कुलदेवी सप्तमी — जिस कुल शक्ति का नाम भी नहीं पता, उनका पूजन कैसे करें
कुलदेवी सप्तमी पर कुल शक्ति के पूजन पर एक लाइव सत्र।
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कुल शक्ति का अर्थ केवल कुलदेवी नहीं, कुल में उपस्थित प्रत्येक शक्ति
कुल शक्ति में कौन-कौन आती हैं, और उनका पूजन कब होता है?
केवल कुलदेवी नहीं, बल्कि कुल में उपस्थित प्रत्येक शक्ति। सनातन धर्म के प्रत्येक व्यक्ति के घर में श्रावण की किसी न किसी तिथि को कुल शक्ति से संबंधित शक्तियों के पूजन का विधान सदैव रहा है — और अधिकतर महादेव के साथ भगवती की प्रमुख योगिनियाँ ही कुलदेवी के रूप में उपस्थित रही हैं।
वक्ता सबसे पहले शब्द का दायरा बड़ा करते हैं। कुलदेवी से तात्पर्य केवल और केवल कुलदेवी से नहीं है — तात्पर्य कुल में उपस्थित प्रत्येक उस शक्ति से है। श्रावण महीने में किसी न किसी तिथि को सनातन धर्म के प्रत्येक व्यक्ति के घर में उनकी कुल शक्ति से संबंधित जो शक्तियाँ होती हैं, उनके पूजन का विधान रहा है, प्रचलन रहा है। वे यह भी बताते हैं कि वे शक्तियाँ प्रायः कौन होती हैं — महादेव के साथ भगवती की जो प्रमुख योगिनियाँ हैं, वही अधिकतर कुलदेवी के रूप में उपस्थित रही हैं, और उन्हीं के द्वारा पूजन किया जाता है।
पूरे श्रावण मास भर हर शक्ति शिव की सेवा में उपस्थित रहती है
श्रावण में सारी शक्तियाँ शिव के पास क्यों एकत्र हो जाती हैं?
क्योंकि श्रावण में हर प्रकार की शक्ति — महाशक्ति, उपशक्ति, देवी-देवता, उपदेवता, यहाँ तक कि भूत, प्रेत और पिशाच भी — भगवान शिव के सन्निकट उपस्थित होकर पूरा महीना उनकी सेवा में व्यतीत करती है। महाशिवरात्रि में जो सेवा एक रात्रि की होती है, श्रावण में वही पूरे मास की हो जाती है।
वक्ता बताते हैं कि यह मास स्वयं भारी क्यों पड़ता है। श्रावण के मास में जितनी भी प्रकार की शक्तियाँ होती हैं — चाहे महाशक्ति हो, उपशक्ति हो, देवी-देवता हों, उपदेवता हों, भूत-प्रेत-पिशाच कोई भी हो — वे सभी भगवान शिव के सन्निकट उपस्थित होकर उनकी सेवा में अपना समय व्यतीत करते हैं। वे इसे महाशिवरात्रि के सामने रखकर समझाते हैं — वहाँ सेवा एक रात्रि की होती है, जबकि श्रावण मास में पूरा महीना उसी में लगता है, और सभी का प्रयास उसी ओर रहता है।
जब शक्तियाँ अन्यत्र एकत्र हों, तब बंधन की प्रक्रिया क्यों नहीं की जाती
जानकार साधक श्रावण में गृह बंधन करने से क्यों मना करते हैं?
क्योंकि बंधन में किसी न किसी शक्ति को पकड़ा जाता है, और यदि वह शक्ति उस समय शिव की सेवा में उपस्थित है तो खिंचकर आने से उसका अपना नियम भंग होता है। मना बिल्कुल नहीं है — कहना बस इतना है कि इस मास में शक्तियों का आवागमन जितना कम हो सके उतना अच्छा।
वक्ता उस सलाह के पीछे का तर्क रखते हैं जो श्रोता को कई साधकों से सुनने को मिलेगी — श्रावण के मास में गृह बंधन आदि मत कीजिए। वे यह स्पष्ट रखते हैं कि यह ओपिनियन है, प्रतिबंध नहीं — ऐसे कर सकते हैं, मना ही नहीं है, लेकिन बहुत लोगों का मत है कि नहीं करना चाहिए, और उसके पीछे का तर्क यह है। चाहे आप शुभ शक्ति को बाँधिए या अशुभ को, चाहे सुरक्षा कर रहे हों या नहीं, किसी न किसी शक्ति के माध्यम से आप किसी शक्ति को बंधन में ले ही रहे हैं। और वह शक्ति यदि उस समय वहाँ उपस्थित हो जाती है, तो एक तरीके से उसका जो नियम है वह भंग होता है। जो अच्छे जानकार हैं उनका कहना यही होता है कि इस समय में आवागमन जितना कम से कम हो सके उतना अच्छा — क्योंकि किसी भी प्रकार का प्रयोग करेंगे तो शक्तियों का आवागमन होगा ही, और उनका एक स्थान पर स्थिर रहने का क्रम टूटेगा। इससे प्रत्यक्ष रूप से दोष लग रहा है कि नहीं, यह वे स्वयं नहीं जानते; वे इसे बड़े-बुजुर्गों के अनुभवगत विषय के रूप में रखते हैं जो चर्चा में चला आया है।
सिद्धि श्रावण में पूरी कीजिए, प्रयोग भाद्रपद में
सिद्धि श्रावण में पूरी कीजिए और प्रयोग भाद्रपद में कीजिए
श्रावण पूर्णिमा को कर सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं; उसके बाद भाद्रपद का मास है और भाद्रपद में भी अपनी एक शक्ति है। सीधा विभाजन यह है कि मंत्र या कवच की सिद्धि श्रावण में पूरी कर लीजिए, और प्रयोग — रक्षा का हो, गृह बंधन का हो, कोई भी हो — भाद्रपद में कीजिए।
वक्ता विकल्प बिना घुमाए देते हैं। श्रावण पूर्णिमा को आप कीजिए, कोई दिक्कत नहीं है। पूर्णिमा के बाद भाद्रपद का महीना आता है, और भाद्रपद में भी एक शक्ति है; वह मास उपयोग में लाया जा सकता है। फिर वे सामान्य नियम के रूप में अपनी पसंद की व्यवस्था रखते हैं — जब आप किसी मंत्र या कवच आदि की सिद्धि कर रहे हों, तो सिद्धि श्रावण के मास में कर ली जाए, और उसके पश्चात प्रयोग आदि का जो विधान है, चाहे वह रक्षा का हो, गृह बंधन का हो या कोई अन्य, वह भाद्रपद के मास आदि में किया जाए। यही उचित क्रम है। एक अपवाद वे साफ रखते हैं। जहाँ इमरजेंसी है, बहुत ज्यादा दिक्कत वाला विषय है, वहाँ यह प्रश्न ही नहीं उठता — विपत्ति काल में मर्यादा रखने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मनुष्य के लिए प्राण रक्षा अधिक आवश्यक हो जाती है। वहाँ विषय अलग है।
हर कुल शक्ति युग्म में होती है, चाहे दोनों के विषय में पता हो या न हो
क्या किसी घर में केवल कुलदेवी हों और कुल देवता न हों, या इसका उल्टा हो?
प्रचलित रूप में जिनके विषय में आप जानते हैं उन्हीं की पूजा कीजिए — लेकिन भीतर का विषय ऐसा कभी हो ही नहीं सकता कि उनके साथ युग्म शक्ति न हो। जहाँ पूजित शक्ति कुंवारी हैं, वहाँ भी उनसे बड़ी कोई न कोई शक्ति होगी; बस वे प्रत्यक्ष उपस्थित होकर आपकी पूजा लेने का अधिकार नहीं रखती होंगी।
वक्ता उस प्रश्न को लेते हैं जो उनसे लगातार पूछा जाता है — कई लोग कहते हैं कि भैया हमारे घर में केवल कुलदेवी हैं, देवता नहीं हैं; और कई कहते हैं कि केवल कुल देवता हैं, कुलदेवी नहीं हैं। व्यावहारिक उत्तर उनका यह है कि प्रचलित रूप में जिनके विषय में आप जानते हैं, उन्हीं की पूजा कीजिए। लेकिन भीतर की वास्तविकता पर वे स्पष्ट हैं — ऐसा कभी हो ही नहीं सकता कि उनके साथ युग्म शक्तियाँ न हों। कठिनतम स्थिति वे स्वयं उठाते हैं — कई लोगों के घर में जो शक्ति पूजित है वे कुंवारी हैं। वहाँ भी ऐसा नहीं है कि उनकी युग्म शक्ति कोई नहीं होगी। उनसे बड़ी शक्ति कोई न कोई होगी; लेकिन वह प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित होकर आपकी पूजा आदि लेने का अधिकार नहीं रखती होंगी, या उस प्रकार से प्रत्यक्ष नहीं होती होंगी।
पीढ़ी दर पीढ़ी मूल कुल शक्ति कैसे छूटती चली गईं
बहुत कम घरों को यह क्यों पता है कि उनकी मूल कुल शक्ति कौन थीं?
क्योंकि हर पीढ़ी में वंश फैलता चला जाता है, और सबसे मूलभूत कुल शक्ति आज शायद ही कहीं पूजित रह गई हैं। लगभग 90% घरों में मूल शक्ति छूट चुकी है और उनके स्थान पर कोई और बैठ गया है।
वक्ता श्रोता से कहते हैं कि अपना वंश पीछे तक देखिए। मान लीजिए आपके चार भाई हैं; आपके पिताजी दो, तीन या पाँच भाई रहे होंगे; दादाजी दो-चार भाई; उनके पिताजी भी उतने ही। इस प्रकार पीढ़ी देखिएगा तो वंश काफी फैला हुआ मिलेगा। मूल रूप से देखा जाए तो उस पूरे फैलाव की जो सबसे मूलभूत कुल शक्ति होंगी, वे आज के समय में शायद ही कहीं पूजित रही होंगी। वर्तमान व्यवस्था ऐसी बन गई है कि बहुत कम ऐसे घर हैं जिन्हें यह पता हो कि हमारी कुल शक्ति पहले से कौन पूजी जा रही हैं, पहले से कौन हैं — और वे यह संख्या लगभग नब्बे प्रतिशत घरों की बताते हैं। एक अवस्था वे बताते हैं जिसे लोग अपने बड़े-बुजुर्गों से स्वयं जाँच सकते हैं — बुजुर्गों से पूछिए तो वे बताएँगे कि हाँ, सप्तमी के दिन पूजा चढ़ती है; लेकिन नाम पूछिए कि किस देवी-देवता के नाम से चढ़ती है तो उत्तर मिलेगा कि बाबा के नाम से चढ़ता है। कौन बाबा, यह उन्हें नहीं पता। लोग नाम ही नहीं जान रहे हैं कि वहाँ किनके नाम का पूजन हो रहा है।
एक-दो पीढ़ी में कुल देवता के समकक्ष बैठ जाने वाली प्रतिस्थापित शक्ति
अभिचार से घर में आई हुई शक्ति कुल देवता के रूप में कैसे पूजित हो जाती है?
अभिचार से त्रस्त होकर कोई व्यक्ति किसी शक्ति को घर में स्थान दे देता है, इस वचन पर कि वह घर का कल्याण करेगी। फिर वह कुल देवता के समकक्ष बैठकर पूजा लेने लगती है, और एक-दो पीढ़ी बाद वह केवल कुल शक्ति के रूप में जानी जाती है — किसी को याद ही नहीं रहता कि वह आई कैसे थी।
वक्ता श्रोता से कहते हैं कि यह विषय पूरा सुनिएगा — बीच में छोड़कर भागिएगा तो बाद में यह मत कहिएगा कि ऐसा नहीं होता। जो क्रम वे बताते हैं — अभिचार के कारण ग्रसित होकर, उससे टूटकर, व्यक्ति किसी शक्ति को अपने घर में स्थान दे देता है। शक्ति की ओर से बात सीधी थी — मुझे पूजा दो, हम तुम्हारे घर का कल्याण करेंगे। स्थान दे दिया गया। अब वह कुल देवता के समकक्ष बैठकर पूजा भी ले रही है। और यह, वे कहते हैं, मैक्सिमम लोगों के घर में है। एक-दो पीढ़ी के बाद वह केवल कुल शक्ति के रूप में ही जानी जाती है; कोई नहीं जान रहा कि वह अभिचार में चली थी, कैसे क्या हुआ। वे यह भी मानते हैं कि हो सकता है वह घर का कल्याण ही कर रही हो — कोई उत्पात नहीं, सब ठीक चल रहा है। दिक्कत कहीं और है — एकाध-दो पीढ़ी के बाद आप उसे भी छोड़ देंगे। और इसी तरीके से पूर्व काल में जो मूल शक्तियाँ पूजित रही होंगी, जो प्रत्येक घर की प्रचंड शक्तियाँ रही होंगी, वे छूटती चली गईं — कभी कोई अभिचारिक शक्ति कुलदेवी बन गई, कभी किसी सोखा-ओझा ने सिद्धि करके किसी शक्ति को बैठा दिया, और ऐसे ही चलता रहा। आज लोग जिन नामों को बताते हैं, वही इस प्रतिस्थापन का प्रमाण हैं — मैक्सिमम लोग बोलेंगे कि हमारे यहाँ केवल सोखा बाबा पूजित हैं; कहीं सोखा बाबा के साथ बंदी माता पूजित हैं; गौरैया बाबा भी पूजित हैं; कहीं ठाकुर देव पूजित हैं; किन्हीं के यहाँ सती माता पूजित हैं। दो-तीन पीढ़ी पीछे यथार्थ रूप से देखिए, वे कहते हैं, कि ये शक्तियाँ वास्तव में हैं कौन।
वह टैबू जिसने कुल शक्ति के पूजन को साल में एक बार तक सीमित कर दिया
कुल देवी-देवता की पूजा साल में एक बार पर आकर क्यों रुक गई?
एक टैबू बैठा दिया गया है कि साल में एक बार पूजा हो जाए वही बहुत है, उससे ज्यादा करना ही नहीं है — जबकि कुलदेवी-देवता के नित्य स्मरण के लिए किसी भगवान ने मना नहीं किया। साथ में वह पुरानी चेतावनी भी चलती है कि ज्यादा पूजा-पाठ करने से भूत-प्रेत लग जाते हैं, जिसे वक्ता अपने ही देवताओं से फ्रस्ट्रेटेड लोगों की आवाज बताते हैं।
वक्ता बताते हैं कि जिन घरों में सचमुच पुरानी शक्तियाँ पूजित हैं — कई-कई पीढ़ियों से चली आ रही शक्तियाँ — वहाँ भी पूजा करने वालों को उनका पूजन विधान नहीं पता है। विषय बस इतना रह गया है कि साल में एक बार पूजा हो जाए, वही बहुत है। उससे ज्यादा करना भी नहीं है। वे इस बात को नहीं मानते। नित्य स्मरण, नित्य पूजन — कुलदेवी या कुल देवता के लिए भगवान ने इसका निषेध थोड़े ही किया है। लेकिन एक टैबू बना दिया गया है, मस्तिष्क में यह विचार बैठा दिया गया है कि बस इतना ही होना चाहिए, इससे ज्यादा नहीं। साथ चलने वाली वह चेतावनी भी वे याद दिलाते हैं जो श्रोताओं ने घर के पुराने लोगों से सुनी होगी — ज्यादा पूजा मत करो, ज्यादा पूजा-पाठ करने से भूत-प्रेत पीछे लग जाते हैं; इतना पूजा-पाठ नहीं करो, जाओ खेलो; सोखा-ओझा बनना है क्या तुमको। उनका पढ़ना यह है कि यह पूजा का विषय है ही नहीं। यह फ्रस्ट्रेटेड माइंड के लोगों की आवाज है, जो अपने ही देवी-देवताओं से फ्रस्ट्रेटेड हो चुके हैं। स्टडी कीजिए, वे कहते हैं, तो आप देखिएगा कि लोग पूछ रहे हैं कि देवताओं ने क्या किया, क्या दिया, बर्बाद तो हो ही गए। घर में किसी का छोटा बच्चा मर जाए तो तुरंत पूजा-पाठ छोड़ देंगे — कौन पूजा करेगा, फालतू का कोई देवता नहीं है।
ज्ञान रखने वाले वर्ग की उपेक्षा
जो वर्ग ज्ञान रखता है उसकी उपेक्षा करने पर कुल का ज्ञान ही चला जाता है
समाज में जो वास्तव में ज्ञान रखता है उसी की उपेक्षा — कोई भी व्यक्ति, किसी भी जाति का, जिसे देवी-देवताओं की, कथा-पुराण की और अपने सनातन समाज की जानकारी है और जो समझाने का प्रयास करता है। वक्ता कहते हैं कि गाली सबसे अधिक उसी को पड़ती रही है।
वक्ता यह स्पष्ट रखते हैं कि वे किसी प्रकार की जाति की बात नहीं कर रहे हैं और न ही इस विषय को उस रूप में पढ़ा जाए — वे यह नहीं कह रहे कि कोई ब्राह्मण बोल रहा है या क्षत्रिय या वैश्य। वे सीधे एक ऐसे वर्ग की बात कर रहे हैं जो ज्ञानी होता है — वह कोई भी हो सकता है — जिसे समाज के विषय में जानकारी है, देवी-देवताओं की जानकारी है, कथा-पुराण की जानकारी है, अपने सनातन समाज की जानकारी और अनुभव है कि ऐसे करोगे तो यह होगा, और जो समझाने का प्रयास करता है। उसी को, वे कहते हैं, सबसे अधिक गाली पड़ती रही है। इसे वे सबसे बड़ी विडंबना कहते हैं, और इसी कारण से दुर्गति होती है। इससे जुड़ी एक बात वे सत्य के रूप में जोड़ते हैं — जो पीढ़ी बहुत अधिक धनी रही है, तीसरी पीढ़ी आते-आते उसकी उल्टी गिनती शुरू हो जाती है, उसके पास कितना भी हो, बर्बाद होना ही होता है; और चौथी पीढ़ी फिर से पुनः प्रयास करना शुरू करती है।
संघर्ष, फिर रिस्पांस, और फिर वह निश्चिंतता जो क्रम तोड़ देती है
साधना वर्षों बाद उत्तर देती है, और जो सुख वह देती है वही अगली पीढ़ी में उसे समाप्त कर देता है
जो पीढ़ी पूरी मार खाई हुई है — शत्रुओं से त्रस्त, तंत्र से त्रस्त, ऋण से त्रस्त — वही स्वयं को मोटिवेट रखकर सेवा-पूजा करती है। वक्ता बताते हैं कि 2002-03 में आरंभ किए गए विषय में रिस्पांस उन्हें लगभग दस साल बाद मिलना शुरू हुआ। फिर कुल शक्ति स्वास्थ्य, धन, पुत्र-पौत्र सब देती हैं — और वह पीढ़ी अगली पीढ़ी को साधना नहीं, आराम सौंपती है।
अभी-अभी बताए हुए तीन पीढ़ी वाले क्रम का कारण वक्ता यहाँ खोलते हैं, और शुरुआत वहीं से करते हैं जहाँ श्रोता वास्तव में खड़ा है। आप पूरे मार खाए हुए हैं — शत्रुओं से त्रस्त हैं, तंत्र से त्रस्त हैं, ऋण से त्रस्त हैं, हर प्रकार से दुखी हैं, परेशान हैं — और फिर भी किसी न किसी प्रकार से स्वयं को मोटिवेट रखकर सेवा-पूजा कर रहे हैं। अपना समय वे प्रमाण के रूप में नहीं, माप के रूप में रखते हैं, और कहते हैं कि साधना में उनके साथ क्या हुआ यह निज विषय है, वे उसे उजागर नहीं करते। इक्कीस से बाईस साल उन्हें लगे हैं। मानकर चलिए कि 2002-03 से शुरू किया गया विषय काफी समय के बाद — यानी लगभग दस साल के बाद — रिस्पांस देना शुरू हुआ। फिर वे वह नियम रखते हैं जिसके भीतर लोग वास्तव में जी रहे हैं। यदि आपके पिताजी, आपके दादाजी, या उनके पिता-दादा बहुत अच्छे साधक रहे होंगे, तो भगवती, आपकी कुल शक्ति कृपा करके स्वास्थ्य, धन, पुत्र-पौत्र सब प्रदान करेंगी। इसमें कोई दो राय नहीं है, देती हैं। दिक्कत मिलने के बाद शुरू होती है। मिलने के बाद आप निश्चिंत हो जाते हैं — और वही निश्चिंतता आप अपनी आने वाली पीढ़ी को दे देते हैं। अगली पीढ़ी को आप आराम देते हैं, निश्चिंतता देते हैं। इतना सुख दे देते हैं, क्योंकि आप स्वयं खूब हो गए हैं और नहीं चाहते कि आपका बच्चा दुख भोगे, कि साधना उस तक पहुँचती ही नहीं।
वे बातें जो माता-पिता तय कर लेते हैं कि बच्चे को नहीं देनी हैं
घर में बच्चे को वास्तव में सिखाना क्या चाहिए?
ब्रह्म मुहूर्त, स्वस्ति वाचन, गणपति जी का स्तोत्र, सहस्रनाम, रुद्राभिषेक कैसे होता है — वही सब, जिसके बारे में माता-पिता तय कर लेते हैं कि बच्चे को इसकी क्या जरूरत है, पहले पढ़ाई। बच्चा फिर भी उस पथ पर न चले यह हो सकता है, वक्ता कहते हैं, लेकिन प्रयास ही न करना आपकी अपनी कमी है।
जो वास्तव में रोका जाता है, वक्ता उसे रोकने वाले माता-पिता की ही आवाज में गिनाते हैं — क्या जरूरत है, हम 3:00 बजे उठकर पूजा कर ही रहे हैं, मेरा पूजा-पाठ किसको लगेगा, तुम्हीं को ना लगेगा। तो उसको क्यों परेशान करना 3:00 बजे उठाकर, उसे ब्रह्म मुहूर्त के विषय में क्यों बताना, उसे स्वस्ति वाचन क्यों सिखाना, गणपति जी का स्तोत्र क्यों सिखाना, सहस्रनाम क्यों सिखाना, रुद्राभिषेक करना क्यों सिखाना, देवी-देवता का क्यों — अरे हम कर देंगे बाबू, तुम पढ़ाई करो, पढ़कर कलेक्टर बनो। अब बच्चा पढ़कर कलेक्टर बनता है और उसे कुछ पता ही नहीं है। यह, वे कहते हैं, आपकी कमी है; इसका दोष किसी अन्य पर मत दीजिए। सामान्य आपत्ति को वे पूरा स्वीकार करते हैं। किसी भी जीव के ऊपर किसी का वश नहीं है, यह सत्य है। आप बहुत ज्ञानी-ध्यानी हो सकते हैं, आपके पास बहुत नॉलेज हो सकता है, और यह भी हो सकता है कि आपका बच्चा आपकी बात ही न माने, जिस पथ पर आप चल रहे हैं उस पर चलने को तैयार ही न हो। यह भी सत्य हो सकता है। लेकिन आप प्रयास ही न करें — यह तो आपकी कमी है। प्रयास के उनके उदाहरण छोटे और ठोस हैं। दादाजी बच्चे को बैठाकर कहें कि सुनो, मेरे साथ बैठकर तुम राम स्तुति गाओ। पिता या माता कभी बैठकर बच्चे को अपने आराध्य के विषय में कोई कथा सुनाएँ — जो होता ही नहीं, इसलिए बच्चे को हनुमान जी की माता जी का नाम तक नहीं पता, और वह कार्टून नेटवर्क पर कुछ और देख रहा है। यह कमी आपकी है, वे कहते हैं, और भुगतनी उस बच्चे को पड़ेगी।
साधना की पूँजी, जो कभी हस्तांतरित नहीं होती
पुण्य बच्चे तक पहुँच जाता है, संस्कार नहीं — क्योंकि साधना की पूँजी दी ही नहीं जाती
अपनी साधना की पूँजी। पाप के कर्म जैसे बच्चों को मिलते हैं वैसे ही पुण्य भी मिलते हैं, इसलिए स्वास्थ्य और संपन्नता तो उन्हें मिल जाती है — लेकिन संस्कार नहीं मिलता, क्योंकि जिस एक चीज को देने में लोग सबसे अधिक कृपणता करते हैं वह साधना ही है।
वक्ता यह बात पुण्य के हस्तांतरण से बनाते हैं। आपके पाप के कर्म जब बच्चों को मिलते हैं तो पुण्य भी तो मिलेगा। तो पुण्य मिल ही रहा है बच्चे को — आपका किया हुआ तप, तपस्या, जितनी तीर्थ यात्रा की, जितना आप स्वयं को यहाँ घिसे हैं, उसके कारण आपका बच्चा स्वस्थ रहेगा, संपन्न रहेगा, धन-धान्य से परिपूर्ण रहेगा। लेकिन, वे कहते हैं, वह संस्कार से विहीन हो जाएगा। क्योंकि संस्कार आप देंगे नहीं — केवल इतना ही सिखाएँगे कि बड़ों का आदर करो, धूप-दीप दिखा दो, थोड़ा सा कर लो, बाकी सब तो हम कर ही रहे हैं। और वह आराम आप जिस कारण देते हैं वह पढ़ाई है — तुम पढ़ाई में ध्यान दो बाबू, पूजा-पाठ के लिए अभी बहुत समय है, चिंता मत करो। टोकन इशारे पर वे तीखे हैं। बहुत खुश हुए तो हनुमान चालीसा सिखा दिए और बच्चे के ऊपर बहुत बड़ा एहसान कर दिए। उस एहसान के तले वह बच्चा जिंदगी भर कभी पढ़ लेता है कभी नहीं, और जब यंग एज में जाएगा तो उसकी क्या स्थिति होगी — विषयों को किस प्रकार लेकर चलना है, इसकी कोई शिक्षा आपने दी ही नहीं। निष्कर्ष उनका यही है — सबसे बड़ी पूँजी जो आपको देनी थी वह अपनी साधना की पूँजी थी, और साधना की पूँजी लोग देते ही नहीं। देने में इतनी कृपणता करते हैं कि माला जपने से उँगली छिल जाएगी, बैठने से कमर में दर्द हो जाएगा, और बच्चे से कहा जाता है कि इतनी देर संस्कृत पढ़ने से अच्छा है कोर्स की किताबें पढ़ो, उससे कुछ नॉलेज मिलेगा।
जिन मंत्रों की अपनी शर्तें हैं, उन्हें खुले में बाँटना
श्री चक्र और कामाख्या मंत्र खुले में क्यों नहीं बताए जाने चाहिए?
क्योंकि जो इस तरीके से बता रहे हैं उन्हें यही ज्ञान नहीं है कि श्री चक्र के पूजन के विषय में किसी को बोलना-बताना है भी या नहीं, और यदि है तो किस तरीके से; कामाख्या मंत्र आदि किस प्रकार दिए जाते हैं। वक्ता कहते हैं कि इससे कितने ही लोगों के घर बर्बाद हो चुके हैं, और इनसे इंस्पायर होकर और भी बर्बाद होंगे।
माता-पिता जो नहीं सिखाते, वहाँ से वक्ता उस ओर मुड़ते हैं जो इसके बदले सिखाया जा रहा है, और जिस चलन पर उन्हें आपत्ति है उसका नाम लेते हैं — आजकल के एक्सीलेंस वाले गीता कोर्सेस, जिनमें एक अजीब प्रकार की मॉडर्निटी सिखाई जा रही है। वह, वे कहते हैं, अलग ही जनरेशन चल रहा है, अलग ही प्रकार की गीता चल रही है। उनकी ठोस शिकायत उन चैनलों को लेकर है जो उन्होंने देखे हैं। एक का वर्णन वे करते हैं जिसमें एक माताजी पूरा शृंगार करके एक ही दिन में पूरा कामाख्या मंत्र बोल रही थीं — और उनकी प्रतिक्रिया यही थी कि यह क्या है। उनका पढ़ना यह है कि ऐसे लोग उस फैक्ट्री के प्रोडक्ट हैं जिसने वह प्रश्न कभी सिखाया ही नहीं जो असल है — कि श्री चक्र के पूजन के विषय में किसी को बोलना-बताना है भी या नहीं, और है तो किस तरीके से; कामाख्या मंत्र आदि किस प्रकार से देना है; और यदि बोल भी रहे हैं तो कैसे। उन्हें व्यक्ति से नहीं, परिणाम से आपत्ति है। यह सब देखकर, वे कहते हैं, भीतर फ्रस्ट्रेशन आ जाता है कि ये लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं। कितने लोगों के घर बर्बाद हो गए; और इनसे इंस्पायर होकर कई और बर्बाद हो जाएँगे, इसी तर्क पर कि जब ये कर रही हैं तो हम क्यों न करें।
तीन प्रकार की सिद्धियों में भौतिक सफलता सबसे निचले स्तर की
सांसारिक सफलता को सबसे निकृष्ट सिद्धि क्यों कहा गया है?
क्योंकि तीन प्रकार की सिद्धियों में मानव जीवन की भौतिक सफलताएँ — अच्छी गाड़ी, अच्छा घर, धन-धान्य, पुत्र-पौत्र, बिना कर्ज और बिना चिंता का सुखमय जीवन — सबसे निकृष्ट मानी गई हैं। देव कृपा वह भी है, पर सबसे निचले स्तर की, और वहाँ मोक्ष की गति नहीं है।
वक्ता क्रम साफ रखते हैं। आपने जिस भी देवी शक्ति की पूजा की हो और उनकी कृपा से आपके भीतर जो सामर्थ्य आया हो — जान लीजिए कि तीन प्रकार की सिद्धियों में इस मानव जीवन की भौतिक सफलताएँ सबसे निकृष्ट मानी गई हैं। अच्छी गाड़ी, अच्छा घर, बढ़िया धन-धान्य, अच्छे पुत्र-पौत्र, सुखमय जीवन, कोई कर्ज नहीं, किसी प्रकार की कोई चिंता नहीं, कोई अवसाद नहीं — यह निकृष्ट सिद्धि है। शब्द के अर्थ पर वे सावधान हैं। निकृष्ट सिद्धि का अर्थ है सबसे निचले स्तर की सिद्धि। देव कृपा है वह भी — लेकिन सबसे निचले स्तर की। उनकी बात यह है कि वहीं रुक जाने पर क्या होता है। भौतिकता की पूर्ति के पश्चात आप तीसरे आयाम में खड़े हैं — धर्म, अर्थ, काम; धर्म हुआ, अर्थ हुआ, काम हुआ, कामनाओं की पूर्ति हो रही है, धर्मयुक्त भी आप चल रहे हैं। लेकिन मोक्ष के लिए गतिमान नहीं हैं। और जब आपकी अगली पीढ़ी इस चीज को लेकर नहीं चलेगी, वे कहते हैं, तो वह आपको गर्त में ही लेकर जाएगी, यह याद रखिएगा। इसे वे पिछली बात से सीधे जोड़ते हैं — यह तब होता है जब जो देना था वह आपने दिया नहीं। और इसीलिए, यदि आपको अपनी कुल शक्ति के बारे में, कुल देवी-देवता के बारे में, उनकी पूजा-सेवा के बारे में कुछ पता नहीं है और आप इससे बहुत फ्रस्ट्रेटेड हैं, तो यह आपके पूर्वजों का ही दिया हुआ है।
यह कमी आपके पूर्वजों की है, किसी प्रवचनकर्ता की नहीं
अगर आपको अपने कुल देवता का पता ही नहीं है, तो यह किसकी कमी है?
आपके पूर्वजों की। यदि आपको अपनी कुल शक्ति का पता नहीं है और आप इससे फ्रस्ट्रेटेड हैं, तो यह उनका दिया हुआ है — इसके लिए आप किसी प्रवचनकर्ता, पुराणकर्ता, कथाकार या तंत्र के ज्ञाता को दोष नहीं दे सकते। कमी उनकी रही; और अब दायित्व आपका है कि यह दोबारा न छूटे।
वक्ता इस हानि का दायित्व साफ तय करते हैं। यदि आपको अपनी कुल शक्ति के बारे में, कुलदेवी या कुल देवता के बारे में, उनकी पूजा-सेवा के बारे में जानकारी नहीं है और आप इससे बहुत फ्रस्ट्रेटेड हैं — तो यह आपके पूर्वजों की देन है। इसके लिए, वे कहते हैं, आप उन्हें या किसी अन्य को गाली नहीं दे सकते। किसी प्रवचनकर्ता को, किसी पुराणकर्ता को, किसी कथाकार को, किसी तंत्र के ज्ञाता को — किसी को भी दोष नहीं दे सकते। यह आपके पूर्वजों की गलती है कि आपको अपनी कुलदेवी के बारे में नहीं पता। कमी उनकी रही है, उन्होंने बताया नहीं। और यहाँ से दायित्व बदल जाता है। अब यह आपका दायित्व बनता है कि जब आप अपने सामर्थ्य से उस देवी कृपा को प्राप्त कर लें और उस कृपा से आपमें दैवीय सामर्थ्य आ जाए, तो कभी यह छूटने न पाए, इसका ध्यान रखें। वे पुरी के शंकराचार्य महाराज का उल्लेख करते हैं, जो सदैव यही कहते हैं कि कुल शक्ति की पूजा कोई मत छोड़ो और प्रतिदिन डेढ़ से दो घंटे साधना करो — और अपना स्थायी न्यूनतम भी जोड़ते हैं कि कुछ न हो तो पंचाक्षरी मंत्र की दस माला रोज कीजिए, क्योंकि वह सामर्थ्य अपने भीतर होना चाहिए, जरूरत पड़ेगी उसकी।
पुण्य का फल परलोक में मिलता है; दुष्कर्म यहीं भुगतना पड़ता है
पूजा-पाठ से अर्जित पुण्य क्या दुष्कर्म का फल काट देता है?
नहीं। वक्ता कहते हैं कि शिव महापुराण में यह स्पष्ट लिखा है — दुष्कृत करने के बाद जो पुण्य कर्म आप करते हैं उसका फल अवश्य मिलेगा, लेकिन आध्यात्मिक जगत में, परलोक में; भौतिक जगत में नहीं। यहाँ जो दुष्कर्म कर दिया है, उसका फल तो यहीं भुगतना है।
वक्ता यहाँ अकेले भाव की चेतावनी से पहुँचते हैं। भाव प्रधानता से भाव शून्यता होने में देर नहीं लगती — अभी आप बहुत भाव प्रधान होकर किसी को सुन लिए, फिर राधा-राधा कर लिए, कृष्ण-कृष्ण कर लिए, शिव-शिव, राम-राम, सब कर लिए। लेकिन दो महीने बाद जब जीवन का डंडा पड़ेगा, जब कष्ट-परेशानी होगी, उस समय आप ज्यादा देर टिक नहीं पाइएगा। क्यों — क्योंकि दिमाग में भर दिया गया है कि केवल नाम लो, काम हो जाएगा। यहीं जाकर आप कमजोर हो जाते हैं। इसके सामने वे अध्ययन रखते हैं। शिव महापुराण पर वे बहुत धीरे चलते हैं, यह कहकर कि केवल पढ़-पढ़कर नहीं जाना है, उस पर चर्चा होती है। और कई कथाओं में आप यह सुनेंगे कि इसका आध्यात्मिक फल तो है, परलोक में फल अवश्य मिलेगा, लेकिन भौतिक जगत में तो अपने कर्म का फल भुगतना पड़ेगा। वहाँ स्पष्ट लिखा हुआ है। अध्याय उन्हें याद नहीं, पर अपलोडेड वीडियोज़ में यह विषय कई बार उठा है। तो जो व्यक्ति इस प्रकार के दुष्कृत करने के पश्चात पुण्य कर्म करता है, उस पुण्य का फल अवश्य मिलेगा — लेकिन भौतिक जगत में नहीं। आध्यात्मिक जगत में मिलेगा, परलोक में मिलेगा; वहाँ आपकी दुर्गति नहीं होगी। लेकिन यहाँ जो दुष्कर्म कर दिया है, उसका फल तो भुगतना ही है। सबसे बड़ी दुर्गति वे उसे मानते हैं जो इसके उलट आशा पर खड़ी है — कि हर प्रकार के कष्ट से छुटकारा मिल ही जाना है। इस आशा-उम्मीद में जो दुर्गति होती है, वे कहते हैं, वही सबसे बड़ी दुर्गति होती है।
भ्रम और अतिक्रमण वाले विषयों पर ही भीड़ जुटती है
अतिक्रमण वाले विषयों पर सबसे ज्यादा सुनने वाले क्यों मिलते हैं?
क्योंकि लोगों को भ्रम उत्पन्न करने वाले विषय सुनने में आनंद आता है, और मेहनत माँगने वाले विषय पर चार गाली देकर भाग जाते हैं। पशुपतास्त्र, ब्रह्मास्त्र, खड्गमाला या श्री चक्र अर्चन की बात कीजिए और लाइव तुरंत वायरल हो जाएगा — कीमत, वक्ता कहते हैं, सौ योनियों तक चुकानी पड़ती है।
वक्ता यह बताकर शुरू करते हैं कि कुल शक्ति को लेकर अवेयरनेस इतनी कम क्यों है। वे कहते हैं कि यदि यह फेसबुक-यूट्यूब न होता तो जनता आज भी इस विषय में कोई अवेयरनेस नहीं रखती, एकदम निश्चिंत होकर पड़ी रहती — जिनका भी पूजा करवा लो, वे कर लेंगे। वे कम्युनिटी में डाले हुए एक स्क्रीनशॉट का उल्लेख करते हैं — एक श्रोता ने लिखा है कि वे कैथोलिक स्कूल में पढ़ते थे, इस कदर इंप्रेस्ड थे, इतना ब्रेनवाश हो चुका था कि वे कैथोलिक बन जाना चाहते थे; और कारण उन्होंने स्वयं लिखा कि कोई बताने वाला व्यक्ति ही नहीं था। वक्ता यह नहीं मानते कि बताने वाला कोई नहीं होता। दो कारण वे गिनाते हैं — सुनने वाले लोग नहीं मिलते, इसलिए बताने वाला पीछे हट जाता है; और जब विरोध शुरू हो जाता है और बैक सपोर्ट नहीं मिलता तो लोग चुप हो जाते हैं। लोग तो सदैव से रहे हैं, वे कहते हैं, नहीं तो आज सनातन बचा कहाँ रहता — कमी सुनने वालों की है और सपोर्टर्स की है। श्रोता वास्तव में क्या चाहते हैं, इस पर वे सीधे बोलते हैं। जिन विषयों से भ्रम उत्पन्न होता है, उन्हीं में सबसे ज्यादा सुनने वाले उत्पन्न होते हैं; लोगों को भ्रम का विषय सुनने में आनंद आता है। मेहनत वाले विषय की चर्चा कीजिए तो तुरंत चार गाली देकर भागेंगे। और मेहनत वालों में भी जो अतिक्रमण करने वाला विषय है, उसे लोग पूरा सुनेंगे — बोलिए कि पशुपतास्त्र की साधना कीजिए, ब्रह्मास्त्र की साधना कीजिए; बताइए कि खड्गमाला इस प्रकार करते हैं, ऐसी अवस्था होती है; श्री चक्र अर्चन ऐसे किया जाता है — आपका लाइव तुरंत वायरल होगा। कीमत पर कोई रुकता ही नहीं। भले उसके लिए आप सौ साल तक, सौ योनियों तक कीड़े-मकोड़े की योनि में प्रकट होते रहिए, नरक में पड़ते रहिए — अरे वो तो जब पढ़ेंगे तब पढ़ेंगे, कौन देखने जाएगा; अभी आनंद लो, अभी क्या जाता है। अतिक्रमण वाला विषय बताइए, तब लोग सुनेंगे।
किसी कुल में जन्म तभी होता है जब उस कुल की शक्ति चाहती हैं
शरीर में जो प्राण है, उसे कुल शक्ति की देन क्यों कहा जाता है?
क्योंकि जब तक कुल शक्ति न चाहें, उनके कुल में जन्म हो ही नहीं सकता। वे अपने सामर्थ्य के अनुसार जीव को देखकर इच्छा करती हैं, इस भाव से कि यह जीव हमारे कुल में आएगा तो कुल का कल्याण करेगा — कोई माता-पिता, और कोई शक्ति, अपने कुल में खराब जीव नहीं चाहती।
वक्ता सीधे कहते हैं — यदि आप जीवित हैं और आपके शरीर में अभी भी प्राण है, तो वह प्राण ऊर्जा आपकी कुल शक्ति से है। यह जीवन प्राप्त ही कुल शक्ति के कारण होता है। उनका तर्क यह है कि जब तक कोई कुल शक्ति न चाहें, तब तक उनके कुल में जन्म हो ही नहीं सकता। वे इच्छा करती हैं — उच्च कोटि के साधकों को अपने सामर्थ्य के अनुसार देखकर, कि हाँ, यह जीव हमारे कुल में आता है तो अवश्य हमारे कुल का कल्याण करेगा। सीधा प्रश्न वे रखते हैं — कौन माता-पिता चाहेगा कि हमारे कुल में खराब जीव आए, अकल्याण वाला काम करे, चोर-डकैत बने? सब कोई अच्छे जीव का ही जन्म चाहते हैं। तो कुल शक्ति क्यों गलत चाहेंगी? जो शर्त वे जोड़ते हैं वह यह है कि जीव उनकी इच्छा भर से नहीं चलता — वह अपने पूर्व के कर्मों के वश में है, और उनके कारण उसकी जो गति होनी है वह तो होगी ही।
जन्म पर पितृ और देवता वैसे ही प्रसन्न होते हैं जैसे श्राद्ध पर
कुल में किसी का जन्म होने पर क्या पितृ और देवता प्रसन्न होते हैं?
हाँ। जैसे कोई व्यक्ति श्राद्ध कर्म करने जा रहा हो तो उसके पितृ-पूर्वज बहुत प्रसन्न होते हैं, वैसे ही किसी जीव के जन्म पर वे ढोल-नगाड़े बजाते हैं, इस भाव से कि यह जीव अच्छे कर्म करेगा, श्राद्ध करेगा, तर्पण करेगा। देवता भी इन्हीं कारणों से प्रसन्न होते हैं।
वक्ता दो अवसरों को आमने-सामने रखते हैं। यह लिखित में है और कई बार इसकी चर्चा हुई है कि जब कोई व्यक्ति श्राद्ध कर्म करने के लिए जा रहा होता है, तो उस समय उसके पितृ-पूर्वज बहुत अधिक प्रसन्न होते हैं। ठीक वैसा ही जन्म पर होता है — जब किसी जीव का जन्म होता है तो उनके पूर्वज बड़े प्रसन्न होते हैं, ढोल-नगाड़े बजाते हैं कि यह जीव जन्म लिया है, यह हमारी सद्गति के लिए अच्छे कर्म करेगा, श्राद्ध करेगा, तर्पण करेगा। देवता भी, वे कहते हैं, उसी प्रकार प्रसन्न होते हैं और कभी अप्रसन्न नहीं होते। वे बहुत प्रसन्न होते हैं कि हमारे कुल में एक अच्छा बच्चा जन्म लिया है — इसके सत्कर्मों के कारण हमारी संतुष्टि-तृप्ति होगी, यह हमारा यजन करेगा, और हम तृप्त होकर इस कुल का कल्याण करेंगे, अभिवृद्धि होगी, देव समाज में हमारा नाम होगा।
कुल की प्रसिद्धि अपने साथ कुल की शक्ति की प्रसिद्धि लाती है
किसी व्यक्ति की सफलता से क्या उसके कुल देवी-देवता की चर्चा भी होती है?
हाँ — और वक्ता का कहना है कि कोई कुल शक्ति इससे उल्टा नहीं चाहेंगी। उदाहरण वे राँची क्षेत्र की सोलह भुजी दुर्गा, भगवती देवड़ी का देते हैं, जिनकी चर्चा उस क्षेत्र के एक क्रिकेटर के विश्व विजेता बनने के बाद खूब चली और मंदिर का पूरा कायाकल्प हो गया।
वक्ता कहते हैं कि आध्यात्मिक क्षेत्र को छोड़ भी दीजिए, सामान्य रूप से देखिए — आप बहुत धनवान हो गए, बहुत सक्सेस हो गए, तो क्या आपके कुल देवी-देवता की चर्चा नहीं होगी? समाज में अवश्य होगी; प्रत्यक्ष रूप से न हो, लेकिन होगी। उदाहरण उनका एक क्रिकेटर का है जो विश्व विजेता बना। जब वह विश्व विजेता बना तो झारखंड-बिहार में सबसे अधिक किस जगह की चर्चा चली? सोलह भुजी दुर्गा की — भगवती देवड़ी। उनका मंदिर राँची के क्षेत्र के आसपास पड़ता है। उस समय उनकी खूब चर्चा चली, मंदिर काफी प्रसिद्ध भी हुआ, और उसका पूरा कायाकल्प बदल चुका है। इससे वे सामान्य बात निकालते हैं — कौन सी कुल की शक्ति नहीं चाहेंगी कि उनकी प्रसिद्धि हो, लोग जानें कि हाँ, इस कुल की यह शक्ति है, यह सामर्थ्य है। तो कुल की शक्ति कभी आपका अहित नहीं चाहेंगी; यह भी सत्य है। गड़बड़ वही होती है जो हमेशा होती है — व्यक्ति कृतघ्न हो जाता है। सामर्थ्य मिल गया, सब कुछ मिल गया, उसके बाद वह छोड़ देता है; फिर उसे कोई विशेष मतलब नहीं रह जाता।
फ्रस्ट्रेशन से उपजा उपहास, और सफल व्यक्ति से उधार ली हुई भक्ति
सामर्थ्यवान का उपहास फ्रस्ट्रेशन से आता है, और उसके बाद उसी की भक्ति उधार ले ली जाती है
क्योंकि उपहास उस मन को शीतलता देने का प्रयास है जो जानता है कि उस सामर्थ्य की बराबरी उससे हो नहीं सकती। और फिर वही लोग उन्हीं की पूजा शुरू कर देते हैं जिनकी पूजा वह सफल व्यक्ति करता है — इस आशा में कि वैसी ही सिद्धि हमें भी मिल जाए।
उदाहरण वक्ता देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक पर बनने वाले मीम्स से लेते हैं, जिनकी बराबर की हैसियत तक पहुँचने की क्षमता किसी में नहीं है। जो लोग मीम्स बनाते हैं वही सबसे ज्यादा मजाक उड़ाते हैं — बहुत अच्छी बात है, वे कहते हैं; लेकिन देखिए कि वे लोग भगवान श्री कृष्ण और भगवती राधा की किस प्रकार पूजा कर रहे हैं, उस सामर्थ्य में, उस स्वरूप में उनका एक डेडिकेशन है। उपहास की व्याख्या उनकी सीधी और सामान्य है — जिसके पास जितनी अधिक क्षमता रहेगी, लोग उतना ही अधिक मजाक उड़ाएँगे, और वे फ्रस्ट्रेटेड लोग हैं। आपका बेटा कल को आईएएस बन गया तो पड़ोसी सामने भले बड़ाई करे, पीछे पूरा मजाक उड़ाएगा — लड़कीबाज था, दारूबाज था, पता नहीं कैसे हो गया। आपके बच्चे की सरकारी नौकरी हो जाए तो तुरंत कहेंगे कि घूस देकर हुआ है, अपनी काबिलियत से थोड़ी हुआ है, खेत बेचकर घूस दिया है। घर में सुंदर बहू आ जाए तो पड़ोसी को वह नकचढ़ी लगेगी, दिन भर लड़ती रहती है। यह सब, वे कहते हैं, द्वेष है — यह चोट कि हमारी क्षमता उनके बराबर हो नहीं सकती, और उपहास उड़ाकर मन को शीतलता देने का प्रयास। फिर वे मोड़ बताते हैं। उन्हीं में से बहुत से लोग स्वयं भगवान कृष्ण और भगवती राधा की पूजा शुरू कर देंगे — कि जब राधा-कृष्ण की पूजा करने से ये इतने हो गए तो कहीं हम भी हो जाएँ। सन्यासी बाबा की पूजा भी लोग इसीलिए कर रहे हैं कि उन्हें भी सिद्धि हो जाए, वे भी पर्चा बनाने में सक्षम हो जाएँ। पूजा इसलिए नहीं हो रही कि हमारा कुछ और हो जाए। और इस प्रवृत्ति का उचित आधा हिस्सा वे स्वीकार भी करते हैं। लोग सीखते तो हैं — कि हाँ, यह सक्सेस व्यक्ति है, समाज में इसकी प्रतिष्ठा है, जिसकी प्रतिस्पर्धा हम नहीं कर सकते, जिसका प्रतिद्वंदी बनने योग्य भी हमारे भीतर सामर्थ्य नहीं है, लेकिन कम से कम इतना तो हो सकता है कि जिस शक्ति के प्रति वह समर्पित है, वैसा समर्पण अपने भीतर भी उसी शक्ति के प्रति ले आएँ। यहाँ तक ठीक है।
समर्पण ले लीजिए, पर अपनी कुल शक्ति को हटाकर नहीं
जिस सफल व्यक्ति से आप प्रेरित हैं, उसके देवता को अपनाने में गलती कहाँ है?
उनके देवता की पूजा शुरू करना ठीक है; गलती अपनी कुल शक्ति को हटाकर उनकी पूजा बैठा देना है। वक्ता इसकी तुलना उस बात से करते हैं कि जन्म देने वाले पिता को छोड़कर किसी और को पिता कहना शुरू कर देना — कोई पिता तुल्य हो सकता है, पर पिता के स्थान पर नहीं।
वक्ता इस प्रवृत्ति को स्वीकार करते हैं। किसी को अच्छा करते देखकर मन होता है कि यह जिसकी पूजा करता है, उसकी पूजा हम भी करें। यहाँ तक तो ठीक था। गलती आगे है — अपने कुल की शक्ति को हटाकर पूरी तरह उनकी पूजा शुरू कर देना। यही, वे कहते हैं, गलत कर देते हैं, और ब्रेनवाश इसी प्रकार से होता है। उनकी उपमा सेल्फ-हेल्प किताबों से आती है। रिच डैड पुअर डैड वाला काम मत कीजिए, वे कहते हैं — किताब में यह अच्छा लगता है, नेटवर्क मार्केटिंग वालों के लिए बहुत अच्छा विषय है, लेकिन इसे जीवन में मत उतारिए: पैदा करने वाले बाप को छोड़कर उसको बाप बोलना शुरू कर देना जो यह समझाता था कि पैसे कैसे बनाने हैं। अपना मत वे मत के रूप में ही रखते हैं — पिता पिता होते हैं, पिता एक ही होते हैं, दस पिता नहीं हो सकते। पिता तुल्य हो सकते हैं — गुरु पिता तुल्य हो सकते हैं, बड़े भाई पिता तुल्य हो सकते हैं — लेकिन माता के स्थान पर या पिता के स्थान पर आप उन्हें स्थान नहीं दे सकते।
गुरु की गद्दी से प्राप्त शक्ति, और वचनों से मुक्त होने के बाद क्या होता है
गुरु की गद्दी से मिली क्षमता साधक की अपनी मेहनत के बिना आ जाती है
गुरु की गद्दी से। जो अपने गुरु की गद्दी से शक्तियों को प्राप्त करता है, जिसके पास परंपरागत शक्ति होती है, उसे बिना विशेष कोई प्रयास किए वैसी क्षमता प्राप्त हो जाती है — वह गद्दी की क्षमता है, यानी सीधे कहिए तो भगवती की कृपा है, जो गुरु सेवा से मिली है, अपनी साधना से नहीं।
वक्ता विंध्य क्षेत्र के एक साधक का छोटा सा उदाहरण देते हैं, जिनके पास तंत्र के विषय में बहुत अच्छा सामर्थ्य है — और जो गिनकर तीन शक्तियाँ रखते हैं, तीन दाने की शक्ति, जो उन्हें गुरु परंपरा से प्राप्त है। और परंपरा भी अच्छी — भैरव घाटी की, अपना जो भैरव कुंड है वहाँ की परंपरा, जिनके पहले के प्रचंड साधक अब ब्रह्मलीन हो गए हैं, उन्हीं के वे शिष्य रहे हैं। ऐसा साधक करता क्या है, यह बताने से पहले वे यह समझाते हैं कि कथा-पुराण पढ़ना क्यों आवश्यक है — केवल तंत्र ही नहीं। हर एक विषय को जब जानिएगा तभी सफल हो पाइएगा। कथाओं में हमने सुना है कि जब सामर्थ्य आ जाती है तो पद बदल दिए जाते हैं, राक्षसों ने पदों को बदल दिया। वही क्रम यहाँ भी दिखता है। पीड़ित व्यक्ति पर होने वाले असर का वर्णन वे ऐसे करते हैं — वे इतने एश्योर रहते हैं कि यदि सामने वाला विषय सचमुच तंत्र का कोई प्रयोग है तो तत्क्षण वह प्रभाव डालेगा ही। आप एकदम फ्रेश हो जाइएगा, लगेगा कि यह तो कुछ है ही नहीं, हम एकदम ठीक हो गए — जबकि अभी तक आप सोच रहे थे कि ऐसा सामर्थ्य होता ही नहीं। यह आता कहाँ से है, यही इस प्रसंग की बात है। जो अपने गुरु की गद्दी से शक्तियों को प्राप्त करता है, जिसके पास परंपरागत शक्ति होती है, उसे बिना विशेष कोई प्रयास किए इसी प्रकार की क्षमता प्राप्त हो जाती है — यह गद्दी की क्षमता है; सीधे बोलिए कि वह भगवती की कृपा है। स्वयं मेहनत करना अलग बात है, और परंपरा की शक्ति प्राप्त कर लेना अलग। गुरु सेवा को वे मेहनत मानते ही हैं — इसीलिए तो गुरु की सेवा कही गई है, और आपके लगन, सम्मान और सेवा को देखकर ही गुरु ने वह प्रदान किया। चिंता उन्हें आगे की है। गुरु के जाने के बाद शिष्य लगभग वचनों से मुक्त हो जाता है — उन्होंने तो सब चीज से मुक्त कर दिया। और वहाँ से, जैसे ही कोई कार्य सिद्ध होता है और अगला व्यक्ति इंप्रेस होता है, क्रम शुरू हो जाता है।
दारू की धार से शुरू होकर स्थायी स्थापना तक पहुँचने वाला क्रम
कोई साधक अपने देवता को दूसरे के घर में कैसे पुजवा देता है?
क्रम से। कार्य सिद्ध हो गया और सामने वाला इंप्रेस हो गया; फिर उस देवता के नाम से घर के पास दारू की धार देना, पहले 11 दिन, फिर 21 दिन; और धीरे-धीरे उसी देवता को उसके घर में ही पुजवा देना — वह भी सदैव के लिए।
वक्ता एक क्रम का वर्णन करते हैं जो उन्होंने केवल एक साधक में नहीं, कई लोगों में देखा है। जैसे ही कार्य सिद्ध होता है और अगला व्यक्ति इंप्रेस होता है, अगला कदम यह होता है — ठीक है, अब तुम मेरे इस देवता के नाम से अपने घर के पास में दारू की धार देना। यहाँ तक भी ठीक था। पहले 11 दिन करवाते हैं, फिर 21 दिन। और फिर धीरे-धीरे उसी देवता को उसके घर में पुजवा देते हैं। वे बताते हैं कि कई लोग इससे आगे जाकर अपने ब्रह्म को दूसरों के घर में पुजवा देते हैं, इस वचन पर कि वह रक्षा करेगा। आपत्ति उन्हें मूल विधि पर नहीं है — वह सर्वविदित है और वे स्वयं मानते हैं कि यह किया जाता है। यदि सामने वाला व्यक्ति बहुत पीड़ित है, उस पर अभिचारिक स्थिति चल रही है और उसकी सुरक्षा करनी है, तो आप अपनी किसी सिद्ध शक्ति को कुछ समय के लिए उनके यहाँ स्थापित कर सकते हैं — सवा महीने के लिए, ढाई महीने के लिए, छह महीने, साल भर के लिए। साल भर बाद उनका विसर्जन होता है, और अवधि पहले से वचन में तय रहती है। व्यवहार में, वे कहते हैं, उतनी लंबी अवधि कोई देता भी नहीं; 11 दिन, 21 दिन मैक्सिमम होता है। उनके यहाँ सदैव के लिए कभी नहीं पुजवाया जाता। और जहाँ कोई शक्ति सदैव के लिए पूजित हो भी रही हो, वहाँ स्पष्ट किया जाता है — यह विधि है, इस तरीके से पूजना होगा, ऐसे तुमको ले जाना होगा, तुम्हारे घर में यह है, इनके साथ इनकी अनुकूलता बन रही है, चाहो तो तुम पूज लो — यदि वे स्वयं सामने से कहें। यह विषय बिल्कुल अलग है।
वह पूजा जो जिस घर में हो रही है उसी को खोखला करती है
चालाकी से बैठाई गई शक्ति जिस घर में पूजी जाती है उसी को खोखला करती है
आपसे कहा जाएगा कि दुर्गा चालीसा कीजिए, दुर्गा जी का स्तोत्र-सतनाम कीजिए, बगलामुखी स्तोत्र-सतनाम कीजिए — और उसके पीछे उसकी बैठाई हुई चीजें आपका पूरा घर खोखला करती रहेंगी। करेंगे आप, पाएगा वह। उसका सोर्स ऑफ एनर्जी आपके घर में बन चुका है।
वक्ता वैध अस्थायी स्थापना और तकनीकी खेल से करवाई गई स्थापना के बीच का अंतर रखते हैं। जहाँ कोई ऐसा गेम खेल-खेलकर अपनी शक्ति को आपके घर में पुजवाता है, वहाँ होता यह है — वह आपसे कहेगा कि आप दुर्गा चालीसा कीजिए, दुर्गा जी का स्तोत्र-सतनाम कीजिए, बगलामुखी स्तोत्र-सतनाम कीजिए; लेकिन उसके पीछे उसकी अपनी चीजें आपका पूरा घर खोखला करेंगी। उनका वाक्य सीधा है — करेंगे आप, पाएगा वह। इसी से वह चलेगा, और उसके सामर्थ्य में कोई कमी नहीं आएगी, क्योंकि उसके लिए वहाँ सोर्स ऑफ एनर्जी बन चुकी है — पुण्यों को प्राप्त करने के लिए, शक्तियों को प्राप्त करने के लिए, जितनी जगह पूजा जाएगा उतनी जगह। यही, वे कहते हैं, वह तरीका है जिससे लोग कहीं न कहीं अपनी कुल शक्ति के साथ गड़बड़ कर बैठते हैं। श्रोता के लिए निष्कर्ष व्यावहारिक है — यदि आप अपनी कुल शक्ति को जानते हैं और आपको जानकारी है, तो उनकी सेवा-पूजा में कभी कोई कमी मत कीजिए। उनको मत छोड़िए।
श्रावण में घर में उपस्थित हर प्रकार की शक्ति का पूजन होता है
कुल में बैठी हुई शक्ति जिस भी रूप में आई हो, कुल देवता के रूप में पूजित होती है
श्रावण के महीने में हर प्रकार की शक्तियों का पूजन होता है — चाहे योगिनी हों, डाकिनी हों, या आपके घर में भूत-प्रेत के रूप में कोई शक्ति पूजन के लिए बैठी हो। वक्ता कहते हैं कि जो आपके कुल देवी-देवता के रूप में, बाबा कहकर पूजित हैं, वे आपके लिए भूत-प्रेत रहेंगे नहीं; कुल में उनका पूजन होगा।
वक्ता इसे रियायत के रूप में नहीं, मास के सीधे परिणाम के रूप में रखते हैं। श्रावण के महीने में हर प्रकार की शक्तियों का पूजन होता है — चाहे वह योगिनी हो, डाकिनी हो, या आपके घर के भूत-प्रेत के रूप में कोई शक्ति पूजन के लिए बैठी हो। ऐसी शक्ति पर उनकी स्थिति भावुक नहीं है। जो आपके कुल देवी-देवता के रूप में, बाबा बोलकर पूजित हैं, वे आपके लिए भूत-प्रेत रहेंगे नहीं। सीधी सी बात है — कुल में उनका पूजन होगा। यहीं से वे उस गलती पर आते हैं जो लोग पूजन ठीक करते हुए भी कर बैठते हैं।
दूसरे कुल का प्रसाद क्यों ग्रहण नहीं किया जाता
क्या दूसरे के कुल देवता का प्रसाद खाना चाहिए?
नहीं। दूसरे के कुल देवी-देवता का प्रसाद ग्रहण नहीं करना चाहिए — और यदि ऐसा प्रसाद आपको मिल जाए तो उसे गौ माता को खिला दीजिए, जिनकी जठराग्नि में हर प्रकार के लाग को भक्षण करके पचा जाने की क्षमता मानी गई है।
वक्ता इसे उस गलती के रूप में उठाते हैं जो लोग पूजन ठीक करते हुए भी कर बैठते हैं — दूसरे के कुल देवी-देवता का प्रसाद मत खाया कीजिए। यदि आपके यहाँ यह नियम पहले से है और जानकारी में है, तब तो सही बात है; यदि जानकारी में नहीं है तो जानकारी में रखना चाहिए। लोग देते ही क्यों हैं, यह अलग विषय है, और वे स्वयं कहते हैं कि यह उन्हें भी समझ नहीं आता — देना क्यों है। देवता का प्रसाद यदि 11 लोगों में बाँटना है तो ऐसे लोगों को बाँटिए जिन्हें जरूरत है। और यदि प्रसाद के रूप में अन्न दे रहे हैं तो उसमें लाग (लाग) मत दीजिए; लोग जानबूझकर लाग देकर परेशान करते हैं, इन चीजों से बचना चाहिए। उपाय उनके पास एक ही है। गौ माता के भीतर वह क्षमता है कि वे हर प्रकार के लाग का भक्षण करके पचा जाती हैं — यह क्षमता उनकी जठराग्नि में है, बड़वाग्नि उनके पेट में विद्यमान रहती है। तो ऐसा कोई प्रसाद आपको मिले तो वह उन्हीं को खिलाना चाहिए।
प्रसाद और पूजन के अधिकार को लेकर घर के अपने नियम
सप्तमी का प्रसाद कौन खा सकता है, और पूजन कौन करेगा?
घर के लोग ही। जिस घर का नियम है कि बेटियाँ प्रसाद ग्रहण नहीं करेंगी या कुल देवता का स्पर्श नहीं करेंगी, या यह कि घर के पुरुष ही प्रसाद बनाएँगे, पूजन करेंगे और वही प्रसाद खाएँगे — वह नियम रखना चाहिए। आजकल के प्रवचन सुनकर उस नियम का अतिक्रमण मत करवाइए।
वक्ता दोनों बातों पर दृढ़ हैं। सप्तमी का प्रसाद — चाहे दूधिया खप्पर चढ़ता हो, चाहे आप किसी भी प्रकार से कुल देवी-देवता का पूजन करते हों — किसी को देना नहीं चाहिए; घर के लोग ही खाएँ। जहाँ घर का नियम है और वह जानकारी में है, वहाँ उसका पालन होना चाहिए। यदि नियम यह है कि घर की बेटियाँ प्रसाद ग्रहण नहीं करेंगी और कुल देवता का स्पर्श नहीं करेंगी — यह विषय, वे कहते हैं, विशेष करके मिथिलांचल क्षेत्र में बहुत लोगों के घर में रहता है — तो उस नियम का अतिक्रमण मत करवाइए। दबाव का नाम वे सीधे लेते हैं — आजकल के बाबाओं को सुनकर यह गलती मत करवाइएगा कि नहीं-नहीं, सब में तो भगवान कृष्ण हैं, सब में तो भगवती हैं, लो प्रसाद बना है, तुम भी पा लो। उनका जीवन मत बर्बाद कीजिए। नियम पूर्वजों ने बनाए हैं तो किसी कारण से बनाए होंगे; उस नियम की अवहेलना नहीं करनी है। यही बात वहाँ भी लागू है जहाँ श्रावण मास की वार्षिक सप्तमी पूजा में नियम यह है कि घर के जो लड़के हैं वही प्रसाद बनाएँगे, वही पूजन करेंगे और वही प्रसाद का भक्षण करेंगे, अधिकार केवल उन्हीं को है। तो वही होना चाहिए।
यह प्रश्न किसी चैनल से नहीं, अपने बड़े-बुजुर्गों से पूछा जाता है
यदि घर में पूजन करने के लिए कोई पुरुष उपस्थित ही न हो तो क्या करें?
यह अपने घर के बड़े-बुजुर्गों से पूछिए, उनसे नहीं। वे उत्तर देने से मना करते हैं क्योंकि एक गलत सजेशन आपकी जिंदगी तहस-नहस कर सकता है — वे यह भी नहीं कह सकते कि किसी ब्राह्मण को बुलाकर पूजन करवा लीजिए, क्योंकि वहाँ बाहर के हाथ का पूजन चढ़ेगा या नहीं यह उन्हें नहीं पता, और आपके देवता कौन हैं यह भी नहीं पता।
वक्ता इस प्रश्न का उत्तर जानबूझकर नहीं देते और मना करने का कारण विस्तार से रखते हैं। जहाँ किसी कारणवश घर में पुरुष वर्ग उपस्थित ही नहीं है और किसी स्त्री को पूजा करनी पड़े, वहाँ विकल्प क्या हो सकता है — इसकी चर्चा अपने घर के बड़े-बुजुर्गों से कीजिए कि कैसे होगा। वे साफ कहते हैं कि आप उनसे या किसी अन्य से भी पूछिएगा तो हो सकता है कि उनका गलत सजेशन आपकी जिंदगी का तहस-नहस कर दे। सामने पड़ा हुआ रास्ता भी वे नहीं देते — कि किसी ब्राह्मण को बुलाकर पूजन करवा लीजिए — क्योंकि बाहर के हाथ का पूजन वहाँ चढ़ेगा ही नहीं, ऐसा भी हो सकता है। आपके देवता कौन से हैं, आपके बड़े-बुजुर्ग उनके विषय में कितनी जानकारी रखते हैं, उसके लिए कोई आदेश है या नहीं, विकल्प क्या है, या पूजन बाद में — अगले महीने जब बड़े-बुजुर्ग आ जाएँ, पुरुष आ जाएँ तब — किया जाएगा; ये सब देखकर वहीं तय करना है। जोखिम न लेने का कारण वे जोड़ते हैं। यदि वे कह दें कि ठीक है, पड़ोसी से करवा लो, किसी पाटीदार से करवा लो, और बात बिगड़ गई तो फिर भुगतेगा कौन। ऐसा नहीं है कि वे बोलकर निकल गए; वह कनेक्शन रहता है और डाँट पड़ेगी कि जब तुम्हें जानकारी थी तो तुम बोले क्यों। सजेशन अपने बड़े-बुजुर्गों से लीजिए, वे कहते हैं, क्योंकि हर प्रकार की देव शक्ति के विषय में पूरी जानकारी बड़े-बुजुर्गों को ही अच्छे से होती है। अंत में वे उस बात की सराहना करते हैं जो बहुत लोग निभा लेते हैं — कई लोग सावन में कुल शक्ति के पूजन के लिए अपने घर-द्वार जाते हैं, यह अच्छा कार्य है। बस किसी से भी गलत सजेशन लेकर फँसने वाला कार्य मत कीजिए।
बाहर से बताई गई कुल शक्ति शायद ही कभी सटीक होती है
क्या कोई साधक दूसरे कुल की कुल शक्ति को ठीक-ठीक बता सकता है?
शत-प्रतिशत सटीक नहीं, और कारण ढाँचागत है — आपके घर में बैठी शक्ति आठ-दस पीढ़ी पुरानी और कहीं अधिक प्रचंड हो सकती है, जबकि जिनके पास आप गए हैं उनकी शक्ति उस स्तर की नहीं है। वह जानकारी वे ला ही नहीं सकते; उनमें वह सामर्थ्य नहीं है।
वक्ता यह क्यों चूकता है, इसका ढाँचा खोलते हैं, और भूमिका उन साधकों से बाँधते हैं जिनके पास शोधन की बहुत उच्च कोटि की क्षमता होती है — नाम वे बागेश्वर धाम वाले धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी का लेते हैं, जो पूरा विषय पर्चे पर लिख देते हैं, पूरा बता देते हैं। फिर भी, वे कहते हैं, यह सदैव स्मरण रखिएगा कि अपने कुल देवी-देवता के विषय में इस प्रकार की जानकारी यदि आप किसी से ले भी रहे हैं — नियर एंड डियर हों तो विषय अलग — तो यह सबके लिए शत-प्रतिशत सटीक आएगा, यह संभव नहीं है। मान लेते हैं कि आपके कुल में पूजित शक्ति ब्रह्म हैं, और मान लेते हैं कि आठ-दस पीढ़ी से वे पूजित हैं — प्रचंड शक्ति हैं। जिनके पास आप दिखाने-सुनाने गए हैं, उनके पास जो शक्ति है वह सामर्थ्यवान तो है, पर बहुत पुरानी नहीं, और उस स्तर की नहीं जिस स्तर की शक्ति आपके घर में बैठी है। बीच में वे एक सिद्धांत दोबारा स्पष्ट करते हैं ताकि गलत न पढ़ा जाए — शक्तियों की क्षमता सबके लिए बराबर होती है। हनुमान जी आपके लिए उतने ही बलशाली हैं जितने उनके लिए; भैरव जी का सामर्थ्य आपके लिए भी उतना ही है, उनके लिए भी उतना ही। अंतर इसमें है कि हम अपने जप, तप और नियमों से उन्हें प्रसन्न करके कितनी कृपा प्राप्त करते हैं — और उसी कृपा के अनुसार हमारे भीतर वह सामर्थ्य होता है कि हम किसी के विषय में क्या जान लें, उसी शक्ति के माध्यम से क्या सत्कार्य कर दें। तो दस पीढ़ी पुराने जो ब्रह्म आपके घर में हैं, उनके भीतर पूर्ण सामर्थ्य है — लेकिन आपने कभी पूर्ण क्षमता के साथ उनकी वैसी सेवा की ही नहीं। और यदि आप स्वतंत्र रूप से उनकी सेवा कीजिएगा तो वे वह सामर्थ्य देंगे भी नहीं, यह भी सत्य है। अकेले में वे बहुत लिमिटेड कृपा ही करेंगे, जब तक शिव कृपा न हो।
ब्रह्म शक्ति की प्रसन्नता शिव और बड़ी भवानी से होती है
ब्रह्म शक्ति पूर्ण कृपा करने से पहले क्या चाहती हैं?
दो से — बड़ी चंडिका, यानी भगवती माँ दुर्गा, जिन्हें भगतवाल में बड़ी भवानी कहा जाता है; और शिव। केवल सोमवार और अमावस्या का सात्विक पूजन देने से कृपा तो होगी, पर बहुत लिमिटेड कृपा — और आपको लगेगा कि बस इतना ही है।
वक्ता उन दो मार्गों के नाम लेते हैं जिनसे ब्रह्म शक्ति प्रसन्न होती हैं — एक बड़ी चंडिका, जो भगवती माँ दुर्गा हैं; और भगतवाल की भाषा में जाएँ तो बड़ी भवानी, जिसका अर्थ, वे कहते हैं, भगवती ही होता है। इसे वे सामने के मामले पर लगाते हैं। आपके कुल में दस पीढ़ी से, पंद्रह से, बीस से पूजित बहुत पुराने ब्रह्म — आप चाहते हैं कि उनकी कृपा प्राप्त हो, और आप स्वतंत्र रूप से उन्हें सोमवार का सात्विक पूजन देते हैं — खड़ाऊँ, जनेऊ, दूध की धार, खप्पर, भात, जो-जो चढ़ता है — और अमावस्या का देते हैं। वे कृपा करेंगे, लेकिन बहुत लिमिटेड कृपा। आपको उसमें आनंद नहीं आएगा; आप सोचेंगे कि यह तो बस इतना ही है, और उतना ही रहेगा। लेकिन यदि आपने पंचाक्षरी मंत्र का पच्चीस लाख या करोड़ों में जप कर लिया है और उसके बाद अपने कुल की शक्ति के लिए यह पूरी प्रक्रिया करते हैं, तो आपके लिए उनकी क्षमता जबरदस्त होगी। इस प्रसंग के साथ वे असामान्य रूप से जोर देकर चेतावनी जोड़ते हैं — मेरी बात से इंस्पायर होकर जाकर कर मत लेना। वे किसी को प्रोत्साहित नहीं कर रहे; केवल जानकारी मात्र दे रहे हैं, जो उनका निज अनुभव है। आपके यहाँ कौन हैं, कैसे हैं, यह उन्हें नहीं पता। जानकारी लीजिए, और किसी योग्य के साथ ही कीजिए।
बड़ी भवानी यानी जगदंबा — प्रचलित लोक वर्गीकरण के विरुद्ध
बड़ी भवानी कौन हैं?
बड़ी भवानी का अर्थ है जगदंबा — पूर्ण सामर्थ्य के साथ पूर्ण स्वरूप में विराजमान। वक्ता उस प्रचलित वर्गीकरण को नहीं मानते जिसमें मृत कुंवारी कन्या को भवानी, जलकर मरी सुहागन को सती, गर्भवती स्त्री की मृत्यु को कालिका और उसके गर्भस्थ शिशु को भैरव कहा जाता है।
वक्ता उस वर्गीकरण पर आपत्ति करते हैं जो भगतवाल शक्तियों की चर्चा करने वालों के बीच चलता है, और जिससे यह दावा निकला कि काली और भवानी अलग-अलग हैं और भवानी काली की सेविका होती हैं। वह योजना कहती क्या है, यह वे रखते हैं — जिस कुंवारी कन्या की मृत्यु हो गई हो उसे ये भवानी कहते हैं; सुहागन स्त्री यदि जलकर मरी हो तो उसे सती कहते हैं; गर्भवती स्त्री की मृत्यु हुई हो तो उसे कालिका कहते हैं; और गर्भ में जो बच्चा हो, यदि उसमें जीव पड़ गया हो और वह मसान शक्ति बन गया हो, तो उसे भैरव कह देते हैं। इस योजना पर, वे कहते हैं, भवानी कालिका की सेविका हो ही जाएँगी, क्योंकि एक पुत्री स्वरूप में हैं और दूसरी माता स्वरूप में। इसके सामने वे अपना अर्थ रखते हैं — भगवती का अर्थ, और बड़ी भवानी का अर्थ, वह जगदंबा हैं जो पूर्ण सामर्थ्य के साथ पूर्ण स्वरूप से विराजमान हैं। साथ में वे जोड़ते हैं कि भगवती की जो उच्च कोटि की योगिनियाँ हैं — विशेष करके जो त्रिनेत्र धारण करती हैं — वे किसी लोक शक्ति के समकक्ष होती ही नहीं। उनका लोक यहाँ से अलग रहता है और उनका सामर्थ्य लोक शक्तियों से कई करोड़ गुना अधिक होता है, यद्यपि वे बहुत न्यून क्षमता में होकर किसी के कुल में पृथ्वी लोक पर निवास करती हैं।
क्षेत्र का सबसे पुराना दुर्गा या चंडिका स्थल ही उस जगह की प्रचंडतम शक्ति रखता है
किसी क्षेत्र की सबसे प्रचंड शक्ति प्रायः कहाँ मिलती है?
उस क्षेत्र के सबसे पुराने दुर्गा पूजन स्थल पर — कोई पुराना दुर्गा मंदिर, चंडिका मंदिर या भगवती काली का मंदिर, विशेष करके जहाँ बलि चढ़ती हो या महिषासुर मर्दिनी का पूजन होता हो, कम से कम पचास-सौ साल पुराना। उस स्थान की सबसे प्रचंडतम शक्ति वहीं अवश्य विद्यमान होती है।
वक्ता किसी भी क्षेत्र की प्रमुख शक्ति को खोजने का नियम देते हैं। प्रत्येक क्षेत्र में जो सबसे पुराना दुर्गा पूजन का स्थल होता है — कोई पुराना दुर्गा मंदिर, या चंडिका मंदिर, या भगवती काली का मंदिर, और विशेष करके जहाँ बलि चढ़ रही हो या महिषासुर मर्दिनी का पूजन हो रहा हो, कम से कम पचास-सौ साल पुराना — वहीं उस स्थान की सबसे प्रचंडतम शक्ति के रूप में वह शक्ति अवश्य विद्यमान होती है। योगिनियों की स्थिति वे मोक्ष के प्रकारों से समझाते हैं — ये वे शक्तियाँ हैं जिन्होंने सायुज्य पद प्राप्त किया है, या सारूप्य — अपने इष्ट-आराध्य के स्वरूप की प्राप्ति कर चुकी हैं, उन्हीं का स्वरूप धारण करके, इसलिए वह वर्चस्व उनको प्राप्त है। मृत्यु लोक पर रहते हुए भी वे साक्षात उन्हीं की शक्ति को धारण करने वाली होती हैं। इतना सामर्थ्य धारण करने वाली शक्ति को ही, वे कहते हैं, बड़ी भवानी कहा जाता है। ऐसे लोकों का परिमाण वे पुराणों से दिखाते हैं — शंखचूर्ण वाली कथा में शिव जी के दिव्य महामहेश्वर लोक का वर्णन है, जहाँ भगवान शिव तक पहुँचने के लिए पंद्रह द्वार पार करने पड़े, और उन द्वारों पर स्थित द्वारपाल साक्षात शिव स्वरूप हैं — पंचानन स्वरूप में पाँच मुख, दस भुजाएँ, सब में त्रिनेत्र, जटा, शीश पर गंगा, चंद्रमा।
जिनसे आप पूछने जाते हैं, उनमें सामर्थ्य, विनम्रता और द्वेष
जिनसे आप पूछने जाते हैं उनमें या तो सामर्थ्य नहीं होता, या विनम्रता नहीं होती
या तो वह बता नहीं सकता — उसकी शक्ति सौ साल पुरानी है और आपके घर की दस पीढ़ी पुरानी — या वह बताएगा नहीं: घुमा देगा, आधी-अधूरी या गलत जानकारी देगा। बताएगा तभी जब वह आपका कल्याण चाहता हो, बात बराबरी की हो, और वह विनम्र हो।
वक्ता उस पूछताछ पर दूसरी बार लौटते हैं, और अब शक्ति की नहीं, पूछे जाने वाले व्यक्ति की बात करते हैं। पहले ढाँचे वाला आधा हिस्सा वे दोहराते हैं। अपने कुल के ब्रह्म की सेवा आपने कभी पूर्ण क्षमता से की नहीं; शिव जी की और भगवती चंडिका की पूजा करके वैसा सामर्थ्य आपने प्राप्त ही नहीं किया जिससे वे ब्रह्म आपके ऊपर पूर्ण कृपा करें — और आप चाहते हैं कि स्वतंत्र रूप से ब्रह्म की सिद्धि कर लें, वह भी दस, पंद्रह, बीस पीढ़ी पुराने ब्रह्म की। अब जिनके पास आप गए हैं, वे स्वयं शायद सौ साल पहले की शक्ति को पूज रहे होंगे, और उन्हें आपके घर जाकर इतने पुराने कुल ब्रह्म के विषय में जानकारी लानी है। आपको क्या लगता है, वे शत-प्रतिशत बता देंगे? वे बता ही नहीं पाएँगे। जानकारी देंगे ही नहीं; उनमें वह सामर्थ्य भी नहीं है। फिर वह आधा हिस्सा जो चरित्र का है। हाँ — यदि वे चाहते हैं कि तुम्हारा कल्याण हो जाए, और वे योग्य हैं, शक्तिज्ञ हैं, बताने लायक हैं; बराबरी की बात होगी तो बताएँगे; विनम्र होंगे तो बताएँगे। लेकिन जो जानकारी वास्तव में जिस प्रकार ली जाती है, वह पूरी नहीं बताएँगे — घुमा देंगे। ऐसी जानकारी देंगे जो आधी-अधूरी होगी, गलत होगी। और इसके लिए, वक्ता कहते हैं, आप उन्हें दोष नहीं दे सकते — आपने गलत जगह से इंफॉर्मेशन लिया, या आपको ऐसे लेना ही नहीं चाहिए था। एक स्थिति को वे भरोसेमंद मानते हैं। जहाँ व्यक्ति केवल शिव जी की, हनुमान जी की, राधे-कृष्ण की खूब पूजा कर रहा है, भक्ति भाव से कर रहा है, और साथ में जानना चाहता है कि ये किस प्रकार के हैं, कैसे क्या किया जाए कि ये प्रसन्न हो जाएँ — वहाँ वे आपके सद्गुणों से पहले से प्रभावित हो चुके हैं, पहले से प्रसन्न हैं, भले आपको लग रहा हो कि नहीं हैं। तब आप किसी ऐसे के पास जाइए जिसके पास सामर्थ्य हो, भले वह कैसी भी निकृष्ट शक्ति की पूजा करता हो — क्योंकि इन देवताओं को अपने कुल का कल्याण करना है; उस समय वह जबरदस्त, एकदम पूरा दिखा देगा, अगला बता देगा, और आपका रास्ता खुल जाएगा। जोखिम का नाम वे अंत में लेते हैं। यदि अगला गड़बड़ कर दे तो भोगेगा वह — लेकिन वह इंफॉर्मेशन लेने के बाद आपका बिगाड़ भी सकता है, क्योंकि वहाँ भी ईर्ष्या-द्वेष काम करता है; द्वेष, वे कहते हैं, घर-घर में और सब लोगों के बीच भरा पड़ा है। जब पूरी की पूरी जानकारी प्राप्त हो जाती है और सामने आता है कि इसके घर में इतनी प्रचंड शक्ति है, तो तुरंत लोभ हो जाता है कि कैसे भी इसे मना करवा कर ले लिया जाए। इस पर उन्होंने वीडियो भी बनाकर डाले हैं।
कुल की शक्ति को जब्त करना, और उसके बाद का बाँस
यदि कोई साधक दूसरे कुल की शक्ति को जब्त करने का प्रयास करे तो क्या होता है?
जब्त की गई शक्तियाँ आपके मंत्र बल का मान रखकर आ भी सकती हैं — लेकिन हाथ वे अपनी बड़ी शक्ति के सामने ही जोड़ेंगी, और बाँस वहीं से होगा। उस समय आपकी जब्त की हुई और अर्जित की हुई सारी शक्ति वहीं जब्त हो जाती है।
वक्ता इस स्थिति को स्वयं को ही दोषी मानकर चलाते हैं, और उदाहरण के लिए एक परिचित का नाम लेते हैं जिनकी कुलदेवी भगवती रेणुका हैं — यह स्पष्ट करते हुए कि यह उदाहरण है, कोई किया हुआ कार्य नहीं। मान लेते हैं उन्हें जानकारी मिलती है कि उनके घर में बड़ी प्रचंड शक्ति है। वे स्वयं दुर्गा जी, काली जी और शिव जी का करोड़ों में जप करके पहले से बैठे हुए हैं। अब मान लीजिए वे अपने मंत्र बल और तपो बल से उस घर में उपस्थित अंशात्मक योगिनी शक्तियों को घेर-घार कर अपने यहाँ शामिल कर लें। हो सकता है वे आ भी जाएँ, वे कहते हैं, उनके मंत्र बल और तपो बल का मान रखकर। लेकिन हाथ वे कहाँ जोड़ेंगी? सीधे रेणुका आई के पास — जो भगवान परशुराम जी की माता हैं, जो भगवती प्रचंड चंडिका की महायोगिनी हैं। और जब वहाँ से बाँस होगा तो बचाने कौन आएगा? जब वज्र वैरोचनी चलेंगी तो फिर कौन बचाएगा? उस समय जितनी जब्त की गई शक्ति होगी और जितनी अर्जित की गई, सब वहीं जब्त हो जाएगी। उसके बाद, वे कहते हैं, जाइए घूमते रहिए, बकरा कटवाते रहिए, छोड़ दो मैया-छोड़ दो मैया करते रहिए। पुराणों से समानांतर वे जोड़ते हैं — इंद्र के पद को हथियाने का, जब्त करने का काम असुरों ने किया, और उसका बाँस बाद में किसने किया; इंद्र ने स्वयं नहीं, इंद्र ने जा-जाकर करवाया। ऐसी कोई प्रक्रिया चल रही हो तो उस समय चुप रहना चाहिए, क्योंकि यह जिनका विषय है वे समझेंगे; यह मनुष्य का विषय नहीं है। बाँस में देरी क्यों होती है, यह भी वे बताते हैं — अगले का भी तो अपना पुण्य होगा। उदाहरण उनका यह है कि भद्रकाली, जो एक हजार भुजाओं के साथ प्रकट हुई थीं और उन्हीं से युद्ध किया था, उन्होंने शंखचूर्ण का वध स्वयं नहीं किया; क्योंकि वरदान था कि वध केवल शिव जी ही करेंगे और कृष्ण जी पहले ही कह चुके थे कि मेरे आराध्य के द्वारा ही इसका वध होना चाहिए — ऐसा नहीं कि भद्रकाली के सम्मुख ठहरने की क्षमता थी।
बड़े साधक का घर भी क्यों गिर सकता है
बड़े-बड़े चंडी पाठ करने वाले साधकों के घर में दुर्भिक्ष क्यों पड़ जाता है?
क्योंकि दुर्भिक्ष आप केवल सामने से देख रहे हैं। जो आप नहीं देख रहे वह यह है कि सामर्थ्य की प्राप्ति के बाद कौन सा दुष्कर्म किया गया — शक्तियों का दोहन, शक्ति के साथ आने वाली मदोन्मत्तता, और उसके पीछे-पीछे जाता हुआ संतुलन।
वक्ता उस आपत्ति का उत्तर देते हैं जो लोग उन्हें लिखकर भेजते हैं — देखिए, बड़े-बड़े चंडी पाठ करने वाले साधकों के घर में दुर्भिक्ष पड़ जाते हैं। उनका उत्तर यह है कि वैसे कारण बनते हैं, लेकिन आप केवल दिखने वाला आधा हिस्सा देख रहे हैं। सामर्थ्य की प्राप्ति के बाद कौन सा दुष्कर्म किया गया, वह आप नहीं देख रहे। प्रक्रिया वे बताते हैं। व्यक्ति बहुत पुण्य अर्जित कर सकता है — दुर्गा सप्तशती का बहुत पाठ किया, अपनी कुलदेवी शक्तियों का पूजन-पाठ किया, सब कुछ किया — और उसके बाद उतना ही शक्तियों का दोहन भी किया, लोगों की भलाई के नाम पर जितना हो सका उतना लूटा। एक दुष्कृत्य का नाम वे सीधे लेते हैं। मंत्र क्षमता प्राप्त करने के पश्चात, किसी शक्ति को प्राप्त करने के पश्चात, तंत्र काट के नाम पर यह जो कहानी चलती है जिसमें लोग कहते हैं कि आप अपनी नाभि का फोटो भेजिए, इस-इस चीज का फोटो भेजिए — यह कहाँ होता है? यदि सचमुच वैसा विषय है, वैसी दिक्कत है और आप देख रहे हो, तो पुरुषों का भी देखो; पुरुषों का तो नहीं माँगते हो तुम लोग, स्त्रियों का सब माँग लेते हो। यदि कारण उस प्रकार से बन रहा है तो सबका बन रहा होगा ना। भगवती ने साक्षात यह बोल दिया है कि वह आपके लिए पुत्री के समान हुई और आपने ऐसा किया, बहन के समान हुई और आपने ऐसा किया, तब तो आप भुगतोगे ही। दूसरी स्थिति वे पूरी तरह स्वीकार करते हैं — यदि यथार्थ में आपके पास सामर्थ्य है और यथार्थ में उस विषय को जानने के लिए आप ऐसा कुछ कर भी रहे हैं, तब कोई दोष नहीं, तब विषय अलग है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है? लोगों को व्यक्ति की बात, उसका ज्ञान, उसकी क्षमता — सब देखनी चाहिए कि वह किस स्तर पर वह कार्य कर रहा है। लूट से आगे की समस्या वे बड़ी मानते हैं — जहाँ शक्ति आती है वहाँ मदोन्मत्तता आ ही जाती है। शक्ति आकर विक्षुब्धता उत्पन्न कर देती है; संतुलन चला जाता है। आप देखिएगा, कई लोगों का संतुलन हिल जाता है। सामर्थ्य की प्राप्ति होती है और फिर व्यक्ति किसी को कुछ नहीं समझता, जितना चाहे उतना बिगाड़ता है — शिष्यों का बिगाड़ेगा, अपने गोतिया लोगों का बिगाड़ेगा, अड़ोसी-पड़ोसी का बिगाड़ेगा; कुछ बोले तो सीधे तुम पर प्रयोग कर देगा। कुछ भी संतुलन में नहीं रहेगा। और जब संतुलन नहीं रहेगा तो भुगतना भी पड़ेगा।
संपर्क कम कीजिए, और किसी की गाली पर तपोबल कभी खर्च मत कीजिए
जिस साधक को सामर्थ्य प्राप्त हो गया हो, उसे समाज में कैसे रहना चाहिए?
समाज के संपर्क में कम से कम आइए, मित्रता कम रखिए, और अटैचमेंट मत रखिए। कोई गाली दे तो दो गाली दे दीजिए — लेकिन उसके ऊपर अपने तपोबल का प्रयोग कभी मत कीजिए। चार बात सुनाकर चले आइए; हाथ में जल लेकर बैठकर शाप मत दीजिए।
वक्ता बताते हैं कि यह सलाह किस कारण से दी जाती है। जब आप साधना कर रहे हैं, या साधना करके अब आपको बहुत अधिक क्षमता प्राप्त हो चुकी है, तो कम से कम संपर्क में आइए — समाज के संपर्क में कम से कम आइए, मित्रता कम हो, लोगों से कम मिलिए। और यदि मिलते भी हैं तो अटैचमेंट मत रखिए। उकसावे पर वे साधारण स्तर पर जानबूझकर ढील देते हैं और दूसरे स्तर पर पूरी तरह सख्त हैं। कोई आपको गाली दे — ठीक है बाबू। आप भले उसे दो गाली दे दीजिए, लेकिन उसके ऊपर कभी भी अपने तपोबल का प्रयोग मत कीजिए। चार बात सुना दीजिए; हृदय से नहीं, बस फ्रस्ट्रेशन निकालना है इसलिए — क्योंकि क्रोध को नियंत्रित करने की क्षमता है नहीं। वह दो और चार गाली आपको दे देगा; मुँह बनाकर चले आइए, और क्या करेंगे उससे ज्यादा। जो नहीं करना है वह यह है कि हाथ में जल लेकर बैठ जाइए कि इतने दिन तक जो 11 सप्तशती पाठ किए हैं, उससे मैं तुम्हें शाप देता हूँ — और संकल्प ले लिया। शाप और वरदान, दोनों संकल्प ही होते हैं, वे कहते हैं; जो तपोबल आपके पास है वही जाता है, वही खर्च होता है। शाप देकर आप वहाँ अपनी क्षमता को ही समाप्त कर रहे हैं।
वह एक स्थिति जहाँ शाप का संकल्प उचित है
क्या कोई ऐसी स्थिति भी है जहाँ साधक को शाप देना चाहिए?
जहाँ सचमुच कोई दुष्कृत हो गया हो — वे विदेश में एक बच्ची के साथ हुई घटना का उल्लेख करते हैं — और कोई और मार्ग न बचे, तब देना चाहिए। एक लाख जप का संकल्प करके भगवती से प्रार्थना कीजिए कि उस व्यक्ति को शीघ्र अति शीघ्र उचित दंड मिले। किसी का अहित करने के लिए इसका प्रयोग किया तो वही आप पर लौटेगा।
वक्ता यहाँ एक ऐसे प्रकरण से पहुँचते हैं जिसमें उन्होंने सार्वजनिक रूप से सहायता की पेशकश की थी — विदेश में एक छोटी सी बच्ची के साथ कुछ गलत हुआ था — और उन्होंने कहा था कि यदि यह बात सच है और वहाँ की पुलिस सहायता नहीं कर पाती, तो वे यूट्यूब चैनल के माध्यम से और जो लोग उस जगह रहते होंगे उनसे जानकारी लेकर, जितना हो सकेगा फ्रंट फुट पर खेलकर सहायता करेंगे, क्योंकि यह बच्ची की बात है। बाद में अगला व्यक्ति स्वयं ही आगे-पीछे होने लगा, इसलिए वे उसमें नहीं पड़े। लेकिन इसी प्रकरण से वे अपवाद रखते हैं। यदि इस प्रकार का कोई दुष्कृत सचमुच किसी के साथ हो जाता है — किसी बच्ची के साथ, किसी अन्य के साथ भी — और आप यह जानकर कि सत्य में ऐसा हुआ है, क्रोध से भर जाते हैं, तो क्या करना चाहिए? तब तो शाप देना ही चाहिए। कोई और मार्ग नहीं है तो यह मार्ग निकालना ही पड़ेगा, ताकि उसे उचित दंड मिले। विधि वे बताते हैं — उसे अपने कर्म का दंड मिलेगा या नहीं, यह अलग; यदि आपके पास क्षमता है तो शाप दीजिए। एक पाठ का दे दीजिए, दस पाठ का दे दीजिए, या जो जप आपने किया है उसमें से एक लाख का संकल्प करके दे दीजिए — कि एक लाख दुर्गा मंत्र जप का संकल्प करके हम यह प्रार्थना करते हैं कि भगवती फलाने व्यक्ति को इस प्रकार का दंड शीघ्र अति शीघ्र प्रदान करें। सीमा उसी साँस में रखी जाती है — यदि आप किसी का अहित करने के लिए इन चीजों का प्रयोग करते हैं, तो आगे आपका अहित होता है। इसी से, वे कहते हैं, यह भी बनता है कि फलाना व्यक्ति दुर्गा साधक था, उसके कुल में दुर्गा साधक थे, और अब वह भुगत रहा है।
अपनी तिथि पता हो तो वही, नहीं तो श्रावण शुक्ल पक्ष की सप्तमी
कुलदेवी का पूजन किस दिन करना चाहिए?
यदि आपको अपने कुल की तिथि पता है तो विषय बहुत अच्छा है — उसी तिथि को कीजिए। यदि नहीं पता है तो श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन अपनी कुल शक्ति का पूजन कीजिए — आप यह वीडियो किसी भी साल सुन रहे हों।
वक्ता दोनों स्थितियों को साफ अलग करते हैं। जिन्हें अपने कुल देवी-देवता की जानकारी है और तिथि भी पता है कि इस तिथि को उनका पूजन होता है, उनके लिए विषय बहुत अच्छा है — उसी तिथि को कीजिए। बाकी सबके लिए दिन श्रावण की सप्तमी है। वे बताते हैं कि रिकॉर्डिंग वाले वर्ष में यह रविवार को पड़ रही है, लेकिन तुरंत इसे सामान्य कर देते हैं — श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन, आप जिस भी साल यह सुन रहे हों, अपनी कुल शक्ति की पूजा कीजिए। अंत के प्रश्नोत्तर में वे इसी बात पर लौटते हैं — जिस घर में कुलदेवी का पूजन सदैव पूर्णिमा को होता आया है, वह घर पूर्णिमा को ही करेगा और सप्तमी के दिन सामान्य पूजन कर लेगा। जिन्हें अपनी तिथि पता है वे उसी पर रहें; जिन्हें नहीं पता वे सब सप्तमी को करेंगे — इसीलिए तो इस सप्तमी को कुलदेवी सप्तमी कहते हैं।
शिव-गौरी और नजदीक का शक्तिपीठ, कुल शक्ति के नाम से
यदि पता ही न हो कि कुल देवी-देवता कौन हैं तो किसका पूजन करें?
शिव-गौरी की पूजा कर लीजिए, और सबसे नजदीक का जो शक्ति पीठ है उसकी पूजा कुल शक्ति के नाम से कर लीजिए — और प्रार्थना कर दीजिए कि भगवती, जो भी हमारी कुल शक्ति हों, उन्हें यह पूजा प्राप्त हो जाए।
वक्ता विकल्प सीधे देते हैं। यदि आपको जानकारी नहीं है कि कुल के देवता कौन हैं, कुल की देवी कौन हैं, तो शिव-गौरी की पूजा कर लीजिए। उसके साथ, सबसे नजदीक का जो शक्ति पीठ है उनकी पूजा कुल शक्ति के नाम से कर लीजिए — और प्रार्थना स्पष्ट रूप से कर दीजिए कि जो भी हमारी कुल शक्ति हों, उन्हें यह पूजा प्राप्त हो जाए। इसी को वे आगे एक क्षेत्रीय उदाहरण के साथ विस्तार से खोलते हैं, और अंत के प्रश्नोत्तर में अलग-अलग राज्यों के श्रोताओं के लिए इसी पर लौटते हैं।
कुलदेवी के लिए सोलह शृंगार, कुल भैरव के लिए धोती-गमछा
वार्षिक पूजन में कुलदेवी और कुल भैरव को क्या-क्या चढ़ाना चाहिए?
कुलदेवी के लिए सोलह शृंगार, जो आपसे बन पड़े — साड़ी, साया, ब्लाउज का कपड़ा, चूड़ी, सिंदूर, मेहंदी — कम पैसे में ला रहे हों तब भी क्वालिटी में कंप्रोमाइज किए बिना। कुल भैरव के लिए धोती-गमछा — लाल, पीला या गुलाबी, जैसा आपका मन भाए।
वक्ता इसे सीधा हिस्सा मानते हैं — वार्षिक पूजन है, तो अर्पण उसी के अनुसार होगा। कुलदेवी के लिए सबसे पहले सोलह शृंगार, जो आपसे बन पड़े — साड़ी, साया, ब्लाउज का कपड़ा, चूड़ी, सिंदूर, मेहंदी, पूरा सामान, अच्छा-अच्छा। शर्त उनकी दाम पर नहीं, क्वालिटी पर है — कम पैसे के भी ला रहे हैं तो क्वालिटी में कंप्रोमाइज किए बिना लाइए। बढ़िया सामग्री लाएँ। कुल भैरव के लिए धोती-गमछा। लाल लीजिए, पीला लीजिए, गुलाबी लीजिए, जैसा आपका मन भाए — यदि आपको नहीं पता है तो उसी अनुसार कर लीजिए।
अज्ञात कुल देवी-देवता के स्थान पर बाबा वैद्यनाथ और जय दुर्गा
देवघर क्षेत्र का घर अपने अज्ञात कुल देवी-देवता के स्थान पर बाबा वैद्यनाथ को भैरव और भगवती जय दुर्गा को शक्ति मान सकता है
वहाँ के भैरव बाबा वैद्यनाथ हैं और शक्तिपीठ भगवती जय दुर्गा का है, जहाँ भगवती का हृदय गिरा माना जाता है — इन्हीं को कुल शक्ति मानकर पूजन कर लीजिए। भगवती के लिए गुलाबी, लाल या पीले वस्त्र के साथ शृंगार, शिव जी के लिए पीला वस्त्र, और दोनों जगह खीर-पूरी का नैवेद्य।
वक्ता विकल्प वाली प्रक्रिया को एक ठोस उदाहरण से चलाते हैं — मान लेते हैं कि आप झारखंड क्षेत्र में, देवघर के बाबा बैजनाथ धाम के पास रहने वाले हैं, जहाँ भगवान ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं। यदि आपको अपने कुल देवी-देवता के विषय में जानकारी नहीं है, तो वहाँ के भैरव बाबा वैद्यनाथ हैं, और वहाँ शक्तिपीठ है भगवती जय दुर्गा का, जहाँ माना जाता है कि भगवती का हृदय गिरा है। इसी कारण से, वे कहते हैं, भगवान ने अपने आत्मलिंग को रावण के माध्यम से वहाँ स्थापित करवाया — साक्षात उनकी आत्मा वहाँ स्थापित है, देवघर में। तो इन्हीं को कुल शक्ति मानकर पूजन कर लीजिए। भगवती जय दुर्गा के लिए गुलाबी, लाल या पीले रंग के वस्त्र का प्रबंध कीजिए, उसी के अनुसार शृंगार — चुनरी, चूड़ी, बिंदी, सब सुंदर-सुंदर। शिव जी के लिए, बाबा वैद्यनाथ के लिए पीला वस्त्र आदि लाइए और समर्पित कीजिए — यह सब घर पर ही। खीर-पूरी बन जाए तो अति उत्तम। खीर-पूरी बनाइए, दोनों जगह पूरा नैवेद्य लगाइए, अर्पित कीजिए, और उसके साथ पंचबली अवश्य कीजिए। उस क्षेत्र की सुविधा वे बताते हैं — शक्तिपीठ और ज्योतिर्लिंग में दस कदम की भी दूरी नहीं है; उसी प्रांगण के अंदर ज्योतिर्लिंग है और उसी प्रांगण में भगवती शक्तिपीठ के रूप में विराजमान हैं। दोनों का गठबंधन है, दोनों एक ही जगह विराजमान हैं — तो इनका पूजन कर लिया, सबकी कृपा प्राप्त हो गई।
पाँच जीवों को अन्न, ताकि कुल के पितृ और देवता भी तृप्त हों
कुलदेवी पूजन में पंचबली क्या है, और वह क्यों की जाती है?
पाँच प्रकार के जीवों को अन्न का दान — चींटी, गाय, कौवा, कुत्ता, और कोई एक व्यक्ति, यानी किसी भूखे को खिला दीजिए। उनके माध्यम से कुल के पितृ भी तृप्त होंगे और देवता भी तृप्त होंगे।
वक्ता शब्द का अर्थ और उसका प्रयोजन एक साथ रखते हैं। पंचबली का अर्थ हुआ पाँच प्रकार के जीवों को अन्न का दान। उनके माध्यम से कुल के पितृ भी तृप्त होंगे, देवता भी तृप्त होंगे। पाँच नाम वे गिनाते हैं — चींटियों को दीजिए, गाय को दीजिए, कौवे को दीजिए, कुत्ते को दीजिए, और किसी व्यक्ति को दे दीजिए, किसी भूखे को खिला दीजिए। इसे वे सप्तमी के पूजन का सबसे सामान्य हिस्सा मानते हैं, और सामर्थ्य के हर स्तर पर दिए गए उनके निर्देशों में यह आता है।
नजदीक के ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ के नाम से आहुति
यदि कुल देवता का पता न हो तो हवन किसके नाम से करें?
भवानी शंकर के नाम से और नजदीक के शक्तिपीठ के नाम से — दोनों की 108-108 आहुति। यज्ञोपवीत धारण करते हैं तो प्रणव के साथ कीजिए; स्त्री हैं और करने वाला कोई पुरुष नहीं है तो देवी प्रणव के साथ — "ह्रीं वैद्यनाथाय स्वाहा", "ह्रीं जय दुर्गायै स्वाहा"।
वक्ता उस स्थिति का हवन बताते हैं जहाँ कुल देवता का पता नहीं है — आहुति इन्हीं विकल्पों को दी जाएगी: भवानी शंकर को, और नजदीक के शक्तिपीठ को। देवघर वाले उदाहरण में रूप है 'श्री वैद्यनाथाय स्वाहा', 108 आहुति के साथ। यदि आप यज्ञोपवीत धारण करते हैं तो प्रणव के साथ कीजिए। यदि आप स्त्री हैं और करने वाला कोई पुरुष नहीं है, तो देवी प्रणव के साथ — 'ह्रीं वैद्यनाथाय स्वाहा', 'ह्रीं जय दुर्गायै स्वाहा' — दोनों की 108-108 आहुति। सामग्री का विभाजन वे वही रखते हैं जो अन्यत्र भी रखते हैं — स्त्रियाँ गूगल ज्यादा रखेंगी, घी कम; पुरुष घी ज्यादा रखेंगे, गूगल कम, और तिल मिलाएँगे; स्त्रियाँ भी तिल मिलाकर इसी प्रकार आहुति करेंगी। यह विकल्प वाला पूजन आगे किस ओर ले जाता है और उसमें समय कितना लगता है, यह भी वे बताते हैं। इस नियम को सदैव बनाकर रखिए, इनका स्मरण सदैव रहे। जैसे-जैसे आप साधना की क्षमता बढ़ाते जाएँगे — पंचाक्षरी मंत्र पाँच लाख किया, दस लाख किया, बढ़ाते गए — स्वप्न आदि में दर्शन होना शुरू होता है, आभास होना शुरू होता है, कुलदेवी के स्वरूप के विषय में जानकारी मिलने लगती है; आप संकल्प ले-लेकर कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं कि हमको बता दीजिए। सही से करेंगे तो तीन साल लगते हैं, वे कहते हैं — और तीन साल कोई करता ही नहीं, इसलिए होता भी नहीं। जहाँ हवन आदि कर्म भी हो रहे हैं, वहाँ क्षमता इतनी बढ़ जाती है कि वे कृपा करके स्वरूप का भेद दिखा देती हैं कि इस स्वरूप से कुलदेवी की पूजा करो। और यदि न भी दिखाएँ, तो इन महाशक्तियों की पूजा, तर्पण और पूजन करते रहने से इन्हीं के माध्यम से आपकी कुल की शक्ति तृप्त होती रहेंगी — इसलिए इनका पूजन अवश्य कीजिए।
हवन की लकड़ी, और आम की लकड़ी का निषेध
इस हवन में कौन सी लकड़ी चलेगी और कौन सी नहीं?
आम की लकड़ी का प्रयोग नहीं करना है। नवग्रह लकड़ी का प्रयोग कीजिए, बेल की लकड़ी का कीजिए, या साल के वृक्ष की लकड़ी — जो सुगंधित होती है और बहुत अच्छे से जलती है — और गाय के गोबर के उपले। समिधा में बेल सबसे उत्तम है, और अंत में पूर्णाहुति कर लीजिए।
वक्ता पहले निषेध बताते हैं — इसमें आम की लकड़ी का प्रयोग नहीं करना है। सत्र में आगे भी वे इसे दोहराते हैं कि जो भी रखें, आम की लकड़ी मत रखिएगा। इसके बदले क्या — नवग्रह लकड़ी, बेल की लकड़ी, और साल के वृक्ष की लकड़ी, जो सुगंधित होती है और बहुत अच्छे से जलती है। इन्हीं के ऊपर आहुति दीजिए, और गाय के गोबर के उपले का प्रयोग कीजिए। जहाँ वे वरीयता बताते हैं, वहाँ समिधा के लिए बेल की लकड़ी उत्तम है। उसके बाद पूर्णाहुति कर लीजिए, और इस प्रकार सप्तमी का पूजन पूरा हो जाता है।
तंत्रोक्त देवी सूक्तम, और खीर में मिला हुआ गौ घृत
हवन में कुल शक्ति सबसे अधिक किससे प्रसन्न होती हैं?
तंत्रोक्त देवी सूक्तम से आहुति देने से — आपकी कुलदेवी कोई भी हों — और आहुति की खीर में गौ घृत मिला देने से। वक्ता कहते हैं कि कुल शक्ति इतनी प्रसन्न होती हैं कि पूरा वात्सल्य लौटाती हैं।
पूरी प्रक्रिया में सबसे प्रभावी हिस्सा वक्ता इसी को बताते हैं। आरंभिक आहुतियों के बाद, आपकी कुलदेवी कोई भी हों, तंत्रोक्त देवी सूक्तम से आहुति दीजिए — वे अति तृप्त होंगी। और यदि खीर में घी मिला देते हैं — गौ घृत मिलाकर आहुति करते हैं — तो कुल शक्ति आपके ऊपर इतनी प्रसन्न होती हैं, वे कहते हैं, कि पूरा वात्सल्य लौटाती हैं। कारण उनका यह है कि यहाँ दो दैविक शक्तियाँ एक साथ तृप्त हो रही हैं — तंत्रोक्त देवी सूक्तम ऐसे ही प्रचंड है, और ऊपर से आप खीर में गौ घृत मिलाकर उससे हवन कर रहे हैं। स्त्री-पुरुष सभी यह कर सकते हैं; जो भी चाहे गौ घृत मिली खीर से सारी आहुति दे सकता है। जो देवी सूक्तम नहीं कर सकते, उनके लिए विकल्प वे साथ ही रखते हैं — मत कीजिए, कोई दिक्कत नहीं; आपको नहीं आता है तो मत कीजिए। उसकी जगह 108 नामों से, उसी रूप में जो ऊपर बताया गया, आहुति दीजिए।
हर हवन में क्षेत्र की इष्टात्री शक्ति का नाम
हवन में अपने क्षेत्र की किस शक्ति के नाम की आहुति देनी चाहिए?
अपने क्षेत्र की इष्टात्री शक्ति के नाम की — झारखंड और बिहार में जय दुर्गा, उत्तर प्रदेश में भगवती विंध्यवासिनी, राँची और जमशेदपुर के क्षेत्र में भगवती छिन्नमस्तिका, और वैद्यनाथ धाम में भगवती बगलामुखी, जिनका प्राकट्य स्थान वही माना गया है।
वक्ता इसे क्षेत्रीय उदाहरणों के साथ एक सामान्य नियम के रूप में देते हैं, और साफ कहते हैं कि यह उनका निज मत नहीं है — यह उन्होंने अन्य लोगों से, बड़े-बुजुर्गों से सुना है और जो देखा है वही बता रहे हैं। झारखंड और बिहार के क्षेत्र में जब भी आप हवन करें, जय दुर्गा के नाम की आहुति अवश्य देनी चाहिए। उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में भगवती विंध्यवासिनी की आहुति अवश्य देनी चाहिए। राँची या जमशेदपुर के लिए भगवती छिन्नमस्तिका — सबसे नजदीक का सिद्धपीठ, कबंध भैरव के साथ — और कामाख्या के बाद उग्रतम पीठों में भगवती का वही पीठ आता है; साथ में सोलह भुजी देवड़ी को भी लेकर चल सकते हैं। नियम को वे उड़ीसा क्षेत्र के एक साधक से समझाते हैं जिनका हवन उन्होंने देखा — वे 'सर्व मंगल मांगल्ये... जय दुर्गायै स्वाहा' से आहुति दे रहे थे। पूछने पर कि यह तो भगवती जय दुर्गा का ध्यान मंत्र नहीं है, उन्होंने कहा कि हम जिस क्षेत्र में उपस्थित हैं वह भगवती जय दुर्गा का क्षेत्र है — पुरुषोत्तम क्षेत्र से अलग, उसके बाद का क्षेत्र — और यहाँ की शक्ति को यदि आहुति नहीं देंगे तो किसको प्रसन्न किया जाएगा। मात्रा वे संयमित रखते हैं — छिन्नमस्तिका को पाँच आहुति दे दीजिए, वे कहते हैं; हजार आहुति देने को नहीं कह रहे। गौ घृत और खीर मिलाकर दीजिए तो कोई दोष भी नहीं लगेगा और कृपा होगी सो अलग। वैद्यनाथ धाम पर वे एक बात और जोड़ते हैं — वहाँ की सबसे प्रचंडतम शक्ति भगवती पीतांबरा बगलामुखी हैं, जिन्हें भगवान शिव की कृत्या शक्ति कहा गया है और निग्रह करने का अधिकार दिया गया है; उनका मंदिर ज्योतिर्लिंग के ठीक पीछे स्थित है। एक कल्प में उनका प्राकट्य स्थान वैद्यनाथ धाम चिता भूमि माना गया है, और वह स्थान बगलामुखी साधना और सिद्धि के लिए प्रचंडतम माना गया है।
रूठी कुल शक्ति के लिए गुड़ वाली खीर की आहुति
यदि पता हो कि कुल शक्ति नाराज चल रही हैं तो क्या करें?
रसियाओ बनाइए — चीनी के बजाय गुड़ वाली खीर — उसमें काला तिल, दही और गौ घृत मिलाइए, और बिल्व पत्र से 108 आहुति उन्हीं के नाम से दीजिए। वक्ता इसे सौम्य प्रयोग कहते हैं, षट्कर्म का प्रयोग नहीं।
वक्ता इसे एक छोटा सा अतिरिक्त विषय कहकर लाते हैं, और उसकी श्रेणी को लेकर सावधान हैं — यह तंत्र का एक प्रयोग मात्र है, लेकिन सौम्य प्रयोग है, कोई षट्कर्म का प्रयोग नहीं। यह उनके लिए है जिन्हें अपने कुल देवी-देवता के विषय में पता है और साथ ही यह भी बताया गया है कि तुम्हारी कुल शक्ति ही तुमसे नाराज हैं — जहाँ घर में दुर्भिक्ष पड़ गया है, धन या संतान की हानि हो रही है, कष्ट सचमुच है। तैयारी — चीनी न डालकर गुड़ से खीर बनाइए, जिसे यूपी-बिहार के लोग रसियाओ बोलते हैं। उसका नैवेद्य अर्पण कीजिए। फिर एक पात्र में वही गुड़ वाली खीर लेकर उसमें थोड़ा सा काला तिल, थोड़ा सा दही और थोड़ा सा गौ घृत मिला दीजिए। 108 बिल्व पत्र रख लीजिए। बिल्व की लकड़ी की समिधा या गाय के गोबर के उपले से अग्नि प्रज्वलित कर लीजिए। आहुति उन्हीं के नाम से दी जाती है — उदाहरण उनका उस घर का है जिसकी कुलदेवी भद्रकाली हैं: 'ह्रीं भद्रकाले दिव्य स्वाहा' — एक बिल्व पत्र लेकर, मृग मुद्रा बनाकर, पत्र पर थोड़ी सी सामग्री उठाकर और हाथ पात्र में ही रखे हुए मंत्र पढ़ते हुए। इसी प्रकार 108 आहुति। परिणाम वे यह बताते हैं — भगवती अनन्य कृपा करेंगी, तुरंत सौम्य हो जाएँगी, शांत हो जाएँगी, कृपा करेंगी और मार्ग प्रशस्त करेंगी।
आहुति से पहले बिल्व पत्र की डंडी तोड़ देना
आहुति से पहले बिल्व पत्र को कैसे तैयार करना चाहिए?
ऊपर से डंडी तोड़ दीजिए — जहाँ गाँठ जैसा बना होता है वह हिस्सा — तभी आहुति दीजिए, सीधे पूरा मत चढ़ाइए। सीधे चढ़ाने पर वह मुख में गड़ता है, और वक्ता का भाव यह है कि जो हमें कष्ट देता है वह जिन तक पहुँचेगा उन्हें भी कष्ट देगा।
वक्ता एक छोटी सी प्रक्रियागत बात रखते हैं जिसे वे महत्व देते हैं। 108 बिल्व पत्रों में से हर पत्र की डंडी ऊपर से तोड़ देनी चाहिए — जहाँ गाँठ जैसा बना होता है वह तोड़कर आहुति दी जाती है, यह नहीं कि सीधे लेकर चढ़ा दिया। व्यावहारिक कारण यह है कि सीधे चढ़ाने पर वह गड़ेगा, मुख में गड़ेगा। वह कहीं न कहीं कंटक का काम कर देता है, इसलिए उसे थोड़ा सा तोड़ दीजिए। वही बात वे बिल्व पत्र खाने पर भी कहते हैं — डंठल तोड़कर तब खाना चाहिए, क्योंकि उसमें प्रेशर हाई होता है। जो कारण वे बताते हैं वह नियम का नहीं, भाव का है — जब वह भगवती स्वाहा के मुख में जाएगा और आपके आराध्य तक पहुँचेगा तो उन्हें भी हानि होगी, इसलिए ऐसे नहीं करना चाहिए। जब हमें कष्ट होता है तो उन्हें भी होगा।
स्वाहा के "आ" पर आहुति छोड़ना
"स्वाहा" के किस अक्षर पर आहुति छोड़ी जाती है?
"आ" पर — स्वाहा बोलने से पहले नहीं, और बोलते हुए भी नहीं, बल्कि "हा" के भीतर जो "आ" है उस पर। वक्ता इसे इस भाव से समझाते हैं कि हवन की अग्नि की आयु छोटे बच्चे की मानी गई है, और बच्चे को तब खिलाते हैं जब वह मुँह खोलकर "आ" करता है।
वक्ता समय बिल्कुल ठीक-ठीक बताते हैं। नियम यह है — स्वाहा बोलने से पहले आहुति नहीं देनी है, और स्वाहा बोलते हुए भी नहीं; 'हा' में जो 'आ' का आकार है, उसी 'आ' को बोलते समय आहुति छोड़िए। समझाने से पहले वे क्षमा माँग लेते हैं कि किसी के सेंटीमेंट्स आहत हों तो हृदय से क्षमा प्रार्थी हैं, और कहते हैं कि वे इसे सरलतम रूप में समझाने का प्रयास कर रहे हैं। हवन की जो अग्नि होती है उनका नाम वरद अग्नि है — कहीं सत कल्याण अग्नि, कहीं सतवर अग्नि भी कहा जाता है — और उनकी आयु छोटे बच्चे की मानी गई है, जिसकी आयु कम होती है और उसी अनुपात में मुख भी छोटा होता है। और छोटे बच्चे को खाना खिलाते समय हम क्या बोलते हैं — 'आ करो बाबू, आ'। जैसे उसने 'आ' किया, वैसे ही आपने उसी क्षण खिला दिया। शुरू-शुरू में यह कठिन लगेगा, कभी आहुति आगे पड़ जाएगी कभी पीछे — इससे घबराना नहीं है; चार-पाँच दिन हवन करते-करते, दिन में सौ से अधिक आहुति डालते-डालते धीरे-धीरे अभ्यास हो जाएगा।
आँसू आ जाएँ तो रुक जाइए, ताकि उच्चारण स्पष्ट रहे
हवन किस भाव में करना चाहिए?
केवल अपने आराध्य के प्रति समर्पण का भाव — न भावुक होना है, न क्रोधी, न काम भाव आए, न कोई अन्य भाव। भक्ति के आँसू आ जाएँ तो अच्छी बात है, लेकिन उस समय आहुति मत दीजिए, थोड़ी देर रुक जाइए — नियम इसलिए है कि मंत्र का उच्चारण गलत न हो, दोष के कारण नहीं।
वक्ता पहले नियम रखते हैं और फिर उसका सामान्य गलत पाठ ठीक करते हैं। हवन के समय न हमें भावुक होना है, न क्रोधी; न काम भाव आना चाहिए, न कोई अन्य भाव। उसमें केवल भाव अपने आराध्य के प्रति समर्पण का होना चाहिए। भावुकता में रोते समय हवन करने से क्यों मना किया गया — इसलिए नहीं, वे कहते हैं, कि आपके लिए कोई दोष है; दोष नहीं है। इसलिए कहा गया कि मंत्र का गलत उच्चारण न हो जाए। यदि आप हवन करते समय बहुत अधिक भावुक हो गए हैं तो यह अच्छी बात है — इसका अर्थ है कि आप अपने आराध्य के प्रति समर्पित हैं और उनका भाव आपके हृदय में इस प्रकार जागृत हुआ कि आँखों से आँसू आ रहे हैं। लेकिन उस समय आहुति मत दीजिए, कुछ समय के लिए रुक जाइए। वे कहते हैं कि उनके साथ भी होता है, विंध्यवासिनी की आहुति में तो कई बार हो ही जाता है — क्योंकि जहाँ समर्पण हो और हृदय जुड़ा हो, वहाँ लगता है कि माँ आई हैं और हमारे हाथ से स्वीकार कर रही हैं। आँसू पोछिए, हृदय को शांत कीजिए — कोई भागेगा नहीं, सब देवता वहीं रहेंगे। फिर जैसे ही आप नॉर्मल हो जाएँ और मंत्रों का उच्चारण स्पष्ट हो, तब जाकर पुनः आहुति शुरू कीजिए। ऐसा न हो कि रोते-रोते कुछ का कुछ बोलकर आहुति करते जाएँ; तुतला-तुतलाकर आहुति मत कीजिएगा।
जप वाला मंत्र मन में, प्रकट में केवल स्वाहा
जिस मंत्र का आप जप करते हैं, क्या उसे आहुति के समय प्रकट में बोलना चाहिए?
नहीं। जिन मंत्रों का आप जप करते हैं, उन्हें आहुति के समय बोलकर नहीं कहना है — पंचाक्षरी का जप करते हैं तो पंचाक्षरी बोल-बोलकर स्वाहा नहीं करना है। मंत्र मन में बोलिए और प्रकट में केवल स्वाहा — ठीक वैसे ही जैसे आप जप करते हैं।
वक्ता इसे छोटी लेकिन परिणाम वाली बात के रूप में रखते हैं। जिन मंत्रों का आप जप करते हैं, उन्हें आहुति देते समय बोलकर नहीं कहना चाहिए। उदाहरण उनका पंचाक्षरी मंत्र का है — यदि आप उसका जप करते हैं तो उसे बोल-बोलकर स्वाहा नहीं करना है। पंचाक्षरी मंत्र आप मन में बोलेंगे, प्रकट में केवल स्वाहा बोलेंगे। कारण उनका यही है कि मंत्र के साथ जो व्यवहार आप जप में करते हैं वही यहाँ भी रहे — जैसे आप जप करते हैं उसी प्रकार से, तभी यह कल्याणप्रद होता है, कल्याण करने वाला होता है।
दो-तीन सौ रुपए में बन जाने वाला नारियल का खप्पर
जिनके पास पूरा पूजन करने का सामर्थ्य न हो वे सप्तमी को क्या करें?
खप्पर वाली विधि — एक बड़ा गड़ी वाला सूखा नारियल बीच से खड़ा काटकर दो खप्पर बनाइए, उनमें काजू-किशमिश और कपूर भरकर प्रज्वलित कीजिए; दाहिनी ओर कुलदेवी का खप्पर, बाईं ओर कुल भैरव का। पूरा खर्च लगभग दो-तीन सौ रुपए।
विधि देने से पहले वक्ता उससे जुड़ी घबराहट हटाते हैं। माता-पिता — और कुल शक्ति, जिनका अंश रक्त और कुल पितृ की दी हुई हड्डी आपके शरीर में है — ऐसे ही प्रसन्न होते हैं; केवल भाव की आवश्यकता होती है। वे क्रोधित उस अहंकार से होते हैं, उस गर्व और दर्प से जो आपके भीतर है, और वह दर्प नष्ट भी नहीं होता। अपमान की बात वे सबसे सरल रूप में रखते हैं। यदि आप बैठकर काली जी का खूब उपहास कर लें — काली माता तो ऐसी हैं, वैसी हैं, वे तो झाड़ू भी नहीं लगातीं — तो वे क्रोधित होंगी कि नहीं? हानि तो उन्हीं की है ना, जगहँसाई उन्हीं की होती है। लोग सरल से ही समझते हैं, वे कहते हैं, इसीलिए वे सरल तरीके से समझाते हैं; बहुत उत्कृष्ट स्तर की बात रख दीजिए तो कोई सुनता ही नहीं। फिर वे उस घर की ओर मुड़ते हैं जो शृंगार, साड़ी, वस्त्र और खीर-पूरी का सामर्थ्य नहीं रखता, और कहते हैं कि कोई दिक्कत नहीं है। सामग्री — एक बड़ा गड़ी वाला नारियल, जिससे तेल पेरा जाता है; दस या पंद्रह-बीस रुपए का काजू-किशमिश, जितना हो सके; पंद्रह-बीस रुपए का भीमसेनी कपूर, या पचास रुपए तक का, क्योंकि कपूर बढ़िया होगा तभी जलेगा। थोड़ा सा लाल कपड़ा; पान का पत्ता। पूरा खर्च वे दो-तीन सौ रुपए बताते हैं। पूजा की थाली चाहिए। यदि नई थाली नहीं है और पूजन का कोई अलग पात्र नहीं है, तो कहीं से गाय का गोबर ले आइए — गाय का ही, वे जोर देते हैं; रास्ते से उठाकर मत लाइएगा कि भैंस का गोबर निकल जाए, क्योंकि फिर वह तंत्र प्रयोग वाला विषय हो जाता है, शक्ति प्रचंड हो जाती है। बछिया का गोबर चलेगा, गौवंश का चलेगा, लेकिन गौ माता का हो तो अति उत्तम। उस गोबर से थोड़ी सी जमीन लीप दीजिए और सुखा दीजिए। क्रम, सबसे नीचे से — गोबर से लीपी हुई जमीन या थाली; उसके ऊपर लाल कपड़ा; कपड़े के ऊपर दोनों खप्पर; हर खप्पर में एक-एक पान का पत्ता, जिसका डंठल पूरा तोड़कर निकाल दिया गया हो और अग्र भाग भी थोड़ा काट दिया गया हो; नीचे कपूर बिछाइए, अष्टगंध और कुमकुम का तिलक कर दीजिए, फिर काजू, किशमिश, छुहाड़ा जो भी ड्राई फ्रूट्स रखते हैं उनसे खप्पर भर दीजिए और ऊपर से कपूर से पूरा भर दीजिए ताकि वह जले। नारियल काटने से पहले कर्म साक्षी दीपक जलाकर, जो फूल-पत्ती आप ला पाएँ वह कुलदेवी-कुल देवता को अर्पित कर दीजिए।
संकल्प, और पहले कुल भैरव का खप्पर प्रज्वलित करना
संकल्प, और पहले कुल भैरव का खप्पर प्रज्वलित करने का क्रम
हाथ में जल लेकर, अपना नाम-गोत्र बोलकर कहिए कि आज कुलदेवी सप्तमी के दिन हम अपनी कुल शक्ति की प्रसन्नता के निमित्त यथा सामर्थ्य यह पूजन कर रहे हैं। दाहिनी ओर का खप्पर कुलदेवी का है, बाईं ओर का कुल भैरव का — पहले कुल भैरव का प्रज्वलित कीजिए।
वक्ता संकल्प पूरा बताते हैं। हाथ में जल लीजिए, अपना नाम-गोत्र उच्चारण कीजिए और बोलिए — आज कुलदेवी सप्तमी के दिन, श्रावण शुक्ल पक्ष सप्तमी के दिन, हम अपने कुल की शक्ति की प्रसन्नता के निमित्त यथा सामर्थ्य यह पूजन कर रहे हैं; हमारे कुल की शक्ति इस पूजन को स्वीकार करें और प्रसन्न हो जाएँ। इतना बोलिए और जल छोड़ दीजिए। स्थान तय है। आपके सामने रखे दोनों खप्परों में से जो आपके राइट हैंड साइड में है वह आपकी कुलदेवी का खप्पर है; जो लेफ्ट हैंड साइड में है वह आपके कुल भैरव का। क्रम स्थान से उल्टा है — पहले कुल भैरव का खप्पर प्रज्वलित कीजिए, उसके बाद कुलदेवी का। जब तक खप्पर प्रज्वलित रहे, हाथ जोड़कर पूर्ण भाव के साथ समर्पित रहिए। जिनसे काजू-किशमिश का भी प्रबंध न हो — और वे कहते हैं कि वे समझते हैं, और जब देवी-देवता रुष्ट हों तो स्थिति खराब हो ही जाती है — वे गुड़, दही और कपूर का प्रबंध कर लीजिए। नारियल तो खप्पर के लिए चाहिए ही; उसे इन्हीं से भी भर सकते हैं।
क्षेत्र के शक्तिपीठ और वहाँ के भैरव के नाम से खप्पर
खप्पर क्षेत्र के शक्तिपीठ और वहाँ के भैरव के नाम से जाता है
अपने आसपास के शक्तिपीठ और वहाँ के भैरव के नाम से — पुरुषोत्तम क्षेत्र में भगवती विमला और भगवान जगन्नाथ, कलकत्ता में कलकत्ते वाली काली और नकुलेश्वर भैरव, तारापीठ की ओर अक्षोभ्य भैरव और भगवती तारा — इस प्रार्थना के साथ कि यह हमारे कुल देवी-देवता तक पहुँचे।
वक्ता सामने खड़े अगले प्रश्न का उत्तर देते हैं — यदि आपको नहीं पता कि आपके कुल के देवी-देवता कौन हैं, तो यह खप्पर किसके नाम से जाना चाहिए? आपके आसपास जो शक्तिपीठ है, वहाँ की इष्टात्री शक्ति और वहाँ के भैरव के नाम से। क्षेत्र के अनुसार उदाहरण वे देते हैं। जगन्नाथ क्षेत्र, पुरुषोत्तम क्षेत्र में भगवती विमला कुलदेवी के स्वरूप में और भगवान जगन्नाथ कुल भैरव के स्वरूप में पूजित होंगे। पश्चिम बंगाल के कलकत्ता क्षेत्र में कलकत्ते वाली काली कुलदेवी के रूप में और नकुलेश्वर भैरव कुल भैरव के रूप में — उनके लिए खप्पर चल जाएगा। यदि आपका घर आगे तारापीठ की ओर है, तो अक्षोभ्य भैरव और भगवती तारा के नाम से भरिए। प्रार्थना हर स्थिति में वही रहती है — कि यह हमारे कुल देवी-देवता तक पहुँचे और उनकी कृपा हम पर हो। इस पर उनका अंतिम निर्देश पूरे सत्र की सबसे कड़ी पंक्ति है — लेकिन कुलदेवी सप्तमी खाली मत जाने दीजिए। उस दिन यथा सामर्थ्य पूजन कीजिए।
पाँच पान के पत्ते, पाँच दीपक और नौ बार आरती
जिनके पास लगभग कुछ भी सामर्थ्य न हो, उनके लिए न्यूनतम पूजन क्या है?
पाँच पान, पाँच सुपारी, दस लौंग, दस इलायची, और कोई भी मीठी सामग्री जो आप घर में बना सकें। कर्म साक्षी दीपक जलाइए और पाँच छोटे-छोटे घी के दीपक जलाइए, सब कुछ पान के पत्तों पर समर्पित कीजिए, और कपूर से कम से कम नौ बार आरती दिखा दीजिए।
वक्ता पूजन की सबसे निचली सीढ़ी बताते हैं, उस घर के लिए जिससे नारियल का खप्पर भी न बन पड़े। पान-सुपारी ला लीजिए — पाँच पान, पाँच सुपारी, दस लौंग, दस इलायची, और खाने के लिए थोड़ी सी कोई भी मीठी सामग्री जो आप घर में बना सकें, खीर आदि। कर्म साक्षी दीपक जला दीजिए, और पाँच छोटे-छोटे घी के दीपक जला दीजिए; मिट्टी वाले भी चलेंगे। पाँच पान के पत्ते रखिए और उनके ऊपर सब कुछ समर्पित कीजिए — फूल, सुपारी, लौंग, इलायची, सब — और कुलदेवी-कुल देवता से बोलिए कि आप चाहे कहीं भी हों, हम यथा सामर्थ्य जो समर्पित कर रहे हैं उसे स्वीकार करके इतने से ही प्रसन्न हो जाइए। फिर कपूर से आरती कर लीजिए। ज्यादा न हो तो कम से कम नौ बार आरती दिखा दीजिए। इतना तो कीजिए — लेकिन खाली मत जाने दीजिए। सप्तमी खाली नहीं जानी चाहिए; श्रावण की सप्तमी किसी के घर खाली नहीं होनी चाहिए।
सामर्थ्य हो तो जीव सेवा और कुलदेवी के नाम से दान
जिनके पास सामर्थ्य है वे सप्तमी को क्या करें?
घर में पूजा कीजिए, जीव-जंतुओं की सेवा कीजिए, और ब्राह्मणों को, विद्वानों को, जिनके प्रति आपकी श्रद्धा है उन्हें, या मंदिर में दान कीजिए — और पूरा प्रयोजन कुलदेवी का रहे, कि कुलदेवी हम पर कृपा करें। जितना सामर्थ्य हो उस अनुसार कीजिए।
वक्ता दूसरे छोर की बात करते हैं। जिनके पास सामर्थ्य है, वे जितना अच्छे से कर सकते हैं उतना कीजिए। उस दिन घर में पूजा कीजिए, और जीव-जंतुओं की सेवा कर दीजिए। ब्राह्मणों को, विद्वानों को, या जिनके प्रति आपका समर्पण और श्रद्धा है उन्हें दीजिए; मंदिर में जो आप कर सकते हैं कर दीजिए। शर्त वे मात्रा पर नहीं, प्रयोजन पर रखते हैं — उसके पीछे पूरा प्रयोजन आपकी कुलदेवी का होना चाहिए, कि कुलदेवी हम पर कृपा करें। जितना सामर्थ्य हो उस अनुसार कीजिए। वे यह भी बताते हैं कि पूजन के बाद यदि आपके पास और समय है तो हवन से पहले स्तुति पाठ आदि करना चाहें तो कर लीजिए; और बाकी सावन की जो पूजा चल रही थी वह एज इट इज चलेगी — घर में शिव जी की जो सेवा, अभिषेक आदि आप कर रहे थे वह सब होगा, और उसी के साथ कुल की देवी और कुल के देवता का पूजन इस प्रकार से होगा।
नारियल और नींबू की बलि, और किसे नहीं चढ़ानी चाहिए
नारियल बलि पुरुष के हाथ से, नींबू की बलि पर कोई रोक नहीं, और श्रावण में छाग बलि घर पर नहीं
कुलदेवी के लिए एक और कुल भैरव के लिए एक नारियल बलि, और यथासंभव कोई पुरुष अपने हाथ से करे — गर्भवती स्त्री विशेष करके न चढ़ाएँ, और स्त्रियों को ऐसे भी नारियल फोड़कर बलि नहीं देनी चाहिए। नींबू की बलि बिल्कुल दे सकते हैं; छाग बलि श्रावण में घर पर नहीं करनी चाहिए।
वक्ता बलि के नियम अपने अपवादों के साथ रखते हैं। गर्भवती स्त्री विशेष करके नारियल की बलि न चढ़ाएँ; और स्त्रियों को ऐसे भी नारियल फोड़कर बलि नहीं देनी चाहिए। जहाँ कोई विकल्प नहीं है और घर में कोई पुरुष ही नहीं है, वहाँ बात अलग है और आप कर सकते हैं — लेकिन प्रयास कीजिए कि कोई पुरुष अपने हाथ से नारियल बलि करे: कुलदेवी को एक और कुल भैरव को एक। नींबू पर वे बिना किसी शर्त के हैं — नींबू की बलि बिल्कुल दे सकते हैं। कुष्मांडा बलि भी, यदि आप करते हैं, तो बिना दिक्कत के कर सकते हैं। प्रश्नोत्तर में अलग से पूछे जाने पर कि क्या माता शाकंभरी को नींबू की बलि दे सकते हैं, वे कहते हैं — बिल्कुल दे सकते हैं। छाग बलि पर वे सख्त हैं — इस समय, विशेष करके श्रावण में, यह घर पर नहीं करनी चाहिए। यदि आप बहुत उच्च कुल के तांत्रिक हैं, तंत्र संपन्न व्यक्ति हैं, या आपके गुरु इतने सामर्थ्यवान हैं, तो उनसे निर्णय लेकर ही यह सब कीजिए। नहीं तो श्रावण मास में घर पर नहीं करना चाहिए। इसे वे शास्त्र का उद्धरण नहीं, अपना अनुभव और विशेष जानकारी बताते हैं, और कहते हैं कि यदि आपके यहाँ यह पहले से होता है तो वे टोका-टाकी नहीं कर रहे — वह आपका निजी विषय है। प्रश्नोत्तर से जुड़ा एक निर्देश और — नारियल फोड़कर अग्नि में नहीं चढ़ाना है। हवन के बाद अलग से नारियल चढ़ा दीजिए।
श्रावण के पर्व काल में मुहूर्त देखा जाए या नहीं
इस पूजन के लिए मुहूर्त, राहु काल और नक्षत्र देखना चाहिए?
उनका अपना मत — जिसे वे भाव प्रधानता कहते हैं, शास्त्र नहीं — यह है कि श्रावण में तिथि, नक्षत्र, मुहूर्त, राहु काल, केतु काल मत देखिए, बस कर लीजिए। जो व्यक्तिवादी नहीं सिद्धांतवादी हैं वे मुहूर्त देखकर करें; आवश्यक बात यह है कि हो जाए।
वक्ता इसे निज मत कहकर देते हैं और दो बार यह स्पष्ट करते हैं। कुलदेवी सप्तमी के दिन तिथि, नक्षत्र, मुहूर्त, राहु काल, केतु काल मत देखिए — विशेष करके यदि आप श्रावण मास में नित्य हवन कर रहे हैं, और उससे भी विशेष तब जब पर्व काल श्रावण में ही पड़ रहा हो। वे साफ कहते हैं कि यह किसी शास्त्र से नहीं बता रहे; यह भाव प्रधानता से कह रहे हैं, और आप नहीं मानना चाहते तो मत मानिएगा। पहले ही वे कह देते हैं कि इसके लिए गाली-गलौज मत कीजिएगा कि यह अशास्त्रीय है — आपकी इच्छा; आप अभिजीत मुहूर्त में कीजिए। विभाजन उनका अपने ही ढंग का है — जो लोग उन्हें थोड़ा प्रेम करते हैं, जो व्यक्तिवादी हैं, वे उस दिन कभी भी कर लें। जो व्यक्तिवादी नहीं सिद्धांतवादी हैं, वे मुहूर्त देखकर करें — कि अभी केतु काल चल रहा है, राहु काल पार हो जाए, फिर सूर्य के काल में करेंगे। दोनों में कोई दिक्कत नहीं है, वे कहते हैं — लेकिन कर लीजिए।
जिनका पूजन सप्तमी को किया, उन्हीं का नित्य स्मरण
कुलदेवी सप्तमी के बाद के दिनों में क्या करना चाहिए?
जिनका भी पूजन और हवन आपने किया, उसी दिन से उनका नित्य स्मरण और नित्य पूजन उनके नाम से कीजिए। चलते-फिरते उनका नाम जपिए — और यदि आपको कोई गुरु मंत्र प्राप्त नहीं है तो नाम जप में कोई दोष नहीं है, कोई कुछ भी कहे।
वक्ता सप्तमी को समापन नहीं, आरंभ मानते हैं। जिनका भी प्रथम पूजन आपने किया, जिनका भी हवन किया, उसी दिन से उनका नित्य स्मरण कीजिए, उनके नाम से प्रतिदिन पूजन कीजिए। उदाहरण वे देवघर वाले प्रसंग से जोड़ते हैं — जैसे बाबा बैजनाथ का किया है, माँ जय दुर्गा का किया है, तो रोज उनका स्मरण कीजिए और चलते-फिरते उनके नाम का जप कीजिए। इस आपत्ति पर कि गुरु मंत्र के बिना नाम जप से कुछ नहीं होता, वे टिकते नहीं। यह जो बात फैलाई जाती है कि जो आपको किसी गुरु से प्राप्त नहीं है, उसमें जो मन करे करने से कल्याण नहीं होगा, कल्याण वही करेगा जो शास्त्र में बताया गया है — इसका उत्तर वे यह देते हैं कि भगवान के हर प्रकार के नाम से ही कल्याण हो जाएगा। और भगवान ही कृपा करके, जब आप बार-बार उनका नाम लीजिएगा, यदि उन्हें उचित लगेगा तो दीक्षा भी दिला देंगे। एक रेखा वे खींचते हैं — बीज मंत्रों का जप चलते-फिरते नहीं करना है। नाम जप में कोई रुकावट नहीं है। यदि आपकी इच्छा जय दुर्गा में हो गई तो जय दुर्गा लीजिए; काली जी में इच्छा है तो काली-काली कीजिए; शिव में मन है तो महादेव का नाम लीजिए; विश्वनाथ जी का, भैरव जी का, महाकाल का — लेकिन लीजिए। चलते-फिरते जप कीजिए, ऑफिस जाते हुए गाड़ी में, कैब में बैठे-बैठे नाम लेते रहिए। आजकल जो भी फिल्मी नायिका चल रही हो उसके विषय में सोचने से अच्छा है, वे कहते हैं, कि आप उनका चिंतन करें।
देवता बदले बिना अपनी बनी हुई साधना में अभिवृद्धि
जो नित्य साधना जम चुकी हो, उसमें समय के साथ कुछ जोड़ना चाहिए?
हाँ, पुराने साधकों के लिए — क्योंकि एक ही चीज करते-करते पूरा अभ्यास हो जाने के बाद आगे न बढ़ें तो मन कटने लगता है। उसमें जोड़िए — षोडशोपचार पूजन में देवी सूक्तम के मंत्रों का समन्वय कर लीजिए, या सहस्रनाम के श्लोक गर्भस्थ कर दीजिए। जोड़ने का अर्थ देवता बदलना नहीं है।
वक्ता स्पष्ट करते हैं कि यह प्रसंग नए साधकों के लिए नहीं है — यह पुराने साधकों के लिए है जो पहले से बहुत अच्छा कर रहे हैं। तर्क उनका व्यावहारिक है। जब आप एक ही चीज करते-करते पूरे अभ्यस्त हो जाते हैं और आगे नहीं बढ़ते, तो उससे उचाट लगने लगता है और मन कटने लगता है — क्योंकि आप धुरंधर साधक तो हैं नहीं कि मन को हमेशा एकाग्र रखेंगे; ऊपर से ऑफिस है, बिजनेस है, फलानी जगह जाना है। मन हमेशा वैसा रहेगा नहीं। इसीलिए उसमें कुछ जोड़ते रहना चाहिए। जोड़ने का अर्थ क्या नहीं है, इस पर वे जोर देते हैं — जोड़ने का अर्थ बदलाव कर देना नहीं है, और देवता बदल देना तो बिल्कुल नहीं है। उदाहरण उनका यह है — मान लीजिए आप भगवती काली का नित्य पूजन कर रहे थे, और अभी तक प्रतिदिन पौराणिक मंत्रों से सोलह उपचार का पूजन कर रहे हैं। दो साल, चार साल, पाँच साल के बाद आप अभ्यस्त हो चुके हैं। तब उसमें देवी सूक्तम के मंत्रों को जोड़ दीजिए — उनका सोलह उपचार के साथ समन्वय करके कीजिए; इसमें कोई दोष नहीं लगने वाला। कोई अन्य स्तुति-स्तोत्र जोड़कर कीजिए और धीरे-धीरे उसका अभ्यास बढ़ाइए। सहस्रनाम का अभ्यास करते हैं तो जो श्लोक आपको अच्छे लगते हों, उन्हें उसमें गर्भस्थ कर दीजिए। जो श्री सूक्तम आदि के लिए अधिकृत हैं, उन्हें वे सुझाते हैं कि श्री सूक्तम के साथ लक्ष्मी सूक्तम को गर्भस्थ करके कीजिए, या दुर्गा सूक्तम से कीजिए, या अन्य देवियों के सूक्तों से — इससे इस क्षेत्र में आपका मस्तिष्क काफी अधिक ब्रॉड होना शुरू हो जाएगा। वे मानते हैं कि यह बात सबको नहीं पचेगी — यह अनुभव वाली बात है, और जो उस स्तर तक पहुँच चुके होंगे उनके लिए संकेत मात्र काफी है; एकदम लो लेवल का ही हमेशा बताते रहना, वे कहते हैं, उचित भी नहीं है।
यंत्र की समझ एक तेज गणना की तरह उतरना
यंत्र की समझ एक तेज कैलकुलेशन की तरह उतरने लगती है
क्योंकि सूक्तों का अभ्यास हो जाने और दैवी कृपा होने के बाद यंत्र का हिसाब उसी तरह निकलने लगता है जैसे मैथमेटिक्स में तेज कैलकुलेशन वाले के लिए इंटीग्रेशन-डिफरेंशिएशन — कि यंत्र का निर्माण किस प्रकार होगा और आगे क्या होगा, यह अपने आप सामने आ जाता है।
वक्ता इसे एक ऐसे विषय पर टिप्पणी के रूप में रखते हैं जिस पर, वे कहते हैं, वे चैनल पर अब तक चर्चा नहीं कर पाए। यंत्र, वे कहते हैं, इतना दिव्य विषय है कि यदि उसे समझकर किया जाए तो वह वैसे ही काम करता है जैसे मैथमेटिक्स में उसके लिए जिसका कैलकुलेशन बहुत फास्ट होता है — इंटीग्रेशन, डिफरेंशिएशन; देखते ही समझ आ जाता है कि इतना-इतना ऐसे हो जाएगा। वैसा ही कैलकुलेशन, वे कहते हैं, यंत्र में भी निकल आता है — इतनी दिव्य क्षमता हो जाती है कि किस प्रकार से यंत्र का निर्माण होगा और आगे क्या होगा, यह स्पष्ट हो जाता है; समय के साथ बने अभ्यास से, और दैवी कृपा से, जब आप इन सभी सूक्तों का अभ्यास करेंगे तब। साथ में वे शृंगेरी मठ के शंकराचार्य जी के शिष्यों द्वारा रुद्र अष्टाध्यायी पर दी गई सामग्री सुनने का सुझाव देते हैं, जो यूट्यूब पर उपलब्ध होनी चाहिए; वह तभी समझ आएगी जब आप थोड़ा पाठ करते होंगे। जब ये कांसेप्ट क्लियर होते हैं, वे कहते हैं, तो लगता है कि ब्रह्मांड का एक बहुत बड़ा रहस्य ज्ञात हो गया।
अधिकार ग्रंथ में ही लिखा है, किसी प्रसिद्ध व्यक्ति के कहने से तय नहीं होता
रुद्र चंडी पाठ का अधिकार किसे है?
ग्रंथ पढ़िए — उसी में लिखा है कि यह सब कोई नहीं कर सकता, और किसके लिए मना है। वक्ता चैनल से इस पर निर्णय देने से मना करते हैं, और बताते हैं कि जब कोई प्रसिद्ध व्यक्ति कह देता है कि सब कोई कर सकते हैं, तो दस लाख लोग उसी को मान लेते हैं और शास्त्र किनारे रख दिया जाता है।
विंध्याचल की बड़ी माता, जिनका दर्शन सबके लिए नहीं है
विंध्याचल में बड़ी माता और प्रेत माता का मंदिर बंद क्यों रहता है?
क्योंकि ये अति प्रचंडतम शक्तियाँ हैं। प्रेत माता का दर्शन फिर भी हो जाता है, लेकिन बड़ी माँ का नहीं — उनका इतिहास काफी उग्र रहा है और वहाँ सभी को जाना भी नहीं चाहिए। बाहर से ही प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लेना उचित है।
यह पूछे जाने पर कि विंध्याचल में शीतला माता — बड़ी माता — का मंदिर हमेशा बंद क्यों रहता है, वक्ता बताते हैं कि प्रेत माता का मंदिर भी उसी प्रकार बंद रहता है। प्रेत माता का दर्शन, वे कहते हैं, फिर भी हो जाता है। बड़ी माँ का नहीं, क्योंकि यह बहुत प्रचंडतम शक्ति हैं। उनका इतिहास काफी उग्र रहा है, और वहाँ सभी को जाना भी नहीं चाहिए; ये अति प्रचंडतम शक्तियाँ हैं। निर्देश उनका यह है कि बाहर से ही प्रणाम करके उनका आशीर्वाद ले लेना उचित है।
गर्भ रक्षण के तीन अभिमंत्रित उपाय
गर्भ रक्षण के लिए क्या किया जा सकता है?
तीन विकल्प, और तीनों में सामग्री को उस कवच से अभिमंत्रित करना है जिसकी आपने सिद्धि की हो — सर्वश्रेष्ठ कामाख्या कवच: तेरह गाँठ वाला लाल धागा कमर में; लाल गुंजा के साथ गोमती चक्र, लाल कपड़े में सील करके; या पुष्य नक्षत्र में लिया गया पपीते का काला बीज, काले कपड़े में सील करके।
वक्ता तीन विधियाँ देते हैं, और तीनों उसी कवच पर टिकी हैं जिसकी पूछने वाले ने पहले से सिद्धि की हो — सर्वश्रेष्ठ वे कामाख्या कवच को बताते हैं। पहली — लाल धागे को कवच से अभिमंत्रित कीजिए, उसमें तेरह गाँठ लगाइए, हर गाँठ के ऊपर पुनः कामाख्या कवच का पाठ कीजिए, और उसे गर्भवती की कमर में बाँध दीजिए; गर्भ सुरक्षित है। दूसरी — गोमती चक्र को कवच से अभिमंत्रित कीजिए, विशेष करके नारायण के कवच से या कामाख्या कवच से, और साथ में लाल गुंजा रखिए; उसे लाल कपड़े में सील करके, लाल धागे में डालकर कमर में बाँध दीजिए। तीसरी — शुक्ल पक्ष में, विशेष करके रवि पुष्य या गुरु पुष्य नक्षत्र में, पके हुए पपीते को काटकर उसका बीज निकालिए — बीज काला ही हो, सफेद अधपका नहीं। उसे थोड़ा सा धूप में सुखा लीजिए, कामाख्या कवच से या किसी अन्य देवी कवच से — काली जी के कवच से, दुर्गा जी के कवच से — अभिमंत्रित कीजिए, काले कपड़े में सील करके काले धागे में डालकर कमर में बाँध दीजिए। कामाख्या कवच को वे पहले क्यों रखते हैं, यह भी बताते हैं — क्योंकि उसमें दसों महाविद्याओं की उपस्थिति है, इसलिए उस पर सूतक-पातक का बैन नहीं है। तीसरी विधि में भी सूतक-पातक वाला कोई विषय नहीं रहता। जब बच्चे का जन्म होने वाला हो, उस समय काट दीजिए; कोई दिक्कत नहीं है।
देवी सूक्तम की आहुति में "कुल दिव्यै स्वाहा" जोड़ना
कुलदेवी के हवन के लिए तंत्रोक्त देवी सूक्तम में क्या बदलाव होगा?
देवी सूक्तम की आहुति चलती है "नमस्तस्यै स्वाहा, नमस्तस्यै स्वाहा, नमस्तस्यै नमो नमः स्वाहा"। कुलदेवी के लिए चतुर्थी विभक्ति जोड़िए — "नमस्तस्यै कुल दिव्यै स्वाहा"; "कुल दिव्ये नमः" नहीं, क्योंकि चतुर्थी में ऐ की मात्रा लगेगी, ई की नहीं।
वक्ता एक श्रोता के प्रस्तावित शब्द को सुधारते हैं और उसके पीछे का व्याकरण देते हैं। जो नहीं चलेगा वह है 'कुल देवी नमः' — यहाँ चतुर्थी विभक्ति लगेगी, इसलिए ऐ की मात्रा आएगी, ई की मात्रा नहीं। 'कुल दिव्ये नमः' मत बोलिए; 'कुल दिव्यै स्वाहा' आप बिल्कुल बोल सकते हैं। फिर वे तंत्रोक्त देवी सूक्तम की पूरी आहुति का रूप देते हैं, जो, वे कहते हैं, यह हवन करने वाले सबको पता होना चाहिए — 'नमस्तस्यै स्वाहा, नमस्तस्यै स्वाहा, नमस्तस्यै नमो नमः स्वाहा'। श्लोक के साथ पूरा — 'या देवी सर्वभूतेषु विद्या रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै स्वाहा, नमस्तस्यै स्वाहा, नमस्तस्यै नमो नमः स्वाहा'। कुल की शक्ति के लिए यह बनेगा — 'नमस्तस्यै कुल दिव्यै स्वाहा, नमस्तस्यै कुल दिव्यै स्वाहा, नमस्तस्यै नमो नमः कुल दिव्यै स्वाहा'। वे जोड़ते हैं कि यह जोड़ जयंती मंगला काली मंत्र के बाद या तंत्रोक्त देवी सूक्तम के बाद आता है, और यदि तंत्रोक्त देवी सूक्तम से हवन करने का कांसेप्ट क्लियर न हो तो पहले क्लियर करके तब कीजिएगा।
साफ-सफाई, गणपति, ध्वजा और आवारा कुत्तों की सेवा
घर में अपने आप राहु-केतु की शांति कैसे करें?
चार बातें — घर और विशेष करके वाशरूम शनिवार और बुधवार को खूब साफ रखिए, और पैर के तलवे साफ रखिए; शिव परिवार और संकटनाशन गणपति का पूजन बारह दूब चढ़ाकर कीजिए; हनुमान जी की लाल ध्वजा लगाइए और वहाँ सुबह-शाम धूप-दीप जले; और आवारा कुत्तों को अपने खाने से पहले खिलाइए।
वक्ता घर पर करने वाला उपाय चार हिस्सों में देते हैं, और उसके साथ अपेक्षित समय भी बताते हैं। साफ-सफाई से राहु शांत होते हैं। घर बिल्कुल साफ-सफाई से युक्त हो; शनिवार और बुधवार के दिन वाशरूम की सफाई बहुत अच्छे से कीजिए, चमकाकर रखिए। पैर के तलवे साफ रखिए — जितना साफ रहेंगे, राहु उतना शांत रहेगा। दूसरा, शिव जी और गणपति जी का पूजन, यानी शिव परिवार का पूजन। गणपति जी का पूजन तो सभी के घर में होता ही है; संकटनाशन गणपति का पूजन बारह दूब चढ़ाकर करने से केतु की भी शांति हो जाएगी। वे बताते हैं कि गणेश जी वाला उपाख्यान शिव महापुराण में भी आया था। तीसरा, हनुमान जी की लाल ध्वजा — ईशान कोण में हो तो सर्वश्रेष्ठ, या आपके घर में जहाँ उपयुक्त हो वहाँ; दिशा देखने की ऐसी आवश्यकता नहीं है — और वहाँ सुबह-शाम धूप-दीप जले। इससे राहु और केतु दोनों की शांति होती है, और ध्वजा से केतु विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं। चौथा, कुत्तों की सेवा — विशेष करके आवारा कुत्तों की। इसके लिए कुत्ते पालने नहीं हैं; यदि पालते हैं तो वे मुख्य द्वार के बाहर हों, क्योंकि घर के भीतर गोद में लेकर घूमेंगे तो कुछ काम होने वाला नहीं। मुख्य द्वार के बाहर जो भी आवारा कुत्ते हों, उन्हें जो खिला सकते हैं खिलाइए — अपने खाने से पहले। यह प्रतिदिन कीजिए, वे कहते हैं, तो राहु और केतु दोनों की प्रसन्नता प्राप्त होने लगेगी; डेढ़ से तीन महीने के भीतर प्रभाव शुभ होने लगेगा। एक निषेध वे जोड़ते हैं — चिल्लाना नहीं है, गाली-गलौज नहीं करनी; इसी से राहु सबसे अधिक शांत होते हैं। और जितना ज्यादा आप किसी भी माध्यम से भगवान का स्मरण करेंगे, राहु देव उतने प्रसन्न होंगे; केतु, जहाँ वे नुकसान दे रहे हों, वहाँ धर्म की वृद्धि करने वाले हो जाते हैं।
मंदिर की फटी ध्वजा बदलवाना, और चाँदनी अर्पित करना
मंदिर की कौन सी सेवा से राहु-केतु प्रसन्न होते हैं?
मंदिर में जाकर साफ-सफाई और सेवा-पूजा; और जहाँ मंदिर का ध्वज फटा हुआ हो, वहाँ ध्वज बदलवाने में सहायता कीजिए — आर्थिक रूप से दीजिए, बनवाकर दीजिए। भगवती के स्थान पर ऊपर जो चाँदनी तानी जाती है, वह अर्पित करने से भी दोनों प्रसन्न होते हैं।
वक्ता उपाय को घर से बाहर तक बढ़ाते हैं। यथा सामर्थ्य मंदिर जाकर वहाँ भी साफ-सफाई, सेवा-पूजा कीजिए। विशेष करके जहाँ किसी मंदिर का ध्वज फटा हुआ हो, वहाँ का ध्वज बदलवाने में सहायता कीजिए — आर्थिक रूप से सहायता कीजिए, ध्वज बनाकर या बनवाकर दीजिए। दूसरा अर्पण वे बताते हैं — चाँदनी, यानी भगवती के जो क्षेत्र-स्थान होते हैं वहाँ ऊपर जो चाँदनी तानी जाती है। वैसी चाँदनी यदि आप मंदिर आदि में अर्पित करते हैं तो उससे भी राहु और केतु दोनों प्रसन्न होते हैं।
ताँबे के लोटे के दूध में चाँदी का नाग-नागिन
राहु की शांति के लिए कौन सा शिव अभिषेक करें, और चाँदी के नाग-नागिन की विधि क्या है?
ऐसे शिवलिंग का अभिषेक कीजिए जिसमें सर्प लगे हों। अमावस्या को सौ-डेढ़ सौ रुपए का छोटा सा चाँदी का नाग-नागिन बनवाकर, ताँबे के लोटे में दूध डालकर — इस प्रक्रिया में ताँबा ही चलेगा — मंदिर में शिव जी को चढ़ा दीजिए, मन में पंचाक्षरी जपते हुए। चढ़ जाने के बाद नाग-नागिन को स्पर्श नहीं करना है।
वक्ता राहु के लिए शिव जी से जुड़े दो उपाय देते हैं। पहला है दूध से ऐसे शिवलिंग का अभिषेक जिसमें सर्प लिपटे हों — यानी जहाँ शिवलिंग वासुकी जी के साथ हो। वे बताते हैं कि मैक्सिमम मंदिरों में यह रहता ही है, लेकिन कई बार लोग सर्प को निकालकर अलग रख देते हैं, और वैसे में यह नहीं चलेगा। जब सर्प शिवलिंग में लगे हों, उस समय उनका अभिषेक किया जाए, धार दी जाए — इससे राहु की शांति तुरंत होती है। दूसरा अमावस्या का है। चाँदी के तार का छोटा सा नाग-नागिन बनवा लीजिए, सौ-डेढ़ सौ रुपए का। ताँबे के लोटे में दूध डालिए — ताँबा ही, इस प्रक्रिया में और कोई धातु नहीं चलेगी, जबकि बाकी समय में ताँबे के लोटे में दूध डालकर शिव जी को चढ़ाया नहीं जाता — और देर मत कीजिए, फटाफट कीजिए। मंदिर में लोटे में दूध डालकर उसमें नाग-नागिन का जोड़ा डाल दीजिए, और मन में पंचाक्षरी मंत्र का जप करते हुए शिव जी को चढ़ा दीजिए। नाग-नागिन उनके ऊपर चढ़ जाने के बाद उन्हें फिर स्पर्श नहीं करना है। उसके बाद जल चढ़ा दीजिए, धूप-दीप, यथा सामर्थ्य शृंगार आदि कर दीजिए — लेकिन गिरने के बाद नाग-नागिन का स्पर्श नहीं होना चाहिए। तीसरा वे जोड़ते हैं — काला तिल दूध में मिलाकर, या जल में मिलाकर, उससे अभिषेक कीजिए तो भी तुरंत कृपा होती है। अभिषेक घर में भी कर सकते हैं, लेकिन नाग-नागिन वाला घर में मत कीजिएगा, वह मंदिर में ही करना है।
जहाँ परंपरा बची ही नहीं, वहाँ इसी सत्र में बताई विधि ही विधान है
जिस घर में कुलदेवी सप्तमी की परंपरा ही लुप्त हो चुकी है वह क्या करे?
जैसा इस सत्र में बताया गया है, पूरा उसी अनुसार कीजिए — पूरा लाइव इसी पर है। मध्य प्रदेश के श्रोता को भी वही उत्तर है: अपने क्षेत्र के नजदीक जो शक्तिपीठ पड़े उसे देख लीजिए। कर्म साक्षी दीपक की विधि पर चैनल पर पहले से चार-पाँच वीडियो हैं।
एक श्रोता कहते हैं कि उनके घर में कभी कुलदेवी सप्तमी की पूजा नहीं हुई, प्रथा-परंपरा लोप है, और पंचाक्षरी (पंचाक्षरी मंत्र) चल रहा है — तो कैसे और क्या पूजन करें। वक्ता का उत्तर है कि जैसे बताया है, पूरा उसी अनुसार आप कर सकते हैं — पूरा लाइव इसी के ऊपर है। मध्य प्रदेश के श्रोता के लिए भी वही नियम है — आपके क्षेत्र के नजदीक जो भी शक्तिपीठ पड़े, आप देख लीजिए। कर्म साक्षी दीपक पर वे दोहराने के बजाय पहले से मौजूद सामग्री की ओर भेजते हैं — उस पर चार-पाँच वीडियो हैं, 'दीपक गृह तंत्र' लिखकर सर्च कीजिए; दीपक में बाती कैसी होनी चाहिए, दीपक कैसे जलाना है, सारा विषय चैनल पर उपलब्ध है। मास के दौरान व्यक्तिगत संपर्क पर भी वे वही रेखा रखते हैं — बात श्रावण मास आदि के बाद हो पाएगी, टेलीग्राम पर या कॉल मी फॉर ऐप पर।
जाति से यह तय नहीं होता कि आपकी कुलदेवी कौन हैं
क्या जाति से तय होता है कि किसी कुल की कुलदेवी कौन हैं?
नहीं — आप यादव हैं या क्षत्रिय, इससे फर्क नहीं पड़ता। कुलदेवी कौन हैं, यह तो उस कुल के लिए देखना पड़ेगा; जाति से ऐसे नहीं बोल सकते। पता न हो तो जैसा बताया गया है वैसे नजदीक के शक्तिपीठ का पूजन कीजिए।
वक्ता उस श्रोता को उत्तर देते हैं जिसने प्रश्न अपनी जाति के हिसाब से रखा था। आप यादव हैं, क्षत्रिय हैं — इससे फर्क नहीं पड़ता, वे कहते हैं। कुलदेवी कौन हैं, वह तो देखना पड़ेगा; किनका पूजन होता है, यह जाति से ऐसे नहीं बोल सकते। जहाँ कुल देवता का पता नहीं है, वहाँ वही विकल्प है जो वे पूरे सत्र में देते आए हैं — जैसा बताया गया वैसे अपने नजदीक के शक्तिपीठ का पूजन कीजिए। पश्चिम बंगाल को लेकर पूछे गए ऐसे ही प्रश्न का — वहाँ मुख्य शक्ति काली जी हैं या दुर्गा जी — उत्तर वे यह देते हैं कि दोनों मुख्य हैं; आप कहाँ रहते हैं यह देखिए और जो पास में शक्तिपीठ हो उन्हीं को मानिए।
मंदिर में सात-सात का दान उपाय नहीं, विधान है
क्या कुलदेवी का पूजन मंदिर में दान करके भी किया जा सकता है?
हाँ — सात शृंगार, सात प्रकार की मिठाई और सात प्रकार का फल कुलदेवी के निमित्त मंदिर में दान किया जा सकता है। वक्ता यह स्पष्ट करते हैं कि यह कोई उपाय के तौर पर नहीं है — यह ऐसा विधान है जिससे उनकी कृपा होती है।
एक श्रोता बताते हैं कि वे दो साल से सप्तमी के दिन, बताए अनुसार, मंदिर जाकर कुलदेवी के निमित्त सात प्रकार की मिठाई, शृंगार, पेटी आदि दान करते हैं। वक्ता इसे सराहते हैं और रूप को सामान्य कर देते हैं — सात शृंगार, सात प्रकार की मिठाई, सात प्रकार का फल; यह सब भी आप मंदिर में दान कर सकते हैं। इसकी श्रेणी पर वे सावधान हैं। ऐसा नहीं है कि यह कोई उपाय के तौर पर है — यह ऐसा विधान है जिससे उनकी कृपा होगी। कुलदेवी से संबंधित और भी लाइव और वीडियोज़ चैनल पर हैं, वे कहते हैं, उन्हें सुन लीजिए, कांसेप्ट क्लियर होगा और उनमें और भी आसान-आसान तरीके बताए गए हैं। इसी हिस्से में दो बातें वे मना करते हैं। नए मकान में देवी-देवता ले जाने की आज्ञा माँगे जाने पर वे कहते हैं कि आज्ञा देने वाले हम कौन होते हैं — आप अपनी इच्छा अनुसार ले जाइए; तुलसी जी को आप सीधे लेकर जा सकते हैं। और जहाँ श्रोता को पहले से पता है कि उनकी कुलदेवी माता मनसा देवी हैं, वहाँ वे बिना हिचक कहते हैं — बिल्कुल, फिर मनसा माई की पूजा कीजिए। उनका बारह नाम का स्तोत्र एक दिन पहले ग्रुप में डाला गया था, चाहें तो उसका पाठ करें; उनका सहस्रनाम, सतनाम, कवच सब कुछ है — उनका पाठ-पूजा किया कीजिए, पंचांग सेवा कीजिए।
क्षेत्र की प्राचीन शक्ति प्रमुख रहती हैं, हाल की शक्ति साथ में नाम से
क्षेत्र की प्रचंड पर हाल में प्रकट हुई देवी को ही मुख्य मान लेना चाहिए?
नहीं — क्षेत्र की प्राचीन शक्ति ही प्रमुख रहें। गोरखपुर के श्रोता से वे कहते हैं कि प्रमुख रूप से भगवती विंध्यवासिनी की पूजा कीजिए, और वहाँ की जो शक्ति बहुत प्रचंड तो हैं पर जिनका प्राकट्य बहुत पुराना नहीं माना जाता, उनकी भी सेवा-पूजा उनके नाम से होनी चाहिए।
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश के श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल भगवती विंध्यवासिनी की पूजा कीजिए। श्रोता जिस स्थानीय देवी का नाम लेते हैं, उन पर उनकी शर्त सामर्थ्य की नहीं, प्राचीनता की है। उनका प्राकट्य बहुत ज्यादा समय का नहीं माना जाता; लेकिन वे बहुत प्रचंड शक्ति हैं, और यदि वे आपके क्षेत्र की शक्ति हैं तो उनके नाम से भी सेवा-पूजा होनी चाहिए। बाकी प्रमुख रूप में आप भगवती विंध्यवासिनी की कीजिए — और विशेष करके तब, जब आपको अपनी कुलदेवी के विषय में जानकारी न हो। उस क्षेत्र में तो ऐसे भी उनकी करनी ही चाहिए, वे जोड़ते हैं; यद्यपि उनकी पूजा तो समस्त संसार में होनी चाहिए, और जो करने वाले हैं वे कर ही रहे हैं। एक समय-निर्देश इस प्रसंग को बंद करता है — कुलदेवी का पूजन सुबह कीजिए, सुबह-सुबह पूजन कीजिए।
अलग अर्घी, और साथ में वासुकी, त्रिशूल तथा नंदी
घर में शिवलिंग और अर्घी किस प्रकार रखनी चाहिए?
गृहस्थ के लिए दोनों अलग-अलग होने चाहिए — नीचे अर्घी, पीतल की या पत्थर की, और उसके ऊपर शिवलिंग; एक में जुड़ा हुआ शिवलिंग नहीं होना चाहिए। नर्मदेश्वर रखिए या स्फटिक का, साथ में वासुकी नाग (पंचमुखी हों तो अति उत्तम), त्रिशूल और नंदी जी।
वक्ता एक श्रोता के प्रश्न का उत्तर छोटी सी सूची से देते हैं। गृहस्थ को घर में शिवलिंग और अर्घी अलग-अलग रखनी चाहिए — नीचे अर्घी हो, उसके ऊपर शिवलिंग, शिवलिंग अलग हो। एक में जुड़ा हुआ शिवलिंग नहीं होना चाहिए। नागराज वासुकी आदि को रखना चाहिए। शिवलिंग में नर्मदेश्वर जी रखिए, या स्फटिक के रखिए। अर्घी पीतल की हो या पत्थर की, उसके ऊपर शिवलिंग को रखें। उसमें वासुकी नाग जी हों — पंचमुखी हों तो अति उत्तम। महादेव का त्रिशूल जरूर हो, और नंदी जी हों। इतना तो अवश्य होना चाहिए, वे कहते हैं। जिस श्रोता को कुलदेवी का नाम पता है पर पूजा विधि नहीं, उन्हें भी वे यही कहते हैं कि जैसा आज चर्चा हुई है वैसा आप कर सकते हैं; और यह निर्देश देते हैं कि नारियल फोड़कर अग्नि में नहीं चढ़ाना है — नारियल हवन के बाद अलग से चढ़ा दीजिए।
सामान्य सप्तमी से ऊपर अपने कुल की तिथि
यदि किसी घर में कुलदेवी का पूजन पहले से किसी और तिथि को होता हो तो?
अपनी ही रखिए। यदि आपके घर में कुलदेवी की पूजा पहले से पूर्णिमा को होती आई है तो पूर्णिमा को ही कीजिए, और सप्तमी के दिन सामान्य पूजन कर लीजिए। जिन्हें अपनी तिथि पता है वे उसी पर रहें; जिन्हें नहीं पता वे सब सप्तमी को करेंगे — इसीलिए इसे कुलदेवी सप्तमी कहते हैं।
वक्ता सत्र के आरंभ में खोला हुआ सूत्र यहाँ बंद करते हैं, उस श्रोता को उत्तर देते हुए जिनके घर का पूजन पूर्णिमा को पड़ता है। यदि आपके घर में कुलदेवी का पूजा पहले से पूर्णिमा को होता आया है, तो आप पूर्णिमा को ही करेंगे। सप्तमी के दिन का सामान्य पूजन कर लीजिए। सामान्य नियम वे दोहराते हैं — जिनका नियम है और जिन्हें पहले से पता है कि इस तिथि को उनका पूजन होता है, वे उसी तिथि को कीजिए। जिन्हें नहीं पता, वे सब सप्तमी को करेंगे — और इसी कारण इस सप्तमी को कुलदेवी सप्तमी कहते हैं। इसे वे पूरे मास पर लगा देते हैं — सावन मास में यदि किसी का पूजन अपनी तिथि के अनुसार किसी और दिन होता है, या पूर्णिमा को होगा, तो आप वैसा ही कीजिए। अंत में तीन निर्देश और आते हैं। इंदौर के नजदीक के श्रोता के लिए — चामुंडा माँ का बिल्कुल कर सकते हैं। नौना का विसर्जन उसी दिन किया जा सकता था, आज ही कर देना था; कल करेंगे तो भी कोई दिक्कत नहीं है। और जिस श्रोता की जगन मंगल काली कवच की साधना सोमवार को पूरी हो रही है और जिन्हें बहुत अच्छा अनुभव हुआ, उनसे वे कहते हैं कि जगन मंगल काली कवच मेरा नहीं, वह भगवती काली का है; अनुभव अच्छा हुआ, बहुत अच्छी बात है; साधना को कंटिन्यू रखिए — भले संख्या कम कर दीजिए, लेकिन उनका जप रखिए, और साथ में भैरव जी का अवश्य कीजिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।