नल-दमयन्ती

Nala and Damayantī — A kingdom lost at dice, a couple parted in the forest, and found again

0:00
न च भार्यासमं किंचिन्नरस्यार्तस्य भेषजम् ॥
वन 58.30

जय श्री कृष्ण।

कुछ लोगों के लिए ज़िंदगी एक झटके में पलट जाती है। कल तक अपना कारोबार था, गाड़ी थी, सम्मान था। आज कर्ज़ है, और फ़ोन उठाने वाला कोई नहीं।

और कुछ घरों में दूसरी तरह का बिछड़ना है। पति एक शहर में, पत्नी दूसरे में। या किसी झगड़े के बाद, एक ही घर में रहकर भी, दो अजनबी। या कोई अपना, जो चला गया, और लौटने का रास्ता भूल गया।

और मन पूछता है — "क्या सब फिर से जुड़ सकता है? या जो टूट गया, वो टूट ही गया?"

आज की कथा इसी सवाल का उत्तर है। और ये कथा महाभारत में सुनाई गई थी… एक ऐसे राजा को, जो ख़ुद यही सवाल पूछ रहा था।

वनवास में बैठे युधिष्ठिर ने एक दिन ऋषि बृहदश्व से कहा — "महाराज, मैं जुए में सब हार गया। पत्नी का भरी सभा में अपमान हुआ। भाई अर्जुन दूर है। क्या पृथ्वी पर मुझसे ज़्यादा अभागा कोई राजा है?"

और ऋषि ने कहा — "है। एक राजा था, जो तुमसे भी ज़्यादा दुखी था। सुनो।"

और फिर शुरू हुई नल और दमयन्ती की कथा।

निषध देश के राजा नल। रूप में ऐसे, मानो कामदेव। और विदर्भ की राजकुमारी दमयन्ती। दोनों ने एक-दूसरे को कभी देखा नहीं। बस लोगों से गुण सुने… और प्रेम हो गया।

और संदेश किसने पहुँचाया? सुनहरे पंखों वाले हंसों ने! नल ने एक हंस पकड़ा, हंस बोला — "मुझे छोड़ दो, मैं दमयन्ती से तुम्हारी ऐसी बातें करूँगा कि वो किसी और को सोचेगी भी नहीं।"

फिर स्वयंवर। और पहली दिलचस्प बात। दमयन्ती को पाने के लिए चार देवता भी आए — इन्द्र, अग्नि, वरुण, यम। और चारों ने नल का ही रूप बना लिया!

अब सभा में दमयन्ती के सामने पाँच नल खड़े हैं। बिल्कुल एक जैसे। असली कौन?

दमयन्ती ने हाथ जोड़कर देवताओं से प्रार्थना की — "अगर मैंने सच्चे मन से नल को चुना है, तो मुझे उन्हें दिखा दीजिए।" और फिर उसने ध्यान से देखा।

छायाद्वितीयो म्लानस्रग्रजःस्वेदसमन्वितः । भूमिष्ठो नैषधश्चैव निमेषेण च सूचितः ॥
54.25

देवताओं को पसीना नहीं था। उनकी पलकें नहीं झपकती थीं। मालाएँ ताज़ी थीं, पैर ज़मीन नहीं छूते थे। और एक के माथे पर पसीना था। माला थोड़ी मुरझाई थी। पैरों में धूल थी। उसकी परछाईं थी। और वो पलक झपका रहा था।

और दमयन्ती ने उसी को माला पहनाई। देवताओं को छोड़कर, एक पसीने वाले, धूल वाले इंसान को।

प्रेम ने चमक नहीं चुनी। उसने सच्चाई चुनी।

बारह साल सब ठीक रहा। दो बच्चे हुए — इन्द्रसेन और इन्द्रसेना। और फिर… कलि, यानी कलियुग का देवता, जो दमयन्ती के स्वयंवर से चिढ़ा था, नल के अंदर घुस गया।

और नल ने अपने भाई पुष्कर के साथ जुआ खेलना शुरू किया। एक दाँव, दूसरा दाँव। सोना गया, रथ गए, घोड़े गए। प्रजा दरवाज़े पर आकर खड़ी हुई — "महाराज, रुकिए!" नल ने किसी की नहीं सुनी। दमयन्ती की भी नहीं।

और यहाँ दमयन्ती की समझदारी देखिए। जब उसने देखा कि सब डूब रहा है, तो उसने सारथि को बुलाया — "बच्चों को रथ में बिठाकर मेरे पिता के घर छोड़ आओ।" डूबते जहाज़ से पहले बच्चों को उतार दिया।

और महीनों के जुए के बाद… नल सब हार गया। राज्य भी। पुष्कर हँसा — "अब दमयन्ती का दाँव लगाओगे?"

नल ने वो दाँव नहीं लगाया। बस एक कपड़ा पहने, सब छोड़कर, नगर से निकल गया। और दमयन्ती, एक कपड़े में, उसके पीछे-पीछे।

भूखे, प्यासे, जंगल में भटकते हुए। एक दिन नल को सुनहरे पक्षी दिखे। सोचा, "आज खाना मिलेगा।" अपना इकलौता कपड़ा उन पर फेंका… और पक्षी कपड़ा लेकर उड़ गए! ऊपर से बोले — "मूर्ख, हम वही पासे हैं।"

अब नल के पास अपना कपड़ा भी नहीं। दमयन्ती ने अपने आधे वस्त्र में उसे ढका। और तब दमयन्ती ने वो बात कही —

न च भार्यासमं किंचिन्नरस्यार्तस्य भेषजम् । नित्यं हि सर्वदुःखेषु सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
58.30

"दुखी आदमी के लिए, हर दुःख में… पत्नी के जैसी कोई दवा नहीं। मैं सच कहती हूँ।"

पर कलि अभी भी नल के अंदर था।

एक रात, एक सूनी धर्मशाला में, दोनों ज़मीन पर सोए। दमयन्ती थककर गहरी नींद में। और नल जागता रहा। सोचता रहा — "मेरे साथ ये दुःख ही पाएगी। अकेली होगी, तो शायद पिता के घर पहुँच जाए।"

उसे एक तलवार मिली। उसने सोती हुई दमयन्ती का आधा वस्त्र काटा, ख़ुद ओढ़ा… और चल पड़ा।

गत्वागत्वा नलो राजा पुनरेति सभां मुहुः । आकृष्यमाणः कलिना सौहृदेनावकृष्यते ॥
59.27

और महाभारत कहता है — नल जाता, फिर लौट आता। फिर जाता, फिर लौट आता। कलि उसे दूर खींचता था… और प्रेम उसे वापस खींच लाता था। जैसे झूला।

और आख़िर में… वो चला गया।

दमयन्ती जागी। "महाराज! कहाँ हो? ये मज़ाक़ बहुत हुआ!" और फिर समझी। रोती, गिरती, उठती, जंगल में दौड़ने लगी।

और अब दूसरी बात, जो दमयन्ती का असली रूप दिखाती है। एक अजगर ने उसे पकड़ लिया। और निगले जाते हुए भी वो रो किसके लिए रही थी? "हे राजन्, जब तुम थके-भूखे होगे, तो तुम्हारी थकान कौन उतारेगा?"

श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य परिग्लानस्य नैषध । कः श्रमं राजशार्दूल नाशयिष्यति तेऽनघ ॥
60.25

एक शिकारी ने उसे बचाया, फिर बुरी नीयत से पास आया। और दमयन्ती ने बस इतना कहा — "अगर मैंने नल के सिवा किसी को मन से भी नहीं सोचा, तो ये गिर पड़े।" और वो गिर पड़ा। अकेली, आधे वस्त्र में, जंगल में… पर टूटी नहीं।

और नल? उसे जंगल की आग में फँसा एक नाग मिला — कर्कोटक। "राजन्, मुझे बचाओ।" नल ने उसे उठाया, बाहर लाया। और नाग ने उसे डस लिया!

डस लिया? जिसने बचाया, उसी को?

और यही है इस कथा का तीसरा, सबसे गहरा रहस्य। उस विष से नल का रूप बदल गया। कोई उसे पहचान नहीं सकता था। और नाग बोला —

ततः कर्कोटको नागः सान्त्वयन्नलमब्रवीत् । मया तेऽन्तर्हितं रूपं न त्वां विद्युर्जना इति ॥
63.14

"मैंने तुम्हारा रूप छिपाया है, ताकि लोग तुम्हें पहचान न सकें। और जिसने तुम्हें ठगा — कलि — वो अब मेरे विष से तुम्हारे अंदर जलेगा।"

जो डंक लगा था… वो दवा थी। ज़िंदगी में कई बार जो चोट सबसे ज़्यादा दुखती है, बाद में पता चलता है, वही रक्षा थी।

नल "बाहुक" नाम से अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण का सारथी बन गया। और एक दिन, एक बहेड़े के पेड़ के पत्ते-फल गिनते हुए, राजा से पासों का रहस्य सीख लिया। और उसी पल… कलि काँपता हुआ उसके शरीर से निकल भागा!

उधर दमयन्ती, पिता के घर पहुँचकर, चैन से नहीं बैठी। ब्राह्मणों को दसों दिशाओं में भेजा। और एक तरकीब निकाली — ख़बर फैलाई कि दमयन्ती दूसरा स्वयंवर कर रही है, कल ही!

क्यों? क्योंकि वो जानती थी, दुनिया में सिर्फ़ एक सारथी है जो एक दिन में सौ योजन रथ ला सकता है। नल!

और बाहुक आया। कुरूप, बदला हुआ। पर दमयन्ती ने परखा, पहचाना… और जब आमने-सामने आए, तो दोनों की आँखों से आँसू बहने लगे।

दमयन्ती ने पूछा — "बाहुक, क्या तुमने कोई ऐसा आदमी देखा है, जो सोती हुई पत्नी को जंगल में छोड़ जाए?"

नल बोला — "मैं वही हूँ। वो मैंने नहीं, कलि ने किया था।" और फिर एक शक — "पर तुम दूसरा स्वयंवर क्यों…?"

दमयन्ती ने हाथ जोड़कर कहा — "हवा, सूरज, चाँद — ये तीनों साक्षी हैं। मैंने पाप किया हो, तो मेरे प्राण ले लें।"

एवमुक्ते ततो वायुरन्तरिक्षादभाषत । नैषा कृतवती पापं नल सत्यं ब्रवीमि ते ॥
74.41

और आकाश से पवन देव बोले — "नल, इसने कोई पाप नहीं किया। मैं सच कहता हूँ। तीन साल हम इसके साक्षी और रक्षक रहे हैं।" फूल बरसे।

नल ने नाग का दिया वस्त्र ओढ़ा, और अपना रूप वापस पाया। और दमयन्ती… दौड़कर उससे लिपट गई।

और अंत की एक बात, जो नल को सचमुच राजा बनाती है। नल ने लौटकर, एक ही दाँव में पुष्कर से राज्य जीत लिया। और फिर?

नाहं परकृतं दोषं त्वय्याधास्ये कथंचन । यथासुखं वै जीव त्वं प्राणानवसृजामि ते ॥
76.23

"जो दूसरे ने किया, उसका दोष मैं तुम पर नहीं डालूँगा। जाओ, सुख से जियो। तुम मेरे भाई हो। सौ बरस जियो।"

जिसने सब छीना था, उसे गले लगाकर, उसका हिस्सा देकर, विदा किया।

और ऋषि ने युधिष्ठिर से कहा — "नल ने अकेले इतना दुःख सहा, और फिर अच्छे दिन पाए। तुम तो भाइयों के साथ हो, द्रौपदी के साथ हो। फिर शोक कैसा? जब भाग्य उलटा हो, तब भीतर की ताक़त पकड़कर रखो।"

तो जो आज सब हार चुके हैं, या किसी से बिछड़े हैं, उनके लिए तीन बातें।

पहली। बिछड़ना अंत नहीं है। नल और दमयन्ती चौथे साल में फिर मिले। बीच के साल लंबे थे, पर मिलन हुआ।

दूसरी। जो डंक आज दुख रहा है, वो शायद कल की रक्षा है। कर्कोटक को याद रखिए।

और तीसरी। जब सब लौट आए, तो क्षमा कीजिए। नल ने पुष्कर से कहा — "वो तुमने नहीं, कलि ने किया था।" घर में भी, जो चोट दी गई, वो कई बार इंसान ने नहीं, उसके अंदर बैठे "कलि" ने दी थी।

तो जब ज़िंदगी पासे की तरह पलट जाए… जब अपने भी दूर हो जाएँ…

तो उस धर्मशाला को याद कीजिए, जहाँ एक राजा बार-बार जाता था, और प्रेम उसे बार-बार लौटा लाता था।

नल-दमयन्ती… जो टूटा था, वो जुड़ गया।

जय श्री कृष्ण।

न च भार्यासमं किंचिन्नरस्यार्तस्य भेषजम् । नित्यं हि सर्वदुःखेषु सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
वन 58.30

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.बिछड़ना अंत नहीं है। नल और दमयन्ती चौथे साल में फिर मिले। बीच के साल लंबे थे, पर मिलन हुआ।
  2. 2.जो डंक आज दुख रहा है, वो शायद कल की रक्षा है। कर्कोटक को याद रखिए।
  3. 3.जब सब लौट आए, तो क्षमा कीजिए। नल ने पुष्कर से कहा — "वो तुमने नहीं, कलि ने किया था।" घर में भी, जो चोट दी गई, वो कई बार इंसान ने नहीं, उसके अंदर बैठे "कलि" ने दी थी।

इस सत्संग के श्लोक

वन 58.30 54.25 58.30 59.27 60.25 63.14 74.41 76.23