पीतांबरा साधना के बाद परेशानी क्यों बढ़ती है — छूटी हुई आरंभिक साधनाएं, अनदेखे नियम, और उग्र शक्ति को सौम्य करने वाला तर्पण
भगवती पीतांबरा की साधना उल्टी क्यों पड़ सकती है, और उसका उपाय।
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पीतांबरा साधना के बाद कलह, नए शत्रु और उग्र स्वभाव
पीतांबरा की साधना के बाद घर में कलह बढ़ा, नए शत्रु उत्पन्न हुए और पुराने प्रचंड हो गए, कार्यक्षेत्र बिगड़ा, और शांत व्यक्ति उग्र हो गया।
एक श्रोता बताते हैं कि भगवती पीतांबरा की साधना करने से परिवार में कलह क्लेश बढ़ने लगा; अनुष्ठान के मध्य में और पूर्ण होने के पश्चात नए शत्रुओं का प्रादुर्भाव हुआ और पुराने शत्रु और अधिक प्रचंड हो गए; कार्यक्षेत्र में विभिन्न प्रकार की परेशानियां आने लगीं; और जो व्यक्ति पहले शांत सौम्य रहता था वह अत्यधिक उग्र हो गया।
वक्ता वह विषय पढ़कर सुनाते हैं जिस पर बात होनी है। भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। की साधना करने से प्रश्नकर्ता के परिवार में कलह क्लेश बढ़ने लगा। उस साधना के पश्चात, अनुष्ठान के मध्य में भी और उसके पूर्ण होने के पश्चात भी, नए-नए शत्रुओं का प्रादुर्भाव हो गया, और पुराने शत्रु और अधिक प्रचंड हो गए। कार्यक्षेत्र में विभिन्न प्रकार की परेशानियां आने लगीं। प्रश्नकर्ता, जो पहले काफी शांत सौम्य रहते थे, अब अत्यधिक उग्र हो गए हैं। एक वाक्य में कहें तो, वे कहते हैं, बात यह है: पीतांबरा की साधना से पहले हम काफी खुश थे, जीवन काफी अच्छा था, लेकिन किन्हीं कारणों से हमने यह साधना आरंभ की और उसके बाद परेशानियां बढ़ गईं और स्थिति काफी खराब हो गई है। यह किस कारण से हो रहा है और इसमें क्या करना चाहिए — यही वह विषय है जिसे वे विस्तृत रूप से जानने का प्रयास करने को कहते हैं।
उद्देश्य, टर्निंग पॉइंट, और अति उत्साह
कोई व्यक्ति सबसे पहले साधना उठाता ही क्यों है?
जब भी कोई व्यक्ति साधना की ओर अग्रसर होता है तो उसके पीछे कोई न कोई उद्देश्य होता है — भौतिक, आध्यात्मिक, अथवा किसी देवी कृपा को प्राप्त करने हेतु — और उस निर्णय तक ले जाने वाला कोई टर्निंग पॉइंट होता है। वक्ता कहते हैं कि जो व्यक्ति पीतांबरा साधना का निर्णय लेता है, उसने वह निर्णय जरूर किसी न किसी व्यक्ति के अनुभव को सुनकर लिया होगा, और उसी अति उत्साह में साधना आरंभ कर दी होगी।
प्रश्न को दोहराते हुए — पीतांबरा की साधना करने से कब परेशानियां बढ़ने लगती हैं, और इसके पीछे का कारण क्या-क्या हो सकता है — वक्ता उद्देश्य से आरंभ करते हैं। जब भी हम साधना की ओर अग्रसर होते हैं तो उसके पीछे कुछ न कुछ एक उद्देश्य होता है, और उस उद्देश्य की पूर्ति हेतु ही हम साधना के क्षेत्र में आते हैं; चाहे वह भौतिक हो या आध्यात्मिक हो अथवा किसी प्रकार की देवी कृपा को प्राप्त करने हेतु हो। साधना के क्षेत्र में आने के पश्चात, वे कहते हैं, इस बात का ध्यान रखिए: आपका उद्देश्य जो भी हो और कारण जो भी हो, इस निर्णय को लेने के लिए कोई न कोई एक टर्निंग पॉइंट रहा होगा। जब आप यह निर्णय लेते हैं कि हम भगवती पीतांबरा की साधना करेंगे, तो जरूर किसी न किसी व्यक्ति के अनुभव को सुनकर ही आपने वह निर्णय लिया होगा। उनके किसी स्वरूप, उनके किसी मंत्र, उनकी किसी साधना का कुछ ऐसा सुना होगा, पढ़ा होगा, जिससे आप काफी अधिक उत्साहित हो गए — और उस अति उत्साह में आपने साधना आरंभ कर दी।
सबसे पहले उठाई गई बगला प्रत्यंगिरा साधना
परेशानी बताने वाले सौ में से लगभग पचासी लोगों ने बगला प्रत्यंगिरा के कवच से ही आरंभ किया — 1100, 3600 और 11000 तक की संख्या में।
वक्ता कहते हैं कि परेशानी बताने वाले सौ लोगों से यदि पूछा जाए कि उन्होंने पीतांबरा से संबंधित कौन सी साधना की, तो सौ में से लगभग पचासी यही कहेंगे कि उन्होंने सबसे पहले बगला प्रत्यंगिरा साधना ही की — प्रत्यंगिरा स्वरूप के कवच इत्यादि का पाठ और अनुष्ठान, 1100, 3600 और 11000 तक की संख्या में।
साधना तो आरंभ कर दी, वक्ता कहते हैं — लेकिन कौन सी साधना आप करने गए? अभी के समय में अगर पूछा जाए कि भगवती पीतांबरा से संबंधित किस प्रकार की साधना आपने की है, जिसके बाद आपको परेशानी आरंभ हुई है, तो सबसे पहला जो निकलेगा वह यह है: सौ लोगों ने अगर साधना की होगी तो मानकर चलिए कि सौ में से पचासी यह बोलेंगे कि उन्होंने सबसे पहले बगला प्रत्यंगिरा (महाप्रत्यंगिरा) साधना ही की। सर्वप्रथम ही, वे कहते हैं, भगवती पीतांबरा के प्रत्यंगिरा स्वरूप के कवच इत्यादि का हमने पाठ किया, अनुष्ठान किए — 1100, 3600, और 11000 तक किए।
पहले कोई साधना नहीं, और इंटरनेट से लिया गया निर्णय
कुछ भी नहीं: न चालीसा, न सुबह-शाम धूप दीप — बहुत हुआ तो शनिवार को हनुमान चालीसा, फिर परेशानी, फिर यूट्यूब से उठाई गई साधना।
पूछने पर कि इससे पहले कौन सी साधना करते थे, उत्तर मिलता है — कोई नहीं: न हनुमान चालीसा, न दुर्गा चालीसा, न सुबह-शाम धूप दीप; बहुत हुआ तो शनिवार को हनुमान चालीसा और मंगलवार को यदा कदा मंदिर। फिर जीवन में परेशानियां आईं, यूट्यूब पर, इंटरनेट पर, गूगल पर सर्च मारे, मैगजीन पढ़ीं, किसी के अनुभव से रिलेट हुए, और साधना उठा ली।
वक्ता ऐसे साधक से प्रश्न करते हैं: इससे पहले आप कौन सी साधना करते थे? उत्तर, वे कहते हैं, यही होता है कि आज से पहले तो हम कोई साधना नहीं करते थे। कुछ तो किया होगा — हनुमान चालीसा पढ़ते होंगे, दुर्गा चालीसा पढ़ते होंगे, सुबह शाम धूप दीप जलाते होंगे, कभी मंदिर जाते होंगे? कुछ भी नहीं। बहुत होता था तो शनिवार को हनुमान जी का चालीसा पढ़ लेते थे, और मंगलवार को यदा कदा मंदिर चले जाते थे। लेकिन जीवन में परेशानियां आईं। यूट्यूब पर सर्च मारे, इंटरनेट पर सर्च मारे, गूगल में, या मैगजींस पढ़ीं; यूट्यूब पर किसी के वक्तव्य को इस प्रकार से सुना, और रिलेट हुए कि हां, इनकी जो परेशानी है मेरी भी ऐसी ही है। चाहे हम अभिशाप से ग्रसित हों या कोई और कारण हो, फिर हमने यह साधना उठाकर करनी आरंभ कर दी। और करने के पश्चात हमने पाया कि जो हमने सुना था — उन्होंने अपने अनुभव में बताया था कि इतने दिन की साधना के बाद ये अनुभव हुए और यह रिजल्ट मिला — हमारे साथ तो पूरा का पूरा उल्टा हो रहा है। ऐसा क्यों, और इसके पीछे का कारण क्या है?
एलकेजी-यूकेजी छोड़कर सीधे दसवीं का सिलेबस लेकर बैठ जाना
सबसे बड़ा कारण यह है कि एलकेजी-यूकेजी किए ही नहीं और सीधे दसवीं क्लास का सिलेबस लेकर बैठ गए।
सबसे पहला और सबसे विशेष कारण, वे कहते हैं, यही है कि आपने यूकेजी एलकेजी किए ही नहीं और सीधे दसवीं क्लास का सिलेबस लेकर बैठ गए। इस बात का, वे कहते हैं, यही सबसे बड़ा कारण बनता है।
इसका सबसे पहला और सबसे विशेष कारण, वक्ता कहते हैं, यही है: कि आपने यूकेजी एलकेजी किए ही नहीं, और सीधे दसवीं क्लास का सिलेबस लेकर बैठ गए। इस बात का, वे कहते हैं, यही सबसे बड़ा कारण बनता है।
तंत्र एक जाग्रत विषय, और दोष हर जगह लगता है
तंत्र का क्षेत्र वैदिक क्षेत्र से किस प्रकार अलग है?
तंत्र को जाग्रत विषय कहा गया है, जो तुरंत प्रभाव देने वाला है; वैदिक चीज अलग होती है, और तांत्रिक तथा तंत्रोक्त चीजों का क्षेत्र ही अलग होता है। लेकिन वक्ता इस भ्रम से सावधान करते हैं कि कहीं और गलती करने पर दोष नहीं लगेगा — दोष हर जगह लगता है, क्षेत्र कोई भी हो, और कोई छूटता नहीं।
यह तंत्र का क्षेत्र है, वक्ता कहते हैं — और वे पूछते हैं कि तंत्र का अर्थ क्या है, और तंत्र की चीजों को क्यों कहा गया है कि तंत्र एक जाग्रत विषय है। वह तुरंत प्रभाव देने वाला है। वैदिक चीज अलग होती है; तांत्रिक चीज, तंत्रोक्त चीजें, यह क्षेत्र ही अलग होता है। लेकिन ऐसा नहीं है, वे चेतावनी देते हैं, कि गलती वहां करेंगे तो वहां दोष नहीं लगेगा और यहां करेंगे तो यहां जल्दी लगेगा। दोष हर जगह लगता है। गलती के लिए दोष तो हर जगह है, चाहे क्षेत्र कोई सा भी हो — तो मन में यह भ्रम न पालें कि हम कहीं गलती करेंगे तो छूट जाएंगे।
भाव से पहले क्रिया, और प्रत्यंगिरा की आठ शक्तियों का प्रभाव सबसे पहले साधक पर
तंत्र में भाव पहले आता है या क्रिया?
वक्ता भाव और क्रिया में भेद करते हैं: यदि आप भाव से कर रहे हैं तो भाव से भक्ति करनी चाहिए, लेकिन तंत्र में भाव का विषय बाद में आता है और क्रिया का विषय पहला हो जाता है। जब भगवती बगला के प्रत्यंगिरा स्वरूप का पाठ किया जा रहा हो, तो प्रत्यंगिरा में जिन आठ शक्तियों को कहा गया है उनके तत्व का प्रभाव सबसे पहले साधक के अपने स्वरूप, शरीर और आभामंडल पर पड़ता है।
एक होता है भाव, वे कहते हैं, और दूसरी होती है क्रिया। यदि आप भाव से कर रहे हैं तो भाव से भक्ति करनी चाहिए। तंत्र में भाव का विषय बाद में है, क्रिया का विषय पहला हो जाता है। जब आप भगवती बगला के प्रत्यंगिरा स्वरूप का पाठ कर रहे हैं, सेवा कर रहे हैं, तो प्रत्यंगिरा में जिन आठ शक्तियों को कहा गया है उन आठ शक्तियों का जो तत्व है, उसका प्रभाव सबसे पहले आपके स्वरूप पर, आपके शरीर पर, आपके आभामंडल पर पड़ेगा। सबसे पहले वह आपके सूक्ष्म शरीर के ऊपर, और आपकी स्थूल काया के ऊपर पड़ेगा।
ऐसा घर जहां न शिव पूजन हुआ, न शिवलिंग की स्थापना, न शिवरात्रि का व्रत और न नवरात्रि की कलश स्थापना
जिस घर में कभी रुद्राभिषेक, शिवलिंग, शिवरात्रि का व्रत या नवरात्रि का कलश नहीं हुआ, वहां न साधक और न परिवार प्रत्यंगिरा से बनी ऊर्जा को पचा पाता है।
वक्ता पूछते हैं कि उस ऊर्जा को पचाने की क्षमता साधक के भीतर है कि नहीं, और जिस घर में यह साधना की जा रही है उसके परिवार के सदस्यों के भीतर है कि नहीं। यदि घर में भगवान सदाशिव का कभी रुद्राभिषेक नहीं हुआ, कभी शिवलिंग की स्थापना ही नहीं हुई, कभी शिव पूजन नहीं हुआ, कभी शिवरात्रि का व्रत नहीं किया, नवरात्रि में कभी कलश स्थापना करके पूजन नहीं किया, आरती तक नहीं की — और सीधे प्रत्यंगिरा स्वरूप पर चले गए — तो जो ऊर्जा बनेगी उसका प्रभाव पड़ेगा।
अब, वक्ता पूछते हैं, उस ऊर्जा को पचाने की क्षमता आपके भीतर है कि नहीं? आपके परिवार के जो सदस्य हैं, जहां रहकर आप यह साधना उपासना कर रहे हैं, उनके भीतर है कि नहीं? यह इसी पर निर्भर करेगा। यदि आपके घर में आज से पहले भगवान सदाशिव का कभी रुद्राभिषेक नहीं हुआ, यदि आपके परिवार में, घर में कभी शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। की स्थापना ही नहीं हुई — वह छोटा सा शिवलिंग जो घर में रखा जाता है, जो वे कहते हैं कि सनातन संस्कृति से संबंधित हर प्रत्येक व्यक्ति के घर में होना चाहिए। यदि कभी शिव पूजन ही नहीं हुआ, यदि कभी आपने शिवरात्रि (महाशिवरात्रि) का व्रत नहीं किया, यदि कभी नवरात्रि में कलश स्थापना करके आपने पूजन ही नहीं किया, यदि नवरात्र में कभी कोई विशेष साधना पूजा नहीं की। आपने आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। तक नहीं की। और आप सुनकर, अति उत्साहित होकर, सीधे भगवती बगला के प्रत्यंगिरा स्वरूप की उपासना करने चले गए। तो जो ऊर्जा बनेगी — उसका प्रभाव क्या करेगा?
पीत वस्त्र, धोती और उसकी लांग, पीला आसन, हरिद्रा, सहस्रनाम और अभिषेक
पीतांबरा साधना के नियम क्या हैं?
वक्ता पूछते हैं कि बाकी के नीति नियमों को माना जा रहा है कि नहीं: पीतांबरा साधना में पीत वस्त्र ही क्यों आवश्यक कहा गया है और हरा या भगवा क्यों नहीं, पीतांबरा नाम क्यों दिया गया, साधक पीतांबरी धोती पहनता है कि नहीं और उसमें लांग लगाना आता है कि नहीं, आसन पीला रखा है कि नहीं, हरिद्रा संस्कारित सामान कभी किया कि नहीं, सहस्रनाम से, सतनाम से, या चित्र रखकर 108 नामावली से अर्चन किया कि नहीं, और कभी भगवती का या उनके भैरव भगवान शिव का अभिषेक किया कि नहीं।
बाकी के नीति नियमों को आप मान रहे हैं कि नहीं मान रहे हैं, वक्ता पूछते हैं। भगवती पीतांबरा की साधना के समय यह क्यों कहा जाता है कि पीत वस्त्र ही आवश्यक है? यह क्यों नहीं कहा गया कि हरा वस्त्र पहन लो, भगवा वस्त्र पहन लो? पीत वस्त्र क्यों कहा गया है? उन्हें पीतांबरा रूप नाम क्यों दिया गया? क्या आप पीतांबर पहनकर करते हैं, पीतांबरी धोती पहनते हैं? धोती पहनने आता है? धोती में लांग कैसे लगाते हैं, वह आता है? आसन पीला रखा है क्या? क्या कभी हरिद्रा संस्कारित सामान करके हरिद्रा से भी भगवती का अर्चन किया है? क्या कभी भगवती पीतांबरा का उनके सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। से अर्चन किया है? सतनाम से अर्चन किया है? क्या कभी उनका एक फोटो रखकर भी 108 नामावली से उनका अर्चन किया है? क्या कभी उनका अभिषेक किया है? क्या कभी भगवान शिव का, जो उनके भैरव हैं, अभिषेक किया है? नहीं किया है ना? पहले देखिए, वे कहते हैं: यदि परेशानी आ रही है तो उसके पीछे का यह मूल कारण है — और हो सकता है अन्य बहुत से कारण हों, यह मूल कारण है।
साधनात्मक चीजों को सबसे पहले देखना
साधनात्मक पक्ष पहले आता है: तिथि नक्षत्र का विचार किया भी था या नहीं, और कब यह नहीं करना है।
साधनात्मक जो चीजें होती हैं, वे कहते हैं, उन्हें सबसे पहले देखना चाहिए। क्या आपने तिथि, नक्षत्र इत्यादि का विचार किया है? ये चीजें आपने पहली बार की हैं, दूसरी बार की हैं — क्या आपने कभी विचार किया है कि कैसे क्या करना है, और कब नहीं करना है?
साधनात्मक जो चीजें होती हैं, वक्ता कहते हैं, उन्हें सबसे पहले देखना चाहिए। क्या आपने तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर।, नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। इत्यादि का कोई विचार किया है? क्योंकि यह आपने पहली बार किया है और दूसरी बार किया है। क्या आपने कभी इन चीजों पर विचार किया है — कैसे क्या करना है, और कब नहीं करना है? भाव प्रधान में आकर आपने तंत्र की साधना उठा ली, और वह भी सीधे प्रत्यंगिरा साधना करने चले गए।
गलत मंत्र उच्चारण के दोष और तिर्यक प्रभाव का उपाय
प्रत्यंगिरा स्वरूप वास्तव में किस लिए बताया गया है?
वक्ता उस लिखे हुए विषय की ओर संकेत करते हैं: कि गलत मंत्र उच्चारण के कारण जो दोष उत्पन्न होता है उसके शमन के लिए, यानी उसके तिर्यक प्रभाव को नष्ट करने के लिए, भगवती पीतांबरा के इस स्वरूप की, यानी प्रत्यंगिरा स्वरूप की उपासना करनी चाहिए, जिससे वह तिर्यक प्रभाव नष्ट हो जाता है। जिस स्वरूप की साधना दूसरे मंत्र के तिर्यक प्रभाव को नष्ट करने का सामर्थ्य रखती है, वे पूछते हैं, क्या वह स्वयं तुरंत प्रभाव देगा? नहीं देगा।
वहां एक लिखा हुआ विषय है, वक्ता कहते हैं — अगर आप पढ़ते हैं, और पढ़कर कर रहे हैं, तो वहां लिखा है कि गलत मंत्र उच्चारण के कारण जो दोष उत्पन्न होता है उसके शमन के लिए, यानी उसके तिर्यक् प्रभाव को नष्ट करने के लिए, भगवती पीतांबरा के इस स्वरूप की, यानी प्रत्यंगिरा के स्वरूप की उपासना करनी चाहिए, जिससे कि वह तिर्यक प्रभाव ही नष्ट हो जाता है। तो भैया, वे कहते हैं: जो चीज भगवती का वह स्वरूप है, वह साधना जो दूसरे मंत्र के तिर्यक प्रभाव को नष्ट करने का अमरत्व रखती है — क्या वह स्वयं तुरंत प्रभाव देगी? नहीं देगी। हम यही सोच रहे हैं ना? नहीं देगी। इसलिए हमारे जीवन में जो परेशानी आ रही है उसका कारण यह तो नहीं होना चाहिए — लेकिन हो आपके साथ रहा है।
गुरु, गणपति और मां शारदा, और गुरु मंत्र का कम से कम सवा लाख जप
गुरु, गणपति, मां शारदा आधार हैं — गुरु मंत्र लिया हो और उसका कम से कम सवा लाख जप हुआ हो।
शुरुआत सदैव आरंभिक साधनाओं से करनी चाहिए। भगवती ने, या कोई भी देवी देवता क्या कहते हैं — सर्वप्रथम गणपति; गुरु, गणपति, मां शारदा। इतनी साधना तो होनी चाहिए। आपने गुरु मंत्र लिया कि नहीं लिया, और उसका कितना जप किया, भले ही वह अजपा जप हो? नियम से कम से कम सवा लाख जप होना चाहिए।
इसके पीछे का कारण, वक्ता कहते हैं, यह है: कि सर्वप्रथम, जब आप इस प्रकार की साधना करने जा रहे हैं, तो सीधी सी बात है कि शुरुआत सदैव आरंभिक साधनाओं से करनी चाहिए — और आपने आरंभिक साधना की ही नहीं है। भगवती ने क्या कहा है, या कोई भी देवी देवता क्या कहते हैं? सर्वप्रथम गणपति — गुरु, गणपति, मां शारदा। इतनी साधना तो होनी ही चाहिए। यह देखिए कि आपने गुरु मंत्र लिया कि नहीं लिया। उसका कितना जप किया, भले ही वह अजपा जप हो? नियम से कम से कम सवा लाख जप होना चाहिए।
सामान्य गणपति स्वरूप, उनका कवच, द्वादश नाम और दस दिन का अनुष्ठान
हरिद्रा गणपति छोड़ दीजिए — सामान्य गणपति का स्वरूप, उनके कवच का पाठ या द्वादश नाम का जप पहले होना चाहिए था, कम से कम दस दिन का अनुष्ठान ही सही।
हरिद्रा गणपति को छोड़ते हुए वक्ता पूछते हैं कि सामान्य गणपति के स्वरूप की साधना, या उनके कवच इत्यादि का पाठ, या उनके द्वादश नाम का जप, कम से कम इतना तो किया कि नहीं। विघ्नहर्ता का कौन सा पाठ पूजा किया, कौन सा अनुष्ठान किया? कम से कम दस दिन का भी कभी अनुष्ठान हुआ? गणपति जी को कभी मोदक का भोग लगाया कि नहीं लगाया?
सामान्य गणपति और हरिद्रा गणपति को छोड़ दीजिए, वक्ता कहते हैं। सामान्य जो गणपति जी हैं, उनके स्वरूप की भी साधना, या उनके कवच इत्यादि का पाठ, और उनके द्वादश नाम इत्यादि का जो जप होता है — कम से कम इतना तो किया कि नहीं? विघ्नहर्ता का कौन सा पाठ पूजा किया, कौन सा अनुष्ठान किया? कम से कम दस दिन का भी कभी अनुष्ठान हुआ? गणपति जी को कभी मोदक का भोग लगाया कि नहीं लगाया?
विघ्नहर्ता का विघ्नकर्ता बन जाना, और वह क्रम जो बदला नहीं जा सकता
यदि विघ्नहर्ता की उपासना न की जाए तो क्या होता है?
आप कैसे सोच सकते हैं कि आपको सफलता मिलेगी और परेशानी नहीं बढ़ेगी, वक्ता पूछते हैं — विघ्नहर्ता ही तो सबसे पहले विघ्नकर्ता बनेंगे, यदि आप उनकी साधना उपासना नहीं करेंगे। अनुपात किसी में ज्यादा या कम हो सकता है, लेकिन क्रम सबके लिए वही होना चाहिए।
आप कैसे सोच सकते हैं कि आपको सफलता मिलेगी, परेशानी नहीं बढ़ेगी, वक्ता पूछते हैं। विघ्नहर्ता ही तो सबसे पहले विघ्नकर्ता बनेंगे — यदि आप उनकी साधना उपासना नहीं करेंगे। तो इन चीजों को पहले देखना चाहिए और इन सभी चीजों को पहले करना चाहिए। अनुपात किसी में ज्यादा या कम हो सकता है। किसी की परेशानी ज्यादा हो सकती है, किसी की कम। कोई गणपति जी की तीन दिन की ही साधना करने के पश्चात सफलता पा जाएगा, और उसे कोई कष्ट नहीं होगा। कोई दस-दस दिन का भी कर लेगा तो भी उसे परेशानी आएगी। यह अनुपात कम या ज्यादा हो सकता है और हमें उसी प्रकार से चलना चाहिए — लेकिन क्रम वही होना चाहिए। सीधे-सीधे साधना अगर आप करेंगे तो आपको परेशानी होगी।
साधना स्थल, कुल देवता का आदेश, मूल मंत्र का अधिकार, और गुरु परंपरा
साधना स्थल, कुल के देवी-देवता और उनका आदेश, शत अक्षरी मूल मंत्र के लिए अपना अधिकार, और जिनसे दीक्षा ली उनकी परंपरा।
वक्ता पूछते हैं कि आपका साधना स्थल कैसा है; आपके कुल के देवी-देवता कौन से हैं, उनका भोग, पूजा और भेंट क्या है, और क्या उनके द्वारा यह आदेशित है कि आप पीतांबरा की साधना कर सकते हैं अथवा नहीं; क्या सीधे मूल मंत्र, शत अक्षरी मंत्र पर जाकर आप उसके अधिकारी हैं भी कि नहीं; और जिनसे आप दीक्षा ले रहे हैं उनकी गुरु परंपरा क्या है, आपके कुल गुरु कौन हैं और उन्हें कितनी जानकारी है।
सिर्फ इतना ही नहीं, वक्ता कहते हैं — इसके आगे भी है। आपका साधना स्थल कैसा है? आपके कुल के देवी और देवता कौन से हैं? उनका भोग, पूजा और भेंट क्या है? क्या उनके द्वारा यह आदेशित है कि आप पीतांबरा की साधना कर सकते हैं, अथवा नहीं कर सकते हैं? वह भी देखना है। आप सीधे-सीधे मूल मंत्र, शत अक्षरी मंत्र करने लग गए। आप उसके अधिकारकिसी उन्नत विधि को करने से पूर्व आवश्यक पात्रता या अधिकार — इसके बिना सही ढंग से किया गया अनुष्ठान भी साधक के लिए गंभीर हानि का जोखिम रखता है। वाले हैं भी कि नहीं? वह देखना है। आप दीक्षा ले रहे हैं — उनकी गुरु परंपरा क्या है? आपके कुल गुरु हैं; कौन से हैं? उन्हें कितनी जानकारी है? आजकल तो, वे टिप्पणी करते हैं, दीक्षा भी बंट रही है, ऑनलाइन बंट रही है; ऑनलाइन भी दीक्षा हो रही है, या जो भी हो रहा है। तो क्या वे सारी चीजें सही हैं? उसके पीछे का विधि विधान क्या है, है भी या नहीं?
देश, काल और परिस्थिति के साथ अपग्रेड होना, पर मूल को छोड़े बिना
देश, काल और परिस्थिति के अनुसार चीजें बदलती हैं और अपग्रेड होनी चाहिए — लेकिन जो मूल हैं उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि प्रभाव भी वे उसी प्रकार देती हैं।
कम से कम बेसिक चीजों तक तो जाइए, वक्ता कहते हैं; लिमिट से बाहर जाइए। देश, काल, परिस्थिति के अनुसार चीजें बदलती हैं, अपग्रेड होती हैं और अपग्रेड होनी चाहिए — लेकिन उसमें भी जो बेसिक हैं, जो मूल हैं, उन्हें नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि प्रभाव भी वे उसी प्रकार से देती हैं। आरंभ की चीजों को देखकर, जानकर और आरंभिक साधनाओं को करने के पश्चात ही कभी भगवती पीतांबरा की साधना करनी चाहिए।
कम से कम बेसिक चीजें, वे कहते हैं — जाइए, लिमिट से बाहर जाइए। देश, काल, परिस्थिति के अनुसार चीजें बदलती हैं; वे बिल्कुल अपग्रेडेड होती हैं, और अपग्रेड होनी चाहिए। लेकिन उसमें भी जो बेसिक हैं, जो मूल हैं, उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता — क्योंकि प्रभाव भी वे उसी प्रकार से देती हैं। तो उस तरीके से मान्य होना चाहिए। आरंभ की जो चीजें हैं उन सभी को देखकर, जानकर, और आरंभिक साधनाओं को करने के पश्चात ही कभी भगवती पीतांबरा की साधना करनी चाहिए।
सहस्रार्चन, तर्पण, और उग्र शक्ति को शांत करने हेतु यंत्र का तर्पण
जहां सब कुछ किया जा चुका हो और फिर भी परेशानी बढ़ रही हो, वहां सबसे पहले भगवती पीतांबरा का सहस्रार्चन और तर्पण — उग्र होती शक्ति को तर्पण से सौम्य किया जाता है।
यदि आप इन सभी चीजों को कर चुके हैं और उसके पश्चात भी परेशानी बढ़ रही है और आप बार-बार साधना को रिपीट कर रहे हैं, तो सबसे पहले भगवती पीतांबरा का सहस्रार्चन और उनका तर्पण करिए; यंत्र का तर्पण कीजिए। जब शक्ति उग्र होने लगती है तो उन्हें तर्पण के द्वारा शांत सौम्य किया जाता है।
यदि आप इन सभी चीजों को कर चुके हैं, वक्ता कहते हैं, और उसके पश्चात भी परेशानी बढ़ रही है और आप बार-बार साधना को रिपीट कर रहे हैं, तो सबसे पहले भगवती पीतांबरा का सहस्रार्चन करिए और उनका तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। करिए। यंत्र का तर्पण कीजिए। जब शक्ति उग्र होने लगती है, तब उन्हें तर्पण के द्वारा शांत सौम्य किया जाता है।
एक वर्ण की गाय का कच्चा दूध और हरिद्रा, जन्म नक्षत्र, और 108 बिल्व पत्र
एक वर्ण की गाय के कच्चे दूध में हरिद्रा और केसर मिलाकर उसमें डुबोए गए 108 बिल्व पत्र, दूध लगे हुए उठाकर, प्रत्येक पर एक नाम के साथ तर्पयामि नमः।
कच्चे दूध में हरिद्रा मिलाकर, और यदि एक वर्ण की गाय मिल जाए तो उसका। वक्ता इसे सामान्य रूप से बताई गई एक छोटी सी बात कहते हैं और कहते हैं कि बाकी आपके अपने गुरु बताएंगे। जो वास्तविक साधक हैं और फिर भी परेशानी आ रही है, उन्हें एक वर्ण की गाय का कच्चा दूध लेना चाहिए, और उसमें भी नक्षत्र इत्यादि का ध्यान रखते हुए अपने जन्म नक्षत्र में करना चाहिए — वही सर्वश्रेष्ठ होता है, समय कोई भी हो और पक्ष से कोई मतलब नहीं। भगवती का चित्र ऐसा रखा जाए जो भीगने से खराब न हो; 108 नाम से तर्पण के लिए 108 बिल्व पत्र गाय के कच्चे दूध में हरिद्रा और केसर मिलाकर उसमें डुबोए जाते हैं, दूध लगे हुए उठाए जाते हैं, और भगवती का एक-एक नाम तर्पयामि नमः के साथ बोलते हुए तर्पण किया जाता है।
तो, दूध में हरिद्रा, कच्चे दूध में हरिद्रा मिलाकर, और यदि एक वर्ण की गाय मिल जाए — यह, वे कहते हैं, आपके गुरु बताएंगे। वे तो सामान्य रूप से छोटा सा बता दे रहे हैं। यदि आप वास्तविक साधक हैं और फिर भी आपको परेशानी आ रही है, तो आपको एक वर्ण की जो गाय होती है उसका कच्चा दूध लेना चाहिए, और उसमें भी नक्षत्र इत्यादि का ध्यान रखते हुए अपने जन्म नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। में करना चाहिए। वही सर्वश्रेष्ठ होता है। आपका जन्म नक्षत्र कभी भी पड़े, पक्ष से कोई मतलब नहीं है; नक्षत्र होना चाहिए। उस नक्षत्र में, समय चाहे कोई भी हो — समय कोई भी हो। भगवती पीतांबरा का चाहे आप चित्र ही क्यों न रखें, वह चित्र ऐसा हो जो भींगने से खराब न हो। और उस पर बिल्व पत्र: मान लीजिए कि भगवती पीतांबरा का 108 नाम से तर्पण करना है, तो 108 बिल्व पत्र लाकर रखेंगे, और गाय के कच्चे दूध में हरिद्रा मिलाएंगे, केसर मिलाएंगे, और उसके द्वारा भगवती पीतांबरा का एक-एक नाम लेते हुए बिल्व पत्रों को पहले दूध में डुबाएंगे और थोड़ा दूध उन पर लगा रहे ऐसे उठाकर, भगवती का नाम लेकर तर्पयामि नमः बोलते हुए भगवती का तर्पण करेंगे।
उग्र ऊर्जा का शांत होना और आभामंडल का उसे ग्रहण करने योग्य बनना
इससे उनकी उग्रता शांत होती है और अपना आभामंडल उनकी ऊर्जा को ग्रहण करने योग्य हो जाता है — और मूल दोष जो भी हो, तब जप शुभ फल देने लगता है।
इससे, वक्ता कहते हैं, उनकी उग्रता या ऊर्जा शांत होगी — यानी हमारा अथर्वा, हमारा आभामंडल, जो उनकी ऊर्जा को ग्रहण नहीं कर पा रहा है, वह सौम्य होकर अच्छा प्रभाव देगा। चाहे कारण कुछ और भी हो गया हो — मंत्र दोष, देवी दोष, कोई श्राप, पितृ दोष या अन्य प्रकार के विभिन्न दोष — इस माध्यम से, तर्पण की इस क्रिया के द्वारा हम भगवती को साम सौम्य कर देते हैं, और जिस मंत्र का जप हम कर रहे हैं वह हमारे लिए शुभ फल देने वाला हो जाता है।
उससे, वक्ता कहते हैं, उनकी उग्रता या ऊर्जा शांत होंगी — यानी कि हमारा अथर्वा, हमारा आभामंडल, जो उनकी ऊर्जा को ग्रहण नहीं कर पा रहा है, वह सौम्य होकर अच्छा प्रभाव देगा। चाहे कारण अन्य भी कुछ हो गया हो — मंत्र दोष, देवी दोष, कोई शाप लगा हो, पितृ दोष, अन्य प्रकार के विभिन्न दोष हों — और हम साधना भी कर रहे हैं, तो इस प्रकार से, इस माध्यम से, तर्पण की इस क्रिया के द्वारा हम भगवती को साम सौम्य करके, और उनकी ऊर्जा — यानी जो मंत्र का जप हम कर रहे हैं — वह हमारे लिए शुभ फल देने वाला हो जाता है। इस प्रकार की विभिन्न क्रियाओं को और उनमें आपके मार्गदर्शन को आपके जो गुरु होंगे वे सही तरीके से बताएंगे। इन सभी विषयों को ध्यान में रखना चाहिए; तब परेशानी नहीं बढ़ेगी, अन्यथा परेशानी बढ़ने लगती है। साधनात्मक विषयों को ध्यान में रखकर ही, वे समापन में कहते हैं, हमें किसी भी साधना को करना चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।