भगवती शाकंभरी दुर्गा की साधना — अनुष्ठान विधि और एक दिवसीय पूर्णिमा प्रयोग
भगवती शाकंभरी की साधना की विधि।
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भगवती शाकंभरी कौन हैं?
दुर्गमासुर का अकाल मिटाने वाला शताक्षी रूप
वक्ता शाकंभरी को भगवती दुर्गा का वह स्वरूप बताते हैं जो इसी नाम से विश्व विख्यात है। जब दुर्गमासुर के कारण पूरे विश्व में अकाल पड़ा, तब जगदम्बा ने शताक्षी रूप धारण किया, यानी अपने शरीर में सौ नेत्र प्रकट किए, और उन नेत्रों से जल यानी आँसू प्रवाहित किए; उन्हीं आँसुओं से विश्व में जल की पूर्ति हुई और सारे शाक-सब्जी फिर से उग आए, और उसके बाद जो स्वरूप उन्होंने धारण किया वही शाकंभरी का स्वरूप माना गया। वे जोड़ते हैं कि शाकंभरी और भगवती अन्नपूर्णा का स्वरूप, और विशेष करके उनके बहुत सारे तंत्र संबंधी मंत्र और विधान, लगभग एक समान हैं।
वक्ता भगवती शाकंभरी की साधना का परिचय देते हैं: भगवती दुर्गा का वह स्वरूप जो शाकंभरी के नाम से विश्व विख्यात है। वे कहते हैं कि जब दुर्गमासुर के कारण पूरे विश्व में अकाल पड़ गया, तब जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। ने शताक्षी रूप धारण किया, यानी अपने शरीर में सौ नेत्र प्रकट किए, और उन नेत्रों के द्वारा जल यानी आँसू प्रवाहित किए। उन्हीं आँसुओं से पूरे विश्व में जल की पूर्ति हुई और जितने भी शाक-सब्जी होते हैं उनका पुनः उद्भव हुआ, वे फिर से उग पाए। उसके पश्चात जगदंबा ने जो स्वरूप धारण किया, उसी को शाकंभरी का स्वरूप माना गया है। फिर वे दो स्वरूपों को साथ रखते हैं: भगवती शाकंभरी का स्वरूप और भगवती अन्नपूर्णा का स्वरूप। विशेष करके, वे कहते हैं, इनके बहुत सारे तंत्र संबंधी मंत्र और विधान लगभग एक समान होते हैं।
गृहस्थ के लिए शाकंभरी या अन्नपूर्णा अनुष्ठान: उद्देश्य और अधिकारी
अन्न, धन, वस्त्र की कमी नहीं; सबके लिए खुला
वक्ता कहते हैं कि नित्य जीवन में, और विशेष करके गृहस्थ साधक को, समय-समय पर भगवती अन्नपूर्णा या भगवती शाकंभरी का अनुष्ठान करते रहना चाहिए, क्योंकि उनकी कृपा प्रसाद से घर-परिवार में अन्न, धन, वस्त्र इत्यादि की कभी कोई कमी नहीं होती। अधिकार पर वे स्पष्ट हैं: इस साधना को कोई भी व्यक्ति कर सकता है, दीक्षित हो या अदीक्षित, स्त्री हो या पुरुष।
वक्ता कहते हैं कि हमें अपने नित्य जीवन में, विशेष करके गृहस्थ साधक को, या तो भगवती अन्नपूर्णा या भगवती शाकंभरी का समय-समय पर अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। इत्यादि करते रहना चाहिए। उनके अनुसार इनकी कृपा प्रसाद से हमारे घर-परिवार में अन्न, धन, वस्त्र इत्यादि की कभी कोई कमी नहीं होती। यह वार्ता, वे बताते हैं, विशेष रूप से भगवती शाकंभरी दुर्गा के साधना अनुष्ठान पर है। अधिकार पर वे स्पष्ट हैं: इस साधना को कोई भी व्यक्ति कर सकता है, चाहे वह दीक्षा प्राप्त हो या अदीक्षित। स्त्री-पुरुष कोई भी, वे कहते हैं, कर सकते हैं।
शाकंभरी साधना कब आरंभ करें
कोई भी नवरात्र, पर्व काल या पूर्णिमा
वक्ता कहते हैं कि इस साधना को आरंभ करने का सर्वश्रेष्ठ समय साल की कोई भी नवरात्रि है, चाहे प्रकट हो या गुप्त नवरात्रि। किसी भी विशेष पर्व काल से भी साधना का आरंभ किया जा सकता है, और पूर्णिमा तिथि से भी।
वक्ता कहते हैं कि इस साधना को आरंभ करने के लिए सर्वश्रेष्ठ समय साल की कोई भी नवरात्रि है; प्रकट नवरात्र या गुप्त नवरात्रि में इसे किया जा सकता है। अथवा किसी भी विशेष पर्व काल से भी साधना का आरंभ किया जा सकता है। पूर्णिमा तिथि से भी इस साधना का आरंभ आप कर सकते हैं।
शाकंभरी अनुष्ठान की तैयारी और पूजन क्रम: वस्त्र, दिशा, विग्रह, न्यास और कवच
लाल या पीला, पूर्व या उत्तर, फिर पीडीएफ की विधि
वक्ता कहते हैं कि लाल या पीला वस्त्र, पीला या लाल आसन लें और पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके जप करें, सामने चतुर्भुजा जगदंबा का श्री विग्रह स्थापित करें या अष्टभुजा दुर्गा का, और उसी पर अर्चन-पूजन करें। क्रम यह है: गुरु, गणपति इत्यादि का स्मरण, फिर भगवती शाकंभरी दुर्गा का ध्यान, फिर विनियोग, ऋषि इत्यादि न्यास, कर न्यास, हृदय न्यास, ध्यान मंत्र और जप मंत्र ठीक वैसे ही जैसे वीडियो के डिस्क्रिप्शन में दी पीडीएफ में लिखा है। उस विधि से पहले शाकंभरी कवच का पाठ किया जा सकता है, वह उपलब्ध न हो तो सप्तशती में वर्णित भगवती के चंडी दुर्गा कवच का, और उसके बाद मंत्र का अनुष्ठान करें।
वक्ता कहते हैं कि साधना में विशेष करके लाल अथवा पीला वस्त्र प्रयोग करना है। पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना है, और आसनसाधना के दौरान प्रयुक्त पवित्र आसन, जिसे पृथ्वी-शक्ति (वसुंधरा) का साक्षात रूप माना जाता है — इसे कभी भी सामान्य प्रयोजन हेतु साझा, पद-दलित, या उपयोग नहीं करना चाहिए। भी पीला अथवा लाल ही रहेगा। जगदंबा भगवती का श्री विग्रह स्थापित कर सकते हैं, जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। चतुर्भुजा हैं। या फिर इसमें अष्टभुजा दुर्गा की भी उपासना कर सकते हैं। उन्हीं के श्री विग्रह पर इनका अर्चन-पूजन करें। सर्वप्रथम गुरु, गणपति इत्यादि का स्मरण करने के पश्चात भगवती शाकंभरी दुर्गा का ध्यान करेंगे। वीडियो के डिस्क्रिप्शन में एक पीडीएफ फाइल का लिंक दिया है जिसमें इस साधना का विनियोग, ऋषि इत्यादि न्यास, कर न्यास, हृदय न्यास सब कुछ लिखा है, साथ में ध्यान मंत्र और जप मंत्र भी। उसी को करना है, वे कहते हैं। उसको करने से पहले शाकंभरी कवच का पाठ कर सकते हैं। अगर वह उपलब्ध न हो तो भगवती के चंडी durga-kavach का पाठ कर लें, जिसका वर्णन दुर्गा सप्तशती में है। और उसके पश्चात इस मंत्र का अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। करें।
शाकंभरी मंत्र की जप संख्या: सवा लाख या 27,000, दशांश हवन, तर्पण और मार्जन सहित
पूर्ण संख्या पर नौ कन्याओं का भोज
वक्ता कहते हैं कि इस मंत्र का अधिकाधिक जप करना चाहिए। अगर आप इसका सवा लाख जप करके उसका दशांश हवन, दशांश तर्पण, दशांश मार्जन और नौ कन्याओं का भोज करते हैं, तो भगवती शाकंभरी की कृपा विशेष रूप से प्राप्त होती है। सामान्य रूप, उनके अनुसार, इस मंत्र का कम से कम 27,000 जप है, दशांश हवन, तर्पण और मार्जन के साथ।
वक्ता कहते हैं कि इस मंत्र का अधिकाधिक जप करना चाहिए। अगर आप इस मंत्र का सवा लाख मंत्र जप करके उसका दशांश हवन, उसका दशांश तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण।, उसका दशांश मार्जन और नौ कन्याओं का भोज करते हैं, तब भगवती शाकंभरी की कृपा विशेष रूप से आपको प्राप्त होती है। सामान्य रूप से, उनके अनुसार, इस मंत्र का कम से कम 27,000 जप, दशांश हवन, तर्पण और मार्जन करना चाहिए।
शाकंभरी साधक किसी को भूखा-प्यासा न छोड़े, और यह भगवती को क्यों प्रसन्न करता है
भूखे के माध्यम से वे साधक की परीक्षा लेती हैं
वक्ता कहते हैं कि इस मंत्र के साधक को किसी भी परिस्थिति में भूख से पीड़ित या बहुत बढ़ी हुई प्यास वाले किसी भी व्यक्ति की सहायता करनी चाहिए, चाहे वह शत्रु ही क्यों न हो; कभी किसी को भूखा नहीं देखना है, यथाशक्ति अन्न से सहायता करनी है, चाहे कोई पशु ही भूखा क्यों न हो, जितना बुद्धि, शरीर और आर्थिक सामर्थ्य साथ दे। कहते हैं कि ऐसा करने से भगवती जल्दी प्रसन्न होती हैं, और इसका कारण वे यह बताते हैं: अन्नपूर्णा और शाकंभरी दुर्गा की साधना में वे इसी स्वरूप के माध्यम से साधक की परीक्षा लेती हैं, और जब आप किसी की क्षुधा तृप्त करते हैं तो भगवती ही तृप्त होकर कृपा करती हैं।
वक्ता इस मंत्र के साधक पर एक स्थायी दायित्व रखते हैं। कोई भी व्यक्ति जो अन्न से, यानी भूख से पीड़ित हो, या जल के कारण उसकी तृष्णा बहुत बढ़ी हुई हो, तो इस मंत्र के साधक को किसी भी परिस्थिति में उसका सहयोग करना चाहिए, चाहे वह शत्रु ही क्यों न हो। यानी कभी किसी को भूखा नहीं देखना है। अगर कोई भूखा व्यक्ति मिले तो यथाशक्ति उसे अन्न से सहायता करनी है; यही अन्नदान इस साधना का आधार है। चाहे कोई पशु भी भूखा क्यों न हो, उस वक्त आपकी जो भी बुद्धि कार्य करे, आपका शरीर जो भी सामर्थ्य दे, आर्थिक रूप से आप जितने सक्षम हों, उतना उनका साथ देना चाहिए और उनकी क्षुधा और तृष्णा को तृप्त करना चाहिए। वे बताते हैं कि कहते हैं ऐसा किया जाए तो भगवती जल्दी प्रसन्न होती हैं। यह इसलिए कहा गया है: जब आप अन्नपूर्णा और शाकंभरी दुर्गा की साधना करते हैं तो वे इसी स्वरूप के माध्यम से आपकी परीक्षा लेती हैं। और जब आप अन्न से किसी की सहायता करते हैं, उसकी क्षुधा तृप्त कर देते हैं, तो भगवती ही तृप्त होकर आप पर कृपा करती हैं। इस प्रकार से, वे कहते हैं, यह साधना कर सकते हैं।
शाकंभरी या अन्नपूर्णा साधना का एक दिवसीय पूर्णिमा रूप, और पौष पूर्णिमा उनका अवतरण दिवस
5,000 जप, दशांश और एक कन्या
वक्ता कहते हैं कि नवरात्र के सिवाय पूर्णिमा, विशेष करके पौष माह की पूर्णिमा, को भगवती का अवतरण दिवस कहा गया है, उसी दिन जगदम्बा ने यह स्वरूप धारण किया था, और उस दिन एक दिवसीय साधना विशेष रूप से की जा सकती है। समय की कमी हो तो अन्नपूर्णा या शाकंभरी साधना किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि को एक दिवसीय साधना के रूप में भी की जा सकती है: उस दिन यथाशक्ति जप, 5,000 जप के साथ उसका दशांश हवन, तर्पण और मार्जन, और एक कन्या का भोज, अथवा एक कन्या का भोजन, वस्त्र और श्रृंगार की सामग्री, जो मंदिर में दान भी की जा सकती है।
वक्ता कहते हैं कि नवरात्रि के सिवाय पूर्णिमा, विशेष करके पौष माह की पूर्णिमा, को भगवती का अवतरण दिवस कहा गया है; उसी दिन जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। ने यह स्वरूप धारण किया था। तो उस दिन भी यह एक दिवसीय साधना विशेष रूप से की जा सकती है। अथवा आपके पास समय की कमी हो तो अन्नपूर्णा साधना अथवा शाकंभरी साधना किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि को एक दिवसीय साधना के रूप में भी कर सकते हैं। एक दिन में यथाशक्ति जप करेंगे, जितना हो सके: 5,000 जप करके उसका दशांश हवन, तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण।, मार्जन और एक कन्या का भोज। अथवा एक कन्या का जो भी खाना, वस्त्र इत्यादि, श्रृंगार का सामान होता है, वह सब मंदिर में दान भी कर सकते हैं। इस प्रकार से, वे कहते हैं, साधना को सिद्ध करें।
अनुष्ठान के बाद शाकंभरी का नित्य जप: पाँच या ग्यारह माला
नित्य प्रयोग का रूप
वक्ता कहते हैं कि प्रयोग के लिए, इस अनुष्ठान को करने के पश्चात, नित्य मंत्र का पाँच माला अथवा ग्यारह माला जप प्रतिदिन कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि प्रयोग के लिए, इस अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। को करने के पश्चात, जो नित्य मंत्र है उसका पाँच माला अथवा ग्यारह माला जप प्रतिदिन कर सकते हैं।
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