बिना दीक्षा के बगलामुखी साधना — तीन आरंभिक साधनाएं और रुद्रयामल का 108 नाम स्तोत्र
बिना दीक्षा के भगवती पीतांबरा की साधना करने पर।
15 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
बिना दीक्षा के पीतांबरा का मंत्र जपने से पहले किन बातों की जानकारी चाहिए
दक्षता, सही उच्चारण, मकार या गकार, और क्रम
वक्ता कहते हैं कि दीक्षा से दक्षता आती है, और वह दक्षता क्रियात्मक चीजों में आती है। इसलिए जो कोई बिना दीक्षा के भगवती पीताम्बरा के किसी भी मंत्र का जप करता है, उसे सर्वप्रथम उस मंत्र का उच्चारण सही आना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि पीतांबरा का एक एकाक्षरी मंत्र भी एक अलग प्रश्न खड़ा करता है: उसे मकार रूप से जपना है या गकार रूप से, वह उस व्यक्ति के लिए कितना उचित है, और वह किस क्रम में जाना चाहता है। ये बातें, वे कहते हैं, जाननी ही पड़ती हैं।
वक्ता कहते हैं कि दीक्षा से दक्षता आती है, और पूछते हैं कि दक्षता किस विषय पर आती है। वे कहते हैं, जो क्रियात्मक चीजें हैं, उनमें दक्षता आती है। इससे प्रश्न यह हो जाता है: अगर कोई व्यक्ति बिना दीक्षा के भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। के किसी भी मंत्र का जप करता है, तो उस मंत्र का उच्चारण उसे सर्वप्रथम सही आना चाहिए। वे श्रोताओं से एक और भेद जानने को कहते हैं। अगर कोई भगवती पीतांबरा का एक अक्षर भी, एकाक्षरी मंत्र भी करता है, तो उस एकाक्षरी मंत्र को मकार रूप से जपना है या गकार रूप से, और वह उसके लिए कितना उचित है या नहीं, यह विषय बिल्कुल अलग हो जाता है। सामान्य रूप से किस रूप में, मकार में या ककार में, जप करना चाहिए? और वह व्यक्ति किस क्रम में जाना चाहता है? यह भी, वे कहते हैं, जानना आवश्यक हो जाता है। इन विषयों की जानकारी होनी चाहिए।
केवल मंत्र पाने के लिए मांगी जाने वाली दीक्षा
दीक्षा न मिलने पर भी दिक्कत, गुरु के रोकने पर भी
वक्ता कहते हैं कि आज के समय में लोग दीक्षा मुख्यतः इसलिए चाहते हैं कि मंत्र मिल जाए, उसे सिद्ध कर लें और अपने अनुसार प्रयोग करें; दीक्षा इतने तक ही सीमित हो गई है। वे बताते हैं कि दिक्कत दोनों ओर होती है: जब मन के अनुसार दीक्षा नहीं मिलती तब भी, और जब योग-सामर्थ्य वाले गुरु दीक्षा देकर ऐसी रोक लगा दें जो अपने मन के अनुसार न हो तब भी। वे स्पष्ट करते हैं कि उनका आशय समर्थ गुरु से है, उन लोगों से नहीं जिन्हें जानकारी नहीं और जो कुछ भी बोलते रहते हैं।
वक्ता दूसरी बात उठाते हैं: लोग दीक्षा क्यों लेना चाहते हैं? वे कहते हैं कि यह विषय उन्होंने अपने एक लाइव सेशन में स्पष्ट किया है, उसका लिंक देंगे, और जो लोग दीक्षा पाना चाहते हैं उनसे उसे एक बार सुनने को कहते हैं। आज के समय में, वे कहते हैं, दीक्षा का एक सबसे मुख्य कारण यह हो गया है कि दीक्षा इसलिए चाहिए कि मंत्र मिल जाए। और मंत्र मिलने के बाद उसे सिद्ध कर लें और अपने अनुसार उसका प्रयोग करें। दीक्षा इतने तक ही सीमित हो जाती है। वे जोड़ते हैं कि जब मन के अनुसार दीक्षा नहीं मिलती तब भी दिक्कत है। और मान लीजिए दीक्षा मिल जाए और गुरु रोक लगा दें। वे स्पष्ट करते हैं कि उनका आशय योग-सामर्थ्य वाले गुरु से है, उनसे नहीं जिन्हें जानकारी नहीं है और जो कुछ भी बोलते हैं। योग-सामर्थ्य वाले गुरु जब कोई बात बताएं और वह अपने मन के अनुसार न हो, तब भी दिक्कतें होने लगती हैं।
जब दीक्षा न मिल रही हो तो गुरु-स्वरूप की पूजा
दीक्षा देने वाले गुरु के अभाव में पहला कदम
बिना दीक्षा के क्या-क्या किया जा सकता है, विशेषकर भगवती पीताम्बरा की साधना में, इस पर वक्ता कहते हैं कि सबसे पहली बात यह है: अगर कोई दीक्षा नहीं लेना चाहता, या उसकी दीक्षा नहीं हो रही, या किसी भी कारण से नहीं मिल रही, तो उसे सर्वप्रथम गुरु-स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। गुरु-स्वरूप का अर्थ समझाने के लिए वे अपने पहले के वीडियो "आओ मित्र लालटेन लेकर गुरु खोजते हैं" की ओर संकेत करते हैं, जिससे उनके अनुसार यह स्पष्ट हो जाता है कि गुरु कैसे खोजना है और गुरु के रूप में किसे चाहना चाहिए।
वक्ता पूछते हैं: बिना दीक्षा के हम किन-किन चीजों को कर सकते हैं, विशेषकर भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। की साधना को? सबसे पहली चीज, वे कहते हैं, यह देखनी चाहिए: अगर कोई दीक्षा नहीं लेना चाहता, या उसकी दीक्षा नहीं हो रही, या किसी भी कारणवश दीक्षा नहीं मिल रही, तो सर्वप्रथम उसे गुरु-स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। गुरु-स्वरूप से उनका आशय वही है जो उन्होंने पहले के वीडियो में बताया, और वे श्रोताओं से उस वीडियो को एक बार सुनने को कहते हैं जिसका शीर्षक था "आओ मित्र लालटेन लेकर गुरु खोजते हैं"। बहुत अच्छा विषय है, वे कहते हैं; एक बार सुनने पर उद्देश्य स्पष्ट हो जाएगा कि गुरु कैसे खोजना है, हमें कैसा गुरु चाहिए, और कौन होने चाहिए।
36 अक्षरी से पहले अपने क्षेत्र के गुरु-रूप में पूजित महापुरुष की साधना
रामकृष्ण, मां शारदा, बामा खेपा और "जय गुरु जय तारा"
वक्ता कहते हैं कि किसी भी कारण से कोई भगवती पीताम्बरा के 36 अक्षरी मंत्र का जप करना चाहे, चाहे किसी के वीडियो से प्रेरित होकर जिसमें शत्रु या विचार के कष्ट पर उसका प्रभाव सुना हो और वही कष्ट अपने जीवन में भी हो, उसे सबसे पहले अपने क्षेत्र के किसी योग्य और गुरु रूप में पूजित महापुरुष की साधना करनी चाहिए। बंगाल के लिए वे रामकृष्ण परमहंस और मां शारदा का नाम लेते हैं; योग्य गुरु के बिना तंत्र क्षेत्र में आगे जाने के लिए बामा खेपा का, जिनका नाम-जप ही पर्याप्त है। वे कहते हैं कि "जय गुरु जय तारा", जो बंगाल में हर कोई बोलता है, उसी को मंत्र के रूप में लेकर चला जा सकता है; जरूरी नहीं कि मंत्र मुख से ही मिले, उनकी कृपा को लेकर चलना है।
वक्ता संक्षेप में कहते हैं: कोई किसी भी कारण से भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। के 36 अक्षरी मंत्र का जप करना चाह सकता है। हो सकता है वह किसी के वीडियो को सुनकर बहुत प्रेरित हो, उसका अनुभव सुना हो कि 36 अक्षरी की साधना से ऐसा-ऐसा प्रभाव मिला, और वही कष्ट उसके अपने जीवन में हो और वह उससे मुक्त होना चाहता हो, चाहे कारण विचार हो या कोई शत्रु। तो सर्वप्रथम, उससे पहले, वे कहते हैं, उसे अपने क्षेत्र के किसी योग्य और गुरु रूप में पूजित महापुरुष की साधना करनी चाहिए। जैसे अगर कोई बंगाल के क्षेत्र से है तो भगवान रामकृष्ण परमहंस की साधना कर ले; मां शारदा की कर ले, मां शारदामणि और रामकृष्ण परमहंस दोनों की साथ में। अगर बंगाल से आगे तंत्र क्षेत्र में जाना चाहता है और अभी कोई योग्य गुरु नहीं मिल रहे, तो बामा खेपा की पूजा करे। उनका नाम-जप ही कर ले। "जय गुरु जय तारा": सभी बोलते हैं, वे कहते हैं; बंगाल के क्षेत्र में जाइए तो हर कोई यही बोलता है। उसी मंत्र को लेकर चलिए। जरूरी नहीं कि मंत्र एकदम मुख से ही मिले। उनकी कृपा को लेकर चलिए।
सभी मार्गों में मान्य गुरु-स्वरूप के रूप में दत्तात्रेय
ब्रह्मा, विष्णु, महेश का सम्यक स्वरूप; अथवा नवनाथों में से एक
जो और आगे जाना चाहे, उसके लिए वक्ता कहते हैं कि वे सबसे अच्छा यही रिकमेंड करेंगे कि भगवान दत्तात्रेय की साधना करे, क्योंकि वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों के सम्यक स्वरूप हैं; शाक्त, कौल संप्रदाय, शैव, वैष्णव, प्रत्येक मार्ग के साधक उन्हें मानते हैं, और प्रत्येक पंथ और संप्रदाय में उनका पूर्ण महत्व है। कोई भी स्वरूप हो, दत्तात्रेय उसमें समन्वित हो जाते हैं, और उनकी कृपा मिले तो भौतिक रूप से भी गुरु मिल जाते हैं, आध्यात्मिक मार्ग में उन्नति होती है, और गुरु मंडल की कृपा प्राप्त होती है। या तो उनके स्वरूप का आश्रय लें, या वह भी न चाहें तो नवनाथ में से किसी एक स्वरूप को ले लें।
अगर कोई क्षेत्रीय गुरु-स्वरूप से भी आगे जाना चाहे, तो वक्ता कहते हैं कि वे एक तरीके से यही रिकमेंड करेंगे कि करना चाहिए, और सबसे अच्छा होता है भगवान दत्तात्रेय की साधना। कारण: वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों के सम्यक स्वरूप हैं। चाहे कोई शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। हो, कौल संप्रदाय हो, शैव हो, वैष्णव हो, प्रत्येक मार्ग के लोग और प्रत्येक मार्ग के साधक भगवान दत्तात्रेय को मानते हैं, और प्रत्येक पंथ और संप्रदाय में उनका पूर्ण महत्व है। कोई भी स्वरूप हो, भगवान दत्तात्रेय उसमें पूरे तरीके से समन्वित हो जाते हैं। और उनकी कृपा अगर प्राप्त हो जाए तो वास्तव में भौतिक रूप से भी गुरु की प्राप्ति हो जाती है, और आध्यात्मिक मार्ग में भी उन्नति होती है। गुरु मंडल की कृपा, वे कहते हैं, प्राप्त हो जाएगी। तो या तो उनके स्वरूप का आश्रय ग्रहण कर लें, या वह भी न चाहें तो नवनाथ में से किसी एक स्वरूप को ले लें।
दत्तात्रेय की साधना में भी दीक्षा की अनिवार्यता, पर उनकी शरणागति खुली है
जब प्रारब्ध से गुरु नहीं मिले, तब परम गुरु
वक्ता कहते हैं कि जो भगवान दत्तात्रेय को लेकर चले, वह उनके माला मंत्र का जप करे, जो उनके चैनल पर है; यह बिना दीक्षा के भगवती पीताम्बरा की आरंभिक साधना से पहले की बात है। वे मानते हैं कि दत्तात्रेय की साधना के लिए भी दीक्षा की अनिवार्यता है, पर कहते हैं कि वे परम गुरु हैं: अगर प्रारब्ध से अभी गुरु निर्मित ही नहीं हुए और गुरु नहीं मिल रहे, तो कम से कम उनकी शरणागति स्वीकार करनी चाहिए। गुरु दत्तात्रेय की प्रारंभिक साधना कैसे करनी है, यह उनके चैनल के एक वीडियो में पूरा बताया गया है; गुरु गोरखनाथ और नवनाथ की साधना उनके सिद्ध साबर विद्या चैनल पर है, और इनमें से किसी माध्यम से पहले आरंभिक साधना करनी चाहिए।
अगर कोई भगवान दत्तात्रेय को लेकर चलता है, वक्ता कहते हैं, तो उनके माला मंत्र का जप करे। माला मंत्र इसी चैनल पर है। वे बताते हैं कि यह बिना दीक्षा के भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। की आरंभिक साधना से पहले की बात है। वे स्वीकार करते हैं कि भगवान दत्तात्रेय की साधना करने के लिए भी दीक्षा की अनिवार्यता है। फिर भी, वे कहते हैं, दत्तात्रेय परम गुरु हैं। अगर गुरु नहीं मिल रहे, हमारा प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। ऐसा है कि हमारे जीवन में प्रारब्ध से अभी निर्मित ही नहीं हुआ कि गुरु प्राप्त हो, तो कम से कम उनकी शरणागति स्वीकार करनी चाहिए। गुरु दत्तात्रेय की प्रारंभिक साधना कैसे करनी है, यह उनके चैनल के एक वीडियो में पूरा बताया गया है, उसे लेकर किया जा सकता है। गुरु गोरखनाथ और नवनाथ की साधना उन्होंने अपने दूसरे चैनल सिद्ध साबर विद्या पर बताई है। इनमें से किसी माध्यम से, वे कहते हैं, पहले आरंभिक साधना करनी चाहिए।
आरंभिक दत्तात्रेय साधना के जप की संख्या
एकाक्षरी का सवा लाख या 27000; माला मंत्र का 1100
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय का एक एकाक्षरी मंत्र होता है; वह बीजाक्षर है, पर उसमें प्रणव नहीं है इसलिए कम से कम वह सही है, और उसका स्मरण या उनके नाम का जप किया जा सकता है। उसका सर्वप्रथम कम से कम सवा लाख करना चाहिए; उतना न हो पाए तो 27000 तो जरूर, प्रत्येक नक्षत्र के लिए एक हजार। अगर दत्तात्रेय माला मंत्र करते हैं तो कम से कम 1100 का अनुष्ठान करना चाहिए।
भगवान दत्तात्रेय का एकाक्षरी मंत्र इत्यादि होता है, वक्ता कहते हैं। वह बीजाक्षर है, लेकिन फिर भी, उसमें प्रणव इत्यादि नहीं है इसलिए कम से कम वह सही है; उसका स्मरण इत्यादि के लिए प्रयोग किया जा सकता है, या उनके नाम का जप किया जा सकता है। उसका सर्वप्रथम कम से कम सवा लाखसवा लाख की संख्या, जिसमें अनेक मंत्रों का पुरश्चरण गिना जाता है। करना चाहिए। उतना न कर पाएं तो 27000 तो जरूर करना चाहिए: प्रत्येक नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। के लिए एक हजार, यानी कम से कम 27000 जप। अगर दत्तात्रेय माला मंत्र का करते हैं तो कम से कम 1100 का अनुष्ठान करना चाहिए। इतना करने के पश्चात, वे कहते हैं, यह देखा जाता है कि भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। से संबंधित और क्या किया जा सकता है।
अदीक्षित के लिए गणपति साधना: हरिद्रा गणपति के स्थान पर संकट हरण स्तोत्र
सात या ग्यारह दिन में 1100 पाठ
वक्ता कहते हैं कि दत्तात्रेय की साधना के बाद, जिसकी दीक्षा नहीं हुई और जिसने उन्हें गुरु-स्वरूप में मान लिया, वह अगली साधना भगवान गणेश की करता है। हरिद्रा गणपति की साधना तंत्र की दृष्टि से, तंत्रोक्त विधि-विधान से है, इसलिए वह नहीं की जाती; उसके स्थान पर सामान्य गणपति पूजन में संकट हरण गणेश स्तोत्र का पाठ किया जाता है। उसका अनुष्ठान कम से कम सात दिन का होना चाहिए: सात दिन में 1100 पाठ, प्रतिदिन 108 पाठ, या ग्यारह दिन में 1100 पाठ।
जब भगवान दत्तात्रेय की साधना कर ली और दीक्षा भी नहीं हुई है, तो उन्हें गुरु-स्वरूप में मानने के पश्चात, वक्ता कहते हैं, भगवान गणेश की साधना की जाती है। हरिद्रा गणपति की साधना अब तंत्र की दृष्टि से है, तंत्रोक्त विधि-विधान से है। तो वह न करके सामान्य गणपति पूजन में भगवान गणेश के संकट हरण गणेश स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। उसका कम से कम सात दिन का अनुष्ठान करना चाहिए: सात दिन में 1100 पाठ, प्रतिदिन 108 पाठ; या ग्यारह दिन में 1100 पाठ। इस तरीके से, वे कहते हैं, भगवान गणपति की साधना कर लेनी चाहिए।
महाभैरव मंत्र के विधान से भैरव जी की सेवा-पूजा
तीन आरंभिक साधनाओं में तीसरी
गुरु और गणपति के बाद, वक्ता कहते हैं, आते हैं भैरव जी: भैरव जी की सेवा-पूजा करनी है। इसके लिए महाभैरव मंत्र का एक विधान उनके चैनल पर दिया हुआ है; उसकी साधना की जा सकती है और उसका जप कर लिया जाता है। इसके साथ तीन आरंभिक साधनाएं पूरी हो जाती हैं।
अदीक्षित व्यक्ति पीतांबरा का क्या कर सकता है: स्तोत्र हां, मूल और बीज मंत्र प्रतीक्षा में
परंपरा में दीक्षित हुए बिना सवा लाख का अनुष्ठान नहीं
वक्ता कहते हैं कि तीन आरंभिक साधनाएं हो जाने पर भगवती पीताम्बरा के स्तोत्र इत्यादि का पाठ किया जा सकता है। मूल मंत्र, बीज मंत्र इत्यादि दीक्षित होने के बाद ही करने चाहिए, या फिर इन आरंभिक साधनाओं के बाद केवल एक निश्चित समय तक; उनका सवा लाख अनुष्ठान नहीं करना, क्योंकि उसके लिए किसी परंपरा में दीक्षित होना आवश्यक है। जो कॉमन आरंभिक चीजें हैं, स्तोत्र, उनका पाठ किया जा सकता है: पीतांबरा के शतनाम, सहस्रनाम इत्यादि, अनुष्ठान उठाकर। बिना दीक्षा के, वे कहते हैं, पहले क्रम से दत्तात्रेय, गणपति जी और भैरव जी की साधना करें, और उसके बाद रुद्रयामल का 108 नाम का स्तोत्र लेकर चलें।
जब तीन आरंभिक साधनाएं हो जाएं, वक्ता कहते हैं, तब भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। के किसी स्तोत्र इत्यादि का पाठ किया जा सकता है। मूल मंत्र, बीज मंत्र इत्यादि दीक्षित होने के पश्चात ही करने चाहिए; या फिर इन आरंभिक साधनाओं को करने के पश्चात एक निश्चित समय तक ही। उनमें सवा लाखसवा लाख की संख्या, जिसमें अनेक मंत्रों का पुरश्चरण गिना जाता है। इत्यादि का अनुष्ठान नहीं करना। उसके लिए कम से कम किसी परंपरा में दीक्षित होना आवश्यक है। इस बात का, वे कहते हैं, ध्यान रखना है। जो आरंभिक विधियां बताई जा रही हैं, जो कॉमन और आरंभिक चीजें हैं, स्तोत्र इत्यादि, उनका पाठ किया जा सकता है। भगवती पीतांबरा के शतनाम, सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। इत्यादि का पाठ कीजिए; उसका अनुष्ठान उठाकर कीजिए। अगर दीक्षित नहीं हैं और बिना दीक्षा के साधना करना चाहते हैं, तो पहले क्रम से इन तीनों को करें: भगवान दत्तात्रेय की साधना, गणपति जी की साधना, और भैरव जी की बताई गई आरंभिक साधना। उसके पश्चात भगवती पीतांबरा के शतनाम, रुद्रयामल के 108 नाम के स्तोत्र को लेकर आगे चलें।
रुद्रयामल का भगवती पीतांबरा का 108 नाम का स्तोत्र
शत्रु और विचार का विनाश, सभा में आकर्षण; बिना दीक्षा के भी
वक्ता कहते हैं कि रुद्रयामल में वर्णित भगवती पीताम्बरा का 108 नाम का स्तोत्र परम दिव्यता से युक्त है। पीतांबरा से जितनी भी कामनाएं हों, कि वे शत्रुओं का सर्वनाश करें, विचार इत्यादि का पूर्ण विनाश करें, या किसी सभा में जाने पर आकर्षण बढ़े और लोग अपनी ओर आकर्षित हों, यह शतनाम स्तोत्र एक तरीके से इन सबको संपन्न करने में सक्षम है। इसलिए उसका अनुष्ठान करना चाहिए; और बिना दीक्षा के, वे कहते हैं, उसका पाठ बिल्कुल किया जा सकता है।
रुद्रयामल में वर्णित भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। की जो 108 नामावली है, 108 नाम का जो स्तोत्र है, वह परम दिव्यता से युक्त है, वक्ता कहते हैं। भगवती पीतांबरा से जितनी भी कामनाएं हों: कि वे शत्रुओं का सर्वनाश करें, या विचार इत्यादि का पूर्ण रूप से विनाश करें; या किसी सभा में जाएं तो वहां आकर्षण बढ़े, लोग अपनी ओर आकर्षित हों। इन सभी चीजों को एक तरीके से संपन्न करने में सक्षम जो स्तोत्र है, वह रुद्रयामल का भगवती पीतांबरा का शतनाम स्तोत्र है। तो उसका अनुष्ठान करना चाहिए। और बिना दीक्षा के उसका अनुष्ठान कैसे होगा? बिना दीक्षा के, वे कहते हैं, उसका पाठ बिल्कुल किया जा सकता है।
तीनों साधनाओं का समय न हो तो दत्तात्रेय, गणपति और भैरव की एक-एक दिन की साधना
गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार; और कुल के देवी-देवता
जिसके पास दत्तात्रेय, गणेश जी और भैरव जी की पूरी साधना का समय न हो, उसके लिए वक्ता कहते हैं कि कम से कम हर एक की एक-एक दिन की साधना कर लें: गुरुवार को भगवान दत्तात्रेय की, शुक्रवार को गणपति जी की, शनिवार को भैरव बाबा की, लगातार तीन दिन में एक-एक दिन। इनकी कृपा, वे कहते हैं, अति आवश्यक है। और कुल के देवी-देवता जो भी अपेक्षा रखें, वह सब तो करना ही चाहिए।
अगर कोई कहे कि भगवान दत्तात्रेय की साधना नहीं करनी, उतना समय नहीं है, गणेश जी की नहीं करनी, भैरव जी की नहीं करनी, तो, वक्ता कहते हैं, कम से कम एक-एक दिन की साधना कर लें। एक दिन, गुरुवार के दिन, भगवान दत्तात्रेय की कर लें। शुक्रवार के दिन गणपति जी की; शनिवार के दिन भैरव बाबा की। कम से कम लगातार तीन दिन में एक-एक दिन की भी साधना कर लें। इनकी कृपा, वे कहते हैं, अति आवश्यक है। और कुल के देवी-देवता की अपनी अपेक्षा होगी; वह सब तो करना ही चाहिए।
पीतांबरा शतनाम स्तोत्र के 3600 पाठ का संकल्प
मंगलवार, गुरुवार या शनिवार से; 36 दिन या 11 दिन
आरंभिक साधनाओं के बाद, वक्ता कहते हैं, किसी भी मंगलवार, गुरुवार या शनिवार से भगवती पीताम्बरा के रुद्रयामल शतनाम स्तोत्र के 3600 पाठ का संकल्प लें। या तो 36 दिन का लें, या उतना न करना चाहें तो 11 दिन का संकल्प लें। प्रतिदिन 100 पाठ करने के संकल्प के साथ स्तोत्र का पाठ हर दिन करना चाहिए।
आरंभिक साधनाओं के पश्चात, वक्ता कहते हैं, किसी भी मंगलवार से, गुरुवार से या शनिवार से 3600 पाठ का संकल्प लीजिए। या तो 36 दिन का लीजिए; या उतना नहीं करना चाहते तो 11 दिन का संकल्प लीजिए। प्रतिदिन 100 पाठ करने का संकल्प लेकर रुद्रयामल में वर्णित भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। के शतनाम स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करना चाहिए।
उद्देश्य के अनुसार पीतांबरा शतनाम स्तोत्र के पाठ का समय
शत्रु और कृत्या के लिए रात्रि; लक्ष्मी और ऋण के लिए भोर या संध्या
भगवती पीताम्बरा के शतनाम स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए, इस पर वक्ता कहते हैं कि रुद्रयामल तंत्र में वर्णित के अनुसार यह रात्रि काल में किया जाता है। लेकिन लक्ष्मी से संबंधित कोई भी प्रयोग सुबह-शाम ही किया जाता है। रात्रि शत्रु विनाश, तंत्र और विचार-घात के विनाश, और पर-कृत्या प्रयोग के नाश के लिए है। लक्ष्मी प्राप्ति और ऋण मुक्ति के लिए शाम या सुबह भोर का समय अति उत्तम है; रात को कर सकते हैं, पर सुबह या संध्या के समय करना कहीं बेहतर है।
पाठ कब करना चाहिए? वक्ता कहते हैं कि रुद्रयामल तंत्र में वर्णित के अनुसार यह रात्रि काल में किया जाता है। लेकिन लक्ष्मी से संबंधित जो भी प्रयोग किया जाता है, वह सुबह-शाम ही करना चाहिए। अगर रात्रि में करना है, तो शत्रु विनाश के लिए, तंत्र और विचार-घात के विनाश के लिए, और पर-कृत्या प्रयोग के नाश के लिए रात्रि काल में करना चाहिए। लक्ष्मी प्राप्ति और ऋण मुक्ति के लिए, वे कहते हैं, शाम के समय या सुबह भोर के समय करना अति उत्तम होता है। रात को कर सकते हैं, लेकिन सुबह के समय या संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। के समय करना अति उत्तम है। इस तरीके से, बिना दीक्षा के, वे कहते हैं, इतना करना चाहिए।
वर्षों तक पीतांबरा शतनाम स्तोत्र के संकल्प दोहराना
एक बार में 36, 21, 11 या 7 दिन; योग्यता से सिद्ध गुरु मिलते हैं
जिसकी श्रद्धा केवल पीताम्बरा में बसी हो और दीक्षा न मिली हो, उसके लिए वक्ता कहते हैं कि रुद्रयामल शतनाम स्तोत्र और उसका विधि-विधान अपने जीवन में उतार लें: प्रतिदिन 100 पाठ, 36-36 दिन के संकल्प बीच में विश्राम के साथ, या 36 नहीं तो 21, 11 या 7 दिन के, दो-तीन दिन रुककर फिर शुरू, हर बार 1100 का संकल्प लेकर। साल, दो साल, तीन साल होते-होते, वे कहते हैं, भगवती की ऐसी कृपा और ऐसे योग्य, समर्थ गुरु मिलेंगे जिन पर विश्वास नहीं होगा; जब भीतर योग्यता आती है तो दिव्य सिद्ध गुरु मिलते हैं और दूर तक ले जाते हैं। अगर दीक्षित नहीं हैं, वे कहते हैं, तो भी कोई बात नहीं; इन विधि-विधानों का पालन करते हुए आगे चलना चाहिए।
अगर कोई केवल रुद्रयामल शतनाम स्तोत्र को लेकर ही आगे चलता है, वक्ता कहते हैं, अगर उसकी श्रद्धा सिर्फ पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। में बसी है, उसका प्राण पीतांबरा के चरणों में बसता है, और दीक्षा भी नहीं मिली, तो वह केवल इसे अपने जीवन में उतार ले: शतनाम स्तोत्र का विधि-विधान उतार ले और प्रतिदिन 100 पाठ करता चले। 36-36 दिन का संकल्प लें; कुछ दिन आराम करें; फिर करें। 36 दिन का नहीं तो 21 का, 21 का नहीं तो 11 का, 11 का नहीं तो सात दिन का। सात दिन की साधना, दो-तीन दिन रुकें, फिर सात दिन, फिर दो-तीन दिन रुकें। बार-बार, करते जाएं, करते जाएं, हर बार 1100 का संकल्प लेकर। साल, दो साल, तीन साल होते-होते, वे कहते हैं, विश्वास नहीं होगा कि भगवती की ऐसी कृपा मिलेगी, और ऐसे योग्य, समृद्ध, सामर्थ्यवान गुरु मिलेंगे जो कहां से कहां लेकर चले जाएंगे। जब हमारे भीतर योग्यता आती है, वे कहते हैं, तो वैसे दिव्य पुरुष मिलते हैं, वैसे दिव्य, योग्य, सिद्ध गुरु मिलते हैं, और फिर वे काफी दूर तक ले जाते हैं। तो इसलिए, वे निष्कर्ष देते हैं, बिना दीक्षा के बगलामुखी साधना इस प्रकार करनी चाहिए। अगर दीक्षित नहीं हैं तो भी कोई बात नहीं; इन विधि-विधानों का पालन करते हुए आगे चलना चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।