भगतवाल में चौकी की शक्ति कैसे बढ़ती या घटती है
चौकी की शक्ति की व्यावहारिक प्रक्रिया पर नोट्स।
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भगतवाल में व्यक्ति को गुरु के पास लाने वाले दो उद्देश्य
प्रतिशोध, या जिज्ञासा जो कल्याण और पैसे में बँटती है
वक्ता कहते हैं कि भगतवाल में जो भी चौकी बनाना चाहता है वह पहले गुरु खोजता है, और लोग दो उद्देश्यों से गुरु के पास जाते हैं। एक प्रतिशोध की भावना से — धन की हानि हुई, शरीर की हानि हुई, पारिवारिक कलह, किसी रिश्तेदार, जाति-बिरादरी या पटीदार से विवाद हुआ, और बदला लेने तंत्र में आता है। दूसरा जिज्ञासु बनकर आता है, और जिज्ञासु भी दो प्रकार के हैं: एक जो ज्ञान पाना, शक्तियों को समझना और पोषित करना, उनके माध्यम से जन कल्याण करना और फिर मुक्त हो जाना चाहता है; दूसरा जो साफ कहता है कि हम ऐसी चीज़ें जागृत करके पैसा कमाएँगे, लोगों का काम हो या न हो इससे ज़्यादा मतलब नहीं, और काम हो जाए तो सोशल मीडिया पर दस जगह दिखाकर और पैसा कमाएँगे।
जब भी कोई साधक चौकी बनाएगा, वक्ता कहते हैं, तो भगतवाल के क्षेत्र में भी सबसे पहले लोग एक गुरु खोजते हैं जिनसे ये सब चीज़ें सीखें। सीखने के लिए जब गुरु के पास जाएँगे तो दो तरह की बातें होंगी। एक व्यक्ति सब सीखने जाता है किसी से बदला लेने के लिए। प्रतिशोध की भावना से लोग तंत्र में जाते हैं: हमें धन की हानि हुई, शरीर से हानि हुई, किसी प्रकार का पारिवारिक अपवाद हो गया, आपस में विवाद हो गया, किसी रिश्तेदार से, अपनी जाति-बिरादरी में, पटीदार में या समाज में पारिवारिक कलह रहा जिसके कारण हानि हुई। दूसरा जिज्ञासु बनकर जाता है, और जिज्ञासु में भी दो प्रकार हैं। एक वह जिसे अपने ज्ञान की प्राप्ति करनी है, शक्तियों को समझना, जानना, पोषित करना, उसके माध्यम से जन कल्याण करना और फिर मुक्त हो जाना है। दूसरा कहता है: हम पैसे कमाने के लिए जाएँगे — इस प्रकार की चीज़ें जागृत करेंगे और उससे पैसा कमाएँगे; लोगों का काम हो चाहे न हो, उससे हमें बहुत मतलब नहीं है, और हो गया तो सोशल मीडिया के माध्यम से दस जगह दिखाएँगे कि हमने यह काम कर दिया, वह काम कर दिया, और फिर पैसे कमाएँगे। ऐसा ही होता है, वे कहते हैं।
भगतवाल गुरु शिष्य को कैसे तैयार करता है: कुलदेवी-पितृ सेवा, दीक्षा, फिर वचनबद्ध शक्तियों का जागरण
किसी मंत्र से पहले सवा महीने की सेवा; भोग के बदले काम का वचन
वक्ता कहते हैं कि हर भगतवाल गुरु अपनी गुरु परंपरा के अनुसार सिखाता है, और अच्छा गुरु पहले देखता है कि शिष्य के घर की शक्ति और देवी कौन है, पितृ-पूर्वज कौन हैं, और उनकी सेवा करवाता है — परंपरा के अनुसार सोमवार, शुक्रवार या शनिवार का व्रत — सबसे पहले सवा महीने तक। उसके बाद ही किसी अच्छे समय में मंत्र दीक्षा देकर उसका अनुष्ठान करवाता है, और तभी एक-एक चीज़ जागृत करवाना शुरू करता है: लोक वीर, मसान, मसानी, प्रेतनी, भूतनी, हर एक अलग तरीके से, हर एक को वचनबद्ध करके। जागृत और वचनबद्ध करने का तरीका, और हर शक्ति का आवाहन-विसर्जन कैसे होता है, वे किसी और चर्चा के लिए छोड़ देते हैं। फिर गुरु शिष्य के घर में इन शक्तियों को स्थान दिलवाता है, हमेशा के लिए या केवल रखकर पूजा और भोग देकर; वचन हमेशा वही रहता है — तुम मेरा काम करोगे और हम तुम्हें भोग देंगे।
जब कोई पहली बार अपने गुरु के पास जाता है, वक्ता कहते हैं, तो जिनसे भी भगतवाल सीखने जा रहा है उनकी अपनी एक गुरु परंपरा और एक तरीका होगा, और वे उसी के अनुसार सिखाएँगे। इस लाइन में सही गुरु की बहुत महत्ता है — गुरु सही होगा तो ही सारी चीज़ें सही होंगी। वे बताते हैं कि यहाँ गुरु भी कभी-कभी छली निकल जाते हैं और शिष्य भी छली निकल जाते हैं, वह अलग विषय है। अच्छा गुरु मिला तो वह सबसे पहले देखेगा: तुम जो आए हो, तुम्हारे घर की शक्ति कौन है, देवी कौन है, उनकी इस तरह सेवा-पूजा करो; पितृ-पूर्वज क्या हैं, इतने दिन तक उनकी सेवा करो। वह एक विधि देगा: सोमवार का उपवास करो, या शुक्रवार, या शनिवार, जैसी उसकी परंपरा हो, और कहेगा कि सबसे पहले सवा महीने तक इस विधि-विधान और नियम का पालन करना है। उतना पहले करवाएगा। उसके बाद किसी अच्छे समय में दीक्षा देगा — मंत्र की दीक्षा — कि इस मंत्र का जप करना है, और सबसे पहले उसका अनुष्ठान करवाएगा। तब जाकर एक-एक चीज़ जागृत करवाना शुरू करेगा। तंत्र की दृष्टि से, वक्ता कहते हैं, यहाँ लोग सबसे पहले वीर की साधना करते हैं, जो लोक वीर होते हैं, ताकि काम हो; मसान को सिद्ध करेंगे, वीर को, मसानी, प्रेतनी, भूतनी को — हर एक को अलग-अलग तरीके से जागृत करेंगे। जागृत करने और वचनबद्ध करने का तरीका अलग विषय है, और वे कहते हैं कि उस पर फिर कभी एक-एक शक्ति लेकर विस्तार से चर्चा करेंगे — कैसे आवाहन होता है, कैसे विसर्जन होता है। तो गुरु एक-एक चीज़ को वचनबद्ध करके जागृत करवा-करवाकर सबको सिखाते जाते हैं। जब भी ऐसी चीज़ सिद्ध होगी, गुरु सीखने वाले साधक को उसका स्थान देंगे, उसके घर में लाकर। स्थान वे किसी भी तरीके से दें, किसी भी माध्यम से — वह उनका तरीका है: चाहे हमेशा के लिए स्थान दें या केवल रखकर पूजा करके भोग देकर। वचन यही रहेगा कि तुम मेरा काम करोगे और हम तुमको भोग देंगे। मुख्य तो वही रहता है, वक्ता कहते हैं, और यह विषय उन्होंने चौकी वाले वीडियो में स्पष्ट किया है।
भगतवाल चौकी की वचनबद्ध शक्तियों का भोग और प्रयोग-रहित परख काल
बीड़ी, गांजा, दारू, बलि नियम से; एक सप्ताह से सवा साल केवल सेवा
वक्ता कहते हैं कि भगतवाल में, चाहे गुरु परंपरा से हो या स्वयं सीखे, मुख्य रूप से नकारात्मक शक्तियाँ ही सिद्ध की जाती हैं — मसान, प्रेत, पिशाच, मरी हुई मसानी — और उन्हें सिगरेट, बीड़ी, गांजा, दारू, दाल-भात, उड़द के पकौड़े आदि दिए जाते हैं, बलि भी चलती है; हर एक का नियम होता है कि किस दिन कौन सा भोग, और उसमें गलती नहीं चलती। एक समय गुरु नियम बना देता है: सवा साल तक — या बहुत बार सप्ताह भर, महीने, सवा महीने तक — किसी पर प्रयोग नहीं करना, केवल सेवा करनी है, प्रयोग बाद में। उस सेवा काल में, वे कहते हैं, ये निम्न शक्तियाँ भोग, पूजा, बलि के साथ साधक की अपनी प्राण ऊर्जा से पोषित होती हैं, जिससे उनका इच्छित शरीर बढ़ता है और आकर्षण पैदा होता है — एक प्रेत दूसरे प्रेत को सबसे अधिक आकर्षण देता है।
जब साधक ऐसी चीज़ें घर लाकर स्थान दे देता है, वक्ता कहते हैं, तो उनके प्रयोग का एक निश्चित समय होता है। गुरु परंपरा में, और वैसे ही भगतवाल में जो भगत स्वयं सीखते हैं, इन तरीकों से मुख्य रूप से नकारात्मक शक्तियाँ ही सिद्ध की जाती हैं — मसान, प्रेत, पिशाच, मरी हुई मसानी। इन्हें सिद्ध करते समय सिगरेट, बीड़ी, गांजा, दारू, दाल-भात या उड़द के पकौड़े आदि होते हैं; ऐसी चीज़ों का प्रयोग होता है, भोग में विशेष रूप से अलग-अलग चीज़ें होती हैं, और बलि आदि चलती है। एक नियम होता है — इस दिन इसको यह भोग देंगे — और बहुत नीति-नियम से चलना पड़ता है; यहाँ गलती नहीं चलेगी। जब साधक इस तरह इन चीज़ों को लेकर चल रहा है, तब एक समय गुरु कहता है: अभी सवा साल तक किसी के ऊपर प्रयोग नहीं करना; पहले केवल सेवा करनी है, उसके बाद प्रयोग करना। एक नियम बना देता है। बहुत बार सप्ताह भर, महीने या सवा महीने के लिए कहता है: अभी तुमको खाली देखना है, यानी सेवा करनी है, बाद में प्रयोग करना। तो वह साधक सिद्ध करने के बाद जितने दिन उनकी सेवा करता है, प्रयोग नहीं करता — कहीं कोई काम नहीं करवाता, केवल सेवा करता है — उतने दिन ये उपदेव, इस जीवन में सिद्ध किए प्रेत-भूत, उसी ऊर्जा से पोषित होते हैं। वे साधक की ही प्राण ऊर्जा लेते हैं। भोग, पूजा, बलि से अपना इच्छित शरीर बढ़ाते हैं और वहाँ आकर्षण पैदा करते हैं; एक प्रेत दूसरे प्रेत को सबसे अधिक आकर्षण देता है, सकारात्मक-नकारात्मक छोड़ दीजिए। इसी तरह वे आकर्षण देते हैं, वे कहते हैं।
जन कल्याण से भगतवाल चौकी कैसे बढ़ती है
तंत्र काट का पुण्य भूत-प्रेत शक्तियों को भी संतुष्ट करता है
वक्ता कहते हैं कि शक्तियाँ तैयार होने पर दोनों तरह के लोग आने लगते हैं — पहले किसी मित्र का काम हुआ, आस-पड़ोस को पता चला, या साधक खुद प्रचार करता है कि हम तारापीठ में श्मशान साधना कर रहे हैं — और हर काम या तो अच्छा होगा या बुरा। यदि कोई तंत्र-पीड़ित आया और साधक ने अपनी शक्तियों से तंत्र काट किया, उनकी रक्षा के लिए कुछ प्रयोग किया और कल्याण किया, तो उसके पुण्य में वृद्धि होती है; उसकी चौकी की शक्तियाँ प्रसन्न-संतुष्ट होती हैं, अच्छी ऊर्जा बढ़ती है, और जो धन मिला उससे वह अपना पालन करे, सिद्ध किए देवी-देवताओं को (चाहे नकारात्मक ही हों) भोग-पूजा दे, और कुछ जीवों की सेवा करे — कुत्ते की ही सही — तो ऐसे व्यक्ति की चौकी दिन-प्रतिदिन बड़ी होती है, चाहे वह भूत-प्रेत की ही हो, क्योंकि समाज का कल्याण हो रहा है और जीवों के आशीर्वाद से वृद्धि हो रही है। गति की बात अलग है, वे जोड़ते हैं: उन शक्तियों की मुक्ति नहीं होगी, उनका अपना प्रारब्ध भुगतना पड़ेगा, लेकिन चौकी बढ़ेगी।
जब यह पूरा विषय बन जाता है, वक्ता कहते हैं, तो साधक चाहे इन शक्तियों का प्रयोग जन कल्याण की दृष्टि से करे या किसी का गलत करने के लिए, और जब वह काम शुरू करता है तो दोनों श्रेणी के लोग आने लगते हैं। सबसे पहले किसी मित्र की सेवा की; वहाँ से किसी और को पता चला; आस-पड़ोस में किसी का काम किया, उसे पता चला; और धीरे-धीरे नाम फैलने लगता है। या आजकल व्यक्ति स्वयं प्रसारित करता है — हम तारापीठ में श्मशान साधना कर रहे हैं, यह कर रहे हैं, वह कर रहे हैं — तो लोग जानने लगते हैं और आना शुरू कर देते हैं। जब भी कोई अपना काम लेकर आया, तो काम दो तरह का होगा: अच्छा या बुरा। अच्छा यानी कोई तंत्र-पीड़ित व्यक्ति आया; साधक ने अपनी शक्तियों से सब जान-मानकर काट-कटांग किया, तंत्र काट किया, उनकी रक्षा के लिए कुछ चीज़ों का प्रयोग किया और उनका कल्याण किया। यह एक हो गया, और इससे उसके पुण्य में कहीं न कहीं वृद्धि हुई; पुण्य बढ़ने से उसकी चौकी की सारी शक्तियाँ कहीं न कहीं प्रसन्न-संतुष्ट होंगी, और जब भी वह ऐसा काम करेगा उसकी अच्छी ऊर्जा में बढ़ोतरी होगी। इससे जो धन मिलेगा उससे वह स्वयं का पालन-पोषण करेगा; कुछ पैसे से अपने सिद्ध किए देवी-देवताओं को, चाहे वे नकारात्मक ही क्यों न हों, भोग-पूजा देगा; और कुछ जीवों का कल्याण करेगा, समाज में लगाएगा, चाहे जीव की ही सेवा करे, कुत्ते की सेवा करे। जो ऐसा करते हैं, वक्ता कहते हैं, उनकी चौकी दिन-प्रतिदिन बड़ी होती है — चाहे वह भूत-प्रेत से संबंधित ही क्यों न हो, बढ़ेगी — क्योंकि समाज का कल्याण हो रहा है और जीवों के आशीर्वाद से उनकी वृद्धि हो रही है। गति की बात अलग है: उनकी मुक्ति नहीं होगी, उन्हें अपना प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। भुगतना पड़ेगा। लेकिन इससे, वे कहते हैं, साधक की बढ़ोतरी होगी।
किसी परिवार पर पैसे लेकर भगतवाल अभिचार कैसे शुरू होता है: रेकी और सबसे कमज़ोर सदस्य
असुरक्षित घर पर सीधा विद्वेषण; सुरक्षित घर में पीने वाले बेटे या असावधान बेटी के रास्ते प्रवेश
वक्ता कहते हैं कि समय के साथ चौकी के भूत-प्रेत-पिशाच की माँग बढ़ती है, क्योंकि प्रेत शरीर इच्छाओं का शरीर है, और जब कोई भगत को एक लाख रुपये देकर शत्रु को तहस-नहस करने को कहता है, तो भगत पहले लक्षित परिवार की रेकी — जासूसी, हीलिंग नहीं — करता है, अपने कच्चे कलवे, मसान, कभी सिद्ध कपाल, या मरने से पहले बुज़ुर्गों द्वारा वचन में सौंपी गई शक्तियों से, मुस्लिम शक्तियाँ भी। वह देखता है कि घर में कौन सी पूजा होती है। यदि कुछ नहीं होती — घर बंधित नहीं, कोई वार्षिक पूजन नहीं, किसी शक्ति पीठ पर जाना नहीं — तो घर खुला है और वह सीधे विद्वेषण करके कलह-क्लेश करवाता है। यदि घर में पूजा होती है, तो वह उस एक सदस्य को ढूँढता है जो नहीं करता: बाहर खाने-पीने वाला किशोर बेटा, जिसके अशुद्ध शरीर पर मदिरा चाहने वाला पिशाच आसानी से हावी होकर घर में प्रवेश करता है और कलह शुरू करवाता है; या किशोर बेटी जिसके पास कोई कवच या ऊर्जा-सुरक्षा नहीं — खुले बाल, सुबह-शाम इत्र, भूत-प्रेत को न मानना — जिस पर चौकी की मोहिनी या पिशाचिक शक्ति लगा दी जाती है, ताकि वह ग्रसित होकर घर लौटे और या तो चिड़चिड़ी, बीमार, झगड़ालू हो जाए या अपनी इच्छा के विरुद्ध चरित्र से भटकने लगे।
दूसरा रास्ता, वक्ता कहते हैं, तब शुरू होता है जब ये शक्तियाँ भगत को मोह में डालने लगती हैं। समय के बाद भूत-प्रेत-पिशाच की माँग भी बढ़ती है, क्योंकि वह प्रेत शरीर है, इच्छाओं का शरीर है, उनकी इच्छा बढ़ती है। तब कोई आकर कहता है: बाबा, हम आपको एक लाख रुपये देंगे, मेरा यह फलाना शत्रु है, इसे तहस-नहस कर दीजिए। भगत पैसा ले लेता है — हम काम कर देंगे, तुम जाओ — डेडिकेशन के साथ। सबसे पहले वह देखता है कि जिस परिवार पर तंत्र शक्ति का प्रयोग करना है, चौकी चलानी है, वहाँ कौन सी शक्तियाँ हैं और कौन सी नहीं। उस परिवार की पहले रेकी होती है — और रेकी, वक्ता ज़ोर देते हैं, का मतलब जासूसी है, हीलिंग मत समझ लीजिए — तंत्र के माध्यम से। उसके पास कच्चे कलवे होते हैं, मसान होते हैं, भूजा के लिए शक्तियाँ होती हैं; कोई-कोई कपाल भी सिद्ध कर लेते हैं। सिद्ध कैसे? वचन में गुरु से मिल जाता है: बुज़ुर्ग विशेष करके दे ही देते हैं कि भाई हम मरने वाले हैं, कब तक सेवा-पूजा करें, अब हम संभाल नहीं पाएँगे — वे वचनबद्धता दे देते हैं कि अब तुम ले लो, और खुद मुक्त हो जाते हैं; मुस्लिम शक्तियाँ भी दे देते हैं। ऐसी शक्तियों से रेकी होती है, और पता चलता है कि जिस पर प्रयोग करना है उसके घर की स्थिति क्या है। उदाहरण लीजिए: पति-पत्नी, 22–25 साल की बड़ी बेटियाँ, दो एक लड़के, बुज़ुर्ग — पूरा परिवार। सबसे पहले देखा जाता है कि इस घर में पूजा-पाठ क्या होता है। यदि कुछ नहीं करते, तो बहुत आसान है: घर बंधित नहीं है, खुला है, कोई वार्षिक पूजन नहीं, किसी शक्ति पीठ पर जाना नहीं; वह सीधे प्रयोग कर देगा — पहले घर में विद्वेषण करवाओ, कलह-क्लेश करवाओ। यदि पूजा-पाठ होता है, तो कोई न कोई एक व्यक्ति होगा जो नहीं करता होगा; कुछ तो गड़बड़ होगी। घर में कोई लड़का है, टीनएजर, जो बाहर खाता-पीता है, तो उसे माध्यम बनाते हैं, हर एक अपने तरीके से। जब उस बच्चे का शरीर अशुद्ध रहता है तो सीधे किसी प्रेत या पिशाच शक्ति का प्रयोग उस पर करा देते हैं, क्योंकि आसान है — पिशाच को मदिरा चाहिए और बंदा खुद पीता-खाता है, तो आराम से उस पर हावी हो जाता है और उसके माध्यम से घर में प्रवेश कर जाता है, और प्रवेश करके सबसे पहले कलह-क्लेश करवाता है, या उसके माध्यम से ऐसा कृत्य करवाया जाता है कि परिवार डिस्टर्ब हो जाए। या कोई लड़की है, टीनएजर। जब भी उसका शरीर खराब हो और उसके पास ऐसी कोई ऊर्जा, कोई कवच आदि न हो; वह खुले बाल बाहर जा रही है — आजकल लड़कियाँ बाल की ये बातें मानती नहीं, सुबह-शाम-रात इत्र लगाती हैं, उनके लिए भूत-प्रेत-पिशाच एग्ज़िस्ट नहीं करते, काफी ब्रॉड-माइंडेड हैं — ऐसी कंडीशन में मोहिनी शक्ति का, अपनी चौकी की मोहिनी का प्रयोग कर देते हैं, या किसी पिशाचिक शक्ति को उस पर लगा देते हैं। जब ऐसी बच्ची अभिचार से ग्रसित होकर घर पहुँचती है तो दो चीज़ें होती हैं: या तो वह कलह-क्लेश करेगी, चिड़चिड़ी हो जाएगी, तबीयत खराब रहेगी, बिना मतलब घर में झगड़ा शुरू कर देगी; या पथभ्रष्ट होना शुरू होगा, चरित्र अलग होने लगेगा — अभिचार से ग्रसित, क्योंकि दिमाग उसके नियंत्रण में नहीं है और उसकी इच्छा नहीं है कि वह ऐसे कृत्य करे।
घर की अपनी शक्तियों को बाँधना और परिवार को पूजा-पाठ से हटाना
अपमानित गृह-शक्तियाँ पीछे हटती हैं; बुज़ुर्गों का जप शरीर-कष्ट से तुड़वाया जाता है
वक्ता कहते हैं कि यदि लक्षित परिवार की कुल-शक्तियाँ ठीक से पूजित नहीं हैं तो भगत को रोकने वाला कुछ नहीं; यदि हैं, तो रेकी से भीतर की स्थिति जानकर पहले उन शक्तियों को भोग और मंत्र से बाँधा जाता है — घर में कम पूजा हो तो सामान्य पूजा से, और बहुत पूजा-पाठ वाला घर भी कुंठित किया जा सकता है यदि शत्रु इतना ईर्ष्यालु हो कि पैसा खर्च करे, क्योंकि जिस भगत को जानकारी नहीं वह किसी बड़े साधक से एक बार बंधन करवा लेता है, जिसके बाद उसकी चौकी सब नियंत्रण में कर लेती है। फिर कलह बढ़ाई जाती है: बेटा पीने लगा, मार-पिटाई हुई, पूजा छूटी, पूर्णिमा की पूजा छोड़ दी, क्रोध में किसी ने पूजा का सामान फेंक दिया — और जाने-अनजाने घर की शक्तियों का अपमान करके परिवार उन्हें पीछे हटा देता है, जिससे अभिचार को और मौका मिलता है। अच्छे घर की लड़की का भाग जाना भी ऐसे अभिचार का हिस्सा है, वे कहते हैं — बाद में वह कहती है कि हम ऐसा चाहते नहीं थे; लोग वशीकरण कहते हैं, पर वे बता रहे हैं कि चौकी से परिवार कैसे तोड़ा जाता है। अंत में जो बुज़ुर्ग सेवा-पूजा, नाम-जप करते हैं उनके शरीर में कष्ट दे दिया जाता है ताकि वे कर ही न पाएँ, और घर की ऊर्जा पूरी बँध जाती है।
लड़की या लड़के पर प्रयोग इसलिए चलता है, वक्ता कहते हैं, क्योंकि परिवार की कुल-शक्तियाँ वैसी पूजित ही नहीं हैं — कुछ ऐसा है ही नहीं। या, यदि हैं भी, तो पहले जो रेकी हुई — जासूसी, वे दोहराते हैं, हीलिंग नहीं — उससे देख लिया कि अंदर क्या-क्या है, और उन शक्तियों को पहले बंधित करते हैं: भोग देकर, अपनी सिद्ध की हुई मंत्र शक्ति के माध्यम से। वह सामान्य पूजा होगी, बहुत अधिक नहीं; अधिक पूजा वाले घर के अलग वीडियो हैं, यहाँ वे सामान्य भगतवाल चौकी की बात कर रहे हैं। जो बहुत अधिक पूजा करते हैं उनका भी तरीका होता है — आपका दुश्मन कितना पैसा खर्च कर सकता है इस पर निर्भर करता है। यदि आप तंत्र की गतिविधि को नहीं समझते या नहीं करते, तो बहुत पूजा-पाठ करने पर भी वहाँ कुंठित किया जाता है, बशर्ते आपका शत्रु इतना ईर्ष्यालु हो और पैसा खर्च करने को तैयार हो। जिस भगतवाल साधक को खुद जानकारी नहीं होती वह किसी बड़े साधक की सहायता से वैसा कृत्य करवा देता है; बंधन में करने की शक्तियाँ होती हैं, वे लोग वह काम कर देते हैं। एक ही बार करना होता है; बाद में मौका मिल ही जाता है — एक बार आपके घर की शक्ति बँध गई तो वह अपनी भगतवाल चौकी चलाकर सब नियंत्रण में करके खराब कर ही देता है। जैसे: घर में कलह-क्लेश हुआ, आप थोड़ा डिस्टर्ब हुए; बेटे ने पीना शुरू कर दिया, पता चला, आपने मार-पिटाई की, खुद डिस्टर्ब हो गए, पूजा-पाठ छूटने लगा, कोई पूर्णिमा की पूजा करनी थी, छोड़ दी — यही आपस में विद्वेषण है। फिर जैसे-जैसे ये चीज़ें टूटेंगी, वे कुछ नया प्रयोग कर देंगे: सुबह-शाम कलह-क्लेश, आपस में झगड़ा; जितना अधिक झगड़ा, जितना टेंशन, उतना आप पूजा-पाठ छोड़ेंगे। कभी ऐसा हो जाएगा कि घर में पूजा करने बैठे हैं, क्रोध आ गया, पूजा का सामान उठाकर फेंक दिया, झगड़ा कर दिया। और इससे आप जाने-अनजाने अपने घर की शक्तियों का अपमान कर देते हैं; जैसे ही अपमान होगा वह शक्ति थोड़ा पीछे हटेगी, भगत को और मौका मिलेगा, और उसका अभिचार धीरे-धीरे बढ़ता जाएगा — वे चौकी बढ़ाते जाएँगे। जो चरित्र से भ्रष्ट होंगे: मान लीजिए आपने अपनी बेटी के बारे में कुछ उल्टा-सीधा सुन लिया — परिवार टूट जाएगा। यही होता है, वे कहते हैं: घर से बच्चियाँ भाग गईं; बहुत अच्छे परिवार की लड़की थी, कितना अच्छा संस्कार था, लेकिन चली गई; अब आप पुलिस केस कर रहे हैं, इधर-उधर भाग रहे हैं, डिस्टर्ब हो गए। इसे भी अभिचार का ही हिस्सा मानकर चलिए। बहुत बार बाद में पता चलता है, लड़की कहती है हम चाहते नहीं थे, बच्चे खुद परेशान होते हैं कि हम ऐसा चाहते नहीं थे लेकिन हो गया। कोई कहते हैं वशीकरण प्रयोग करवाया गया — वह विषय अलग है; वे बता रहे हैं कि शत्रु के अभिचारिक प्रयोग से चौकी के माध्यम से परिवार कैसे तोड़ा जाता है। इसी तरह घर में कोई बड़े-बुज़ुर्ग हैं जो सेवा-पूजा, नाम-जप करते हैं, तो उन्हें भी रोका जाता है: उनका पूजा-पाठ बीच में छूटेगा ही। यदि उनके पास उतनी ऊर्जा नहीं, या शरीर उतना सक्षम नहीं, और जो थोड़ा-बहुत वे करते थे उसी से घर में शांति रहती थी, तो भगत उनके शरीर में भी कोई कष्ट कर देता है, जिससे शरीर के कष्ट में वे कर ही नहीं पाते। तब घर की ऊर्जा पूरी की पूरी चौकी से बाँध दी जाती है। यह एक पहलू हुआ, वे कहते हैं — यहाँ तक ये लोग खुद को बम-बम करके पैसा कमा लेते हैं।
अभिचार-ग्रस्त परिवार कैसे उबरता है: पुण्य उदय, सही सहायक, तंत्र काट, पलटना और गृह बंधन
पीड़ा प्रारब्ध का कटना है; पैसे वाला शत्रु दस बार और पलटवाता है
वक्ता कहते हैं कि जब देव-कृपा और पूजा-पाठ वाला अच्छा परिवार इस तरह बाँधा जाता है तो पूरे परिवार का प्रारब्ध कट रहा है — जितनी जल्दी मानें उतना अच्छा — और एक समय आता है, साल, दो साल या पाँच साल बाद, जब घर में किसी का पुण्य उदय होता है और वह इन चीज़ों को जानने और सही से करने की ठानता है; वह भटकेगा, दस जगह ठोकर खाएगा, और कभी न कभी सही व्यक्ति या सही माध्यम मिल जाएगा। ऐसा व्यक्ति, जो तंत्र की काट क्रियाएँ जानता है, पहले बताता है कि घर में कौन-कौन से प्रयोग हुए हैं, कितना समय लगेगा, क्या विधि-विधान करना है और देवी-देवताओं की क्या स्थिति है। फिर हर सदस्य के शरीर से काट होकर शरीर सुरक्षित किया जाता है और पूरा तंत्र पलटा जाता है (पलटना), चाहे एक दिन के लिए ही — लेकिन यदि शत्रु पैसे वाला है और भोग-दारू के लिए पैसा देता जा रहा है, तो उसका तांत्रिक तुरंत दस और पलट देता है, इसलिए सहायक परिवार के भरोसे के अनुसार तंत्र-युद्ध करता है। चीज़ें हटाने पर वह परिवार को खड़ा करता है: घर में इस तरह पूजा-पाठ करना है, गृह बंधन होता है, अपनी शक्तियों की पूजा बताई जाती है, नवरात्रि में साधना और हवन, शक्ति पीठ की यात्रा, और अपने गणों — चाहे अपनी चौकी के भूत-प्रेत ही हों — का पहरा भी लगाता है। धीरे-धीरे घर की ऊर्जा लौटती है।
अब दूसरा पहलू, वक्ता कहते हैं। जब किसी अच्छे परिवार में ऐसा होता है — पहले से पूजा-पाठ हो रहा था, देव शक्तियों की कृपा थी, और तंत्र से बाँधा गया — तो जो भी घट रहा है, मान लीजिए कि पूरे परिवार का प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। कहीं न कहीं कट रहा है। जितनी जल्दी मानेंगे उतना अच्छा। और कभी न कभी एक समय आएगा, चाहे साल भर, दो साल या पाँच साल बाद, कि आपके घर में किसी न किसी व्यक्ति का पुण्य उदय होगा, किसी भी कारण से; एक समय आता है कि होगा। दिमाग में टिक करेगा: पहले तो ऐसा होता था, अब मुझे ये सब चीज़ें जाननी हैं और सही तरीके से करनी हैं — क्योंकि पहले आपके घर में 15, 20, 25 साल तक अच्छी सेवा-पूजा होती थी। नहीं भी होती थी तो भी एक समय आएगा कि आप जानने का प्रयास करेंगे, थोड़ा भटकना शुरू करेंगे, खोजेंगे, दस जगह ठोकर भी खाएँगे; कभी न कभी कोई सही व्यक्ति या सही माध्यम मिल जाएगा कि इन चीज़ों से कैसे लड़ना है, और फिर आपके भीतर मनोबल बनना शुरू होगा। या फिर सीधे कोई सही व्यक्ति मिल गया, जो तंत्र की काट क्रियाओं को जानता है और आपका सपोर्ट करने को तैयार है। तंत्र के क्षेत्र में ऐसा व्यक्ति मिलेगा तो वह पहले देखेगा और कहेगा: तुम्हारे घर में इस-इस प्रकार के प्रयोग किए गए हैं; इतना दिन लगेगा; यह विधि-विधान करना है; आपके देवी-देवताओं की यह स्थिति है; इस तरह हम उनका पूरा सही तरीके से प्रयोग करेंगे। आप तैयार हुए। अब पहले एक-एक के शरीर से काट होती है, शरीर सुरक्षित किया जाता है; पूरे तंत्र को, चाहे एक दिन के लिए ही सही, पलटा जाता है। इसमें भी दो तरीके का तंत्र होगा: कोई भी तांत्रिक जब उस पूरी चौकी को पलटेगा, तो अगला व्यक्ति, आपका शत्रु, यदि पैसे वाला है और उस तांत्रिक को भोग के लिए और पैसा दे रहा है, तो वह तांत्रिक तुरंत दस और पलट देगा। उसे क्या है? भोग ही तो देना है — दारू ढारते जाओ, मंत्र देते जाओ, करते जाओ; बाद में भोगता जाएगा, अभी तो पैसा कमाना है। तो जो साधक आपका सपोर्ट करने को तैयार हुआ — हाँ, हम यहाँ तंत्र से युद्ध करेंगे — वह आपके भरोसे के अनुसार आपकी सहायता करेगा। सहायता करके जब इन चीज़ों को हटाएगा, तो फिर आपको खड़ा करेगा: घर में इस-इस तरह पूजा-पाठ करना है; घर का बंधन करेगा, गृह बंधन होगा; आपकी जो भी शक्तियाँ हैं उनकी पूजा-पाठ बताई जाएगी। आप एक-एक चीज़ धीरे-धीरे करना शुरू करेंगे, और आपकी ऊर्जा, घर की सब चीज़ धीरे-धीरे लौटेगी। किसी महीने, नवरात्रि आदि में साधना होगी, हवन होगा; वह आपको शक्ति पीठ की यात्रा करने कहेगा। और अपने गणों का — जो भी शक्ति हो, चाहे अपनी चौकी के भूत-प्रेत ही क्यों न हों — वह भी पहरा लगाएगा। यह एक तरीका हुआ, वक्ता कहते हैं।
भगतवाल चौकी के विरुद्ध महाविद्या और हनुमान प्रयोग क्रमशः होते हैं, सीधे कभी नहीं
पहले भैरव पूजा-बलि, घर में मंदिर का अंश स्थापित, फिर कवच और हवन
वक्ता कहते हैं कि यदि पीड़ित परिवार को कोई महाविद्या का साधक या कोई प्रचंड साधक मिल जाए, तो वह सारी सामान्य काट क्रियाएँ तो करता ही है, साथ में अपनी महाविद्याओं का प्रयोग करता है और कल्प विधान भी करने को कहता है। लेकिन तंत्र में इन सबका प्रयोग कभी सीधे-सीधे नहीं होता; हमेशा स्टेप-वाइज़ होता है। जिसके शरीर पर कष्ट है उस पर सीधे प्रयोग करवा देना गलत है और परेशानी हो जाती है — छोटा सा विधान होता है, पर होता है: पहले भैरव जी की ऐसे पूजा-बलि करो, फिर मंदिर का हल्का सा अंश ही सही घर में स्थापित करो, तब करो। फिर बंधन शक्तियों का प्रयोग होता है — चाहे हनुमान जी का ही, यदि अच्छे हनुमान साधक मिल जाएँ: पंचमुखी हनुमान या एकादशमुखी हनुमान का वज्र कवच और हवनात्मक प्रयोग सिखाकर अनुष्ठान लेकर किया जाता है, जिसके बाद गलत भगत ने घर पर जो शक्तियाँ चलाई थीं उनकी हनुमान जी कुटाई शुरू कर देते हैं, घर में हनुमान जी के दूतों का पहरा पड़ जाता है, या परिवार बालाजी जैसे जागृत शक्तिपीठ से ऐसी चीज़ें प्राप्त कर लेता है, और घर का रक्षण होता है।
दूसरा मामला, वक्ता कहते हैं, यह कि कोई महाविद्या का साधक या कोई अच्छे, प्रचंड साधक मिल गए। वे ये सारी सामान्य चीज़ें तो करेंगे ही, इन क्रियाओं को तो करेंगे ही, साथ-साथ अपनी महाविद्याओं का भी प्रयोग करेंगे और कल्प विधान आदि करने को कहेंगे — वह भी करना है। लेकिन तंत्र में उन सब चीज़ों का प्रयोग कभी सीधे-सीधे नहीं होता; स्टेप-वाइज़ होता है। यह नहीं कि गए और सीधे मार-पीट करने लग गए। जिनके शरीर पर कष्ट है, यदि सीधे उन पर प्रयोग करवा दोगे तो उसका एक तरीका होता है — देखना होता है कि कैसे क्या है। छोटा सा ही विधान होता है, लेकिन होता है: पहले भैरव जी की ऐसे पूजा-बलि करो; उसके बाद हल्का सा ही अंश सही, मंदिर का अंश घर में स्थापित करो, तब करो। जो सीधे कर देते हैं वह गलत होता है, वहाँ परेशानी हो जाती है। फिर जब महाविद्याओं का प्रयोग होगा, या बंधन शक्तियों का, चाहे हनुमान जी का ही प्रयोग क्यों न हो — अच्छे हनुमान साधक मिल गए, पंचमुखी हनुमान या एकादशमुखी हनुमान का वज्र कवच और हवनात्मक प्रयोग सिखा दिए, परिवार ने खुद किए, अनुष्ठान लेकर करने लगे — तब जो गलत भगतवाल तांत्रिक घर पर शक्तियाँ चला रहा था, उनकी हनुमान जी कुटाई शुरू कर देते हैं। अब उस घर में हनुमान जी के दूतों का पहरा पड़ गया; या आप किसी अच्छे शक्तिपीठ, बालाजी, में चले गए जहाँ सब चीज़ सही तरीके से होती है, जागृत है, वहाँ से ऐसी चीज़ें प्राप्त हो गईं — और घर का रक्षण हो रहा है।
दुष्ट भगतवाल चौकी क्यों ढहती है: पिटी हुई शक्तियाँ वचन से मुकर जाती हैं
प्रेत मन के अधीन है; तपोगुण नहीं, शिष्य का धोखा, विसर्जन नहीं
वक्ता कहते हैं कि गलत भगत एक ही परिवार का नुकसान नहीं करता; पैसे के लिए दस जगह प्रयोग किए होंगे, और उनमें से पाँच यदि महाविद्या, हनुमान जी या दुर्गा जी के पाठ-हवन संकल्प लेकर पलटवार करें, तो उसकी शक्तियाँ जहाँ जाती हैं वहीं पिटती हैं — हनुमान जी कूटते हैं, भगवती बगलामुखी बंबू कर देती हैं, भैरव जी का सोटा पड़ता है, या उच्च कोटि की तांत्रिक शक्तियाँ, चाहे नकारात्मक ही हों, चीर-फाड़ कर भेज देती हैं — यंत्र, मंत्र, स्तोत्र अनुष्ठान, वैदिक या तांत्रिक किसी भी माध्यम से। दो, तीन, चार साल ऐसा होने पर शक्तियाँ क्षीण होकर कहती हैं, हम क्यों लात खाकर तेरा काम करें; प्रेत सूक्ष्म शरीर है जो अब भी मनुष्य-जीवन के मन के अधीन है, इसलिए साथ नहीं निभाएगा। इसीलिए भगतवाल में शक्ति "साथ छोड़ देती है", भले वचन की पक्की रही हो: साथ देना कम कर देती है, गई तो आई नहीं। फिर भगत के शरीर में कष्ट, घर में परेशानी, वंश वृद्धि नहीं, और अंत में चौकी किसी काम की नहीं रहती, क्योंकि उसने महाशक्तियों की सेवा नहीं की और ऊर्जा तपोगुण में नहीं थी। यदि कोई शिष्य धोखा दे दे, या वचनबद्धता के कारण वह शक्तियों को न किसी को दे पाए न विसर्जन कर पाए, तो बर्बादी पूरी हो जाती है।
ये भगतवाल के निकृष्ट साधक जो गलत काम करते हैं, वक्ता कहते हैं, एक ही के साथ ऐसा नहीं करते। पैसा कमाने के लिए दस जगह दस लोगों पर विचार किए होंगे, अपनी मसानिक शक्ति का उपयोग करके गलत काम किए होंगे। मान लीजिए दस में से पाँच ऐसे लोग हो गए जो महाविद्या के प्रयोग से, अच्छे साधक के माध्यम से, या अपने पुण्यों के जागृत होने से हनुमान जी, महाविद्याओं, दुर्गा जी के अच्छे पाठ-हवन संकल्प लेकर करने लगे — उन्हें पता चल गया कि क्या करना है। वे बताते हैं कि उनके अपने YouTube साधक परिवार के बहुत से साधक ये चीज़ें करके इनसे छुटकारा पा रहे हैं। जब वे शुरू करेंगे, और एक भगत ने पाँच जगह प्रयोग किए थे और पाँच आदमी पलटवार करने लगे, तो उसकी चौकी की गलत शक्तियाँ जब-जब अपनी अभिचारिक गतिविधि पूरी करने जाएँगी — भोग देकर भेजा गया है कि जाओ परेशान करो, या वहाँ बंदी हैं — उनकी कुटाई शुरू हो जाती है। पता चलता है: वहाँ गए तो हनुमान जी कूटकर भेज रहे हैं; दूसरी जगह गए तो भगवती बगलामुखी बंबू कर दे रही हैं; कहीं गए जहाँ कुछ पाठ हुआ है तो भैरव जी का सोटा खाकर आ रहे हैं; कहीं इनसे उच्च श्रेणी की कोई तांत्रिक शक्ति — भले नकारात्मक ही हो — पकड़कर अच्छे से चीर-फाड़ करके भेज दे रही है। तो कष्ट हो रहा है: एक ऊर्जा से दूसरी ऊर्जा को कष्ट, तारण विधि, त्रास — चाहे यंत्र से, मंत्र से, स्तोत्र अनुष्ठान से या किसी अन्य माध्यम से, वैदिक हो या तांत्रिक। जब इस तांत्रिक की पूरी चौकी को इस तरह कष्ट मिलना शुरू होगा, तो एक समय आएगा — दो साल, तीन साल, चार साल — जब बार-बार ऐसा होने पर उसकी शक्तियाँ क्षीण होने लगेंगी। वे कहेंगी: हम क्यों लात खाकर तेरा काम करें? भले दो-चार साल के वचन में हों, वह शक्ति कभी जीवित मनुष्य थी, और मनुष्य में जो उसकी क्षमता और सोच थी उसी अनुसार बना सूक्ष्म शरीर अब प्रेत शरीर बन चुका है। प्रेत कहीं न कहीं मन के अधीन ही है; मन की तमति-सुमति के अधीन होने से ही प्रेत बना है। बार-बार कुटकर आने पर उसके भीतर ऐसा विचार नहीं होगा कि हम साथ निभाएँगे। इसीलिए, वक्ता कहते हैं, भगतवाल में देखते हैं कि शक्ति साथ छोड़ देती है — लोग कहते हैं यह शक्ति तो वचन की पक्की थी, फिर भी फलानी शक्ति साथ छोड़कर भाग गई; बात यही है: हम क्यों लात खाएँ। फिर शक्तियाँ भगत का साथ देना कम कर देती हैं; गलत चीज़ों में साथ नहीं देंगी — गई तो आई नहीं, आई तो गई नहीं। उसके शरीर में कष्ट-परेशानी शुरू हो जाती है और धीरे-धीरे उसकी चौकी निस्तेज होने लगती है — क्योंकि उसने महाशक्तियों की साधना-सेवा की नहीं, ऊर्जा तपोगुण में थी नहीं। शक्तियाँ साथ नहीं दे रहीं, शरीर में कष्ट, घर में परेशानी, अपने ही घर में वंश वृद्धि नहीं, कुछ न कुछ परेशानी, और अंत में चौकी किसी काम की नहीं रह जाती। इस तरह, वे कहते हैं, चौकी को ऐसे चलाने से ऐसे साधकों की अंत में बहुत दुर्गति होती है। और यदि उसने किसी को शिष्य बनाया है, तो यह भी होता है कि कोई शिष्य ही धोखा दे देता है, उसके साथ कोई आरएंडडी कर देता है, तो भी दिक्कत हो जाती है। यदि वचनबद्धता के कारण अपनी शक्ति किसी को दे ही न पाए, विसर्जन ही न कर पाए, तो भी दिक्कत होती है। ऐसे बहुत सारे कारण बन जाते हैं, वे कहते हैं, और अंत में ये लोग पूरी तरह बर्बाद हो जाते हैं।
भगतवाल चौकी को फलता-फूलता रखना: कल्याण, धन का सदुपयोग और समय पर विसर्जन
भूत-प्रेत शक्तियों के लिए महादेव का स्थान; शक्तिपीठ में जीवित पिंडदान
वक्ता कहते हैं कि यदि इन्हीं शक्तियों से जन कल्याण और सेवा हो रही है, परिवार का भरण-पोषण करने के बाद पैसे का सदुपयोग और जीव सेवा हो रही है, और भगत में इतनी बुद्धि है कि ये भूत-प्रेत शक्तियाँ हैं, इसलिए उनके लिए महादेव का स्थान बना दे और समय रहते उनका विसर्जन कर दे ताकि उनकी भी गति हो जाए, तो उसकी चौकी की बढ़ोतरी होती है, शुभ शक्तियाँ भी आती हैं, और बाद में बहुत भटकना नहीं पड़ता — समय रहते आत्म-कल्याण कर लेता है। बहुत लोग, वे जोड़ते हैं, शक्तिपीठों और अन्य पीठों में जीवित अवस्था में ही अपना पिंडदान कर लेते हैं कि आगे पता नहीं क्या हो, या किसी परंपरा में चले जाते हैं कि भगतवाल कर ली, अब अपनी मुक्ति-गति देखें; उनकी शक्तियाँ समय रहते साथ देती हैं और सद्गति करा देती हैं, और वे प्रायः बहुत नहीं फँसते।
लेकिन, वक्ता कहते हैं, यदि इन्हीं शक्तियों के माध्यम से भगत जन कल्याण कर रहा है, सेवा कर रहा है, उन पैसों का सदुपयोग कर रहा है, जीव सेवा कर रहा है, परिवार का भरण-पोषण करने के बाद सब कुछ कर रहा है — और अब थोड़ी सोच आई है, बुद्धि बढ़ी है: ये भूत-प्रेत संबंधी शक्तियाँ हैं, तो ऐसी शक्तियों के लिए चलो महादेव का स्थान बना दिया, समय रहते उनका विसर्जन कर दिया ताकि इनकी भी गति हो जाए — तब ऐसी स्थिति में उसकी चौकी की बढ़ोतरी भी होगी, शुभ शक्तियाँ भी आएँगी, और बाद में बहुत अधिक भटकना नहीं पड़ेगा। कहीं न कहीं समय रहते आत्म-कल्याण कर लेगा। बहुत लोग, वे कहते हैं, शक्तिपीठों और अन्य पीठों में जीवित अवस्था में ही अपना पिंडदान आदि कर लेते हैं — पता नहीं आगे क्या हो — या किसी परंपरा में चले जाते हैं: भगतवाल कर ली, अब अपनी मुक्ति-गति देखी जाए। उनकी शक्तियाँ समय रहते साथ देती हैं और सद्गति करा देती हैं; प्रायः बहुत अधिक नहीं फँसते। यही, वे कहते हैं, तरीका है जिससे तंत्र प्रवृत्ति के लोगों की चौकी की शक्ति बढ़ती या घटती है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।