नौ रातें, नौ दिन नहीं
अगर और कुछ न करें
  1. नौ दिन खाली न जाने दें
  2. अंधेरा होने के बाद कीजिए
  3. ग्यारहवें दिन बंद मत कीजिए
नौ रात्रि क्रम
साधना विधान
  1. घट स्थापना: प्रतिपदा और अमावस्या एक ही दिन पड़ें तो स्थापना व कलश
  2. कलश के नीचे जवारे बोने की विधि स्थापना व कलश
  3. अखंड ज्योत: किस ओर, किस तेल की, बाती कितनी लंबी स्थापना व कलश
  4. अखंड ज्योत बुझ जाए तो स्थापना व कलश
  5. विग्रह को नौ दिन आसन से न हटाएं स्थापना व कलश
  6. माला, और उसकी प्राण प्रतिष्ठा स्थापना व कलश
  7. वस्त्र, आसन और दिशा स्थापना व कलश
  8. भोग, और वह मधु जो कोई याद नहीं रखता स्थापना व कलश
  9. संकल्प, और वही कहना जो आप वास्तव में करेंगे सप्तशती व जप
  10. वह क्रम जिसे कोई छोड़ नहीं सकता: गुरु, गणपति, भैरव — फिर भगवती सप्तशती व जप
  11. सप्तशती नौ दिन में — प्रतिदिन पूरी नहीं सप्तशती व जप
  12. नवार्ण: बिना दीक्षा क्या कर सकते हैं, क्या नहीं सप्तशती व जप
  13. गलत पाठ करने से हिंदी में पाठ करना बेहतर है सप्तशती व जप
  14. रात्रि काल, और वह सलाह जो उसे छीन लेती है सप्तशती व जप
  15. रात्रि का नवदुर्गा जप — नौ माला और नौ लौंग सप्तशती व जप
  16. एक समय एक ही मंत्र — दो साथ नहीं सप्तशती व जप
  17. जिनका कोई गुरु नहीं, वे वास्तव में कहां से आरंभ करें सप्तशती व जप
  18. 32-नामावली — यदि एक ऐसी चीज़ चाहिए जिसमें अनुमति न लगे सप्तशती व जप
  19. व्रत कैसे करें — और लोग उसे कैसे दिखावा बना देते हैं व्रत व नियम
  20. उपवास नहीं रह सकते, तो कलश स्थापित मत कीजिए व्रत व नियम
  21. भूमि शयन — और कब आवश्यक नहीं व्रत व नियम
  22. ब्रह्मचर्य — शारीरिक ही नहीं, मानसिक भी व्रत व नियम
  23. बीच में यात्रा, या केवल तीन दिन हों तो व्रत व नियम
  24. बुजुर्ग या रोगग्रस्त साधक के लिए न्यूनतम व्रत व नियम
  25. झाड़ू वाला नियम जो लोग आधा याद रखते हैं व्रत व नियम
  26. संधि काल: अष्टमी के अंत के इधर-उधर बीस मिनट अष्टमी–नवमी
  27. संधि काल की बलि — सरलतम विधि अष्टमी–नवमी
  28. पहले हवन, फिर कन्या पूजन — कभी उलटा नहीं अष्टमी–नवमी
  29. हवन: सामग्री, और कुंड किस धातु का अष्टमी–नवमी
  30. क्या स्त्री आहुति दे सकती हैं? अष्टमी–नवमी
  31. पारण दशमी का है — अधिकांश व्रत यहीं टूटते हैं समापन व उसके बाद
  32. दशमी: अपराजिता, शमी, और कलश हिलाना समापन व उसके बाद
  33. अखंड ज्योत कब बुझने दी जाए समापन व उसके बाद
  34. कलश का नारियल कभी मत फोड़िए समापन व उसके बाद
  35. एकादशी से: वह नियम जो तय करता है कि कुछ बचेगा या नहीं समापन व उसके बाद
  36. व्रत खोलते समय उसे उलटा मत कीजिए समापन व उसके बाद
  37. मंत्र को तुरंत दूसरों पर मत चलाइए समापन व उसके बाद
  38. लौंग का क्या करें समापन व उसके बाद
  39. गुप्त नवरात्रि: कलश स्थापित मत कीजिए गुप्त नवरात्रि
  40. गुप्त नवरात्रि किसलिए नहीं है गुप्त नवरात्रि
साधकों के प्रश्न
  1. पहले कभी कोई साधना नहीं की — क्या मैं नवरात्र कर सकता हूं?
  2. दुर्गा सप्तशती पढ़ने के लिए दीक्षा चाहिए?
  3. संस्कृत के बदले हिंदी में पाठ कर सकते हैं?
  4. बीच रात में अखंड ज्योत बुझ जाए तो क्या करें?
  5. पारण नवमी को करें या दशमी को?
  6. कलश पर रखे नारियल का क्या करें?
  7. पहले हवन या पहले कन्या पूजन?
  8. क्या स्त्री हवन में आहुति दे सकती हैं?
  9. बिना उपवास के घट और अखंड ज्योत रख सकते हैं?
  10. क्या बिना घट स्थापना के नवरात्र किया जा सकता है?
  11. क्या सचमुच रात्रि में दुर्गा सप्तशती नहीं पढ़नी चाहिए?
  12. संधि काल वास्तव में क्या है, और उसमें करना क्या है?
  13. क्या 21 दिन का नवरात्र संकल्प लिया जा सकता है?
  14. बाहर जाना पड़ेगा — क्या केवल तीन या पांच दिन कर सकते हैं?
  15. साधना के लिए कौन-सा नवरात्र सही है — चैत्र, शारदीय या गुप्त?
  16. अच्छे नवरात्र के तुरंत बाद लोग बीमार क्यों पड़ते हैं?
  17. सामर्थ्य नहीं है कि ठीक से सामग्री जुटा सकूं — क्या साधना में कमी रह जाएगी?
  18. नौ दिन में दो देवी-मंत्र साथ चला सकते हैं?
जिन भूलों से व्रत भंग होता है
  1. अष्टमी या नवमी को पारण कर लेना
  2. पूजा पूरी दिखने पर ज्योत बुझा देना
  3. प्रसाद के लिए कलश का नारियल फोड़ देना
  4. कागज़ पर व्रत, और पेट भर कर खाना
  5. सामर्थ्य होते हुए कमी करना
  6. पारण के साथ ब्रह्मचर्य समाप्त कर देना
  7. सीधे भारी या तामसिक भोजन पर चले जाना
  8. ग्यारहवें दिन सब कुछ बंद कर देना
  9. अगले ही सप्ताह मंत्र दूसरों पर चला देना
  10. हर नवरात्र साधना बदल देना
  11. संकल्प में व्रत बढ़ा-चढ़ा कर बोलना
  12. बीच नवरात्र में विग्रह को आसन से उठा लेना
नवरात्र जांच-सूची
Festival

नवरात्र साधना विधि

नौ रातों के लिए प्रवचनों में वास्तव में जो विधान बताया गया है — कलश कब स्थापित हो, किस तिथि को सप्तशती का कौन-सा अध्याय, अखंड ज्योत बुझ जाए तो क्या करें, पारण नवमी को क्यों नहीं दशमी को है, अष्टमी-नवमी की संधि किसलिए है, और वह नियम जो तय करता है कि नौ दिन की मेहनत दसवें दिन बचेगी या नहीं।

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एक अनुक्रमणिका, राय नहीं
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नौ रातें, नौ दिन नहीं

नवरात्रि में जो कुछ गलत होता है, उसकी जड़ में प्रायः एक ही चुपचाप मान ली गई बात रहती है — कि ये नौ दिन हैं जिनमें कहीं पूजा भी है। जिन प्रवचनों से यह पृष्ठ संकलित हुआ है, वे इसके ठीक उलट खड़े हैं, और स्पष्ट शब्दों में: नाम नव-रात्रि है, विशेष काल लगभग रात 9 बजे से 1 बजे तक है, और जो साधक शाम सात बजे तक निपटा कर सो जाता है, उसने साधना उसके अपने केंद्र के आसपास कर ली है, केंद्र पर नहीं। जो बात सबसे अधिक फैली है — कि रात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ नहीं करना है — उस पर कहा गया है कि ऐसा बताने वाला आपका ही क्षय कर रहा है, और यह कि रातें ही यदि विषय न होतीं तो माई इसे नव-दिन कह देतीं।

ढांचा यही है। इसके भीतर विधि छोटी और निश्चित है: सही मुहूर्त में कलश स्थापित करें, ऐसा दीपक जलाएं जो नौ दिन बिना छेड़े जल सके, प्रतिदिन प्रातः दुर्गा सप्तशती का निर्धारित अंश पढ़ें, रात्रि में उस तिथि का नवदुर्गा मंत्र जपें, अष्टमी-नवमी पर हवन और कन्या पूजन से समापन करें, और पारण दशमी को करें — उससे पहले नहीं। इस पृष्ठ का शेष सब कुछ इन्हीं छह में से किसी एक का विस्तार है, या वह प्रश्न जिस पर लोग अटकते हैं, या वह भूल जो पूरे व्रत को चुपचाप निष्फल कर देती है।

विस्तार से पहले एक बात, क्योंकि पूरे संग्रह में यही सबसे अधिक बार दोहराई गई है और यही सबसे कम मानी जाती है: एक साधना चुनिए और उसे हर नवरात्र दोहराइए। सबसे शक्तिशाली सुनाई देने वाली नहीं — वह जिसे आप वास्तव में पूर्ण करेंगे, बार-बार, जब तक वह आपकी न हो जाए। जो साधक हर नवरात्र नया अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। उठाता है, वह हर मार्ग में स्थायी रूप से आरंभिक बना रहता है।

भाई नवरात्र नव दिन क्यों नहीं है फिर? फिर बोल देती माई कि नहीं नव दिन है, दिन में ही करो, रात में मत करो। तो आप अगर देवी उपासना कर रहे हैं तो इस विषय का विशेष ध्यान रखें।

नवरात्र के नौ दिन के विशेष तंत्र काल →

अगर और कुछ न करें

०१

नौ दिन खाली न जाने दें

न्यूनतम सीमा जानबूझकर नीची रखी गई है। संस्कृत नहीं आती, व्रत नहीं रह सकते, कोई विधि नहीं आती — तो दुर्गा चालीसा कीजिए, हो सके तो चक्र विधि से, नहीं तो सामान्य रूप से। पर नवरात्र खाली मत जाने दीजिए। इन नौ दिनों में कुछ न करना तटस्थ चुनाव नहीं, आगे चल कर पड़ने वाला वास्तविक कष्ट माना गया है।

०२

अंधेरा होने के बाद कीजिए

आपने जो भी चुना हो — जप, चंडी पाठ, कोई कवच — उसे रात 9 से 1 के बीच ले जाइए। यही एक बदलाव नवरात्र की साधना को साधारण नित्य पूजन से अलग करता है, और इसमें कुछ खर्च नहीं होता।

०३

ग्यारहवें दिन बंद मत कीजिए

नौ दिन का संचित जप दशमी के बाद पूरी तरह असुरक्षित छोड़ देना ही वह कारण है जिससे अच्छे साधक अच्छे नवरात्र के बाद बीमार पड़ते हैं। एकादशी से: उसी मंत्र की कम से कम एक माला, साथ में उसका कवच, नित्य। इस पृष्ठ पर यही सबसे कम वैकल्पिक बात है।

नौ रात्रि क्रम

गृहस्थ क्रम — उन साधकों के लिए जिन्हें दीक्षा प्राप्त नहीं है और जिन्हें नौकरी भी करनी है: सप्तशती प्रतिदिन पूरी पढ़ने के बजाय महाविद्या क्रम से नौ तिथियों में बंटती है, और उस दिन का नवदुर्गा मंत्र रात्रि में होता है। कवच, अर्गला और कीलक प्रतिदिन, उस दिन के अध्यायों से पहले; और तंत्रोक्त देवी सूक्तम प्रतिदिन, उनके बाद। इस क्रम में उत्कीलन तथा मृत्यु-संजीवन की आवश्यकता नहीं रहती।
तिथि सप्तशती पाठ (प्रातः) रात्रि जप — नौ माला Source
प्रतिपदा कवच · अर्गला · कीलक, फिर प्रथम अध्याय, फिर तंत्रोक्त देवी सूक्तम शैलपुत्री चैत्र नवरात्र नवचंडी गृहस्थ तंत्र साधना।सभी गृहस्थ हेतु …
द्वितीया अध्याय 2–3 ब्रह्मचारिणी चैत्र नवरात्र नवचंडी गृहस्थ तंत्र साधना।सभी गृहस्थ हेतु …
तृतीया अध्याय 4 चंद्रघंटा चैत्र नवरात्र नवचंडी गृहस्थ तंत्र साधना।सभी गृहस्थ हेतु …
चतुर्थी अध्याय 5–8 कूष्मांडा चैत्र नवरात्र नवचंडी गृहस्थ तंत्र साधना।सभी गृहस्थ हेतु …
पंचमी अध्याय 9–10 स्कंदमाता चैत्र नवरात्र नवचंडी गृहस्थ तंत्र साधना।सभी गृहस्थ हेतु …
षष्ठी अध्याय 11 कात्यायनी चैत्र नवरात्र नवचंडी गृहस्थ तंत्र साधना।सभी गृहस्थ हेतु …
सप्तमी अध्याय 12–13 — तेरह अध्याय अब पूर्ण कालरात्रि चैत्र नवरात्र नवचंडी गृहस्थ तंत्र साधना।सभी गृहस्थ हेतु …
अष्टमी अध्याय 13 के बाद दिए गए तीनों रहस्य महागौरी — और इसी तिथि के अंत पर अष्टमी-नवमी की संधि चैत्र नवरात्र नवचंडी गृहस्थ तंत्र साधना।सभी गृहस्थ हेतु …
नवमी प्रातः: पहले हवन, फिर कन्या पूजन सिद्धिदात्री — और आज पारण नहीं चैत्र नवरात्र नवचंडी गृहस्थ तंत्र साधना।सभी गृहस्थ हेतु …
दशमी अपराजिता पूजन, शमी पूजन, जवारे अर्पण, कलश हिलाना व विसर्जन दान व समर्पण के बाद पारण अखंड ज्योत बुझने पर क्या करें navratri

साधना विधान

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घट स्थापना: प्रतिपदा और अमावस्या एक ही दिन पड़ें तो

पहला दिन

मुहूर्त का प्रश्न वास्तव में तिथि का प्रश्न है, और इसके दो स्पष्ट रूप हैं।

यदि प्रतिपदा उसी दिन आरंभ होकर उसी दिन समाप्त हो रही है — जैसे सुबह 8 बजे तक अमावस्या रही, उसके बाद प्रतिपदा लगी, और अगले दिन प्रतिपदा है ही नहीं — तो उसी दिन मध्यान्ह के अभिजीत मुहूर्त में घटस्थापना कर लें।

यदि अमावस्या पूरा दिन रही और अगले दिन प्रातः प्रतिपदा मिल रही है, सूर्योदय के बाद आधा-एक-दो घंटे के लिए भी — तो वही प्रातःकाल आपका है: उसी अवधि में शुभ चौघड़िया देख कर कलश स्थापित करें। यदि अवधि डेढ़ घंटे की ही है और उसमें शुभ चौघड़िया नहीं मिल रहा, तो उसी दिन अभिजीत मुहूर्त में कर लें।

शक्ति पीठ, ज्योतिर्लिंग क्षेत्र या जहां भगवती और शिव नित्य विराजमान माने गए हैं, वहां मुहूर्त देखने की विशेष आवश्यकता नहीं — वहां तो दीक्षा के लिए भी नक्षत्र-मुहूर्त नहीं देखना, ऐसा कहा गया है।

कलश के नीचे जवारे बोने की विधि

जहां जवारे बोए जाते हैं — और यह क्षेत्रीय है, चैत्र नवरात्र में बहुत जगह नहीं बोते — वहां क्रम महत्वपूर्ण है। भूमि साफ करें, उस पर त्रिकोण या षटकोण बनाएं, उसके ऊपर गंगाजल मिली शुद्ध मिट्टी बिछाएं, और भगवती के जो मंत्र आपको आते हों उनका उच्चारण करते हुए जौ का रोपण करें।

दो बातें विधि का ही अंग हैं, सुझाव नहीं: जौ को एक दिन पहले भिगो कर छोड़ दें ताकि अच्छी तरह अंकुरित हो, और बीच का भाग खाली रखें ताकि कलश ठीक से बैठे और जवारे उगने पर उसे हिला न दें।

अखंड ज्योत: किस ओर, किस तेल की, बाती कितनी लंबी

मूल

कलश स्थापना के तुरंत बाद अखंड ज्योति प्रज्वलित होती है, और उसका स्थान उसके ईंधन से तय होता है: घी का दीपक भगवती के दाहिने हाथ की ओर, तिल तेल का दीपक उनकी बाईं ओर।

बाती जानबूझ कर लंबी रखें — असामान्य रूप से लंबी। पूरा उद्देश्य यही है कि बीच में बाती बदलनी ही न पड़े, क्योंकि नौ दिन की ज्योत वास्तव में जिन क्षणों में बुझती है वे साधारण ही होते हैं: कालिख हटाते समय, या पंचमी की रात तीन बजे बाती चुक जाने पर।

अखंड ज्योत बुझ जाए तो

सुधार

पुनः प्रज्वलित कर दीजिए। जैसे ही दिखे, वैसे ही जला दीजिए — पहला निर्देश पूरा यही है, और इसी के आसपास की घबराहट को ठीक किया जा रहा है।

फिर जब अगली बार आसन पर बैठें, तो प्रायश्चित्त स्वरूप एक माला या देवी सर्वभूतेषु क्षमारूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः का जप कर लें। प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। इतना ही है। नौ दिन व्यर्थ नहीं हुए, व्रत भंग नहीं हुआ, और इसके आगे कुछ शेष नहीं।

छूटे हुए नित्य कर्म का प्रायश्चित्त उतना ही बड़ा है जितना वह छूटा — एक दिन के लिए सौ जप, दस दिन से आगे एक लाख, महीना बीत जाने पर पुनः संस्कार — न कि यह निर्णय कि पूरा अनुष्ठान ही व्यर्थ हो गया।

यह संध्या के विषय में कहा गया है, अखंड ज्योत के विषय में नहीं — इन अध्यायों में दीपक की चर्चा ही नहीं है। इसे उस सिद्धांत के लिए उद्धृत किया गया है जो प्रवचन ज्योत बुझने पर लागू करते हैं: पुनः जलाइए, प्रायश्चित्त जप कीजिए, और आगे बढ़िए। यह घबराहट कि नौ दिन अब व्यर्थ हो गए, ग्रंथ जिस तरह किसी व्यवधान को संभालते हैं उसमें उसका कोई आधार नहीं है।

मूल पाठ पढ़ें →
29

सायं मुहूर्तादर्वाक्तु कृता सन्ध्या वृथा भवेत् । अकालात्काल इत्युक्तो दिनेऽतीते यथाक्रमम् ॥

मुहूर्त से पहले की गई सायं-सन्ध्या व्यर्थ हो जाती है; दिन बीत जाने पर यथाक्रम अकाल को काल कहा गया है।

30

दिवातीते च गायत्रीं शतं नित्यं क्रमाज्जपेत् । आदशाहात्परातीतं गायत्रीं लक्षमभ्यसेत् । मासातीते तु नित्ये हि पुनश्चोपनयं चरेत् ॥

दिन बीत जाने पर प्रतिदिन क्रमशः सौ बार गायत्री जपे; दस दिन से आगे बीत जाने पर लाख बार गायत्री का अभ्यास करे; और मास बीत जाने पर पुनः उपनयन करे।

तो ऐसे समय में देखिए ज्योत को दोबारा जला देना चाहिए, प्रज्वलित कर देना चाहिए। आप जैसे ही देखते हैं वैसे ही ज्योत को प्रज्वलित कर दीजिए। अखंड ज्योत बुझने पर क्या करें navratri →

विग्रह को नौ दिन आसन से न हटाएं

यदि आपने कलश स्थापित किया है, अखंड ज्योत जलाई है और विग्रह भी रखा है, तो वह श्री विग्रह नौ दिन अपने आसन से नहीं हटेगा। पहले दिन पूर्ण स्नान विधि होगी; दूसरे दिन से वह वहीं रहेगा।

जिनका नित्य नियम विग्रह उठा कर अभिषेक करने का है, उनके लिए उत्तर अभिषेक छोड़ना नहीं, व्यवस्था बदलना है: आसन ऐसा बना दें कि जल पात्र से होते हुए दूसरे पात्र में चला जाए, वस्त्र हल्के से हटाएं, स्नान कराएं, वहीं पोंछ कर श्रृंगार कर दें। जिनके गुरुजी हैं वे उनसे पूछ लें — यहां जो स्थिति दी गई है वह इस परंपरा की अपनी है, सार्वभौमिक निर्णय के रूप में नहीं रखी गई।

माला, और उसकी प्राण प्रतिष्ठा

रक्त चंदन, रुद्राक्ष या स्फटिक — रात्रि जप के लिए तीनों में से कोई भी चलेगी। जो वैकल्पिक नहीं है वह यह कि नवरात्र आरंभ होने से पहले माला प्राण-प्रतिष्ठित व चेतन-युक्त हो। इसके लिए ठीक पहले पड़ने वाली अमावस्या को उपयुक्त दिन बताया गया है।

जो माला किसी गुरु या अनुष्ठान के माध्यम से पहले से प्रतिष्ठित प्राप्त हुई है, उसमें कुछ नहीं करना — सीधे जप आरंभ कीजिए।

वस्त्र, आसन और दिशा

रंगीन वस्त्र पहनें — लाल, पीला या नारंगी, जिनमें लाल सर्वोत्तम है। कुश आसन पर बैठें, या लाल अथवा पीले आसन पर; यहां भी लाल पहले। दिशा पूर्व या उत्तर।

ये नौ दिन के ढांचे के रूप में बताए गए हैं, पहले दिन की औपचारिकता के रूप में नहीं — और पूरी विधि में इन्हें निभाना सबसे सस्ता है।

भोग, और वह मधु जो कोई याद नहीं रखता

यदि नौ स्वरूपों के लिए नौ अलग भोग सम्भव हों, तो कीजिए। न हो तो सामान्य भोग पर्याप्त है: दूध से बनी मिठाई, किशमिश, छुहारे, और उस समय उपलब्ध मौसमी फल।

जिस एक वस्तु के विषय में स्पष्ट कहा गया है कि उसे अवश्य अर्पित करना चाहिए, वह है मधु। हो सके तो छोटी चांदी की कटोरी में नौ दिन भगवती के समक्ष मधु रखें; पाठ पूर्ण होने पर उस मधु को जल में मिला कर स्वयं भी लें और प्रसाद रूप में सबको दें।

संकल्प, और वही कहना जो आप वास्तव में करेंगे

पहले गुरु व गणपति पूजन, फिर स्वस्तिवाचन, फिर हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है।। स्वस्तिवाचन नहीं आता तो भगवान नारायण का तीन बार नाम लीजिए, गणपति जी का पाठ कर लीजिए, और आगे बढ़िए।

जो बात महत्वपूर्ण है और छूट जाती है: यदि आप नौ दिन उपवास नहीं करने वाले — केवल पहले और अंतिम दिन करेंगे — तो यह संकल्प में स्पष्ट रूप से कहिए। जो संकल्प आपकी क्षमता से बड़ा है, वही आगे चल कर भंग व्रत के रूप में पढ़ा जाता है। संकल्प उसी नाम से लीजिए जिस नाम से आप पुकारे जाते हैं; राशि या नक्षत्र नाम तभी बेहतर है जब आप पहले से उसी से संकल्प लेते आए हों।

जहां मंत्र सिद्धि भी अभीष्ट है, वहां उसे भी नाम दीजिए — संकल्प मंत्र की सिद्धि और प्रयोग काल में पूर्ण प्रभाव प्राप्ति के लिए होता है, केवल अस्पष्ट कृपा-प्राप्ति के लिए नहीं।

वह क्रम जिसे कोई छोड़ नहीं सकता: गुरु, गणपति, भैरव — फिर भगवती

मूल

सीधे प्रश्न पर कि क्या गणपति पूजन किए बिना देवी पूजन कर सकते हैं, उत्तर स्पष्ट ना है। पूजन क्रमगत होगा: गुरु, गणेश, बटुक भैरव, हनुमान, तब भगवती। इनके साथ रक्षक चतुष्टय के चौथे रूप में नरसिंह भगवान को भी अक्षत-पुष्प अर्पित करने को कहा गया है।

जहां पूर्ण विधान नहीं आता, वहां इन सबके नाम से अक्षत और पुष्प चढ़ा देना ही पूजा स्वीकार है। जहां उतना भी न हो सके, न्यूनतम है गणपति जी और भैरव जी, तब भगवती। गुरु न हों तो दत्तात्रेय का ध्यान कीजिए — महागुरु, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक साथ हैं — और उसी नाम से अर्पित कीजिए।

सप्तशती नौ दिन में — प्रतिदिन पूरी नहीं

नौकरीपेशा साधकों हेतु

प्रतिदिन पूरे तेरह अध्याय — यह नौकरी करने वाले गृहस्थ के लिए विधान नहीं है। महाविद्या क्रम पाठ को नौ तिथियों में बांट देता है (विभाजन ऊपर की तालिका में है), और समय बचाने के अतिरिक्त इसका एक संरचनात्मक लाभ है: इस क्रम में उत्कीलन और मृत्यु-संजीवन की प्रक्रियाएं करने की आवश्यकता नहीं होती। अदीक्षित पाठक के लिए दुर्गा सप्तशती की सबसे बड़ी अटकन — कीलक और उसका क्या करें — यहीं समाप्त हो जाती है।

प्रतिदिन जो अनिवार्य है: उस दिन के अध्यायों से पहले कवच, अर्गला और कीलक, और उनके बाद तंत्रोक्त देवी सूक्तम — वही या देवी सर्वभूतेषु वाली स्तुति।

नवार्ण: बिना दीक्षा क्या कर सकते हैं, क्या नहीं

अधिकार

रेखा दोनों ओर से स्पष्ट खींची गई है।

बिना दीक्षा: नवार्ण की एक माला चल जाएगी। महाविद्या क्रम में उस दिन के अध्याय का संपुट कर रहे हों तो पहले एक माला और बाद में एक माला; संपुट नहीं कर रहे तो कम से कम नौ बार। और प्रणवों के बिना कीजिए।

बिना दीक्षा नहीं: नवार्ण का स्वतंत्र अनुष्ठान, संख्या और सिद्धि की दृष्टि से। उसके लिए विधिवत शाक्त दीक्षा और गुरु का आदेश चाहिए, और यह भी स्पष्ट कहा गया है कि वह विधि ऑनलाइन बताई ही नहीं जा सकती — पूछने वालों को बार-बार यही उत्तर दिया गया है।

इसी से जुड़ी और प्रायः भ्रमित करने वाली बात: जहां कहीं मंत्र में वैदिक प्रणव आता हो, वहां सामान्य साधक को तांत्रिक प्रणव का उच्चारण करना चाहिए। वैदिक प्रणव विशेष रूप से संन्यासियों के निमित्त है।

गलत पाठ करने से हिंदी में पाठ करना बेहतर है

पहली बार करने वालों से सीधे कहा गया है: यदि संस्कृत ठीक नहीं है तो गलत पाठ मत कीजिए — पूरा पाठ हिंदी में, भावपूर्वक कीजिए। यह आपत्ति कि हिंदी में “कुछ नहीं होता”, यहीं उठाई और खारिज की गई है।

पर यह छूट लक्ष्य के साथ आती है, स्थायी समझौते के रूप में नहीं। सप्तशती सात सौ श्लोक ही तो है; प्रतिदिन दस श्लोक से दो महीने दस दिन में उच्चारण आ जाएगा — कंठस्थ नहीं करना, केवल उच्चारण। पंद्रह-तीस मिनट प्रतिदिन, और दो-चार नवरात्र में आप संस्कृत में पढ़ने लगेंगे। कवच का पाठ भी हिंदी में किया जा सकता है।

अब यहां पर जिनको संस्कृत में पाठ करने नहीं आता है, गलत पाठ कृपया ना करें। आप हिंदी में भाव पूर्वक पूर्ण पाठ कीजिए। चैत्र नवरात्र नवचंडी गृहस्थ तंत्र साधना।सभी गृहस्थ हेतु … →

रात्रि काल, और वह सलाह जो उसे छीन लेती है

मूल

नौ से एक। नौ रातों के लिए यही अवधि बताई गई है, और इसमें की गई साधना को अति उत्तम कहा गया है। कारण विस्तृत नहीं है — यह जगदंबा का समय है, और अनुष्ठान का नाम ही रातों पर है।

विपरीत मत का सामना सीधे किया गया है: जो यह बता रहा है कि रात्रि में सप्तशती पाठ नहीं करना, वह चाहे कितना ही प्रतिष्ठित संत, महात्मा या सिद्ध क्यों न कहलाता हो, वह साधक का क्षय ही कर रहा है। लिखित निषेध है, यह स्वीकार किया गया है; आपत्ति इस पर है कि लिखे को उद्धृत तो करते हैं, पर जिस कारण से लिखा गया उसकी चर्चा कोई नहीं करता। फिर भी यदि आप उस मत पर टिके हैं, तो स्थिति यह रखी गई है कि यह आपका विषय है।

रात्रि का नवदुर्गा जप — नौ माला और नौ लौंग

संध्या आरती के बाद, लगभग आठ बजे, पुनः आसन पर बैठिए। अखंड ज्योत जल ही रही है; इस बैठक के लिए एक अलग कर्म-साक्षी दीपक प्रज्वलित कीजिए। धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित कीजिए, फिर गुरु, गणपति, बटुक भैरव और नरसिंह भगवान के नाम से अक्षत-पुष्प।

फिर उस रात के नवदुर्गा स्वरूप की नौ माला — प्रतिपदा को शैलपुत्री, और इसी क्रम में नौ तक — और जप भगवती को समर्पित कर दीजिए। अंत में किसी पात्र में नौ लौंग या नौ कपूर प्रज्वलित कर दीजिए। रात्रि की बैठक इतनी ही है; इसे जानबूझ कर छोटा रखा गया है।

एक समय एक ही मंत्र — दो साथ नहीं

पूछे जाने पर कि रात्रि सूक्तम और जयंती मंगला काली साथ-साथ कर सकते हैं या नहीं, उत्तर है नहीं — कोई एक कीजिए। कारण सैद्धांतिक से अधिक व्यावहारिक दिया गया है: दोनों में प्रचंड शक्तियां हैं, और दोनों एक साथ चलाने पर दोनों की भक्ति में कमी आ जाती है और जो आता है उसे संभालना आपके ऊपर पड़ता है।

यह सामान्य नियम के रूप में कहा गया है, किसी एक प्रश्न का उत्तर भर नहीं: एक समय पर एक ही मंत्र का जप करना सदैव उत्तम रहता है।

जिनका कोई गुरु नहीं, वे वास्तव में कहां से आरंभ करें

आरंभिक साधक

जिनकी कोई दीक्षा नहीं और कोई परंपरा नहीं, उनके लिए दिया गया क्रम — महीने में एक सीढ़ी, ताकि नवरात्रों और पर्व-कालों का एक वर्ष आधार बना दे:

१. देव-दीक्षा विधान और दत्त माला मंत्र का पुरश्चरण — जब कोई प्रत्यक्ष गुरु नहीं है, तब यही आपको गुरु-मंडल से जोड़ता है और सूक्ष्म शरीर में मंत्र धारण करने की क्षमता देता है।
२. गणपति — संकट नाशन गणेश स्तोत्र, कुछ महीनों में 1100, 2100 या 11000। इसके बिना मूलाधार स्थिर नहीं होता, और साधना उठा कर छोड़ देने की प्रवृत्ति का कारण सीधे इसी की अनुपस्थिति बताई गई है।
३. बटुक भैरव जी का स्तोत्र व सतनाम — उस रक्षा के लिए जिसकी आवश्यकता साधना स्वयं उत्पन्न करने लगती है।
४. फिर पंचाक्षरी, अथवा भगवती का सतनाम और कोई कवच — कुब्जिका, कामाख्या, या जो आप करते हों।
५. इतनी दूर आने के बाद ही एकाक्षरी बीज।

आसपास के बाज़ार पर: यह दावा कि बिना गुरु के कोई मंत्र छुआ ही नहीं जा सकता, उसे मार्केटिंग कहा गया है। दीक्षा का विरोध नहीं है — ऐसे कई अदीक्षित साधकों का उल्लेख है जिनके अनुभव और सफलता दीक्षितों से भी अधिक रही। आपत्ति शब्दों के आकर्षण पर है, जहां “श्मशान भैरव” की दीक्षा तुरंत बिक जाती है और हनुमान जी की कोई लेता ही नहीं।

32-नामावली — यदि एक ऐसी चीज़ चाहिए जिसमें अनुमति न लगे

दुर्गा जी के 32 नामों के लिए दीक्षा बिल्कुल आवश्यक नहीं — यह स्पष्ट रूप से और बार-बार कहा गया है। नवरात्र के लिए दिया गया क्रम: पहली बार सामान्य 1100 पाठ; अभ्यास हो जाने पर चक्र विधि पर जाइए।

चक्र विधि से एक चक्र लगभग 33 पाठ होता है। कम से कम तीन चक्र, हो सके तो पांच, या सुबह-शाम मिला कर नौ। पुष्प के साथ कर रहे हों तो या तो प्रति चक्र 33 पुष्प, या एक ही पुष्प पर 33 पाठ — दोनों चलेंगे, अधिक हो तो और अच्छा। लौंग एक ही रखिए, जोड़ा नहीं, क्योंकि यह भगवती का अकेले का है।

व्रत कैसे करें — और लोग उसे कैसे दिखावा बना देते हैं

शरीर की वास्तविक क्षमता के अनुसार व्रत कीजिए: फल और फलों का रस, जितना अधिक हो सके लिक्विड, ताकि शरीर के भीतर के अंगों को भी विश्राम मिले और उसी के साथ शरीर की टॉक्सिसिटी भी समाप्त हो। यदि यह वास्तव में सम्भव न हो तो एक समय कुट्टू के आटे की रोटी जैसा सामान्य अन्न स्वीकार है — इतना कि काम चल जाए, उससे अधिक नहीं।

दो विफलताएं नाम लेकर बताई गई हैं। हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति यदि नवरात्र भर भरपेट भोजन कर रहा है तो स्पष्ट कहा गया है कि यह उचित नहीं। और फल ठूंस-ठूंस कर खाना — डकार आने तक, इस तर्क पर कि फल तो वर्जित नहीं — इससे व्रत का कोई विषय ही नहीं रह जाता। व्रत अन्न के त्याग से पहले जिह्वा के स्वाद का त्याग है।

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 17.36–37

जप-अनुष्ठान का अपना विधान ही एक बार, मित मात्रा में भोजन, मौन और इंद्रिय-संयम बताता है — व्रत साधना का अंग है, उससे अलग कोई पुण्य-कर्म नहीं।

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36

एकवारं मिताशी तु वाग्यतो नियतेन्द्रियः ॥

एक बार परिमित भोजन करते हुए, मौन रहकर, इन्द्रियों को वश में रखकर —

37

स्वस्य राजपितृणां च नित्यं शुश्रूषणं चरेत् । सहस्रजपमात्रेण भवेच्छुद्धोऽन्यथा ऋणी ॥

अपने स्वामी और माता-पिता की नित्य सेवा करे; केवल सहस्र जप से ही शुद्ध हो जाता है, अन्यथा ऋणी रहता है।

उपवास नहीं रह सकते, तो कलश स्थापित मत कीजिए

अधिकार

सीधे प्रश्न पर कि बिना उपवास के घट और अखंड ज्योत रख सकते हैं या नहीं, उत्तर है नहीं — उनकी सेवा के लिए थोड़ा उपवास तो रहना ही पड़ता है, और आधा-अधूरा करने की अनुमति देने के बजाय मना किया गया है। कहा गया है कि भगवती से सामर्थ्य मांगिए कि हम उपवास रख कर विधिवत सेवा करें।

विकल्प कम कृपा वाला नहीं, अलग आकार का है: घट छोड़िए, सेवा रखिए। सुबह-शाम का नित्य पूजन बढ़िया से, भव्यता से कीजिए, श्रृंगार कीजिए। स्पष्ट कहा गया है कि उसमें भी कृपा प्राप्त होगी। बिना घट स्थापना के प्रतिदिन चंडी पाठ, पंचोपचार पूजन, कर्म-साक्षी दीपक और सात्विक बलि — यह पूर्णतः ठीक है। और बिना घट स्थापित किए नौ दिन का उपवास भी ठीक है।

भूमि शयन — और कब आवश्यक नहीं

यदि शरीर साथ देता है तो भूमि पर सोइए: कुशा की चटाई, या कंबल, या कंबल को मोटा कर के। खाट पर नहीं, पलंग पर नहीं — नियम यही है, और भूमि शयन को इनमें सर्वश्रेष्ठ कहा गया है।

छूट वास्तविक है और सहज दी गई है। यदि नीचे जगह ही नहीं है, या परिवार की परिस्थिति ऐसी है कि सम्भव नहीं, तो ऊपर सोना दोष नहीं — भगवती से क्षमा याचना कर के सो जाइए। यह शरीर और परिस्थिति का नियम माना गया है, परीक्षा नहीं।

ब्रह्मचर्य — शारीरिक ही नहीं, मानसिक भी

नौ दिन ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य।, शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से — यह अनुष्ठान करने वालों के लिए नियम के रूप में और कुछ न करने वालों के लिए भी प्रार्थना के रूप में कहा गया है। दूसरे वर्ग के लिए बात न्यूनतम और स्पष्ट है: नवरात्र में कुछ नहीं भी कर रहे, घूमिए-फिरिए, पर दो चीज़ें कीजिए — उल्टा-सीधा मत खाइए और ब्रह्मचर्य का पालन कीजिए।

यहां असामान्य बात यह है कि यह दशमी पर समाप्त नहीं होता। नीचे “नवरात्र के बाद” वाला कार्ड देखिए।

बीच में यात्रा, या केवल तीन दिन हों तो

एक साधिका के प्रश्न पर कि उन्हें बीच में बाहर जाना पड़ता है, क्या वे केवल शुरू के तीन या पांच दिन पूजा कर सकती हैं — उत्तर सीधा हां है।

यही सिद्धांत स्थान बदलने पर भी लागू है: जो साधक पहले पास के मंदिर में अखंड ज्योत और मंडल के साथ पूरा अनुष्ठान करते थे और अब नहीं कर सकते, उनसे कहा गया है कि जितना सम्भव है वह कीजिए, कोई दोष नहीं लगेगा। जहां क्षेत्र में फल-पत्ती तक का अभाव हो, वहां मानसिक रूप से समर्पण कर के पूजन पूर्ण कर लीजिए।

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 15.56–58

साधन न हों तो निर्धन व्यक्ति वाणी से या क्रिया से यज्ञ करे; देवता को अर्पण के भाव से किया गया थोड़ा या बहुत, दोनों ही काम आते हैं।

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56

बन्धुराजभयाद् बुद्धिः श्रद्धा सा च कनीयसी । सर्वाभावे दरिद्रस्तु वाचा वा कर्मणा यजेत् ॥

भाई-बन्धु अथवा राजा के भय से जो बुद्धि होती है, वह श्रद्धा कनिष्ठ है। सब वस्तुओं के अभाव में दरिद्र पुरुष वाणी अथवा कर्म से यजन करे।

57

वाचिकं यजनं विद्यान्मन्त्रस्तोत्रजपादिकम् । तीर्थयात्रा व्रताद्यं हि कायिकं यजनं विदुः ॥

मन्त्र, स्तोत्र, जप आदि को वाचिक यजन जानना चाहिए; तीर्थयात्रा, व्रत आदि को कायिक यजन जानना चाहिए।

58

येन केनाप्युपायेन ह्यल्पं वा यदि वा बहु । देवतार्पणबुद्ध्या च कृतं भोगाय कल्पते ॥

जिस किसी भी उपाय से, थोड़ा हो या बहुत, देवतार्पण की बुद्धि से किया गया कर्म भोग के लिए समर्थ होता है।

बुजुर्ग या रोगग्रस्त साधक के लिए न्यूनतम

जिनका शरीर साथ नहीं दे रहा — आयु के कारण या रोग के कारण — उनके लिए दिया गया संक्षिप्त रूप अस्पष्ट नहीं, ठोस है: घर में भगवती का एक छोटा श्री विग्रह रखिए, पांच-छह इंच का, और उसका नित्य अभिषेक, श्रृंगार और आरती कीजिए। इनमें श्रृंगार पूजा को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है।

उस स्थिति में पूरी साधना इतनी ही है, और इसे पर्याप्त कह कर दिया गया है, सांत्वना के रूप में नहीं।

झाड़ू वाला नियम जो लोग आधा याद रखते हैं

प्रचलित निषेध रात्रि में झाड़ू लगाने पर है। जो सुधार दिया गया है वह अधिक बारीक है: जो नहीं होना चाहिए वह है अंधेरे के बाद देहरी से बाहर कचरा जाना — मेन गेट से बाहर। घर के भीतर साफ-सफाई की जा सकती है।

कठोर रूप — शाम के बाद झाड़ू को स्पर्श ही न करना — को स्वीकार किया गया है कि बहुत जगह ऐसा नियम है, और उसका खंडन नहीं किया गया। बात केवल इतनी है कि जो रूप वास्तव में महत्व रखता है वह देहरी वाला है।

संधि काल: अष्टमी के अंत के इधर-उधर बीस मिनट

शिखर

जहां अष्टमी समाप्त होकर नवमी आरंभ होती है — अष्टमी के अंतिम बीस मिनट और नवमी के आरंभ के बीस मिनट — वह नौ रातों का सबसे विशेष काल है, और कारण भी बताया गया है: इसी समय चामुंडा प्रकट हुई थीं, जिन्हें जगदंबा का सबसे बड़ा तंत्रोक्त स्वरूप कहा गया है। उस समय उनकी ऊर्जा समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त रहती है — इसीलिए शत्रु नाश, कष्ट नाश और रोग नाश के लिए यही समय सर्वोत्तम बताया गया है।

इससे जुड़ी पर अलग बात: महा अष्टमी की मध्य रात्रि अपने आप में शिखर है। जिस रात अष्टमी की मध्य-रात्रि व्यापिनी पड़े, उस रात को खाली मत जाने दीजिए — बगलामुखी और ललितांबा की पंचांग विद्याओं की फलश्रुति में उस साधक का विशेष उल्लेख है जो शारदीय नवरात्र की महा अष्टमी की मध्य रात्रि में पाठ करता है।

संधि काल की बलि — सरलतम विधि

नारियल, नींबू, केला — और खीरा, लौकी व कुष्मांडा को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। मंत्रोक्त विधान अलग है और गहरा है; यहां जानबूझ कर सबसे सरल रूप दिया गया है, उस साधक के लिए जिसे कुछ नहीं आता।

केले का पत्ता बिछाइए, उस पर फल रखिए, फल को ढक दीजिए — केला हो तो लाल कपड़े से — और इतना तीव्र प्रहार कीजिए कि एक ही बार में दो टुकड़े हो जाएं। फिर रोली लगा कर जल देते हुए उसे घेर दीजिए। आपके घर की शक्ति इसे अवश्य स्वीकार करेंगी; बलि भगवती को बहुत प्रिय है और उससे वे बहुत प्रसन्न होती हैं।

यदि और कुछ न हो सके: एक नारियल और तीन नींबू, और कपूर-लौंग जला दीजिए। इसके लिए चांदी का पात्र अति उत्तम है, मिट्टी, तांबे या पीतल का भी चलेगा।

पहले हवन, फिर कन्या पूजन — कभी उलटा नहीं

क्रम

क्रम का नियम सरल है और सबसे अधिक उलटा किया जाता है। हवन पहले होगा; कन्या पूजन उसके बाद।

किस दिन, यह इस पर निर्भर है कि पाठ कहां पूर्ण हुआ। यदि सप्तमी को सप्तशती पाठ पूर्ण हो गया और अष्टमी को कन्या पूजन करना है, तो अष्टमी को सर्वप्रथम हवन कीजिए, उसके बाद कन्या पूजन। यदि पाठ अष्टमी को पूर्ण हो रहा है, तो दोनों नवमी को — प्रातः हवन, उसके बाद कन्या पूजन।

हवन: सामग्री, और कुंड किस धातु का

गुग्गल और घी — पौष्टिक हवन के लिए सर्वश्रेष्ठ संयोग, सदैव। उसमें पंचमेवा और मधु मिला दें तो और उत्तम। पूरा सेट: पंचमेवा, मधु, काला तिल, गुग्गल और घी।

एक भेद स्पष्ट कहा गया है: पुरुष घी की मात्रा अधिक रखेंगे, स्त्रियां गुग्गल की मात्रा अधिक रखेंगी। जिस मंत्र का जप किया है उसी से 108 आहुति दीजिए।

कुंड तांबे का लीजिए। लोहा-स्टील का मत लीजिए। खैर की लकड़ी चल जाएगी — वह नवग्रह लकड़ियों में से एक है।

जहां नवदुर्गा अनुष्ठान किया है, वहां नवमी प्रातः का रूप यह दिया गया है: नौ दुर्गाओं में से प्रत्येक के अपने मंत्र से कम से कम 27-27 आहुति।

लोकप्रचलित — ग्रंथ में ऐसा नहीं कहा गया श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 17

दशांश का नियम — जितना जप उसका दशांश हवन, उसका दशांश तर्पण, उसका दशांश मार्जन — वही नवरात्र अनुष्ठान को पूर्ण करता है।

सर्वत्र माना जाता है, और यहाँ कहा नहीं गया है। सीड किए गए पाठ का जो एक अध्याय मंत्र-अनुष्ठान को आरंभ से अंत तक रखता है, वह इसके बदले नियत आहुति-संख्याएँ देता है (17.46–47)। दशांश का अनुपात उस तंत्र व पद्धति साहित्य का है जिससे इस पृष्ठ के स्रोत चलते हैं, इस पुराण का नहीं।

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1

प्रणवस्य च माहात्म्यं षड्लिङ्गस्य महामुने । शिवभक्तस्य पूजां च क्रमशो ब्रूहि नः प्रभो ॥

हे महामुने! षड्लिंगस्वरूप प्रणव का माहात्म्य, तथा शिवभक्त की पूजा — हे प्रभो, हमें क्रमशः बताइए।

2

तपोधनैर्भवद्भिश्च सम्यक् प्रश्नस्त्वयं कृतः । अस्योत्तरं महादेवो जानाति स्म न चापरः ॥

तपोधनी आप लोगों द्वारा यह प्रश्न भलीभाँति किया गया है; इसका उत्तर महादेव ही जानते हैं, दूसरा कोई नहीं।

3

तथापि वक्ष्ये तमहं शिवस्य कृपयैव हि । शिवोऽस्माकं च युष्माकं च रक्षां गृह्णातु भूरिशः ॥

तथापि मैं शिव की कृपा से ही उसे कहूँगा; शिव हम सबकी और आप सबकी बार-बार रक्षा करें।

4

प्रो हि प्रकृतिजातस्य संसारस्य महोदधेः । नवं नावांतरमिति प्रणवं वै विदुर्बुधाः ॥

"प्र" प्रकृति से उत्पन्न संसाररूपी महासागर है; "नव" उसे पार करने की नयी नाव है — इसी अर्थ में विद्वान् प्रणव को जानते हैं।

5

प्रः प्रपञ्चो न नास्ति वो युष्माकं प्रणवं विदुः । प्रकर्षेण नयेद्यस्मान्मोक्षं वः प्रणवं विदुः ॥

"प्र" प्रपंच है, "न" नहीं है, "वः" तुम्हारे लिए — इस भाव से भी प्रणव जाना जाता है; और चूँकि यह तुम्हें बलपूर्वक मोक्ष तक ले जाता है, इसलिए भी इसे प्रणव जानते हैं।

6

स्वमन्त्रजापकानां च पूजकानां च योगिनाम् । सर्वकर्मक्षयं कृत्वा दिव्यज्ञानं तु नूतनम् ॥

अपने मन्त्र का जप करने वालों, पूजकों और योगियों के समस्त कर्मों का क्षय करके यह सदा नूतन दिव्य ज्ञान देता है।

7

तमेव मायारहितं नूतनं परिचक्षते । प्रकर्षेण महात्मानं नवं शुद्धस्वरूपकम् ॥

उस मायारहित को ही "नूतन" कहते हैं; प्रकृष्टरूप से शुद्धस्वरूप महात्मा को "नव" कहा जाता है।

नूतनं वै करोतीति प्रणवं तं विदुर्बुधाः ।

"यह नूतन करता है" — इसलिए विद्वान् इसे प्रणव जानते हैं।

8

प्रणवं द्विविधं प्रोक्तं सूक्ष्मस्थूलविभेदतः ॥

प्रणव को सूक्ष्म और स्थूल के भेद से दो प्रकार का कहा गया है।

9

सूक्ष्ममेकाक्षरं विद्यात्स्थूलं पञ्चाक्षरं विदुः । सूक्ष्ममव्यक्तपञ्चार्णं सुव्यक्तार्णं तथेतरत् ॥

सूक्ष्म को एकाक्षर जानना चाहिए, स्थूल को पंचाक्षर जानना चाहिए। सूक्ष्म में पाँचों अक्षर अव्यक्त हैं, और दूसरे (स्थूल) में वे सुव्यक्त हैं।

10

जीवन्मुक्तस्य सूक्ष्मं हि सर्वसारं हितस्य हि । मन्त्रेणार्थानुसन्धानं स्वदेहविलयावधि ॥

जीवन्मुक्त के लिए सूक्ष्म ही सब का सार तथा हितकारी है; मन्त्र के साथ उसके अर्थ का अनुसन्धान अपने शरीर के विलय तक चलता रहता है।

10½

स्वदेहे गलिते पूर्णं शिवं प्राप्नोति निश्चयः ।

अपने शरीर के गल जाने पर वह निश्चय ही पूर्ण शिव को प्राप्त होता है।

11

केवलं मन्त्रजापी तु योगं प्राप्नोति निश्चयः ॥

और केवल मन्त्र का जप करने वाला भी निश्चय ही योग को प्राप्त होता है।

12

षट्त्रिंशत्कोटिजापी तु निश्चयं योगमाप्नुयात् । सूक्ष्मं च द्विविधं ज्ञेयं ह्रस्वदीर्घविभेदतः ॥

छत्तीस करोड़ जप करने वाला निश्चय ही योग को प्राप्त होता है। और सूक्ष्म को भी ह्रस्व और दीर्घ के भेद से दो प्रकार जानना चाहिए।

13

अकारश्च उकारश्च मकारश्च ततः परम् । बिन्दुनादयुतं तद्धि शब्दकालकलान्वितम् ॥

अ, उ और म, और उससे परे बिन्दु-नाद से युक्त — यही शब्द, काल और कला से युक्त है।

14

दीर्घप्रणवमेवं हि योगिनामेव हृद्गतम् । मकारं तन्त्रितत्त्वं हि ह्रस्वप्रणव उच्यते ॥

यही दीर्घ प्रणव है, जो योगियों के हृदय में ही स्थित है। तीन तत्त्वों से युक्त मकार ही ह्रस्व प्रणव कहलाता है।

15

शिवः शक्तिस्तयोरैक्यं मकारं तु त्रिकात्मकम् । ह्रस्वमेवं हि जाप्यं स्यात्सर्वपापक्षयैषिणाम् ॥

शिव, शक्ति और उन दोनों की एकता — मकार इन तीनों के स्वरूप वाला है। यही ह्रस्व प्रणव सब पापों के क्षय के इच्छुकों के लिए जप्य है।

16

भूवायुकनकार्णोद्यौः शब्दाद्याश्च तथा दश । आशान्वये दश पुनः प्रवृत्ता इति कथ्यते ॥

भूमि, वायु, स्वर्ण (तेज), जल, आकाश तथा शब्दादि — ये मिलकर दस होते हैं; और आशा से युक्त होने पर पुनः वे दस ही "प्रवृत्त" कहलाते हैं।

17

ह्रस्वमेव प्रवृत्तानां निवृत्तानां तु दीर्घकम् । व्याहृत्यादौ च मन्त्रादौ कामं शब्दकलायुतम् ॥

प्रवृत्तों के लिए ह्रस्व ही और निवृत्तों के लिए दीर्घ ही उपयुक्त है। व्याहृतियों के आदि में और मन्त्रों के आदि में इच्छानुसार शब्द और कला से युक्त प्रणव का प्रयोग करे।

17½

वेदादौ च प्रयोज्यं स्याद्वन्दने सन्ध्ययोरपि ।

वेद के आरम्भ में और दोनों संध्याओं की वन्दना में भी इसका प्रयोग करना चाहिए।

18

नवकोटिजपाज्जप्त्वा संशुद्धः पुरुषो भवेत् ॥

नौ करोड़ जप करने से पुरुष सम्पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाता है।

19

पुनश्च नवकोट्या तु पृथिवीजयमाप्नुयात् । पुनश्च नवकोट्या तु ह्यपां जयमवाप्नुयात् ॥

और पुनः नौ करोड़ जप से वह पृथ्वी-तत्त्व पर विजय पाता है; और पुनः नौ करोड़ जप से जल-तत्त्व पर विजय पाता है।

20

पुनश्च नवकोट्या तु तेजसां जयमाप्नुयात् । पुनश्च नवकोट्या तु वायोर्जयमवाप्नुयात् । आकाशजयमाप्नोति नवकोटिजपेन वै ॥

और पुनः नौ करोड़ जप से वह तेज-तत्त्व पर विजय पाता है; और पुनः नौ करोड़ जप से वायु-तत्त्व पर विजय पाता है; और नौ करोड़ जप से आकाश-तत्त्व पर विजय पाता है।

21

गन्धादीनां क्रमेणैव नवकोटिजपेन वै । अहङ्कारस्य च पुनर्नवकोटिजपेन वै ॥

गन्ध आदि पर भी क्रमशः नौ-नौ करोड़ जप से विजय पाता है; और पुनः नौ करोड़ जप से अहंकार पर भी विजय पाता है।

22

सहस्रमन्त्रजप्तेन नित्यशुद्धो भवेत्पुमान् । ततः परं स्वसिद्ध्यर्थं जपो भवति हि द्विजाः ॥

सहस्र मन्त्र-जप से मनुष्य नित्य शुद्ध हो जाता है; हे द्विजो, उससे आगे का जप अपनी सिद्धि के लिए होता है।

23

एवमष्टोत्तरशतकोटिजपेन वै पुनः । प्रणवेन प्रबुद्धस्तु शुद्धयोगमवाप्नुयात् ॥

इस प्रकार पुनः एक सौ आठ करोड़ जप करने से प्रणव द्वारा प्रबुद्ध हुआ पुरुष शुद्ध योग को प्राप्त करता है।

24

शुद्धयोगेन संयुक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः । सदा जपन्सदा ध्यायच्छिवं प्रणवरूपिणम् ॥

शुद्ध योग से युक्त होकर वह जीवन्मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं — सदा प्रणवरूप शिव का जप और ध्यान करते हुए।

25

समाधिस्थो महायोगी शिव एव न संशयः । ऋषिच्छन्दो देवतादि न्यस्य देहे पुनर्जपेत् ॥

समाधिस्थ महायोगी साक्षात् शिव ही है, इसमें सन्देह नहीं। ऋषि, छन्द, देवता आदि का शरीर में न्यास करके फिर जप करे।

26

प्रणवं मातृकायुक्तं देहे न्यस्य ऋषिर्भवेत् । दशमातृषडध्वादि सर्वं न्यासफलं लभेत् ॥

मातृका से युक्त प्रणव का शरीर में न्यास करके मनुष्य ऋषि हो जाता है; दश मातृका, षडध्व आदि सम्पूर्ण न्यास का फल प्राप्त करता है।

26½

प्रवृत्तानां च मिश्राणां स्थूलप्रणवमिष्यते ।

प्रवृत्त तथा मिश्रित भाव वाले पुरुषों के लिए स्थूल प्रणव ही अभीष्ट है।

27

क्रियातपोजपैर्युक्तास्त्रिविधाः शिवयोगिनः ॥

क्रिया, तप और जप से युक्त होकर शिवयोगी तीन प्रकार के होते हैं।

28

धनादिविभवैश्चैव कराद्यङ्गैर्नमादिभिः । क्रियया पूजया युक्तः क्रियायोगीति कथ्यते ॥

धन आदि वैभव से, हाथ आदि अंगों से, नमस्कारादि से क्रियापूर्वक पूजा से युक्त पुरुष क्रियायोगी कहलाता है।

29

पूजायुक्तश्च मितभुग्बाह्येन्द्रियजयान्वितः । परद्रोहादिरहितस्तपोयोगीति कथ्यते ॥

पूजा से युक्त, मिताहारी, बाह्य इन्द्रियों को जीतने वाला, परद्रोहादि से रहित पुरुष तपोयोगी कहलाता है।

30

एतैर्युक्तः सदा शुद्धः सर्वकामादिवर्जितः । सदा जपपरः शान्तो जपयोगीति तं विदुः ॥

इन गुणों से युक्त, सदा शुद्ध, सब कामादि से रहित, सदा जपपरायण, शान्त पुरुष को जपयोगी जानना चाहिए।

31

उपचारैः षोडशभिः पूजया शिवयोगिनाम् । सालोक्यादिक्रमेणैव शुद्धो मुक्तिं लभेन्नरः ॥

शिवयोगियों की षोडशोपचार पूजा से शुद्ध हुआ मनुष्य सालोक्यादि क्रम से ही मुक्ति प्राप्त करता है।

32

जपयोगमथो वक्ष्ये गदतः शृणुत द्विजाः । तपःकर्तुर्जपः प्रोक्तो यज्जपन्परिमार्जते ॥

अब मैं जपयोग कहूँगा; हे द्विजो, मुझे बोलते हुए सुनिए। तपस्वी के लिए जप कहा गया है, क्योंकि जप करते-करते वह स्वयं को शुद्ध करता है।

33

शिवनाम नमःपूर्वं चतुर्थ्या पञ्चतत्त्वकम् । स्थूलप्रणवरूपं हि शिवपञ्चाक्षरं द्विजाः ॥

"नमः"-पूर्वक चतुर्थी विभक्ति में शिव का नाम, पंचतत्त्वात्मक — हे द्विजो, यही स्थूल प्रणवरूप शिव-पंचाक्षर है।

34

पञ्चाक्षरजपेनैव सर्वसिद्धिं लभेन्नरः । प्रणवेनादिसंयुक्तं सदा पञ्चाक्षरं जपेत् ॥

पंचाक्षर के जप से ही मनुष्य सर्वसिद्धि प्राप्त करता है; प्रणव से आदि में संयुक्त पंचाक्षर का सदा जप करे।

35

गुरूपदेशं सङ्गम्य सुखवासे सुभूतले । पूर्वपक्षे समारभ्य कृष्णाभूतावधि द्विजाः ॥

गुरु का उपदेश पाकर, सुखद निवास वाली सुन्दर भूमि पर, शुक्लपक्ष के प्रारम्भ से लेकर हे द्विजो, कृष्णपक्ष आने तक —

35½

माघं भाद्रं विशिष्टं तु सर्वकालोत्तमोत्तमम् ।

माघ और भाद्रपद विशिष्ट हैं, ये सब कालों में उत्तमोत्तम हैं।

36

एकवारं मिताशी तु वाग्यतो नियतेन्द्रियः ॥

एक बार परिमित भोजन करते हुए, मौन रहकर, इन्द्रियों को वश में रखकर —

37

स्वस्य राजपितृणां च नित्यं शुश्रूषणं चरेत् । सहस्रजपमात्रेण भवेच्छुद्धोऽन्यथा ऋणी ॥

अपने स्वामी और माता-पिता की नित्य सेवा करे; केवल सहस्र जप से ही शुद्ध हो जाता है, अन्यथा ऋणी रहता है।

38

पञ्चाक्षरं पञ्चलक्षं जपेच्छिवमनुस्मरन् । पद्मासनस्थं शिवदं गङ्गाचन्द्रकलान्वितम् ॥

पद्मासन में स्थित, शिवद, गंगा और चन्द्रकला से युक्त शिव का स्मरण करते हुए पंचाक्षर मन्त्र का पाँच लाख जप करे,

39

वामोरुस्थितशक्त्या च विराजन्तं महागणैः । मृगटङ्कधरं देवं वरदाभयपाणिकम् ॥

बाईं जाँघ पर स्थित शक्ति के साथ महागणों द्वारा विराजमान, मृगमुद्रा और टंक धारण किए हुए, वरद-अभय मुद्रा वाले देव को स्मरण करते हुए,

40

सदानुग्रहकर्तारं सदाशिवमनुस्मरन् । सम्पूज्य मनसा पूर्वं हृदि वा सूर्यमण्डले ॥

सदा अनुग्रह करने वाले सदाशिव का स्मरण करते हुए; पहले मन से हृदय में अथवा सूर्यमण्डल में उनकी पूजा करके,

41

जपेत्पञ्चाक्षरीं विद्यां प्राङ्मुखः शुद्धकर्मकृत् । प्रातः कृष्णचतुर्दश्यां नित्यकर्म समाप्य च ॥

पूर्वाभिमुख होकर, शुद्ध कर्म करते हुए पंचाक्षरी विद्या का जप करे। कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को प्रातःकाल नित्यकर्म समाप्त करके,

42

मनोरमे शुचौ देशे नियतः शुद्धमानसः । पञ्चाक्षरस्य मन्त्रस्य सहस्रं द्वादशं जपेत् ॥

मनोरम पवित्र स्थान में नियमबद्ध और शुद्ध मन से पंचाक्षर मन्त्र का बारह हजार जप करे।

43

वरयेच्च सपत्नीकान् शैवान्वै ब्राह्मणोत्तमान् । एकं गुरुवरं शिष्टं वरयेत्साम्बमूर्तिकम् ॥

सपत्नीक श्रेष्ठ शैव ब्राह्मणों का वरण करे; तथा एक श्रेष्ठ शिष्ट गुरुवर का वरण साम्बमूर्ति समझकर करे।

44

ईशानं चाथ पुरुषमघोरं वाममेव च । सद्योजातं च पञ्चैव शिवभक्तान्द्विजोत्तमान् ॥

ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात — इन पाँचों के प्रतीकस्वरूप पाँच श्रेष्ठ शिवभक्त द्विजों को आमन्त्रित करे।

45

पूजाद्रव्याणि सम्पाद्य शिवपूजां समारभेत् । शिवपूजां च विधिवत्कृत्वा होमं समारभेत् ॥

पूजा-सामग्री एकत्र करके शिवपूजा आरम्भ करे; और विधिपूर्वक शिवपूजा करके होम आरम्भ करे।

46

मुखान्तं च स्वसूत्रेण कृत्वा होमं समाचरेत् । दशैकं वा शतैकं वा सहस्रैकमथापि वा ॥

अपने गृह्यसूत्र के अनुसार मुखान्त कर्म करके होम करे — ग्यारह, अथवा एक सौ एक, अथवा एक सहस्र एक आहुतियाँ,

47

कापिलेन घृतेनैव जुहुयात्स्वयमेव हि । कारयेच्छिवभक्तैर्वाप्यष्टोत्तरशतं बुधः ॥

कपिला गाय के घी से स्वयं ही आहुति दे; अथवा विद्वान् शिवभक्तों से एक सौ आठ आहुतियाँ दिलाए।

48

होमान्ते दक्षिणा देया गुरोर्गोमिथुनं तथा । ईशानादिस्वरूपांस्तानुगुरुं साम्बं विभाव्य च ॥

होम के अन्त में गुरु को दक्षिणा तथा गो-मिथुन देना चाहिए; और उन ब्राह्मणों को ईशानादि स्वरूप, तथा गुरु को साम्ब समझकर,

49

तेषां पत्सिक्ततोयेन स्वशिरः स्नानमाचरेत् । षट्त्रिंशत्कोटितीर्थेषु सद्यः स्नानफलं लभेत् ॥

उन सबके चरण धोने से युक्त जल से अपने सिर का स्नान करे; इससे छत्तीस करोड़ तीर्थों में स्नान का फल तत्काल प्राप्त होता है।

50

दशाङ्गमन्नं तेषां वै दद्याद्धै भक्तिपूर्वकम् । पराबुद्ध्या गुरोः पत्नीमीशानादिक्रमेण तु ॥

उन्हें भक्तिपूर्वक दशांग अन्न दे; परा शक्ति की बुद्धि से गुरु-पत्नी का, तथा ईशानादि क्रम से,

51

परमान्नेन सम्पूज्य यथाविभवविस्तरम् । रुद्राक्षवस्त्रपूर्वं च वटकापूपकैर्युतम् ॥

उत्तम अन्न से, अपने वैभव-विस्तार के अनुसार पूजा करके, रुद्राक्ष-वस्त्र आदि तथा बड़ा-पूआ आदि से युक्त होकर,

52

बलिदानं ततः कृत्वा भूरि भोजनमाचरेत् । ततः सम्प्रार्थ्य देवेशं जपं तावत्समापयेत् ॥

फिर बलिदान करके भरपूर भोजन कराए; फिर देवेश से प्रार्थना करके जप को वहीं समाप्त करे।

53

पुरश्चरणमेवं तु कृत्वा मन्त्री भवेन्नरः । पुनश्च पञ्चलक्षेण सर्वपापक्षयो भवेत् ॥

इस प्रकार पुरश्चरण करके मनुष्य मन्त्री (मन्त्रसिद्ध) हो जाता है; और पुनः पाँच लाख जप से सब पापों का क्षय हो जाता है।

54

अतलादि समारभ्य सत्यलोकावधि क्रमात् । पञ्चलक्षजपात्तत्तल्लोकैश्वर्यमवाप्नुयात् ॥

अतल आदि से आरम्भ करके सत्यलोकपर्यन्त क्रमशः पाँच-पाँच लाख जप से उन-उन लोकों का ऐश्वर्य प्राप्त होता है।

55

मध्ये मृतश्चेद्रोगान्ते भूमौ तज्जापको भवेत् । पुनश्च पञ्चलक्षेण ब्रह्मसामीप्यमाप्नुयात् ॥

यदि बीच में ही किसी रोग के कारण मृत्यु हो जाए, तो वह पुनः पृथ्वी पर उसी मन्त्र का जापक होता है; और पुनः पाँच लाख जप से ब्रह्मा का सामीप्य प्राप्त करता है।

56

पुनश्च पञ्चलक्षेण सारूप्यैश्वर्यमाप्नुयात् । आहत्य शतलक्षेण साक्षाद् ब्रह्मसमो भवेत् ॥

और पुनः पाँच लाख जप से सारूप्य ऐश्वर्य प्राप्त करता है; कुल मिलाकर एक करोड़ जप से वह साक्षात् ब्रह्मा के समान हो जाता है।

57

कार्यब्रह्मण एवं हि सायुज्यं प्रतिपद्य वै । यथेष्टं भोगमाप्नोति तद् ब्रह्म प्रलयावधि ॥

इस प्रकार कार्य-ब्रह्मा का सायुज्य प्राप्त करके वह उस ब्रह्मलोक में प्रलय तक यथेच्छ भोग प्राप्त करता है।

58

पुनः कल्पान्तरे वृत्ते ब्रह्मपुत्रः स जायते । पुनश्च तपसा दीप्तः क्रमान्मुक्तो भविष्यति ॥

फिर दूसरे कल्प के आरम्भ होने पर वह ब्रह्मा का पुत्र होता है; और पुनः तपस्या से देदीप्यमान होकर क्रमशः मुक्त हो जाता है।

59

पृथ्व्यादिकार्यभूतेभ्यो लोका वै निर्मिताः क्रमात् । पातालादि च सत्यान्तं ब्रह्मलोकाश्चतुर्दश ॥

पृथ्वी आदि कार्यभूतों से क्रमशः लोकों का निर्माण हुआ है; पाताल से सत्यलोकपर्यन्त ब्रह्मा के चौदह लोक हैं।

60

सत्यादूर्ध्वं क्षमान्तं वै विष्णुलोकाश्चतुर्दश । क्षमालोके कार्यविष्णुर्वैकुण्ठे वरपत्तने ॥

सत्यलोक से ऊपर क्षमालोकपर्यन्त विष्णु के चौदह लोक हैं; क्षमालोक में स्थित वैकुण्ठ नामक श्रेष्ठ नगर में कार्य-विष्णु निवास करते हैं।

61

कार्यलक्ष्म्या महाभोगी रक्षां कृत्वाधितिष्ठति । तदूर्ध्वगाश्च शुच्यन्ता लोकाष्टाविंशतिः स्थिताः ॥

कार्य-लक्ष्मी सहित महाभोगी विष्णु रक्षा करते हुए वहाँ अधिष्ठित हैं। उसके ऊपर शुचिलोकपर्यन्त अट्ठाईस लोक स्थित हैं।

62

शुचौ लोके तु कैलासे रुद्रो वै भूतहृत्स्थितः । षडुत्तराश्च पञ्चाशदहिंसान्तास्तदूर्ध्वगाः ॥

शुचिलोक में स्थित कैलास पर प्राणियों का संहार करने वाले रुद्रदेव विराजमान हैं। उसके ऊपर अहिंसालोकपर्यन्त छप्पन लोक स्थित हैं।

63

अहिंसालोकमास्थाय ज्ञानकैलासके पुरे । कार्येश्वरस्तिरोभावं सर्वान्कृत्वाधितिष्ठति ॥

अहिंसालोक का आश्रय लेकर ज्ञानकैलास नामक नगर में कार्य-ईश्वर सबको तिरोभूत करके अधिष्ठित हैं।

64

तदन्ते कालचक्रं हि कालातीतस्ततः परम् । शिवेनाधिष्ठितस्तत्र कालचक्रेश्वराह्वयः ॥

उसके अन्त में कालचक्र है, और उससे परे कालातीत है। वहाँ शिव द्वारा अधिष्ठित कालचक्रेश्वर नामक शिव विराजमान हैं।

64½

माहिषं धर्ममास्थाय सर्वान्कालेन युञ्जति ।

महिषरूप धर्म का आश्रय लेकर वे सबको काल से संयुक्त करते हैं।

65

असत्याश्चाशुचिश्चैव हिंसा चैवाथ निर्घृणा ॥

असत्य, अशुचि, हिंसा और निर्दयता —

66

असत्यादिचतुष्पादः सर्वांशः कामरूपधृक् । नास्तिक्यलक्ष्मीर्दुःसङ्गो वेदबाह्यध्वनिः सदा ॥

असत्य आदि ये चार पाद उनके सर्वांश हैं, जो कामरूपधारी हैं। नास्तिकतायुक्त लक्ष्मी, दुःसंग, सदा वेदबाह्य शब्द,

67

क्रोधसङ्गः कृष्णवर्णो महामहिषवेषवान् । तावान्महेश्वरः प्रोक्तस्तिरोधास्तावदेव हि ॥

क्रोध का संग, कृष्ण वर्ण, महामहिष का वेष — यहाँ तक ही महेश्वर के विराट् स्वरूप का वर्णन किया गया है, और यहाँ तक ही तिरोभाव है।

68

तदर्वाक्कर्मभोगो हि तदूर्ध्वं ज्ञानभोगकम् । तदर्वाक्कर्ममाया हि ज्ञानमाया तदूर्ध्वकम् ॥

उससे नीचे कर्मभोग है, और उससे ऊपर ज्ञानभोग है। उससे नीचे कर्ममाया है, और उससे ऊपर ज्ञानमाया है।

69

मा लक्ष्मीः कर्मभोगो वै याति मायेति कथ्यते । मा लक्ष्मीर्ज्ञानभोगो वै याति मायेति कथ्यते ॥

"मा" का अर्थ लक्ष्मी है; उससे कर्मभोग प्राप्त होता है, इसे माया कहते हैं। इसी तरह "मा" लक्ष्मी से ज्ञानभोग भी प्राप्त होता है, इसे भी माया कहते हैं।

70

तदूर्ध्वं नित्यभोगो हि तदर्वाङ् नश्वरं विदुः । तदर्वाक्च तिरोधानं तदूर्ध्वं न तिरोधनम् ॥

उससे ऊपर नित्य भोग है, और उससे नीचे नश्वर भोग जानना चाहिए। उससे नीचे ही तिरोधान है, और उससे ऊपर तिरोधान नहीं है।

71

तदर्वाक् पाशबन्धो हि तदूर्ध्वं नहि बन्धनम् । तदर्वाक् परिवर्तन्ते काम्यकर्मानुसारिणः ॥

उससे नीचे ही पाशबन्ध है, और उससे ऊपर बन्धन नहीं है। उससे नीचे ही काम्यकर्म का अनुसरण करने वाले जीव चक्कर काटते हैं।

71½

निष्कामकर्मभोगस्तु तदूर्ध्वं परिकीर्तितः ।

निष्काम कर्म का भोग उससे ऊपर ही होता है, ऐसा कहा गया है।

72

तदर्वाक् परिवर्तन्ते बिन्दुपूजापरायणाः ॥

उससे नीचे ही बिन्दुपूजा में तत्पर रहने वाले घूमते हैं।

73

तदूर्ध्वं हि व्रजन्त्येव निष्कामा लिङ्गपूजकाः । तदर्वाक् परिवर्तन्ते शिवान्यसुरपूजकाः ॥

उससे ऊपर ही निष्काम भाव से लिंगपूजा करने वाले जाते हैं। उससे नीचे शिव के अतिरिक्त अन्य देवताओं के पूजक घूमते रहते हैं।

74

शिवैकनिरता ये च तदूर्ध्वं सम्प्रयान्ति ते । तदर्वाग्जीवकोटिः स्यात्तदूर्ध्वं परकोटिकाः ॥

और जो शिव में ही एकनिष्ठ हैं, वे उससे ऊपर जाते हैं। उससे नीचे जीवकोटि है, और उससे ऊपर ईश्वरकोटि है।

75

सांसारिकास्तदर्वाक् च मुक्ताः खलु तदूर्ध्वगाः । तदर्वाक् परिवर्तन्ते प्राकृतद्रव्यपूजकाः ॥

संसारी जीव उससे नीचे हैं, और मुक्त जीव उससे ऊपर हैं। उससे नीचे प्राकृत द्रव्यों से पूजा करने वाले घूमते हैं।

76

तदूर्ध्वं हि व्रजन्त्येते पौरुषद्रव्यपूजकाः । तदर्वाक्छक्तिलिङ्गं तु शिवलिङ्गं तदूर्ध्वकम् ॥

उससे ऊपर पौरुष द्रव्यों से पूजा करने वाले जाते हैं। उससे नीचे शक्तिलिंग है, और उससे ऊपर शिवलिंग है।

77

तदर्वागावृतं लिङ्गं तदूर्ध्वं हि निराकृति । तदर्वाक्कल्पितं लिङ्गं तदूर्ध्वं वै न कल्पितम् ॥

उससे नीचे लिंग आवृत है, और उससे ऊपर निराकार है। उससे नीचे लिंग कल्पित है, और उससे ऊपर वह कल्पित नहीं है।

78

तदर्वाग्बाह्यलिङ्गं स्यादन्तरङ्गं तदूर्ध्वकम् । तदर्वाक्छक्तिलोका हि शतं वै द्वादशाधिकम् ॥

उससे नीचे लिंग बाह्य है, और उससे ऊपर आन्तरिक है। उससे नीचे शक्ति के एक सौ बारह लोक हैं।

79

तदर्वाग्बिन्दुरूपं हि नादरूपं तदुत्तरम् । तदर्वाक्कर्मलोकस्तु तदूर्ध्वं ज्ञानलोककः ॥

उससे नीचे बिन्दुरूप है, और उससे ऊपर नादरूप है। उससे नीचे कर्मलोक है, और उससे ऊपर ज्ञानलोक है।

80

नमस्कारस्तदूर्ध्वं हि मदाहङ्कारनाशनः । जनं तस्मात् तिरोधानं प्रत्यायाति न ना यतः ॥

उससे ऊपर मद-अहंकार का नाश करने वाला नमस्कार है; इसलिए वहाँ से किसी को तिरोधान प्राप्त नहीं होता, क्योंकि वह उसकी सीमा से परे है।

81

ज्ञानशब्दार्थ एवं हि तिरोधाननिवारणात् । तदर्वाक् परिवर्तन्ते ह्याधिभौतिकपूजकाः ॥

इस प्रकार तिरोधान के निवारण से ही "ज्ञान" शब्द का अर्थ सिद्ध होता है। उससे नीचे आधिभौतिक उपासक घूमते रहते हैं।

82

आध्यात्मिकार्चका एव तदूर्ध्वं सम्प्रयान्ति वै । तावद्धै वेदिभागं तन्महालोकात्मलिङ्गके ॥

आध्यात्मिक उपासक ही उससे ऊपर जाते हैं। उस महालोकरूपी आत्मलिंग में वेदिभाग वहाँ तक ही है।

83

प्रकृत्याद्यष्टबन्धोऽपि वेद्यते सम्प्रतिष्ठितः । एवमेतादृशं ज्ञेयं सर्वं लौकिकवैदिकम् ॥

प्रकृति आदि आठ बन्धन भी वहाँ प्रतिष्ठित रूप में जाने जाते हैं। इस प्रकार सब कुछ लौकिक और वैदिक स्वरूप जानना चाहिए।

84

अधर्ममहिषारूढं कालचक्रं तरन्ति ते । सत्यादिधर्मयुक्ता ये शिवपूजापराश्च ये ॥

जो सत्य आदि धर्मों से युक्त और शिवपूजा में तत्पर हैं, वे अधर्मरूपी भैंसे पर आरूढ़ कालचक्र को पार कर जाते हैं।

85

तदूर्ध्वं वृषभो धर्मो ब्रह्मचर्यस्वरूपधृक् । सत्यादिपादयुक्तस्तु शिवलोकाग्रतः स्थितः ॥

उससे ऊपर वृषभरूप धर्म है, जो ब्रह्मचर्य का स्वरूप धारण किए हुए है। सत्यादि चरणों से युक्त वह शिवलोक के आगे स्थित है।

86

क्षमाशृङ्गः शमश्रोत्रो वेदध्वनिविभूषितः । आस्तिक्यचक्षुर्निःश्वासगुरुबुद्धिमना वृषः ॥

क्षमारूपी सींग, शमरूपी कान, वेदध्वनि से विभूषित, आस्तिकतारूपी नेत्र, तथा निःश्वास एवं गुरुबुद्धिमय मन वाला यह वृषभ है।

87

क्रियादिवृषभा ज्ञेयाः कारणादिषु सर्वदा । तं क्रियावृषभं धर्मं कालातीतोऽधितिष्ठति ॥

क्रिया आदि वृषभ कारण आदि में सर्वदा स्थित जानने चाहिए; उस क्रियारूप वृषभ धर्म पर कालातीत शिव आरूढ़ होते हैं।

88

ब्रह्मविष्णुमहेशानां स्वस्वायुर्दिनमुच्यते । तदूर्ध्वं न दिनं रात्रिर्न जन्ममरणादिकम् ॥

ब्रह्मा, विष्णु और महेश की अपनी-अपनी आयु ही दिन कहलाती है; उससे ऊपर न दिन है, न रात्रि है, और न जन्म-मरण आदि है।

89

पुनः कारणसत्यान्ताः कारणब्रह्मणस्तथा । गन्धादिभ्यस्तु भूतेभ्यस्तदूर्ध्वं निर्मिताः सदा ॥

फिर कारण-ब्रह्मा के सत्यलोकपर्यन्त लोक भी, उससे ऊपर, गन्ध आदि सूक्ष्म भूतों से सदा निर्मित हैं,

89½

सूक्ष्मगन्धस्वरूपा हि स्थिता लोकाश्चतुर्दश ।

वे चौदह लोक सूक्ष्म गन्ध के स्वरूप वाले होकर वहाँ स्थित हैं।

90

पुनः कारणविष्णोर्वै स्थिता लोकाश्चतुर्दश ॥

और पुनः कारण-विष्णु के चौदह लोक भी वहाँ स्थित हैं।

91

पुनः कारणरुद्रस्य लोकाष्टाविंशका मताः । पुनश्च कारणेशस्य षट्पञ्चाशत्तदूर्ध्वगाः ॥

और पुनः कारण-रुद्र के अट्ठाईस लोक माने गए हैं; और पुनः उससे ऊपर कारण-ईश के छप्पन लोक हैं।

92

ततः परं ब्रह्मचर्यलोकाख्यं शिवसम्मतम् । तत्रैव ज्ञानकैलासे पञ्चावरणसंयुते ॥

उससे परे ब्रह्मचर्यलोक नामक शिवसम्मत लोक है; वहीं पाँच आवरणों से युक्त ज्ञानकैलास में,

93

पञ्चमण्डलसंयुक्तं पञ्चब्रह्मकलान्वितम् । आदिशक्तिसमायुक्तमादिलिङ्गं तु तत्र वै ॥

पाँच मण्डलों से युक्त, पाँच ब्रह्मकलाओं से युक्त, आदिशक्ति से संयुक्त आदिलिंग वहीं स्थित है।

94

शिवालयमिदं प्रोक्तं शिवस्य परमात्मनः । परशक्त्या समायुक्तस्तत्रैव परमेश्वरः ॥

इसे परमात्मा शिव का शिवालय कहा गया है; वहीं परमेश्वर परा शक्ति से समायुक्त होकर विराजमान हैं।

95

सृष्टिः स्थितिश्च संहारस्तिरोभावोऽप्यनुग्रहः । पञ्चकृत्यप्रवीणोऽसौ सच्चिदानन्दविग्रहः ॥

सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह — इन पाँचों कृत्यों में वे प्रवीण हैं, और सच्चिदानन्द विग्रह वाले हैं।

96

ध्यानधर्मः सदा यस्य सदानुग्रहतत्परः । समाध्यासनमासीनः स्वात्मारामो विराजते ॥

जिनका धर्म सदा ध्यानरूप है, जो सदा अनुग्रह करने में तत्पर हैं, समाधिरूपी आसन पर आसीन, स्वात्माराम वे शोभित होते हैं।

97

तस्य सन्दर्शनं साध्यं कर्मध्यानादिभिः क्रमात् । नित्यादिकर्मयजनाच्छिवकर्मे मतिर्भवेत् ॥

उनका दर्शन क्रमशः कर्म-ध्यानादि साधनों से साध्य है। नित्यादि कर्मों के अनुष्ठान से शिवकर्म में मन लगता है।

98

क्रियादिशिवकर्मभ्यः शिवज्ञानं प्रसाधयेत् । तद्दर्शनगताः सर्वे मुक्ता एव न संशयः ॥

क्रिया आदि शिवसम्बन्धी कर्मों से शिवज्ञान सिद्ध करे। उनके दर्शन को प्राप्त सभी लोग मुक्त ही हैं, इसमें सन्देह नहीं।

99

मुक्तिरात्मस्वरूपेण स्वात्मारामत्वमेव हि । क्रियातपोजपज्ञानध्यानधर्मेषु सुस्थितः ॥

मुक्ति आत्मस्वरूप से स्वात्मारामत्व ही है। क्रिया, तप, जप, ज्ञान और ध्यानरूपी धर्मों में सुस्थित रहते हुए,

100

शिवस्य दर्शनं लब्ध्वा स्वात्मारामत्वमेव हि । यथा रविः स्वकिरणादशुद्धिमपनेष्यति ॥

शिव का दर्शन पाकर स्वात्मारामत्व ही प्राप्त होता है। जैसे सूर्य अपनी किरणों से अशुद्धि को दूर करते हैं,

101

कृपाविचक्षणः शम्भुरज्ञानमपनेष्यति । अज्ञानविनिवृत्तौ तु शिवज्ञानं प्रवर्तते ॥

उसी प्रकार कृपा में कुशल शम्भु अज्ञान को दूर कर देते हैं; अज्ञान की निवृत्ति होने पर शिवज्ञान प्रकट होता है।

102

शिवज्ञानात्स्वस्वरूपमात्मारामत्वमेष्यति । आत्मारामत्वसंसिद्धौ कृतकृत्यो भवेन्नरः ॥

शिवज्ञान से अपने स्वरूपभूत आत्मारामत्व की प्राप्ति होती है; आत्मारामत्व की सिद्धि हो जाने पर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।

103

पुनश्च शतलक्षेण ब्रह्मणः पदमाप्नुयात् । पुनश्च शतलक्षेण विष्णोः पदमवाप्नुयात् ॥

और पुनः एक करोड़ जप से ब्रह्मा का पद प्राप्त होता है; और पुनः एक करोड़ जप से विष्णु का पद प्राप्त होता है।

104

पुनश्च शतलक्षेण रुद्रस्य पदमाप्नुयात् । पुनश्च शतलक्षेण ऐश्वर्यं पदमाप्नुयात् ॥

और पुनः एक करोड़ जप से रुद्र का पद प्राप्त होता है; और पुनः एक करोड़ जप से ऐश्वर्ययुक्त पद प्राप्त होता है।

105

पुनश्चैवंविधेनैव जपेन सुसमाहितः । शिवलोकादिभूतं हि कालचक्रमवाप्नुयात् ॥

और पुनः इसी प्रकार की जप-साधना से सुसमाहित होकर मनुष्य शिवलोक के आदिभूत कालचक्र को प्राप्त कर लेता है।

106

कालचक्रं पञ्चचक्रमेकैकेन क्रमोत्तरे । सृष्टिमोहौ ब्रह्मचक्रं भोगमोहौ तु वैष्णवम् ॥

कालचक्र पाँच चक्रों वाला है, जो एक के बाद एक क्रम से स्थित हैं। सृष्टि और मोह से युक्त ब्रह्मचक्र है, तथा भोग और मोह से युक्त वैष्णवचक्र है;

107

कोपमोहौ रौद्रचक्रं भ्रमणं चैश्वरं विदुः । शिवचक्रं ज्ञानमोहौ पञ्चचक्रं विदुर्बुधाः ॥

क्रोध और मोह से युक्त रौद्रचक्र है, तथा भ्रमण से युक्त ऐश्वरचक्र जानना चाहिए; ज्ञान और मोह से युक्त शिवचक्र है — इस प्रकार विद्वान् पंचचक्र को जानते हैं।

108

पुनश्च दशकोट्या हि कारणब्रह्मणः पदम् । पुनश्च दशकोट्या हि तत्पदैश्वर्यमाप्नुयात् ॥

और पुनः दस करोड़ जप से कारण-ब्रह्मा का पद प्राप्त होता है; और पुनः दस करोड़ जप से उस पद का ऐश्वर्य प्राप्त होता है।

109

एवं क्रमेण विष्णवादेः पदं लब्ध्वा महौजसः । क्रमेण तत्पदैश्वर्यं लब्ध्वा चैव महात्मनः ॥

इस प्रकार क्रमशः महान् तेजस्वी विष्णु आदि का पद प्राप्त करके, और क्रमशः उस महात्मा के पद का ऐश्वर्य भी प्राप्त करके,

110

शतकोटिमनुं जप्त्वा पञ्चोत्तरमतन्द्रितः । शिवलोकमवाप्नोति पञ्चमावरणाद् बहिः ॥

बिना आलस्य के एक सौ पाँच करोड़ मन्त्र-जप करके, मनुष्य पाँचवें आवरण से बाहर स्थित शिवलोक को प्राप्त करता है।

111

राजसं मण्डपं तत्र नन्दिसंस्थानमुत्तमम् । तपोरूपश्च वृषभस्तत्रैव परिदृश्यते ॥

वहाँ राजसमण्डप है, जो नन्दीश्वर का उत्तम निवासस्थान है; और वहीं तपस्यारूपी वृषभ भी दिखाई देता है।

112

सद्योजातस्य तत्स्थानं पञ्चमावरणं परम् । वामदेवस्य च स्थानं चतुर्थावरणं पुनः ॥

वह स्थान सद्योजात का है, जो पाँचवाँ श्रेष्ठ आवरण है; और वामदेव का स्थान पुनः चतुर्थ आवरण है।

113

अघोरनिलयं पश्चात् तृतीयावरणं परम् । पुरुषस्यैव साम्बस्य द्वितीयावरणं शुभम् ॥

उसके पश्चात् श्रेष्ठ तृतीय आवरण अघोर का निवासस्थान है; और शुभ द्वितीय आवरण साम्ब स्वरूप पुरुष (तत्पुरुष) का है।

114

ईशानस्य परस्यैव प्रथमावरणं ततः । ध्यानधर्मस्य च स्थानं पञ्चमं मण्डपं ततः ॥

फिर परम ईशान का प्रथम आवरण है; और उसके बाद पंचम मण्डप ध्यानधर्म का स्थान है।

115

बलिनाथस्य संस्थानं तत्र पूर्णामृतप्रदम् । चतुर्थं मण्डपं पश्चाच्चन्द्रशेखरमूर्तिमत् ॥

वहाँ बलिनाथ का निवासस्थान है, जो पूर्ण अमृत प्रदान करने वाला है; उसके पश्चात् चतुर्थ मण्डप चन्द्रशेखर की मूर्ति वाला है।

116

सोमस्कन्दस्य च स्थानं तृतीयं मण्डपं परम् । द्वितीयं मण्डपं नृत्यमण्डपं प्राहुरास्तिकाः ॥

और श्रेष्ठ तृतीय मण्डप सोमस्कन्द का स्थान है; द्वितीय मण्डप को आस्तिक जन नृत्यमण्डप कहते हैं।

117

प्रथमं मूलमायायाः स्थानं तत्रैव शोभनम् । तत परं गर्भगृहं लिङ्गस्थानं परं शुभम् ॥

प्रथम मण्डप वहीं मूलमाया का सुन्दर स्थान है; उसके परे गर्भगृह है, जो लिंग का परम शुभ स्थान है।

118

नन्दिसंस्थानतः पश्चान्न विदुः शिववैभवम् । नन्दीश्वरो बहिस्तिष्ठन्पञ्चाक्षरमुपासते ॥

नन्दी के स्थान से आगे शिव के वैभव को कोई नहीं जानता। नन्दीश्वर बाहर स्थित रहकर पंचाक्षर मन्त्र की उपासना करते हैं।

119

एवं गुरुक्रमाल्लब्धं नन्दीशाच्च मया पुनः । ततः परं स्वसंवेद्यं शिवेनैवानुभावितम् ॥

इस प्रकार गुरुपरम्परा से तथा नन्दीश्वर से मुझे यह ज्ञान प्राप्त हुआ है; उसके आगे का रहस्य स्वसंवेद्य है, जिसे स्वयं शिव ही अनुभव कराते हैं।

120

शिवस्य कृपया साक्षाच्छिवलोकस्य वैभवम् । विज्ञातुं शक्यते सर्वैर्नान्यथेत्याहुरास्तिकाः ॥

शिवलोक का वैभव सबके द्वारा साक्षात् केवल शिव की कृपा से ही जाना जा सकता है, अन्यथा नहीं — ऐसा आस्तिक जन कहते हैं।

121

एवं क्रमेण मुक्ताः स्युर्ब्राह्मणा वै जितेन्द्रियाः । अन्येषां च क्रमं वक्ष्ये गदतः शृणुतादरात् ॥

इस प्रकार क्रमशः जितेन्द्रिय ब्राह्मण मुक्त हो जाते हैं। अब मैं अन्य वर्णों का क्रम कहूँगा; बोलते हुए मुझे आदरपूर्वक सुनिए।

122

गुरूपदेशाज्जाप्यं वै ब्राह्मणानां नमोऽन्तकम् । पञ्चाक्षरं पञ्चलक्षमायुष्यं प्रजपेद्धिधीः ॥

गुरु के उपदेश से ब्राह्मणों के लिए "नमः"-अन्त पंचाक्षर मन्त्र जप्य है; बुद्धिमान् व्यक्ति आयुष्यकर पंचाक्षर का पाँच लाख जप करे।

123

स्त्रीत्वापनयनार्थं तु पञ्चलक्षं जपेत्पुनः । मन्त्रेण पुरुषो भूत्वा क्रमान्मुक्तो भवेद् बुधः ॥

स्त्रीत्व की निवृत्ति के लिए पुनः पाँच लाख जप करे; उस मन्त्र से पुरुष होकर वह बुद्धिमती स्त्री क्रमशः मुक्त हो जाती है।

124

क्षत्रियः पञ्चलक्षेण क्षत्रत्वमपनेष्यति । पुनश्च पञ्चलक्षेण क्षत्रियो ब्राह्मणो भवेत् ॥

क्षत्रिय पाँच लाख जप से क्षत्रियत्व को दूर कर लेता है; और पुनः पाँच लाख जप करने पर वह क्षत्रिय ब्राह्मण हो जाता है।

125

मन्त्रसिद्धिर्जपाच्चैव क्रमान्मुक्तो भवेन्नरः । वैश्यस्तु पञ्चलक्षेण वैश्यत्वमपनेष्यति ॥

जप से मन्त्रसिद्धि होकर मनुष्य क्रमशः मुक्त हो जाता है। वैश्य पाँच लाख जप से अपने वैश्यत्व को दूर कर लेता है;

126

पुनश्च पञ्चलक्षेण मन्त्रक्षत्रिय उच्यते । पुनश्च पञ्चलक्षेण क्षत्रत्वमपनेष्यति ॥

और पुनः पाँच लाख जप करने पर वह मन्त्र-क्षत्रिय कहलाता है; और पुनः पाँच लाख जप से उस क्षत्रियत्व को भी दूर कर लेता है।

127

पुनश्च पञ्चलक्षेण मन्त्रब्राह्मण उच्यते । शूद्रश्चैव नमोऽन्तेन पञ्चविंशतिलक्षतः ॥

और पुनः पाँच लाख जप करने पर वह मन्त्र-ब्राह्मण कहलाता है। और शूद्र भी "नमः"-अन्त मन्त्र से पचीस लाख जप करके,

128

मन्त्रविप्रत्वमापद्य पश्चाच्छुद्धो भवेद् द्विजः । नारी वाथ नरो वाथ ब्राह्मणो वान्य एव वा ॥

मन्त्र-विप्रत्व को प्राप्त करके शुद्ध द्विज हो जाता है — चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, ब्राह्मण हो या अन्य कोई भी वर्ण।

129

नमोऽन्तं वा नमः पूर्वमातुरः सर्वदा जपेत् । तत्र स्त्रीणां तथैवोह्य गुरुर्निर्देशयेत्क्रमात् ॥

आतुर पुरुष सदा "नमः"-अन्त अथवा "नमः"-पूर्व मन्त्र का जप करे; वहाँ स्त्रियों के लिए भी उसी प्रकार विचारकर गुरु क्रमशः निर्देश दे।

130

साधकः पञ्चलक्षान्ते शिवप्रीत्यर्थमेव हि । महाभिषेकनैवेद्यं कृत्वा भक्तांश्च पूजयेत् ॥

साधक पाँच लाख जप के अन्त में केवल शिवप्रीत्यर्थ महाभिषेक और नैवेद्य करके शिवभक्तों का पूजन करे।

131

पूजया शिवभक्तस्य शिवः प्रीततरो भवेत् । शिवस्य शिवभक्तस्य भेदो नास्ति शिवो हि सः ॥

शिवभक्त की पूजा से शिव अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। शिव और शिवभक्त में कोई भेद नहीं है, वह साक्षात् शिव ही है।

132

शिवस्वरूपमन्त्रस्य धारणाच्छिव एव हि । शिवभक्तशरीरे हि शिवे तत्परमो भवेत् ॥

शिवस्वरूप मन्त्र को धारण करने से वह साक्षात् शिव ही है; अतः शिवभक्त के शरीर में शिव की सेवा में तत्पर रहना चाहिए।

133

शिवभक्ताः क्रियाः सर्वा वेद सर्वक्रियां विदुः । यावद्यावच्छिवं मन्त्रं येन जप्तं भवेत्क्रमात् ॥

शिवभक्त सब क्रियाओं को जानते हैं, वे वेद की सारी क्रियाओं को जानते हैं। जिसने जितना-जितना क्रमशः शिवमन्त्र का जप किया है,

134

तावद्धै शिवसानिध्यं तस्मिन्देहे न संशयः । देवीलिङ्गं भवेद् रूपं शिवभक्तस्त्रियास्तथा ॥

उतना ही शिवसामीप्य उस शरीर को प्राप्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं। इसी प्रकार शिवभक्त स्त्री का रूप देवी के लिंग के समान है।

134½

यावन्मन्त्रं जपेद्देव्यास्तावत्सानिध्यमस्ति हि ।

वह जितना देवी के मन्त्र का जप करती है, उतना ही देवी का सांनिध्य उसे प्राप्त होता है।

135

शिवं सम्पूजयेद्धीमान्स्वयं वै शब्दरूपभाक् ॥

बुद्धिमान् व्यक्ति स्वयं मन्त्ररूप होकर ही शिव का पूजन करे।

136

स्वयं चैव शिवो भूत्वा परां शक्तिं प्रपूजयेत् । शक्तिं वेरं च लिङ्गं च ह्यालेख्यामायया यजेत् ॥

स्वयं शिव बनकर परा शक्ति की पूजा करे; शक्ति, मूर्ति और लिंग को चित्र अथवा मिट्टी के रूप में पूजे।

137

शिवलिङ्गं शिवं मत्वा स्वात्मानं शक्तिरूपकम् । शक्तिलिङ्गं च देवीं च मत्वा स्वं शिवरूपकम् ॥

शिवलिंग को शिव मानकर, और अपने को शक्तिरूप मानकर; तथा शक्तिलिंग को देवी मानकर, और अपने को शिवरूप मानकर,

138

शिवलिङ्गं नादरूपं बिन्दुरूपं सशक्तिकम् । उपप्रधानभावेन अन्योन्यासक्तलिङ्गकम् ॥

शिवलिंग को नादरूप और शक्ति को बिन्दुरूप मानकर, उपप्रधान भाव से परस्पर संलग्न लिंगों के रूप में पूजे।

139

पूजयेच्च शिवं शक्तिं स शिवो मूलभावनात् । शिवभक्ताश्छिवमन्त्ररूपकाश्छिवरूपकान् ॥

जो शिव और शक्ति की पूजा करता है, वह मूल भावना से स्वयं शिव ही है; शिवभक्त शिवमन्त्ररूप होकर शिवरूप भक्तों का पूजन करते हैं।

140

षोडशैरुपचारैश्च पूजयेदिष्टमाप्नुयात् । येन शुश्रूषणाद्यैश्च शिवभक्तस्य लिङ्गिनः ॥

षोडशोपचार से पूजा करके इष्ट वस्तु प्राप्त करे; जिस सेवा आदि से शिवलिंगधारी शिवभक्त का,

141

आनन्दं जनयेद्विद्वाच्छिवः प्रीततरो भवेत् । शिवभक्तान्सपत्नीकान्पत्या सह सदैव तत् ॥

विद्वान् आनन्द उत्पन्न करता है, उससे शिव अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। सपत्नीक शिवभक्तों को अपनी पत्नी सहित सदा इस प्रकार,

142

पूजयेद्भोजनाद्यैश्च पञ्च वा दश वा शतम् । धने देहे च मन्त्रे च भावनायामवञ्चकः ॥

भोजनादि से पाँच, दस अथवा सौ का पूजन करे, धन, देह और मन्त्र में भावना करते हुए निष्कपट रहे।

142½

शिवशक्तिस्वरूपेण न पुनर्जायते भुवि ।

शिवशक्ति के स्वरूप में स्थित होने से मनुष्य फिर इस भूतल पर जन्म नहीं लेता।

143

नाभेरधो ब्रह्मभागमाकण्ठं विष्णुभागकम् ॥

नाभि के नीचे का भाग ब्रह्मभाग है, और नाभि से लेकर कण्ठ तक का भाग विष्णुभाग है।

144

मुखं लिङ्गमिति प्रोक्तं शिवभक्तशरीरकम् । मृतान्दाहादियुक्तान्वा दाहादिरहितान्मृतान् ॥

मुख को लिंग कहा गया है — यही शिवभक्त का शरीर है। चाहे मृतक दाहादि संस्कार से युक्त हों, या दाहादि से रहित हों,

145

उद्दिश्य पूजयेदादिपितरं शिवमेव हि । पूजां कृत्वादिमातुश्च शिवभक्तांश्च पूजयेत् ॥

उनके उद्देश्य से शिव को ही आदिपितर मानकर पूजा करे; और आदिमाता की पूजा करके शिवभक्तों का भी पूजन करे।

146

पितृलोकं समासाद्य क्रमान्मुक्तो भवेन्मृतः । क्रियायुक्तदशभ्यश्च तपोयुक्तो विशिष्यते ॥

मृत व्यक्ति पितृलोक को प्राप्त कर क्रमशः मुक्त हो जाता है। दस क्रियायुक्त पुरुषों की अपेक्षा एक तपोयुक्त पुरुष श्रेष्ठ है।

147

तपोयुक्तशतेभ्यश्च जपयुक्तो विशिष्यते । जपयुक्तसहस्रेभ्यः शिवज्ञानी विशिष्यते ॥

सौ तपोयुक्तों की अपेक्षा एक जपयुक्त श्रेष्ठ है; सहस्र जपयुक्तों की अपेक्षा एक शिवज्ञानी श्रेष्ठ है।

148

शिवज्ञानिषु लक्षेषु ध्यानयुक्तो विशिष्यते । ध्यानयुक्तेषु कोटिभ्यः समाधिस्थो विशिष्यते ॥

एक लाख शिवज्ञानियों की अपेक्षा एक ध्यानयुक्त श्रेष्ठ है; करोड़ ध्यानियों की अपेक्षा एक समाधिस्थ श्रेष्ठ है।

149

उत्तरोत्तरवैशिष्ट्यात्पूजायामुत्तरोत्तरम् । फलं वैशिष्ट्यरूपं च दुर्विज्ञेयं मनीषिभिः ॥

इस उत्तरोत्तर वैशिष्ट्य के कारण पूजा में उत्तरोत्तर प्राप्त होने वाला विशिष्टतारूप फल मनीषियों के लिए भी दुर्विज्ञेय है।

150

तस्माद्धै शिवभक्तस्य माहात्म्यं वेत्ति को नरः । शिवशक्त्योः पूजनं च शिवभक्तस्य पूजनम् ॥

इसलिए शिवभक्त की महिमा को कौन मनुष्य जान सकता है? शिव-शक्ति का पूजन ही शिवभक्त का पूजन है।

151

कुरुते यो नरो भक्त्या स शिवः शिवमेधते । य इमं पठतेऽध्यायमर्थवद्वेदसम्मतम् ॥

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसे करता है, वह शिवस्वरूप होकर शिव में ही वृद्धि पाता है। जो इस अर्थयुक्त, वेदसम्मत अध्याय को पढ़ता है,

152

शिवज्ञानी भवेद्विप्रः शिवेन सह मोदते । श्रावयेच्छिवभक्तांश्च विशेषज्ञो मुनीश्वराः ॥

वह विप्र शिवज्ञानी होकर शिव के साथ आनन्द भोगता है। हे मुनीश्वरो, विशेषज्ञ पुरुष को चाहिए कि वह शिवभक्तों को भी यह सुनाए।

153

शिवप्रसादसिद्धिः स्याच्छिवस्य कृपया बुधाः ॥

हे बुधजनो, शिव की कृपा से ही शिवप्रसाद की सिद्धि होती है।

क्या स्त्री आहुति दे सकती हैं?

अधिकार

जो उत्तर दिया गया है वह सर्वव्यापी निर्णय नहीं, दो पद्धतियों के बीच की रेखा है। वैदिक विधान में नहीं — यह सीधे कहा गया है, और व्यंग्य उन पर है जो इसे छिपाते हैं। तंत्रोक्त विधान में, जो कि यही है, हां — स्त्री सामान्य आहुति दे सकती हैं, इसमें कोई दिक्कत नहीं। यह जगदंबा का विधान है।

इसी क्रम में, पूछे जाने पर कि क्या कोई स्त्री एक दिन में एक चंडी पाठ कर सकती हैं: बिल्कुल — यदि विधि-विधान आता है, उच्चारण स्पष्ट है और गुरु से आदेश है। और चाहें तो हिंदी में भी।

पारण दशमी का है — अधिकांश व्रत यहीं टूटते हैं

सुधार

नवरात्र व्रत चुपचाप भंग होने का सबसे सामान्य तरीका: अष्टमी को कन्या पूजन कर के उसी दिन पारण कर लेना, या नवमी को कर के उसी शाम।

तर्क भावुक नहीं, गणितीय है। अष्टमी को पारण कर लिया तो नौ दिन कहां पूर्ण हुए — शैलपुत्री की पूजा अभी बाकी है, दशमी का पूरा विधान अभी बाकी है। कन्या पूजन आपने अष्टमी को किया हो या नवमी को, पारण दशमी लगने की प्रतीक्षा करेगा।

पारण से पहले: दान के लिए कुछ वस्तुएं छू कर रख दीजिए — यथाशक्ति अन्न, फल, मसाले, तेल, घी — संकल्प लीजिए, और अंत में समर्पण कीजिए कि पूरा नवरात्र व्रत जगदंबा को अर्पित है। उसके बाद ही पारण।

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 15.8–12

वही कर्म जिस काल में किया जाए उसके अनुसार गुणित फल देता है, और व्रत का अंत उन्हीं विशेष कालों में गिना गया है।

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8

शुद्धात्मनः शुद्धदिने पुण्यं समफलं विदुः । तस्माद् दशगुणं ज्ञेयं रविसङ्क्रमणे बुधाः ॥

शुद्ध अन्तःकरण वाले पुरुष का शुद्ध दिन में किया पुण्य समान फल देने वाला जानना चाहिए; हे बुधजनो, उससे दस गुना सूर्य के संक्रमण में जानना चाहिए।

9

विषुवे तद्दशगुणमयने तद्दश स्मृतम् । तद्दश मृगसङ्क्रान्तौ तच्चन्द्रग्रहणे दश ॥

विषुव में उससे दस गुना, अयन में उससे दस गुना माना गया है; मृग [मकर] संक्रान्ति में उससे दस गुना, और चन्द्रग्रहण में उससे दस गुना है।

10

ततश्च सूर्यग्रहणे पूर्णं कालोत्तमे विदुः । जगद्रूपस्य सूर्यस्य विषयोगाच्च रोगदम् ॥

और उससे भी सूर्यग्रहण में उस उत्तम काल को पूर्ण फल देने वाला जानना चाहिए; जगद्रूप सूर्य का विष के योग से वह रोगदायक भी होता है।

11

अतस्तद्विषशान्त्यर्थं स्नानदानजपांश्चरेत् । विषशान्त्यर्थकालत्वात्स कालः पुण्यदः स्मृतः ॥

इसलिए उस विष की शान्ति के लिए स्नान, दान और जप करने चाहिए; विषशान्ति का काल होने से वह काल पुण्यदायक माना गया है।

12

जन्मर्क्षे च व्रतान्ते च सूर्यरागोपमं विदुः । महतां सङ्गकालश्च कोट्यर्कग्रहणं विदुः ॥

जन्मनक्षत्र में और व्रत के अन्त में सूर्यराग [ग्रहण] के समान जानना चाहिए; और महापुरुषों के संग के काल को करोड़ों सूर्यग्रहणों के समान जानना चाहिए।

अष्टमी को अगर आप कर ले रहे हैं पारण तो फिर नवरात्र का नौ दिन कहां पूर्ण होगा अभी शैलपुत्री की पूजा बाकी है। दशमी का पूरा विधान बाकी है तो व्रत भंग हो जाएगा। अखंड ज्योत बुझने पर क्या करें navratri →

दशमी: अपराजिता, शमी, और कलश हिलाना

दशमी की सुबह का क्रम, सबसे पहले: अपराजिता भगवती का पूजन, फिर शमी पूजा, फिर जो जवारे उगे हैं वे भगवती को अर्पित।

उसके बाद विसर्जन — और उसकी पहली भौतिक क्रिया कलश को हिलाना है, जिससे भगवती की समस्त शक्तियों और उनके पूरे परिवार को यथा स्थान भेजा जाता है। शेष सब उसके बाद।

एक क्षेत्रीय अपवाद बताया गया है: यदि दशमी को बृहस्पतिवार पड़ जाए तो कलश घर से हटाया नहीं जाता। हिलाया जरूर जाएगा, हटाया नहीं।

अखंड ज्योत कब बुझने दी जाए

कन्या पूजन हो जाने पर नहीं। पाठ पूर्ण हो जाने पर नहीं। ज्योत तब तक जलेगी जब तक कलश हिलाया नहीं जाता।

कारण भी बताया गया है: आपने आवाहन किया था, और जब तक विदाई नहीं की, तब तक भगवती भेजी नहीं गईं। विसर्जन के बाद यदि दीपक अपने आप बुझ जाए तो कोई दिक्कत नहीं। जो कभी नहीं होना चाहिए वह यह कि दिखने वाला हिस्सा पूरा हो गया इसलिए ज्योत बुझा दी जाए।

कलश का नारियल कभी मत फोड़िए

सुधार

इसे स्पष्ट शब्दों में सबसे बड़ी बेवकूफी कहा गया है — और यह लगभग हर घर में होता है। विसर्जन के समय कलश के ऊपर रखा नारियल निकाल कर तोड़ दिया जाता है और प्रसाद रूप में बांट दिया जाता है, चाहे नदी पर या घर लौट कर।

आपत्ति अंधविश्वास नहीं, पहचान की है: वह नारियल साक्षात भगवती का स्वरूप है। उसने नौ दिन पूजा ली है; नौ दिन जगदंबा ज्योत में और कलश में स्थापित रही हैं। वह प्रसाद नहीं है और प्रसाद बनता भी नहीं।

इसके बजाय क्या करें: विसर्जन के बाद नदी में ही छोड़ दीजिए, या घर लाकर पूजन स्थान में रख कर उसकी पूजा कीजिए — तब अगले वर्ष उसका विसर्जन करना होगा। यदि नारियल जम जाए तो उसे किसी साफ-सुथरे स्थान पर रोपित कर के जल दे कर बढ़ा सकते हैं; इससे घर का रक्षण होता है।

कलश में जो आप स्थापित किए हैं उसके ऊपर जो नारियल रखे हैं उसको फोड़ना सबसे बड़ी बेवकूफी है क्योंकि वह नारियल साक्षात भगवती का स्वरूप होता है। अखंड ज्योत बुझने पर क्या करें navratri →

एकादशी से: वह नियम जो तय करता है कि कुछ बचेगा या नहीं

अनिवार्य

संग्रह का यह भाग सामान्य नवरात्र सामग्री में कहीं नहीं मिलता, और परिणाम इसी के सबसे ठोस हैं। जो वर्णन किया गया है वह एक पहचाना हुआ पैटर्न है: जो साधक नवरात्र भर बहुत अच्छा कर रहे थे, वे नवरात्र के दो-चार दिन बाद बीमार पड़ जाते हैं, या आवेशित होने लगते हैं, और निष्कर्ष निकालते हैं कि पूजा व्यर्थ चली गई।

व्याख्या यह दी गई है कि वह व्यर्थ नहीं, असुरक्षित है। नौ दिन के जप, हवन और उपवास से अन्नमय कोष शुद्ध होता है और आभा मंडल शुभ्र — पारण के एक-दो दिन बाद, जब नींद पूरी हो जाती है, यह दिखाई भी देता है: मन शांत, चेहरा खिला हुआ, एक वास्तविक तृप्ति। नकारात्मक शक्तियां उस स्थिति को ठीक-ठीक पढ़ती हैं और उसी कारण खिंची चली आती हैं कि अब आपके पास कुछ है। दसवें दिन सब कुछ छोड़ देना — इसे पूरा खजाना इकट्ठा कर के उसे लेकर चौराहे पर खड़े हो जाने जैसा बताया गया है।

एकादशी से जारी रखिए। जिस मंत्र का जप किया था उसकी कम से कम एक माला; मंत्र छोटा हो तो दस माला तक, बड़ा हो तो एक। कवच और मंत्र दोनों, साथ-साथ, नित्य। फिर पूर्णिमा को एक लघु हवन — एक ही माला का सही, पर अवश्य।

व्रत खोलते समय उसे उलटा मत कीजिए

दो विशिष्ट भूलें बताई गई हैं। पहली, पारण होते ही भरपूर खाना शुरू कर देना, नौ दिन की “भरपाई” के लिए। दूसरी, और अधिक गंभीर, तुरंत तामसिक अन्न पर चले जाना — लहसुन, प्याज, भारी मसाला — दशमी को ही, या दो दिन बाद इस तर्क पर कि अब तो समय बीत गया।

तंत्र यह दिया गया है: शरीर की गर्मी एकाएक बढ़ती है, और नौ दिन में शुद्ध किया गया अन्नमय कोष उसी भोजन से बिगड़ना आरंभ हो जाता है। आभा मंडल की शुभ्रता ही वह चीज़ थी जो सात्विक ऊर्जा को टिकाए हुए थी।

धीरे-धीरे बढ़ाइए, और पूर्णिमा तक ही अपने सामान्य आहार पर लौटिए। एक सीमा रखिए; उसे बहुत ज्यादा मत छेड़िए।

और ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। — शारीरिक व मानसिक दोनों — पूर्णिमा तक चलेगा, दशमी तक नहीं। यह इस जानकारी के साथ कहा गया है कि बहुतों को बुरा लगेगा।

मंत्र को तुरंत दूसरों पर मत चलाइए

सावधानी

साधक नवरात्र का अनुष्ठान पूर्ण करता है, पड़ोस में किसी पर बाधा आती है, और मंत्र चल जाता है। चेतावनी इस विषय में बहुत सटीक है कि होता क्या है: बाधा भले चली जाए — आपकी ऊर्जा भी उसी के साथ जाती है। आपने 11000 जप किया था; वहां कितना लगा, यह आपको पता ही नहीं, क्योंकि यह इस पर निर्भर है कि सामने वाले पर कौन-सी शक्ति है और उसके पास कितना पुण्य बचा है।

दो परिणाम बताए गए हैं। यह भंडार अक्षय नहीं है — अक्षय पुण्य होता है, और वह भी यहां खर्च हो रहा है। और जो शक्ति आप तक नहीं पहुंच पाएगी, वह आपके घर-परिवार तक पहुंच जाएगी, जिनके पास आपकी सुरक्षा नहीं है।

प्रयोग से पहले की सीमा: चार-पांच नवरात्र तक उसी मंत्र का पुरश्चरण चलने दीजिए — गुप्त हों या प्रकट — बीच के समय में 11 या 21 माला नित्य, और हर पर्व काल में उस मंत्र की आवृत्ति और हवन दोनों। समर्पण शक्ति पीठ में कीजिए। सप्तशती के लिए विशेष रूप से न्यूनतम सतचंडी कहा गया है, नवचंडी उससे नीचे की सीमा — और जो संख्या वास्तव में अधिकार देती है, वह है बिना संपुट के 108 पाठ भगवती को समर्पित, साथ में नवार्ण का अधिकार, जिसके लिए दीक्षा चाहिए।

स्पष्ट कहा गया है और याद रखने योग्य है: हानि और लाभ के आप स्वयं जिम्मेदार हैं।

लौंग का क्या करें

उनके लिए एक छोटी, विशिष्ट विधि जो आरती के उस विधान का पालन कर रहे हैं जिसमें प्रतिदिन लौंग जोड़ी जाती है। जब दीपक शांत हो जाएं और ठंडा हो जाए, तो जली हुई लौंग को एकत्रित करते जाइए — नौ दिन तक।

बाद में उनका चूर्ण बना कर, उसमें केसर मिला कर, नवरात्र के बाद नित्य तिलक कीजिए। इससे यह प्रश्न भी हल हो जाता है कि जो कुछ जला है उसका क्या करें, और कुछ भी यों ही फेंकना नहीं पड़ता।

गुप्त नवरात्रि: कलश स्थापित मत कीजिए

नियम अलग हैं

गुप्त नवरात्रि में गृहस्थों के लिए निर्देश प्रचलित मत के विरुद्ध जाता है, और दृढ़ता से दिया गया है: गृहस्थ को गुप्त नवरात्रि में कलश स्थापना की आवश्यकता बिल्कुल नहीं है, और नहीं करनी चाहिए। वह उन साधकों का विषय है जो साधना मार्ग पर काफी आगे जा चुके हैं और जो फिर हर वर्ष गुप्त नवरात्रि में करेंगे।

अखंड ज्योत सम्भव है यदि क्षमता वास्तव में हो — पर वह आपको उतने दिन घर में रहने के लिए बांध देती है, और यही व्यावहारिक अड़चन लोग चूक जाते हैं। सामान्य स्थिति यह है कि गुप्त नवरात्रि में गृहस्थ से इतने कर्मकांड की अपेक्षा नहीं है।

जिसकी अपेक्षा है वह है पुनरावृत्ति: पहले किसी नवरात्र में जो साधना की है, उसी को दोहराइए — कोई नई साधना नहीं। गुप्त नवरात्रि वह जगह है जहां चल रहे अनुष्ठान की संख्या बढ़ती है।

गुप्त नवरात्रि किसलिए नहीं है

हर गुप्त नवरात्रि में जो मांगें आती हैं, उनके नाम सीधे लिए गए हैं — जिन्न सिद्धि, परी सिद्धि, यक्षिणी, कण-पिशाचनी — और उन्हें एक श्रेणी के रूप में मना किया गया है। इस चैनल की सामग्री गृहस्थों के लिए बताई गई है: कोई अघोर साधना नहीं, कोई मसानिक या श्मशानिक साधना नहीं, कच्चे कलवे नहीं, डाकिनी-शाकिनी नहीं, इस प्रकार की कोई क्षुद्र साधना नहीं।

यह खिंचाव क्यों है, उस पर की गई टिप्पणी मना करने से अधिक मूल्यवान है: सिद्धि और चमत्कार, ये दो शब्द हैं जिनको लेकर यह क्षेत्र सबसे अधिक उतावला है, और व्यक्ति उस बिंदु तक पहुंच जाता है जहां वह कोई भी सिद्धि स्वीकार करने को तैयार है, प्रेत-पिशाचनी की भी, बस मिल जाए। गृहस्थ के लिए सलाह पहले तपोबल बढ़ाने की है — वह धीमा उत्तर जो कोई नहीं चाहता।

साधकों के प्रश्न

प्रवचनों में जो उत्तर दिए गए, वही — साधकों ने जो प्रश्न वास्तव में पूछे उनके सामने। हर उत्तर उसी क्षण से जुड़ा है जहां वह दिया गया था।

हां, और यह बिना किसी शर्त के कहा गया है — जो पहली बार भी नवरात्र करने जा रहे हैं, वे कर सकते हैं। प्रतिपदा को शुभ मुहूर्त में घटस्थापना कीजिए और गृहस्थ क्रम का पालन कीजिए।

यदि संस्कृत भी पहुंच से बाहर है, तो न्यूनतम है दुर्गा चालीसा — चक्र विधि से हो सके तो, नहीं तो सामान्य रूप से। जो मांगा गया है वह केवल इतना कि नौ दिन खाली न जाएं।

पाठ के लिए नहीं — पर एक शर्त के साथ, और वह शर्त पद की नहीं, शुद्धता की है। यदि आप बिना दीक्षा संस्कृत में पढ़ रहे हैं तो सब कुछ एकदम ठीक पता होना चाहिए; उच्चारण में कोई त्रुटि-दोष न हो। निर्देश यह है कि गायत्री करने वाले किसी ब्राह्मण से उपदेश ले लीजिए, या घर में कोई बड़े-बुजुर्ग साधना-पूजा करने वाले हों तो उनसे आज्ञा ले लीजिए। आज्ञा लेकर करेंगे तो उत्तम रहेगा।

नवार्ण अलग है — बिना दीक्षा एक माला चल जाएगी, अनुष्ठान नहीं। और सप्तशती को किसी अभीष्ट कार्य में प्रयोग करने के लिए पीछे सतचंडी भी चाहिए और नवार्ण का अधिकार भी, जिसके लिए दीक्षा आवश्यक है।

हां — और यह अनुमति से अधिक ज़ोर के साथ कहा गया है। गलत संस्कृत मत बोलिए। पूरा पाठ हिंदी में, भावपूर्वक कीजिए, और यह आपत्ति कि हिंदी से कुछ नहीं होता, सीधे खारिज की गई है।

कवच का पाठ भी हिंदी में हो सकता है। पर छूट के साथ एक क्षितिज जुड़ा है: सात सौ श्लोक, प्रतिदिन दस — दो महीने दस दिन में उच्चारण आ जाएगा, और पंद्रह-तीस मिनट नित्य देने पर छह महीने में।

जैसे ही दिखे, पुनः प्रज्वलित कर दीजिए। फिर अगली बार आसन पर बैठने पर एक माला या देवी सर्वभूतेषु क्षमारूपेण संस्थिता का जप प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। स्वरूप। उपाय पूरा इतना ही है।

उत्तर का अधिक उपयोगी आधा हिस्सा रोकथाम है: बाती इतनी लंबी रखिए कि बदलनी ही न पड़े, क्योंकि सामान्य कारण यही होते हैं — कालिख हटाते समय बुझ जाना, या बाती का बीच में ही चुक जाना।

छूटे हुए नित्य कर्म का प्रायश्चित्त उतना ही बड़ा है जितना वह छूटा — एक दिन के लिए सौ जप, दस दिन से आगे एक लाख, महीना बीत जाने पर पुनः संस्कार — न कि यह निर्णय कि पूरा अनुष्ठान ही व्यर्थ हो गया।

यह संध्या के विषय में कहा गया है, अखंड ज्योत के विषय में नहीं — इन अध्यायों में दीपक की चर्चा ही नहीं है। इसे उस सिद्धांत के लिए उद्धृत किया गया है जो प्रवचन ज्योत बुझने पर लागू करते हैं: पुनः जलाइए, प्रायश्चित्त जप कीजिए, और आगे बढ़िए। यह घबराहट कि नौ दिन अब व्यर्थ हो गए, ग्रंथ जिस तरह किसी व्यवधान को संभालते हैं उसमें उसका कोई आधार नहीं है।

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29

सायं मुहूर्तादर्वाक्तु कृता सन्ध्या वृथा भवेत् । अकालात्काल इत्युक्तो दिनेऽतीते यथाक्रमम् ॥

मुहूर्त से पहले की गई सायं-सन्ध्या व्यर्थ हो जाती है; दिन बीत जाने पर यथाक्रम अकाल को काल कहा गया है।

30

दिवातीते च गायत्रीं शतं नित्यं क्रमाज्जपेत् । आदशाहात्परातीतं गायत्रीं लक्षमभ्यसेत् । मासातीते तु नित्ये हि पुनश्चोपनयं चरेत् ॥

दिन बीत जाने पर प्रतिदिन क्रमशः सौ बार गायत्री जपे; दस दिन से आगे बीत जाने पर लाख बार गायत्री का अभ्यास करे; और मास बीत जाने पर पुनः उपनयन करे।

दशमी को। कन्या पूजन अष्टमी को किया हो या नवमी को, व्रत दशमी लगने तक चलेगा।

कारण यह दिया गया है कि अन्यथा नौ दिन पूर्ण नहीं होते — शैलपुत्री की पूजा और दशमी का पूरा विधान अभी शेष है, और पहले पारण कर लेने से व्रत भंग होता है। जो साधक फिर भी नवमी को पारण करना चाहें, उनके लिए कहा गया है कि यह उनका विषय है — यहां जो विधान दिया गया है वह विंध्य क्षेत्र में माना जाने वाला दशमी का विधान है।

कभी मत फोड़िए। उसने नौ दिन पूजा ली है और वह साक्षात भगवती का स्वरूप है; उसे तोड़ कर प्रसाद रूप में बांट देना सबसे बड़ी बेवकूफी कहा गया है, और इससे बहुत दोष लगता है।

या तो विसर्जन के बाद नदी में ही छोड़ दीजिए, या घर लाकर पूजन स्थान में रख कर पूजा कीजिए — तब अगले वर्ष उसका विसर्जन होगा। यदि जम जाए तो किसी साफ स्थान पर रोपित कर के बढ़ने दीजिए।

हवन पहले, सदैव। यदि पाठ सप्तमी को पूर्ण हुआ और कन्या पूजन अष्टमी को है, तो अष्टमी की सुबह हवन कीजिए और उसके बाद कन्या पूजन। यदि पाठ अष्टमी को पूर्ण हुआ, तो दोनों नवमी को, उसी क्रम में।

वैदिक विधान में नहीं। तंत्रोक्त विधान में — जो कि यही है — हां, बिना किसी दिक्कत के; सामान्य आहुति दी जा सकती है। यह जगदंबा का अपना विधान है।

इसके साथ चलने वाला व्यावहारिक भेद: स्त्रियां गुग्गल की मात्रा अधिक रखेंगी, पुरुष घी की मात्रा अधिक रखेंगे।

नहीं। उनकी सेवा के लिए थोड़ा उपवास तो रहना ही पड़ता है, और उत्तर यह है कि आधा-अधूरा करने के बजाय भगवती से सामर्थ्य मांगिए।

विकल्प कम कृपा नहीं, अलग साधना है: घट पूरी तरह छोड़ दीजिए और उसके बदले सुबह-शाम का पूर्ण, भव्य पूजन कीजिए। स्पष्ट कहा गया है कि उसमें भी कृपा प्राप्त होगी।

हां, दोनों दिशाओं में। बिना कोई घट स्थापित किए नौ दिन का उपवास ठीक है — भगवती की सेवा-पूजा बिना घट के भी हो सकती है। और बिना घट स्थापना के प्रतिदिन चंडी पाठ, पंचोपचार पूजन, कर्म-साक्षी दीपक और सात्विक बलिदान — यह भी बिल्कुल ठीक बताया गया है।

यहां जो स्थिति ली गई है वह इसके ठीक उलट है, और तीखेपन के साथ। रात्रि जगदंबा का समय है; नौ रातों के लिए 9 से 1 की अवधि बताई गई है। जो यह बता रहा है कि रात में सप्तशती नहीं पढ़नी, उसके विषय में कहा गया है कि वह साधक का क्षय कर रहा है।

लिखित निषेध है, यह स्वीकार किया गया है। आपत्ति इस पर है कि उसे उद्धृत करते हैं पर जिस कारण से लिखा गया उसकी चर्चा कोई नहीं करता — और उलट प्रश्न सीधा है: रातें यदि विषय न होतीं तो इसे नव-रात्रि क्यों कहा गया, नव-दिन क्यों नहीं?

अष्टमी के अंतिम बीस मिनट और नवमी के आरंभ के बीस मिनट — दोनों तिथियों की संधि। यही वह काल है जिसमें जगदंबा का सबसे बड़ा तंत्रोक्त स्वरूप चामुंडा प्रकट हुई थीं, और उस समय उनकी ऊर्जा समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त रहती है।

उसमें क्या होता है: बलि, दीपदान, और उस स्वरूप का पूजन। जहां पूर्ण विधान न आता हो, वहां न्यूनतम बताया गया है — एक नारियल और तीन नींबू की बलि, और कपूर-लौंग जला देना।

नहीं — नवरात्र का संकल्प नौ दिन का ही होता है। पूछे जाने पर कि 21 दिन का संकल्प करने पर विसर्जन 22वें दिन होगा और कन्या पूजन कब होगा, उत्तर है कि ऐसे नहीं होगा।

21 दिन का अनुष्ठान करना है तो किसी अन्य महीने में लीजिए — अष्टमी से, या शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से — और यह देख कर कि किस देवता का क्या विधान है।

हां, सीधा। यही सिद्धांत स्थान बदलने पर भी लागू है: जो साधक पहले अखंड ज्योत और मंडल के साथ पूरा अनुष्ठान करते थे और अब नहीं कर सकते, उनसे कहा गया है कि जितना सम्भव हो वह कीजिए और कोई दोष नहीं लगेगा। जहां फल-पत्ती तक उपलब्ध न हो, वहां मानसिक समर्पण से पूजन पूर्ण हो जाता है।

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 15.56–58

साधन न हों तो निर्धन व्यक्ति वाणी से या क्रिया से यज्ञ करे; देवता को अर्पण के भाव से किया गया थोड़ा या बहुत, दोनों ही काम आते हैं।

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56

बन्धुराजभयाद् बुद्धिः श्रद्धा सा च कनीयसी । सर्वाभावे दरिद्रस्तु वाचा वा कर्मणा यजेत् ॥

भाई-बन्धु अथवा राजा के भय से जो बुद्धि होती है, वह श्रद्धा कनिष्ठ है। सब वस्तुओं के अभाव में दरिद्र पुरुष वाणी अथवा कर्म से यजन करे।

57

वाचिकं यजनं विद्यान्मन्त्रस्तोत्रजपादिकम् । तीर्थयात्रा व्रताद्यं हि कायिकं यजनं विदुः ॥

मन्त्र, स्तोत्र, जप आदि को वाचिक यजन जानना चाहिए; तीर्थयात्रा, व्रत आदि को कायिक यजन जानना चाहिए।

58

येन केनाप्युपायेन ह्यल्पं वा यदि वा बहु । देवतार्पणबुद्ध्या च कृतं भोगाय कल्पते ॥

जिस किसी भी उपाय से, थोड़ा हो या बहुत, देवतार्पण की बुद्धि से किया गया कर्म भोग के लिए समर्थ होता है।

यहां इन्हें क्रम में नहीं रखा गया, इनके अलग-अलग काम बताए गए हैं। आपने जो आधार-साधना चुनी है, वह हर नवरात्र में चलेगी। गुप्त नवरात्रि वह जगह है जहां चल रहे अनुष्ठान को दोहराया जाता है, नया नहीं उठाया जाता — और जहां गृहस्थ को कलश स्थापित ही नहीं करना चाहिए।

प्रकट नवरात्रों में पूरी विधि रहती है — घट स्थापना, अखंड ज्योत, नौ रात्रि क्रम, कन्या पूजन। शारदीय की महा अष्टमी की मध्य रात्रि को अनेक फलश्रुतियों में देवी पाठ के लिए वर्ष का शिखर बताया गया है।

इन सब पर एक निर्देश समान रूप से लागू है: एक चीज़ पकड़िए — एकाक्षरी बीज, या 32-नामावली का 1100, या कामाख्या कवच, या जयंती मंगला का 10000 — और वही एक चीज़ हर नवरात्र में कीजिए, उसमें जोड़ते जाइए, बदलिए नहीं।

क्योंकि उन्होंने बंद कर दिया। नौ दिन से अन्नमय कोष शुद्ध और आभा मंडल शुभ्र है, और वह स्थिति ठीक उन्हीं शक्तियों को पढ़ने में आती है जो उसकी ओर खिंचती हैं। दसवें दिन सब कुछ छोड़ देना — पूरा खजाना इकट्ठा कर के उसे लेकर असुरक्षित खड़े हो जाना बताया गया है। पारण के दो-चार दिन बाद बीमारी या आवेश, यह संयोग नहीं, अपेक्षित परिणाम के रूप में रखा गया है।

उपाय छोटा है: एकादशी से उसी मंत्र की कम से कम एक माला और उसका कवच, नित्य; और पूर्णिमा को एक लघु हवन।

नहीं — और यहां जो भेद खींचा गया है वह पूरा कहने योग्य है। जिस साधक के पास वास्तव में सामर्थ्य नहीं है, वह यदि हृदय से मानस स्तुति भी करता है तो जगदंबा, कुल-देवता और घर के देवी-देवता सभी संतुष्ट होते हैं; मानसिक पूजन का फल सर्वश्रेष्ठ माना गया है। साथ में एक ही शर्त जुड़ी है — पंचोपचार भी मानसिक रूप से करना है, क्योंकि बिना मानसोपचार के कोई पूजन पूर्ण नहीं माना गया।

अपराध उलटी स्थिति में बनता है: जिस साधक के पास सामर्थ्य है और वह पुष्प, नैवेद्य और पान इस तर्क पर छोड़ देता है कि माता तो भाव से ही प्रसन्न हो जाएंगी। वह भाव स्वीकार तो होगा — पर कहा गया है कि वह परलोक में काम आएगा, इस लोक में नहीं, और भौतिक पदार्थ में जो कमी की गई वह भौतिक जीवन में कमी बन कर लौटेगी।

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 15.56–58

साधन न हों तो निर्धन व्यक्ति वाणी से या क्रिया से यज्ञ करे; देवता को अर्पण के भाव से किया गया थोड़ा या बहुत, दोनों ही काम आते हैं।

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56

बन्धुराजभयाद् बुद्धिः श्रद्धा सा च कनीयसी । सर्वाभावे दरिद्रस्तु वाचा वा कर्मणा यजेत् ॥

भाई-बन्धु अथवा राजा के भय से जो बुद्धि होती है, वह श्रद्धा कनिष्ठ है। सब वस्तुओं के अभाव में दरिद्र पुरुष वाणी अथवा कर्म से यजन करे।

57

वाचिकं यजनं विद्यान्मन्त्रस्तोत्रजपादिकम् । तीर्थयात्रा व्रताद्यं हि कायिकं यजनं विदुः ॥

मन्त्र, स्तोत्र, जप आदि को वाचिक यजन जानना चाहिए; तीर्थयात्रा, व्रत आदि को कायिक यजन जानना चाहिए।

58

येन केनाप्युपायेन ह्यल्पं वा यदि वा बहु । देवतार्पणबुद्ध्या च कृतं भोगाय कल्पते ॥

जिस किसी भी उपाय से, थोड़ा हो या बहुत, देवतार्पण की बुद्धि से किया गया कर्म भोग के लिए समर्थ होता है।

जो सामग्री साधक वास्तव में जुटा सकता है उसे रोक लेना भीतरी या ऊँचा मार्ग नहीं है — इस युग में धन-रूप धर्म की ही प्रशंसा है, और ज्ञान मूर्ति-पूजन से सिद्ध होता है।

ये श्लोक हर युग के उपयुक्त साधन का क्रम बताते हैं; न किसी नवरात्र अर्पण का नाम लेते हैं, न कमी करने के अपराध का। पर जो भेद ये रखते हैं वही प्रवचनों का आधार है — कि त्याग-द्वारा-कमी पूर्व युगों का मार्ग है, इस युग का नहीं। इसीलिए वही स्रोत निर्धन साधक के मानसिक पूजन को पूर्ण मानते हैं (15.56–58) और सामर्थ्यवान की कंजूसी को अपराध।

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54

कृतादौ हि तपः श्लाघ्यं द्रव्यधर्मः कलौ युगे ॥

कृत आदि युगों में तप ही प्रशंसनीय है, और कलियुग में द्रव्यधर्म प्रशंसनीय है।

55

कृते ध्यानाज्ज्ञानसिद्धिस्त्रेतायां तपसा तथा । द्वापरे यजनाज्ज्ञानं प्रतिमापूजया कलौ ॥

कृतयुग में ध्यान से ज्ञानसिद्धि होती है, त्रेता में तप से; द्वापर में यजन से ज्ञान, कलियुग में प्रतिमापूजा से।

नहीं। रात्रि सूक्तम और जयंती मंगला काली एक साथ करने पर उत्तर है कि कोई एक कीजिए — दोनों में प्रचंड शक्तियां हैं, और दोनों साथ चलाने पर दोनों की भक्ति में कमी रह जाती है और संभालना आपके ऊपर आ पड़ता है। सामान्य नियम के रूप में: एक समय में एक ही मंत्र का जप सदैव उत्तम है।

जिन भूलों से व्रत भंग होता है

प्रवचनों में जो सुधार सबसे अधिक बार किए गए हैं — इनमें से हर एक वास्तव में बड़े पैमाने पर होता है, काल्पनिक नहीं है।

अष्टमी या नवमी को पारण कर लेना

सबसे सामान्य संरचनात्मक भंग। कन्या पूजन पूर्ण होना व्रत पूर्ण होना नहीं है — शैलपुत्री की पूजा और दशमी का पूरा विधान शेष है। कन्या पूजन जिस भी दिन पड़ा हो, व्रत दशमी में जाएगा।

पूजा पूरी दिखने पर ज्योत बुझा देना

कन्या पूजन के बाद, या पाठ पूर्ण होने पर अखंड ज्योत बुझा देना भूल है। आवाहन हो चुका है और विदाई नहीं हुई; दीपक तब तक जलेगा जब तक कलश हिलाया नहीं जाता। विसर्जन के बाद वह स्वयं बुझ जाए तो कोई दिक्कत नहीं।

प्रसाद के लिए कलश का नारियल फोड़ देना

लगभग हर विसर्जन में होता है, और इसे सबसे बड़ी बेवकूफी कहा गया है। उस नारियल ने नौ दिन पूजन लिया है और वह साक्षात भगवती का स्वरूप है। नदी, या घर का पूजन स्थान और अगले वर्ष का विसर्जन — फोड़ कर बांटना कभी नहीं।

कागज़ पर व्रत, और पेट भर कर खाना

फल वर्जित नहीं इसलिए ठूंस-ठूंस कर फल खाना — स्पष्ट कहा गया है कि इससे व्रत का कोई विषय ही नहीं रह जाता। यही बात उस हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति पर भी लागू है जो नौ दिन भरपेट भोजन कर रहा है। व्रत अन्न के त्याग से पहले स्वाद का त्याग है — भीतर के अंगों को भी विश्राम मिलना है।

सामर्थ्य होते हुए कमी करना

नैवेद्य, पुष्प, पान-सुपारी इस तर्क पर छोड़ देना कि माता भाव से ही प्रसन्न हो जाएंगी — जबकि सामर्थ्य है। भाव स्वीकार होगा, पर वह परलोक में काम आएगा; भौतिक कमी इस जीवन में भौतिक कमी बन कर लौटेगी। जिस साधक के पास वास्तव में कुछ नहीं है, उसकी स्थिति बिल्कुल अलग है और उसके लिए मानसिक पूजन पूर्ण है।

जो सामग्री साधक वास्तव में जुटा सकता है उसे रोक लेना भीतरी या ऊँचा मार्ग नहीं है — इस युग में धन-रूप धर्म की ही प्रशंसा है, और ज्ञान मूर्ति-पूजन से सिद्ध होता है।

ये श्लोक हर युग के उपयुक्त साधन का क्रम बताते हैं; न किसी नवरात्र अर्पण का नाम लेते हैं, न कमी करने के अपराध का। पर जो भेद ये रखते हैं वही प्रवचनों का आधार है — कि त्याग-द्वारा-कमी पूर्व युगों का मार्ग है, इस युग का नहीं। इसीलिए वही स्रोत निर्धन साधक के मानसिक पूजन को पूर्ण मानते हैं (15.56–58) और सामर्थ्यवान की कंजूसी को अपराध।

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54

कृतादौ हि तपः श्लाघ्यं द्रव्यधर्मः कलौ युगे ॥

कृत आदि युगों में तप ही प्रशंसनीय है, और कलियुग में द्रव्यधर्म प्रशंसनीय है।

55

कृते ध्यानाज्ज्ञानसिद्धिस्त्रेतायां तपसा तथा । द्वापरे यजनाज्ज्ञानं प्रतिमापूजया कलौ ॥

कृतयुग में ध्यान से ज्ञानसिद्धि होती है, त्रेता में तप से; द्वापर में यजन से ज्ञान, कलियुग में प्रतिमापूजा से।

पारण के साथ ब्रह्मचर्य समाप्त कर देना

नौ दिन का संयम और दशमी को तुरंत वापसी — इसे संचित ऊर्जा का सबसे बड़ा एकमुश्त क्षय कहा गया है। शारीरिक और मानसिक, दोनों ब्रह्मचर्य पूर्णिमा तक चलने को कहा गया है। यह इस पूरी जानकारी के साथ कहा गया है कि बहुत सुनने वालों को यह अच्छा नहीं लगेगा।

सीधे भारी या तामसिक भोजन पर चले जाना

दशमी को ही लहसुन-प्याज और भारी मसाला — या दो दिन बाद, इस तर्क पर कि अब समय बीत गया। शरीर की गर्मी एकाएक बढ़ती है, कोष अस्थिर होते हैं, और नौ दिन की शुद्धि उसी भोजन से खुलने लगती है। आहार धीरे-धीरे बढ़ाइए और पूर्णिमा तक ही सामान्य भोजन पर लौटिए।

ग्यारहवें दिन सब कुछ बंद कर देना

इस पृष्ठ की सबसे परिणाम वाली चूक। एकादशी से: उसी मंत्र की कम से कम एक माला, साथ में उसका कवच, नित्य — और पूर्णिमा को एक लघु हवन। जो साधक यह कुछ नहीं करते, वही अच्छे बीते नवरात्र के कुछ ही दिनों में बीमार पड़ते हैं या आवेशित होने लगते हैं।

अगले ही सप्ताह मंत्र दूसरों पर चला देना

अनुष्ठान के तुरंत बाद झाड़-फूंक, या किसी शत्रु पर प्रयोग। बाधा भले हट जाए, आपकी संचित ऊर्जा उसी के साथ जाती है, और कितनी जाती है इसका अनुमान आपके पास नहीं है। जो शक्ति आप तक नहीं पहुंच पाती वह आपके परिवार तक पहुंच जाती है, जिनके पास आपकी सुरक्षा नहीं है। पहले चार-पांच नवरात्र का पुरश्चरण, और समर्पण शक्तिपीठ में।

हर नवरात्र साधना बदल देना

इस वर्ष जो सबसे शक्तिशाली सुनाई दे उसके पीछे, अगले वर्ष किसी और के पीछे। विकल्प इसलिए दिए गए हैं कि आपको कोई एक ऐसी मिल जाए जिसे आप वास्तव में पूर्ण करेंगे — इसलिए नहीं कि आप उनमें घूमते रहें। एक आधार तय कीजिए और उसे जीवन भर रखिए; उसमें जोड़िए, बदलिए नहीं।

संकल्प में व्रत बढ़ा-चढ़ा कर बोलना

नौ दिन उपवास का संकल्प लेना जिसे आप निभाएंगे नहीं — आगे चल कर यही भंग व्रत के रूप में पढ़ा जाता है। यदि केवल पहले और अंतिम दिन उपवास करना है, तो संकल्प में ठीक यही कहिए। छोटा संकल्प पूरा निभाना कम साधना नहीं है।

बीच नवरात्र में विग्रह को आसन से उठा लेना

जहां कलश और अखंड ज्योत स्थापित हैं, वहां पहले दिन पूर्ण स्नान विधि होगी और उसके बाद विग्रह अपने आसन से नहीं हटेगा। यदि आपके नित्य नियम में अभिषेक है, तो अभिषेक या नियम में से किसी एक को छोड़ने के बजाय व्यवस्था ऐसी बनाइए कि जल वहीं से निकल जाए।

नवरात्र जांच-सूची

of done

जहां आपकी कुल-परंपरा या गुरु-परंपरा की अपनी नवरात्र विधि पहले से चल रही हो, वहां पहले उसे मानिए — यह सूची उस गृहस्थ साधक के लिए संकलित है जिसके पास अपनी कोई चली आ रही परंपरा नहीं है, और इसमें कई बिंदु (गुप्त नवरात्रि का कलश, दशमी का पारण, पूर्णिमा तक ब्रह्मचर्य) इसी परंपरा की स्थिति के रूप में दिए गए हैं, सार्वभौमिक निर्णय के रूप में नहीं।

स्रोत

ऊपर दी गई प्रत्येक बात विश्वसनीय स्रोतों से ली गई है। इस पृष्ठ पर 7 स्रोत उद्धृत हैं, उसी क्रम में जिसमें वे पहली बार आए हैं: