बंधन में पड़े पितरों की मुक्ति — कुल भैरव, दत्तात्रेय तर्पण, हनुमान चालीसा हवन और ज्वालामुखी पत्थर
बंधे हुए पितरों को मुक्त करने के तीन प्रयोग।
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पितृ बंधन में हों तो सबसे पहला सहारा कुल भैरव
कुल का साधक मृत्यु के बाद कुल भैरव बन सकता है
वक्ता कहते हैं कि जब आपको स्वप्न से या किसी जानकार व्यक्ति से पता चल जाए कि आपके पितृ बंधन में हैं और उसी कारण जीवन में दुर्घटनाएँ, कष्ट और रुकी हुई उन्नति है, तो सबसे पहला और सबसे विशिष्ट काम है अपने कुल के भैरव का सहयोग लेना, यदि आप उन्हें जानते हैं। जहाँ कुलदेवी हैं वहाँ कुल भैरव अवश्य हैं; हर कुल में होते ही हैं, सूक्ष्म रूप से या प्रत्यक्ष रूप से, और कुल भैरव हर प्रकार का बंधन काटने में समर्थ होते हैं। वे बताते हैं कि कुल का कोई साधक जिसने उच्च कोटि की साधना की हो, मृत्यु के बाद देवी की कृपा से कुल भैरव का पद पा सकता है, इसीलिए वह पितरों और कुल शक्तियों दोनों की सद्गति का कारण बनता है। अतः उनकी पूजा, अर्चना, सेवा और अनुष्ठान से कुल के पितृ बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
वक्ता वहाँ से आरंभ करते हैं जब किसी व्यक्ति को किसी भी माध्यम से — स्वप्न से या किसी जानकार व्यक्ति से — पता चलता है कि उसके पितृ बंधे हुए हैं, जिसके कारण जीवन में बहुत सी दुर्घटनाएँ हो रही हैं, कष्ट मिल रहा है और उन्नति रुकी हुई है। उनका विषय है कि ऐसा व्यक्ति किसी और की सहायता लिए बिना स्वयं क्या करे कि पितृ बंधन से मुक्त हों। वे कहते हैं कि सबसे पहला और सबसे विशिष्ट काम है अपने कुल के भैरव का सहयोग लेना, यदि आपको उनका ज्ञान है। कुलदेवी होंगी तो कुल भैरव अवश्य होंगे; प्रत्येक कुल में होते ही हैं, चाहे सूक्ष्म रूप से हों या प्रत्यक्ष रूप से। कुल भैरव हर प्रकार के बंधन को काटने में समर्थ और शक्तिशाली होते हैं। जैसे शक्ति पीठ के रक्षक भैरव होते हैं, वैसे ही कुल शक्तियों के रक्षण के लिए भैरव जी को स्थान दिया गया रहता है। वे एक बात उन लोगों के हवाले से जोड़ते हैं जिन्हें तंत्र क्षेत्र में दिव्यदृष्टि प्राप्त है — जिन्हें सही जानकारी है, जो केवल बड़बोलेपन और पाखंड में नहीं हैं: कुल का कोई साधक जिसने उच्च कोटि की साधना की हो, कालांतर में मृत्यु के बाद देवी की कृपा से कुल भैरव का पद भी पा लेता है। इसीलिए वह पितरों की भी और देवताओं तथा कुल की देवी शक्तियों की भी सद्गति का कारण बनता है। अतः यदि पितृ बंधन में हैं और आप अपने कुल भैरव को जानते हैं, तो उनकी पूजा, अर्चना, सेवा और अनुष्ठान करके आप कुल के पितरों को बंधन से मुक्त कर देते हैं। यदि यह जानकारी नहीं है, तो वे आगे अन्य तरीके बताते हैं।
सावधानी: पितृ बंधे हों तो पितृ मंत्रों का सीधा प्रयोग कभी न करें
पितरों के साथ बैठाया प्रेत भोग ले लेता है
वक्ता चेतावनी देते हैं कि पितृ को बंधन से मुक्त करने के लिए आधी-अधूरी जानकारी में पितरों से संबंधित मंत्रों का सीधा प्रयोग कभी न करें। पितृ बंधे हैं तो आपको पता नहीं कि अभिचार में कौन सी शक्ति चलाई गई है या किसी तांत्रिक ने पितरों के साथ कौन सी प्रेत शक्ति बैठा दी है; तब पितृ मंत्र का अनुष्ठान पितरों को न मिलकर उसी नकारात्मक शक्ति को मिलने लगता है। वे कहते हैं कि पूजा-पाठ आप सही कर रहे होंगे, पर उसे कोई और ले रहा होगा।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात एक सावधानी है: कुल के पितृ को बंधन से मुक्त करने के लिए कभी भी आधी-अधूरी जानकारी में जाकर पितरों से संबंधित मंत्रों का सीधे-सीधे प्रयोग न करें। कारण वे यह बताते हैं कि यदि पितृ बंधित हैं तो आपको पता नहीं होता कि अभिचार में कौन सी शक्ति चलाई गई है, कौन सा तंत्र-मंत्र किया गया है, किस तांत्रिक ने क्रिया की है — और पितरों के साथ न जाने कौन सी प्रेत शक्ति भी बैठा दी गई होगी। तब जब आप पितरों से संबंधित किसी मंत्र का अनुष्ठान करेंगे, तो वह पितरों को न मिलकर उस नकारात्मक शक्ति को मिलने लगेगा। वे कहते हैं कि यह बात उनकी पितृ प्लेलिस्ट में पहले स्पष्ट की जा चुकी है: कैसे पितरों को हटाकर नकारात्मक शक्तियों को स्थान दिया जाता है, और कैसे कुल शक्तियों को हटाकर नकारात्मक शक्तियों को बैठा दिया जाता है। पूजा-पाठ आप सही कर रहे होंगे, लेकिन उसे कोई और ले रहा होगा। इसलिए उनके मंत्रों का सीधा प्रयोग कभी नहीं करना है; सुरक्षित रास्ता, वे आगे कहते हैं, भगवान दत्तात्रेय के माध्यम से जाता है।
बंधे पितरों को अर्पण के लिए दत्तात्रेय सुरक्षित माध्यम क्यों हैं
ब्रह्मा, विष्णु, महेश एक में — फल को छानने वाला माध्यम
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय ऐसी महाशक्ति हैं जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का पूर्ण स्वरूप विराजमान है। यदि आप उनके शरणागत होकर उनकी 108 नामावली के माध्यम से पितृ के निमित्त तर्पण करते हैं, तो उनकी कृपा से ऐसा माध्यम बनता है कि हर शुभ कर्म का फल केवल आपके अपने कुल के पितरों को ही मिलता है; उनके साथ बैठी कोई प्रेत शक्ति उसे नहीं पा सकती। वे कहते हैं कि यह छनकर जाता है, सही चीज सही को मिल जाती है।
पितृ मंत्रों के सीधे प्रयोग से मना करने के बाद वक्ता बताते हैं कि करना कैसे है: भगवान दत्तात्रेय से संबंधित मंत्रों के माध्यम से। वे कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय ऐसी शक्ति, ऐसी महाशक्ति हैं जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का पूर्ण स्वरूप विराजमान है। यदि उनकी कृपा से आप उनके शरणागत होते हैं और उनसे संबंधित साधन — दत्तात्रेय माला मंत्र की बात वे अन्यत्र बता चुके हैं — तथा उनकी 108 नामावली के माध्यम से पितृ के निमित्त तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। करते हैं, तो दत्त की कृपा से ऐसा माध्यम निर्मित होता है कि सभी शुभ कर्मों का फल केवल आपके अपने कुल के पितरों को ही प्राप्त होता है। उनके साथ यदि कोई प्रेत शक्ति उपस्थित होगी तो उसे वह चीज नहीं मिलेगी। उनके शब्दों में, छानकर सीधे का सीधा सही चीज सही को मिल जाती है। इसी कारण वे इस वीडियो का सारा पितृ-कार्य दत्तात्रेय के माध्यम से करवाते हैं।
बंधे पितरों की मुक्ति के लिए पीपल, बरगद या बेल के नीचे दत्तात्रेय 108 नाम दुग्ध तर्पण
दिन, वृक्ष, वस्त्र, कर्ता, सामग्री, संकल्प, तर्पण, अवधि
वक्ता बंधे पितृ के लिए भगवान दत्तात्रेय के 108 नामों से तर्पण बताते हैं, जो किसी भी गुरुवार, अमावस्या या पूर्णिमा से पीपल, बरगद या बिल्व वृक्ष के नीचे ऐसी जगह आरंभ हो जहाँ पूजन-पाठ होता हो, किसी निर्जन तंत्र-मंत्र वाले स्थान पर नहीं। पीतल या चांदी के लोटे में (तांबे में नहीं, स्त्री के लिए तो विशेष रूप से) कम से कम आधा लीटर या एक पाव कच्चा दूध गंगाजल और पहले से घुली मिश्री के साथ लिया जाता है, और नाम-गोत्र के संकल्प, अक्षत, फूल तथा ₹1 या ₹10 के सिक्के के बाद 108 नामों के हर 'नमः' पर वृक्ष के पत्ते या चांदी के चम्मच से जड़ पर डाला जाता है। श्वेत वस्त्र पहनना है; स्त्री पाड़ वाली सफेद साड़ी और पूरा घूंघट रखे, क्योंकि स्त्रियाँ बिना घूंघट पितृ-कार्य कभी न करें। घर का पुरुष सर्वोत्तम; वह न हो तो बड़ी बहू, फिर छोटी बहू। यह हर अमावस्या को होता है, नित्य नहीं, और तीन अमावस्या के बाद वे कृपा आरंभ होने और पितरों के स्वप्न में दिखने की आशा रखते हैं।
दिन, वृक्ष और स्थान। वक्ता कहते हैं कि किसी भी गुरुवार, किसी भी अमावस्या या किसी भी पूर्णिमा से आरंभ करें, पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। वृक्ष, बरगदबरगद का वृक्ष, जिसके नीचे कुछ प्रयोग किए जाते हैं और जिस पर प्रेत योनि का वास माना जाता है। वृक्ष या फिर बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। वृक्ष के नीचे बैठकर। भगवान दत्तात्रेय की 108 नामावली इंटरनेट पर आराम से मिल जाती है। वृक्ष ऐसा हो जहाँ पूजन-पाठ होता हो, मंदिर आदि के पास — किसी निर्जन तंत्र-मंत्र वाले स्थान में मत जाइए। वस्त्र और कर्ता। आसन पर बैठकर केवल श्वेत वस्त्र पहनें। स्त्री सफेद साड़ी पहने तो पाड़ वाली, और घूंघटसिर पर डाला जाने वाला घूंघट, जो कुछ कर्मों में आवश्यक और कुछ में वर्जित है। अवश्य करे; स्त्रियाँ बिना घूंघट पितरों के निमित्त कोई काम कभी न करें। घर का कोई पुरुष करे तो अति उत्तम। यदि घर का कोई पुरुष समर्थ न हो, उसकी स्थिति न हो, या करना ही न चाहे, और काम परिवार के कल्याण के लिए है, तो घर की बहू कर सकती है — विशेषकर बड़ी बहू; वह न करे तो छोटी बहू — पूरा घूंघट करके, जैसा घर की बहुएँ लेती हैं, केवल सिर पर आंचल रखना नहीं। सामग्री। लोटे में कच्चा दूध, उसमें गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। और थोड़ी पत्थर वाली मिश्रीमिश्री, जो नैवेद्य के रूप में अर्पित की जाती है। पहले से डालकर घुला लें। लोटा पीतल या चांदी का हो, तांबे का नहीं — स्त्री के लिए तो विशेष रूप से; पुरुष का तांबे में चल जाएगा, पर प्रयास पीतल का ही करें। कम से कम आधा लीटर दूध; न हो तो एक पाव में भी आराम से हो जाएगा। चांदी का चम्मच सर्वश्रेष्ठ है, या जिस पीपल, बरगद या बेल के नीचे बैठे हैं उसका पत्ता। हाथ में अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं।, फूल और ₹1 या ₹10 का सिक्का लें। संकल्प। अपने नाम और गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है। का उच्चारण करते हुए कहें कि अपने कुल के पितरों के निमित्त — उन्हें सद्गति हो, तृप्ति हो, और जिस भी तंत्र प्रक्रिया से वे बंधे गए हैं उससे मुक्ति मिले — मैं भगवान दत्तात्रेय का दुग्ध तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। करने का संकल्प लेता/लेती हूँ; और उनसे प्रार्थना करें कि कुल के पितरों को बंधन मुक्त, पुष्ट और संतुष्ट करें ताकि परिवार का कल्याण हो और उनका आशीर्वाद मिले। फिर अक्षत, फूल और सिक्का वृक्ष की जड़ में रख दें, और गुरु हों तो उनका, गणपति का, कुल के देवी-देवताओं और स्थान के देवी-देवताओं का नाम लेकर सबको प्रणाम कर लें। तर्पण और अवधि। लोटे से एक-एक बार दूध निकालकर हर नाम पर जड़ में डालते जाएँ — जैसे पहले नाम 'श्री दत्तात्रेयाय नमः', 'श्री अनुसूया पुत्राय नमः' पर 'नमः' बोलते ही दूध जड़ पर। यह अमावस्या के अमावस्या करते जाएँ; नित्य नहीं करना है, अमावस्या को करना सर्वश्रेष्ठ है। तीन अमावस्या बीतने पर वे आशा रखते हैं कि कृपा आरंभ हो जाएगी और पितृ बंधन से मुक्त होकर स्वप्न आदि में दिखने लगेंगे। पूरे तर्पण में मुश्किल से पाँच मिनट लगते हैं।
तर्पण के बाद 27 बार दत्त माला मंत्र, श्वेत पुष्प और पाँच कपूर के साथ
उसी आसन पर दूसरा प्रयोग
वक्ता कहते हैं कि उसी वृक्ष के नीचे बैठकर, दत्तात्रेय दुग्ध तर्पण के तुरंत बाद, हाथ में श्वेत पुष्प लेकर dattatreya-mala-mantra का 27 बार पाठ करें और वह फूल भगवान दत्तात्रेय के नाम से पीपल या बरगद की जड़ में चढ़ा दें। फिर पाँच कपूर रखकर हर एक पर एक-एक लौंग रखें — जोड़े में नहीं, एक-एक — उन्हें जला दें, दत्तात्रेय से प्रार्थना करें और घर लौट आएँ।
वक्ता कहते हैं कि दूसरा प्रयोग दत्त माला मंत्र है। यह उसी वृक्ष के नीचे बैठकर तर्पण के बाद किया जाता है, जिसमें मुश्किल से पाँच मिनट लगते हैं। हाथ में श्वेत पुष्प लेकर dattatreya-mala-mantra का 27 बार पाठ करें। फिर वह पुष्प भगवान दत्तात्रेय के नाम से उसी पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। या बरगद वृक्ष की जड़ में चढ़ा दें। फिर लौंग-कपूर जला दें: पाँच कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है। रखें और हर एक के ऊपर एक-एक लौंगलौंग, जो अर्पण तथा छोटे प्रयोगों में प्रयुक्त होती है। रखें — जोड़े में नहीं, एक-एक — उन्हें जलाएँ, भगवान दत्तात्रेय से प्रार्थना करें और वापस घर आ जाएँ।
हनुमान जी पितरों को हर प्रकार के बंधन से क्यों मुक्त कर सकते हैं
जो श्री राम को मुक्त कर सके, वे साधारण मनुष्य को भी
बंधे पितृ के लिए वक्ता का दूसरा उपाय हनुमान जी का प्रयोग है, जो उनके अनुसार आज के समय में भी इतने सर्वशक्तिशाली हैं कि सबको पता होना चाहिए कि वे हर प्रकार की शक्ति के बंधन से मुक्त कर सकते हैं; तंत्र ग्रंथों में वर्णन है कि उन्होंने सबको बंधन से मुक्त किया। जो भगवान श्री राम को बंधन से मुक्त कर सकते हैं — भले उसे श्री राम की कृपा माना जाए — वे हम-आप जैसे साधारण मनुष्य के लिए क्या नहीं कर सकते। हनुमान चालीसा या bajrang-baan का प्रयोग होता है, और बजरंग बाण न भी करें तो केवल चालीसा से भी पितृ मुक्त हो सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि पितृ को बंधन से मुक्त करने का दूसरा उपाय हनुमान जी का प्रयोग है। हनुमान जी आज के समय में भी इतने सर्वशक्तिशाली और सर्वसमर्थ हैं कि सबको पता होना चाहिए कि वे हर प्रकार की शक्ति के बंधन से मुक्त करने में सक्षम हैं। तंत्र ग्रंथों में कई बार वर्णन है कि उन्होंने सबको बंधन से मुक्त किया है। जो भगवान श्री राम को बंधन से मुक्त कर सकते हैं — भले लोग मानें कि वह श्री राम की कृपा से हुआ — वे आप-हम जैसे सामान्य मनुष्य के लिए क्या नहीं कर सकते। अतः प्रयोग हनुमान चालीसा या bajrang-baan का है; और बजरंग बाण का प्रयोग न भी करें तो केवल हनुमान चालीसा से भी पितरों को बंधन से मुक्त किया जा सकता है। इसके साथ जो हवन वे बताते हैं, वह आगे है।
बंधे पितरों की मुक्ति के लिए अमावस्या से आरंभ गुग्गल-घी का हनुमान चालीसा हवन
स्त्रियाँ केवल गुग्गल से आहुति दें; धुआँ पूरे घर में दिखाएँ
बंधे पितृ के लिए वक्ता का हनुमान चालीसा हवन अमावस्या से आरंभ होता है: पहले हनुमान मंदिर में लंगोट और चोला चढ़ाएँ, फिर घर पर दोपहर तक निराहार (या फलाहार पर) रहकर लगभग 11 बजे गाय के गोबर के उपला की अच्छी तरह सुलगी अगियारी जलाएँ, गुरु-गणपति का स्मरण कर अक्षत-फूल लेकर संकल्प करें, और चालीसा की हर चौपाई पर घी में मिले गुग्गुल की एक आहुति दें। पुरुष घी और गुग्गल दोनों से आहुति दे; स्त्री केवल गुग्गल से, घी से कभी नहीं, और घूंघट रखे। अंत में राम, सीता, चारों भाइयों, शिव और पार्वती के नाम एक-एक आहुति देकर धुआँ पूरे घर में दिखाएँ और अग्नि मुख्य द्वार के पास रख दें। अमावस्या से अमावस्या तक नित्य करें तो सर्वोत्तम; नहीं तो हर अमावस्या, या मंगल-शनिवार को।
आरंभ। वक्ता कहते हैं कि अमावस्या तिथि से आरंभ करें। पहले दिन हनुमान मंदिर जाकर लंगोटहनुमान और भैरव को अर्पित किया जाने वाला लंगोट। चढ़ाएँ, चोला चढ़ाएँ, पूजन करके घर आ जाएँ। प्रयोग दोपहर में करना है; तब तक खाना-पीना नहीं, न रह पाएँ तो फलाहारव्रत के दिनों में अन्न के स्थान पर लिया जाने वाला फलाहार। कर लें। दस-ग्यारह बजे, कम से कम 11 बजे से आरंभ करें। संकल्प और अग्नि। हाथ में अक्षत-फूल लेकर गुरु-गणपति का स्मरण करें और संकल्प लें: 'हे हनुमान जी, पितरों को बंधन से मुक्त करने के लिए मैं आपकी हनुमान चालीसा का हवन करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।' अगियारी जलाएँ — गाय के गोबर के उपलासूखा गोबर का उपला, जो हवन और बाहरी प्रयोगों में अग्नि का आधार बनता है। ऐसे सुलगाएँ कि उनमें आग अच्छी तरह हो जाए। आहुति। गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त। और घी मिला लें; मिश्रण काफी गाढ़ा होता है, इसलिए चम्मच से निकालें। हनुमान चालीसा की एक-एक चौपाई पढ़ते जाएँ और हर चौपाई पर एक आहुति डालते जाएँ। पुरुष घी और गुग्गल दोनों से आहुति दे। स्त्री अपने पितरों के लिए कर रही हो तो केवल गुग्गल से आहुति दे, घी से नहीं; और यहाँ भी घूंघटसिर पर डाला जाने वाला घूंघट, जो कुछ कर्मों में आवश्यक और कुछ में वर्जित है। लेकर ही प्रयोग करे। समापन और धुआँ। आहुति पूरी होने पर राम जी और सीता जी के नाम एक-एक आहुति दें, फिर चारों भाइयों के नाम, फिर शिव जी और भगवती पार्वती के नाम एक-एक आहुति। उठता धुआँ — धुआँ न भी हो तो अग्नि — पूरे घर में अच्छी तरह दिखाएँ और मुख्य द्वार के पास लाकर रख दें। अवधि। अमावस्या से आरंभ करके अगली अमावस्या तिथि तक नित्य करें तो अति उत्तम; नहीं तो हर अमावस्या तिथि को करते जाएँ, या मंगलवार और शनिवार को। वे इसे अति प्रभावशाली बताते हैं।
बंधे पितरों की मुक्ति के लिए काली मंदिर में ज्वालामुखी पत्थर का प्रयोग
अंतिम उपाय; पत्थर को हाथ से कभी नहीं छूना
वक्ता का तीसरा उपाय एक तंत्रोक्त प्रयोग है जिसे तभी करें जब बहुत से प्रयोग करके भी प्रभाव न मिला हो, क्योंकि इसमें कठिनाई से मिलने वाली वस्तु चाहिए: ज्वालामुखी पत्थर, जो कुछ पूजन की दुकानों पर महँगा मिलता है। अमावस्या को उसे गंगाजल से स्नान कराकर कम से कम 12 वर्ष पुराने मंदिर में पंडित से भगवती काली के दाहिने चरण पर रखवाएँ; संकल्प लेकर अर्गला स्तोत्र के प्रथम मंत्र का कम से कम सवा घंटे जप करें। न आप, न पंडित (जिन्हें इसके लिए दान-दक्षिणा दें) पत्थर को छुएँ: पीपल के पत्ते से ढकेलकर दूसरे पीपल के पत्ते पर लें, पीले या सफेद कपड़े में बाँधें, और मुख्य द्वार के बाहर उस ओर लटकाएँ जो प्रवेश करते समय आपके दाहिने पड़े; प्रतिदिन उसी मंत्र के साथ काली के नाम धूप-दीप करें। उसकी सुधा शक्ति पितरों को कितने भी बड़े बंधन से मुक्त कर देती है; असली पत्थर हो तो कार्य एक बार में हो जाता है, पर मुक्त पितृ आपके लिए क्रियान्वित होंगे या नहीं, वे कहते हैं, यह अलग विषय है।
कब करें। वक्ता कहते हैं कि पितृ को बंधन से मुक्त करने का तीसरा प्रयोग एक तंत्रोक्ततंत्र में कहा गया, जो उसी कर्म अथवा मंत्र के वेदोक्त रूप से भिन्न होता है। प्रयोग है जो भगवती काली के मंदिर में किया जाता है। इसमें ऐसी वस्तुएँ चाहिए जो सामान्यतः उपलब्ध नहीं होतीं, इसलिए यह तभी करें जब बहुत से प्रयोग कर लिए हों और कोई प्रभाव न मिल रहा हो। वस्तु है ज्वालामुखी पत्थर; पूजन की दुकान पर पूछें — थोड़ा महँगा होता है, पर मिलने की संभावना रहती है, मिल जाए तो अति उत्तम। मंदिर में। पत्थर को ऐसे काली मंदिर में ले जाएँ जो कम से कम 12 वर्ष पुराना हो, गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। से स्नान कराएँ और पंडित जी से भगवती काली के चरणों पर रखवाएँ — दक्षिण चरण, यानी दाहिने पैर पर। पितरों की मुक्ति का संकल्प लेकर वहीं अर्गला स्तोत्र के प्रथम मंत्र का कम से कम सवा घंटे जप करें। यह अमावस्या तिथि को ही करना है। न छूने का नियम। पत्थर को आपको स्पर्श नहीं करना है; ध्यान रखें। पंडित जी को दान-दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। देकर यह तय कर लें कि वे भी उसे न छुएँ। पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। का पत्ता लेकर, पत्ते से ही ढकेलकर पत्थर को चरण से दूसरे पीपल के पत्ते पर लें, और पीले या सफेद कपड़े में बाँध लें। घर पर। उसे घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर लाएँ। बाहर से अंदर प्रवेश करते समय जो ओर आपके दाहिने पड़े — बाहर निकलते समय बाएँ — उसी ओर, बाहर की तरफ, प्रवेश के समय लटका दें। उसके बाद प्रतिदिन भगवती काली के नाम से अर्गला का प्रथम मंत्र पढ़ते हुए धूप-दीप करते जाएँ। यह क्या करता है। वे कहते हैं कि उसमें जो सुधा शक्ति है वही कार्य करती है और पितृ कितने भी बड़े बंधन में हों, उन्हें मुक्त कर देती है। यह परीक्षित प्रयोग है, पर पत्थर मिलना कठिन है; असली मिल जाए तो कार्य एक बार में संपादित हो जाता है। वे एक बात जोड़ते हैं: पितरों का बंधन मुक्त होना एक बात है; वे फिर क्रियान्वित होंगे या नहीं, और आपके लिए किस प्रकार का कार्य करेंगे, यह अलग विषय है। इसी के साथ वे वीडियो के तीन मुख्य प्रयोग समाप्त करते हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।