बिना दीक्षा के बगलामुखी साधना — तीन आरंभिक साधनाएं और रुद्रयामल का 108 नाम स्तोत्र
बिना दीक्षा के भगवती पीतांबरा की साधना करने पर।
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36 अक्षरी मूल मंत्र, सहस्त्रनाम, स्तोत्र और कवच
बिना दीक्षा के 36 अक्षरी मूल मंत्र, सहस्त्रनाम, स्तोत्र और कवच लिए जा सकते हैं या नहीं।
क्या बिना दीक्षा के भगवती पीतांबरा महाविद्या की साधना की जा सकती है; क्या बिना दीक्षा के भगवती पीतांबरा का 36 अक्षरी मूल मंत्र लिया जा सकता है; क्या सहस्त्रनाम, स्तोत्र इत्यादि का पाठ किया जा सकता है; क्या उनके कवच इत्यादि का पाठ किया जा सकता है; और क्या बिना दीक्षा के पीतांबरा बगलामुखी से संबंधित मंत्रों का जप करना सही है, अथवा उसका कोई विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
वक्ता आरंभ में वे प्रश्न रखते हैं जिन्हें आज विस्तार से जानने का प्रयास किया जाएगा। क्या बिना दीक्षा के भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। महाविद्या की साधना की जा सकती है? क्या बिना दीक्षा के भगवती पीतांबरा के 36 अक्षरी मूल मंत्र की साधना की जा सकती है? क्या सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं।, स्तोत्र इत्यादि का पाठ किया जा सकता है? क्या उनके कवच इत्यादि का पाठ किया जा सकता है कि नहीं? क्या बिना दीक्षा के भगवती पीतांबरा बगलामुखी से संबंधित मंत्रों का जप करना सही है, अथवा उसका कोई विपरीत प्रभाव पड़ेगा?
क्रियात्मक विषयों में दक्षता, और सही उच्चारण
दीक्षा वास्तव में क्या देती है, और बिना दीक्षा वाले व्यक्ति को किस बात का ध्यान रखना चाहिए?
दीक्षा से दक्षता आती है, और वह दक्षता उन चीजों में आती है जो क्रियात्मक हैं। इसलिए यदि आप बिना दीक्षा के भगवती पीतांबरा के किसी भी मंत्र का जप करते हैं, तो उस मंत्र का उच्चारण सर्वप्रथम आपको सही आना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि दीक्षा से दक्षता आती है, और जब दक्षता आती है तो वह किस विषय पर आती है? जो क्रियात्मक चीजें हैं, उनमें दक्षता आती है। प्रश्न यहां यह हो जाता है: यदि आप बिना दीक्षा के भगवती पीतांबरा के किसी भी मंत्र का जप करते हैं, तो उस मंत्र का उच्चारण सर्वप्रथम आपको सही आना चाहिए।
मकार या गकार रूप, और किस क्रम में चलना है
एकाक्षरी मंत्र में भी मकार या गकार रूप का, और किस क्रम में चलना है इसका प्रश्न उठता है।
यदि आप भगवती पीतांबरा का एक अक्षर भी — एकाक्षरी मंत्र भी — करते हैं, तो उसे मकार रूप से जपना है या गकार रूप से, और वह आपके लिए कितना उचित है या नहीं, यह एक अलग विषय हो जाता है। सामान्य रूप से किस रूप में जप करना चाहिए, और आप किस क्रम में जाना चाहते हैं, यह भी आपको जानना आवश्यक है। इन विषयों की जानकारी होनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यहां भेद क्या है, इस विषय को भी जानिए। यदि आप भगवती पीतांबरा का एक अक्षर भी — एकाक्षरी मंत्र भी — करते हैं, तो उस एकाक्षरी मंत्र को मकार रूप से जप करना है या गकार रूप से, और वह आपके लिए कितना उचित है या नहीं है, यह विषय बिल्कुल अलग हो जाता है। सामान्य रूप से, कॉमनली किस रूप में यानी मकार में या ककार में जप करना चाहिए? आप किस क्रम में जाना चाहते हैं? यह भी आपको जानना आवश्यक हो जाता है। इन विषयों की जानकारी होनी चाहिए।
दीक्षा का मंत्र प्राप्ति और अपने अनुसार प्रयोग तक सिमट जाना
लोग केवल मंत्र प्राप्त करने के लिए ही दीक्षा क्यों चाहते हैं?
वक्ता कहते हैं कि आज के समय में सबसे मुख्य कारण यह हो गया है कि दीक्षा इसलिए चाहिए कि हमें मंत्र प्राप्त हो जाए; और मंत्र प्राप्त होने के पश्चात हम उस मंत्र को सिद्ध कर लें और अपने अनुसार उसका प्रयोग करें। दीक्षा इतने तक ही सीमित हो जाती है।
वक्ता पूछते हैं कि एक तरीके से लोग दीक्षा क्यों लेना चाहते हैं। वे बताते हैं कि इस विषय को उन्होंने अपने ही एक लाइव सेशन में स्पष्ट किया है और उसका लिंक दे देंगे, तथा जो लोग दीक्षा चाहते हैं उनसे उसे एक बार सुनने का आग्रह करते हैं। आज के समय में दीक्षा का एक सबसे मुख्य कारण यह हो गया है कि दीक्षा इसलिए चाहिए कि हमें मंत्र प्राप्त हो जाए। और मंत्र प्राप्त होने के पश्चात हम मंत्र को सिद्ध कर लें और अपने अनुसार उसका प्रयोग करें। दीक्षा इतने तक ही सीमित हो जाती है।
दीक्षा न मिलने पर भी दिक्कत, और समर्थ गुरु के रोक लगाने पर भी
जब दीक्षा अपने मन के अनुसार नहीं मिलती तो क्या होता है?
जब मन के अनुसार दीक्षा की प्राप्ति नहीं होती, तब भी दिक्कत है। और दीक्षा मिल भी जाए तथा गुरु रोक लगा दें — वे स्पष्ट करते हैं कि उनका आशय योग सामर्थ्य गुरु से है, उन लोगों से नहीं जिन्हें जानकारी नहीं है और जो कुछ भी बोलते रहते हैं — तो ऐसे गुरु जब आपको कोई बात बताएं और वह आपके मन के अनुसार न हो, तब भी दिक्कतें होने लगती हैं।
वक्ता कहते हैं कि मन के अनुसार जब दीक्षा की प्राप्ति भी नहीं होती है, तो भी उसमें दिक्कत है। मान लीजिए दीक्षा मिल जाए और गुरु रोक लगा दें। वे स्पष्ट करते हैं कि उनका आशय किससे है — योग सामर्थ्य गुरु से। वे कहते हैं कि वे उन लोगों की बात नहीं कर रहे जिन्हें जानकारी नहीं है और जो कुछ भी बोल रहे हैं। योग सामर्थ्य गुरु जब आपको कोई चीज बताएं और वह आपके मन के अनुसार न हो, तब भी दिक्कतें होने लगती हैं।
जीवित दीक्षा गुरु के स्थान पर गुरु स्वरूप की पूजा
यदि दीक्षा प्राप्त ही न हो रही हो तो सबसे पहले क्या करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला चीज यही देखनी चाहिए कि यदि आप दीक्षा नहीं लेना चाहते, या आपकी दीक्षा नहीं हो रही, या किसी भी कारणवश दीक्षा प्राप्त नहीं हो रही है, तो सर्वप्रथम आपको गुरु स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। गुरु स्वरूप का अर्थ क्या है और गुरु कैसे खोजना है, इसके लिए वे अपने पहले के वीडियो "आओ मित्र लालटेन लेकर गुरु खोजते हैं" की ओर संकेत करते हैं।
वक्ता पूछते हैं कि तो बिना दीक्षा के हम किन-किन चीजों को कर सकते हैं — विशेष करके भगवती पीतांबरा की साधना को। सबसे पहला चीज तो आपको यही देखना चाहिए: यदि आप दीक्षा नहीं लेना चाहते हैं, या आपकी दीक्षा नहीं हो रही, या किसी भी कारणवश दीक्षा प्राप्त नहीं हो रही है, तो सर्वप्रथम आपको गुरु स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। गुरु स्वरूप से उनका आशय वही है जो उन्होंने पहले के वीडियोस में बताया है, और वे श्रोताओं से एक बार उस वीडियो को सुनने का आग्रह करते हैं जिसका शीर्षक था "आओ मित्र लालटेन लेकर गुरु खोजते हैं"। वे कहते हैं कि बहुत अच्छा विषय है; एक बार सुनेंगे तो आपका उद्देश्य स्पष्ट हो जाएगा और यह स्पष्ट हो जाएगा कि गुरु कैसे खोजना है, या गुरु हमें कैसे चाहिए, कौन होने चाहिए।
अपने क्षेत्र के किसी योग्य और गुरु रूप में पूजित महापुरुष की साधना
किसी और के अनुभव से प्रेरित होकर 36 अक्षरी मंत्र लेने से पहले क्या करना चाहिए?
भगवती पीतांबरा के 36 अक्षरी मंत्र का जप करने का कारण चाहे कुछ भी हो — किसी के वीडियो को सुनकर बहुत अधिक मोटिवेट हो जाना कि उनके अनुभव से 36 अक्षरी की साधना करने से ऐसा प्रभाव मिला, और वही कष्ट आपके जीवन में है, चाहे कारण विचार का हो या किसी शत्रु का — सर्वप्रथम आपको अपने क्षेत्र के किसी योग्य और गुरु रूप में पूजित महापुरुष की साधना करनी चाहिए।
संक्षेप में वक्ता सभी के समक्ष यह बात रखते हैं: भगवती पीतांबरा के 36 अक्षरी मंत्र का जप आप किसी भी कारण से करना चाहते हों, कारण कुछ भी बना हो। आप किसी के वीडियो को सुनकर बहुत अधिक मोटिवेट हो सकते हैं, चाहते हों कि हां, हमने उनका अनुभव सुना है कि 36 अक्षरी की साधना करने से ऐसा-ऐसा प्रभाव मिला, और वही कष्ट हमारे जीवन में है और हम उससे मुक्त होना चाहते हैं। चाहे विचार का कारण हो, या कोई शत्रु का कारण हो। तो सर्वप्रथम, उससे पहले, आपको अपने क्षेत्र के किसी योग्य और गुरु रूप में पूजित महापुरुष की — सही बोला जाए तो उनकी — साधना करनी चाहिए।
रामकृष्ण परमहंस और मां शारदा; बामा खेपा और "जय गुरु जय तारा"
बंगाल के क्षेत्र से आने वाले व्यक्ति को किस गुरु स्वरूप की पूजा करनी चाहिए?
यदि आप बंगाल के क्षेत्र से हैं, तो परमहंस स्वामी — भगवान रामकृष्ण परमहंस — की साधना कर लीजिए, और उनके साथ मां शारदा, मां शारदामणि और रामकृष्ण परमहंस की। यदि आप बंगाल से आगे के क्षेत्र में, तंत्र क्षेत्र में जाना चाहते हैं और कोई योग्य गुरु नहीं मिल रहे, तो बामा खेपा की पूजा कीजिए; उनका नाम जप ही कीजिए। वहां "जय गुरु जय तारा" हर कोई बोलता है, और उसी मंत्र को लेकर चला जा सकता है — यह जरूरी नहीं कि मंत्र एकदम मुख से ही मिले।
उदाहरण के रूप में वक्ता कहते हैं: यदि आप बंगाल के क्षेत्र से हैं, तो परमहंस स्वामी — भगवान रामकृष्ण परमहंस — की साधना कर लीजिए। मां शारदा की कर लीजिए, उनके साथ में मां शारदामणि और रामकृष्ण परमहंस। यदि आप बंगाल से आगे के क्षेत्र में, तंत्र क्षेत्र में जाना चाहते हैं, और कोई योग्य गुरु अभी नहीं मिल रहे हैं, तो बामा खेपा की पूजा कीजिए। उनका नाम जप ही कीजिए। "जय गुरु जय तारा" — वे कहते हैं कि सभी कोई बोलते हैं; आप बंगाल के क्षेत्र में जाइएगा तो हर कोई "जय गुरु जय तारा" बोलता है। उसी मंत्र को आप लेकर चलिए। यह जरूरी नहीं है कि मंत्र एकदम मुख से ही मिले। उनकी कृपा को लेकर चलिए।
दत्तात्रेय, जो शाक्त, कौल, शैव और वैष्णव सभी मार्गों में स्वीकार्य हैं
शाक्त, कौल, शैव और वैष्णव — हर मार्ग में कौन सा गुरु स्वरूप स्वीकार्य है?
यदि आप इससे भी आगे जाना चाहते हैं, तो वक्ता जिसे सबसे अच्छा बताकर रिकमेंड करेंगे वह है भगवान दत्तात्रेय की साधना — क्योंकि वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों का सम्यक स्वरूप हैं, और चाहे शाक्त हो, कौल हो, शैव हो या वैष्णव, प्रत्येक मार्ग के लोग और साधक भगवान दत्तात्रेय को मानते हैं, तथा प्रत्येक पंथ और संप्रदाय में उनका पूर्ण महत्व है।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप इससे भी आगे जाना चाहते हैं, तो वे जो बोलेंगे — हां, यह वे रिकमेंड करेंगे कि एक तरीके से करना चाहिए — वह यह कि सबसे अच्छा होता है भगवान दत्तात्रेय की साधना। भगवान दत्तात्रेय की साधना इसलिए, क्योंकि वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों का सम्यक स्वरूप हैं। चाहे शाक्त हो, कौल हो, शैव हो, वैष्णव हो, प्रत्येक मार्ग के लोग और प्रत्येक मार्ग के साधक भगवान दत्तात्रेय को मानते हैं, और प्रत्येक पंथ में, संप्रदाय में भगवान दत्तात्रेय का पूर्ण महत्व है। कोई भी स्वरूप हो, भगवान दत्तात्रेय उसमें पूरे तरीके से समन्वित हो जाते हैं; और उनकी कृपा यदि प्राप्त हो जाए तो वास्तव में भौतिक रूप से भी हमें गुरु की प्राप्ति हो जाती है, और आध्यात्मिक मार्ग में भी उन्नति होती है। गुरु मंडल की कृपा आपको प्राप्त हो जाएगी।
परम गुरु और शरणागति, जब प्रारब्ध से गुरु प्राप्त नहीं हुए हैं
क्या भगवान दत्तात्रेय की साधना के लिए भी दीक्षा आवश्यक नहीं है?
वक्ता स्पष्ट कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय की भी साधना करने के लिए दीक्षा की अनिवार्यता है। लेकिन फिर भी वे परम गुरु हैं; और यदि आपको गुरु प्राप्त नहीं हो रहे — हमारा प्रारब्ध ऐसा है कि हमारे जीवन में प्रारब्ध से यह निर्मित ही नहीं हुआ कि गुरु प्राप्त हों — तो कम से कम उनकी शरणागति को स्वीकार करना चाहिए और उनका माला मंत्र लेना चाहिए, जिसके लिए चैनल पर एक वीडियो है।
वक्ता कहते हैं कि या तो आप उनके स्वरूप का आश्रय ग्रहण कर लें, या यदि वह भी नहीं चाहते तो नवनाथ में से किसी एक स्वरूप को ले लें। यदि आप भगवान दत्तात्रेय को लेकर चलते हैं तो उनके माला मंत्र का जप करें। माला मंत्र इसी चैनल पर है। वे जोड़ते हैं कि यह बिना दीक्षा की भगवती पीतांबरा की आरंभिक साधना से पहले की बात बताई जा रही है। हालांकि भगवान दत्तात्रेय की भी साधना करने के लिए दीक्षा की अनिवार्यता है, फिर भी वे परम गुरु हैं; और यदि आपको गुरु प्राप्त नहीं हो रहे — हमारा प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। ऐसा है कि हमारे जीवन में प्रारब्ध से निर्मित ही नहीं हुए कि गुरु प्राप्त हों — तो कम से कम उनकी शरणागति को स्वीकार करना चाहिए। उनका माला मंत्र, और गुरु दत्तात्रेय की प्रारंभिक साधना कैसे करनी है, यह इस चैनल के एक वीडियो में पूरा बताया है, और आप उसे लेकर कर सकते हैं।
सवा लाख, या कम से कम 27000 — प्रत्येक नक्षत्र के लिए एक हजार
दत्तात्रेय के एकाक्षरी मंत्र का कितना जप करना चाहिए?
भगवान दत्तात्रेय का एकाक्षरी मंत्र इत्यादि होता है। वह बीजाक्षर है, लेकिन फिर भी, चूंकि उसमें प्रणव इत्यादि नहीं है, वह कम से कम सही है; आप उसका स्मरण इत्यादि के लिए प्रयोग कर सकते हैं या उनका नाम जप कर सकते हैं। वह आपको सर्वप्रथम कम से कम सवा लाख करना चाहिए; उतना न कर पाएं तो 27000 तो जरूर करना चाहिए — प्रत्येक नक्षत्र के लिए 1000, यानी कम से कम 27000 जप।
वक्ता कहते हैं कि गुरु गोरखनाथ की साधना और नवनाथ की साधना सिद्ध साबरी विद्या चैनल पर बताई है; उस माध्यम से आपको पहले आरंभिक साधना करनी चाहिए। भगवान दत्तात्रेय का एकाक्षरी मंत्र इत्यादि होता है। वह बीजाक्षर है, लेकिन फिर भी, चूंकि उसमें प्रणव इत्यादि नहीं है, वह कम से कम सही है — आप उसका स्मरण इत्यादि के लिए प्रयोग कर सकते हैं, या उनका नाम जप सकते हैं। वह आपको सर्वप्रथम कम से कम सवा लाख करना चाहिए। उतना न कर पाएं तो 27000 तो जरूर करना चाहिए। प्रत्येक नक्षत्र के लिए 1000, यानी कम से कम 27000 जप आपको करना चाहिए।
माला मंत्र का कम से कम 1100 का अनुष्ठान
यदि दत्तात्रेय माला मंत्र लिया जाए तो कम से कम 1100 का अनुष्ठान करना चाहिए।
यदि आप दत्तात्रेय माला मंत्र का करते हैं, तो कम से कम 1100 का अनुष्ठान करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप दत्तात्रेय माला मंत्र का करते हैं, तो कम से कम 1100 का अनुष्ठान करना चाहिए। इतना करने के पश्चात आप भगवती पीतांबरा से संबंधित और क्या कर सकते हैं?
हरिद्रा गणपति तंत्रोक्त है, इसलिए उसके स्थान पर संकट हरण गणेश स्तोत्र
बिना दीक्षा वाले के लिए कौन सी गणपति साधना उपयुक्त है, और हरिद्रा गणपति को क्यों छोड़ा जाता है?
दत्तात्रेय को गुरु स्वरूप में मानने के पश्चात आप भगवान गणपति की साधना करेंगे। वक्ता कहते हैं कि हरिद्रा गणपति की साधना तंत्र की दृष्टि से है, तंत्रोक्त विधि विधान से है — तो वह न करके, सामान्य गणपति पूजन में संकट हरण गणेश स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। उसका कम से कम सात दिन का अनुष्ठान करना चाहिए: सात दिन में 1100 पाठ, प्रतिदिन 108 पाठ; या 11 दिन में 1100 पाठ।
वक्ता कहते हैं कि जब आप भगवान दत्तात्रेय की साधना कर लेंगे और आपकी दीक्षा भी नहीं हुई है, तो गुरु स्वरूप में उनको मानने के पश्चात आप भगवान गणपति की साधना करेंगे। भगवान गणपति के विषय में — हरिद्रा गणपति की साधना अब तंत्र की दृष्टि से है, तंत्रोक्त विधि विधान से है। तो वह न करके, सामान्य गणपति पूजन में भगवान गणेश का जो संकट हरण गणेश स्तोत्र है, उसका पाठ करना चाहिए। उसका कम से कम सात दिन का अनुष्ठान करना चाहिए: सात दिन में 1100 पाठ कीजिए, प्रतिदिन 108 पाठ कीजिए; या 11 दिन में 1100 पाठ कीजिए। इस तरीके से भगवान गणपति की साधना कर लेनी चाहिए।
महाभैरव मंत्र के विधान से भैरव जी की सेवा पूजा
इसके बाद भैरव जी की सेवा पूजा आती है, जो महाभैरव मंत्र के विधान से की जाती है।
अब गुरु हो गए, गणपति हो गए, अब आते हैं भैरव जी। आपको भैरव जी की सेवा पूजा करनी है, और उसके लिए महाभैरव मंत्र का एक विधान चैनल पर दिया हुआ है; उसकी आप साधना कर सकते हैं और जप कर लेंगे।
वक्ता कहते हैं कि अब गुरु हो गए, गणपति हो गए, अब आते हैं भैरव जी। आपको भैरव जी की सेवा पूजा करनी है। भैरव जी की सेवा पूजा करने के लिए महाभैरव मंत्र का एक विधान चैनल पर दिया हुआ है। उसकी आप साधना कर सकते हैं। वह जप कर लेंगे।
स्तोत्र हां; मूल और बीज मंत्र केवल दीक्षा के पश्चात या एक निश्चित समय तक
स्तोत्रों का पाठ किया जा सकता है, पर मूल और बीज मंत्र दीक्षा की या एक निश्चित समय की प्रतीक्षा करते हैं।
ये तीन आरंभिक साधनाएं कर लेने के पश्चात आप भगवती पीतांबरा के किसी भी स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। मूल मंत्र, बीज मंत्र इत्यादि दीक्षित होने के पश्चात ही करना चाहिए, या फिर इन आरंभिक साधनाओं को करने के पश्चात एक निश्चित समय तक ही करना चाहिए। उनमें सवा लाख इत्यादि का अनुष्ठान आपको नहीं करना चाहिए — उसके लिए किसी परंपरा में दीक्षित होना आवश्यक है।
वक्ता कहते हैं कि वह जप कर लेंगे, ये तीन आरंभिक साधनाएं कर लेंगे, उसके पश्चात आप भगवती पीतांबरा के किसी भी स्तोत्र इत्यादि का पाठ कर सकते हैं। मूल मंत्र, बीज मंत्र इत्यादि दीक्षित होने के पश्चात ही करना चाहिए, या फिर इन आरंभिक साधनाओं को करने के पश्चात एक निश्चित समय तक ही करना चाहिए। उनमें सवा लाख इत्यादि का अनुष्ठान आपको नहीं करना चाहिए। उसके लिए कम से कम आपको किसी परंपरा में दीक्षित होना आवश्यक है। इस बात का ध्यान रखेंगे। भगवान दत्तात्रेय की साधना की जो आरंभिक विधियां बताई जा रही हैं, जो कॉमन हैं, आरंभिक चीजें हैं — स्तोत्र इत्यादि — उनका पाठ आप कर सकते हैं। भगवती पीतांबरा के शतनाम, सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। इत्यादि का पाठ आप कीजिए। उसका अनुष्ठान आप उठाकर कीजिए। यदि आप दीक्षित नहीं हैं और बिना दीक्षा के साधना करना चाहते हैं, तो इन तीनों को पहले क्रम से करें: भगवान दत्तात्रेय की साधना, गणपति जी की साधना, और भैरव जी की जो आरंभिक साधना बताई है।
रुद्रयामल का 108 नाम वाला स्तोत्र
बिना दीक्षा वाला गृहस्थ भगवती पीतांबरा का कौन सा पाठ कर सकता है?
उसके पश्चात भगवती पीतांबरा के शतनाम को लेकर चलें — यानी रुद्रयामल के 108 नाम का जो स्तोत्र है। वक्ता कहते हैं कि रुद्रयामल में वर्णित 108 नामावली, 108 नाम का जो स्तोत्र है, परम दिव्यता से युक्त है।
वक्ता कहते हैं कि उसके पश्चात भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। के शतनाम को लेकर चलें — यानी 108 नाम का जो स्तोत्र है, रुद्रयामल का। रुद्रयामल में वर्णित भगवती पीतांबरा की जो 108 नामावली है, 108 नाम का जो स्तोत्र है, वह परम दिव्यता से युक्त है।
शत्रुओं और विचार का विनाश, तथा सभा में आकर्षण
पीतांबरा शतनाम स्तोत्र किन कामनाओं को पूर्ण करने में सक्षम बताया गया है?
भगवती पीतांबरा से आपकी जितनी भी कामनाएं हैं — कि भगवती पीतांबरा मेरे शत्रुओं का सर्वनाश करें, या विचार इत्यादि का पूर्ण रूप से विनाश करें; कि किसी सभा में जाएं तो वहां हमारा आकर्षण बढ़े और लोग हमारी ओर आकर्षित हों — इन सभी चीजों को संपन्न करने में सक्षम स्तोत्र, वे कहते हैं, रुद्रयामल का भगवती पीतांबरा का शतनाम स्तोत्र है। इसलिए उसका अनुष्ठान आपको करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। से लेकर आपकी जितनी भी कामनाएं हैं — कि भगवती पीतांबरा मेरे शत्रुओं का सर्वनाश करें, या विचार इत्यादि का पूर्ण रूप से विनाश करें। कि किसी सभा में जाएं तो वहां पर हमारा आकर्षण बढ़े, लोग हमारी ओर आकर्षित हों। इन सभी चीजों को एक तरीके से संपन्न करने में सक्षम जो स्तोत्र है, वह रुद्रयामल का भगवती पीतांबरा का स्तोत्र, शतनाम स्तोत्र है। तो उसका अनुष्ठान आप करें। और बिना दीक्षा के उसका अनुष्ठान आप कैसे करेंगे? बिना दीक्षा के बिल्कुल आप पाठ कर सकते हैं।
एक-एक दिन — गुरुवार को दत्तात्रेय, शुक्रवार को गणपति, शनिवार को भैरव
यदि तीनों आरंभिक साधनाओं के लिए समय न हो, तो गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार को एक-एक दिन।
यदि आप कहते हैं कि नहीं, भगवान दत्तात्रेय की साधना नहीं करनी है, उतना समय नहीं है, गणपति जी की भी नहीं करनी, भैरव जी की भी नहीं — तो कम से कम एक-एक दिन की साधना भी कर लें: गुरुवार के दिन भगवान दत्तात्रेय की, शुक्रवार के दिन गणपति जी की, शनिवार के दिन भैरव बाबा की। कम से कम लगातार तीन दिन में एक-एक दिन की साधना कर लें। वे कहते हैं कि इनकी कृपा अति आवश्यक है — और आपके कुल के देवी देवता की जो आवश्यकता होगी, वह सब तो आपको करना ही चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप चाहते हैं कि नहीं, हमें भगवान दत्तात्रेय की साधना नहीं करनी है, उतना समय नहीं है हमारे पास, गणपति जी की नहीं करनी है, भैरव जी की नहीं करनी है — तो कम से कम एक-एक दिन की साधना भी कर लें। एक दिन, गुरुवार के दिन भगवान दत्तात्रेय की कर लें। शुक्रवार के दिन गणपति जी की कर लें, शनिवार के दिन भैरव बाबा की कर लें। कम से कम लगातार तीन दिन में एक-एक दिन की भी साधना कर लें। इनकी कृपा अति आवश्यक है। और आपके कुल के देवी देवता की आपको जो आवश्यकता होगी, वह सब तो आपको करना ही चाहिए।
मंगलवार, गुरुवार या शनिवार से 3600 पाठ — 36 दिन या 11 दिन
शतनाम स्तोत्र के लिए कौन सा संकल्प और कितनी संख्या बताई गई है?
उसके पश्चात किसी भी मंगलवार से, गुरुवार से अथवा शनिवार से 3600 पाठ का संकल्प लीजिए। या तो 36 दिन का लीजिए, या यदि आप उतना नहीं करना चाहते तो 11 दिन का संकल्प लीजिए। प्रतिदिन 100 पाठ करने का संकल्प लेकर भगवती पीतांबरा के रुद्रयामल में वर्णित शतस्तोत्र नाम स्तोत्र का पाठ आपको प्रतिदिन करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि उसके पश्चात किसी भी मंगलवार से, गुरुवार से, अथवा शनिवार से 3600 पाठ का संकल्प लीजिए। या तो 36 दिन का लीजिए; या यदि आप उतना नहीं करना चाहते हैं तो 11 दिन का संकल्प लीजिए। प्रतिदिन 100 पाठ करने का संकल्प लेकर भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। के रुद्रयामल में वर्णित शतस्तोत्र नाम स्तोत्र का पाठ आपको प्रतिदिन करना चाहिए।
शत्रु और कृत्या विनाश के लिए रात्रि; लक्ष्मी और ऋण मुक्ति के लिए भोर या संध्या
पीतांबरा शतनाम स्तोत्र का पाठ किस समय करना चाहिए?
रुद्रयामल तंत्र से वर्णित के अनुसार आप इसे रात्रि काल में करेंगे। जब भी लक्ष्मी संबंधित प्रयोग किया जाता है, वह सुबह-शाम ही करना चाहिए। यदि रात्रि काल में करना है, तो वह शत्रु विनाश के लिए, तंत्र और विचार घात के विनाश के लिए, तथा परकृत्या प्रयोग के नाश के लिए करना चाहिए। लक्ष्मी प्राप्ति और ऋण मुक्ति हेतु शाम के समय या सुबह भोर के समय करना अति उत्तम होता है; रात को आप कर सकते हैं, लेकिन सुबह या संध्या का समय अति उत्तम है।
वक्ता पूछते हैं कि पाठ कब करना चाहिए? रुद्रयामल तंत्र से वर्णित के अनुसार आप इसे रात्रि काल में करेंगे। जब भी लक्ष्मी संबंधित प्रयोग किया जाता है, वह सुबह और शाम ही करना चाहिए। यदि आपको रात्रि में करना है, तो वह शत्रु विनाश के लिए, तंत्र और विचार घात के विनाश के लिए, तथा परकृत्या (कृत्या) प्रयोग के नाश के लिए — तभी रात्रि काल में करना चाहिए। लक्ष्मी प्राप्ति के लिए और ऋण मुक्ति हेतु हमें शाम के समय में या सुबह भोर के समय में करना अति उत्तम होता है। रात को आप कर सकते हैं, लेकिन सुबह के समय या संध्या के समय में करना अति उत्तम होता है। इस तरीके से बिना दीक्षा के आप इतना करें।
वर्षों तक 36, 21, 11 या 7 दिन के संकल्प बार-बार दोहराना
जिसकी श्रद्धा केवल पीतांबरा में बसी है, उसे लंबे समय तक क्या करना चाहिए?
यदि आपकी श्रद्धा सिर्फ पीतांबरा में बसी हुई है, आपका प्राण पीतांबरा के चरणों में बसता है और दीक्षा भी प्राप्त नहीं हुई है, तो केवल इसको अपने जीवन में उतार दीजिए। शतस्तोत्र का विधि विधान अपने भीतर उतार लीजिए और प्रतिदिन 100 पाठ करते चलें। 36-36 दिन का संकल्प लीजिए, कुछ दिन आराम कीजिए, फिर कीजिए; 36 दिन का नहीं तो 21 दिन का, 21 का नहीं तो 11 का, 11 का नहीं तो सात दिन का — सात दिन की साधना, दो-तीन दिन रुकें, फिर सात दिन। 1100 का संकल्प लेकर करते रहिए।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप रुद्रयामल में वर्णित शतस्तोत्र नाम स्तोत्र को लेकर ही आगे चलते हैं — यदि आपकी श्रद्धा सिर्फ पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। में बसी हुई है, आपका प्राण पीतांबरा के चरणों में बसता है और दीक्षा भी प्राप्त नहीं हुई है — तो केवल इसको अपने जीवन में उतार दीजिए। शतस्तोत्र का जो विधि विधान है, उसको अपने भीतर उतार लीजिए। प्रतिदिन 100 पाठ करते चलें। 36-36 दिन का संकल्प लीजिए; कुछ दिन आराम कीजिए; फिर कीजिए। 36 दिन का नहीं तो 21 दिन का, 21 का नहीं तो 11 का, 11 का नहीं तो सात दिन का। सात दिन की साधना, दो-तीन दिन रुकें, फिर सात दिन कीजिए, फिर दो-तीन दिन रुकें। बार-बार, बार-बार करते जा रहे हैं, करते जा रहे हैं। 1100 का संकल्प लेकर करते रहिए। वे कहते हैं कि साल, दो साल, तीन साल होते-होते आप विश्वास नहीं करेंगे कि भगवती की ऐसी कृपा आपको प्राप्त होगी, और ऐसे योग्य, समृद्ध और सामर्थ्य गुरु आपको प्राप्त होंगे जो आपको कहां से कहां लेकर चले जाएंगे।
स्वयं में योग्यता; और यंत्र, विग्रह तथा किसे साधना नहीं करनी है, इन पर अलग वीडियो
जब हमारे भीतर योग्यता आती है, तब सिद्ध और योग्य गुरु प्राप्त होते हैं और वे हमें दूर तक ले जाते हैं।
वे कहते हैं कि जब हमारे भीतर योग्यता आएगी, तब वैसे दिव्य पुरुष हमें प्राप्त होंगे — वैसे दिव्य, योग्य, सिद्ध गुरु हमें प्राप्त होंगे, और वे फिर हमें काफी दूर तक ले जाएंगे। तो इसलिए बिना दीक्षा के बगलामुखी साधना इस प्रकार से करनी चाहिए; यदि दीक्षित नहीं हैं तो भी कोई बात नहीं है, और इन विधि विधानों का पालन करते हुए आगे चलना चाहिए। बाकी जो विषय हैं — यंत्र रखना है कि नहीं, विग्रह रखना है कि नहीं, किसे साधना नहीं करनी है, परेशानी कैसे बढ़ने लगती है — उनके लिए इसी चैनल पर अलग-अलग वीडियो हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब हमारे भीतर योग्यता आएगी, तब वैसे दिव्य पुरुष हमें प्राप्त होंगे; वैसे दिव्य, योग्य, सिद्ध गुरु हमें प्राप्त होंगे। और वे फिर हमें काफी दूर तक ले जाएंगे। तो इसलिए बिना दीक्षा के बगलामुखी साधना इस प्रकार से करनी चाहिए। यदि दीक्षित नहीं हैं तो भी कोई बात नहीं है। इन विधि विधानों का पालन करते हुए आगे चलना चाहिए। बाकी अन्य जो विषय हैं — यंत्र रखना है कि नहीं, विग्रह रखना है कि नहीं, किसे साधना नहीं करनी है, परेशानी कैसे बढ़ने लगती है — इन सभी विषयों के लिए इसी चैनल पर भगवती पीतांबरा से संबंधित अलग-अलग वीडियो हैं, और वे श्रोताओं से उन्हें सुनने का आग्रह करते हैं ताकि उनका विषय और अधिक स्पष्ट हो जाए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।