घर पर कुंभ की साधना — 41 दिन के पूरे मंडल की विधि

एक लंबी लाइव चर्चा, जिसमें चरण-दर-चरण बताया गया है कि जो लोग कुंभ में प्रयाग नहीं पहुँच सकते वे घर पर ही पूरे काल की मंडल साधना कैसे करें। आरंभ इस तर्क से होता है कि उपलब्ध सवा महीना स्वयं में एक पूरा 41 दिन का मंडल है — जो अकेला माघ मास नहीं दे पाता — और इस काल का जप हजार गुना पुण्य देने वाला कहा गया है। इसके बाद कुंभ की कथाएँ और प्रयाग की प्रमुखता, फिर यह विषयांतर कि तंत्र का उपदेश सीमा में क्यों रखा जाता है और अपराध कर बैठने वाले साधक के साथ क्या होता है। मुख्य भाग विधि और अनुशासन का है: बिना सिला वस्त्र, न बदला जाने वाला आसन, नियत दैनिक समय, एक समय का भोजन, दूसरे के घर का अन्न-जल नहीं, अलग बिछावन-पादुका-कंघी, सूतक का प्रबंध, तथा वैष्णव, शाक्त और कौल परंपराओं में रजस्वला संबंधी भिन्न नियम। फिर देवताओं का क्रम — पौष पूर्णिमा को दत्तात्रेय और शाकंभरी, मकर संक्रांति को गणपति और नवग्रह, उसके बाद प्रमुख साधना — एकाक्षरी, वज्र कवच, संकट नाशन गणेश स्तोत्र, आपद उद्धारण बटुक भैरव स्तोत्र, भगवती की 32 नामावली, जयंती मंगला और रात्रि सूक्त की ठोस संख्याओं सहित, साथ में दो मिनट की हवन विधि और नींबू की बलि। अंत में उनके लिए घटा हुआ विकल्प जो कोई नियम नहीं निभा सकते — बिना किसी नियम के पंचाक्षरी — एक लंबा प्रश्नोत्तर, और यह वर्णन कि भगवती की दृष्टि में आ जाने के बाद साधक को किस "अप्सरा" परीक्षा का सामना करना पड़ता है।

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01

कुंभ का समय साधक को घर बैठे पूरा मंडल क्यों दे देता है?

कुंभ स्वयं में एक पूरा 41 दिन का मंडल

· 00:52–03:50 · Also a question

क्योंकि जो सवा महीने का समय है वह पूरे 41 दिन का मंडल समा लेने भर लंबा है, जो अकेला माघ मास नहीं दे पाता — और कुंभ में किया गया जप सामान्य पर्वकालों की तुलना में हजार गुना अधिक पुण्य देने वाला कहा गया है।

02

साधक की नियमावली आसन पर बैठने से नहीं, सो कर उठने के क्षण से आरंभ होती है

पूरे काल की पूर्वशर्त — अनुशासन

· 03:51–07:01

क्योंकि नियमावली आसन से नहीं, सो कर उठने से शुरू होती है। जो साधक उठते ही सबसे पहले अपना बिछावन समेटता है, वह जीवन की हर चीज में व्यवस्था लेकर चलता है; और जो नीति-नियम से डर कर भागता है वह हर जगह भागेगा — नौकरी में, व्यापार में और साधना में भी।

03

कुंभ का अमृत वास्तव में कहाँ-कहाँ गिरा था?

अमृत जिन बारह स्थानों पर गिरा

· 07:02–09:03 · Also a question

चार नहीं, बारह जगहों पर। आठ स्थान अन्य लोकों में हैं जहाँ केवल सिद्ध, चारण और देवता ही जा सकते हैं; चार भारत की भूमि पर हैं, और उनमें प्रयाग सर्वप्रमुख है क्योंकि वहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती तीनों मिलती हैं।

04

हर कोई हर विषय नहीं पचा पाता, और जो नहीं पचा पाता वह निंदा करने लगता है

तंत्र का उपदेश सीमा में क्यों रखा जाता है

· 09:04–09:59

क्योंकि हर कोई हर विषय नहीं पचा पाता, और जो नहीं पचा पाता वह निंदा करना आरंभ कर देता है — और दोष का भागी बन जाता है। कई बार रहस्य को बचाए रखने के लिए जानबूझ कर नकारात्मक बात रख दी जाती है, और साधक के योग्य होते ही रहस्य स्वयं खुल जाते हैं।

05

गणपति जी के वे कौन से स्वरूप हैं जिन तक सामान्य भक्त कभी नहीं पहुँचते?

गणपति के अनेक स्वरूप और उनके तांत्रिक विषय

· 10:00–13:52 · Also a question

घर के लक्ष्मी-गणेश से आगे 32 गणपति, द्वादश, षोडश और 56 विनायक हैं। महागणपति के साथ जो भगवती हैं वे सिद्ध लक्ष्मी हैं; और उच्छिष्ट गणपति का तांत्रिक विषय भगवती नील सरस्वती से जुड़ा है, जिसे जानकर सामान्य जन विचलित हो जाएँगे।

06

जिस साधक से किसी देवता का अपराध हो गया हो, उसके साथ क्या होता है?

अज्ञात अपराध साधना को कैसे रोक देता है

· 13:53–18:07 · Also a question

किसी पीठ पर मंत्र सिद्धि का प्रयास करते ही वह उच्चाटित हो जाता है — झगड़ा खड़ा होता है, मन पलट जाता है और वह वहाँ से चला आता है। जहाँ विनायक कुपित हों वहाँ बाधा शारीरिक होती है: पेट में गैस, नाभि पर्यंत दर्द, बैठ न पाना और मूलाधार का गड़बड़ा जाना।

07

त्रिवेणी में तीन डुबकियाँ लगाने से क्या होता है?

तीन डुबकियाँ और तीन प्रकार के पाप

· 18:08–20:02 · Also a question

पहली में कायिक पाप, दूसरी में वाचिक, तीसरी में मानसिक। साधक साँस रोक कर जल के भीतर अपने आराध्य का स्मरण करता है, और स्मरण का वही क्षण वह क्षण कहा गया है जिसमें पाप भस्म हो जाता है।

08

जो चालीस दिन नहीं कर सकते, उन्हें कौन से छोटे पर्वकाल चुनने चाहिए?

कुंभ काल के भीतर के छोटे पर्वकाल

· 20:03–21:14 · Also a question

एक दिन का मकर संक्रांति; माघ की गुप्त नवरात्रि, जिसे मौनी अमावस्या से माघ पूर्णिमा तक पंद्रह-सोलह दिन का मान कर चलें और नौ दिन की नवरात्रि उसी के भीतर; और शिव जी की नवरात्रि जो महाशिवरात्रि तक जाती है।

09

साधना काल में साधक को कैसे वस्त्र धारण करने चाहिए?

बिना सिला वस्त्र और एक ही न बदला जाने वाला आसन

· 21:15–22:49 · Also a question

बिना सिला हुआ वस्त्र — माताएँ दो सूती साड़ियाँ नीचे से ऊपर लपेट कर, पुरुष धोती, जिसके लिए वक्ता कोई विकल्प नहीं बताते। पूजन का वस्त्र अलग रखा जाता है और उसे पहन कर खाना-पीना नहीं है, और आसन फिक्स रहता है: न बदला जाए, न धोया जाए, न उस पर कोई और बैठे।

10

साधना दिन के किस समय करनी चाहिए?

साधना का समय चुनना

· 22:50–23:54 · Also a question

इस काल में चौबीसों घंटे दिव्य हैं, फिर भी भोर — लगभग रात 2:30 से सुबह 8 बजे तक — सर्वोत्तम कहा गया है। देवी साधक और वीराचारी रात्रि कालीन भी कर सकते हैं; भोर, संध्या और मध्यान तीनों चलेंगे।

11

साधना काल में खान-पान का नियंत्रण किस प्रकार रखना चाहिए?

अन्न एक ही समय, और सेंधा नमक

· 23:55–25:14 · Also a question

सेंधा नमक लिया जा सकता है। अन्न दिन में एक ही बार, नियत समय पर, उसके बाद फलाहार, और शरीर साथ दे तो सूर्यास्त के बाद अन्न नहीं। तीनों समय भोजन करते हुए सिद्धि का अनुभव संभव नहीं बताया गया है।

12

पहले दिन जो समय तय हुआ, वही समय हर एक दिन रहेगा

पूरे मंडल के लिए दैनिक समय का निश्चित होना

· 25:15–25:46

13 जनवरी की पौष पूर्णिमा से 26 फरवरी तक समय बदलना नहीं है। जो रात 9 बजे से भोर 2:30-3 बजे तक करने वाले हैं उनका प्रतिदिन वही समय रहेगा; जिसने भोर चुना है उसका भोर।

13

कलश की स्थापना कब करनी चाहिए और विसर्जन कब?

कुंभ काल में कलश का समय

· 25:47–27:07 · Also a question

मकर संक्रांति को, या पौष पूर्णिमा को। पूर्णिमा को स्थापित किया हो तो शिवरात्रि के तुरंत बाद नहीं हटाना, कम से कम एक दिन और रुकना है; मकर संक्रांति को स्थापित किया हो तो शिवरात्रि के बाद पड़ने वाली अमावस्या तक रखना और तब विसर्जन करना है।

14

क्या साधना के दौरान विग्रहों का नित्य स्नान चलता रहेगा?

नित्य स्नान — श्री विग्रह और प्रतिष्ठित शिलाएँ

· 27:08–28:35 · Also a question

पहले का नियम बदलेगा नहीं — जो पहले नित्य स्नान कराते थे वे कराते रहें। शिलाओं का नित्य स्नान आवश्यक है — नर्मदेश्वर, स्फटिक शिला, भगवती की स्वर्णमुखी शिला, शालिग्राम — पर घर के सामान्य श्री विग्रह के लिए यह अनिवार्य नहीं है।

15

पूजन में प्रयोग होने वाले पात्रों के लिए क्या नियम हैं?

पात्र प्रतिदिन धुलें, और अगरबत्ती की प्लेट

· 28:36–30:43 · Also a question

मिट्टी नहीं, धातु का पात्र; प्रतिदिन वही एक पात्र, धो कर साफ-सफाई के साथ। कल का नैवेद्य पड़े रहने वाले झूठे पात्र में फिर से अर्पित करना गलत कहा गया है, और वर्षों तक भस्म जमाए रखने वाली अगरबत्ती की प्लेट को वे विशेष रूप से न रखने योग्य बताते हैं।

16

बलि पात्र किस चीज का होना चाहिए?

बलि पात्र मिट्टी का नहीं, धातु का क्यों

· 30:44–31:33 · Also a question

धातु का। मिट्टी का खप्पर प्रयोग किया जा सकता है और उसे बदलने की आवश्यकता नहीं, पर गरम होकर वह चटक जाता है — और चटका हुआ पात्र साधक के लिए सही नहीं माना गया है।

17

क्या कुंभ की साधना के लिए जप की माला बदलनी चाहिए?

वही माला रखें, जब तक वह स्वयं गलत न हो

· 31:34–31:59 · Also a question

जिस पर पहले से जप करते आ रहे हैं वही रखें। अपवाद केवल वह माला है जो स्वयं गलत हो — प्लास्टिक की, या अनजाने में ली हुई गड़बड़ माला — उसे पूरा मंडल आरंभ करने से पहले सुधार लेना चाहिए, उसी के साथ मंडल में नहीं जाना चाहिए।

18

पौष पूर्णिमा को शाकंभरी के साथ दत्तात्रेय — कम से कम एक दिन का पूजन अवश्य

पहले दिन दत्तात्रेय और शाकंभरी

· 32:00–35:01

पौष पूर्णिमा को भगवती शाकंभरी के साथ भगवान दत्तात्रेय — कम से कम एक दिन का पूजन। साधक आगे जिस भी परंपरा में जाए, गुरु मंडल में उनकी उपस्थिति सदैव बनी रहती है।

19

माघ में घर पर साधक को स्नान किस प्रकार करना चाहिए?

गंगा स्तोत्र से स्नान के जल को अभिमंत्रित करना

· 35:02–36:45 · Also a question

धातु के बड़े पात्र में जल को पहले से गंगा जी के स्तोत्र और सतनामावली से अभिमंत्रित कर लें, उसे स्नान के जल में मिलाएँ और सूर्योदय से पूर्व स्नान करें। माघ के जल में देवत्व और वेद मंत्रों की उपस्थिति कही गई है।

20

गणपति और नवग्रह, दोनों दिन के पूर्वार्ध में ही पूर्ण

मकर संक्रांति को गणपति और नवग्रह

· 36:46–40:32

भगवान गणेश और नवग्रह, दोनों दिन के पहले हिस्से में पूर्ण कर लेने हैं। मुख्य साधना उसी दिन के बाद या उसी रात्रि से मकर संक्रांति से आरंभ होती है।

21

दत्तात्रेय साधना में किस परंपरा के अनुसार समय चुनें?

परंपरा के अनुसार दत्तात्रेय साधना का समय

· 40:33–41:54 · Also a question

वैष्णव परंपरा से चलने वाले भोर में; शैव विधान वाले संध्या या भोर में; और जो आगे भगवती की प्रसन्नता चाहते हैं और वीर साधक बनना चाहते हैं वे आरंभ से ही रात्रि कालीन।

22

दत्तात्रेय के कौन से मंत्र लेने चाहिए, और उनसे क्या नहीं करना है?

दत्तात्रेय के मंत्र विकल्प, और प्रयोग का निषेध

· 41:55–43:15 · Also a question

जिन्होंने देव दीक्षा विधान किया है उनके लिए एकाक्षरी, साथ में या तो वज्र कवच या दत्त का माला मंत्र; जो कवच नहीं कर पाएँगे उनके लिए द्वादश नाम। साधना के मध्य में किसी भी मंत्र का प्रयोग नहीं करना है।

23

साधक को दूसरे के घर का अन्न-जल क्यों नहीं लेना चाहिए?

दूसरे घर का अन्न और जल न लेना

· 43:16–46:02 · Also a question

क्योंकि अन्न और स्थान दोनों का प्रभाव पड़ता है। काम से बाहर जाना पड़े तो साधक अपना पानी और अपना भोजन साथ ले जाता है, अपने बर्तन स्वयं धोता है, और घर में शुद्धता से बना ही खाता है — या फलाहार पर रहता है।

24

रसोई की अवस्था साधना के फल को क्यों प्रभावित करती है?

रसोई पितरों का स्थान

· 46:03–46:57 · Also a question

क्योंकि रसोई घर में पितरों का स्थान होता है। रात भर झूठे बर्तन पड़े रहने से वे किलसे रहते हैं — और यह नियम कि अग्नि स्नान के बाद ही प्रज्वलित हो, अधिकतर घरों में यूँ ही टूटता रहता है।

25

इस काल में किसी की निंदा करना साधक को फल से वंचित कर देता है

निंदा का निषेध और मौन का अभ्यास

· 46:58–47:52

निंदा करते रहेंगे तो कुछ नहीं मिलेगा। वक्ता इसकी जगह चुप रहना और मौन रहना सीखने को कहते हैं — मौनी अमावस्या इसी मास में पड़ती है, और जितना मौन रहेंगे उतना पुण्य मिलेगा — तथा जो नियमों को बाईपास करेगा, भगवान भी उसे उसी तरह बाईपास कर देंगे।

26

साधना के मध्य में सीमा का उल्लंघन हो जाए तो क्या करना चाहिए?

साधना के बीच सीमा उल्लंघन का प्रायश्चित

· 47:53–48:53 · Also a question

उसी समय क्षमा याचना कर लें, और अगले दिन सूर्यनारायण को प्रायश्चित्त के रूप में एक लोटा argha अधिक दें — एक की जगह दो — यह कहते हुए कि परिस्थितिवश जाना पड़ा और यह अर्घ उसी के निमित्त है।

27

बिछावन, पादुका, वस्त्र और कंघी साझा क्यों नहीं करने चाहिए?

बिछावन, पादुका और कंघी अलग क्यों रहें

· 48:54–52:06 · Also a question

क्योंकि दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क की गंदगी उसके बैठने से वहाँ के आभामंडल में फैल जाती है, और क्योंकि पैर के नीचे की मिट्टी से मारण प्रयोग होते हैं — यानी वहाँ से भी ऊर्जा निकलती है, और साधक का पुण्य इधर-उधर नहीं जाना चाहिए।

28

साधना के बीच सूतक लग जाए तो क्या करना चाहिए?

साधना के मध्य सूतक और पातक

· 52:07–53:55 · Also a question

जाने की मनाही नहीं है और जाने से कोई दोष नहीं लगता। पर धागे में बना कवच या माला पहले उतार कर जाना है, और लौट कर स्नान के बाद धागा बदल लेना है — जबकि चाँदी की वस्तुओं के लिए केवल स्नान पर्याप्त है।

29

रजस्वला स्त्री के बनाए भोजन का नियम परंपरा के अनुसार कैसे बदलता है?

परंपरा के अनुसार बदलते रजस्वला संबंधी नियम

· 53:56–57:25 · Also a question

इस पर कि साधक किस पंथ में दीक्षित है। वैष्णव गुरुजन इसमें दोष मानते हैं और वैष्णव मंत्रों की साधना करने वाले को उसका पालन करना पड़ेगा; शाक्त और कौल परंपरा में विशेष सोचने की आवश्यकता नहीं, फिर भी उस समय उनके हाथ की सेवा नहीं ली जाती, क्योंकि वे भगवती कामाख्या का स्वरूप हो जाती हैं।

30

साधना काल में बिना नैवेद्य अर्पित किए भोजन करने से दोष लगता है

साधना काल के हर भोजन से पहले नैवेद्य

· 57:26–57:56

जो भी खाया जाए — रोटी हो, कोई अन्य अन्न हो या केवल फलाहार — वह पहले अपने आराध्य को समर्पित होगा और उसके बाद ही साधक स्वयं ग्रहण करेगा। भोजन से पहले नैवेद्य अर्पित करना नित्य नियम में तो है ही, पर साधना काल में इसे छोड़ने से दोष लगता है।

31

इस काल में एकाक्षरी की गंभीर साधना के लिए कितना जप चाहिए?

एकाक्षरी की जप संख्या

· 57:57–1:00:23 · Also a question

चालीस दिन में कम से कम चार लाख — प्रतिदिन 100 माला, लगभग एक घंटा। अभ्यासी साधक प्रतिदिन दो घंटे में आठ लाख कर लें; सोलह लाख अति उत्तम कहा गया है, और अकेला चार लाख एक सामान्य महापुरश्चरण है।

32

क्या दशांश हवन अनिवार्य है, और दैनिक हवन कितना छोटा हो सकता है?

दैनिक हवन जो दो मिनट में हो जाए

· 1:00:24–1:02:17 · Also a question

दशांश की अनिवार्यता नहीं है — कुंभ में जप मात्र से सिद्धि हो जाती है। प्रतिदिन एक माला का हवन पर्याप्त है, और पंचभू संस्कार दो मिनट का है: दो खरिका, लाइन खींचना, मिट्टी रखना, जल छिड़कना, और अग्नि दो बार रखना।

33

वज्र कवच प्रतिदिन 100 पाठ, चालीस दिन में 4,000, और महाशिवरात्रि को समापन

वज्र कवच की संख्या और मंडल का समापन

· 1:02:18–1:04:34

वज्र कवच प्रतिदिन 100 पाठ, चालीस दिन में 4,000 — जिसे जीवन भर के लिए वज्र बन जाना कहा गया है। मंडल का समापन महाशिवरात्रि को थोड़े बृहद हवन और पूर्णाहुति के साथ होता है, और वह दिन भगवान दत्त को समर्पित है।

34

कुंभ भर गणपति साधना किस प्रकार करनी चाहिए?

कुंभ में गणपति साधना की संख्या और तर्पण

· 1:04:35–1:07:23 · Also a question

संकट नाशन गणेश स्तोत्र प्रतिदिन 500 तक, जिससे पूरे काल में लगभग 21,000 हो जाएँ, साथ में दूर्वा अर्पण और द्वादश नामों में से प्रत्येक नाम से चार-चार तर्पण — कुल 48 तर्पण।

35

इस काल में हर घर के लिए बटुक भैरव की साधना क्यों बताई जा रही है?

रक्षा प्रधान देवता के रूप में बटुक भैरव

· 1:07:24–1:12:36 · Also a question

क्योंकि वे रक्षा प्रधान देवता हैं और उनके प्रसन्न होते ही ज्ञात-अज्ञात सभी शत्रुओं का नाश होता है। वक्ता इस काल में बटुक भैरव को घर में सदैव के लिए स्थापित करने को कहते हैं, और काल भैरव को स्थापित करने से मना करते हैं।

36

जहाँ विग्रह न हो, वहाँ त्रिशूल की भैरव के रूप में प्रतिष्ठा कैसे करें?

त्रिशूल की भैरव रूप में प्रतिष्ठा

· 1:12:37–1:14:15 · Also a question

मकर संक्रांति की सुबह पंचगव्य और पंचामृत से स्नान कराएँ, गौ घृत का लेपन करें, देवी सूक्त का पाठ करते हुए गाय के दूध की धार छोड़ें, फिर पोंछ कर इत्र और चंदन लगाएँ, कुमकुम-रोली से श्रृंगार करें, कलावा लपेटें और तीनों शूलों पर एक-एक नींबू लगाएँ।

37

साधक के दाहिनी ओर, या भगवती के बाईं ओर, सामने चार मुख वाला दीपक

त्रिशूल की स्थापना और भैरव पाठ की संख्या

· 1:14:16–1:16:25

साधक के दाहिनी ओर, और जहाँ भगवती का स्थान हो वहाँ उनके बाईं ओर, सामने चार मुख वाला दीपक। आपद उद्धारण बटुक भैरव स्तोत्र सतनाम का रात्रि में 108 पाठ, रात 10 से 1 बजे के बीच, जिससे 4,000 का पुरश्चरण पूरा होता है।

38

क्या साधना के दौरान गृह बंधन किया जा सकता है?

गृह बंधन और साधना एक साथ नहीं

· 1:16:26–1:17:00 · Also a question

नहीं — ये दोनों काम एक साथ नहीं चलेंगे। घर या चौखट का जो बंधन करना है वह साधना आरंभ होने से पहले मकर संक्रांति को कर लेना चाहिए, साधना के बीच में नहीं।

39

केवल हनुमान चालीसा ही सही — इकतालीस दिन प्रतिदिन

इकतालीस दिन के अनुष्ठान के रूप में हनुमान चालीसा

· 1:17:01–1:17:20

जो और कुछ नहीं करेंगे वे इकतालीस दिन प्रतिदिन हनुमान चालीसा ही कर लें — रात्रि कालीन करें तो अत्युत्तम — और वक्ता कहते हैं कि हनुमान जी की कृपा की अनुभूति वे स्वयं कर पाएँगे। नियम पूरा फिर भी रहेगा: ब्रह्मचर्य का पालन और खान-पान का अनुशासन।

40

अनुष्ठान के साथ-साथ आराध्य का नाम दिन भर चलते रहना चाहिए

दिन भर चलने वाला नाम जप

· 1:17:21–1:18:14

जब भी समय मिले — चलते-फिरते, या अजपा जप के रूप में — गुरु मंत्र या अपने आराध्य का नाम चलते रहना चाहिए: भैरव जी के दशनाम, दत्त के द्वादश नाम, भगवती का नाम, और कुछ नहीं तो सीताराम जी का नाम। दो-तीन दिन के डेडिकेशन में यह स्वतः चलने लगता है।

41

दैनिक हवन में बलि के रूप में क्या अर्पित करें, और कौन सी लकड़ी प्रयोग हो?

नींबू की बलि और हवन की समिधा

· 1:18:15–1:19:15 · Also a question

एक नींबू, काट कर पर बिना निचोड़े, अग्निकुंड में ही डाला जाए — यह उनके लिए है जो भैरव साधना के साथ नित्य हवन कर रहे हैं। खैर की लकड़ी सर्वश्रेष्ठ है, उसके बाद गाय के गोबर का उपला, नवग्रह समिधा और बेल की लकड़ी; आम की लकड़ी पर हवन नहीं करना है।

42

साधना के लिए भगवती का कौन सा स्वरूप चुनना चाहिए?

वर्तमान आवश्यकता के अनुसार भगवती का स्वरूप चुनना

· 1:19:16–1:22:21 · Also a question

यदि घर-परिवार इस समय किसी दुविधा या संकट काल से गुजर रहा है तो उन्हीं स्वरूपों की साधना करें जो त्वरित कृपा करके उससे निकाल लें। हर स्वरूप संकट हरता है, पर कुछ स्वरूप प्रमुख रूप से सिद्धि प्रदाता हैं — जैसे महासरस्वती पहले सामर्थ्य और ज्ञान देती हैं।

43

32 नामावली किस विधि से करें, और उसके साथ क्या नहीं करना है?

चक्र विधि से 32 नामावली, बिना पदार्थ सिद्धि के

· 1:22:22–1:23:48 · Also a question

चक्र विधि सामान्य विधि से कहीं श्रेष्ठ है — जागृति बहुत तेजी से होती है और सौ गुना फल कहा गया है। पर मंडल के भीतर किसी पदार्थ की सिद्धि नहीं करनी: 32 गाँठ वाला धागा नहीं लगाना है, जप बस भगवती को समर्पित होता जाए।

44

पैंतालीस दिनों में प्रतिदिन 711 या 712 — अभ्यास हो जाने पर लगभग चार घंटे

45 दिन में 32,000 पाठ का गणित

· 1:23:49–1:25:08

पैंतालीस दिनों में प्रतिदिन 711 या 712 पाठ। अभ्यास हो जाने पर एक घंटे में लगभग 200, यानी प्रतिदिन लगभग चार घंटे — रात 9 बजे से 1:30-2:30 बजे तक, या दो बैठकों में बाँट कर।

45

जो 32,000 जप पूरा कर के भी अनुभव न पाए, उसके लिए वे स्वयं अपने खर्च से विंध्याचल में नवचंडी कराने को कहते हैं

अपने ही दावे के विरुद्ध वक्ता का नवचंडी वाला वचन

· 1:25:09–1:26:30

अपने खर्चे से विंध्याचल में नवचंडी करवाने का। वे कहते हैं कि जो यथार्थ रूप से 32,000 जप पूरा कर के भी कोई अनुभव न पाए वह उन्हें बताए, और वे इसे अपने कहे हुए के प्रायश्चित के रूप में करवाएँगे।

46

32,000 का दशांश 3,200 — प्रत्येक नाम की एक माला आहुति, लगभग 32 दिन का काम

3,200 आहुति का हवन और सामूहिक व्यवस्था

· 1:26:31–1:30:39

32,000 का दशांश 3,200 हुआ — 32 नामों में से प्रत्येक नाम की एक माला आहुति, जो सफेद तिल से घर पर करने पर लगभग 32 दिन ले लेगी। वक्ता इसकी जगह उन साधकों के लिए सामूहिक हवन कराने का प्रस्ताव रखते हैं जिनका जप पूरा हो जाए।

47

विंध्याचल की त्रिकोण यात्रा, मौन रहते हुए, पूरे मार्ग 32 नामावली का जप करते हुए

सामूहिक हवन का विकल्प — त्रिकोण यात्रा

· 1:30:40–1:32:41

हाँ — विंध्याचल में मौन रहते हुए 32 नामावली का जप करते हुए एक त्रिकोण यात्रा पूरी करें, फिर विंध्याचल के कुंड में 32 नामों में से प्रत्येक की एक-एक माला आहुति दें, कुल 32 माला हवन।

48

जयंती मंगला और रात्रि सूक्त का मंत्र — दोनों प्रतिदिन दस माला, 40,000 तक

जयंती मंगला और रात्रि सूक्त की संख्या

· 1:32:42–1:35:45

जयंती मंगला प्रतिदिन रात्रि में दस माला, जिससे 40,000 पूरा होता है — इससे कुलदेवी की कृपा भी मिल जाती है और पितरों का विषय भी निपट जाता है। भगवती विंध्यवासिनी का रात्रि सूक्तम् का प्रथम मंत्र भी उसी दर से।

49

जो कोई अनुशासन नहीं निभाएँगे, उनके लिए क्या रखा गया है?

अंतिम विकल्प — बिना किसी नियम के पंचाक्षरी

· 1:35:46–1:39:06 · Also a question

रुद्राक्ष की माला पर प्रतिदिन 100 से 121 माला पंचाक्षरी, जिससे चार से पाँच लाख जप यानी एक पुरश्चरण हो जाए। न समय बँधा है, न धोती, न हवन, न शुद्धता के नियम; बस स्नान, जब भी करना हो।

50

जिसका परिवार कोई साधना करने ही न दे, वह क्या कर सकता है?

जहाँ घर सहयोग न करे वहाँ नाम जप

· 1:39:07–1:44:04 · Also a question

अपने आराध्य के बारह, सोलह या अठारह नाम कंठस्थ कर लें और सुबह स्नान के बाद से सोने तक चलते-फिरते उन्हीं का जप करते रहें — ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए और कुंभ भर मांस का त्याग करते हुए।

51

क्या साधना आरंभ करने से पहले प्रायश्चित करना चाहिए?

आरंभ से पहले एक दिन का प्रायश्चित

· 1:44:05–1:44:33 · Also a question

हाँ — यह मान कर कि ज्ञात-अज्ञात अपराध हुए हैं, एक दिन का प्रायश्चित्त विधान अवश्य कर लेना चाहिए। इसमें सूर्य भगवान को argha, दान, जप-तप, प्रदक्षिणा या उपवास-व्रत — कुछ भी हो सकता है।

52

हनुमान अष्टोत्तर सतनाम की संपूर्ण सिद्धि किस संख्या से होती है?

हनुमान अष्टोत्तर सतनाम की सिद्धि संख्या

· 1:44:34–1:44:59 · Also a question

मूल सिद्धि दस हजार और संपूर्ण सिद्धि चालीस हजार — ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए तथा खान-पान के नियमों का ध्यान रखते हुए।

53

बिना दीक्षा के कौन से पाठ किए जा सकते हैं?

बिना दीक्षा के खुले पाठ

· 1:45:00–1:45:58 · Also a question

पंचाक्षरी का जप और कामाख्या कवच का पाठ संसार का प्रत्येक स्त्री-पुरुष कर सकता है। भैरव कवच के लिए पहले फल श्रुति पढ़ लें — यदि उसमें कहीं लिखा हो कि बिना गुरु के यह पाठ न करें, तो उसका पाठ मत करिए।

54

बलि के रूप में चढ़ाया गया फल बाद में खाया जा सकता है?

बलि का फल कभी ग्रहण क्यों नहीं किया जाता

· 1:45:59–1:48:13 · Also a question

नहीं — उसे चार या आठ टुकड़ों में काट कर गौ माता को खिला देना चाहिए। योगिनियाँ उसे ग्रहण करती हैं, क्योंकि बलि रक्त की प्रतीक हो जाती है; न चढ़ाने वाला उसे खा सकता है न कोई और, और नींबू की बलि का जूस बना कर पी लेना भी नहीं करना है।

55

कुंभ के शिविर में प्रसाद ग्रहण करने वाले गृहस्थ को वहाँ पैसे अवश्य रखने चाहिए

कुंभ के शिविर में लिए गए प्रसाद का मूल्य

· 1:48:14–1:50:00

दस रुपये दीजिए, सौ दीजिए या एक लाख — राशि खुली है, पर शिविर में प्रसाद या अन्न क्षेत्र का भोजन ग्रहण करने वाले गृहस्थ को वहाँ पैसे अवश्य रखने चाहिए। साधु-संन्यासियों के लिए वह निःशुल्क है; यह नियम गृहस्थ पर लागू होता है।

56

पूरी हो चुकी संख्या को याद रख कर लिए घूमना नहीं, उसे बढ़ाना है

संख्या पूरी हो जाने के बाद क्या करें

· 1:50:01–1:50:41

संख्या याद रखिए और फिर उसे भूल जाइए। जो प्रतिदिन यही दोहराता रहे कि हमने 5,100 कर लिया है, उसका 5,100 से 5,200 हो नहीं रहा — और संख्या तो खर्च भी होती रहती है। निर्देश यह है कि उसे बढ़ाइए, और अपने आराध्य का अनुष्ठान कीजिए।

57

साधना के मध्य ब्रह्मचर्य टूट जाए तो क्या होता है?

अज्ञात अपराध नहीं, पर उग्र मंत्रों में दिक्कत

· 1:50:42–1:51:46 · Also a question

जहाँ संकल्प सकाम था वहाँ उस कामना की पूर्ण पूर्ति नहीं हो पाती। स्वप्न दोष को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया — पर बगलामुखी जैसी उग्र शक्तियों में उससे भी दिक्कत होती है, और यही कारण है कि गणपति साधना पहले अनिवार्य है।

58

साधना के दौरान आकर्षण उत्पन्न हो जाए तो उसका क्या अर्थ है?

आकर्षण को परीक्षा के रूप में पढ़ना

· 1:51:47–1:55:38 · Also a question

कि साधक अब भगवती की दृष्टि में आ चुका है और उनकी योगिनियाँ उसकी परीक्षा लेनी आरंभ कर चुकी हैं। और जहाँ कुछ हो ही नहीं रहा, वक्ता उसे यह पढ़ते हैं कि साधना का प्रभाव अभी आराध्य तक पहुँचा ही नहीं है।

59

जो पूरे काल घर पर नहीं रह सकते, वे छोटे पर्वकालों में ही एक पुरश्चरण कर लें

काम से आते-जाते रहने वालों के लिए घटाया हुआ पुरश्चरण

· 1:55:39–1:57:08

गुप्त नवरात्रि जैसा कोई पर्वकाल पकड़ कर उसी में एक पुरश्चरण पूरा कर लें — जहाँ पंचाक्षरी का पाँच लाख संभव न हो वहाँ सवा लाख, और जहाँ 32,000 संभव न हो वहाँ 10,000। बात यही है कि यह समय व्यर्थ न जाए।

60

जहाँ घर में उपदेवी-देवता स्थापित हों, वहाँ वह साधना घर पर करने से परेशानी बढ़ सकती है

घर के उपदेवता और अतृप्त पितृ

· 1:57:09–2:03:10

घर पर करने से साधक को दिक्कत देगा। जहाँ उपदेवता स्थापित हों और कुल के पितरों की गति न हुई हो — और त्रिपिंडी श्राद्ध अभी संभव न हो — वहाँ वक्ता कहते हैं कि वह साधना घर में करने से परेशानी शांत होने के बजाय बढ़ सकती है।

61

64 योगिनी और कामाख्या कवच धारण करने के साथ कौन से आचरण-नियम आते हैं?

कवच धारण करने के साथ आने वाले आचरण-नियम

· 2:03:11–2:07:08 · Also a question

64 योगिनी कवच धारण करके किसी भी स्त्री को अकारण प्रताड़ित करने वाले का विनाश तय बताया गया है। कामाख्या कवच में यही शर्त पत्नी के संबंध में है, रजस्वला की अवस्था सहित।

62

वही भगवती स्वतंत्र महाशक्ति के रूप में भी हैं और योगिनी मंडल के भीतर भी

भगवती के स्वतंत्र और योगिनी — दोनों स्वरूप

· 2:07:09–2:07:54

दोनों, और इसमें कोई विरोध नहीं है। वज्रेश्वरी माँ जगदंबा का साक्षात स्वरूप भी हैं और योगिनी स्वरूप में भी हैं; भगवती काली स्वतंत्र रूप से महाशक्ति भी हैं और भगवती के मंडल में तथा 64 योगिनियों में भी पूजित मिलती हैं।

63

कौन सा कवच सबसे अधिक प्रभाव देगा, और सिद्ध पंचमुखी हनुमान कवच क्या करता है

कवच का प्रभाव समर्पण से तय होता है

· 2:07:55–2:10:59

साधक जिनको समर्पित है, उन्हीं का कवच प्रभाव देगा, क्योंकि मंत्र, मणि और औषधि मन के भाव के अनुसार प्रभाव देते हैं। श्रद्धा और समर्पण न हो तो 5,000 तो क्या, 50,000 जप करके जाने पर भी कुछ नहीं होगा।

64

संकल्प के मध्य माला टूट जाए तो क्या करना चाहिए?

माला टूटने का प्रायश्चित

· 2:11:00–2:12:14 · Also a question

माला को पुनः गुथवा कर उसकी प्रतिष्ठा कर लें, और फिर प्रायश्चित्त के रूप में कम से कम ग्यारह माला जप तथा हवन कर के आगे बढ़ें।

65

जिन स्त्रियों के बीच में पाँच-सात दिन छूट जाते हैं, वे अपनी संख्या कैसे पूरी करें?

महाशिवरात्रि के बाद संख्या को बढ़ा कर पूरा करना

· 2:12:15–2:13:25 · Also a question

महाशिवरात्रि के बाद उतने ही पाँच-सात दिन बढ़ा कर। वे दिन संकल्प के भीतर ही माने जाएँगे और संकल्प खंडित नहीं होगा।

66

कुंभ जाने वाले के सामने सबसे पहली परीक्षा कौन सी है?

कुंभ में पहली परीक्षा स्वाद की

· 2:13:26–2:13:53 · Also a question

स्वाद की। वक्ता जाने वालों से कहते हैं कि जीभ और मन पर नियंत्रण रख कर जाइएगा, क्योंकि वहाँ खाने की सामग्री ऐसी सज-सज कर लगी रहेगी कि जाने वाला कहेगा कि साधना अगले कुंभ में कर लेंगे, इस बार खा लेते हैं।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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