बंधन में पड़े पितरों की मुक्ति — कुल भैरव, दत्तात्रेय तर्पण, हनुमान चालीसा हवन और ज्वालामुखी पत्थर

बंधे हुए पितरों को मुक्त करने के तीन प्रयोग।

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01

स्वप्न या कोई जानकार व्यक्ति, और उससे होने वाली दुर्घटनाएँ

पितरों के बंधे होने का पता कैसे चलता है, और जीवन पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है

· Reviewed Sep 2026 · 00:23–00:58

वक्ता अपनी बात वहाँ से आरंभ करते हैं जहाँ आपको किसी भी माध्यम से — स्वप्न के माध्यम से या किसी जानकार व्यक्ति के माध्यम से — यह पता चल जाता है कि आपके पितृ बंधे हुए हैं, जिसके कारण आपके जीवन में बहुत सारी दुर्घटनाएँ हो रही हैं, कष्ट मिल रहा है और उन्नति रुकी हुई है। यहाँ उनका विषय यह है कि ऐसी स्थिति में आप स्वयं, किसी अन्य व्यक्ति की सहायता लिए बिना, क्या करेंगे कि आपके पितृ बंधन से मुक्त हो जाएँ।

02

अपने कुल के भैरव की सहायता लेना

पितरों के बंधन में होने पर सबसे पहला काम क्या करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 00:59–01:30 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला और सबसे विशिष्ट चीज है अपने कुल के भैरव का सहयोग लेना, यदि आपको उनके विषय में ज्ञान है। यदि कुल देवी होंगी तो कुल भैरव अवश्य होंगे — वे प्रत्येक कुल में होते ही होते हैं, चाहे सूक्ष्म रूप से हों या प्रत्यक्ष रूप से — और कुल भैरव हर प्रकार के बंधन को काटने में समर्थ, शक्तिशाली होते हैं।

03

देवी कृपा से मृत्यु के पश्चात प्राप्त होने वाला भैरव पद

कुल का कोई साधक कुल भैरव का पद कैसे प्राप्त करता है?

· Reviewed Sep 2026 · 01:31–02:11 · Also a question

जिस प्रकार शक्तिपीठों के रक्षक भैरव होते हैं, उसी प्रकार कुल शक्तियों के रक्षण के हेतु भैरव जी को स्थान दिया गया रहता है। जो तंत्र क्षेत्र में दिव्य दृष्टि प्राप्त करते हैं, जिन्हें तंत्र की सही जानकारी है — जो केवल बड़बोलेपन और पाखंड में नहीं हैं — वे यह भली-भाँति जानते हैं कि कुल का ही कोई साधक, जिसने उच्च कोटि की साधना की हो, कालांतर में मृत्यु के पश्चात देवी कृपा से कुल के भैरव का पद प्राप्त कर सकता है।

04

पितरों और कुल शक्तियों की सद्गति के कारण के रूप में कुल भैरव

कुल भैरव की पूजा से पितर बंधन मुक्त कैसे होते हैं?

· Reviewed Sep 2026 · 02:12–02:27 · Also a question

क्योंकि वे पितरों के लिए भी सद्गति का कारण बनते हैं और देवताओं के लिए तथा कुल की देवी शक्तियों के लिए भी सद्गति का कारण बनते हैं। इसलिए यदि पितृ बंधन में हैं और आपको अपने कुल भैरव की जानकारी है, तो उनकी पूजा, अर्चना, सेवा और अनुष्ठान करके आप कुल पितरों को बंधन से मुक्त कर देते हैं।

05

पितरों के साथ बैठाई गई प्रेत शक्ति का अर्पण को ग्रहण कर लेना

पितरों से संबंधित मंत्रों का प्रयोग आधी-अधूरी जानकारी में सीधे क्यों नहीं करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 02:28–03:15 · Also a question

क्योंकि यदि पितृ बंधित हैं, तो आपको यह पता नहीं होता कि अभिचार में कौन सी शक्ति चली है, कौन सा तंत्र-मंत्र किया गया है, या किसी तांत्रिक ने पितरों के साथ कौन सी प्रेत शक्ति बैठा दी होगी। ऐसे में जब आप पितरों से संबंधित किसी मंत्र का अनुष्ठान करेंगे, तो वह पितरों को न प्राप्त होकर उस नकारात्मक शक्ति को प्राप्त होने लगेगा।

06

दत्तात्रेय की 108 नामावली का फल को छानकर अपने ही पितरों तक पहुँचाना

एक ही शक्ति में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पूर्ण स्वरूप — इसीलिए फल आपके अपने पितरों को ही मिलता है

· Reviewed Sep 2026 · 03:16–03:58

भगवान दत्तात्रेय ऐसी शक्ति, महाशक्ति हैं जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का पूर्ण स्वरूप विराजमान है। यदि आप उनके शरणागत होकर उनकी 108 नामावली के माध्यम से पितरों के निमित्त तर्पण करते हैं, तो भगवान दत्त की कृपा से ऐसा माध्यम निर्मित होता है कि सभी शुभ कर्मों के फल आपके अपने कुल के पितरों को ही प्राप्त होंगे, और उनके साथ उपस्थित कोई प्रेत शक्ति उसे नहीं पाएगी — यानी छानकर सही चीज सही को ही प्राप्त हो जाएगी।

07

गुरुवार, अमावस्या या पूर्णिमा, और पीपल, बरगद या बेल का वृक्ष

किसी भी गुरुवार, अमावस्या या पूर्णिमा से, पीपल, बरगद या बेल वृक्ष के नीचे

· Reviewed Sep 2026 · 03:59–04:44

किसी भी गुरुवार से, किसी भी अमावस्या या किसी भी पूर्णिमा के दिन से आरंभ करें, पीपल के वृक्ष के नीचे या बरगद के वृक्ष के नीचे — अथवा बेल वृक्ष के नीचे — और 108 मंत्रों से, 108 नामों की नामावली से भगवान दत्तात्रेय का तर्पण करें। तर्पण बेल पत्र से किया जा सकता है, पीपल के नीचे बैठे हों तो पीपल के पत्ते से, बरगद के नीचे हों तो बरगद के पत्ते से, अथवा चाँदी के चम्मच से; पात्र में कच्चा दूध लिया जाता है जिसमें गंगाजल मिलाया गया हो।

08

श्वेत वस्त्र, पाड़ वाली सफेद साड़ी, और अनिवार्य घूंघट

केवल श्वेत वस्त्र; पाड़ वाली सफेद साड़ी, और घूंघट अवश्य

· Reviewed Sep 2026 · 04:45–04:59

अपने आसन पर बैठकर आप श्वेत वस्त्र ही पहनेंगे। यदि आप महिला हैं और सफेद साड़ी पहनती हैं, तो साथ में पाड़ वाली हो, और घूंघट अवश्य करेंगी। घूंघट किए बिना महिलाएँ पितरों के निमित्त कभी कोई काम न करें।

वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम, अपने आसन पर बैठकर आप श्वेत वस्त्र ही पहनेंगे, यानी सफेद वस्त्र पहनेंगे। या अगर आप महिला हैं, अगर सफेद साड़ी पहनती हैं, तो साथ में पाड़ वाली, और घूंघट जरूर करेंगी। घूंघट किए बिना महिलाएँ पितरों के निमित्त कभी भी कोई काम न करें।

09

पुरुष श्रेष्ठ, अन्यथा बड़ी बहू; और स्थान का चुनाव

घर का कोई पुरुष श्रेष्ठ, अन्यथा बड़ी बहू, और स्थान का चयन

· Reviewed Sep 2026 · 05:00–05:38

अगर घर में कोई पुरुष कर रहे हैं तो अति उत्तम है। अगर घर का कोई पुरुष करने में समर्थ नहीं है, उसकी स्थिति ऐसी नहीं है कि वह कर पाए, या वह करना ही नहीं चाहता, और आप अपने परिवार के कल्याण के लिए यह करने जा रही हैं, तो घर की बहू यह कर सकती हैं — विशेष करके बड़ी बहू, और अगर वे नहीं करेंगी तो छोटी बहू, घूंघट करके, वैसा पूरा घूंघट जैसा घर की बहुएँ लेती हैं, न कि केवल सिर पर आंचल रखना। स्थान ऐसा पीपल या बरगद हो जहाँ पूजन-पाठ होता हो, कोई निर्जन या तंत्र-मंत्र वाला स्थान नहीं।

10

मिश्री, पीतल या चाँदी का लोटा, दूध की मात्रा, और चम्मच

पहले से घुली हुई मिश्री वाला दूध, पीतल या चाँदी के लोटे में, चम्मच से निकाला हुआ

· Reviewed Sep 2026 · 05:39–06:05

एक लोटे में दूध लें और उसमें थोड़ी सी पत्थर वाली मिश्री डाल दें ताकि वह पहले ही घुल जाए। लोटा पीतल का या चाँदी का होना चाहिए; ध्यान रखें कि तांबे का न हो, स्त्री के लिए विशेष करके — पुरुषों का तांबे में चलेगा, लेकिन प्रयास करें कि पीतल में ही लें। दूध कम से कम आधा लीटर हो, जिसमें गंगाजल इत्यादि मिलाया गया हो; आधा लीटर न हो तो एक पाव में भी आराम से हो जाएगा। चाँदी का चम्मच सर्वश्रेष्ठ है; न हो तो पीपल के पत्ते से भी किया जा सकता है।

11

नाम और गोत्र, जड़ में रखा सिक्का, और प्रणाम

हाथ में अक्षत, फूल और सिक्का, और अपने नाम-गोत्र का उच्चारण

· Reviewed Sep 2026 · 06:06–06:59

हाथ में अक्षत और फूल तथा ₹1 या ₹10 का सिक्का लें। अपने नाम और गोत्र का उच्चारण करते हुए कहें कि अपने कुल के पितरों के निमित्त — उन्हें सद्गति हो, तृप्ति हो, और जिस भी प्रकार की तंत्र प्रक्रिया से वे बाँधे गए हैं उससे उन्हें मुक्ति प्राप्त हो — इस हेतु मैं भगवान दत्तात्रेय का दुग्ध से तर्पण करने का संकल्प लेता/लेती हूँ। फिर उनसे प्रार्थना करें, अक्षत, फूल और सिक्का वृक्ष की जड़ में रख दें, और अपने गुरु, गणपति, अपने कुल के देवी-देवताओं तथा स्थान के देवी-देवताओं को प्रणाम करें।

12

हर नमः पर एक अर्पण, और तीन अमावस्या का क्रम

हर "नमः" पर जड़ में एक-एक बार दूध, और तीन अमावस्या का क्रम

· Reviewed Sep 2026 · 07:00–07:48

लोटे में से एक-एक बार दूध निकालें और उसे बरगद, पीपल या बेल वृक्ष की जड़ पर डालते जाएँ — जैसे दत्तात्रेय का पहला नाम, "श्री दत्तात्रेयाय नमः", "श्री अनुसूया पुत्राय नमः", तो "नमः" बोलने के साथ ही वह दूध जड़ पर डाल देंगे। पीपल, बरगद या बेल के पत्ते से डालिए, अथवा चाँदी के चम्मच से। इस प्रकार अमावस्या के अमावस्या करते जाएँ; तीन अमावस्या बीतने के पश्चात वक्ता को आशा और उम्मीद है कि कृपा प्राप्त होना आरंभ हो जाएगा। इस चीज को नियमित रूप से नहीं करना है, और अमावस्या को करना सर्वश्रेष्ठ है।

13

सत्ताईस बार पाठ, श्वेत पुष्प, और लौंग सहित पाँच कपूर

उसी आसन पर सत्ताईस बार पाठ, श्वेत पुष्प और लौंग सहित पाँच कपूर

· Reviewed Sep 2026 · 07:49–08:22

दूसरा है दत्त माला मंत्र। उसी वृक्ष के नीचे बैठकर, यह तर्पण करने के पश्चात — जिसमें मुश्किल से 5 मिनट लगेंगे — हाथ में एक श्वेत पुष्प लेकर दत्त माला मंत्र का 27 बार पाठ करें, और उस पुष्प को भगवान दत्तात्रेय के नाम से उसी पीपल या बरगद वृक्ष की जड़ में चढ़ा दें। फिर लौंग और कपूर जलाएँ: पाँच कपूर रखें और उनके ऊपर एक-एक लौंग रखें, जोड़े में नहीं बल्कि एक-एक, उन्हें जला दें, भगवान दत्तात्रेय से प्रार्थना करके वापस घर आ जाएँ।

14

दूसरे उपाय के रूप में हनुमान चालीसा या बजरंग बाण

पितरों को बंधन से मुक्त करने के लिए हनुमान जी का प्रयोग क्यों किया जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 08:23–09:01 · Also a question

पितरों को बंधन से मुक्त करने का दूसरा उपाय हनुमान जी का प्रयोग है। वक्ता कहते हैं कि हनुमान जी आज के समय में भी इतने सर्वशक्तिशाली, सर्वसमर्थ हैं कि सभी को पता होना चाहिए कि वे हर प्रकार की शक्तियों के बंधन से मुक्त करने में सक्षम हैं। तंत्र ग्रंथों में इसका वर्णन है कि उन्होंने सभी को बंधन से मुक्त किया है; और जो भगवान श्री राम को बंधन से मुक्त कर सकते हैं — भले ही वे इसे श्री राम की कृपा मानते हों — तो आप और हम जैसे सामान्य मनुष्यों के लिए वे क्या नहीं कर सकते। बजरंग बाण का प्रयोग न भी करें, तो केवल हनुमान चालीसा से भी यह किया जा सकता है।

15

अमावस्या को चोला, दोपहर तक निराहार, समय, और संकल्प

अमावस्या से: लंगोट चढ़ाना, चोला चढ़ाना, दोपहर तक निराहार, फिर घर पर संकल्प

· Reviewed Sep 2026 · 09:02–09:46

अमावस्या तिथि से आरंभ करें। सर्वप्रथम हनुमान जी के मंदिर में लंगोट चढ़ा दीजिए, पहले दिन वहाँ उनका चोला चढ़ा दीजिए, पूजन करके घर आ जाइए। यह प्रयोग दोपहर के समय करना है; दोपहर तक आपको खाना-पीना नहीं है, और अगर न रह पाएँ तो फलाहार कर लीजिए। 10-11 बजे, कम से कम 11:00 बजे से आरंभ कीजिए। हाथ में अक्षत और फूल लेकर, गुरु और गणपति का स्मरण करने के पश्चात संकल्प करें, फिर अगियारी जलाएँ — गाय के गोबर के उपले इस प्रकार जलाएँ कि वे पूरी तरह अच्छे से सुलग जाएँ — और पितरों को बंधन से मुक्त करने के लिए हनुमान चालीसा का हवन करने का संकल्प लें।

16

गुग्गल और घी की आहुति, और स्त्रियों के घी देने पर निषेध

गुग्गल में घी मिलाकर, हर चौपाई पर एक आहुति — स्त्रियाँ घी की आहुति नहीं देतीं

· Reviewed Sep 2026 · 09:47–10:15

गुग्गल और घी मिलाएँ; मिलाने पर यह काफी गाढ़ा हो जाएगा, तो चम्मच से निकालें, हनुमान चालीसा की एक-एक चौपाई पढ़ते जाएँ और उसके ऊपर डालते जाएँ। पुरुष घी और गुग्गल दोनों से आहुति करेंगे; स्त्रियाँ, यदि वे अपने पितरों के निमित्त उन्हें बंधन से मुक्त करने के लिए कर रही हैं, तो केवल गुग्गल से आहुति देंगी, घी से आहुति उन्हें नहीं देनी है। इस बात का ध्यान रखें, और यहाँ भी यह प्रयोग घूंघट लेकर ही करना है।

17

समापन की आहुतियाँ, घर में धुआँ, और करने का क्रम

राम और सीता के नाम से एक-एक आहुति, फिर चारों भाई, और धुएँ को पूरे घर में दिखाना

· Reviewed Sep 2026 · 10:16–10:51

जब आहुतियाँ पूर्ण हो जाएँ, तो राम जी के नाम से और सीता जी के नाम से एक-एक आहुति दें, फिर चारों भाइयों के नाम से आहुतियाँ, और उसके पश्चात शिव जी तथा भगवती पार्वती के नाम से एक-एक आहुति दें। फिर जो धुआँ उठ रहा होगा — या धुआँ न भी हो — उसे अपने पूरे घर में सब जगह दिखाकर मुख्य द्वार के पास लाकर रख दीजिए। यह अमावस्या से आरंभ करें, और अगर अमावस्या तिथि तक लगातार करेंगे तो अति उत्तम है; नहीं तो कम से कम हर अमावस्या तिथि को करते जाइए, या मंगलवार और शनिवार को करते जाइए।

18

काली मंदिर का प्रयोग और ज्वालामुखी पत्थर

तीसरा उपाय तांत्रोक्त है, काली मंदिर में किया जाता है, और उसमें दुर्लभ वस्तुएँ चाहिए

· Reviewed Sep 2026 · 10:52–11:32

पितरों को बंधन से मुक्त करने का तीसरा प्रयोग तांत्रोक्त संबंधी है, जो भगवती काली के मंदिर में किया जाता है। लेकिन इसमें बहुत सारी ऐसी वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है जो सामान्यतः उपलब्ध नहीं हो पातीं, इसलिए वक्ता कहते हैं कि यह प्रयोग तभी करना चाहिए जब आप बहुत सारे प्रयोग कर चुके हों और कोई प्रभाव प्राप्त न हो पा रहा हो। इसमें एक पत्थर चाहिए जिसे ज्वालामुखी पत्थर कहा जाता है, जो पूजन की दुकान पर बोलने से थोड़ा महँगा होता है, लेकिन मिलने की संभावना रहती है।

19

बारह वर्ष पुराना काली मंदिर और अर्गला के प्रथम मंत्र का सवा घंटा जप

कम से कम बारह वर्ष पुराना काली मंदिर, गंगा में स्नान कराया पत्थर, और अर्गला के प्रथम मंत्र का सवा घंटा जप

· Reviewed Sep 2026 · 11:33–11:59

उस पत्थर को लेकर भगवती काली के ऐसे मंदिर में जाइए जो कम से कम 12 वर्ष पुराना हो, उसका गंगा जी में स्नान करवाकर — यानी गंगाजल से स्नान करवाकर — पंडित जी से बोलकर उस पत्थर को भगवती काली के श्री चरणों पर रखवाइए। वहाँ रखवाने के पश्चात आपको अर्गला के प्रथम मंत्र का कम से कम सवा घंटा जप करना है, और संकल्प पहले ही ले लेना है, पितरों को बंधन से मुक्ति के लिए।

20

केवल अमावस्या, स्पर्श निषेध, दक्षिण चरण, और दो पीपल के पत्ते

केवल अमावस्या को, पत्थर को हाथ से न छूना, दक्षिण चरण से दो पीपल पत्तों पर उठाना

· Reviewed Sep 2026 · 12:00–12:30

यह केवल अमावस्या तिथि को ही करना है। पीपल का पत्ता लेकर जाइए; उस पत्थर को आपको स्पर्श नहीं करना है — इसका ध्यान रखें — और पंडित जी को दान-दक्षिणा देकर उनसे भी इस तरीके से बात कर लें कि वे भी उस पत्थर को स्पर्श न करें। भगवती काली के चरणों में से दक्षिण चरण पर, यानी दाहिने पैर पर, इसे रखा जाता है। वहाँ से पीपल के पत्ते से ही उसे ढकेलकर दूसरे पीपल के पत्ते पर ले लेंगे, और उस पत्थर को पीले कपड़े में या सफेद कपड़े में बाँध लेना है।

21

मुख्य प्रवेश द्वार, प्रवेश करते समय दाहिनी ओर, और प्रतिदिन धूप-दीप

मुख्य द्वार पर, प्रवेश करते समय दाहिनी ओर पड़ने वाली दिशा में, और प्रतिदिन धूप-दीप

· Reviewed Sep 2026 · 12:31–12:56

उसे घर लाकर घर के मुख्य दरवाजे पर, जो प्रवेश द्वार है: जब आप बाहर से अंदर की ओर प्रवेश करते हैं तो जो आपकी दाहिनी ओर पड़ेगा, और अंदर से बाहर निकलते समय बाईं ओर — उसी ओर उसे लटकाना है, बाहर की ओर ही, प्रवेश करने के समय के अनुसार। उसके पश्चात प्रतिदिन भगवती काली के नाम से धूप-दीप करें, अर्गला के प्रथम मंत्र को पढ़ते हुए।

22

पत्थर में स्थित सुधा शक्ति, और असली पत्थर मिलने की शर्त

पत्थर की सुधा शक्ति ही कार्य करती है — बशर्ते पत्थर असली हो

· Reviewed Sep 2026 · 12:57–13:22

वक्ता कहते हैं कि उसमें जो सुधा शक्ति होती है वही कार्य करती है, और पितृ कितने भी बड़े बंधन में पड़े हों, वह उन्हें उससे मुक्त कर देती है। यह एक परीक्षित प्रयोग है, लेकिन ज्वालामुखी पत्थर मिलना थोड़ा कठिन होता है; असली मिल जाए तो कार्य एक ही बार में संपादित हो जाता है। वे यह भी जोड़ते हैं कि पितरों का बंधन मुक्त होना एक बात है, और उसके बाद वे क्रियान्वित होंगे अथवा नहीं, तथा आपके लिए किस प्रकार के कार्य करेंगे, यह अलग विषय है।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।