भगवान स्कंद और मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग — शिव महापुराण का गणेश-कार्तिकेय विवाह अध्याय
शिव महापुराण की गणेश-कार्तिकेय विवाह प्रतियोगिता, कार्तिकेय का क्रौंच पर्वत पर जाना और मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति की कथा, साथ में माता-पिता की सेवा और पुत्र वियोग के उपाय पर वक्ता की शिक्षाएँ।
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विवाह के दोष दूर करने के लिए पुराणों की विवाह कथाओं का पाठ
सप्तम भाव, वैधव्य और विलंब के दोषों का उपाय
वक्ता कहते हैं कि जिसकी कुंडली में विवाह से जुड़ा कोई दोष हो — सप्तम भाव दोषयुक्त हो, वहाँ प्रेत-पिशाच का योग हो, पितृ दोष हो, ग्रहण दोष हो, कन्या या पुरुष की कुंडली में वैधव्य का योग हो, विवाह में देरी हो, या विवाह के बाद पति-पत्नी में से कोई बहुत बीमार रहता हो — उसे पुराणों में जो विवाह की कथाएँ हैं उनका पाठ करना चाहिए। वे कहते हैं कि दोष जड़ से खत्म हो जाता है और स्वास्थ्य में लाभ होता है; अकाल मृत्यु और वैधव्य के दोष भी दूर होते हैं। यह केवल शिव-पार्वती या गणेश-कार्तिकेय नहीं, अपने आराध्य की विवाह कथा पर भी लागू होता है।
गणेश और कार्तिकेय जी के विवाह की कथा में आगे बढ़ने से पहले वक्ता एक बात याद रखने को कहते हैं, जो पुराणों की हर विवाह कथा पर लागू होती है। जिसके जीवन में विवाह से जुड़ा कोई दोष हो — जन्म कुंडली में सप्तम भाव दोषयुक्त हो, वहाँ प्रेत-पिशाच का योग बना हो, पितृ दोष हो, ग्रहण दोष आदि हो, कन्या या पुरुष की कुंडली में वैधव्य का योग हो, विवाह में देरी हो रही हो, या विवाह के बाद पति-पत्नी में से किसी एक की तबीयत बहुत खराब रहती हो — उसे पुराणों में जो विवाह से जुड़े आख्यान हैं उनका पाठ अवश्य करना चाहिए। वे कहते हैं कि इससे यह दोष जड़ से खत्म हो जाता है और स्वास्थ्य में लाभ होता है। यदि अकाल मृत्यु या वैधव्य से जुड़ा कोई दोष बन गया हो, तो वह भी दूर होता है। वे यह भी जोड़ते हैं कि यह केवल शिव-पार्वती या गणेश-कार्तिकेय के विवाह तक सीमित नहीं है: आपके जो भी इष्ट देवता हों, उनके विवाह से जुड़ी कथा सुनना भी उतना ही उचित है।
गणेश-कार्तिकेय विवाह की स्पर्धा: पृथ्वी की परिक्रमा बनाम माता-पिता की परिक्रमा
दिव्य लीला के साधन के रूप में लोकाचार
वक्ता रुद्र संहिता के कुमार खंड का अंतिम अध्याय सुनाते हैं: जब शिव-पार्वती अपने पुत्रों को विवाह योग्य समझते हैं, तो गणेश और कार्तिकेय दोनों पहले विवाह पर अड़ जाते हैं, और माता-पिता शर्त रखते हैं कि जो पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा उसी का विवाह पहले होगा। कार्तिकेय तुरंत निकल पड़ते हैं; गणेश, जो कोस भर भी नहीं चल सकते, स्नान करके माता-पिता को आसन पर बैठाते हैं, उनका पूजन करते हैं, सात परिक्रमा और सात साष्टांग प्रणाम करते हैं, फिर विवाह माँगते हैं — और जब कुमार की तरह पृथ्वी की परिक्रमा करने को कहा जाता है, तो उत्तर देते हैं कि माता-पिता के पूजन और परिक्रमा से उन्होंने अपनी बुद्धि से समुद्र पर्यंत पृथ्वी की सात परिक्रमा कर ली है। वक्ता बताते हैं कि ग्रंथ बार-बार कहता है कि यह "लोकाचार का आश्रय लेकर" हुआ: वास्तव में कोई विवाद नहीं था, पूरी लीला समाज के लिए एक संदेश है।
वक्ता कहते हैं कि यह शिव महापुराण की रुद्र संहिता के कुमार खंड का सबसे अंतिम अध्याय है। गणेश और कार्तिकेय जी के जन्म और तारकासुर के वध के आख्यान के बाद नारदएक देव-ऋषि, पौराणिक साहित्य में प्रायः प्रश्नकर्ता या श्रोता के रूप में उपस्थित। जी ब्रह्मा जी से पूछते हैं कि इन दोनों का विवाह कैसे हुआ। ब्रह्मा जी बताते हैं कि दोनों कैलाशशिव और पार्वती का पर्वत-निवास। पर शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की तरह बड़े हुए, दोनों माता-पिता की सेवा करते थे, और पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। और शिव, जिन्हें उनसे बहुत स्नेह था, विचार करते हैं कि पुत्र अब विवाह योग्य हो गए हैं। जब पुत्रों को यह पता चलता है, तो दोनों लोकाचार की तरह "पहले मेरा विवाह होगा" कहकर बार-बार विवाद करने लगते हैं। वक्ता ध्यान दिलाते हैं कि ग्रंथ में बार-बार "लोकाचार की रीति का आश्रय लेकर" लिखा आता है: वास्तव में ऐसा कोई विषय नहीं है, लेकिन भगवान को अपनी लीला के माध्यम से समाज और सनातन संस्कृति को संदेश देना है, इसलिए वे लोकाचार का आश्रय लेते हैं। माता-पिता फिर वह प्रसिद्ध युक्ति रचते हैं: तुम दोनों हमें समान रूप से प्रिय हो, अतः एक कल्याणप्रद शर्त है — जो पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा उसी का विवाह पहले होगा। कार्तिकेय जी तुरंत चल पड़ते हैं। बुद्धिमान गणपति जी सोचते हैं: मैं तो लाँघ भी नहीं सकता, कोस भर चलने के बाद फिर चल नहीं सकता, इस पृथ्वी की परिक्रमा से मुझे कौन सा सुख मिलेगा? गणेश जी विधिपूर्वक स्नान करके घर आते हैं और माता-पिता से कहते हैं कि पूजा के लिए स्थापित आसन पर बैठकर मेरा मनोरथ पूर्ण कीजिए। वे दोनों का पूजन करते हैं, सात बार परिक्रमा और सात बार साष्टांग प्रणाम करते हैं, हाथ जोड़कर स्तुति करते हैं, और कहते हैं: हे माता, हे पिता, अब शीघ्र मेरा विवाह कर दीजिए। वे कहते हैं कि तुम भी वन सहित पृथ्वी की ठीक-ठीक परिक्रमा करो, कुमार गया हुआ है, तुम भी जाओ और पहले चले आओ। गणेश जी संयमित भी और कुपित भी होकर कहते हैं: आप दोनों धर्मरूप और अत्यंत विद्वान हैं, मेरी धर्मसम्मत बात सुनिए — मैंने सात बार पृथ्वी की परिक्रमा कर ली है। लौकिक रीति का आश्रय लेकर वे पूछते हैं: हे पुत्र, सात द्वीप वाली, समुद्र पर्यंत फैली, घोर जंगलों से भरी इस पृथ्वी की परिक्रमा तुमने कब की? गणेश जी उत्तर देते हैं कि आप दोनों माता-पिता शिव और शिवा का पूजन करके मैंने अपनी बुद्धि से समुद्र पर्यंत पृथ्वी की परिक्रमा कर ली है — और ऐसा वचन वेदों, शास्त्रों और धर्मशास्त्रों में विद्यमान है।
पुत्र के लिए माता-पिता और स्त्री के लिए पति ही सबसे बड़ा तीर्थ
माता-पिता की परिक्रमा और सेवा पूरी पृथ्वी के तीर्थ के बराबर
वक्ता कहते हैं कि वेद और धर्मशास्त्र कहते हैं कि जो माता-पिता का पूजन करके उनकी परिक्रमा करता है उसे पूरी पृथ्वी की परिक्रमा का फल मिलता है, और माता-पिता के चरण-कमल ही पुत्र के लिए महान तीर्थ हैं — अन्य तीर्थ दूर हैं, यह पास है। पुत्र के लिए माता-पिता और स्त्री के लिए पति ही घर में सर्वोत्तम तीर्थ हैं; पत्नी पति की सेवा से और पुत्र माता-पिता की सेवा से तीर्थ का फल पाता है। वे ग्रंथ की चेतावनी जोड़ते हैं: जो माता-पिता को घर छोड़कर तीर्थ यात्रा पर जाता है उसे उन दोनों के वध का पाप लगता है, इसलिए यदि माता-पिता सक्षम हों तो उन्हें साथ लिए बिना कभी न जाएँ। शरीर, धन और बुद्धि से यथाशक्ति माता-पिता की सेवा के बाद ही तीर्थ आते हैं।
वक्ता बताते हैं कि गणेश जी के दावे के पीछे वेद-शास्त्र क्या कहते हैं: जो माता-पिता का पूजन करके उनकी परिक्रमा कर लेता है, उसे निश्चित रूप से वही फल मिलता है जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा से मिलता है। माता-पिता की सात परिक्रमा कर लेने मात्र से गणेश जी की पृथ्वी की सात प्रदक्षिणा हो गई — यह, वे कहते हैं, शास्त्रों का कथन है। फिर वे इस प्रसंग के एक और संदेश की ओर ध्यान दिलाते हैं और सबको ध्यान से सुनने को कहते हैं। जो माता-पिता को घर में छोड़कर तीर्थ स्थान में जाता है, उसे वैसा ही पाप लगता है जो उन दोनों के वध से लगता है। यदि माता-पिता जीवित और सक्षम हों, तो उन्हें छोड़कर कभी तीर्थ यात्रा नहीं करनी चाहिए; उन्हें साथ लेकर ही जाना चाहिए। उन्हें छोड़कर जाएँ तो वध के समान ही पाप लगता है। वे कहते हैं कि ग्रंथ आगे कहता है कि माता-पिता के चरण-कमल ही पुत्र के लिए महान तीर्थ हैं। अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर मिलते हैं; यह तीर्थ पास रहकर सभी प्रकार के सुलभ धर्मों का साधन है। पुत्र के लिए माता-पिता और स्त्री के लिए पति ही घर में सर्वोत्तम तीर्थ हैं: पत्नी पति की सेवा करके तीर्थ सेवा का फल पा सकती है, और पुत्र माता-पिता की सेवा करके घर में ही तीर्थ का लाभ पा सकता है। गणेश जी शास्त्र और धर्म का आश्रय लेकर माता-पिता से कहते हैं कि वेद निरंतर ऐसा कहते हैं और आपको भी यही करना चाहिए, अन्यथा वे असत्य हो जाएँगे — आपका स्वरूप ही असत्य हो जाएगा और तब वेद भी असत्य हो जाएँगे। अतः, वे कहते हैं, शीघ्र मेरा विवाह कीजिए या वेदों और शास्त्रों को मिथ्या कहिए। वक्ता कहते हैं कि बुद्धि के निदान गणपति जी ने किस कुशलता से अपना पक्ष रखा, और संदेश निकालते हैं: माता-पिता से बढ़कर तीर्थ नहीं है; माता-पिता की सेवा के बाद ही तीर्थ आते हैं। जितना सामर्थ्य हो — शरीर से, धन से, बुद्धि से, हर प्रकार से — माता-पिता की सेवा करनी चाहिए।
संकट में घबराने के बजाय बुद्धि को जागृत रखना
गणेश जी की निर्मल बुद्धि की पार्वती जी द्वारा प्रशंसा
वक्ता गणेश जी के तर्क के बाद पार्वती जी की प्रशंसा सुनाते हैं: तुझमें निर्मल बुद्धि उत्पन्न हुई है, और संकट आने पर भी जिसकी बुद्धि में विशेषता बनी रहती है उसका दुख वैसे ही दूर हो जाता है जैसे सूर्योदय से अंधकार। वे ज़ोर देते हैं कि यह सबके लिए है: संकट सब पर आता है, और दिक्कत तब होती है जब कोई घबराकर, हतोत्साहित होकर बुद्धि से विचार करना छोड़ देता है — वे याद दिलाते हैं कि एक खरगोश ने मदोन्मत्त सिंह को कुएँ में गिरा दिया था। पार्वती जी कहती हैं कि गणेश ने बालक के लिए बताया गया धर्म निभाया है, और माता-पिता उनकी बात को अंतिम मान लेते हैं।
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्मा जी बताते हैं कि गणेश जी की बात सुनकर पार्वती जी मौन हो गईं, फिर अपने पुत्र की प्रशंसा करते हुए बोलीं: हे पुत्र, तुझ महात्मा में निर्मल बुद्धि उत्पन्न हुई है; तुमने जो कहा वह सत्य ही है, इसमें संदेह नहीं। संकट उपस्थित होने पर भी जिसकी बुद्धि में विशेषता बनी रहती है, उसका दुख उसी तरह दूर हो जाता है जैसे सूर्य के उदय होने पर अंधकार दूर हो जाता है। वक्ता ध्यान देने को कहते हैं, क्योंकि यह विषय हम सबके लिए है। संकट सब पर आता है। भगवती कह रही हैं कि संकट आने पर भी बुद्धि में विशेषता बनी रहे — यानी बुद्धि ऐसी रहे कि संकट से निकलने के लिए क्या विचार-विवेक लगाना है, वह जागृत रहे। संकट में जब कोई बहुत घबराकर, हतोत्साहित होकर बुद्धि से विचार करना छोड़ देता है, तब बहुत दिक्कत होती है; ऐसे व्यक्ति की बुद्धि को बल कहाँ से मिलेगा? वे याद दिलाते हैं कि किसी खरगोश ने एक मदोन्मत्त सिंह को कुएँ में गिरा दिया था। भगवती आगे कहती हैं: वेद, शास्त्रों और पुराणों में बालक के लिए जो धर्म पालन बताया गया है, तुमने अवश्य उसका पालन किया है; तुमने जो सम्यक कार्य किया, उसे कोई नहीं कर सकता। हम दोनों ने तुम्हारी बात मान ली, अब उसे अन्यथा नहीं किया जा सकता। इस तरह गणेश जी को आश्वस्त कर दिया गया कि उनका विवाह होगा।
गणेश जी की पत्नियाँ सिद्धि और बुद्धि तथा पुत्र शुभ और लाभ
प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियाँ; क्षेम और लाभ
वक्ता कहते हैं कि प्रजापति मनु और दक्ष के अलावा एक प्रजापति विश्वरूप हैं, जिनकी दो पुत्रियों भगवती सिद्धि और भगवती बुद्धि — जिन्हें सब ऋद्धि-सिद्धि कहते हैं — का विवाह धूमधाम से गणेश जी से हुआ। गणेश जी के दो पुत्र शुभ-लाभ हैं, जिन्हें पुराणों में क्षेम और लाभ भी कहा जाता है: सिद्धि से क्षेम (शुभ) और बुद्धि से लाभ। इससे शिव-पार्वती दादा-दादी बने और उनकी गृहस्थी पूर्ण हो गई।
वक्ता कहते हैं कि प्रजापतियों में हम मनु और दक्ष प्रजापति को जानते हैं। जिनकी पुत्रियों से गणेश जी का विवाह हुआ, वे भी एक प्रजापति हैं, जिनका नाम विश्वरूप है। उनकी दो पुत्रियाँ भगवती सिद्धि और भगवती बुद्धि हैं — जिन्हें हम सब ऋद्धि-सिद्धिगणेश जी की दो अर्धांगिनी, समृद्धि व सिद्धि की प्रतीक। कहते हैं। उन दोनों के साथ गणेश जी का विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ। गणेश जी के दो पुत्र हुए, शुभ-लाभगणेश जी के दो पुत्र, शुभता व लाभ के प्रतीक।, जिन्हें हम सब जानते हैं; पुराणों में इन्हें क्षेम और लाभ भी कहा जाता है। सिद्धि नामक पत्नी से क्षेम यानी शुभ और बुद्धि नामक पत्नी से लाभ नामक पुत्र उत्पन्न हुए। इस प्रकार, वक्ता कहते हैं, गणेश जी का विवाह हुआ और दो पुत्र भी हुए — यानी शिव-पार्वती दादा-दादी बन गए और उनकी गृहस्थी पूर्ण हो गई। वे टिप्पणी करते हैं कि प्रत्यक्ष रूप से देखा जाए तो एकमात्र भगवान शिव ही सामान्य रूप से दादा-दादी हैं: माता-पिता भी बने और दादा-दादी भी।
कार्तिकेय जी कैलाश छोड़कर दक्षिण के क्रौंच पर्वत पर क्यों गए
सूत्रधार नारद; कार्तिकेय के दक्षिण-वास के पीछे की लीला
वक्ता कहते हैं कि जब कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा से लौटे, तो नारद जी — जिन्हें हर बड़ी घटना से पहले सूत्रधार बनाया जाता है, इसीलिए वे भगवान का मन कहलाते हैं — शिव-प्रेरणा से उन्हें बताते हैं कि माता-पिता ने परिक्रमा का बहाना बनाकर गणेश जी का विवाह कर दिया, जिनकी अब दो पत्नियाँ और दो पुत्र हैं। कार्तिकेय जी क्रोध में माता-पिता को प्रणाम करके, उनके रोकने पर भी, कैलाश त्यागकर दक्षिण के क्रौंच पर्वत पर चले गए और सदा कुमार ही रहे; कुमार नाम पाप नष्ट करता है और ब्रह्मचर्य देता है। वक्ता पूरी लीला को गहरे रहस्य की बात कहते हैं: इसने मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की नींव रखी, त्रिपुर वध में तारकासुर के तीन पुत्रों के विरुद्ध शिव के कार्यों से जुड़ी थी, और कार्तिकेय को दक्षिण भेजने की युक्ति थी, वरना वहाँ उपद्रव मचाते असुर सनातन की हानि करते रहते — इसीलिए वे आज भी दक्षिण में हैं।
वक्ता बताते हैं कि गणेश जी के विवाह के बाद कार्तिकेय जी परिक्रमा पूरी करके अपने महल में लौटे। यहाँ नारदएक देव-ऋषि, पौराणिक साहित्य में प्रायः प्रश्नकर्ता या श्रोता के रूप में उपस्थित। जी आते हैं, और वक्ता एक पैटर्न पर ध्यान दिलाते हैं: जब भी कोई बहुत बड़ी घटना घटने वाली होती है, नारद जी को सूत्रधार बनाया जाता है — जो भी बीज बोना होता है नारद जी ही बोते हैं, इसीलिए उन्हें भगवान का मन कहा गया है। शिव-प्रेरणा से नारद जी कार्तिकेय जी के पास पहुँचकर कहते हैं: मैं यथार्थ कह रहा हूँ, न छल से न मत्सर से — तुम्हारे माता-पिता ने जो किया वह इस लोक में कोई नहीं कर सकता। पृथ्वी की परिक्रमा का बहाना बनाकर उन्होंने तुम्हें घर से बाहर निकालकर गणेश जी का शोभन विवाह कर दिया; उन्हें प्रजापति विश्वरूप की दो रत्नरूपा कन्याएँ पत्नी रूप में मिलीं और उनसे दो पुत्र भी हुए, और वे माता-पिता के घर में सुखों का उपभोग कर रहे हैं। छलपूर्वक दी गई माता-पिता की आज्ञा से तुमने समुद्र-वन सहित पृथ्वी की परिक्रमा तो कर डाली, लेकिन तुम्हें यह फल मिला। वक्ता जोड़ते हैं कि नारद जी नीति सूत्र और स्मृति शास्त्र का आश्रय लेकर और भी बहुत कुछ कहते हैं कि माता-पिता ने अनुचित किया है। नारद जी के मौन होने पर कार्तिकेय अत्यंत क्रोध में माता-पिता के पास गए, उन्हें प्रणाम किया और कैलाशशिव और पार्वती का पर्वत-निवास। का त्याग कर दिया। शिव-पार्वती मना करते और रोकते रह गए, लेकिन वे दक्षिण दिशा में क्रौंच पर्वत पर चले गए और वहीं रहने लगे। कहा गया है कि दर्शन मात्र से सबका पाप हरने वाले कुमार कार्तिकेय आज भी वहीं हैं। उस दिन से शिवपुत्र कुमार ही रह गए; तीनों लोकों में प्रसिद्ध यह नाम सुखदायक, सब पापों को नष्ट करने वाला, पुण्यरूप और ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। प्रदान करने वाला है। वक्ता ने पहले ही, इसे गहरे रहस्य की बात कहकर, बताया था कि कार्तिकेय जी के साथ रची जा रही यह लीला मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की नींव रख रही थी। इसका संबंध त्रिपुर वध के समय शिव के विशेष कार्यों — तारकासुर के तीन पुत्रों — से भी है, और यह लीला कार्तिकेय को दक्षिण भेजने के लिए रची गई थी: यदि वे वहाँ न जाते, तो असुरों के उपद्रव से सनातन की सदैव हानि होती रहती। इसीलिए, वे कहते हैं, कार्तिकेय जी आज भी दक्षिण क्षेत्र में हैं; यह कोई सामान्य विषय नहीं रहा।
कार्तिकेय जी के कुमार स्थान पर रजस्वला आयु की स्त्रियों पर प्रतिबंध
क्रौंच विग्रह सदा कुमार; वल्ली और देवसेना अन्य अवतारों की
वक्ता कहते हैं कि कार्तिकेय जी का जो साक्षात विग्रह क्रौंच पर्वत पर गया वह आज भी कुमार स्वरूप में है, जबकि स्कंद पुराण से ज्ञात उनका विवाह और प्रेमिका — श्रीवल्ली और भगवती देवसेना — उनके अन्य अवतारों का विषय है, जिन्होंने विवाह किया। चूँकि वहाँ भगवान की इसी कुमार रूप में पूजा होती है, कहा गया है कि 13 वर्ष से अधिक की जिस कन्या का रजोनिवृत्ति न हुआ हो वह उस स्थान पर न जाए। वे कहते हैं कि दक्षिण भारत के मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश पर जो बड़ा बवाल हुआ, उसका यही कारण था।
वक्ता ध्यान रखने को कहते हैं कि कार्तिकेय जी के विवाह और उनकी प्रेमिका का पूरा विषय उनके अन्य अवतारों का है; पूरा स्कंद पुराण आदि पढ़ने पर यह स्पष्ट हो जाता है। श्रीवल्ली, कार्तिकेय जी की प्रेमिका, और भगवती देवसेना के बारे में जो हम पढ़ते हैं वह अलग कथा है: उस कथा के अनुसार अलग रूप में उन्होंने विवाह किया। लेकिन जो भगवान का साक्षात विग्रह है, जो क्रौंच पर्वत पर गया, वह आज भी कुमार स्वरूप में उपस्थित है। चूँकि वहाँ भगवान की इसी कुमार रूप में पूजा होती है, वे कहते हैं, इसलिए कहा गया है कि जो कन्या 13 वर्ष से अधिक की हो और जिसका रजोनिवृत्ति न हुआ हो वह उस स्थान पर न जाए। वे याद दिलाते हैं कि दक्षिण भारत के मंदिर में स्त्रियों को ले जाने को लेकर जो बड़ा बवाल हुआ था, उसका यही कारण रहा है: भगवान वहाँ कुमार स्वरूप में विराजते हैं, और उस दिन से इसी रूप में विराजमान रह गए हैं।
शिव के तेज से उत्पन्न स्कंद: पौरुष, बल और ब्रह्मचर्य में अग्रगण्य
स्कंद साक्षात शिव, जैसे गणेश साक्षात भगवती
वक्ता कहते हैं कि पौरुष, उग्रता, बल, ब्रह्मचर्य और रक्त से जुड़े हर विषय में कुमार का नाम अग्रगण्य है। कार्तिकेय साक्षात शिव के तेज से उत्पन्न हुए हैं: जैसे भगवती के पूरे शरीर के रोमकूपों के उबटन से बने गणपति साक्षात भगवती के विग्रह हैं, वैसे ही शिव के तेज से उत्पन्न कुमार स्कंद साक्षात शिव ही हैं। दोनों की, वे कहते हैं, अपनी-अपनी विशेषता है।
वक्ता ध्यान रखने को कहते हैं कि जितने भी पौरुष से, उग्रता से, बल से, ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। से और रक्त से संबंधित विषय हैं, उनमें कुमार का नाम अग्रगण्य रहता है। कार्तिकेय, वे कहते हैं, साक्षात शिव के तेजदिव्य तेजस्विता या तेजोमय शक्ति — यहां भगवान शिव का वह तेज, जो अंततः कार्तिकेय के रूप में प्रकट हुआ। से उत्पन्न हुए हैं। जिस प्रकार गणपति जी भगवती के समस्त शरीर के रोमकूपों में उपस्थित उबटन से उत्पन्न होकर साक्षात भगवती के विग्रह स्वरूप हैं, उसी प्रकार शिव के तेज से उत्पन्न कुमार स्कंद साक्षात शिव ही हैं। यही, वे कहते हैं, दोनों की अपनी-अपनी विशेषता है।
क्रौंच पर्वत पर कार्तिक पूर्णिमा को कार्तिकेय जी का दर्शन
कार्तिक मास कार्तिकेय के नाम पर; कृत्तिका नक्षत्र से पुण्य बढ़ता है
वक्ता कहते हैं कि नारायण का सबसे प्रसिद्ध मास कार्तिक मास कार्तिकेय जी के नाम पर पड़ा, क्योंकि नारायण को भी कार्तिकेय जी से अत्यंत प्रेम रहा है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन जितने तीर्थ, देवता, देवी, ऋषि-मुनि और सिद्ध हैं, सब कुमार के दर्शन के लिए क्रौंच पर्वत पर जाते हैं। यदि कार्तिक पूर्णिमा को कृत्तिका नक्षत्र पड़ जाए, तो वह तिथि इतनी पुण्यमय हो जाती है कि उस दिन कुमार कार्तिकेय का दर्शन करने से समस्त पाप भस्म हो जाते हैं और सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं।
वक्ता कहते हैं कि भगवान नारायण का सबसे प्रसिद्ध मास कार्तिक मास कार्तिकेय जी के नाम पर पड़ा, क्योंकि भगवान नारायण को भी कार्तिकेय जी से अत्यंत प्रेम रहा है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन, वे कहते हैं, जितने भी तीर्थ हैं, जितने देवता-देवी, ऋषि-मुनि और सिद्ध हैं — सभी कुमार के दर्शन के लिए क्रौंच पर्वत पर जाते हैं। कहा गया है कि यदि कार्तिक पूर्णिमा के दिन कृत्तिकाछह देव-कन्याएं जिन्होंने बालक कार्तिकेय को अपने पुत्र के समान पाला और स्तनपान कराया। नक्षत्र पड़ जाए, तो वह तिथि इतनी पुण्यमय हो जाती है कि उस दिन कुमार कार्तिकेय का दर्शन कर लिया जाए तो समस्त पाप भस्म हो जाते हैं और सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग: शिव-पार्वती के वियोग से उत्पत्ति और बार-बार पुत्र खोने वाले दंपति का उपाय
पुत्र वियोग के लिए मल्लिकार्जुन संकल्प से रुद्राभिषेक
वक्ता कहते हैं कि स्कंद के वियोग से दुखी पार्वती जी ने शिव जी से भी वहाँ चलने को कहा, और दोनों एक स्वरूप में क्रौंच पर्वत पर जाकर मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुए — ज्योतिर्लिंगों के क्रम में सोमनाथ के बाद दूसरा। चूँकि यह पुत्र के वियोग और पुत्र के अत्यधिक स्नेह से प्रकट हुआ, जिसे भी पुत्र वियोग हो — केवल बेटे का घर छोड़ना नहीं, बल्कि जिनके बच्चे गर्भ में या जन्म लेकर मर जाते हों, या कन्या जीवित रहे और पुत्र मर जाए — उसे इसका आश्रय लेना चाहिए; इसके साथ वे घृष्णेश्वर का भी नाम लेते हैं। बार-बार पुत्र खोना किसी प्रकार का शाप है; उपाय यह कि जो भी रुद्राभिषेक कराएँ उसमें संकल्प करवाएँ "भगवान मल्लिकार्जुन महाज्योतिर्लिंग की प्रसन्नता के निमित्त", तब मल्लिकार्जुन अवश्य पुत्र वियोग दूर करते हैं। शिव-पार्वती वहाँ नित्य विराजमान हैं और भक्तों को आज भी दर्शन मिलता है।
वक्ता बताते हैं कि पार्वती जी स्कंद के वियोग से अत्यंत दुखी हुईं और शिव जी से कहा कि आप भी वहीं चलिए — अपना पुत्र चला जाए तो कौन माता दुखी नहीं होगी? इसलिए भगवती पार्वती भगवान शिव के साथ एक स्वरूप में क्रौंच पर्वत पर गईं और वहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुईं — यही मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग है। चूँकि यह ज्योतिर्लिंग पुत्र के वियोग और पुत्र के अत्यधिक स्नेह के कारण वहाँ प्रकट हुआ, जिसे भी किसी कारण से पुत्र का वियोग हो उसे इसका आश्रय अवश्य लेना चाहिए। पुत्र वियोग का अर्थ, वे स्पष्ट करते हैं, केवल बेटे का छोड़कर चले जाना नहीं; जिनके बच्चे गर्भ में या जन्म लेकर मर जाते हों, वे भी इसमें आते हैं। वे दो ज्योतिर्लिंगों का नाम लेते हैं — घृष्णेश्वर और मल्लिकार्जुन — और बताते हैं कि ज्योतिर्लिंगों के क्रम में मल्लिकार्जुन सोमनाथ के बाद दूसरे स्थान पर है। जिस दंपति के साथ ऐसा बार-बार होता हो — कन्या जन्म लेकर जीवित रहे लेकिन पुत्र मर जाए, जैसा कई बार होता है — उसे मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का आश्रय अवश्य लेना चाहिए। यह, वे कहते हैं, किसी न किसी प्रकार का शाप होता है। उपाय: जो भी रुद्राभिषेक आदि कराएँ, उसमें यह संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करवा लें कि "भगवान मल्लिकार्जुन महाज्योतिर्लिंग की प्रसन्नता के निमित्त हम यह रुद्राभिषेक कर रहे हैं।" तब भगवान मल्लिकार्जुन अवश्य कृपा करके पुत्र वियोग दूर कर देते हैं — पार्वती और शिव उस वियोग को दूर कर देते हैं। वे जोड़ते हैं कि वह ज्योतिर्लिंग आज भी प्रतिष्ठित है; वहाँ शिव-पार्वती नित्य विराजमान रहते हैं और भक्तों को आज भी दर्शन मिलता है। ज्योतिर्लिंग क्षेत्र में शिव सदैव कई स्वरूपों में वास करते हैं; वहाँ शिव को देखने की भी आवश्यकता नहीं, उनकी उपस्थिति सदा बनी रहती है।
अमावस्या को शिव और पूर्णिमा को पार्वती कुमार से मिलने जाते हैं
कार्तिकेय का तीन योजन दूर दूसरा प्रस्थान
वक्ता कहते हैं कि जब कुमार ने देखा कि पार्वती और शिव क्रौंच पर आ गए हैं, तो वे विरक्त हो गए, क्योंकि हृदय में अभी कष्ट था, और तीन योजन और दूर जाकर रहने लगे — वक्ता का अनुमान है कि वह सबरीमाला का क्षेत्र होना चाहिए। कहा गया है कि पर्व काल में शिव-पार्वती उस स्थान पर सदैव जाते हैं: अमावस्या को शिव जी अवश्य जाते हैं और पूर्णिमा को पार्वती जी कुमार से मिलने जाती हैं।
वक्ता बताते हैं कि जब कुमार ने देखा कि भगवती पार्वती और भगवान शिव वहाँ आ गए हैं, तो वे विरक्त हो गए, क्योंकि हृदय में अभी कष्ट था। वे पुनः वहाँ से तीन योजन दूर जाकर निवास करने लगे। वक्ता अपना अनुमान रखते हैं कि वह सबरीमाला का क्षेत्र होना चाहिए। फिर, कहा गया है, पर्व काल में शिव-पार्वती उस स्थान पर सदैव जाते रहते हैं। अमावस्या के दिन शिव जी वहाँ अवश्य जाते हैं और पूर्णिमा के दिन भगवती पार्वती कुमार से मिलने जाती हैं।
शिव महापुराण के गणेश-कार्तिकेय विवाह अध्याय के पाठ का फल
माता-पिता या पुत्र से हर वियोग के विरुद्ध एक अध्याय
वक्ता कहते हैं कि यह अध्याय स्कंद के प्रति शिव-पार्वती का प्रेम दिखाता है और गणेश जी की कथा कहता है, और इसका माहात्म्य यह है कि इस एक अध्याय का प्रतिदिन पाठ किया जाए तो माता-पिता या पुत्र से किसी भी प्रकार का वियोग या दूरी दूर हो जाती है और मार्ग प्रशस्त होता है। जो इसे पढ़ता, पढ़ाता, सुनता, सुनाता है उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं: ब्राह्मण ब्रह्मवर्चस्वी, क्षत्रिय विजयी, वैश्य धन-संपन्न और शूद्र श्रेष्ठ हो जाता है; रोगी रोग से और भयभीत भय से मुक्त होता है, और ऐसा व्यक्ति भूत-प्रेत से पीड़ित नहीं होता। यह पापरहित है, यश, सुख और आयु बढ़ाता है, स्वर्ग, अतुलनीय पुत्र-पौत्र, मोक्षदायक शिव-ज्ञान और शिव-भक्ति देता है; जिन्हें शिव के अद्वैत ज्ञान और कल्याण की कामना हो उन्हें इसे सदा सुनना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यह पूरी कथा स्कंद के प्रति शिव-पार्वती के प्रेम को बताती है, और गणेश जी की कथा भी कहती है। इस आख्यान का माहात्म्य यह है कि यदि इसका प्रतिदिन पाठ किया जाए — यह मात्र एक अध्याय है — तो माता-पिता या पुत्र से किसी भी प्रकार का वियोग, किसी भी प्रकार की दूरी दूर हो जाती है; उससे छुटकारा मिलता है और मार्ग प्रशस्त होता है। माहात्म्य कहता है कि जो कोई इस कथा को पढ़ता, पढ़ाता, सुनता या सुनाता है उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं करना चाहिए। ब्राह्मण ब्रह्मवर्चस्वी बन जाता है, क्षत्रिय विजयी होता है, वैश्य धन से संपन्न होता है और शूद्र श्रेष्ठता प्राप्त करता है। रोगी रोग से मुक्त होता है और भयभीत भय से; ऐसा मनुष्य भूत-प्रेत आदि बाधाओं से पीड़ित नहीं होता। यही, वे कहते हैं, कार्तिकेय-मल्लिकार्जुन और गणपति के विवाह का माहात्म्य है। वे आगे कहते हैं कि यह आख्यान पापरहित है, यश और सुख बढ़ाने वाला, आयु में वृद्धि करने वाला, स्वर्ग दिलाने वाला, अतुलनीय पुत्र-पौत्र देने वाला, मोक्षदायक शिव-ज्ञान देने वाला, शिव-शिवा को प्रिय और शिव-भक्ति बढ़ाने वाला है। जिन भक्तों को शिव के अद्वैत ज्ञान और कल्याण की कामना हो, उन्हें इस शिवमय आख्यान का सदा श्रवण करना चाहिए — ऐसा इसके माहात्म्य में वर्णन है। इसके साथ, वे कहते हैं, रुद्र संहिता के कुमार खंड का अंतिम अध्याय पूर्ण हुआ।
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