मारण प्रयोग होने पर शीघ्र प्राण रक्षा — तत्काल करने योग्य नौ विधान
किसी व्यक्ति पर मारण प्रयोग हो जाने पर उसके प्राणों की रक्षा के लिए वक्ता का नौ चरणों का आपात विधान — पहली अखंड ज्योत से लेकर लंबी अवधि के साप्ताहिक अभ्यास तक।
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मारण प्रयोग पर पहली प्रतिक्रिया: कुल की शक्तियों से काम लें, बंधे कुलदेवता-पितरों का प्रश्न बाद में
कुल की शक्ति प्राण ऊर्जा का स्रोत
वक्ता कहते हैं कि जैसे ही पता चले कि किसी परिजन पर मारण प्रयोग हो चुका है, सबसे पहला कार्य कुल शक्ति के माध्यम से करना है, क्योंकि कुल की शक्तियां ही उस व्यक्ति की प्राण ऊर्जा और जीवन ऊर्जा का स्रोत हैं। यदि आप अपने कुलदेवी-कुलदेवता को जानते हैं, तो उस समय यह विचार नहीं करना है कि प्रयोग ने कुलदेवता या पितृ को बंधित कर दिया होगा; वह उस समय गौण बात है।
वक्ता कहते हैं कि विषय यह है कि जब हमें पता चल जाए कि हमारे किसी परिजन-प्रियजन पर मारण प्रयोग कर दिया गया है, तब रक्षा के लिए तत्काल क्या-क्या विधान करना चाहिए ताकि उनके प्राणों की रक्षा हो और भविष्य में उन्हें पूरी तरह सुरक्षित किया जा सके। वे कहते हैं कि पहली बात यह है: जैसे ही पता चले कि शरीर पर मारण प्रयोग हो चुका है, और यदि आप अपने कुल की शक्तियों को जानते हैं, जानते हैं कि आपके कुलदेवी-कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। कौन हैं, तो उस समय यह विचार नहीं करना है कि मारण प्रयोग हुआ है तो कुलदेवी-देवता को बंधित कर दिया होगा या पितृ बंधित कर दिए गए होंगे। उस समय यह गौण बात है। वे कहते हैं कि सबसे पहला कार्य कुल शक्ति के माध्यम से करना है, क्योंकि आपकी प्राण ऊर्जा और जीवन ऊर्जा का स्रोत कुल की शक्तियां ही हैं।
कुल की शक्ति के नाम से प्राण-रक्षा की अखंड ज्योत, 27 काली मिर्च के साथ
संकल्प के शब्द, और कुल शक्ति न पता हो तो किसके नाम से
वक्ता कहते हैं कि पहला विधान है कुल की शक्ति के नाम से अखंड ज्योति प्रज्वलित करना, पीड़ित व्यक्ति के प्राण-रक्षण का संकल्प लेकर, और उसमें 27 नक्षत्र के नाम से 27 काली मिर्च डालना — नक्षत्रों के नाम न पता हों तो भी। यदि कुल की शक्ति का पता न हो तो वही दीप सबसे पहले भैरव जी के नाम से, या जिस प्रमुख देवता की पूरा परिवार मिलकर पूजा करता है उनके नाम से जलाया जाए।
वक्ता कहते हैं कि कुल की शक्तियों के नाम से आपको अखंड ज्योति प्रज्वलित कर देनी है। जिनके शरीर पर मारण प्रयोग किया गया है, उनके लिए इनके नाम से संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करके कहें: हे भगवती, हे जगदंबा, आप हमारे कुल की देवी हैं; मैं फलां व्यक्ति के प्राणों की रक्षा हेतु यह अखंड ज्योत प्रज्वलित कर रहा हूं / कर रही हूं; कृपा करके उनके प्राणों की रक्षा करें और अभिचार प्रयोग इत्यादि को पूरी तरह नष्ट कर दें। वे कहते हैं कि यह बोलकर उसमें 27 काली मिर्च जरूर डालनी हैं, 27 नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। के नाम से। यदि नक्षत्रों के नाम न पता हों तो भी यह बोलकर कि हम 27 नक्षत्रों के नाम से काली मिर्च डाल रहे हैं, और भगवती से कहें कि इस व्यक्ति के सभी नक्षत्रों में इनका रक्षण करें। यदि कुल की शक्ति के विषय में पता नहीं है, तो वे कहते हैं कि सबसे पहले भैरव जी के नाम से यही दीप प्रज्वलित करना है — या घर में आप जिस भी प्रमुख देवता की पूजा करते हों: भगवती दुर्गा, काली जी, हनुमान जी, भगवती का कोई भी स्वरूप या महादेव। जो प्रमुख देवता हैं जिनकी पूरा परिवार मिलकर सेवा-पूजा-अर्चन करता है, यह अखंड ज्योत प्रमुख रूप से उन्हीं के नाम से, उन्हीं के हेतु जलाई जाएगी। उस व्यक्ति के रक्षण का संकल्प लेकर 27 काली मिर्च उसमें जरूर डाल देनी हैं। वे कहते हैं कि यह पहला कार्य है।
रक्षा की अखंड ज्योत पर मुहूर्त, खरमास या मलमास का कोई बंधन नहीं; ठीक होने तक जलती है
प्राण-रक्षा का कार्मिक दीप, देवता का अनुष्ठान नहीं
वक्ता कहते हैं कि यह अखंड ज्योत तब तक जलेगी जब तक व्यक्ति ठीक न हो जाए, कम से कम सात से दस दिन, और जिस समय प्रयोग हुआ हो उस समय यह नहीं देखना है कि समय अच्छा है या नहीं, खरमास चल रहा है या मलमास। यह प्राण-रक्षा के लिए कार्मिक ज्योत है, किसी देवता का अनुष्ठान नहीं, इसलिए इसे कभी भी प्रज्वलित किया जा सकता है।
वक्ता कहते हैं कि अखंड ज्योत तब तक जलेगी जब तक व्यक्ति ठीक नहीं हो जाता — कम से कम सात दिन, दस दिन तक। जिस समय प्रयोग हुआ हो, उस समय आपको यह नहीं देखना है कि अखंड ज्योत जलाने के लिए अभी समय बढ़िया है या नहीं, या ऐसा कुछ भी। वे कहते हैं कि यह उस व्यक्ति के प्राण की रक्षा हेतु कार्मिक ज्योत है। यह किसी देवता के हेतु या किसी प्रकार के अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। के हेतु नहीं है; यह रक्षण की ज्योत है। इसलिए आप इसे कभी भी प्रज्वलित कर सकते हैं — खरमास चल रहा हो या मलमास चल रहा हो, उस समय यह सब कुछ नहीं देखना है।
मारण प्रयोग के विरुद्ध क्षेत्रपाल निकारी, और उसे कहां देना है
प्रक्षेपित अभिचार शक्तियों को रोकने वाले पहले देवता क्षेत्रपाल
वक्ता कहते हैं कि दूसरा प्रमुख कार्य, जब पीड़ित व्यक्ति को बहुत अधिक दिक्कत हो रही हो, यह है कि तुरंत अपने क्षेत्रपाल की जानकारी लें — आप जिस स्थान पर रहते हैं वहां का सबसे पुराना मंदिर — और वहां जाकर पूजा दें; जानकारी न मिले तो किसी भी शिव मंदिर के पास, उसके पीछे या बगल में या चौराहा के किनारे, क्षेत्रपाल निकारी अर्थात क्षेत्रपाल का बलि विधान करें। वे कहते हैं कि क्षेत्रपाल ही सबसे प्रमुख शक्ति हैं और अभिचारिक विद्याओं से प्रक्षेपित शक्तियों को रोकने वाले पहले देवता वही हैं।
वक्ता कहते हैं कि दूसरा प्रमुख कार्य तब है जब प्रभावित व्यक्ति को बहुत अधिक दिक्कत हो रही हो: तुरंत अपने क्षेत्रपाल के विषय में जानकारी लें — आप जिस स्थान पर रहते हैं, वहां सबसे पुराना मंदिर कौन-सा है। यदि जानकारी नहीं है तो किसी भी शिव जी के मंदिर के पास क्षेत्रपाल निकारी जरूर करनी है। वे समझाते हैं कि क्षेत्रपाल निकारीक्षेत्रपाल को अर्पित एक विसर्जन-अनुष्ठान — सुरक्षा तथा क्षेत्र में निवास करने वाली दुष्ट शक्तियों (डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल) की शांति हेतु प्रार्थना, जो घर की देहरी पर व्याप्त दुष्ट ऊर्जाओं को कम-से-कम 24 घंटे हेतु शुद्ध कर देती है। क्षेत्रपाल का बलि विधान है। यह इसलिए किया जाता है क्योंकि क्षेत्रपाल ही सबसे प्रमुख शक्ति होते हैं: अभिचारिक विद्याओं के द्वारा जिन भी शक्तियों को प्रक्षेपित किया गया है, उन्हें रोकने वाले सबसे पहले देवता वही होते हैं। इसलिए वहां का पूजन देना है। यदि पता चल गया कि कौन-सा मंदिर है तो वहां जाकर पूजा दीजिए; अन्यथा निकारी करके वहां रखिए। यदि यह भी न हो तो शिव मंदिर के पीछे या पास में, या चौराहाचौराहा, जहाँ कुछ अर्पण रखकर बिना पीछे देखे लौटा जाता है। के किनारे क्षेत्रपाल का बलि विधान करें। वे बताते हैं कि उस बलि विधान का वीडियो चैनल पर उपलब्ध है, और उसी तरीके से करना है।
मारण प्रयोग से पीड़ित के सिर से आटे के चौमुख दिये का उतारा
सरसों का तेल, 27 काली मिर्च, सात बार उल्टा, बाहर रखना
जब क्षेत्रपाल की जानकारी न मिले, या आप किसी जगह नए हों या वहां इतनी सघनता हो कि वह विधान न हो सके, तो वक्ता कहते हैं कि घर के मुख्य दरवाजे के पास आटे का चौमुख दिया बनाएं, उसमें सरसों का तेल और 27 काली मिर्च डालें, पीड़ित व्यक्ति के सिर के ऊपर से सात बार उल्टा (एंटी-क्लॉकवाइज) घुमाकर उतारें, और उसे दरवाजे के बाहर या हो सके तो घर से कुछ दूर रख दें — क्षेत्रपाल या ग्राम देवी के नाम की ज्योत के रूप में। परेशानी अधिक हो तो निकारी और यह दिया दोनों करें, दिये को चौराहा पर या शिव मंदिर के पास पूजित पीपल या बरगद के पास रखें।
वक्ता कहते हैं कि तीसरा विधान तब के लिए है जब क्षेत्रपाल के विषय में जानकारी न मिल पा रही हो, या आप ऐसी नई जगह रहते हों जहां जानकारी ही न हो, या वहां लोगों की इतनी सघनता हो कि आप वह विधान न कर सकें। ऐसी स्थिति में घर के मुख्य दरवाजे के पास आटे का चौमुख दिया बनाइए। उसमें सरसों का तेल डालिए और 27 काली मिर्च डालिए। फिर जो व्यक्ति अभिचार से ग्रसित है, उनके सिर से उल्टा सात बार उतारिए — सिर के ऊपर सात बार एंटी-क्लॉकवाइज घुमाना है। वे कहते हैं कि उसके बाद उसे घर के पास रख दीजिए। संभव हो तो घर से थोड़ी दूर रखें तो बढ़िया है; दूर न रख सकें तो घर के दरवाजे के पास बाहर की ओर रखिए, किसी भी तरफ, बाएं या दाएं, जहां सुविधा हो। यदि यह दूर जा सके तो बहुत बढ़िया। यह भी क्षेत्रपाल के नाम से या ग्राम देवी के नाम से ज्योत रहेगी। वे कहते हैं कि यदि संभव हो और परेशानी ज्यादा हो तो दोनों प्रक्रियाएं कर दें: क्षेत्रपाल की निकारी की विधि, व्यक्ति के शरीर से पूरा उतारकर, और आटे का चौमुख दिया ग्राम देवी के नाम से, जिसे किसी चौराहाचौराहा, जहाँ कुछ अर्पण रखकर बिना पीछे देखे लौटा जाता है। के किनारे रख दें। चौराहा न मिले तो किसी पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। वृक्ष के पास, शिव मंदिर के पास, या शिव मंदिर में जो पूजित पीपल या बरगद का वृक्ष हो, वहां रख देना चाहिए।
मारण प्रयोग के तीन तत्काल विधानों में अखंड ज्योत अनिवार्य
निकारी या आटे का दिया: जो संभव हो
वक्ता कहते हैं कि ये तीन विधान — अखंड ज्योति, क्षेत्रपाल निकारी और आटे का चौमुख दिया — तुरंत करने चाहिए। इन तीनों में से पहला, अखंड ज्योत वाला, तो जरूर; दूसरे-तीसरे में से जो संभव हो वह।
वे कहते हैं कि ये तीन विधान तुरंत करने चाहिए — या इन तीनों में से पहला, अखंड ज्योति वाला, तो जरूर, और दूसरे-तीसरे, क्षेत्रपाल निकारीक्षेत्रपाल को अर्पित एक विसर्जन-अनुष्ठान — सुरक्षा तथा क्षेत्र में निवास करने वाली दुष्ट शक्तियों (डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल) की शांति हेतु प्रार्थना, जो घर की देहरी पर व्याप्त दुष्ट ऊर्जाओं को कम-से-कम 24 घंटे हेतु शुद्ध कर देती है। और आटे का दिया, में से जो संभव हो।
मारण प्रयोग से पीड़ित के लिए अपने सिद्ध मंत्र या नित्य पाठ का संकल्प-सहित जप
और कुछ न हो तो पीड़ित के पास धीमे स्वर में हनुमान चालीसा या बजरंग बाण
वक्ता कहते हैं कि चौथा विधान, पिछले काम हो जाने पर, यह है कि जिस भी मंत्र का आपने जप किया हो, सिद्ध किया हो, अनुष्ठान या पुरश्चरण किया हो — सबर मंत्र, तंत्रोक्त या अन्य — या जिसका नित्य पाठ करते हों: दुर्गा कवच, हनुमान कवच, चालीसा, बजरंग बाण, साठिका या बीसा — उसका अधिकाधिक जप पीड़ित के नाम से संकल्प लेकर करें कि इनके प्राणों की रक्षा हो। ऐसा कुछ न हो तो संकल्प लेकर हनुमान चालीसा या बजरंग बाण का पाठ करें, पीड़ित के पास धीमी आवाज में ताकि उसे भी सुनाई दे।
वक्ता कहते हैं कि चौथी विधि तब है जब ऊपर की चीजें हो जाएं। यदि आपने किसी मंत्र का जप किया है, उसकी सिद्धि की है, किसी मंत्र का अनुष्ठान या पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। किया है — चाहे वह सबर मंत्र हो, तंत्रोक्ततंत्र में कहा गया, जो उसी कर्म अथवा मंत्र के वेदोक्त रूप से भिन्न होता है। हो या कोई अन्य — या जिसका भी आप नित्य पाठ-पूजन करते हों, जैसे दुर्गा कवच, हनुमान कवच, चालीसा, बजरंग बाण, कोई साठिका या बीसा, तो उसका अधिकाधिक जप पीड़ित व्यक्ति के नाम से संकल्प करके करें कि इनके प्राणों की रक्षा हो। वे कहते हैं कि ऐसा कुछ न हो तो संकल्प लेकर हनुमान चालीसा का पाठ करें, या संकल्प लेकर बजरंग बाण का पाठ करें, उस व्यक्ति के पास थोड़ी आवाज में ताकि उसे भी सुनाई दे।
विभत्स मारण प्रयोग के लिए "संकट कटे मिटे सब पीरा" के संपुट से हनुमान चालीसा
गलत संपुट और सही संपुट
वक्ता कहते हैं कि यदि प्रयोग बहुत विभत्स हो और परेशानी अधिक हो, तो हनुमान चालीसा का पाठ "संकट कटे मिटे सब पीरा जो सुमरे हनुमत बलबीरा" के संपुट के साथ करें, सही विधि से, जो चैनल पर लाइव वीडियो में पूरी तरह प्रसारित है — यह गलत तरीका नहीं कि पहली चौपाई से पहले एक बार और अंत में एक बार पढ़ लिया। सही संपुट से पहले ही पाठ से आराम मिलना शुरू हो जाता है।
वे कहते हैं कि इस चौथी चीज में एक बात और है: यदि आप हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं और प्रयोग बहुत विभत्स है, ज्यादा परेशानी हो रही है, तब संपुट हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। संपुट है: संकट कटे मिटे सब पीरा जो सुमरे हनुमत बलबीरा। इसका संपुट लगाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। वे कहते हैं कि संपुट की सही विधि चैनल पर लाइव वीडियो में पूरी तरह प्रसारित है; उसे पहले से सुनकर तैयार रहें, या यदि यह वीडियो देखते समय ही आवश्यकता पड़ गई हो तो सुन लें कि संपुट कैसे लगाते हैं। गलत संपुट मत लगाइए — पहली चौपाई से एकदम पहले एक बार पढ़ लिया और अंत में एक बार पढ़ लिया, वह गलत है। वे कहते हैं कि सही प्रकार से संपुट लगाकर पाठ करेंगे तो पहले ही पाठ से आराम मिलना शुरू हो जाएगा।
जिस दिन मारण प्रयोग हुआ हो उस दिन 108 दीपकों का भैरव दीपदान
अष्ट भैरवों के लिए आठ जगह भोग, केवल एक शाम
वक्ता कहते हैं कि पांचवीं विधि चैनल पर बताई गई भैरव जी की दीपदान विधि है: 108 दीपकों से एक यंत्र बनाना है और अष्ट भैरव के नाम से आठ जगह भोग देना है, जिस दिन प्रयोग हुआ हो उस दिन घर में शाम को (या सुबह), केवल पहले दिन। भैरव जी की ऊर्जा बहुत प्रचंडता से आती है, वहां उपस्थित नकारात्मक ऊर्जा पूरी तरह नष्ट होने लगती है, और प्रयोग के पीछे कितना भी बलि विधान हो, वह अपनी मंशा में सफल नहीं हो पाता।
वक्ता कहते हैं कि पांचवीं विधि भैरव जी के दीपदानविशेष अवसरों — जैसे गंगा दशहरा पर काल भैरव या बटुक भैरव की पूजा — पर किया जाने वाला दीपदान अनुष्ठान। की वह विधि है जो इसी गृहस्थ तंत्र चैनल पर बताई गई है। 108 दीपकों से एक यंत्र बनाना है और अष्ट भैरव के नाम से आठ जगह भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। देना है; पूरी विधि-विधान उस वीडियो में है, और नाम न भी बोलें तो आठ जगह भोग देना होता है। वे कहते हैं कि यह दीपदान जिस दिन प्रयोग हुआ हो उस दिन घर में शाम के समय कर लें — जैसे हो सके शाम को या सुबह, पर रात या शाम को करें तो ज्यादा बढ़िया। यह पहले दिन, केवल एक ही दिन करना है, लेकिन इससे तुरंत राहत मिलती है। वे समझाते हैं कि भैरव दीपदान की विधि में भैरव जी की ऊर्जा बहुत प्रचंडता के साथ आती है, और जो नकारात्मक ऊर्जा वहां प्रक्षेपित और उपस्थित रहती है, वह पूरी तरह नष्ट होने लगती है। उसके पीछे चाहे कितना भी बलि विधान इत्यादि हो, कम से कम वह अपनी मंशा में सफल नहीं हो पाएगा। वे जोड़ते हैं कि दीपदान का वीडियो काल भैरव अष्टमी के आसपास का है, बहुत लोगों ने बाद में उसे किया है और उनके वीडियो-फोटो अपलोड हैं; उसे देखकर अच्छे से यह विधि जरूर करें।
अभिचार के विरुद्ध अपामार्ग की लकड़ी पर काली मिर्च, पीली सरसों, लाल गुंजा और गुग्गल की रक्षा-धूनी
सुबह-शाम 7 से 11 दिन; हवन नहीं, इसलिए दोष नहीं
वक्ता कहते हैं कि छठा विधान, जिसे घर पर सुबह-शाम शुरू करके लंबे समय तक करना है, धूनी है: गाय के गोबर के कंडे या सबसे सही अपामार्ग की लकड़ी कपूर से प्रज्वलित करें और उस पर काली मिर्च, पीली सरसों, लाल गुंजा और गुग्गल मिलाकर धूनी दें, साथ में हनुमान जंजीरा, बजरंग बाण, हनुमान चालीसा, नरसिंह भगवान के मंत्र या अपना कोई सिद्ध किया हुआ सुरक्षात्मक मंत्र — साबर, तंत्रोक्त या पुराणोक्त — पढ़ते हुए। यह हवन नहीं है, इसलिए कोई दोष नहीं। इससे बनी ऊर्जा अभिचार का नाश करती है; दोनों समय, कम से कम सात और ग्यारह दिन तक तो जरूर करें।
वक्ता कहते हैं कि छठी विधि वह है जिसे घर पर सुबह-शाम शुरू कर देना है; यह बहुत जरूरी विधि है और इसे लंबे समय तक करना है, ताकि अभिचार का जो भी प्रभाव हो वह नष्ट होता रहे, नया अभिचार हो तो उसका प्रभाव न पड़े, और व्यक्ति के प्राण की रक्षा हो। यह धूनीविशेष लकड़ियों व बीजों को जलाकर घर या स्थान से नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा दूर करने हेतु की जाने वाली धूनी। है: गाय के गोबर के कंडे लें, या — सबसे सही — अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी, जो आपको मिल जाएगी। उस लकड़ी को कपूर से प्रज्वलित करें और उसके ऊपर काली मिर्च, पीली सरसों, लाल गुंजालाल घुंघची के बीज — घर या दुकान के बाहर उच्चाटन क्रिया हेतु फेंके जाते हैं, अथवा उसी प्रभाव के निवारण हेतु पीली सरसों के साथ धूनी में जलाए जाते हैं। और गुग्गल, इन सभी को मिलाकर धूनी करें। धूनी कैसे करनी है? हनुमान जंजीरा का पाठ करते हुए, या बजरंग बाण, या हनुमान चालीसा, या भगवान नरसिंह के मंत्रों का पाठ करते हुए, या आपने कोई भी सुरक्षात्मक मंत्र सिद्ध किया हो — सबर मंत्र, तंत्रोक्त या पुराणोक्त — उसका पाठ करते हुए धूनी करनी है। वे जोर देते हैं कि हवन नहीं कर रहे हैं, इसलिए धूनी करने में कोई दोष नहीं। धूनी से जो ऊर्जा निर्मित होगी, वह अभिचार का नाश करेगी। यह सुबह-शाम दोनों समय, कम से कम सात दिन और ग्यारह दिन तक तो जरूर करना है। वे कहते हैं कि ये छह विधान कर लेने पर बहुत हद तक सुरक्षा प्राप्त हो जाती है।
भारी मारण प्रयोग के लिए दुर्गा सप्तशती संपुट अनुष्ठान या नवचंडी, साथ में रुद्राभिषेक
उचित साधकों द्वारा, घर पर, सामर्थ्य के अनुसार
यदि अभिचार बहुत भारी हो और छह विधानों के बाद भी दिक्कत टली न हो, तो वक्ता कहते हैं कि सातवां विधान यह है कि उचित साधकों से दुर्गा सप्तशती का संपुट अनुष्ठान करवाएं — एक पाठ या नौ पाठ, एक दिन या पांच-सात दिन — या नवचंडी अनुष्ठान, अपने सामर्थ्य के अनुसार, साथ में रुद्राभिषेक, पार्थिव शिवलिंग का हो तो अति उत्तम, सब घर पर, यदि सक्षमता हो।
वक्ता कहते हैं कि अब यदि अभिचार बहुत भारी मात्रा में हो, बहुत ज्यादा परेशान करने वाला हो, और आपको पता हो कि दिक्कत अभी भी टली नहीं है, तब छठी विधि के बाद सातवां विधान है: उचित साधकों के द्वारा श्री दुर्गा सप्तशती का संपुट अनुष्ठान करवाएं — चाहे एक पाठ का हो या नौ पाठ का, एक दिन का हो या पांच-सात दिन का। नवचंडी अनुष्ठान करवाएं, अथवा अपने सामर्थ्य के अनुसार जितना हो सके। भगवती की प्रसन्नता हेतु दुर्गा सप्तशती का संपुट पाठ अवश्य करवाएं, साथ में रुद्राभिषेक; पार्थिव शिवलिंग का रुद्राभिषेक हो तो अति उत्तम। यह घर पर करवाना है, चाहे एक दिन का अनुष्ठान हो या पांच दिन का, यदि आपके पास सक्षमता हो।
सप्तशती अनुष्ठान सामर्थ्य से बाहर हो तो धूनी में जयंती मंगला काली मंत्र
कम से कम 27 बार, पूरे घर को धूपित करते हुए
सप्तशती अनुष्ठान की सक्षमता न हो तो वक्ता कहते हैं कि धूनी करते रहें और उसमें एक मंत्र और डालें — अर्गला स्तोत्र का प्रथम मंत्र, जयंती मंगला काली "जयंती मंगला काली भद्रकाली का पालिनी" — कम से कम 27 बार, उससे पूरे घर को धूपित करें, और धूनी में कपूर मिलाकर रखें ताकि वह प्रज्वलित रहती रहे।
वक्ता कहते हैं कि सक्षमता न हो, इतना न कर सकें, तो धूनीविशेष लकड़ियों व बीजों को जलाकर घर या स्थान से नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा दूर करने हेतु की जाने वाली धूनी। की विधि करते रहें। धूनी में एक मंत्र और डालें — अर्गला स्तोत्र का प्रथम मंत्र, जयंती मंगला काली: जयंती मंगला काली भद्रकाली का पालिनी — कम से कम 27 बार, और उससे पूरे घर को धूपित करें। धूनी में कपूर की मात्रा भी मिलाकर रखें ताकि वह प्रज्वलित होती रहे।
मारण प्रयोग के विरुद्ध कम खर्च के स्वयं किए जाने वाले अनुष्ठान, जिनमें महाभैरव सर्वोत्तम
हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, महाभैरव या सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र
वक्ता कहते हैं कि यदि आप सप्तशती जैसे बड़े अनुष्ठान, जिनमें 20–22 हजार रुपये लग जाते हैं, करवाने में सक्षम नहीं हैं, पर थोड़ा पूजन-पाठ स्वयं कर सकते हैं, तो हनुमान चालीसा या बजरंग बाण का अनुष्ठान कर लें। उनके अनुसार सबसे सही, जिसके अनुभव चैनल पर बार-बार डाले जाते हैं, महाभैरव का अनुष्ठान है: पहले से किया हो तो ठीक, पर दिक्कत आने के बाद देख रहे हों तो कम से कम उसका पाठ शुरू कर दें। अन्यथा सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र, जो सिद्ध साबरी विद्या चैनल पर मिलेगा, उसका अनुष्ठान घर पर करने से भी परिवार और पीड़ित व्यक्ति की रक्षा होगी।
वक्ता कहते हैं कि आठवीं विधि तब के लिए है जब आप बहुत बड़े अनुष्ठान करवाने में सक्षम न हों — सप्तशती इत्यादि में 20–22 हजार रुपये लग जाएंगे — लेकिन थोड़ा पूजन-पाठ स्वयं कर सकते हों। ऐसे में हनुमान चालीसा का अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। कर लें, या बजरंग बाण का, या उसका जिसे प्रतिलेख में "निष्टराध्य" लिखा गया है। उनके अनुसार सबसे सही — जिसके लोगों के अनुभव चैनल पर बार-बार डाले जाते हैं — महाभैरव का अनुष्ठान है। यदि आपने महाभैरव अनुष्ठान पहले से करके रखा है तब तो ठीक है; यदि दिक्कत आने के बाद देख रहे हैं तो कम से कम उसका पाठ शुरू कर दीजिए। अन्यथा, वे कहते हैं, सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र है, जो सिद्ध साबरी विद्या चैनल पर मिल जाएगा; उसका भी अनुष्ठान घर पर कर सकते हैं, और उससे भी परिवार की और पीड़ित व्यक्ति की रक्षा होगी।
मारण प्रयोग से पीड़ित व्यक्ति के लिए रक्षा कवच और स्वयं जप
दीक्षित हो तो गुरु मंत्र, अन्यथा भगवान का नाम या जयंती मंगला काली
वक्ता कहते हैं कि नौवां विधान यह है कि जिस व्यक्ति पर मारण प्रयोग किया गया है, उसके शरीर पर रक्षा कवच धारण करवाएं ताकि उसकी प्राण ऊर्जा की रक्षा हो, और उससे स्वयं भी मंत्र जप करवाएं: दीक्षित हो तो गुरु मंत्र इत्यादि, अन्यथा भगवान का नाम जप, या जयंती मंगला काली मंत्र का, जो नाम मंत्र है, जितना हो सके अधिकाधिक जप।
वक्ता कहते हैं कि नौवां विधान रक्षा कवच का धारण और मंत्र का जप है। यानी जो व्यक्ति परेशान है, जिस पर मारण प्रयोग प्रक्षेपित किया गया है, उसके शरीर पर रक्षा कवच धारण करवाएं ताकि उसकी प्राण ऊर्जा की रक्षा हो सके — और उससे स्वयं भी मंत्र जाप करवाएं। वे कहते हैं कि दीक्षित हों तो गुरु मंत्र इत्यादि करें। दीक्षित न हों तो भगवान का नाम जप करें, या जयंती मंगला काली मंत्र का, जो नाम मंत्र है — जितना हो सके उतना अधिकाधिक जप करें।
मारण प्रयोग के बाद साप्ताहिक काली या हनुमान मंदिर पूजन, नींबू की माला और ज्योत, और शाम को भैरव के नाम से दीप
लंबी अवधि की दिनचर्या, और भगवती की इच्छा तथा प्रारब्ध की सीमा
वक्ता कहते हैं कि सभी विधानों के साथ-साथ मंगलवार और शनिवार को काली जी या हनुमान जी के मंदिर में पूजन दें, भगवती को नींबू की माला पहनाएं, और पीड़ित के हाथ से स्पर्श करवाकर संकल्प के साथ नींबू की ज्योत जलाएं। हर शाम घर के दोनों ओर एक-एक दीप, या चार बाती वाला एक छोटा-सा चौमुख दीप भैरव जी के नाम से प्रज्वलित करें। लंबे समय तक यह करते रहने से मारण का प्रभाव शांत और नष्ट हो जाता है, और कोई कितना भी प्रयोग कर ले वैसी अरिष्टता नहीं आ पाती जैसी वह चाहता है — बाकी, वे कहते हैं, भगवती की इच्छा और अपना प्रारब्ध और पुण्य।
वक्ता कहते हैं कि ये सभी विधि-विधान करने हैं, और इनके साथ-साथ मंगलवार-शनिवार के दिन काली जी या हनुमान जी के मंदिर में पूजन देना है। भगवती को नींबू की माला पहनानी है। पीड़ित व्यक्ति के हाथ से स्पर्श करवाकर, उनसे संकल्प करवाकर नींबू की ज्योत भी जलाई जाती है — उससे भी रक्षा होती है। वे कहते हैं कि शाम के समय घर के दोनों ओर एक-एक दीप प्रज्वलित कर दें, या चार बाती डालकर एक ही छोटा-सा चौमुख दीप भैरव जी के नाम से प्रज्वलित करें। लंबे समय तक यह करते रहें तो मारण का प्रभाव शांत भी हो जाएगा और नष्ट भी। कोई कितना भी प्रयोग कर ले, वैसी अरिष्टता नहीं आ पाएगी जैसी वह चाहता है; बहुत हद तक रक्षण होगा। बाकी, वे कहते हैं, भगवती की इच्छा और आपका अपना प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। और पुण्य। फिर भी, यह देखा गया है कि ये सब चीजें करने से मारण के प्रयोग में काफी अधिक विषमता आ जाती है और उसका प्रभाव नहीं पड़ पाता।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।