यमराज के पीछे-पीछे
Following Yama — Sāvitrī walks after Death and wins her husband back, boon by boon
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यत्र मे नीयते भर्ता स्वयं वा यत्र गच्छति ।
मया च तत्र गन्तव्यमेष धर्मः सनातनः ॥
जय श्री कृष्ण।
अस्पताल। आई.सी.यू. के बाहर का गलियारा। रात के तीन बजे।
एक स्त्री बेंच पर बैठी है। अंदर उसके पति हैं। मशीनों की आवाज़ बाहर तक आती है। डॉक्टर आते हैं, जाते हैं। कुछ ठीक से नहीं बताते। "देखते हैं। अगले चौबीस घंटे ज़रूरी हैं।"
रिश्तेदार कहते हैं, "घर जाकर थोड़ा सो लो।" पर वो नहीं जाती। वहीं बैठी रहती है। जैसे उसके वहाँ बैठे रहने से ही कुछ बदल जाएगा।
आप में से कई लोग उस बेंच पर बैठ चुके हैं। पति के लिए, पत्नी के लिए, बच्चे के लिए, माँ-बाप के लिए।
आज की कथा एक ऐसी स्त्री की है, जो उस बेंच से भी आगे गई। वो मृत्यु के देवता के पीछे-पीछे चल पड़ी।
मद्र देश की राजकुमारी सावित्री। पिता ने कहा — "बेटी, अपना वर ख़ुद चुनो।" वो तीर्थों और आश्रमों में घूमती रही। और लौटकर बोली — "पिताजी, मैंने चुन लिया।"
"साल्व देश के राजा द्युमत्सेन थे। अंधे हो गए, तो दुश्मन ने राज्य छीन लिया। अब वो पत्नी और बेटे के साथ जंगल में रहते हैं। उनका बेटा — सत्यवान। मैंने उसे मन से चुन लिया है।"
अब एक प्यारी-सी बात। पहली। सत्यवान को बचपन से घोड़े बहुत पसंद थे। मिट्टी के घोड़े बनाता था, चित्रों में घोड़े बनाता था। इसलिए उसका एक और नाम था — चित्राश्व!
वहाँ देवर्षि नारद बैठे थे। सत्यवान के गुण सुनकर बोले — "सूर्य जैसा तेजस्वी, पृथ्वी जैसा क्षमाशील, सत्यवादी, दानी।" फिर रुके।
"पर एक दोष है। और वो सारे गुणों को ढक देता है। आज से एक साल में… सत्यवान की आयु पूरी हो जाएगी।"
पिता घबरा गए। "बेटी, कोई और चुन लो।"
और सावित्री ने जो कहा, वो आज भी हर रिश्ते की नींव है —
दीर्घायुरथवाऽल्पायुः सगुणो निर्गुणोऽपि वा ।
सकृद्वृतो मया भर्ता न द्वितीयं वृणोम्यहम् ॥
"लंबी उम्र वाला हो या छोटी उम्र वाला, गुणी हो या गुणहीन… मैंने एक बार चुन लिया। दूसरा नहीं चुनूँगी।"
मनसा निश्चयं कृत्वा ततो वाचाऽभिधीयते ।
क्रियते कर्मणा पश्चात्प्रमाणं मे मनस्ततः ॥
"पहले मन में तय होता है, फिर ज़ुबान पर आता है, फिर काम में। मेरा मन तय कर चुका है।"
विवाह हुआ। सावित्री ने राजमहल के गहने उतारे, वल्कल पहने, और जंगल के आश्रम में सास-ससुर की सेवा में लग गई।
और फिर… वो साल शुरू हुआ।
गणयन्त्याश्च सावित्र्या दिवसे दिवसे गते ।
महाभारत कहता है — सावित्री एक-एक दिन गिनती रहती थी। किसी को बताया नहीं। अकेले। दिन गिनती रही।
सोचिए। हर सुबह पति को मुस्कुराकर देखना… और मन में गिनना, "तीन सौ दिन बचे। दो सौ। सौ।"
और जब चार दिन बचे, तो उसने तीन रात का कठोर व्रत लिया। तीन दिन, तीन रात… बिना खाए, खड़ी रही। ससुर ने समझाया, "बेटी, ये बहुत कठिन है।" "पिताजी, दुःख मत कीजिए। जो दृढ़ निश्चय से लिया है, वो दृढ़ निश्चय से ही पूरा होगा।"
महाभारत कहता है — वो ऐसी अचल खड़ी थी, जैसे लकड़ी की बनी हो।
और आख़िरी दिन। सत्यवान कुल्हाड़ी कंधे पर रखकर जंगल जाने लगा। सावित्री बोली — "आज मैं भी साथ चलूँगी।"
जंगल में सत्यवान ने फल तोड़े, टोकरी भरी, फिर लकड़ी काटने लगा। पसीना आया। और अचानक सिर में तेज़ दर्द।
"सावित्री… सिर फट रहा है। अंग दुख रहे हैं। मुझसे खड़ा नहीं हुआ जाता।"
सावित्री ज़मीन पर बैठ गई। पति का सिर अपनी गोद में रख लिया। और मन में नारद की बात मिलाई… घड़ी, पल, दिन।
"वो समय आ गया।"
और तभी उसने देखा — लाल वस्त्र, सिर पर मुकुट, सूर्य जैसा तेज, साँवला रंग, लाल आँखें… और हाथ में पाश। सत्यवान को एकटक देखता हुआ।
सावित्री ने धीरे से पति का सिर नीचे रखा। उठी। हाथ जोड़े। "आप देवता हैं। कौन हैं आप?"
"मैं यम हूँ।"
और अब दूसरी चौंकाने वाली बात। सावित्री ने पूछा — "सुना है, आप तो दूतों को भेजते हैं। आप स्वयं क्यों आए?"
अयं च धर्मसंयुक्तो रूपवान्गुणसागरः ।
नार्हो मत्पुरुषैर्नेतुमतोऽस्मि स्वयमागतः ॥
"ये धर्मात्मा है, गुणों का सागर है। मेरे दूत इसे ले जाने लायक़ नहीं। इसलिए मैं स्वयं आया हूँ।"
अच्छे आदमी को लेने… मृत्यु भी ख़ुद आती है। आदर से।
यम ने सत्यवान के शरीर से अँगूठे भर का पुरुष खींच लिया। और दक्षिण की ओर चल पड़े।
और सावित्री… पीछे-पीछे।
यम मुड़े। "सावित्री, लौट जाओ। पति का क्रिया-कर्म करो। जितना कोई आ सकता है, तुम आ चुकी।"
यत्र मे नीयते भर्ता स्वयं वा यत्र गच्छति ।
मया च तत्र गन्तव्यमेष धर्मः सनातनः ॥
"जहाँ मेरे पति ले जाए जाएँ, या जहाँ वो ख़ुद जाएँ… वहीं मुझे भी जाना है। यही सनातन धर्म है।"
प्राहुः साप्तपदं मैत्रं बुधास्तत्त्वार्थदर्शिनः ।
और फिर एक बहुत चतुर बात कही — "ज्ञानी कहते हैं, सात क़दम साथ चलो तो मित्रता हो जाती है। महाराज, हम तो सात से ज़्यादा क़दम साथ चल चुके! अब मित्र के नाते एक बात सुनिए।"
और वो धर्म की बातें करने लगी। सज्जनों का संग कभी व्यर्थ नहीं जाता। सज्जन शत्रु पर भी दया करते हैं। यम प्रसन्न। "सत्यवान के प्राण छोड़कर, कोई वर माँगो।"
और अब देखिए, सावित्री ने क्या-क्या माँगा।
पहला वर — "मेरे ससुर की आँखें लौट आएँ।" मिला। "अब लौट जाओ, थक गई होगी।"
"पति के पास रहते थकान कैसी?" और फिर धर्म की बात।
दूसरा वर — "ससुर को उनका राज्य वापस मिले।" मिला। "अब लौट जाओ।"
तीसरा वर — "मेरे पिता के कोई बेटा नहीं। उन्हें सौ पुत्र हों।" मिला। "बहुत दूर आ गई, लौट जाओ।"
"पति के पास हूँ, तो दूर कहाँ? मेरा मन तो और आगे दौड़ रहा है।"
अब देखिए, सावित्री ने अब तक अपने लिए कुछ नहीं माँगा। सास-ससुर के लिए, पिता के लिए।
चौथा वर — और यहाँ उसकी बुद्धि देखिए — "सत्यवान से और मुझसे, हम दोनों से, सौ बलवान पुत्र हों।"
और यम, बातों में मगन, बोल पड़े — "तथास्तु!"
और फिर यम बोले — "तुम्हारी हर बात के साथ तुम्हारे लिए मेरी श्रद्धा बढ़ती जाती है। कोई अनुपम वर माँगो।"
और सावित्री ने देखा — इस बार यम ने "सत्यवान के प्राण छोड़कर" नहीं कहा!
न कामये भर्तृविनाकृता सुखं
न कामये भर्तृविनाकृता दिवम् ।
"पति के बिना मुझे सुख नहीं चाहिए। पति के बिना स्वर्ग नहीं चाहिए।"
वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं
तवैव सत्यं वचनं भविष्यति ॥
"आपने ही मुझे सौ पुत्रों का वर दिया, और मेरे पति को ले जा रहे हैं? यही वर माँगती हूँ — सत्यवान जीवित हों। तभी आपका अपना वचन सच होगा।"
और धर्मराज यम… मुस्कुराए होंगे। "ऐसा ही हो।" पाश खोल दिया। "तुम्हारे साथ ये चार सौ बरस जिएगा।"
सावित्री लौटी। पति का सिर फिर गोद में रखा। और सत्यवान ने आँखें खोलीं। "अरे, मैं बहुत देर सो गया। जगाया क्यों नहीं? वो साँवला आदमी कहाँ गया, जो मुझे खींच रहा था?"
और अब तीसरी बात, जो मुझे सबसे छूती है। जागते ही सत्यवान को सबसे पहले किसकी चिंता हुई?
अपने माँ-बाप की। "रात हो गई! मेरे अंधे पिता आश्रम में हर किसी से मेरे बारे में पूछ रहे होंगे। माँ रो रही होगी। मैं उनकी लाठी हूँ।" और वो दोनों हाथ उठाकर फूट-फूटकर रोने लगा।
सावित्री ने उसके आँसू पोंछे और कहा —
न स्मराम्युक्तपूर्वं वै स्वैरेष्वप्यनृतां गिरम् ।
तेन सत्येन तावद्य ध्रियेतां श्वशुरौ मम ॥
"मुझे याद नहीं कि मैंने कभी मज़ाक़ में भी झूठ बोला हो। उसी सत्य के बल से, आज मेरे सास-ससुर सकुशल रहें।"
फिर उठी, बाल बाँधे, फलों की टोकरी पेड़ पर टाँग दी — "फल कल ले जाएँगे।" कुल्हाड़ी अपने हाथ में ली, पति की बाँह अपने कंधे पर रखी… और अंधेरे जंगल में घर की ओर चल पड़ी।
जो अभी-अभी मृत्यु से लड़कर आई थी… वो कुल्हाड़ी और टोकरी भी नहीं भूली।
गीता में भगवान कहते हैं —
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥
"भला करने वाले की कभी दुर्गति नहीं होती।" सावित्री का सत्य, उसकी सेवा, उसका धर्म… यम के सामने वही उसका वकील बना।
तो जो आज किसी अस्पताल के गलियारे में हैं, उनके लिए तीन बातें।
पहली। हिम्मत मत छोड़िए। "यावद्गम्यम्" — जहाँ तक जा सकते हैं, जाइए। सावित्री वहाँ भी चली, जहाँ कोई नहीं जाता।
दूसरी। संकट में भी अपनों को मत भूलिए। सावित्री ने पहले सास-ससुर का माँगा, पिता का माँगा। जो दूसरों के लिए माँगता है, उसकी अपनी झोली अपने आप भर जाती है।
और तीसरी। सत्य को अपनी सबसे बड़ी पूँजी बनाइए। "मैंने मज़ाक़ में भी झूठ नहीं बोला।" जिस दिन संकट आएगा, उस दिन यही सत्य आपके लिए बोलेगा।
तो अगर आज रात आप भी किसी बेंच पर बैठे हैं… किसी अपने की साँसें गिन रहे हैं…
तो उस जंगल की उस स्त्री को याद कीजिए, जिसने दिन गिने, व्रत रखा, और मृत्यु के पीछे भी चल पड़ी।
यमराज के पीछे-पीछे… और धर्म ने हार मान ली।
जय श्री कृष्ण।
वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं
तवैव सत्यं वचनं भविष्यति ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.हिम्मत मत छोड़िए। "यावद्गम्यम्" — जहाँ तक जा सकते हैं, जाइए। सावित्री वहाँ भी चली, जहाँ कोई नहीं जाता।
- 2.संकट में भी अपनों को मत भूलिए। सावित्री ने पहले सास-ससुर का माँगा, पिता का माँगा। जो दूसरों के लिए माँगता है, उसकी अपनी झोली अपने आप भर जाती है।
- 3.सत्य को अपनी सबसे बड़ी पूँजी बनाइए। "मैंने मज़ाक़ में भी झूठ नहीं बोला।" जिस दिन संकट आएगा, उस दिन यही सत्य आपके लिए बोलेगा।