मारण से त्वरित रक्षा के बिना सिद्धि समर्थ विधान — चौखट उतारा, नरसिंह, क्षेत्रपाल और जीवित कुक्कुट उतारा
बिना किसी सिद्धि के मारण या अभिचार प्रयोग से आपात रक्षा: नरसिंह की चौखट पर उतारा, भैरव प्याला या नींबू-गुड़ का विकल्प, क्षेत्रपाल निकारी, यात्रा में वाहन का उतारा, और एक रंग का कुक्कुट सीमा पार जीवित छोड़ने की विधि; साथ में लाइव प्रश्नोत्तर।
22 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
4 also answer a common question
Questions this answers
4 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.
घर की चौखट पर उतारा: बिना किसी सिद्धि के मारण प्रयोग से सबसे तीव्र रक्षा
चौखट पर बैठे नरसिंह सबसे पहले रक्षा करते हैं
वक्ता कहते हैं कि लगभग हर किसी के जीवन में कभी न कभी मारण प्रयोग या अभिचार से भेंट हो जाती है, और कोई हनुमान जी या काली जी की सिद्धि करके रक्षा के लिए बैठा नहीं है। सबसे तीव्र रक्षा करने वाले देवता, वे कहते हैं, हर घर की चौखट पर बैठे हैं — भगवान नरसिंह, सबसे प्रथम देवता। पीड़ित व्यक्ति चौखट के अंदर की ओर खड़ा रहता है और उतारा अंदर से करके बाहर ले जाया जाता है: नींबू का उतारा, सेंधा नमक, लाल मिर्च, पीला या काला सरसों, या क्षेत्रपाल के लिए भेजा जाने वाला उतारा भी। उसी समय पचास प्रतिशत राहत मिल जाती है; जानकार व्यक्ति मिलने तक हर पंद्रह मिनट पर पाँच बार उतारा किया जाता है। किसी मंत्र सिद्धि की आवश्यकता नहीं — हनुमान चालीसा से भी हो जाता है — लेकिन चौखट न हो तो यह नहीं हो सकता।
वक्ता कहते हैं कि अब ये विषय छुपे हुए नहीं रहे: पहले ऐसा कोई प्लेटफ़ॉर्म नहीं था कि आम आदमी इन्हें समझ पाए, इसलिए इन्हें अंधविश्वास कहकर टाल दिया जाता था या भुक्तभोगी भुगतता रहता था और निकलने का मार्ग नहीं मिलता था। आज मार्ग है। वे श्रोताओं से एक बात स्पष्ट रखने को कहते हैं — रक्षण से जुड़ी सिद्धियाँ लोग सीमित मात्रा में ही करते हैं, जबकि मारण प्रयोग करने वाले बहुत हैं, और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग सभी के जीवन में कभी न कभी ऐसी अवस्था से भेंट हो जाती है। कोई हनुमान जी या काली जी की सिद्धि करके रक्षा के लिए बैठा नहीं है। किसी की नई-नई शादी हुई, और शादी के मंडप में जलने वालों की कमी नहीं होती; पट्टीदार पूरा प्रबंध करते हैं कि शादी अच्छे से न हो। किसी ने आप पर, आपकी पत्नी पर, आपकी माता पर कुछ करवा दिया, और आपको समझ आ रहा है कि अवस्था सामान्य नहीं है। आपको जानकारी हो या न हो, वे कहते हैं, आपने कोई रक्षा-प्रबंध कर रखा हो या न हो, सबसे तीव्र रक्षा करने वाले देवता आपके ही घर में बैठे हैं। वे सबके घर में हैं — लेकिन उनका आसन आपके घर में है या नहीं, यह आपको तय करना है, और यहीं व्यक्ति मार खा जाता है। वह स्थान है घर की चौखट, और उस पर विराजमान भगवान नरसिंह, सबसे प्रथम देवता। जिस क्षण अभिचार की अवस्था बने, किसी पर प्राणघात हो और आपको समझ आए कि यह बाहरी समस्या है, उसी समय आप यह कर सकते हैं। व्यक्ति को चौखट पर खड़ा करके बाहर की ओर उतारा किया जाता है — चाहे आप उतारा क्षेत्रपाल के लिए भेज रहे हों, नींबू का उतारा कर रहे हों, या सेंधा नमक, लाल मिर्च, पीला या काला सरसों का। कीजिए, वे कहते हैं, उसी समय पचास प्रतिशत राहत मिल जाएगी। जब तक कोई जानकार व्यक्ति न मिले, एक बार से अधिक कीजिए: हर पंद्रह मिनट पर, पाँच उतारे। व्यक्ति को चौखट के ऊपर खड़ा नहीं करना है; वह अंदर की ओर रहेगा, और आप अंदर से उतारा करके बाहर ले जाएँगे। चौखट न हो तो यह नहीं हो सकता — यह याद रखिए। यह पहला और सबसे तीव्र उपाय है, और इसमें किसी सिद्धि की ज़रूरत नहीं। कोई मंत्र सिद्ध न हो पर हनुमान चालीसा याद हो, तो हनुमान चालीसा से उतारा कर दीजिए — लेकिन चौखट के पास।
दूसरा उपाय भैरव जी का प्याला, और वैष्णव के लिए विकल्प: नरसिंह को नींबू की बलि और गुड़
वैष्णव के लिए नरसिंह ही भैरव हैं
वक्ता अभिचार के विरुद्ध बिना सिद्धि के दूसरे उपाय के रूप में भैरव जी के प्याले का नाम लेते हैं, लेकिन कहते हैं कि सभी इसे नहीं चढ़ा सकते: इसमें गुरु आदेश का विषय आ जाता है, और जिस वैष्णव को गुरु ने जीवन भर मदिरा का स्पर्श भी न करने का आदेश दिया हो, वह नहीं चढ़ा सकता। विकल्प यह है, वे कहते हैं, कि वैष्णव के लिए भगवान नरसिंह ही भैरव हैं — नरसिंह भैरव नाम का स्वरूप भी है, और रक्षा-प्रधान सभी देवता भैरव ही कहे गए हैं। तो जिस चौखट पर उतारा किया, वहीं, अगर बाहर नहीं जा सकते, नरसिंह को निंबू बलि दी जाती है और साथ में गुड़ का भोग लगाया जाता है।
मारण प्रयोग के विरुद्ध ताँबे के पात्र से गुड़-जल की धार
विष का भोग चौखट के आगे, ऊपर कभी नहीं
वक्ता कहते हैं कि मारण के नाश के लिए नरसिंह के उग्रतम स्वरूप को जो धार दी जाती है, वह "विष का भोग" है: ताँबे के अर्घ्य पात्र या ताँबे के लोटे में जल में गुड़ कम से कम सवा मिनट — दो मिनट मान लीजिए — घोला जाता है, जब तक वह ताँबे से थोड़ा रिएक्ट न कर जाए। वह घोल पीड़ित व्यक्ति के सिर के ऊपर से उल्टा उतारा जाता है और घर की चौखट के पास भगवान नरसिंह के नाम से धार दे दी जाती है। यही धार शिव मंदिर की चौखट पर, शिव मंदिर के पीछे, और काली या सात बहन के मंदिर के पीछे भी दी जाती है — पीछे, सामने कभी नहीं। धार सदैव चौखट के ठीक आगे दी जाती है, ऊपर कभी नहीं; ऊपर श्रृंगार होता है।
वक्ता कहते हैं कि नरसिंह के उग्रतम स्वरूप को — तंत्र नाश के लिए, मारण के लिए, यह प्रार्थना करके कि मारण का नाश कीजिए, रक्षा कीजिए — जो धार दी जाती है, वह विष का भोग है। विष का अर्थ यहाँ यह है: ताँबे के अर्घ्य पात्र या ताँबे के लोटे में जल और गुड़ लेकर गुड़ को कम से कम सवा मिनट — दो मिनट मान लीजिए — घोलना है। वह ताँबे के साथ थोड़ा रिएक्ट कर जाएगा। वही घोल उतारा जाता है: जिस पर मारण या अभिचार का प्रयोग हुआ हो, उसके सिर के ऊपर से उल्टा उतारते हैं। उतारकर घर की चौखट के पास भगवान नरसिंह के नाम से धार दे देते हैं। यही चीज़, वे कहते हैं, शिव मंदिर की चौखट पर, शिव मंदिर के पीछे, और काली जी के मंदिर के पीछे — या विशेष करके सात बहन का स्थान हो तो उनके मंदिर के पीछे — भी की जाती है। मंदिर के पीछे, सामने नहीं। शिव जी की चौखट पर चौखट के पास किया जाता है। चौखट के ऊपर धार कभी नहीं दी जाती; सदैव पास में दी जाती है। ऊपर अन्य विषय हैं — चौखट का श्रृंगार किया जाता है, धुलकर, सजाकर, सुगंधित करके। लेकिन जब धार देते हैं तो चौखट के ठीक आगे देते हैं। इसका ध्यान रखें, वे कहते हैं।
चौखट न हो या अभिचार तीव्र हो तो उतारा क्षेत्रपाल को भेजना
असली क्षेत्रपाल भैरव हैं; डीह पर कौन है, यह जानें
वक्ता कहते हैं कि चौखट न हो, या अभिचार बहुत कष्टदायक हो गया हो, तो उतारा क्षेत्रपाल के पास भेजा जाता है — इसमें भी सिद्धि की ज़रूरत नहीं, लेकिन एक नियम है: क्षेत्रपाल कौन हैं, यह जानना कहीं श्रेष्ठ है। मुख्य क्षेत्रपाल सदैव भैरव होते हैं, लेकिन पिछले सौ वर्षों में बँधे बहुत से डीहों पर लोगों ने ब्रह्म को डीह बाबा के रूप में स्थान दे दिया है, और तब दो निकारी जाती हैं — एक भैरव जी की और एक ब्रह्म बाबा की। भैरव जी की पूरी क्षेत्रपाल निकारी वह है जिसे सात्विक में उड़द बलि कहते हैं: गोटा काला उड़द, चावल और दही, ऊपर चौमुख दीपक दीपक, सफ़ेद मिठाई, दक्षिणा और पानी।
नरसिंह और भैरव के दो चौखट-उपायों के बाद, वक्ता कहते हैं, तीसरा विषय आता है: अगर आपके पास चौखट नहीं है, या अभिचार की अवस्था बहुत कष्ट देने वाली हो गई है, तो उतारा क्षेत्रपाल के पास भेजना होता है। इसके लिए भी किसी सिद्धि की आवश्यकता नहीं। लेकिन क्षेत्रपाल में एक नियम है — क्षेत्रपाल कौन हैं, यह जानकारी हो तो कहीं श्रेष्ठ होता है। उदाहरण के लिए, वे कहते हैं, मान लीजिए किसी के गाँव में डीह बाबा या क्षेत्रपाल के स्थान पर ब्रह्म को स्थान दे दिया गया है, और ब्रह्म ही क्षेत्रपाल के रूप में पूजित हो रहे हैं। मुख्य क्षेत्रपाल सदैव भैरव होते हैं, लेकिन पिछले सौ साल में देखिए: जहाँ नया-नया डीह बँधता है, लोग ब्रह्म को स्थान दे देते हैं। अगर उस स्थान पर ऐसा है तो क्षेत्रपाल में दो निकारी जाएँगी — एक भैरव जी की और दूसरी ब्रह्म बाबा की। कैसे जाएँगी? पूरी क्षेत्रपाल निकारी, वे कहते हैं, काला उड़द — गोटा उड़द — चावल, दही, बलि की पूरी सामग्री है; इसी को सात्विक में उड़द बलि कहते हैं। इसके ऊपर चौमुख दीपक, सफ़ेद मिठाई, दक्षिणा और पानी। यह हुई क्षेत्रपाल भैरव जी की निकारी।
विशेष स्थिति: गाँव के डीह पर क्षेत्रपाल रूप में स्थापित ब्रह्म की निकारी
दही-चूड़ा या कच्चा दूध, जनेऊ और आटे का दीपक
वक्ता कहते हैं कि जहाँ क्षेत्रपाल स्थान के प्रमुख देवता ब्रह्म हों, वहाँ भैरव की निकारी के साथ उनकी दूसरी निकारी जाती है: बाल ब्रह्म हों तो कच्चा दूध, नहीं तो दही-चूड़ा जिसमें लड्डू और जनेऊ रहे, पानी अलग से, और सरसों के तेल या घी में जला चार मुँह वाला आटे का दीपक। अगर उस ब्रह्म स्थान पर कोई ऐसी देवी भी हों जिन्हें बलि चढ़ती है, तो सरसों तेल का दीपक और दूध की मिठाई भी जाती है; जहाँ बलि चढ़ती है वहाँ भैंस के घी का प्रयोग हो सकता है, जिससे एक ही उतारे में सभी देवी-देवताओं का नैवेद्य हो जाता है और कृपा शीघ्र मिलती है — लेकिन यह टेक्निकल विषय है, जिसे वहाँ की जानकारी रखने वाला ही करे तो उचित है। इनमें से किसी में मंत्र सिद्धि की ज़रूरत नहीं।
वक्ता कहते हैं कि क्षेत्रपाल भैरव जी के स्थान पर प्रमुख देवता अगर विशेष करके ब्रह्म हैं, तो उनके लिए निकारी दही-चूड़ा या कच्चा दूध है। बाल ब्रह्म हों तो कच्चा दूध, नहीं तो दही-चूड़ा, जिसमें लड्डू और जनेऊ रहे, उनके निमित्त पानी अलग से, और उस पर सरसों के तेल या घी में जला हुआ चार मुँह वाला आटे का दीपक। अगर आपको यह भी जानकारी हो कि उस ब्रह्म स्थान में कोई ऐसी देवी हैं जिन्हें क्षेत्रपाल के स्थान पर बलि भी चढ़ती है, तो सरसों तेल का दीपक तो निकलेगा ही, साथ में दूध की बनी मिठाई और वह सारी सामग्री भी जाएगी। इसका ध्यान रखें, वे कहते हैं। और जहाँ बलि चढ़ती है, वहाँ भैंस के घी का प्रयोग भी किया जा सकता है: भैंस के घी से एक ही उतारे में सभी देवी-देवताओं का नैवेद्य हो जाता है और उनकी कृपा शीघ्र मिलती है। लेकिन यह थोड़ा टेक्निकल विषय हो जाता है, और उस स्थान की अच्छी जानकारी रखने वाला ही ऐसे विषयों को लेकर चले तो अधिक उचित है। इन सबके लिए, वे कहते हैं, किसी मंत्र सिद्धि की आवश्यकता नहीं। इनसे आप सीधे अपने परिवार की रक्षा कर सकते हैं।
यात्रा में अभिचार हो जाए तो देवता के वाहन के नाम से उतारा
नंदी, सोम नंदी या कालकंटक; किसी जीव को खिला दें
वक्ता कहते हैं कि यात्रा में, किसी रास्ते-घाट पर, अगर लगे कि कोई प्रयोग हो गया है और समस्या शुरू हो गई है, तो सर्वश्रेष्ठ उपाय किसी भी देवता के वाहन के नाम से उतारा करना है — नंदी जी, सोम नंदी जी, कालकंटक महाराज, किसी के भी नाम से। और सबसे श्रेष्ठ यह कि कोई जीव मिल जाए तो उतारा उसे खिला दें या उसके सामने डाल दें।
अगला विषय, वक्ता कहते हैं: मान लीजिए आप किसी यात्रा पर हैं। यात्रा में भी ऐसा विषय हो जाता है। किसी रास्ते-घाट में आपको लगे कि कोई प्रयोग हो गया है, कोई दिक्कत या समस्या हो रही है — तो क्या किया जाए? ऐसी अवस्था में सर्वश्रेष्ठ प्रयोग, वे कहते हैं, किसी भी देवता के वाहन के नाम से उतारा करना है। यानी नंदी जी के नाम से, सोम नंदी जी के नाम से, कालकंटक महाराज के नाम से — इनमें से किसी के भी नाम से आप उतारा कर सकते हैं। और सबसे श्रेष्ठतम: अगर कोई जीव मिल जाए तो उतारा उसे खिला दें या उसके सामने डाल दें। वह और भी श्रेष्ठ है।
बलि से चला मारण जब प्राण पर आ जाए: उग्र भैरव के लिए जीवित कुक्कुट का उतारा
जीव के बदले जीव छोड़ना — काटना नहीं, वध नहीं
वक्ता कहते हैं कि जब मारण प्रयोग बलि देकर चलाया गया हो, तो उसमें चलने वाली शक्ति जीव के बदले जीव माँगती है, इसलिए नींबू के साधारण उतारे और देवताओं के विधान से राहत न भी मिले। अगर आपात स्थिति में, डॉक्टर के पास हो आने के बाद भी, दो-चार घंटे बीत जाएँ और लगे कि प्राण निकल सकते हैं, तो जीव छोड़ना पड़ता है: एक रंग का कुक्कुट — पूरा सफ़ेद, पूरा काला या पूरा लाल — बिना घृणा के क्षेत्रपाल रक्षक उग्र भैरव के नाम से लाया जाता है, जिसका प्रमाण महाभैरव के विषय में कालिका पुराण में है। उस पर गंगाजल छिड़ककर, व्यक्ति का नाम-गोत्र लेकर प्रार्थना के साथ थोड़ा अरवा चावल खिलाया जाता है, सिर के ऊपर से तीन, पाँच या सात बार उल्टा उतारा जाता है, और अपनी सीमा से बाहर निर्जन स्थान में जीवित छोड़ दिया जाता है — काटना नहीं, वध नहीं। उसका क्या होगा, वह देवता का विषय है, और चला हुआ अभिचार सौ प्रतिशत समाप्त हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि एक और विषय है जो कुछ लोगों को थोड़ा ऑफेंडेड लगेगा, लेकिन वे बता रहे हैं: प्राणघात के समय अपने प्रियजनों की रक्षा के लिए इसका भी प्रयोग किया जा सकता है। यह कोई नकारात्मक प्रभाव देने वाला विषय नहीं, वे कहते हैं — तंत्र का विषय है। कई बार मारण प्रयोग में बलि चढ़ाई जाती है, और तब जीव को जीव से ही शांत किया जाएगा: मारण में चलने वाली शक्ति सीधे कहती है कि हम प्राण लेकर चले हैं, प्राण से ही शांत होंगे। तो मान लीजिए किसी के प्राण निकलते लग रहे हैं; आप डॉक्टर के पास दौड़ चुके हैं, लेकिन जानते हैं कि यह अभिचार भी है। वे यह नहीं कह रहे कि आपको बलि देनी है या ऐसे कृत्य करने हैं। जो सामान्यतः कर सकते हैं वह सब कीजिए — नींबू का पूरा प्रयोग, देवताओं के बताए सारे विधान। लेकिन उससे राहत न हो, और एकदम आपात स्थिति में दो-चार घंटे बीत जाएँ, तो जीव छोड़ना पड़ता है। आपको पता नहीं कि मूल बलि में क्या दिया गया, लेकिन कुछ चीज़ों के लिए यह देखने की ज़रूरत नहीं — एक रंग का कुक्कुट, यानी मुर्गा: पूरा सफ़ेद (कलगी लाल चलेगी), पूरा काला, या पूरा लाल। सफ़ेद आसानी से मिल जाता है; काला और लाल में शायद समस्या हो; देसी-विदेशी नहीं देखना। लाने के बाद उसे छूने में घिन नहीं करनी है — देव बलि में कभी घृणा नहीं की जाती; बाद में नहा लीजिए, लेकिन प्रियजन की रक्षा करनी है। उसे भैरव जी के नाम से लाइए — कौन भैरव? क्षेत्रपाल रक्षक उग्र भैरव — यह प्रार्थना करके कि प्रभु, हमारी रक्षा कीजिए। प्रमाण के लिए वे चौखंबा प्रकाशन के कालिका पुराण की ओर संकेत करते हैं: भगवान सर्वेश्वर और नरसिंह के युद्ध, भगवती पृथ्वी के वाराह के साथ विवाह और नरकासुर के जन्म का प्रकरण, जिसके आगे-पीछे महाभैरव का पूरा विषय — उनका प्राकट्य, तिथि, नैवेद्य-भोग — मिलता है। वहाँ बृहत विषय है, वे कहते हैं, लेकिन वर्तमान परिस्थिति के अनुसार उसका प्रयोग किया जा सकता है। विधि: महाभैरव, या क्षेत्रपाल महाभैरव उग्र भैरव, के नाम से कुक्कुट को थोड़ा स्नान कराकर उस पर गंगाजल छिड़ककर शुद्ध कर लें, फिर थोड़ा अरवा चावल खिलाएँ, यह कहकर: प्रभु, हम आपको यह कुक्कुट बलि स्वरूप में दे रहे हैं; कृपा करके स्वीकार करें, और — व्यक्ति का नाम-गोत्र लेकर — इनकी शीघ्र अति शीघ्र रक्षा करें; इन पर जो भी अभिचारिक प्रयोग है, इसके माध्यम से नष्ट कर दें। जब वह थोड़ा चावल खा ले, तो उसे व्यक्ति के सिर के ऊपर से तीन, पाँच या सात बार उल्टा उतारें, फिर ले जाकर निर्जन क्षेत्र में छोड़ दें। बलि नहीं चढ़ानी, काटना नहीं, वध नहीं करना। विशेष करके वहाँ छोड़ें जहाँ डीह लगता हो — आपके क्षेत्र की सीमा: दूसरे गाँव या दूसरे मोहल्ले की सीमा में ले जाकर छोड़ें; अपनी सीमा में कभी नहीं, और निर्जन स्थान हो तो अति उत्तम। उसके बाद वह कहाँ जाएगा, कौन पकड़ेगा, घर लौट आएगा या नहीं — इससे आपका कोई लेना-देना नहीं। जो भी उसे खाएगा, या कोई मांसभक्षी जीव उसे खा ले — वह अब देवता का हो गया, और देवता उसे किसी का पेट भरने को दें, स्वयं स्वीकार करें या जीवनदान दें, यह उनका विषय है; आपका विषय वहीं समाप्त। इसके बाद, वे कहते हैं, जो भी अभिचारिक अवस्था बनी हो वह नष्ट हो जाती है और आपको पूरा समय मिल जाता है। उस समय चला हुआ प्रयोग अब काम नहीं करेगा — यह सौ प्रतिशत है।
आपात उतारे केवल चला हुआ प्रयोग समाप्त करते हैं; स्थायी रक्षा के लिए पुरश्चरण चाहिए
कठिन समय के लिए मंत्र, स्तोत्र या कवच की सिद्धि
वक्ता कहते हैं कि बिना सिद्धि के जो उतारे उन्होंने बताए हैं, वे उस समय चलाया गया प्रयोग नष्ट कर देते हैं — वह दोबारा काम नहीं करेगा, सौ प्रतिशत। लेकिन अगला आदमी फिर नया करे तो वह अलग विषय है; उससे पहले अपनी रक्षा का प्रबंध कर लेना है, और उसके लिए मंत्र, स्तोत्र या कवच का पुरश्चरण करके सिद्धि करना आवश्यक है, तभी कठिन समय में वह काम आएगा। आपात स्थिति में ये सब चीज़ें परिवार के लिए बहुत काम आती हैं, क्योंकि उस समय आप जिसके पास जाएँ वह रक्षा कर पाए या न कर पाए।
वक्ता कहते हैं कि आपात उतारे के बाद उस समय चलाया गया प्रयोग नष्ट हो जाता है और अब काम नहीं करेगा — यह सौ प्रतिशत है। अगर वह अगला आदमी फिर से नया करता है तो वह अलग विषय है। उससे पहले, वे कहते हैं, अपनी रक्षा का प्रबंध कर लीजिए। उसके लिए मंत्र, स्तोत्र या कवच का पुरश्चरण करके सिद्धि करना आवश्यक है; तभी कठिन समय में वह आपके काम आएगा। इन सभी विषयों का ध्यान रखिए, वे कहते हैं: आपात स्थिति में ये परिवार के लिए बहुत काम आती हैं, क्योंकि उस समय आप किसी के पास जाएँगे और वह आपकी रक्षा कर पाए या न कर पाए। इनका आप सहयोग ले सकते हैं।
साधना के बीच कर्म साक्षी दीपक का बुझ जाना
पास में तेल रखकर डालते रहें; बुझे तो फिर जलाएँ
साधना के बीच कर्म साक्षी दीपक बुझ जाए तो क्या करें, इस पर वक्ता कहते हैं कि उसमें डाला हुआ वनस्पति घी या तेल कम हो रहा हो तो डिब्बा पास में रखिए और डालते रहिए ताकि वह न बुझे। फिर भी बुझ जाए तो उसे दोबारा जला देना चाहिए।
एक श्रोता कहते हैं कि साधना करते समय कर्म साक्षी दीपक बुझ जाता है। वक्ता उत्तर देते हैं: मान लीजिए उसमें जो वनस्पति घी या तेल डाला है वह कम हो रहा है — डिब्बा पास में ही रखिए और उसमें डाल दीजिए। डालते रहिए ताकि वह न बुझे। और अगर ऐसे बुझ गया, वे कहते हैं, तो दोबारा जला देना चाहिए — फिर से प्रज्वलित करें।
खरमास में भैरव डंडा नहीं चढ़ाया जाता
14 जनवरी या उसके बाद ही चढ़ाएँ
वक्ता एक श्रोता से कहते हैं कि खरमास में भैरव डंडा नहीं चढ़ाना है: इस अवधि में चढ़ाने की आवश्यकता नहीं — अभी रुकिए, और 14 जनवरी या उसके बाद ही चढ़ाइए।
एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि भैरव डंडा अभी खरमास में नहीं चढ़ाना है। खरमास में चढ़ाने की आवश्यकता नहीं — अभी रुकिए। 14 जनवरी या उसके बाद ही चढ़ाना चाहिए।
जायफल और नींबू की बलि सबके लिए है, हिंदी में पाठ करने वालों के लिए भी
इन दो बलियों पर कोई रोक नहीं
हिंदी में पाठ करने वाले एक श्रोता पूछते हैं कि क्या वे बलि दे सकते हैं। वक्ता कहते हैं बिल्कुल: जायफल की बलि और निंबू बलि सभी के लिए है, उसमें कोई दिक्कत नहीं।
हिंदी में पाठ करने वाले एक श्रोता पूछते हैं कि क्या वे बलि दे सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल दे सकते हैं: जायफल की बलि और नींबू की बलि सभी के लिए है — उसमें कोई दिक्कत नहीं।
क्या धार्मिक ग्रंथ में महत्वपूर्ण अंश पेन से चिह्नित किए जा सकते हैं?
हाईलाइटर से, पेन से नहीं
धार्मिक ग्रंथ के पठन-पाठन में महत्वपूर्ण बिंदु पेन से चिह्नित कर सकते हैं या नहीं, इस पर वक्ता कहते हैं कि हाईलाइटर से निशान लगाइए। पेन से निशान लगाने को बहुत लोग मना करते हैं; हाईलाइटर से कोई गड़बड़ नहीं होती, और वह समय के साथ मिट भी जाता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि किसी धार्मिक ग्रंथ का पठन-पाठन करते हुए महत्वपूर्ण बिंदु पेन से चिह्नित कर सकते हैं या नहीं। वक्ता कहते हैं कि हाईलाइटर से निशान लगाइए। पेन से निशान न लगाएँ — बहुत लोग मना करते हैं। हाईलाइटर से, वे कहते हैं, कोई गड़बड़ नहीं होती, और वह समय के साथ मिट भी जाता है।
यात्रा में शिवलिंग या शालिग्राम घर पर छोड़ने से क्या दोष लगता है?
सूखा मेवा, ढका जल और प्रार्थना
वक्ता कहते हैं कि शालिग्राम जी के नियम ज़्यादा रहते हैं, लेकिन वर्तमान देश-काल-परिस्थिति में यात्रा पर जाने और शिवलिंग या शालिग्राम घर पर छोड़ने से दोष नहीं लगता। कोई उपाय नहीं करना, बस एक विधि: ज़्यादा दिन के लिए जा रहे हों तो उनके पास सूखा मेवा और चाँदी या पीतल के ढके पात्र में जल रखें जिसमें पानी खराब न हो, और प्रार्थना करके जाएँ कि जब तक हम नहीं हैं, आप इसमें से अपनी सेवा-पूजा स्वीकार करते रहें और हम जहाँ रहेंगे मानसिक रूप से आपका स्मरण-पूजन करते रहेंगे।
शिवलिंग या शालिग्राम रखने वाले के यात्रा पर जाने के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि शालिग्राम जी का नियम ज़्यादा रहता है — लेकिन फिर भी वर्तमान देश, काल, परिस्थिति में दोष नहीं लगता। कोई उपाय नहीं करना है, वे कहते हैं; बस एक विधि। अगर ज़्यादा दिन के लिए जा रहे हों तो उनके पास सूखा मेवा रखें और चाँदी या पीतल के पात्र में — ऐसे अच्छे पात्र में जिसमें पानी खराब न हो — जल भरकर ढक दें, और प्रार्थना करके जाएँ: प्रभु, जब तक हम नहीं हैं तब तक आप इसमें से अपनी सेवा-पूजन स्वीकार करते रहें; हम जहाँ रहेंगे वहाँ मानसिक रूप से आपका स्मरण-पूजन करते रहेंगे।
ग्रहण काल में मंत्र जप का फल किसी संख्या में सीमित नहीं
प्रश्न शिव षडाक्षरी पर; नियम हर मंत्र पर
शिव षडाक्षरी मंत्र के जप से क्या फल मिलता है, इस पर वक्ता कहते हैं कि फल बहुत मिलता है — ग्रहण काल में इस या किसी भी मंत्र के जप को संख्या में सीमित नहीं किया जा सकता।
एक श्रोता पूछते हैं कि शिव षडाक्षरी मंत्र का जप करने से क्या फल मिलता है। वक्ता कहते हैं कि फल तो बहुत मिलता है: ग्रहण काल में इस या किसी भी मंत्र के जप को आप संख्या में सीमित नहीं कर सकते।
क्या बिना दीक्षा के ललिता सहस्रनाम का पाठ किया जा सकता है?
न्यास छोड़ें; नामावली बेहतर
वक्ता कहते हैं कि ललिता सहस्रनाम पर बहुत सारा विषय है और उसकी फलश्रुति पढ़ने से समझ आ जाएगा। लेकिन अगर दीक्षा नहीं है तो न्यास आदि के बिना पाठ करें। उनके अनुसार नामावली का पाठ — जिसमें हर नाम के साथ "नमः" लगा हो — अधिक उचित है, क्योंकि पूरा सहस्रनाम श्लोक रूप में होता है और सभी नाम श्लोक में होते हैं। ऐसे पाठ कर सकते हैं या सुन सकते हैं; सुनने में कोई दिक्कत नहीं।
ललिता सहस्रनाम पर वक्ता कहते हैं कि इसमें बहुत सारा विषय है; फलश्रुति पढ़िए तो समझ आ जाएगा। दूसरी बात, वे कहते हैं, इसका ध्यान रखें: अगर दीक्षित नहीं हैं तो न्यास आदि के बिना पाठ करें। उनके अनुसार नामावली का पाठ अधिक उचित है — वह रूप जिसमें हर नाम के साथ "नमः" लगा हो। सहस्रनाम पूरा श्लोक में होता है, सभी नाम श्लोक के रूप में। तो ऐसे पाठ कर सकते हैं, या सुन सकते हैं — सुनने में कोई दिक्कत नहीं।
गंदा साधना-आसन धोया जाता है, कपड़े से ढका नहीं
आसन को ही साफ़ करें
एक श्रोता पूछते हैं कि असली आसन गंदा होने के कारण उस पर रखे कपड़े का क्या करें और कितने दिन रखें। वक्ता पूछते हैं कि कपड़ा रखना ही क्यों है: आसन गंदा है तो आसन को धोकर साफ़ कीजिए — आसन पर कपड़ा क्यों लगाना?
एक श्रोता कहते हैं कि असली आसन ज़्यादा गंदा है इसलिए उस पर कपड़ा रखकर साधना करते हैं, और पूछते हैं कि उस कपड़े को बदलना हो तो उसका क्या करें और कितने दिन तक रखें। वक्ता प्रश्न से ही उत्तर देते हैं: कपड़ा रखना ही क्यों है? आसन गंदा है तो आसन को धोकर साफ़ कीजिए। आसन पर कपड़ा क्यों लगाना?
मंदिर में दीपक-कपूर पर रोक: निर्धारित स्थान पर जलाएँ या मानसिक प्रणाम करें
मुख्य है दर्शन करना
काशी के काल भैरव जैसे बड़े मंदिरों में कपूर, दीपक और अक्षत तक न चढ़ाने दिए जाने पर क्या करें, इस पर वक्ता कहते हैं कि इसके पीछे कारण है — विंध्याचल मंदिर में हाल में लगी आग, जगह की कमी, और एक की बदमाशी से सबको भुगतना। निर्धारित स्थान हो तो वहाँ दीपक-कपूर जलाइए, जैसे कामाख्या में दीपक के लिए अलग से पूरा गृह और स्टैंड बने हैं; न हो तो कोई विकल्प नहीं — मानसिक रूप से प्रणाम कर लें और चिंता न करें, क्योंकि मुख्य दर्शन है। कुंभ में भी घाट पर दीपक नहीं जलाने देंगे, और बिछे पुआल और करोड़ों की भीड़ को देखते हुए यह उचित ही है।
एक श्रोता कहते हैं कि बड़े मंदिरों में कपूर नहीं जलाने देते — काशी के काल भैरव में अक्षत नहीं चढ़ाने दिया, कपूर नहीं जलाने दिया, दीपक भी नहीं — और पूछते हैं कि विकल्प क्या है। वक्ता कहते हैं कि इसके पीछे कारण है: जैसा उन्होंने कुछ दिन पहले ग्रुप में डाला था, विंध्याचल मंदिर में भी आग लग गई थी। जगह की कमी से थोड़ी समस्या होती है, और एक की बदमाशी से सबको भुगतना पड़ता है। निर्धारित स्थान हो, वे कहते हैं, तो वहाँ दीपक-कपूर प्रज्वलित करें। कामाख्या मंदिर में दीपक के लिए स्टैंड लगे हैं, अलग से पूरा गृह बना है, खुला कमरा है; वैसा खोजिए, और हो तो वहाँ दीपक जलाएँ। न जलाने दें तो कोई विकल्प नहीं — मानसिक रूप से प्रणाम कर लें, इसमें टेंशन लेने वाली बात नहीं। कुंभ में भी, वे कहते हैं, घाट पर दीपक नहीं जलाने देंगे: वे अभी वहाँ गए थे और देखा कि पुआल बिछा है, गलती से दीपक गिरा तो आग लग ही जाएगी, और करोड़ों लोग आएँगे तो यह उचित ही है। निर्धारित स्थान हो तो वहाँ जलाइए; न हो तो मानसिक प्रणाम कर लीजिए, क्योंकि मुख्य दर्शन है — वही सबसे ज़रूरी है।
पत्नी मनोरमा देही प्रार्थना में रोज़ कम से कम एक माला
एक माला से कम में कोई लाभ नहीं
वक्ता एक श्रोता से कहते हैं कि "पत्नी मनोरमा देही" की कम से कम एक माला अवश्य करें — उससे कम में कोई लाभ नहीं। कम से कम एक माला ज़रूर करनी है।
"पत्नी मनोरमा देही" प्रार्थना पर एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं: कम से कम एक माला अवश्य करिए। उससे कम में कोई लाभ नहीं। एक माला कम से कम ज़रूर करें।
स्वप्न में सर्प का सिर उठाकर ले जाना
नारायण या भैरव द्वारा संकट का हरण
वक्ता कहते हैं कि स्वप्न में सर्प अगर सिर उठाकर आपको ले गया तो इसका सीधा अर्थ है कि भगवान नारायण या भगवान भैरव द्वारा आपके संकट का हरण किया जा रहा है। यह अच्छा स्वप्न है।
एक श्रोता के स्वप्न पर, जिसमें सर्प सिर उठाकर उन्हें ले गया, वक्ता कहते हैं कि इसका सीधा अर्थ है कि भगवान नारायण या भगवान भैरव जी आपके संकट का हरण कर रहे हैं। अच्छा स्वप्न है, वे कहते हैं।
पंडित के मना करने पर भी अर्गला स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है
बिना कारण की रोक पर वक्ता का मत
अर्गला स्तोत्र, देवी सूक्त, अष्टोत्तर नाम और सप्तशती का एक अध्याय करने वाले एक श्रोता कहते हैं कि किसी पंडित जी ने कहा है कि वे अर्गला नहीं कर सकते, जबकि वक्ता कहते हैं कर सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि पंडित जी ने क्यों मना किया यह पंडित जी जानें — उन्हें क्या पता — और कहते हैं कि दुनिया में अद्भुत लोग हैं जो जो नहीं करना चाहिए उसे करने को कह देते हैं; पाठ किया जा सकता है, यह उनका मत बना रहता है।
अर्गला स्तोत्र, देवी सूक्त, अष्टोत्तर नाम और सप्तशती का एक अध्याय करने वाले एक श्रोता कहते हैं कि किसी पंडित जी ने कहा कि वे अर्गला नहीं कर सकते, जबकि वक्ता कहते हैं कर सकते हैं — और पूछते हैं कि दोनों बातों का क्या तात्पर्य है। वक्ता कहते हैं कि पहला विषय उन्हें समझ आ गया: ठीक है, पंडित जी ने मना किया है — लेकिन पंडित जी क्यों बोले, यह पंडित जी जानें; वह उनका काम है, और वक्ता को क्या पता कि वे क्यों मना कर रहे हैं। वे कहते हैं कि दुनिया में अद्भुत लोग हैं जो जो चीज़ नहीं करनी चाहिए उसके लिए बोल देंगे करो। पाठ किया जा सकता है, यह उनका उत्तर बना रहता है।
क्या अभिचार उसी देवता से उतारना ज़रूरी है जिसकी शक्ति चली हो?
ग्रामीण भगत का नियम बनाम तंत्र की असीम परिधि
वक्ता कहते हैं कि अभिचार उसी देवता से उतरे जिसकी शक्ति चली हो, या उस देवता के किसी गुरु से, यह विषय ज़्यादातर ग्रामीण भगत परंपरा में है; यह सही है और होता भी है, लेकिन तंत्र इसी तक सीमित नहीं। काली जी के मंत्र से अभिचार चला हो तो काली जी के ही मंत्र से उतरेगा, ऐसा एकदम नहीं — भगवान शिव से भी उतरेगा, और औरों से भी।
एक श्रोता यह मत रखते हैं कि जिस देवता की शक्ति चली हो उसी देवता से उतारा हो, या उस देवता के किसी गुरु से। वक्ता कहते हैं कि एग्ज़ैक्ट ऐसा नहीं है: जो विषय श्रोता कह रहे हैं वह ग्रामीण भगत वालों में ज़्यादा है — कि जिस देवता की शक्ति चली हो उसी से उतारा हो या उस देवता के किसी गुरु से। ये सब विषय वहाँ हैं। लेकिन, वे कहते हैं, तंत्र का विषय सीमित नहीं है। श्रोता की बात सही है, ऐसा होता भी है, लेकिन ऐसा नहीं कि केवल यहीं तक सीमित है। काली जी के मंत्र से अभिचार चला हो तो काली जी के ही मंत्र से उतरेगा, ऐसा एकदम नहीं है। भगवान शिव से भी उतरेगा — उनसे भी होगा, औरों से भी होगा।
शिव और भगवती की पूजा में आसन का रंग
शिव के लिए पीला, भगवती के लिए लाल; लाल ऊन चलेगा
शिव पूजा में लाल ऊन का आसन चल सकता है या नहीं, इस पर वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं — और लाल ऊन के आसन पर पीला प्रयोग करें तो और भी अच्छा। शिव जी के लिए पीला और भगवती के लिए लाल आसन अति उत्तम है।
एक श्रोता पूछती हैं कि शिव जी की पूजा में लाल ऊन का आसन कर सकते हैं या नहीं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं। लाल ऊन के आसन पर पीला प्रयोग करेंगे तो और भी अच्छा — यानी शिव जी का पीला हो और भगवती का लाल हो तो अति उत्तम है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।