पीतांबरा साधना के बाद परेशानी क्यों बढ़ती है — छूटी हुई आरंभिक साधनाएं, अनदेखे नियम, और उग्र शक्ति को सौम्य करने वाला तर्पण

भगवती पीतांबरा की साधना उल्टी क्यों पड़ सकती है, और उसका उपाय।

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01

पीतांबरा साधना के बाद कलह, नए शत्रु और उग्र स्वभाव

पीतांबरा की साधना के बाद घर में कलह बढ़ा, नए शत्रु उत्पन्न हुए और पुराने प्रचंड हो गए, कार्यक्षेत्र बिगड़ा, और शांत व्यक्ति उग्र हो गया।

· Reviewed Sep 2026 · 00:06–01:25

एक श्रोता बताते हैं कि भगवती पीतांबरा की साधना करने से परिवार में कलह क्लेश बढ़ने लगा; अनुष्ठान के मध्य में और पूर्ण होने के पश्चात नए शत्रुओं का प्रादुर्भाव हुआ और पुराने शत्रु और अधिक प्रचंड हो गए; कार्यक्षेत्र में विभिन्न प्रकार की परेशानियां आने लगीं; और जो व्यक्ति पहले शांत सौम्य रहता था वह अत्यधिक उग्र हो गया।

02

उद्देश्य, टर्निंग पॉइंट, और अति उत्साह

कोई व्यक्ति सबसे पहले साधना उठाता ही क्यों है?

· Reviewed Sep 2026 · 01:26–02:34 · Also a question

जब भी कोई व्यक्ति साधना की ओर अग्रसर होता है तो उसके पीछे कोई न कोई उद्देश्य होता है — भौतिक, आध्यात्मिक, अथवा किसी देवी कृपा को प्राप्त करने हेतु — और उस निर्णय तक ले जाने वाला कोई टर्निंग पॉइंट होता है। वक्ता कहते हैं कि जो व्यक्ति पीतांबरा साधना का निर्णय लेता है, उसने वह निर्णय जरूर किसी न किसी व्यक्ति के अनुभव को सुनकर लिया होगा, और उसी अति उत्साह में साधना आरंभ कर दी होगी।

03

सबसे पहले उठाई गई बगला प्रत्यंगिरा साधना

परेशानी बताने वाले सौ में से लगभग पचासी लोगों ने बगला प्रत्यंगिरा के कवच से ही आरंभ किया — 1100, 3600 और 11000 तक की संख्या में।

· Reviewed Sep 2026 · 02:35–03:10

वक्ता कहते हैं कि परेशानी बताने वाले सौ लोगों से यदि पूछा जाए कि उन्होंने पीतांबरा से संबंधित कौन सी साधना की, तो सौ में से लगभग पचासी यही कहेंगे कि उन्होंने सबसे पहले बगला प्रत्यंगिरा साधना ही की — प्रत्यंगिरा स्वरूप के कवच इत्यादि का पाठ और अनुष्ठान, 1100, 3600 और 11000 तक की संख्या में।

04

पहले कोई साधना नहीं, और इंटरनेट से लिया गया निर्णय

कुछ भी नहीं: न चालीसा, न सुबह-शाम धूप दीप — बहुत हुआ तो शनिवार को हनुमान चालीसा, फिर परेशानी, फिर यूट्यूब से उठाई गई साधना।

· Reviewed Sep 2026 · 03:11–04:01

पूछने पर कि इससे पहले कौन सी साधना करते थे, उत्तर मिलता है — कोई नहीं: न हनुमान चालीसा, न दुर्गा चालीसा, न सुबह-शाम धूप दीप; बहुत हुआ तो शनिवार को हनुमान चालीसा और मंगलवार को यदा कदा मंदिर। फिर जीवन में परेशानियां आईं, यूट्यूब पर, इंटरनेट पर, गूगल पर सर्च मारे, मैगजीन पढ़ीं, किसी के अनुभव से रिलेट हुए, और साधना उठा ली।

05

एलकेजी-यूकेजी छोड़कर सीधे दसवीं का सिलेबस लेकर बैठ जाना

सबसे बड़ा कारण यह है कि एलकेजी-यूकेजी किए ही नहीं और सीधे दसवीं क्लास का सिलेबस लेकर बैठ गए।

· Reviewed Sep 2026 · 04:02–04:15

सबसे पहला और सबसे विशेष कारण, वे कहते हैं, यही है कि आपने यूकेजी एलकेजी किए ही नहीं और सीधे दसवीं क्लास का सिलेबस लेकर बैठ गए। इस बात का, वे कहते हैं, यही सबसे बड़ा कारण बनता है।

इसका सबसे पहला और सबसे विशेष कारण, वक्ता कहते हैं, यही है: कि आपने यूकेजी एलकेजी किए ही नहीं, और सीधे दसवीं क्लास का सिलेबस लेकर बैठ गए। इस बात का, वे कहते हैं, यही सबसे बड़ा कारण बनता है।

06

तंत्र एक जाग्रत विषय, और दोष हर जगह लगता है

तंत्र का क्षेत्र वैदिक क्षेत्र से किस प्रकार अलग है?

· Reviewed Sep 2026 · 04:16–04:50 · Also a question

तंत्र को जाग्रत विषय कहा गया है, जो तुरंत प्रभाव देने वाला है; वैदिक चीज अलग होती है, और तांत्रिक तथा तंत्रोक्त चीजों का क्षेत्र ही अलग होता है। लेकिन वक्ता इस भ्रम से सावधान करते हैं कि कहीं और गलती करने पर दोष नहीं लगेगा — दोष हर जगह लगता है, क्षेत्र कोई भी हो, और कोई छूटता नहीं।

07

भाव से पहले क्रिया, और प्रत्यंगिरा की आठ शक्तियों का प्रभाव सबसे पहले साधक पर

तंत्र में भाव पहले आता है या क्रिया?

· Reviewed Sep 2026 · 04:51–05:25 · Also a question

वक्ता भाव और क्रिया में भेद करते हैं: यदि आप भाव से कर रहे हैं तो भाव से भक्ति करनी चाहिए, लेकिन तंत्र में भाव का विषय बाद में आता है और क्रिया का विषय पहला हो जाता है। जब भगवती बगला के प्रत्यंगिरा स्वरूप का पाठ किया जा रहा हो, तो प्रत्यंगिरा में जिन आठ शक्तियों को कहा गया है उनके तत्व का प्रभाव सबसे पहले साधक के अपने स्वरूप, शरीर और आभामंडल पर पड़ता है।

08

ऐसा घर जहां न शिव पूजन हुआ, न शिवलिंग की स्थापना, न शिवरात्रि का व्रत और न नवरात्रि की कलश स्थापना

जिस घर में कभी रुद्राभिषेक, शिवलिंग, शिवरात्रि का व्रत या नवरात्रि का कलश नहीं हुआ, वहां न साधक और न परिवार प्रत्यंगिरा से बनी ऊर्जा को पचा पाता है।

· Reviewed Sep 2026 · 05:26–06:09

वक्ता पूछते हैं कि उस ऊर्जा को पचाने की क्षमता साधक के भीतर है कि नहीं, और जिस घर में यह साधना की जा रही है उसके परिवार के सदस्यों के भीतर है कि नहीं। यदि घर में भगवान सदाशिव का कभी रुद्राभिषेक नहीं हुआ, कभी शिवलिंग की स्थापना ही नहीं हुई, कभी शिव पूजन नहीं हुआ, कभी शिवरात्रि का व्रत नहीं किया, नवरात्रि में कभी कलश स्थापना करके पूजन नहीं किया, आरती तक नहीं की — और सीधे प्रत्यंगिरा स्वरूप पर चले गए — तो जो ऊर्जा बनेगी उसका प्रभाव पड़ेगा।

09

पीत वस्त्र, धोती और उसकी लांग, पीला आसन, हरिद्रा, सहस्रनाम और अभिषेक

पीतांबरा साधना के नियम क्या हैं?

· Reviewed Sep 2026 · 06:10–07:01 · Also a question

वक्ता पूछते हैं कि बाकी के नीति नियमों को माना जा रहा है कि नहीं: पीतांबरा साधना में पीत वस्त्र ही क्यों आवश्यक कहा गया है और हरा या भगवा क्यों नहीं, पीतांबरा नाम क्यों दिया गया, साधक पीतांबरी धोती पहनता है कि नहीं और उसमें लांग लगाना आता है कि नहीं, आसन पीला रखा है कि नहीं, हरिद्रा संस्कारित सामान कभी किया कि नहीं, सहस्रनाम से, सतनाम से, या चित्र रखकर 108 नामावली से अर्चन किया कि नहीं, और कभी भगवती का या उनके भैरव भगवान शिव का अभिषेक किया कि नहीं।

10

साधनात्मक चीजों को सबसे पहले देखना

साधनात्मक पक्ष पहले आता है: तिथि नक्षत्र का विचार किया भी था या नहीं, और कब यह नहीं करना है।

· Reviewed Sep 2026 · 07:02–07:22

साधनात्मक जो चीजें होती हैं, वे कहते हैं, उन्हें सबसे पहले देखना चाहिए। क्या आपने तिथि, नक्षत्र इत्यादि का विचार किया है? ये चीजें आपने पहली बार की हैं, दूसरी बार की हैं — क्या आपने कभी विचार किया है कि कैसे क्या करना है, और कब नहीं करना है?

11

गलत मंत्र उच्चारण के दोष और तिर्यक प्रभाव का उपाय

प्रत्यंगिरा स्वरूप वास्तव में किस लिए बताया गया है?

· Reviewed Sep 2026 · 07:23–08:10 · Also a question

वक्ता उस लिखे हुए विषय की ओर संकेत करते हैं: कि गलत मंत्र उच्चारण के कारण जो दोष उत्पन्न होता है उसके शमन के लिए, यानी उसके तिर्यक प्रभाव को नष्ट करने के लिए, भगवती पीतांबरा के इस स्वरूप की, यानी प्रत्यंगिरा स्वरूप की उपासना करनी चाहिए, जिससे वह तिर्यक प्रभाव नष्ट हो जाता है। जिस स्वरूप की साधना दूसरे मंत्र के तिर्यक प्रभाव को नष्ट करने का सामर्थ्य रखती है, वे पूछते हैं, क्या वह स्वयं तुरंत प्रभाव देगा? नहीं देगा।

12

गुरु, गणपति और मां शारदा, और गुरु मंत्र का कम से कम सवा लाख जप

गुरु, गणपति, मां शारदा आधार हैं — गुरु मंत्र लिया हो और उसका कम से कम सवा लाख जप हुआ हो।

· Reviewed Sep 2026 · 08:11–08:48

शुरुआत सदैव आरंभिक साधनाओं से करनी चाहिए। भगवती ने, या कोई भी देवी देवता क्या कहते हैं — सर्वप्रथम गणपति; गुरु, गणपति, मां शारदा। इतनी साधना तो होनी चाहिए। आपने गुरु मंत्र लिया कि नहीं लिया, और उसका कितना जप किया, भले ही वह अजपा जप हो? नियम से कम से कम सवा लाख जप होना चाहिए।

13

सामान्य गणपति स्वरूप, उनका कवच, द्वादश नाम और दस दिन का अनुष्ठान

हरिद्रा गणपति छोड़ दीजिए — सामान्य गणपति का स्वरूप, उनके कवच का पाठ या द्वादश नाम का जप पहले होना चाहिए था, कम से कम दस दिन का अनुष्ठान ही सही।

· Reviewed Sep 2026 · 08:49–09:07

हरिद्रा गणपति को छोड़ते हुए वक्ता पूछते हैं कि सामान्य गणपति के स्वरूप की साधना, या उनके कवच इत्यादि का पाठ, या उनके द्वादश नाम का जप, कम से कम इतना तो किया कि नहीं। विघ्नहर्ता का कौन सा पाठ पूजा किया, कौन सा अनुष्ठान किया? कम से कम दस दिन का भी कभी अनुष्ठान हुआ? गणपति जी को कभी मोदक का भोग लगाया कि नहीं लगाया?

14

विघ्नहर्ता का विघ्नकर्ता बन जाना, और वह क्रम जो बदला नहीं जा सकता

यदि विघ्नहर्ता की उपासना न की जाए तो क्या होता है?

· Reviewed Sep 2026 · 09:08–09:42 · Also a question

आप कैसे सोच सकते हैं कि आपको सफलता मिलेगी और परेशानी नहीं बढ़ेगी, वक्ता पूछते हैं — विघ्नहर्ता ही तो सबसे पहले विघ्नकर्ता बनेंगे, यदि आप उनकी साधना उपासना नहीं करेंगे। अनुपात किसी में ज्यादा या कम हो सकता है, लेकिन क्रम सबके लिए वही होना चाहिए।

15

साधना स्थल, कुल देवता का आदेश, मूल मंत्र का अधिकार, और गुरु परंपरा

साधना स्थल, कुल के देवी-देवता और उनका आदेश, शत अक्षरी मूल मंत्र के लिए अपना अधिकार, और जिनसे दीक्षा ली उनकी परंपरा।

· Reviewed Sep 2026 · 09:43–10:24

वक्ता पूछते हैं कि आपका साधना स्थल कैसा है; आपके कुल के देवी-देवता कौन से हैं, उनका भोग, पूजा और भेंट क्या है, और क्या उनके द्वारा यह आदेशित है कि आप पीतांबरा की साधना कर सकते हैं अथवा नहीं; क्या सीधे मूल मंत्र, शत अक्षरी मंत्र पर जाकर आप उसके अधिकारी हैं भी कि नहीं; और जिनसे आप दीक्षा ले रहे हैं उनकी गुरु परंपरा क्या है, आपके कुल गुरु कौन हैं और उन्हें कितनी जानकारी है।

16

देश, काल और परिस्थिति के साथ अपग्रेड होना, पर मूल को छोड़े बिना

देश, काल और परिस्थिति के अनुसार चीजें बदलती हैं और अपग्रेड होनी चाहिए — लेकिन जो मूल हैं उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि प्रभाव भी वे उसी प्रकार देती हैं।

· Reviewed Sep 2026 · 10:25–11:00

कम से कम बेसिक चीजों तक तो जाइए, वक्ता कहते हैं; लिमिट से बाहर जाइए। देश, काल, परिस्थिति के अनुसार चीजें बदलती हैं, अपग्रेड होती हैं और अपग्रेड होनी चाहिए — लेकिन उसमें भी जो बेसिक हैं, जो मूल हैं, उन्हें नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि प्रभाव भी वे उसी प्रकार से देती हैं। आरंभ की चीजों को देखकर, जानकर और आरंभिक साधनाओं को करने के पश्चात ही कभी भगवती पीतांबरा की साधना करनी चाहिए।

17

सहस्रार्चन, तर्पण, और उग्र शक्ति को शांत करने हेतु यंत्र का तर्पण

जहां सब कुछ किया जा चुका हो और फिर भी परेशानी बढ़ रही हो, वहां सबसे पहले भगवती पीतांबरा का सहस्रार्चन और तर्पण — उग्र होती शक्ति को तर्पण से सौम्य किया जाता है।

· Reviewed Sep 2026 · 11:01–11:08

यदि आप इन सभी चीजों को कर चुके हैं और उसके पश्चात भी परेशानी बढ़ रही है और आप बार-बार साधना को रिपीट कर रहे हैं, तो सबसे पहले भगवती पीतांबरा का सहस्रार्चन और उनका तर्पण करिए; यंत्र का तर्पण कीजिए। जब शक्ति उग्र होने लगती है तो उन्हें तर्पण के द्वारा शांत सौम्य किया जाता है।

18

एक वर्ण की गाय का कच्चा दूध और हरिद्रा, जन्म नक्षत्र, और 108 बिल्व पत्र

एक वर्ण की गाय के कच्चे दूध में हरिद्रा और केसर मिलाकर उसमें डुबोए गए 108 बिल्व पत्र, दूध लगे हुए उठाकर, प्रत्येक पर एक नाम के साथ तर्पयामि नमः।

· Reviewed Sep 2026 · 11:09–12:13

कच्चे दूध में हरिद्रा मिलाकर, और यदि एक वर्ण की गाय मिल जाए तो उसका। वक्ता इसे सामान्य रूप से बताई गई एक छोटी सी बात कहते हैं और कहते हैं कि बाकी आपके अपने गुरु बताएंगे। जो वास्तविक साधक हैं और फिर भी परेशानी आ रही है, उन्हें एक वर्ण की गाय का कच्चा दूध लेना चाहिए, और उसमें भी नक्षत्र इत्यादि का ध्यान रखते हुए अपने जन्म नक्षत्र में करना चाहिए — वही सर्वश्रेष्ठ होता है, समय कोई भी हो और पक्ष से कोई मतलब नहीं। भगवती का चित्र ऐसा रखा जाए जो भीगने से खराब न हो; 108 नाम से तर्पण के लिए 108 बिल्व पत्र गाय के कच्चे दूध में हरिद्रा और केसर मिलाकर उसमें डुबोए जाते हैं, दूध लगे हुए उठाए जाते हैं, और भगवती का एक-एक नाम तर्पयामि नमः के साथ बोलते हुए तर्पण किया जाता है।

19

उग्र ऊर्जा का शांत होना और आभामंडल का उसे ग्रहण करने योग्य बनना

इससे उनकी उग्रता शांत होती है और अपना आभामंडल उनकी ऊर्जा को ग्रहण करने योग्य हो जाता है — और मूल दोष जो भी हो, तब जप शुभ फल देने लगता है।

· Reviewed Sep 2026 · 12:14–13:07

इससे, वक्ता कहते हैं, उनकी उग्रता या ऊर्जा शांत होगी — यानी हमारा अथर्वा, हमारा आभामंडल, जो उनकी ऊर्जा को ग्रहण नहीं कर पा रहा है, वह सौम्य होकर अच्छा प्रभाव देगा। चाहे कारण कुछ और भी हो गया हो — मंत्र दोष, देवी दोष, कोई श्राप, पितृ दोष या अन्य प्रकार के विभिन्न दोष — इस माध्यम से, तर्पण की इस क्रिया के द्वारा हम भगवती को साम सौम्य कर देते हैं, और जिस मंत्र का जप हम कर रहे हैं वह हमारे लिए शुभ फल देने वाला हो जाता है।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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