भगतवाल साधक की क्या गति होती है — चौकी, उसका वचन, और वह अपने ही साधक को कैसे फँसा लेती है

दिखावे या पैसे के लिए सवारी और भगताई करने वाले ओझा के साथ वास्तव में क्या होता है, और उसकी अपनी वचनबद्ध शक्तियाँ अंततः उसे ही क्यों फँसा लेती हैं।

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01

भगतवाल का साधक, उपदेव शक्तियाँ, और "सूखा ओझा"

"भगतवाल" के साधक कौन होते हैं?

· Reviewed Sep 2026 · 00:06–01:53 · Also a question

वक्ता उन गृहस्थ साधकों की बात करते हैं — जो किसी गुरु परंपरा में हों या न हों, जिन्होंने शादी-विवाह किया हो या नहीं, पर घर-परिवार, भाई-भतीजे के साथ रह रहे हों — जो तंत्र मार्ग पर चलते हुए सिर्फ़ एक महाशक्ति को नहीं, बल्कि विभिन्न प्रकार की उपदेव संबंधित शक्तियों को वचनबद्ध और सिद्ध करते हैं: ब्रह्म शक्ति, भूत-प्रेत, शमशानिक शक्तियाँ, डाकनी इत्यादि। इस प्रकार की सिद्धियाँ लेने वाले भगतवाल के "सूखा ओझा" बनते हैं, गुनी बनते हैं। वीडियो का प्रश्न यह है कि क्या ऐसे लोग शरीर छोड़ने के पश्चात मुक्त हो पाते हैं, और उनकी वास्तव में क्या गति होती है — यह वह विषय है जिसे लोग विशेष रूप से तब खोजते हैं जब किसी परिवार में मृत्यु के उपरांत ऐसे लोगों के द्वारा काफ़ी कष्ट दिया जाता है।

02

तंत्र प्रवृत्ति, और उस मार्ग पर आने वाले तीन प्रकार के लोग

कुछ लोक कल्याण करते जाते हैं, कुछ शक्तियाँ सिद्ध करके उनका उपयोग ही नहीं करते, और कुछ गृहस्थ लोक वीर या लोक योगिनी की सिद्धि चाहते हैं

· Reviewed Sep 2026 · 01:54–03:11

वक्ता कहते हैं कि तंत्र मार्ग में गुरु परंपरा का बहुत महत्व होता है; तंत्र मार्ग का अर्थ है किसी भी महाविद्या या महाशक्ति के निकट जाने के लिए तंत्र प्रवृत्ति को अपनाना, तंत्र की विद्याओं के अनुसार क्रमगत साधना करना। कुछ लोग लोक कल्याण करते हुए आगे बढ़ जाते हैं और अपनी शक्ति की वृद्धि करते रहते हैं; कुछ तंत्र शक्तियों को सिद्ध तो करते हैं पर उनका उपयोग नहीं करते, अपने नित्यानंद में ही मग्न रहकर परमानंद के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं; और कुछ गृहस्थ, सामाजिक जीवन जीते हुए, वाम मार्गी या लोक प्रचलित साधनाओं में विशेष रुचि रखते हैं — किसी लोक वीर या किसी लोक योगिनी की सिद्धि।

03

कुल शक्ति का आदेश, जिसकी घर में स्थान देने से पहले अवहेलना कर दी जाती है

गृहस्थ साधक को किसी भी शक्ति को सिद्ध करने से पहले कुल देवी-देवता से क्यों देखना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 03:12–04:13 · Also a question

जिस गृहस्थ साधक का पूजन स्थान घर के भीतर बना होता है, उसके लिए वक्ता वह बात दोहराते हैं जिसे वे बार-बार बोलते हैं: जब भी कोई साधक साधना करके किसी भी शक्ति को सिद्ध करता है, तो सबसे अधिक महत्व उसके कुल की शक्ति का है। उसे पहले यह देखना चाहिए कि उस शक्ति के माध्यम से परिवार को कोई कष्ट तो नहीं होगा, और कुल की देवी तथा कुल के देवी-देवता इसके लिए आदेश दे रहे हैं या नहीं। वे कहते हैं कि बहुत बार लोग इस पूरे प्रश्न की अवहेलना कर देते हैं और सीधे शक्ति को जागृत करके, वचन में लाकर, घर में स्थान दे देते हैं।

04

सेवड़ा सयाना से सीखना, और वचन में ली जाने वाली शक्तियाँ

किसी सेवड़ा सयाना के पास रहकर मसानिक क्रियाएँ, कच्चे कलवे और डाकिनी शक्तियाँ एक-एक करके सीखना

· Reviewed Sep 2026 · 04:14–04:53

वक्ता बताते हैं कि यह कैसे किया जाता है: पहले से किसी सेवड़ा सयाना या भगतवाल के साधक के पास रहकर एक-एक चीज़ सीखी जाती है — मसान में जाना, मसानिक क्रियाएँ करना सीखना, मसान शक्ति को कैसे जागृत करना है, उसे कैसे चलाना है, कैसे आवाहन देना है, किसी के ऊपर कैसे भेजना है; कच्चे कलवे की सिद्धि और उनका प्रयोग; देव-उपदेव योनि की कुछ अच्छी शक्तियाँ; और डाकनी संबंधी यानी स्त्री प्रेत शक्तियाँ, प्रेतनी इत्यादि — ये सभी मुख्यतः वचन और भोग के द्वारा ली जाती हैं।

05

अतृप्त इच्छा-शरीर, जो इच्छा को पोषित करने से और बढ़ता जाता है

अमुक्त प्रेत शक्ति को भोग की आवश्यकता क्यों होती है, और समय के साथ उसकी शक्ति का क्या होता है?

· Reviewed Sep 2026 · 04:54–06:42 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भोग का महत्व इसलिए है क्योंकि ये कहीं न कहीं अतृप्त शक्तियाँ हैं, जिन्हें अपनी इच्छा के कारण मुक्ति नहीं मिली; प्रेत शरीर स्वयं एक "इच्छा का शरीर" है, और जितना अधिक उस इच्छा को पोषित किया जाएगा, उतनी ही उसकी शक्ति में वृद्धि होती जाएगी — क्योंकि मृत्यु के समय की मति ही उसे उस प्रेत योनि में ले गई ("अंत मति सो गति"), और उसी इच्छा को पोषित करते रहना उसे और बल देता है। ऐसा साधक वचन यह लेता है कि बुलाने पर आना होगा, जहाँ भेजें वहाँ जाना होगा, जो कहें वह करना होगा; और बदले में दारू, कच्चा दूध, मांस, अमावस्या के अमावस्या दाल-भात, या मुर्गा बलि देने का वचन देता है।

06

सजा हुआ स्थान, और वे थोड़े से लोग जो शक्ति को सचमुच मुक्त करते हैं

लगभग 90% में महाकाली का सजा हुआ स्थान तो होता है, पर भगत ने कभी उनकी अपनी सेवा नहीं की होती

· Reviewed Sep 2026 · 06:43–08:11

शक्ति के सिद्ध होकर स्थान ग्रहण कर लेने के बाद, वक्ता कहते हैं, बहुत बार देखने में आता है कि जगह को बहुत अच्छे से सजाया गया है, जहाँ महाकाली का फोटो रखा है और उसके सामने ज्योत जल रही है — लेकिन वे कहते हैं कि यह भी देखिए कि उस भगत ने किसी समय महाकाली की अपनी सेवा अच्छे तरीके से की थी या नहीं। यह, वे कहते हैं, लगभग 90% होता है; बाक़ी 10% ऐसे साधक होते हैं जो जन कल्याण हेतु या अपनी रुचि के अनुसार ऐसी शक्तियों को सिद्ध करते हैं लेकिन उन्हें मुक्त कर देते हैं, या फिर वचन ऐसा रहता है कि साधक का शरीर छूटते ही शक्ति स्वतः विसर्जित हो जाएगी — ऐसे लोग मुख्यतः गुरु परंपरा में होते हैं, जहाँ दिक़्क़त तुलनात्मक रूप से कम होती है। शेष, जिन्हें वे "उच्छृंखल" (छुट्टा साँड़ जैसा) कहते हैं, यहाँ उनका विषय हैं।

07

महाकाली के स्थान पर बिठाई गई प्रेत शक्ति, और वह समुच्चय जिसे चौकी कहते हैं

क्या भगतवाल के स्थान पर वास्तव में देवी की प्राण प्रतिष्ठा होती है, और "चौकी" क्या है?

· Reviewed Sep 2026 · 08:12–10:35 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह कभी मत सोचिए कि ऐसे स्थान पर भगवती महाकाली के स्वरूप को स्थापित किया गया है। वहाँ वास्तव में जिसे स्थान दिया जाता है वह है — महाकाली के किसी मंत्र के द्वारा या साधक के अपने गुरु से सीखी विधि के द्वारा — कोई विशेष स्त्री प्रेत शक्ति, डाकिनी स्वरूप में; महाकाली संबंधी पूजा, भोग और मंत्र से इस तंत्र क्रिया के द्वारा पोषित होकर उस ऊर्जा को ऐसी ऊर्जा में रूपांतरित कर दिया गया है जो लगभग महाकाली से संबंधित तत्व को दर्शाती है, पर नकारात्मक रूप में; उसे इसलिए जगाया जाता है क्योंकि वह काफ़ी तीव्र है और ज़ोरदार तरीक़े से काम करती है। उसके साथ मसान, कच्चे कलवे, कुछ डाकिनी संबंधी शक्तियाँ और प्रेत विचार भी रहते हैं, सबको अलग-अलग तरीक़े से बिठाया जाता है — यह पूरा समुच्चय ही "चौकी" कहलाता है। वहाँ इत्र, फूल और दूध चढ़ते दिखते हैं, पर पीछे चलने वाला मंत्र एक ही होता है — महाकाली का साबर मंत्र।

08

अपना घर, परिवार में उत्तराधिकारी, और किस भावना से लाया गया

घर वास्तव में अपना होना चाहिए, कभी पुलिस क्वार्टर या कंपनी के फ्लैट में नहीं, और परिवार में कोई आगे चलाने वाला होना चाहिए

· Reviewed Sep 2026 · 10:36–11:25

वक्ता कहते हैं कि ऐसी शक्ति को लाने से पहले साधक को यह सोच लेना चाहिए कि इसके जाने का मार्ग कैसे होगा। चूँकि वह गृहस्थ साधक है और अपने घर में स्थान दे रहा है, वह घर सबसे पहले तो उसका अपना होना चाहिए — पुलिस रेसिडेंसी के क्वार्टर, कंपनी के फ्लैट, या ऐसी किसी जगह में जिसे कभी छोड़ना पड़े, यह करना ही नहीं चाहिए। अपने घर में भी उसे देख लेना चाहिए कि परिवार में कोई ऐसा व्यक्ति है जो उसके बाद इन सभी चीज़ों को लेकर चल पाएगा, तभी इसे हमेशा के लिए लाना चाहिए ताकि परंपरा चलती रहे और शक्ति, सेवित होकर, कल्याण भी करे — यदि उसे जन कल्याण की भावना से लाया गया हो।

09

आरंभ में वर्चस्व और दंड की भावना, और बाद में पैसे के वश में हो जाना

वर्चस्व या द्वेष की भावना से सिद्ध की गई शक्ति पहले सटीक काम करती है; फिर साधक काम के रेट तय करने लगता है और शक्ति उसे नियंत्रित करने लगती है

· Reviewed Sep 2026 · 11:26–12:43

वक्ता कहते हैं कि वास्तव में होता यह है कि ऐसी शक्तियाँ बहुत बार अपना वर्चस्व कायम करने की भावना से, या किसी द्वेष के कारण किसी को दंड देने के लिए सिद्ध की जाती हैं। शुरू-शुरू में शक्ति बहुत सटीक काम करती है — जितनी ऊर्जा के साथ पूजा, भोग और बलि दी जाती है, उतना ही सटीक। लेकिन समय के साथ यह क्षीण होती जाती है, क्योंकि साधक कहीं न कहीं पैसे में बँध जाता है — यह काम इतने हज़ार में, वह काम इतने में — और यह उसकी मानसिक अवस्था को घुमाना शुरू कर देता है, यहाँ तक कि जो पहले शक्ति को नियंत्रित कर रहा था, अब शक्ति उसे नियंत्रित करने लगती है। इसके पीछे मूल कारण, वे कहते हैं, यह है कि साधक ने किसी महाशक्ति की सेवा-तपस्या करके अपने तपोबल को उस स्तर तक बढ़ाया ही नहीं।

10

सेवा की एक निश्चित अवधि, फिर उस शक्ति की सदगति के लिए विसर्जन

शक्ति को एक, दो, पाँच या दस वर्ष रखने का वचन, फिर उसका विसर्जन और उसकी सदगति के लिए कर्मकांड

· Reviewed Sep 2026 · 12:44–13:51

उच्च कोटि के तांत्रिक — वे भी जो वाम मार्ग पर चलते हैं और तंत्र के माध्यम से मुक्ति चाहते हैं, जैसा इस कलयुग के विषय में कहा-सुना जाता है — अपने तपोबल के माध्यम से अपनी प्राण ऊर्जा को पोषित करते हैं, किसी महाशक्ति की साधना का करोड़ों में जप करते हैं, और ऐसी शक्तियों को केवल अपनी सेवा के लिए या लोक कल्याण की भावना से रखते हैं। सिद्धि के साथ-साथ वे स्वयं भी वचन लेते हैं: शक्ति को एक निश्चित अवधि तक अपने पास रखेंगे — साल भर, दो साल, पाँच साल, या दस साल तक — उसके पश्चात वे उसका विसर्जन करेंगे और जो भी कर्मकांड आवश्यक हो, चाहे तंत्र के माध्यम से या वैदिक माध्यम से, उसकी सदगति और उस योनि से मुक्ति के लिए करेंगे।

11

वचनबद्ध शक्ति का अपनी सेवा से ऋण पहले ही चुका देना

शक्ति अपना काम करके साधक का ऋण पहले ही एडवांस में चुका देती है, और बदले में मुक्त कर दी जाती है

· Reviewed Sep 2026 · 13:52–14:07

वक्ता कहते हैं कि जब वचन इस प्रकार निभाया जाता है तो दोनों में से किसी को ऋण दोष नहीं लगता: शक्ति अपना काम कर-करके साधक का ऋण पहले ही एडवांस में चुका देती है, और बदले में उसे मुक्त कर दिया जाता है।

इस प्रकार करने पर, वक्ता कहते हैं, दोनों में से किसी को ऋण दोष नहीं लगता। जो शक्ति सिद्ध होती है, वह अपना काम कर-करके साधक का ऋण पहले ही एडवांस में चुका देती है — और इसके बदले में उसे मुक्त कर दिया जाता है।

12

आत्महत्या करने वाली आत्मा को वशीकरण के लिए बाँधना, सही-ग़लत की परवाह किए बिना

चौदह से बाईस वर्ष की जिस लड़की की मृत्यु अधूरी काम ऊर्जा के कारण आत्महत्या से होती है, उसकी योनि मोहिनी कामिनी कहलाती है

· Reviewed Sep 2026 · 14:08–14:58

कुछ बदमाश साधक, दुष्टता के वश, उनकी आत्माओं को बाँधते हैं जिन्होंने आत्महत्या की हो — बहुत बार कोई लड़की जो लगभग चौदह से बाईस वर्ष की अवस्था में अप्राप्त प्रेम, या दूसरे शब्दों में अधूरी काम ऊर्जा के कारण मृत्यु को प्राप्त हुई हो। ऐसी आत्मा की योनि मोहिनी कामिनी कहलाती है, और वह वशीकरण के लिए काफ़ी तीव्र काम करती है। जब ऐसा साधक उसे शमशान इत्यादि में सिद्ध करके बाँधता है और वह मुक्त होने को कहती है, तो वह सेवा की एक अवधि तय कर देता है; पर वह यह नहीं देखता कि जो काम वह करा रहा है वह उच्च है या नीच — वह उसका उपयोग जन कल्याण के लिए भी कर सकता है और ग़लत काम के लिए भी। वचन दे देने के बाद वह आत्मा हर हाल में बँध जाती है।

13

उस परम सत्ता द्वारा दंड, जिसके क्षेत्र में वे शक्तियाँ आती हैं

जो साधक शक्ति को मुक्त नहीं करता उसे परम सत्ता दंडित करती है, इसीलिए तांत्रिकों की मृत्यु कभी-कभी काफ़ी ख़राब होती है

· Reviewed Sep 2026 · 14:59–15:34

यदि ऐसी शक्ति लेने वाला साधक बाद में अपने उस वचन की पूर्ति नहीं करता कि वह उसे अंततः मुक्त करेगा, तो वक्ता कहते हैं कि परम सत्ता के द्वारा — यह मानकर चलिए कि ऐसी शक्तियाँ कहीं न कहीं महाकाली के क्षेत्र में आती हैं — उसे दंडित करने का अधिकार रहता है, और वह दंडित करती है। इसीलिए, वे कहते हैं, तांत्रिक लोगों की मृत्यु भी कभी-कभी काफ़ी ख़राब होती है; अच्छे तांत्रिकों से भी कहीं न कहीं यही ग़लती हो जाती है।

14

सच्चे साधक का पलटवार प्रयोग, और वचनबद्ध शक्ति की सीमित क्षमता

चौकी की शक्ति अंततः क्यों कम पड़ने लगती है या ग़लत बताने लगती है?

· Reviewed Sep 2026 · 15:35–16:51 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि समय के साथ ऐसे साधक कभी न कभी यह ग़लती अवश्य करते हैं कि किसी भगवती या हनुमान जी की सेवा-पूजा करने वाले, या उच्च कोटि की साधनाएँ करने वाले सच्चे साधक के पीछे अपना तंत्र प्रयोग कर देते हैं। यह समझकर कि उन पर तांत्रिक प्रयोग हो गया है, ऐसा सच्चा साधक बड़वानल का प्रयोग या भगवती बगलामुखी के अच्छे-अच्छे प्रयोग करके पलटवार करता है। इससे चौकी की शक्तियाँ कुंठित होने लगती हैं — कितनी भी बलि चढ़ा लें, कितना भी भोग-पूजा दे लें, वचनबद्ध शक्ति की एक सीमा है, जबकि महाशक्तियों की सीमा नहीं, वे अनंत हैं और एक बार प्रसन्न होने पर ऐसी जगह में एक क्षण में सब कुछ ख़त्म कर देती हैं।

15

घटती क्षमता, नाराज़ मन, और हताशा में और अधिक काम ले लेना

बार-बार चोट खाकर शक्तियाँ नाराज़ होती हैं और साधक को ही कष्ट देने लगती हैं, और वह पैसे के लिए और जोखिम भरा काम लेने लगता है

· Reviewed Sep 2026 · 16:52–18:12

वक्ता कहते हैं कि बार-बार चोट खाते-खाते ऐसी शक्तियों की क्षमता सीमित होती जाती है — और चूँकि वे भी किसी समय मनुष्य रही हैं, उनका मानसिक स्तर भी वैसा ही रहता है और वे बार-बार पिटने से नाराज़ होने लगती हैं। जैसे-जैसे साधक को उनका साथ कम मिलता है, उसकी अपनी तकलीफ़ें बढ़ने लगती हैं, उसका मन उच्चाटित होने लगता है, और उसकी अपनी वचनबद्ध शक्तियाँ उसे ही कष्ट देना शुरू कर देती हैं। इस अवस्था में वह और भी जोखिम भरा काम लेने लगता है — किसी का वशीकरण, किसी को बर्बाद करना — केवल पैसे के लिए, और जितना अधिक वह यह करता है उतना ही अधिक फँसता जाता है।

16

गीता के "जिसको पूजोगे उसको प्राप्त होगे" के अनुसार अपनी ही चौकी का हिस्सा बन जाना

जो साधक अपनी वचनबद्ध शक्तियों को मुक्त किए बिना मर जाता है, उसकी अंतिम गति क्या होती है?

· Reviewed Sep 2026 · 18:13–18:51 · Also a question

यदि ऐसा साधक इन वचनबद्ध शक्तियों को मुक्त किए बिना किसी भी कारणवश मर जाता है, तो वक्ता कहते हैं कि वह उन्हीं के साथ फँस जाता है। श्रीमद् भगवद् गीता में नारायण की इस वाणी का हवाला देते हुए कि जिसको पूजोगे उसको प्राप्त होगे, वे कहते हैं कि जिस साधक ने इतने दिन चौकी की पूजा की, वह बाद में उसी चौकी का हिस्सा बनकर रह जाता है, और उसके परिवार में कलह-क्लेश शुरू हो जाता है। तो गति मुक्ति नहीं होती — वे लोग मुक्त हो नहीं पाते। उसे मुक्त करने के लिए चौकी की एक-एक चीज़ को अलग-अलग मुक्त करना पड़ेगा, यानी इसमें तंत्र का पूर्ण सहयोग लेना पड़ेगा, जो एक बिल्कुल अलग विषय हो जाता है।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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