ग्रहण काल की गुरु गायत्री साधना — अमावस्या से गुरु पूर्णिमा तक का विधान
जून के सूर्य ग्रहण के लिए एक सरल साधना विधान।
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840 वर्ष बाद चूड़ामणि योग, और ग्रहण काल का फल
21 जून का सूर्य ग्रहण साधना के लिए इतना महत्वपूर्ण समय क्यों माना जा रहा है?
वक्ता कहते हैं कि 21 जून को लगने वाले सूर्य ग्रहण में 840 वर्ष के बाद चूड़ामणि योग है, और उस समय में की गई कोई भी साधना आपकी साधना को उतना बल प्रदान करेगी। वे कहते हैं कि महात्माओं, संतों और विद्वान जनों का कहना है कि करोड़ों गुना अधिक फल प्रदान करने वाला समय ग्रहण काल है, और रविवार के दिन लगने वाला सूर्य ग्रहण अक्षय फल, अनंत अनंत गुणा फल प्रदान करता है।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि आज जो साधना वे सभी के समक्ष रख रहे हैं, वह इस ग्रहण काल के लिए है, और यह समय बहुत ही महत्वपूर्ण है। वे कहते हैं कि 21 जून को जो सूर्य ग्रहण लग रहा है, उसमें 840 वर्ष के बाद चूड़ामणि योग है, और उस समय में की गई कोई भी साधना आपकी साधना को इतना बल प्रदान करेगी। वे बताते हैं कि महात्माओं का, संतों का और विद्वान जनों का यह कहना है कि करोड़ों गुना अधिक फल प्रदान करने वाला जो समय है, वह ग्रहण काल है। और उसमें भी यदि रविवार के दिन सूर्य ग्रहण लगता है, तो वह अक्षय फल प्रदान करता है — अनंत अनंत गुणा फल। इसीलिए, वे कहते हैं, वे यह साधना सभी के समक्ष रख रहे हैं।
जिनके गुरु नहीं हैं, और रक्षा चाहने वाले गृहस्थ
जिनके गुरु नहीं हैं और जो साधना मार्ग पर आना चाहते हैं, तथा रक्षा चाहने वाले गृहस्थों के लिए
वक्ता कहते हैं कि यह साधना खास करके उनके लिए है जिनका कोई गुरु नहीं है और जो साधना मार्ग पर आना चाहते हैं, तथा उन साधारण व्यक्तियों के लिए भी जो अपने घर-परिवार की और स्वयं की सुरक्षा के लिए साधना करना चाहते हैं।
यह साधना खास करके उनके लिए है जिनका कोई गुरु नहीं है, वे कहते हैं, और जो साधना मार्ग पर आना चाहते हैं। यह उस साधारण व्यक्ति के लिए भी है जो अपने घर-परिवार की सुरक्षा के लिए और स्वयं की सुरक्षा के लिए साधना करना चाहता है। उनके लिए, वे कहते हैं, यह साधना है। यदि हमें गुरु प्राप्त नहीं हो रहे हैं, या मन लायक कोई गुरु मिल नहीं रहे हैं, तो भटकने की आवश्यकता नहीं है। जब तक गुरु प्राप्त न हों, तब तक यह साधना करें, और तब तक के लिए इन मंत्रों को जागृत कर लें।
कर्मों का प्रारब्ध, और उसे काटने वाला पुण्य
कुछ लोगों को गुरु आसानी से क्यों नहीं मिलते?
वे कहते हैं कि गुरु इतनी आसानी से नहीं मिलते; यह हमारे कुछ कर्मों का प्रारब्ध होता है कि गुरु प्राप्त नहीं हो रहे हैं। जब वह प्रारब्ध कटेगा, पुण्य में वृद्धि होगी, जीवात्मा में बल आएगा और तप की ऊर्जा बढ़ेगी, तब गुरु अवश्य प्राप्त हो जाएंगे।
ऐसा है, वक्ता कहते हैं, कि गुरु इतनी आसानी से नहीं मिलते। यह हमारे कुछ कर्मों का प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। होता है कि गुरु प्राप्त नहीं हो रहे हैं। जब वह प्रारब्ध कटेगा, जब पुण्य में वृद्धि होगी, जब आपके जीवात्मावर्तमान भौतिक शरीर को सक्रिय करने वाली व्यष्टि आत्मा — जो मूलतः निराकार व निर्लिंग आत्मा से भिन्न प्रतीत होती है। में बल आएगा, जब तप की ऊर्जा बढ़ेगी और पुण्यों का संचय होगा, तब गुरु अवश्य प्राप्त हो जाएंगे। तो यह साधना, और इस समय में की गई यह साधना, अवश्य आपके तप को बढ़ाएगी, वे कहते हैं — तपोबल को बढ़ाएगी।
रुद्राक्ष, काला हकीक, पीला हकीक या स्फटिक — एक माला
चार में से कोई एक — रुद्राक्ष, काला हकीक, पीला हकीक या स्फटिक; केवल एक ही चाहिए
वे कहते हैं कि चार प्रकार की माला में से कोई भी एक तरह की माला लाएं — रुद्राक्ष, काला हकीक, पीला हकीक, या स्फटिक। इन चारों में से केवल एक ही चाहिए।
इस साधना को करने के लिए किन-किन चीजों की आवश्यकता है, इस पर वक्ता कहते हैं: तीन प्रकार, चार प्रकार की माला में से कोई भी एक तरह की माला लाएं। वह माला या तो रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की हो, या काला हकीक, या पीला हकीक, या फिर स्फटिकस्फटिक की माला, जब साधक की कुंडली में शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो, तब रुद्राक्ष के स्थान पर चुनी जाती है। की। इन चारों में से कोई भी एक प्रकार की माला लाएं।
गुरुर् ब्रह्मा, गुरुर् विष्णु — परब्रह्म को गुरु मानना
जिस व्यक्ति का कोई गुरु नहीं है, वह किसे गुरु रूप में स्वीकार कर सकता है?
आरंभ में बोले गए मंत्र का हवाला देते हुए वे कहते हैं कि जिनके गुरु नहीं हैं, वे यह समझें कि ब्रह्मा जी ही गुरु हैं, विष्णु जी ही गुरु हैं, भगवान शिव ही गुरु हैं, मां जगदम्बा ही गुरु हैं, वह परब्रह्म भगवती ही गुरु हैं — और उन्हें गुरु मान सकते हैं।
जो मंत्र उन्होंने आरंभ में बोला, वे कहते हैं, वह सभी को पता है: गुरुर् ब्रह्मा गुरुर् विष्णु गुरुर् देवो महेश्वरः गुरुर् साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः। यानी गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही साक्षात शिव है, परब्रह्म ही साक्षात गुरु हैं। उसी प्रकार से, वे कहते हैं, आप जिनके गुरु नहीं हैं, इस बात को समझिए — कि ब्रह्मा जी ही गुरु हैं, विष्णु जी ही गुरु हैं और भगवान शिव ही गुरु हैं, मां जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। ही गुरु हैं, वह परब्रह्म भगवती ही गुरु हैं। तो आप उन्हें गुरु मान सकते हैं। हमारी योग्यता का उनसे कोई लेना-देना नहीं है, वे कहते हैं; उनके समक्ष कोई भी व्यक्ति योग्य नहीं बन सकता। जब उनकी कृपा दृष्टि होगी, उनकी इच्छा होगी, उनका आशीर्वाद और कृपा होगी और हमारे पुण्यों का बल होगा, तब जाकर वे हमें स्थूल रूप में कोई साक्षात गुरु, भौतिक जगत का भौतिक गुरु प्रदान करेंगे। तो अभी उन्हें गुरु मान करके हम अपनी ये साधनाएं, अपनी सात्विक साधनाएं, अपने घर-परिवार के लिए कर सकते हैं।
चुने हुए गुरु-रूप के अनुसार माला, और ग्रहण से पहले प्राण प्रतिष्ठा
शिव के लिए रुद्राक्ष या काला हकीक, जगदंबा के लिए स्फटिक, नारायण के लिए पीला हकीक — ग्रहण से पहले प्राण प्रतिष्ठित
वे कहते हैं: यदि भगवान शिव को गुरु मानना है तो रुद्राक्ष, और शिव के लिए काला हकीक भी लाया जा सकता है; यदि मां जगदंबा को गुरु मानना है तो स्फटिक; यदि भगवान नारायण को मानना है तो पीला हकीक। कोई भी एक माला लाएं, और ग्रहण काल से पहले किसी विशेष शुभ दिन में उसकी प्राण प्रतिष्ठा करा लें। वे यह भी जोड़ते हैं कि आगे वे बताएंगे कि इस माला को कैसे पहनना है, किस विधि से पहनना है, और कितना उर्जित करके पहनना है।
यदि आपको भगवान शिव को गुरु मानना है तो रुद्राक्ष की माला लाएं, वक्ता कहते हैं। भगवान शिव को गुरु मानना हो तो काला हकीक की माला भी लाई जा सकती है। यदि मां जगदंबा को गुरु मान कर साधना करनी है तो स्फटिक की माला लाएं। यदि भगवान नारायण को मान कर साधना करनी है तो पीला हकीक की माला ले लें। कोई भी एक माला ले लें, और ग्रहण काल से पहले किसी विशेष शुभ दिन में इसकी प्राण प्रतिष्ठा कर लें। वे कहते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा की साधारण सात्विक विधि, एक छोटी सी विधि, वे जल्दी ही एक अलग वीडियो में बता देंगे — कि कम से कम समय में और आसान विधि से इसकी प्राण प्रतिष्ठा कैसे की जाए। बस यही एक माला चाहिए, वे कहते हैं, और यही आपके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है; और इसी माला को आपको पहनना है। कैसे पहनना है, किस विधि से पहनना है और कितना उर्जित करके पहनना है — यही, वे कहते हैं, अब वे बता रहे हैं, साथ में यह भी कि साधना कैसे करनी है।
गुरुहीन के लिए गुरु गायत्री; गुरुयुक्त के लिए गुरु मंत्र
जिनके गुरु नहीं उनके लिए गुरु गायत्री; जिन्हें गुरु मंत्र मिल चुका है वे उसी का जप करें
वे कहते हैं कि गुरु गायत्री मंत्र जिनके गुरु नहीं हैं उनके लिए सर्वश्रेष्ठ है, और जिनके गुरु हैं उनके लिए भी सर्वश्रेष्ठ है — लेकिन जिनके गुरु हैं उन्हें गुरु मंत्र प्राप्त हो चुका है, इसलिए वे उसी गुरु मंत्र का जप करें और अपने गुरु से इस काल के लिए विधान ले लें। यदि कोई और साधना न कर पाएं, तो कम से कम इस समय में अपने गुरु मंत्र का जप अवश्य करें।
जिनका कोई गुरु नहीं है, वक्ता कहते हैं, उनके लिए गुरु गायत्री सर्वश्रेष्ठ है। जिनके गुरु हैं उनके लिए भी यह सर्वश्रेष्ठ है — लेकिन जिनके गुरु हैं उन्हें तो गुरु मंत्र प्राप्त हो चुका है, इसलिए वे उसी गुरु मंत्र का जप करें। वे इस ग्रहण काल के लिए अपने गुरु से विधान ले लें। जिनके गुरु हैं और जिन्हें गुरु मंत्र प्राप्त है, उनके लिए भी यह ग्रहण का समय बहुत ही महत्वपूर्ण है। यदि अन्य कोई साधना करने के लिए समय न हो, इच्छा न हो, या किसी भी कारणवश, परिस्थितिवश वे न कर पा रहे हों, तो कम से कम अपने गुरु मंत्र का जप अवश्य करें।
सुबह 10:15 से दोपहर 2:45 तक, और व्यावहारिक लक्ष्य 12:15
10:10 तक आसन पर बैठ जाएं, कम से कम 2:45 तक एक ही आसन पर, और व्यावहारिक लक्ष्य 12:15
वे कहते हैं कि 21 जून को साधना काल सुबह 10:15 बजे से आरंभ होगा — कम से कम 10:10 तक बैठ जाइए — और कम से कम दोपहर 2:45 तक एक ही आसन पर लगातार बैठे रहना है। जो इतनी देर न बैठ सकें, वे कम से कम दो घंटे, 12:15 तक, लगातार बैठने का प्रयास करें ताकि ग्रहण का स्पर्श काल और मध्य काल तक पहुंच जाएं।
21 जून को साधना काल का जो समय रहेगा, जिस समय से शुरुआत होगी, वह सुबह के 10:15 बजे से होगा, वक्ता कहते हैं। सुबह कम से कम 10:10 तक बैठ जाइए, और कम से कम दोपहर के 2:45 तक आपको एक आसन पर लगातार बैठे रहना है। यदि आप करने में सक्षम नहीं हैं और उतनी देर तक नहीं बैठ सकते, तो कोई दिक्कत नहीं है, कोई परेशानी नहीं है, वे कहते हैं। यदि आप नए साधक हैं या बैठने का अभ्यास नहीं है, तो ऐसा नहीं है कि जान दे देनी है कि भैया बैठे हैं तो बैठे ही रह गए। आप आराम से अपना आसन छोड़ सकते हैं। लेकिन कम से कम प्रयास कीजिएगा: यदि 10:15 पर बैठ रहे हैं तो 12:15 तक, दो घंटे तक लगातार बैठने का प्रयास कीजिएगा, ताकि ग्रहण के स्पर्श काल और मध्य काल तक आप पहुंच जाएं। जब पूर्ण ग्रहण लग जाएगा — पूर्ण ग्रहण मध्य काल में लगता है — तो पूर्ण ग्रहण का समय पार करने की कोशिश कीजिएगा, कि कम से कम 12:15 तक बैठ जाएं। यदि इतनी देर भी बैठ कर कर लेते हैं, वे कहते हैं, तो आपका बहुत सारा काम बन जाएगा।
गुलाब जल मिला गंगाजल, आचमनी सहित लोटा, और आसन वस्त्र
गुलाब जल मिला गंगाजल, आचमनी सहित एक लोटा जल, और पीला या सफेद आसन वस्त्र या कुशासन
वे कहते हैं कि एक कटोरी में गुलाब जल मिलाकर गंगाजल रखना है, और साथ में आचमनी सहित एक लोटा जल; आसन वस्त्र पीला या सफेद, या कुश आसन भी हो सकता है। महिला साधिकाएं चाहें तो पीली या लाल साड़ी, अथवा अपनी इच्छा के अनुसार रंग-बिरंगे वस्त्र पहन सकती हैं, पर काला नहीं — इस गुरु साधना में, जो सात्विक है और गृहस्थ लोगों के लिए है, काले या श्याम वस्त्र का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना है। आसन पर पूर्व की ओर मुंह करके बैठना है।
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं: एक कटोरी में गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। रखना है, उसमें गुलाब जल मिलाकर, और साथ में आचमनी के साथ एक लोटा जल। आसनसाधना के दौरान प्रयुक्त पवित्र आसन, जिसे पृथ्वी-शक्ति (वसुंधरा) का साक्षात रूप माना जाता है — इसे कभी भी सामान्य प्रयोजन हेतु साझा, पद-दलित, या उपयोग नहीं करना चाहिए। वस्त्र पीला या सफेद हो; कुश आसन भी हो सकता है। जो महिला साधिकाएं हैं, वे चाहें तो पीली साड़ी पहनें; लाल साड़ी भी पहन सकती हैं, और अपनी इच्छा के अनुसार रंग-बिरंगे वस्त्र पहन सकती हैं — पर काला न पहनें। इस गुरु साधना में, वे कहते हैं, क्योंकि यह सात्विक है और गृहस्थ लोगों के लिए है, काले वस्त्र का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना है। श्याम वस्त्र का प्रयोग नहीं करना है। कोशिश यह करनी है कि पीला, या लाल, या गुलाबी — इन रंगों का प्रयोग करें। आसन पर पूर्व की तरफ मुंह करके बैठ जाना है।
पूर्वमुखी घी या तिल तेल का दीपक, दो बातियों सहित
घी या तिल तेल का दीपक, मुंह पूर्व की ओर, और आपस में गूंथी हुई दो बातियां
वे कहते हैं कि यदि बहुत अधिक इच्छा हो, और साधना को बल देने के लिए, तो घी का या तिल तेल का एक दीपक जलाएं। दीपक का मुंह सदैव पूर्व की तरफ होता है, इसलिए उसे पूर्व की ओर रखकर जलाते हैं; और बाती एक नहीं, दो जलाई जाती हैं — कलावा और रुई मिलाकर, आपस में गूंथकर, ऐसे कि वह पूरे ग्रहण काल तक, तीन घंटे तक जल सके।
यदि बहुत अधिक इच्छा हो, और इसे बल देने के लिए, तो एक दीपक — या तो घी का या फिर तिल तेल का, वक्ता कहते हैं। और दीपक कैसे जलाया जाता है? दीपक का मुंह सदैव पूर्व की तरफ होता है, तो पूर्व की तरफ ही रखकर दीपक को जलाएंगे; और उसमें जो धागा डालेंगे वह दो धागे होंगे। यदि कलावालाल-पीला पवित्र धागा (जिसे मौली भी कहते हैं), जो कलाई पर बाँधा जाता है अथवा दीपक की बत्ती बनाने में प्रयुक्त होता है; यह लच्छों में आता है जिन्हें गिनकर लपेटा जाता है। डालते हैं, कच्चा धागा कलावा डालते हैं, या फिर रुई डालते हैं, तो रुई के साथ कलावा मिलाकर डालेंगे। कभी भी एक धागा नहीं जलाया जाता, एक बाती नहीं जलाई जाती — दो बातियां जलाते हैं। तो दो बातियों को आपस में गूंथकर आराम से उसे जला दीजिएगा, जो कि तीन घंटे तक, पूरे ग्रहण काल तक जल सके। बस उसे जला लीजिए, बैठ जाइए।
जानबूझकर सरल रखी गई विधि, और गंगाजल में वापस रखी जाने वाली माला
जानबूझकर सरल रखी गई विधि — भगवान को स्मरण कर जप करें; जप के बाद माला गंगाजल में रख दें
वे कहते हैं कि यदि आचमन और भूमि शोधन आता हो तो ठीक है; न आता हो तो भगवान को स्मरण करके गुरु गायत्री का जप करें। माला पहले से ही प्राण प्रतिष्ठित है, बस उसे लेकर जप आरंभ कर देना है। जप पूर्ण होने के बाद माला को उस जल में रख देना है — जिसमें केवल गंगाजल ही हो, पीतल के कटोरे में गुलाब जल मिला हुआ, कोई और जल मिला न हो — और जप को मानसिक रूप से समर्पित कर देना है।
जो विधि-विधान आपको आता हो — आचमनपूजा से पूर्व आत्मशुद्धि हेतु जल का अनुष्ठानिक आचमन, प्रारंभिक शुद्धिकरण क्रियाओं में से एक। करना, भूमि शोधित करना इत्यादि — यदि वह विधि आती हो तो ठीक है; न आती हो तो भगवान को स्मरण करके गुरु गायत्री का जप करें, वक्ता कहते हैं। वे कहते हैं कि वे बिल्कुल आसान विधि बता रहे हैं, एकदम आसान से आसान रखने का प्रयास कर रहे हैं ताकि कुछ क्लिष्ट न हो और मन में कोई शंका न रहे। माला पहले से ही प्राण प्रतिष्ठित है। बस उस माला को लेना है और जप आरंभ कर देना है। समय वे आपको बता ही चुके हैं। जप पूर्ण होने के बाद माला उस जल में जाएगी जिसमें केवल गंगाजल ही होना चाहिए। पीतल का जो कटोरा है, उसमें गुलाब जल मिलाया हुआ, उसमें सिर्फ गंगाजल ही होना चाहिए — उसमें कोई और जल मिलाया हुआ न हो। बस जप पूर्ण करने के बाद उसमें माला को रख देना है, और मानसिक रूप से जप को समर्पित कर देना है।
दोनों ओर छह-छह घंटे का सूतक, और बंद रखा गया पूजा कक्ष
सूर्य ग्रहण के दिन सूतक के क्या नियम हैं, और क्या पूजा की जा सकती है?
वे कहते हैं कि इस बार जो ग्रहण लग रहा है उसमें छह घंटे पहले सूतक है और छह घंटे बाद भी सूतक है, इसलिए उस दिन पूजा कक्ष में पूजा-पाठ या धूप-दीप-बत्ती इत्यादि करने की कोई आवश्यकता नहीं है; उस दिन नहीं करना है। पूजा कक्ष का पूरा पट बंद रखें। ग्रहण काल में देवताओं का पूजन-भोग इत्यादि नहीं किया जाता — सिर्फ जप किया जाता है। पूजा कक्ष के बाहर धूप नहीं जलाते; केवल दीपक जलाया जा सकता है।
ध्यान रहे, वक्ता कहते हैं, कि इस बार जो ग्रहण लग रहा है उसमें छह घंटे पहले सूतक है और छह घंटे बाद भी सूतक है। इसी कारण उस दिन पूजा-पाठ इत्यादि करने की कोई आवश्यकता नहीं है — मतलब पूजा कक्ष में धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है।, दीप, बत्ती इत्यादि। उस दिन नहीं करना है। उस दिन पूजा कक्ष का पूरा पट बंद रखें। ग्रहण काल में देवताओं का पूजन और भोग इत्यादि नहीं किया जाता। सिर्फ जप किया जाता है। अधिक से अधिक, पूजा कक्ष के बाहर — धूप तो नहीं जलाते, दीप सिर्फ जला सकते हैं। उस दिन बस यही काम करेंगे। और उस कटोरे को फिर बाद में पूजा कक्ष में रख देंगे।
जल में रखा पीला या सफेद कनेर का जड़, और दशमी तक एक ही माला संख्या
बृहस्पतिवार को लाया गया पीला या सफेद कनेर का जड़, यथासंभव पुष्य नक्षत्र में, और दशमी तक एक ही निश्चित दैनिक संख्या
वे कहते हैं कि पीले या सफेद कनेर का जड़ बृहस्पतिवार के दिन ले आएं — वैसे तो वह पुष्य नक्षत्र में लाया जाता है, पर पुष्य न भी मिले तो भी ले आएं — और उसे पूरे ग्रहण काल में जल वाले कटोरे में रखें। अगले दिन से नवरात्रि आरंभ हो रही है, और अपनी पूजा-पाठ करने के बाद इस मंत्र की एक माला जप कर सकें तो एक, दस कर सकें तो दस; पर पहले दिन जो संख्या तय हो वही रोज रहेगी, दशमी की सुबह तक।
अमावस्या से गुरु पूर्णिमा तक — एक पक्षीय पूर्ण साधना
एक पूरा पक्ष, जो 5 जुलाई की आषाढ़ पूर्णिमा पर पूर्ण होता है
वे कहते हैं कि यह साधना गुरु पूर्णिमा तक चलती है — 5 जुलाई को पड़ने वाली आषाढ़ पूर्णिमा तक, जो रविवार भी है — और उसी दिन जाकर यह साधना पूर्ण होती है। वे इसे दो सप्ताह की पूर्ण साधना कहते हैं, एक पक्षीय साधना, अमावस्या से पूर्णिमा तक, अंधकार से प्रकाश तक।
फिर, वक्ता कहते हैं, पूर्णिमा तक — जिस दिन गुरु पूर्णिमा पड़ रही है उस दिन तक, गुरु पूर्णिमा तक, 5 जुलाई को पड़ने वाली आषाढ़ पूर्णिमा तक — उस दिन तक आप करेंगे। उस दिन भी रविवार है। उस दिन जाकर यह साधना आपकी पूर्ण होती है। यह दो सप्ताह की पूर्ण साधना है, वे कहते हैं, पूरी एक पक्षीय साधना — अमावस्या से लेकर पूर्णिमा तक, अंधकार से लेकर प्रकाश तक की यह साधना है। उस दिन यह साधना पूर्ण हो जाती है।
आम की लकड़ी और गोबर के कंडों पर घी की 108 आहुतियां
दशमी को 108 आहुतियां, केवल घी की, आम की लकड़ी और गाय के गोबर के कंडों पर
वे कहते हैं कि दशमी को जब जप पूर्ण हो जाए, तो उस दिन एक बार आहुति कर लें, हवन कर लें। हवन सिर्फ और सिर्फ घी, आम की लकड़ी और गाय के गोबर के कंडों पर करना है — उसमें अन्य किसी चीज का प्रयोग नहीं करना है, और घी शुद्ध देसी घी होना चाहिए। 108 आहुति दें, बहुत है, और फिर पूर्णाहुति कर लें। यहीं साधना का पहला चरण पूर्ण होता है।
जब दशमी को जप पूर्ण हो जाएगा, तो उस दिन एक बार आहुति कर लें, हवन कर लें, वक्ता कहते हैं। हवन आप सिर्फ और सिर्फ घी और आम की लकड़ी और गाय के गोबर के कंडों पर करेंगे। उसमें अन्य किसी चीज का प्रयोग नहीं करना है। सिर्फ घी होना चाहिए, और शुद्ध देसी घी होना चाहिए। 108 आहुति दें — बहुत है। इतना देने के बाद पूर्णाहुति कर लें। यहां आपकी साधना पूर्ण होती है, वे कहते हैं: पहला चरण।
जप जारी रहता है, और माला फिर भी गंगाजल में रखी जाती है
जप एक या पांच माला पर जारी रहता है, और माला फिर भी गंगाजल में ही लौटती है
वे कहते हैं कि माला अभी भी प्रयोग नहीं करनी है — जप के बाद वह उसी गंगाजल वाले कटोरे में वापस रख दी जाती है। दशमी के अगले दिन से एक माला या पांच माला जप, जो भी आप कर रहे थे, जारी रखें; अब आपकी इच्छा है — यदि इच्छा हो कि केवल एक ही माला जप करेंगे, तो सिर्फ एक ही माला जप करेंगे।
इसके बाद, वक्ता कहते हैं, अगला चरण यह है कि माला अभी भी प्रयोग नहीं करनी है। उस माला पर जप करने के बाद उसे फिर उसी तरह उसी पानी में, गंगाजल वाले कटोरे में रख देना है। और उसके बाद क्या करना है? दशमी के अगले दिन से — फिर एक माला जप, या पांच माला जप, जो भी आप कर रहे थे; अब आपकी इच्छा। दशमी के अगले दिन से, यदि आपकी इच्छा है कि नहीं, मैं एक ही माला जप करूंगा, तो सिर्फ एक ही माला जप करेंगे।
गुरु पूजन, वस्त्र और भोग, दान और दक्षिणा, और अंत में माला धारण
वस्त्र और भोग के साथ गुरु पूजन, फिर दान और दक्षिणा — और तभी माला धारण की जाती है
वे कहते हैं कि उस दिन गुरु पूजन किया जाता है — जिन्हें भी आपने गुरु रूप में स्वीकार किया है, उनके लिए वस्त्र रखे जाते हैं और मिठाई इत्यादि का भोग दिया जाता है। पूजन के बाद दान इत्यादि के लिए वस्तुएं छूकर अलग रख दी जाती हैं — जो भी अन्न दान या अन्य दान करना चाहें, कुछ दक्षिणा के साथ, उन याचकों के लिए जो कुछ मांगने आते हैं। इसके बाद ही माला को गुरु के आशीर्वाद और गुरु की रक्षा के स्वरूप गले में धारण किया जाता है।
उस दिन गुरु पूजन करेंगे, जिन्हें भी आपने गुरु रूप में स्वीकार किया है, वक्ता कहते हैं। उनके लिए वस्त्र रखेंगे, और मिठाई इत्यादि का भोग देंगे। और फिर, पूजन करने के बाद, दान इत्यादि करने के लिए वस्तुएं छूकर अलग रख देंगे — जो भी अन्न दान करना चाहते हैं, जो भी दान करना चाहते हैं, वह कुछ दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। के साथ अलग रख देंगे। याचक जो कुछ मांगने आते हैं — उन्हें कुछ देने के लिए आप अलग रख देंगे। और उसके बाद इस माला को गुरु के आशीर्वाद स्वरूप और गुरु की रक्षा के स्वरूप, यह निमित्त मानकर, अपने गले में धारण कर लेंगे।
कोई अलग नियम नहीं, सिवाय शौच के समय रुद्राक्ष माला उतारने के
प्राण प्रतिष्ठित माला धारण कर लेने के बाद उसके साथ क्या नियम लगते हैं?
वे कहते हैं कि एक बार धारण कर लेने के बाद इसके साथ कोई अलग से नियम नहीं है — कोई आवश्यकता नहीं कि इसे कब उतारना है या कहां रखना है; सदैव धारण किए रहें, और मन में किसी प्रकार का कोई संशय न रखें। हां, यदि रुद्राक्ष की माला है, तो शौच के समय उसे उतार ही देना चाहिए; शौच के समय जाते हैं तो उतार दीजिए, और नहाने के बाद फिर से पूजन करके पहन लीजिए।
यहां आपने इसे धारण कर लिया, और इनके साथ कोई भी अलग से नियम नहीं है, वक्ता कहते हैं। आपको कोई आवश्यकता नहीं है कि आप इसे उतारें, या कब रखें। सदैव धारण किए रहें। कोई दिक्कत नहीं है, और किसी प्रकार का कोई संशय मन में न रखें। हां — यदि रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की माला है, तो शौच इत्यादि के समय, आपकी इच्छा है, पर उसे उतार ही देना चाहिए। शौच के समय जाते हैं तो उतार दीजिए। नहाने के बाद फिर से पूजन करके पहन लीजिए। कोई दिक्कत नहीं है। कहीं भी जाते-आते हैं, हमेशा सदैव धारण किए रहें। इसमें कोई परेशानी नहीं है।
श्रावण भर प्रतिदिन एक माला, और तपो बल की वृद्धि
श्रावण से आगे वैकल्पिक: प्रतिदिन एक माला, सदैव धारण किए हुए, तपो बल बढ़ाते हुए
वे कहते हैं कि उसके अगले दिन से, जब श्रावण (सावन) शुरू हो रहा है, तो आपकी इच्छा — यदि चाहें तो फिर से इसका हर दिन एक-एक माला जप करते रहें, और गले में धारण किए रहें। यह साधना का पहला चरण होगा; जो इसे कर लेगा उसे आगे जो भी अन्य साधना करनी होगी उसमें कष्ट-परेशानी ज्यादा नहीं होगी, सही मार्गदर्शन होगा, और उसे पूर्ण करने में सहायता और बल मिलेगा, साथ ही उसके पुण्यों और तपोबल में वह वृद्धि होगी जिससे उसे इस भौतिक जगत में प्रत्यक्ष गुरु की प्राप्ति हो सके।
उसके बाद, उसके अगले दिन से, जब श्रावण (सावन) शुरू हो रहा है, तो आपकी इच्छा — यदि चाहें तो फिर से इसका हर-हर दिन एक-एक माला जप करते रहें, और गले में धारण किए रहें, वक्ता कहते हैं। यह आपका साधना का पहला चरण होगा। जो इसे कर लेगा, उसके बाद आगे जो भी कोई और साधना करनी होगी उसमें कोई कष्ट-परेशानी ज्यादा न हो, सही से मार्गदर्शन हो, और जो साधना वह करना चाहता है वह पूर्ण हो — इससे उसमें सहायता और बल मिलेगा। साथ ही आपके पुण्यों में और आपके तपोबल में वह वृद्धि होगी जिससे कि आपको इस भौतिक जगत में सामने, समक्ष, प्रत्यक्ष गुरु की प्राप्ति हो सके।
दो ग्रहणों के बीच पड़ती पूर्ण नवरात्रि
गुरु पक्ष, जिसमें दो ग्रहणों के बीच पूरी नवरात्रि पड़ रही है
वे कहते हैं कि यह पूरा समय गुरु पक्ष का है, और यह ग्रहण काल और नवरात्रि का समय बहुत ही विशेष समय है — इससे विशेष और कुछ हो नहीं सकता कि दो ग्रहणों के बीच में पूर्ण नवरात्रि पड़ रही है। यह, वे कहते हैं, आपकी साधना के लिए, तपो बल के लिए और ऊर्जा के लिए बहुत ही अच्छा समय है; वे कहते हैं कि इस समय का सदुपयोग करें और इसी समय में अपनी साधना का आरंभ करें।
गुरु सुमेरु हैं — सभी साधनाओं का आरंभ बिंदु
साधना का आरंभ गुरु से ही क्यों किया जाए?
वे कहते हैं कि यदि किसी ने स्वयं के लिए आज तक कुछ नहीं किया है, यदि आज तक हमने कोई साधना नहीं की है, तो भी कम से कम इस गुरु गायत्री का प्रयोग अपने जीवन में एक बार अवश्य करें। साधना का आरंभ सदैव गुरु से किया जाता है: गुरु सुमेरु होते हैं, गुरु पर्वत होते हैं, और सभी साधनाओं की शुरुआत गुरु से ही करनी चाहिए।
यदि आज तक आप में से किसी ने स्वयं के लिए कुछ नहीं किया है, यदि आज तक हमने कोई साधना नहीं की है, तो भी कम से कम इस गुरु गायत्री का प्रयोग अपने जीवन में एक बार अवश्य करें, वक्ता कहते हैं। साधना का आरंभ कभी भी गुरु से करते हैं। गुरु सुमेरुमाला का शिरोमणि दाना, जिसे जप में लाँघा नहीं जाता — वहीं से माला लौटाई जाती है। होते हैं, गुरु पर्वत होते हैं; सभी साधनाओं की शुरुआत गुरु से ही करनी चाहिए। इस मंत्र की साधना करने के बाद, वे कहते हैं, वे आगे और भी बहुत सी ऐसी साधनाएं बताएंगे जो आप घर में रहकर आराम से कर सकते हैं और जिनसे अपनी कुछ समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं। आगे भगवती की इच्छा है, वे कहते हैं — भगवती की इच्छा से हम सभी निमित्त मात्र हैं।
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