किन घरेलू पौधों पर प्रेत आकर्षित होते हैं और कौन सुरक्षित हैं
घरेलू पौधों पर वनस्पति तंत्र पर नोट्स।
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सनातन में गाय, कुत्ते, तुलसी और पीपल की वर्गीकृत सेवा क्यों कही गई है
मंत्र, मणि, औषधि भाव से फल देते हैं; आधुनिकतावादी आपत्ति का उत्तर
वक्ता कहते हैं कि तंत्र में वनस्पति और औषधि का अत्यंत महत्व है, और यह कहावत दोहराते हैं कि मंत्र, मणि और औषधि तीनों भाव के अनुसार फल देते हैं। सनातन संस्कृति में, वे कहते हैं, जीव, वनस्पति और प्रकृति की सेवा का महत्व सबसे अधिक है और सबकी सेवा करने को कहा गया है — फिर भी गाय, कुत्ते, तुलसी और पीपल की वर्गीकृत सेवा भी कही गई है, और उसका कारण है। वे उन आधुनिक सोच वालों की आलोचना करते हैं जो वेद के मर्मज्ञ बनकर भी इन्हें ढोंग-पाखंड कहते हैं और उन्हीं आचार्यों को गलत साबित करते हैं जिनसे उन्होंने सीखा; उनका वीडियो इन कारणों को समझाने के लिए है।
वक्ता कहते हैं कि तंत्र में वनस्पति और औषधि का अत्यंत महत्व है। कहते भी हैं, वे बताते हैं, कि मंत्र, मणि और औषधि — ये तीनों भाव के अनुसार फल देते हैं। सनातन संस्कृति में, वे कहते हैं, जीव की, जीवात्मा की, वनस्पति की, पेड़-पौधों की, प्रकृति की सेवा का महत्व अत्यंत अधिक है; सभी की सेवा करने को कहा गया है। लोग कहते हैं कि गाय-कुत्ते की सेवा से क्या होगा, एक विशेष प्राणी की सेवा क्यों, सबकी सेवा करो। ठीक है, वे कहते हैं, सबकी सेवा करनी चाहिए — लेकिन क्लासिफाइड सेवा करने को क्यों कहा गया है? कुछ कारण रहा है। वे शिकायत करते हैं कि आज के समय में लोग आधुनिकता के कारण हर चीज़ पर प्रश्न उठा देते हैं — चाहे कितने बड़े आध्यात्मिक हों, वेद पढ़ लिए हों, स्वयं को वेद का मर्मज्ञ कहें, वेदांत भाष्य लिखते हों — और उन्हीं महात्माओं, उन्हीं धर्माचार्यों को गलत साबित करते हैं जिन्हें पढ़कर वे आगे बढ़े। वे सिलेक्टिव चीज़ें चुनते हैं जो उन्हें सही लगती हैं, और चूँकि उन्हें आधुनिकता का परिचायक बनना है, बाकी सब उन्हें ढोंग और पाखंड लगता है: गौ की सेवा पाखंड, कुत्तों के लिए कुछ करना पाखंड, केवल तुलसी को जल देना पाखंड, केवल पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। की सेवा पाखंड; कहते हैं हम सबकी करेंगे। वहीं से, वे कहते हैं, वे इस सबको अंधविश्वास से जोड़ देते हैं — घर में कैक्टस लगाने के प्रश्न सहित, जहाँ से उनकी चर्चा शुरू होती है।
क्या कैक्टस के पौधों में प्रेत रहते हैं?
वह मरुद्गण वायु जो प्रेत को कैक्टस की ओर खींचती है
वक्ता कहते हैं कि यह 100% सत्य है: जहाँ प्रेत उपस्थित होते हैं, वहाँ कैक्टस स्वतः उगता और बड़ा हो जाता है। लेकिन घर के कैक्टस में फूल आने का यह अर्थ नहीं कि आपके घर में प्रेत बैठा है। मेहमान, मित्र, रिश्तेदार, पड़ोसी आते-जाते रहते हैं और उन्हीं में कभी न कभी कोई ऐसा होगा। वायु तत्त्व के 49 प्रकार के मरुद्गण में से एक वायु प्रेतों से संबंधित है; वैसी वायु चल रही हो और उस समय कोई प्रेत-ग्रसित या प्रेत से उन्मादित व्यक्ति आपके घर आए और उसे यह पौधा मिले, तो वह चीज़ अंशात्मक रूप से वहाँ आकर्षित होगी — 24 घंटे वास नहीं करेगी, पर कुछ समय आएगी, क्योंकि यह पौधा उसे आकर्षित करता है।
जो लोग पूछते हैं कि आप घर में कैक्टस लगाने से क्यों मना करते हैं और क्यों कहते हैं कि इसमें प्रेतों का वास होता है, उन्हें वक्ता उत्तर देते हैं कि यह 100% सत्य है: जिस जगह प्रेत उपस्थित होते हैं, कैक्टस का पौधा स्वतः बढ़ता है, काफी बड़ा हो जाता है। आदमी आजकल घर में लगाता है। वे कहते हैं कि शो के लिए सजाकर रखे कैक्टस में फूल आने लगें तो यह बिल्कुल आवश्यक नहीं कि आपके घर में प्रेत बैठा है; आपका घर बहुत बढ़िया चल रहा होगा। लेकिन घर में लोग आते-जाते हैं — मेहमान, मित्र, रिश्तेदार, अगल-बगल के पड़ोसी — और उन्हीं में से कभी न कभी कोई ऐसा समय आएगा, कुछ ऐसा होगा, क्योंकि यह तत्व ही ऐसा है। वे तंत्र वायु तत्त्व से समझाते हैं: कहते हैं कि 49 प्रकार के मरुद्गण होते हैं, 49 प्रकार की वायु चलती है, और उनमें एक वायु को प्रेतों से संबंधित माना गया है। मान लीजिए उस प्रकार की वायु चल रही हो, और उसी समय कोई प्रेत-ग्रसित, प्रेत से उन्मादित व्यक्ति आपके घर आए और वहाँ उसे यह चीज़ मिले — तो अंशात्मक रूप से वह चीज़ वहाँ आकर्षित होगी। 100%, 24 घंटे वहाँ वास नहीं करेगी, लेकिन कुछ समय होगा जब वह वहाँ आएगी, क्योंकि यह चीज़ उसे आकर्षित करती है।
घर में फूल न देने वाला काँटेदार पौधा: उस पर छाया और वह क्यों आकर्षित करता है
पौधा घर के आभामंडल से पोषित होता है; शोरूम का सोना बनाम कचरे का सोना
वक्ता कहते हैं कि हर काँटेदार पौधा समस्या नहीं — गुलाब तो भगवती को चढ़ता है। लेकिन घर में लगाया गुलाब अनेक प्रयासों के बाद भी कभी फूल न दे, न सूखे न खिले, तो वह किसी चपेट में आ चुका है; उसे विसर्जित कर दें। यह छाया, वे कहते हैं, तब पड़ती है जब प्रेत-संबंधी मरुद्गण वायु चल रही हो और प्रेत का प्रभाव अत्यधिक हो। घर में यह इसलिए होता है क्योंकि घर की चीज़ आपके पूजा-पाठ की ऊर्जा, आपके विचारों और आपके आभामंडल से — सात्विक या तामसिक — पोषित होकर अलग तरह से जीवंत होती है — जैसे जौहरी के केबिन का सोना बनाम कचरे में पड़ा सोना। सजे-सँवरे घर में फूलता कैक्टस कचरे में उगे कैक्टस से कहीं अधिक ऐसी चीज़ों को खींचता है; प्रभावित व्यक्ति आए तो दोनों एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं और वहाँ वास सुनिश्चित हो जाता है — अनजाने में की गई आकर्षण क्रिया। हर काँटेदार पौधा कहीं न कहीं ऐसी चीज़ों को खींचता है, इसलिए फूल न देने वाला गुलाब हटा दें।
कौन सा गुलाब, वक्ता पूछते हैं — सब गुलाब ऐसे नहीं होते। काँटेदार वृक्षों में गुलाब तो भगवती को समर्पित किया जाता है; कौन से देवी-देवता हैं जिन्हें नहीं चढ़ता? लेकिन चूँकि वह काँटेदार है, यदि आपके घर में पुष्पविहीन पौधा है — आपने गुलाब लगाया और अनेकों प्रयास के बाद भी उसमें गुलाब नहीं हो रहे — तो कृपया उसे विसर्जित कर दें। वह सूख भी नहीं रहा, फूल भी नहीं दे रहा: कहीं न कहीं वह किसी चपेट में पड़ चुका है। यह छाया उस पर कब पड़ती है? जब मरुद्गण में उस प्रकार की वायु चल रही हो — प्रेत-कल्प कहिए या प्रेत का प्रभाव — और वह अत्यधिक हो; उस समय वह बली हो और इन सब चीज़ों के संपर्क में आए। और घर में ही क्यों? क्योंकि, वे कहते हैं, घर में जो चीज़ उपस्थित है वह आपके पूजा-पाठ से निर्मित ऊर्जा से शुद्ध है, आपके विचारों के वातावरण से शुद्ध है। आसपास के जीवों द्वारा उत्सर्जित ऊर्जाओं को वह स्वयं ग्रहण कर रही है; आपके आभामंडल से जो निकल रहा है उससे पोषित हो रही है, आपके विचारों को ग्रहण कर रही है — सात्विक हों या तामसिक, यह अलग बात है। उन्हें ग्रहण करने के कारण वह भी जीवंत है, एक अलग प्रकार की चीज़ है। कचरे में पड़ा सोना और जौहरी के केबिन में सजा सोना, दोनों में कुछ तो फ़र्क होता है, वे कहते हैं; कचरे से निकालकर सोना जौहरी के पास ले जाओ तो हो सकता है वह दाम कम दे। ठीक उसी प्रकार कचरे में जमा कैक्टस अपना प्रभाव अलग तरह से देगा, लेकिन वही कैक्टस आपने घर में सजा लिया, उसमें फूल आ रहे हैं, पूरा घर कैक्टस के शोरूम की तरह — वहाँ जब इस प्रकार के व्यक्ति आते हैं तो वे चीज़ें और अधिक आकर्षित हो जाती हैं। दोनों एक-दूसरे को आकर्षित करेंगे, वहाँ उनका वास सुनिश्चित हो जाएगा, और आपके घर में प्रभाव पड़ना शुरू हो जाएगा। इसे अनजाने में की गई आकर्षण की क्रिया मानकर चलिए। इस प्रकार के जितने काँटेदार वृक्ष हैं, वे कहीं न कहीं ऐसी चीज़ों को आकर्षित करते हैं। तो पुष्पविहीन चीज़ें — गुलाब है और गुलाब नहीं हो रहा — हटा दीजिए।
क्या बेल के वृक्ष में काँटों के बावजूद प्रेत रहते हैं?
सदाशिव को चढ़ने वाला फलता वृक्ष प्रेत को आश्रय नहीं दे सकता
यह पूछे जाने पर कि बिल्व के वृक्ष में भी तो काँटे होते हैं, क्या उसमें प्रेतों का वास हो सकता है, वक्ता कहते हैं नहीं: बेल को साक्षात श्री का वृक्ष, नारायण का साक्षात स्वरूप, नारायण का हृदय माना गया है, और उसके पुष्प, फल, पत्ते सदा सदाशिव और भगवती को चढ़ाए जाते हैं। जिस वृक्ष में फल लग रहा है उसमें प्रेत नहीं हो सकता।
वक्ता स्वयं आपत्ति उठाते हैं: बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। के वृक्ष में भी तो काँटे होते हैं, तो क्या बेल में प्रेतों का वास होता है? बेल को, वे कहते हैं, साक्षात श्री का वृक्ष कहा गया है, नारायण का साक्षात स्वरूप, नारायण का हृदय माना गया है। क्या उस पर प्रेतों का वास कभी हो सकता है? जिसके पुष्प, फल, पत्ते सदा सदाशिव को, भगवती को चढ़ाए जाते हैं — क्या उस पर प्रेत रह सकते हैं, केवल इसलिए कि उसमें भी काँटे हैं? यह जान लीजिए, वे कहते हैं: नहीं। जिस वृक्ष में फल लग रहा है, उसमें नहीं हो सकता।
आधा सूखा बेल का वृक्ष तामसिक प्रयोगों का स्थान
प्रेत वहाँ लोगों द्वारा बैठाए जाते हैं, स्वयं नहीं आते
वक्ता कहते हैं कि जब बिल्व का वृक्ष सूखने लगे और काँटे रहते हुए उसे हटाया न जाए — बीच की अवस्था, न पूरा सूखा न जीवित, झड़ता हुआ — तब आकर्षण और वशीकरण से संबंधित जितने प्रेतयुक्त कर्म हैं, तामसिकता भरे जितने कर्म हैं, ऐसे वृक्ष को खोजकर किए जाते हैं। प्रेत उसमें स्वयं नहीं रहता, स्वयं नहीं आता; लोग उसे वहाँ बैठाते हैं, यह जानते हुए कि तामसिक क्रिया वहाँ सफल होगी, क्योंकि वृक्ष में देवतुल्य शक्ति अभी भी है और देवता शरणागत को हटाते नहीं। ऐसे वृक्षों पर ध्यान दें तो बाँध-बाँधकर लटकाया हुआ दिखेगा। कभी-कभी इन कर्मों से इतनी ऊर्जा अवशोषित हो जाती है कि निर्जन स्थान का हरा-भरा बेल भी सूखने लगता है। वे कहते हैं कि लोग ये बातें खुलकर नहीं बताते, जैसा उन्होंने बाँस वाले वीडियो पर देखा।
वक्ता कहते हैं कि फलते बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। में प्रेत नहीं हो सकता, लेकिन जब बेल का वृक्ष सूखने लगे और सूखने के बाद भी उसे हटाया न जाए, और उसमें काँटे आ रहे हों — तब उन्हीं जगहों पर देखिए। लोग इन चीज़ों को खोलकर नहीं बोलते, वे कहते हैं; बाँस वाले वीडियो में बहुत सी बातें कहने पर लोगों ने अनेक प्रकार की बातें कहीं, तो खुलकर नहीं बताएँगे। जिस अवस्था की बात है वह बीच की है: न पूरा सूखा, न अभी जीवित, झड़ रहा है। इस अवस्था में आकर्षण और वशीकरण से संबंधित जितने प्रेतयुक्त कर्म हैं, तामसिकता से भरे जितने कर्म हैं, ऐसे वृक्ष को खोजकर किए जाते हैं। प्रेत उसमें रहता नहीं, उसमें आकर्षण नहीं होता, स्वयं से नहीं आ सकता — लोगों द्वारा वहाँ बैठाया जाता है। उन्हें पता होता है कि इस प्रकार की तामसिक क्रियाएँ इस वृक्ष पर सफलतम होंगी। क्यों? क्योंकि उसमें देवतुल्य शक्ति तो है, लेकिन वह शक्ति अब कैसी हो चुकी है? वे देवता किसी को हटाएँगे, भगाएँगे क्या? जो भी उनकी शरणागति में आएगा उसे रखेंगे। इसलिए, वे कहते हैं, सुरक्षात्मक दृष्टि से तांत्रिक लोग वहाँ प्रयोग कर देते हैं — और ऐसे वृक्षों पर ध्यान दोगे तो बाँध-बाँधकर लटकाया हुआ मिलेगा। कभी-कभी, वे जोड़ते हैं, अवस्था ऐसी हो जाती है कि इन प्रेतयुक्त कर्मों के कारण निर्जन स्थान के बेल के वृक्ष सब सूखने लगते हैं; इतनी ऊर्जा का अवशोषण कर लेते हैं कि अच्छा-खासा हरा-भरा वृक्ष भी सूखने लगता है। सामान्य और अत्याधुनिक, बहुत पढ़े-लिखे लोग यह सुनकर सोचेंगे कि बस ऐसे ही है — लेकिन इसमें ऊर्जाएँ काम करती हैं।
घर में गुलाब और बेल: तभी तक रखें जब तक फूल-फल आ रहे हों
कौन से काँटेदार पौधे पूज्य हैं, और कब हटाएँ
काँटेदार वृक्षों में, वक्ता कहते हैं, गुलाब और बिल्व को घर में बिल्कुल रख सकते हैं — वे पूज्य और मान्य हैं — लेकिन तभी तक जब तक वे सही से पल्लवित हो रहे हों, फूल और फल दोनों आ रहे हों। जब सूखने लगें, झड़ने लगें, तो नहीं रखना चाहिए; हटा देना चाहिए।
घर में वनस्पति तंत्र करने वाले के लिए कौन से पौधे उपयुक्त हैं, इस पर वक्ता दो काँटेदार पौधे गिनाते हैं: गुलाब और बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। का वृक्ष। इन्हें घर में रखिए, वे कहते हैं — बिल्कुल पूज्य हैं, मान्य हैं, योग्य हैं। लेकिन कब तक? जब तक वे सही से पल्लवित हो रहे हैं, जिनमें फूल और फल दोनों आ रहे हैं। जब सूखने लगें, हटने लगें, तो नहीं रखना चाहिए, हटा देना चाहिए।
कैक्टस घर में कभी क्यों नहीं लगाना चाहिए?
इसके फूल प्रेत-सिद्धि के चढ़ावे में प्रेतों को जाते हैं
वक्ता कहते हैं कि कैक्टस कहीं भी पूजने के लिए नहीं है — वह प्रेतों को चढ़ता है। प्रेत कर्म में, जिसने प्रेत सिद्धि की हो उसे हर अमावस्या को निर्जन क्षेत्र में पीपल के नीचे जाकर दाल-भात और ऐसे पदार्थ रखने पड़ते हैं, मदिरा आदि भी देनी होती है; उसमें जो सब जाता है उसमें कैक्टस पर उगे फूल ही रखे जाते हैं। तो वह एक तरीके से उनके लिए आकर्षण का केंद्र है, इसलिए इसे घर में नहीं लगाना चाहिए।
कैक्टस, वक्ता कहते हैं, कहीं भी पूजने के लिए नहीं है; वह प्रेतों को चढ़ता है। प्रेत कर्म में — जिसमें किसी ने प्रेत सिद्धि की हो — हर अमावस्या के दिन निर्जन क्षेत्र में पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। वृक्ष के नीचे जाकर दाल-भात और इसी प्रकार के पदार्थ रखने पड़ते हैं; मदिरा इत्यादि भी देनी होती है। प्रेत कर्मों में ऐसा होता है। उस समय जो सब चीज़ वहाँ जाती है, वे कहते हैं, उसमें कैक्टस के ऊपर उगे फूल ही रखे जाते हैं। तो एक तरीके से कैक्टस उनके लिए आकर्षण का केंद्र है — इसलिए इसे नहीं लगाना चाहिए।
घर की रक्षा के लिए श्वेत आक और दूध वाले पौधों पर सावधानी
श्वेतार्क हर जगह नहीं; दूध वाला पौधा दोनों ओर काम करता है, इसलिए स्रोत महत्वपूर्ण
घर के रक्षण के लिए, वक्ता कहते हैं, हम जानते हैं कि मदार या आक (मदार) (अकवन) — श्वेत आक, श्वेतार्क — का पौधा घर के पास लगाना चाहिए। श्वेतार्क हर जगह उपलब्ध नहीं, तो क्या सामान्य आक लगा सकते हैं? वे कहते हैं कि दूध वाले पौधों में दोनों प्रकार की चीज़ें होती हैं, इसलिए श्वेतार्क का पौधा लाते समय यह ध्यान रखना है कि किस जगह से ला रहे हैं।
इसके सिवाय, वक्ता कहते हैं, घर के रक्षण हेतु हम जानते हैं कि मदार का वृक्ष — आक (मदार)दूधिया लेटेक्स वाला एक पौधा (आक/मदार) — इसकी श्वेत किस्म (श्वेतार्क) घर की रक्षा हेतु समीप रोपी जाती है, परंतु इसका स्रोत महत्वपूर्ण है, क्योंकि दूधिया पौधों में जहाँ से लाए जाएं उसके अनुसार द्विविध (सकारात्मक या नकारात्मक) गुण होते हैं।, अकवन — श्वेत आक, श्वेतार्क का पौधा घर के पास लगाना चाहिए। श्वेतार्क हर जगह उपलब्ध नहीं होता। तो क्या करें — सामान्य आक लगा सकते हैं कि नहीं? फिर यह भी कहा जाता है, वे बताते हैं, कि दूध युक्त पौधों में दोनों प्रकार की चीज़ें होती हैं। तो आपको यह ध्यान रखना है कि श्वेतार्क का पौधा जब ला रहे हैं तो किस जगह से ला रहे हैं।
चार बातें जो तय करती हैं कि पवित्र पौधा घर को क्या फल देगा
स्रोत, नक्षत्र, स्थान और घर की स्थिति; उतारे का जाल
वक्ता बार-बार कहते हैं कि बाँस, पीपल, बरगद, आक (मदार) और नवग्रह के वृक्ष सभी पवित्र हैं, लेकिन पौधा आपको क्या फल देगा यह इस पर निर्भर करता है कि आप उसे किस जगह से ला रहे हैं, किस नक्षत्र में ला रहे हैं, कहाँ लगाएँगे, और आपके घर की स्थिति क्या है। यदि ऐसी जगह से आक ले आए जहाँ पहले किसी प्रकार का उतारा या प्रेत क्रिया की गई है, तो उसके साथ वह भी आ जाएगा, आपको जानकारी नहीं होगी।
वक्ता कहते हैं कि वे पुनः-पुनः बोलते हैं: बाँस का वृक्ष हो, पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। हो, बरगद हो, या आप आक (मदार)दूधिया लेटेक्स वाला एक पौधा (आक/मदार) — इसकी श्वेत किस्म (श्वेतार्क) घर की रक्षा हेतु समीप रोपी जाती है, परंतु इसका स्रोत महत्वपूर्ण है, क्योंकि दूधिया पौधों में जहाँ से लाए जाएं उसके अनुसार द्विविध (सकारात्मक या नकारात्मक) गुण होते हैं। (अकवन) लाएँ, सभी पवित्र वृक्ष हैं; नवग्रह के वृक्ष भी पवित्र हैं। लेकिन आप किस जगह से ला रहे हैं, किस नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। में ला रहे हैं, कहाँ लगाएँगे, और आपके घर की स्थिति क्या है — इन सभी पर निर्भर करता है कि वह आपको क्या फल देगा। यदि आप ऐसी जगह से आक का वृक्ष ले आए हैं जहाँ पहले से किसी प्रकार का उतारा, किसी प्रकार की प्रेत क्रिया की गई है, तो उसके साथ वह भी आ जाएगा — और आपको जानकारी नहीं है।
वनस्पति तंत्र के लिए पौधा घर लाने की प्रक्रिया
भूमि शोधन, अभिमंत्रित सरसों, देवताओं से हटाने की प्रार्थना, दीप-निमंत्रण, अगले दिन पुष्य में लाना
किसी भी जगह से पौधा लाने से पहले — खासकर तंत्रोक्त पौधे, जो वनस्पति तंत्र के अनुसार लाए जाते हैं — वक्ता कहते हैं कि एक पूर्व-प्रक्रिया है: जिस भूमि से ला रहे हैं उसका शोधन करें, वहाँ मंत्र विधान से अभिमंत्रित पीली सरसों छींटें, वहाँ के देवी-देवताओं से हटाने के लिए कहें, यह कार्य अपने इष्ट देवता के द्वारा करें, दीप प्रज्वलित करके फिर पौधे को निमंत्रण दें, और अगले दिन जाकर उसे लाएँ। यह सब करने के बाद भी, जानकारी न हो, देखना-सुनना न आता हो, तो कोई गारंटी नहीं; इसलिए ऐसी जगह से लाएँ जो सही हो, और नक्षत्र सही हो — देव नक्षत्र, सबसे बढ़कर पुष्य नक्षत्र, चाहे रवि पुष्य हो या गुरु पुष्य।
इसीलिए, वक्ता कहते हैं, किसी भी जगह से पौधा लाकर लगाने से पहले की प्रक्रिया होती है — खासकर तंत्रोक्त पौधे, जो वनस्पति तंत्र के अनुसार लाए जाते हैं। जिस जगह से ला रहे हैं उस भूमि का शोधन करेंगे। वहाँ मंत्र विधान से अभिमंत्रित पीली सरसों छींटेंगे। वहाँ के देवी-देवताओं को हटाने के लिए कहेंगे, ये कार्य अपने इष्ट देवता के द्वारा करेंगे। पहले दीप इत्यादि का प्रज्वलन करेंगे, फिर निमंत्रण देंगे। अगले दिन जाकर उसे लेकर आएँगे। यह पूरी प्रक्रिया है। यह सब करने के पश्चात भी, वे कहते हैं, कोई गारंटी नहीं है यदि आपको जानकारी नहीं है — देखना-सुनना नहीं आता तो कोई गारंटी नहीं कि चीज़ें सही से होंगी। इसलिए ऐसी जगह से लाना चाहिए जो सही हो, और नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। सही होना चाहिए। किस नक्षत्र में? देव नक्षत्र में लाइए। पुष्य नक्षत्र बार-बार कहा जाता है — चाहे रवि पुष्य हो, गुरु पुष्य हो, इस नक्षत्र में लाइए तो ये सब चीज़ें सही तरीके से होंगी। इसी प्रकार, वे कहते हैं, वनस्पति तंत्र का प्रयोग करना चाहिए।
घर में अपराजिता और शमी: उनका खिलना और सूखना क्या संकेत देता है
खिलती अपराजिता का अर्थ शुभ शक्तियों और योगिनियों का आना-जाना; संवेदनशील पौधे तंत्र वाली जगह सूखते हैं
वक्ता कहते हैं कि अपराजिता और शमी का पौधा घर में ज़रूर लगाना चाहिए और उसी प्रकार सेवा करनी है — नील, श्वेत या कृष्ण वर्ण की अपराजिता, कोई भी। यदि अपराजिता में पुष्प आने लगे तो मान लीजिए कि घर में शुभ शक्तियों का उद्भव हो चुका है: भगवती की शक्तियाँ, योगिनियाँ और उनकी अंग-शक्तियाँ नित्य आती-जाती हैं, तभी वह सही से पल्लवित होती है; आप पर उसका क्या प्रभाव है वह आपके कर्म पर निर्भर है, पर शक्तियों का आवागमन है, क्योंकि वातावरण में सकारात्मकता हो तभी पुष्प आते हैं। तुलसी, आक (मदार), अपराजिता और शमी का आभामंडल और ऊर्जा उत्सर्जन की प्रक्रिया इतनी संवेदनशील है कि जहाँ तंत्र का प्रयोग हो या जगह सही न हो, ये तुरंत सूखने लगते हैं।
वक्ता कहते हैं कि अपराजिता का पौधा और शमीउपाय-अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक पत्ता — परंपरागत रूप से शनिवार को नहीं तोड़ा जाता; शनिवार के अनुष्ठान हेतु आवश्यक हो तो इसे पूर्व शुक्रवार को तोड़ लिया जाता है। जी का पौधा घर में ज़रूर लगाना चाहिए, और सेवा भी उसी प्रकार करनी है। चाहे नील अपराजिता हो, श्वेत अपराजिता हो, या कृष्ण वर्ण की — कोई भी अपराजिता लगाएँ। यदि अपराजिता में पुष्प आने लगे तो यह मानकर चलिए कि घर में शुभ शक्तियों का उद्भव हो चुका है: भगवती की शक्तियाँ, योगिनियाँ, उनकी अंग-शक्तियाँ नित्य आती-जाती हैं, तभी यह सही तरीके से पल्लवित हो रहा है। प्रभाव क्या दे रहा है वह आप समझिए — आपके क्या कर्म हैं और उनके कारण आपके साथ क्या हो रहा है वह आपकी बात है — लेकिन शक्तियों का आवागमन है। यह इसलिए होता है क्योंकि वातावरण में सकारात्मकता रहेगी तभी इनमें पुष्प सही तरीके से आना शुरू होता है; यह बहुत बड़ा विषय है, वे कहते हैं। चाहे तुलसी का पौधा हो, आक (मदार)दूधिया लेटेक्स वाला एक पौधा (आक/मदार) — इसकी श्वेत किस्म (श्वेतार्क) घर की रक्षा हेतु समीप रोपी जाती है, परंतु इसका स्रोत महत्वपूर्ण है, क्योंकि दूधिया पौधों में जहाँ से लाए जाएं उसके अनुसार द्विविध (सकारात्मक या नकारात्मक) गुण होते हैं। हो, अपराजिता हो या शमी जी का पौधा — ये ऐसे पौधे हैं जिनका स्वयं का आभामंडल, ऊर्जा उत्सर्जन की विधि या प्रक्रिया इतनी संवेदनशील होती है कि जहाँ तंत्र का प्रयोग रहेगा, जगह सही नहीं रहेगी, ये तुरंत सूखने लगते हैं।
घर बनाने से पहले प्रेत-दोष वाली भूमि की शुद्धि के लिए अनार रोपण
नौ या सत्ताईस वृक्ष एक वर्ष फलने तक छोड़े जाते हैं, फिर अधिकांश हटाकर भूमि शोधन
वक्ता कहते हैं कि अनार के वृक्ष को साक्षात भगवती का स्वरूप कहा गया है। जिस भूमि में प्रेत दोष या वैसा तांत्रिक दोष हो, वहाँ घर बनाने से पहले अनार का रोपण किया जाता है — आवश्यकता अनुसार नौ या सत्ताईस वृक्ष — और एक वर्ष के लिए छोड़ा जाता है; वे पूरी तरह लग जाएँ और पूरा फल आ जाए। फिर उखाड़कर अन्य जगह लगा दिए जाते हैं, पर सब नहीं: सत्ताईस में से नौ रह जाते हैं, अठारह हटते हैं। फिर भूमि शोधन, फिर भूमि पूजन, और तब घर बनता है (प्रेत दोष वृक्ष उपाय)।
अनार के वृक्ष को, वक्ता कहते हैं, साक्षात भगवती का स्वरूप बोला गया है। जिस भूमि में प्रेत दोष इत्यादि हो, कुछ वैसा तांत्रिक दोष हो, वहाँ घर बनाने से पहले इसी अनार के वृक्ष का रोपण किया जाता है। अब वह नौ अनार हों या सत्ताईस अनार के वृक्ष — जितने लगने हैं — पूरा लगाकर एक वर्ष के लिए छोड़ा जाता है। एक बार वह पूरा लग जाना चाहिए, उसमें पूरे का पूरा फल आ जाना चाहिए। उसके पश्चात पुनः उखाड़कर किसी अन्य जगह लगा दिया जाता है, और फिर वहाँ भूमि शोधन इत्यादि की क्रिया की जाती है। पर सब का सब नहीं हटाया जाता: सत्ताईस में से नौ रह जाएँगे, बाकी अठारह हटेंगे। तत्पश्चात भूमि का पूजन इत्यादि होता है और फिर घर बनता है (प्रेत दोष वृक्ष उपायनिर्माण से पूर्व प्रेत दोष से प्रभावित भूमि पर 9 या 27 अनार के वृक्ष — जिन्हें भगवती का साक्षात् स्वरूप माना जाता है — रोपे जाते हैं, एक वर्ष तक पूर्ण रूप से बढ़ने व फल देने तक छोड़े जाते हैं, फिर आंशिक रूप से उखाड़कर अन्यत्र रोपित किए जाते हैं, इसके पश्चात भूमि शोधन व भूमि पूजन के बाद निर्माण आरंभ होता है।)।
वनस्पति तंत्र: उसका दायरा और गृहस्थ की सावधानियाँ
पौधे आकर्षण, वशीकरण, षट्कर्म, मारण और सिद्धि कर्मों में काम आते हैं
वक्ता कहते हैं कि तंत्र में अनेक क्रियाएँ हैं जो वनस्पति के माध्यम से की जाती हैं — आकर्षण, वशीकरण, षट्कर्म, मारण, सब चीज़ की प्रक्रियाएँ, और सिद्धि कर्म। इसलिए गृहस्थ को ध्यान रखना चाहिए कि कौन से पौधे कब लाएँ, कब लगाएँ, वे लग रहे हैं या नहीं; इन सब बातों को ध्यान में रखकर ही वनस्पति तंत्र का सही प्रयोग करना चाहिए।
समापन में वक्ता कहते हैं कि तंत्र में इस प्रकार की अनेक क्रियाएँ हैं जो वनस्पति के माध्यम से की जाती हैं — चाहे आकर्षण-वशीकरण हो, षट्कर्म हो, मारण हो; सब चीज़ की प्रक्रियाएँ होती हैं, सिद्धि कर्म भी होते हैं। तो गृहस्थ को, वे कहते हैं, इन सभी बातों का ध्यान रखना चाहिए: कौन से पौधे कब लाएँ, कब लगाएँ, वह लग रहा है कि नहीं। इन सब चीज़ों को ध्यान में रखकर उसके बाद ही वनस्पति तंत्र का सही तरीके से प्रयोग करना चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।