:39–1:14:40

घर के शिवलिंग पर सदैव बेलपत्र या फूल की पत्ती रखनी चाहिए क्या, इस पर वक्ता कहते हैं हाँ: घर में या कहीं भी शिवलिंग का मस्तक कभी खाली नहीं रखा जाता, क्योंकि शिव अखिल ब्रह्मांड के महाराजाधिराज हैं, और राजा का मस्तक कभी खाली नहीं रहता। उस पर मुकुट रखिए; मुकुट न हो तो कम से कम अखंडित चावल, या बेलपत्र; रोज़ ताज़ा बेलपत्र न मिले तो चाँदी का बेलपत्र। साथ में वासुकी सर्प रखें — पंचमुखी सर्प सर्वश्रेष्ठ — और नंदी जी व उनका त्रिशूल ज़रूर रहे। जिस श्रोता के पीतल के शिवलिंग का मस्तक नुकीला है और सब गिर जाता है, उससे वे कहते हैं: छोटा चाँदी का मुकुट बनवा लें, या कान्हा जी के लिए मिलने वाला टोपी वाला मुकुट लाकर महादेव को पहनाएँ, हर मासिक शिवरात्रि को नया बदलें — बस मस्तक खाली न रहे।

30

संस्कृत की जगह हिंदी में कवच का पाठ

पहले भावपूर्ण हिंदी, धीरे-धीरे संस्कृत

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:14:45–1:14:56

भगवान दत्तात्रेय के कवच का हिंदी में पाठ करने वाले श्रोता से वक्ता कहते हैं: बिल्कुल, हिंदी में कीजिए, पूरे भाव से। हिंदी जब हो जाए, तब धीरे-धीरे संस्कृत में कर सकते हैं।

एक श्रोता कहता है कि वह भगवान दत्तात्रेय के कवच का पाठ हिंदी में करता है। बिल्कुल, वक्ता कहते हैं — भावपूर्ण हिंदी में कीजिए। हिंदी जब हो जाए, तब धीरे-धीरे संस्कृत में कर सकते हैं।

31

छोटे बच्चे की कुंडली नहीं दिखाई जाती; माता-पिता बच्चे के निमित्त रुद्राभिषेक कर सकते हैं

बाल-ग्रह शांति जन्म के समय एक बार, तेरह वर्ष तक के लिए बताई जाती है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:17:20–1:18:07

माता-पिता पूछते हैं कि चार साल के बेटे की कुंडली में काल सर्प दोष है तो क्या वे उसके लिए रुद्राभिषेक और नौ दिन का पूजन कर सकते हैं। सबसे पहले, वक्ता कहते हैं, चार साल के बच्चे की कुंडली दिखाई नहीं जाती। बाल-ग्रहों का दोष जन्म के समय, षष्ठी आदि पर जब जन्म कुंडली पहली बार बनती है, तब एक बार बताया जाता है: पंडित जी कहते हैं कि तेरह वर्ष तक इस-इस उम्र में यह शांति करवा लेनी है। बीच में न कुंडली दिखाई जाती है, न कुछ पढ़ा जाता है। फिर भी, दोष मान भी लें तो माता-पिता स्वयं सब कर सकते हैं — संकल्प करके रुद्राभिषेक और जो भी पूजन चाहें; और जन्म के समय बताया गया था तो ठीक है, शिव नवरात्रि में किसी दिन पंडित जी से रुद्राभिषेक करवाया जा सकता है।

32

समर्पित साधना से स्वप्न में दर्शन स्वतः होने लगते हैं

अलग से स्वप्न सिद्धि की आवश्यकता नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:19:34–1:21:35

स्वप्न में दर्शन और बात के लिए विशेष संकल्प लें क्या, इस पर वक्ता कहते हैं कि उनके अनुसार जब समर्पित होकर साधना करने लगते हैं तो ये चीज़ें स्वतः हो जाती हैं — वे चैट में एक साधिका की ओर संकेत करते हैं जो बिल्कुल सामान्य जीवन जीती हैं, कहीं स्वयं को प्रदर्शित नहीं करतीं, असली नाम भी नहीं बतातीं, फिर भी "आज दर्शन नहीं हुआ" कहने की स्थिति में हैं। साधना में उतर जाएँगे तो नियमित रूप से होने लगेगा; स्वप्न में दर्शन होने लगेंगे; अलग से स्वप्न सिद्धि की आवश्यकता नहीं। वे ऐसा संकल्प न लेने को कहेंगे, क्योंकि सफल होगा या नहीं यह वे नहीं कह सकते; महादेव से संबंधित बताई गई कोई भी साधना, या अपनी इच्छा की, समर्पित होकर कर लीजिए, कृपा ज़रूर होगी — वे ज़रूर दर्शन दे सकते हैं।

33

भैरव त्रिशूल पर नींबू: आकार, बदलने का दिन और विसर्जन

त्रिशूल इतना तो हो कि नींबू लग जाए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:23:56–1:24:51

भैरव त्रिशूल पर आए कई प्रश्नों से: त्रिशूल कम से कम इतना हो कि नींबू लग जाए — तीनों नोकों पर एक-एक फँस जाए तो चलेगा; बहुत छोटा हो तो पुष्प लगा दें, लेकिन वक्ता अंत में नींबू ही लगाते हैं और बलि-छेदन के लिए उससे छोटा कुछ नहीं देखते। घर में माँ काली और महादेव के लिए दो अलग त्रिशूल हों तो कोई दोष नहीं; और तीन त्रिशूल हों तो नींबू केवल भैरव जी के नाम से रखे लोहे के त्रिशूल पर। नींबू हर शनिवार बदला जाता है; उस दिन न हो सके तो रविवार या मंगलवार भी चलेगा। पुराना नींबू देव-वृक्ष के नीचे विसर्जित करें, या नदी में — गंगा जी पास हों तो गंगा जी में; कई एक साथ भी कर सकते हैं।

34

तेतर: तीन बेटियों के बाद जन्मा बेटा

एक मान्य दोष, जिसकी अपनी निवृत्ति है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:25:39–1:26:33

तीन बेटियों के बाद चौथी संतान के रूप में जन्मे लड़के को तेतर कहा गया है, वक्ता कहते हैं। ऐसे जन्म से माता-पिता को और बड़े भाई को कष्ट माना गया है — स्वास्थ्य और धन की हानि। यह कोई कुप्रथा नहीं; इसका कारण रहा है, लोक-प्रचलन में रहा है, इसकी दोष-निवृत्ति होती है, और यह देखा भी गया है कि ऐसा लड़का आगे चलकर परिवार में, विशेषकर बड़े भाई या बड़ी बहन के लिए, क्लेश का कारण बन जाता है।

35

सदाशिव की कृपा के लिए शिव नवरात्रि में नौ दिन का पुराण पाठ

एक संहिता, एक संकल्प, चार पुरुषार्थ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:28:00–1:28:26

नौ दिनों के लिए एक विशेष बात, वक्ता कहते हैं: यदि केवल भगवान सदाशिव की कृपा चाहिए — कोई विशेष साधना हो या साधारण अनुष्ठान — तो शिव नवरात्रि में उनसे संबंधित पुराणों का पाठ करें: शिव पुराण का जितना हो सके, या उसकी कोई एक पूरी संहिता — विश्वेश्वर, रुद्र, कैलाश — नौ दिन के भीतर पूरी। साथ में यह संकल्प: मुझे सदाशिव और भगवती पार्वती की कृपा प्राप्त हो, और उनकी कृपा से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थ। यह निष्काम नहीं — काम ही है — लेकिन पुराण पाठ के इस अलग विधि-विधान से करें तो ज़रूर विशेष फल मिलता है।

36

हर ओर से बंधन हो तो: हनुमान अनुष्ठान

जो नौ ग्रहों को मुक्त करते हैं वे आपको भी करेंगे

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:34:52–1:35:18

हर तरफ से बंधन किया हो तो शिव नवरात्रि में कौन-सी पूजा करें, इस पर वक्ता कहते हैं: बंधन से मुक्त करने में हनुमान जी — शिव-भक्त, शिव-अवतार, रुद्रावतार — पूर्ण रूप से सक्षम हैं; जो नौ ग्रहों को बंधन से मुक्त कर सकते हैं, वे आपको और हमको क्यों नहीं करेंगे? ऐसी विशेष विकट परिस्थिति हो तो हनुमान जी से संबंधित अनुष्ठान करें।

37

प्रत्यंगिरा प्रायोगिक विद्या है: यह सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं सिखाई जाती, और क्यों उल्टी पड़ती है

इसमें ऊर्जा खर्च होती है, बनती नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:40:28–1:42:23

प्रयोग सहित महाप्रत्यंगिरा का वीडियो माँगने पर वक्ता कहते हैं कि वे ऐसे वीडियो बनाते ही नहीं — बगलामुखी तंत्र रहस्य प्लेलिस्ट में एक-दो वीडियो हैं। प्रत्यंगिरा क्रम विद्या है, प्रायोगिक विद्या: इसमें ऊर्जा बनती नहीं, खर्च होती है; इसमें आप देवी को आदेश दे रहे हैं, उनसे तप-बल नहीं माँग रहे। वे इसे सार्वजनिक नहीं डालेंगे — जिन्होंने पहले के वीडियो नहीं देखे वे सीधे करने लग जाएँगे — हालाँकि लंबे समय से जुड़े साधकों के लिए बाद में मेंबर्स-ओनली प्रैक्टिकल वीडियो आ सकते हैं। जिस श्रोता पर बजरंग बाण या प्रत्यंगिरा "वापस लग रहा" है, उससे: ज़रूर कोई कारण है; पहला कारण अपने कुल के देवी-देवता हो सकते हैं, या कोई बेसिक गलती — शत्रु का प्रत्यंगिरा को वापस भेज देना ऐसे संभव नहीं।

38

रजस्वला अवस्था में कामाख्या कवच

वह कवच जो अशुद्धि में भी रक्षा करता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:42:27–1:43:08

रजस्वला स्त्री कामाख्या कवच का पाठ कर सकती है क्या? हाँ, वक्ता कहते हैं — चैनल पर इसी शीर्षक से दिया है, अशुद्धि में भी रक्षा करने वाला कवच; रजस्वला स्त्री किसी भी समय कर सकती है। तरीका: पूजन स्थान पर न जाएँ, धूप-दीप न जलाएँ, देवताओं के स्थान पर न जाएँ; नहा-धोकर पूजन स्थान से बाहर कहीं भी खड़े होकर हाथ जोड़कर मानसिक रूप से पाठ करें — उतना काफी है। उस अवस्था में और किसी का पाठ नहीं कर सकते।

39

बिना दीक्षा नाम जप, और सार्वजनिक रूप से महाविद्या का नाम

समर्पण से नाम फलदायी है; बीज न जोड़ें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:43:28–1:44:15

बिना दीक्षा नाम लेना फलदायी होगा? क्यों नहीं, वक्ता कहते हैं — उतने समर्पण से नाम लीजिए तो होगा; और उसी नाम के फल से फिर दीक्षा मिलेगी, समर्पण हो तब। महाविद्या स्वरूप का नाम सार्वजनिक रूप से जपा जा सकता है? नाम जप के लिए कोई दिक्कत नहीं — कर सकते हैं — बस उसमें कोई बीज मंत्र न लगाएँ। और जिसे कहा गया कि बिना दीक्षा केवल राम जी का नाम लें क्योंकि उसी से इष्ट का भी जप हो जाता है: यह कहने वाले का अपना भाव है, नियम नहीं — जिनमें श्रद्धा हो, राम या भगवती, उनका नाम लीजिए, उतर जाएँगे।

40

धन लेकर दूसरों के लिए जप या हवन: साधक पर आने वाला दोष

ब्राह्मण का नहीं, साधक का धन नहीं पचता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:45:11–1:47:37

धन लेकर दूसरों के लिए हवन करने पर वक्ता कहते हैं: तभी, जब देव कृपा हो, या किसी देवी-देवता या आपके गुरु ने कहा हो, और आप उतने समर्थ हों। जब साधक किसी अन्य के लिए संकल्प लेकर जप करता है, तो उस व्यक्ति की सारी बुरी परिस्थिति और दोष — क्योंकि जप उसके परिहार के लिए है — साधक पर आ पड़ते हैं। "ब्राह्मण का धन नहीं पचता" का असली अर्थ यही है: कहना चाहिए "साधक का धन"। "केवल ब्राह्मण से करवाइए" का तात्पर्य उन जन्मना ब्राह्मणों से था जिन्हें शुरू से वेदाध्ययन में भेजा गया, पूजन-पाठ समझाया गया, त्रिकाल संध्या-गायत्री करवाई गई, तो उनका तपोबल बना रहा। सामान्य व्यक्ति जो त्रिकाल संध्या नहीं करता, अपने लिए बहुत जप नहीं करता, हवन नहीं करता, नियमित देवताओं का पूजन नहीं करता, वह दूसरे के लिए करते ही उसका दोष अपने ऊपर ले लेगा, और परिवार बर्बादी के कगार पर पहुँच जाएगा। जो ब्राह्मण गलत करके भी सुख-चैन से हैं, वे दादा का पुण्य खा रहे हैं — वंशज भोगेंगे। तो: उतना सामर्थ्य हो तो कर सकते हैं।

41

108 या अधिक आहुतियों के हवन के बाद तर्पण और मार्जन

जिस मंत्र की सबसे अधिक आहुति हुई

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:48:44–1:49:00

हर हवन के बाद मुख्याहुति मंत्र का मार्जन आवश्यक है क्या, इस पर वक्ता कहते हैं: जिस मंत्र की आपने सबसे अधिक आहुति दी है — किसी मंत्र की कम से कम 108 आहुति की है — तो उसका तर्पण और मार्जन कर लेना चाहिए।

एक श्रोता पूछती है कि क्या हर हवन के बाद हवन के मुख्याहुति मंत्र का मार्जन आवश्यक है। जिस मंत्र की आपने अधिकाधिक आहुति की है, वक्ता कहते हैं — किसी मंत्र की कम से कम 108 आहुति की है — तो उसका तर्पण-मार्जन कर लेना चाहिए।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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