भगवान दत्तात्रेय के एकाक्षरी मंत्र का विधान — बिना गुरु वाले साधक के लिए पूर्णिमा से पूर्णिमा का अनुष्ठान
भगवान दत्त के एकाक्षरी बीज मंत्र का विधान।
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जिन्हें गुरु प्राप्त नहीं हुए, उनकी प्रथम साधना
भगवान दत्तात्रेय के एकाक्षरी मंत्र का विधान किसे करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय के एकाक्षरी मंत्र का विधान प्रत्येक साधक को विशेष करके करना चाहिए, और विशेषकर उन्हें जिन्हें गुरु की प्राप्ति नहीं हुई है, जिन्हें किसी भौतिक गुरु के मुख से मंत्र की प्राप्ति नहीं हुई है, और जो अन्यथा साधना मार्ग पर सीधे भैरव जी, काली जी, दुर्गा जी और महाशक्तियों की साधना से आरंभ कर देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय के एकाक्षरी मंत्र का विधान प्रत्येक साधक को विशेष करके करना चाहिए। उनका संकेत ऐसे लोगों की ओर है जिनको गुरु की प्राप्ति नहीं हुई है, जिनको किसी भौतिक गुरु के मुख से मंत्र की प्राप्ति नहीं हुई है, और जो साधना मार्ग पर चलते समय सीधे भैरव जी, काली जी, दुर्गा जी और महाशक्तियों की साधना करने लगते हैं। वक्ता कहते हैं कि उनके लिए सबसे पहले भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश के सम्यक स्वरूप भगवान दत्तात्रेय आने चाहिए।
हर पंथ और संप्रदाय में गुरु स्वरूप में पूजित
भगवान दत्तात्रेय की पूजा सभी गुरुओं की पूजा क्यों मानी जाती है?
वक्ता कहते हैं कि इसका कारण यह है कि सनातन संस्कृति में जितने भी पंथ और संप्रदाय बने हैं, उन सभी में भगवान दत्तात्रेय किसी न किसी स्वरूप में — गुरु स्वरूप में — पूजित हैं। इसलिए यदि हम उनकी सेवा-पूजा करें तो सभी गुरुओं की पूजा हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि हमारी सनातन संस्कृति में जितने भी अलग-अलग पंथ और संप्रदाय बने हैं, उन सभी में भगवान दत्तात्रेय किसी न किसी स्वरूप में, और गुरु स्वरूप में पूजित हैं। इसलिए यदि हम उनकी सेवा-पूजा करेंगे तो उसी से सभी गुरुओं की पूजा हो जाएगी। वे उस मंत्र की ओर संकेत करते हैं जिसे हम लोग पढ़ते हैं — गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा, गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः — और कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय को देखने से यह पूरा श्लोक साक्षात उन्हीं को समर्पित हो जाता है। इसलिए उनके लिए यही सबसे बड़ा मंत्र है: वे गुरु स्वरूप हैं, क्योंकि उनके अपने स्वरूप में ही तीनों दिखते हैं — ब्रह्मा, विष्णु, महेश — और साक्षात परब्रह्म; वे महामुनि हैं। वक्ता कहते हैं कि इसलिए उन्हें गुरु स्वरूप में स्वीकार कर लें, और एकाक्षरी मंत्र का विधान अवश्य करें।
शिष्य के असंतुष्ट रहने पर भी यही विधान
यदि गुरु प्राप्त तो हो गए हों, पर वे साधक को आगे न ले जा पा रहे हों, तो क्या करें?
वक्ता कहते हैं कि यदि गुरु प्राप्त भी हो गए हों, किंतु किसी कारणवश वे आपको साधना मार्ग पर आगे नहीं ले जा पा रहे हों, या आप संतुष्ट नहीं हो पा रहे हों, तब भी आपको भगवान दत्त के इस एकाक्षरी मंत्र का विधान करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि मान लीजिए आपको कोई गुरु प्राप्त हो भी गए हैं — किंतु किसी कारणवश वे आपको साधना मार्ग पर आगे नहीं ले जा पा रहे हैं, या फिर आप संतुष्ट नहीं हो पा रहे हैं। वे कहते हैं कि तब भी आपको भगवान दत्त के उस एकाक्षरी मंत्र का विधान करना चाहिए जो आज बताया जा रहा है। अन्यथा, यदि आपके गुरु नहीं हैं और आप साधना मार्ग पर चलना चाहते हैं, तो सबसे पहले आपको देव दीक्षा विधान करना चाहिए।
पूर्णिमा या शुभ पर्व काल में देव दीक्षा
पहले देव दीक्षा विधान — पूर्णिमा या किसी शुभ पर्व काल में
वक्ता कहते हैं कि देव दीक्षा विधान का लिंक इसी वीडियो के विवरण में दिया जाएगा। किसी भी शुभ पर्व काल में, या पूर्णिमा के दिन, सबसे पहले भगवान दत्तात्रेय के समक्ष वह विधान करना चाहिए — मानसिक रूप से उनके समक्ष समर्पित होकर उन्हें सद्गुरु और परम गुरु के रूप में स्वीकार करते हुए। उसके बाद ही, साधना मार्ग पर चलने से पहले, यह एकाक्षरी अनुष्ठान लेना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि उस विधान का लिंक इसी वीडियो के विवरण में डाल दिया जाएगा। किसी भी शुभ पर्व काल में, या पूर्णिमा के दिन, सबसे पहले आपको भगवान दत्तात्रेय के समक्ष वह विधान करना चाहिए — मानसिक रूप से उनके समक्ष समर्पित होकर उन्हें सद्गुरु और परम गुरु के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए। तत्पश्चात, साधना मार्ग पर चलने से पहले, उनके इस एकाक्षरी मंत्र का यह अनुष्ठान अपने जीवन में करना चाहिए।
भगवान दत्त के पूर्ण स्वरूप का बीज मंत्र
भगवान दत्तात्रेय का एकाक्षरी मंत्र क्या है?
वक्ता कहते हैं कि यह भगवान दत्तात्रेय के पूर्ण स्वरूप का बीज मंत्र है। जैसे काली जी का बीज मंत्र है, दुर्गा जी का बीज मंत्र है, और जितनी भी प्रमुख महाशक्तियाँ हैं उनका बीज मंत्र है, उसी प्रकार परम गुरु स्वरूप और परम दिव्य स्वरूप भगवान दत्त का यह बीज मंत्र है।
वक्ता कहते हैं कि यह मंत्र भगवान दत्तात्रेय के पूर्ण स्वरूप का बीज मंत्र है। जैसा कि हम लोग जानते हैं, काली जी का बीज मंत्र है, दुर्गा जी का बीज मंत्र है, और जितनी भी प्रमुख महाशक्तियाँ हैं उनका बीज मंत्र है। उसी प्रकार परम गुरु स्वरूप, परम दिव्य स्वरूप भगवान दत्त का यह है। वे बताते हैं कि बीज का अर्थ यह है कि एक बीज से एक वृक्ष बनेगा और उस वृक्ष में अनेक फल लगेंगे। ठीक उसी प्रकार यह भगवान दत्त का सबसे छोटा सा स्वरूप है — किंतु इसमें उनकी सभी शक्तियाँ समाहित हैं।
तुरंत उपस्थिति और सभी अभीष्टों की पूर्ति
भगवान दत्त स्वयं साधक से क्या वचन देते हैं?
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्त स्वयं कहते हैं कि जो मुझको जिस भाव में जैसे भी भजता है, मैं तुरंत उपस्थित होकर उसके सभी अभीष्टों की पूर्ति कर देता हूँ। इसलिए वे श्रोताओं से कहते हैं कि मन में बिना किसी नकारात्मक विचार के, और किसी अति विद्वान जन की यह बात सुनकर रुके बिना कि स्वयं से यह विधान नहीं कर सकते, स्व कल्याण के लिए यह विधान कर लेना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यह सभी भक्तों के लिए, सभी सनातनियों के लिए, और विशेष करके उनके लिए जो साधना मार्ग पर चलना चाहते हैं और किसी कारणवश जिन्हें गुरु की प्राप्ति नहीं हो पाई है, परम वरदान से युक्त होता है। भगवान दत्त स्वयं यह कहते हैं: जो मुझको जिस भाव में जैसे भी भजता है, मैं तुरंत उपस्थित होकर उसके सभी अभीष्टों की पूर्ति कर देता हूँ। इसलिए, वक्ता कहते हैं, मन में बिना किसी नकारात्मक विचार के, और किसी अति विद्वान जन की यह बात सुने बिना कि नहीं, स्वयं से यह विधान नहीं कर सकते, स्व कल्याण के लिए यह विधान कर लेना चाहिए।
तर्क के स्थान पर शरणागति, और प्रमाण कहाँ हैं
दूसरों की आपत्तियों में जाने से आगे नहीं बढ़ा जा सकता; प्रमाण अपनी जगह हैं
वक्ता कहते हैं कि यदि आप दूसरों की बातों में जाएंगे तो अनेक बातें सुनकर कभी भी अपने कल्याण मार्ग पर आगे नहीं जा पाएंगे। सभी बातों को छोड़कर भगवान की शरणागति स्वीकार कीजिए और उन्हें समर्पित हो जाइए। वे जोड़ते हैं कि इसका प्रमाण पहले के वीडियो में दिया जा चुका है, जिनमें लाइव वीडियो भी हैं और उनमें इस विषय पर बहुत चर्चा की गई है।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप दूसरे की बात में जाएंगे तो अनेक बातें सुनकर कभी अपने कल्याण मार्ग पर आगे नहीं जा पाएंगे। इसलिए सभी बातों को छोड़कर भगवान की शरणागति को स्वीकार करके उन्हें समर्पित हो जाइए। वे कहते हैं कि इसका प्रमाण भगवान दत्तात्रेय से संबंधित पहले के वीडियो में दिया जा चुका है; लाइव वीडियो भी हैं, जिनमें उनके विषय में बहुत चर्चा की गई है, और उन्हें सुनने से सभी शंकाएँ दूर हो जाएँगी। तो सर्वप्रथम उन पर विश्वास और श्रद्धाकिसी देवता, गुरु अथवा साधना में श्रद्धा और आदरपूर्ण विश्वास — पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्म से भिन्न। रखकर उन्हें गुरु स्वरूप में स्वीकार कीजिए। वे पुनः कहते हैं कि उनके उस स्वरूप को देखकर वह गुरु मंत्र जो आप बचपन से पढ़ते आ रहे हैं — गुरु को समर्पित वह श्लोक — उसमें प्रत्यक्ष और पूरा दिखाई देता है।
किसी भी माह की पूर्णिमा तिथि से, पीले रंग में
किसी भी माह की पूर्णिमा तिथि से, पीले वस्त्र और पीले आसन पर
वक्ता कहते हैं कि जब आप साधना मार्ग पर चलना चाहें और भगवान दत्त के स्वरूप की उपासना करना चाहें, तो इस साधना को किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि से आरंभ करें। पीला वस्त्र और पीला आसन रखें; आसन कुशा का भी रख सकते हैं। दिशा उत्तर, पूर्व या पश्चिम — किसी भी ओर रख सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब आप साधना मार्ग पर चलना चाहें और भगवान दत्त के स्वरूप की उपासना करना चाहें, और एकाक्षरी मंत्र से आरंभ करना हो, तो इस साधना को किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि से आरंभ करें। पीला वस्त्र रखें, पीला आसन रखें; आसन कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है। का भी रख सकते हैं। दिशा उत्तर, पूर्व या पश्चिम — किसी भी ओर रख सकते हैं।
गिरनार क्षेत्र की ओर मुख, और दक्षिण दिशा का निषेध
क्या यह जप गिरनार की दिशा की ओर मुख करके किया जा सकता है?
वक्ता कहते हैं कि हाँ। आपके निवास स्थान से गिरनार पर्वत का क्षेत्र जिस दिशा में पड़ता है — गिरनार गुजरात में है — उस दिशा की ओर मुख करके भी जप कर सकते हैं। भगवान दत्त हर जगह विद्यमान हैं, क्योंकि वे साक्षात परब्रह्म परमेश्वर हैं, इसलिए किसी भी दिशा की ओर मुख कर सकते हैं; किंतु गृहस्थों को घर में शांति और पौष्टिक कर्म की साधना दक्षिण दिशा की ओर मुख करके नहीं करनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि आपके निवास स्थान से गिरनार पर्वत का क्षेत्र जिस दिशा में पड़ता है — गिरनार गुजरात में है — उस दिशा की ओर भी मुख करके आप जप कर सकते हैं। वे जोड़ते हैं कि यद्यपि भगवान दत्त हर जगह विद्यमान हैं, क्योंकि वे साक्षात परब्रह्म परमेश्वर हैं। इसलिए आप किसी भी दिशा की ओर मुख करके कर सकते हैं। किंतु गृहस्थों को घर में शांति और पौष्टिक कर्म की साधना में दक्षिण दिशा की ओर मुख नहीं करना चाहिए। उसके सिवाय आप पूर्व, पश्चिम और उत्तर की ओर मुख करके साधना कर सकते हैं।
पीले धागे में रुद्राक्ष, पीली गोमुखी, पीत चंदन
पीले धागे में गुथी रुद्राक्ष माला, पीली गोमुखी और पीत चंदन
वक्ता कहते हैं कि माला रुद्राक्ष की लेनी है, जो पीले धागे में गुथी हुई हो। गोमुखी भी पीली ही रखनी है। मस्तक पर पीत वस्त्र और पीत चंदन का — यानी पीले चंदन का — लेपन करना है; इस साधना के आरंभ में रक्त चंदन का लेपन नहीं करना चाहिए। उसके स्थान पर केसर का लेपन भी कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसमें आपको रुद्राक्ष (रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला ।) की माला लेनी है। रुद्राक्ष की माला पीले धागे में गुथी हुई होनी चाहिए। गोमुखी (गोमुखीगाय के मुख के आकार की कपड़े की माला-थैली, जिसमें मंत्र-जप के समय हाथ व माला को सार्वजनिक दृष्टि से छुपाया जाता है।) भी इसमें आपको पीली ही रखनी है। मस्तक पर पीत वस्त्र और पीत चंदन का लेपन करना है — पीले चंदन का लेपन। इस साधना में आरंभ में रक्त चंदन का लेपन नहीं करना चाहिए। तत्पश्चात आप केसर का लेपन भी कर सकते हैं।
प्रथम दिन का पूजन धर्मपत्नी के साथ, और सामग्री अछूती
साधना की सामग्री का प्रयोग और कौन कर सकता है, और क्या पूजन में धर्मपत्नी सम्मिलित होती हैं?
वक्ता कहते हैं कि यदि आपका विवाह आदि हो चुका है, तो प्रथम दिन पूजन करते समय इस बात का ध्यान रखें कि यदि संभव हो तो भगवान दत्त का पूजन अपनी धर्मपत्नी के साथ अवश्य करें। साधना में प्रयोग किए जाने वाले वस्त्र दैनिक जीवन में प्रयोग नहीं करने हैं, केवल पूजन-पाठ में; और उन वस्त्रों का या आपके आसन का प्रयोग कोई अन्य व्यक्ति न करे, न ही आपकी माला या गोमुखी को कोई स्पर्श करे।
वक्ता कहते हैं कि यदि आपका विवाह इत्यादि हो चुका है, तो प्रथम दिन जब भी पूजन करेंगे तो इस बात का ध्यान रखें: यदि संभव हो तो भगवान दत्त का पूजन अपनी धर्मपत्नी के साथ अवश्य कर लें। साधना में जो वस्त्र आप प्रयोग करेंगे, उस वस्त्र का प्रयोग दैनिक जीवन में नहीं करना है। उसका प्रयोग केवल पूजन-पाठ में करना है। साथ ही इस बात का ध्यान रखना है कि उन वस्त्रों का प्रयोग किसी अन्य के द्वारा न किया जाए, आपके आसन का प्रयोग कोई अन्य व्यक्ति न करे, और आपकी माला या आपकी गोमुखीगाय के मुख के आकार की कपड़े की माला-थैली, जिसमें मंत्र-जप के समय हाथ व माला को सार्वजनिक दृष्टि से छुपाया जाता है। को कोई अन्य व्यक्ति स्पर्श न करे। केवल आप ही उन सभी चीजों का प्रयोग करें।
घी के दो दीप — दत्तात्रेय और भगवती अनघा लक्ष्मी
घी के दो दीपक — एक भगवान दत्तात्रेय के नाम, एक भगवती अनघा लक्ष्मी के नाम
वक्ता कहते हैं कि इसमें घी का दीपक जलाना उत्तम और सर्वश्रेष्ठ रहेगा। प्रत्येक व्यक्ति को दो दीपक जलाने चाहिए: एक भगवान दत्तात्रेय जी के नाम से और दूसरा उनकी महाशक्ति भगवती अनघा लक्ष्मी के नाम से। इसमें प्रत्येक व्यक्ति को दो दीप प्रज्वलित करने चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि इसमें घी का दीपक जलाएँगे तो उत्तम रहेगा — सर्वश्रेष्ठ रहेगा। इसमें प्रत्येक व्यक्ति को दो दीपक जलाने चाहिए। एक भगवान दत्तात्रेय जी के नाम से, और दूसरा उनकी महाशक्ति भगवती अनघा लक्ष्मी के नाम से। प्रत्येक व्यक्ति को दो दीप प्रज्वलित करने चाहिए। पूजन आरंभ में कर लेना है। पूजन की संक्षिप्त विधि के विषय में वे कहते हैं कि भगवान दत्त से संबंधित महत्वपूर्ण लिंक इसी वीडियो के विवरण में दे दिए जाएँगे — स्वयं में देव दीक्षा कैसे लेनी है, क्या विधि रहेगी; उसी सामग्री में उन्होंने षोडशोपचार पूजन की सामान्य विधि बताई है, और उसी विधि से आप प्रथम दिन भगवान का पूजन कर सकते हैं।
विनियोग और न्यास, फिर केवल बीज — न प्रणव, न नमः
पहले विनियोग और न्यास, फिर केवल बीज — न आगे प्रणव, न पीछे नमः
वक्ता कहते हैं कि जप की पूरी विधि का एक पीडीएफ इसी वीडियो के विवरण में रहेगा, जिसे डाउनलोड करके प्रिंट आउट निकलवा लेना है। आप विनियोग करेंगे, न्यास करेंगे, तत्पश्चात एकाक्षरी मंत्र का जप करेंगे। इसमें न प्रणव लगाना है, न नमः — जितना बीज मंत्र है केवल उसी का जप अधिकाधिक मात्रा में करना है।
वक्ता कहते हैं कि तत्पश्चात आपको जप आरंभ करना है। जप आरंभ करने के लिए जप की पूरी विधि का एक पीडीएफ इसी वीडियो के विवरण में रहेगा; उस पीडीएफ को डाउनलोड करके प्रिंट आउट निकलवा लीजिएगा। विनियोग और न्यास। आप विनियोग करेंगे, न्यास करेंगे, तत्पश्चात एकाक्षरी मंत्र का जप करेंगे। न ही इसमें प्रणव लगाना है, न ही नमः। जितना बीज मंत्र है, केवल उसी बीज मंत्र का जप आपको अधिकाधिक मात्रा में करना है।
एक पूर्णिमा से अगली पूर्णिमा तक प्रतिदिन 108 माला
एक पूर्णिमा से अगली पूर्णिमा तक प्रतिदिन 108 माला
वक्ता कहते हैं कि यदि एक पूर्णिमा से लेकर अगली पूर्णिमा तक प्रतिदिन 108 माला जप कर लें — समय सुबह, एकदम भोर के समय रख सकते हैं, या रात्रिकालीन साधना भी कर सकते हैं, शाम के समय भी कर सकते हैं — तो यही मात्रा है। किंतु वे कहते हैं कि ध्यान रखें, यदि 9-10 बजे साधना करेंगे तो प्रभाव कम मिलेगा; इसलिए सुबह भोर के समय करने का प्रयास करें।
वक्ता कहते हैं कि यदि एक पूर्णिमा से लेकर अगली पूर्णिमा तक प्रतिदिन 108 माला जप पूर्ण कर लेते हैं, तो अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। बन जाता है। समय आप सुबह रख सकते हैं, एकदम भोर के समय; या आप रात्रिकालीन साधना भी कर सकते हैं; शाम के समय भी कर सकते हैं। किंतु ध्यान रखें कि यदि 9-10 बजे साधना करेंगे तो प्रभाव कम मिलेगा। इसलिए सुबह के समय, भोर के समय करने का प्रयास करें।
सुबह 54 और शाम 54, तथा इस संकल्प का फल
क्या 108 माला को दो बैठकों में बाँटा जा सकता है?
वक्ता कहते हैं कि हाँ। आप दो समय मिलाकर भी 108 माला पूर्ण कर सकते हैं — सुबह 54 माला और शाम को 54 माला; 54-54 दो बार भी कर सकते हैं। यदि एक पूर्णिमा से अगली पूर्णिमा तक प्रतिदिन 108 माला जप कर देते हैं, तो भगवान दत्त की कृपा से न भौतिक जीवन में कुछ कमी रहेगी, न आध्यात्मिक जीवन में, और समय पर उनका मार्गदर्शन और सहयोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अवश्य मिलता रहेगा।
वक्ता कहते हैं कि आप इस साधना को दो समय मिलाकर भी कर सकते हैं और 108 माला पूर्ण कर सकते हैं — सुबह 54 माला, शाम को 54 माला; 54-54 दो बार भी कर सकते हैं। यदि एक पूर्णिमा से अगली पूर्णिमा तक प्रतिदिन 108 माला जप पूर्ण कर देते हैं, तो भगवान दत्त की कृपा से न आपके भौतिक जीवन में कोई कमी रहेगी, न आध्यात्मिक जीवन में। समय पर मार्गदर्शन और उनका सहयोग प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से अवश्य मिलता रहेगा। वे कहते हैं कि इसलिए सर्वप्रथम आप सभी को यह साधना करनी चाहिए।
मीठा भोग, चढ़ाया गया जल, बेलपत्र और तुलसी पत्र
कोई भी मीठी सामग्री — छुहारा, किशमिश, मिश्री — साथ में बेलपत्र और तुलसी पत्र
वक्ता कहते हैं कि भोग में आप कोई भी मीठी सामग्री लगा सकते हैं — छुहारा, किशमिश, मिश्री; इन सभी का भोग लगाना है। भोग लगाकर आप स्वयं भी खा सकते हैं और घर के लोगों को भी खिला सकते हैं। भोग के साथ जो जल रखेंगे, वह जल आप स्वयं पिएँगे। भगवान को बेलपत्र भी चढ़ा सकते हैं और तुलसी पत्र भी; दोनों चढ़ा सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसमें भोग कौन सा लगाना है — यह प्रश्न रहेगा। भोग में आप कोई भी मीठी सामग्री लगा सकते हैं: छुहारा, किशमिश, मिश्री; इन सभी का भोग लगाना है। भोग लगाकर आप स्वयं भी खा सकते हैं, और घर के लोगों को भी खिला सकते हैं। जो जल चढ़ाया जाएगा — अर्थात जो जल आप भोग के साथ रखेंगे — वह जल आप स्वयं पिएँगे। भगवान को बेलपत्र भी चढ़ा सकते हैं, और तुलसी पत्र भी चढ़ा सकते हैं; ये दोनों आप चढ़ा सकते हैं।
गौ माता कामधेनु और भगवान दत्त के चार कुत्ते
साधना काल में किन प्राणियों को भोजन कराना अनिवार्य है?
वक्ता कहते हैं कि जब तक जप चले, जब तक साधना काल रहे — वस्तुतः यह तो सदैव जीवन में पालन करना चाहिए — प्रतिदिन गाय को भोग अवश्य खिलाना है। भगवान दत्त सदैव गाय के साथ चलते हैं, इसलिए गौ माता कामधेनु उनके साथ उपस्थित होती हैं और उनकी सेवा होनी चाहिए। भगवान दत्त के साथ चार कुत्ते रहते हैं, इसलिए इस बात का भी ध्यान रखना है कि कुत्तों को भी भोजन कराना है।
वक्ता कहते हैं कि इसके सिवाय एक और विशेष बात का ध्यान रखना है: जब तक जप चले, जब तक साधना काल रहे — वस्तुतः यह तो सदैव जीवन में पालन करना चाहिए — प्रतिदिन गाय को भोग अवश्य खिलाना है। भगवान दत्त सदैव गाय के साथ चलते हैं। गौ माता कामधेनु उनके साथ उपस्थित होती हैं, तो उनकी सेवा हो। भगवान दत्त के साथ चार कुत्ते रहते हैं। इसलिए उस समय भी आपको इस बात का ध्यान रखना है कि कुत्तों को भी भोजन अवश्य कराना है। वे कहते हैं कि इन सभी कार्यों के साथ यदि आप यह जप करते हैं, तो उनकी असीम कृपा आपको अवश्य प्राप्त होती है।
कम से कम 11 माला का हवन, उच्चारण केवल मन में
अंतिम दिन कम से कम ग्यारह माला का हवन, और मंत्र का उच्चारण केवल मन में
वक्ता कहते हैं कि जप पूर्ण होने के बाद, यदि संभव हो तो अंतिम दिन — अर्थात जब पूर्णिमा से पूर्णिमा तक का जप पूरा हो जाए — हवन भी कर लीजिए। यह कम से कम 11 माला का हवन होगा। इसमें केवल बीज का उच्चारण करते हुए स्वाहा बोलेंगे; और उच्चारण मुख से नहीं, मन में करना है। चूँकि इस मंत्र को गुरु स्वरूप में धारण किया जा रहा है, इसलिए इसका जप कभी बोलकर नहीं करना है।
वक्ता कहते हैं कि जप पूर्ण होने के बाद, यदि संभव हो तो अंतिम दिन — अर्थात जब आपने पूर्णिमा से पूर्णिमा तक जप कर लिया हो — हवन भी कर लीजिए। यह कम से कम 11 माला का हवन होगा। इसमें केवल बीज मंत्र का उच्चारण करते हुए स्वाहादेवताओं हेतु अग्नि में दी जाने वाली आहुति के अंत में बोला जाने वाला वचन, पितरों के 'स्वधा' से भिन्न। बोलेंगे। और उच्चारण भी मुख से नहीं करना है; मन में करना है। ध्यान रखें कि चूँकि आप इस मंत्र को गुरु स्वरूप में धारण कर रहे हैं, इसलिए इस मंत्र का जप कभी भी उच्चारण करके नहीं करेंगे। बोलकर जप नहीं करना है। ओठ हिला सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं, किंतु किसी को सुनाई नहीं देना चाहिए। यह गुरु मंत्र है, इसलिए इसे किसी को नहीं बताना है; इसलिए कभी बोलना नहीं है। जब आहुति भी डालेंगे, हवन भी करेंगे, तो मन में उच्चारण करते हुए केवल स्वाहा बोलकर आहुति देंगे। इस प्रकार आपको यह जप पूर्ण करना है, और जप का समर्पण भगवान दत्त को करते रहना है।
दो भोजपत्र, विपरीत दो त्रिभुज, बीच में बीज
दो भोजपत्र, एक-दूसरे से विपरीत दो त्रिभुज, और बीच में लिखा बीज
वक्ता कहते हैं कि यदि इसके साथ एक और प्रयोग कर लें तो अति उत्तम होता है। दो भोजपत्र लेकर उन पर यंत्र बनाएँगे — यंत्र कैसा होता है यह दीक्षा विधान वाले वीडियो में देखा जा सकता है। दो त्रिभुज बनेंगे, एक-दूसरे से विपरीत, और बीच में भगवान दत्त का यह एकाक्षरी बीज लिखा जाएगा। उसकी प्राण प्रतिष्ठा की सामान्य विधि वहीं बताई गई है, और यदि आपको पूर्ण विधि आती है तो वह भी कर सकते हैं। तत्पश्चात उसे भगवान दत्त के पास रख देंगे और प्रथम दिन का जप पूर्ण करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ एक और प्रयोग कर लेते हैं तो अति उत्तम होता है। यद्यपि दीक्षा विधान में वह बात बताई गई है, फिर भी वे उसे यहाँ पुनः बता देते हैं। दो भोजपत्रभोजपत्र, अनार की टहनी की कलम व लाल चंदन की स्याही से मंत्र या नाम लिखने हेतु प्रयुक्त — जैसे शिवलिंग के अर्घे पर नाम रखकर मधु-अभिषेक करने में। लेंगे और उन पर यंत्र बनाएँगे। यंत्र कैसा होता है, वह दीक्षा विधान वाले वीडियो में देख सकते हैं। दो त्रिभुज बनेंगे, एक-दूसरे से विपरीत, और बीच में भगवान दत्त का यह एकाक्षरी बीज मंत्र लिखा जाएगा। उसकी प्राण प्रतिष्ठा की विधि होगी — वही सामान्य विधि जो वहाँ बताई गई है; यदि आपको पूर्ण विधि आती है तो वह भी कर सकते हैं। तत्पश्चात उसको भगवान दत्त के पास रख देंगे, और प्रथम दिन का जप पूर्ण करेंगे।
पीले धागे में ताँबे या चाँदी का कवच
एक यंत्र ताँबे या चाँदी के कवच में, पीले धागे में गले में धारण
वक्ता कहते हैं कि दोनों में से एक यंत्र को किसी कवच में — चाहे ताँबे का हो या चाँदी का — डालकर, पीले धागे में करके अपने गले में पहन लेंगे; और आप जप करते रहेंगे। जब आपके 30 दिन पूर्ण हो जाएँगे, अर्थात जब अगली पूर्णिमा आएगी, तो उस दिन आप जप करेंगे, हवन करेंगे और समर्पण कर देंगे।
दूसरा यंत्र धारण, पहला नदी में विसर्जित
दूसरा कवच धारण किया जाता है और पहला नदी में विसर्जित
वक्ता कहते हैं कि प्रथम दिन बनाकर भगवान के पास रख छोड़ा हुआ यंत्र तब एक सुंदर से नए कवच में डालकर गले में धारण कर लिया जाता है; और जो कवच आपने तब तक पहन रखा था, उसे नदी में ले जाकर विसर्जित कर देंगे। इस प्रकार कवच और मंत्र दोनों सिद्ध हो जाएँगे, जिसके बाद आप दैनिक जीवन में यथाशक्ति पाँच माला या 11 माला जप नियमित रूप से करते रहेंगे।
वक्ता कहते हैं कि तत्पश्चात, जो यंत्र आपने प्रथम दिन बनाकर भगवान के पास रख छोड़ा था, उसे पुनः एक सुंदर से कवच में डालकर गले में धारण कर लेंगे; और जो कवच आपने पहले से पहन रखा था, उसको आप नदी में ले जाकर विसर्जन कर देंगे। इस प्रकार यह कवच और यह मंत्र — ये दोनों — सिद्ध हो जाएँगे। उसके पश्चात दैनिक जीवन में आप प्रतिदिन इस मंत्र का यथाशक्ति पाँच माला, 11 माला नियमित रूप से जप करते रहेंगे। तब आपकी आध्यात्मिक उन्नति भी होगी, और आगे आप जो भी साधना करेंगे — भगवान गणपति की, भैरव जी की, हनुमान जी की, महाविद्याओं की — उनमें आपको अवश्य सफलता प्राप्त होगी। फिर आपको कोई दोष नहीं लगेगा। और दोष लगने पर भगवान दत्त आपको मार्गदर्शन करके उस दोष से छुटकारा हेतु कोई न कोई निमित्त बना देंगे। वे कहते हैं कि इस प्रकार भगवान महागुरु महादत्त के शरण में जाकर, उनकी शरणागति को स्वीकार करके, आप अपनी साधनात्मक और आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ भौतिक जीवन में भी उन्नति कर सकते हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।