नए साधक की प्रथम तीन साधनाएं — गुरु, गणपति और फिर बटुक भैरव
बिना गुरु वाले साधकों की प्रथम साधनाओं पर समापन चर्चा।
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गुरु-विहीन नए साधक की प्रथम साधनाओं का क्रम
विधि-विधान, फिर गुरु, फिर गणपति, फिर बटुक भैरव
वक्ता कहते हैं कि व्यक्ति किसी भी कारण से साधना में आए — तंत्राघात, शत्रु, ऋण, स्वास्थ्य, पारिवारिक कलह या केवल इच्छा — आना ही सर्वोत्तम बात है, और जिसे गुरु नहीं मिला उसके लिए क्रम निश्चित है। पहले स्थान पर बैठने का बेसिक विधि-विधान, जो हर साधना से पहले अनिवार्य है; फिर गुरु साधना, उस एक स्वरूप की जो प्रमुखतः गुरु के निमित्त है, क्योंकि प्रत्यक्ष गुरु या दीक्षा नहीं है; फिर गुरु मंडल की कृपा और देव दीक्षा विधान के बाद गणपति विनायक मंडल; और दोनों पूर्ण होने पर ही भैरव — बटुक भैरव साधना। वे कहते हैं कि ये सभी अवश्य करनी चाहिए, और दीप प्रज्वलन की बेसिक बातें भी नए साधक के लिए आवश्यक हैं।
वक्ता कहते हैं कि इस सीरीज में चर्चा होती आ रही है कि एक नया साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। अपनी साधना का शुभारंभ कैसे करे। जिस किसी भी कारण से कोई साधना के क्षेत्र में आना चाहे — तंत्राघात से परेशान, शत्रुओं से, कर्ज-ऋण से, स्वास्थ्य की किसी दिक्कत से, परिवार के कलह-क्लेश से, या किसी भी कारण से — या केवल यह इच्छा हो कि साधना करें: यह, वे कहते हैं, सबसे सर्वोत्तम बात है। प्रश्न यह है कि गुरु की प्राप्ति न हुई हो तो आरंभ कैसे करें। वे क्रम दोहराते हैं। पहले साधना के स्थान पर बैठने का तरीका और वहाँ किया जाने वाला विधि-विधान; यह हर साधना से पहले अनिवार्य है और सभी साधक-साधिकाओं के लिए बेसिक है। दूसरा, प्रथम साधना गुरु साधना है: यदि प्रत्यक्ष गुरु नहीं है और दीक्षा प्राप्त नहीं है, तो कौन सा स्वरूप सर्वश्रेष्ठ रहेगा — सभी देवताओं का स्वरूप गुरु स्वरूप है, वे कहते हैं, लेकिन एक अवतार, एक स्वरूप है जो प्रमुखतया गुरु के निमित्त ही है, उसी की साधना होती है (यहाँ वे उसका नाम नहीं लेते, कहते हैं कि पहले चर्चा हो चुकी है)। जब वह साधना पूर्ण हो जाए और देव दीक्षा विधान हो जाए, तब दूसरी साधना गणपति जी की है। गुरु मंडल की कृपा प्राप्त कर लेने पर, वे कहते हैं, फिर गणपति विनायक मंडल की कृपा प्राप्त करनी होती है; जब गुरु और गणपति की साधना पूर्ण हो जाए, तब भैरव जी की ओर बढ़ते हैं। सार रूप में वे कहते हैं कि नए साधक को आवश्यक विधि-विधान सीखने के बाद सबसे पहले गुरु साधना, फिर गणपति साधना, और उसके बाद भैरव साधना — बटुक भैरव जी की साधना — अवश्य करनी चाहिए। वे जोड़ते हैं कि दीप प्रज्वलन के बेसिक प्रश्न — दीपक में बाती कैसे रहेगी, उसका मुख किस ओर होगा, प्रज्वलित करने के बाद दीप कहाँ रखें, और घर का पूजन-स्थान ईशान कोण में न हो तो दीप कैसे जलाएँ — नए साधक के लिए बहुत आवश्यक हैं ताकि कोई गलती न हो; उनका उत्तर वे यहाँ नहीं देते, कहते हैं कि इन पर अलग वीडियो हैं।
गणपति के अनेक स्वरूप: 56 विनायक, षोडश विनायक और परंपरा के गणपति
हर विद्या-महाविद्या का अपना गणपति
वक्ता कहते हैं कि गणेश के अनेक स्वरूप हैं: 56 विनायक माने गए हैं, षोडश विनायक माने गए हैं, और कुल परंपरा में हर परंपरा, हर विद्या, हर महाविद्या और उप-महाविद्या के अलग-अलग गणपति हैं। इन सबका, वे कहते हैं, स्वतंत्र रूप से एक पूरा तंत्र विकसित है और पूरी स्वतंत्र मंडल साधना होती है, जिसमें उनकी उप-महाविद्याओं, शक्तियों और अंग-विद्याओं की उपासना होती है।
वक्ता कहते हैं कि गुरु के बाद दूसरी साधना गणेश जी की है — और गणपति जी के अनेक स्वरूप हैं। 56 विनायक माने गए हैं, षोडश विनायक माने गए हैं, और जब परंपरा में, कुल परंपरापीढ़ी-दर-पीढ़ी दीक्षा के माध्यम से चली आ रही तांत्रिक साधना की कुल या वंश-परंपरा। में जाएँगे, तो हर परंपरा के, हर विद्या के, हर महाविद्या और उप-महाविद्या के अलग-अलग गणपति हैं। इनका, वे कहते हैं, स्वतंत्र रूप से पूरा एक तंत्र विकसित है और स्वतंत्र रूप से उनकी पूरी मंडल साधना होती है: उनकी उप-महाविद्याओं, शक्तियों और अंग-विद्याओं सभी की उपासना होती है। वे इसे उस विस्तार के रूप में रखते हैं जो साधक को आगे मिलेगा, और फिर बताते हैं कि नए साधक को पहले कौन सी एक गणपति साधना लेनी चाहिए।
नए साधक की प्रथम गणपति साधना: संकट नाशन गणपति स्तोत्रम्
कृपा, तपोबल, प्रारब्ध और कामना एक साथ
वक्ता कहते हैं कि नए साधक को आँख मूँदकर गणपति के निमित्त प्रथम साधना नारद पुराण में दिया गया संकट नाशन स्तोत्र करना चाहिए। इसे करने से, वे कहते हैं, न केवल गणपति जी की कृपा मिलती है, तपोबल का संचय होता है और प्रारब्ध का नाश होता है, बल्कि, जैसा स्तोत्र में ही दिया है, जिस कामना के निमित्त पाठ किया जाए वह कामना भी पूर्ण होती है। अनुष्ठान का पूरा विधि-विधान, वे कहते हैं, उनके चैनल पर अलग से दिया गया है।
गणपति के अनेक स्वरूप गिनाने के बाद वक्ता कहते हैं कि जब आप नए साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। हैं, तो भगवान गणपति के निमित्त आँख मूँदकर जो प्रथम साधना करनी चाहिए, वह नारदएक देव-ऋषि, पौराणिक साहित्य में प्रायः प्रश्नकर्ता या श्रोता के रूप में उपस्थित। पुराण में दिया गया संकट नाशन स्तोत्र — संकट नाशन गणपति स्तोत्रम् — है। इस साधना को करने से, वे कहते हैं, न सिर्फ गणपति जी की कृपा प्राप्त होगी, न सिर्फ तपोबल का संचय होगा, न सिर्फ प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। का नाश होगा — इसके साथ-साथ स्तोत्र में ही दिया है कि जिस कामना के निमित्त इसका पाठ करेंगे, वह कामना भी पूर्ण होगी। वे कहते हैं कि नए साधक का प्रथम अनुष्ठान इसी स्तोत्र का होता है, और उसका पूरा विधि-विधान उनके चैनल पर उपलब्ध है; इस वार्ता में वे विधान नहीं बताते।
गणपति अनुष्ठान के बिना साधना शुरू करने पर आने वाले विघ्न
विनायक के विघ्न और मूलाधार का संबंध
वक्ता कहते हैं कि महागणपति की कृपा के बिना, या विनायक के किसी एक स्वरूप का आश्रय लेकर उनकी साधना-पूजा-सेवा किए बिना, साधना में विशेष सफलता नहीं मिलती और बहुत विघ्न-बाधाएँ आती हैं। जो साधक आरंभ में गणपति का अनुष्ठान किए बिना कोई विशिष्ट साधना ले लेता है, उसे बहुत आलस, निद्रा, तंद्रा आती है, विचार कभी स्थिर नहीं होते, एकाग्रता भंग होती रहती है और उच्चाटन आरंभ हो जाता है। ये विघ्न विनायक के हैं, वे कहते हैं, और इनका सीधा संबंध मूलाधार से है — प्रथम चक्र, जहाँ शरीर आसन से संपर्क करता है, गणपति का स्थान है — इसलिए उनकी कृपा के बिना कोई अनुष्ठान निर्विघ्न संपन्न नहीं होता।
वक्ता कहते हैं, यह जान लीजिए: महागणपति जी की कृपा के बिना, या जब तक भगवान विनायक के किसी एक स्वरूप का आश्रय लेकर उनकी साधना-पूजा-सेवा नहीं करते, तब तक साधना के क्षेत्र में विशेष सफलता नहीं मिलेगी और बहुत सारे विघ्न-बाधाएँ आएँगी। वे बताते हैं कि साधक क्या करते हैं: कोई विशिष्ट साधना ले लेते हैं और आरंभ में गणपति का कोई अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। नहीं करते। तब उन्हें कौन-कौन से कष्ट होते हैं? बहुत आलस आता है, निद्रा आती है, तंद्रा आती है, विचार कभी स्थिर नहीं होते, एकाग्रता बिल्कुल भंग होती रहती है, और साथ ही उच्चाटन आरंभ हो जाता है। ये जितने भी विघ्न-बाधाएँ हैं, वे कहते हैं, भगवान महागणपति या भगवान विनायक के सभी स्वरूपों से संबंधित हैं — वही विघ्न देते हैं। इसका सीधा संबंध हमारे मूलाधार से है, वे समझाते हैं: जिस आसन पर हम बैठे हैं, हमारा शरीर आसन के साथ जहाँ संपर्क स्थापित करता है, वह प्रथम स्थान, वह प्रथम चक्र ही भगवान गणपति का प्रथम स्थान है, मूलाधार। जब तक हम उनकी पूजा-सेवा नहीं करते, उनकी साधना पूरी नहीं करते, उनकी कृपा प्राप्त नहीं करते, तब तक हमारा अनुष्ठान बिना विघ्न-बाधा के संपन्न नहीं हो पाएगा, दिक्कतें आती रहेंगी। ये सब परेशानियाँ न आएँ और शीघ्र अति शीघ्र हमारे प्रमुख देवता की कृपा मिल जाए, इसके लिए, वे कहते हैं, भगवान गणपति की सेवा-पूजा-अनुष्ठान अवश्य करनी चाहिए।
संकट नाशन गणपति अनुष्ठान की तिथि-अवधि
चतुर्थी से चतुर्दशी, किसी भी पक्ष-मास में
वक्ता कहते हैं कि संकट नाशन स्तोत्र का अनुष्ठान चतुर्थी तिथि से चतुर्दशी तिथि तक करना सर्वोत्तम है, और यह किसी भी महीने के किसी भी पक्ष में किया जा सकता है।
संकट नाशन स्तोत्र के प्रथम अनुष्ठान के लिए वक्ता समय बताते हैं: चतुर्थी तिथि से लेकर चतुर्दशी तिथि तक, किसी भी महीने के किसी भी पक्ष में यदि साधना करते हैं तो सर्वोत्तम है। वे इसे किसी विशेष महीने या शुक्ल-कृष्ण पक्ष तक सीमित नहीं करते।
पूजन के लिए धन न हो तो गणपति के बारह नाम प्रतिदिन लिखना
जप और मूल स्तोत्र, छह महीने लगातार
वक्ता कहते हैं कि जब कष्ट, विपत्तियाँ और आर्थिक समस्याएँ बहुत अधिक हों और धूप, दीप, फूल, प्रसाद तक के लिए पैसे न हों, तो सर्वश्रेष्ठ विधान है केवल गणपति का जप और उनके बारह नामों का मूल स्तोत्र — प्रथम वक्रतुंड से द्वादश नाम तक — प्रतिदिन लिखना। वे कहते हैं कि गणपति तब शीघ्र अति शीघ्र धन के मार्ग खोल देते हैं और कर्ज-ऋण से निवृत्ति का मार्ग भी खुलता है, परंतु फलश्रुति में छह महीने लगातार करने पर लिखा है; इसे प्रतिदिन करके ही आर्थिक, शारीरिक और मानसिक अवस्था मजबूत करनी है।
वक्ता उनके लिए विकल्प बताते हैं जिनका कष्ट बहुत ज़्यादा है — परेशानियाँ, विपत्तियाँ, आर्थिक समस्याएँ बहुत अधिक हैं, यहाँ तक कि आगे की साधना के लिए धन की व्यवस्था भी नहीं है। आखिर, वे कहते हैं, धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है।, दीप, फूल, प्रसाद आदि खरीदने के लिए भी पैसे की आवश्यकता होती ही है। ऐसी अवस्था में, वे कहते हैं, केवल गणपति का जप और उनके बारह नामों का मूल स्तोत्र — प्रथम वक्रतुंड से लेकर द्वादश नाम तक — प्रतिदिन लिखना ही सर्वश्रेष्ठ विधान है। इससे भगवान गणपति कृपा करके शीघ्र अति शीघ्र धन के मार्ग खोल देते हैं। कर्ज हो, ऋण हो, तो उससे निवृत्ति का मार्ग भी खुलता है। लेकिन देखिए, वे कहते हैं, फलश्रुति में लिखा है कि छह महीने तक लगातार करने पर। इसलिए यह कार्य प्रतिदिन करना है, और इसी से अपनी आर्थिक अवस्था और अपनी शारीरिक-मानसिक अवस्था को मजबूत करना है।
नए साधक की तीसरी साधना: बटुक भैरव साधना
अपनी साधना की सुरक्षा और पूर्णता के लिए
वक्ता कहते हैं कि गुरु और गणपति की साधना पूर्ण होने पर तीसरी साधना भैरव जी की है। भैरव जी के अनेक स्वरूप हैं — बटुक भैरव, काल भैरव, भूत भैरव, महाभैरव, श्मशान भैरव, महाकाल भैरव और हर शक्ति पीठ के भैरव — परंतु नए साधक को अपनी साधना की सुरक्षा और पूर्णता के लिए बटुक भैरव साधना अवश्य करनी चाहिए। इसे लेने से पहले, वे कहते हैं, यह डर पहले दूर कर लें कि भैरव की पूजा करने से भूत-प्रेत आ जाएँगे; कितना और कैसे करना है, यह अलग वीडियो में है, जिसे वे यहाँ नहीं दोहराते।
जब गुरु और गणपति जी की साधना पूर्ण हो जाए, वक्ता कहते हैं, तब भैरव जी की ओर बढ़ते हैं: तीसरी साधना भैरव जी की है। भैरव जी के भी अनेक स्वरूप हैं, वे कहते हैं — बटुक भैरव, काल भैरव, भूत भैरव, महाभैरव, श्मशान भैरव, महाकाल भैरव, और जितने शक्तिपीठ (शक्ति पीठ) हैं उन सभी स्थानों के भैरव — तो भैरव जी के स्वरूप अनेक हैं। वे सुनने वालों से कहते हैं कि पहले वह कांसेप्ट क्लियर करें जिसके कारण वे भैरव जी से डरते हैं — कि भैरव जी की पूजा करने से भूत-प्रेत आ जाएँगे — और ऐसे सभी विषय पहले साफ कर लें; इसके लिए उनके चैनल पर भैरव जी की पूरी प्लेलिस्ट है। फिर, अपनी साधना की सुरक्षा और पूर्णता के लिए, वे कहते हैं, भैरव जी की साधना अवश्य करनी चाहिए, जिसमें भगवान बटुक भैरव जी की साधना करनी है। कितना करना है, कैसे करना है, यह चैनल पर कई अलग वीडियो में है, जिन्हें देखकर समर्पण पुष्ट किया जा सकता है, कांसेप्ट क्लियर किया जा सकता है और फिर अच्छे से साधना की जा सकती है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।