पूरा परिवार तांत्रिक प्रहार से पीड़ित — दत्तात्रेय वज्र पंजर कवच संपुट पाठ से रक्षा (सत्य घटना)
तांत्रिक प्रहार से रोगग्रस्त और निद्राहीन एक परिवार की सत्य घटना, और दत्तात्रेय वज्र पंजर कवच का संपुट पाठ — उसकी पूर्व शर्तें, विधान, प्रदर्शित संपुट और परिणाम — जिससे वक्ता के अनुसार उस परिवार की रक्षा हुई।
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पूरे घर पर तांत्रिक प्रहार के लक्षण: बिना मेडिकल कारण के रोग, पलट जाने वाली राहत, डरावने सपने और पूजा से उचटा मन
कानपुर के परिवार के प्रसंग में बताए गए लक्षण
वक्ता कानपुर के एक परिवार का प्रसंग बताते हैं जिसमें हर सदस्य को कोई न कोई रोग था — बुखार, पेट दर्द आदि — पर मेडिकल जाँच में कोई ठोस कारण नहीं आता था और दवा असर नहीं करती थी। झाड़-फूँक और काट से राहत मिलती थी, पर दस-पंद्रह दिन में सब पलट जाता था और एक सदस्य से शुरू होकर एक-दो दिन में सबको वही समस्या हो जाती थी। रात में किसी को ठीक नींद नहीं आती थी, डरावने और गंदे सपने आते थे, सिर के पास कोई बैठा लगता था, मनोबल टूटा हुआ था, और पूजा-पाठ का विचार आते ही मन उचट जाता था कि यह सब बेकार है।
वक्ता भगवान दत्तात्रेय के कवच प्रयोग पर एक सत्य घटना शुरू करते हैं, जो उत्तर प्रदेश के कानपुर क्षेत्र की है। वे कहते हैं कि संबंधित साधक कोई विशेष उपासक नहीं थे — किसी सिद्धि के लिए कोई साधना नहीं करते थे। इनके परिवार के सभी सदस्यों को कोई न कोई रोग था: किसी को बुखार, किसी को पेट दर्द, किसी को कुछ और। सबसे अजीब बात यह थी कि मेडिकल टेस्ट में कोई ऐसा ठोस कारण नहीं दिखता था जिसे डॉक्टर बीमारी कह सकें, और बुखार की दवा का कोई खास असर नहीं होता था। घर में कमाने वाले एक ही व्यक्ति थे और वे भी पूरी तरह परेशान थे। बहुत जगह दिखाया-सुनाया और राहत भी होती थी — जब झाड़-फूँक और तंत्र काट की जाती थी तो आराम मिल जाता था। लेकिन चीज़ें पलट जाती थीं, चाहे दस दिन में या पंद्रह दिन में। वक्ता इसे सबसे बुरी बात बताते हैं: जहाँ एक सदस्य को दर्द शुरू हुआ, शाम होते-होते या चौबीस घंटे से दो दिन में सबको फिर वही पुरानी समस्या शुरू हो जाती थी। इसके साथ रात में किसी को ठीक से नींद नहीं आती थी — बहुत डरावने और गंदे सपने, डर-डर कर जाग जाना, और कई बार ऐसा अनुभव कि सिर के पास कोई बैठा हुआ है। इससे मनोबल टूट गया था, और जिसका मनोबल टूटा हो वह ऐसा कोई प्रयास भी नहीं करता जिससे वह कुछ कर पाए। जब इनसे पूछा गया कि क्या इस समस्या से छूटने के लिए आप पूजा-पाठ करते थे, तो उत्तर था कि शुरू में थोड़ा-बहुत प्रयास किया, कोई विशेष नहीं। लेकिन जब पूजा-पाठ का विषय आता था तो मन बहुत उचट जाता था: लगता था कि भगवान की पूजा करेंगे तो उससे कुछ होने वाला नहीं है — यह सब मत करो, यह सब बेकार की, फालतू की चीज़ें हैं। इसी कारण घर में सेवा-पूजन का स्थान भी उपेक्षित पड़ा था। जो जैसा बताता था वैसा छोटा-मोटा उपाय कर लेते थे, दिखा-सुना लेते थे, राहत हो जाती थी; अब दिक्कत बढ़ गई थी और राहत नहीं हो रही थी। बुज़ुर्ग माता-पिता को भी समस्या थी — वक्ता मानते हैं कि बुढ़ापे में रोग लगता ही है, पर यह अतिरिक्त रोग अलग विषय था, क्योंकि मेडिकल में कम से कम कुछ तो आना चाहिए था, और वहाँ कुछ नहीं आ रहा था।
वज्र पंजर कवच संपुट प्रयोग से पहले की नींव: दत्त दीक्षा, जागृत एकाक्षरी मंत्र और जागृत कवच
कानपुर के प्रसंग में चार लाख जप और 4100 पाठ; न्यूनतम 1100 पाठ
वक्ता कहते हैं कि संपुट सीधे-सीधे कभी नहीं लगाया जाता। कानपुर के प्रसंग में साधक ने पहले भगवान दत्तात्रेय का दीक्षा विधान पूर्ण किया, फिर शिव मंदिर में दत्त एकाक्षरी मंत्र का चार लाख का पुरश्चरण, और फिर वज्र पंजर कवच का एक मंडल का अनुष्ठान — 41 दिन में 4100 पाठ, प्रतिदिन 108 पाठ सुबह-शाम में बाँटकर, मंदिर में सुबह चार बजे से। सामान्य नियम के रूप में वे कहते हैं: प्रयोग से पहले एकाक्षरी मंत्र को जागृत कर लें और कवच के कम से कम 1100 पाठ कर लें — 41 दिन न हो सके तो 11 दिन — साथ में दत्त पूजा, हवन और ब्राह्मण भोज या किसी साधु को भोजन, ताकि कवच जागृत हो जाए।
वक्ता कहते हैं कि जब परिवार की यह स्थिति थी, तब उस व्यक्ति से कहा गया कि पहले भगवान दत्तात्रेय का दीक्षा विधान पूर्ण करें और उसके बाद शिव मंदिर में भगवान दत्त के एकाक्षरी मंत्र का चार लाख का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करें। इसमें उन्हें काफी समय लगा, क्योंकि वे बिल्कुल नए साधक थे — जप की विधि नई थी और, जैसा वक्ता कहते हैं, नए-नए में माला जल्दी अच्छे से नहीं घूमती। पर उन्होंने चार लाख पूर्ण किया। अगला अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। उनसे भगवान दत्तात्रेय के वज्र पंजर कवच कवच का करवाया गया: 41 दिन और 4100 पाठ। यानी प्रतिदिन मूल कवच के 108 पाठ — मूल पाठ वहाँ से, जहाँ से रक्षण के लिए कहा गया है, विनियोग, न्यास, ध्यान और मंत्र के बाद। एक बार में नहीं कर पाते थे, तो सुबह 50 और शाम को 50-51 करते थे। इनका समय बिल्कुल भोर का था, जब मंदिर बंद रहता था — पंडित जी, वक्ता कहते हैं, छह-सात बजे आते थे — तो ऑफिस के कारण ये सुबह चार बजे से जाकर अपना जप पूर्ण कर लेते थे। मंदिर खुलने पर साफ-सफाई में सहयोग करते, थोड़ी देर बैठकर पाँच पाठ और कर लेते, समर्पण करके चले जाते, और शिव जी की जो सेवा-पूजा-श्रृंगार बन पड़े वह कर लेते थे। वक्ता साफ कहते हैं कि 41 दिन की मंडल पूजा पूरी हुई, पर वे यह नहीं कहेंगे कि पूरा नीति-नियम पालन करके हुई — वह हो ही नहीं पाया। लंबी साधना थी और पहली बार थी; इससे पहले उन्होंने सात-सात दिन के दो छोटे प्रयोग किए थे, जिनमें सफलता मिली थी, पर वही अस्थायी वाली। सामान्य नियम के रूप में वक्ता कहते हैं कि संपुट सीधे-सीधे नहीं लगाया जाता: यहाँ प्रयोग से पहले चार लाख का जप और एक मंडल का 4100 पाठ का अनुष्ठान हो चुका था। जो भी प्रयोग करना चाहे, वह पहले एकाक्षरी मंत्र को जागृत कर ले और वज्र पंजर कवच के कम से कम 1100 पाठ कर ले — 41 दिन न हो सके तो 11 दिन — साथ में भगवान दत्त की पूजा-सेवा, हवन, और ब्राह्मण भोज या किसी साधु-संन्यासी को भोजन, ताकि कवच जागृत हो जाए। उसके बाद, वे कहते हैं, इसे रक्षण या बंधन के लिए प्रयोग किया जा सकता है, और वह सारा कार्य कोई भी कर सकता है।
क्या लंबे अनुष्ठान के बीच स्वप्न दोष से साधना खंडित हो जाती है?
अनैच्छिक स्वप्न दोष शक्ति साधना के बाहर कोई दोष नहीं
वक्ता कहते हैं नहीं। 41 दिन के कवच अनुष्ठान के बीच साधक को वह स्वप्न दोष हुआ जो पुरुषों को होता है, और उन्होंने पूछा कि अब तो साधना खंडित हो गई। बड़े संत-महात्माओं और शंकराचार्य परंपरा के साधकों का हवाला देते हुए वक्ता कहते हैं कि यदि स्वप्न में ऐसी स्थिति स्वयं उत्पन्न हो और साधना कोई शक्ति या महाशक्ति साधना न हो, तो उसे किसी दोष में न लें — आपने कोई प्रयास नहीं किया, तो आपको कुछ करना नहीं है; उसे अनदेखा करें, पकड़कर न बैठें। दायरा वे जोड़ते हैं: भगवती की कुछ विशेष शक्ति साधनाओं में इसका विशेष ध्यान रखना पड़ता है, वहाँ यह अनिवार्य हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि जब 41 दिन की साधना शुरू हुई, तो बीच में वह स्वप्न दोष की समस्या, जो पुरुषों को होती है, हुई। वे इसे जान-बूझकर कह रहे हैं, क्योंकि बहुत लोग कमेंट करेंगे कि इतने दिनों में तो ऐसा हो जाता है — हाँ, इनके साथ भी हुआ था। साधक ने पूछा कि अब तो साधना खंडित हो गई। वक्ता का उत्तर: कई बड़े संत-महात्मा और शंकराचार्य परंपरा के साधक कहते हैं कि यदि स्वप्न में स्वयं से ऐसी स्थिति उत्पन्न हो, और वह कोई शक्ति साधना या महाशक्ति साधना न हो, तो उसे किसी प्रकार के दोष में मत लीजिए। उसमें कोई दोष नहीं है। आपने कोई प्रयास नहीं किया — और आपको करना भी नहीं है। यहाँ यही सत्य था: उस व्यक्ति ने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया था; बहुत सही व्यक्ति थे। तो उन्होंने साधना पूर्ण की। वक्ता कहते हैं कि वे यह इसलिए बता रहे हैं ताकि यदि किसी के साथ साधना के मध्य ऐसी घटना घटे, तो वह कम से कम यह जानता रहे कि इस पर ध्यान नहीं देना है, इसे पकड़कर नहीं बैठना है; यह आपका कोई दोष नहीं, शरीर की अवस्था है — अनदेखा कीजिए। दूसरा नियम, कि यह भी नहीं होना चाहिए, अलग प्रकार की साधनाओं का है: भगवती की कुछ विशेष साधनाएँ, शक्ति संबंधी साधनाएँ ऐसी होती हैं जिनमें इन सब विषयों का विशेष ध्यान रखना पड़ता है, और वहाँ यह अनिवार्य हो जाता है।
परिवार पर किए अभिचार और कृत्या के नाश के लिए एकाक्षरी बीज से वज्र पंजर कवच का संपुट प्रयोग
संकल्प, हर श्लोक के आगे-पीछे ओम द्राम, रक्षा श्लोकों तक 27 पाठ, ग्यारह दिन
वक्ता कानपुर के प्रसंग में शिव मंदिर में किए गए प्रयोग का वर्णन करते हैं: संकल्प कि वज्र पंजर कवच के इस संपुट पाठ से साधक और उसके परिवार पर की गई हर अभिचारिक गतिविधि और कृत्या प्रयोग नष्ट हो और उनका रक्षण हो। पूर्व पीठिका, विनियोग, न्यास, ध्यान और मंत्र एक बार पढ़े जाते हैं, पंचोपचार या मानसोपचार पूजन होता है, और जहाँ से कवच आरंभ होता है वहाँ से हर श्लोक को प्रणव और उसके बाद एकाक्षरी बीज से लपेटा जाता है — श्लोक से पहले "ओम द्राम" और बाद में "द्राम", जो वे पहले तीन श्लोकों पर दिखाते हैं। ऐसे कम से कम 27 पाठ किए जाते हैं, वहाँ तक जहाँ तक कवच में रक्षण के लिए कहा गया है, फलश्रुति छोड़कर। वे कहते हैं कि प्रयोग ग्यारह दिन चला, तुरंत राहत मिली, बच्चे का पुराना पेट दर्द पहले दिन से कम हुआ और तीसरे-चौथे दिन सामान्य हो गया; इसके बाद दत्तात्रेय माला मंत्र का प्रयोग हुआ, जिसे वे दूसरे वीडियो के लिए रखते हैं।
वक्ता कहते हैं कि अनुष्ठान पूर्ण होने पर प्रयोग शुरू हुआ — वह भी शिव जी के मंदिर में ही। पहले प्रयोग में यह संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। था: कि वज्र पंजर कवच कवच के इस संपुट पाठ से हम और हमारे घर-परिवार पर जो भी अभिचार गतिविधि की गई है, जो भी कृत्या प्रयोग है, वह नष्ट हो जाए और हमारा और हमारे परिवार का रक्षण हो। पाठ एकाक्षरी बीज का संपुट लगाकर होता था। वे कहते हैं कि यह संपुट विधान उन्होंने एक लाइव में थोड़ा बताया था और आज भी थोड़ा बता देते हैं; व्यक्तिगत बातचीत में वे अनुष्ठान करने वाले दत्त सेवकों को — विशेषकर गुजरात और महाराष्ट्र के साधकों को — सदा यही करने को कहते हैं, और इसमें लाभ भी होता है, एक तो क्योंकि उनका समर्पण और श्रद्धा भगवान दत्त के प्रति पहले से है, दूसरा क्योंकि यह विधान हो जाने पर ऐसा हो ही नहीं सकता कि प्रभाव न दे। ढाँचा: कवच की पूर्व पीठिका — पूरा विषय कि वज्र पंजर कवच किसे कैसे मिला — और फिर विनियोग, न्यास और ध्यान मंत्र एक बार पढ़े जाते हैं। सिद्धि के समय भी और प्रयोग के समय भी पंचोपचारपूजा का मूल पंचांग क्रम — धूप, दीप, गंध, पुष्प व नैवेद्य — जो साधना की प्रारंभिक क्रियाओं के बाद देवता हेतु किया जाता है। या मानसिक पूजन किया जाता है, और जहाँ से वज्र पंजर कवच स्वयं आरंभ होता है वहाँ से संपुट लगाना है। संपुट में जहाँ प्रणव बोलेंगे, उसके बाद एकाक्षरी बीज का उच्चारण करेंगे; इस तरह हर श्लोक के आगे और पीछे एक-एक बार एकाक्षरी बीज बोलना है। श्लोक से ठीक पहले द्राम बीज, और बाद में फिर एकाक्षरी द्राम बीज — तो हो जाएगा "ओम द्राम", फिर "दत्तात्रेयः शिरः पातु" से शुरू होने वाला श्लोक, फिर "द्राम"; फिर "द्राम" और अगला श्लोक, और इसी तरह आगे। वे तीन श्लोक ऐसे पढ़कर दिखाते हैं और कहते हैं कि हर श्लोक में ठीक इसी तरह संपुट लगाना है और एकाक्षरी का संपुट लगाते हुए पाठ करते जाना है। वे कहते हैं कि वे धीरे-धीरे बोल रहे हैं ताकि जो प्रयोग करे उसे सहयोग हो। ऐसे कम से कम 27 पाठ किए जाते हैं। कहाँ तक, इस पर वे कहते हैं: दत्तात्रेय वज्र पंजर कवच में जहाँ तक रक्षण के लिए कहा गया है वहाँ तक — फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। छोड़कर; फलश्रुति में संपुट लगाने की आवश्यकता नहीं है। यही विधान उस व्यक्ति ने किया। इसके बाद प्रभाव पड़ना शुरू हुआ और बहुत राहत हुई। यह मात्र ग्यारह दिन का प्रयोग था, प्रतिदिन 27 संपुट पाठ और परिवार के रक्षण की प्रार्थना, जो संकल्प में ही रहती थी। वक्ता कहते हैं कि संपुट वाले इस कवच विधान से जबरदस्त लाभ हुआ: उस व्यक्ति के अनुसार उनके बच्चे का पेट दर्द, जो कभी ठीक ही नहीं होता था, अनुष्ठान के पहले दिन से ही कम हुआ और तीसरे-चौथे दिन पूरी तरह सामान्य हो गया। इसके बाद दत्तात्रेय माला मंत्र का प्रयोग भी करवाया गया, जिसे वक्ता दूसरे वीडियो के लिए रखते हैं।
संपुटित वज्र पंजर कवच से गृह बंधन: घर में 108 पाठ, सात दिन दत्त हवन और क्षेत्रपाल निकारी
परिवार को राहत मिलने के बाद घर का बंधन
वक्ता कहते हैं कि परिवार को राहत मिलने के बाद घर में ही इसका प्रयोग शुरू करवाया गया, घर के बंधन के लिए: गृह बंधन का संकल्प करके इसी कवच के 108 संपुट पाठ घर में, साथ में एकाक्षरी मंत्र और भगवान दत्तात्रेय के नाम मंत्र से 108 आहुतियों का हवन, पूरे सप्ताह, सातों दिन। इससे घर पूरी तरह सुरक्षित हो गया; क्षेत्रपाल निकारी आदि की प्रक्रिया भी की गई। वे पूरे विधान को बिल्कुल सरल बताते हैं, इसमें कोई क्लिष्ट विधान नहीं — धीरे-धीरे करेंगे तो सामर्थ्य भी मिलेगा और हो भी जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि फिर घर में इसका प्रयोग शुरू करवाया गया। गृह बंधन — घर के बंधन — का संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करके इसी कवच के 108 संपुट पाठ घर में किए गए, और साथ में एकाक्षरी मंत्र तथा भगवान दत्तात्रेय के नाम मंत्र से 108 आहुति का हवन। यह हवन सप्ताह भर, सातों दिन चला। इससे, वे कहते हैं, घर पूरी तरह सुरक्षित हो गया। क्षेत्रपाल निकारीक्षेत्रपाल को अर्पित एक विसर्जन-अनुष्ठान — सुरक्षा तथा क्षेत्र में निवास करने वाली दुष्ट शक्तियों (डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल) की शांति हेतु प्रार्थना, जो घर की देहरी पर व्याप्त दुष्ट ऊर्जाओं को कम-से-कम 24 घंटे हेतु शुद्ध कर देती है। आदि की प्रक्रिया भी की गई। इसका और विवरण वे नहीं देते। अंत में वे कहते हैं कि यह पूरा बिल्कुल सरल विधान है; इसमें कोई क्लिष्टतम विधान नहीं है। धीरे-धीरे करेंगे तो आपको सामर्थ्य भी मिलेगा और कर भी लीजिएगा।
महागुरु स्वरूप भगवान दत्तात्रेय: जिन पर उनकी कृपा हो, उन पर कोई तंत्र नहीं चलता
ब्रह्मा, विष्णु, महेश और जगदंबा की एकत्र शक्ति
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्त गुरु स्वरूप में, महागुरु स्वरूप में हैं, और उनकी सेवा-पूजा करने को कहते हैं। कितना भी बड़ा प्रेत-पिशाच हो, या कोई भी इस्लामिक शक्ति या तंत्र-मंत्र किया गया हो, यदि आप समर्पित होकर उनकी सेवा करते हैं तो उनके पास ब्रह्मा, विष्णु, महेश की एकत्र शक्ति और भगवती जगदंबा की महाशक्ति है; भगवती की कृपा से वे सर्व-समर्थ महासिद्ध हैं, सारी परंपराएँ उन्हीं से हैं, और उनकी कृपा से हर प्रकार के तंत्र पर विजय मिल सकती है। जिनके पीछे भगवान दत्त खड़े हों, वे पूछते हैं, उन्हें कौन हरा सकता है और उन पर कौन सा तंत्र चल सकता है? मनुष्य तो मनुष्य है; यह महाशक्ति है, और उनकी शरणागति में बहुत क्षमता है।
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्त गुरु स्वरूप में हैं — महासिद्ध महागुरु स्वरूप में। उनकी सेवा-पूजा कीजिए। कितना भी बड़ा प्रेत-पिशाच हो, और कोई भी इस्लामिक शक्ति या तंत्र-मंत्र किया गया हो, यदि आप समर्पित होकर उनकी सेवा कर रहे हैं, तो उन हर चीज़ के सामने उनके पास ब्रह्मा, विष्णु, महेश की एकत्र शक्ति है, और भगवती जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। की महाशक्ति उनके पास है। भगवती की कृपा से, वे कहते हैं, दत्त सर्व-समर्थ महासिद्ध हैं; जितनी भी परंपराएँ हैं, उन्हीं से हैं। इसलिए उनकी कृपा से आप हर प्रकार के तंत्र पर विजय पा सकते हैं। जिनके पीछे भगवान दत्त खड़े हो जाएँ, जिन पर उनकी कृपा हो जाए — उन्हें भला कौन हरा सकता है और उन पर कौन सा तंत्र चल सकता है? मनुष्य तो मनुष्य ही हो सकता है; यह महाशक्ति है। उनकी शरणागति में, वे कहते हैं, बहुत क्षमता है।
परिवार के रक्षण के लिए बृहस्पतिवार भगवान दत्त को: कवच या माला मंत्र पाठ, पूजा, दीपदान, और मज़ार-दरगाह की जगह उनका मंदिर
गुरु संप्रदाय के महागुरु को सप्ताह का एक दिन
वक्ता सबसे कहते हैं कि अपने परिवार के रक्षण के लिए हर बृहस्पतिवार कम से कम इतना करें: दत्तात्रेय वज्र पंजर कवच का पाठ, या उनके माला मंत्र का पाठ, या उनकी सामान्य पूजा, या — समस्या बड़ी हो तो — दीपदान की विधि, बृहस्पतिवार दर बृहस्पतिवार। बृहस्पतिवार को कभी किसी मुल्ला, मज़ार, दरगाह या किसी पीर-फ़कीर के स्थान पर न जाएँ; भगवान दत्त के मंदिर जाएँ, और न हो तो घर में उनकी पूजा करें, उनका स्मरण और आवाहन करें। कवच को हिंदी में पढ़ने से, वे कहते हैं, पता चलता है कि दत्त स्मरण मात्र से कितनी जल्दी आ जाते हैं; गुरु परंपरा के इन महागुरु को सप्ताह का एक दिन दें तो आपका और परिवार का कल्याण होगा, अकल्याण कभी नहीं।
वक्ता कहते हैं कि बृहस्पतिवार के दिन आप सभी अपने परिवार के रक्षण के लिए कम से कम दत्तात्रेय वज्र पंजर कवच कवच का पाठ, या उनके माला मंत्र का पाठ, या उनकी सामान्य पूजा, या — समस्या ज़्यादा हो तो — दीपदानविशेष अवसरों — जैसे गंगा दशहरा पर काल भैरव या बटुक भैरव की पूजा — पर किया जाने वाला दीपदान अनुष्ठान। की विधि, हर बृहस्पतिवार ज़रूर करें। बृहस्पतिवार के दिन, वे कहते हैं, कभी भी किसी मुल्ला, मज़ारएक अशास्त्रीय समाधि-स्थल — विशेषकर गुरुवार (भगवान दत्तात्रेय के पवित्र दिन) को ऐसे स्थलों की पूजा सनातन धर्म के विरुद्ध है और निम्न प्रेत-शक्तियों को पोषित कर सकती है। या दरगाह, किसी पीर-फ़कीर के स्थान पर न जाकर भगवान दत्त के मंदिर जाइए। न हो तो अपने घर में भगवान दत्त की पूजा कीजिए, उनका स्मरण कीजिए, उनका आवाहन कीजिए। इसी कवच को — दत्तात्रेय भगवान के वज्र पंजर कवच को — हिंदी में पढ़िए, तो पता चलेगा कि भगवान दत्त स्मरण मात्र से कितनी तेज़ी से, कितनी जल्दी आ जाते हैं। जो इतनी देर से भगवान दत्त के विषय में सुन रहे हैं, वे कहते हैं, वह चिंतन इस समय भी चल रहा है, और क्योंकि वे इतने स्मृतिगामी हैं — स्मरण मात्र से आ जाने वाले — तो वे आ चुके होंगे; बस अपने भाव से उन्हें अहसास करना है, अनुभव करना है। तो, वे कहते हैं, अपने परिवार और स्वयं के रक्षण के लिए सप्ताह का एक दिन ज़रूर गुरु संप्रदाय के गुरु तत्त्व के इन महागुरु, महासिद्ध को दिया करें, समर्पित किया करें। इससे आपका और आपके परिवार का कल्याण होगा; किसी प्रकार का अकल्याण नहीं होगा।
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