नए साधक की प्रथम तीन साधनाएं — गुरु, गणपति और फिर बटुक भैरव

बिना गुरु वाले साधकों की प्रथम साधनाओं पर समापन चर्चा।

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01

बिना गुरु के साधना में प्रवेश — आने के कारण

लोग किन-किन कारणों से साधना के क्षेत्र में आते हैं, और क्या कारण से कोई अंतर पड़ता है?

· Reviewed Sep 2026 · 00:03–01:08 · Also a question

वक्ता गिनाते हैं — तंत्राघात, शत्रुओं से परेशानी, कर्ज और ऋण, स्वास्थ्य में कोई दिक्कत, परिवार में कलह-कलेश — या फिर केवल यह इच्छा कि साधना करें। कारण जो भी हो, वे कहते हैं कि साधना के क्षेत्र में आना ही सबसे सर्वोत्तम बात है; यह सीरीज इसी पर है कि जब गुरु की प्राप्ति न हुई हो तो आरंभ कैसे करें।

02

आसन पर बैठने का विधि-विधान, हर साधना से पूर्व अनिवार्य

आसन पर बैठने का विधि-विधान हर साधना से पहले अनिवार्य है, और यह सभी साधक-साधिकाओं के लिए बुनियादी है।

· Reviewed Sep 2026 · 01:09–01:22

वक्ता कहते हैं कि पहली चर्चा उस क्षण पर हुई थी जब हम साधना के स्थान पर बैठते हैं — किस प्रकार से बैठेंगे और क्या विधि-विधान करेंगे। वे कहते हैं कि यह हर साधना से पहले अनिवार्य होगा, और यह सभी साधक-साधिकाओं के लिए बुनियादी विषय है।

वक्ता कहते हैं कि प्रथम तो साधना के आसन पर चर्चा हुई: जब हम स्थान पर बैठते हैं, तो किस प्रकार से बैठेंगे और क्या विधि-विधान करेंगे। वे कहते हैं कि यह हर एक साधना से पहले अनिवार्य होगा। यह बेसिक है — यह सभी साधक-साधिकाओं के लिए समान रूप से है।

03

प्रथम साधना के रूप में गुरु साधना, और कौन सा गुरु स्वरूप लें

जिसके कोई प्रत्यक्ष गुरु न हों, उसके लिए सबसे पहली साधना कौन सी है?

· Reviewed Sep 2026 · 01:23–01:44 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि हम जो प्रथम साधना करेंगे, वह गुरु साधना होगी। यदि आपके कोई प्रत्यक्ष गुरु नहीं हैं और दीक्षा प्राप्त नहीं है, तो पूर्व के वीडियो में चर्चा हुई थी कि कौन सा स्वरूप सर्वश्रेष्ठ रहेगा: सभी देवताओं का स्वरूप गुरु स्वरूप है, परंतु एक अवतार है, एक स्वरूप है जो प्रमुखतया गुरु के निमित्त ही है।

04

गुरु के पश्चात गणपति साधना — 56 विनायक, षोडश विनायक और परंपरा के गणपति

गुरु साधना के बाद गणपति साधना: 56 विनायक, षोडश विनायक, और हर परंपरा, विद्या तथा महाविद्या के अलग-अलग गणपति।

· Reviewed Sep 2026 · 01:45–02:24

उस साधना के पूर्ण हो जाने और देव दीक्षा विधान हो जाने के पश्चात — गुरु की साधना पहले पूर्ण कर लेने पर — दूसरी साधना गणपति जी की होगी। वक्ता कहते हैं कि गणपति जी के अनेक स्वरूप हैं: 56 विनायक माने गए हैं, षोडश विनायक माने गए हैं, और कुल परंपरा में हर परंपरा, हर विद्या, महाविद्या और उप-महाविद्या के अपने अलग-अलग गणपति हैं।

05

नारद पुराण का संकट नाशन गणपति स्तोत्रम

एक नए साधक को गणपति की कौन सी साधना लेनी चाहिए, और उससे क्या प्राप्त होता है?

· Reviewed Sep 2026 · 02:25–02:53 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि एक नए साधक को आंख मूंद करके भगवान गणपति के निमित्त प्रथम साधना के रूप में नारद पुराण में दिया गया संकट नाशन गणपति स्तोत्रम ही करना चाहिए। इसे करने से न केवल गणपति जी की कृपा, तपोबल का संचय और प्रारब्धों का नाश होता है, वरन उसमें यह भी दिया है कि जिस कामना के निमित्त आप इसका पाठ करेंगे, वह कामना भी पूर्ण होगी।

06

विनायक के विघ्न, और उनका मूलाधार से संबंध

जो साधक पहले गणपति की साधना किए बिना कोई विशिष्ट साधना आरंभ कर देता है, उसके साथ क्या होता है?

· Reviewed Sep 2026 · 02:54–03:54 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि महागणपति जी की कृपा के बिना, या भगवान विनायक के किसी एक स्वरूप का आश्रय लिए बिना, साधना के क्षेत्र में कोई विशेष सफलता प्राप्त नहीं होती और बहुत सारे विघ्न-बाधा आते हैं। विशेष रूप से: बहुत आलस, निद्रा, तंद्रा, विचारों का कभी स्थिर न होना, एकाग्रता का बार-बार भंग होना, और उच्चाटन का आरंभ हो जाना। वे कहते हैं कि ये विघ्न विनायक स्वरूपों से संबंधित हैं, और इनका सीधा संबंध मूलाधार से है।

07

चतुर्थी से चतुर्दशी तक, किसी भी महीने के किसी भी पक्ष में

संकट नाशन गणपति स्तोत्रम का अनुष्ठान कब करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 03:55–04:48 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जब तक हम गणपति जी की पूजा, सेवा और साधना करके उनकी कृपा प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक हमारा अनुष्ठान बिना विघ्न-बाधा के संपन्न नहीं हो पाएगा। इसलिए प्रथम अनुष्ठान संकट नाशन गणपति स्तोत्रम का होगा — और यदि आप चतुर्थी तिथि से लेकर चतुर्दशी तिथि तक, किसी भी महीने के किसी भी पक्ष में साधना करते हैं, तो वह सर्वोत्तम है।

08

जप और गणपति के द्वादश नामों का प्रतिदिन लेखन

जब पूजा-सामग्री तक के लिए धन न हो, तब क्या किया जा सकता है?

· Reviewed Sep 2026 · 04:49–05:29 · Also a question

जहां कष्ट, विपत्तियां और आर्थिक समस्याएं बहुत अधिक हों और धूप, दीप, फूल, प्रसाद तक के लिए पैसे न हों, वहां वक्ता कहते हैं कि सर्वश्रेष्ठ विधान यह है कि केवल उनका जप करें और उनके द्वादश नामों के मूल स्तोत्र को प्रतिदिन लिखें — प्रथम वक्रतुंडम, द्वितीय गम, इसी क्रम में द्वादश नाम तक। वे कहते हैं कि तब भगवान गणपति शीघ्र अति शीघ्र धन के मार्ग खोल देते हैं, और कर्ज-ऋण से निवृत्ति के लिए भी मार्ग खुलता है; वे बताते हैं कि फल श्रुति में 6 महीने तक लगातार करने का उल्लेख है।

09

पहले गुरु मंडल, फिर गणपति विनायक मंडल

पहले गुरु मंडल की कृपा, फिर गणपति विनायक मंडल की, और उसके बाद ही भैरव जी की ओर बढ़ना।

· Reviewed Sep 2026 · 05:30–05:41

वक्ता कहते हैं कि गुरु मंडल की कृपा प्राप्त कर लेने के बाद फिर आपको गणपति विनायक मंडल की कृपा प्राप्त करनी होती है। जब गुरु और गणपति जी की साधना पूर्ण हो जाए, तब उसके पश्चात हम भैरव जी की ओर बढ़ते हैं।

वक्ता कहते हैं कि आपने गुरु मंडल की कृपा प्राप्त कर ली है; फिर आपको गणपति विनायक मंडल की कृपा प्राप्त करनी होती है। जब गुरु और गणपति जी की साधना पूर्ण हो जाए, तब उसके पश्चात हम भैरव जी की ओर बढ़ते हैं।

10

बटुक भैरव साधना, और यह भ्रांति कि भैरव पूजा से भूत-प्रेत आते हैं

तीसरी साधना भैरव जी की है, और बटुक भैरव साधना लेने से पहले यह भय दूर करना है कि भैरव पूजा से भूत-प्रेत आ जाएंगे।

· Reviewed Sep 2026 · 05:42–06:43

तीसरी साधना भैरव जी की होगी। वक्ता बटुक भैरव, काल भैरव, भूत भैरव, महाभैरव, शमशान भैरव, महाकाल भैरव और सभी शक्तिपीठों के भैरवों के नाम लेते हैं — स्वरूप अनेक हैं। वे श्रोताओं से कहते हैं कि पहले यह भय दूर कर लें कि भैरव जी की पूजा करने से भूत-प्रेत आ जाएंगे; फिर, अपनी साधना की सुरक्षा और पूर्णता के लिए उन्हें बटुक भैरव जी की साधना अवश्य करनी चाहिए।

11

विधि-विधान, फिर गुरु, फिर गणपति, फिर बटुक भैरव

नए साधक के लिए पूरा क्रम: पहले आवश्यक विधि-विधान, फिर गुरु साधना, फिर गणपति साधना, और उसके बाद बटुक भैरव साधना।

· Reviewed Sep 2026 · 06:44–07:09

वक्ता सार में कहते हैं: एक नए साधक को सबसे पहले आवश्यक विधि-विधान सीखने के पश्चात सबसे पहले गुरु साधना, पुनः गणपति साधना, और उसके पश्चात भैरव जी की साधना — बटुक भैरव जी की साधना करनी चाहिए। वे कहते हैं कि ये तीनों अवश्य करनी चाहिए।

वक्ता सार रूप में कहते हैं कि यानी कि एक नए साधक को सबसे पहले आवश्यक विधि-विधान को सीखने के पश्चात सबसे पहले गुरु साधना, पुनः गणपति साधना, और उसके पश्चात भैरव जी की साधना — भगवान बटुक भैरव जी की साधना करनी चाहिए। वे कहते हैं कि ये सभी अवश्य करनी चाहिए।

12

दीप प्रज्वलन की बुनियादी बातें और पूजा स्थान की दिशा

बाती किस प्रकार रहेगी, उसका मुख किस ओर होगा, दीपक कहां रखा जाएगा, और जब पूजा का स्थान ईशान कोण में न हो तब क्या करें।

· Reviewed Sep 2026 · 07:10–07:40

वक्ता उन प्रश्नों को गिनाते हैं जिन्हें एक बुनियादी साधक को तय करना है: दीप कैसे प्रज्वलित करना है, दीपक में बाती कैसे रहेगी, उसका मुख किस ओर होगा, प्रज्वलित करने के पश्चात उसे किस ओर रखें, और यदि घर में पूजन का स्थान ईशान कोण में न होकर कहीं और है तो वहां दीप कैसे प्रज्वलित करेंगे। वे कहते हैं कि नए साधकों को इन विषयों का विशेष रूप से ध्यान रखना है और इन्हें सीखना है।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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