भगवान स्कंद और मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग — शिव महापुराण का गणेश-कार्तिकेय विवाह अध्याय

शिव महापुराण की गणेश-कार्तिकेय विवाह प्रतियोगिता, कार्तिकेय का क्रौंच पर्वत पर जाना और मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति की कथा, साथ में माता-पिता की सेवा और पुत्र वियोग के उपाय पर वक्ता की शिक्षाएँ।

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The notes
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01

विवाह के दोष दूर करने के लिए पुराणों की विवाह कथाओं का पाठ

सप्तम भाव, वैधव्य और विलंब के दोषों का उपाय

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:28–04:34

वक्ता कहते हैं कि जिसकी कुंडली में विवाह से जुड़ा कोई दोष हो — सप्तम भाव दोषयुक्त हो, वहाँ प्रेत-पिशाच का योग हो, पितृ दोष हो, ग्रहण दोष हो, कन्या या पुरुष की कुंडली में वैधव्य का योग हो, विवाह में देरी हो, या विवाह के बाद पति-पत्नी में से कोई बहुत बीमार रहता हो — उसे पुराणों में जो विवाह की कथाएँ हैं उनका पाठ करना चाहिए। वे कहते हैं कि दोष जड़ से खत्म हो जाता है और स्वास्थ्य में लाभ होता है; अकाल मृत्यु और वैधव्य के दोष भी दूर होते हैं। यह केवल शिव-पार्वती या गणेश-कार्तिकेय नहीं, अपने आराध्य की विवाह कथा पर भी लागू होता है।

02

गणेश-कार्तिकेय विवाह की स्पर्धा: पृथ्वी की परिक्रमा बनाम माता-पिता की परिक्रमा

दिव्य लीला के साधन के रूप में लोकाचार

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:35–09:06

वक्ता रुद्र संहिता के कुमार खंड का अंतिम अध्याय सुनाते हैं: जब शिव-पार्वती अपने पुत्रों को विवाह योग्य समझते हैं, तो गणेश और कार्तिकेय दोनों पहले विवाह पर अड़ जाते हैं, और माता-पिता शर्त रखते हैं कि जो पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा उसी का विवाह पहले होगा। कार्तिकेय तुरंत निकल पड़ते हैं; गणेश, जो कोस भर भी नहीं चल सकते, स्नान करके माता-पिता को आसन पर बैठाते हैं, उनका पूजन करते हैं, सात परिक्रमा और सात साष्टांग प्रणाम करते हैं, फिर विवाह माँगते हैं — और जब कुमार की तरह पृथ्वी की परिक्रमा करने को कहा जाता है, तो उत्तर देते हैं कि माता-पिता के पूजन और परिक्रमा से उन्होंने अपनी बुद्धि से समुद्र पर्यंत पृथ्वी की सात परिक्रमा कर ली है। वक्ता बताते हैं कि ग्रंथ बार-बार कहता है कि यह "लोकाचार का आश्रय लेकर" हुआ: वास्तव में कोई विवाद नहीं था, पूरी लीला समाज के लिए एक संदेश है।

03

पुत्र के लिए माता-पिता और स्त्री के लिए पति ही सबसे बड़ा तीर्थ

माता-पिता की परिक्रमा और सेवा पूरी पृथ्वी के तीर्थ के बराबर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:07–11:13

वक्ता कहते हैं कि वेद और धर्मशास्त्र कहते हैं कि जो माता-पिता का पूजन करके उनकी परिक्रमा करता है उसे पूरी पृथ्वी की परिक्रमा का फल मिलता है, और माता-पिता के चरण-कमल ही पुत्र के लिए महान तीर्थ हैं — अन्य तीर्थ दूर हैं, यह पास है। पुत्र के लिए माता-पिता और स्त्री के लिए पति ही घर में सर्वोत्तम तीर्थ हैं; पत्नी पति की सेवा से और पुत्र माता-पिता की सेवा से तीर्थ का फल पाता है। वे ग्रंथ की चेतावनी जोड़ते हैं: जो माता-पिता को घर छोड़कर तीर्थ यात्रा पर जाता है उसे उन दोनों के वध का पाप लगता है, इसलिए यदि माता-पिता सक्षम हों तो उन्हें साथ लिए बिना कभी न जाएँ। शरीर, धन और बुद्धि से यथाशक्ति माता-पिता की सेवा के बाद ही तीर्थ आते हैं।

04

संकट में घबराने के बजाय बुद्धि को जागृत रखना

गणेश जी की निर्मल बुद्धि की पार्वती जी द्वारा प्रशंसा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 11:14–13:22

वक्ता गणेश जी के तर्क के बाद पार्वती जी की प्रशंसा सुनाते हैं: तुझमें निर्मल बुद्धि उत्पन्न हुई है, और संकट आने पर भी जिसकी बुद्धि में विशेषता बनी रहती है उसका दुख वैसे ही दूर हो जाता है जैसे सूर्योदय से अंधकार। वे ज़ोर देते हैं कि यह सबके लिए है: संकट सब पर आता है, और दिक्कत तब होती है जब कोई घबराकर, हतोत्साहित होकर बुद्धि से विचार करना छोड़ देता है — वे याद दिलाते हैं कि एक खरगोश ने मदोन्मत्त सिंह को कुएँ में गिरा दिया था। पार्वती जी कहती हैं कि गणेश ने बालक के लिए बताया गया धर्म निभाया है, और माता-पिता उनकी बात को अंतिम मान लेते हैं।

05

गणेश जी की पत्नियाँ सिद्धि और बुद्धि तथा पुत्र शुभ और लाभ

प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियाँ; क्षेम और लाभ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 13:23–14:53

वक्ता कहते हैं कि प्रजापति मनु और दक्ष के अलावा एक प्रजापति विश्वरूप हैं, जिनकी दो पुत्रियों भगवती सिद्धि और भगवती बुद्धि — जिन्हें सब ऋद्धि-सिद्धि कहते हैं — का विवाह धूमधाम से गणेश जी से हुआ। गणेश जी के दो पुत्र शुभ-लाभ हैं, जिन्हें पुराणों में क्षेम और लाभ भी कहा जाता है: सिद्धि से क्षेम (शुभ) और बुद्धि से लाभ। इससे शिव-पार्वती दादा-दादी बने और उनकी गृहस्थी पूर्ण हो गई।

06

कार्तिकेय जी कैलाश छोड़कर दक्षिण के क्रौंच पर्वत पर क्यों गए

सूत्रधार नारद; कार्तिकेय के दक्षिण-वास के पीछे की लीला

· Reviewed Sep 14, 2026 · 14:54–17:34

वक्ता कहते हैं कि जब कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा से लौटे, तो नारद जी — जिन्हें हर बड़ी घटना से पहले सूत्रधार बनाया जाता है, इसीलिए वे भगवान का मन कहलाते हैं — शिव-प्रेरणा से उन्हें बताते हैं कि माता-पिता ने परिक्रमा का बहाना बनाकर गणेश जी का विवाह कर दिया, जिनकी अब दो पत्नियाँ और दो पुत्र हैं। कार्तिकेय जी क्रोध में माता-पिता को प्रणाम करके, उनके रोकने पर भी, कैलाश त्यागकर दक्षिण के क्रौंच पर्वत पर चले गए और सदा कुमार ही रहे; कुमार नाम पाप नष्ट करता है और ब्रह्मचर्य देता है। वक्ता पूरी लीला को गहरे रहस्य की बात कहते हैं: इसने मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की नींव रखी, त्रिपुर वध में तारकासुर के तीन पुत्रों के विरुद्ध शिव के कार्यों से जुड़ी थी, और कार्तिकेय को दक्षिण भेजने की युक्ति थी, वरना वहाँ उपद्रव मचाते असुर सनातन की हानि करते रहते — इसीलिए वे आज भी दक्षिण में हैं।

07

कार्तिकेय जी के कुमार स्थान पर रजस्वला आयु की स्त्रियों पर प्रतिबंध

क्रौंच विग्रह सदा कुमार; वल्ली और देवसेना अन्य अवतारों की

· Reviewed Sep 14, 2026 · 17:35–18:51

वक्ता कहते हैं कि कार्तिकेय जी का जो साक्षात विग्रह क्रौंच पर्वत पर गया वह आज भी कुमार स्वरूप में है, जबकि स्कंद पुराण से ज्ञात उनका विवाह और प्रेमिका — श्रीवल्ली और भगवती देवसेना — उनके अन्य अवतारों का विषय है, जिन्होंने विवाह किया। चूँकि वहाँ भगवान की इसी कुमार रूप में पूजा होती है, कहा गया है कि 13 वर्ष से अधिक की जिस कन्या का रजोनिवृत्ति न हुआ हो वह उस स्थान पर न जाए। वे कहते हैं कि दक्षिण भारत के मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश पर जो बड़ा बवाल हुआ, उसका यही कारण था।

08

शिव के तेज से उत्पन्न स्कंद: पौरुष, बल और ब्रह्मचर्य में अग्रगण्य

स्कंद साक्षात शिव, जैसे गणेश साक्षात भगवती

· Reviewed Sep 14, 2026 · 18:52–19:44

वक्ता कहते हैं कि पौरुष, उग्रता, बल, ब्रह्मचर्य और रक्त से जुड़े हर विषय में कुमार का नाम अग्रगण्य है। कार्तिकेय साक्षात शिव के तेज से उत्पन्न हुए हैं: जैसे भगवती के पूरे शरीर के रोमकूपों के उबटन से बने गणपति साक्षात भगवती के विग्रह हैं, वैसे ही शिव के तेज से उत्पन्न कुमार स्कंद साक्षात शिव ही हैं। दोनों की, वे कहते हैं, अपनी-अपनी विशेषता है।

09

क्रौंच पर्वत पर कार्तिक पूर्णिमा को कार्तिकेय जी का दर्शन

कार्तिक मास कार्तिकेय के नाम पर; कृत्तिका नक्षत्र से पुण्य बढ़ता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 19:45–20:37

वक्ता कहते हैं कि नारायण का सबसे प्रसिद्ध मास कार्तिक मास कार्तिकेय जी के नाम पर पड़ा, क्योंकि नारायण को भी कार्तिकेय जी से अत्यंत प्रेम रहा है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन जितने तीर्थ, देवता, देवी, ऋषि-मुनि और सिद्ध हैं, सब कुमार के दर्शन के लिए क्रौंच पर्वत पर जाते हैं। यदि कार्तिक पूर्णिमा को कृत्तिका नक्षत्र पड़ जाए, तो वह तिथि इतनी पुण्यमय हो जाती है कि उस दिन कुमार कार्तिकेय का दर्शन करने से समस्त पाप भस्म हो जाते हैं और सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं।

10

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग: शिव-पार्वती के वियोग से उत्पत्ति और बार-बार पुत्र खोने वाले दंपति का उपाय

पुत्र वियोग के लिए मल्लिकार्जुन संकल्प से रुद्राभिषेक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 20:38–22:37

वक्ता कहते हैं कि स्कंद के वियोग से दुखी पार्वती जी ने शिव जी से भी वहाँ चलने को कहा, और दोनों एक स्वरूप में क्रौंच पर्वत पर जाकर मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुए — ज्योतिर्लिंगों के क्रम में सोमनाथ के बाद दूसरा। चूँकि यह पुत्र के वियोग और पुत्र के अत्यधिक स्नेह से प्रकट हुआ, जिसे भी पुत्र वियोग हो — केवल बेटे का घर छोड़ना नहीं, बल्कि जिनके बच्चे गर्भ में या जन्म लेकर मर जाते हों, या कन्या जीवित रहे और पुत्र मर जाए — उसे इसका आश्रय लेना चाहिए; इसके साथ वे घृष्णेश्वर का भी नाम लेते हैं। बार-बार पुत्र खोना किसी प्रकार का शाप है; उपाय यह कि जो भी रुद्राभिषेक कराएँ उसमें संकल्प करवाएँ "भगवान मल्लिकार्जुन महाज्योतिर्लिंग की प्रसन्नता के निमित्त", तब मल्लिकार्जुन अवश्य पुत्र वियोग दूर करते हैं। शिव-पार्वती वहाँ नित्य विराजमान हैं और भक्तों को आज भी दर्शन मिलता है।

11

अमावस्या को शिव और पूर्णिमा को पार्वती कुमार से मिलने जाते हैं

कार्तिकेय का तीन योजन दूर दूसरा प्रस्थान

· Reviewed Sep 14, 2026 · 22:38–23:12

वक्ता कहते हैं कि जब कुमार ने देखा कि पार्वती और शिव क्रौंच पर आ गए हैं, तो वे विरक्त हो गए, क्योंकि हृदय में अभी कष्ट था, और तीन योजन और दूर जाकर रहने लगे — वक्ता का अनुमान है कि वह सबरीमाला का क्षेत्र होना चाहिए। कहा गया है कि पर्व काल में शिव-पार्वती उस स्थान पर सदैव जाते हैं: अमावस्या को शिव जी अवश्य जाते हैं और पूर्णिमा को पार्वती जी कुमार से मिलने जाती हैं।

12

शिव महापुराण के गणेश-कार्तिकेय विवाह अध्याय के पाठ का फल

माता-पिता या पुत्र से हर वियोग के विरुद्ध एक अध्याय

· Reviewed Sep 14, 2026 · 23:13–24:57

वक्ता कहते हैं कि यह अध्याय स्कंद के प्रति शिव-पार्वती का प्रेम दिखाता है और गणेश जी की कथा कहता है, और इसका माहात्म्य यह है कि इस एक अध्याय का प्रतिदिन पाठ किया जाए तो माता-पिता या पुत्र से किसी भी प्रकार का वियोग या दूरी दूर हो जाती है और मार्ग प्रशस्त होता है। जो इसे पढ़ता, पढ़ाता, सुनता, सुनाता है उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं: ब्राह्मण ब्रह्मवर्चस्वी, क्षत्रिय विजयी, वैश्य धन-संपन्न और शूद्र श्रेष्ठ हो जाता है; रोगी रोग से और भयभीत भय से मुक्त होता है, और ऐसा व्यक्ति भूत-प्रेत से पीड़ित नहीं होता। यह पापरहित है, यश, सुख और आयु बढ़ाता है, स्वर्ग, अतुलनीय पुत्र-पौत्र, मोक्षदायक शिव-ज्ञान और शिव-भक्ति देता है; जिन्हें शिव के अद्वैत ज्ञान और कल्याण की कामना हो उन्हें इसे सदा सुनना चाहिए।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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