जो भी मंत्र, चालीसा, स्तुति या स्तोत्र आप पहले से अधिकाधिक मात्रा में जपते हैं, उसी का अधिकाधिक पाठ अमावस्या, पूर्णिमा और ग्रहण काल में करें। कारण भी स्पष्ट बताया गया है — अधिकांश लोगों की कुंडली में ग्रहण दोषराहु या केतु का जन्मकुंडली में सूर्य अथवा चंद्र के साथ एक ही भाव में युति होने पर उत्पन्न ज्योतिषीय दोष — दृष्टि-संबंध से भी यह दोष बनता है, किंतु समभाव युति कहीं अधिक प्रबल होती है। और पितृ दोष होता ही है, और उसकी पीड़ा ठीक इन्हीं तिथियों में प्रकट होती है। इसीलिए वर्ष भर कोई बड़ा अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। न भी करें, तो भी मासिक पूर्णिमा और अमावस्या पर विशेष अनुष्ठान व पाठ करना चाहिए।
साथ में एक सरल नियम भी दिया गया है — यदि आसपास कोई तीर्थ क्षेत्र या पुराना मंदिर हो तो उस दिन वहाँ जाकर उपस्थिति दर्ज कराएँ, शरणागत हों। नियम बना लें कि हर पूर्णिमा-अमावस्या को अपने इष्ट आराध्य के मंदिर जाएँगे — इससे बहुत बल मिलता है।