पीतांबरा साधना के बाद परेशानी क्यों बढ़ती है — छूटी हुई आरंभिक साधनाएं, अनदेखे नियम, और उग्र शक्ति को सौम्य करने वाला तर्पण
भगवती पीतांबरा की साधना उल्टी क्यों पड़ सकती है, और उसका उपाय।
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पीतांबरा साधना के उल्टे पड़ने के लक्षण
कलह, नए शत्रु और उग्र हो गया स्वभाव
वक्ता वह प्रकरण पढ़कर सुनाते हैं जिस पर बात होनी है: भगवती पीताम्बरा की साधना करने से परिवार में कलह-क्लेश बढ़ने लगा; अनुष्ठान के मध्य में और पूर्ण होने के बाद नए-नए शत्रु पैदा होते गए और पुराने शत्रु और प्रचंड हो गए; कार्यक्षेत्र में तरह-तरह की परेशानियां आने लगीं; और जो व्यक्ति पहले शांत-सौम्य था वह अत्यधिक उग्र हो गया। एक वाक्य में, वे कहते हैं, साधना से पहले जीवन अच्छा था और उसके बाद खराब हो गया। ऐसा क्यों होता है और इसमें क्या करना चाहिए, यही विषय वे बताने को कहते हैं।
वक्ता उस शिकायत से आरंभ करते हैं जो उन्हें भेजी गई है। भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। की साधना करने से प्रश्नकर्ता के परिवार में कलह-क्लेश बढ़ने लगा। उस साधना के बाद, अनुष्ठान के मध्य में भी और पूर्ण होने के बाद भी, नए-नए शत्रु पैदा हो गए और पुराने शत्रु और अधिक प्रचंड हो गए। कार्यक्षेत्र में तरह-तरह की परेशानियां आने लगीं। प्रश्नकर्ता, जो पहले काफी शांत-सौम्य रहते थे, अब अत्यधिक उग्रअनुष्ठान अथवा देवता का उग्र भाव, जो सौम्य भाव के विपरीत है। हो गए हैं। एक वाक्य में कहें तो, वे कहते हैं, बात यह है: पीतांबरा साधना से पहले हम काफी खुश थे, जीवन काफी अच्छा था; किन्हीं कारणों से हमने यह साधना आरंभ की और उसके बाद परेशानियां बढ़ गईं और स्थिति काफी खराब हो गई। यह क्यों हो रहा है और इसमें क्या करना चाहिए? यही, वे कहते हैं, वे विस्तार से समझाने का प्रयास करेंगे।
पीतांबरा साधना के बाद परेशानी का मुख्य कारण: बिना किसी पूर्व अभ्यास के सीधे बगला प्रत्यंगिरा से आरंभ
एलकेजी-यूकेजी छोड़कर सीधे दसवीं का सिलेबस
वक्ता कहते हैं कि हर साधना किसी न किसी उद्देश्य से आरंभ होती है, और पीतांबरा साधना का निर्णय हमेशा किसी और के अनुभव को सुनकर, अति उत्साह में लिया जाता है। परेशानी बताने वाले सौ लोगों में से, वे कहते हैं, करीब पचासी ने अपनी सबसे पहली साधना के रूप में बगला महाप्रत्यंगिरा साधना की, उनके कवच का 1100, 3600 और 11000 तक का अनुष्ठान किया, और उससे पहले शनिवार की कभी-कभार हनुमान चालीसा के सिवा कोई अभ्यास नहीं था; साधना YouTube या इंटरनेट से उठाई गई। परेशानी का पहला और सबसे विशेष कारण, वे कहते हैं, यही है: एलकेजी-यूकेजी किए ही नहीं और सीधे दसवीं क्लास का सिलेबस लेकर बैठ गए।
वक्ता उद्देश्य से आरंभ करते हैं। जब भी हम साधना की ओर बढ़ते हैं, उसके पीछे कोई न कोई उद्देश्य होता है, भौतिक, आध्यात्मिक, या किसी देवी कृपा को पाने का, और इस निर्णय का कोई न कोई टर्निंग पॉइंट रहा होगा। जब आप भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। की साधना का निर्णय लेते हैं, वे कहते हैं, तो जरूर किसी व्यक्ति के अनुभव को सुनकर लिया होगा: उनके किसी स्वरूप, किसी मंत्र, किसी साधना के बारे में ऐसा कुछ सुना या पढ़ा होगा जिससे आप बहुत उत्साहित हो गए, और उसी अति उत्साह में साधना आरंभ कर दी। लेकिन कौन सी साधना करने गए? अगर पीतांबरा से संबंधित साधना करके परेशानी में पड़े सौ लोगों से पूछा जाए, वे कहते हैं, तो मानकर चलिए कि पचासी लोग कहेंगे कि सबसे पहले बगला महाप्रत्यंगिरा साधना की: सर्वप्रथम ही भगवती पीतांबरा के प्रत्यंगिरा स्वरूप के कवच इत्यादि का पाठ किया, 1100, 3600, 11000 तक का अनुष्ठान किया। पूछा जाए कि इससे पहले कौन सी साधना करते थे, तो उत्तर मिलता है: भैया, इससे पहले तो कोई साधना नहीं करते थे। न हनुमान चालीसा, न दुर्गा चालीसा, न सुबह-शाम धूप-दीप, न मंदिर जाना; बहुत हुआ तो शनिवार को हनुमान चालीसा पढ़ ली और यदा-कदा मंगलवार को मंदिर चले गए। फिर जीवन में परेशानी आई, YouTube पर, इंटरनेट पर, Google पर सर्च मारा, मैगजीन पढ़ीं, YouTube पर किसी का वक्तव्य सुना और रिलेट हुआ कि इनकी परेशानी भी मेरी जैसी ही है, चाहे हम अभिशाप से ग्रसित हों या कुछ और कारण हो। और यह साधना उठाकर करने लगे। उस व्यक्ति ने बताया था कि इतने दिन की साधना के बाद ये अनुभव हुए और यह परिणाम मिला; लेकिन हमारे साथ, वे कहते हैं, पूरा का पूरा उल्टा हो रहा है। ऐसा क्यों? पहला और सबसे विशेष कारण, वे कहते हैं, यही है कि आपने यूकेजी-एलकेजी की ही नहीं और सीधे दसवीं क्लास का सिलेबस लेकर बैठ गए। यही सबसे बड़ा कारण बनता है।
तंत्र एक जाग्रत विषय है, और गलती का दोष हर क्षेत्र में लगता है
तुरंत प्रभाव, और कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जहां गलती छूट जाए
वक्ता कहते हैं कि तंत्र को जाग्रत विषय इसलिए कहा गया है कि वह तुरंत प्रभाव देता है; वैदिक चीजें अलग हैं, और तांत्रिक या तंत्रोक्त चीजें अपना अलग ही क्षेत्र हैं। लेकिन वे इस भ्रम से सावधान करते हैं कि कहीं और गलती करेंगे तो दोष नहीं लगेगा और यहां करेंगे तो जल्दी लगेगा: गलती का दोष हर जगह लगता है, क्षेत्र कोई भी हो, इसलिए कोई यह न सोचे कि कहीं गलती करके छूट जाएंगे।
वक्ता पूछते हैं कि तंत्र का अर्थ क्या है और तंत्र को जाग्रत विषय क्यों कहा गया है। वह, वे कहते हैं, तुरंत प्रभाव देने वाला है। वैदिक चीजें अलग होती हैं; तांत्रिक चीजें, तंत्रोक्त चीजें, अपना अलग ही क्षेत्र हैं। लेकिन ऐसा नहीं है, वे कहते हैं, कि वहां गलती करेंगे तो दोष नहीं लगेगा और यहां करेंगे तो जल्दी लगेगा। दोष हर जगह लगता है। गलती के लिए दोष हर क्षेत्र में है, क्षेत्र कोई सा भी हो, इसलिए मन में यह भ्रम न पालें कि कहीं गलती करेंगे तो छूट जाएंगे।
प्रत्यंगिरा की ऊर्जा सबसे पहले साधक और घर पर पड़ती है, और उसे पचाने की क्षमता चाहिए
भाव से पहले क्रिया; बिना शिव पूजन का घर उसे झेल नहीं पाता
वक्ता कहते हैं कि भाव और क्रिया दो अलग चीजें हैं: भाव से भक्ति एक मार्ग है, लेकिन तंत्र में भाव का विषय बाद में आता है और क्रिया का पहले। जब कोई भगवती बगला के महाप्रत्यंगिरा स्वरूप का पाठ करता है, तो प्रत्यंगिरा में कही गई आठ शक्तियों के तत्व का प्रभाव सबसे पहले साधक के अपने शरीर, आभामंडल और सूक्ष्म शरीर पर पड़ता है, और सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि उस ऊर्जा को पचाने की क्षमता साधक में और घर के सदस्यों में है या नहीं। अगर उस घर में कभी सदाशिव का रुद्राभिषेक नहीं हुआ, कभी शिवलिंग नहीं रखा गया, कभी शिव पूजन नहीं, शिवरात्रि का व्रत नहीं, नवरात्रि में कलश स्थापना या विशेष पूजा नहीं, आरती तक नहीं, और अति उत्साह में सीधे प्रत्यंगिरा उपासना में चले गए, तो जो ऊर्जा बनेगी वह अपना प्रभाव दिखाएगी।
एक होता है भाव, वक्ता कहते हैं, और दूसरी होती है क्रिया। अगर आप भाव से कर रहे हैं तो भाव से भक्ति करनी चाहिए। लेकिन तंत्र में भाव का विषय बाद में है; क्रिया का विषय पहले हो जाता है। जब आप भगवती बगला के महाप्रत्यंगिरा स्वरूप का पाठ और सेवा कर रहे हैं, तो प्रत्यंगिरा में जिन आठ शक्तियों को कहा गया है, उनके तत्व का प्रभाव सबसे पहले आपके स्वरूप, आपके शरीर, आपके आभामंडल पर पड़ता है: आपके सूक्ष्म शरीर पर और आपकी स्थूल काया पर। अब उस ऊर्जा को पचाने की क्षमता आपके भीतर है कि नहीं? जहां आप रहकर यह साधना-उपासना कर रहे हैं, उस घर के परिवार के सदस्यों के भीतर है कि नहीं? इसी पर, वे कहते हैं, निर्भर करेगा। अगर आपके घर में आज से पहले कभी भगवान सदाशिव का रुद्राभिषेक नहीं हुआ; अगर घर में कभी शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। की स्थापना ही नहीं हुई (वह छोटा शिवलिंग जो घर में रखा जाता है, जो उनके अनुसार सनातन संस्कृति के हर व्यक्ति के घर में होना चाहिए); अगर कभी शिव पूजन ही नहीं हुआ, कभी शिवरात्रि का व्रत नहीं किया, कभी नवरात्रि में कलश स्थापना करके पूजन नहीं किया, नवरात्र में कभी विशेष साधना-पूजा नहीं की, आरती तक नहीं की; और कुछ सुनकर अति उत्साहित होकर सीधे भगवती बगला के प्रत्यंगिरा स्वरूप की उपासना करने चले गए, तो जो ऊर्जा बनेगी और उसका जो प्रभाव पड़ेगा, वह क्या करेगा?
पीतांबरा साधना के वे नियम जो छोड़ दिए जाते हैं
पीत वस्त्र, धोती, आसन, हरिद्रा, अर्चन, अभिषेक, तिथि और नक्षत्र
वक्ता पूछते हैं कि पीताम्बरा साधना के बाकी नीति-नियम माने भी गए या नहीं: पीत वस्त्र ही आवश्यक कहा गया है (हरा या भगवा नहीं, इसीलिए उनका नाम पीतांबरा है), तो क्या साधक पीतांबरी धोती पहनता है और उसमें लांग लगाना जानता है; क्या आसन पीला है; क्या कभी हरिद्रा-संस्कारित सामान से, उनके सहस्रनाम से, शतनाम से या फोटो के सामने ही 108 नामावली से भगवती का अर्चन किया; क्या कभी उनका abhishek किया, और उनके भैरव भगवान शिव का अभिषेक किया। वे यह भी पूछते हैं कि साधनात्मक पक्ष पहले देखा या नहीं: तिथि, नक्षत्र, कैसे-क्या करना है और कब नहीं करना है। अगर इनमें से कुछ नहीं हुआ, वे कहते हैं, तो परेशानी का मूल कारण यही है, हालांकि अन्य कारण भी हो सकते हैं।
बाकी के नीति-नियम मान रहे हैं कि नहीं, वक्ता पूछते हैं। भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। की साधना में पीत वस्त्र ही आवश्यक क्यों कहा गया है? क्यों नहीं कहा गया कि हरा वस्त्र या भगवा वस्त्र पहन लो? उनको पीतांबरा रूप-नाम क्यों दिया गया? क्या आप पीतांबर पहनकर, पीतांबरी धोती पहनकर करते हैं? धोती पहननी आती है? धोती में लांग कैसे लगाते हैं, आता है? आसन पीला रखा है क्या? कभी हरिद्रा-संस्कारित सामान से, हरिद्रा से भगवती का अर्चन किया है क्या? कभी भगवती पीतांबरा का उनके सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। से अर्चन किया? शतनाम से? उनका एक फोटो रखकर ही 108 नामावली से अर्चन किया? कभी उनका abhishek किया? भगवान शिव उनके भैरव हैं; कभी उनका अभिषेक किया? नहीं किया है ना? पहले यह देखिए, वे कहते हैं: अगर परेशानी आ रही है तो उसके पीछे यह मूल कारण है। हो सकता है अन्य बहुत से कारण हों, लेकिन मूल कारण यही है। साधनात्मक जो चीजें होती हैं उन्हें सबसे पहले देखना चाहिए। क्या तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर।, नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। इत्यादि का विचार किया? पहली बार किया, दूसरी बार किया, तो क्या कभी इन चीजों का विचार किया: कैसे-क्या करना है, और कब नहीं करना है? इसके बजाय, वे कहते हैं, भाव-प्रधान होकर तंत्र की साधना उठा ली, और वह भी सीधे प्रत्यंगिरा साधना करने चले गए।
पीतांबरा का प्रत्यंगिरा स्वरूप किसके लिए बताया गया है
तिर्यक प्रभाव का उपचार, तुरंत फल देने वाली नहीं
वक्ता बताते हैं कि इस विषय पर लिखा क्या है: भगवती पीताम्बरा के महाप्रत्यंगिरा स्वरूप की उपासना गलत मंत्र उच्चारण से उत्पन्न दोष के शमन के लिए, यानी उसके तिर्यक् प्रभाव को नष्ट करने के लिए बताई गई है, और उससे वह तिर्यक प्रभाव नष्ट हो जाता है। जो स्वरूप दूसरे मंत्र के तिर्यक प्रभाव को नष्ट करने के लिए है, वे पूछते हैं, क्या वह स्वयं तुरंत प्रभाव देगा? नहीं देगा। इसलिए वह जीवन की परेशानी का कारण होना तो नहीं चाहिए, पर हो रहा है; और कारण, वे कहते हैं, यह है कि शुरुआत हमेशा आरंभिक साधनाओं से करनी चाहिए, जो की ही नहीं गईं।
यहां एक लिखा हुआ विषय है, वक्ता कहते हैं: अगर आप पढ़ते हैं और पढ़कर कर रहे हैं, तो वहां लिखा है कि गलत मंत्र उच्चारण के कारण जो दोष उत्पन्न होता है उसके शमन के लिए, यानी उसके तिर्यक् प्रभाव को नष्ट करने के लिए, भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। के इस स्वरूप, यानी महाप्रत्यंगिरा स्वरूप की उपासना करनी चाहिए, जिससे वह तिर्यक प्रभाव ही नष्ट हो जाता है। तो भैया, वे कहते हैं, देखिए: भगवती का जो स्वरूप, जो साधना दूसरे मंत्र के तिर्यक प्रभाव को नष्ट करने की सामर्थ्य रखती है, क्या वह स्वयं तुरंत प्रभाव देगी? नहीं देगी। हम यही सोच रहे हैं ना? नहीं देगी। इसलिए हमारे जीवन में जो परेशानी आ रही है उसका कारण यह तो नहीं होना चाहिए; लेकिन आपके साथ हो रहा है। इसके पीछे का कारण, वे कहते हैं, यह है कि जब आप इस प्रकार की साधना करने जा रहे हैं तो सीधी सी बात है कि शुरुआत हमेशा आरंभिक साधनाओं से करनी चाहिए, और वे आरंभिक साधनाएं आपने की ही नहीं।
पीतांबरा साधना से पहले की नींव: गुरु, गणपति और मां शारदा
नहीं तो विघ्नहर्ता ही विघ्नकर्ता बन जाते हैं
भगवती या कोई भी देवी-देवता जो सबसे पहले कहते हैं, वक्ता कहते हैं, वह है गुरु, गणेश और मां शारदा; कम से कम इतनी साधना पीछे होनी चाहिए। गुरु मंत्र लिया या नहीं, और उसका कितना जप किया, भले ही अजपा जप हो: नियम से कम से कम सवा लाख। हरिद्रा गणपति छोड़िए, क्या सामान्य गणपति स्वरूप की भी सेवा की, उनके कवच का पाठ, द्वादश नाम का जप, कम से कम दस दिन का अनुष्ठान, मोदक का भोग? अगर विघ्नहर्ता की साधना नहीं करेंगे, वे कहते हैं, तो वही सबसे पहले विघ्नकर्ता बनेंगे, फिर सफलता और बिना परेशानी की आशा कैसे। परेशानी का अनुपात व्यक्ति-व्यक्ति में अलग होता है, कोई तीन दिन के गणपति के बाद सफल हो जाता है और कोई दस दिन के बाद भी कष्ट पाता है, लेकिन क्रम वही रहना चाहिए; सीधे साधना करेंगे तो परेशानी होगी।
भगवती ने क्या कहा है, या कोई भी देवी-देवता क्या कहते हैं, वक्ता पूछते हैं। सर्वप्रथम गणपति: गुरु, गणेश, मां शारदाविद्या और वाणी की अधिष्ठात्री देवी।। कम से कम इतनी साधना तो होनी चाहिए। देखिए कि आपने कभी गुरु मंत्र लिया कि नहीं। उसका कितना जप किया, भले ही वह अजपा जप हो? नियम से कम से कम सवा लाख जप होना चाहिए। हरिद्रा गणपति छोड़ दीजिए; सामान्य जो गणपति जी हैं, उनके स्वरूप की साधना, या उनके कवच इत्यादि का पाठ, या उनके द्वादश नाम का जप, कम से कम वह किया कि नहीं? विघ्नहर्ताविघ्नों को हरने वाले गणपति, जिनका पूजन सर्वप्रथम किया जाता है ताकि कर्म निर्विघ्न पूर्ण हो। का कौन सा पाठ-पूजा किया, कौन सा अनुष्ठान किया? कम से कम दस दिन का भी कभी अनुष्ठान हुआ? गणपति जी को कभी मोदकगणपति को अर्पित किया जाने वाला मीठा पकवान। का भोग लगाया कि नहीं? कैसे सोच सकते हैं, वे पूछते हैं, कि सफलता मिलेगी और परेशानी नहीं बढ़ेगी? विघ्नहर्ता ही सबसे पहले विघ्नकर्ता बनेंगे, अगर उनकी साधना-उपासना नहीं करेंगे। तो इन चीजों को पहले देखना चाहिए और इन सभी को पहले करना चाहिए। अनुपात किसी में ज्यादा या कम हो सकता है: किसी की परेशानी ज्यादा हो सकती है, किसी की कम। कोई गणपति जी की तीन दिन की साधना के बाद ही सफल हो जाएगा और उसे कोई कष्ट नहीं होगा; कोई दस-दस दिन का करेगा तो भी परेशानी आएगी। यह अनुपात कम या ज्यादा हो सकता है और उसी के अनुसार चलना चाहिए, लेकिन क्रम वही होना चाहिए। सीधे साधना करेंगे, वे कहते हैं, तो परेशानी होगी।
पीतांबरा साधना से पहले की जांच: साधना स्थल, कुल देवता का आदेश, अधिकार और गुरु परंपरा
ऑनलाइन दीक्षा और बिना अधिकार का मूल मंत्र
नींव के आगे भी, वक्ता कहते हैं, और देखना है: साधना स्थल कैसा है; कुल देवता कौन हैं, उनका भोग-पूजा-भेंट क्या है, और उन्होंने आदेश दिया है या नहीं कि आप पीतांबरा की साधना कर सकते हैं। अगर सीधे मूल मंत्र, शत अक्षरी मंत्र करने लग गए, तो देखना है कि उसका अधिकार है भी या नहीं। और दीक्षा लेते समय गुरु परंपरा क्या है, कुल गुरु कौन हैं और उन्हें कितनी जानकारी है; आजकल, वे टिप्पणी करते हैं, दीक्षा ऑनलाइन बंट रही है, और पूछना चाहिए कि क्या वह सब सही है और उसके पीछे कोई विधि-विधान है या नहीं।
सिर्फ इतना ही नहीं, वक्ता कहते हैं; इसके आगे भी है। आपका साधना स्थल कैसा है? आपके कुल के देवी-देवता, आपके कुल देवता कौन हैं? उनका भोग-पूजा-भेंट क्या है? उन्होंने आदेश दिया है कि आप पीतांबरा की साधना कर सकते हैं, या नहीं कर सकते? वह भी देखना है। आप सीधे मूल मंत्र, शत अक्षरी मंत्र करने लग गए। उसका अधिकारकिसी उन्नत विधि को करने से पूर्व आवश्यक पात्रता या अधिकार — इसके बिना सही ढंग से किया गया अनुष्ठान भी साधक के लिए गंभीर हानि का जोखिम रखता है। है भी कि नहीं? वह देखना है। आप दीक्षा ले रहे हैं: उनकी गुरु परंपरा क्या है? आपके कुल गुरु कौन हैं? उन्हें कितनी जानकारी है? आजकल तो भाई, वे टिप्पणी करते हैं, दीक्षा बंट रही है, ऑनलाइन बंट रही है; ऑनलाइन भी दीक्षा हो रही है, या जो भी हो रहा है। तो क्या वे सारी चीजें सही हैं? उसके पीछे विधि-विधान है या नहीं?
देश, काल, परिस्थिति के अनुसार साधना अपग्रेड हो सकती है, पर मूल नहीं छोड़ा जा सकता
मूल जितना रखा जाए, प्रभाव उतना ही देता है
वक्ता कहते हैं कि कम से कम बेसिक चीजें कीजिए, तभी लिमिट से बाहर जाइए। देश, काल, परिस्थिति के अनुसार चीजें बदलती हैं; अपग्रेड होती हैं और होनी चाहिए। लेकिन उसमें भी जो बेसिक है, जो मूल है, उसे नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि प्रभाव भी उसी प्रकार से मिलता है, और उसे उसी तरह मान्य होना चाहिए। आरंभ की चीजों को देखकर, जानकर और आरंभिक साधनाएं करने के बाद ही भगवती पीताम्बरा की साधना कभी करनी चाहिए।
कम से कम, वक्ता कहते हैं, बेसिक चीजें कीजिए; फिर लिमिट से बाहर जाइए। देश, काल, परिस्थिति के अनुसार चीजें बदलती हैं, बिल्कुल अपग्रेड होती हैं, और अपग्रेड होनी चाहिए। लेकिन उसमें भी जो बेसिक है, जो मूल है, उसे नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि प्रभाव भी उसी प्रकार से देता है। तो उसी तरीके से मान्य होना चाहिए। इसलिए, वे कहते हैं, आरंभ की सभी चीजों को देखकर, जानकर, और आरंभिक साधनाएं करने के बाद ही आपको कभी भी भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। की साधना करनी चाहिए।
उग्र हुई शक्ति को सौम्य करने के लिए भगवती पीतांबरा का तर्पण
बिल्व पत्र, एक वर्ण की गाय का कच्चा दूध, हरिद्रा और केसर
अगर आरंभ की सारी चीजें कर ली गईं और फिर भी साधना दोहराते हुए परेशानी बढ़ रही है, तो वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले भगवती पीताम्बरा का सहस्रार्चन और उनका तर्पण कीजिए, और उनके यंत्र का तर्पण: जब शक्ति उग्र होने लगती है तो उसे तर्पण से शांत-सौम्य किया जाता है। वे केवल एक छोटी सी सामान्य रूपरेखा देते हैं और कहते हैं कि बाकी गुरु बताएंगे: एक वर्ण की गाय मिल जाए तो उसका कच्चा दूध, उसमें हरिद्रा और केसर मिलाकर, अपने जन्म नक्षत्र में (पक्ष कोई भी, समय कोई भी), भगवती के ऐसे चित्र के सामने जो भीगने से खराब न हो; 108 नामों के तर्पण के लिए 108 बिल्व पत्र एक-एक करके दूध में डुबाकर, थोड़ा दूध लगा रहे ऐसे उठाकर, भगवती का एक-एक नाम लेकर "तर्पयामि नमः" बोलते हुए अर्पित किए जाते हैं। इससे उनकी उग्रता शांत होती है, साधक का आभामंडल जो उनकी ऊर्जा ग्रहण नहीं कर पा रहा था सौम्य हो जाता है, और मूल कारण चाहे मंत्र दोष, देवी दोष, कोई शाप, पितृ दोष या अन्य दोष हो, जो जप किया जा रहा है वह शुभ फल देने वाला हो जाता है।
अगर आप ये सब चीजें कर चुके हैं, वक्ता कहते हैं, और उसके बाद भी परेशानी बढ़ रही है और बार-बार साधना दोहरा रहे हैं, तो सबसे पहले भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। का सहस्रार्चन और उनका तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। कीजिए। यंत्र का तर्पण कीजिए। जब शक्ति उग्रअनुष्ठान अथवा देवता का उग्र भाव, जो सौम्य भाव के विपरीत है। होने लगती है तो उसे तर्पण के द्वारा शांत-सौम्य किया जाता है। कच्चे दूध में हरिद्रा मिलाकर, वे कहते हैं, एक वर्ण की गाय मिल जाए तो उसका; यह आपके गुरु बताएंगे, वे तो सामान्य रूप से छोटी सी रूपरेखा दे रहे हैं। अगर आप वास्तविक साधक हैं और फिर भी परेशानी आ रही है, तो एक वर्ण की गाय का कच्चा दूध लीजिए, और नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। का ध्यान रखते हुए अपने जन्म नक्षत्र में कीजिए, यही सर्वश्रेष्ठ है। जन्म नक्षत्र कभी भी पड़े, पक्ष से मतलब नहीं; नक्षत्र होना चाहिए, और उस नक्षत्र में समय कोई भी हो। भगवती पीतांबरा का चाहे चित्र ही रखें, वह ऐसा हो जो भीगने से खराब न हो। मान लीजिए भगवती पीतांबरा का 108 नामों से तर्पण करना है: 108 बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। पत्र लाकर रखिए, गाय का कच्चा दूध लेकर उसमें हरिद्रा और केसरअष्टगंध की स्याही तथा देवी के अर्पण में प्रयुक्त केसर। मिलाइए। फिर भगवती का एक-एक नाम लेते हुए बिल्व पत्र को पहले दूध में डुबाइए, थोड़ा दूध उस पर लगा रहे ऐसे उठाइए, भगवती का नाम लेकर "तर्पयामि नमः" बोलते हुए उनका तर्पण कीजिए। इससे, वे कहते हैं, उनकी उग्रता, उनकी ऊर्जा शांत होती है; यानी हमारा अथर्वा, हमारा आभामंडल, जो उनकी ऊर्जा ग्रहण नहीं कर पा रहा है, सौम्य होकर अच्छा प्रभाव देता है। चाहे कारण कुछ और भी हो, मंत्र दोष, देवी दोष, कोई शाप, पितृ दोष या अन्य विभिन्न दोष, और हम साधना भी कर रहे हैं, तो इस माध्यम से, इस तर्पण की क्रिया के द्वारा, हम भगवती को शांत-सौम्य करते हैं, और उनकी ऊर्जा और जो मंत्र जप हम कर रहे हैं वह हमारे लिए शुभ फल देने वाला हो जाता है। इस प्रकार की विभिन्न क्रियाएं, वे जोड़ते हैं, आपके गुरु मार्गदर्शक के रूप में सही तरीके से बताएंगे। इन सभी बातों का ध्यान रखिए, वे कहते हैं, तो परेशानी नहीं बढ़ेगी; अन्यथा बढ़ने लगती है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।