पूर्वजों का पूजित विग्रह कभी मत हटाइए — और उसके सम्मुख किन रात्रियों में बैठें
पूर्वजों से चले आए पूजित विग्रह हटाइए नहीं, उन्हीं की पूजा कीजिए।
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वे जानकार जो पहले घर का पूजा स्थान खाली करवाते हैं
जब कोई जानकार कहे कि पूजा स्थान खाली करना पड़ेगा, तो क्या पुराने विग्रह हटा देने चाहिए?
नहीं — उनका कारण मनोवैज्ञानिक हो या कोई भी हो, यह गलती कभी नहीं करनी चाहिए। जहाँ परेशानी दिखाने-सुनाने जाते हैं, वहाँ अक्सर बता दिया जाता है कि आपके घर में अमुक चीज पूजित है, उसे घर से निकाल दीजिए; कुछ लोगों को यह भी कहा जाता है कि साधना ठीक से तभी होगी जब सारे पुराने विग्रह हटा दिए जाएँ।
वक्ता आज के सत्र की शुरुआत इसी विषय से करते हैं। वे कहते हैं कि बहुत बार ऐसा होता है कि घर में परेशानी हो और व्यक्ति किसी और के पास दिखाने-सुनाने जाए, तो सामने वाला कहता है कि आपके घर में फलाँ चीज पूजित है, उन्हें घर से निकाल दीजिए — और विशेष रूप से जानकार लोग ही ऐसा कहते हैं। वे जोड़ते हैं कि कई बार लोग यह तक बताते हैं कि जब वे किसी व्यक्ति के पास साधना सीखने गए, तो उनसे कहा गया कि घर में जितने पुराने विग्रह रखे हैं वे सब हटाने पड़ेंगे, तभी वे साधनाओं को सही तरीके से कर पाएँगे। इसके पीछे उनका कोई मनोवैज्ञानिक कारण हो या कोई भी कारण हो, ऐसी गलती कभी नहीं करनी चाहिए।
पूर्वजों से चली आई वस्तु में समाहित कई पीढ़ियों की ऊर्जा
पूर्वजों से चला आया विग्रह कई पीढ़ियों का जप-तप अपने भीतर लिए होता है
क्योंकि उसमें कई पीढ़ियों की ऊर्जा समाहित हो चुकी होती है। जहाँ आपके पूर्वजों द्वारा रखी गई कोई शिला, कोई विशेष विग्रह या कोई तंत्रोक्त वस्तु सेवित-पूजित हो रही है, उसमें कई पीढ़ियों का जप और तप है — और आप उनमें से कोई भी चीज देखने तो गए नहीं थे।
वक्ता अपने निषेध का कारण बताते हैं। सामान्यतः जहाँ आपके पूर्वजों द्वारा आपके पूजन स्थान पर कोई शिला, कोई विशेष विग्रह या कोई भी तंत्रोक्त वस्तु रखी गई है और उनकी सेवा-पूजा होती है, वहाँ कहीं न कहीं उसमें कई पीढ़ियों की ऊर्जा समाहित की गई होगी। और जब आप उसे वहाँ से हटाते हैं, तब आपको यह जानकारी ही नहीं होती कि वह है क्या। उदाहरण के लिए वे एक साधारण स्थिति लेते हैं — दुर्गा जी का विग्रह, काफी पुराना। पहले के समय में इतने सुंदर विग्रह नहीं बनते थे, अस्पष्ट रहते थे। अब बहुत सुंदर आ रहे हैं, तो अब हम बड़ा विग्रह लाकर स्थापित करेंगे और छोटे वाले को हटा देंगे। और पता नहीं वह कब से पूजित हो रहा था — दादाजी या परदादाजी के समय से, आपके परनाना के समय से, या कब से। वे कहते हैं, जान लीजिए कि इसमें कई पीढ़ियों की ऊर्जा और कई पीढ़ियों का जप-तप है। आप हर चीज देखने तो गए नहीं थे; आपने सुना भी नहीं होगा कि यहाँ कभी कोई अनुष्ठान हुआ होगा। पता नहीं कितने मंत्र जप हुए होंगे। और जब आप उसे हटा देते हैं तो जो कृपा-आशीर्वाद उसमें संरक्षित रहता है, वह भी चला जाता है। यदि कोई कहे कि यह बेकार की बात है, तो वे कहते हैं उसे समझाइए कि यह बेकार की बात नहीं है — किसी वस्तु में एक दिन की भी पूजा कर दी जाए और उसके पश्चात उसे हटाना हो तो उसके लिए भी कितना कुछ सोचना पड़ता है। इसलिए घर के देवी-देवता के स्थान पर रखी कोई भी पुरानी चीज कभी मत हटाइए।
एक साधक द्वारा साझा की गई घटना: सुंदर विग्रह के लिए खाली किया गया पूजा स्थान
वह घर जहाँ से देवी-देवता हटा दिए गए थे, और उसके बाद मिली बात
एक श्रोता ने वक्ता को बताया कि जब घर में परेशानी शुरू हुई और वे दिखाने-सुनाने गए, तो सबसे पहले यही बताया गया कि आपने घर के देवी-देवताओं को हटा दिया है और अब उनका स्थान वहाँ है ही नहीं — भगवती का छोटा विग्रह एक नई दुल्हन की इच्छा पर बड़े विग्रह से बदल दिया गया था।
वक्ता इस बात को एक ऐसी घटना से समझाते हैं जो एक श्रोता ने हाल ही में अपने जीवन की सत्य घटना के रूप में उनसे साझा की। कुछ समय पहले इन श्रोता के घर में परेशानी शुरू हुई। जब उन्होंने दिखाना-सुनाना शुरू किया, तो जिन व्यक्ति के पास वे गए थे उन्होंने बताया कि आप जो कुछ भी दिखा रहे हैं, उससे पहले की बात यह है कि आप लोगों ने अपने घर के देवी-देवताओं को हटा दिया है — उनका स्थान ही अब वहाँ नहीं है। वक्ता बताते हैं कि हुआ यह था कि कोई नई दुल्हन आई थीं, और उनका कहना था कि भगवती के इस छोटे से विग्रह के स्थान पर हम बड़ा विग्रह रखकर पूजन करेंगे। और जो कोई इन विषयों को नहीं जानता, वे कहते हैं, वह वही करेगा जो यहाँ किया गया: हाँ ठीक है, हटा लो, तुम्हारा पूजा करने का मन है, अच्छा है, सुंदर सा विग्रह स्थापित कर दो।
मायके की देवी को ससुराल ले जाना
क्या विवाह के समय बेटी को अपने मायके की देवी अपने साथ ले जानी चाहिए?
वक्ता के अनुसार नहीं ले जानी चाहिए। आप जिस भी भाव से पूजती हों, उस शक्ति को साथ ले जाना मायके को खाली कर देना है — आप दूसरे घर की गृहलक्ष्मी बनने जा रही हैं, और जाते-जाते अपने माता-पिता के सौभाग्य का कारण खाली करके जा रही हैं।
वक्ता एक चलन का नाम लेते हैं जिसे वे कुछ हद तक सीरियल्स का प्रभाव मानते हैं: कोई स्त्री जिसने मायके में दस साल से किसी विग्रह का पूजन किया है, वह विवाह के समय कहती है कि हम अपनी काली जी को, अपनी दुर्गा जी को छोड़ेंगे नहीं — मीराबाई ने कान्हा को नहीं छोड़ा था, साथ लेकर गई थीं — हम भी ले जाएँगे, ससुराल में स्थापित करेंगे और पूजा करेंगे, क्योंकि मेरा भाव ऐसा है कि मैं छोड़ नहीं सकती। वे कहते हैं, न छोड़ पाना एक स्तर तक तो ठीक था। लेकिन उनके अनुसार यह भी नहीं होना चाहिए, और यही सत्य है: मायके में जो शक्ति पूजित हो रही है, आप जिस भी भाव से पूज रही हों, उन्हें लेकर कहीं चले जाना अपने मायके को खाली कर देना है। जो शुभ शक्ति वहाँ स्थापित हो गई होगी, आप जो उस घर की लक्ष्मी हैं और दूसरे घर की गृहलक्ष्मी बनने जा रही हैं, उनके सौभाग्य का कारण वहाँ खाली करके जा रही हैं। माता-पिता को हानि होगी। और दूसरी ओर भी, वे कहते हैं, यदि वहाँ आपने स्थान दिया, जो पहले से था उसे हटाया और स्वयं अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास किया — कि पूजन स्थान पर मेरा ही अधिकार है क्योंकि मैं बहुत पूजा करती हूँ — तो वहाँ भी उसी तरीके से परेशानी शुरू हो जाएगी। उनका भेद इसे समाप्त करता है: आपके पूजन में कोई दोष नहीं है और भाव में कोई दोष नहीं है, लेकिन शक्तियों की एक व्यवस्था भी बनी हुई है। साक्षात जगदंबा वहाँ नहीं विराजतीं; उनकी अंशात्मक शक्तियाँ उनका प्रतिनिधित्व करते हुए आपके घर में योगिनी स्वरूप आदि में विराजती हैं, और उन्हें हटाइएगा तो दोष लगे बिना नहीं रहेगा।
भाव भाव है और क्रिया क्रिया — पाँच साल में पत्थर भी चैतन्य
क्या केवल पूजा जाने से एक साधारण पत्थर भी जागृत हो जाता है?
हाँ। एक पत्थर भी यदि पाँच साल पूजा जाए तो चैतन्य और जागृत हो जाता है। वक्ता भाव और क्रिया को अलग रखते हैं — भाव भाव होता है, क्रिया क्रिया — और बताते हैं कि तांत्रिक कर्मों में नकारात्मक शक्तियों को कोयले और कंकड़ों में ही बैठाया जाता है, क्योंकि इतनी छोटी वस्तुएँ भी उन्हें धारण कर लेती हैं।
वक्ता सिद्धांत सीधे रखते हैं: भाव भाव होता है और क्रिया क्रिया होती है। एक पत्थर भी यदि रखकर पाँच साल पूजा जाए तो वह भी चैतन्य और जागृत हो जाता है। वे इसे उल्टी दिशा से पुष्ट करते हैं। तंत्र-विचार आदि कर्मों में क्या किया जाता है? कोयला — श्मशान का कोयला — लेकर उसमें मंत्र पढ़े जाते हैं, और उतनी छोटी-छोटी चीजों में, कंकड़ों में, उसी आकार की वस्तुओं में नकारात्मक शक्तियों को फेंक दिया जाता है, बैठा दिया जाता है। तो वे पूछते हैं, आपके अपने घर में पूर्वजों द्वारा पूजित कोई विग्रह भला कैसे चैतन्य नहीं होगा। वे अपनी ब्रह्म पिशाच प्रपंच कथा की ओर संकेत करते हैं, जिसमें वे यह स्पष्ट कर चुके हैं कि पत्थर आदि में लाग कैसे लगाया गया और उनके माध्यम से कितनी क्रियाएँ हुई हैं।
वह साधारण विग्रह जो शायद पूरे घर को थामे हुए है
हो सकता है वही साधारण पुराना विग्रह घर की बरकत और रक्षा का कारण हो
हो सकता है वही कारण हो कि आपके घर में अब तक बरकत है और आपका रक्षण हो रहा है। हटाइएगा तो क्या पता सब ध्वस्त हो जाए। वक्ता कहते हैं कि लोग पुराने विग्रह इसलिए बदलते हैं कि उनका सुंदर श्रृंगार नहीं हो पाता — और वहीं से बर्बादी शुरू हो जाती है।
वक्ता प्रश्न को पलट देते हैं। वे कहते हैं, क्या पता वही छोटा सा विग्रह, जो देखने में सुंदर नहीं है, उसी के कारण आपके घर में अब तक बरकत हो रही हो, उसी के कारण आपका रक्षण हो रहा हो। हटाइएगा, तो क्या पता सब ध्वस्त हो जाए। वे बदलने का सामान्य कारण भी बताते हैं: पुराने श्री विग्रह जो पूजित होते हैं उनमें सुंदरता नहीं होती, उनका श्रृंगार नहीं कर पाएँगे, इसलिए हम इससे बढ़िया लाएँगे और बढ़िया भाव बनेगा — और, वे कहते हैं, आपकी बर्बादी शुरू हो जाती है। वे जोर देकर कहते हैं कि यह गलत नहीं सही है, और यह अनुभव की बात है जो कई लोगों ने देखी होगी। इसलिए यह कार्य नहीं करना है, चाहे वह विग्रह भगवती का हो, शिव जी का हो, हनुमान जी का हो या किसी का भी हो। ऐसे कार्य करने से घर में किसी न किसी प्रकार की दिक्कत हो जाती है।
पूर्वजों के विग्रह के सम्मुख बैठने के तंत्रोक्त रात्रि काल
पूर्वजों की पूजित वस्तु के सम्मुख अनुष्ठान के लिए तंत्रोक्त रात्रि काल
वे निशाधि काल की रात्रियाँ जिन्हें तंत्रोक्त माना गया है: दीपावली की रात्रि, होलिका की रात्रि, रक्षाबंधन की रात्रि, भाद्रपद की अमावस्या, चैत्र की अमावस्या — और ग्रहण काल। वहाँ एकाध रात का अनुष्ठान करके देखिए, कुछ न कुछ अनुभव अवश्य होगा।
पूरे आरंभिक तर्क का निष्कर्ष यही सकारात्मक निर्देश है। जहाँ पूर्वजों द्वारा पूजित कोई विग्रह, कोई रुद्राक्ष, किसी प्रकार का कोई यंत्र जिसका विशेष विधि-विधान बताया गया है, या कोई स्थापित वस्तु — त्रिशूल ही हो सकता है — रखी है, वहाँ उन रुद्राक्ष या उस विग्रह के सम्मुख बैठिए। जो समय वे बताते हैं वे निशाधि काल हैं, तंत्रात्मक काल: दीपावली की रात्रि, होलिका की रात्रि, रक्षाबंधन की रात्रि, भाद्रपद की अमावस्या, चैत्र की अमावस्या — ये सभी समय जिन्हें तंत्रोक्त रात्रि काल माना गया है। इनमें एकाध रात का अनुष्ठान करके देखिए। ग्रहण काल में अनुष्ठान करके देखिए। उनका दावा बिना किसी हिचक के है: वहाँ आपको सौ प्रतिशत कुछ न कुछ अनुभव अवश्य होगा। और यदि वह अति चैतन्य हुआ तो कई प्रकार के ऐसे चमत्कारी अनुभव हो जाएँगे कि आदमी को लगेगा कि यह क्या हो गया। विशिष्ट देवी कृपा चाहने वालों के लिए उनका निष्कर्ष: जहाँ आपके पितृ-पूर्वजों और आपसे पहले के लोगों द्वारा पूजित-आराधित कोई चीज रखी गई है, उसे हटाइए नहीं। वह देखने में कैसी भी हो, उनके समक्ष साधना कीजिए, उनके माध्यम से साधना करने का प्रयास कीजिए — और आपको जरूरत से ज्यादा सफलता मिलेगी।
शबरी कवच में दीक्षा की आवश्यकता नहीं, पर भीतर की गायत्री मानसिक
क्या शबरी कवच के लिए दीक्षा आवश्यक है?
किसी भी प्रकार की दीक्षा की आवश्यकता नहीं है, नवनाथ दीक्षा की भी नहीं। केवल एक बात ध्यान रखनी है: बीच में जहाँ एक बार गायत्री आती हैं, वहाँ उनका उच्चारण नहीं करना है — उस अंश का मानसिक रूप से पाठ कर लेना है।
वक्ता उत्तर देते हैं कि शबरी कवच के लिए न गुरु दीक्षा चाहिए और न नवनाथ दीक्षा। वे इससे उस स्थिति को अलग करते हैं जहाँ कोई साबर क्षेत्र में ही आगे बढ़ना चाहता है — जिसने साबर मंत्रों को चुना है, जो साबर के माध्यम से सिद्धि प्राप्त करना, देवताओं को प्रसन्न करना और उसके द्वारा कार्य सिद्ध करना चाहता है। ऐसे व्यक्ति को भगवान दत्तात्रेय, नवनाथ और गुरु गोरखनाथ की साधना करनी चाहिए, और उसके बाद शबरी कवच के कई अनुष्ठान करने चाहिए। जिनकी ऐसी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है, उनके लिए: एक दिन का अनुष्ठान कीजिए, और जितनी आपकी क्षमता हो उतना अधिक से अधिक शबरी कवच का पाठ करते जाइए। एक ही विधिगत सावधानी है: इसके भीतर एक बार गायत्री आती हैं, और उस समय उनका उच्चारण नहीं करना है — मानसिक रूप से पाठ कर लेना है। बस इतना ही।
रात्रि के अनुष्ठान के लिए उदया तिथि नहीं, निशीथ-व्यापिनी तिथि
जब पूर्णिमा दो दिन पड़ जाए तो रात्रि के अनुष्ठान किस तिथि पर होंगे?
साधना के लिए वही पूर्णिमा या अमावस्या देखनी होगी जो वास्तव में रात्रि में व्याप्त हो। जहाँ 30 की रात्रि भर पूर्णिमा रहेगी, वहाँ दीप दान और हर तंत्रोक्त अनुष्ठान उसी रात्रि का है — अगली रात्रि में पूर्णिमा है ही नहीं, इसलिए उसमें किए गए का कोई लाभ नहीं।
वक्ता दो दिन पड़ने की बार-बार आने वाली उलझन को सीधे संबोधित करते हैं, और दोनों प्रकार के आचरण को अलग कर देते हैं। सामाजिक पर्व के विषय में वे उदासीनता की हद तक अनुमति देते हैं: जो उदया तिथि से मानना चाहें मानें, उन्हें कोई आपत्ति नहीं, आपको जो उचित लगे वैसा कीजिए। वे यह भी बताते हैं कि पूर्णिमा का क्षय हो रहा है और प्रतिपदा पड़ रही है, तथा विंध्यवासिनी जयंती 1 तारीख को है जिस दिन द्वितीया है — तो वे पूछते हैं कि प्रतिपदा में पूर्णिमा कहाँ मनाई जा रही है। पर वे इसे छोड़ देते हैं: सुविधा से मना लीजिए। साधना के लिए नियम अलग है और वे उसे स्पष्ट रूप से कहते हैं। जहाँ साधना का प्रश्न है, वहाँ हमें निशीथ-व्यापिनी पूर्णिमा और निशीथ-व्यापिनी अमावस्या देखनी होती है। यदि आप 108 वर्तिका वाले दीप का दीप दान करना चाहते हैं, तो वह 30 को ही कीजिए — उस पूरी रात्रि पूर्णिमा रहेगी, और जो भी साधनाएँ करनी हैं वे उसी रात्रि में करनी हैं। वे दूसरे विकल्प के लिए इसे दोहराते हैं: जो लोग उदया तिथि से 31 को पूर्णिमा मानेंगे — उस रात्रि में पूर्णिमा कहाँ है? है ही नहीं। उस रात्रि में न दीप दान होगा और न कुछ और; उसमें कोई लाभ नहीं है। दीप दान, साधना और जो कुछ भी करना है वह 30 की रात्रि में ही मान्य है। वे गिनाते हैं कि उस रात्रि में क्या-क्या आता है: जो भी तंत्रोक्त अनुष्ठान करना चाहें, या भैरु जी के लिए दीप दान, या अपनी कुलदेवी और कुल देवता के लिए, या कोई विशेष तंत्रोक्त अनुष्ठान या हवन, या कोई मंत्र जप — क्योंकि यह तंत्रोक्त रात्रियों में से एक है, एक प्रकार से माया रात्रि, श्रावणी पूर्णिमा।
केवल एक यंत्र, पूरे विधान से बना, और सस्ते यंत्रों से आने वाली दिक्कत
गृहस्थ को घर में कितने यंत्र रखने चाहिए?
केवल एक — इष्ट का, जिसका निर्माण पूरे विधि-विधान से हुआ हो। पाँच और दस रुपये वाले रंग-बिरंगे यंत्र कबाड़ी को बेचे गए घरेलू कचरे और प्लास्टिक को रीसाइकल करके बनाए जाते हैं; इसी अपवित्रता और उसमें की गई पूजा से दिक्कत आती है।
वक्ता पहले नियम बताते हैं, फिर कारण। गृहस्थ लोगों को घर में केवल एक ही यंत्र रखना चाहिए, एक से अधिक नहीं: इष्ट का यंत्र, जिसका निर्माण पूरे विधि-विधान से किया गया हो। सस्ते यंत्र क्या हैं, इसका उनका विवरण: जो खराब प्लास्टिक और घर का कचरा हम कबाड़ी वाले को बेच देते हैं, वह ले जाकर आगे बेचा जाता है, रीसाइकल होता है, गलाया जाता है, और उन्हीं कचरे की सामग्रियों से पाँच और दस रुपये वाले भिन्न-भिन्न रंगों के यंत्र बनते हैं। और आप उन्हें लाकर घर में रखते हैं और पूजते हैं। इसी अपवित्रता और ऐसी अपवित्रता की पूजा के कारण दिक्कत आती है। उनका विकल्प माँग नहीं, चुनाव के रूप में रखा गया है: यदि लाना ही है तो ढंग से रखिए; यदि सामर्थ्य नहीं है तो मत रखिए — जब दोष लेने की आवश्यकता ही नहीं है तो क्यों लेना। संग्रह पर वे तीखे हैं: कई लक्ष्मी यंत्र एक में ही बने हुए, दस महाविद्या यंत्र, श्री यंत्र, कुबेर यंत्र, धन वर्षा यंत्र, धन रक्षा यंत्र — घर में पूरी प्रदर्शनी लगा दी जाती है, और वही प्रदर्शनी आपकी परेशानी शुरू होने का कारण बनती है।
यंत्र देवता का घर, और उसके लिए अपेक्षित आवरण पूजन
यंत्र देवता का घर है, और वह आवरण पूजन माँगता है
धूप-दीप दिखा देना पूजा नहीं है। यंत्र देवताओं का घर है और उनका पूरा परिवार उसमें विराजमान रहता है — और आप एक की भी अर्चना, पूजन और आवरण नहीं कर पाते, फिर भी घर में उनकी बाढ़ लगा देते हैं।
वक्ता उस संग्रह के नीचे बैठी धारणा को सुधारते हैं। क्या आप जाकर हर एक का पूजन करेंगे? धूप-दीप दिखा देना भला पूजा थोड़ी होती है। वे कहते हैं, यंत्र देवताओं का घर है; उनका पूरा परिवार उसमें विराजमान रहता है। और आप एक की भी अर्चना, पूजन या आवरण नहीं कर पाते — फिर भी घर में उन्हें बाढ़ की तरह लगा देते हैं। तो दिक्कत तो करेगा ही।
यंत्र को बाजार से खरीदने के बजाय विधिपूर्वक बनवाना
यंत्र कैसे बनवाना चाहिए?
अपने गुरु से बनवाइए, या किसी परिचित सुनार से, अपने पुरोहित से विचार-विमर्श करके।
वक्ता बताते हैं कि यंत्र ढंग से कैसे प्राप्त किया जाए। पहले यह देखिए कि आप प्रमुख रूप से भगवती के किस स्वरूप की पूजा करते हैं; यदि आपके गुरु जी हैं तो उनसे कहिए कि मेरे लिए ऐसा बनवा दीजिए। अन्यथा जहाँ आपके कोई परिचित सुनार हैं, उनसे कहकर एक सामान्य यंत्र बनवा लीजिए — यदि बहुत विशेष नहीं बनवा सकते तो वह भी चलेगा। और यदि आपको लगता है कि आपको अपने से ही करना है, तो अपने पुरोहित जी और सुनार से कहकर वैसी चीजों का निर्माण करवा लीजिए। एक ही बनना चाहिए और सारा पूजन उसी पर होना चाहिए। मार्केट से पचास, सौ या दस रुपये में जो खरीदकर लाते हैं, वे दोहराते हैं, वह अपनी बर्बादी ही लाते हैं — क्योंकि पता नहीं उसका पूरा सिस्टम कब बना, उसमें किसी ग्रह-नक्षत्र का कोई लेना-देना नहीं। अंत में वे आधे-अधूरेपन को नकारते हैं: करिए तो पूरा करिए, आधा-अधूरा नहीं — कि मेरा तो मन चंगा है, हम तो ऐसे ही कर लेंगे, इसमें भी तो वही जाएगा। यह अपने आप को कन्विंस करने की और बेवकूफी वाली बातें हैं, और वे इसमें किसी का समर्थन करने से इनकार करते हैं।
मुहूर्त क्यों देखा जाता है, और देवताओं का अपना समय भी होता है
मुहूर्त आखिर देखा ही क्यों जाता है?
क्योंकि एक व्यवस्था बनी हुई है, और देवताओं के अपने समय होते हैं। जमीन खरीदने का मुहूर्त है, उसके पूजन का, नींव रखने का और गृह प्रवेश का भी — क्योंकि दिव्य शक्तियाँ आपके साथ घर में जाती हैं और नियत समय पर हविष्य से तृप्त होती हैं; गलत समय पर जाइए तो दिक्कत होती है।
वक्ता यंत्र वाले प्रश्न से आगे बढ़कर इसे मुहूर्त के सामान्य समर्थन में ले जाते हैं। वे कहते हैं कि सनातन में किसी भी चीज का निर्माण कार्य जब से शुरू होता है, तब से एक व्यवस्था है: घर के लिए जमीन खरीदने का मुहूर्त है, जमीन के पूजन का मुहूर्त है, नींव रखने का समय है, जिसमें न्यू पूजन किया जाता है और तभी घर बनता है — और फिर गृह प्रवेश का भी मुहूर्त है। व्यक्ति मुहूर्त इसलिए देखता है कि सुख-शांति रहे। वे लोगों की आपत्ति भी उद्धृत करते हैं: कि आदमी बिना मुहूर्त के जन्म लेता है और बिना मुहूर्त के मरता है, फिर भी पूरा जीवन मुहूर्त देखते बिताता है, और गीता में इसका वर्णन नहीं है। उनका उत्तर है कि हर चीज का नियम होता है — और वे आपत्ति करने वालों पर ही उसे लौटा देते हैं, क्योंकि वे स्वयं कहते हैं कि इस समय नहीं खाना चाहिए और उस समय खाना चाहिए। विशेष रूप से गृह प्रवेश के लिए उनका तर्क: देवता आपके साथ जाते हैं, दिव्य शक्तियाँ शुभता के साथ आपके साथ जाती हैं, और नियत समय पर उन्हें हविष्य देकर तृप्त किया जाता है — तब आपके घर में श्री और समृद्धि आती है। गलत समय पर जाइएगा तो दिक्कत होगी; उनके भी अपने समय होते हैं। वे इसे पितरों तक बढ़ाते हैं: पितर पंद्रह दिन सोते हैं और पंद्रह दिन जागते हैं, और उन पंद्रह दिनों में उनका एक दिन और एक रात होती है। उनका दिन-रात आपके जैसा नहीं है — और आप उन्हें अपनी व्यवस्था से चलाना चाहते हैं, यह कहकर कि गीता में नहीं लिखा है। वे कहते हैं, यदि उनका अस्तित्व है तो कहीं न कहीं से हम संदर्भ लेंगे कि वे किस प्रकार के हैं।
मिल गई तांत्रिक सामग्री गृहस्थ के रखने की चीज क्यों नहीं है
अपने आप मिल गई साँप की केंचुली जैसी वस्तु का क्या करें?
उसे तंत्र क्षेत्र के किसी व्यक्ति को दे दीजिए जो उसका कुछ कर सके। साँप की केंचुली, बिल्ली की जेर, जड़ मोहरा — मिल भी जाएँ तो आप उन्हें रखेंगे कैसे और करेंगे क्या? ऐसी वस्तु देने वाले के लिए भी नियम और विधान बने हुए हैं।
एक श्रोता बताते हैं कि उन्हें अपने आप साँप की केंचुली मिल गई है और पूछते हैं कि उसका क्या करें। वक्ता की पहली प्रतिक्रिया प्रश्न ही है: आप उसका करेंगे क्या, क्या आप तांत्रिक हैं? वे मानते हैं कि लोग कहते हैं कि केंचुली दो-तीन प्रकार के प्रयोगों में काम आती है और उसके कई प्रयोग हैं — लेकिन एक सामान्य गृहस्थ के लिए उसका क्या प्रयोग होगा। साँप की केंचुली, बिल्ली की जेर, जड़ मोहरा — ये आपको मिल भी जाएँ तो आप इन्हें रखेंगे कैसे और करेंगे क्या। उसे किसी ऐसे व्यक्ति को दे दीजिए जो तंत्र-मंत्र के क्षेत्र में है, ताकि वह उसका कुछ कर सके। लोगों के दावों पर — कि सियार सिंगी को साँप की केंचुली में लपेटकर रखने से धन की वर्षा होगी, कि ऐसा हो जाएगा और वैसा — उनका उत्तर है कि सब कुछ सबके लिए नहीं होता, जैसा वे बार-बार कहते हैं। चीजें प्रतिशत-प्रतिशत बदलती हैं, और ऐसी वस्तु को रखने के लिए तथा उसे देने वाले व्यक्ति के लिए भी नियम और विधान होता है। उनका दृष्टांत: पुलिसवाला बंदूक रख सकता है; आप उसके बगल में बंदूक लेकर खड़े हो जाइए तो वह आपको गिरफ्तार कर लेगा। आपको लाइसेंस चाहिए — और लाइसेंस के साथ पचास और नियम हैं: इतनी ही गोलियाँ, आप उसे निकालकर किसी को धमका नहीं सकते। और लाइसेंस मिलेगा भी कैसे। ठीक यही स्थिति इन चीजों की है — पहले यह जान-सुन लेना चाहिए कि आपको वास्तव में इनकी आवश्यकता है भी या नहीं।
विनियोग नहीं, संकल्प में पार्वती का नाम लेना
पार्वती की कृपा हेतु दुर्गा सप्तशती का पाठ करते समय उनका नाम कहाँ लें?
संकल्प में। वक्ता यह भी मानते हैं कि चाहें तो विनियोग में भी कह सकते हैं, पर उनका अपना मत है कि यह संकल्प में ही होना चाहिए — और शेष मूल तत्वों के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए।
जब पूछा गया कि क्या माता पार्वती की कृपा के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जा सकता है, तो वक्ता पुष्टि करते हैं कि किया जा सकता है और फिर बताते हैं कि संकल्प कहाँ रखा जाए। वे कहते हैं, विनियोग में नहीं बल्कि संकल्प में — यद्यपि यदि आप विनियोग में भी कहना चाहें तो कह सकते हैं। उनका अपना मत है कि यह संकल्प ही होना चाहिए। उनकी शर्त बाकी सब पर है: जब तक उस प्रकार से मूल तत्वों के साथ छेड़छाड़ नहीं की जाती, तब तक भगवती पार्वती का नाम लेने में कोई भी कठिनाई नहीं है।
जहाँ घर के देवी-देवता ज्ञात न हों वहाँ जयंती मंगला काली
पैसे और स्वास्थ्य दोनों की दिक्कत हो तो क्या करना चाहिए?
घर के देवी-देवताओं की सेवा-पूजा कीजिए — और जहाँ यह ज्ञात न हो कि वे कौन हैं, वहाँ जितनी क्षमता हो उतना जयंती मंगला काली का जप कीजिए। वक्ता कहते हैं कि यह उत्तर वे बार-बार देते हैं।
पैसे और स्वास्थ्य दोनों की दिक्कत के विषय में पूछे जाने पर वक्ता प्रश्नकर्ता को घर के देवी-देवताओं की सेवा-पूजा की ओर भेजते हैं। जहाँ यह ज्ञात नहीं है — जहाँ व्यक्ति को पता ही नहीं कि घर के देवी-देवता कौन हैं — वहाँ वे वही स्थायी विकल्प देते हैं जिसे वे लगातार दोहराते हैं: जितनी क्षमता हो उतना जयंती मंगला काली का जप कीजिए।
तीनों देती हैं; प्रश्न यह है कि आप ले कितना सकते हैं
सारे सुखों के लिए लक्ष्मी, कामाख्या और भुवनेश्वरी में से किसकी साधना करें?
इनमें से कोई भी — तीनों ही आपको सारे सुख देंगी। लक्ष्मी भी देंगी, कामाख्या भी देंगी, भुवनेश्वरी भी देंगी; उनकी सामर्थ्य में कोई कमी नहीं है। इसके बजाय यह सोचिए कि उसे ले पाने की शक्ति आप में कितनी है।
सारे सुखों की प्राप्ति के लिए लक्ष्मी, कामाख्या और भुवनेश्वरी में से चुनने को कहे जाने पर वक्ता तुलना करने से इनकार कर देते हैं। वे कहते हैं, इनमें से कोई भी कीजिए: तीनों में से तीनों ही आपको आपके सारे सुख देंगी। लक्ष्मी भी देंगी, कामाख्या भी देंगी, भुवनेश्वरी भी देंगी। उनकी सामर्थ्य में ऐसी कोई कमी नहीं है कि वे आपको सुख न दे सकें। जिस चर की ओर वे ध्यान मोड़ते हैं वह साधक है: यह सोचिए कि आप में कितनी शक्ति है कि आप उनसे वह सुख ले सकें।
आवरण की सामग्री हलवा-पूरी की तरह क्यों नहीं बाँटी जाती
आवरण की सामग्री इसलिए सार्वजनिक नहीं की जाती कि उसकी नकल होगी और दुरुपयोग
क्योंकि उसकी नकल की जाएगी, उसे दोहराया जाएगा और उसका दुरुपयोग होगा। वक्ता सप्तशती के तेरह आवरणों का उल्लेख करते हैं, जिनमें से दस का पूजन होता है, और बताते हैं कि सामान्य रूप से उपलब्ध नवें आवरण में भैरव पूजन का उल्लेख ही नहीं है — ऐसा विवरण वे बाँटकर नकल करवाना नहीं चाहते।
वक्ता आवरण की सामग्री सार्वजनिक नहीं करना चाहते। इसमें कितनी गहराई है, इसका उनका उदाहरण: सप्तशती में तांत्रिक रूप से तेरह या चौदह आवरण माने जाते हैं, जिनमें से तेरह प्रचलित हैं और दस का प्रमुख रूप से पूजन होता है। और जो नवाँ आवरण सामान्य रूप से मिलता है, उसमें भैरव आदि के पूजन का उल्लेख ही नहीं है। इस प्रकार की कई बातें उन्होंने स्पष्ट की हैं, और प्रत्येक यंत्र तथा प्रत्येक आवरण की पूरी विधि — क्या करना है और कैसे — वे हलवा-पूरी की तरह बाँटना नहीं चाहते, कि लोग यहाँ से देखकर नकल कर लें, स्वयं बनाना शुरू कर दें, और फिर उसका भी दुरुपयोग हो। यह किसके लिए है: जिनमें बहुत उत्कंठा है और जो ऐसी चीजें अपने घर में स्थापित करके उसी प्रकार सीखना चाहते हैं। और उन्हें एक ही सीखना चाहिए — सप्तशती, फिर बगलामुखी, फिर कामाख्या, फिर हनुमान जी भी, ऐसा नहीं। कार्य एक ही देवता का, एक ही दिव्य शक्ति का है; उसी को सीखिए और कीजिए। जीवन भर कुछ बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, और नवरात्रि तथा अन्य पर्व कालों के विशेष प्रयोग बीच-बीच में बता दिए जाएँगे। वे इसकी तुलना उससे करते हैं जो उनके अनुसार खुलेआम बाँट दिया गया है: कुंजिका हलवे की तरह बाँट दी गई — गुप्त कुंजिका, यह कुंजिका, वह कुंजिका — और वे कहते हैं कि उसे करके लोग बर्बाद हुए हैं। लोग उन्हें इसलिए गाली देते हैं कि वे इसे पाखंड कहते हैं, जबकि प्रयास यही है कि उनकी बर्बादी रुके।
बाल और नाखून, जो शरीर की ऊर्जा के जीवित वाहक हैं
साधना काल में बाल और नाखून क्यों नहीं काटने चाहिए?
क्योंकि वे जीवित हैं और शरीर से जुड़ी ऊर्जा उनमें रहती है — इसीलिए तंत्र में इन्हीं के माध्यम से व्यक्ति पर प्रयोग किए जाते हैं। साधना आरंभ होने से दो-तीन दिन पहले क्षौर कर्म करा लीजिए, और पूर्ण होने के बाद फिर से।
वक्ता नियम और उसका कारण दोनों बताते हैं। साधना काल में बाल और नाखून नहीं काटने चाहिए और दाढ़ी बनाना निषिद्ध है; क्षौर कर्म साधना आरंभ होने से दो-तीन दिन पहले करा लेना चाहिए, और साधना पूर्ण होने के बाद फिर से। उनका कारण तंत्र की ओर से आरंभ होता है: सब जानते हैं कि तंत्र में बाल, नाखून, शरीर के मैल और पैरों के नीचे की मिट्टी का कितना बड़ा महत्व है — श्रोताओं ने इन प्रयोगों के बारे में कम से कम सुना तो होगा, और यदि वे तंत्र ग्रंथ पढ़ते हैं तो पढ़ा भी होगा। ये हमारे शरीर के वे अंग हैं जिनके माध्यम से हम पर विशेष क्रियाएँ आसानी से और सहजता से की जा सकती हैं, क्योंकि इनमें हमारे शरीर से जुड़ी ऊर्जा उपस्थित रहती है। नाखून जीवित है; बाल जीवित हैं। तो जब हम साधना करते हैं, तब हमारे शरीर में उपस्थित होने वाले तत्व इन्हें भी एक माध्यम बना देते हैं। वे कवच से ही एक शास्त्रीय आधार देते हैं: देवी कवच का पाठ करते समय — मान लीजिए भगवती भुवनेश्वरी का सवा लाख का अनुष्ठान — नाखूनों की रक्षा के लिए उनकी शक्ति का आवाहन किया जाता है, कि नरसिंही मेरे नखों की रक्षा करें। नाखून में वह सामर्थ्य है कि पहले के समय में योद्धा युद्ध में उसी से शत्रुओं को चीर देते थे; और भगवान नरसिंह के मूल मंत्र में ही वज्र-नख का विशेषण आता है। वे यह भी जोड़ते हैं कि विष्णु के दस अवतार भगवती त्रिपुर सुंदरी के दस नखों से माने जाते हैं। साधना के बीच में काटने का परिणाम: उनमें ऊर्जा उपस्थित रहती है, और काटने से वह अलग हो जाती है, इसलिए ऊर्जा के बनने का पूरा चक्र, आभामंडल का शोधन, उसमें तत्वों का उपस्थित होना और सूक्ष्म शरीर में जागरण — वे भी अलग हो जाते हैं। सरल शब्दों में, वे कहते हैं, कहीं एक छेद हो जाता है।
दंडवत और महामृत्युंजय, तथा पहले से ली गई मन्नत
क्या स्त्रियाँ दंडवत प्रणाम और महामृत्युंजय का जप कर सकती हैं?
वक्ता दोनों के लिए मना करते हैं: शास्त्रों ने स्त्रियों के लिए दंडवत प्रणाम निषिद्ध किया है, और महामृत्युंजय वैदिक मंत्र है जिसका उच्चारण केवल द्विज ही कर सकता है। जहाँ मन्नत पहले ही ली और पूरी की जा चुकी है, वहाँ उस स्थान के पुजारी से बात कीजिए।
वक्ता अपना उत्तर अपनी पसंद के रूप में नहीं बल्कि जो कहा गया है उस रूप में देते हैं, और अंत में निर्णय प्रश्नकर्ता पर छोड़ देते हैं। दंडवत प्रणाम पर: यह नहीं करना चाहिए। शास्त्रों ने इसे निषिद्ध किया है और यह बार-बार कहा जाता है — स्त्रियों को दंडवत प्रणाम कभी नहीं करना चाहिए। महामृत्युंजय पर: इसका जप भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह वैदिक मंत्र है और इसका उच्चारण नहीं करना है। इसकी अपनी विधि है और इसे केवल द्विज ही कर सकता है। इससे आगे, वे कहते हैं, आपकी इच्छा; सत्य जैसा कहा गया है वैसा ही है। जो मन्नत पहले ही ली और पूरी की जा चुकी है — जहाँ किसी ने लेटकर, लोट लगाते हुए परिक्रमा करने की मन्नत ली थी — उसे वे बिल्कुल अलग विषय मानते हैं, और प्रश्नकर्ता को उसी स्थान के पुजारी से बात करके उसी अनुसार करने को कहते हैं।
बिना गुरु के काली की मूर्ति पूजा, शांत स्वरूप में
क्या बिना गुरु के काली की मूर्ति पूजा की जा सकती है?
हाँ, कोई पाप नहीं लगता। विधिपूर्वक मूर्ति पूजा कीजिए, सामान्य रहते हुए — बलि आदि विशिष्ट चीजों में मत जाइए — और विग्रह सौम्य तथा शांत स्वरूप का हो। उग्र स्वरूप की पूजा मत कीजिए।
वक्ता उत्तर देते हैं कि इसमें पाप लगने का कोई प्रश्न ही नहीं है। उनकी शर्तें ढंग पर और विग्रह पर हैं। मूर्ति पूजा विधिपूर्वक कीजिए, उसे लेकर सामान्य रहिए, और बलि जैसी अत्यंत विशिष्ट चीजों में मत जाइए। और विग्रह सौम्य हो, शांत हो। उनका एकमात्र निषेध: उग्र स्वभाव वाले विग्रह का पूजन मत कीजिए।
उमानंद भैरव, गुवाहाटी के प्रमुख क्षेत्रपाल
गुवाहाटी के क्षेत्रपाल कौन हैं?
गुवाहाटी में एक से अधिक क्षेत्रपाल हैं, और प्रमुख क्षेत्रपाल उमानंद भैरव हैं। कामाख्या पीठ पर उमानंद के साथ कामेश्वर महादेव भी हैं; उससे आगे उमानंद हैं।
जब पूछा गया कि गुवाहाटी में क्षेत्रपाल उमानंद जी हैं या भीमशंकर जी, तो वक्ता उत्तर देते हैं कि वहाँ एक से अधिक क्षेत्रपाल हैं, और प्रमुख क्षेत्रपाल उमानंद भैरव हैं। वे स्थान की व्यवस्था भी जोड़ते हैं: जब आप कामाख्या पीठ जाते हैं तो वहाँ उमानंद के साथ कामेश्वर महादेव हैं, और उससे आगे उमानंद।
लांगुर उपनिषद की पात्रता, और उसकी विधि क्यों नहीं दी जाती
लांगुर उपनिषद की साधना के लिए क्या आवश्यक है?
वक्ता विधि देने से इनकार करते हैं। इसकी तीव्रता ऐसी है कि इसमें एक भी गलती सह्य नहीं है। इसके पास जाने से पहले उनकी बताई न्यूनतम शर्त: वैष्णव मंत्रों और राम नाम का 27 नक्षत्रों की गिनती पर 27 लाख जप, और विधिवत दीक्षा।
वक्ता लांगुर उपनिषद की साधना विधि देने से इनकार करते हैं। वे कहते हैं, यदि आप इसे स्वयं करेंगे तो इसकी तीव्रता और इससे दूसरों को दीक्षित करने की संभावना को देखते हुए कई प्रकार की हानि संभव हो जाती है। इसमें एक भी गलती सह्य नहीं है। इसके बदले वे पात्रता बताते हैं। यदि आप इतनी लंबी और इतनी उच्च कोटि की साधना का विचार कर रहे हैं, तो उसके लिए पात्रता रखिए और विधिवत दीक्षित होकर कीजिए। उनकी बताई न्यूनतम शर्त: कि आपने वैष्णव मंत्रों और राम नाम का जप किया हो — न्यूनतम इतना मानिए कि 27 नक्षत्रों की गिनती पर राम नाम का 27 लाख जप पूरा हो चुका हो। तभी ऐसी साधनाओं में जाना उचित होगा। वे इसे बिना नरम किए समाप्त करते हैं: लांगुर उपनिषद कोई मजाक नहीं है। इससे आगे आपकी इच्छा। श्री विद्या पर भी वे ऐसा ही रुख रखते हैं: आरंभिक जानकारी एक सीमा तक दी जा सकती है, लेकिन पूरा बृहद विधि-विधान श्री संप्रदाय में दीक्षित होकर ही ठीक से सीखा जा सकेगा।
उपनयन से मिलने वाली गायत्री दीक्षा, और जिसके लिए गुरु फिर भी चाहिए
उपनयन संस्कार स्वयं कौन सी दीक्षा दे देता है?
उपनयन के समय आपको गायत्री की दीक्षा मिल जाती है और आप पात्र हो जाते हैं। लेकिन विशेष दीक्षा — कोई भी तंत्रोक्त मंत्र, या किसी संप्रदाय-परंपरा का ज्ञान — गुरु दीक्षा प्राप्त करने के बाद ही मिलती है; बताने वाले गुरु ही हैं।
वक्ता दोनों में भेद करते हैं। उपनयन सोलह संस्कारों में से एक संस्कार है, और उपनयन के समय आपको गायत्री की दीक्षा प्राप्त हो जाती है और आप पात्र हो जाते हैं। लेकिन विशेष दीक्षा — कोई भी तंत्रोक्त मंत्र, और किसी भी संप्रदाय-परंपरा का ज्ञान — गुरु दीक्षा प्राप्त होने के बाद ही मिलती है। बताने वाले गुरु ही होते हैं।
जहाँ पूरा अर्गला हवन संभव न हो वहाँ न्यूनतम संख्या
अर्गला के प्रथम मंत्र के हवन में कम से कम कितनी आहुतियाँ?
कम से कम 108। वक्ता कहते हैं कि यदि आप अर्गला के प्रथम मंत्र का हवन बहुत अधिक नहीं कर सकते, तो कम से कम 108 आहुति कर लीजिए।
वक्ता प्रश्नों के दौर के बीच इसे एक पंक्ति की छूट के रूप में देते हैं। यदि आप अर्गला के प्रथम मंत्र का हवन बहुत अधिक नहीं कर सकते हैं, तो कम से कम 108 आहुति कर लीजिए।
करवाए गए मारण के विरुद्ध शीघ्र फल देने वाले पाठ
जहाँ घर पर मारण तंत्र करवाया गया हो वहाँ क्या करना चाहिए?
वक्ता की पसंद शबरी कवच, नरसिंह का माला मंत्र, महाभैरव, और हनुमान जी का बजरंग बाण है — जिनसे शीघ्र लाभ मिलता है। नारायण कवच भी किया जा सकता है, पर हिंदी में वह एक सीमा तक ही रक्षा करेगा; ऐसे अनुष्ठान मंदिर में कीजिए।
जब पूछा गया कि घर में मारण तंत्र से बहुत मुश्किल आ रही है और क्या नारायण कवच का पाठ किया जा सकता है, तो वक्ता अनुमति देते हैं और फिर दिशा बदल देते हैं। यदि आप अपनी रुचि के अनुसार अपनी रक्षा के लिए कुछ प्रयोग करना चाहते हैं तो वह आपकी इच्छा — लेकिन वे जो कहेंगे वह यह है कि यदि आप कर सकते हैं तो शबरी कवच कीजिए। भगवान नरसिंह का माला मंत्र; महाभैरव; हनुमान जी का बजरंग बाण — ये कीजिए, जिनसे आपको शीघ्र लाभ होता है। नारायण कवच भी किया जा सकता है, लेकिन चूँकि प्रश्नकर्ता कहते हैं कि वे इसे हिंदी में करेंगे, हिंदी में भाव के साथ करने से एक सीमा तक ही रक्षा होगी — क्योंकि आरंभ में वे अनुष्ठान नहीं कर पाएँगे और परेशानी बढ़ भी सकती है। स्थान पर उनका निर्देश: इन कवचों का अनुष्ठान मंदिर में कीजिए।
वह गर्भ जहाँ दोबारा नहीं पहुँचना है, और गोवा-शिमला की दौड़
साधना इसलिए है कि चेतना पूर्व जन्मों को जान सके और प्रारब्ध पार कर सके, न कि पैसा, नौकरी या संपत्ति पाने के लिए
साधना इसलिए है कि चेतना इतनी विकसित हो जाए कि व्यक्ति अपने पूर्व जन्मों को जान सके और प्रारब्ध में अटका न रहकर उसे पार कर ले। लोग वास्तव में इसे पैसे, नौकरी, अच्छे जीवनसाथी और धन-संपत्ति के लिए करते हैं — और शरीर बूढ़ा हो जाने पर तब कहीं चार धाम।
वक्ता श्रोताओं को अपने प्रेगनेंसी वाले वीडियो की ओर भेजते हुए उद्देश्य पर एक विषयांतर करते हैं। गर्भ में छठे से नौवें महीने तक बच्चे की जो स्थिति होती है, वे कहते हैं, वह स्थिति आपकी भी रही है और उनकी भी; और उसी स्थिति में दोबारा न पहुँचा जाए, इसीलिए मनुष्य का जन्म मिलता है। लेकिन माँ के गर्भ से निकलते ही बाहर की हवा लगते ही आदमी सब भूल जाता है। तो मनुष्य जीवन में साधना क्यों है: कि हम ऊर्ध्व गति को प्राप्त कर लें, कि हमारी चेतना इतनी विकसित हो जाए कि हम अपने पूर्व जन्म को भी जान लें और फिर अटके न रहकर अपने प्रारब्ध को पार कर लें। और वास्तव में यह किसलिए की जाती है, उनके अनुसार: कि पैसा आ जाए, नौकरी लग जाए, लड़की मिल जाए, सुंदर पति मिल जाए, अच्छा रिश्ता मिल जाए, धन-संपत्ति हो जाए, ताकि आराम से जिया जाए — गोवा जाएँ, शिमला जाएँ, मनाली जाएँ, कोयंबटूर घूमें, मॉरीशस देखें, पूरा वर्ल्ड टूर कर लें। तब तक समय निकल जाता है, और जब शरीर बूढ़ा हो जाता है तब तय होता है कि चार धाम कर लिया जाए। और अब, वे जोड़ते हैं, चार धाम भी नहीं करेंगे, क्योंकि हर जगह रील बनाना बंद कर दिया गया है — तो जाएँ किसलिए। बगल के मंदिर में कोई कभी नहीं जाएगा, लेकिन चार धाम की यात्रा अवश्य होगी, क्योंकि रील डालनी है और फेसबुक-इंस्टाग्राम पर स्टेटस लगाना है।
फोटो पीछे, विग्रह आगे
मूर्ति ले आने के बाद पुरानी फोटो का क्या करें?
फोटो को पीछे रखिए और श्री विग्रह को आगे; पूजन विग्रह पर कीजिए और फोटो को भी धूप-दीप दिखा दीजिए। वक्ता इसे कोई बड़ा विषय नहीं मानते।
एक श्रोता, जो पहले हनुमान जी की पूजा फोटो में करते थे और अब मूर्ति ले आए हैं, पूछते हैं कि क्या फ्रेम की हुई फोटो का पूजन अब भी करना है। वक्ता की व्यवस्था: फोटो को पीछे रखिए और श्री विग्रह को आगे रख दीजिए। पूजन श्री विग्रह पर कीजिए, और फोटो को भी धूप-दीप दिखा दीजिए। वे कहते हैं, इसमें कोई बहुत बड़ा विषय थोड़ी है।
पुण्य का उदय उसी से नापा जाता है जो व्यक्ति की वास्तविक प्राथमिकता है
शुभ पुण्यों का उदय किसे कहते हैं?
वक्ता कोई निश्चित उत्तर नहीं देते: यह व्यक्ति पर और उसकी प्राथमिकता पर निर्भर है। नब्बे प्रतिशत लोग पैसा कमा लेने को ही इसका चिह्न मानते हैं; बाकी लोग जिस भी इच्छा की पूर्ति हो जाए उसे मान लेते हैं।
एक श्रोता कहते हैं कि वक्ता के माध्यम से भगवान बटुक भैरव महाराज के विषय में जो इतनी जानकारी मिल रही है, वह किसी भाग्य उदय से कम नहीं है, और पूछते हैं कि क्या इसी को शुभ पुण्यों का उदय कहते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह व्यक्ति के ऊपर निर्भर करता है — कि वह शुभ पुण्यों का उदय किस चीज को मानता है। कोई मानता है कि पैसा कमा लिया तो पुण्य उदय हुए हैं, और नब्बे प्रतिशत लोग, वे कहते हैं, उसी को मानते हैं। बाकी लोगों की जिस-जिस चीज की इच्छा होती है, वह इच्छा जब पूरी होती है तो वे मानते हैं कि उनके पुण्य उदय हुए हैं। तो, वे कहते हैं, आपकी नजर में जिस चीज की प्राथमिकता है, उसी को आप पुण्यों का उदय मानिएगा। अपना मापदंड वे उदाहरण के रूप में देते हैं: हम जैसे लोग होंगे तो हम कहेंगे कि विंध्य पर्वत की, त्रिकोण की भगवती की 108 प्रदक्षिणा पूरी हो गई — तो हमारे पुण्य उदय हो गए हैं; उन्होंने पूरा करवा दिया। हम कहेंगे कि अपना पुण्य तो वहाँ रखा है।
नकारात्मक साधक की शक्ति के नीचे बैठा देव पूजन
क्या अभिचार करवाने वाला व्यक्ति देवी-देवताओं की पूजा भी करता है?
हाँ, और वह पहले होता है। अभिचार करने से पहले साधक अपने इष्ट को मजबूत करता है — और छोटी विद्या सिखाने वाले गुरु ने स्वयं तंत्रोक्त रूप में शिव या महाकाली की कृपा प्राप्त की होगी, तथा उनकी कोई विशेष योगिनी या गण सिद्ध किया होगा।
वक्ता प्रश्नकर्ता के संदेह की पुष्टि करते हैं और उसके नीचे की व्यवस्था समझाते हैं। यह पहले होता है: अभिचार करने से पहले साधक अपने इष्ट को मजबूत करता है। वे इसे स्वयं को शिक्षक मानकर एक कल्पना के रूप में रखते हैं। मान लीजिए मैं आपको काला जादू सिखा रहा हूँ — कोई नकारात्मक ऊर्जा, कोई मैली विद्या या क्षुद्र विद्या — और आप मेरे शिष्य हैं। तो जान लीजिए कि मैंने, या जो भी मेरे गुरु रहे होंगे उन्होंने, किसी विशेष शक्ति की उपासना अवश्य की होगी और तंत्रोक्त रूप में भगवान शिव या भगवती महाकाली की कृपा प्राप्त की होगी। उनकी कोई विशेष योगिनी या विशेष गण सिद्ध किया गया होगा। और उसके बाद ही हम उनके माध्यम से किसी नकारात्मक ऊर्जा को नियंत्रित करेंगे। वे कहते हैं कि बाद के शिष्य संभवतः उस नकारात्मक शक्ति को सीधे सिद्ध कर रहे होंगे और सीधे चला रहे होंगे — इसीलिए वे अपने गुरुओं की सौगंध देते हैं। साबर में गुरु की सौगंध का इतना भार इसी कारण है: जहाँ किसी चीज को रोकना होता है, वहाँ गुरु की सौगंध देकर रोका जाता है — तुम अपने गुरु की सौगंध से बँधे हो। उनका अंतिम बिंदु यह है कि आधार सदैव मजबूत रखा जाता है। वे अपने इष्ट को मजबूत रखते ही हैं; वही नींव है। लेकिन वे इसे कभी उजागर नहीं करते।
चौखट धोना और कुलवधू द्वारा पाँच तिलक लगाना
घर की चौखट का पूजन कैसे और कब किया जाता है?
उसे गंगाजल से धोइए; नारंगी सिंदूर को घी में मिलाइए; फिर पहले कुलदेवी का स्मरण करके और शुभ मंत्र का उच्चारण करके घर की कुलवधू ऊपर की ओर पाँच स्थानों पर तिलक लगाती हैं। यह होली, दीपावली, नवरात्रि और विजयादशमी पर होता है — दीपावली में अवश्य।
वक्ता विधि संक्षेप में बताते हैं। विशेष समयों और पर्व कालों में घर की चौखट का पूजन करना चाहिए। उसे गंगाजल से धोइए। नारंगी सिंदूर लेकर उसे घी में मिलाइए। फिर पहले अपनी कुलदेवी का स्मरण करके और उसके बाद शुभ मंत्र का उच्चारण करते हुए घर की कुलवधू पाँच स्थानों पर, ऊपर की ओर, तिलक लगाती हैं। वे कहते हैं, यही प्रमुख चौखट पूजन है। अवसर: होली के समय, दीपावली पर, नवरात्रि में, विजयादशमी के समय — और दीपावली में तो अवश्य होता है।
पहले रोटी विधान, फिर गेहूँ के आटे का चौमुखा दीपक
जहाँ कई तांत्रिकों द्वारा मारण किया गया हो वहाँ तत्काल क्या किया जा सकता है?
रोटी विधान तुरंत कीजिए। जहाँ दिक्कत बहुत अधिक है, वहाँ पहले गेहूँ के आटे का चौमुखा दीपक बनाकर क्षेत्रपाल विधि से उतारा शीघ्र कीजिए, और उसके बाद ही हनुमान चालीसा का संपुट हनुमान जंजीरा मंत्र के साथ लगाइए।
एक श्रोता बताते हैं कि उन पर छह बंगाली तांत्रिकों द्वारा मारण किया गया है और पूछते हैं कि क्या वे हनुमान चालीसा का प्रयोग हनुमान जंजीरा मंत्र के संपुट के साथ कर सकते हैं। वक्ता का उत्तर एक चीज को दूसरी से पहले रखता है। रोटी विधान तुरंत, अभी कीजिए। और जहाँ दिक्कत बहुत अधिक है, वहाँ पहला कार्य अलग है: गेहूँ का आटा लेकर उसका चौमुखा दीपक बनाइए, और क्षेत्रपाल विधि से उतारा शीघ्र, तुरंत कीजिए। उसके बाद ही मंत्र लगाइए।
जो ब्राह्मण यज्ञोपवीत कराते हैं वही प्रायश्चित भी कराते हैं
जहाँ उपनयन हुआ ही न हो, वहाँ प्रायश्चित कौन कराएगा?
वही ब्राह्मण जिनसे आप उपनयन के लिए बात करेंगे। जो आपको फिर से यज्ञोपवीत देंगे और संस्कार कराएँगे, वही प्रायश्चित की विधि स्वयं भी करेंगे और आपसे भी कराएँगे — वे संकल्प लेकर कुछ भाग स्वयं करते हैं, क्योंकि यह अकेले संभव नहीं है।
वक्ता यह प्रश्न स्वयं उत्तर देने के बजाय कर्मकांड कराने वालों पर ही छोड़ते हैं। जब आप उपनयन संस्कार के लिए ब्राह्मणों से बात करें, तो उन्हें प्रायश्चित के विषय में भी बता दीजिए; वही इसे करवाएँगे। जो आपको फिर से यज्ञोपवीत देंगे — जो यज्ञोपवीत संस्कार और उपनयन कराएँगे — वही लोग प्रायश्चित की विधि करेंगे और आपसे भी कराएँगे। वे संकल्प लेकर पहले स्वयं भी करेंगे, क्योंकि यह अकेले होना संभव नहीं है; और आपसे भी संकल्प करवाएँगे।
तीन वर्ष का शास्त्रीय नियम, बनाम जन्म की प्रतीक्षा वाली प्रथा
जिस त्यौहार के दिन किसी की मृत्यु हो गई हो, उस त्यौहार का क्या होगा?
शास्त्रोक्त रूप से यह तीन वर्ष का है — जिस पर्व काल में मृत्यु हुई हो, वह पर्व तीन वर्ष तक नहीं मनाया जाएगा और चौथे वर्ष से मनाया जा सकता है। उस दिन किसी के जन्म लेने तक प्रतीक्षा करने की प्रथा एक अलग प्रचलन है; अपने पुरोहित से पूछिए कि आप पर कौन सा लागू है।
वक्ता शास्त्रीय नियम और प्रचलित प्रथा को अलग करते हैं, और बताते हैं कि शास्त्रीय पक्ष उन्होंने कहाँ सुना। नियम: यदि किसी त्यौहार के पर्व काल में किसी की मृत्यु हो जाती है, तो वह पर्व तीन वर्ष तक नहीं मनाया जाएगा, और चौथे वर्ष से मनाया जा सकता है। इसका श्रेय वे कौशिक जी महाराज को देते हैं, जिनके शॉर्ट्स वायरल होते हैं और जिन्होंने, वे कहते हैं, इसे अच्छे से बताया था। प्रथा: उनके अपने समाज में प्रचलन यह है कि जब तक उस दिन कोई जन्म न ले तब तक वह पर्व नहीं मनाया जाएगा। प्रश्नकर्ता के लिए उनका निर्देश यह पता करने का है कि उन पर कौन सा लागू है — आपके पुरोहित क्या कह रहे हैं, तीन वर्ष या जब तक कोई जन्म न ले — और उसी अनुसार निर्णय लीजिए। यदि शास्त्र आज्ञा से जाइएगा तो तीन ही वर्ष का है। दसवें संस्कार के त्यौहार से पहले पूरा न हो पाने वाले प्रश्न पर वे स्पष्ट हैं: इसमें खोटा होने का कोई लेना-देना नहीं है, ऐसा कुछ नहीं है। उस दिन रक्षाबंधन नहीं मनाएँगे; अगले साल से आप आराम से मना सकते हैं। यहीं से वे एक और प्रचलन की आलोचना में चले जाते हैं: उपनयन संस्कार को देखिए — बच्चे बूढ़े हो जा रहे हैं और उपनयन हो ही नहीं रहा, कि शादी होगी तभी होगा, कि ब्याह नहीं हुआ तो यज्ञोपवीत हुआ ही नहीं। और यदि हो भी गया तो शादी के बाद उसे उतारकर रख देते हैं, यह कहकर कि यज्ञोपवीत का नियम नहीं निभा पाएँगे। यह सब, वे कहते हैं, गलत है।
दशमी पर गंगा पूजन, और बटुक भैरव जयंती
दशमी तिथि पर गंगा पूजन, और गंगा दशहरा पर बटुक भैरव जयंती
दशमी तिथि के दिन भगवती गंगा का पूजन करना चाहिए। गंगा दशहरा का काल वही दिन है जिस दिन बटुक भैरव जयंती पड़ती है, और उस दिन उनका विशेष पूजन किया जाता है — इस पर चैनल पर पहले से एक वीडियो है।
वक्ता इसे संक्षेप में बताते हैं। दशमी तिथि के दिन भगवती गंगा आदि का पूजन करना चाहिए। और गंगा दशहरा का समय वही दिन है जिस दिन बटुक भैरव जयंती पड़ती है; उस दिन उनका विशेष पूजन किया जाता है। वे श्रोताओं को चैनल पर पहले से मौजूद उस वीडियो की ओर भेजते हैं।
एक बार पूजित हो जाने पर विग्रह बेहतर विग्रह से बदला नहीं जाता
अनजाने में सस्ते में लिया गया विग्रह भी, एक बार पूजित हो जाने पर, बदला नहीं जाता
वक्ता उत्तर एक प्रश्न से देते हैं: अब जब वे पूजित हो गए हैं, तो बदलना क्यों है? विग्रह किस दाम में लिया गया या कैसे चुना गया, इससे परे वे स्थापित पूजा को ही निर्णायक मानते हैं।
एक श्रोता बताते हैं कि उस समय उन्हें जानकारी नहीं थी और विग्रह हल्के में — सस्ते में — लिया गया था, और अब पता चलने पर वे उसे बदलना चाहते हैं। वक्ता का पूरा उत्तर उल्टा प्रश्न ही है: अब, जब वे पूजित हो गए हैं, तो उसे बदलना क्यों है? यह वही सिद्धांत है जिससे उन्होंने सत्र आरंभ किया था, यहाँ उस स्थिति पर लागू जहाँ दोष घमंड का नहीं बल्कि अनजानेपन का था: स्थापित पूजा ही विषय को तय कर देती है।
बार-बार बच्चों का सपना, और घर का बंधन
सपने में बार-बार छोटे बच्चे दिखना किसका संकेत है?
जहाँ वे बार-बार दिख रहे हों, वहाँ वक्ता की बताई भगवती काली की विधि कीजिए — काली मंदिर में किया जाने वाला वह पूजन — और उसके बाद घर की निकारी करके घर का बंधन कीजिए। यदि स्वयं न कर सकें तो किसी से करवा लीजिए।
सपने में बार-बार छोटे बच्चे दिखने के विषय में पूछे जाने पर वक्ता सपने से अधिक उसके बार-बार आने को संकेत मानते हैं। जहाँ वे बार-बार दिख रहे हैं, वहाँ भगवती काली के लिए उनकी बताई विधि कीजिए — काली मंदिर में जाकर वह पूजन करना। और उसके बाद: घर की निकारी कीजिए और घर का बंधन कीजिए। यदि आप स्वयं नहीं कर सकते तो किसी से करवा लीजिए।
लंबी साधना के लिए फोटो नहीं, विग्रह क्यों चाहिए
क्या कालिका योगिनी साधना फोटो पर की जा सकती है?
नहीं — फोटो पर मत कीजिए, क्योंकि यह लंबी साधना है जिसका प्रभाव जीवन भर रहता है। फोटो खराब हो जाए तो पूरी साधना प्रभावित होती है। बहुत छोटा ही सही, पर श्री विग्रह रखिए।
वक्ता इस विशेष साधना के लिए फोटो को अस्वीकार करते हैं और अपना कारण सिद्धांत नहीं बल्कि अवधि बताते हैं। वे कहते हैं, फोटो पर मत कीजिए, क्योंकि यह लंबी साधना है; इसका प्रभाव जीवन भर रहता है। यदि फोटो खराब हो गई तो उनके अनुसार पूरी साधना — और उनका अपना मन इसकी संस्तुति करने की अनुमति नहीं देता। उनका निर्देश: छोटा सा ही सही, श्री विग्रह रखिए, पर विग्रह रखिए।
उल्टा सिंह, जिससे वह प्रत्यंगिरा स्वरूप हो जाता है
दुर्गा के विग्रह में सिंह किस ओर मुख किए है, क्या इससे अंतर पड़ता है?
हाँ। जहाँ सिंह उल्टा है, वहाँ स्वरूप विपरीत प्रत्यंगिरा के भाव में चला जाता है — उल्टा सिंह दुर्गा प्रत्यंगिरा का माना जाता है। उल्टे सिंह वाला विग्रह नहीं रखना चाहिए।
जब पूछा गया कि माता के विग्रह में सिंह उनके दाएँ हाथ की ओर है या बाएँ, इससे क्या अंतर पड़ता है, तो वक्ता उत्तर इस रूप में देते हैं कि तब वह विग्रह किस स्वरूप का हो जाता है। यदि आशय उल्टे सिंह से है, तो वे विपरीत प्रत्यंगिरा के भाव में चली जाती हैं; दुर्गा प्रत्यंगिरा में उल्टा सिंह ही माना जाता है। उनका निष्कर्ष सीधा निषेध है: उल्टे सिंह वाला नहीं रखना चाहिए।
बाल गोपाल, जिनका कोई तंत्रोक्त वर्णन नहीं है
क्या बाल गोपाल के श्री विग्रह पर आवरण पूजन किया जा सकता है?
बिल्कुल नहीं — बाल गोपाल का कोई तंत्रोक्त वर्णन है ही नहीं, और वक्ता इसे शौकिया पूजा कहते हैं। वे संतान गोपाल स्वरूप को, जिसका शास्त्रीय वर्णन है, उस लड्डू गोपाल स्वरूप से अलग करते हैं जिसे लोग वास्तव में रखते हैं।
वक्ता इसका उत्तर स्पष्ट रूप से देते हैं: बिल्कुल नहीं। वे कहते हैं, सत्य यह है कि बाल गोपाल का कोई तंत्रोक्त वर्णन ही नहीं है। और कितने लोग तो, वे जोड़ते हैं, इसका शास्त्रीय वर्णन तक नकारते हैं — यह एक शौकिया पूजा है, और यही वास्तविकता है। इसके बाद वे भक्ति वाले पक्ष को स्वीकार करते हैं, पर कर्मकांड वाले को नहीं। इससे आगे यह सबकी श्रद्धा और भाव है; भगवान को बाल स्वरूप में भाव से पूजिए, और वे स्वयं भी पूजते हैं। लेकिन अब इसे हर जगह मत कहिएगा — भाव से हम भगवान को किसी भी स्वरूप में स्थापित कर सकते हैं, फिर भी यह हर स्थान पर नहीं चलेगा। उनका भेद: संतान गोपाल स्वरूप और जो लड्डू गोपाल स्वरूप हम देखते हैं, दोनों अलग-अलग चीजें हैं। लड्डू गोपाल का वर्णन कहाँ है? लड्डू गोपाल का वर्णन नहीं है; संतान गोपाल का है, और संतान गोपाल का स्वरूप अलग है। वे एक ऐसी बात भी जोड़ते हैं जिससे वे आश्चर्य की अपेक्षा करते हैं: ध्यान मंत्र कीजिए और आपको लगेगा कि भगवती विंध्यवासिनी के स्वरूप और संतान गोपाल के स्वरूप में थोड़ा ही अंतर है — और आश्चर्य होगा कि दोनों ऐसे कैसे हो सकते हैं।
विंध्यवासिनी के पूजन के लिए फोटो का पर्याप्त होना
क्या भगवती विंध्यवासिनी का पूजन फोटो से किया जा सकता है?
हाँ — वक्ता कहते हैं कि भगवती विंध्यवासिनी का पूजन बिल्कुल किया जा सकता है, और उसके लिए फोटो ही पर्याप्त है।
सत्र के अंतिम उत्तरों में वक्ता कहते हैं कि भगवती विंध्यवासिनी का पूजन बिल्कुल किया जा सकता है, और उसके लिए फोटो जो है उतना ही बहुत है।
आसन से उठना, मस्तक पर जल लगाकर
पूजा समाप्त होने के बाद आसन से कितनी देर में उठना चाहिए?
कम से कम एक-दो मिनट तो अवश्य बैठना चाहिए। फिर आसन उठाकर वहाँ जल डालिए, वह जल अपने मस्तक पर लगाइए, और भगवान इंद्र का स्मरण करते हुए उठिए।
वक्ता एक बैठक के समापन की विधि बताते हैं। पूजा समाप्त होने के बाद कम से कम एक-दो मिनट, न्यूनतम इतना तो बैठना ही चाहिए। फिर आसन उठाकर जल डालिए; वह जल अपने मस्तक पर लगाइए; और भगवान इंद्र का स्मरण करते हुए तब उठिए।
फोटो, जिन्हें खराब हो जाने पर हटाया जा सकता है
विग्रह न हटाने का नियम फोटो पर लागू नहीं होता
नहीं, यह फोटो पर लागू नहीं है — फोटो तो वैसे भी अपने आप खराब हो जाती है। इसमें परेशान होने की आवश्यकता नहीं है: फोटो पाँच-दस साल में खराब हो जाती है और तब हटाई जा सकती है, और जब तक ठीक है तब तक उसका पूजन करते रहिए।
वक्ता सत्र के आरंभिक तर्क की सीमा बताकर उसे पूरा करते हैं। विग्रह न हटाने वाला नियम फोटो पर लागू नहीं होता, क्योंकि फोटो तो वैसे भी अपने आप खराब हो जाती है। इसमें परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। फोटो पाँच-दस साल में खराब हो जाती है, और तब उसे हटाया जा सकता है। जब तक वह ठीक है, तब तक उसका पूजन करते रहिए।
ट्रेडिंग में जाने से पहले राहु और पंचम भाव देखना
स्टॉक मार्केट ट्रेडिंग में सफलता के लिए कौन सी साधना करनी चाहिए?
वक्ता कोई साधना नहीं बताते। पहले जन्म कुंडली दिखवाइए — राहु की स्थिति क्या है, पंचम भाव की स्थिति क्या है — और उसके बाद ही इन सब में जाइए। और तब भी, वे कहते हैं, यह कहना मुश्किल है कि फलादेश सौ प्रतिशत सटीक होगा।
जब पूछा गया कि स्टॉक मार्केट ट्रेडिंग में सफलता के लिए कौन सी साधना करनी चाहिए, तो वक्ता इसे साधना का नहीं बल्कि पात्रता का प्रश्न मानते हैं, और प्रश्न पर उनका मनोरंजन स्पष्ट है। यदि आपको ट्रेडिंग में सफलता चाहिए, तो सबसे पहले अपनी जन्म कुंडली दिखवाइए: राहु की स्थिति क्या है, पंचम भाव की स्थिति क्या है। उसे ठीक से दिखवाकर ही इन सब चीजों में जाना चाहिए। और वे उतना भी वचन देने से इनकार करते हैं: यह कहना भी मुश्किल है कि वह सौ प्रतिशत एग्जैक्ट फलित होगा।
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