शिव नवरात्रि: पंचायतन पूजा और नौ दिन की साधनाएँ
शिव नवरात्रि पर उपाय और साधकों के प्रश्नों का उत्तर।
41 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
शिव नवरात्रि: महाशिवरात्रि से पहले के नौ दिन
हर देवता का अपने प्राकट्य तिथि से पहले एक नवरात्र होता है
जैसे हम जगदंबा के लिए नवरात्रि मनाते हैं, वक्ता कहते हैं कि हर देवी-देवता का अपना नवरात्र है: उनका विशेष अर्चन उनकी प्राकट्य तिथि से नौ दिन पहले आरंभ होता है, और वह तिथि कल्प भेद से अलग-अलग होती है (उदाहरण में वे बगलामुखी के दो विवरण देते हैं)। सदाशिव के लिए सबसे विशेष रात्रि महाशिवरात्रि है, इसलिए शिव नवरात्रि उससे पहले के नौ दिन हैं — इस लाइव के वर्ष में 10 फरवरी से। इन नौ दिनों में यदि सच्चे समर्पण से सदाशिव से संबंधित साधना कर ली जाए, वे कहते हैं, तो महादेव की कृपा से वह भी मिल सकता है जो भाग्य में नहीं है, और जन्म कुंडली धरी की धरी रह जाती है।
किसी भी साधना में सदाशिव की साधना की उपेक्षा क्यों नहीं करनी चाहिए
सदाशिव के बिना फल नहीं मिलता
किसी भी देवता का सीरियल देखें या कोई भी कथा-पुराण उठाकर पढ़ें, वक्ता कहते हैं, सदाशिव उसमें होते ही होते हैं, क्योंकि महादेव के बिना यह जगत चल ही नहीं सकता। उनसे जुड़ी सबसे विशेष बात: जीवन में हम कोई भी यज्ञ, कर्मकांड, तंत्रकांड या पूजन-पाठ कर लें, यदि सदाशिव से संबंधित साधनाओं को पूरी तरह नहीं करते — न्यूनता से करते हैं, छोड़ देते हैं — तो सामान्यतः वह फल नहीं मिलता जो मिलना चाहिए।
बचपन में टीवी सीरियल देखने वाले और थोड़ा-सा एनालाइज़ करने वाले बच्चों ने, वक्ता कहते हैं, एक बात ज़रूर देखी होगी: भले किसी भी भगवान का सीरियल हो, कोई भी कथा-पुराण उठाकर पढ़िए, सदाशिव उसमें होते ही होते हैं, महादेव होते ही होते हैं — क्योंकि उनके बिना यह जगत चल नहीं सकता। इसी से महादेव से संबंधित सबसे विशेष बात निकलती है। हमारे जीवन में हम कोई भी यज्ञ, कर्मकांड, तंत्रकांड आदि कर लें, कोई भी पूजन-पाठ कर लें — यदि भगवान सदाशिव से संबंधित साधनाओं को पूरी तरह नहीं करते, या बिल्कुल न्यूनता से करते हैं, छोड़ देते हैं, रिक्तता से करते हैं, तो सामान्यतः वह फल प्राप्त नहीं होता जो होना चाहिए।
भ्रांति: केवल मेरे आराध्य सर्वश्रेष्ठ हैं, और किसी अन्य देवता का नाम नहीं लेना है
अपने आराध्य को दूसरों पर थोपना विकृति है
वक्ता कहते हैं कि अपने लिए आप अपने आराध्य को सर्वश्रेष्ठ मान सकते हैं — लेकिन दूसरों पर थोपना, यह ज़िद करना कि बाकी सब उनके दास मात्र हैं, मूर्खता है: जिन प्रमाणों से अन्य देवी-महाशक्तियाँ सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होती हैं वे सर्वत्र उपलब्ध हैं, और उन्हें भी मानना पड़ेगा। उन्होंने लाइव वीडियो में लोगों को अपने बच्चों को भगवती का नाम लेने से रोकते और हनुमान जी की पूजा से मना करते देखा है; इसे वे निकृष्ट प्रवृत्ति कहते हैं। कोई संस्था अच्छे आचार्य से शुरू होकर बाद में विकृत हो सकती है — जहाँ ऐसी शिक्षा दी जाए वहाँ जाने से बचें।
आजकल शिव जी और विष्णु जी में भेद की बात क्यों चल रही है, वक्ता पूछते हैं? पूर्व काल में भी हुआ करती थी, और अज्ञानता को भी इसका कारण माना जा सकता है। लेकिन जब कोई यह मूर्खतापूर्ण बात करने लगे कि "मेरे आराध्य ही सर्वश्रेष्ठ हैं, बाकी तो उनके दास मात्र हैं" — आप अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन यदि दूसरों पर थोप रहे हैं और ज़बरदस्ती प्रमाण दे रहे हैं, तो प्रमाण सर्वत्र उपलब्ध हैं जिनसे अन्य देवी-महाशक्तियों को भी सर्वश्रेष्ठ बताया जा सकता है, और आपको वे प्रमाण भी मानने पड़ेंगे। लोग मानते नहीं, यह गलत है; समाज में संदेश गलत जाता है। कुछ लोगों का, वे कहते हैं, इस कदर ब्रेनवॉश कर दिया गया है — भगवती ही जानें क्या बुद्धि है — कि सनातन के भीतर भी भेद करते हैं: मेरे आराध्य ही सर्वश्रेष्ठ, इसलिए उनके बच्चे भगवती का नाम लें तो कहते हैं "नहीं, भगवती का नाम नहीं लेना है"। लाइव वीडियो में उन्होंने यह देखा है। हनुमान जी की पूजा से तक मना कर देते हैं। पता नहीं कहाँ से इस प्रकार की निकृष्ट प्रवृत्ति की बुद्धि आ रही है, लेकिन ध्यान रहे, वे कहते हैं: इस प्रकार की गलत चीज़ों में कभी नहीं पड़ना है। पहले कोई आचार्य रहे होंगे जिनके सत्कर्मों से कोई बहुत बड़ी संस्था खड़ी हुई और अच्छे से चली; कालांतर में उसमें कहीं-न-कहीं विकृति आ गई है कि अब ऐसी शिक्षा दी जा रही है। ऐसी शिक्षा लेने से बचें, वे कहते हैं — जहाँ गलत शिक्षा दी जाने लगे, वहाँ जाने से बचें।
पंचायतन पूजन: केवल अपने आराध्य नहीं, हर देवता की पूजा क्यों
जागते ही कण-कण में ईश्वर
सनातन परंपरा के सर्वश्रेष्ठ आचार्यों ने — जिन्हें साक्षात शंकर का अवतार कहा जाता है — पंचायतन पूजन का निर्देश दिया: केवल एक की नहीं, सभी देवी-शक्तियों की पूजा, क्योंकि हमारे लिए कण-कण में भगवान हैं। वक्ता दिखाते हैं कि यह भाव पूरी सनातन सुबह में चलता है: जागते ही अपने हाथों के भीतर के भगवान को प्रणाम (कराग्रे वसते लक्ष्मी); पैर रखने से पहले धरती माता से क्षमा; माता-पिता को प्रणाम; सूर्य नारायण को अर्घ्य; तुलसी, अपराजिता, शमी और देव-वृक्षों को प्रणाम; गौ माता और श्वान को रोटी; फिर शालिग्राम, नर्मदेश्वर शिवलिंगम् और घर के देवताओं का स्नान-श्रृंगार। इसमें कहीं हम यह सोचकर प्रणाम नहीं करते कि "छोटी-मोटी पृथ्वी माता हैं, मेरे आराध्य बड़े हैं" — और जो शिक्षा किसी अन्य देवता का नाम लेने से भी रोके, उससे दूर रहना है।
सनातन परंपरा के सर्वश्रेष्ठ आचार्यों ने, वक्ता कहते हैं — जिनके पदचिह्नों पर चलकर भारत भूमि का उद्धार हुआ, जिन्हें साक्षात शंकर का अवतार कहा जाता है — निर्देशित किया कि हम सभी पंचायतन पूजन करें, यानी सभी देवी-शक्तियों की पूजा। और हमारे लिए तो कण-कण में भगवान हैं। सबसे पहली शुरुआत कहाँ से होती है? सुबह सोकर उठते हैं तो सबसे पहले अपने भीतर के ही भगवान को, अपने हाथों में, प्रणाम करते हैं — जिन्हें याद है वे हाथ देखकर "कराग्रे वसते लक्ष्मी" का पूरा मंत्र पढ़ते हैं। फिर भूमि छूने से पहले धरती माता से क्षमा माँगते हैं कि माँ, पादतल स्पर्श कर रहे हैं, क्षमा कीजिए: उस भूमि में भी चैतन्यता है, देवत्व का वास है, और हम क्षमा याचना कर रहे होते हैं। फिर मनुष्यों में सर्वप्रथम जिनके माध्यम से हमारा जन्म हुआ, माता-पिता, उन्हें प्रणाम। तो यहीं तीन ऐसे हो गए जिन्हें हम साक्षात देव, साक्षात शक्ति — सर्वश्रेष्ठ — मान रहे हैं। दैनिक कर्म के बाद सूर्य नारायण, जो प्रकृति हैं: उन्हें अर्घ्य दे रहे हैं, प्रणाम कर रहे हैं। तुलसी जी, अपराजिता के पौधे, शमी जी और जो भी देव-वृक्ष उपलब्ध हैं, उन्हें प्रणाम। गौ माता को रोटी, श्वान को रोटी। फिर पूजन घर में बैठते हैं तो जिन सभी देवी-देवताओं का नित्य स्नान हो सकता है — शालिग्राम शिला जी, नर्मदेश्वर जी, सदाशिव के किसी भी स्वरूप का शिवलिंग — उन्हें स्नान कराते हैं, श्रृंगार करते हैं, तत्पश्चात सबका पूजन करते हैं। यह संस्कार, सबमें ईश्वर और सबमें सर्वश्रेष्ठ देखने का यह भाव — हम पृथ्वी माता को प्रणाम करते समय यह सोचकर नहीं करते कि "अरे चलो कर लो, छोटी-मोटी पृथ्वी माता हैं, सबसे बड़े तो मेरे आराध्य हैं, प्रणाम करने में क्या है"। यदि हम केवल अपने आराध्य को ही प्रणाम करें, तो उस अवस्था में तो छोड़ ही देना चाहिए, किसी और का सम्मान ही नहीं करना चाहिए। और यही, वे कहते हैं, ऐसे लोग अंत में सिखा रहे हैं — किसी अन्य देवी-देवता का नाम लेने से भी मना कर रहे हैं। ऐसी जगहों पर जाने से बचें।
पूरे मंडल सहित शिवलिंग का पूजन हर देवता को समेट लेता है
शिव जी का नित्य अभिषेक सभी शक्तियों का अभिषेक है
ऐसा माना गया है, वक्ता कहते हैं, कि सदाशिव के शिवलिंग का जब उनकी argha, नंदी जी, उनके सर्प और उनके त्रिशूल सहित — उनसे जुड़ा पूरा मंडल — पूजन होता है, तो उसमें सभी देवी-देवताओं का पूजन हो जाता है। इसलिए नित्य केवल शिव जी का अभिषेक भी कर दें, तो माना गया है कि समस्त ब्रह्मांड की सभी शक्तियों का अभिषेक और पूजन हो गया; उनके पिंड का पूजन समस्त ब्रह्मांड का पूजन है, और पूर्ण है।
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं: जब हम महादेव की पूजा करते हैं, तो महादेव के स्वरूप में यह माना गया है कि सदाशिव के शिवलिंग में जब हम उनकी अरघी समेत, नंदी जी, उनके सर्प, उनके अस्त्र त्रिशूल — यानी वह पूरा मंडल — पूजन कर लेते हैं, तो सदाशिव से संबंधित पूजन हो गया, और उसमें सभी देवी-देवताओं का पूजन हो गया। नित्य यदि केवल शिव जी का अभिषेक कर दे रहे हैं, तो माना गया है कि समस्त ब्रह्मांड में जितनी भी शक्तियाँ हैं सबका अभिषेक हो गया, सबका पूजन हो गया। उनके पिंड का पूजन हो गया तो समस्त ब्रह्मांड का पूजन यहाँ हो गया। यह कंप्लीट है।
मंदिर में चढ़ी वस्तुओं पर पैर पड़ने का दोष और उसका निवारण
क्षमा याचना ही एकमात्र उपाय
मंदिर में सेवा करते समय भगवान की चढ़ी वस्तुएँ पैरों में पड़ जाएँ तो दोष लगता है या नहीं, इस पर वक्ता बड़े मंदिरों की ओर संकेत करते हैं — बाबा बैजनाथ धाम चले जाइए, मुख्य शिवलिंग पर चढ़ा बेलपत्र-पुष्प पैरों तले रौंदा जाता है, और अरघी की नाली में आपका पैर पड़ जाएगा। वहाँ ऐसी ही व्यवस्था बना रखी गई है। यदि गलती से लग जाए, वे कहते हैं, तो निवारण केवल क्षमा याचना है।
एक श्रोता पूछता है: मंदिर में सेवा करते समय भगवान की चढ़ी हुई वस्तुएँ न चाहते हुए भी पैरों में पड़ जाती हैं; दोष तो लगता होगा — लगे तो निवारण क्या है? बड़े-बड़े मंदिरों में जाइए, वक्ता उत्तर देते हैं — और कहीं की क्या कहें, बाबा बैजनाथ धाम ही चले जाइए। बैजनाथ धाम के मुख्य शिवलिंग पर चढ़ा बेलपत्र-पुष्प पूरे पैरों तले रौंदा जाता है। अरघी में, जो पानी बहने के लिए बनाई गई है, उसमें आपका पैर पड़ जाएगा। वहाँ जाने के बाद लगता है कि कितना दोष लग गया — ऐसी व्यवस्था वहाँ बना रखी गई है। निवारण, यदि गलती से लग जाए, तो केवल क्षमा याचना हो सकती है।
साधना शुरू करते ही कष्ट क्यों बढ़ जाता है
नकारात्मक शक्ति जाना नहीं चाहती
जब नकारात्मक शक्ति शरीर के भीतर होती है, वक्ता कहते हैं, तो वह घर कर जाती है और निकलने तक थोड़ा कष्ट देती है; जब तक आपके आभा मंडल में उसकी ऊर्जा है तब तक कष्ट होगा। आभा मंडल — सूक्ष्म शरीर — तभी मुक्त होता है जब आपके जप-तप से बनी ऊर्जा उसमें मौजूद नकारात्मक ऊर्जा से अधिक हो जाए। ये चाहते ही नहीं कि छोड़कर जाएँ: अभिचार से किसी पर बैठाया भूत, प्रेत या पिशाच कभी शरीर छोड़ना नहीं चाहता, क्योंकि उसका खाना आपके माध्यम से हो रहा है। इसलिए आप कोई भी पूजन-पाठ करें, ये कष्ट बढ़ाएँगे, ताकि आप छोड़ दें।
जब नकारात्मक शक्ति शरीर के भीतर होती है, वक्ता कहते हैं, तो जब भी आप कोई साधना आरंभ करेंगे, जब तक वह चीज़ शरीर से नहीं निकलेगी, वह भीतर घर कर गई है और थोड़ा कष्ट देगी। जब तक आपके आभा मंडल में नकारात्मक शक्तियों की ऊर्जा उपलब्ध है, तब तक आपको कष्ट होगा। राहत तब मिलती है जब आपका आभा मंडल — आपका सूक्ष्म शरीर — उससे मुक्त होता है। कैसे? जब आप जो भी जप-तप कर रहे हैं उससे निर्मित ऊर्जा आपके आभा मंडल में उपस्थित नकारात्मक ऊर्जा की मात्रा से अधिक हो जाए। तब जाकर वह साफ होता है। और ये चाहते ही नहीं कि आपको छोड़कर जाएँ। किसी के भी शरीर पर अभिचारिक कर्म के कारण यदि भूत-प्रेत-पिशाच या कोई अभिचारिक शक्ति है, तो वह कभी शरीर छोड़कर जाना नहीं चाहती, क्योंकि उसके खाने की पूर्ति आपके माध्यम से हो रही है। आप कोई भी पूजन-पाठ करेंगे तो ये कष्ट बढ़ाएँगे — ताकि आप वह न करें, छोड़ दें।
बिना पंडित के रुद्राभिषेक: स्वयं कैसे करें
जल ही काफी है; बस शुरू कीजिए
बारह ज्योतिर्लिंगओं के पास रहने वाले एक श्रोता से, जिनसे रुद्राभिषेक के ₹1100 लिए जाते हैं, वक्ता कहते हैं: सामर्थ्य नहीं है तो मत करवाइए — स्वयं कीजिए, स्वयं करना सीखिए। ज़रूरी नहीं कि दूध से ही अभिषेक हो; जल से कीजिए। जल में भस्म, सफेद चंदन पाउडर या अष्टगंध मिला लीजिए; वह भी नहीं है तो सादे पानी में मिश्री मिलाकर मीठा कर लीजिए। घर में शिवलिंग रखते हैं तो घर पर, नहीं तो मंदिर में जाकर कीजिए। भगवान इसलिए अप्रसन्न नहीं होते कि रुद्राष्टाध्यायी का पाठ नहीं करवा सके — बिल्कुल प्रसन्न होंगे; बात करने की है। विधि चैनल पर है।
एक श्रोता लिखता है कि वह बारह ज्योतिर्लिंगों के पास रहता है लेकिन रुद्राभिषेक के ₹1100 लेते हैं — भक्ति कैसे करे, क्या करे? ₹1100 लेते हैं और आपका सामर्थ्य नहीं है, वक्ता कहते हैं, तो मत करवाइए; स्वयं कीजिए। स्वयं करना सीखिए। जिन्हें भी लगता है कि पूजन-पाठ-अनुष्ठान के लिए वे समर्थ नहीं हैं — भगवान ने सामर्थ्य नहीं दिया तो अलग विषय है — वे स्वयं कर सकते हैं। ज़रूरी नहीं कि दूध से ही अभिषेक हो; पानी से कीजिए, जल से ही कीजिए। विधि-विधान चैनल पर डाले हुए हैं। जल में भस्म मिला लीजिए, या सफेद चंदन पाउडर, या अष्टगंध। वह भी नहीं है तो केवल सादे पानी में मिश्री मिलाकर मीठा पानी कर लीजिए। घर में शिवलिंग रखे हैं तो घर पर, मंदिर में करना हो तो मंदिर जाकर कर लीजिए। भगवान ऐसे नहीं हैं कि हम सामर्थ्यशाली नहीं हैं और रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करवाए बिना अभिषेक करेंगे तो हमसे प्रसन्न नहीं होंगे। बिल्कुल प्रसन्न होंगे। आप करिए तो सही। खुद से कैसे करना है, विधि चैनल पर है।
पंडित की दक्षिणा, और श्रद्धा से दिया गया दान
प्रशिक्षित ब्राह्मण की फीस उसकी आजीविका है, डॉक्टर की तरह
वक्ता कहते हैं कि जिन्होंने रुद्राष्टाध्यायी का अध्ययन किया, संस्कृत सीखी और आचार्यत्व धारण किया, उनके भरण-पोषण का दायित्व हमारा है — ₹1100 कम है। आज दो तरह के ब्राह्मण हैं: जो विधि-विधान से सीखे हैं और यजमान की शंका का निवारण भी करते हैं (उच्च कोटि के, क्योंकि सशंकित यजमान को पूरा फल नहीं मिलता), और जो नहीं। माँगी गई दक्षिणा न दे सकें तो विनयपूर्वक कहिए, मान लेंगे; मुँह लगाइए तो वे नाराज़ होंगे ही, क्योंकि वही उनका भरण-पोषण है। लाखों खर्च करके पढ़ा डॉक्टर पाँच मिनट के ₹500 लेता है — सीखा हुआ ब्राह्मण दक्षिणा माँगे तो गलत कहाँ है? सामर्थ्य न होना एक बात है; "ब्राह्मण लूटते हैं" वाली मानसिकता दूसरी, और उस तर्क से तो हर कोई लूट रहा है। दान पर: विश्वास से दिया धन कोई दुरुपयोग करे तो आपका कुछ नहीं जाता — आपका विश्वास फलित होगा, बस जानकारी न लेने का थोड़ा दोष लगेगा — जबकि दुरुपयोग करने वाले के साथ बहुत गलत होता है। और धर्म का अर्थ सब कुछ मंदिर में लगाना नहीं: सनातन के गरीबों को दीजिए।
यहाँ उचित-अनुचित की बात नहीं है, वक्ता कहते हैं। जिन्होंने रुद्राष्टाध्यायी के मंत्रों का अध्ययन किया है, जो आचार्यत्व धारण करते हैं, जिन्होंने संस्कृत सीखी है, जिन्होंने अपने कंधे पर दायित्व लिया है कि सनातन संस्कृति की सेवा करेंगे, उसे आगे बढ़ाएँगे — उनके भरण-पोषण का दायित्व आपका और हमारा है। हमें उन्हें देना चाहिए। ₹1100 बहुत कम ले रहे हैं, वे कहते हैं: यदि आपसे कहा जाए कि रुद्राध्याय के एक अध्याय का, एक मंत्र का ही पाठ विधि-विधान से, नियम-निष्ठा से कर लीजिए, तो आप स्वयं समझ जाएँगे कि वह पैसा कम है या अधिक। आज सर्वत्र दो तरह के ब्राह्मण उपलब्ध हैं। एक वे जो सच में विधि-विधान से सब कुछ सीखे हैं — उनका पूर्व जीवन कैसा रहा, ज़रूरी नहीं, लेकिन आचार्यत्व में आने पर अनुष्ठान विधि-विधान से करवाते हैं, और यजमान अनुष्ठान से संबंधित प्रश्न पूछे तो उसकी शंका का निवारण भी करते हैं। ऐसे ब्राह्मण अभी के समय में उच्च कोटि के माने जाएँ, क्योंकि यजमान के मन में शंका रहेगी तो अनुष्ठान का पूरा फल नहीं मिलेगा। आप रुद्राध्याय से अभिषेक करवा रहे हैं और आपको पता ही नहीं कि किसके पाठ से क्या होगा, मंत्रों का क्या प्रभाव है, मंत्र में क्या कहा जा रहा है; ब्राह्मण देव को थोड़ा-सा संक्षेप में बताना चाहिए — इसके संकल्प से ऐसा होता है, कुछ उपाख्यान। और यजमान भी ऐसे हों कि जब किसी आचार्य, पंडित जी, ब्राह्मण को घर बुलाएँ तो श्रद्धा और समर्पण से पूजन करवाएँ। यदि सामर्थ्य नहीं है — लगता है कि माँगी गई दक्षिणा नहीं दे सकते — तो विनयपूर्वक कहिए: पंडित जी, क्षमा करें, भगवान ने इतना सामर्थ्य नहीं दिया। क्यों नहीं मानेंगे वे? ज़रूरी थोड़ी है कि लड़ जाएँगे। जब हम मुँह लगाने, लड़ने लगते हैं तभी बात बिगड़ती है; "बाबा, अभी इतना ही है" कहें तो ज़रूर कहेंगे "कोई बात नहीं, भगवती आपको सामर्थ्य दें कि इस पंडित को भी दें"। लेकिन "रखिए न, कितना लीजिएगा, इतना दिए न" कहें तो वे भी गुस्सा होंगे, क्योंकि वही उनका भरण-पोषण है — अच्छे में लगाएँ या खराब में, वह उनका कर्म है। वे विंध्याचल के अष्टभुजी का एक उदाहरण देते हैं: वहाँ के पंडित आगंतुक की वेशभूषा देखकर बोलते हैं — बन-ठनकर आए हों तो "यजमान, निकालिए ₹1100", और गाँव-देहात का दिखे तो वही पूरा पूजन करवाकर "चलो ₹20 निकालो"; और हर जगह तेल, घी, आरती आपके नाम से। इसे वे उचित मानते हैं; आप विनम्रता से मना कर सकते हैं। यह सामर्थ्य और आपकी प्रसन्नता पर निर्भर है। और किसी भी क्षेत्र से लीजिए, वे कहते हैं। आपने मेडिकल की पढ़ाई की, लाखों-करोड़ों खर्च किए, सर्टिफिकेट मिला, अब बैठकर लोगों का इलाज कर रहे हैं, तो फीस रखी होगी — ₹500 — और मरीज को परेशानी हो या न हो, दो-चार-पाँच मिनट की फीस लेंगे; फीस फिक्स है। तो जो ब्राह्मण कर्मकांड सीखा है और सही तरीके से आपका पूजन-अनुष्ठान करवा रहा है — वह कहे कि इतनी दक्षिणा दीजिए, तो उसमें गलत कहाँ है? या तो आपमें सामर्थ्य नहीं है, या आपकी मानसिकता सेट हो गई है कि ब्राह्मण लूटते हैं। ऐसा सेट कर रखा है तो हर कोई लूट रहा है — डॉक्टर भी, पढ़-लिखकर गई पुलिस भी, देश का हर व्यक्ति; केवल ब्राह्मण को क्यों बदनाम कर रहे हैं? ऐसा मत करिए। दान पर: आप किसी पर विश्वास करके ₹1 लाख दे दें और वह उसे धर्म-कार्य में लगाए तो पुण्य आपको भी मिलेगा, उसे भी। और यदि वह उससे रोज़ बीयर-दारू पीता है, गोवा-मनाली घूमता है — चिंता मत कीजिए, आपका कुछ नहीं जाएगा; जिस विश्वास से दिया, आपका विश्वास फलित होगा। बस थोड़ा-सा दोष लगेगा कि सही जानकारी नहीं ली कि व्यक्ति क्या करता है। लेकिन जो धर्म-कार्य के पैसों से ऐसे गलत काम करते हैं, उनके साथ बहुत गलत होता है। पेट का भरण-पोषण आवश्यक है, लेकिन उससे भी आवश्यक है कि भरण-पोषण के बाद जो निधि बचे उससे लोगों की, सनातन की सेवा हो — और धर्म का अर्थ यह नहीं कि पूरा पैसा मंदिर की सेवा में लगा दें; सनातन के गरीब भाई-बहनों के लिए कर दीजिए।
केसर-जल के साथ रुद्राष्टक: दोष और श्राप के लिए शिव नवरात्रि का उपाय
पीतल का लोटा, केसर, और आठ या सत्ताईस रुद्राष्टक
हर कुंडली में एकाध दोष निकल ही जाता है, वक्ता कहते हैं — ग्रहण दोष, पितृ दोष, काल सर्प दोष — और दोष का अर्थ है कोई श्राप मिला है; कुंडली न हो तो लक्षण हैं बार-बार गर्भपात, वाहन की परेशानी आदि। किसी भी दोष से मुक्ति के लिए — देव दोष, पितृ दोष, माता-पिता या किसी का श्राप — शिव नवरात्रि में सबसे पहला काम: पीतल के लोटे में केसर डालें, जल डालें, दोनों हाथों में पकड़ें, रुद्राष्टकम् का कम से कम 8 बार (समय हो तो 27) पाठ करें, फिर सदाशिव से प्रार्थना करें कि हर प्रकार के श्राप से मुक्त कर दें — जिसमें किसी के दुखी हृदय से निकली बद्दुआ भी है; भगवान उस व्यक्ति के मन के भाव बदलकर ऐसा श्राप हटाते हैं। 10 से 18 फरवरी तक प्रतिदिन कीजिए। बहुत समय से रुका काम हो तो पूरे नौ दिन पूरे समर्पण से; यह टोटका नहीं है।
पहली बात, वक्ता कहते हैं, हर किसी के जीवन में दो-चार कष्ट कॉमन हैं। कुंडली दिखाइए, ग्रहण दोष निकल जाता है; घर में पाँच सदस्य हैं तो एकाध-दो का निकलेगा। पितृ दोष कोई-न-कोई दृष्टि बनाकर कहीं से निकल जाएगा; तथाकथित काल सर्प दोष भी निकल ही जाएगा। दोष निकल रहे हैं — और दोष का अर्थ क्या? कि किसी प्रकार का श्राप हमें मिला है। पंचम में राहु है तो सर्प दोष; राहु-दृष्ट है तो सर्प दोष — यानी कभी सर्प की हत्या की होगी, नाग दोष का श्राप लगा। ग्रहण दोष, चाहे चंद्र ग्रहण हो या सूर्य, पितृ दोष के समकक्ष है। और कुंडली नहीं है तो वीडियो में बताए लक्षण दिखते हैं — विशेषकर घर में बार-बार गर्भपात, वाहन से जुड़ी समस्या, वाहन सुख में कमी, और कई अन्य चीज़ें। तब दोष से मुक्ति के लिए — देव दोष, पितृ दोष, माता-पिता से संबंधित, किसी प्रकार का श्राप, कोई भी दोष — इस शिव नवरात्रि में सबसे पहला काम: रुद्राष्टक का पाठ करके शिव जी को जल चढ़ाइए। घर पर चढ़ाना चाहें तो घर पर, संभव हो तो मंदिर में जाकर। इसके लिए केवल केसर और पीतल का लोटा चाहिए: लोटे में केसर डालें, फिर जल; दोनों हाथों में लोटा पकड़ें; रुद्राष्टक का कम से कम आठ बार — बहुत अच्छा समय हो तो सत्ताईस बार — पाठ करें, और फिर भगवान सदाशिव से प्रार्थना करें: मुझे हर प्रकार के श्राप से मुक्त कर दीजिए। बहुत लोग बद्दुआ दे देते हैं, श्राप दे देते हैं — "जाओ, तुम्हारे साथ ऐसा होगा" — आपकी गलती हो या न हो। कभी हाय लग जाती है; जाने-अनजाने लोग श्राप दे देते हैं; किसी का हृदय हमारे कारण दुखता है। सामने वाला हमारे लिए बहुत अच्छा हो सकता है और हम उसके लिए, फिर भी अनजाने में श्राप दे सकता है। कब हम किसके हृदय को दुखा दें — और सामने वाला एक सीमा तक ही परिस्थितियाँ देखता है; यह कलिकाल है, एक समय के बाद सबको लगेगा "मेरा दुख बड़ा, तुम्हारा छोटा"। जब किसी के हृदय से "जाओ" निकल जाए, तो समझिए वह आपको छोड़ रहा है — टिकट कट गया। तो जो भी दुखी होकर बोला हो — मित्र, परिजन, अरिजन — उसकी निवृत्ति के लिए भी यह करना चाहिए, क्योंकि अभी छोटा है, बार-बार होता रहा तो बड़ा होगा। जब हम भगवान को यह जल अर्पित करेंगे तो भगवान क्या करेंगे, श्राप से कैसे मुक्त करेंगे? उस व्यक्ति के मन के भाव हमारे प्रति परिवर्तित कर देंगे, उसमें हमारे प्रति शुभ विचार लाएँगे। क्योंकि ऐसा द्वेष हमारा मूल कर्म या मूल विचार नहीं है — सनातन ऐसा नहीं सिखाता; वह इस जन्म में जो कर्म कर रहे हैं और उसकी जो छाप पड़ रही है, उससे होता है। तो हर प्रकार के दोष की निवृत्ति के लिए 10 फरवरी से 18 फरवरी तक प्रतिदिन यह काम ज़रूर कीजिए। और यदि आपका कोई काम बहुत समय से नहीं बन रहा — प्रयास कर-करके थक चुके हैं, बन ही नहीं रहा — तो यह कोई टोटका नहीं है: बिल्कुल समर्पण के भाव से पूरे नौ दिन यह कार्य करें।
बहुत समय से रुके काम के लिए कमल के साथ शिव सहस्रनाम
एक कमल, एक संकल्प, और पूरा सहस्रनाम
शिव सहस्रनाम को सिद्ध करने या उसके द्वारा सदाशिव की कृपा पाने की सर्वश्रेष्ठ विधि कमल है, वक्ता कहते हैं। एक कमल लाइए, स्नान कराइए, केसर से तिलक कीजिए, उसे हाथ में लेकर संकल्प लीजिए — "मेरा यह काम बहुत समय से रुका है, सदाशिव इसे फलीभूत कीजिए" — और उसे लिए हुए ही पूरा सहस्रनाम कम से कम एक बार (समय हो तो 5 या 11 बार) पढ़िए; फिर पुष्प शिवलिंग पर अर्पित कीजिए। इससे पहले, हर विधि की तरह: अक्षत पर घी के दो दीपक, एक शिव जी के लिए (सब देवता) और एक पार्वती जी के लिए (सब शक्तियाँ, क्योंकि दस महाविद्याएँ उन्हीं के शरीर से प्रकट हुईं); अभिषेक — चाहें तो परिवार के हर सदस्य के लिए एक लोटा; बेलपत्र, त्रिपुण्ड्र, श्रृंगार, धूप और नैवेद्य के साथ मीठा जल; पीला वस्त्र और पीला आसन। शिव मंदिर में गणपति की मूर्ति न हो तो गणपति के लिए रखी दूब शिवलिंग की argha पर रख दें — उन्हें स्वीकार होगी। यह नौ दिन कीजिए। कमल के नियम: बृहस्पतिवार को स्वयं न तोड़ें; और किसी सरोवर, बगीचे या निर्जन स्थान से पुष्प लेने से पहले हाथ जोड़कर वहाँ के रक्षक यक्ष या देवता से आज्ञा माँगें — क्या पता उस पेड़ के नीचे किसने किसे बैठाया हो — नहीं तो दोष-निवृत्ति के लिए गए और नया दोष लग गया। बाद में सहस्रनाम कठिन लगने वाले श्रोता से वे कहते हैं: नौ दिन रुद्राष्टक कर लीजिए।
किसी ने शिव सहस्रनाम के बारे में पूछा था। शिव सहस्रनाम को सिद्ध करने, या उससे सदाशिव की कृपा पाने की सर्वश्रेष्ठ विधि, वक्ता कहते हैं, कमल का पुष्प है। सहस्रदल कमल होता है, लेकिन एक ही कमल का पुष्प लाइए; उसे स्नान आदि कराकर केसर से तिलक कर दीजिए; हाथ में लेकर पहले संकल्प कर लीजिए; और लिए हुए ही पूरे शिव सहस्रनाम का पाठ करें — कम से कम एक बार, बहुत अधिक समय हो तो पाँच या ग्यारह बार। फिर पाठ के बाद वह पुष्प शिवलिंग पर अर्पित करें। इस प्रकार नौ दिन में, यदि आप अपने बहुत समय से रुके किसी काम के लिए संकल्प ले लेते हैं — "सदाशिव, मेरा यह काम बहुत समय से रुका है, इसे फलीभूत कीजिए" — और सहस्रनाम पाठ करके समर्पित कर देते हैं, यही विधि है। इसका ढाँचा हर विधि में रहता है। जब भी कोई कर्मकांड करें, घी का दीपक पहले से जलता रहे; यानी आरंभिक पूजन — पंचोपचार, दशोपचार, षोडशोपचार, जो करना है, शिव जी का अभिषेक — सब कर लीजिए, उसके बाद यह काम करना है। सबसे पहले शिव जी के समक्ष चावल, अक्षत रखकर उस पर दीप रखिए, प्रज्वलित कीजिए। दीप जोड़े में लगाना चाहिए, एक शिव जी के लिए, एक पार्वती जी के लिए: शिव जी में सभी देवता आ जाएँगे, पार्वती जी में सभी शक्तियाँ, क्योंकि दस महाविद्याएँ भगवती पार्वती के ही शरीर से प्रकट हुई हैं। तो पहले दो दीपक। फिर अभिषेक के लिए जल — परिवार के सदस्यों के निमित्त भी चढ़ाना चाहें तो जितने सदस्य, उतने लोटे। फिर बेलपत्र, सुंदर श्रृंगार; त्रिपुंड बनाना हो तो बनाइए। फिर धूप और नैवेद्य — जो संभव हो, दूध से बनी मिठाई, फल — और उनके पास जल रखिए, पीने के लिए मीठा जल; भगवान सदाशिव से निवेदन कर दीजिए। तत्पश्चात बैठकर अपना पूजन, सहस्रनाम का पाठ, पीले वस्त्र और पीले आसन पर। गणपति पर: अभी के बहुत से नए मंदिरों में, और पुराने में भी, गणपति जी की मूर्ति नहीं होती, और लोग पूछते हैं कि प्रथम पूज्य का पूजन कैसे, कहाँ करें। कोई दिक्कत नहीं, वे कहते हैं: ऐसे शिवालय में गए हैं जहाँ गणपति, पार्वती, कार्तिकेय की प्रतिमा नहीं है, तो गणपति जी के निमित्त जो दूब रखनी है वह शिव जी की अरघी पर रख दें; गणपति जी को स्वीकार होगी, और आगे का पूजन करें। पुष्प के बारे में दो सावधानियाँ। इन नौ दिनों में जिस दिन बृहस्पतिवार पड़े, उस दिन कमल स्वयं सरोवर से नहीं तोड़ना है। और सरोवर में जाने से पहले हाथ जोड़कर प्रार्थना करें: "इस सरोवर के जो भी रक्षक हों, जो भी यक्ष या देवता, उनसे प्रार्थना करता हूँ कि अपने इस स्थान से एक कमल लेने का आदेश दें; मैं शिव जी की पूजा के निमित्त लेने आया हूँ" — फिर प्रणाम करके तोड़ें। कहीं से भी पुष्प तोड़ा जाए, सरोवर से विशेषकर, ऐसे ही; और दूसरे के बगीचे से तोड़ें तो भी ऐसे प्रार्थना करके, क्योंकि वन-देवता, वन-देवी होते हैं। दूसरों के क्षेत्र में जाकर तोड़ेंगे, क्या पता वहाँ कौन-सा भूत लाकर बैठाया हो — दिक्कत हो सकती है। निर्जन में जाइए तो यंत्र बना-बनाकर पेड़ों पर टँगे रहते हैं; बेल के पेड़ पर बेलपत्र तोड़ने गए और पता ही नहीं नीचे किसे बैठाया गया है। इसलिए निर्जन स्थान से पुष्प-पत्र लें तो अवश्य प्रार्थना कर लें, ताकि दोष न लगे — नहीं तो दोष-निवृत्ति के लिए गए और नया दोष लग गया। सत्र में बाद में एक श्रोता कहता है कि शिव सहस्रनाम बोलने में बहुत कठिन है; वक्ता सरल मार्ग बताते हैं: रुद्राष्टक — "नमामि शमीशान निर्वाण रूपं…" — पूरा रुद्राष्टक, नौ दिन तक कीजिए।
पूर्व जन्मों के पापों के लिए द्वादश ज्योतिर्लिंग अभिषेक और शमी पत्र
हर नाम से बारह अभिषेक, या एक शमी पत्र के साथ स्तोत्र
जिन्हें पता है कि इस जन्म में शरीर, मन, वाणी से पाप हो रहे हैं या हुए हैं, या जिनकी कुंडली में पाप-ग्रहों से दृष्ट ऐसे योग हैं जिन्हें ज्योतिषी बड़ा पाप बताते हैं, और जिन्हें दिखता है कि इसी से सफलता नहीं मिल रही — उनके लिए वक्ता बताते हैं सदाशिव का बारह ज्योतिर्लिंगओं के नाम से अभिषेक, हर नाम से बारह-बारह अभिषेक (विधि चैनल पर)। वह न हो सके तो: शिवालय में सामान्य अभिषेक करके, वहीं बैठकर एक शमी पत्र हाथ में लें, jyotirlinga-stotram ("सौराष्ट्रे सोमनाथं च…") का 12 से 108 बार पाठ करें, और पत्र शिवलिंग पर अर्पित कर दें। केवल पाठ से ही सात जन्मों के पाप नष्ट होना कहा गया है; शमी पत्र के साथ, वे कहते हैं, ज़रूर नष्ट होंगे। शमी शनिवार को कभी न तोड़ें — शुक्रवार को तोड़कर पानी में रखें।
कुछ लोगों को अपने जीवन में पता है, वक्ता कहते हैं, कि इस जन्म में शरीर, मन, वाणी से — मानसिक, कायिक, वाचिक — हर प्रकार के पाप हो रहे हैं या पहले हुए हैं, और वे निवृत्ति चाहते हैं। या जन्म कुंडली में पाप-ग्रहों से दृष्ट ऐसे बहुत से योग बन रहे हैं, और जिन ज्योतिषियों को दिखाया उन्होंने बताया कि ये दिखाते हैं कि आप बहुत बड़े पापी हैं; और उन्हें जीवन में दिखाई भी दे रहा है कि इन कारणों से किसी भी क्षेत्र में सफलता नहीं आ रही। ऐसी स्थिति में भगवान सदाशिव का बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम से अभिषेक करना चाहिए: प्रत्येक नाम से बारह-बारह अभिषेक। पूरी विधि चैनल पर करके दिखाई गई है। अभिषेक न कर सकें, तो विधि-विधान से सामान्य अभिषेक कीजिए, लेकिन शिवालय में, और वहीं बैठकर शमी का पत्र लीजिए। एक नियम: शमी जी का पत्र शनिवार को कभी नहीं तोड़ते; शनिवार को पूजा हो तो शुक्रवार को तोड़कर रख लीजिए — थोड़े मुरझा जाएँगे, लेकिन पानी में रखें तो ठीक चलेंगे। एक भी शमी पत्र हाथ में लें और द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र — "सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्" — का पूरा पाठ कम से कम 12 और अधिक से अधिक 108 बार करें, फिर वह शमी पत्र शिवलिंग पर अर्पित कर दें। कहा गया है कि केवल पाठ से ही सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं; साथ में शमी पत्र चढ़ा दें तो ऐसे पाप ज़रूर नष्ट होंगे — ऐसा माना जाता है।
धन और ऋण के लिए काली किशमिश के साथ दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र
केसर लगी बारह किशमिश, हर पाठ पर एक
धन की समस्या और न उतरने वाले कर्ज़ के लिए वक्ता इस समय के लिए एक छोटी विधि के साथ daridra-dahana-stotram बताते हैं: कृष्ण द्राक्षा (काली किशमिश) रख लें; हर दिन थोड़े गंगाजल में केसर घिसकर उसमें बारह किशमिश मिला दें; एक किशमिश लेकर स्तोत्र पढ़ें और शिवलिंग पर समर्पित करें, ऐसे बारह बार। बारह बेलपत्र मिल जाएँ तो हर किशमिश को एक बेलपत्र पर रखकर समर्पित करें — और अधिक लाभ। इससे धन-संपदा मिलती है और कर्ज़ से मुक्ति। समर्पण से करें, टोटके या "उपाय" के भाव से नहीं: उस भाव से करेंगे तो फल नहीं मिलेगा। विधि लिखित है, तांत्रोक्त प्रमाण सहित — उसमें मधु भी लिखा है, पर विधि सरल रखने के लिए वे उसे छोड़ देते हैं।
धन संबंधी समस्या है, कर्ज़ नहीं उतर रहा — तो इसी समय में, वक्ता कहते हैं, दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र, लेकिन एक छोटी-सी विधि के साथ। कृष्ण द्राक्षा, काली किशमिश का जो छोटा-सा फल होता है, लाकर रख लीजिए। हर दिन बारह किशमिश और केसर की आवश्यकता होगी। हल्का-सा गंगाजल मिलाकर केसर घिस लें और उसमें बारह काली किशमिश मिला दें। अब दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र का पाठ करें: एक किशमिश लेकर पाठ किया, शिवलिंग पर समर्पित किया — ऐसे बारह बार। बारह बेलपत्र भी मिल जाएँ तो एक बेलपत्र पर एक किशमिश रखकर पाठ करके समर्पित करते जाएँ — इससे भी अत्यधिक लाभ होगा। इससे धन-संपदा की प्राप्ति होती है, कर्ज़ से भी मुक्ति। ध्यान रखें, वे कहते हैं: टोटके के, "उपाय" के भाव से करेंगे — झंझट से छुटकारे के लिए उपाय कर रहे हैं — तो फलीभूत नहीं होगा। समर्पण से करना है। और यह विधि टोटका नहीं है; शास्त्रों में लिखित है, तांत्रोक्त प्रमाण के साथ। चैनल पर अभी प्रमाण नहीं दिखा सकते, लेकिन लिखा है: कृष्ण द्राक्षा बेलपत्र से संयुक्त, और साथ में मधु भी लिखा है — मधु वे यहाँ नहीं बता रहे क्योंकि एक विधि और बढ़ जाएगी और लोग कहेंगे क्लिष्ट हो गई। इन्हें समर्पित करने से कर्ज़ से मुक्ति मिलती है, साथ ही धन-संपदा की प्राप्ति भी।
जिस रोग पर औषधि असर न करे, उसके लिए 27 नक्षत्रों पर महामृत्युंजय कवच
शिवरात्रि से पहले के पाँच दिन, हाथ में बिल्व गिरी लेकर रोज़ 27 पाठ
शरीर में बहुत रोग हो और औषधि का प्रभाव न पड़े, तो वक्ता महामृत्युंजय कवच बताते हैं — उसमें बीज मंत्र हैं, इसलिए जिन्हें उच्चारण आता हो वही करें। यह नौ दिन नहीं, केवल पाँच दिन करना है, शिवरात्रि से पहले के पाँच, लगभग नवमी से: प्रतिदिन 27 पाठ, हर नक्षत्र के लिए एक। हाथ में बिल्व गिरी (बेल का गूदा) लें, 27 नक्षत्रों के नाम लिखकर ले जाएँ, और हर पाठ से पहले कहें: "हे सदाशिव, अश्विनी नक्षत्र की शांति हेतु, और उससे जनित कोई रोग मेरे शरीर पर प्रभाव दे रहा हो तो उसकी शांति हेतु यह पाठ कर रहा हूँ" — फिर कवच; फिर भरणी, कृत्तिका, इसी तरह सभी 27, इस भाव से कि वे शांत हो रहे हैं। पूरी संस्कृत विधि हर एक की अलग है; यह संक्षिप्त रूप है। बाद में वह एक बिल्व गिरी शिवलिंग पर रख दें।
इसके बाद वक्ता उस स्थिति पर आते हैं जहाँ शरीर में बहुत अधिक रोग है, छुटकारा नहीं मिल रहा, और औषधि का शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा। ऐसी स्थिति के लिए महामृत्युंजय कवच आदि है; लेकिन उसमें बीज मंत्र है, इसलिए जिन्हें उच्चारण आता है वे वह विधि कर सकते हैं — उसकी विधि अलग से भी बताएँगे। वह नौ दिन नहीं करना है; मात्र पाँच दिन, यानी शिवरात्रि से पहले के पाँच दिन, तो लगभग नवमी से शुरू करना होगा। पाँच दिन प्रतिदिन 27-27 पाठ करें। प्रत्येक नक्षत्र के लिए एक पाठ होगा, और पाठ करके समर्पित करते जाएँगे। इसमें बिल्व गिरी का प्रयोग होता है — बेल के भीतर का गूदा। उसे हाथ में लें; 27 बार पाठ करें; लेकिन 27 नक्षत्रों के नाम लिखकर ले जाने होंगे, और हर नक्षत्र के नाम पर — जैसे पहला पाठ अश्विनी नक्षत्र — कहें: "हे सदाशिव, अश्विनी नक्षत्र की शांति हेतु, और इससे किसी प्रकार का दुष्प्रभाव मेरे शरीर पर पड़ रहा हो, अश्विनी नक्षत्र से जनित कोई रोग मेरे शरीर में प्रभाव दे रहा हो, तो उसकी शांति हेतु मैं यह पाठ कर रहा हूँ।" फिर महामृत्युंजय कवच का पाठ। फिर अगला: रेवती है तो रेवती का पाठ; भरणी है तो भरणी का; कृत्तिका है तो कृत्तिका का — सभी नक्षत्रों का नाम लेते जाएँ और महामृत्युंजय का पाठ करते जाएँ, इस भाव से कि वे शांत हो रहे हैं। पूरी विधि-विधान में संस्कृत में जाएँ तो हर एक का अलग-अलग विधान है; वे संक्षेप में, सरल में बता रहे हैं। इस तरीके से बिल्व गिरी एक ही हाथ में रहेगी, और उसके बाद उसे शिवलिंग के ऊपर रख देना है।
शिवलिंग के चारों ओर छाल की अरघी: अस्त्र-मंत्र अभिषेक, और रोग के लिए नीम की छाल का उपाय
पेड़ की छाल से बनी अरघी
पिछले सावन के लाइव की एक विधि याद करते हुए वक्ता छाल की argha बताते हैं: पुराने आम या बेल के पेड़ की बाहरी छाल, पूरी बिना टूटे निकालकर, पानी में फूलने तक रखकर, हल्के से अरघी के आकार में मोड़कर, शिवलिंग के चारों ओर पहनाई जाती है, और उसी से अभिषेक होता है। उस विधि में अस्त्र मंत्र मंत्रों का प्रयोग होता है — महामृत्युंजय मंत्र, और तांत्रोक्त रूप में अघोरास्त्र और अलग नीलकंठ अस्त्र, शत्रुनाश और अभिचार-नाश के लिए; महामृत्युंजय के अन्य संपुट मंत्र लक्ष्मी-प्राप्ति के लिए। वह विधि थोड़ी क्लिष्ट है। रोगनाश के लिए घर का छोटा रूप: नीम की छाल की छोटी अरघी शिवलिंग के चारों ओर, और मट्ठे से शिव जी का अभिषेक।
पिछले साल के सावन के लाइव सुनिए, वक्ता कहते हैं — सावन और महाशिवरात्रि के समय के चार-पाँच लाइव — जिनमें उन्होंने पेड़ की छाल की एक विधि बताई थी। जब हम पेड़ की बाहरी छाल उखाड़ते हैं, जैसे आम के पेड़ की, तो उससे गोंद निकलने लगता है, चिपचिपा तरल पदार्थ। बेल के पेड़ की भी वैसी ही छाल होती है। इन छालों को थोड़ा मज़बूती से, पुराने पेड़ों से निकाला जाए तो बिना टूटे पूरी निकल आती है, और उससे एक अरघी तैयार की जाती है, थोड़ी बड़ी। विधि: छाल को पानी में डालकर छोड़ा जाता है; थोड़ा फूल जाए तो बिल्कुल हल्के से मोड़कर अरघी जैसा आकार दे दिया जाता है। वह अरघी शिव जी को पहनाई जाती है — शिवलिंग के चारों ओर अरघी की तरह — और तत्पश्चात शिव जी का अभिषेक होता है। उस विधि में अस्त्र मंत्रों का प्रयोग होता है। महामृत्युंजय मंत्र का प्रयोग होता है, और तांत्रोक्त मंत्र में जाएँ तो अस्त्र मंत्रों का भी — अघोरास्त्र; महामृत्युंजय नीलकंठ अस्त्र, जो अलग है (नीलकंठ अघोरास्त्र नहीं; नीलकंठ अस्त्र एक अलग अस्त्र है), शत्रुनाश आदि के लिए। लक्ष्मी-प्राप्ति के लिए महामृत्युंजय के अन्य मंत्र — संपुट मंत्र; और शत्रुनाश के लिए अभिचार-नाश हेतु प्रयोग होता है। वैसे प्रयोग हैं, लेकिन विधि थोड़ी क्लिष्ट है। वे कभी करके दिखाएँगे, जैसे कई विधियाँ वीडियो में दिखाई हैं — घर में छोटा प्रयोग कैसे करें। जैसे रोगनाश के लिए: नीम के पेड़ की छाल से छोटी-सी अरघी बनाकर शिवलिंग के चारों ओर रखें, और फिर मट्ठे से शिव जी का अभिषेक करें; उससे रोगनाश होता है। इस प्रकार की विधि बताई गई है, और वह भी की जा सकती है।
घर के किन शिवलिंगों और मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा चाहिए
नर्मदेश्वर कभी नहीं; स्फटिक, मूंगा और विग्रह हाँ
नर्मदेश्वर शिवलिंगम् शिवलिंग की कभी प्रतिष्ठा नहीं होती, वक्ता कहते हैं। स्फटिक या मूंगे (मणि-माणिक्य) का शिवलिंग, या अकेले सदाशिव का अथवा शिव परिवार का विग्रह हो तो कर सकते हैं — प्रतिष्ठा विधि वही रहेगी, महादेव से संबंधित विधान के साथ। चैनल पर दी गई घर की विधि हिंदी में भावपूर्ण सामान्य प्रतिष्ठा है, मंदिर की अचल प्रतिष्ठा नहीं; जिन्हें लंबी लगे वे छोटी कर लें और उसे छोड़ दें। किसी भी त्रिनेत्र देवता के लिए एक सावधानी: नेत्र-उन्मीलन में तीसरा नेत्र न खोलें — वह ओवर-स्मार्टनेस होगी।
घर में मूर्ति लाएँ तो प्राण प्रतिष्ठा कैसे की जाती है, उसकी पूरी विधि चैनल पर करके दिखा दी गई है, वक्ता कहते हैं — एक-एक विधि हिंदी में, संस्कृत मंत्रों का कहीं-कहीं बिल्कुल हल्का प्रयोग और उसका विकल्प भी दिया हुआ। कुछ लोगों ने कमेंट किया कि विधि बहुत लंबी है, छोटी चाहिए; छोटी चाहिए तो छोटी ही कर लीजिए — वह करने की ज़रूरत क्या है? वह कर्मकांड का विषय है, और चैनल पर मेधावी साधक हैं जिन्हें पूरा विधि-विधान चाहिए था लेकिन वैदिक मंत्र नहीं आते, तो बीच का माध्यम निकाला गया: भावपूर्ण, लेकिन विधि-विधान से — अग्नि-उत्तारण क्यों की जाती है, आदि। सुनिए तो पता चलेगा। मंदिर में जो विधि-विधान होता है वह भी पूरा नहीं है; मंदिर की विधि अलग होती है। यह घर की विधि है, भाव की: इसमें अचल प्रतिष्ठा नहीं हो रही — बिल्कुल सामान्य प्रतिष्ठा हो रही है, वैसे मंत्रों का प्रयोग नहीं, सारे मंत्र भावपूर्ण हिंदी में बोलकर भगवान की प्रतिष्ठा कर रहे हैं। उस विधि-विधान से प्रतिष्ठा कर सकते हैं। विषय इसलिए उठा कि प्रश्न आया था कि सदाशिव के शिवलिंग की प्रतिष्ठा करनी है या नहीं। नर्मदेश्वर शिवलिंग की कभी प्रतिष्ठा नहीं होती। मणि-माणिक्य संयुक्त — स्फटिक का, मूंगे का — शिवलिंग ले रहे हैं तो कर सकते हैं; प्रतिष्ठा विधि वही रहेगी, महादेव से संबंधित विधान का प्रयोग करेंगे। उनका श्री विग्रह ले रहे हैं — शिव परिवार का, या अकेले सदाशिव का — और प्रतिष्ठा करना चाहते हैं तो वह भी कर सकते हैं। एक बात का ध्यान रखें: सदाशिव की, या किसी भी त्रिनेत्र देवी-देवता की प्रतिष्ठा में, नेत्र-उन्मीलन की जो विधि वे बताते हैं उसमें यह गलती न करें कि तीसरे नेत्र का भी उन्मीलन कर दें। वह ओवर-स्मार्टनेस वाली बात हो जाएगी; वहाँ ऐसा न करें। यह विषय जानने की आवश्यकता है।
पर्व काल मंत्र चैतन्य करने के लिए है, प्रयोग के लिए नहीं
बैंक में जितना है उतना ही खर्च करें
जो पहले से साधना कर रहे हैं वे इन नौ दिनों में उसे दोहराएँ, वक्ता कहते हैं — प्रयोग नहीं करें। लोग एक 11 दिन की साधना करके तुरंत प्रयोग विधि माँगते हैं, फिर कहते हैं कुछ नहीं हुआ: बैंक में ₹10,000 हों तो उससे अधिक खर्च नहीं कर सकते; 100 माला जमा हैं तो 1,000 खर्च नहीं होंगी। आपका शत्रु कच्चा खिलाड़ी नहीं है। अनुष्ठान बार-बार दोहराएँ जब तक कम से कम कृपा-सिद्धि न हो, तभी प्रयोग प्रभाव देगा। महाशिवरात्रि, शिव नवरात्र, होलिका की रात जैसे पर्व काल में प्रयोग की बजाय मंत्रों को चैतन्य करने पर ध्यान दें — इन समयों में प्रयोग केवल दुष्ट, बेवकूफ लोग दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए करते हैं, और ऐसा प्रयोग तुरंत असर तो करता है, पर सामने वाले का इष्ट और तप-बल मज़बूत हो तो वह कुछ दिन बीमार पड़कर ठीक हो जाता है, और उसका ज्ञात-अज्ञात सभी शत्रुओं के विरुद्ध लिया संकल्प फिर उन्हें समाप्त कर देता है।
शिव नवरात्र के नौ दिन अति महत्त्वपूर्ण हैं, वक्ता कहते हैं। जो पहले से साधना करते आ रहे हैं, वे इन नौ दिनों में उस साधना को दोहराएँ। प्रयोग नहीं — अभी नहीं। वे बताते हैं लोग क्या करते हैं: एक बार 11 दिन की साधना की, उसके बाद तुरंत मैसेज — "गुरु जी, आज मेरी साधना पूरी हो गई, अब प्रयोग विधि बताइए", रिपीट पर रिपीट। प्रयोग विधि बता भी दें तो: "गुरु जी, कुछ फ़र्क नहीं पड़ा, कुछ नहीं हो रहा।" कहाँ से फ़र्क पड़ेगा, वे पूछते हैं। बैंक में ₹10,000 जमा हैं तो 10,000 से अधिक खर्च मत करिए और फिर कहिए कि मर्सिडीज़ खरीदना चाहते थे, खरीद नहीं पा रहे — आप बोले थे इतने दिन मेहनत करेंगे फिर खरीद लेंगे; बैलेंस देखिए। यहाँ आप 100 माला खर्च करने जा रहे हैं; 1,000 माला कहाँ से खर्च होगी? आपका शत्रु कच्चा खिलाड़ी नहीं है — जो विचार-कर्म करवाते हैं वे इतना गलत काम कर देते हैं; इतनी आसानी से कैसे होगा? ऊपर से आप प्रायोगिक विधान माँग रहे हैं जबकि भाव-पूर्णता से किया ही नहीं — इतना भाव नहीं कि आपकी ऊर्जा बहुत बढ़ा दी गई हो। हनुमान जी हों या सदाशिव, आपके लिए भी उतने ही समर्थ हैं जितने उनके लिए; फिर उनके मंत्र दोनों को अलग फल क्यों देते हैं? क्योंकि आपका भाव, विचार, क्रिया-प्रणाली अलग है, उनका अलग। इसलिए जब भी किसी प्रयोग को करने जाएँ, उससे पहले कम से कम उसकी कृपा-सिद्धि हो गई हो; उसके लिए साधना-अनुष्ठान को अधिक से अधिक बार दोहराएँ, तब जाकर प्रयोग करेंगे तो प्रभाव देगा। और विशेष पर्व काल में — महाशिवरात्रि, अभी आने वाला शिव नवरात्र, आने वाली होलिका की रात्रि — प्रयोग करने से ज़्यादा मंत्रों को चैतन्य करने पर ध्यान दें तो अधिक अच्छा है। इन समयों में प्रयोग केवल दुष्ट लोग करते हैं, दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए — बेवकूफ लोग। जो चालाक हैं, जिनके पास भगवान-भगवती की दी थोड़ी सद्बुद्धि है, वे इस समय का सदुपयोग करके मंत्रों को जागृत और चैतन्य करते हैं, उन्हें और प्रभावशाली, क्रियाशील बनाते हैं। अन्य समय में सामने वाला प्रयोग करे और आप काटने में समर्थ हों तो संकल्प लेकर पाठ करने पर काट देंगे। लेकिन जो दुष्ट इस समय का दुरुपयोग करके उसी समय प्रयोग कर दे, उसने जो भी संकल्प लेकर तंत्र-विचार प्रयोग किया वह तुरंत प्रभाव देगा, क्योंकि उस समय उसकी क्षमता काफी बढ़ी होती है। लेकिन उसके बाद क्या? सामने वाले का इष्ट मज़बूत, तप-बल मज़बूत हुआ तो वह दो-चार-दस दिन बीमार पड़ेगा, दिक्कत होगी, फिर ठीक हो जाएगा। और जब वह संकल्प लेकर कहेगा — "मेरे ज्ञात-अज्ञात सभी शत्रुओं ने जो भी तंत्र-मंत्र विचार-कर्म मुझ पर, मेरे परिवार पर किया है, उसके लिए मैं इस स्तोत्र का अनुष्ठान कर रहा हूँ, इतना पाठ करूँगा, मेरा संकल्प पूर्ण हो, शत्रु का सर्वनाश हो" — तब पीछे का चाइनीज़ बंबू कहीं का नहीं रहेगा। तो पहले इतने सामर्थ्यशाली बन जाइए, वे कहते हैं, फिर प्रयोग कीजिए। दो-चार दिन या दो-चार महीने में बड़े शत्रु से टक्कर मत लीजिए, क्योंकि जो शत्रु आप पर मारण विद्या का प्रयोग करने का सामर्थ्य रखता है, उसने शमशानिक-मसानिक प्रेतों को सिद्ध करके प्रत्यक्ष कर लिया है। वह भी एक विद्या है — भूत विद्या, प्रेत विद्या, निकृष्ट विद्या, शूद्र विद्या, लेकिन विद्या — और वह अपने देवताओं को सिद्ध करके सामर्थ्यशाली बनकर खड़ा है।
शत्रुओं के विरुद्ध संकल्प, बिना नाम लिए
दंड अपने इष्ट पर छोड़ दें
चैनल पर दिए प्रयोग प्रयोग नहीं, निवेदन हैं, वक्ता कहते हैं। हनुमान जंजीरा करते हुए आप यह नहीं कहते कि "फलाने को जाकर खत्म करो"; भैरव जी के विधानों में ऐसी चीज़ें हैं, लेकिन नाम लेने को उन्होंने कहीं नहीं कहा — लेना है तो अपने रिस्क पर, क्योंकि शत्रु पलटवार करे तो रोकने का सामर्थ्य आपमें होना चाहिए। शत्रु को दंड देना है तो जिन आराध्य की सेवा करते हैं उन पर छोड़िए: पाठ करके समर्पित करते जाइए — "हनुमान जी, मेरे शत्रुओं को देखिए, उन्हें दंडित कीजिए" — यह नहीं कि "फलाने को ऐसा करके आइए"। नाम लेना तभी उचित है जब किसी देवता को उस प्रकार की त्रिवाचा के साथ सिद्ध किया हो। अन्यथा शत्रु-नाश का संकल्प लीजिए, पर समर्पण अपने इष्ट को कीजिए।
चैनल पर जितने प्रयोग-विधान उन्होंने बताए हैं, उन्हें देखिए, वक्ता कहते हैं: वे प्रयोग नहीं हैं, केवल निवेदन हैं। हनुमान जंजीरा करते हुए आप यह नहीं बोल रहे होते कि "फलाने का नाम है, जाकर उस शत्रु की कहानी खत्म करो"। भैरव जी के विधानों में ऐसी चीज़ें हैं, लेकिन नाम लेने के लिए उन्होंने कहीं नहीं कहा; लेना है तो अपने रिस्क पर लीजिए। आपके पीछे इतना सामर्थ्य होना चाहिए कि जब आप नाम लें और सामने वाला शत्रु चलाए, तो आप फिर रोक सकें। इसीलिए बार-बार वार्न किया है कि यह गलती नहीं करनी है। शत्रु को दंड देना है तो भगवान पर छोड़िए — जिन आराध्य की सेवा-पूजा करते हैं उन पर। पाठ करके उन्हें समर्पित करते जाइए। हनुमान जंजीरा कर रहे हैं तो समर्पित कीजिए: "हनुमान जी, आप मेरे शत्रुओं को देखिए, आप उन्हें दंडित कीजिए, आप देखिए।" यह नहीं बोलना है कि "फलाना मेरा शत्रु है, उसको ऐसा करके आइए।" ऐसा कर्म करेंगे तो उस प्रकार का सामर्थ्य होना ज़रूरी है — किसी देवता को सिद्ध किया हो, उस प्रकार की त्रिवाचा हो — तब करें, वह उचित है। अन्यथा शत्रु-नाश का संकल्प लीजिए, लेकिन समर्पण अपने इष्ट-आराध्य को कीजिए; शत्रु का नाम लेकर करने की गलती मत कीजिए।
शिव नवरात्रि में अभिचार के लिए भैरव अनुष्ठान, और एक साधना पर टिके रहना
अनुष्ठान दोहराइए; प्रभाव देना उनका काम है
जिनके जीवन में बहुत विचित्र घटनाएँ हो रही हैं — चैनल पर भैरव जी से संबंधित प्रयोग अभिचार-नाश के लिए हैं, वहाँ तक जहाँ किसी परिवार पर मारण प्रयोग होते रहते हैं — उनसे वक्ता कहते हैं: इस नवरात्रि में भैरव जी का अनुष्ठान करें। बटुक भैरव हृदय; रुद्रयामल तंत्र का बटुक भैरव स्तोत्र, शतनाम का संकल्प लेकर; या महाभैरव मंत्र अथवा महाभैरव स्तोत्र। पहले अनुष्ठान, बार-बार दोहराया हुआ; प्रयोग विधि बाद में। उनके मूल साधकों ने एक बात फिक्स कर रखी है: शिवरात्रि पर केवल अघोरास्त्र सिद्धि। एक जगह जम जाइए, वे कहते हैं; "प्रभाव कब मिलेगा" मत पूछते रहिए — प्रभाव देने वाले वहाँ बैठे हैं; न आप एक पत्ता हिला सकते हैं न वे, लेकिन भगवान कहते हैं कि सब कुछ मेरी इच्छा से होता है।
भैरव जी से संबंधित प्रयोग चैनल पर दिए हुए हैं, वक्ता कहते हैं, विशेषकर अभिचार-नाश के लिए — और अभिचार-नाश में भी सामान्य नहीं, पूरा का पूरा, जहाँ किसी के घर-परिवार में मारण प्रयोग आदि होते रह रहे हैं। जिनके जीवन में विशेषकर बहुत विचित्र प्रकार की घटनाएँ घट रही हैं, वे इस नवरात्रि में भैरव जी का अनुष्ठान करें: भैरव हृदय, बटुक भैरव जी का हृदय; या रुद्रयामल का बटुक भैरव स्तोत्र, शतनाम का संकल्प लेकर उसका अनुष्ठान; या महाभैरव मंत्र का अनुष्ठान, या महाभैरव स्तोत्र का। पहले अनुष्ठान, उसके बाद उसकी प्रयोग विधि; अनुष्ठान बार-बार दोहराइए। वे जोड़ते हैं कि शुरुआत के साधक परिवार के लोग बार-बार पूछते हैं — उसी दिन मैसेज आया: "कौन-सा करना है, गुरु जी?" कुछ ने हर साल फिक्स कर रखा है: शिव जी की नवरात्रि और महाशिवरात्रि के समय केवल नीलकंठ अघोरास्त्र का संकल्प लेकर विधि-विधान से उसका अनुष्ठान। वे अपने मूल साधकों से — जो उनके विषय को लेकर चलते हैं, बात मानते हैं, सीखते हैं, स्वयं भी बहुत सक्षम हैं — एक ही स्तोत्र करवाते हैं, और एक समय पर फिक्स कर दिया गया है: शिवरात्रि के समय केवल अघोरास्त्र सिद्धि, उसी का जप; सबका फिक्स है। तो जो साधक परिवार में आना चाहते हैं, या साधनाओं को लेकर चलना चाहते हैं, वे इसे समझें: एक जगह जम जाइए। केवल इस पर ध्यान मत दीजिए कि "इतना कर लिया, प्रभाव कब मिलेगा, प्रभाव कब मिलेगा"। प्रभाव देने वाले वहाँ बैठे हैं; वे देंगे, आप और हम नहीं। आपमें सामर्थ्य है कि एक पत्ता हिला दें? नहीं — उनमें भी नहीं। लेकिन भगवान कहते हैं: मेरी इच्छा से ही सारी चीज़ें होती हैं।
महाशिवरात्रि: प्रथम ज्योतिर्लिंग, और सदाशिव का पंचानन स्वरूप
विवाह की तिथि से कहीं अधिक
सब महाशिवरात्रि को शिव-पार्वती विवाह का दिन जानते हैं, वक्ता कहते हैं, लेकिन शिव पुराण की विश्वेश्वर संहिता और बताती है: यही वह तिथि है जिस दिन सदाशिव पहली बार ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए — पहली बार मूर्त आकार लिया, स्वयं को स्तंभ का आकार दिया। कल्प भेद से एक अन्य विवरण इसे मार्गशीर्ष कृष्ण तृतीया, आर्द्रा नक्षत्र में रखता है; दोनों गलत नहीं। और उनका प्रथम स्वरूप एकमुखी नहीं था: सदाशिव का पूर्ण स्वरूप पंचानन है, पंचमुखी — जैसे कामाख्या के कामेश्वर महादेव भी माने गए हैं, कामेश्वरी पंचमुखी और कामाख्या षण्मुखी, और श्री विद्या के ध्यान मंत्रों में नाम-स्वरूप के और भेद। केवल इतना जान लें, वे कहते हैं: महाशिवरात्रि अति विशिष्ट है, और उससे पहले के पूरे नौ दिन साधना करने से विशेष फल मिलता है।
शिव महापुराण का पाठ कीजिए, वक्ता कहते हैं, उसकी विश्वेश्वर संहिता में आरंभ में ही आपको यह पढ़ने को मिलेगा। सब जानते हैं कि महाशिवरात्रि को शिव जी और पार्वती जी का विवाह हुआ था। लेकिन विषय इतना ही नहीं है। विवाह से पहले भी, यही वह तिथि है जिस दिन — कल्प भेद के अनुसार, एक कल्प में अलग, एक में अलग — भगवान सदाशिव प्रथम बार ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। एक कल्प में माना गया है कि मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष तृतीया, आर्द्रा नक्षत्र में प्रकट हुए; वह तिथि भी मानी गई है, गलत नहीं है, अलग-अलग पुराणों में कुछ-कुछ जगह वर्णन आता है; यह कल्प भेद का विषय हो जाता है। इसी दिन सदाशिव ने प्रथम बार मूर्त आकार लिया, स्वयं को स्तंभ का आकार दिया। इसलिए भी यह बड़ा विशेष दिन है। यह भी जानना चाहिए, वे कहते हैं: सदाशिव का जो मनुष्य स्वरूप हम पहले देखते हैं — त्रिनेत्रधारी, गले में सर्प — उनका प्रथम स्वरूप कौन-सा रहा? केवल एक मुख का नहीं रहा। वे पंचमुखी रहे हैं; पंचानन भगवान सदाशिव का पूर्ण स्वरूप है। एक दूसरा स्वरूप: कामरूप कामाख्या क्षेत्र में हम भगवती कामेश्वरी, माँ कामरूप कामाख्या की पूजा करते हैं, और उनके शक्ति कामेश्वर महादेव — दोनों का पंचानन मुख माना गया है; भगवती कामाख्या का छह मुख, कामेश्वरी का पाँच; और यहाँ भी कल्प भेद में जाएँ तो स्वरूप भेद, नाम भेद में आएगा — कामेश्वर महादेव, कामेश्वरी, दो शक्तियाँ; कामाख्या शक्ति पीठ की अलग हो जाती हैं; और महाविद्याओं के कुल में श्री विद्या में जाएँ तो ध्यान मंत्र फिर अलग मिलेगा। तो भेद बहुत हैं। आपको केवल इतना जान लेना चाहिए: महाशिवरात्रि अपने आप में अति विशेष है, अति विशिष्ट। और शिव जी के नवरात्र के नौ दिन तक इन विषयों को लेकर साधना-आराधना कर लें, तो बहुत अच्छा होता है; विशेष फल की प्राप्ति होती है।
धन के लिए गोधूलि बेला में शिव तांडव स्तोत्र, और इसे घर में पढ़ने की भ्रांति
फलश्रुति स्वयं लक्ष्मी का वचन देती है
समय कम हो और किसी एक चीज़ को लेकर चलना हो, विशेषकर धन के लिए, तो वक्ता कहते हैं: गोधूलि बेला में, शाम के संध्या वंदन के समय, शिव ताण्डव स्तोत्र का पाठ करें। यह भ्रम कि इसे घर में नहीं पढ़ना चाहिए — "कहाँ से ऐसी बुद्धि लाते हैं, भगवान जाने" — मन से निकाल दें: स्तोत्र में अंत में स्वयं लिखा है कि जो संध्या के समय पूजन के पश्चात इसका पाठ करेगा, उसके घर में लक्ष्मी स्थिरता से रहेंगी, रथ-गज आदि सहित पूरी धन-संपदा मिलेगी। शिव नवरात्र से आरंभ करके जीवन पर्यंत करते चलें; सही समय पर करें तो शीघ्र प्रभाव दिखता है।
बहुत अधिक समय न हो, वक्ता कहते हैं, और केवल किसी एक चीज़ को लेकर चलना चाहते हों और फल भी चाहिए — विशेषकर धन संबंधी — तो गोधूलि बेला में, शाम के समय, जिस समय हम संध्या वंदन करते हैं, उसी समय शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करें। और यदि किसी के मन में यह भ्रम बैठा हो कि शिव तांडव स्तोत्र का पाठ घर में नहीं करना चाहिए — कहाँ-कहाँ से ये सब बुद्धि लाते हैं, भगवान जाने; कभी-कभी उन्हें लगता है कि शायद गलत गोले में आ गए हैं। ऐसा भ्रम मन में न पालें। शिव तांडव स्तोत्र में ही लिखा है — अंत में पढ़िए — कि जो कोई संध्या के समय पूजन के पश्चात इसका पाठ करेगा, उसके घर में लक्ष्मी स्थिरता के साथ रहेंगी, रथ-गज आदि के साथ — यानी पूरी धन-संपदा की प्राप्ति होगी। तो शाम के समय यह कार्य कर सकते हैं। शिव नवरात्र से आरंभ करके फिर जीवन पर्यंत इसे करते चलिए; शीघ्र ही इसका प्रभाव देखने को मिलेगा — यदि सही समय पर करते हैं तो।
जनेऊ धारण करने वाले के लिए न्यूनतम दैनिक गायत्री
अर्घ्य के समय पाँच मानसिक गायत्री, सुबह-शाम
पंद्रह वर्ष के एक बच्चे के प्रश्न पर कि जनेऊ धारण करने वाले को प्रतिदिन कितनी पूजा करनी चाहिए, वक्ता कहते हैं कि त्रिकाल गायत्री — त्रिकाल संध्या — कही गई है, लेकिन पूरा विधि-विधान अभी के समय में संभव नहीं। देश-काल-परिस्थिति के अनुसार कम से कम सुबह-शाम पूजन-पाठ हो जाए; और वह भी न हो सके तो सूर्य नारायण को अर्घ्य देते समय कम से कम पाँच बार मानसिक गायत्री का पाठ हो जाए — उससे भी वह फल मिलता है, और इतना तो ज़रूर करना चाहिए।
एक श्रोता का पंद्रह वर्ष का बेटा लिखता है: "अंकल जी, जनेऊ धारण करने वाले को प्रतिदिन कितनी पूजा करनी चाहिए?" देखो बच्चे, वक्ता उत्तर देते हैं — त्रिकाल गायत्री के लिए कहा गया है। लेकिन देश-काल-परिस्थिति के अनुसार केवल इतना भी हो जाए कि प्रतिदिन सुबह-शाम पूजन-पाठ हो जाए। और वह भी न हो पाए तो सूर्य नारायण को अर्घ्य देते समय कम से कम पाँच बार मानसिक गायत्री का पाठ हो जाए; तब भी वह फल मिलता है। इतना तो ज़रूर करना चाहिए। पूरा विधि-विधान अभी के समय में संभव नहीं; त्रिकाल गायत्री, त्रिकाल संध्या के लिए कहा गया है।
क्या मनसा देवी पुराणों में नहीं हैं? एक खंडन
मनसा के बिना महाभारत और परीक्षित की कथा गिर जाती है
एक श्रोता दावा करता है कि माँ मनसा देवी का उल्लेख किसी पुराण में नहीं मिलता, फिर उनकी पूजा कैसे शुरू हुई। किसने कहा, वक्ता पूछते हैं — आप सारे पुराण पढ़ चुके हैं? यदि मनसा देवी हैं ही नहीं, तो पूरा महाभारत गलत हो गया, पूरा श्रीमद्भागवत गलत, राजा परीक्षित की कथा गलत — और फिर कलियुग ही गलत हो गया। आपने पूरा ब्रह्मांड घुमा दिया, वे कहते हैं।
एक श्रोता लिखता है कि माँ मनसा देवी का उल्लेख किसी पुराण में नहीं मिलता — फिर उनकी पूजा कैसे होने लगी? कहाँ, क्यों, किसने कहा कि पुराण में उल्लेख नहीं मिलता, वक्ता पूछते हैं। आप सारे पुराण पढ़ चुके हैं? किसने कह दिया कि भगवती मनसा देवी की कथा किसी पुराण में कहीं नहीं मिलती? यदि आप कहते हैं कि मनसा देवी का उल्लेख ही नहीं मिलता, तो स्वयं सोचिए: पूरा महाभारत ही गलत हो गया, पूरा श्रीमद्भागवत ही गलत हो गया। वे ऐसा क्यों कह रहे हैं, इस पर विचार कीजिए। यदि भगवती मनसा हैं ही नहीं, तो राजा परीक्षित की कथा भी गलत हो जाएगी — और फिर तो कलियुग भी यहाँ गलत हो जाएगा। बहुत बड़ा विषय आपने बोल दिया है, वे कहते हैं: यदि देवी मनसा नहीं हैं, तो आपने पूरा ब्रह्मांड घुमा दिया।
स्वप्न में मिला सच्चा आदेश और भ्रमित करने वाला आदेश कैसे पहचानें
नाड़ी, और जागने पर वातावरण
क्या स्वप्न में देव शक्तियाँ सच में साधना का आदेश दे सकती हैं, या कोई दूसरी शक्ति भ्रमित करने के लिए करती है? दोनों हो सकता है, वक्ता कहते हैं; उस समय जो आभास हुआ उसके अनुसार विचार करें। एक तरीका, जिस पर वीडियो पहले से है, नाड़ी विज्ञान: देखें उस समय सूर्य नाड़ी चल रही थी या चंद्र — इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना — यह ध्यान रखते हुए कि किस करवट सोए थे। दूसरा: नींद टूटते ही यदि देव शक्ति थी तो आसपास का वातावरण अत्यंत शुभ्र, शांत, सौम्य लगेगा, कोई विशेष सुगंध भी महसूस हो सकती है, अर्धनिद्रा में भी; नकारात्मक ऊर्जा थी तो उठते ही एकाएक हल्का भय लगेगा, वातावरण भयभीत-सा, कुछ अच्छा नहीं लगेगा। जब तक आभामंडल इतना संवेदनशील न हो, ऐसा निर्देश मिलता भी नहीं — और त्रिशंकु साधक, जो साधना के मध्य में है, उसके साथ ये सब होता रहता है और समझना मुश्किल हो जाता है।
एक श्रोता पूछता है कि क्या सच में स्वप्न में देव शक्तियाँ अपनी साधना करने का आदेश दे सकती हैं, या कोई दूसरी शक्ति भ्रमित करने के लिए करती है। दोनों हो सकता है, वक्ता कहते हैं, और उस समय आपको जो आभास हुआ उसके अनुसार विचार करना होता है। स्वप्न में आदेश सही प्रकार से, सही शक्ति से मिला या नहीं — इसे कैसे पता किया जाता है, इस पर एक वीडियो पहले से उपलब्ध है, जिसमें कुछ कॉमन चीज़ें बताई गई हैं। पहले नाड़ी देखनी होती है: उस समय सूर्य नाड़ी चल रही थी या चंद्र नाड़ी — हालाँकि यह इस पर भी निर्भर करता है कि दाईं या बाईं किस करवट सोए थे। नाड़ी विज्ञान के अनुसार — चंद्र और सूर्य, जिन्हें इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना कहते हैं — हमें यह निर्णय लेना होता है कि जो स्वप्न देखा वह किसी देव शक्ति के माध्यम से दिशा-निर्देश है, या कोई दैत्य की सामान्य शक्ति, कोई नकारात्मक शक्ति। वह एक तरीका हो गया। दूसरा: जब नींद टूटे, उस समय यदि देव शक्ति थी तो आसपास का वातावरण अत्यंत शुभ्र, शांत, सौम्य होगा। कुछ विशेष प्रकार की सुगंध भी महसूस हो सकती है — अर्धनिद्रा में भी हो सकती है। लेकिन यदि कोई नकारात्मक ऊर्जा थी, तो उठने के बाद एकाएक हल्का-सा भयभीत लगेगा; एकदम भय-सा वातावरण लगेगा; कुछ अच्छा नहीं लगेगा। और जब तक आपका आभामंडल इन सब चीज़ों को ग्रहण करने के लिए इतना संवेदनशील न हो, तब तक ऐसा दिशा-निर्देश मिलता भी नहीं। त्रिशंकु साधक — जो अभी साधना के मध्य में है — उसके साथ ये सब चीज़ें होती ही रहती हैं, और समझना थोड़ा मुश्किल हो जाता है।
मंत्र जप के दौरान क्रोध क्यों बढ़ता है
मूलाधार पहले सक्रिय होता है; इसीलिए गणपति प्रथम पूज्य हैं
माँ के मंत्र जप से अधिक क्रोध क्यों आता है, इस पर वक्ता कहते हैं कि यह किसी भी मंत्र से होता है, और दो तरह से समझाते हैं। पहला: साधक जब बैठकर जप करता है तो मूलाधार — ठीक आसन के पास — सबसे पहले सक्रिय होता है, और उसके साथ काम और क्रोध का आवेग बढ़ता है; यह साधना का स्टार्टिंग फेज़ है, और उस चक्र के स्वामी भगवान गणेश हैं। इसीलिए वे प्रथम पूज्य हैं: गणपति इन्हें नियंत्रित कर लें तो आगे की साधना में यह आवेग परेशान नहीं करता। लेकिन हम गणपति साधना कितनी करते हैं — "गजाननं भूतगणादि सेवितं" कर दिया, हो गया; 11,000 या 21,000 दो-तीन दिन में खत्म, फिर भगवती के मंत्र के पाँच-नौ लाख: नियंत्रण भी उसी अनुसार होगा। क्रम है गुरु, गणपति, फिर भैरव, फिर हनुमान, तब मुख्य साधना, कुल के देवी-देवता सहित। दूसरा: मंत्र की प्रकृति — बीज मंत्र हो तो गकार-मकार और अनुस्वार का सही उच्चारण मायने रखता है (वे कालिका बीज का उदाहरण देते हैं); उल्टा करें तो शरीर में दिक्कत देगा। और षट्चक्र के अनुसार असंतुलित चक्र क्रोध बढ़ाता है: मूलाधार छोड़ दें तो प्रायः नाभि चक्र असंतुलित होता है, रं अग्नि बीज के साथ। बड़ी साधना से पहले अपनी प्रकृति जानिए।
एक श्रोता पूछता है कि माँ के मंत्र जप से ज़्यादा गुस्सा क्यों आता है, उसे कैसे कम करें। केवल भगवती के मंत्र जप से ही नहीं, वक्ता कहते हैं — सामान्यतः किसी भी मंत्र का जप करेंगे तो होगा — और इसे दो तरीके से समझ सकते हैं। पहला: जब हम साधक होकर बैठकर जप कर रहे होते हैं, तो जैसे ही मूलाधार सक्रिय होना आरंभ करता है — हमारा मूलाधार ठीक हमारे आसन के पास होता है, और सबसे पहले वही सक्रिय होता है — तो सर्वप्रथम काम और क्रोध: काम का आवेग बढ़ता है, क्रोध भी बहुत अधिक आता है। यह साधना का स्टार्टिंग फेज़ है, और उस चक्र पर जिसका स्वामित्व, जिसका नियंत्रण है, वे हैं भगवान गणपति। इसीलिए प्रथम पूज्य गणपति हैं, इसीलिए गणपति पूजन पहले किया जाता है — कि गणपति जब इन चीज़ों को नियंत्रित कर लेंगे, प्रसन्न होंगे, तो आगे की साधना में जब काम-क्रोध का आवेग आए, गणपति उस पर नियंत्रण स्थापित कर देंगे और ऐसी दिक्कतें नहीं आएँगी। लेकिन गणपति जी की साधना हम कितनी करते हैं? "गजाननं भूतगणादि सेवितं" — कर दिया, हो गया। बहुत विशेष सवा लाख का जप शायद ही कोई करता है; 11,000-21,000 एक-दो-तीन दिन में खत्म, साधना पूरी। तो प्रभाव भी वैसा ही मिलता है। अब भगवती के मंत्रों के पाँच-पाँच, नौ-नौ लाख करने वाले हैं और गणपति जी का मात्र 5,000 कर लिया — नियंत्रण भी उसी अनुसार होगा। इसीलिए कहा गया है: गुरु, गणपति पहले; गुरु-गणपति के पश्चात भैरव जी, तब हनुमान जी, तब जाकर मुख्य साधनाएँ — कुल के देवी-देवताओं सहित अन्य सबका पहले भी, क्योंकि इस बार कृपा प्राप्त कर सकते हैं। सीधे मुख्य मंत्रों का जप करेंगे तो यह होगा। दूसरा: मंत्र की प्रकृति कैसी है, और बीज मंत्र से युक्त है तो बीज मंत्र में गकार, मकार, अनुस्वार आदि का उच्चारण सही कर रहे हैं या नहीं। उसी के अनुसार शरीर पर प्रभाव पड़ेगा। जैसे भगवती कालिका का बीज मंत्र: उसमें गकार करेंगे कि मकार? गकार कब करना होता है, मकार कब? यह न पता हो और सीधे उल्टा कर रहे हों तो शरीर में दिक्कत देगा। साथ ही षट्चक्र के अनुसार भी देखना होता है कि छह चक्रों में कौन-सा मज़बूत है, कौन-सा कमज़ोर; चक्र संतुलित न रहे तो शरीर में क्रोध की मात्रा बढ़ेगी। जैसे आप कह रहे हैं कि बहुत अधिक क्रोध आ रहा है — पहला विषय छोड़ दें, मूलाधार छोड़ दें — तो आपका नाभि चक्र, नाभि की ऊर्जा कहीं असंतुलित होगी। रं अग्नि बीज है: उससे संबंधित मंत्रों का जप कर रहे हों, या जप में जो भी बीज समाविष्ट हो उसे गलत कर रहे हों, तो ऊर्जा बढ़ेगी, नियंत्रण नहीं कर पाएँगे, क्रोध काफी अधिक आएगा। इसलिए अपनी प्रकृति आदि जानना आवश्यक है — जब बहुत अधिक मात्रा में साधना करनी हो तब इन विषयों को जान लेना चाहिए।
हर पूर्णिमा और पर्व काल पर नारियल का दीपदान
108 बत्ती का नारियल दीपक सर्वांगीण प्रभाव वाला है
दीपावली पर बताया नारियल का दीपदान हर विशेष पर्व पर किया जा सकता है क्या, इस पर वक्ता कहते हैं हाँ — वे कह भी चुके हैं। नारियल में 108 बत्ती का दीपदान सर्वांगीण प्रभाव वाला है: नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है, धन की प्राप्ति होती है, और पितृ व देवता दोनों तृप्त होते हैं। इसलिए हर पूर्णिमा और हर आने वाले पर्व काल पर कीजिए — सरस्वती पूजा और माघ पूर्णिमा अभी गई; शिव नवरात्रि आ रही है तो महाशिवरात्रि को ज़रूर; फिर फाल्गुन अमावस्या; फिर होलिका की रात। "यहाँ तो होली है, आप दिवाली वाली बात कह रहे हैं" पर वे कहते हैं दोनों कीजिए, फल बढ़िया मिलेगा। वे उन साधिकाओं का भी ज़िक्र करते हैं जो हर कृष्ण पक्ष अष्टमी को भैरव जी का वृहद दीपदान करती हैं — सामर्थ्य हो तो पूरा कीजिए, नहीं तो थोड़ा।
एक श्रोता पूछता है कि दीपावली पर बताया नारियल का दीपदान क्या हर विशेष पर्व पर किया जा सकता है। जी हाँ, बिल्कुल, वक्ता कहते हैं — वे कह भी चुके हैं कि जो भी विशेष पर्व काल आए, करना चाहिए; अभी माघ पूर्णिमा गई। विषय इतने सारे हैं कि उन्हें याद नहीं रहता, और वे श्रोताओं से कहते हैं कि पर्व से पहले मैसेज कर दिया करें ताकि वे सबके लिए दीपदान का स्मरण दोबारा डाल दें। वे हरिद्वार की दो साधिकाओं, दो बहनों का ज़िक्र करते हैं, जो हर कृष्ण पक्ष अष्टमी को भैरव जी का वृहद दीपदान करती हैं, और एक अन्य साधक जो दीपदान करके भेजते हैं — वे स्वयं कभी भूल जाते हैं कि अष्टमी को भैरव दीपदान करना है, इतना बड़ा उनका अपना नित्य नियम है, और वे वहाँ से भेजती हैं: "भैया देखिए, पूरा दीपदान हो गया", पूरी वृहद विधि से, अब तक हर कृष्ण पक्ष अष्टमी को। तो सामर्थ्य हो तो पूरा कीजिए, नहीं तो थोड़ा-सा कीजिए। लेकिन जो नारियल वाली दीपदान विधि बताई थी — 108 बत्ती का दीपदान, कम में कैसे, नारियल में कैसे होता है — वह ओवरऑल है: नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होगी, धन की प्राप्ति होगी, सभी चीज़ के लिए। पितरों की तृप्ति होगी, देवताओं की तृप्ति होगी। तो वह हर पूर्णिमा को और जितने भी पर्व काल आते हैं उन पर कीजिए: सरस्वती पूजा अभी गई, उसमें करना था; माघ पूर्णिमा को करना था। अब शिव जी की नवरात्रि आ रही है तो महाशिवरात्रि को ज़रूर कर लीजिए। फिर फाल्गुन की अमावस्या को। फिर होलिका की रात्रि में। कोई कहेगा: यहाँ तो रंग उड़ाना है और आप दिवाली वाली बात कह रहे हैं — दोनों कीजिए, वे कहते हैं; उससे फल बढ़िया मिलेगा।
एक दीपक से दूसरा दीपक क्यों नहीं जलाते
ऋण दोष
दीपक से दीपक जलाना ऋण दोष माना गया है, वक्ता कहते हैं — इसीलिए न जलाने को कहा गया है। विशेषकर दूसरे के दीपक से अपना दीप प्रज्वलित करना तो मना ही है।
एक श्रोता पूछता है कि दीपक से दीपक क्यों नहीं जलाना चाहिए। ऋण दोष माना गया है, वक्ता उत्तर देते हैं। इसीलिए बताया गया है कि दीपक से दीपक नहीं जलाना चाहिए। और विशेष रूप से, दूसरे के दीपक से अपना दीप प्रज्वलित करना तो मना ही है।
पितृ पक्ष में या शनि पुष्य में जन्मा बच्चा
पूछिए पुष्य के स्वामी और देवता कौन हैं
एक माँ को कहा गया है कि उनकी बेटी का जन्म — श्राद्ध में, शनिवार को शनि पुष्य में — ठीक नहीं। ऐसा नहीं कहा जा सकता, वक्ता उत्तर देते हैं, कि श्राद्ध में जन्म कठिनाई वाला जीवन है; किसके जीवन में कठिनाई नहीं है? और जिसने शनि पुष्य को बुरा कहा उससे पूछिए: पुष्य नक्षत्र के स्वामी कौन हैं, और देवता कौन — दोनों अलग होते हैं — फिर बताएँ कि शनि पुष्य का जन्म कैसे गड़बड़ हो गया। लोगों ने गुरु पुष्य, रवि पुष्य सुना है और शनि पुष्य को बुरा कह देते हैं, बिना जाने कि नक्षत्र पर किसका अधिकार है। सब अपना प्रारब्ध काटने जन्मे हैं; ग्रह-नक्षत्र को दोष न दें, भ्रमित न हों।
एक श्रोता लिखती हैं कि बेटी का जन्म श्राद्ध में, शनिवार को शनि पुष्य नक्षत्र में हुआ है, और सब कहते हैं ठीक नहीं — कि श्राद्ध में जन्मे बच्चे के जीवन में कठिनाई होती है। एक बात बताइए, वक्ता कहते हैं: जिसने यह बात कही — क्या उसके अपने जीवन में कठिनाई नहीं है? ऐसा नहीं कहा जा सकता कि श्राद्ध में जन्म हुआ है तो वह कठिनाई वाला जन्म है। और शनिवार, पुष्य नक्षत्र में जन्म — जिसने यह कहा उससे एक बार पूछिए: पुष्य नक्षत्र के स्वामी कौन हैं? पुष्य नक्षत्र के देवता कौन, और स्वामी कौन? पूछिए, और फिर वे बताएँ कि शनि पुष्य के दिन जन्म कैसे गड़बड़ हो गया। गुरु पुष्य, रवि पुष्य तो सुने हैं; शनि पुष्य में जन्म हो तो कहते हैं उचित नहीं — तो पुष्य नक्षत्र के स्वामी कौन-से ग्रह हैं, किन्हें माना गया है? ज़रूर उनसे पूछिए जिन्होंने यह कहा। और श्राद्ध पक्ष में जन्म लेने से जीवन भर कष्ट ही होगा — यह भी कहाँ उचित है? वे जोड़ते हैं: ध्यान रखिए कि नक्षत्र के स्वामी और देवता दोनों अलग होते हैं; उन्होंने पुष्य के स्वामी और देवता दोनों की चर्चा की है। भ्रमित नहीं होना है। सबके जीवन में तकलीफ है; सब, हम हों या आप, अपना प्रारब्ध काटने जन्मे हैं। ग्रह-नक्षत्र को दोष नहीं देना है।
शिवलिंग का मस्तक कभी खाली नहीं रखा जाता
ब्रह्मांड के महाराजाधिराज मुकुट पहनते हैं
घर के शिवलिंग पर सदैव बेलपत्र या फूल की पत्ती रखनी चाहिए क्या, इस पर वक्ता कहते हैं हाँ: घर में या कहीं भी शिवलिंग का मस्तक कभी खाली नहीं रखा जाता, क्योंकि शिव अखिल ब्रह्मांड के महाराजाधिराज हैं, और राजा का मस्तक कभी खाली नहीं रहता। उस पर मुकुट रखिए; मुकुट न हो तो कम से कम अखंडित चावल, या बेलपत्र; रोज़ ताज़ा बेलपत्र न मिले तो चाँदी का बेलपत्र। साथ में वासुकी सर्प रखें — पंचमुखी सर्प सर्वश्रेष्ठ — और नंदी जी व उनका त्रिशूल ज़रूर रहे। जिस श्रोता के पीतल के शिवलिंग का मस्तक नुकीला है और सब गिर जाता है, उससे वे कहते हैं: छोटा चाँदी का मुकुट बनवा लें, या कान्हा जी के लिए मिलने वाला टोपी वाला मुकुट लाकर महादेव को पहनाएँ, हर मासिक शिवरात्रि को नया बदलें — बस मस्तक खाली न रहे।
एक श्रोता पूछती हैं कि घर में रखे शिवलिंग पर क्या सदैव बेलपत्र या फूल की पत्ती रखनी चाहिए, और नंदी जी, वासुकी जी, त्रिशूल भी रखना चाहिए क्या। बिल्कुल सही प्रश्न है, वक्ता कहते हैं, और ऐसा करना चाहिए। घर में क्या, कहीं भी शिवलिंग का मस्तक कभी खाली नहीं रखा जाता — क्योंकि शिव जी अखिल ब्रह्मांड के राजा हैं, महाराजा, महाराजाधिराज, और राजा का मस्तक कभी खाली नहीं रहता। उस पर सदैव मुकुट पहनाकर रखें। मुकुट न पहना सकें तो एक अखंडित चावल ज़रूर चढ़ाना चाहिए, या बेलपत्र रहे; बेलपत्र भी न हो पा रहा हो, रोज़ न मिल पाता हो, तो चाँदी का बेलपत्र — चाँदी का बेलपत्र चढ़ा सकते हैं। लेकिन कभी खाली नहीं। साथ में वासुकी सर्प ज़रूर रखें — पंचमुखी सर्प रखें तो सर्वश्रेष्ठ — नंदी जी ज़रूर रहें, उनका त्रिशूल ज़रूर रहे। बाद में एक श्रोता कहता है कि उसका पीतल का शिवलिंग है, मस्तक गोल और कोना निकला हुआ, तो चावल या कुछ भी चढ़ाओ तो मस्तक से गिर जाता है। दो काम कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं: या तो छोटा-सा चाँदी का मुकुट बनवा लें, या चाँदी नहीं चाहते तो कान्हा जी के लिए आजकल जो सुंदर टोपी वाला मुकुट आता है वह लाकर महादेव को पहनाएँ। हर महीने, हर मासिक शिवरात्रि को नया बदल दिया करें। बस मस्तक खाली न रहे।
संस्कृत की जगह हिंदी में कवच का पाठ
पहले भावपूर्ण हिंदी, धीरे-धीरे संस्कृत
भगवान दत्तात्रेय के कवच का हिंदी में पाठ करने वाले श्रोता से वक्ता कहते हैं: बिल्कुल, हिंदी में कीजिए, पूरे भाव से। हिंदी जब हो जाए, तब धीरे-धीरे संस्कृत में कर सकते हैं।
एक श्रोता कहता है कि वह भगवान दत्तात्रेय के कवच का पाठ हिंदी में करता है। बिल्कुल, वक्ता कहते हैं — भावपूर्ण हिंदी में कीजिए। हिंदी जब हो जाए, तब धीरे-धीरे संस्कृत में कर सकते हैं।
छोटे बच्चे की कुंडली नहीं दिखाई जाती; माता-पिता बच्चे के निमित्त रुद्राभिषेक कर सकते हैं
बाल-ग्रह शांति जन्म के समय एक बार, तेरह वर्ष तक के लिए बताई जाती है
माता-पिता पूछते हैं कि चार साल के बेटे की कुंडली में काल सर्प दोष है तो क्या वे उसके लिए रुद्राभिषेक और नौ दिन का पूजन कर सकते हैं। सबसे पहले, वक्ता कहते हैं, चार साल के बच्चे की कुंडली दिखाई नहीं जाती। बाल-ग्रहों का दोष जन्म के समय, षष्ठी आदि पर जब जन्म कुंडली पहली बार बनती है, तब एक बार बताया जाता है: पंडित जी कहते हैं कि तेरह वर्ष तक इस-इस उम्र में यह शांति करवा लेनी है। बीच में न कुंडली दिखाई जाती है, न कुछ पढ़ा जाता है। फिर भी, दोष मान भी लें तो माता-पिता स्वयं सब कर सकते हैं — संकल्प करके रुद्राभिषेक और जो भी पूजन चाहें; और जन्म के समय बताया गया था तो ठीक है, शिव नवरात्रि में किसी दिन पंडित जी से रुद्राभिषेक करवाया जा सकता है।
एक श्रोता पूछता है: चार साल के बेटे की कुंडली में काल सर्प दोष है — क्या वे माता-पिता के रूप में उसके लिए रुद्राभिषेक कर सकते हैं, और पितरों के लिए भी नौ दिन पूजन? सबसे पहली बात, वक्ता कहते हैं: चार साल के बच्चे की कुंडली नहीं दिखाई जाती। बाल-ग्रह का दोष होता है — जन्म के समय, षष्ठी आदि पर, जब जन्म कुंडली पहली बार बनती है, तब पंडित जी तेरह साल तक के लिए बता देते हैं कि इस-इस समय में यह-यह करवा लेना है, इनकी शांति करवा लेनी है। बीच में न कुंडली दिखाई जाती है, न कुछ। काल सर्प दोष बताया जा रहा है — ठीक है, मान भी लेते हैं — तो आप स्वयं कर सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं: रुद्राभिषेक आदि और जो भी पूजन चाहें, संकल्प करके। जब श्रोता स्पष्ट करता है कि कुंडली बाद में नहीं दिखाई, जन्म के समय बनाते समय बताया गया था, तो वे कहते हैं: तब तो ठीक है — वही तो वे कह रहे थे कि उसी समय बता दिया जाता है कि इस साल में, तीन-चार वर्ष के होने पर यह समस्या रहेगी, यह करवा लेना चाहिए। रुद्राभिषेक बिल्कुल करवा सकते हैं; शिव नवरात्रि में किसी दिन पंडित जी से बात करके करवा लें।
समर्पित साधना से स्वप्न में दर्शन स्वतः होने लगते हैं
अलग से स्वप्न सिद्धि की आवश्यकता नहीं
स्वप्न में दर्शन और बात के लिए विशेष संकल्प लें क्या, इस पर वक्ता कहते हैं कि उनके अनुसार जब समर्पित होकर साधना करने लगते हैं तो ये चीज़ें स्वतः हो जाती हैं — वे चैट में एक साधिका की ओर संकेत करते हैं जो बिल्कुल सामान्य जीवन जीती हैं, कहीं स्वयं को प्रदर्शित नहीं करतीं, असली नाम भी नहीं बतातीं, फिर भी "आज दर्शन नहीं हुआ" कहने की स्थिति में हैं। साधना में उतर जाएँगे तो नियमित रूप से होने लगेगा; स्वप्न में दर्शन होने लगेंगे; अलग से स्वप्न सिद्धि की आवश्यकता नहीं। वे ऐसा संकल्प न लेने को कहेंगे, क्योंकि सफल होगा या नहीं यह वे नहीं कह सकते; महादेव से संबंधित बताई गई कोई भी साधना, या अपनी इच्छा की, समर्पित होकर कर लीजिए, कृपा ज़रूर होगी — वे ज़रूर दर्शन दे सकते हैं।
एक श्रोता स्वप्न में दर्शन और देवता से बात करने के लिए संकल्प लेने के बारे में पूछता है। उनके अनुसार, वक्ता कहते हैं, ये चीज़ें अपने आप हो जाती हैं — जब हम समर्पित होकर साधना करने लगते हैं तो स्वतः हो जाएँगी। वे लाइव में कमेंट कर रही एक साधिका की ओर संकेत करते हैं: उनकी स्थिति कभी ऐसी हो जाती है कि कहती हैं "आज दर्शन नहीं हुआ", फिर भी वे बिल्कुल सामान्य, सीधा जीवन जी रही हैं; ऐसा नहीं कि बहुत दिखाती हैं — अपना असली नाम नहीं बतातीं, किसी के सामने स्वयं को प्रदर्शित नहीं करतीं — और हमें ऐसा ही बनना है। साधना में उतर जाएँगे तो यह नियमित रूप से होने लगेगा; स्वप्न में दर्शन होने लगेंगे। अलग से स्वप्न सिद्धि करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। तो वे यही कहेंगे: ऐसा संकल्प न लें — सफल होगा या नहीं, वे नहीं कह सकते। लेकिन समर्पित होकर साधना कर लीजिए: महादेव से संबंधित जो-जो बताया गया है उनमें से कोई भी, या अपनी इच्छा की — कृपा ज़रूर होगी; वे ज़रूर दर्शन दे सकते हैं।
भैरव त्रिशूल पर नींबू: आकार, बदलने का दिन और विसर्जन
त्रिशूल इतना तो हो कि नींबू लग जाए
भैरव त्रिशूल पर आए कई प्रश्नों से: त्रिशूल कम से कम इतना हो कि नींबू लग जाए — तीनों नोकों पर एक-एक फँस जाए तो चलेगा; बहुत छोटा हो तो पुष्प लगा दें, लेकिन वक्ता अंत में नींबू ही लगाते हैं और बलि-छेदन के लिए उससे छोटा कुछ नहीं देखते। घर में माँ काली और महादेव के लिए दो अलग त्रिशूल हों तो कोई दोष नहीं; और तीन त्रिशूल हों तो नींबू केवल भैरव जी के नाम से रखे लोहे के त्रिशूल पर। नींबू हर शनिवार बदला जाता है; उस दिन न हो सके तो रविवार या मंगलवार भी चलेगा। पुराना नींबू देव-वृक्ष के नीचे विसर्जित करें, या नदी में — गंगा जी पास हों तो गंगा जी में; कई एक साथ भी कर सकते हैं।
कई श्रोता भैरव त्रिशूल पर नींबू के बारे में पूछते हैं, और वक्ता के उत्तर मिलकर एक शिक्षा बनते हैं। एक कहता है कि भैरव त्रिशूल छोटा है और नींबू नहीं लगता — क्या रखें? नींबू से छोटा बलि-छेदन के लिए और क्या हो सकता है, वे पूछते हैं; वे स्वयं अंत में नींबू ही लगाते हैं। कुछ नया डिस्कवर करने जाएँ तो सोचना पड़ेगा। त्रिशूल छोटा है तो पुष्प लगा दीजिए — कोई भी पुष्प लगा सकते हैं — लेकिन त्रिशूल कम से कम इतना लेना चाहिए कि उसमें नींबू लग जाए; तीनों नोकों पर एक-एक नींबू फँस जाए तो चलेगा, पतला हो तो भी नींबू लग जाएँगे। एक और पूछता है कि घर में माँ काली और महादेव के लिए दो अलग त्रिशूल से कोई दोष लगता है क्या — नहीं, क्यों लगेगा, वे कहते हैं; दोनों त्रिशूल पकड़ते हैं, अच्छा ही है। और जहाँ तीन त्रिशूल हों, माँ के हाथ में आदि, वहाँ नींबू केवल भैरव जी के नाम से रखे लोहे के त्रिशूल पर ही लगाएँ। बदलने पर: उन्होंने कहा था कि त्रिशूल का नींबू हर शनिवार बदलना है। शनिवार न हो पाए — श्रोता पूछती है कि उस दिन तबीयत खराब हो तो लगा रहने दें या मम्मी से निकलवा दें — तो रविवार या मंगलवार को भी कर सकते हैं। पुराना नींबू कहाँ छोड़ें: या तो देव-वृक्ष के नीचे विसर्जित करें, या नदी हो तो नदी में — आपके पास गंगा जी हैं, गंगा जी में विसर्जन करें। कई एक साथ रखकर भी कर सकते हैं।
तेतर: तीन बेटियों के बाद जन्मा बेटा
एक मान्य दोष, जिसकी अपनी निवृत्ति है
तीन बेटियों के बाद चौथी संतान के रूप में जन्मे लड़के को तेतर कहा गया है, वक्ता कहते हैं। ऐसे जन्म से माता-पिता को और बड़े भाई को कष्ट माना गया है — स्वास्थ्य और धन की हानि। यह कोई कुप्रथा नहीं; इसका कारण रहा है, लोक-प्रचलन में रहा है, इसकी दोष-निवृत्ति होती है, और यह देखा भी गया है कि ऐसा लड़का आगे चलकर परिवार में, विशेषकर बड़े भाई या बड़ी बहन के लिए, क्लेश का कारण बन जाता है।
एक श्रोता पूछता है कि तीन लड़कियों के बाद लड़का हो तो परिवार को क्या कष्ट होता है। ऐसे लड़के को तेतर कहा गया है, वक्ता कहते हैं। तीन लड़कियों के बाद चौथी संतान लड़का हो जाए तो उससे माता-पिता को कष्ट माना गया है; बड़े भाई को कष्ट माना गया है — स्वास्थ्य संबंधी हानि, धन संबंधी हानि। यह कोई कुप्रथा नहीं है, वे कहते हैं; इसका कारण रहा है। लोक-प्रचलन में भी रहा है; इसके लिए दोष-निवृत्ति भी होती है; और यह देखा भी गया है कि वह लड़का आगे चलकर परिवार में क्लेश और कष्ट का कारण बन जाता है — विशेषकर बड़े भाई के लिए, वे कहते हैं, और बड़ी बहन आदि के लिए भी।
सदाशिव की कृपा के लिए शिव नवरात्रि में नौ दिन का पुराण पाठ
एक संहिता, एक संकल्प, चार पुरुषार्थ
नौ दिनों के लिए एक विशेष बात, वक्ता कहते हैं: यदि केवल भगवान सदाशिव की कृपा चाहिए — कोई विशेष साधना हो या साधारण अनुष्ठान — तो शिव नवरात्रि में उनसे संबंधित पुराणों का पाठ करें: शिव पुराण का जितना हो सके, या उसकी कोई एक पूरी संहिता — विश्वेश्वर, रुद्र, कैलाश — नौ दिन के भीतर पूरी। साथ में यह संकल्प: मुझे सदाशिव और भगवती पार्वती की कृपा प्राप्त हो, और उनकी कृपा से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थ। यह निष्काम नहीं — काम ही है — लेकिन पुराण पाठ के इस अलग विधि-विधान से करें तो ज़रूर विशेष फल मिलता है।
हर ओर से बंधन हो तो: हनुमान अनुष्ठान
जो नौ ग्रहों को मुक्त करते हैं वे आपको भी करेंगे
हर तरफ से बंधन किया हो तो शिव नवरात्रि में कौन-सी पूजा करें, इस पर वक्ता कहते हैं: बंधन से मुक्त करने में हनुमान जी — शिव-भक्त, शिव-अवतार, रुद्रावतार — पूर्ण रूप से सक्षम हैं; जो नौ ग्रहों को बंधन से मुक्त कर सकते हैं, वे आपको और हमको क्यों नहीं करेंगे? ऐसी विशेष विकट परिस्थिति हो तो हनुमान जी से संबंधित अनुष्ठान करें।
एक श्रोता पूछता है: हर तरफ से बंधन किया हो तो शिव नवरात्रि में कौन-सी पूजा कर सकते हैं? बंधन से मुक्त करने में, वक्ता कहते हैं, शिव-भक्त, शिव-अवतार, रुद्रावतार हनुमान जी पूर्ण रूप से सक्षम हैं। जो नौ ग्रहों को बंधन से मुक्त कर सकते हैं — वे आपको और हमको क्यों नहीं करेंगे? यदि ऐसी कोई विशेष विकट परिस्थिति है तो हनुमान जी से संबंधित अनुष्ठान कर सकते हैं।
प्रत्यंगिरा प्रायोगिक विद्या है: यह सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं सिखाई जाती, और क्यों उल्टी पड़ती है
इसमें ऊर्जा खर्च होती है, बनती नहीं
प्रयोग सहित महाप्रत्यंगिरा का वीडियो माँगने पर वक्ता कहते हैं कि वे ऐसे वीडियो बनाते ही नहीं — बगलामुखी तंत्र रहस्य प्लेलिस्ट में एक-दो वीडियो हैं। प्रत्यंगिरा क्रम विद्या है, प्रायोगिक विद्या: इसमें ऊर्जा बनती नहीं, खर्च होती है; इसमें आप देवी को आदेश दे रहे हैं, उनसे तप-बल नहीं माँग रहे। वे इसे सार्वजनिक नहीं डालेंगे — जिन्होंने पहले के वीडियो नहीं देखे वे सीधे करने लग जाएँगे — हालाँकि लंबे समय से जुड़े साधकों के लिए बाद में मेंबर्स-ओनली प्रैक्टिकल वीडियो आ सकते हैं। जिस श्रोता पर बजरंग बाण या प्रत्यंगिरा "वापस लग रहा" है, उससे: ज़रूर कोई कारण है; पहला कारण अपने कुल के देवी-देवता हो सकते हैं, या कोई बेसिक गलती — शत्रु का प्रत्यंगिरा को वापस भेज देना ऐसे संभव नहीं।
एक श्रोता प्रत्यंगिरा पर प्रयोग सहित वीडियो बनाने को कहता है। ऐसे वीडियो वे बनाते ही नहीं, वक्ता कहते हैं। चैनल पर एक प्लेलिस्ट है, बगलामुखी तंत्र रहस्य, उसमें बगला से संबंधित एक-दो वीडियो मिल जाएँगे। प्रत्यंगिरा क्रम विद्या है। चैनल का हर वीडियो सब नहीं देखते — अब लगभग 500 होने वाले हैं — और प्रत्यंगिरा सीधा डाल दें तो सबको पता होगा, विधि-विधान स्पष्ट हो जाएगा, और सीधे करने लग जाएँगे। यह प्रायोगिक विद्या है: इसमें ऊर्जा बनती नहीं, खर्च होती है; इसमें आप देवी को आदेश दे रहे हैं, उनसे तप-बल की प्राप्ति नहीं माँग रहे। यह एक अलग विधि-विधान है, और वे इसे ऐसे नहीं दे सकते। भविष्य में यह ज़रूर होगा कि जब मूल साधकों का समूह — जो लंबे समय से साधना कर रहे हैं, अभी दस-पंद्रह लोग हैं जिनसे आराम से बात हो जाती है — बड़ा होगा, तब इसी मेंबरशिप के माध्यम से ऐसे वीडियो प्रैक्टिकली बनाकर डालेंगे जिनका एक्सेस केवल उन मेंबर्स के पास रहेगा। अभी सार्वजनिक रूप से नहीं दे सकते; उचित भी नहीं है। एक और श्रोता कहता है कि बजरंग बाण या प्रत्यंगिरा उस पर वापस लग जाता है और उपाय पूछता है। यह बड़ी विकट बात बताई है, वक्ता उत्तर देते हैं; यह देखने का विषय है — वापस लग रहा है तो ज़रूर कोई कारण होगा, चर्चा में समझ में आएगा। बहुत से कारण हो सकते हैं: सबसे पहला कारण आपके कुल के देवी-देवता हो सकते हैं। शत्रु का प्रत्यंगिरा को वापस भेज देना — यह ऐसे संभव नहीं; कुछ बेसिक गलती हो रही होगी।
रजस्वला अवस्था में कामाख्या कवच
वह कवच जो अशुद्धि में भी रक्षा करता है
रजस्वला स्त्री कामाख्या कवच का पाठ कर सकती है क्या? हाँ, वक्ता कहते हैं — चैनल पर इसी शीर्षक से दिया है, अशुद्धि में भी रक्षा करने वाला कवच; रजस्वला स्त्री किसी भी समय कर सकती है। तरीका: पूजन स्थान पर न जाएँ, धूप-दीप न जलाएँ, देवताओं के स्थान पर न जाएँ; नहा-धोकर पूजन स्थान से बाहर कहीं भी खड़े होकर हाथ जोड़कर मानसिक रूप से पाठ करें — उतना काफी है। उस अवस्था में और किसी का पाठ नहीं कर सकते।
एक श्रोता पूछती है कि क्या स्त्री रजस्वला होने पर भी कामाख्या कवच का पाठ कर सकती है। चैनल पर दिया है, वक्ता कहते हैं, कि प्रत्येक व्यक्ति, रजस्वला स्त्री, किसी भी समय कर सकती है — टॉपिक ही लिखा है: अशुद्धि में भी रक्षण करने वाला कवच, कामाख्या कवच। रजस्वला अवस्था में पाठ के लिए: पूजन स्थान पर नहीं जाना है, धूप-दीप नहीं जलाना है, देवताओं के स्थान पर नहीं जाना है। नहा-धोकर, पूजन स्थान से बाहर कहीं भी खड़े होकर, हाथ जोड़कर मानसिक रूप से पाठ करेंगी — उतना काफी है। और उस अवस्था में किसी और का पाठ नहीं कर सकते।
बिना दीक्षा नाम जप, और सार्वजनिक रूप से महाविद्या का नाम
समर्पण से नाम फलदायी है; बीज न जोड़ें
बिना दीक्षा नाम लेना फलदायी होगा? क्यों नहीं, वक्ता कहते हैं — उतने समर्पण से नाम लीजिए तो होगा; और उसी नाम के फल से फिर दीक्षा मिलेगी, समर्पण हो तब। महाविद्या स्वरूप का नाम सार्वजनिक रूप से जपा जा सकता है? नाम जप के लिए कोई दिक्कत नहीं — कर सकते हैं — बस उसमें कोई बीज मंत्र न लगाएँ। और जिसे कहा गया कि बिना दीक्षा केवल राम जी का नाम लें क्योंकि उसी से इष्ट का भी जप हो जाता है: यह कहने वाले का अपना भाव है, नियम नहीं — जिनमें श्रद्धा हो, राम या भगवती, उनका नाम लीजिए, उतर जाएँगे।
एक श्रोता पूछता है कि बिना दीक्षा के नाम फलदायी होंगे या नहीं। क्यों नहीं होंगे, वक्ता कहते हैं — उतने समर्पण से नाम लीजिए तो फलदायी होंगे। और उन्हीं के फल से फिर आपको दीक्षा मिलेगी — लेकिन उतना समर्पण हो तब। एक और पूछता है कि क्या महाविद्या स्वरूप का भी नाम जप सार्वजनिक रूप से किया जा सकता है। नाम जप के लिए कोई दिक्कत नहीं; कर सकते हैं। बस उसमें कोई बीज मंत्र मत लगाइए। तीसरा कहता है कि एक बंधु ने कहा कि बिना दीक्षा केवल राम जी का नाम लेना चाहिए, क्योंकि उसी से अपने इष्ट का भी नाम जप हो जाता है। नहीं, वक्ता कहते हैं, ऐसी बात नहीं है — जिन्होंने कहा, वे उनके भाव हैं। भगवान राम में श्रद्धा है तो उनका नाम लीजिए; श्रद्धा भगवती में है तो उनका नाम लीजिए। जिनमें श्रद्धा है उनका नाम लेंगे तो उतर जाएँगे। नाम लिखना मानसिक जप में आता है; दोनों में आ जाएगा।
धन लेकर दूसरों के लिए जप या हवन: साधक पर आने वाला दोष
ब्राह्मण का नहीं, साधक का धन नहीं पचता
धन लेकर दूसरों के लिए हवन करने पर वक्ता कहते हैं: तभी, जब देव कृपा हो, या किसी देवी-देवता या आपके गुरु ने कहा हो, और आप उतने समर्थ हों। जब साधक किसी अन्य के लिए संकल्प लेकर जप करता है, तो उस व्यक्ति की सारी बुरी परिस्थिति और दोष — क्योंकि जप उसके परिहार के लिए है — साधक पर आ पड़ते हैं। "ब्राह्मण का धन नहीं पचता" का असली अर्थ यही है: कहना चाहिए "साधक का धन"। "केवल ब्राह्मण से करवाइए" का तात्पर्य उन जन्मना ब्राह्मणों से था जिन्हें शुरू से वेदाध्ययन में भेजा गया, पूजन-पाठ समझाया गया, त्रिकाल संध्या-गायत्री करवाई गई, तो उनका तपोबल बना रहा। सामान्य व्यक्ति जो त्रिकाल संध्या नहीं करता, अपने लिए बहुत जप नहीं करता, हवन नहीं करता, नियमित देवताओं का पूजन नहीं करता, वह दूसरे के लिए करते ही उसका दोष अपने ऊपर ले लेगा, और परिवार बर्बादी के कगार पर पहुँच जाएगा। जो ब्राह्मण गलत करके भी सुख-चैन से हैं, वे दादा का पुण्य खा रहे हैं — वंशज भोगेंगे। तो: उतना सामर्थ्य हो तो कर सकते हैं।
एक श्रोता धन लेकर दूसरों के लिए हवन करने पर वक्ता का विचार पूछता है — जैसे कोई धन देकर किसी योग्य साधक से करवाए। इसमें वे इतना ही कह सकते हैं: यदि देव कृपा है, या किसी देवी-देवता ने आपको कहा है, आपके गुरु ने कहा है, आप उतने समर्थ हैं, तो कर सकते हैं। क्योंकि जब भी हम किसी अन्य के लिए धन लेकर साधना, पूजन, हवन या जप करते हैं — क्यों कहा जाता है कि ब्राह्मण का धन नहीं पचा सकते? वास्तव में ब्राह्मण का नहीं, साधक का धन नहीं पचा सकते; यह कहना चाहिए। जब कोई साधक किसी अन्य के लिए संकल्प लेता है, तो जिसके लिए संकल्प लेकर जप किया, उसकी सारी बुरी परिस्थिति, जो भी दोष आदि हैं, उसके ऊपर आ पड़ेंगे — क्योंकि उसके परिहार के लिए कर रहा है। इसीलिए कहा गया है, "केवल ब्राह्मणों से करवाइए" — बात केवल "ब्राह्मण से करवाइए" की नहीं थी। ब्राह्मण का तात्पर्य वहाँ यह था: जो जन्मना ब्राह्मण थे उन्हें शुरू से ही वेदाध्ययन के लिए भेजा गया, शुरू से पूजन-पाठ समझाया गया, शुरू से त्रिकाल संध्या-गायत्री करवाई गई, तो उनका तपोबल बना रहा। जब सामान्य व्यक्ति इस प्रकार किसी अन्य के लिए जप करे, और त्रिकाल न करता हो, या स्वयं के लिए मंत्र जप सिद्धि मिलने के बाद बहुत जप न करता हो, अपने लिए हवन न करता हो, नियमित रूप से देवताओं का पूजन-पाठ न करता हो — तो जैसे ही किसी अन्य के लिए करेगा, सामने वाले का जो भी दोष है वह उस पर पड़ेगा, और परिवार बर्बादी के कगार पर पहुँच जाएगा। प्रश्न हो सकता है: हम ऐसे ब्राह्मणों को जानते हैं जो बहुत गलत काम करते हैं, फिर भी दूसरों का पूजा-पाठ करवाते हैं और सुख-चैन से हैं। कोई दिक्कत नहीं — आने वाले समय में, वे कहते हैं, ऐसे ब्राह्मण भी मिलेंगे जो कहते हैं "मेरे दादाजी इतने जानकार थे, इतनी शक्तियाँ थीं, फलानी सिद्धि थी, करोड़पति थे, आज हमारे पास कुछ नहीं"। दादाजी का पुण्य प्रबल था; वे भोगकर गए, लेकिन वंशज भोग रहे हैं। ऐसा सबके साथ हो जाता है। तो — उतना सामर्थ्य हो, तो कर सकते हैं।
108 या अधिक आहुतियों के हवन के बाद तर्पण और मार्जन
जिस मंत्र की सबसे अधिक आहुति हुई
हर हवन के बाद मुख्याहुति मंत्र का मार्जन आवश्यक है क्या, इस पर वक्ता कहते हैं: जिस मंत्र की आपने सबसे अधिक आहुति दी है — किसी मंत्र की कम से कम 108 आहुति की है — तो उसका तर्पण और मार्जन कर लेना चाहिए।
एक श्रोता पूछती है कि क्या हर हवन के बाद हवन के मुख्याहुति मंत्र का मार्जन आवश्यक है। जिस मंत्र की आपने अधिकाधिक आहुति की है, वक्ता कहते हैं — किसी मंत्र की कम से कम 108 आहुति की है — तो उसका तर्पण-मार्जन कर लेना चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।