बंधन में पड़े पितरों की मुक्ति — कुल भैरव, दत्तात्रेय तर्पण, हनुमान चालीसा हवन और ज्वालामुखी पत्थर
बंधे हुए पितरों को मुक्त करने के तीन प्रयोग।
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स्वप्न या कोई जानकार व्यक्ति, और उससे होने वाली दुर्घटनाएँ
पितरों के बंधे होने का पता कैसे चलता है, और जीवन पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है
वक्ता अपनी बात वहाँ से आरंभ करते हैं जहाँ आपको किसी भी माध्यम से — स्वप्न के माध्यम से या किसी जानकार व्यक्ति के माध्यम से — यह पता चल जाता है कि आपके पितृ बंधे हुए हैं, जिसके कारण आपके जीवन में बहुत सारी दुर्घटनाएँ हो रही हैं, कष्ट मिल रहा है और उन्नति रुकी हुई है। यहाँ उनका विषय यह है कि ऐसी स्थिति में आप स्वयं, किसी अन्य व्यक्ति की सहायता लिए बिना, क्या करेंगे कि आपके पितृ बंधन से मुक्त हो जाएँ।
वक्ता कहते हैं कि पितृ (पितृ) किस-किस प्रकार से बंधन (बंधन) में आते हैं — वह कौन-कौन सा तरीका होता है जिसके द्वारा पितरों को सच में बंधन में लाया जाता है, और पंचमहाभूत शरीर में से किसी एक महाभूत से निर्मित शरीर को लोग कैसे बांधते हैं — इस विषय पर चैनल पर पहले चर्चा हो चुकी है। अब बात यह है कि जब आपको किसी भी माध्यम से, स्वप्न (स्वप्न) के माध्यम से या किसी जानकार व्यक्ति के माध्यम से पता चल गया कि आपके पितृ बंधे हुए हैं, जिसके कारण आपके जीवन में बहुत सारी दुर्घटनाएँ हो रही हैं, कष्ट मिल रहा है, उन्नति रुकी हुई है। ऐसी स्थिति में आप स्वयं ऐसा क्या करेंगे कि आपके पितृ बंधन से मुक्त हो जाएँ — आप स्वयं चाहते हैं, और किसी अन्य व्यक्ति की सहायता न लेकर स्वयं अपने पितरों को बंधन मुक्त कैसे करेंगे। वे कहते हैं कि इसी विषय पर यहाँ पूर्ण रूप से चर्चा की जाएगी।
अपने कुल के भैरव की सहायता लेना
पितरों के बंधन में होने पर सबसे पहला काम क्या करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला और सबसे विशिष्ट चीज है अपने कुल के भैरव का सहयोग लेना, यदि आपको उनके विषय में ज्ञान है। यदि कुल देवी होंगी तो कुल भैरव अवश्य होंगे — वे प्रत्येक कुल में होते ही होते हैं, चाहे सूक्ष्म रूप से हों या प्रत्यक्ष रूप से — और कुल भैरव हर प्रकार के बंधन को काटने में समर्थ, शक्तिशाली होते हैं।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम, जब आपको यह पता चल जाए कि आपके पितृ बंधन में हैं, तो इसमें सबसे पहला और सबसे विशिष्ट चीज है अपने कुल के भैरव का सहयोग लेना — यदि आपको अपने कुल भैरव के विषय में जानकारी है। वे इसी चैनल पर भैरव जी से संबंधित पहले से मौजूद एक वीडियो की ओर संकेत करते हैं। अब कुल देवी अगर होंगी तो कुल भैरव (कुल भैरव) अवश्य होंगे। प्रत्येक कुल में वे होते ही होते हैं, चाहे सूक्ष्म रूप से हों या प्रत्यक्ष रूप से। तो कुल भैरव की सहायता आपको लेनी चाहिए। कुल भैरव जो होते हैं वे हर प्रकार के बंधन को काटने में समर्थ, शक्तिशाली होते हैं।
देवी कृपा से मृत्यु के पश्चात प्राप्त होने वाला भैरव पद
कुल का कोई साधक कुल भैरव का पद कैसे प्राप्त करता है?
जिस प्रकार शक्तिपीठों के रक्षक भैरव होते हैं, उसी प्रकार कुल शक्तियों के रक्षण के हेतु भैरव जी को स्थान दिया गया रहता है। जो तंत्र क्षेत्र में दिव्य दृष्टि प्राप्त करते हैं, जिन्हें तंत्र की सही जानकारी है — जो केवल बड़बोलेपन और पाखंड में नहीं हैं — वे यह भली-भाँति जानते हैं कि कुल का ही कोई साधक, जिसने उच्च कोटि की साधना की हो, कालांतर में मृत्यु के पश्चात देवी कृपा से कुल के भैरव का पद प्राप्त कर सकता है।
वक्ता कहते हैं कि जिस प्रकार से शक्तिपीठ (शक्ति पीठ) के रक्षक भैरव होते हैं, उसी प्रकार से कुल शक्तियों के रक्षण के हेतु भैरव जी को स्थान दिया गया रहता है। और बहुत बार यह कहा भी गया है कि जो तंत्र क्षेत्र में दिव्य दृष्टि (दिव्यदृष्टि) को प्राप्त करते हैं, जिनको तंत्र की सही जानकारी होगी — जो केवल बड़बोलेपन, पाखंड इत्यादि में नहीं हैं, बल्कि जिनको वास्तव में सही मायने में तंत्र सिद्धि या किसी भी शक्ति का ज्ञान है — वे इस चीज को बहुत अच्छी तरीके से जानते हैं: कि कुल का ही कोई साधक, जिसने उच्च कोटि की साधना इत्यादि की हो, कालांतर में मृत्यु के पश्चात देवी कृपा से कुल के भैरव का पद भी प्राप्त कर लेता है।
पितरों और कुल शक्तियों की सद्गति के कारण के रूप में कुल भैरव
कुल भैरव की पूजा से पितर बंधन मुक्त कैसे होते हैं?
क्योंकि वे पितरों के लिए भी सद्गति का कारण बनते हैं और देवताओं के लिए तथा कुल की देवी शक्तियों के लिए भी सद्गति का कारण बनते हैं। इसलिए यदि पितृ बंधन में हैं और आपको अपने कुल भैरव की जानकारी है, तो उनकी पूजा, अर्चना, सेवा और अनुष्ठान करके आप कुल पितरों को बंधन से मुक्त कर देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए वे पितरों के लिए भी सद्गति (सद्गतिदिवंगत प्राणी की शुभ गति, जो पितृ कर्म और तर्पण का उद्देश्य है।) का कारण बनते हैं, और देवताओं के लिए भी तथा कुल की देवी शक्तियों के लिए भी सद्गति का कारण बनते हैं। इसीलिए वे कह रहे हैं कि अगर पितृ बंधन में हैं और अगर आपको अपने कुल के भैरव की जानकारी है, तो उनके माध्यम से — उनकी पूजा, अर्चना, सेवा, अनुष्ठान इत्यादि करके — आप कुल पितरों को बंधन से मुक्त कर देते हैं। वे कहते हैं कि सबसे पहला चीज तो यह हो गया।
पितरों के साथ बैठाई गई प्रेत शक्ति का अर्पण को ग्रहण कर लेना
पितरों से संबंधित मंत्रों का प्रयोग आधी-अधूरी जानकारी में सीधे क्यों नहीं करना चाहिए?
क्योंकि यदि पितृ बंधित हैं, तो आपको यह पता नहीं होता कि अभिचार में कौन सी शक्ति चली है, कौन सा तंत्र-मंत्र किया गया है, या किसी तांत्रिक ने पितरों के साथ कौन सी प्रेत शक्ति बैठा दी होगी। ऐसे में जब आप पितरों से संबंधित किसी मंत्र का अनुष्ठान करेंगे, तो वह पितरों को न प्राप्त होकर उस नकारात्मक शक्ति को प्राप्त होने लगेगा।
वक्ता कहते हैं कि दूसरा, कुल पितरों को बंधन से मुक्त करने के लिए कभी भी आधी-अधूरी जानकारी में जाकर पितरों से संबंधित मंत्रों का प्रयोग सीधे-सीधे न करें। क्योंकि आपको यह पता नहीं होता कि पितृ अगर बंधित हैं तो अभिचार (अभिचार) में चली हुई कोई शक्ति, कोई तंत्र-मंत्र, किसी तांत्रिक व्यक्ति की तंत्र क्रिया की गई हो — और पितरों के साथ पता नहीं कौन सी प्रेत (प्रेत) शक्ति भी बैठा दी गई हो। फिर जब आप पितरों से संबंधित किसी मंत्र का अनुष्ठान करेंगे, तो वह पितरों को न प्राप्त होकर उस नकारात्मक शक्ति को प्राप्त होने लगेगा। वे श्रोताओं को पितरों से संबंधित एक प्लेलिस्ट की ओर भेजते हैं जिसमें यह पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है: कैसे पितरों को हटाकर नकारात्मक शक्तियों को स्थान दिया जाता है, कैसे कुल शक्तियों को हटाकर नकारात्मक शक्तियों को स्थान दे दिया जाता है। आप पूजन-पाठ तो सही कर रहे होंगे, और पूजा कोई और ले रहा होगा। इसलिए कभी भी सीधे-सीधे उनके मंत्रों का प्रयोग नहीं करना है।
दत्तात्रेय की 108 नामावली का फल को छानकर अपने ही पितरों तक पहुँचाना
एक ही शक्ति में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पूर्ण स्वरूप — इसीलिए फल आपके अपने पितरों को ही मिलता है
भगवान दत्तात्रेय ऐसी शक्ति, महाशक्ति हैं जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का पूर्ण स्वरूप विराजमान है। यदि आप उनके शरणागत होकर उनकी 108 नामावली के माध्यम से पितरों के निमित्त तर्पण करते हैं, तो भगवान दत्त की कृपा से ऐसा माध्यम निर्मित होता है कि सभी शुभ कर्मों के फल आपके अपने कुल के पितरों को ही प्राप्त होंगे, और उनके साथ उपस्थित कोई प्रेत शक्ति उसे नहीं पाएगी — यानी छानकर सही चीज सही को ही प्राप्त हो जाएगी।
तो फिर करना कैसे है? वक्ता कहते हैं कि इसमें भगवान दत्तात्रेय (दत्तात्रेय) से संबंधित मंत्र है। भगवान दत्तात्रेय ऐसी शक्ति, महाशक्ति हैं जिनमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश — तीनों का पूर्ण स्वरूप विराजमान है। तो उनकी कृपा से, अगर आप उनके शरणागत होते हैं, दत्तात्रेय के लिए जो माला मंत्र इत्यादि बताए गए हैं उनसे — भगवान दत्तात्रेय की 108 नामों की नामावली (नामावलीदेवता के नामों की लिखित सूची — जैसे दुर्गा के 108 नाम, हवन में प्रत्येक नाम पर पृथक आहुति देने की सुविधा हेतु अलग से लिखे जाते हैं।) है, और उसके माध्यम से अगर आप पितरों के निमित्त तर्पण (तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण।) इत्यादि करते हैं, तो भगवान दत्त की कृपा से ऐसा एक माध्यम निर्मित होता है कि शुभ कर्म के जो सभी फल होते हैं वे आपके अपने कुल के पितरों को ही प्राप्त होंगे। उनके साथ अगर कोई प्रेत शक्ति उपस्थित होगी तो उसे वह चीज नहीं मिलेगी। यानी कि छानकर सीधा सही चीज सही को प्राप्त हो जाएगी।
गुरुवार, अमावस्या या पूर्णिमा, और पीपल, बरगद या बेल का वृक्ष
किसी भी गुरुवार, अमावस्या या पूर्णिमा से, पीपल, बरगद या बेल वृक्ष के नीचे
किसी भी गुरुवार से, किसी भी अमावस्या या किसी भी पूर्णिमा के दिन से आरंभ करें, पीपल के वृक्ष के नीचे या बरगद के वृक्ष के नीचे — अथवा बेल वृक्ष के नीचे — और 108 मंत्रों से, 108 नामों की नामावली से भगवान दत्तात्रेय का तर्पण करें। तर्पण बेल पत्र से किया जा सकता है, पीपल के नीचे बैठे हों तो पीपल के पत्ते से, बरगद के नीचे हों तो बरगद के पत्ते से, अथवा चाँदी के चम्मच से; पात्र में कच्चा दूध लिया जाता है जिसमें गंगाजल मिलाया गया हो।
वक्ता कहते हैं कि इसके लिए किसी भी गुरुवार से, किसी भी अमावस्या (अमावस्या) से या किसी भी पूर्णिमा (पूर्णिमा) के दिन से, पीपल (पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है।) के वृक्ष के नीचे अथवा बरगद के वृक्ष के नीचे — इन दोनों में से — या फिर बेल वृक्ष के नीचे, इन तीनों में से किसी भी वृक्ष के नीचे, 108 मंत्रों से, 108 नामों की नामावली से भगवान दत्तात्रेय का तर्पण करेंगे। वे कहते हैं कि नामावली इंटरनेट पर आराम से उपलब्ध है, और वीडियो के डिस्क्रिप्शन में पीडीएफ का लिंक भी दे दिया जाएगा। तर्पण कैसे करना है? चाहें तो बेल पत्र से कर सकते हैं। पीपल के पेड़ के नीचे बैठे हैं तो पीपल के पत्ते से कीजिए; बरगद के पेड़ के नीचे हैं तो उससे कीजिए; अथवा चाँदी के चम्मच से करिए। एक लोटे में, एक पात्र में आपने कच्चा दूध ले लिया, और कच्चे दूध में गंगाजल (गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त।) मिला लिया है।
श्वेत वस्त्र, पाड़ वाली सफेद साड़ी, और अनिवार्य घूंघट
केवल श्वेत वस्त्र; पाड़ वाली सफेद साड़ी, और घूंघट अवश्य
अपने आसन पर बैठकर आप श्वेत वस्त्र ही पहनेंगे। यदि आप महिला हैं और सफेद साड़ी पहनती हैं, तो साथ में पाड़ वाली हो, और घूंघट अवश्य करेंगी। घूंघट किए बिना महिलाएँ पितरों के निमित्त कभी कोई काम न करें।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम, अपने आसन पर बैठकर आप श्वेत वस्त्र ही पहनेंगे, यानी सफेद वस्त्र पहनेंगे। या अगर आप महिला हैं, अगर सफेद साड़ी पहनती हैं, तो साथ में पाड़ वाली, और घूंघट जरूर करेंगी। घूंघट किए बिना महिलाएँ पितरों के निमित्त कभी भी कोई काम न करें।
पुरुष श्रेष्ठ, अन्यथा बड़ी बहू; और स्थान का चुनाव
घर का कोई पुरुष श्रेष्ठ, अन्यथा बड़ी बहू, और स्थान का चयन
अगर घर में कोई पुरुष कर रहे हैं तो अति उत्तम है। अगर घर का कोई पुरुष करने में समर्थ नहीं है, उसकी स्थिति ऐसी नहीं है कि वह कर पाए, या वह करना ही नहीं चाहता, और आप अपने परिवार के कल्याण के लिए यह करने जा रही हैं, तो घर की बहू यह कर सकती हैं — विशेष करके बड़ी बहू, और अगर वे नहीं करेंगी तो छोटी बहू, घूंघट करके, वैसा पूरा घूंघट जैसा घर की बहुएँ लेती हैं, न कि केवल सिर पर आंचल रखना। स्थान ऐसा पीपल या बरगद हो जहाँ पूजन-पाठ होता हो, कोई निर्जन या तंत्र-मंत्र वाला स्थान नहीं।
वक्ता कहते हैं कि अगर घर में कोई पुरुष कर रहे हैं तो अति उत्तम है। अगर ऐसी कंडीशन है कि आपके घर का कोई पुरुष करने में समर्थ नहीं है, उसकी स्थिति ऐसी नहीं है कि वह कर पाए, या कोई करना ही नहीं चाहे, और आप अपने परिवार के कल्याण के लिए करने जा रही हैं, तो घर की बहू ही इस चीज को कर सकती हैं — विशेष करके बड़ी बहू। अगर बड़ी बहू भी नहीं करने वाली हैं, तब छोटी बहू करें, और घूंघट करके करें: घूंघट इतना हो जैसा घर की बहुएँ लेती हैं, ऐसे नहीं कि केवल सिर पर आंचल रख लिया, बल्कि पूरा घूंघट करके। रही स्थान की बात, तो बरगद या पीपल के उस वृक्ष के नीचे करें जहाँ पूजन-पाठ होता हो। किसी निर्जन स्थान में जाकर या तंत्र-मंत्र वाले स्थान में मत करने लगिएगा। एकदम अच्छी जगह, जहाँ मंदिर इत्यादि हो, उस जगह पर आप कर सकते हैं।
मिश्री, पीतल या चाँदी का लोटा, दूध की मात्रा, और चम्मच
पहले से घुली हुई मिश्री वाला दूध, पीतल या चाँदी के लोटे में, चम्मच से निकाला हुआ
एक लोटे में दूध लें और उसमें थोड़ी सी पत्थर वाली मिश्री डाल दें ताकि वह पहले ही घुल जाए। लोटा पीतल का या चाँदी का होना चाहिए; ध्यान रखें कि तांबे का न हो, स्त्री के लिए विशेष करके — पुरुषों का तांबे में चलेगा, लेकिन प्रयास करें कि पीतल में ही लें। दूध कम से कम आधा लीटर हो, जिसमें गंगाजल इत्यादि मिलाया गया हो; आधा लीटर न हो तो एक पाव में भी आराम से हो जाएगा। चाँदी का चम्मच सर्वश्रेष्ठ है; न हो तो पीपल के पत्ते से भी किया जा सकता है।
वक्ता कहते हैं कि तो एक लोटे में दूध लें, और उसमें थोड़ी सी मिश्री (मिश्रीमिश्री, जो नैवेद्य के रूप में अर्पित की जाती है।) — जो पत्थर वाली मिश्री आती है — डाल दें, जो पहले ही घुल जाए। लोटा पीतल का या चाँदी का होना चाहिए। इसका ध्यान रखें कि तांबे का न हो। स्त्री के लिए विशेष करके। पुरुषों का तांबे में चलेगा, लेकिन प्रयास करें कि पीतल में ही लें। दूध कम से कम आधा लीटर हो, और उसमें गंगाजल इत्यादि मिलाया हो। आधा लीटर न हो तो एक पाव में भी आराम से हो जाएगा। चाँदी का चम्मच सर्वश्रेष्ठ है; न हो तो पीपल के पत्ते से भी किया जा सकता है।
नाम और गोत्र, जड़ में रखा सिक्का, और प्रणाम
हाथ में अक्षत, फूल और सिक्का, और अपने नाम-गोत्र का उच्चारण
हाथ में अक्षत और फूल तथा ₹1 या ₹10 का सिक्का लें। अपने नाम और गोत्र का उच्चारण करते हुए कहें कि अपने कुल के पितरों के निमित्त — उन्हें सद्गति हो, तृप्ति हो, और जिस भी प्रकार की तंत्र प्रक्रिया से वे बाँधे गए हैं उससे उन्हें मुक्ति प्राप्त हो — इस हेतु मैं भगवान दत्तात्रेय का दुग्ध से तर्पण करने का संकल्प लेता/लेती हूँ। फिर उनसे प्रार्थना करें, अक्षत, फूल और सिक्का वृक्ष की जड़ में रख दें, और अपने गुरु, गणपति, अपने कुल के देवी-देवताओं तथा स्थान के देवी-देवताओं को प्रणाम करें।
वक्ता कहते हैं कि हाथ में आप अक्षत (अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं।) और फूल तथा ₹1 का सिक्का या ₹10 का सिक्का लेंगे। सर्वप्रथम अपने नाम और गोत्र (गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है।) का उच्चारण करते हुए बोलेंगे: मैं अपने कुल के पितरों के निमित्त, उनको सद्गति हो, उनको तृप्ति हो, और वे जिस भी प्रकार की तंत्र प्रक्रिया इत्यादि से बाँधे गए हैं उस बंधन से उन्हें मुक्ति प्राप्त हो, इस हेतु भगवान दत्तात्रेय का दुग्ध से तर्पण करने का संकल्प लेता हूँ, लेती हूँ। हे भगवान दत्तात्रेय, आप मेरे कुल के पितरों के ऊपर कृपा करके उनको बंधन मुक्त करें, पुष्ट करें, संतुष्ट करें, ताकि मेरे परिवार का कल्याण हो और उनका आशीर्वाद हमारे परिवार को प्राप्त हो। यह बोलकर अक्षत, फूल और वह सिक्का पीपल वृक्ष की जड़ में रख दीजिए, या बरगद या बेल वृक्ष के नीचे जहाँ बैठे हैं वहाँ रख दीजिए; और उसके पश्चात एक बार, अगर आपके गुरु हैं तो उनका नाम, गणपति (गणेश) का नाम, अपने कुल के देवी-देवताओं का नाम, स्थान के देवी-देवताओं का नाम लेकर सभी को प्रणाम कर लीजिए।
हर नमः पर एक अर्पण, और तीन अमावस्या का क्रम
हर "नमः" पर जड़ में एक-एक बार दूध, और तीन अमावस्या का क्रम
लोटे में से एक-एक बार दूध निकालें और उसे बरगद, पीपल या बेल वृक्ष की जड़ पर डालते जाएँ — जैसे दत्तात्रेय का पहला नाम, "श्री दत्तात्रेयाय नमः", "श्री अनुसूया पुत्राय नमः", तो "नमः" बोलने के साथ ही वह दूध जड़ पर डाल देंगे। पीपल, बरगद या बेल के पत्ते से डालिए, अथवा चाँदी के चम्मच से। इस प्रकार अमावस्या के अमावस्या करते जाएँ; तीन अमावस्या बीतने के पश्चात वक्ता को आशा और उम्मीद है कि कृपा प्राप्त होना आरंभ हो जाएगा। इस चीज को नियमित रूप से नहीं करना है, और अमावस्या को करना सर्वश्रेष्ठ है।
वक्ता कहते हैं कि फिर लोटे में से एक-एक बार आप जल निकालेंगे, दूध निकालेंगे, और उसे बरगद के वृक्ष की जड़ पर, या पीपल वृक्ष या बेल वृक्ष की जड़ पर डालते जाएँगे। जैसे भगवान दत्तात्रेय का पहला नाम — श्री दत्तात्रेयाय नमः, श्री अनुसूया पुत्राय नमः — तो "नमः" बोलने के साथ ही वह दूध जड़ पर डाल देंगे। पीपल के पत्ते से डालिए, बरगद के पत्ते से या बेल के पत्ते से, अथवा चाँदी के चम्मच से। इस प्रकार से आप अमावस्या (अमावस्या) के अमावस्या करते जाएँ। वे कहते हैं कि तीन अमावस्या बीतने के पश्चात आशा और उम्मीद है कि उससे भगवान की कृपा आपको प्राप्त होना शुरू हो जाएगी और पितृ बंधन से मुक्त होकर स्वप्न इत्यादि के माध्यम से आपको दिखाना भी शुरू कर देंगे। इस चीज को नियमित रूप से नहीं करना है; अमावस्या को करेंगे तो सर्वश्रेष्ठ है।
सत्ताईस बार पाठ, श्वेत पुष्प, और लौंग सहित पाँच कपूर
उसी आसन पर सत्ताईस बार पाठ, श्वेत पुष्प और लौंग सहित पाँच कपूर
दूसरा है दत्त माला मंत्र। उसी वृक्ष के नीचे बैठकर, यह तर्पण करने के पश्चात — जिसमें मुश्किल से 5 मिनट लगेंगे — हाथ में एक श्वेत पुष्प लेकर दत्त माला मंत्र का 27 बार पाठ करें, और उस पुष्प को भगवान दत्तात्रेय के नाम से उसी पीपल या बरगद वृक्ष की जड़ में चढ़ा दें। फिर लौंग और कपूर जलाएँ: पाँच कपूर रखें और उनके ऊपर एक-एक लौंग रखें, जोड़े में नहीं बल्कि एक-एक, उन्हें जला दें, भगवान दत्तात्रेय से प्रार्थना करके वापस घर आ जाएँ।
वक्ता कहते हैं कि यह एक प्रयोग हो गया; दूसरा है दत्त माला मंत्र। उसी वृक्ष के नीचे बैठकर, यह प्रयोग करने के पश्चात — इसको करने में मुश्किल से 5 मिनट लगेंगे — इसके पश्चात आप दत्त माला मंत्र (दत्तात्रेय माला मंत्र) का 27 बार पाठ करते हैं। हाथ में एक फूल: श्वेत फूल, श्वेत पुष्प, यानी सफेद रंग का कोई पुष्प, जिसे हाथ में लेकर आप दत्त माला मंत्र का 27 बार पाठ करके उस पुष्प को उसी पीपल वृक्ष की जड़ में या बरगद वृक्ष की जड़ में भगवान दत्तात्रेय के नाम से चढ़ा देंगे। लौंग (लौंगलौंग, जो अर्पण तथा छोटे प्रयोगों में प्रयुक्त होती है।) और कपूर (कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है।) जला देंगे — यानी पाँच कपूर रखें और उनके ऊपर एक-एक लौंग रखेंगे; जोड़े में नहीं रखेंगे, एक-एक लौंग रखेंगे — उन्हें जला दें, और भगवान दत्तात्रेय से प्रार्थना करके वापस घर आ जाना है।
दूसरे उपाय के रूप में हनुमान चालीसा या बजरंग बाण
पितरों को बंधन से मुक्त करने के लिए हनुमान जी का प्रयोग क्यों किया जाता है?
पितरों को बंधन से मुक्त करने का दूसरा उपाय हनुमान जी का प्रयोग है। वक्ता कहते हैं कि हनुमान जी आज के समय में भी इतने सर्वशक्तिशाली, सर्वसमर्थ हैं कि सभी को पता होना चाहिए कि वे हर प्रकार की शक्तियों के बंधन से मुक्त करने में सक्षम हैं। तंत्र ग्रंथों में इसका वर्णन है कि उन्होंने सभी को बंधन से मुक्त किया है; और जो भगवान श्री राम को बंधन से मुक्त कर सकते हैं — भले ही वे इसे श्री राम की कृपा मानते हों — तो आप और हम जैसे सामान्य मनुष्यों के लिए वे क्या नहीं कर सकते। बजरंग बाण का प्रयोग न भी करें, तो केवल हनुमान चालीसा से भी यह किया जा सकता है।
वक्ता कहते हैं कि पितरों को बंधन से मुक्त करने के लिए दूसरा उपाय हनुमान जी का प्रयोग है। हनुमान जी आज के भी समय में इतने सर्वशक्तिशाली, सर्वसमर्थ हैं कि सभी को पता होना चाहिए कि वे हर प्रकार की शक्तियों के बंधन से मुक्त करने में सक्षम होते हैं। तंत्र ग्रंथों में, और इनसे भी आगे की चीजों में, इसका वर्णन है कि उन्होंने कितनी ही बार सभी को बंधन से मुक्त किया है। जो भगवान श्री राम को बंधन से मुक्त कर सकते हैं — भले ही वे इसे श्री राम की कृपा मानते हों — तो आप और हम, एक सामान्य साधारण मनुष्य के लिए वे क्या नहीं कर सकते। तो हनुमान चालीसा (हनुमान चालीसा) का या बजरंग बाण (बजरंग बाण) का प्रयोग। बजरंग बाण का प्रयोग न भी करें, तो हनुमान चालीसा का प्रयोग करके भी आप पितरों को बंधन से मुक्त कर सकते हैं।
अमावस्या को चोला, दोपहर तक निराहार, समय, और संकल्प
अमावस्या से: लंगोट चढ़ाना, चोला चढ़ाना, दोपहर तक निराहार, फिर घर पर संकल्प
अमावस्या तिथि से आरंभ करें। सर्वप्रथम हनुमान जी के मंदिर में लंगोट चढ़ा दीजिए, पहले दिन वहाँ उनका चोला चढ़ा दीजिए, पूजन करके घर आ जाइए। यह प्रयोग दोपहर के समय करना है; दोपहर तक आपको खाना-पीना नहीं है, और अगर न रह पाएँ तो फलाहार कर लीजिए। 10-11 बजे, कम से कम 11:00 बजे से आरंभ कीजिए। हाथ में अक्षत और फूल लेकर, गुरु और गणपति का स्मरण करने के पश्चात संकल्प करें, फिर अगियारी जलाएँ — गाय के गोबर के उपले इस प्रकार जलाएँ कि वे पूरी तरह अच्छे से सुलग जाएँ — और पितरों को बंधन से मुक्त करने के लिए हनुमान चालीसा का हवन करने का संकल्प लें।
वक्ता कहते हैं कि इसके लिए, अमावस्या की तिथि से आरंभ करके, सर्वप्रथम हनुमान जी के मंदिर में लंगोट इत्यादि चढ़ा दीजिए, पहले दिन वहाँ उनका चोला चढ़ा दीजिए, पूजन इत्यादि करके घर आ जाइए। यह प्रयोग दोपहर के समय में करना है; दोपहर तक आपको खाना-पीना नहीं करना है, और अगर न रह पाएँ तो फलाहार कर लीजिए। दिन में 10-11 बजे, कम से कम 11:00 बजे से आरंभ कीजिए। संकल्प इसी प्रकार से कर लेना है: हाथ में अक्षत और फूल लेकर, गुरु और गणपति (गणेश) का स्मरण करने के पश्चात अगियारी जलानी है। अगियारी कैसे करनी है? गाय के गोबर के उपले को इस प्रकार से जलाना है कि वह पूरी तरीके से अच्छे से सुलग जाए, पूरा उसमें आग अच्छे से हो जाए। उसके पश्चात आपने संकल्प कर लिया है: पितरों को बंधन से मुक्त करने के लिए, हे हनुमान जी, मैं आपके हनुमान चालीसा का हवन करने का संकल्प लेता हूँ, लेती हूँ।
गुग्गल और घी की आहुति, और स्त्रियों के घी देने पर निषेध
गुग्गल में घी मिलाकर, हर चौपाई पर एक आहुति — स्त्रियाँ घी की आहुति नहीं देतीं
गुग्गल और घी मिलाएँ; मिलाने पर यह काफी गाढ़ा हो जाएगा, तो चम्मच से निकालें, हनुमान चालीसा की एक-एक चौपाई पढ़ते जाएँ और उसके ऊपर डालते जाएँ। पुरुष घी और गुग्गल दोनों से आहुति करेंगे; स्त्रियाँ, यदि वे अपने पितरों के निमित्त उन्हें बंधन से मुक्त करने के लिए कर रही हैं, तो केवल गुग्गल से आहुति देंगी, घी से आहुति उन्हें नहीं देनी है। इस बात का ध्यान रखें, और यहाँ भी यह प्रयोग घूंघट लेकर ही करना है।
वक्ता कहते हैं कि गुग्गल (गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त।) और घी को मिलाकर — और जब गुग्गल और घी को मिला दिया जाएगा तो यह काफी गाढ़ा हो जाएगा — आप चम्मच से निकालेंगे, हनुमान चालीसा की एक-एक चौपाई को पढ़ते जाएँगे, और उसके ऊपर डालते जाएँगे। पुरुष जो होगा वह घी और गुग्गल दोनों से आहुति (आहुति) करेगा। स्त्रियाँ, अगर वे अपने पितरों के निमित्त उन्हें बंधन से मुक्त करने के लिए कर रही हैं, तो केवल गुग्गल से आहुति देंगी; घी से आहुति उनको नहीं देनी है। वे कहते हैं कि इस बात का ध्यान रखें, और यहाँ पर भी आपको घूंघट लेकर ही इस प्रयोग को करना है।
समापन की आहुतियाँ, घर में धुआँ, और करने का क्रम
राम और सीता के नाम से एक-एक आहुति, फिर चारों भाई, और धुएँ को पूरे घर में दिखाना
जब आहुतियाँ पूर्ण हो जाएँ, तो राम जी के नाम से और सीता जी के नाम से एक-एक आहुति दें, फिर चारों भाइयों के नाम से आहुतियाँ, और उसके पश्चात शिव जी तथा भगवती पार्वती के नाम से एक-एक आहुति दें। फिर जो धुआँ उठ रहा होगा — या धुआँ न भी हो — उसे अपने पूरे घर में सब जगह दिखाकर मुख्य द्वार के पास लाकर रख दीजिए। यह अमावस्या से आरंभ करें, और अगर अमावस्या तिथि तक लगातार करेंगे तो अति उत्तम है; नहीं तो कम से कम हर अमावस्या तिथि को करते जाइए, या मंगलवार और शनिवार को करते जाइए।
वक्ता कहते हैं कि जब आहुति पूर्ण हो जाएगी तो राम जी के नाम से और सीता जी के नाम से एक-एक आहुति देकर, चारों भाइयों के नाम से आहुति इत्यादि देकर, उसके पश्चात शिव जी और भगवती पार्वती के नाम से एक-एक आहुति दें। फिर वह जो धुआँ उठ रहा होगा — या धुआँ न भी हो — उसे अपने घर में सब कुछ पूरे तरीके से दिखाकर, और मुख्य द्वार के पास लाकर रख दीजिए। यह कार्य आपको अमावस्या (अमावस्या) से आरंभ करके, कम से कम अमावस्या तिथि तक अगर लगातार करेंगे तो अति उत्तम है; नहीं तो कम से कम हर अमावस्या तिथि को इसको करते जाइए, या मंगलवार और शनिवार को करते जाइए। वे कहते हैं कि यह अति प्रभावशाली होता है — यह दूसरा प्रकार हुआ।
काली मंदिर का प्रयोग और ज्वालामुखी पत्थर
तीसरा उपाय तांत्रोक्त है, काली मंदिर में किया जाता है, और उसमें दुर्लभ वस्तुएँ चाहिए
पितरों को बंधन से मुक्त करने का तीसरा प्रयोग तांत्रोक्त संबंधी है, जो भगवती काली के मंदिर में किया जाता है। लेकिन इसमें बहुत सारी ऐसी वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है जो सामान्यतः उपलब्ध नहीं हो पातीं, इसलिए वक्ता कहते हैं कि यह प्रयोग तभी करना चाहिए जब आप बहुत सारे प्रयोग कर चुके हों और कोई प्रभाव प्राप्त न हो पा रहा हो। इसमें एक पत्थर चाहिए जिसे ज्वालामुखी पत्थर कहा जाता है, जो पूजन की दुकान पर बोलने से थोड़ा महँगा होता है, लेकिन मिलने की संभावना रहती है।
वक्ता कहते हैं कि अपने पितरों को बंधन से मुक्त करने के लिए तीसरा प्रयोग तांत्रोक्त (तंत्रोक्ततंत्र में कहा गया, जो उसी कर्म अथवा मंत्र के वेदोक्त रूप से भिन्न होता है।) संबंधी प्रयोग है, जो भगवती काली (काली) के मंदिर में किया जाता है। लेकिन इस प्रयोग को करने के लिए आपको बहुत सारी ऐसी वस्तुओं की आवश्यकता पड़ेगी जो सामान्यतः उपलब्ध नहीं हो पातीं। अगर आप कर सकें तो इस चीज को कीजिए — यह प्रयोग तभी करना चाहिए जब आप बहुत सारे प्रयोग कर चुके हों और कोई प्रभाव आपको प्राप्त न हो पा रहा हो। तब इसमें आपको एक पत्थर की आवश्यकता पड़ेगी, जिसे ज्वालामुखी पत्थर कहा जाता है। पूजन की दुकान पर बोलने से यह थोड़ा महँगा होता है, लेकिन मिलने की संभावना रहती है। अगर मिल जाए तो अति उत्तम है।
बारह वर्ष पुराना काली मंदिर और अर्गला के प्रथम मंत्र का सवा घंटा जप
कम से कम बारह वर्ष पुराना काली मंदिर, गंगा में स्नान कराया पत्थर, और अर्गला के प्रथम मंत्र का सवा घंटा जप
उस पत्थर को लेकर भगवती काली के ऐसे मंदिर में जाइए जो कम से कम 12 वर्ष पुराना हो, उसका गंगा जी में स्नान करवाकर — यानी गंगाजल से स्नान करवाकर — पंडित जी से बोलकर उस पत्थर को भगवती काली के श्री चरणों पर रखवाइए। वहाँ रखवाने के पश्चात आपको अर्गला के प्रथम मंत्र का कम से कम सवा घंटा जप करना है, और संकल्प पहले ही ले लेना है, पितरों को बंधन से मुक्ति के लिए।
वक्ता कहते हैं कि उस पत्थर को लेकर भगवती काली के ऐसे मंदिर में जाना है जो कम से कम 12 वर्ष पुराना हो, और गंगा जी में स्नान इत्यादि करवाकर — यानी गंगाजल (गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त।) से स्नान करवाकर — उस पत्थर को भगवती काली के श्री चरणों पर रखवाना है, पंडित जी से बोलकर। और वहाँ रखवाने के पश्चात, उसके बाद जो अर्गला (अर्गला स्तोत्र) का प्रथम मंत्र है, उसका कम से कम सवा घंटा आपको जप करना है। संकल्प पहले ही ले लेना है, पितरों को बंधन से मुक्ति के लिए।
केवल अमावस्या, स्पर्श निषेध, दक्षिण चरण, और दो पीपल के पत्ते
केवल अमावस्या को, पत्थर को हाथ से न छूना, दक्षिण चरण से दो पीपल पत्तों पर उठाना
यह केवल अमावस्या तिथि को ही करना है। पीपल का पत्ता लेकर जाइए; उस पत्थर को आपको स्पर्श नहीं करना है — इसका ध्यान रखें — और पंडित जी को दान-दक्षिणा देकर उनसे भी इस तरीके से बात कर लें कि वे भी उस पत्थर को स्पर्श न करें। भगवती काली के चरणों में से दक्षिण चरण पर, यानी दाहिने पैर पर, इसे रखा जाता है। वहाँ से पीपल के पत्ते से ही उसे ढकेलकर दूसरे पीपल के पत्ते पर ले लेंगे, और उस पत्थर को पीले कपड़े में या सफेद कपड़े में बाँध लेना है।
वक्ता कहते हैं कि सवा घंटा जप करने के पश्चात — और यह अमावस्या (अमावस्या) तिथि को ही करना है — पीपल का पत्ता लेकर जाइए। पीपल के पत्ते पर: अब आपको उस पत्थर को स्पर्श नहीं करना है, ध्यान रखें। और पंडित जी को भी दान-दक्षिणा देकर उनसे इस तरीके से बात कर लें कि वे भी उस पत्थर को स्पर्श न करें। भगवती काली के चरणों में से किस चरण पर रखेंगे? दक्षिण चरण पर — भगवती काली के जो दाहिना पैर, चरण है, उस पर रखना है। वहाँ से पीपल के पत्ते से ही उसको ढकेलकर दूसरे पीपल के पत्ते पर उसे ले लेंगे, और उस पत्थर को पीले कपड़े में या सफेद कपड़े में बाँध लेना है।
मुख्य प्रवेश द्वार, प्रवेश करते समय दाहिनी ओर, और प्रतिदिन धूप-दीप
मुख्य द्वार पर, प्रवेश करते समय दाहिनी ओर पड़ने वाली दिशा में, और प्रतिदिन धूप-दीप
उसे घर लाकर घर के मुख्य दरवाजे पर, जो प्रवेश द्वार है: जब आप बाहर से अंदर की ओर प्रवेश करते हैं तो जो आपकी दाहिनी ओर पड़ेगा, और अंदर से बाहर निकलते समय बाईं ओर — उसी ओर उसे लटकाना है, बाहर की ओर ही, प्रवेश करने के समय के अनुसार। उसके पश्चात प्रतिदिन भगवती काली के नाम से धूप-दीप करें, अर्गला के प्रथम मंत्र को पढ़ते हुए।
वक्ता कहते हैं कि उसे घर लाकर, घर के मुख्य दरवाजे पर, जो दरवाजा प्रवेश द्वार है: जब आप बाहर से अंदर की ओर प्रवेश करते हैं तो वह आपकी दाहिनी ओर पड़ेगा, और जब अंदर से बाहर की ओर निकलेंगे तो वह आपकी बाईं ओर पड़ेगा। उसी ओर उसे लटका देना है, बाहर की ओर ही, प्रवेश करने के समय के अनुसार। और उसके पश्चात प्रतिदिन, भगवती काली के नाम से धूप (धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है।) और दीप के साथ, अर्गला (अर्गला स्तोत्र) के प्रथम मंत्र को पढ़ते हुए आप करते जाइए।
पत्थर में स्थित सुधा शक्ति, और असली पत्थर मिलने की शर्त
पत्थर की सुधा शक्ति ही कार्य करती है — बशर्ते पत्थर असली हो
वक्ता कहते हैं कि उसमें जो सुधा शक्ति होती है वही कार्य करती है, और पितृ कितने भी बड़े बंधन में पड़े हों, वह उन्हें उससे मुक्त कर देती है। यह एक परीक्षित प्रयोग है, लेकिन ज्वालामुखी पत्थर मिलना थोड़ा कठिन होता है; असली मिल जाए तो कार्य एक ही बार में संपादित हो जाता है। वे यह भी जोड़ते हैं कि पितरों का बंधन मुक्त होना एक बात है, और उसके बाद वे क्रियान्वित होंगे अथवा नहीं, तथा आपके लिए किस प्रकार के कार्य करेंगे, यह अलग विषय है।
वक्ता कहते हैं कि उसमें जो सुधा शक्ति होती है वह इस चीज का कार्य करती है, और पितृ कितने भी बड़े बंधन में पड़े हों, वह उन्हें उससे मुक्त कर देती है। यह एक परीक्षित प्रयोग है, लेकिन ज्वालामुखी पत्थर मिलना थोड़ा कठिन होता है। असली मिल जाए तो कार्य एक ही बार में संपादित हो जाता है। वे कहते हैं कि ऐसे चांस बहुत कम होते हैं — पितरों का बंधन मुक्त होना अलग बात हो गई। इससे वे बंधन मुक्त हो जाएँगे; वे क्रियान्वित होंगे अथवा नहीं, और आपके लिए किस प्रकार के कार्य करेंगे, वह अलग विषय होता है। अंत में वे आशा करते हैं कि आज बताए गए ये तीन मुख्य प्रयोग सभी को लाभ पहुँचाएँगे और श्रोता अपने-अपने पितरों को बंधन से मुक्त करने में सक्षम होंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।