नए साधक की प्रथम तीन साधनाएं — गुरु, गणपति और फिर बटुक भैरव
बिना गुरु वाले साधकों की प्रथम साधनाओं पर समापन चर्चा।
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बिना गुरु के साधना में प्रवेश — आने के कारण
लोग किन-किन कारणों से साधना के क्षेत्र में आते हैं, और क्या कारण से कोई अंतर पड़ता है?
वक्ता गिनाते हैं — तंत्राघात, शत्रुओं से परेशानी, कर्ज और ऋण, स्वास्थ्य में कोई दिक्कत, परिवार में कलह-कलेश — या फिर केवल यह इच्छा कि साधना करें। कारण जो भी हो, वे कहते हैं कि साधना के क्षेत्र में आना ही सबसे सर्वोत्तम बात है; यह सीरीज इसी पर है कि जब गुरु की प्राप्ति न हुई हो तो आरंभ कैसे करें।
वक्ता कहते हैं कि इस सीरीज में यही चर्चा चलती आ रही है कि एक नए साधक को किस प्रकार से अपनी साधना का शुभारंभ करना चाहिए। वे कहते हैं कि आप चाहे जिस किसी भी कारण से साधना के क्षेत्र में आना चाह रहे हों — आप तंत्राघात से परेशान हैं, शत्रुओं से परेशान हैं, ऋण के कारण कर्ज से परेशान हैं, स्वास्थ्य में किसी दिक्कत के कारण परेशान हैं, परिवार में कलह-कलेश है, या जिस किसी भी कारण से आप परेशान होकर साधना के क्षेत्र में आए हैं — या केवल यह आपकी इच्छा है कि आप साधना करें: यह, वे कहते हैं, सबसे सर्वोत्तम बात होती है। और यदि आप साधना के क्षेत्र में आए हैं और आपको गुरु की प्राप्ति नहीं हुई है, तो आरंभ हम किस प्रकार से करें? वे कहते हैं कि यही इस चर्चा का विषय है।
आसन पर बैठने का विधि-विधान, हर साधना से पूर्व अनिवार्य
आसन पर बैठने का विधि-विधान हर साधना से पहले अनिवार्य है, और यह सभी साधक-साधिकाओं के लिए बुनियादी है।
वक्ता कहते हैं कि पहली चर्चा उस क्षण पर हुई थी जब हम साधना के स्थान पर बैठते हैं — किस प्रकार से बैठेंगे और क्या विधि-विधान करेंगे। वे कहते हैं कि यह हर साधना से पहले अनिवार्य होगा, और यह सभी साधक-साधिकाओं के लिए बुनियादी विषय है।
वक्ता कहते हैं कि प्रथम तो साधना के आसन पर चर्चा हुई: जब हम स्थान पर बैठते हैं, तो किस प्रकार से बैठेंगे और क्या विधि-विधान करेंगे। वे कहते हैं कि यह हर एक साधना से पहले अनिवार्य होगा। यह बेसिक है — यह सभी साधक-साधिकाओं के लिए समान रूप से है।
प्रथम साधना के रूप में गुरु साधना, और कौन सा गुरु स्वरूप लें
जिसके कोई प्रत्यक्ष गुरु न हों, उसके लिए सबसे पहली साधना कौन सी है?
वक्ता कहते हैं कि हम जो प्रथम साधना करेंगे, वह गुरु साधना होगी। यदि आपके कोई प्रत्यक्ष गुरु नहीं हैं और दीक्षा प्राप्त नहीं है, तो पूर्व के वीडियो में चर्चा हुई थी कि कौन सा स्वरूप सर्वश्रेष्ठ रहेगा: सभी देवताओं का स्वरूप गुरु स्वरूप है, परंतु एक अवतार है, एक स्वरूप है जो प्रमुखतया गुरु के निमित्त ही है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरा, यह चर्चा हुई कि हम जो प्रथम साधना करेंगे वह गुरु साधना होगी। गुरु स्वरूप में किस स्वरूप की साधना करनी है — यदि आपके कोई प्रत्यक्ष गुरु नहीं हैं और दीक्षा प्राप्त नहीं है, तो कौन सा स्वरूप सर्वश्रेष्ठ रहेगा? सर्वश्रेष्ठ क्या है? वे कहते हैं कि सभी देवताओं का स्वरूप गुरु स्वरूप है, परंतु एक अवतार है, एक स्वरूप है, जो प्रमुखतया केवल गुरु के निमित्त ही है। उसी पर चर्चा की गई थी।
गुरु के पश्चात गणपति साधना — 56 विनायक, षोडश विनायक और परंपरा के गणपति
गुरु साधना के बाद गणपति साधना: 56 विनायक, षोडश विनायक, और हर परंपरा, विद्या तथा महाविद्या के अलग-अलग गणपति।
उस साधना के पूर्ण हो जाने और देव दीक्षा विधान हो जाने के पश्चात — गुरु की साधना पहले पूर्ण कर लेने पर — दूसरी साधना गणपति जी की होगी। वक्ता कहते हैं कि गणपति जी के अनेक स्वरूप हैं: 56 विनायक माने गए हैं, षोडश विनायक माने गए हैं, और कुल परंपरा में हर परंपरा, हर विद्या, महाविद्या और उप-महाविद्या के अपने अलग-अलग गणपति हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसके पश्चात — जब वह साधना पूर्ण हो जाए, देव दीक्षा विधान हो जाए और गुरु की साधना प्रथम पूर्ण कर ली जाए — तब जो दूसरी साधना होगी, वह गणपति जी की साधना होगी। गणपति जी की साधना करनी है। अब गणपति जी के अनेक स्वरूप हैं। 56 विनायक माने गए हैं, षोडश विनायक माने गए हैं, और जब आप परंपरा में, कुल परंपरा में जाएंगे, तो हर परंपरा के, हर विद्या के, हर महाविद्या के और हर उप-महाविद्या के अलग-अलग गणपति हैं। वे कहते हैं कि उनका स्वतंत्र रूप से पूरा एक तंत्र विकसित है, और स्वतंत्र रूप से उनकी पूरी मंडल साधना होती है। उनकी उप-महाविद्याओं का, उनकी शक्तियों का और उनकी अंग विद्याओं का सभी का उपासना होता है।
नारद पुराण का संकट नाशन गणपति स्तोत्रम
एक नए साधक को गणपति की कौन सी साधना लेनी चाहिए, और उससे क्या प्राप्त होता है?
वक्ता कहते हैं कि एक नए साधक को आंख मूंद करके भगवान गणपति के निमित्त प्रथम साधना के रूप में नारद पुराण में दिया गया संकट नाशन गणपति स्तोत्रम ही करना चाहिए। इसे करने से न केवल गणपति जी की कृपा, तपोबल का संचय और प्रारब्धों का नाश होता है, वरन उसमें यह भी दिया है कि जिस कामना के निमित्त आप इसका पाठ करेंगे, वह कामना भी पूर्ण होगी।
वक्ता कहते हैं कि परंतु जब आप एक नए साधक हैं, तो आंख मूंद करके भगवान गणपति के निमित्त जो प्रथम साधना आपको करनी चाहिए, वह संकट नाशन स्तोत्र है — नारदएक देव-ऋषि, पौराणिक साहित्य में प्रायः प्रश्नकर्ता या श्रोता के रूप में उपस्थित। पुराण में दिया गया संकट नाशन गणपति स्तोत्रम। वे कहते हैं कि इस साधना को करने से न सिर्फ गणपति जी की कृपा प्राप्त होगी, न सिर्फ आपके तपोबल का संचय होगा, न ही सिर्फ आपके प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। का नाश होगा — वरन इसके साथ-साथ उसमें दिया है कि जिस कामना के निमित्त आप इसका पाठ करेंगे, वह कामना भी पूर्ण होगी।
विनायक के विघ्न, और उनका मूलाधार से संबंध
जो साधक पहले गणपति की साधना किए बिना कोई विशिष्ट साधना आरंभ कर देता है, उसके साथ क्या होता है?
वक्ता कहते हैं कि महागणपति जी की कृपा के बिना, या भगवान विनायक के किसी एक स्वरूप का आश्रय लिए बिना, साधना के क्षेत्र में कोई विशेष सफलता प्राप्त नहीं होती और बहुत सारे विघ्न-बाधा आते हैं। विशेष रूप से: बहुत आलस, निद्रा, तंद्रा, विचारों का कभी स्थिर न होना, एकाग्रता का बार-बार भंग होना, और उच्चाटन का आरंभ हो जाना। वे कहते हैं कि ये विघ्न विनायक स्वरूपों से संबंधित हैं, और इनका सीधा संबंध मूलाधार से है।
वक्ता कहते हैं कि यह जान लीजिए: महागणपति जी की कृपा के बिना, या जब तक आप भगवान विनायक के किसी एक स्वरूप का आश्रय लेकर उनकी साधना, पूजा और सेवा नहीं करते, तब तक साधना के क्षेत्र में आपको कोई विशेष सफलता प्राप्त नहीं होगी, और बहुत सारे विघ्न-बाधा आएंगे। वे कहते हैं कि आप देखिए साधक क्या करते हैं — कोई भी विशिष्ट साधना ले लेंगे और आरंभ में गणेश जी का कोई अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। नहीं करेंगे। तब उनके कौन-कौन से कष्ट होंगे? एक तो उन्हें आलस बहुत आएगा, निद्रा आएगी, तंद्रा आएगी, विचार कभी भी स्थिर नहीं होंगे, एकाग्रता बिल्कुल भंग होती रहेगी, और साथ ही उच्चाटन होना आरंभ हो जाएगा। वे कहते हैं कि ये जितने भी विघ्न-बाधाएं हैं, ये भगवान महागणपति जी के द्वारा, या भगवान विनायक के जितने स्वरूप हैं उन सभी से संबंधित हैं। वे विघ्न देते हैं। और वे कहते हैं कि इसका सीधा-सा संबंध हमारे मूलाधार से होता है — क्योंकि जिस आसन पर हम बैठे हैं, हमारा शरीर आसन के साथ जहां संपर्क स्थापित करता है, वह जो प्रथम स्थान है, वह जो प्रथम चक्र है, वही भगवान गणपति का प्रथम स्थान है, जो मूलाधार है।
चतुर्थी से चतुर्दशी तक, किसी भी महीने के किसी भी पक्ष में
संकट नाशन गणपति स्तोत्रम का अनुष्ठान कब करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि जब तक हम गणपति जी की पूजा, सेवा और साधना करके उनकी कृपा प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक हमारा अनुष्ठान बिना विघ्न-बाधा के संपन्न नहीं हो पाएगा। इसलिए प्रथम अनुष्ठान संकट नाशन गणपति स्तोत्रम का होगा — और यदि आप चतुर्थी तिथि से लेकर चतुर्दशी तिथि तक, किसी भी महीने के किसी भी पक्ष में साधना करते हैं, तो वह सर्वोत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि जब तक हम उनकी पूजा-सेवा नहीं करते, जब तक उनकी साधना पूरी नहीं कर लेते, जब तक उनकी कृपा प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक हमारा अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। बिना विघ्न-बाधा के संपन्न नहीं हो पाएगा — दिक्कतें आती रहेंगी। ये जितनी भी परेशानियां हैं वे न आएं, और शीघ्र अति शीघ्र हमारे प्रमुख देवता की कृपा हमें प्राप्त हो जाए, इसके निमित्त हमें भगवान गणपति जी की सेवा, पूजा और अनुष्ठान अवश्य करनी चाहिए। तो जो प्रथम अनुष्ठान करेंगे, वह संकट नाशन स्तोत्र का होगा। वे कहते हैं कि इसमें यदि आप चतुर्थी तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। से लेकर चतुर्दशी तिथि तक, किसी भी महीने के किसी भी पक्ष में साधना करते हैं, तो वह सर्वोत्तम है।
जप और गणपति के द्वादश नामों का प्रतिदिन लेखन
जब पूजा-सामग्री तक के लिए धन न हो, तब क्या किया जा सकता है?
जहां कष्ट, विपत्तियां और आर्थिक समस्याएं बहुत अधिक हों और धूप, दीप, फूल, प्रसाद तक के लिए पैसे न हों, वहां वक्ता कहते हैं कि सर्वश्रेष्ठ विधान यह है कि केवल उनका जप करें और उनके द्वादश नामों के मूल स्तोत्र को प्रतिदिन लिखें — प्रथम वक्रतुंडम, द्वितीय गम, इसी क्रम में द्वादश नाम तक। वे कहते हैं कि तब भगवान गणपति शीघ्र अति शीघ्र धन के मार्ग खोल देते हैं, और कर्ज-ऋण से निवृत्ति के लिए भी मार्ग खुलता है; वे बताते हैं कि फल श्रुति में 6 महीने तक लगातार करने का उल्लेख है।
वक्ता कहते हैं कि या फिर, यदि कष्ट बहुत ज्यादा है — परेशानियां, विपत्तियां, आर्थिक समस्याएं बहुत अधिक हैं, और आपके पास आगे की साधना के निमित्त धन की व्यवस्था भी नहीं है, क्योंकि धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है।, दीप, फूल, प्रसाद आदि खरीदने के लिए भी तो पैसे की आवश्यकता होती ही है — तो ऐसी अवस्था में एक दूसरा मार्ग है। केवल उनका जप, और उनके द्वादश नामों के मूल स्तोत्र का लेखन: प्रथम वक्रतुंडम, द्वितीय गम, और इसी क्रम में द्वादश नाम तक — उस मूल स्तोत्र को प्रतिदिन लिखना। वे कहते हैं कि यह सर्वश्रेष्ठ विधान होता है, जिससे भगवान गणपति कृपा करके शीघ्र अति शीघ्र ही धन के मार्ग खोल देते हैं। कर्ज हो, ऋण हो, तो उसकी निवृत्ति के निमित्त भी मार्ग खुलता है। परंतु वे कहते हैं कि देखिए, फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। में लिखा है: 6 महीने तक लगातार करने पर। तो यह कार्य आपको प्रतिदिन करके अपनी आर्थिक अवस्था को, अपनी शारीरिक और मानसिक अवस्था को मजबूत करना है।
पहले गुरु मंडल, फिर गणपति विनायक मंडल
पहले गुरु मंडल की कृपा, फिर गणपति विनायक मंडल की, और उसके बाद ही भैरव जी की ओर बढ़ना।
वक्ता कहते हैं कि गुरु मंडल की कृपा प्राप्त कर लेने के बाद फिर आपको गणपति विनायक मंडल की कृपा प्राप्त करनी होती है। जब गुरु और गणपति जी की साधना पूर्ण हो जाए, तब उसके पश्चात हम भैरव जी की ओर बढ़ते हैं।
बटुक भैरव साधना, और यह भ्रांति कि भैरव पूजा से भूत-प्रेत आते हैं
तीसरी साधना भैरव जी की है, और बटुक भैरव साधना लेने से पहले यह भय दूर करना है कि भैरव पूजा से भूत-प्रेत आ जाएंगे।
तीसरी साधना भैरव जी की होगी। वक्ता बटुक भैरव, काल भैरव, भूत भैरव, महाभैरव, शमशान भैरव, महाकाल भैरव और सभी शक्तिपीठों के भैरवों के नाम लेते हैं — स्वरूप अनेक हैं। वे श्रोताओं से कहते हैं कि पहले यह भय दूर कर लें कि भैरव जी की पूजा करने से भूत-प्रेत आ जाएंगे; फिर, अपनी साधना की सुरक्षा और पूर्णता के लिए उन्हें बटुक भैरव जी की साधना अवश्य करनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि तीसरी साधना भैरव जी की होगी। भैरव जी के भी अनेक स्वरूप हैं: बटुक भैरव, काल भैरव, भूत भैरव, महाभैरव, शमशान भैरव, महाकाल भैरव, और जितने शक्ति पीठ हैं उन सभी स्थानों के भैरव — तो भैरव जी के स्वरूप अनेक हैं। उस कांसेप्ट को क्लियर कीजिए — वह भय जो आप रखते हैं कि भैरव जी की पूजा करने से भूत बाधा और प्रेत आ जाएंगे। उन सभी विषयों को पहले क्लियर कर लीजिए। और अपनी साधना की सुरक्षा के लिए, उसकी पूर्णता के लिए, आपको भैरव जी की साधना अवश्य करनी चाहिए, जिसमें भगवान बटुक भैरव जी की साधना करनी है।
विधि-विधान, फिर गुरु, फिर गणपति, फिर बटुक भैरव
नए साधक के लिए पूरा क्रम: पहले आवश्यक विधि-विधान, फिर गुरु साधना, फिर गणपति साधना, और उसके बाद बटुक भैरव साधना।
वक्ता सार में कहते हैं: एक नए साधक को सबसे पहले आवश्यक विधि-विधान सीखने के पश्चात सबसे पहले गुरु साधना, पुनः गणपति साधना, और उसके पश्चात भैरव जी की साधना — बटुक भैरव जी की साधना करनी चाहिए। वे कहते हैं कि ये तीनों अवश्य करनी चाहिए।
वक्ता सार रूप में कहते हैं कि यानी कि एक नए साधक को सबसे पहले आवश्यक विधि-विधान को सीखने के पश्चात सबसे पहले गुरु साधना, पुनः गणपति साधना, और उसके पश्चात भैरव जी की साधना — भगवान बटुक भैरव जी की साधना करनी चाहिए। वे कहते हैं कि ये सभी अवश्य करनी चाहिए।
दीप प्रज्वलन की बुनियादी बातें और पूजा स्थान की दिशा
बाती किस प्रकार रहेगी, उसका मुख किस ओर होगा, दीपक कहां रखा जाएगा, और जब पूजा का स्थान ईशान कोण में न हो तब क्या करें।
वक्ता उन प्रश्नों को गिनाते हैं जिन्हें एक बुनियादी साधक को तय करना है: दीप कैसे प्रज्वलित करना है, दीपक में बाती कैसे रहेगी, उसका मुख किस ओर होगा, प्रज्वलित करने के पश्चात उसे किस ओर रखें, और यदि घर में पूजन का स्थान ईशान कोण में न होकर कहीं और है तो वहां दीप कैसे प्रज्वलित करेंगे। वे कहते हैं कि नए साधकों को इन विषयों का विशेष रूप से ध्यान रखना है और इन्हें सीखना है।
वक्ता कहते हैं कि अब, दीप कैसे प्रज्वलित करना है; दीपक में बाती कैसे रहेगी; उसका मुख किस ओर होगा; प्रज्वलित करने के पश्चात उसे किस ओर रखें; और यदि हमारे घर में पूजन का स्थान ईशान कोण में नहीं है, कहीं और है, तो वहां पर दीप कैसे प्रज्वलित करेंगे — आदि-आदि। वे कहते हैं कि ये विभिन्न प्रकार के जितने भी प्रश्न हैं, वे बेसिक साधकों के लिए बहुत आवश्यक होते हैं, ताकि पूरा कांसेप्ट क्लियर रहे और कोई गलती न हो। वे कहते हैं कि इस प्रकार से आप साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ें। जो नए साधक हैं, उन्हें इन विषयों का बहुत विशेष रूप से ध्यान रखना है और इन्हें सीखना है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।