ग्रहण काल की गुरु गायत्री साधना — अमावस्या से गुरु पूर्णिमा तक का विधान
जून के सूर्य ग्रहण के लिए एक सरल साधना विधान।
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सूर्य ग्रहण और दो ग्रहणों के बीच की नवरात्रि: कई गुना फल देने वाला समय
840 वर्ष बाद चूड़ामणि योग; रविवार का ग्रहण अक्षय फल देता है
वक्ता कहते हैं कि 21 जून के सूर्य ग्रहण में 840 वर्ष बाद चूड़ामणि योग है, और उस समय में की गई कोई भी साधना अपनी साधना को बहुत बल देती है। महात्माओं, संतों और विद्वानों का कहना है, वे बताते हैं, कि ग्रहण काल करोड़ों गुना अधिक फल देने वाला समय है, और रविवार के दिन का सूर्य ग्रहण अक्षय, अनंत गुना फल देता है। वे जोड़ते हैं कि यह पूरा समय गुरु पक्ष है, और इससे विशेष कुछ नहीं हो सकता कि दो ग्रहणों के बीच पूर्ण नवरात्रि पड़ रही है: साधना, तपोबल और ऊर्जा के लिए बहुत अच्छा समय, जिसका सदुपयोग करके इसमें अपनी साधना का आरंभ करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि जो साधना वे रख रहे हैं वह इस ग्रहण काल के लिए है, और यह समय बहुत महत्वपूर्ण है। 21 जून के सूर्य ग्रहण में 840 वर्ष बाद चूड़ामणि योग है, और उस समय में की गई कोई भी साधना अपनी साधना को उतना बल प्रदान करेगी। महात्माओं, संतों और विद्वानों का कहना है, वे बताते हैं, कि करोड़ों गुना अधिक फल देने वाला समय ग्रहण काल है। और उसमें भी रविवार के दिन सूर्य ग्रहण लगे तो वह अक्षय फल, अनंत-अनंत गुना फल देता है। इसीलिए वे यह साधना सबके समक्ष रख रहे हैं। वे जोड़ते हैं कि यह पूरा समय गुरु पक्ष है, और ग्रहण काल और नवरात्रि का यह समय बहुत ही विशेष है। इससे विशेष और कुछ नहीं हो सकता, वे कहते हैं: दो ग्रहणों के बीच पूर्ण नवरात्रि पड़ रही है। साधना के लिए, तपोबल के लिए, ऊर्जा के लिए बहुत अच्छा समय है। वे कहते हैं कि इस समय का सदुपयोग करें और इसमें अपनी साधना का आरंभ करें।
ग्रहण की गुरु साधना किसके लिए है, और गुरु आसानी से क्यों नहीं मिलते
जिनके गुरु नहीं हैं; प्रारब्ध, पुण्य और तपोबल
वक्ता कहते हैं कि यह साधना खास करके उनके लिए है जिनके कोई गुरु नहीं हैं और जो साधना मार्ग पर आना चाहते हैं, और उन साधारण लोगों के लिए भी जो अपने घर-परिवार और स्वयं की सुरक्षा के लिए साधना करना चाहते हैं। अगर गुरु नहीं मिल रहे, या मन लायक गुरु नहीं मिल रहे, तो भटकने की आवश्यकता नहीं: जब तक गुरु न मिलें, यह साधना करें और तब तक के लिए इन मंत्रों को जागृत कर लें। गुरु इतनी आसानी से नहीं मिलते, वे कहते हैं; हमारे कुछ कर्मों का यह प्रारब्ध होता है कि गुरु नहीं मिल रहे। जब वह प्रारब्ध कटेगा, पुण्य बढ़ेंगे, जीवात्मा में बल आएगा, तप की ऊर्जा बढ़ेगी और पुण्यों का संचय होगा, तो गुरु अवश्य मिल जाएंगे। इस समय में की गई यह साधना, वे कहते हैं, तप और तपोबल को अवश्य बढ़ाएगी।
वक्ता कहते हैं कि यह साधना खास करके उनके लिए है जिनके कोई गुरु नहीं हैं और जो साधना मार्ग पर आना चाहते हैं; और उन साधारण लोगों के लिए भी जो अपने घर-परिवार की सुरक्षा और स्वयं की सुरक्षा के लिए साधना करना चाहते हैं। उनके लिए यह साधना है। अगर गुरु नहीं मिल रहे, या मन लायक कोई गुरु नहीं मिल रहे, तो भटकने की आवश्यकता नहीं है, वे कहते हैं। जब तक गुरु न मिलें, तब तक यह साधना करें; तब तक के लिए इन मंत्रों को जागृत कर लें। गुरु, वे कहते हैं, इतनी आसानी से नहीं मिलते। हमारे कुछ कर्मों का यह प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। होता है कि गुरु नहीं मिल रहे। जब वह प्रारब्ध कटेगा, पुण्य में वृद्धि होगी, जीवात्मावर्तमान भौतिक शरीर को सक्रिय करने वाली व्यष्टि आत्मा — जो मूलतः निराकार व निर्लिंग आत्मा से भिन्न प्रतीत होती है। में बल आएगा, तप की ऊर्जा बढ़ेगी और पुण्यों का संचय होगा, तो गुरु अवश्य मिल जाएंगे। तो इस समय में की गई यह साधना, वे कहते हैं, अवश्य तप को, तपोबल को बढ़ाएगी।
ग्रहण की गुरु साधना के लिए कौन सी माला लाएं
शिव के लिए रुद्राक्ष या काला हकीक, जगदंबा के लिए स्फटिक, नारायण के लिए पीला हकीक
वक्ता कहते हैं कि चार प्रकार की मालाओं में से कोई एक माला लाएं, रुद्राक्ष, काला हकीक, पीला हकीक या स्फटिक; एक ही चाहिए, और यही सबसे महत्वपूर्ण चीज है, क्योंकि अंत में इसी माला को पहनना है। चुनाव उस स्वरूप के अनुसार है जिसे गुरु माना जाए: भगवान शिव को गुरु मानना हो तो रुद्राक्ष, या काला हकीक; मां जगदम्बा को तो स्फटिक; भगवान नारायण को तो पीला हकीक। माला को ग्रहण काल से पहले किसी विशेष शुभ दिन प्राण-प्रतिष्ठित कर लेना है; वे कहते हैं कि छोटी, आसान, सात्विक प्राण प्रतिष्ठा विधि वे एक अलग वीडियो में बताएंगे।
इस साधना के लिए क्या-क्या चाहिए, इस पर वक्ता कहते हैं: तीन-चार प्रकार की मालाओं में से किसी एक प्रकार की माला लाएं। या तो रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की, या काला हकीक, या पीला हकीक, या स्फटिकस्फटिक की माला, जब साधक की कुंडली में शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो, तब रुद्राक्ष के स्थान पर चुनी जाती है। की। इन चारों में से कोई एक। चुनाव इस पर है कि किसे गुरु माना जाए। अगर भगवान शिव को गुरु मानना है तो रुद्राक्ष की माला लाएं; शिव के लिए काला हकीक की माला भी ला सकते हैं। अगर मां जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। को गुरु मानकर साधना करनी है तो स्फटिक की माला लाएं। अगर भगवान नारायण को मानकर करनी है तो पीला हकीक की माला। कोई एक माला लाएं और ग्रहण काल से पहले किसी विशेष शुभ दिन उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर लें। वे कहते हैं कि प्राण-प्रतिष्ठा की छोटी, साधारण, सात्विक विधि वे जल्दी ही एक अलग वीडियो में बताएंगे, ताकि कम से कम समय में और आसान विधि से प्राण प्रतिष्ठा की जा सके। बस यही एक माला चाहिए, वे कहते हैं, और यही सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी माला को पहनना है। कैसे पहनना है, किस विधि से, और कितना ऊर्जित करके, यही आगे की साधना बताती है।
गुरु न होने पर ब्रह्मा, विष्णु, शिव या जगदंबा को गुरु मानना
गुरुर् ब्रह्मा गुरुर् विष्णु: भौतिक गुरु मिलने तक परब्रह्म ही गुरु
"गुरुर् ब्रह्मा गुरुर् विष्णु गुरुर् देवो महेश्वरः, गुरुर् साक्षात परब्रह्म" श्लोक का हवाला देकर वक्ता कहते हैं कि गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही साक्षात शिव हैं, परब्रह्म ही साक्षात गुरु हैं। इसलिए जिनके गुरु नहीं हैं वे समझें कि ब्रह्मा जी ही गुरु हैं, विष्णु जी ही गुरु हैं, भगवान शिव ही गुरु हैं, मां जगदम्बा ही गुरु हैं, वह परब्रह्म भगवती ही गुरु हैं, और उन्हें गुरु मान सकते हैं। हमारी योग्यता का, वे कहते हैं, इससे कोई लेना-देना नहीं; उनके समक्ष कोई योग्य बन ही नहीं सकता। जब उनकी कृपा-दृष्टि, इच्छा और आशीर्वाद होगा और हमारे पुण्य का बल होगा, तब वे स्वयं अपने रूप में इस भौतिक जगत का कोई साक्षात गुरु देंगे; तब तक उन्हें गुरु मानकर घर-परिवार के लिए अपनी सात्विक साधनाएं की जा सकती हैं।
वक्ता आरंभ में बोले श्लोक को याद दिलाते हैं, जो सबको पता है: "गुरुर् ब्रह्मा गुरुर् विष्णु गुरुर् देवो महेश्वरः, गुरुर् साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः"। यानी गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही साक्षात शिव हैं, परब्रह्म ही साक्षात गुरु हैं। उसी प्रकार, वे कहते हैं, जिनके गुरु नहीं हैं वे यह समझें: ब्रह्मा जी ही गुरु हैं, विष्णु जी ही गुरु हैं, भगवान शिव ही गुरु हैं, मां जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। ही गुरु हैं, वह परब्रह्म भगवती ही गुरु हैं। तो उन्हें गुरु मान सकते हैं। हमारी योग्यता का, वे कहते हैं, उनसे कोई लेना-देना नहीं है; उनके समक्ष कोई भी व्यक्ति योग्य नहीं बन सकता। जब उनकी कृपा-दृष्टि होगी, उनकी इच्छा होगी, उनका आशीर्वाद और कृपा होगी, और हमारे पुण्य का बल होगा, तब जाकर वे अपने रूप में कोई साक्षात स्थूल गुरु, भौतिक जगत का गुरु, हमें प्रदान करेंगे। तो अभी उन्हें गुरु मानकर ये साधनाएं, अपनी सात्विक साधनाएं, अपने घर-परिवार के लिए की जा सकती हैं।
जिनके गुरु नहीं उनके लिए गुरु गायत्री; जिनके गुरु हैं उनके लिए गुरु मंत्र
ग्रहण में कम से कम अपने गुरु मंत्र का जप
वक्ता कहते हैं कि जिनके गुरु नहीं हैं उनके लिए गुरु गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ है, और जिनके गुरु हैं उनके लिए भी सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन जिनके गुरु हैं उन्हें गुरु मंत्र मिल चुका है, इसलिए वे उसी गुरु मंत्र का जप करें और इस ग्रहण काल के लिए अपने गुरु से विधान लें; उनके लिए भी ग्रहण का समय बहुत महत्वपूर्ण है। अगर किसी और साधना का समय या इच्छा न हो, या किसी कारणवश न कर पा रहे हों, तो कम से कम अपने गुरु मंत्र का जप करें।
वक्ता कहते हैं कि जिनके गुरु नहीं हैं उनके लिए गुरु गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ है; और जिनके गुरु हैं उनके लिए भी सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन जिनके गुरु हैं उन्हें तो गुरु मंत्र मिल चुका है, इसलिए वे उसी गुरु मंत्र का जप करें। इस ग्रहण काल के लिए वे अपने गुरु से विधान ले लें, क्योंकि जिन्हें गुरु मंत्र मिला है उनके लिए भी ग्रहण का यह समय बहुत महत्वपूर्ण है। अगर किसी अन्य साधना के लिए समय न हो, इच्छा न हो, या किसी कारणवश, परिस्थितिवश न कर पा रहे हों, तो कम से कम अपने गुरु मंत्र का जप करें।
ग्रहण के दिन जप में बैठने का समय
10:10 तक बैठें, यथासंभव 2:45 तक; व्यावहारिक लक्ष्य 12:15 तक दो घंटे
वक्ता कहते हैं कि 21 जून को साधना काल सुबह 10:15 से शुरू होगा: कम से कम 10:10 तक बैठ जाएं, और एक आसन पर लगातार कम से कम दोपहर 2:45 तक बैठे रहें। जो इतनी देर नहीं बैठ सकते, नए साधक या जिन्हें बैठने का अभ्यास नहीं, वे जबरदस्ती न करें और आसन छोड़ सकते हैं; लेकिन कम से कम 10:15 से 12:15 तक दो घंटे लगातार बैठने का प्रयास करें, ताकि ग्रहण का स्पर्श काल और मध्य काल, जब पूर्ण ग्रहण लगता है, तक पहुंचें और उसे पार कर लें। इतना भी कर लिया, वे कहते हैं, तो बहुत सारा काम बन जाएगा।
21 जून को साधना काल, वक्ता कहते हैं, सुबह 10:15 से शुरू होगा। कम से कम 10:10 तक बैठ जाएं, और एक आसन पर लगातार कम से कम दोपहर 2:45 तक बैठे रहना है। अगर कोई सक्षम नहीं है, इतनी देर नहीं बैठ सकता, तो कोई दिक्कत नहीं, वे कहते हैं। नया साधक है या बैठने का अभ्यास नहीं है तो ऐसा नहीं है कि जान दे देनी है कि बैठे हैं तो बैठे ही रह गए। आराम से आसन छोड़ सकते हैं। लेकिन कम से कम यह प्रयास करें: अगर 10:15 में बैठ रहे हैं तो 12:15 तक, दो घंटे लगातार बैठने का प्रयास करें, ताकि ग्रहण का स्पर्श काल और मध्य काल तक पहुंच जाएं। मध्य काल में पूर्ण ग्रहण लग जाता है; पूर्ण ग्रहण का समय पार करने की कोशिश करें, कम से कम 12:15 तक बैठ जाएं। इतनी देर भी बैठकर कर लिया, वे कहते हैं, तो बहुत सारा काम बन जाएगा।
ग्रहण की गुरु साधना के लिए जल, आसन और वस्त्र
गुलाब जल मिला गंगाजल, पीला या सफेद आसन, काला वस्त्र नहीं, पूर्व की ओर मुख
वक्ता कहते हैं कि एक कटोरी में गुलाब जल मिलाकर गंगाजल रखें, और एक लोटा पानी आचमनी के साथ। आसन वस्त्र पीला या सफेद, या कुश आसन। महिला साधिकाएं पीली या लाल साड़ी, या अपनी इच्छा के रंग पहन सकती हैं, पर काला नहीं: यह गुरु साधना सात्विक और गृहस्थों के लिए है, इसलिए काले या श्याम वस्त्र का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना; पीला, लाल या गुलाबी पहना जा सकता है। पूर्व की ओर मुंह करके आसन पर बैठना है।
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, एक कटोरी में गुलाब जल मिलाकर गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। रखना है, और एक लोटा पानी आचमनी के साथ। आसन वस्त्र पीला या सफेद; कुश आसन भी हो सकता है। महिला साधिकाएं चाहें तो पीली साड़ी पहनें; लाल साड़ी भी पहन सकती हैं; अपनी इच्छा के अनुसार रंग-बिरंगा पहनें, पर काला न पहनें। क्योंकि यह गुरु साधना सात्विक और गृहस्थ लोगों के लिए है, इसलिए काले वस्त्र का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना है; श्याम वस्त्र का प्रयोग नहीं करना है। कोशिश करें पीला या लाल; गुलाबी भी पहन सकती हैं। पूर्व की ओर मुंह करके आसन पर बैठ जाना है।
ग्रहण साधना के लिए दो बत्ती का दीपक
घी या तिल का तेल, मुंह पूर्व की ओर, कभी एक बत्ती नहीं
वक्ता कहते हैं कि बहुत अधिक इच्छा हो और साधना को बल देना हो तो घी या तिल तेल का दीपक जलाया जा सकता है। दीपक का मुंह सदा पूर्व की ओर होता है, इसलिए पूर्व की ओर रखकर जलाते हैं। बत्ती सदा दो धागे की होती है: चाहे कलावा हो, कच्चा धागा हो, या रुई, रुई के साथ कलावा मिलाकर डालते हैं, क्योंकि कभी एक धागा, एक बत्ती नहीं जलाई जाती; दो बत्ती जलाते हैं। दोनों बत्तियों को आपस में गूंथकर जलाते हैं ताकि दीपक तीन घंटे, पूरे ग्रहण काल तक जल सके।
बहुत अधिक इच्छा हो और साधना को बल देने के लिए, वक्ता कहते हैं, एक दीपक जलाएं, या तो घी का या तिलतिल, विशेषतः काला तिल, जो पितृ कर्म और अनेक आहुतियों का मुख्य द्रव्य है। तेल का। और दीपक कैसे जलाया जाता है? दीपकपूजन के लिए जलाया जाने वाला दीपक, जो विधि के अनुसार घी अथवा तेल का होता है। का मुंह, वे कहते हैं, सदा पूर्व की ओर होता है; तो पूर्व की ओर ही रखकर दीपक जलाते हैं। और उसमें जो धागा डालते हैं वह दो धागा होगा। चाहे कलावालाल-पीला पवित्र धागा (जिसे मौली भी कहते हैं), जो कलाई पर बाँधा जाता है अथवा दीपक की बत्ती बनाने में प्रयुक्त होता है; यह लच्छों में आता है जिन्हें गिनकर लपेटा जाता है। डालें, कच्चा धागा कलावा, या रुई, तो रुई के साथ कलावा मिलाकर डालते हैं। कभी एक धागा नहीं जलाया जाता, एक बत्ती नहीं जलाई जाती; दो बत्ती जलाते हैं। तो दोनों बत्तियों को आपस में गूंथकर आराम से जला दें, जो तीन घंटे, पूरे ग्रहण काल तक जल सके। बस उसे जला लें, वे कहते हैं, और बैठ जाएं।
ग्रहण की गुरु साधना की सरल जप विधि और गंगाजल में रखी माला
भगवान का स्मरण कर जप; बाद में माला केवल गंगाजल में
वक्ता कहते हैं कि अगर आचमन, भूमि शोधन इत्यादि विधि आती हो तो ठीक है; न आती हो तो बस भगवान का स्मरण करके गुरु गायत्री का जप आरंभ कर दें। वे जानबूझकर विधि को आसान से आसान रख रहे हैं ताकि कुछ क्लिष्ट न हो और मन में कोई शंका न रहे। माला पहले से प्राण-प्रतिष्ठित है, बस उसे लेकर बताए समय पर जप आरंभ कर देना है। जप पूर्ण होने पर माला उस जल में रख देनी है, जिसमें केवल गंगाजल हो, पीतल के कटोरे में गुलाब जल मिला हुआ और कोई दूसरा जल न मिला हो, और मानसिक रूप से जप समर्पित कर देना है।
जो विधि-विधान आता हो, आचमनपूजा से पूर्व आत्मशुद्धि हेतु जल का अनुष्ठानिक आचमन, प्रारंभिक शुद्धिकरण क्रियाओं में से एक। करना, भूमि शोधन इत्यादि, अगर वह विधि आती हो तो ठीक है, वक्ता कहते हैं; न आती हो तो भगवान का स्मरण करके गुरु गायत्री का जप करें। वे बिल्कुल आसान विधि बता रहे हैं, ताकि कुछ क्लिष्ट न हो, मन में कोई शंका न हो; आसान से आसान रखने का प्रयास कर रहे हैं। माला पहले से ही प्राण-प्रतिष्ठित है। बस उस माला को लेना है और बताए समय पर जप आरंभ कर देना है। जप पूर्ण होने के बाद माला उस जल में रख देनी है जिसमें केवल गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। होना चाहिए: पीतल का कटोरा, उसमें गुलाब जल मिला हुआ, और सिर्फ गंगाजल, कोई और जल न मिला हो। जप पूर्ण करने के बाद उसमें माला रख देनी है और मानसिक रूप से जप समर्पित कर देना है।
सूर्य ग्रहण के दिन सूतक के नियम: पूजा घर बंद, केवल जप
आगे-पीछे छह घंटे का सूतक; पूजन-भोग नहीं, धूप नहीं, केवल दीप
वक्ता कहते हैं कि इस बार के ग्रहण में छह घंटे पहले सूतक है और छह घंटे बाद भी, इसलिए उस दिन पूजा घर में पूजा-पाठ या धूप-दीप-बत्ती करने की कोई आवश्यकता नहीं; नहीं करना है, और पूजा घर का पूरा पट बंद रखना है। ग्रहण काल में देवताओं का पूजन-भोग नहीं किया जाता; सिर्फ जप करते हैं। पूजा घर के बाहर अधिक से अधिक धूप नहीं जलाते; सिर्फ दीप जला सकते हैं। उस दिन केवल यही काम करना है, और माला वाला कटोरा बाद में पूजा घर में रख देना है।
ध्यान रहे, वक्ता कहते हैं, कि इस बार के ग्रहण में छह घंटे पहले सूतक है और छह घंटे बाद भी सूतक है। इसलिए उस दिन पूजा घर में पूजा-पाठ इत्यादि, यानी धूप-दीप-बत्ती, करने की कोई आवश्यकता नहीं है; उस दिन नहीं करना है। उस दिन पूजा घर का पूरा पट बंद रखें। ग्रहण काल में देवताओं का पूजन-भोग नहीं किया जाता; सिर्फ जप करते हैं। अधिक से अधिक, पूजा घर के बाहर धूप नहीं जलाते; सिर्फ दीप जला सकते हैं। तो उस दिन सिर्फ यही काम करना है। और वह कटोरा बाद में पूजा घर में रख देना है।
ग्रहण भर जल में रखी कनेर की जड़
पीला या सफेद कनेर, बृहस्पतिवार को लाया हुआ, यथासंभव पुष्य में
वक्ता कहते हैं कि एक चीज और चाहिए: कनेर की जड़, पीला कनेर या सफेद कनेर, इन दोनों में से किसी की, बृहस्पतिवार के दिन लाई हुई। वह पुष्य नक्षत्र में लाई जाती है, पर पुष्य न भी मिले तो भी लाकर रख लें। इस जड़ को उस जल के कटोरे में, जिसमें माला रखी जाती है, पूरे ग्रहण काल में रखना है।
नवरात्रि में दशमी तक प्रतिदिन एक जैसी माला-संख्या
एक माला हो या दस, पर रोज वही संख्या
वक्ता कहते हैं कि ग्रहण के अगले दिन से नवरात्रि आरंभ हो रही है, और जो पूजा-पाठ करना है उसे करने के बाद इस मंत्र का जप करना है: एक माला कर सकते हैं तो एक, दस कर सकते हैं तो दस। पर रोज एक ही संख्या रखनी है: आज पांच माला तो कल भी पांच, नवरात्रि के तीसरे दिन भी पांच, और दशमी की सुबह तक वही पांच-पांच माला। हर दिन जप के बाद माला वापस गंगाजल के कटोरे में रखनी है।
अमावस्या से गुरु पूर्णिमा तक: ग्रहण की गुरु साधना का एक पक्ष का क्रम
दशमी के बाद पूर्णिमा तक रोज एक या पांच माला, माला अभी भी नहीं पहननी
वक्ता कहते हैं कि दशमी के हवन के बाद भी माला का प्रयोग अभी नहीं करना; हर जप के बाद वह उसी गंगाजल के कटोरे में वापस रखनी है। दशमी के अगले दिन से एक माला या पांच, जो भी कर रहे थे, अब अपनी इच्छा से जारी रखें; अगर इच्छा एक ही माला की है तो एक ही। यह गुरु पूर्णिमा तक चलता है, 5 जुलाई की आषाढ़ पूर्णिमा, जो रविवार भी है, और उस दिन साधना पूर्ण होती है। वे इसे दो सप्ताह की पूर्ण साधना कहते हैं, एक पक्ष की साधना, अमावस्या से पूर्णिमा तक, अंधकार से प्रकाश तक।
दशमी के हवन से पहला चरण पूरा होने के बाद, वक्ता कहते हैं, अगला चरण यह है: माला अभी भी प्रयोग नहीं करनी। जप करने के बाद उसी तरह उसी पानी में, गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। वाले कटोरे में फिर रख देनी है। दशमी के अगले दिन से फिर एक माला जप या पांच माला, जो भी कर रहे थे; अब अपनी इच्छा। अगर दशमी के अगले दिन से इच्छा है कि एक ही माला जप करूंगा, तो एक ही माला। यह उस पूर्णिमा तक चलेगा जिस दिन गुरु पूर्णिमा पड़ रही है, 5 जुलाई की आषाढ़ पूर्णिमा; उस दिन तक करेंगे। उस दिन भी रविवार है। उस दिन जाकर यह साधना पूर्ण होती है। यह दो सप्ताह की पूर्ण साधना है, वे कहते हैं, पूरी एक पक्षीय साधना: अमावस्या से पूर्णिमा तक, अंधकार से प्रकाश तक।
ग्रहण की गुरु साधना का दशमी का हवन
आम की लकड़ी और गाय के कंडे पर शुद्ध देसी घी की 108 आहुति
वक्ता कहते हैं कि दशमी को जब जप पूर्ण हो जाए तो उस दिन एक बार आहुति कर लें, हवन कर लें। हवन सिर्फ और सिर्फ घी, आम की लकड़ी और गाय के गोबर के कंडे पर करना है; उसमें किसी और चीज का प्रयोग नहीं करना, और घी शुद्ध देसी घी होना चाहिए। 108 आहुति दें, बहुत है, और फिर पूर्णाहुति कर लें। यहां, वे कहते हैं, साधना का पहला चरण पूर्ण होता है।
जब दशमी को जप पूर्ण हो जाए, वक्ता कहते हैं, उस दिन एक बार आहुति कर लें, हवन कर लें। हवन सिर्फ और सिर्फ घी, आम की लकड़ी और गाय के गोबर के कंडे पर करना है। उसमें अन्य किसी चीज का प्रयोग नहीं करना। सिर्फ घी होना चाहिए, शुद्ध देसी घी। 108 आहुति दें; बहुत है। इतना देने के बाद पूर्णाहुति कर लें। यहां, वे कहते हैं, साधना पूर्ण होती है: पहला चरण।
गुरु पूर्णिमा का पूजन, दान और माला धारण
गुरु-रूप के लिए वस्त्र और मिठाई, दक्षिणा सहित दान अलग, फिर माला धारण
वक्ता कहते हैं कि जिस दिन साधना पूर्ण होती है, गुरु पूर्णिमा को, जिन्हें भी गुरु रूप में स्वीकार किया है उनका गुरु पूजन करना है: उनके लिए वस्त्र रखें, मिठाई इत्यादि का भोग दें। पूजन के बाद दान की वस्तुएं छूकर अलग रख दें: जो भी अन्नदान या अन्य दान करना चाहें, कुछ दक्षिणा के साथ, जो याचक मांगने आएं उन्हें देने के लिए। उसके बाद माला को गुरु के आशीर्वाद स्वरूप और गुरु की रक्षा के स्वरूप निमित्त मानकर गले में धारण कर लें।
जब उस दिन, गुरु पूर्णिमा को, यह साधना पूर्ण हो जाती है, वक्ता कहते हैं, तो जिन्हें भी गुरु रूप में स्वीकार किया है उनका गुरु पूजन करना है। उनके लिए वस्त्र रखें; मिठाई इत्यादि का भोग दें। फिर पूजन करने के बाद दान इत्यादि के लिए वस्तुएं छूकर अलग रख दें: जो भी अन्नदान करना चाहें, जो भी दान करना चाहें, कुछ दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। के साथ अलग रख दें। जो याचक कुछ मांगने आएं उन्हें देने के लिए अलग रख दें। उसके बाद इस माला को गुरु के आशीर्वाद स्वरूप और गुरु की रक्षा के स्वरूप, यह निमित्त मानकर, अपने गले में धारण कर लें।
प्राण-प्रतिष्ठित गुरु साधना की माला पहनने के नियम
कोई अलग नियम नहीं, बस शौच के समय रुद्राक्ष की माला उतारें
वक्ता कहते हैं कि माला धारण कर लेने के बाद उसके साथ कोई अलग नियम नहीं है: उतारने या कहीं रखने की कोई आवश्यकता नहीं; सदैव धारण किए रहें, कहीं भी आते-जाते, और मन में किसी प्रकार का संशय न रखें। एक अपवाद रुद्राक्ष की माला है: शौच इत्यादि के समय उसे उतार ही देना चाहिए; शौच जाते समय उतार दें, और नहाने के बाद फिर पूजन करके पहन लें।
माला धारण कर लेने के बाद, वक्ता कहते हैं, उसके साथ कोई अलग से नियम नहीं है। कोई आवश्यकता नहीं कि उसे उतारना है, कब रखना है; सदैव धारण किए रहें। कोई दिक्कत नहीं है, और मन में किसी प्रकार का संशय न रखें। हां, अगर रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की माला है तो शौच इत्यादि के समय उसे उतार ही देना चाहिए। शौच जाते समय उतार दें; नहाने के बाद फिर से पूजन करके पहन लें। कोई दिक्कत नहीं है। कहीं भी जाते-आते हमेशा धारण किए रहें, वे कहते हैं; इसमें कोई परेशानी नहीं है।
श्रावण में गुरु माला का जप जारी रखना, और पहला चरण क्या देता है
रोज एक माला पहने-पहने, आगे की साधना में कम कष्ट, प्रत्यक्ष गुरु के लिए पुण्य और तपोबल
वक्ता कहते हैं कि गुरु पूर्णिमा के अगले दिन से, जब श्रावण (सावन) शुरू हो रहा है, अपनी इच्छा है: चाहें तो हर दिन इसकी एक माला जप करते रहें, माला गले में धारण किए रहें। यह साधना का पहला चरण है। जो इसे कर लेगा, वे कहते हैं, उसे आगे किसी भी और साधना में कष्ट-परेशानी कम होगी, सही मार्गदर्शन होगा, और जो साधना करना चाहे वह पूर्ण हो, इसमें सहायता और बल मिलेगा; और उसके पुण्य और तपोबल में वह वृद्धि होगी जिससे इस भौतिक जगत में प्रत्यक्ष गुरु की प्राप्ति हो सके।
उसके अगले दिन से, जब श्रावण (सावन) शुरू हो रहा है, वक्ता कहते हैं, अपनी इच्छा है: चाहें तो फिर से हर दिन इसकी एक-एक माला जप करते रहें, गले में धारण किए रहें। यह, वे कहते हैं, साधना का पहला चरण होगा। जो इसे कर लेगा, उसके बाद आगे जो भी और साधना करनी होगी उसमें कोई कष्ट-परेशानी ज्यादा न हो, सही से मार्गदर्शन हो, जो साधना करना चाहते हैं वह पूर्ण हो; उसमें इससे सहायता और बल मिलेगा। साथ ही पुण्य में और तपोबल में वह वृद्धि होगी जिससे इस भौतिक जगत में समक्ष, प्रत्यक्ष गुरु की प्राप्ति हो सके। तो यह साधना करें, वे कहते हैं।
हर साधना का आरंभ गुरु से
गुरु सुमेरु हैं; जीवन में एक बार गुरु गायत्री अवश्य
वक्ता कहते हैं कि अगर किसी ने आज तक स्वयं के लिए कुछ नहीं किया, आज तक कोई साधना नहीं की, तो भी कम से कम इस गुरु गायत्री का अपने जीवन में एक बार प्रयोग अवश्य करें। साधना का आरंभ सदा गुरु से करते हैं: गुरु सुमेरु होते हैं, गुरु पर्वत होते हैं, गुरु से ही सभी साधनाओं की शुरुआत करनी चाहिए। इस मंत्र की साधना के बाद, वे कहते हैं, वे और बहुत सी साधनाएं बताएंगे जो घर में रहकर आराम से की जा सकें और जिनसे अपनी समस्याओं से छुटकारा मिले।
अगर स्वयं के लिए आज तक किसी ने कुछ नहीं किया, वक्ता कहते हैं, अगर आज तक हमने कोई साधना नहीं की, तो भी कम से कम इस गुरु गायत्री का अपने जीवन में एक बार प्रयोग अवश्य करें। साधना का आरंभ सदा गुरु से करते हैं। गुरु सुमेरुमाला का शिरोमणि दाना, जिसे जप में लाँघा नहीं जाता — वहीं से माला लौटाई जाती है। होते हैं, गुरु पर्वत होते हैं; गुरु से ही सभी साधनाओं की शुरुआत करनी चाहिए। इस मंत्र की साधना के बाद, वे कहते हैं, वे आगे और बहुत सी साधनाएं बताएंगे जो घर में रहकर आराम से की जा सकें और जिनसे अपनी कुछ समस्याओं से छुटकारा मिले। हम सभी, वे जोड़ते हैं, भगवती की इच्छा के निमित्त मात्र हैं, और इन बातों को मानते हुए आने वाले समय की तैयारी करते हैं।
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