भगतवाल साधक की क्या गति होती है — चौकी, उसका वचन, और वह अपने ही साधक को कैसे फँसा लेती है
दिखावे या पैसे के लिए सवारी और भगताई करने वाले ओझा के साथ वास्तव में क्या होता है, और उसकी अपनी वचनबद्ध शक्तियाँ अंततः उसे ही क्यों फँसा लेती हैं।
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भगतवाल का साधक, उपदेव शक्तियाँ, और "सूखा ओझा"
"भगतवाल" के साधक कौन होते हैं?
वक्ता उन गृहस्थ साधकों की बात करते हैं — जो किसी गुरु परंपरा में हों या न हों, जिन्होंने शादी-विवाह किया हो या नहीं, पर घर-परिवार, भाई-भतीजे के साथ रह रहे हों — जो तंत्र मार्ग पर चलते हुए सिर्फ़ एक महाशक्ति को नहीं, बल्कि विभिन्न प्रकार की उपदेव संबंधित शक्तियों को वचनबद्ध और सिद्ध करते हैं: ब्रह्म शक्ति, भूत-प्रेत, शमशानिक शक्तियाँ, डाकनी इत्यादि। इस प्रकार की सिद्धियाँ लेने वाले भगतवाल के "सूखा ओझा" बनते हैं, गुनी बनते हैं। वीडियो का प्रश्न यह है कि क्या ऐसे लोग शरीर छोड़ने के पश्चात मुक्त हो पाते हैं, और उनकी वास्तव में क्या गति होती है — यह वह विषय है जिसे लोग विशेष रूप से तब खोजते हैं जब किसी परिवार में मृत्यु के उपरांत ऐसे लोगों के द्वारा काफ़ी कष्ट दिया जाता है।
वक्ता आरंभ में गृहस्थ साधकों की एक श्रेणी का वर्णन करते हैं — भगतवाल के लोग — जो किसी गुरु परंपरा में हो भी सकते हैं और नहीं भी, जिन्होंने शादी-विवाह इत्यादि किया हो या न किया हो, लेकिन जो घर-परिवार के साथ, अपने भाई-भतीजे के साथ रह रहे हैं। भगतवाल में, वे कहते हैं, लोग सिर्फ़ एक महाशक्ति को सिद्ध नहीं करते; तंत्र मार्ग पर चलते हुए वे विभिन्न प्रकार की उपदेवप्रमुख देवताओं से निम्न श्रेणी के गौण दिव्य प्राणियों की एक श्रेणी — पितरों को इसी श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है। संबंधित शक्तियों को वचनबद्ध करते हैं, सिद्ध करते हैं। इनमें वे गिनाते हैं: ब्रह्म शक्ति; भूत-प्रेत तथा शमशानिक शक्तियाँ; और जो इस प्रकार की डाकनी तथा शमशानिक/मसान सिद्धियाँ लेते हैं, वे भगतवाल के सूखा ओझाएक लोक-तांत्रिक जो मदिरा व मांस जैसे भोग द्वारा प्रेत-शक्तियों को बांधकर संचालित करता है। बनते हैं, गुनी बनते हैं। ऐसे लोगों के विषय में वे प्रश्न रखते हैं कि क्या वे अपने शरीर को छोड़ने के पश्चात मुक्त हो पाते हैं, और उनकी क्या गति होती है। वे कहते हैं कि यह वास्तव में वह विषय है जिसे लोग खोजते हैं, क्योंकि ऐसा देखा जाता है कि किसी परिवार में मृत्यु के उपरांत इन लोगों के द्वारा काफ़ी अधिक कष्ट दिया जाता है, और तभी व्यक्ति यह समझने का प्रयास करता है कि कैसे क्या हुआ।
तंत्र प्रवृत्ति, और उस मार्ग पर आने वाले तीन प्रकार के लोग
कुछ लोक कल्याण करते जाते हैं, कुछ शक्तियाँ सिद्ध करके उनका उपयोग ही नहीं करते, और कुछ गृहस्थ लोक वीर या लोक योगिनी की सिद्धि चाहते हैं
वक्ता कहते हैं कि तंत्र मार्ग में गुरु परंपरा का बहुत महत्व होता है; तंत्र मार्ग का अर्थ है किसी भी महाविद्या या महाशक्ति के निकट जाने के लिए तंत्र प्रवृत्ति को अपनाना, तंत्र की विद्याओं के अनुसार क्रमगत साधना करना। कुछ लोग लोक कल्याण करते हुए आगे बढ़ जाते हैं और अपनी शक्ति की वृद्धि करते रहते हैं; कुछ तंत्र शक्तियों को सिद्ध तो करते हैं पर उनका उपयोग नहीं करते, अपने नित्यानंद में ही मग्न रहकर परमानंद के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं; और कुछ गृहस्थ, सामाजिक जीवन जीते हुए, वाम मार्गी या लोक प्रचलित साधनाओं में विशेष रुचि रखते हैं — किसी लोक वीर या किसी लोक योगिनी की सिद्धि।
वक्ता कहते हैं कि तंत्र मार्ग में गुरु परंपरा का बहुत महत्व होता है। तंत्र मार्ग का अर्थ, वे समझाते हैं, यह हुआ कि किसी भी महाविद्या या किसी भी महाशक्ति के निकट जाने के लिए तंत्र प्रवृत्ति को अपनाना, तंत्र की विद्याओं के अनुसार क्रमगत साधना करते हुए, अन्य विद्याओं को भी सिद्ध करते चलना। वे इस मार्ग पर आने वाले तीन प्रकार के लोगों में भेद करते हैं। कुछ लोक कल्याण करते हुए आगे बढ़ जाते हैं और उसके द्वारा अपनी शक्ति की वृद्धि करते रहते हैं। कुछ लोग तंत्र शक्तियों को सिद्ध करते हैं लेकिन उनका उपयोग नहीं करते — वे उसे अपने तक ही सीमित रखते हैं, केवल अपने कर्म प्रारब्ध को भुगतना चाहते हैं; वे सीधा जागृत करते हैं, सिद्ध करते हैं, और उसके द्वारा आनंदमग्न होते हुए, उन शक्तियों की बार-बार सेवा, पूजा और भोग करते हुए अपने नित्यानंद को भोगते हैं और आध्यात्मिक मार्ग में उस ओर आगे बढ़ते हैं जिसे परमानंद कहा जाता है। और ऐसे भी लोग हैं जो सामाजिक जीवन जीते हुए साधना मार्ग में एक अलग प्रकार की रुचि रखते हैं, विशेष करके वाम मार्गी साधनाओं के प्रति, या फिर लोक प्रचलित साधनाओं के प्रति — किसी लोक वीर की सिद्धि, या किसी लोक योगिनी की सिद्धि। (वे कहते हैं कि योगिनी साधना स्वयं एक अलग विषय है, जिसे वे अलग से विस्तार से स्पष्ट करेंगे।)
कुल शक्ति का आदेश, जिसकी घर में स्थान देने से पहले अवहेलना कर दी जाती है
गृहस्थ साधक को किसी भी शक्ति को सिद्ध करने से पहले कुल देवी-देवता से क्यों देखना चाहिए?
जिस गृहस्थ साधक का पूजन स्थान घर के भीतर बना होता है, उसके लिए वक्ता वह बात दोहराते हैं जिसे वे बार-बार बोलते हैं: जब भी कोई साधक साधना करके किसी भी शक्ति को सिद्ध करता है, तो सबसे अधिक महत्व उसके कुल की शक्ति का है। उसे पहले यह देखना चाहिए कि उस शक्ति के माध्यम से परिवार को कोई कष्ट तो नहीं होगा, और कुल की देवी तथा कुल के देवी-देवता इसके लिए आदेश दे रहे हैं या नहीं। वे कहते हैं कि बहुत बार लोग इस पूरे प्रश्न की अवहेलना कर देते हैं और सीधे शक्ति को जागृत करके, वचन में लाकर, घर में स्थान दे देते हैं।
वक्ता ऐसे किसी भी साधक की ओर मुड़ते हैं, ऐसे किसी भी गृहस्थ की जो अपने घर-परिवार के साथ रहता है, और जिसने जीवन रहते जिस भी प्रकार की सिद्धियाँ लीं उन्हें अपने पूजन स्थान में — जो घर के भीतर ही बना हुआ है — स्थान दे दिया। वे कहते हैं कि यह बात वे बार-बार बोलते हैं: जब भी कोई साधक साधना करता है, किसी भी शक्ति को सिद्ध करता है, तो उसके कुलदेवी तथा कुल शक्ति का महत्व सबसे ऊपर है। उसे देखना चाहिए कि उस शक्ति के माध्यम से उसे कोई कष्ट तो नहीं होगा, कुल की देवी इसके लिए आदेश दे रही हैं या नहीं, कुल के देवी-देवता इसके लिए तैयार हैं और उनका आदेश प्राप्त हो रहा है या नहीं। वे कहते हैं कि बहुत बार लोग इन सभी चीज़ों की अवहेलना कर देते हैं, उन्हें महत्व नहीं देते। वे सीधे आ जाते हैं — कि हम इन शक्तियों को जागृत करेंगे, सिद्ध करेंगे और फिर उन्हें वचनबद्ध में लाकर अपने पूजन स्थान पर जगह दे देंगे।
सेवड़ा सयाना से सीखना, और वचन में ली जाने वाली शक्तियाँ
किसी सेवड़ा सयाना के पास रहकर मसानिक क्रियाएँ, कच्चे कलवे और डाकिनी शक्तियाँ एक-एक करके सीखना
वक्ता बताते हैं कि यह कैसे किया जाता है: पहले से किसी सेवड़ा सयाना या भगतवाल के साधक के पास रहकर एक-एक चीज़ सीखी जाती है — मसान में जाना, मसानिक क्रियाएँ करना सीखना, मसान शक्ति को कैसे जागृत करना है, उसे कैसे चलाना है, कैसे आवाहन देना है, किसी के ऊपर कैसे भेजना है; कच्चे कलवे की सिद्धि और उनका प्रयोग; देव-उपदेव योनि की कुछ अच्छी शक्तियाँ; और डाकनी संबंधी यानी स्त्री प्रेत शक्तियाँ, प्रेतनी इत्यादि — ये सभी मुख्यतः वचन और भोग के द्वारा ली जाती हैं।
ऐसी शक्ति वास्तव में लाई कैसे जाती है, वक्ता पूछते हैं। यह ऐसे होता है, वे कहते हैं, कि कोई पहले से सेवड़ा सयाना या भगतवाल का कोई साधक हो, उनके पास रहकर एक-एक चीज़ सीखी जाती है। मनुष्य मसान में जाता है, मसानिक क्रियाएँ करना सीखता है — मसान शक्ति को कैसे जागृत करना है, उसे कैसे चलाना है, कैसे आवाहन देना है, किसी के ऊपर कैसे भेजना है। कहीं कच्चे कलवे होते हैं जिन्हें सिद्ध किया गया है, और यह सीखा जाता है कि उनका प्रयोग कैसे करना है। देव-उपदेवप्रमुख देवताओं से निम्न श्रेणी के गौण दिव्य प्राणियों की एक श्रेणी — पितरों को इसी श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है। योनि की भी कुछ अच्छी शक्तियाँ होती हैं जिन्हें सिद्ध किया जाता है। और डाकनी संबंधी शक्तियाँ — यानी स्त्री प्रेत शक्तियाँ, प्रेतनी इत्यादि — वचन में ली जाती हैं। मुख्यतः, वे कहते हैं, ये जितने भी होते हैं, इन सभी को वचन और भोग के द्वारा ही लिया जाता है।
अतृप्त इच्छा-शरीर, जो इच्छा को पोषित करने से और बढ़ता जाता है
अमुक्त प्रेत शक्ति को भोग की आवश्यकता क्यों होती है, और समय के साथ उसकी शक्ति का क्या होता है?
वक्ता कहते हैं कि भोग का महत्व इसलिए है क्योंकि ये कहीं न कहीं अतृप्त शक्तियाँ हैं, जिन्हें अपनी इच्छा के कारण मुक्ति नहीं मिली; प्रेत शरीर स्वयं एक "इच्छा का शरीर" है, और जितना अधिक उस इच्छा को पोषित किया जाएगा, उतनी ही उसकी शक्ति में वृद्धि होती जाएगी — क्योंकि मृत्यु के समय की मति ही उसे उस प्रेत योनि में ले गई ("अंत मति सो गति"), और उसी इच्छा को पोषित करते रहना उसे और बल देता है। ऐसा साधक वचन यह लेता है कि बुलाने पर आना होगा, जहाँ भेजें वहाँ जाना होगा, जो कहें वह करना होगा; और बदले में दारू, कच्चा दूध, मांस, अमावस्या के अमावस्या दाल-भात, या मुर्गा बलि देने का वचन देता है।
इन शक्तियों के लिए भोग का इतना महत्व क्यों है, वक्ता पूछते हैं। महत्व इसलिए है, वे कहते हैं, क्योंकि वे कहीं न कहीं अतृप्त शक्तियाँ हैं, जिन्हें अपनी इच्छा के कारण मुक्ति नहीं मिली है। ऐसी शक्ति जितनी पुरानी होती जाएगी, उतनी ही उसकी शक्ति में वृद्धि होगी — और वे कारण बताते हैं: क्योंकि समय तो बढ़ रहा है, और उसके अपने सूक्ष्म शरीर की जो ऊर्जा है वह प्रेत शरीर है, प्राण ऊर्जा नहीं। उस प्रेत शरीर को जितना अधिक आप उसकी इच्छाओं से जोड़ते जाएँगे, उतना ही उसकी शक्ति में वृद्धि होती जाएगी, क्योंकि वह शरीर इच्छा का ही शरीर है और आप उसी को पोषित कर रहे हैं। जिस प्रकार की इच्छा रखते हुए जीव ने मृत्यु प्राप्त की — कहते हैं न, अंत मति सो गति — वही मति उसे प्रेत योनि में ले गई, और आप उसी को पोषित कर रहे हैं। ऐसे तांत्रिक साधक — भगतवाल के साधक इत्यादि — शक्ति से वचन लेते हैं: जब बुलाएँ तब आना होगा, जहाँ भेजें वहाँ जाना होगा, जो कहें वह करना होगा। और बदले में वे अपना वचन देते हैं: जब तुम मेरा काम करोगे तो हम तुम्हें फ़लाना भोग देंगे — दारू देंगे, कच्चा दूध देंगे, मांस देंगे, अमावस्या के अमावस्या दाल-भात देंगे, या कोई और चीज़, या मुर्गा बलि देंगे। मुख्यतः यही होता है, वे कहते हैं, यद्यपि इसके भीतर बहुत भेद है और वे इसे सरल, सामान्य रूप में ही बता रहे हैं।
सजा हुआ स्थान, और वे थोड़े से लोग जो शक्ति को सचमुच मुक्त करते हैं
लगभग 90% में महाकाली का सजा हुआ स्थान तो होता है, पर भगत ने कभी उनकी अपनी सेवा नहीं की होती
शक्ति के सिद्ध होकर स्थान ग्रहण कर लेने के बाद, वक्ता कहते हैं, बहुत बार देखने में आता है कि जगह को बहुत अच्छे से सजाया गया है, जहाँ महाकाली का फोटो रखा है और उसके सामने ज्योत जल रही है — लेकिन वे कहते हैं कि यह भी देखिए कि उस भगत ने किसी समय महाकाली की अपनी सेवा अच्छे तरीके से की थी या नहीं। यह, वे कहते हैं, लगभग 90% होता है; बाक़ी 10% ऐसे साधक होते हैं जो जन कल्याण हेतु या अपनी रुचि के अनुसार ऐसी शक्तियों को सिद्ध करते हैं लेकिन उन्हें मुक्त कर देते हैं, या फिर वचन ऐसा रहता है कि साधक का शरीर छूटते ही शक्ति स्वतः विसर्जित हो जाएगी — ऐसे लोग मुख्यतः गुरु परंपरा में होते हैं, जहाँ दिक़्क़त तुलनात्मक रूप से कम होती है। शेष, जिन्हें वे "उच्छृंखल" (छुट्टा साँड़ जैसा) कहते हैं, यहाँ उनका विषय हैं।
ऐसी शक्ति के सिद्ध होकर स्थान ग्रहण कर लेने के बाद, वक्ता कहते हैं, ध्यान से देखिए कि क्या होता है। बहुत बार जगह को बहुत अधिक अच्छे से सजाया गया होता है — वहाँ महाकाली का फोटो, उनकी तस्वीर रखी होती है, और उनके सामने ज्योत जल रही होती है। लेकिन वे कहते हैं कि यह भी देखिए: जिस भगत ने यह बिठाया, क्या उसने कभी, किसी समय, महाकाली की अपनी सेवा अच्छे तरीके से की थी? वे इस पर आँकड़ा रखते हैं: यह — बिना वास्तविक सेवा के सजा हुआ स्थान — लगभग 90% होता है। शेष 10%, वे कहते हैं, ऐसे साधक होते हैं जो जन कल्याण हेतु या अपनी रुचि के अनुसार ऐसी शक्तियों को सिद्ध करते हैं, लेकिन उन्हें मुक्त कर देते हैं — या फिर वचन ऐसा रहता है कि उनका शरीर छूटेगा तो शक्ति स्वतः विसर्जन हो जाएगी। ऐसे लोग, वे कहते हैं, मुख्यतः गुरु परंपरा में मिलते हैं, और वहाँ दिक़्क़त तुलनात्मक रूप से कम होती है। लेकिन वे स्पष्ट करते हैं कि यहाँ वे उनकी बात कर रहे हैं जिन्हें उच्छृंखल साधक कहते हैं — छुट्टा साँड़ जैसा, जो कहता है "चलो हम करेंगे, हम ताक़त दिखाएँगे, हम फ़लाना करेंगे, यह करेंगे" — और ऐसे लोगों के साथ क्या होता है, यही वे बता रहे हैं। दूसरी, सामान्य श्रेणी की बात वे इसके बाद अलग से करेंगे।
महाकाली के स्थान पर बिठाई गई प्रेत शक्ति, और वह समुच्चय जिसे चौकी कहते हैं
क्या भगतवाल के स्थान पर वास्तव में देवी की प्राण प्रतिष्ठा होती है, और "चौकी" क्या है?
वक्ता कहते हैं कि यह कभी मत सोचिए कि ऐसे स्थान पर भगवती महाकाली के स्वरूप को स्थापित किया गया है। वहाँ वास्तव में जिसे स्थान दिया जाता है वह है — महाकाली के किसी मंत्र के द्वारा या साधक के अपने गुरु से सीखी विधि के द्वारा — कोई विशेष स्त्री प्रेत शक्ति, डाकिनी स्वरूप में; महाकाली संबंधी पूजा, भोग और मंत्र से इस तंत्र क्रिया के द्वारा पोषित होकर उस ऊर्जा को ऐसी ऊर्जा में रूपांतरित कर दिया गया है जो लगभग महाकाली से संबंधित तत्व को दर्शाती है, पर नकारात्मक रूप में; उसे इसलिए जगाया जाता है क्योंकि वह काफ़ी तीव्र है और ज़ोरदार तरीक़े से काम करती है। उसके साथ मसान, कच्चे कलवे, कुछ डाकिनी संबंधी शक्तियाँ और प्रेत विचार भी रहते हैं, सबको अलग-अलग तरीक़े से बिठाया जाता है — यह पूरा समुच्चय ही "चौकी" कहलाता है। वहाँ इत्र, फूल और दूध चढ़ते दिखते हैं, पर पीछे चलने वाला मंत्र एक ही होता है — महाकाली का साबर मंत्र।
वक्ता इस बात पर ज़ोर देते हैं: ऐसे स्थान पर महाकाली की मूर्ति या फोटो लगी देखकर कभी यह मत सोचिए कि वहाँ भगवती महाकाली के स्वरूप को स्थापित किया गया है। वहाँ होता यह है, वे कहते हैं, कि महाकाली के किसी मंत्र के द्वारा, या जो भी उनके गुरु रहे होंगे उनसे सीखी विधि के माध्यम से, किसी विशेष प्रेत शक्ति को — महिला प्रेत शक्ति को, डाकिनी स्वरूप में — वहाँ जगह दे दी जाती है। क्योंकि वह महाकाली से संबंधित पूजा और भोग के द्वारा, या उनके मंत्र के द्वारा, इस प्रकार की तंत्र क्रिया से पोषित होकर, उस ऊर्जा को ऐसी ऊर्जा में रूपांतरित किया गया है जो वहाँ लगभग महाकाली से संबंधित तत्व को दर्शाएगी — पर नकारात्मक रूप में। वे उसे इसीलिए जगाते हैं क्योंकि यह शक्ति काफ़ी तीव्र होती है, काफ़ी तरीक़े से काम करती है। उसे स्थान दे दिया जाता है, और उसे संभालने के लिए पूजा-भोग का वचन पहले से रहता है; और उसके साथ-साथ मसान भी रहेंगे, कच्चे कलवे भी रहेंगे, कुछ डाकिनी संबंधी शक्तियाँ रहेंगी, प्रेत विचार रहेंगे, सबको अलग-अलग तरीक़े से बिठाया जाता है। यह सब मिलाकर ही, वे कहते हैं, "चौकी" कहलाता है। तो, वे कहते हैं, वहाँ आप देखते हैं कि इत्र चढ़ रहा है, फूल चढ़ रहा है, दूध चढ़ रहा है, पूजा हो रही है — लेकिन जो मंत्र वास्तव में चल रहा है और सारा काम कर रहा है, वह महाकाली का एक ही सबर मंत्र है।
अपना घर, परिवार में उत्तराधिकारी, और किस भावना से लाया गया
घर वास्तव में अपना होना चाहिए, कभी पुलिस क्वार्टर या कंपनी के फ्लैट में नहीं, और परिवार में कोई आगे चलाने वाला होना चाहिए
वक्ता कहते हैं कि ऐसी शक्ति को लाने से पहले साधक को यह सोच लेना चाहिए कि इसके जाने का मार्ग कैसे होगा। चूँकि वह गृहस्थ साधक है और अपने घर में स्थान दे रहा है, वह घर सबसे पहले तो उसका अपना होना चाहिए — पुलिस रेसिडेंसी के क्वार्टर, कंपनी के फ्लैट, या ऐसी किसी जगह में जिसे कभी छोड़ना पड़े, यह करना ही नहीं चाहिए। अपने घर में भी उसे देख लेना चाहिए कि परिवार में कोई ऐसा व्यक्ति है जो उसके बाद इन सभी चीज़ों को लेकर चल पाएगा, तभी इसे हमेशा के लिए लाना चाहिए ताकि परंपरा चलती रहे और शक्ति, सेवित होकर, कल्याण भी करे — यदि उसे जन कल्याण की भावना से लाया गया हो।
इन शक्तियों को वचन में कैसे लिया जाता है, इस विषय में एक दूसरी बात समझने की है, वक्ता कहते हैं: ऐसी किसी भी शक्ति को लाने से पहले यह सोच लेना चाहिए कि इनके जाने का मार्ग कैसे होगा। क्योंकि गृहस्थ साधक उसे अपने घर में स्थान दे रहा है, वह घर सबसे पहले तो उसका अपना होना चाहिए। यदि कोई किसी प्रकार के क्वार्टर में — पुलिस रेसिडेंसी के क्वार्टर इत्यादि में — या किसी कंपनी के फ्लैट में रह रहा है, जिसे कभी छोड़ना है, तो वहाँ यह करना ही नहीं चाहिए। जहाँ अपना घर भी है, वे कहते हैं, वहाँ भी देख लेना चाहिए कि परिवार में कोई ऐसा व्यक्ति है जो उसके बाद इन सभी चीज़ों को लेकर चल पाएगा। इसे हमेशा के लिए ही लाना चाहिए, ताकि यह परंपरा चलती रहे और ऐसी शक्तियाँ सेवित होकर कल्याण भी करें — यदि, वे जोड़ते हैं, उन्हें जन कल्याण की भावना से लाया गया हो।
आरंभ में वर्चस्व और दंड की भावना, और बाद में पैसे के वश में हो जाना
वर्चस्व या द्वेष की भावना से सिद्ध की गई शक्ति पहले सटीक काम करती है; फिर साधक काम के रेट तय करने लगता है और शक्ति उसे नियंत्रित करने लगती है
वक्ता कहते हैं कि वास्तव में होता यह है कि ऐसी शक्तियाँ बहुत बार अपना वर्चस्व कायम करने की भावना से, या किसी द्वेष के कारण किसी को दंड देने के लिए सिद्ध की जाती हैं। शुरू-शुरू में शक्ति बहुत सटीक काम करती है — जितनी ऊर्जा के साथ पूजा, भोग और बलि दी जाती है, उतना ही सटीक। लेकिन समय के साथ यह क्षीण होती जाती है, क्योंकि साधक कहीं न कहीं पैसे में बँध जाता है — यह काम इतने हज़ार में, वह काम इतने में — और यह उसकी मानसिक अवस्था को घुमाना शुरू कर देता है, यहाँ तक कि जो पहले शक्ति को नियंत्रित कर रहा था, अब शक्ति उसे नियंत्रित करने लगती है। इसके पीछे मूल कारण, वे कहते हैं, यह है कि साधक ने किसी महाशक्ति की सेवा-तपस्या करके अपने तपोबल को उस स्तर तक बढ़ाया ही नहीं।
वास्तव में होता यह है, वक्ता कहते हैं, कि ऐसी शक्तियाँ बहुत बार किसी ऐसी भावना से सिद्ध की जाती हैं कि अपना वर्चस्व कायम करना है — या किसी द्वेष की भावना से, किसी को दंड देने के लिए; शक्ति सिद्ध करके वहाँ स्थान दे दिया जाता है और पूजा शुरू कर दी जाती है। वे कहते हैं कि यह भी जान लीजिए: शुरू-शुरू में ऐसी शक्तियाँ बहुत काम करती हैं। नई-नई सिद्ध होने पर, जितनी ऊर्जा के साथ आप पूजा, भोग और बलि देंगे, उतना ही सटीक — एक-एक पल की जानकारी बहुत अच्छे तरीक़े से बताएँगी। लेकिन यह चीज़, वे कहते हैं, समय के साथ क्षीण होती जाती है, और वे इसका कारण भी स्पष्ट करते हैं। शुरू-शुरू में शक्ति काम करेगी; लेकिन एक समय के बाद, क्योंकि उस शक्ति-ऊर्जा का स्वभाव ऐसा है, साधक स्वयं कहीं न कहीं पैसे में बँध जाएगा — कि हमको पैसा चाहिए, यह काम करेंगे तो पाँच हज़ार लेंगे, फ़लाना काम करेंगे तो इतना लेंगे। यह चीज़ें साधक की मानसिक अवस्था को घुमाना शुरू कर देती हैं: पहले वह शक्ति को कंट्रोल कर रहा था, अब शक्ति उसे कंट्रोल करने लगती है। इसके पीछे का मूल कारण, वे कहते हैं, यह है कि साधक ने किसी महाशक्ति की सेवा-तपस्या करके अपने तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। को उस स्तर तक वृद्धि की ही नहीं।
सेवा की एक निश्चित अवधि, फिर उस शक्ति की सदगति के लिए विसर्जन
शक्ति को एक, दो, पाँच या दस वर्ष रखने का वचन, फिर उसका विसर्जन और उसकी सदगति के लिए कर्मकांड
उच्च कोटि के तांत्रिक — वे भी जो वाम मार्ग पर चलते हैं और तंत्र के माध्यम से मुक्ति चाहते हैं, जैसा इस कलयुग के विषय में कहा-सुना जाता है — अपने तपोबल के माध्यम से अपनी प्राण ऊर्जा को पोषित करते हैं, किसी महाशक्ति की साधना का करोड़ों में जप करते हैं, और ऐसी शक्तियों को केवल अपनी सेवा के लिए या लोक कल्याण की भावना से रखते हैं। सिद्धि के साथ-साथ वे स्वयं भी वचन लेते हैं: शक्ति को एक निश्चित अवधि तक अपने पास रखेंगे — साल भर, दो साल, पाँच साल, या दस साल तक — उसके पश्चात वे उसका विसर्जन करेंगे और जो भी कर्मकांड आवश्यक हो, चाहे तंत्र के माध्यम से या वैदिक माध्यम से, उसकी सदगति और उस योनि से मुक्ति के लिए करेंगे।
वास्तव में उच्च कोटि के तांत्रिकों के साथ क्या होता है, वक्ता कहते हैं — तंत्र प्रवृत्ति के साधकों के साथ — वह बिल्कुल अलग है, चाहे वे वाम मार्ग पर ही क्यों न जाएँ, और चाहे उनका लक्ष्य वह मुक्ति ही हो जिसके विषय में लोग कहते-सुनते हैं कि इस कलयुग में तंत्र के द्वारा ही केवल मुक्ति होगी। ऐसे साधक अपने तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। के माध्यम से अपनी प्राण ऊर्जा को इतना पोषित कर लेते हैं — किसी भी महाशक्ति की साधना का करोड़ों-करोड़ों में जप करके — कि वे ऐसी शक्तियों को केवल अपनी सेवा के लिए, या अपनी लोक कल्याण की भावना से ही रखते हैं। और वे कहते हैं कि यह भी जानिए कि वे तब भी क्यों रखते हैं: जिस भी ऊर्जा को वे सिद्ध करते हैं, उनका अपना वचन उसके साथ जुड़ जाता है — कि जब तक उनका शरीर है, वे शक्ति को एक निश्चित अवधि तक अपने साथ रखेंगे, चाहे वह साल भर हो, दो साल, पाँच साल, या दस साल तक, इस समझ के साथ कि उतने वर्षों के बाद, उससे सेवा-पूजा और अपना काम करा लेने के पश्चात, वे उसका विसर्जन करेंगे — और उसकी सदगति के लिए, उस योनि से उसकी मुक्ति के लिए, जो भी कर्मकांड इत्यादि होते हैं वे करेंगे, चाहे तंत्र के माध्यम से हो या फिर वैदिक माध्यम से। जो अच्छी प्रवृत्ति के, उच्च कोटि के साधक होते हैं, वे ठीक इसी प्रकार से काम करते हैं।
वचनबद्ध शक्ति का अपनी सेवा से ऋण पहले ही चुका देना
शक्ति अपना काम करके साधक का ऋण पहले ही एडवांस में चुका देती है, और बदले में मुक्त कर दी जाती है
वक्ता कहते हैं कि जब वचन इस प्रकार निभाया जाता है तो दोनों में से किसी को ऋण दोष नहीं लगता: शक्ति अपना काम कर-करके साधक का ऋण पहले ही एडवांस में चुका देती है, और बदले में उसे मुक्त कर दिया जाता है।
इस प्रकार करने पर, वक्ता कहते हैं, दोनों में से किसी को ऋण दोष नहीं लगता। जो शक्ति सिद्ध होती है, वह अपना काम कर-करके साधक का ऋण पहले ही एडवांस में चुका देती है — और इसके बदले में उसे मुक्त कर दिया जाता है।
आत्महत्या करने वाली आत्मा को वशीकरण के लिए बाँधना, सही-ग़लत की परवाह किए बिना
चौदह से बाईस वर्ष की जिस लड़की की मृत्यु अधूरी काम ऊर्जा के कारण आत्महत्या से होती है, उसकी योनि मोहिनी कामिनी कहलाती है
कुछ बदमाश साधक, दुष्टता के वश, उनकी आत्माओं को बाँधते हैं जिन्होंने आत्महत्या की हो — बहुत बार कोई लड़की जो लगभग चौदह से बाईस वर्ष की अवस्था में अप्राप्त प्रेम, या दूसरे शब्दों में अधूरी काम ऊर्जा के कारण मृत्यु को प्राप्त हुई हो। ऐसी आत्मा की योनि मोहिनी कामिनी कहलाती है, और वह वशीकरण के लिए काफ़ी तीव्र काम करती है। जब ऐसा साधक उसे शमशान इत्यादि में सिद्ध करके बाँधता है और वह मुक्त होने को कहती है, तो वह सेवा की एक अवधि तय कर देता है; पर वह यह नहीं देखता कि जो काम वह करा रहा है वह उच्च है या नीच — वह उसका उपयोग जन कल्याण के लिए भी कर सकता है और ग़लत काम के लिए भी। वचन दे देने के बाद वह आत्मा हर हाल में बँध जाती है।
कुछ "बदमाश" — यानी दुष्ट प्रवृत्ति के — साधक, वक्ता कहते हैं, केवल दुष्टता के वश यह करते हैं: वे उनकी आत्माओं को बाँधते हैं जिन्होंने आत्महत्या की है। बहुत बार ऐसा होता है, वे कहते हैं, कि कोई लड़की, किसी कारणवश, जिस प्रेमी को चाहती थी वह उसे नहीं मिला, और प्रेम के कारण — या दूसरे शब्दों में, अधूरी काम ऊर्जा के कारण — वह आत्महत्या कर लेती है, चौदह-पंद्रह साल से लेकर जिसे लोग टीनएजर्स कहते हैं, बीस, इक्कीस, बाईस तक। यदि उस अवस्था में उसकी मृत्यु होती है, तो उसकी जो योनि बनती है उसे मोहिनी कामिनी कहते हैं। ऐसी शक्तियाँ, वे कहते हैं, वशीकरण के लिए काफ़ी तीव्र काम करती हैं। बदमाश साधक ऐसी शक्ति को श्मशान इत्यादि में सिद्ध करके बाँध लेता है। वह मुक्त होना चाहती है — "हमको मुक्त करो" — और वह मान जाता है: पाँच साल मेरा काम करो, उसके बाद हम तुमको मुक्त कर देंगे। लेकिन ऐसा बदमाश साधक, सच्चे उच्च कोटि के तांत्रिक की तरह, उच्चता और नीचता नहीं देखता — कि जो काम करने को कहा जा रहा है वह सही है या ग़लत। वह चाहे जन कल्याण के लिए उसका प्रयोग करे, चाहे ग़लत काम के लिए। वचन दे देने के बाद वह आत्मा हर हाल में बँध जाती है, चाहे उसे जो भी काम करने को कहा जाए।
उस परम सत्ता द्वारा दंड, जिसके क्षेत्र में वे शक्तियाँ आती हैं
जो साधक शक्ति को मुक्त नहीं करता उसे परम सत्ता दंडित करती है, इसीलिए तांत्रिकों की मृत्यु कभी-कभी काफ़ी ख़राब होती है
यदि ऐसी शक्ति लेने वाला साधक बाद में अपने उस वचन की पूर्ति नहीं करता कि वह उसे अंततः मुक्त करेगा, तो वक्ता कहते हैं कि परम सत्ता के द्वारा — यह मानकर चलिए कि ऐसी शक्तियाँ कहीं न कहीं महाकाली के क्षेत्र में आती हैं — उसे दंडित करने का अधिकार रहता है, और वह दंडित करती है। इसीलिए, वे कहते हैं, तांत्रिक लोगों की मृत्यु भी कभी-कभी काफ़ी ख़राब होती है; अच्छे तांत्रिकों से भी कहीं न कहीं यही ग़लती हो जाती है।
यदि बाद में साधक अपने दिए हुए वचन की पूर्ति नहीं करता — कि वह शक्ति को अंततः मुक्त करेगा — तो वक्ता कहते हैं कि तब परम सत्ता के द्वारा कार्य होता है: यह मानकर चलिए कि ऐसी शक्तियाँ कहीं न कहीं महाकाली के क्षेत्र में आती हैं, तो उस सत्ता के हाथ में अधिकार रहेगा कि वह उस तरीक़े से दंडित करे, या स्वयं महाकाली दंडित करती हैं। इसीलिए, वे कहते हैं, तांत्रिक लोगों की मृत्यु भी कभी-कभी काफ़ी ख़राब होती है — और वे कहते हैं कि अच्छे तांत्रिकों से भी कहीं न कहीं यह ग़लती इसी प्रकार हो जाती है।
सच्चे साधक का पलटवार प्रयोग, और वचनबद्ध शक्ति की सीमित क्षमता
चौकी की शक्ति अंततः क्यों कम पड़ने लगती है या ग़लत बताने लगती है?
वक्ता कहते हैं कि समय के साथ ऐसे साधक कभी न कभी यह ग़लती अवश्य करते हैं कि किसी भगवती या हनुमान जी की सेवा-पूजा करने वाले, या उच्च कोटि की साधनाएँ करने वाले सच्चे साधक के पीछे अपना तंत्र प्रयोग कर देते हैं। यह समझकर कि उन पर तांत्रिक प्रयोग हो गया है, ऐसा सच्चा साधक बड़वानल का प्रयोग या भगवती बगलामुखी के अच्छे-अच्छे प्रयोग करके पलटवार करता है। इससे चौकी की शक्तियाँ कुंठित होने लगती हैं — कितनी भी बलि चढ़ा लें, कितना भी भोग-पूजा दे लें, वचनबद्ध शक्ति की एक सीमा है, जबकि महाशक्तियों की सीमा नहीं, वे अनंत हैं और एक बार प्रसन्न होने पर ऐसी जगह में एक क्षण में सब कुछ ख़त्म कर देती हैं।
चौकी का बताया हुआ अंततः ग़लत क्यों मिलने लगता है, या उसका काम होना बंद क्यों हो जाता है या कम क्यों हो जाता है, वक्ता पूछते हैं — और समझाते हैं कि ऐसे साधक कभी न कभी ग़लती अवश्य करते हैं। क्या ग़लती? कोई अच्छा साधक — जो भगवती की सेवा-पूजा करता हो, या हनुमान जी की, या उच्च कोटि की साधनाएँ करता हो — उसके पीछे ऐसी शक्तियों का तंत्र प्रयोग कर दिया जाता है। जब ऐसा होता है, तो वह सच्चा साधक, यह समझकर कि उसके ऊपर तांत्रिक प्रयोग हो गया है, पलटवार करता है — बड़वानल स्तोत्र का प्रयोग कर देता है, या भगवती बगलामुखी के अच्छे-अच्छे प्रयोग कर देता है। इससे उस भगतवाल के साधक की शक्तियाँ, जो सामान्यतः भूत-प्रेतों को सिद्ध करके रखता था और चौकी चलाता था, कुंठित होने लगती हैं। वे कारण बताते हैं: कितनी भी बलि चढ़ा लें, कितना भी भोग-पूजा दे लें, ऐसी शक्ति की अपनी एक सीमा है — केवल महाशक्ति की क्षमता ही अनंत है। महाशक्ति को केवल प्रसन्न करना है; एक बार प्रसन्न हो जाएँ तो ऐसी जगह में एक क्षण में सब कुछ ख़त्म कर देती हैं।
घटती क्षमता, नाराज़ मन, और हताशा में और अधिक काम ले लेना
बार-बार चोट खाकर शक्तियाँ नाराज़ होती हैं और साधक को ही कष्ट देने लगती हैं, और वह पैसे के लिए और जोखिम भरा काम लेने लगता है
वक्ता कहते हैं कि बार-बार चोट खाते-खाते ऐसी शक्तियों की क्षमता सीमित होती जाती है — और चूँकि वे भी किसी समय मनुष्य रही हैं, उनका मानसिक स्तर भी वैसा ही रहता है और वे बार-बार पिटने से नाराज़ होने लगती हैं। जैसे-जैसे साधक को उनका साथ कम मिलता है, उसकी अपनी तकलीफ़ें बढ़ने लगती हैं, उसका मन उच्चाटित होने लगता है, और उसकी अपनी वचनबद्ध शक्तियाँ उसे ही कष्ट देना शुरू कर देती हैं। इस अवस्था में वह और भी जोखिम भरा काम लेने लगता है — किसी का वशीकरण, किसी को बर्बाद करना — केवल पैसे के लिए, और जितना अधिक वह यह करता है उतना ही अधिक फँसता जाता है।
इस प्रकार बार-बार चोट खाते-खाते, वक्ता कहते हैं, ऐसी शक्तियों की सीमा सीमित होती जाती है, उनकी क्षमता कम होती जाती है। और, वे ध्यान दिलाते हैं, वे भी किसी न किसी समय मनुष्य रही हैं, इसलिए उनका मानसिक स्तर भी एक तरीक़े से वैसा ही रहता है: वे कहने लगती हैं — क्यों हम जाकर बार-बार लात खाते रहें, हनुमान जी के भक्त के सोटे से, या किसी अच्छे धाम की या किसी अच्छे साधक की शक्तियों से, जिनके पास लोग अपनी अभिचारिक तकलीफ़ों के कारण जाते हैं और जिन्होंने ऐसी शक्तियाँ सिद्ध करके रखी हैं जो ऐसी चौकी को पकड़कर लाइन से कूट देती हैं। ऐसे बहुत सारे मंत्र और विद्याएँ हैं, वे कहते हैं, और यह भी होता रहता है। ऐसी अवस्था में ऐसे निकृष्ट तांत्रिक साधकों की — भूत-प्रेत वालों की — ऊर्जा फिर धीरे-धीरे साथ देना कम कर देती है। जैसे ग़लत होने लगता है, उनकी अपनी तकलीफ़ें बढ़ने लगती हैं, और उनका मन उच्चाटन होने लगता है। जैसे-जैसे मन उच्चाटित होता है, उनकी अपनी शक्तियाँ उन्हें ही कष्ट देना शुरू कर देती हैं। इस अवस्था में, वे कहते हैं, ऐसे लोग और काम लेने लगते हैं — किसी का वशीकरण कर देते हैं, किसी को बर्बाद कर देंगे — पैसा लेकर और काम करने की चाह में। और जितना ज़्यादा वे यह करते जाएँगे, उतना ज़्यादा फँसते जाएँगे।
गीता के "जिसको पूजोगे उसको प्राप्त होगे" के अनुसार अपनी ही चौकी का हिस्सा बन जाना
जो साधक अपनी वचनबद्ध शक्तियों को मुक्त किए बिना मर जाता है, उसकी अंतिम गति क्या होती है?
यदि ऐसा साधक इन वचनबद्ध शक्तियों को मुक्त किए बिना किसी भी कारणवश मर जाता है, तो वक्ता कहते हैं कि वह उन्हीं के साथ फँस जाता है। श्रीमद् भगवद् गीता में नारायण की इस वाणी का हवाला देते हुए कि जिसको पूजोगे उसको प्राप्त होगे, वे कहते हैं कि जिस साधक ने इतने दिन चौकी की पूजा की, वह बाद में उसी चौकी का हिस्सा बनकर रह जाता है, और उसके परिवार में कलह-क्लेश शुरू हो जाता है। तो गति मुक्ति नहीं होती — वे लोग मुक्त हो नहीं पाते। उसे मुक्त करने के लिए चौकी की एक-एक चीज़ को अलग-अलग मुक्त करना पड़ेगा, यानी इसमें तंत्र का पूर्ण सहयोग लेना पड़ेगा, जो एक बिल्कुल अलग विषय हो जाता है।
यदि इस अवस्था में ऐसा साधक इन शक्तियों को मुक्त किए बिना किसी भी कारणवश मर जाता है, तो वक्ता कहते हैं कि वह फिर उन्हीं के साथ फँस जाता है। वे श्रीमद् श्रीमद्भगवद्गीता में सुनी जाने वाली नारायण की वाणी की ओर संकेत करते हैं कि जिसको पूजोगे उसको प्राप्त होगे। तो इतने दिन चौकी की पूजा करने के बाद, ऐसा साधक मृत्यु के पश्चात उसी चौकी का हिस्सा बनकर रह जाता है — और फिर उसके परिवार में कलह-क्लेश शुरू हो जाता है। तो गति, वे निष्कर्ष देते हैं, मुक्ति नहीं होती। ऐसे लोग मुक्त हो नहीं पाते। उन्हें मुक्त करने के लिए चौकी की एक-एक चीज़ को एक-एक करके मुक्त करना पड़ेगा — यानी इसमें तंत्र का पूर्ण सहयोग लेना पड़ेगा — और यह, वे कहते हैं, एक बिल्कुल अलग विषय हो जाता है।
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