पूर्णिमा तिथि का महत्व
यदि और कुछ न कर सकें
  1. जो पहले से जपते हैं, उसी को बढ़ा दें
  2. दीपदान — कम से कम सोलह दीपक
  3. सूर्योदय से पूर्व स्नान
साधनाएं
  1. अपने नित्य जप व पाठ को बढ़ा दें जप व पाठ
  2. दीपदान — कम से कम सोलह दीपक दीपदान
  3. भैरव दीपदान — निरंतर बाधा होने पर दीपदान
  4. चंडी याग के स्थान पर आहुति हवन
  5. पाक्षिक गीता पाठ — एक तिथि नियत कर लें जप व पाठ
  6. अन्नपूर्णा अथवा शाकंभरी — एक दिवसीय साधना देव-विशेष
  7. दत्त माला मंत्र देव-विशेष
  8. दत्त दीपदान — पूर्णिमा को दीपदान
  9. कवच कब धारण करें स्नान, व्रत व दान
  10. कुलदेवी पूजन — यदि आपके कुल की तिथि यही हो स्नान, व्रत व दान
  11. कलह-क्लेश हेतु गौ माता को खीर स्नान, व्रत व दान
  12. सूर्योदय से पूर्व स्नान स्नान, व्रत व दान
  13. दान — और पात्र का विचार स्नान, व्रत व दान
  14. सौम्य या पौष्टिक मंत्र चुनें जप व पाठ
  15. पौष्टिक सामग्री से हवन हवन
  16. सप्तशती पाठ को एक नियत तिथि से बांधें जप व पाठ
  17. सुगंधित जल से अभिषेक देव-विशेष
  18. अन्नपूर्णा साधना आरंभ करना देव-विशेष
  19. पूर्णिमा व्रत स्नान, व्रत व दान
पूर्णिमा एक सीमा-बिंदु के रूप में
मास अनुसार
  1. चैत्र पूर्णिमा
  2. आषाढ़ पूर्णिमा
  3. श्रावण पूर्णिमा
  4. आश्विन पूर्णिमा
  5. कार्तिक पूर्णिमा
  6. मार्गशीर्ष पूर्णिमा
  7. पौष पूर्णिमा
  8. माघ पूर्णिमा
  9. फाल्गुन पूर्णिमा
नियम व सावधानियाँ
  1. नियमित हवन के लिए अग्निवास देखने की आवश्यकता नहीं
  2. रात्रि हवन में किस दिशा में मुख करें
  3. कौन-सा दिन पूर्णिमा माना जाए
  4. पूरे चक्र में समय नियत रखें
  5. हवन के पश्चात तर्पण व मार्जन
  6. चालू पुरश्चरण के बीच पड़ती पूर्णिमा
  7. माला का अनुशासन
आपकी पूर्णिमा जाँच-सूची
Tithi

पूर्णिमा तिथि की साधना विधि

पूर्णिमा तिथि के लिए बताई गई प्रत्येक साधना — नित्य का मूल आचरण, पूर्णिमा से पूर्णिमा तक के अनुष्ठान चक्र, वर्ष की प्रत्येक नामित पूर्णिमा, और वे प्रक्रियागत नियम जो तय करते हैं कि साधना ठीक से हुई या नहीं। प्रत्येक प्रविष्टि पर मूल वीडियो का लिंक दिया गया है।

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पूर्णिमा तिथि का महत्व

जब भी हम किसी मंत्र का जप करते हैं, उससे निर्मित ऊर्जा किसी देव तत्व का आकर्षण करती है और वहाँ से प्रवाहित होकर हमारे सूक्ष्म शरीर व कारण शरीर तक पहुँचती है। इस पूरे प्रसार और आकर्षण के माध्यम में चंद्रमा का सबसे विशेष प्रभाव होता है — वही इसमें प्रमुख कारक हैं। इसी कारण जन्म कुंडली में चंद्रमा की स्थिति पर यह निर्भर करता है कि मंत्र सिद्धि किस प्रकार होगी, और सिद्धि प्राप्त होने के पश्चात उसका प्रभाव कब क्षीण हो सकता है।

इसी से आगे का नियम निकलता है, और वह स्पष्ट रूप से कहा गया है — उग्रता प्रदान करने वाले मंत्रों का जप कृष्ण पक्ष में, अष्टमी से चतुर्दशी तक; और सौम्य तथा पौष्टिक मंत्रों का जप शुक्ल पक्ष में, पूर्णिमा तिथि के आसपास। पूर्णिमा केवल एक शुभ तिथि नहीं है — यह वह समय है जब आपकी साधना जिस माध्यम से यात्रा करती है, वह अपने पूर्णतम पर होता है।

उग्रता प्रदान के जो मंत्र होते हैं, कृष्ण पक्ष में उनका जप अष्टमी से चतुर्दशी तक अत्यधिक किया जाए तो उसका प्रभाव, और सौम्य तथा पौष्टिक मंत्रों का जप अगर शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा तिथि के आसपास किया जाए तो उनका अत्यधिक प्रभाव प्राप्त होता है।

शरद पूर्णिमा की महारात्रि और तांत्रिक मंत्र सिद्धि। … →

यदि और कुछ न कर सकें

०१

जो पहले से जपते हैं, उसी को बढ़ा दें

कोई नया मंत्र नहीं। जो चालीसा, स्तुति, स्तोत्र या मंत्र आप पहले से करते आ रहे हैं, उसी का अधिकाधिक पाठ इस दिन करें।

०२

दीपदान — कम से कम सोलह दीपक

गौ घृत के, और वह संभव न हो तो तिल तेल के। प्रदोष अथवा निशा काल में।

०३

सूर्योदय से पूर्व स्नान

विशेष रूप से वर्ष की बड़ी पूर्णिमाओं पर — कार्तिक पूर्णिमा पर तो अवश्य।

साधनाएं

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अपने नित्य जप व पाठ को बढ़ा दें

मूल

जो भी मंत्र, चालीसा, स्तुति या स्तोत्र आप पहले से अधिकाधिक मात्रा में जपते हैं, उसी का अधिकाधिक पाठ अमावस्या, पूर्णिमा और ग्रहण काल में करें। कारण भी स्पष्ट बताया गया है — अधिकांश लोगों की कुंडली में ग्रहण दोष और पितृ दोष होता ही है, और उसकी पीड़ा ठीक इन्हीं तिथियों में प्रकट होती है। इसीलिए वर्ष भर कोई बड़ा अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। न भी करें, तो भी मासिक पूर्णिमा और अमावस्या पर विशेष अनुष्ठान व पाठ करना चाहिए।

साथ में एक सरल नियम भी दिया गया है — यदि आसपास कोई तीर्थ क्षेत्र या पुराना मंदिर हो तो उस दिन वहाँ जाकर उपस्थिति दर्ज कराएँ, शरणागत हों। नियम बना लें कि हर पूर्णिमा-अमावस्या को अपने इष्ट आराध्य के मंदिर जाएँगे — इससे बहुत बल मिलता है।

आप और किसी समय में कोई बड़ा अनुष्ठान करें या ना करें, लेकिन मासिक पूर्णिमा जो पड़े, जब आपका अमावस्या पड़े, उस समय आपको विशेष अनुष्ठान इत्यादि पाठ करना चाहिए।

दीपदान — कम से कम सोलह दीपक

मूल

भगवती को सोलह का अंक अति प्रिय है — षोडशोपचार, भगवती की सोलह कलाएँ। इसलिए पूर्णिमा की रात्रि में कम से कम सोलह गौ घृत के दीपक प्रज्वलित करें; गौ घृत संभव न हो तो काले तिल के तेल का दीपक। अपने पूजन स्थान पर, भगवती लक्ष्मी के नाम से समर्पित करें।

दीपदान में संकल्प यह लें कि भगवती सदैव प्रसन्न होकर कुल में वास करें। यदि सोलह दीपक प्रज्वलित करके रात्रि काल में उनका अर्चन भी कर लें तो अति दिव्य — यह एक-दो घंटे का पूजन होगा, किंतु वर्ष भर कृपा प्राप्त होती रहेगी।

षोडशोपचार भगवती की है, 16 कलाएं भगवती को अति प्रिय हैं, तो पूर्णिमा की रात्रि में कम से कम 16 गौ घृत के दीपक, या अगर गौ घृत नहीं हो पा रहा है तो तिल तेल का दीपक… प्रज्वलित करें। शरद पूर्णिमा की महारात्रि और तांत्रिक मंत्र सिद्धि। … →

भैरव दीपदान — निरंतर बाधा होने पर

जहाँ निरंतर तंत्र-बाधा या कलह चल रहा हो, वहाँ भैरव दीपदान की विधि अवश्य करनी चाहिए। नियम अष्टमी का है, किंतु जब भी कोई पर्व काल आए — पूर्णिमा हो, अमावस्या हो, गंगा दशहरा हो — उस दिन भी दीपदान कर सकते हैं। इसमें किसी विशेष मंत्र का विषय नहीं है।

अष्टमी अष्टमी को भैरव दीप दान विधि करिए, और कभी भी पर्व काल आ जाए — पूर्णिमा हो, अमावस्या हो, गंगा दशहरा आए… उस दिन दीप दान करिए।

चंडी याग के स्थान पर आहुति

जो उतना बड़ा अनुष्ठान कराने में सक्षम न हों, उनके लिए सीधा विकल्प दिया गया है — पूर्णिमा और अमावस्या दोनों दिन अपने प्रतिष्ठित देवता के मंत्रों द्वारा हवन दें, और द्रव्य समस्या के अनुसार चुनें। संतान संबंधी परेशानी में बटुक भैरव को खीर अथवा घी से; धन संबंधी समस्या में सरसों तेल व बेलपत्र से; तंत्र प्रयोग की काट हेतु 108 नामावली से काली मिर्च द्वारा।

एक चेतावनी इसी के साथ जुड़ी है — यह लंबे समय तक निरंतर करना है, हर पूर्णिमा-अमावस्या-अष्टमी को। बार-बार नया स्वरूप पकड़कर पुराने को छोड़ देने से समस्या वहाँ हल नहीं होती।

अगर आप उतने बड़े अनुष्ठान को कराने में सक्षम ना है तो पूर्णिमा और अमावस्या के दोनों दिन जो है, अपने प्रतिष्ठित देवता की मूर्ति… उनके मंत्रों के द्वारा आहुति कीजिए, जैसी समस्या है उस अनुसार।

पाक्षिक गीता पाठ — एक तिथि नियत कर लें

महीने में या पक्ष में एक बार अपने आराध्य से संबंधित गीता का पाठ करें, और उसके लिए एक तिथि नियत कर लें। भगवती के लिए — अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा या अमावस्या। भगवान शिव के लिए — पंचमी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या या पूर्णिमा। गणपति के लिए चतुर्थी या चतुर्दशी। संक्रांति पर सभी का किया जा सकता है।

अन्नपूर्णा अथवा शाकंभरी — एक दिवसीय साधना

किसी भी मास

समय की कमी हो तो अन्नपूर्णा अथवा शाकंभरी साधना किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि को एक ही दिन में पूर्ण की जा सकती है। विधि स्पष्ट है — एक दिन में यथाशक्ति जप, लगभग 5,000; फिर उसका दशांश हवन, तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण।, मार्जन; और एक कन्या का भोज। कन्या का भोजन, वस्त्र व श्रृंगार सामग्री मंदिर में दान भी की जा सकती है।

अनुष्ठान पूर्ण होने के पश्चात प्रयोग हेतु नित्य उसी मंत्र की पाँच अथवा ग्यारह माला जप करते रहें।

अन्नपूर्णा साधना अथवा शाकंभरी साधना किसी भी महीने के पूर्णिमा तिथि को एक दिवसीय साधना भी आप कर सकते हैं। एक दिन में आप यथाशक्ति जप करेंगे… 5,000 जप करके उसका दशांश हवन, तर्पण, मार्जन और एक कन्या का भोज।

दत्त माला मंत्र

किसी भी मास

मार्गशीर्ष पूर्णिमा — दत्तात्रेय जयंती — से आरंभ करें, अथवा किसी भी मास की पूर्णिमा तिथि से। इसके लिए छह इंच से छोटा विग्रह या दत्तात्रेय यंत्र घर में स्थापित किया जा सकता है।

दत्त दीपदान — पूर्णिमा को

भगवान दत्त के लिए स्थायी क्रम यही रहेगा, चाहे आप किसी भी स्तर के साधक हों — बृहस्पतिवार को विशेष पूजन, और पूर्णिमा आदि को दीपदान, तथा महापर्व काल के समय भी दीपदान।

प्रथम साधना भगवान दत्त का करेंगे — बृहस्पतिवार के दिन उनका विशेष पूजन करेंगे, पूर्णिमा आदि को उनका दीप दान करेंगे, महापर्व काल के समय में उनका दीप दान करेंगे।

कवच कब धारण करें

प्राप्त हुआ कवच पहली बार कब धारण करें — इसका उत्तर सीधा है: सावन में कभी भी, गुप्त नवरात्र में कभी भी, अथवा पूर्णिमा को। उत्तर का भाव यही है कि उपयुक्त समय की कमी नहीं है।

कुलदेवी पूजन — यदि आपके कुल की तिथि यही हो

यदि आपके घर में पहले से ही कुलदेवी का पूजन पूर्णिमा को होता आया है, तो आप पूर्णिमा को ही करेंगे — कुल की परंपरागत तिथि ही मान्य होगी, और सामान्य सप्तमी पूजन उससे अलग रहेगा। जिनके कुल की कोई ज्ञात तिथि न हो, वे कुलदेवी सप्तमी का पालन करें।

अगर आपके घर में पहले से ही कुलदेवी का पूजा पूर्णिमा को होता आया है, तो आप पूर्णिमा को ही करेंगे।

कलह-क्लेश हेतु गौ माता को खीर

जिस परिवार में पहले प्रेम था और अब अत्यधिक कलह-क्लेश हो चुका हो, और हवन-पूजन आदि का प्रयोग करने पर भी ठीक न हो रहा हो — ऐसी अवस्था में पूर्णिमा अथवा अमावस्या के दिन परिवार का प्रत्येक सदस्य खीर बनाकर अपने हाथ से गौ माता को, बहुत प्रेम से खिलाए। संभव हो तो अपने द्वार पर, किंतु पशु अपने घर की न हो — इसका ध्यान रखें।

साथ में यदि श्रीमद्भगवद्गीता के सप्तम, नवम अथवा एकादश अध्याय में से किसी एक का सामूहिक पाठ होने लगे, तो प्रभाव पहले दिन से ही दिखने लगेगा।

पूर्णिमा के दिन या अमावस्या के दिन खीर बनाएं और सभी सदस्य अपने हाथ से खीर जो है गौ माता को खिलाएं, और बहुत प्रेम से खिलाएं… लेकिन पशु अपने घर की नहीं होनी चाहिए, इस बात का भी ध्यान रखना है।

सूर्योदय से पूर्व स्नान

मूल

वर्ष की बड़ी पूर्णिमाओं पर — और कार्तिक पूर्णिमा पर तो अवश्य — सूर्योदय से पूर्व गंगा जी अथवा किसी भी दिव्य नदी या सरोवर में स्नान करें। कहा गया है कि पूरे कार्तिक मास का पुण्य इन्हीं तीन दिनों में प्राप्त हो जाता है। जिन्होंने अब तक दीपदान नहीं किया या कम किया है, वे इन तीन दिनों में अत्यधिक दीपदान करें।

ये तीन दिन सूर्योदय से पहले तो अवश्य ही स्नान कर लीजिए, बहुत ही अच्छा रहेगा, क्योंकि ये पूरे कार्तिक मास का पुण्य बाकी के तीन दिनों में प्राप्त हो जाता है।

दान — और पात्र का विचार

पूर्णिमा के आचरण में दान सम्मिलित है — अन्न, वस्त्र और दक्षिणा, यथाशक्ति, उन्हें जो वास्तव में आपका मार्गदर्शन करते हैं: जो नवरात्रि में, एकादशी में, पर्व कालों में आपका पूजन कराते हैं। सावधानी इसी के साथ जुड़ी है — कुपात्र को दान कभी न दें।

सौम्य या पौष्टिक मंत्र चुनें

यह केवल पसंद नहीं, तिथि-चयन का सिद्धांत है। सौम्य व पौष्टिक मंत्रों का शुक्ल पक्ष में, पूर्णिमा तिथि के आसपास जप कहीं अधिक प्रभाव देता है; उग्रता प्रदान करने वाले मंत्र कृष्ण पक्ष, अष्टमी से चतुर्दशी के हैं। मास के जिस भाग में हों, उसी के अनुसार मंत्र चुनें।

पौष्टिक सामग्री से हवन

पोषक सामग्री से हवन पूर्णिमा के दिन किया जाता है, और शरद पूर्णिमा पर सर्वोत्तम कहा गया है। यह वहां लक्ष्मी साधना के साथ जुड़ता है — उनका माला-मंत्र, धनदा लक्ष्मी कवच, उनका जप, या स्वयं हवन।

सप्तशती पाठ को एक नियत तिथि से बांधें

जिस मन को किसी एक साधना में स्थिरता न मिले, उसके लिए दिया गया उपाय। अपना नित्य शिव-मंत्र जप बिना रुके चलाते रहें, और सप्तशती पाठ को एक नियत तिथि से बांध दें — अष्टमी या चतुर्दशी, या पूर्णिमा या अमावस्या। किसी नियम से बंधना ही अभ्यास को स्थिर करता है; इसके बिना मन एक बात से दूसरी की ओर भटकता रहता है।

सुगंधित जल से अभिषेक

एकादशी या पूर्णिमा को, अपनी सुविधा अनुसार, दिव्य सुगंधित द्रव्यों से मिश्रित जल से एक अभिषेक करें। भगवती के स्वरूपों व भगवान नारायण के लिए अनुमत है — किंतु हल्दी महादेव को नहीं चढ़ाई जाती, इसलिए उन्हें कभी हल्दी-जल से स्नान नहीं कराया जाता। उनकी शांति, प्रसन्नता व लक्ष्मी प्राप्ति हेतु संकल्प लें।

अन्नपूर्णा साधना आरंभ करना

गृहस्थ के लिए अत्यंत आवश्यक साधना बताई गई है। नवरात्र में यह प्रतिपदा से अष्टमी तक चलती है; अन्य किसी भी मास में, इसे पूर्णिमा तिथि से आरंभ करें। इसे लेने वाले हर साधक के लिए ब्रह्मचर्य पालन पहली शर्त बताई गई है।

पूर्णिमा व्रत

पूर्णिमा व्रत साधक की नित्य दिनचर्या में अष्टमी व प्रदोष व्रत के साथ स्वाभाविक रूप से बैठता है। जो पहले से ये तीनों रखता हो, उसके यह पूछने पर कि और जोड़ा जा सकता है या नहीं, उत्तर था कि शेष तिथियां भी रखी जा सकती हैं — हर एक का अपना देवता है, प्रतिपदा के प्रजापति से आगे तक।

पूर्णिमा एक सीमा-बिंदु के रूप में

पूर्णिमा केवल एक दिन की साधना नहीं — बार-बार इसे अनुष्ठान के आरंभ या समापन की सीमा के रूप में प्रयोग किया गया है। यदि आप एक रात्रि नहीं, बल्कि एक चक्र की योजना बना रहे हैं, तो ये रूप दिए गए हैं।
चक्र क्या विधान है Source
पूर्णिमा → पूर्णिमा एकाक्षरी बीज मंत्र की प्रतिदिन 108 माला। पहले विनियोगन्यास, फिर केवल बीज मंत्र — न प्रणव लगाना है, न नमः। भोर के समय अथवा रात्रिकालीन; 9–10 बजे की साधना का प्रभाव कम बताया गया है। चाहें तो सुबह-शाम 54-54 माला भी कर सकते हैं। आकाशचारी सिद्ध भी साधना में सहयोग करते हैं …
पूर्णिमा → पूर्णिमा (दीक्षा) दीक्षा विधान स्वयं किसी भी मास की पूर्णमासी को, अथवा शिवरात्रि या नवरात्रि के पर्व काल में। चूँकि किसी गुरु परंपरा से मंत्र प्राप्ति नहीं हो रही, इसलिए एक मास का विधान करना चाहिए। श्री दत्तात्रेय दीक्षा।महागुरु वरण की पूर्ण विधि।इस विधान …
पूर्णिमा → अमावस्या 15 दिन, प्रतिदिन 108 जप — सदाशिव के विग्रह अथवा शिवलिंग के समक्ष, दीप प्रज्वलित करके, पंचमुखी रुद्राक्ष माला से। न्यूनतम 11 दिन; 27 दिन सर्वोत्तम। प्रातःकाल श्रेष्ठ है। श्री दत्तात्रेय माला मंत्र।सौ काम का एक मंत्र।#dattatreya …
अमावस्या → पूर्णिमा एक पक्ष की पूर्ण साधना — अंधकार से प्रकाश तक — जिसका समापन गुरु पूर्णिमा को होता है। एक माला हो या पाँच, अंत तक निरंतरता बनी रहे। गुरु गायत्री साधना।Guru Gayatri Sadhana
प्रतिपदा → पूर्णिमा जो लंबा अनुष्ठान नहीं निभा सकते, वे छोटे करें — एकादशी से एकादशी, अथवा प्रतिपदा से पूर्णिमा। समय-सारणी नियत करके उसका पालन करें। संकल्प कृपा प्राप्ति और कवच/माला मंत्र के पूर्ण जागरण का हो, प्रयोग-परीक्षण का नहीं। तंत्र काट स्वयं करना सही या गलत
जप संख्या पूर्ण करना पंचाक्षरी पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। में — प्रतिदिन 41 माला से तीस दिन में लगभग 1,230 माला होती है, इसलिए पूर्णिमा को 20 माला अधिक कर लें, सवा लाख सहज पूर्ण हो जाएगा। श्रावण महामृत्युंजय तंत्र साधना विशेष-गृहस्थ साधकों हेतु संपूर्ण
देव दीक्षा के पश्चात एकाक्षरी देव दीक्षा विधान पूर्ण करके उसी दिन से एकाक्षरी जप आरंभ करें और 41 दिन तक ले जाएँ — अथवा पौष पूर्णिमा तक, माघ पूर्णिमा तक, माघ अमावस्या तक, या मकर संक्रांति तक। इनमें से कोई भी समापन-बिंदु उत्तम कहा गया है। श्री त्रिपुर भैरवी अन्नपूर्णा दत्तात्रेय जयंती।। अति विशिष्ट …

मास अनुसार

वर्ष की नामित पूर्णिमाएँ और उनसे जुड़ा विधान। जो आपके लिए आवश्यक हो, उसे खोलें।

हनुमान साधना यहीं से आरंभ होती है और पूर्णिमा से पूर्णिमा तक — कम से कम एक पूरा मास — चलती है। एकमुखी हनुमान कवच सुझाया गया है, अथवा पंचमुखी, बिना साधना को अधिक भारी किए। परिवार सहित हनुमान चालीसा का हवन करें। श्रृंगार में पान व पीपल के पत्ते जिन पर राम का बीज मंत्र अंकित हो, तुलसी पत्र और लाल पुष्प। नवरात्रि का प्रसाद भी इसी पूर्णिमा पूजन के पश्चात पूर्ण होता है।

गुरु पूजन करें; तीनों मंडलों का तर्पण — दिव्यौघ, मानव, और अपने गुरु-कुल का — आवश्यक माना गया है, यद्यपि विधान परंपरा अनुसार भिन्न होता है। जो दीक्षित हैं वे अपने गुरु के पास जाएँ।

जिनके कोई गुरु नहीं हैं: वे भगवान सदाशिव के मंदिर में जाकर गुरु रूप में उन्हीं को वस्त्र अथवा यथाशक्ति जो दे सकें, अर्पण करें। त्रिकाल गायत्री करने वाले अथवा कोई वयोवृद्ध साधक या पंडित जी जो शिव मंदिर में सेवा करते हों — उन्हें भी उस दिन दान-दक्षिणा देकर संतुष्ट किया जा सकता है। इस दिन गोरखनाथ साधना भी की जा सकती है।

श्रावणी पूर्णिमा को तंत्रोक्त रात्रियों में से एक माना गया है — एक प्रकार से माया रात्रि। उस रात्रि में जो भी तंत्रोक्त अनुष्ठान करना हो, भैरव जी का दीपदान हो, अपने कुलदेवी-देवता का पूजन हो, या कोई मंत्र जाप — वह करना चाहिए। यह वही दिन है जिस दिन यज्ञोपवीत धारण करने वाले उसका नवीनीकरण करते हैं।

लक्ष्मी की रात्रि। रात्रि अनुष्ठान में मुख्यतः दो स्वरूप लिए जाते हैं — अष्टलक्ष्मी / धनदा लक्ष्मी, और स्वर्णाकर्षण भैरव।

रात्रि जागरण करें और यथाशक्ति जप करें। स्पष्ट कहा गया है कि भोर तक चलाना अनिवार्य नहीं — यदि दो-तीन बजे शरीर साथ न दे तो वहीं समर्पण कर दें। रात्रि रखनी है; जप उतना जितना संभव हो।

कम से कम सोलह गौ घृत के दीपक। पौष्टिक सामग्री से हवन इस रात्रि पर सर्वोत्तम कहा गया है। यदि शरद पूर्णिमा किसी चालू संकल्प के बीच पड़ रही हो, तो उसे प्रतिस्पर्धी अनुष्ठान बनाने के बजाय उस दिन के सहस्राक्षरी मंत्र के रूप में सम्मिलित कर लें।

बैकुंठ चतुर्दशी और उससे पूर्व की त्रयोदशी सहित — ये तीन दिन अत्यंत विशिष्ट कहे गए हैं। सूर्योदय से पूर्व स्नान गंगा जी अथवा किसी दिव्य नदी या सरोवर में; पूरे कार्तिक मास का पुण्य इन्हीं तीन दिनों में प्राप्त हो जाता है।

तत्पश्चात सूर्य नारायण पूजन, फिर अपने इष्ट देव का। विशेष शिव पूजन और कमल का अर्पण — कमल न मिले तो कमलगट्टा — उनके 108 नामों सहित। इस दिन अपने आराध्य की 108-नामावली से अथवा अपने जप मंत्र से हवन करें। संध्या काल में घर पर दीपदान, गौशाला में धूना व दीपदान, और आसपास के शिव, दुर्गा व नारायण मंदिरों में दीप।

दत्तात्रेय जयंती — और यहाँ ध्यान से देखें कि जयंती का महत्व रात्रिकालीन पूर्णिमा पर है, उदय-व्यापिनी पर नहीं। जहाँ तिथि एक दिन संध्या में आरंभ होकर अगले दिन उदय-व्यापिनी हो, वहाँ रात्रि की गणना ही मान्य होगी।

कहा गया है कि इसी पूर्णिमा को भगवती अन्नपूर्णा प्रकट हुईं, और त्रिपुर भैरवी — पंचम महाविद्या — भगवान दत्त के साथ उपस्थित थीं। इस दिन देव दीक्षा विधान पूर्ण करें और उसी दिन से एकाक्षरी जप आरंभ करें। दत्त माला मंत्र भी यहीं से आरंभ होता है।

पौष मास की पूर्णिमा को शाकंभरी पूर्णिमा कहा जाता है — भगवती का इस स्वरूप में अवतरण दिवस। अन्नपूर्णा अथवा शाकंभरी स्वरूप की उपासना अवश्य करनी चाहिए।

शाकंभरी नवरात्र सप्तमी/अष्टमी से इसी पूर्णिमा तक चलता है, और मुख्यतः वे ही मनाते हैं जिनकी कुलदेवी वे हैं अथवा जो उनके क्षेत्र में निवास करते हैं — यह सर्वत्र प्रकट रूप से नहीं मनाया जाता। एक सावधानी: यह प्रायः खरमास में पड़ता है, और खरमास में कोई नई साधना आरंभ नहीं करनी चाहिए। जगदंबा और भगवान दत्त — दोनों के निमित्त दीपदान करें। कुंभ काल का नियम भी इसी दिन से आरंभ होता है, जिसमें नित्य स्नान प्रथम नियम है।

व्रत-कथा के क्रम से — माघ पूर्णिमा तिथि को रात्रि भर जागरण करें, और प्रातःकाल नदी के तट पर भीगे वस्त्र पहनकर शिव पूजन करें। यह मासिक शिव-आचरणों की एक शृंखला में आता है, जिसकी परिणति महाशिवरात्रि पर होती है जहाँ प्रत्येक प्रहर में बिल्व अर्पित करते हुए रात्रि जागरण किया जाता है।

हर वर्ष दो तिथियों को लेकर जो भ्रम बनता है, उसका उत्तर सीधा दिया गया है — जब पूर्णिमा रात्रि-व्यापिनी हो, निश्चित रूप से रात्रि में व्याप्त हो, तब पर्व काल के निमित्त पूजन-जप कर लेना चाहिए, क्योंकि रंगोत्सव अगली प्रतिपदा का विषय है।

नियम व सावधानियाँ

ये वे प्रक्रियागत बिंदु हैं जो तय करते हैं कि पूर्णिमा की साधना ठीक से हुई या नहीं — इनमें से अधिकांश लाइव सत्रों में बार-बार पूछे गए प्रश्नों के सीधे उत्तर हैं।

नियमित हवन के लिए अग्निवास देखने की आवश्यकता नहीं

यदि आपने हवन किसी तिथि से बाँध लिया है — हर पूर्णिमा, हर अमावस्या, हर अष्टमी, हर प्रदोष — तो अग्निवास नहीं देखना है। यही नियम साप्ताहिक हवन पर और नित्य हवन पर भी लागू होता है। केवल आरंभ अच्छे शुभ काल में करें।

कोई कह रहे हैं कि हम हर पूर्णिमा को हवन करेंगे, हर अमावस्या हवन करेंगे… जिनका भी जिस तिथि को हवन करना हो उस तिथि में हवन आराम से कर लें, अग्निवास देखने की आवश्यकता नहीं है।

रात्रि हवन में किस दिशा में मुख करें

रात्रि समय में पूर्णिमा हवन किस दिशा में मुख करके करें — इस सीधे प्रश्न का उत्तर: गृहस्थों को प्रमुख रूप से पूर्व और उत्तर की दिशा में करना चाहिए।

रात्रि समय में पूर्णिमा हवन किस दिशा में मुख करके करें? — गृहस्थों को प्रमुख रूप से पूर्व और उत्तर की दिशा में करनी चाहिए।

कौन-सा दिन पूर्णिमा माना जाए

जहाँ पर्व रात्रि पर निर्भर हो, वहाँ रात्रि-व्यापिनी गणना मान्य होगी। जहाँ स्नान प्रमुख कर्म हो, वहाँ प्रातः — उदय-व्यापिनी — मान्य होगी, क्योंकि स्नान का महत्व उसी काल में अधिक है। एक दिन पहले ही सब कुछ निपटा देने की वर्तमान प्रवृत्ति के विरुद्ध, और तिथि क्षय होने पर प्रतिपदा को पूर्णिमा मान लेने के विरुद्ध, बार-बार सचेत किया गया है।

पूरे चक्र में समय नियत रखें

साधना का समय एक बार चुन लेने के बाद अनुष्ठान की अवधि तक बदलना नहीं चाहिए। पहले दिन भोर में आरंभ किया है तो अंतिम दिन तक उसी समय पर; यही नियम रात्रि साधना पर भी लागू है। संभव हो तो साधना के पश्चात अन्न न लें — दूध ले सकते हैं।

हवन के पश्चात तर्पण व मार्जन

जो पूर्णिमा को हवन तो करते हैं किंतु तर्पण करना नहीं जानते — उनके लिए तर्पण-मार्जन की पूरी विधि चैनल पर अलग से उपलब्ध है।

पूर्णिमा में हवन कर रहे हैं, तर्पण करने नहीं आता… केवल सर्च कीजिए — हवन के बाद तर्पण मार्जन कैसे करें।

चालू पुरश्चरण के बीच पड़ती पूर्णिमा

पुरश्चरण के दौरान किसी अन्य शक्ति का पूजन नहीं उठाया जाता — अर्थात कोई अलग बृहद पूजन विधि नहीं। जहाँ कोई बड़ी पूर्णिमा संकल्प के बीच पड़ रही हो, वहाँ उसे प्रतिस्पर्धी अनुष्ठान बनाने के बजाय उस दिन के सहस्राक्षरी मंत्र के रूप में सम्मिलित कर लें।

माला का अनुशासन

नए साधकों के लिए विशेष रूप से — आपकी जप माला का स्पर्श कोई अन्य न करे, और गले में धारण की हुई माला किसी को प्रसन्नता के क्षण में दे नहीं देनी चाहिए। ऐसी भूलें सिद्धि की हानि का कारण बताई गई हैं।

आपकी पूर्णिमा जाँच-सूची

दिन भर के क्रम में मूल आचरण। चिह्न केवल इसी ब्राउज़र में सुरक्षित रहते हैं, इसलिए प्रातः तैयारी करके रात्रि में लौट सकते हैं।
of done

हर बिंदु हर साधक पर लागू नहीं होता। यदि आप किसी चालू अनुष्ठान के भीतर हैं, तो पहले उसी का नियम मान्य होगा — पुरश्चरण इस सूची के लिए नहीं तोड़ा जाता।

Sources

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