वंश वृद्धि दुर्गा कवच: संतान प्राप्ति और वंश वृद्धि हेतु साधना
संतान प्राप्ति और वंश वृद्धि हेतु वंश वृद्धि दुर्गा कवच की विधि।
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वंश वृद्धि दुर्गा कवच किनके लिए है: रुका हुआ वंश, न ठहरता गर्भ और गर्भपात
कुंडली दोष, कुल दोष और पूर्वजों के कर्म कारण के रूप में
वक्ता कहते हैं कि वंश की वृद्धि जन्म कुंडली के दोष (पंचम भाव पर किसी क्रूर ग्रह की दृष्टि), कुल के दोष, या पूर्वजों अथवा स्वयं के किए कर्मों के कारण रुक सकती है — मेडिकली सब ठीक होते हुए भी संतान नहीं होती। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, भगवान महादेव के साथ-साथ भगवती जगदंबा की शरणागति लेनी चाहिए। जो विधान वे बता रहे हैं वह तब भी काम आता है जब गर्भ ठहरने के बाद गर्भपात हो जाए या गर्भ बार-बार न रुके। इसे पूरे समर्पण के साथ करना चाहिए।
वक्ता पहले कारण बताते हैं। वे कहते हैं कि अगर वंश की वृद्धि रुक गई हो तो इसके अनेक कारण बनते हैं: जन्म कुंडली में कोई दोष, विशेषकर पंचम भाव पर किसी क्रूर ग्रह की दृष्टि, जिससे संतान प्राप्ति में बाधा होती है; कुल का दोष; और अनेक प्रकार के ऐसे कार्य जो पूर्वजों ने या स्वयं ने कर दिए हों और जिनसे कोई दोष उपस्थित हो। ऐसे में, वे कहते हैं, आदमी मेडिकली सही हो सकता है, फिर भी संतान प्राप्ति में बहुत दिक्कत होती है।\n\nऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, भगवान महादेव के साथ-साथ भगवती जगदंबा की शरणागति लेनी चाहिए। फिर वे दायरा बढ़ाते हैं: अगर गर्भ ठहरने के बाद किसी प्रकार का कष्ट या विपत्ति आ जाए, गर्भपात हो जाए, या गर्भ किसी तरह ठहर ही न पाए — इन सभी में भी आज बताया जा रहा विधान प्रयोग किया जा सकता है। पूरा विधि-विधान, वे कहते हैं, करना चाहिए और एकदम समर्पण के साथ करना चाहिए।
वंश वृद्धि दुर्गा कवच में गोपनीयता का नियम: केवल जीवनसाथी और गुरु को पता हो
किसी और को न बताएँ, न किसी और से पूछें
वक्ता कहते हैं कि जब तक यह विधि की जा रही हो, पति अपनी पत्नी के सिवाय और पत्नी अपने पति के सिवाय किसी को इसकी जानकारी न होने दे। अगर कोई गुरु या मार्गदर्शक हो तो उनसे चर्चा की जा सकती है और पूछा जा सकता है। अन्य किसी व्यक्ति को न बताना है, न उससे पूछना है।
वक्ता पूरी विधि के लिए गोपनीयता का एक नियम रखते हैं। वे कहते हैं कि अगर आप पति हैं तो अपनी पत्नी के सिवाय किसी को पता नहीं होना चाहिए कि आप यह विधि कर रहे हैं; अगर पत्नी हैं तो अपने पति के सिवाय किसी को नहीं।\n\nएक ही छूट वे देते हैं — गुरु या मार्गदर्शक की: अगर कोई गुरु हो और इस विषय में चर्चा करनी हो तो उनसे पूछ सकते हैं, चर्चा कर सकते हैं। लेकिन, वे कहते हैं, अन्य किसी भी व्यक्ति को इसके विषय में न बताना चाहिए, न ही पूछना चाहिए।
वंश वृद्धि दुर्गा कवच का उद्गम और पाठ के कौन-से भाग पढ़े जाते हैं
सूर्यनारायण द्वारा दिया गया; मूल कवच सबसे अधिक पढ़ें
वक्ता कहते हैं कि इस कवच के विषय में कहा गया है कि यह भगवान सूर्यनारायण ने दिया है, और इसका नाम ही वंश कवचम् या वंश वृद्धि दुर्गा कवचम् है। पाठ की पीडीएफ वीडियो के डिस्क्रिप्शन में है। शुरू का पूरा विधान और फल श्रुति केवल पहली और अंतिम बार पढ़ी जाती है; मूल कवच ही बार-बार पढ़ा जाता है।
वक्ता कहते हैं कि इस कवच के विषय में कहा गया है कि यह भगवान सूर्यनारायण के द्वारा दिया गया है। इसका नाम ही, वे कहते हैं, वंश कवचम् — वंश वृद्धि दुर्गा कवचम् है। वे दर्शकों को बताते हैं कि पाठ की पीडीएफ का लिंक वीडियो के डिस्क्रिप्शन में होगा, उसे सबसे पहले डाउनलोड कर लें।\n\nपाठ कैसे करना है, इस पर: मूल कवच का पाठ करना है। पहले और आगे का जो पूरा विधान दिया गया है और जो फल श्रुति है, वह केवल पहली बार और अंतिम बार पढ़नी चाहिए। मूल कवच का पाठ, वे कहते हैं, बाकी से कहीं अधिक बार करना चाहिए।
वंश वृद्धि दुर्गा कवच को सिद्ध करने का विधान: सात दिन 108 पाठ
अष्टमी से चतुर्दशी तक, हाथ में कमल, बेल या नारियल
वक्ता कहते हैं कि पहले कवच को सिद्ध करना है: किसी भी महीने के शुक्ल या कृष्ण पक्ष की अष्टमी से चतुर्दशी तक प्रतिदिन मूल कवच का 108 पाठ — घर में या दुर्गा मंदिर में, पीले या लाल वस्त्र में, पूर्व या श्री विग्रह की ओर मुख करके, घी के दो दीपक जलाकर। कवच की सिद्धि और संतान के लिए संकल्प लें; पति-पत्नी दोनों पहले कुश और पवित्री अंगूठी धारण करें। हर 108 पाठ के दौरान दाहिने हाथ में कमल का फूल, पूरा बेल फल या बिना फोड़ा पानी वाला नारियल रहे, गिनती किसी और चीज़ से हो, और फिर वह भगवती के चरणों में समर्पित हो। पहले अनुष्ठान में कुल कम से कम 1100 पाठ होने चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले कवच को सिद्ध कर लेना चाहिए, और विधि बताते हैं। किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष में अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। से चतुर्दशी तक प्रतिदिन मूल कवच का 108 बार पाठ करें। अपने घर में कर सकते हैं, भगवती दुर्गा के मंदिर में भी। पाठ के समय शरीर पर वस्त्र पीला या लाल हो; मुख पूर्व की ओर हो, या मंदिर में हों तो भगवती के श्री विग्रह की ओर। घी के दो दीपक जलाएँ।\n\nफिर संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लें: कवच की सिद्धि हो, और इस कवच की कृपा से, भगवती की कृपा से संतान प्राप्ति के लिए हम यह अनुष्ठान कर रहे हैं। वे बल देकर कहते हैं कि कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है। ज़रूर धारण करना है, और जो पवित्रीकुश घास से बनी अंगूठी जो अनामिका में धारण की जाती है, पितृ कर्म तथा अनेक अनुष्ठानों में आवश्यक। अंगूठी बनाई जाती है वह विधान करने वाले स्त्री-पुरुष दोनों को धारण करनी है; उसके बाद ही संकल्प लेकर जप शुरू करना है।\n\nजाप के लिए, वे कहते हैं, कमल के फूल या बेल फल का प्रयोग करें। 108 पाठ के लिए एक कमल का फूल एक हाथ में रहे और 108 की गिनती किसी और चीज़ से करें। जब तक 108 पाठ पूरे न हों, वह फूल या पूरा बेल फल दाहिने हाथ में रहे। इनकी जगह पानी वाला नारियल भी ले सकते हैं, पर उसे फोड़ना नहीं है: वह गोटा ही समर्पित होकर भगवती के पास रख दिया जाएगा। फूल पर जाप पूरा हो जाए तो वह फूल भगवती के श्री चरणों में समर्पित करें — खुद या पंडित जी के द्वारा; घर में हों तो भगवती के श्री विग्रह के चरणों में। यह अष्टमी से चतुर्दशी तक रोज़ करना है।\n\nपहली बार अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। करने के लिए वे एक गिनती का नियम जोड़ते हैं: कुल मिलाकर कम से कम 1100 पाठ हो जाने चाहिए।
वंश वृद्धि दुर्गा कवच अनुष्ठान के अंतिम दिन का हवन
घी और गुग्गल की 108 आहुति, पति-पत्नी साथ
वक्ता कहते हैं कि अंतिम दिन (चतुर्दशी) स्वयं सूक्ष्म हवन करें: घी और गुग्गुल से 108 आहुति, भगवती दुर्गा के 108 नामों से या जयंती मंगला काली मंत्र से। स्त्री कर रही हो तो चैनल के एक और वीडियो में बताई पौष्टिक हवन सामग्री मिलाएँ। पति-पत्नी साथ करें तो अति उत्तम: पति घी-गुग्गल की आहुति दे, पत्नी पौष्टिक सामग्री से दे या केवल पति के हाथ को स्पर्श कर दे।
वक्ता कहते हैं कि पाठ के अंतिम दिन स्वयं हवन करने की बारी आती है। यह सूक्ष्म हवन है: घी और गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त। से 108 आहुति, भगवती दुर्गा के 108 नामों से या जयंती मंगला काली मंत्र (जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा…) से।\n\nअगर स्त्री कर रही हैं, तो वे कहते हैं कि पौष्टिक हवन सामग्री क्या होती है इस पर चैनल पर एक वीडियो है; उसे सर्च करके देख लें, उन सभी सामग्रियों को मिलाकर उससे हवन करें। यह तंत्रोक्त विधि है, वे कहते हैं, तो हवन कर सकते हैं; और पति-पत्नी साथ में करें तो अति उत्तम है, और दोनों इस कवच के साथ पूरा अनुष्ठान करें तो अति उत्तम। तब पति घी और गुग्गल मिलाकर आहुति देंगे, और पत्नी पौष्टिक सामग्री से देंगी या केवल अपने पति के हाथ को स्पर्श कर देंगी। इसी प्रकार से, वे कहते हैं, यह विधान करना चाहिए।
वंश वृद्धि दुर्गा कवच को घुश्मेश्वर महादेव अभिषेक विधि के साथ जोड़ना
एक ही तिथि से शुरू, पहले कवच, एक साझा हवन
वक्ता कहते हैं कि कवच का अनुष्ठान चैनल पर दी गई घुश्मेश्वर महादेव की शिव-अभिषेक विधि के साथ करें तो अति उत्तम है। तब यह उसी तिथि से शुरू होगा जिस दिन वह पूजा शुरू हो — महाशिवरात्रि, मासिक शिवरात्रि या प्रदोष — और रोज़ अभिषेक से पहले कवच का पाठ होगा। बहुत अधिक कष्ट हो तो दोनों का संयुक्त प्रयोग शीघ्र लाभ देता है; उस अनुष्ठान के एक महीने या 11 दिन तक यथाशक्ति कवच साथ चलता है। अंतिम दिन एक ही हवन: पहले घुश्मेश्वर महादेव के मंत्र से आहुति, फिर दुर्गा के 108 नाम या जयंती मंगला मंत्र से।
वक्ता कहते हैं कि अगर इस विधान के साथ-साथ चैनल पर दी गई घुश्मेश्वर महादेव की विधि — शिव जी के अभिषेक की विधि — भी करते हैं तो अति उत्तम है। तब कवच का अनुष्ठान उसी तिथि से शुरू होगा जिस दिन उनकी पूजा शुरू करेंगे, यानी महाशिवरात्रि, मासिक शिवरात्रि या प्रदोष से। उसी दिन से कवच का पाठ भी शुरू होगा।\n\nरोज़ का क्रम, वे कहते हैं, तय है: उस विधि का अभिषेक आदि करने से पहले कवच का पाठ कर लेना है। पहले वंश वृद्धि का पाठ, फिर उस विधि से भगवान शिव का अभिषेक। बहुत अधिक कष्ट हो तो दोनों का एक साथ संयुक्त प्रयोग, संयुक्त अनुष्ठान करने से शीघ्र अति शीघ्र लाभ मिलता है। जब तक वह अनुष्ठान चले — एक महीने या 11 दिन, यथाशक्ति — कवच साथ-साथ चलता रहेगा।\n\nअंतिम दिन, वे कहते हैं, हवन एक ही होगा: सबसे पहले घुश्मेश्वर महादेव के मंत्र से आहुति पड़ेगी, उसके बाद भगवती के 108 नाम या जयंती मंगला मंत्र से। इस प्रकार, वे कहते हैं, अनुष्ठान पूर्ण होता है।
वंश वृद्धि दुर्गा कवच का अभिमंत्रित जल: कैसे बनता है और कौन कब पिए
जप और हवन के पास ढका हुआ गंगाजल का कलश
वक्ता कहते हैं कि जब अनुष्ठान और हवन चल रहा हो, ढक्कन लगा कलश या लोटा शुद्ध गंगाजल से भरकर रखें ताकि रोज़ के पाठ की ऊर्जा उस पर पड़े और हवन की अग्नि का ताप उस तक पहुँचे। बाद में, जिस पति में शुक्र दोष या ऐसी कोई कमी हो, वह रोज़ सुबह नहा-धोकर, पूजा और भगवती का प्रसाद लेने के बाद खाली पेट यह जल पिए। पत्नी जिस दिन ऋतु स्नाता हो (पीरियड पूरा, बाल धोकर, प्रथम पूजन), उस दिन से पिए, फिर अगले दिन से लगातार कुछ समय तक; जितना लंबा पिए उतना अच्छा।
अनुष्ठान के बाद, वक्ता कहते हैं, इसकी प्रयोग विधि आती है, और वह अनुष्ठान के दौरान ही शुरू हो जाती है। जब अनुष्ठान चले और हवन हो, एक ढक्कन लगा हुआ कलश या लोटा शुद्ध गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। से भरकर रख दें। रोज़ जब जाप करें तो आपकी वाणी से जो ऊर्जा निकल रही हो वह उस पर पड़े; और जब हवन हो तो ध्यान रखें कि अग्नि का ताप उस लोटे तक पहुँचे। यही अभिमंत्रित जल बनता है।\n\nआगे वे बताते हैं कि इसे कौन कब पिए। अगर पुरुष में कोई दोष है — शुक्र की कमी, शुक्र दोष आदि — तो वह रोज़ सुबह नहा-धोकर, पूजा करके, भगवती का प्रसाद लेकर, उसके बाद सबसे पहले खाली पेट वह जल पी ले।\n\nस्त्री उस दिन से पिए जब वह ऋतु स्नाता हो: जिस दिन उसका मासिक चक्र, पीरियड पूरा हो जाए, बाल आदि धोए और प्रथम पूजन करे। उस दिन से वह अनुष्ठान के समय अभिमंत्रित किया गया जल पिए। वे बल देते हैं कि विशेषकर ऋतु स्नाता होने पर अगले दिन से लगातार कुछ समय तक जल ज़रूर पीना है; लंबे समय तक पिए तो, वे कहते हैं, बहुत अच्छा होता है।
वंश वृद्धि दुर्गा कवच से जिन कष्टों से छुटकारा बताया गया है
बंध्यत्व से लेकर पितृ दोष और अभिचार तक
वक्ता का दावा है कि कवच के अनुष्ठान से वंश रोकने वाले किसी भी दोष से छुटकारा मिलता है; बंध्या (लंबे समय से संतानहीन), मृतवत्सा या काकबंध्या स्त्री को लाभ होता है, और जिस स्त्री के गर्भ क्षेत्र में, उनके शब्दों में, पुष्प नहीं बनते उसे भी — अभिमंत्रित जल या मक्खन से। ग्रह-नक्षत्र की बाधा, कुल का दोष, प्रेत-पिशाच दोष, पितृ दोष या अभिचार से गर्भ में आया दोष भी हटता है। साथ में अनुष्ठान में गर्भ गौरी रुद्राक्ष और कवच अभिमंत्रित कर पहने जाते हैं; स्वयं करने वाला भी यह सब कर सकता है।
वक्ता कहते हैं कि इस कवच के प्रभाव से, इसका अनुष्ठान करने पर, किसी भी कारण से वंश रुका हो, उस दोष से छुटकारा मिलता है और वंश की वृद्धि हो जाती है। वे और स्थितियाँ गिनाते हैं: जो बंध्या हैं, बहुत लंबे समय से संतान नहीं हो रही, उन्हें भी होती है; मृतवत्सा या काकबंध्या को भी लाभ होता है।\n\nवे एक मेडिकल स्थिति भी बताते हैं: जैसा बोलते हैं कि गर्भ क्षेत्र में जो पुष्प बनने चाहिए वे नहीं बन रहे, जिससे स्त्री के भीतर गर्भधारण हो ही नहीं पाता — उसमें भी लाभ होता है, अभिमंत्रित जल पीने या अभिमंत्रित मक्खन खाने से, जिसकी विधि वे आगे बताते हैं।\n\nइसके सिवाय ग्रह-नक्षत्र की बाधा हो, कुल का कोई दोष हो, प्रेत-पिशाच का दोष हो, पितृ दोष हो, या किसी अभिचार कर्म के कारण गर्भ में कोई दोष आ गया हो — कवच का अनुष्ठान कर लेने या करवा लेने पर उससे भी छुटकारा मिलता है। फिर, वे कहते हैं, अभिमंत्रित चीज़ें पहनी जाती हैं: गर्भ गौरी रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । इसमें अभिमंत्रित करके पहना जाता है, और कवच के अनुष्ठान से अभिमंत्रित कवच बनते हैं। यह सब, वे कहते हैं, विधान है; स्वयं करने वाला भी यह सब विधि कर सकता है, और सभी प्रकार के दोष खत्म हो जाते हैं।
वंश वृद्धि कवच जारी रखने से गर्भस्थ और जन्मे बालक की रक्षा
गले या कमर में कवच; योगिनियाँ बालक की रक्षा करती हैं
वक्ता कहते हैं कि अनुष्ठान में बना अभिमंत्रित कवच स्त्री गले में या कमर में धारण करती है। गर्भधारण हो जाने के बाद भी अगर यथाशक्ति अनुष्ठान नियमित रखा जाए तो गर्भ में आने वाले बालक की रक्षा होती है; जन्म के बाद भी उस पर भगवती की कृपा बनी रहती है और योगिनीयाँ उसे सदैव रक्षित और पोषित रखती हैं। वे इसे अति विशिष्ट और उत्तम कवच कहते हैं।
वक्ता कहते हैं कि कवच के अनुष्ठान से जो अभिमंत्रित कवच बनते हैं, उन्हें स्त्री गले में या कमर में धारण करती है।\n\nऔर इतना ही नहीं: इस कवच के अनुष्ठान से जब गर्भधारण हो जाए, उसके बाद भी अगर यथाशक्ति अनुष्ठान नियमित करते रहें तो गर्भ में आने वाले बालक की रक्षा होती है। जन्म के बाद भी उस पर भगवती की कृपा बनी रहती है और वह योगिनीयों के द्वारा सदैव रक्षित और पोषित होता रहता है। यही, वे कहते हैं, कवच का प्रभाव है, और यह कवच अपने आप में अति विशिष्ट और उत्तम है।
गोपनीयता के नियम के बावजूद वंश वृद्धि दुर्गा कवच को प्रकाशित क्यों किया जा रहा है
अच्छे लोगों पर अभिचार से वंश रुकना बताया गया है
वक्ता कहते हैं कि इसमें यहाँ तक कहा गया है कि इसे सब जगह प्रकाशित न करें। फिर भी वे इसे बता रहे हैं क्योंकि उनके अनुसार अभी के समय में ज़रूरत है कि लोग इसे जानें और करें: वंश वृद्धि अनेक प्रकार से रुक जाती है और अच्छे-अच्छे लोगों पर कभी अभिचार भी किया जाता है। इसीलिए, वे कहते हैं, कवच का प्रकाश किया जा रहा है, और वे सबसे इसे करने को कहते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इस कवच के विषय में यहाँ तक कहा गया है कि इसे सब जगह प्रकाशित ही न करें। फिर भी, वे कहते हैं, अभी के समय में इन चीज़ों की आवश्यकता है कि लोग जानें और करें।\n\nउनका कारण यह है कि सनातन में इस समय वंश वृद्धि अनेक प्रकार से रुक जाती है और अच्छे-अच्छे लोगों पर कभी अभिचार भी किया जाता है। इसीलिए, वे कहते हैं, इस कवच का प्रकाश किया जा रहा है, और वे सबसे इसे करने को कहते हैं।
अनुष्ठान के बाद वंश वृद्धि कवच का नित्य पाठ और नया जल अभिमंत्रित करना
कम से कम सात बार, 27 बार अति उत्तम
वक्ता कहते हैं कि अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद भी मूल कवच का पाठ रोज़ करना है: कम से कम सात बार, 27 बार करें तो अति उत्तम। अभिमंत्रित जल समाप्त हो जाए या रखा ही न हो, तो इस नित्य पाठ के समय फिर से भगवती के पास जल अभिमंत्रित होने के लिए रख दें, और वह जल स्त्री और पुरुष दोनों पिएँ।
वक्ता कहते हैं कि जब अभिमंत्रित जल समाप्त हो जाए, या आपके पास जल न हो क्योंकि रखना भूल गए, तब भी कवच का नित्य पाठ तो ऐसे भी करना है। अनुष्ठान पूर्ण हो जाने के बाद प्रतिदिन कम से कम सात बार मूल कवच का पाठ करें; 27 बार करें तो अति उत्तम।\n\nउस नित्य पाठ के समय, वे कहते हैं, भगवती के पास फिर से जल अभिमंत्रित होने के लिए रख दें, और वह अभिमंत्रित जल स्त्री को और पुरुष को भी पीना है।
गर्भधारण के लिए वंश वृद्धि दुर्गा कवच से अभिमंत्रित मक्खन
ऋतु स्नान के बाद एक चम्मच देसी गाय का मक्खन
वक्ता कहते हैं कि स्त्री के ऋतु स्नान के बाद शुद्ध देसी गाय के दूध का मक्खन — बस एक चम्मच भर — भगवती के सामने रखकर इस कवच से अभिमंत्रित किया जाए। फिर वह उसे खाए तो, वे कहते हैं, वर्णन आया है कि गर्भधारण अवश्य होता है।
जल के सिवाय वक्ता एक और प्रयोग बताते हैं। स्त्री के ऋतु स्नाता होने के बाद भगवती के सामने मक्खन रखकर इस कवच से अभिमंत्रित करें। मक्खन शुद्ध देसी गाय के दूध का बना हो, और थोड़ा-सा ही चाहिए — बस एक चम्मच भर।\n\nअभिमंत्रित हो जाने पर, वे कहते हैं, अगर वह उसे भी खाती हैं तो गर्भधारण आदि अवश्य होता है; ऐसा, वे कहते हैं, वर्णन आया है।
रविवार की संक्रांति या रविवार की शुक्ल सप्तमी को चौखट पर अभिमंत्रित जल या मक्खन लेना
सूर्यनारायण का विशेष दिन, सूर्य को देखते हुए
वक्ता कहते हैं कि जब रविवार को संक्रांति लगे या रविवार को शुक्ल पक्ष की सप्तमी पड़े, तो वह सूर्यनारायण का विशेष कृपा-दिवस है, और यह कवच उन्हीं का दिया हुआ है, इसलिए उस दिन अभिमंत्रित जल या मक्खन घर के प्रमुख द्वार की चौखट पर — जहाँ कुल देवी-देवताओं और पितरों का पूजन होता है — खड़े होकर सूर्य को देखते हुए लिया जाता है। वहाँ से सूर्य न दिखे तो चौखट पर प्रणाम और स्मरण करके बाहर जाकर दर्शन करें, तभी पिएँ या खाएँ। इससे, वे कहते हैं, बहुत त्वरित लाभ मिलता है।
वक्ता एक खास दिन अलग से बताते हैं। जब कभी रविवार के दिन संक्रांति लगे, या रविवार को शुक्ल पक्ष की सप्तमीपक्ष की सातवीं तिथि। पड़े, तो वह भगवान सूर्यनारायण का विशेष दिवस है और उस दिन उनकी विशेष कृपा होती है। यह कवच उन्हीं का बताया हुआ है, इसलिए उस दिन का भी विधान है, ताकि उनकी कृपा से गर्भधारण हो।\n\nउस दिन घर की चौखट पर — मकान के प्रमुख द्वार पर, जहाँ कुल के देवी-देवताओं और पितरों का पूजन होता है — खड़े होकर, अगर वहाँ से सूर्यनारायण दिख जाएँ तो उन्हें देखते हुए अभिमंत्रित जल पिएँ या अभिमंत्रित मक्खन खाएँ।\n\nअगर न दिखें तो पहले चौखट पर खड़े होकर प्रणाम कर लें, स्मरण कर लें; फिर बाहर जाकर सूर्यनारायण के दर्शन करें और तब अभिमंत्रित जल पिएँ या मक्खन खाएँ। इससे भी, वे कहते हैं, बहुत त्वरित लाभ मिलता है।
वंश वृद्धि कवच से लाभ मिलने के बाद सदाशिव और भगवती की आजीवन भक्ति
दंपति और संतान भक्ति कभी न छोड़ें
वक्ता कहते हैं कि इस कवच और घुश्मेश्वर महादेव के पूरे विधान से जब लाभ मिल जाए, तो दंपति और आने वाली संतान आजीवन सदाशिव और भगवती की भक्ति करते रहें, दूसरों का कल्याण करने का प्रयास करते रहें, और वह भक्ति कभी न छोड़ें। वे जो देंगे, वे कहते हैं, अच्छा ही देंगे: धर्मयुक्त पुत्र या संतान अवश्य मिलेगी।
अंत में वक्ता कहते हैं कि यही पूरा विधि-विधान है। जब कभी आप इस कवच के माध्यम से और घुश्मेश्वर महादेव के पूरे विधान के माध्यम से अनुष्ठान करें और लाभ मिल जाए, तो आजीवन आने वाली संतान भी और आप भी सदाशिव और भगवती की भक्ति करते रहें, दूसरों का कल्याण करने का प्रयास करते रहें, और उनकी भक्ति कभी न छोड़ें।\n\nजो वे देंगे, वे कहते हैं, अच्छा ही देंगे: धर्मयुक्त पुत्र या संतान इन सभी प्रभावों से अवश्य मिलेगी। ऐसा, वे कहते हैं, उनका विश्वास है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।